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पंचतंत्र की कहानी: दो दोस्त और बोलनेवाला पेड़ (Panchtantra Story: Two Friends And A Talking Tree)

 

Panchtantra Story

दो दोस्त और बोलनेवाला पेड़ (Panchtantra Story: Two Friends And A Talking Tree)

एक गांव में मनोहर और धर्मचंद नाम के दो दोस्त रहते थे. एक बार वे कमाने के लिए अपना गांव छोड़कर बाहर गए. दूसरे शहर से वो दोनों ख़ूब सारा धन कमाकर लाए. उन्होंने सोचा कि इतना सारा धन घर में रखेंगे, तो ख़तरा हो सकता है. बेहतर होगा कि इसे घर में न रखकर कहीं और रख दें, इसलिए उन्होंने उस धन को नीम के पेड़ की जड़ में गड्ढा खोदकर दबा दिया.

दोनों में यह भी समझौता हुआ कि जब भी धन निकालना होगा, साथ-साथ आकर निकाल लेंगे. मनोहर बेहद भोला और नेक दिल इंसान था, जबकि धर्मचंद बेईमान था. वह दूसरे दिन चुपके से आकर धन निकालकर ले गया, उसके बाद वह मनोहर के पास आया और बोला कि चलो कुछ धन निकाल लाते हैं. दोनों मित्र पेड़ के पास आए, तो देखा कि धन गायब है.

Two Friends And A Talking Tree Story

धर्मचंद ने फौरन मनोहर पर इल्ज़ाम लगा दिया कि धन तुमने ही चुराया है. दोनों मे झगड़ा होने लगा. बात राजा तक पहुंची, तो राजा ने कहा कि कल नीम की गवाही के बाद ही कोई फैसला लिया जाएगा. ईमानदार मनोहर ने सोचा कि ठीक है नीम भला झूठ क्यों बोलेगा?
धर्मचंद भी ख़ुशी-ख़ुशी मान गया. दूसरे दिन राजा उन दोनों के साथ जंगल में गया. उनके गांव के अन्य लोग भी थे. सभी सच जानना चाहते थे. राजा ने नीम से पूछा- हे नीमदेव बताओ धन किसने लिया है?

मनोहर ने… नीम की जड़ से आवाज़ आई.

यह सुनते ही मनोहर रो पड़ा और बोला- महाराज, पेड़ झूठ नहीं बोल सकता, इसमें ज़रूर किसी की कोई चाल है. कुछ धोखा है.
राजा ने पूछा कैसी चाल?

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मैं अभी सिद्ध करता हूं महाराज. यह कहकर मनोहर ने कुछ लकड़ियां इकट्ठी करके पेड़ के तने के पास रखी और फिर उनमें आग लगा दी.
तभी पेड़ से बचाओ-बचाओ की आवाज़ आने लगी. राजा ने तुरंत सिपाहियों को आदेश दिया कि जो भी हो उसे बाहर निकालो. सिपाहियों ने फौरन पेड़ के खोल में बैठे आदमी को बाहर निकाल लिया. उसे देखते ही सब चौंक पड़े, क्योंकि वह धर्मचंद का पिता था. अब राजा सारा माजरा समझ गया.

Two Friends And A Talking Tree Hindi Story

उसने पिता-पुत्र को जेल में डलवा दिया और उसके घर से धन ज़ब्त करके मनोहर को दे दिया. साथ ही उसकी ईमानदारी सिद्ध होने पर और भी बहुत-सा ईनाम व धन दिया.

सीख: विपरीत परिस्थितियों में भी अपना आपा नहीं खोना चाहिए. अपनी समझ-बूझ से काम करना चाहिए. कठिन परिस्थितियों में भी डरने की बजाय उसका सामना करने की हिम्मत करें और शांत होकर अपने दिमाग से फैसले लें.

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पंचतंत्र की कहानी: तीन काम (Panchtantra Story:Three Tasks)

Panchtantra Story
पंचतंत्र की कहानी: तीन काम (Panchtantra Story:Three Tasks)

आज के हाईटेक युग में जब बच्चों को हर जानकारी कंप्यूटर/इंटरनेट पर ही मिल रही है, उनका पैरेंट्स से जुड़ाव कम हो रहा है. साथ ही उन्हें मोरल वैल्यूज़ (Moral Values) भी पता नहीं चल पाती, ऐसे में बेड टाइम स्टोरीज़ (Bed Time Stories) जैसे- पंचतंत्र (Panchtantra) की सीख देने वाली पॉप्युलर कहानियों के ज़रिए न स़िर्फ आपकी बच्चे से बॉन्डिंग स्ट्रॉन्ग होगी, बल्कि उन्हें अच्छी बातें भी पता चलती हैं.

एक बार दो गरीब दोस्त एक सेठ के पास काम मांगने जाते हैं. कंजूस सेठ उन्हें फ़ौरन काम पर रख लेता है और पूरे साल काम करने पर साल के अंत में दोनों को 12-12 स्वर्ण मुद्राएं देने का वचन देता है. साथ ही सेठ यह भी शर्त रखता है कि अगर उन्होंने काम ठीक से नहीं किया या किसी आदेश का पालन ठीक से नहीं किया, तो उस एक गलती के बदले 4 सुवर्ण मुद्राएं वो उनकी तनख्वाह से काट लेगा.

दोनों दोस्त सेठ की शर्त मान जाते हैं और पूरे साल कड़ी मेहनत करते हैं. दौड़-दौड़कर सारे काम करते और सेठ के हर आदेश का पालन करते. इस तरह पूरा साल बीत गया. दोनों सेठ के पास 12-12 स्वर्ण मुद्राएं मांगने जाते हैं, पर सेठ बोलता है कि अभी साल का आखरी दिन पूरा नहीं हुआ है और मुझे तुम दोनों से आज ही तीन और काम करवाने हैं. दोनों हैरान थे, पर क्या कर सकते थे. सेठ ने तीन काम बताने शुरू किए-

पहला काम: छोटी सुराही में बड़ी सुराही डालकर दिखाओ.
दूसरा काम: दुकान में पड़े गीले अनाज को बिना बाहर निकाले सुखाओ.
तीसरा काम: मेरे सर का सही-सही वज़न बताओ.
यह तो असंभव है… उन दोनों ने सेठ से कहा.

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सेठ की चालकी काम कर गई, उसने कहा कि ठीक है तो फिर यहां से चले जाओ. इन तीन कामों को ना कर पाने के कारण मैं हर एक काम के लिए 4 स्वर्ण मुद्राएं काट रहा हूं. मक्कार सेठ की इस धोखाधड़ी से उदास हो कर दोनों दोस्त बोझिल मन से जाने लगते हैं. उन्हें रास्ते में एक चतुर पंडित मिलता है. उनके ऐसे चेहरे देखकर पंडित उनसे उनकी उदासी का कारण पूछता है और पूरी बात समझने के बाद उन्हें वापस सेठ पास भेजता है.

दोनों सेठ के पास पहुंचकर बोलते हैं, सेठजी अभी आधा दिन बाकी है, हम आपके तीनों काम कर देते हैं.

सेठ हैरान था, पर सोचा कि उसका क्या बिगड़ेगा. वो तीनों दुकान में जाते हैं. दोनों दोस्त अपना काम शुरू कर देते हैं. वो बड़ी सुराही को तोड़-तोड़कर उसके टुकड़े कर देते हैं और उन्हें छोटी के अन्दर डाल देते हैं. सेठ मन मसोसकर रह जाता है, पर कुछ कर नहीं पाता है.

इसके बाद दोनों गीले अनाज को दुकान के अन्दर फैला देते हैं, तो सेठ बोल पड़ता है कि स़िर्फ फैलाने से ये कैसे सूखेगा? इसके लिए तो धूप और हवा चाहिए, सेठ मुस्कुराते हुए कहता है.

देखते जाइए, ऐसा कहते हुए दोनों मित्र हथौड़ा उठा आगे बढ़ जाते हैं और दुकान की दीवार और छत तोड़ डालते हैं, जिससे वहां हवा और धूप दोनों आने लगती है.

क्रोधित मित्रों को सेठ और उसके आदमी देखते रह जाते हैं, पर किसी की भी उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं होती.

अब आख़िरी काम बचा होता है, दोनों मित्र तलवार लेकर सेठ के सामने खड़े हो जाते हैं और कहते हैं, मालिक आपके सिर का सही-सही वज़न तौलने के लिए इसे धड़ से अलग करना होगा. कृपया बिना हिले स्थिर खड़े रहें.

अब सेठ को समझ आ जाता है कि वह ग़रीबों का हक इस तरह से नहीं मार सकता और बिना आनाकानी के वह उन दोनों को 12-12 स्वर्ण मुद्राएं सौंप देता है.

सीख: बेईमानी का फल हमेशा बुरा ही होता है.

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पंचतंत्र की कहानी: वंश की रक्षा (Panchtantra Ki Kahani: Frogs That Rode A Snake)

Panchtantra Ki Kahani

आज के हाईटेक युग में जब बच्चों को हर जानकारी कंप्यूटर/इंटरनेट पर ही मिल रही है, उनका पैरेंट्स से जुड़ाव कम हो रहा है. साथ ही उन्हें मोरल वैल्यूज़ (Moral Values) भी पता नहीं चल पाती, ऐसे में बेड टाइम स्टोरीज़ (Bed Time Stories) जैसे- पंचतंत्र (Panchtantra) की सीख देने वाली पॉप्युलर कहानियों के ज़रिए न स़िर्फ आपकी बच्चे से बॉन्डिंग स्ट्रॉन्ग होगी, बल्कि उन्हें अच्छी बातें भी पता चलती हैं.

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पंचतंत्र की कहानी: वंश की रक्षा (Panchtantra Ki Kahani: Frogs That Rode A Snake)

एक पर्वत प्रदेश में मन्दविष नाम का एक बूढ़ा सांप रहता था. एक दिन वह विचार करने लगा कि ऐसा क्या उपाय हो सकता है, जिससे बिना परिश्रम किए ही उसकी आजीविका चलती रहे. उसने बहुत सोचा और उसके मन में एक विचार आया.
वह पास के मेंढकों से भरे तालाब के पास चला गया. वहां पहुंचकर वह बड़ी बेचैनी से इधर-उधर घूमने लगा. उसे घूमते देखकर तालाब के किनारे एक पत्थर पर बैठे मेंढक को आश्‍चर्य हुआ तो उसने पूछा, “आज क्या बात है मामा? शाम हो गई है, पर तुम भोजन-पानी की व्यवस्था नहीं कर रहे हो?”

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सांप बड़े दुखी मन से कहने लगा, “क्या करूं बेटा, अब मैं बूढ़ा हो चला हूं. मुझे तो अब भोजन की अभिलाषा ही नहीं रह गई है. आज सवेरे ही मैं भोजन की खोज में निकल पड़ा था. एक सरोवर के तट पर मैंने एक मेंढक को देखा. मैं उसको पकड़ने की सोच ही रहा था कि उसने मुझे देख लिया. पास ही कुछ ब्राह्मण तपस्या में लीन थे, वह उनके बीच जाकर कहीं छिप गया. उसको तो मैंने फिर देखा नहीं, पर उसके भ्रम में मैंने एक ब्राह्मण के पुत्र को काट लिया, जिससे उसकी तत्काल मृत्यु हो गई. उसके पिता को इसका बड़ा दुख हुआ और उस शोकाकुल पिता ने मुझे शाप देते हुए कहा, “दुष्ट सांप! तुमने मेरे पुत्र को बिना किसी अपराध के काटा है, अपने इस अपराध के कारण तुमको मेंढकों का वाहन बनना पड़ेगा.”

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मैं बस अपने पाप का प्रायश्‍चित करना चाहता हूं और तुम लोगों के वाहन बनने के उद्देश्य से ही मैं यहां तुम लोगों के पास आया हूं.
मेंढक सांप से यह बात सुनकर अपने परिजनों के पास गया और उनको भी उसने सांप की वह बात बता दी. इस तरह से यह बात सब मेढकों तक पहुंच गई.

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उनके राजा जलपाद को भी इसकी ख़बर लगी. उसको यह सुनकर बड़ा आश्‍चर्य हुआ. सबसे पहले वही सांप के पास जाकर उसके फन पर चढ़कर बैठ गया. उसे चढ़ा हुआ देखकर अन्य सभी मेंढक उसकी पीठ पर चढ़ गए. सांप ने किसी को कुछ नहीं कहा.

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मन्दविष ने उन्हें तरह-तरह के करतब दिखाए. सांप की कोमल त्वचा का स्पर्श पाकर जलपाद तो बहुत ही प्रसन्न हुआ. इस प्रकार एक दिन निकल गया.

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दूसरे दिन जब वह उनको बैठाकर चला, तो उससे चला नहीं गया.  उसको देखकर जलपाद ने पूछा, “क्या बात है, आज आप चल नहीं पा रहे हैं?”
“हां, मैं आज भूखा हूं और इस उम्र में कमज़ोरी भी बहुत हो जाती है, इसलिए चलने में कठिनाई हो रही है.”

जलपाद बोला, “अगर ऐसी बात है, तो आप परेशना न हों. आप आराम से साधारण कोटि के छोटे-मोटे मेंढकों को खा लिया कीजिए और अपनी भूख मिटा लिया कीजिए.”

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इस प्रकार वह सांप अब रोज़ बिना किसी परिश्रम के अपना भोजन करने लगा. किन्तु वह जलपाद यह भी नहीं समझ पाया कि अपने क्षणिक सुख के लिए वह अपने वंश का नाश करने का भागी बन रहा है. धीरे-धीरे सांप ने अपनी चालाकी से सभी मेंढकों को खा लिया और उसके बाद एक दिन जलपाद को भी खा गया. इस तरह मेंढकों का पूरा वंश ही नष्ट हो गया.

 

सीख: अपने हितैषियों की रक्षा करने से हमारी भी रक्षा होती है.

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पंचतंत्र की कहानी: दो सांपों की कहानी (Panchtantra Ki Kahani: The Tale Of Two Snakes)

Panchtantra Ki Kahani, The Tale Of Two Snakes

देवशक्ति  नाम का एक राजा था, वो बेहद परेशान था और उसकी परेशानी की वजह थी, उसका बेटा, जो बहुत कमज़ोर था. वह दिन व दिन और कमज़ोर होता जा रहा था.

कई प्रसिद्ध चिकित्सक भी उसे ठीक नहीं कर पा रहे थे. दूर-दराज़ के कई मशहूर चिकित्सकों को भी बुलाया गया, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ, क्योंकि उसके पेट में सांप था.

Panchtantra Ki Kahani, The Tale Of Two Snakes

वह राजकुमार भी अपनी कमज़ोरी और सेहत को लेकर बेहद परेशान था. अपने पिता को दुखी देखकर बहुत निराश भी था. अपनी ज़िंदगी से तंग आकर एक रात वह महल छोड़कर कहीं दूसरे राज्य में चला गया. उसने एक मंदिर में रहना शुरू कर दिया और अन्य लोग जो कुछ भी उसे दान देते थे,  उसी से उसका काम चल रहा था. वो वही खा-पी लेता था.

इस नए राज्य का जो राजा था, उसकी दो जवान बेटियां थीं. वे बेहद अच्छे संस्कारी और ख़ूबसूरत थीं. बेटियों में से एक ने कहा, पिताजी, आपके आशीर्वाद से हमें दुनिया के सभी सुख प्राप्त हैं, वहीं दूसरी बेटी ने कहा इंसान को स़िर्फ अपने कार्यों का ही फल मिलता है. दूसरी बेटी की इस टिप्पणी से राजा क्रोधित हो गया. एक दिन उसने अपने मंत्रियों को बुलाकर कहा कि इसे ले जाओ और इसका महल के बाहर किसी के भी साथ इसका विवाह कर दो. यह अपने कार्यों का फल भोगेगी.

मंत्रियों ने मंदिर में रह रहे युवा राजकुमार से उसका विवाह कर दिया, क्योंकि उन्हें कोई और नहीं मिल रहा था. राजकुमारी अपने पति को भगवान मानती थी. वह ख़ुश थी और अपनी शादी से संतुष्ट थी. उन्होंने देश के एक अलग हिस्से की यात्रा करने का निर्णय लिया, क्योंकि मंदिर में घर बनाना सही नहीं था.

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Panchtantra Ki Kahani, The Tale Of Two Snakes

चलते-चलते राजकुमार थक गया था और एक पेड़ की छाया के नीचे आराम करने लगा. राजकुमारी ने पास के बाज़ार से कुछ भोजन लाने का फैसला किया. जब वह लौटकर आई, तो उसने अपने पति को सोया देखा और पास के एक बिल से उभरते सांप को भी देखा. उसकी नज़र पति के मुख पर गई, तो उसने अपने पति के मुंह से उभरते हुए एक और सांप को देखा. वह छिपकर सब देखने लगी.

पेड़ के पास  के सांप ने दूसरे सांप से कहा,  तुम इस प्यारे राजकुमार को इतना दुःख क्यों दे रहे हो? इस तरह तुम खुद का जीवन खतरे में डाल रहे हो. अगर राजकुमार जीरा और सरसों का गर्म पानी पी लेगा, तो तुम मर जाओगे.

राजकुमार के मुंह के सांप ने कहा, तुम सोने की दो घड़ों की रक्षा अपनी ज़िंदगी को ख़तरे में डालकर भी क्यों करते हैं? इसकी तुमको कोई ज़रूरत नहीं है. अगर किसी ने गर्म पानी और तेल को डाला, तो तुम भी तो मर जाओगे.

बातें करने के बाद, वे अपने-अपने स्थानों के अंदर चले गए, लेकिन राजकुमारी उनके रहस्य जान चुकी थी.

 

Panchtantra Ki Kahani, The Tale Of Two Snakes

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उसने जीरा और सरसों का गर्म पानी तैयार करके अपने पति को भोजन के साथ दिया. कुछ ही घंटों में राजकुमार ठीक होना शुरू हो गया और उसकी ऊर्जा व ताकत वापस आ गई. उसके बाद, उसने सांप के बिल में गर्म पानी और तेल डाला और सोने के दो बर्तन ले लिए. वह राजकुमार अब पूरी तरह से ठीक हो गया था और उनके पास दो बर्तन भर सोना भी था. वे दोनों ही ख़ुशी-ख़ुशी से रहने लगे.

सीख: दुश्मनों की लड़ाई में आपको फ़ायदा हो सकता है, इसलिए सतर्क रहें और अपने दुश्मनों पर नज़र रखें.

 

पंचतंत्र की कहानी: मूर्ख ब्राह्मण और तीन ठग (Panchtantra Ki Kahani: The Brahmin & Three Crooks)

Panchtantra Ki Kahani, The Brahmin,Three Crooks

Panchtantra Ki Kahani, The Brahmin,Three Crooks
किसी गांव में एक ब्राह्मण रहता था. एक दिन वो दावत में गया जहां उसे यजमान से एक बकरा मिली. वो ख़ुशी ख़ुशी उसको लेकर अपने घर जा रहा था. रास्ता लंबा और सुनसान था. आगे जाने पर रास्ते में उसको ठगों ने देखा और सोचा कि क्यों न इससे यह बकरा हथिया लिया जाये. तीनों ठगों ने ब्राह्मण के कंधे पर बकरे को देखकर उसे हथियाने की योजना बनाई.

जैसे ही ब्राह्मण आगे गया एक ठग ने ब्राह्मण को रोककर कहा, “अरे पंडित जी यह क्या अनर्थ कर रहे हैं? आप अपने कंधे पर क्या उठा कर ले जा रहे हैं? आप तो ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण होकर कुत्ते को कंधों पर बैठा कर ले जा रहे हैं.”

ब्राह्मण ने क्रोधित होकर उसे झिड़कते हुए कहा, “पागल है क्या? या अंधा हो गया है? दिखाई नहीं देता यहकुत्ता नहीं बकरा है.”

पहले ठग ने फिर कहा, “खैर मेरा काम आपको बताना था. अगर आपको कुत्ता ही अपने कंधों पर ले जाना है तो मुझे क्या? आप जानें और आपका काम.”

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Panchtantra Ki Kahani, The Brahmin,Three Crooks

थोड़ी दूर चलने के बाद ब्राह्मण को दूसरा ठग मिला. उसने ब्राह्मण को रोका और कहा, “पंडित जी क्या हो गया है आपको? ब्राह्मण होकर मरी हुई बछिया को कंधे पर लादकर ले जा रहे हैं? उच्चकुल के लोगों को क्या यह शोभा देता है?”

पंडित उसे भी झिड़क कर आगे बढ़ गया. आगे जाने पर उसे तीसरा ठग मिला. उसने भी ब्राह्मण को टोका और कहा कि इस गधे को कंधे पर क्यों ले जा रहे हो? ब्राह्मण अब घबरा गया. उसको लगा कि ये ज़रूर कोई मायावी जीव है, जो बार बार रूप बदल रहा है, वरना इतने सारे लोग झूठ क्यों बोलेंगे?

Panchtantra Ki Kahani, The Brahmin,Three Crooks

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थोड़ी दूर जाकर, उसने बकरे को कंधे से उतार दिया और आगे बढ़ गया. इधर तीनों ठग ने उस बकरे को हथिया लिया और उस ब्राह्मण की मूर्खता पर उनको हंसी भी आई.

सीख: कहते हैं कि किसी झूठ को बार-बार बोलने से वह सच की तरह लगने लगता है, इसलिए अपने दिमाग से काम लें और अपने आप पर विश्वास करें.

पंचतंत्र की कहानी: चालाक लोमड़ी और मूर्ख कौआ (Panchtantra Ki Kahani: The Fox And The Crow)

चालाक लोमड़ी और मूर्ख कौआ, The Fox And The Crow
चालाक लोमड़ी और मूर्ख कौआ, The Fox And The Crowपंचतंत्र की कहानी: चालाक लोमड़ी और मूर्ख कौआ (Panchtantra Ki Kahani: The Fox And The Crow)

एक जंगल में एक लोमड़ी रहती थी. वो बहुत ही भूखी थी. वह अपनी भूख मिटने के लिए भोजन की खोज में इधर– उधर घूमने लगी. उसने सारा जंगल छान मारा, जब उसे सारे जंगल में भटकने के बाद भी कुछ न मिला, तो वह गर्मी और भूख से परेशान होकर एक पेड़ के नीचे बैठ गई. अचानक उसकी नजर ऊपर गई. पेड़ पर एक कौआ बैठा हुआ था. उसके मुंह में रोटी का एक टुकड़ा था.

चालाक लोमड़ी और मूर्ख कौआ, The Fox And The Crow

कौवे के मुंह में रोटी देखकर उस भूखी लोमड़ी के मुंह में पानी भर आया. वह कौवे से रोटी छीनने का उपाय सोचने लगी. उसे अचानक एक उपाय सूझा और तभी उसने कौवे को कहा, ”कौआ भैया! तुम बहुत ही सुन्दर हो. मैंने तुम्हारी बहुत प्रशंसा सुनी है, सुना है तुम गीत बहुत अच्छे गाते हो. तुम्हारी सुरीली मधुर आवाज़ के सभी दीवाने हैं. क्या मुझे गीत नहीं सुनाओगे ?

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चालाक लोमड़ी और मूर्ख कौआ, The Fox And The Crow

कौआ अपनी प्रशंसा को सुनकर बहुत खुश हुआ. वह लोमड़ी की मीठी मीठी बातों में आ गया और बिना सोचे-समझे उसने गाना गाने के लिए मुंह खोल दिया. उसने जैसे ही अपना मुंह खोला, रोटी का टुकड़ा नीचे गिर गया. भूखी लोमड़ी ने झट से वह टुकड़ा उठाया और वहां से भाग गई.

चालाक लोमड़ी और मूर्ख कौआ, The Fox And The Crow

यह देख कौआ अपनी मूर्खता पर पछताने लगा. लेकिन अब पछताने से क्या होना था, चतुर लोमड़ी ने मूर्ख कौवे की मूर्खता का लाभ उठाया और अपना फायदा किया.

सीख: यह कहानी सन्देश देती है कि अपनी झूठी प्रशंसा से हमें बचना चाहिए. कई बार हमें कई ऐसे लोग मिलते हैं, जो अपना काम निकालने के लिए हमारी झूठी तारीफ़ करते हैं और अपना काम निकालते हैं. काम निकल जाने के बाद फिर हमें पूछते भी नहीं.

पंचतंत्र की कहानी: दिन में सपने… (Panchtantra Ki Kahani: Day Dreams)

पंचतंत्र की कहानी, Panchtantra Ki Kahani

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पंचतंत्र की कहानी: दिन में सपने… (Panchtantra Ki Kahani: Day Dreams)

एक गांव में एक लड़की अपनी मां के साथ रहती थी. वो लड़की मन की बहुत चंचल थी. अक्सर सपनों में खो जाया करती थी. एक दिन वो दूध से भरा बर्तन लेकर शहर जाने की सोच रही थी. उसने अपनी मां से पूछा, “मां, मैं शहर जा रही हूं, क्या आपको कुछ मंगवाना है?”

उसकी मां ने कहा, “मुझे कुछ नहीं चाहिए. हां, यह दूध बेचकर जो पैसे मिलें, उनसे तुम अपने लिए चाहो तो कुछ ले लेना.”

पंचतंत्र की कहानी, Panchtantra Ki Kahani
वो लड़की शहर की ओर चल पड़ी. चलते-चलते वो फिर सपनों में खो गई. उसने सोचा कि ये दूध बेचकर भला मुझे क्या फ़ायदा होगा. ज़्यादा पैसे तो मिलेंगे नहीं, तो मैं ऐसा क्या करूं कि ज़्यादा पैसे कम सकूं… इतने में ही उसे ख़्याल आया कि दूध बेचकर जो पैसे मिलेंगे उससे वो मुर्गियां ख़रीद सकती है. वो फिर सपनों में खो गई“दूध बेचकर मुझे पैसे मिलेंगे, तो मैं मुर्गियां ख़रीद लूंगी, वो मुर्गियां रोज़ अंडे देंगी. इन अंडों को मैं बाज़ार में बेचकर काफ़ी पैसे कमा सकती हूं. उन पैसों से मैं और मुर्गियां ख़रीदूंगी, फिर उनके चूज़े निकलेंगे, उनसे और अंडे मिलेंगे… इस तरह तो मैं ख़ूब पैसा कमाऊंगी…

लेकिन फिर इतने पैसों का मैं करूंगी क्या?…हां, मैं उन पैसों से एक नई ड्रेस और टोपी ख़रीदूंगी. जब मैं यह ड्रेस और टोपी पहनकर बाहर निकलूंगी, तो पूरे शहर के लड़के मुझे ही देखेंगे.

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पंचतंत्र की कहानी, Panchtantra Ki Kahani

सब मुझसे दोस्ती करना चाहेंगे. पास आकर हाय-हैलो बोलेंगे. मैं भी इतराकर उनसे बात करूंगी. बड़ा मज़ा आएगा, लेकिन यह देखकर बाकी की सब लड़कियां तो मुझसे जलने लगेंगी. उन्हें जलता देख मुझे मज़ा आएगा. मैं उन्हें घूरकर देखूंगी और अपनी गर्दन इस तरह से स्टाइल में झटककर आगे बढ़ जाऊंगी.”

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यह कहते ही उस लड़की ने अपनी गर्दन को ज़ोर से झटका और गर्दन झटकते ही उसे सामने रखे एक पत्थर से ठोकर भी लग गई और दूध से भरा बर्तन, तो उसने सिर पर रख रखा था, नीचे गिरकर टूट गया. यह देख वो सदमे में आ गई और उसकी तंद्रा टूटी. मायूस होकर वो गांव लौटी.

उसने अपनी मां से माफी मांगी कि उसने सारा दूध गिरा दिया. यह सुनकर उसकी मां ने कहा, “दूध के गिरने की चिंता छोड़ो, लेकिन एक बात हमेशा याद रखो कि जब तक अंडे न फूट जाएं, तब तक चूज़े गिनने से कोई फ़ायदा नहीं…” मां की हिदायत और इशारा दोनों उसको समझ में आ गया. उसकी मां यही कहना चाहती थी कि जब तक हाथ में कुछ हो नहीं, तब तक उसके बारे में यूं ख़्याली पुलाव नहीं पकाना चाहिए.

सीख: ख़्याली पुलाव पकाने से कोई फ़ायदा नहीं. दिन में सपने देखकर उनमें खोने से कुछ नहीं होगा. अगर सच में कुछ हासिल करना है, तो हक़ीक़त में मेहनत करो.

पंचतंत्र की कहानी: गौरैया और घमंडी हाथी (Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant)

Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant
Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant
पंचतंत्र की कहानी: गौरैया और घमंडी हाथी (Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant)

एक जंगल में बड़े से पेड़ पर एक गौरैया अपने पति के साथ रहती थी. उसका पति बाहर जाकर खाने-पीने का इंतज़ाम करता और वह घोंसले में रहकर अपने अंडों की रखवाली करती। गोरैया अपने घोंसले में अंडों से चूजों के निकलने का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी. एक दिन की बात है वो अपने अंडों को से रही थी और उसका पति भी रोज़ की तरह खाने के इंतज़ाम के लिए बाहर गया हुआ था.

Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant
उसी जंगल में एक गुस्सैल हाथी में रहता था. वो हाथी वहां आ धमका और आस-पास के पेड़-पौधों को रौंदते हुए तोड़-फोड़ करने लगा. उसी तोड़ फोड़ के दौरान वह उस पेड़ तक भी पहुंच गया, जहां गौरैया रहती थी. उस हाथी ने पेड़ को गिराने के लिए ज़ोर-ज़ोर से हिलाया, लेकिन वह पेड़ बहुत मजबूत था इसलिए हाथी पेड़ को नहीं तोड़ पाया और थककर वहां से चला गया. लेकिन उसके पेड़ को ज़ोर-ज़ोर से हिलाने से गौरैया का घोंसला टूटकर नीचे आ गिरा और उसके सारे अंडे फूट गए.

Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant

गौरैया यह देख बेहद आहत हुई और वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी. थोड़ी देर बाद उसका पति भी वापस आ गया. उसे सारा किस्सा पता चला, तो वो भी बहुत दुखी हुआ. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और हाथी से बदला लेने व उसे सबक सिखाने की बात सोची.
उनका एक मित्र था, जो कठफोड़वा था. वे उसके पास पहुंचे और उसे सारी बात बताई. वे हाथी से बदला लेने के लिए कठफोड़वा की मदद चाहते थे. कठफोड़वा के दो अन्य दोस्त भी थे- एक मधुमक्खी और एक मेंढक. वो सब तैयार हो गए और उन्होंने मिलकर हाथी से बदला लेने की योजना बनाई.

Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant

तय योजना के तहत सबसे पहले मधुमक्खी ने अपना काम शुरू किया. उसने हाथी के कान में गुनगुनाना शुरू किया. हाथी को उसका संगीत भा गया, उसे उसके संगीत में मज़ा आने लगा और वो पूरी तरह उसके संगीत में तल्लीन हो गया. इसी बीच कठफोड़वा ने अपना काम शुरू कर दिया. उसने हाथी की दोनों आंखों पर वार किया. हाथी दर्द से कराहने लगा.

उसके बाद मेंढक अपनी पलटन के साथ एक दलदल के पास गया और सब मिलकर टर्राने लगे. मेंढकों का टर्राना सुनकर हाथी को लगा कि पास में ही कोई तालाब है. वह उस आवाज़ की दिशा में गया और दलदल में फंस गया. इस तरह से हाथी धीरे-धीरे दलदल में फंसता चला गया.

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Panchtantra Ki Kahani: The Sparrow And The Elephant

सीख: एकता में बहुत ताक़त है, यदि कमज़ोर से कमज़ोर लोग भी एकजुट होकर काम करें, तो बड़े से बड़े कार्य को अंजाम दे सकते हैं और ताक़तवर शत्रु को भी पराजित कर सकते हैं. दूसरी ओर यह भी सीख मिलती है कि अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है, हाथी को अपनी ताक़त पर घमंड था और उसका गुस्सा उसकी कमज़ोरी बन गया, जिसका परिणाम उसे भोगना ही पड़ा.

पंचतंत्र की कहानी: शेर और सियार (Panchtantra Ki Kahani: The Lion And The Jackal)

Panchtantra Ki Kahani

Panchtantra Ki Kahani

पंचतंत्र की कहानी: शेर और सियार (Panchtantra Ki Kahani: The Lion And The Jackal)

वर्षों पहले घने जंगलों में एक बलिष्ठ शेर रहा करता था. वो रोज़ शिकार करके अपना पेट भरता था. एक दिन वह एक भैंसे का शिकार और भक्षण कर अपनी गुफा को लौट रहा था कि तभी रास्ते में उसे एक मरियल-सा सियार मिला. सियार ने उसे लेटकर दण्डवत् प्रणाम किया.

शेर बड़ा हैरान हुआ. जब शेर ने उससे ऐसा करने का कारण पूछा तो उसने कहा, “आप राजा हैं और बहुत ही बलशाली हैं. मैं आपका सेवक बनना चाहता हूं, कुपया मुझे आप अपनी शरण में ले लें. मैं आपकी सेवा करूंगा और आपके द्वारा छोड़े गये शिकार से अपना गुजर-बसर कर लूंगा.’

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शेर उसकी बातों से खुश हुआ और उसने सियार की बातों पर भरोसा करके उसकी बात मान ली और उससे दोस्ती करके उसे मित्रवत अपनी शरण में रखा. कुछ ही दिनों में शेर द्वारा छोड़े गये शिकार को खा-खा कर वह सियार बहुत ही तगड़ा और मोटा हो गया.

सियार रोज़ शेर की शक्ति को देखता और प्रतिदिन सिंह के पराक्रम को देख-देख वो खुद को भी शक्तिशाली समझने लगा. उसने भी स्वयं को सिंह का प्रतिरुप मान लिया.

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एक दिन उसने सिंह से कहा, ‘दोस्त मैं भी अब तुम्हारी तरह शक्तिशाली हो गया हूं और आज मैं एक हाथी का शिकार करुंगा और उसका भक्षण करुंगा और उसके बचे-खुचे मांस को तुम्हारे लिए छोड़ दूंगा.’

शेर उस सियार को अपना दोस्त समझता था, इसलिए उसने उसकी बातों का बुरा नहीं माना, लेकिन सियार को समझाया ज़रूर कि वो ऐसी गलती न करे. उसे हाथी के शिकार से रोका. पर वो सियार बहुत ही घमंडी बन चुका था. वो अपने ही भ्रम में जी रहा था.

वह दम्भी सियार सिंह के परामर्श को अस्वीकार करता हुआ पहाड़ की चोटी पर जा खड़ा हुआ.  वहां से उसने नज़रें दौड़ाई तो पहाड़ के नीचे हाथियों के एक समूह को देखा.

उनको देखते ही वो तीन बार आवाजें लगा कर एक बड़े हाथी के ऊपर कूद पड़ा, किन्तु हाथी के सिर के ऊपर न गिर वह उसके पैरों पर जा गिरा और हाथी अपनी मस्तानी चाल से अपना अगला पैर उसके सिर के ऊपर रख आगे बढ़ गया. क्षण भर में सियार का सिर चकनाचूर हो गया. सियार उसी वक़्त मर गया.

पहाड़ के ऊपर से शेर सब कुछ देख रहा था. सियार की सारी हरकतें देखकर उसने मन ही मन सोचा कि ‘होते हैं जो मूर्ख औरघमंडी, होती है उनकी ऐसी ही गति.’

सीख: कभी भी ज़िंदगी में घमण्ड नहीं करना चाहिए, क्यूंकि घमंड और मूर्खता का साथ बहुत गहरा होता है. इतिहास गवाह है कि बलशाली और शक्तिशाली लोगों के भी पतन का कारण उनका घमंड बना था.

पंचतंत्र की कहानी: चींटी और घमंडी हाथी (Panchtantra Ki Kahani: The Ant And The Elephant)

पंचतंत्र की कहानी: चींटी और घमंडी हाथी

पंचतंत्र की कहानी: चींटी और घमंडी हाथी

पंचतंत्र की कहानी: चींटी और घमंडी हाथी (Panchtantra Ki Kahani: The Ant And The Elephant)

एक जंगल में चींटियों का झुंड रहता था, उसकी रानी बहुत मेहनती थी. सुबह-सुबह ही वो अपनी टोली के साथ खाने की तलाश में निकल पड़ती. इसी जंगल में एक घमंडी हाथी भी रहता था. वो जंगल में सभी जानवरों को परेशान करता था. कभी गंदे नाले से सूंड़ में पानी भरकर उन पर फेंक देता, तो कभी अपनी ताक़त का प्रदर्शन करके उन्हें डराता.

उस हाथी को इन चींटियों से बड़ी ईर्ष्या होती थी. वो उन्हें जब भी देखता, तो पैरों से कुचल देता. एक दिन चींटी रानी से हाथी से विनम्रता से पूछा कि आप दूसरों को क्यों परेशान करते हो? यह आदत अच्छी नहीं है.

यह सुनकर हाथी क्रोधित हो गया और उसने चींटी को धमकाया कि तुम अभी बहुत छोटी हो, अपनी ज़ुबान पर लगाम लगाकर रखो, मुझे मत सिखाओ कि क्या सही है, क्या ग़लत वरना तुम्हें भी कुचल दूंगा.

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यह सुन चींटी निराश हुई, लेकिन उसने मन ही मन हाथी को सब सिखाने की ठानी. चींटी पास ही एक झाड़ी में छिप गई और मौक़ा देखते ही चुपके से हाथी की सूंड़ में घुस गई. फिर उसने हाथी को काटना शुरु कर दिया. हाथी परेशान हो उठा. उसने सूंड़ को ज़ोर-ज़ोर से हिलाया, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ. हाथी दर्द से कराहने और रोने लगा. यह देख चींटी ने कहा कि हाथी भइया, आप दूसरों को परेशान करते हो, तो बड़ा मज़ा लेते हो, तो अब ख़ुद क्यों परेशान हो रहे हो?

हाथी को अपनी ग़लती का एहसास हो गया और उसने चींटी से माफ़ी मांगी कि आगे से वो कभी किसी को नहीं सताएगा.

चींटी को उस पर दया आ गई. वो बाहर आकर बोली कि कभी किसी को छोटा और कमज़ोर नहीं समझना चाहिए.

यह सुन हाथी बोला कि मुझे सबक मिल चुका है. मुझे अच्छी सीख दी तुमने. अब हम सब मिलकर रहेंगे और कोई किसी को परेशान नहीं करेगा.

सीख: घमंडी का सिर सदा नीचे होता है. कभी किसी को कमज़ोर और छोटा न समझें. दूसरों के दर्द व तकलीफ़ को समझना ही जीने का सही तरीक़ा है.

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पंचतंत्र की कहानी: शरारती बंदर और लकड़ी का खूंटा (Panchtantra Ki Kahani: The Monkey and the Wedge)

पंचतंत्र की कहानी: शरारती बंदर और लकड़ी का खूंटा

 

पंचतंत्र की कहानी: शरारती बंदर और लकड़ी का खूंटा (Panchtantra Ki Kahani: The Monkey and the Wedge)

बहुत समय पहले की बात है, एक शहर से कुछ ही दूरी पर एक मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था, जिसके लिए कई मज़दूरों को रखा गया था. वो मज़दूर फिल्हाल लकड़ी का काम कर रहे थे, इसलिए यहां-वहां लकड़ी के ढेर सारे लठ्ठे पड़े हुए थे. इन लकड़ियों को चीरने का काम ज़ोर-शोर से चल रहा था. सभी मज़दूर दिनभर काम करते. सुबह होते ही काम पर लग जाते, लेकिन उनको दोपहर का भोजन करने के लिए काफ़ी दूर जाना पड़ता था, इसलिए दोपहर के समय काफ़ी देर तक वहां कोई नहीं होता था. एक दिन की बात है, खाने का समय हुआ और सारे मज़दूर काम छोड़कर खाना खाने के लिए चल पड़े. इनमें से एक लठ्ठा आधा चिरा ही रह गया था. उस आधे चिरे लठ्ठे में मज़दूर लकड़ी का कीला फंसाकर चले गए, ताकि वापस आने पर जब वो दोबारा काम शुरू करे, तो आरी घुसाने में आसानी रहे.

सारे मज़दूर तो जा चुके थे, लेकिन तभी वहां बंदरों का एक दल उछलता-कूदता आया. सभी बंदर यहां-वहां उछल-कूद करके खेल रहे थे. उनमें एक बंदर कुछ ज़्यादा ही शरारती था. वो बिना मतलब चीज़ों से छेड़छाड़ करता रहता था. यह उसकी हमेशा की ही आदत थी. बंदरों के सरदार ने सबको वहां पड़ी चीज़ों से छेड़छाड़ न करने का आदेश दिया थाल पर वो शरारती बंदर सबकी नज़रें बचाकर वहां रखी चीज़ों से ख़ूब छेड़छाड़ करने लगा.

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कुछ ही देर में उसकी नज़र उस अधचिरे लठ्ठे पर पड़ी, फिर क्या था, कौतुहलवश वह उसी के साथ खेलने लगा. उस लठ्ठे को यहां-वहां घूम-घूमकर देखने लगा. फिर उसने पास पड़ी आरी को देखा और उसे उठाकर लकड़ी पर रगड़ने लगा. थोड़ी देर बाद वह दोबारा लठ्ठे के बीच फंसे कीले को देखने लगा.


उसके शैतानी दिमाग में शरारती सूझी कि क्यों न इस कीले को लठ्ठे के बीच में से निकाल दिया जाए? वो देखना चाहता था कि ऐसा किया, तो क्या होगा? बस, फिर क्या था. वो कीले को पकड़कर उसे बाहर निकालने के लिए ज़ोर लगाने लगा. लठ्ठे के बीच फंसाया गया कीला तो दो पाटों के बीच बहुत मज़बूती से जकड़ा हुआ था. लेकिन शरारती बंदर ने हार नहीं मानी और बंदर खूब ज़ोर लगाकर उसे हिलाने की कोशिश करने लगा. कीला ज़ोर लगाने पर हिलने व खिसकने लगा, तो बंदर अपनी शक्ति पर खुश हो गया. वह और ज़ोर से कीला सरकाने लगा. इस बीच बंदर की पूंछ कब लकड़ी के दो पाटों के बीच आ गई, उसको पता ही नहीं चला.

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उसने उत्साहित होकर एक ज़ोरदार झटका मारा और जैसे ही कीला बाहर खिंचा, लठ्ठे के दो चिरे भाग क्लिप की तरह जुड़ गए और बीच में फंस गई बंदर की पूंछ. बंदर दर्द से कराह उठा, वो बुरी तरह ज़ख़्मी हो गया था.
तभी मज़दूर वहां लौटे, तो उन्हें देखते ही बंदर ने भागने के लिए ज़ोर लगाया और उसकी पूंछ और भी बुरी तरह ज़ख़्मी हो गई.

सीख: दूसरों के कार्य में दख़लअंदाज़ी करनेवाले का अंजाम बुरा ही होता है. जिन चीज़ों से हमारा वास्ता न हो, उनके चक्कर में कभी नहीं पड़ना चाहिए.

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पंचतंत्र की कहानी: दो मुंहवाला पंछी (Panchtantra Ki Kahani: The Bird with Two Heads)

 

पंचतंत्र की कहानी: दो मुंहवाला पंछी (Panchtantra Ki Kahani: The Bird with Two Heads)

एक जंगल में एक सुंदर-सा पंछी रहता था. यह पंछी अपनेआप में बेहद अनोखा था, क्योंकि इसके दो मुंह थे. दो मुंह होने के बाद भी इसका पेट एक ही था. यह पंछी यहां-वहां घूमता, कभी झील के किनारे, तो कभी पेड़ों के आसपास.
एक दिन की बात है, यह पंछी एक सुंदर-सी नदी के पास से गुज़र रहा था कि तभी उसमें से एक मुंह की नज़र एक मीठे फल पर पड़ी. वो वहां गया और फल को देखकर बहुत ख़ुश हुआ. उसने फल तोड़ा और उसे खाने लगा. फल बेहद मीठा और स्वादिष्ट था. उसने फल खाते हुए दूसरे मुंह से कहा, “यह तो बहुत ही मीठा और स्वादिष्ट फल है. बिल्कुल शहद जैसा. मज़ा आ गया इसे खाकर.”

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उसकी बात सुनकर दूसरे मुंह ने कहा, “मुझे भी यह फल चखाओ. मैं भी इसे खाना चाहता हूं.”
पहले मुंह ने कहा, “अरे, तुम इसे खाकर क्या करोगे? मैंने कहा न कि यह एकदम शहद जैसा है और वैसे भी हमारे पेट तो एक ही है न. तो मैं खाऊं या तुम, क्या फ़र्क़ पड़ता है.”
दूसरे मुंह को यह सुनकर बहुत दुख हुआ. उसने सोचा यह कितना स्वार्थी है. उसने पहले मुंह से बात करना बंद कर दिया और मन ही मन उससे बदला लेने की ठानी.

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कुछ दिनों तक दोनों में बातचीत बंद रही. फिर एक दिन जब वो कहीं घूम रहे थे, तभी दूसरे मुंह की नज़र भी एक फल पर पड़ी. वो फल ज़हरीला था. उसने सोचा कि बदला लेने का यह सही मौक़ा है. उसने कहा, “मुझे यह फल खाना है.”
पहले मुंह ने कहा, “यह बहुत ही ज़हरीला फल है, इसे खाकर हम मर जाएंगे.”
दूसरे मुंह ने कहा, “मैं इसे खा रहा हूं, तुम नहीं, तो तुम्हें कोई तकलीफ़ नहीं होनी चाहिए.”
पहले मुंह ने कहा, “हमारे मुंह भले ही दो हैं, लेकिन पेट तो एक ही है न. तुम खाओगे, तो हम दोनों मर जाएंगे. इसे मत खाओ.”
लेकिन पहले मुंह न एक न सुनी और उसने वह ज़हरीला फल खा लिया. धीरे-धीरे ज़हर ने अपना असर दिखाया और वह दो मुंहवाला अनोखा पंछी मर गया.

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सीख: स्वार्थ से बचकर एकता की शक्ति को पहचानना चाहिए. स्वार्थ हमेशा ख़तरनाक होता है, जबकि एकता का बल बहुत अधिक होता है.