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पंचतंत्र की कहानी: वंश की रक्षा (Panchtantra Ki Kahani: Frogs That Rode A Snake)

Panchtantra Ki Kahani

आज के हाईटेक युग में जब बच्चों को हर जानकारी कंप्यूटर/इंटरनेट पर ही मिल रही है, उनका पैरेंट्स से जुड़ाव कम हो रहा है. साथ ही उन्हें मोरल वैल्यूज़ (Moral Values) भी पता नहीं चल पाती, ऐसे में बेड टाइम स्टोरीज़ (Bed Time Stories) जैसे- पंचतंत्र (Panchtantra) की सीख देने वाली पॉप्युलर कहानियों के ज़रिए न स़िर्फ आपकी बच्चे से बॉन्डिंग स्ट्रॉन्ग होगी, बल्कि उन्हें अच्छी बातें भी पता चलती हैं.

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पंचतंत्र की कहानी: वंश की रक्षा (Panchtantra Ki Kahani: Frogs That Rode A Snake)

एक पर्वत प्रदेश में मन्दविष नाम का एक बूढ़ा सांप रहता था. एक दिन वह विचार करने लगा कि ऐसा क्या उपाय हो सकता है, जिससे बिना परिश्रम किए ही उसकी आजीविका चलती रहे. उसने बहुत सोचा और उसके मन में एक विचार आया.
वह पास के मेंढकों से भरे तालाब के पास चला गया. वहां पहुंचकर वह बड़ी बेचैनी से इधर-उधर घूमने लगा. उसे घूमते देखकर तालाब के किनारे एक पत्थर पर बैठे मेंढक को आश्‍चर्य हुआ तो उसने पूछा, “आज क्या बात है मामा? शाम हो गई है, पर तुम भोजन-पानी की व्यवस्था नहीं कर रहे हो?”

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सांप बड़े दुखी मन से कहने लगा, “क्या करूं बेटा, अब मैं बूढ़ा हो चला हूं. मुझे तो अब भोजन की अभिलाषा ही नहीं रह गई है. आज सवेरे ही मैं भोजन की खोज में निकल पड़ा था. एक सरोवर के तट पर मैंने एक मेंढक को देखा. मैं उसको पकड़ने की सोच ही रहा था कि उसने मुझे देख लिया. पास ही कुछ ब्राह्मण तपस्या में लीन थे, वह उनके बीच जाकर कहीं छिप गया. उसको तो मैंने फिर देखा नहीं, पर उसके भ्रम में मैंने एक ब्राह्मण के पुत्र को काट लिया, जिससे उसकी तत्काल मृत्यु हो गई. उसके पिता को इसका बड़ा दुख हुआ और उस शोकाकुल पिता ने मुझे शाप देते हुए कहा, “दुष्ट सांप! तुमने मेरे पुत्र को बिना किसी अपराध के काटा है, अपने इस अपराध के कारण तुमको मेंढकों का वाहन बनना पड़ेगा.”

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मैं बस अपने पाप का प्रायश्‍चित करना चाहता हूं और तुम लोगों के वाहन बनने के उद्देश्य से ही मैं यहां तुम लोगों के पास आया हूं.
मेंढक सांप से यह बात सुनकर अपने परिजनों के पास गया और उनको भी उसने सांप की वह बात बता दी. इस तरह से यह बात सब मेढकों तक पहुंच गई.

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उनके राजा जलपाद को भी इसकी ख़बर लगी. उसको यह सुनकर बड़ा आश्‍चर्य हुआ. सबसे पहले वही सांप के पास जाकर उसके फन पर चढ़कर बैठ गया. उसे चढ़ा हुआ देखकर अन्य सभी मेंढक उसकी पीठ पर चढ़ गए. सांप ने किसी को कुछ नहीं कहा.

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मन्दविष ने उन्हें तरह-तरह के करतब दिखाए. सांप की कोमल त्वचा का स्पर्श पाकर जलपाद तो बहुत ही प्रसन्न हुआ. इस प्रकार एक दिन निकल गया.

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दूसरे दिन जब वह उनको बैठाकर चला, तो उससे चला नहीं गया.  उसको देखकर जलपाद ने पूछा, “क्या बात है, आज आप चल नहीं पा रहे हैं?”
“हां, मैं आज भूखा हूं और इस उम्र में कमज़ोरी भी बहुत हो जाती है, इसलिए चलने में कठिनाई हो रही है.”

जलपाद बोला, “अगर ऐसी बात है, तो आप परेशना न हों. आप आराम से साधारण कोटि के छोटे-मोटे मेंढकों को खा लिया कीजिए और अपनी भूख मिटा लिया कीजिए.”

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इस प्रकार वह सांप अब रोज़ बिना किसी परिश्रम के अपना भोजन करने लगा. किन्तु वह जलपाद यह भी नहीं समझ पाया कि अपने क्षणिक सुख के लिए वह अपने वंश का नाश करने का भागी बन रहा है. धीरे-धीरे सांप ने अपनी चालाकी से सभी मेंढकों को खा लिया और उसके बाद एक दिन जलपाद को भी खा गया. इस तरह मेंढकों का पूरा वंश ही नष्ट हो गया.

 

सीख: अपने हितैषियों की रक्षा करने से हमारी भी रक्षा होती है.

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पंचतंत्र की कहानी: मूर्ख ब्राह्मण और तीन ठग (Panchtantra Ki Kahani: The Brahmin & Three Crooks)

Panchtantra Ki Kahani, The Brahmin,Three Crooks

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किसी गांव में एक ब्राह्मण रहता था. एक दिन वो दावत में गया जहां उसे यजमान से एक बकरा मिली. वो ख़ुशी ख़ुशी उसको लेकर अपने घर जा रहा था. रास्ता लंबा और सुनसान था. आगे जाने पर रास्ते में उसको ठगों ने देखा और सोचा कि क्यों न इससे यह बकरा हथिया लिया जाये. तीनों ठगों ने ब्राह्मण के कंधे पर बकरे को देखकर उसे हथियाने की योजना बनाई.

जैसे ही ब्राह्मण आगे गया एक ठग ने ब्राह्मण को रोककर कहा, “अरे पंडित जी यह क्या अनर्थ कर रहे हैं? आप अपने कंधे पर क्या उठा कर ले जा रहे हैं? आप तो ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण होकर कुत्ते को कंधों पर बैठा कर ले जा रहे हैं.”

ब्राह्मण ने क्रोधित होकर उसे झिड़कते हुए कहा, “पागल है क्या? या अंधा हो गया है? दिखाई नहीं देता यहकुत्ता नहीं बकरा है.”

पहले ठग ने फिर कहा, “खैर मेरा काम आपको बताना था. अगर आपको कुत्ता ही अपने कंधों पर ले जाना है तो मुझे क्या? आप जानें और आपका काम.”

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थोड़ी दूर चलने के बाद ब्राह्मण को दूसरा ठग मिला. उसने ब्राह्मण को रोका और कहा, “पंडित जी क्या हो गया है आपको? ब्राह्मण होकर मरी हुई बछिया को कंधे पर लादकर ले जा रहे हैं? उच्चकुल के लोगों को क्या यह शोभा देता है?”

पंडित उसे भी झिड़क कर आगे बढ़ गया. आगे जाने पर उसे तीसरा ठग मिला. उसने भी ब्राह्मण को टोका और कहा कि इस गधे को कंधे पर क्यों ले जा रहे हो? ब्राह्मण अब घबरा गया. उसको लगा कि ये ज़रूर कोई मायावी जीव है, जो बार बार रूप बदल रहा है, वरना इतने सारे लोग झूठ क्यों बोलेंगे?

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थोड़ी दूर जाकर, उसने बकरे को कंधे से उतार दिया और आगे बढ़ गया. इधर तीनों ठग ने उस बकरे को हथिया लिया और उस ब्राह्मण की मूर्खता पर उनको हंसी भी आई.

सीख: कहते हैं कि किसी झूठ को बार-बार बोलने से वह सच की तरह लगने लगता है, इसलिए अपने दिमाग से काम लें और अपने आप पर विश्वास करें.

पंचतंत्र की कहानी: चींटी और घमंडी हाथी (Panchtantra Ki Kahani: The Ant And The Elephant)

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पंचतंत्र की कहानी: चींटी और घमंडी हाथी (Panchtantra Ki Kahani: The Ant And The Elephant)

एक जंगल में चींटियों का झुंड रहता था, उसकी रानी बहुत मेहनती थी. सुबह-सुबह ही वो अपनी टोली के साथ खाने की तलाश में निकल पड़ती. इसी जंगल में एक घमंडी हाथी भी रहता था. वो जंगल में सभी जानवरों को परेशान करता था. कभी गंदे नाले से सूंड़ में पानी भरकर उन पर फेंक देता, तो कभी अपनी ताक़त का प्रदर्शन करके उन्हें डराता.

उस हाथी को इन चींटियों से बड़ी ईर्ष्या होती थी. वो उन्हें जब भी देखता, तो पैरों से कुचल देता. एक दिन चींटी रानी से हाथी से विनम्रता से पूछा कि आप दूसरों को क्यों परेशान करते हो? यह आदत अच्छी नहीं है.

यह सुनकर हाथी क्रोधित हो गया और उसने चींटी को धमकाया कि तुम अभी बहुत छोटी हो, अपनी ज़ुबान पर लगाम लगाकर रखो, मुझे मत सिखाओ कि क्या सही है, क्या ग़लत वरना तुम्हें भी कुचल दूंगा.

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यह सुन चींटी निराश हुई, लेकिन उसने मन ही मन हाथी को सब सिखाने की ठानी. चींटी पास ही एक झाड़ी में छिप गई और मौक़ा देखते ही चुपके से हाथी की सूंड़ में घुस गई. फिर उसने हाथी को काटना शुरु कर दिया. हाथी परेशान हो उठा. उसने सूंड़ को ज़ोर-ज़ोर से हिलाया, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ. हाथी दर्द से कराहने और रोने लगा. यह देख चींटी ने कहा कि हाथी भइया, आप दूसरों को परेशान करते हो, तो बड़ा मज़ा लेते हो, तो अब ख़ुद क्यों परेशान हो रहे हो?

हाथी को अपनी ग़लती का एहसास हो गया और उसने चींटी से माफ़ी मांगी कि आगे से वो कभी किसी को नहीं सताएगा.

चींटी को उस पर दया आ गई. वो बाहर आकर बोली कि कभी किसी को छोटा और कमज़ोर नहीं समझना चाहिए.

यह सुन हाथी बोला कि मुझे सबक मिल चुका है. मुझे अच्छी सीख दी तुमने. अब हम सब मिलकर रहेंगे और कोई किसी को परेशान नहीं करेगा.

सीख: घमंडी का सिर सदा नीचे होता है. कभी किसी को कमज़ोर और छोटा न समझें. दूसरों के दर्द व तकलीफ़ को समझना ही जीने का सही तरीक़ा है.

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पंचतंत्र की कहानी: चूहा, जिसने लोहे का तराजू ही खा लिया (Panchtantra Ki Kahani: The Rat Who Ate Iron Balance)

पंचतंत्र की कहानी: चूहा, जिसने लोहे का तराजू ही खा लिया

पंचतंत्र की कहानी: चूहा, जिसने लोहे का तराजू ही खा लिया

पंचतंत्र की कहानी: चूहा, जिसने लोहे का तराजू ही खा लिया (Panchtantra Ki Kahani: The Rat Who Ate Iron Balance)

किसी नगर में एक व्यापारी रहता था. वो बेहद सरल स्वभाव का और कोमल हृदय का था. काफ़ी दान-पुण्य भी करता था, लेकिन दुर्भाग्य से उसको व्यापार में काफ़ी नुक़सान हो गया और उसकी सारी संपत्ति समाप्त हो गई. उसने सोचा कि क्यों न किसी दूसरे नगर जाकर व्यापार किया जाए. उसके पास एक भारी और मूल्यवान तराजू था, जिसका वज़न बीस किलो था. उसने अपने तराजू को एक सेठ के पास धरोहर के रूप में रख दिया, क्योंकि इतने वज़नदार तराजू को लेकर जगह-जगह घूमना बेहद मुश्किल होता. तराजू सेठ के पास रखकर वो व्यापार करने दूर चला गया.

कई जगहों और देशोंय में घूम-घूमकर उसने काफ़ी धन कमाया और फिर वह घर वापस लौटा. उसने सोचा अब वो अपना तराजू भी वापस ले सकता है, तो एक दिन सेठ से अपना तराजू लेने चला गया. सेठ से तराजू मांगा, तो सेठ बेईमानी पर उतर गया और बोला, “क्या बताऊं भाई, तुम्हारे तराजू को तो चूहे खा गए.”


व्यापारी बड़ा हैरान-परेशान हुआ, फिर कुछ सोचा और सेठ से बोला, “सेठ जी, अब इसमें आपका क्या कुसूर. जब चूहे तराजू को खा ही गए, तो आप कर भी क्या कर सकते हैं! मैं नदी में स्नान करने जा रहा हूं, यदि आप अपने पुत्र को मेरे साथ नदी तक भेज देंगे, तो बड़ी कृपा होगी.”
सेठ मन-ही-मन डर भी रहा था कि व्यापारी उस पर चोरी का आरोप न लगा दे, लेकिन वो बेहद लालची भी था, तो उसने सोचा अपने पुत्र को बता दे कि जब यह व्यापारी नदी में स्नान करेगा, तो उसके गहने व कपड़े बहाने से चुरा ले. इसलिए उसने अपने पुत्र को उसके साथ भेज दिया.
स्नान करने के बाद व्यापारी सेठ के लड़के को बहाने से पास ही की एक गुफा में ले गया और उसने लड़के को उस गुफा में छिपा दिया और गुफा का द्वार चट्टान से बंद कर दिया. फिर वो अकेला ही सेठ के पास लौट आया, तो सेठ ने पूछा, “मेरा बेटा कहा रह गया?”
इस पर व्यापारी ने उत्तर दिया, “जब हम नदी किनारे बैठे थे, तो एक बड़ा सा बाज आया और झपट्टा मारकर आपके पुत्र को उठाकर ले गया.”

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सेठ क्रोधित हो उठा और आग-बबूला होते उसने वो चिल्लाने लगा, “तुम झूठे बोल रहे हो. तुम एक नंबर के मक्कार हो. कोई बाज इतने बड़े लड़के को उठाकर कैसे ले जा सकता है? यह असंभव है. तुम मेरे पुत्र को वापस ले आओ, वरना मैं राजा से तुम्हारी शिकायत करूंगा.”
व्यापारी ने कहा, “आप ठीक कहते हैं, हमें राजा के पास ही चलना चाहिए.”
दोनों न्याय के लिए दरबार में पहुंचे.


सेठ ने व्यापारी पर अपने पुत्र के अपहरण का आरोप लगाया. न्यायाधीश ने व्यापारी से पूरी कहानी पूछी, तो उसने कहा, “मैं नदी के तट पर बैठा हुआ था. इसी बीच एक बड़ा-सा बाज झपटा और सेठ के लड़के को पंजों में दबाकर उड़ गया. मैं उसे कैसे वापस कर सकता हूं.”
न्यायाधीश ने हैरानी से कहा, “भला ऐसा कैसे संभव हो सकता है. तुम ज़रूर झूठ बोलते हो. एक बाज पक्षी इतने बड़े लड़के को कैसे उठाकर ले जा सकता है?”

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इस पर व्यापारी ने कहा, “क्यों नहीं, यदि बीस किलो भार का मेरा लोहे का तराजू एक साधारण चूहा खाकर पचा सकता है, तो बाज भी सेठ के लड़के को उठाकर ले जा सकता है.”
न्यायाधीश समझ गया कि ज़रूर दाल में कुछ काला है, कोई न कोई बात तो ज़रूर है, उसने सेठ से क्रोधित होकर पूछा, “यह क्या मामला है?”
डर के मारे अंततः सेठ ने स्वयं सारी बात उगल दी. सब कुछ सुनकर न्यायाधीश समझ गया था. उसने सेठ से कहा, “तुम इसका तराजू वापस कर दो, तुम्हें भी तुम्हारा पुत्र मिल जाएगा.”


व्यापारी को उसका तराजू सेठ ने दे दिया और सेठ का पुत्र उसे वापस मिल गया.

सीख: लालच बुरी बला है. चालाकी से आप कुछ समय के लिए तो फ़ायदा ले सकते हो, लेकिन यह छल-कपट और लालच अंत में आपको ही नुक़सान पहुंचाएगा. बेहतर है, इमानदर रहें और मेहनत में विश्‍वास रखें.

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पंचतंत्र की कहानी: दो मुंहवाला पंछी (Panchtantra Ki Kahani: The Bird with Two Heads)

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पंचतंत्र की कहानी: दो मुंहवाला पंछी (Panchtantra Ki Kahani: The Bird with Two Heads)

एक जंगल में एक सुंदर-सा पंछी रहता था. यह पंछी अपनेआप में बेहद अनोखा था, क्योंकि इसके दो मुंह थे. दो मुंह होने के बाद भी इसका पेट एक ही था. यह पंछी यहां-वहां घूमता, कभी झील के किनारे, तो कभी पेड़ों के आसपास.
एक दिन की बात है, यह पंछी एक सुंदर-सी नदी के पास से गुज़र रहा था कि तभी उसमें से एक मुंह की नज़र एक मीठे फल पर पड़ी. वो वहां गया और फल को देखकर बहुत ख़ुश हुआ. उसने फल तोड़ा और उसे खाने लगा. फल बेहद मीठा और स्वादिष्ट था. उसने फल खाते हुए दूसरे मुंह से कहा, “यह तो बहुत ही मीठा और स्वादिष्ट फल है. बिल्कुल शहद जैसा. मज़ा आ गया इसे खाकर.”

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उसकी बात सुनकर दूसरे मुंह ने कहा, “मुझे भी यह फल चखाओ. मैं भी इसे खाना चाहता हूं.”
पहले मुंह ने कहा, “अरे, तुम इसे खाकर क्या करोगे? मैंने कहा न कि यह एकदम शहद जैसा है और वैसे भी हमारे पेट तो एक ही है न. तो मैं खाऊं या तुम, क्या फ़र्क़ पड़ता है.”
दूसरे मुंह को यह सुनकर बहुत दुख हुआ. उसने सोचा यह कितना स्वार्थी है. उसने पहले मुंह से बात करना बंद कर दिया और मन ही मन उससे बदला लेने की ठानी.

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कुछ दिनों तक दोनों में बातचीत बंद रही. फिर एक दिन जब वो कहीं घूम रहे थे, तभी दूसरे मुंह की नज़र भी एक फल पर पड़ी. वो फल ज़हरीला था. उसने सोचा कि बदला लेने का यह सही मौक़ा है. उसने कहा, “मुझे यह फल खाना है.”
पहले मुंह ने कहा, “यह बहुत ही ज़हरीला फल है, इसे खाकर हम मर जाएंगे.”
दूसरे मुंह ने कहा, “मैं इसे खा रहा हूं, तुम नहीं, तो तुम्हें कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए.”
पहले मुंह ने कहा, “हमारे मुंह भले ही दो हैं, लेकिन पेट तो एक ही है न. तुम खाओगे, तो हम दोनों मर जाएंगे. इसे मत खाओ.”
लेकिन पहले मुंह न एक न सुनी और उसने वह ज़हरीला फल खा लिया. धीरे-धीरे ज़हर ने अपना असर दिखाया और वह दो मुंहवाला अनोखा पंछी मर गया.

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सीख: स्वार्थ से बचकर एकता की शक्ति को पहचानना चाहिए. स्वार्थ हमेशा ख़तरनाक होता है, जबकि एकता का बल बहुत अधिक होता है.

 

पंचतंत्र की कहानी: चतुर लोमड़ी (Panchtantra Ki Kahani: The Clever Fox)

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पंचतंत्र की कहानी: चतुर लोमड़ी (Panchtantra Ki Kahani: The Clever Fox)

एक जंगल में शेर, लोमड़ी और गधे नए-नए दोस्त बने. तीनों ने मिलकर शिकार करने की योजना बनाई और सबने मिलकर यह फैसला लिया कि शिकार के तीन हिस्से होंगे और तीनों का शिकार पर बराबर का हक होगा. तीनों ही फिर निकल पड़े शिकार की तलाश में.

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थोड़ी देर बाद ही उन्हें जंगल में एक हिरण नज़र आया. वो हिरण इन सबसे बेख़बर अपना भोजन कर रहा था. लेकिन जैसे ही हिरण ने ख़तरे को भांपा, वो तेज़ी से दौड़ पड़ा. लेकिन वो कब तक इनसे भागता, आख़िर ये तीन थे और वो अकेला. आख़िरकार वो थक कर चूर हो गया.

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शेर ने मौका देखते ही उस पर हमला बोल दिया और उसे मार गिराया.तीनों बहुत ख़ुश हुए. शेर ने गधे से कहा, “शिकार के तीन हिस्से कर दो दोस्त.” गधे ने शिकार के तीन बराबर हिस्से कर दिए, लेकिन यह बात शेर को पसंद नहीं आई और वो ग़ुस्से से दहाड़ने लगा. शेर ने गधे पर भी हमला बोल दिया और देखते ही देखते अपने नुकीले दांतों और पंजों से उसे दो हिस्सों में काटकर अलग कर दिया.

उसके बाद उसने लोमड़ी से कहा, “लोमड़ी, तुम भी अपना हिस्सा क्यों नहीं ले लेती?”
लोमड़ी बहुत ही चतुर और समझदार थी. उसने हिरण का एक चौथाई हिस्सा ही अपने लिए लिया और बाकी का तीन चौथाई हिस्सा शेर के लिए छोड़ दिया.

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ये देख शेर बेहद प्रसन्न हुआ और ख़ुश होकर बोला, “वाह! लोमड़ी मेरी दोस्त, तुमने भोजन की बिल्कुल सही मात्रा मेरे लिए छोड़ी है… तुम सचमुच बहुत ही समझदार हो. आख़िर तुमने इतने समझदारी कहां से सीखी?”

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लोमड़ी ने जवाब दिया, “महाराज! दरअसल, इस बेव़कूफ़ गधे की हालत व दुर्दशा देखकर ही मैं समझ गई थी कि आप क्या चाहते हैं. इसकी बेव़कूफ़ी से ही मैंने सीख ली.

सीख: स़िर्फ अपनी ही ग़लतियों से नहीं, दूसरों की ग़लतियों से भी सीखना चाहिए. जी हां, दूसरों की ग़लतियां भी आपकी सीख का कारण बन सकती है, ज़रूरी नहीं कि आप अपनी ग़लती होने का ही इंतज़ार करें! समझदार व्यक्ति दूसरों की ग़लतियों से भी सीख ले लेता है.

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पंचतंत्र की कहानी: भालू और दो मित्र (Panchtantra Ki Kahani: Bear And Two Friends)

भालू और दो मित्र, Bear And Two Friends

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पंचतंत्र की कहानी: भालू और दो मित्र (Panchtantra Ki Kahani: Bear And Two Friends)

दो दोस्त एक घने जंगल से होकर कहीं जा रहे थे. दोनों काफ़ी गहरे दोस्त थे और अपनी दोस्ती को लेकर दोनों ही बातें करते हुए जा रहे थे. जंगल बहुत ही घना था, तो उनमें से एक दोस्त (friend) डर रहा था, लेकिन उसके साथी मित्र ने कहा कि मेरे होते हुए तुम्हें डरने की कोई ज़रूरत नहीं. मैं तुम्हारा सच्चा और अच्छा मित्र हूं. इतने में ही सामने से ही बहुत ही बड़ा भालू (bear) उन्हें नज़र आया. जो दोस्त कह रहा था कि मैं अच्छा मित्र हूं, वो भालू को देखते ही भाग खड़ा हुआ. दूसरा मित्र कहता रहा कि मुझे छोड़कर मत भागो, लेकिन वो भागते हुए एक पेड़ पर चढ़ गया.

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यह देख उसका मित्र और भी डर गया, क्योंकि वो पेड़ पर चढ़ना नहीं जानता था. इतने में वो भालू और भी नज़दीक आ गया था. जब वो बेहद क़रीब आने लगा, तो दूसरे मित्र के पास कोई चारा नहीं रहा और वो वहीं नीचे ज़मीन पर आंखें बंद करके लेट गया. पेड़ पर चढ़ा मित्र यह सारा नज़ारा देख रहा था और वो सोचने लगा कि ऐसे तो यह मर जाएगा. इतने में ही वो भालू नीचे लेटे मित्र के क़रीब आकर उसे देखने लगा, उसे सूंघा और उसके शरीर का पूरी तरह मुआयना करके आगे बढ़ गया.

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ज़मीन पर लेटे मित्र ने राहत की सांस ली और वो सोचने लगा कि अच्छा हुआ जो मैंने सांस रोक ली थी, क्योंकि भालू मुर्दों को नहीं खाते और वो भालू मुझे मरा हुआ जानकर आगे बढ़ गया.

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पेड़ पर चढ़ा मित्र बहुत हैरान था. भालू के जाने के बाद वो नीचे उतरा और उसने अपने मित्र से पूछा कि आख़िर उसने क्या किया था और वो भालू उसके कान में क्या कह रहा था. मुर्दा होने का नाटक कर रहे मित्र ने कहा कि भालू ने मेरे कान में कहा कि बुरे व़क्त में ही सही दोस्तों की पहचान होती है, इसलिए कभी भी ऐसे दोस्तों के साथ मत रहो, जो बुरा समय देखकर तुम्हें अकेले छोड़कर भाग जाएं और जो व़क्त पर काम ही न आएं. दूसरे मित्र को समझते देर न लगी और फिर दोनों आगे बढ़ गए.

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सीख: सच्चा दोस्त वही होता है, जो बुरे से बुरे व़क्त में भी अपने मित्र का साथ नहीं छोड़ता और मुसीबत के समय अपने मित्र की मदद करता है.

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पंचतंत्र की कहानी: कौवा और कोबरा (Panchtantra Ki Kahani: The Cobra And The Crows)

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पंचतंत्र की कहानी: कौवा और कोबरा (Panchtantra Ki Kahani: The Cobra And The Crows)

बहुत साल पुरानी बात है, एक धनवान राज्य में बहुत बड़ा और पुराना बरगद का पेड़ था. उस पेड़ पर एक कौआ-कव्वी (Crows) का जोड़ा अपने घोसले में रहता था. ये जोड़ा दिनभर भोजन की तलाश में बाहर रहता और शाम होते ही लौट आता. उसी पेड़ के पास एक दुष्ट सांप  (Cobra) भी रहता था. कौआ-कव्वी का जोड़ा बहुत आराम से गुज़र-बसर कर रहा था. इसी बीच कव्वी ने अंडे दिए, दोनों बेहद ख़ुश थे. लेकिन एक दिन जब वो बाहर गए, तो सांप उनके अंडों को खा गया.

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दोनों बहुत रोये. अब हर साल मौसम आने पर कव्वी अंडे देती और वो सांप (Snake) मौक़ा पाकर उनके घोसले में जाकर अंडे खा जाता. वो दोनों ही समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर उनके बच्चों का दुश्मन कौन है? लेकिन जल्द हो वो समझ कि हो न हो यह काम उस सांप का ही है. सांप तो अंडे खाकर चला गया, लेकिन कव्वी के दिल पर जो बीता वो सोचा भी नहीं जा सकता था. कौए ने अपनी पत्नी को ढाढस बंधाया, “अब हमें शत्रु का पता चल चूका है, तो हम कुछ उपाय भी ज़रूर सोच लेंगे.”

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कौए ने काफ़ी सोचा और अपनी मित्र लोमडी से सलाह लेने दोनों उसके पास गए. लोमडी ने अपने मित्रों की दुख भरी कहानी सुनी. लोमडी ने काफ़ी सोचने के बाद कहा “मित्रो! तुम्हें वह पेड छोडकर जाने की जरुरत नहीं हैं. मेरे पास एक तरकीब है, जिससे उस दुष्टसर्प से छुटकारा पाया जा सकता है.” लोमडी ने अपने चतुर दिमाग में आई तरकीब बताई. उन्होंने लोमडी को धन्यवाद दिया और अपने घर लौट आए.

अगले ही दिन योजना अमल में लानी थी. दरअसल उस प्रदेश की राजकुमारी एक सरोवर में अपनी सहेलियों के साथ जल-क्रीड़ा करने आती थी. उनके साथ अंगरक्षक तथा सैनिक भी आते थे.

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जब राजकुमारी और उनकी सहेलियां सरोवर में स्नान करने जल में उतरी तो योजना के अनुसार कौआ उडता हुआ वहां आया. उसने पहले तो राजकुमारी तथा सहेलियों का ध्यान अपनी और आकर्षित करने के लिए ‘कांव-कांव’ का शोर मचाया. फिर राजकुमारी तथा उसकी सहेलियों द्वारा उतारकर रखे गए कपडों व आभूषणों में से राजकुमारी का प्रिय हीरे व मोतियों का विलक्षण हार में से एक हार चोंच में दबाकर ऊपर उड़ गया. सभी सहेलियां चीखी, “वह राजकुमारी का हार उठाकर ले जा रहा हैं.”

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सैनिकों ने ऊपर देखा तो सचमुच एक कौआ हार लेकर धीरे-धीरे उड़ता जा रहा था. सैनिक उसी दिशा में दौडने लगे. कौआ सैनिकों को उसी पेड़ की ओर ले आया. जब सैनिक कुछ ही दूर रह गए तो कौए ने हार इस प्रकार गिराया कि वह सांप के खोल के भीतर जा गिरा.

सैनिक दौड़कर खोल के पास पहुंचे, तो वहां हार और उसके पास में ही एक काले सर्प को देखा. सैनिकों ने भालों से उस सांप के टुकड़े-टुकड़े  कर डाले और वो दुष्ट सांप मर गया. कौआ-कव्वी बेहद खुश थे.

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सीख: शरीर से आप भले ही कमज़ोर हों, लेकिन सूझ बूझ का उपयोग कर हम बड़ी से बड़ी ताकत और दुश्मन को हरा सकते हैं, बुद्धि का प्रयोग करके हर संकट का हल निकाला जा सकता है.

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पंचतंत्र की कहानी: किसान और सांप (Panchtantra Ki Kahani: The Farmer And The Snake)

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पंचतंत्र की कहानी: किसान और सांप (Panchtantra Ki Kahani: The Farmer And The Snake)

एक गांव में एक किसान (Farmer) रहता था. उसकी सारी ज़मीन पिछले 2-3 सालों से सूखे की मार झेल रही थी और वो पूरी तरह सूख चुकी थी. सर्दी का मौसम आ चुका था. किसान पेड़ के नीचे आराम कर रहा था. शाम हो चुकी थी. तभी उसकी नज़र पास बने बिल पर गई, वहां एक सांप (Snake) अपना फन उठाए बैठा था.

किसान के मन में एक बात आई कि यह सांप तो सालों से यहीं रहता होगा, लेकिन मैंने इसकी कभी पूजा नहीं की और शायद यही वजह है कि मेरी सारी ज़मीन सूख चुकी है. किसान ने ठान लिया कि मैं हर रोज़ सांप की पूजा किया करूंगा.

किसान एक कटोरे में दूध (Milk) ले आया और बिल के पास रखकर कहने लगा, “हे नागराज, मुझे नहीं पता था कि आप यहां रहते हैं, इसलिए मैंने कभी आपकी पूजा नहीं की. मुझे क्षमा करें, अब से मैं रोज़ आपकी पूजा करूंगा…” किसान सोने चला गया. सुबह देखा, तो उस दूध के कटोरे में कुछ चमक रहा था. पास जाकर किसान ने देखा, तो वह सोने का सिक्का था. अब तो यह रोज़ का सिलसिला हो गया था. किसान रोज़ सांप को दूध पिलाता और उसे सुबह एक सोने का सिक्का  (Gold Coin) मिलता.

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एक दिन किसान को किसी काम से दूसरे गांव जाना पड़ा, तो उसने अपने बेटे को रोज़ सांप को दूध पिलाने को कहा. किसान के बेटे ने वैसा ही किया.

अगली सुबह उसे भी सोने का सिक्का मिला. उसके बेटे ने सोचा कि यह सांप तो बड़ा कंजूस है. ज़रूर उसके बिल में बहुत-से सोने के सिक्के होंगे, लेकिन यह तो बस रोज़ एक ही सिक्का देता है. अगर मैं इसको मार दूं, तो मुझे सारा का सारा सोना मिल जाएगा.

अगली शाम लड़का जब दूध देने गया, तो उसने सांप को देखते ही उस पर छड़ी से वार किया, जिससे सांप ने विकराल रूप धारण कर लिया और उसे डस लिया. ज़ख़्मी सांप उसके बाद अपने बिल में चला गया. किसान के रिश्तेदारों ने उसके बेटे का अंतिम संस्कार कर दिया.

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जब किसान लौटा, तो अपने बेटे की मृत्यु की ख़बर से बहुत व्यथित हुआ. उसे सांप पर भी बहुत क्रोध आया, लेकिन सांप ने उसे सारी सच्चाई बताई, तो किसान ने कहा. “मुझे पता है कि ग़लती मेरे बेटे की थी, उसकी तरफ़ से मैं माफ़ी मांगता हूं. किसान ने उसे दूध दिया और उससे फिर माफ़ी मांगते हुए कहा, “कृपया मेरे बेटे को माफ़ करें.” सांप ने कहा, “उन लकड़ियों के ढेर को और मेरे सिर को देखो, दरअसल यह न तो तुम्हारे बेटे का दोष था और न ही मेरा. परिस्थिति ही कुछ ऐसी बन गई थी कि यह सब कुछ हो गया. यह भाग्य का ही खेल था. भाग्य के आगे हम सब मजबूर हैं.

सीख: यह सच है कि भाग्य अपना खेल खेलता है, लेकिन हमारे कर्म भी मायने रखते हैं. लालच का फल हमेशा बुरा ही होता है. कभी भी लालच में आकर ऐसा काम नहीं करना चाहिए, जिससे दूसरों को हानि पहुंचाने की सोचें, वरना लेने के देने पड़ सकते हैं.

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पंचतंत्र की कहानी: आलसी ब्राह्मण (Panchtantra Ki Kahani: The Lazy Brahmin)

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पंचतंत्र की कहानी: आलसी ब्राह्मण (Panchtantra Ki Kahani: The Lazy Brahmin)

बहुत समय की बात है. एक गांव में एक ब्राह्मण अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था. उसकी ज़िंदगी में बेहद ख़ुशहाल थी. उसके पास भगवान का दिया सब कुछ था. सुंदर-सुशील पत्नी, होशियार बच्चे, खेत-ज़मीन-पैसे थे. उसकी ज़मीन भी बेहद उपजाऊ थी, जिसमें वो जो चाहे फसल उगा सकता था. लेकिन एक समस्या थी कि वो ख़ुद बहुत ही ज़्यादा आलसी था. कभी काम नहीं करता था. उसकी पत्नी उसे समझा-समझा कर थक गई थी कि अपना काम ख़ुद करो, खेत पर जाकर देखो, लेकिन वो कभी काम नहीं करता था. वो कहता, “मैं कभी काम नहीं करूंगा.” उसकी पत्नी उसके अलास्य से बेहद परेशान रहती थी, लेकिन वो चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती थी. एक दिन एक साधु ब्राह्मण के घर आया और ब्राह्मण ने उसका ख़ूब आदर-सत्कार किया. ख़ुश होकर सम्मानपूर्वक उसकी सेवा की. साधु ब्राह्मण की सेवा से बेहद प्रसन्न हुआ और ख़ुश होकर साधु ने कहा कि “मैं तुम्हारे सम्मान व आदर से बेहद ख़ुश हूं, तुम कोई वरदान मांगो.” ब्राह्मण को तो मुंहमांगी मुराद मिल गई. उसने कहा, “बाबा, कोई ऐसा वरदान दो कि मुझे ख़ुद कभी कोई काम न करना पड़े. आप मुझे कोई ऐसा आदमी दे दो, जो मेरे सारे काम कर दिया करे.”

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बाबा ने कहा, “ठीक है, ऐसा ही होगा, लेकिन ध्यान रहे, तुम्हारे पास इतना काम होना चाहिए कि तुम उसे हमेशा व्यस्त रख सको.” यह कहकर बाबा चले गए और एक बड़ा-सा राक्षसनुमा जिन्न प्रकट हुआ. वो कहने लगा, “मालिक, मुझे कोई काम दो, मुझे काम चाहिए.”
ब्राह्मण उसे देखकर पहले तो थोड़ा डर गया और सोचने लगा, तभी जिन्न बोला, “जल्दी काम दो वरना मैं तुम्हें खा जाऊंगा.”
ब्राह्मण ने कहा, “जाओ और जाकर खेत में पानी डालो.” यह सुनकर जिन्न तुरंत गायब हो गया और ब्राह्मण ने राहत की सांस ली और अपनी पत्नी से पानी मांगकर पीने लगा. लेकिन जिन्न कुछ ही देर में वापस आ गया और बोला, “सारा काम हो गया, अब और काम दो.”
ब्राह्मण घबरा गया और बोला कि अब तुम आराम करो, बाकी काम कल करना. जिन्न बोला, “नहीं, मुझे काम चाहिए, वरना मैं तुम्हें खा जाऊंगा.”

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ब्राह्मण सोचने लगा और बोला,“तो जाकर खेत जोत लो, इसमें तुम्हें पूरी रात लग जाएगी.” जिन्न गायब हो गया. आलसी ब्राह्मण सोचने लगा कि मैं तो बड़ा चतुर हूं. वो अब खाना खाने बैठ गया. वो अपनी पत्नी से बोला, “अब मुझे कोई काम नहीं करना पड़ेगा, अब तो ज़िंदगीभर का आराम हो गया.” ब्राह्मण की पत्नी सोचने लगी कि कितना ग़लत सोच रहे हैं उसके पति. इसी बीच वो जिन्न वापस आ गया और बोला, “काम दो, मेरा काम हो गया. जल्दी दो, वरना मैं तुम्हें खा जाऊंगा.”
ब्राह्मण सोचने लगा कि अब तो उसके पास कोई काम नहीं बचा. अब क्या होगा? इसी बीच ब्राह्मण की पत्नी बोली, “सुनिए, मैं इसे कोई काम दे सकती हूं क्या?”

ब्राह्मण ने कहा, “दे तो सकती हो, लेकिन तुम क्या काम दोगी?”
ब्राह्मण की पत्नी ने कहा, “आप चिंता मत करो. वो मैं देख लूंगी.”
वो जिन्न से मुखातिब होकर बोली, “तुम बाहर जाकर हमारे कुत्ते मोती की पूंछ सीधी कर दो. ध्यान रहे, पूंछ पूरी तरह से सीधी हो जानी चाहिए.”

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जिन्न चला गया. उसके जाते ही ब्राह्मण की पत्नी ने कहा, “देखा आपने कि आलस कितना ख़तरनाक हो सकता है. पहले आपको काम करना पसंद नहीं था और अब आपको अपनी जान बचाने के लिए सोचना पड़ रहा कि उसे क्या काम दें.”
ब्राह्मण को अपनी ग़लती का एहसास हुआ और वो बोला, “तुम सही कह रही हो, अब मैं कभी आलस नहीं करूंगा, लेकिन अब मुझे डर इस बात का है कि इसे आगे क्या काम देंगे, यह मोती की पूंछ सीधी करके आता ही होगा. मुझे बहुत डर लग रहा है. हमारी जान पर बन आई अब तो. यह हमें मार डालेगा.”
ब्राह्मण की पत्नी हंसने लगी और बोली, “डरने की बात नहीं, चिंता मत करो, वो कभी भी मोती की पूंछ सीधी नहीं कर पाएगा.”
वहां जिन्न लाख कोशिशों के बाद भी मोती की पूंछ सीधी नहीं कर पाया. पूंछ छोड़ने के बाद फिर टेढ़ी हो जाती थी. रातभर वो यही करता रहा.
ब्राह्मण की पत्नी ने कहा, “अब आप मुझसे वादा करो कि कभी आलस नहीं करोगे और अपना काम ख़ुद करोगे.”
ब्राह्मण ने पत्नी से वादा किया और दोनों चैन से सो गए.
अगली सुबह ब्राह्मण खेत जाने के लिए घर से निकला, तो देखा जिन्न मोती की पूंछ ही सीधी कर रहा था. उसने जिन्न को छेड़ते हुए पूछा, “क्या हुआ, अब तक काम पूरा नहीं हुआ क्या? जल्दी करो, मेरे पास तुम्हारे लिए और भी काम हैं.”
जिन्न बोला, “मालिक मैं जल्द ही यह काम पूरा कर लूंगा.”
ब्राह्मण उसकी बात सुनकर हंसते-हंसते खेत पर काम करने चला गया और उसके बाद उसने आलस हमेशा के लिए त्याग दिया.

सीख: आलस्य ही मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है. अपनी मदद आप करने से ही कामयाबी मिलती है और आलस करने से ज़िंदगी में बड़ी मुसीबतें आ सकती हैं.

 

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पंचतंत्र की कहानी: बन्दर और मगरमच्छ (Panchtantra Ki Kahani: Bandar Aur Magarmachh)

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पंचतंत्र की कहानी: बन्दर और मगरमच्छ (Panchtantra Ki Kahani: Bandar Aur Magarmachh)

एक नदी के किनारे एक जामुन के पेड़ पर एक बन्दर रहता था. उस पेड़ पर बहुत ही मीठे-मीठे जामुन लगते थे. एक दिन एक मगरमच्छ खाना तलाशते हुए पेड़ के पास आया. बन्दर ने उससे पूछा तो उसने अपने आने की वजह बताई. बन्दर ने बताया की यहाँ बहुत ही मीठे जामुन लगते हैं और उसने वो जामुन मगरमछ को दिए. उसकी मित्रता नदी में रहने वाले मगरमच्छ के साथ हो गयी. वह बन्दर उस मगरमच्छ को रोज़ खाने के लिए जामुन देता रहता था.

एकदिन उस मगरमच्छ ने कुछ जामुन अपनी पत्नी को भी खिलाये. स्वादिष्ट जामुन खाने के बाद उसने यह सोचकर कि रोज़ाना ऐसे मीठे फल खाने वाले का दिल भी खूब मीठा होगा, उसने अपने पति से कहा कि उसे उस बन्दर का दिल चाहिए और वो इसी ज़िद पर अड़ गई. उसने बीमारी का बहाना बनाया और कहा कि जब तक बन्दर का कलेजा उसे मिलेगा वो पायेगी.

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पत्नी कि ज़िद से मजबूर हुए मगरमच्छ ने एक चाल चली और बन्दर से कहा कि उसकी भाभी उसे मिलना चाहती है. बन्दर ने कहा कि वो भला नदी में कैसे जायेगा? मगरमच्छ ने उपाय सुझाया कि वह उसकी पीठ पर बैठ जाये, ताकि सुरक्षित उसके घर पहुँच जाए.

बन्दर भी अपने मित्र की बात का भरोसा कर, पेड़ से नदी में कूदा और उसकी पीठ पर सवार हो गया. जब वे नदी के बीचों-बीच पहुंचे, मगरमच्छ ने सोचा कि अब बन्दर को सही बात बताने में कोई हानि नहीं और उसने भेद खोल दिया कि उसकी पत्नी उसका दिल खाना चाहती है. बन्दर का दिल टूट गया, उसको धक्का तो लगा, लेकिन उसने अपना धैर्य नहीं खोया.

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बन्दर तपाक से बोला “ओह मेरे मित्र तुमने, यह बात मुझे पहले क्यों नहीं बताई क्योंकि मैंने तो अपना दिल जामुन के पेड़ में सम्भाल कर रखा है. अब जल्दी से मुझे वापस नदी के किनारे ले चलो ताकि मैं अपना दिल लाकर अपनी भाभी को उपहार में देकर उसे खुश कर सकूं.”

मूर्ख मगरमच्छ बन्दर को जैसे ही नदी-किनारे ले कर आया बन्दर ने ज़ोर से जामुन के पेड़ पर छलांग लगाई और क्रोध में भरकर बोला, “मूर्ख ,दिल के बिना भी क्या कोई ज़िन्दा रह सकता है ? जा, आज से तेरी-मेरी दोस्ती समाप्त.”

सीख: इससे पहली यह सीख मिलती है कि मुसीबत के क्षणों में धैर्य नहीं खोना चाहिए और अनजान से दोस्ती सोच समझकर करनी चाहिए.
– दूसरे, मित्रता का सदैव सम्मान करें.

पंचतंत्र की कहानी: बोलती गुफा (Panchtantra ki kahani: Bolti Gufa)

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पंचतंत्र की कहानी: बोलती गुफा (Panchtantra ki kahani: Bolti Gufa)

जंगल में एक बूढ़ा शेर मारा-मारा फिर रहा था. बुढ़ापे के कारण उसका शरीर कमज़ोर हो चूका था और यही वजह थी कि कई दिनों से उसे खाना भी नसीब नहीं हुआ था. बुढ़ापे के कारण वह शिकार नहीं कर पाता था. कोई भी जानवर उसके हाथ नहीं आ रहा था. छोटे-छोटे जानवर भी उसे चकमा देकर भाग जाते थे. एक बार वह भटकते-भटकते बहुत थक गया तो एक जगह पर रुककर सोचने लगा कि ऐसे कैसे काम चलेगा, क्या करूं ? किधर जाऊं? कैसे अपना पेट भरूं ? इस तरह तो मैं मर जाऊंगा.

अचानक उसकी नज़र एक गुफा पर पड़ी. उसने सोचा कि इस गुफा में कोई जंगली जानवर ज़रूर रहता होगा. मैं इस गुफा के अन्दर बैठ जाता हूं, जैसे ही वह जानवर आएगा, मैं उसे खाकर अपना पेट भर लूंगा. शेर उस गुफा के अंदर जाकर बैठ गया और अपने शिकार की प्रतीक्षा करने लगा.

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दरअसल, वह गुफा एक गीदड़ की थी. गीदड़ जैसे ही अपनी गुफा की तरफ बढ़ने लगा, उसने ने गुफा के करीब शेर के पंजों के निशान देखे. उसे समझते देर नहीं लगी और वो फौरन खतरा भांप गया. उसके सामने उसकी मौत थी, लेकिन सामने संकट देखकर भी उसने अपना संयम नहीं खोया बल्कि उसकी बुद्धि तेजी से काम करने लगी कि इस शत्रु से कैसे बचा जाए ?

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उसके दिमाग में नई बात आ ही गई, वह गुफा के द्वार पर खड़ा होकर बोला–‘‘ओ गुफा !’’
जब अंदर से गुफा ने कोई उत्तर न दिया, तो गीदड़ एक बार फिर बोला, ‘‘सुन गुफा ! तेरी मेरी यह संधि है कि मैं बाहर से आऊंगा, तो तेरा नाम लेकर बुलाऊंगा, जिस दिन तुम मेरी बात का उत्तर नहीं दोगी मैं तुझे छोड़कर किसी दूसरी गुफा में रहने चला जाऊंगा.’’
जवाब न मिलता देख गीदड़-बार-बार अपनी बात दोहराने लगा.

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अन्दर बैठे शेर ने गीदड़ की यह बात सुनी, तो वह यह समझ बैठा कि गुफा गीदड़ के आने पर बोलती होगी. शेर अपनी आवाज को मधुर बनाकर बोला, ‘‘अरे आओ गीदड़ भाई… स्वागत है!’’
‘‘अरे शेर मामा,  तुम हो? बुढ़ापे में तुम्हारी बुद्धि इतना भी नहीं सोच पा रही कि गुफाएं कभी नहीं बोलतीं… कहकर वह तेजी से पलटकर भागा. शेर ने उसे पकड़ने के लिए गुफा से बाहर तो ज़रूर आया, किंतु तब तक वह गीदड़ नौ दो ग्याह हो चुका था.

शिक्षा:  मुसीबत के समय में भी संयम नहीं खोना चाहिए और अपनी बुद्धि का दामन नहीं छोड़ना चाहिए.

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