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कहीं आपके बच्चे का व्यवहार असामान्य तो नहीं? (9 Behavioral Problems Of Children And Their Solutions)

कभी-कभार बच्चे (Children) अपने माता-पिता के सब्र का इम्तिहान लेते हैं. यह बहुत सामान्य बात है. लेकिन अगर बच्चा बार-बार एक ही तरह की ग़लती दोहराने लगे तो यह ख़तरे की घंटी हो सकती है, इसलिए अभिभावकों के लिए ज़रूरी है कि बच्चे के व्यवहार (Behavior) पर ध्यान दें, ताकि भविष्य में अपने आचरण व आदतों के कारण उसे किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े. हम आपको बच्चों की 7 ग़लत आदतों (Bad Habits) के बारे में बता रहे हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं करना चाहिए.   

Behavioral Problems Of Children

  1. बदला लेने की आदत

बच्चों को कठिन परिस्थितियों से बाहर निकलना आना चाहिए. यही वजह है कि अभिभावक अपने बच्चों को स्थिति का सामना करना और मुसीबत आने पर पीछे हटने की बजाय उससे सामना करना सिखाते हैं, लेकिन कुछ बच्चे इसे बेहद गंभीरता से ले लेते हैं. कोई उनके साथ ग़लत तरी़के से पेश आए तो वे उसे सबक सिखाए बिना बाज नहीं आते. अगर आपका बच्चा भी माफ़ करने की बजाय हमेशा बदला लेने के बारे में सोचता है तो यह ग़लत संकेत है.

क्या करें?

अपने बच्चे को माफ़ करने के फ़ायदे बताएं. उसे अपनी भावनाओं के साथ-साथ दूसरे की बात को समझने को कहें, ताकि उसे झगड़े या असहमति की वजह का पता चल सके. साथ ही उसे अरुचिकर परिस्थिति से बाहर निकलना भी सिखाएं.

 

  1. ग़ैरज़िम्मेदाराना व्यवहार

कुछ बच्चे बेहद ग़ैरज़िम्मेदार किस्म के होते हैं. वे किसी भी काम की ज़िम्मेदारी नहीं लेते. और तो और कोई ग़लती करने पर सारा दोष अपने भाई-बहन या दोस्तों पर थोप देते हैं.

क्या करें?

बच्चे में ज़िम्मेदारी का भाव पैदा करने के लिए उसे कोई ऐसा काम सौंपें, जिसकी जवाबदेही उसे लेनी पड़े. साथ ही उससे समस्या और बुरे बर्ताव का कारण जानने की कोशिश करें.

 

  1. बेहद ज़िद्दी और अकड़ू स्वभाव

अपने विचारों का समर्थन करना और अपनी बात रखना अच्छी बात होती है, लेकिन हमेशा अपनी बात पर अड़े रहना ग़लत होता है. बच्चे को परिस्थिति के अनुसार समझौता करना आना चाहिए. माता-पिता को कोशिश करनी चाहिए कि बच्चे में यह गुण पैदा हो.

क्या करें?

बच्चे की भावना को समझने की कोशिश करें और उसके ज़िद की वजह जानने की कोशिश करें. उसे अपनी और दूसरे की भावना को समझने का गुण सिखाएं. उसे बताएं कि वो क्या कर सकता है और क्या नहीं. शांत तरी़के से उसे समझाने की कोशिश करें. लेकिन उसे किसी चीज़ का लालच देकर अपनी बात मनवाने की ग़लती न करें.

 

  1. चालबाज़ी

कभी-कभी बच्चे अपनी बात मनवाने के लिए कोई भी तरीक़ा अपनाने से नहीं कतराते, जैसे अगर उन्हें कोई चीज़ चाहिए तो भरे बाज़ार में रोना शुरू कर देते हैं. ऐसे में पैरेंट्स के पास उनकी बात मानने के अलावा कोई चारा ही नहीं होता. अगर आपका बच्चा ऐसा करे तो उसे समझाने की कोशिश करें कि उसका ऐसा व्यवहार किसी को भी अच्छा नहीं लगता व सब उसे नापसंद करेंगे.

क्या करें?

आमतौर पर बच्चा इस तरह का व्यवहार तब करता है, जब उसे अपने माता-पिता का ध्यान आकर्षित करना होता है. इसलिए ज़रूरी है कि  बच्चे के साथ ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताएं. अगर बच्चा ग़लत तरी़के से काम करे या बात मनवाने के लिए चालाकी करने की कोशिश करें तो आपा खोने की बजाय शांत दिमाग़ से काम लें. यह थोड़ा मुश्क़िल होता है, लेकिन इसके नतीज़े बहुत अच्छे होते हैं.

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  1. बदलाव से डर

3-4 साल तक के बच्चों का नए वातावरण और माहौल से घबराना सामान्य है, लेकिन 5 साल से बड़े बच्चों को नए वातावरण व नई चीज़ों को स्वीकार करना सीखना चाहिए. आजकल के माहौल में नई परिस्थितियों को अपनाने की कला जानना ज़रूरी है. ऐसा नहीं होने पर बच्चे को एडजस्टमेंट में बहुत दिक्कत होती है. उदाहरण के लिए यदि आपका बच्चा किंडरगार्डन जाता है और जब वहां कोई उसकी पेसिंल या टिफिन किसी अलग जगह पर रख देता है तो वह रोने लगता है, तो समझ लीजिए कि उसे बदलाव से डर लगता है. ऐसे में आपको उसके व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए.

क्या करें?

बच्चे को बदलाव के बारे में हमेशा बताते रहें और उसे पहले से ही बदलाव के लिए तैयार रखें. अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखें, क्योंकि बच्चे हावभाव को बहुत जल्दी समझ लेते हैं और आपकी चिंता को भांप लेते हैं. कोशिश करें कि बच्चे को अच्छे दोस्त मिलें, क्योंकि बच्चे दोस्तों के साथ मिलकर चुनौतियों का सामना अपेक्षाकृत आसानी से कर लेते हैं. बच्चे से बात करें, ताकि उसे एहसास हो कि आप उसकी भावनाओं को समझ रहे हैं. ध्यान रखें कि बच्चों के लिए छोटी-छोटी चीज़ें भी बहुत मायने रखती हैं.

 

  1. उग्र व्यवहार

कुछ बच्चे स्वभाव से बहुत उग्र होते हैं और वे बिना सोचे-समझे और रिजल्ट की परवाह किए बिना कोई भी कार्य कर देते हैं. ऐसे में अभिभावक का यह फ़र्ज बनता है कि बच्चे को उसके व्यवहार के परिणाम के बारे में पहले ही आगाह कर दें.

क्या करें?

शांत दिमाग़ से काम लें. बच्चे के साथ बैठकर उसके व्यवहार का आंकलन करें और यह जानने की कोशिश करें कि वो ऐसा काम क्यों कर रहा है. बच्चे को आत्म नियंत्रण करना सिखाएं और उसे बताएं कि वो कितना ग़लत व्यवहार कर रहा है.

 

  1. एडजेस्टमेंट में असमर्थ

रूस की एक चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट, कैटेरिना मुराशोवा ने 68 टीनएज़र्स (12-18 वर्ष) पर एक शोध किया. उन्हें 8 घंटे किसी दोस्त या गैजेट के बिना अकेले रहने को कहा. 68 में से स़िर्फ 3 ही इस टास्क को आसानी से कर पाए, दूसरे बच्चों को बहुत दिक्कत हुई.

छोटे बच्चे अकेले नहीं रह सकते और यह सामान्य भी है. लेकिन 10 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों को अकेले स्थिति का सामना करना आना चाहिए. अगर बच्चा ऐसा करने में असमर्थ होता है, तो उसे अपनी भावना पर भी नियंत्रण करने में परेशानी होती है. उसे छोटी-छोटी चीज़ें व्यथित करती हैं, जैसे फोन बंद हो जाना इत्यादि.

क्या करें?

बच्चे को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश करें. अचानक ऐसा करना मुमक़िन नहीं है, इसलिए बेहतर होगा कि छुटपन से ही उसमें ऐसी आदत डालने की कोशिश की जाए, ताकि बड़ा होकर उसे किसी तरह की समस्या न हो.

 

  1. गाली-गलौज

ग़ुस्सा आने पर बच्चे अक्सर चिल्लाते या रोते हैं, लेकिन अगर 10 साल से भी छोटी उम्र में वे गाली देना शुरू कर दें, तो आपको इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए.

क्या करें?

इस बात का ध्यान रखें कि आप कभी बच्चे के सामने ग़लत भाषा का प्रयोग न करें और अगर बच्चा ग़लत भाषा का प्रयोग करे तो उसे कड़े शब्दों में समझाएं कि ऐसा बिल्कुल नहीं चलेगा. अगर 3-4 साल का छोटा बच्चा इस तरह की भाषा का प्रयोग करता है तो उसे तुरंत समझाएं कि ये बुरे शब्द हैं और अगर वो इस तरह के शब्द बोलेगा तो कोई उससे बात नहीं करेगा.

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  1. झूठ बोलना

झूठ बोलना बच्चों की सामान्य आदत है. बच्चे जब झूठ बोलते हैं तो माता-पिता को बहुत बुरा लगता है, उन्हें समझ में नहीं आता कि आख़िर उनकी परवरिश में क्या कमी रह गई, जिससे बच्चे ने झूठ बोलना सीख लिया. वे ठगा-सा महूसस करते हैं.

क्या करें?

इसे दिल पर न लें, बल्कि यह सोचने की कोशिश करें कि आख़िर किस कारण से बच्चा झूठ बोलने पर विवश हो गया. अक्सर बच्चों को लगता है कि सच बोलने पर उन्हें बहुत डांट पड़ेगी तो वे झूठ बोलने लगते हैं. अत: बच्चे को सच बोलने के लिए प्रेरित करें और ख़ुद उसके रोल मॉडल बनें. अगर इतने प्रयास करने के बाद भी वो झूठ  बोलना न छोड़े, तो उसे दंड दें.

ख़तरे के संकेत

* अगर आप एक महीने से ज़्यादा समय से बच्चे के व्यवहार से परेशान हैं.

* आप स्थिति पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं.

* दूसरे लोग भी आपके बच्चे के व्यवहार से परेशान हैं.

* अगर बच्चे का व्यवहार अचानक बिना किसी कारण से बदल जाएं, जैसे-आपका बच्चा अचानक अपने दोस्तों से बात करना या मिलना-जुलना एकदम कम कर दे.

* बच्चे को स्कूल में भी समस्या हो रही है, जैसे- उसके मार्क्स खराब आने लगें, वो झगड़े करने लगे या क्लास मिस करने लगे.

* नींद, साफ-सफाई और खाने-पीने की आदतों में बदलाव.

– शिल्पी शर्मा

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बच्चों के कानों की देखभाल (Parenting Guide- Baby Ear Care Tips)

छोटे बच्चे बहुत नाजुक होते हैं. उनके प्रत्येक अंग की उचित देखरेख ज़रूरी होती है. लेकिन कानों की देखरेख, उनकी सफ़ाई के लिए क्या करना आवश्यक है, इसके बारे में कुछ सुझाव यहां प्रस्तुत हैं.

Parenting Guide

* कानों में मैल जमा हो जाने से बच्चे कान खुजलाने लगते हैं. ऐसे में कानों में इयर ड्रॉप्स डालकर कान साफ करें.

* स्नान करते समय बच्चों के कान में पानी चले जाने की आशंका रहती है. लिहाज़ा नर्म तौलिए से बच्चों के कानों को अच्छी तरह से पोंछ दें.

* नहलाते समय बच्चों के कानों में रुई के फाहे डालकर कानों में पानी जाने से रोक सकते हैं.

* सर्दी-जुकाम होने पर तुरंत बच्चे का उपचार करें.

यह भी पढ़े: कहीं अंजाने में अपने बच्चों को ग़लत आदतें तो नहीं सिखा रहे हैं? (Is Your Child Learning Bad Habits From You?)

* पान के कुनकुने रस की कुछ बूंदें कान में डालें. इससे ठंडी के कारण बच्चे के कान में होनेवाली पीड़ा शांत होती है.

* बच्चे का कान बहता हो, तो मां के दूध की धार उसके कानों में डालें. कौड़ी की राख कान में डालने से भी कान का बहना बंद हो जाता है.

* पटाखों और ऊंची आवाजों से बच्चों को बचाना चाहिए, खासकर छोटे शिशुओं को. ऊंची आवाज़ें बच्चों को बुरी तरह प्रभावित करती हैं.

* छोटे शिशुओं के कान में जाड़े के दिनों में ऊन से बनी टोपी पहनाए रखें. इससे अधिक ठंड से उनके कानों की रक्षा होगी.

– सूर्यकांत ओमप्रकाश

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कहीं अंजाने में अपने बच्चों को ग़लत आदतें तो नहीं सिखा रहे हैं? (Is Your Child Learning Bad Habits From You?)

आपका आचरण आपके बच्चों के लिए आदर्श होता है. आप भले ही उन्हें बड़े-बड़े लेक्चर दे लें, लेकिन वो वही बातें ग्रहण करते हैं, जो आपको देखकर सीखते हैं. ऐसे में आपको उन्हें क्या सिखाना है और किन आदतों से बचाना है, यह आपको ही तय करना है, क्योंकि अक्सर अंजाने में आप अपनी ग़लत आदतें अपने बच्चों को सिखा देते हैं. बेहतर होगा, बच्चों को सही बातें सिखाने के लिए पहले ख़ुद सही आचरण करें.

Child Learning
झूठ बोलना: कभी रिश्तेदारों के सामने, तो कभी दोस्तों के साथ या कभी बच्चों से ही हम झूठ बोलते हैं. किसी का फोन आता है, तो हम बच्चों को बोलते हैं कि कह दो पापा/मम्मी घर पर नहीं हैं… ये तमाम बातें बच्चे हमसे ही सीख लेते हैं और फिर वो उनके व्यवहार में भी शामिल होने लगती हैं. उन्हें लगता है झूठ बोलना ग़लत नहीं है. मम्मी-पापा भी तो बोलते हैं. ख़ुद को बचाने के लिए, तो कभी यूं ही बिना किसी वजह के वो टीचर से, दोस्तों से और यहां तक कि हमसे भी झूठ बोलने लगते हैं.

क्या करें?
झूठ, फरेब व निंदा से बचें. बच्चों से छोटे-मोटे झूठ न बुलवाएं. आपको भले ही यह लग रहा हो कि बच्चा अपने खेल में मग्न है, लेकिन बच्चे दरअसल बहुत बारीक़ी से हमें ऑब्ज़र्व करते हैं और ऐसी चीज़ें जल्दी सीखते हैं.

हाइजीन पर ध्यान न देना: बुलबुल की टीचर अक्सर एक बात नोटिस कर रही हैं कि बुलबुल कुछ भी खाने के बाद अपने हाथ अपनी स्कर्ट से पोंछ लेती है. उन्होंने कई बार टोका भी, पर बुलबुल यह व्यवहार दोहराती रही. एक दिन उसकी टीचर ने पूछा, तो वो दंग रह गईं कि बुलबुल की मम्मी भी अक्सर खाना बनाते समय अपने हाथ अपनी नाइटी से ही पोंछती रहती हैं. बस, उसने भी यही सीख लिया.

क्या करें?
अच्छा होगा कि सुबह का रूटीन हम बच्चों के साथ ही करें. उन्हें टाइम पर उठाएं, उनके साथ सली़के से ब्रश करें. टॉयलेट ट्रेनिंग दें.
यहां-वहां कचरा न फेंकें. डस्टबिन का ही इस्तेमाल करें. खाने से पहले हाथ धोना, खाने के बाद भी हाथ धोकर टॉवेल से पोंछना… आदि बातें उन्हें करके दिखाएं.

पंक्चुअल यानी समय का पाबंद नहीं होना: हम में से अधिकांश लोगों की सोच यही होती है कि सबसे पहले पहुंचकर अपना महत्व क्यों कम करना… आख़िर सभी लोग लेट आते हैं, तो हम क्यों जल्दी जाएं. यही आदत हमारे बच्चे भी सीख जाते हैं. उन्हें भी लगता है कि लेट जाने का मतलब है अपना महत्व बढ़ाना.

क्या करें?
बच्चों को समय का महत्व समझाने से पहले हमें ख़ुद समय को महत्व देना होगा. हम अगर अनुशासन में रहेंगे, तो बच्चों को भी अनुशासित रखना व अनुशासन व समय का महत्व समझाना आसान होगा.

अनहेल्दी डायट: कभी पूरियां खाने का मन करता है, कभी समोसे, तो कभी पिज़्ज़ा… माना आप खाने के शौक़ीन हैं, लेकिन अपने बच्चों को जंक फूड खाने से रोकना चाहते हैं, तो ये उनके साथ अन्याय ही होगा. हम इतने बड़े होकर अपने खाने की आदतों को नहीं बदल पाते, तो छोटे बच्चों से कैसे उम्मीद करते हैं कि वो हेल्दी फूड खाएंगे?

क्या करें?
हेल्दी डायट स़िर्फ बच्चों के लिए ही नहीं सभी के लिए ज़रूरी है. आप हेल्दी खाएंगे, तो बच्चों को बेहतर तरी़के से कंविन्स कर पाएंगे कि वो भी जंक फूड कम खाएं.

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आलस करना: बच्चों को कहते हैं कि अर्ली टु बेड, अर्ली टु राइज़… पर ख़ुद लेट नाइट पार्टीज़ या फिर देर तक लैपटॉप पर ऑफिस का काम करना… सोशल साइट्स पर एक्टिव रहना, सुबह जल्दी उठने में आनाकानी करना, पानी का ग्लास तक भी ख़ुद उठकर न लेना, नहाने में आलस करना… ये तमाम बातें अपने आप में विरोधी हैं.

क्या करें?
घर में जल्दी सोने व समय पर उठने का माहौल शुरू से बनाएं. अपने-अपने काम ख़ुद करने की ट्रेनिंग सबको दें. अपने पानी व दूध का ग्लास, खाने के बर्तन ख़ुद उठाकर रखना, अपने कपड़ों को सही जगह पर रखना आदि सभी को करना चाहिए. इससे एक व्यक्ति पर काम का अधिक बोझ भी नहीं होगा और सबको अपने काम करने व अनुशासन में रहने की आदत भी पड़ेगी.

एक्सरसाइज़ न करना: फिटनेस की आदत सबको होनी चाहिए. आप ख़ुद सोफे पर पड़े रहते हैं, दिनभर टीवी देखते रहते हैं और बच्चों से अपेक्षा रखते हैं कि वो एक्टिव रहें, हेल्दी रहें. कम उम्र में मोटे न हों.

क्या करें?
बच्चों को अपने साथ योग व प्राणायाम करवाएं या उन्हें योगा क्लास जॉइन करवाएं. उनके साथ स्विमिंग, साइकिलिंग या जॉगिंग भी कर सकते हैं. आपका साथ उन्हें मोटिवेट करेगा और आपका व्यवहार उनका आदर्श बनेगा.

अव्यवस्थित रहना: कपड़े कहीं पड़े हैं, आलमारी में फाइल्स अव्यवस्थित हैं, किचन में सामान यहां-वहां है… कभी घर की चाभी ढूंढ़ते रहते हैं आप, तो कभी कोई ख़ास रंग का सूट या साड़ी… बच्चे स्कूल से आते हैं, बस्ता वहीं पटककर खेलने चले जाते हैं. मोज़े कहीं, जूते कहीं और कपड़े कहीं और ही… आप उन पर बरसते हैं कि यह क्या तरीक़ा है? अपना सामान ढंग से व सही जगह पर रखा करो… क्या वो आपकी बात सुनेंगे?

क्या करें?
रोज़ अगले दिन की प्लानिंग करें, वो भी बच्चों के सामने, इससे बच्चों में यह संदेश जाएगा कि उन्हें एडवांस प्लानिंग करनी चाहिए, ताकि सुबह की भागदौड़ से बचा जा सके. कोशिश करें कि घर को व अन्य सामान को व्यवस्थित रखने में बच्चों की भी मदद लें. इससे उन्हें भी पता चलेगा कि जो सामान जहां से उठाया, वहीं रखना ज़रूरी है, ताकि ज़रूरत के व़क्त वो आसानी से मिल जाए.

रेस्पेक्ट न करना: हो सकता अपनी सास से आपकी ट्यूनिंग इतनी अच्छी न हो या हो सकता है कोई पड़ोसी आपको पसंद न हो, पर अपना आक्रोश व रोष बच्चों के सामने जताने से बचें. आप अगर दूसरों को इज़्ज़त नहीं देंगे, तो बच्चे आपको भी रेस्पेक्ट नहीं देंगे. वो भी अपनी दादी से, अपने अंकल से दूर होते जाएंगे और उनकी नज़रों में उनका सम्मान कम होता जाएगा.

क्या करें?
आपसी मतभेद कितने भी गहरे हों, एक-दूसरे को अपशब्द कहने से बचें. बच्चों के सामने अपने ग़ुस्से पर नियंत्रण रखें. अपनी शिकायतें आपसी बातचीत से हल करने की कोशिश करें. बच्चों के सामने चुगली व निंदा करने से बचें.

गाली देना या ग़लत भाषा का प्रयोग: अधिकांश पुरुष न स़िर्फ ग़ुस्से में, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी व बातचीत में भी गालियों का बहुत प्रयोग करते हैं. उनके लिए यह एक सामान्य बात है, यहां तक कि वो घर पर भी इसी तरह से बात करने से परहेज़ नहीं करते. पर ध्यान रखें कि आपका बच्चा आपको गाली देते देखेगा, तो बाहर जाकर दोस्तों के बीच उसका प्रयोग भी करेगा.

क्या करें?
ज़ाहिर-सी बात है, गाली देने से बचें. मज़ाक में भी बच्चों के सामने ऐसी भाषा का प्रयोग न करें. सबको सम्मान देना, सबसे प्यार से बात करना कितना ज़रूरी है, इसका महत्व बच्चों को समझाना ज़रूरी है और वो आप ख़ुद अपने व्यवहार से ही समझा सकते हैं.

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अल्कोहल/स्मोकिंग: शिकागो में हुए अध्ययन के मुताबिक बच्चे अगर अपनी गुड़िया या खिलौनों से भी खेलते हैं, तो वो पैरेंट्स का ही अनुसरण करते हैं. वो अपने गुड्डे को भी खेल-खेल में सिगरेट और शराब ऑफर करते हैं और उसी तरह व्यवहार व बातें करते हैं, जो पैरेंट्स को दोस्तों के साथ पार्टीज़ या गेट टु गेदर में करते देखते हैं.

क्या करें?
घर पर पार्टी करें, तो इन चीज़ों से जितना हो सके, बचें. बच्चों के सामने थोड़ा सतर्क रहना ज़रूरी है. यदि संभव हो, तो ये बुरी लत छोड़ ही दें.

ईटिंग हैबिट्स और टेबल मैनर्स: ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ करके खाना, खाने के बीच में उंगलियां चाटना, जूठे चम्मच से ही खाना लेना, जल्दी-जल्दी खाना, खाते समय बहुत ज़्यादा बोलना, फोन पर रहना आदि… ये तमाम चीज़ें आप अंजाने में करते हैं और फिर बच्चों को भी यही आदतें अंजाने में ही पास ऑन कर देते हैं.

क्या करें?
ख़ुद को सुधारें, बच्चे अपने आप सही बातें आपको देखकर सीख जाएंगे.

बहुत अधिक गैजेट्स का प्रयोग करना: हमेशा मोबाइल व लैपटॉप पर रहना और बच्चों से यह कहना कि मोबाइल इतना अधिक यूज़ मत करो, कितना जायज़ है?

क्या करें?
बच्चों के साथ-साथ अपना भी टाइम फिक्स करें कि इससे अधिक न तो आपको मोबाइल का इस्तेमाल करना है और न ही सोशल साइट्स पर रहना है. सबके लिए समान नियम रहेगा, तो बच्चों के लिए उसे व्यवहार में शामिल करना आसान होगा.

हर समय शिकायत करते रहना/ईर्ष्या करना: माना आपकी ज़िंदगी वैसी नहीं, जैसी आपने सोची थी, पर हर व़क्त शिकायत करते रहना, रोते रहना न स़िर्फ आपको नकारात्मक इंसान बनाएगा, आपके बच्चे को भी सकारात्मक नहीं बनने देगा. दूसरों की कामयाबी से ईर्ष्या रखना और उन्हें बुरा साबित करने की कोशिश करना भी नकारात्मक भाव है, जो बच्चों के मन में भी ईर्ष्या व द्वेष जैसी भावनाएं पैदा करते हैं.

क्या करें?
आप पहले ख़ुद को पॉज़िटिव बनाएं, यह सोचें कि आपकी ज़िंदगी भले ही आपकी कल्पना जैसी न हो, पर बहुतों से बेहतर है. अपने बच्चों को भी यही सिखाएं कि दूसरों के पास क्या है, इससे तुलना न करें, बल्कि यह देखें कि आपके पास क्या है, जो बहुत से लोगों के पास नहीं है. सकारात्मक पैरेंट्स व माहौल ही हेल्दी बच्चे के सफल भविष्य की नींव रख सकता है.

– विजयलक्ष्मी

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बढ़ने न दें बच्चों में मोटापा (How Parents Can Prevent Child Obesity?)

मॉडर्न लाइफस्टाइल, ग़लत खान-पान और व्यायाम न करने की आदत से न स़िर्फ वयस्क ही मोटापे की गिरफ्त में आ रहे हैं, बल्कि छोटे स्कूली बच्चे भी तेज़ी से मोटापे का शिकार हो रहे हैं. अगर आपके बच्चे का वज़न उसकी औसत लंबाई के हिसाब से अधिक है तो इसे हल्के में न लें, क्योंकि वो मोटापे का शिकार हो सकता है. आंकड़ों के मुताबिक़, दुनियाभर में तक़रीबन 16 से 33 फ़ीसदी बच्चे बढ़ते वज़न के शिकार हैं. बच्चों में बढ़ता हुआ मोटापा उन्हें छोटी-सी उम्र में ही कई बीमारियों का शिकार बना सकता है. चलिए जानते हैं बच्चों में मोटापा बढ़ने के कुछ आम कारण, ताकि व़क्त रहते आप अपने बच्चे को मोटापे की मार से बचा सकें.

Child Obesity

क्या है मोटापा?
जब शरीर में अत्यधिक फैट के कारण वज़न बेहिसाब बढ़ने लगता है और उसका सेहत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है, तो इस स्थिति को मोटापा कहते हैं. सामान्य तौर पर बच्चों में मोटापा तब तक नहीं बढ़ता, जब तक बच्चे का वज़न उसकी लंबाई व शारीरिक बनावट से 10 फ़ीसदी अधिक न हो जाए. दरअसल, बच्चों में वज़न बढ़ने की समस्या की शुरुआत 5-6 साल या किशोरावस्था में शुरू हो जाती है. एक अध्ययन के अनुसार, जो बच्चे 10 से 13 साल की उम्र में मोटापे के शिकार हो जाते हैं, उनके वयस्क होने पर भी उनमें मोटापा बढ़ने की संभावना दूसरों के मुक़ाबले अधिक होती है.

लक्षण
मोटापे के कारण शरीर में कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक परिवर्तन आते हैं और व्यक्ति में इसके लक्षण भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं, जो निम्न प्रकार के हैं.
– सांस फूलना.
– अधिक पसीना आना.
– तेज़ आवाज़ में खर्राटे लेना.
– अत्यधिक थकान महसूस होना.
– पीठ और जोड़ों में दर्द होना.
– आत्मविश्‍वास में कमी आना.
– अकेलापन महसूस करना.

कारण
अगर बच्चे के माता-पिता में से कोई एक मोटा है, तो बच्चे के मोटे होने की संभावना 50 फ़ीसदी तक होती है और अगर माता-पिता दोनों ही मोटे हैं, तो बच्चे में मोटापे की संभावना 80 फ़ीसदी तक होती है. इसके अलावा कई और कारण भी हो सकते हैं.

बाहर का खाना
अधिकांश बच्चे घर के बने खाने की बजाय बाज़ार में मिलने वाली खाने की चीज़ों को बड़े ही चाव से खाते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में हुए एक अध्ययन के मुताबिक, जो बच्चे बाहर का खाना खाते हैं, उनमें क़रीब 30 फ़ीसदी बच्चे मोटापे के शिकार हो जाते हैं. इस सर्वे में यह भी पाया गया कि जो बच्चे चिप्स और सोडा जैसी चीज़ें खाने में दिलचस्पी रखते हैं, उनमें मोटापा अधिक बढ़ता है.

टीवी देखना
जो बच्चे घंटों बैठकर टीवी देखते हैं या फिर ऑनलाइन वीडियो गेम खेलते हैं, उनमें मोटापा तेज़ी से बढ़ता है. कई अध्ययनों में यह ख़ुलासा हुआ है कि ज़्यादा टीवी देखने से बच्चों में मोटापा बढ़ता है. एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जो लड़कियां रोज़ाना ढाई घंटे या उससे अधिक टीवी देखती हैं, वे दो घंटे टीवी देखने वालों के मुक़ाबले ज़्यादा मोटी होती हैं.

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आर्थिक संपन्नता
आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों में जन्म लेने वाले बच्चों में मोटापा आम बच्चों की तुलना में अधिक होता है. एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि संपन्न परिवार के बच्चे पौष्टिक भोजन की बजाय बाज़ार में मिलने वाले जंक फूड और फास्ट फूड का सेवन ज़्यादा करते हैं. इस तरह की चीज़ों को खाने से मोटापा बढ़ता है. इसके अलावा जो बच्चे खाने के बाद बैठे रहते हैं उनके शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा हो जाती है.

पढ़ाई का प्रेशर
स्कूली बच्चों के माता-पिता अक्सर पढ़ाई को लेकर उन पर दबाव बनाते रहते हैं, लेकिन वो इस बात से बेख़बर होते हैं कि उनका इस तरह से बच्चे पर दबाव बनाना उसे मोटापे का शिकार बना सकता है. दरअसल, पढ़ाई का बढ़ता दबाव और खेल-कूद या शारीरिक व्यायाम में कमी आना, बच्चे के वज़न बढ़ने के कारणों में से एक हो सकता है.

नौकरीपेशा मां
साल 2011 में बच्चों के विकास पर हुए एक अध्ययन के मुताबिक, जो महिलाएं ऑफिस जाती हैं उनके बच्चे घर पर रहने वाली घरेलू औरतों के बच्चों के मुक़ाबले ज़्यादा मोटे होते हैं. इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि किसी भी नौकरीपेशा महिला के बच्चे का घर पर रहने वाली महिला के बच्चे की तुलना में पांच महीने में एक पाउंड ज़्यादा वज़न बढ़ जाता है और उनका बीएमआई दूसरे बच्चों की तुलना में ज़्यादा होता है.

डिजिटल एडिक्शन
बच्चों का अधिक टेक सेवी होना और उनमें बढ़ता डिजिटल एडिक्शन उन्हें मोटापे का शिकार बना रहा है. साल 2010 में फैमिली फाउंडेशन द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक, 8 से 18 साल तक की उम्र वाले बच्चे प्रतिदिन अपना डेढ़ घंटा आई फोन या अन्य प्रकार के गैजेट्स पर बिताते हैं, जिससे उनकी शारीरिक गतिविधियों में कमी आई है और इसका सीधा असर उनके बीएमआई पर पड़ रहा है.

Child Obesity

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अन्य कारण
– भूख से ज़्यादा खाना या ओवरईटिंग.
– खेल-कूद या शारीरिक गतिविधियों में कमी.
– मोटापे का पारिवारिक इतिहास.
– न्यूरोलॉजिकल समस्या और दवाइयां.
– तनावपूर्ण घटना या अन्य भावनात्मक समस्या.

कैसे करें बचाव?
मोटापे के शिकार बच्चों को मेडिकल जांच की ज़रूरत होती है, जिससे उनके मोटापे की असली वजह का पता लगाया जाता है. हालांकि कुछ सावधानियां बरतकर आप अपने बच्चे को मोटापे की मार से बचा सकते हैं.

– बच्चों को दें हेल्दी लाइफस्टाइल.
– बच्चे को घर का बना खाना ही खिलाएं.
– खेल-कूद व शारीरिक गतिविधियों में भाग लेनें दें.
– बच्चों के टीवी देखने का समय निर्धारित करें.
– उन्हें इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से दूर रखें.
– हर समय उन पर पढ़ाई का दबाव न बनाएं.
– बच्चे के साथ समय बिताएं.

– कमला बडोनी

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बच्चों की परवरिश को यूं बनाएं हेल्दी (Give Your Child A Healthy Upbringing)

दुनिया के हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चों की परवरिश सही और हेल्दी तरी़के से हो. इसके लिए वो हर मुमक़िन कोशिश भी करते हैं. हालांकि बच्चों की अच्छी परवरिश और उनका स्वस्थ विकास किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है. ख़ासकर तब जब माता-पिता दोनों ही नौकरीपेशा हों. दरअसल, दिन का ज़्यादातर समय ऑफिस में बिताने के कारण अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों के साथ ज़्यादा समय नहीं बिता पाते हैं, बावजूद इसके इस लेख में बताए गए निम्न तरीक़ों से आप अपने बच्चों की परवरिश को हेल्दी बना सकते हैं.

 

मोटापे पर रखें नज़र
फास्ट फूड व आधुनिक गैजेट्स के कारण स्कूली बच्चों में मोटापा एक कॉमन और गंभीर समस्या बन चुकी है. आज के इस डिजिटल युग में एक ही जगह पर घंटों बैठकर खेलना, अनहेल्दी खाना, देर से सोना, देर रात खाना आदि कारणों से बच्चों में मोटापा बढ़ने लगता है. अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा हेल्दी और फिट रहे, तो आपको यह सुनिश्‍चित करना चाहिए कि वो हेल्दी खाए, समय पर सोए और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से दूर रहे.

बच्चों के साथ समय बिताएं
आपकी दिनचर्या कितनी भी व्यस्त क्यों न हो, अपने बच्चों के लिए थोड़ा समय ज़रूर निकालें. उन्हें बिज़ी रखने के लिए गैजेट्स थमाने के बजाय उनका हाथ थामकर उन्हें बाहर घुमाने ले जाएं. दफ़्तर से लौटने के बाद और छुट्टी के दिन बच्चों के साथ समय बिताएं. उन्हें कहानियां सुनाएं और आउटडोर गेम्स के लिए प्रेरित करें.

टीवी पर लगाएं लगाम
जब बच्चा टीवी देख रहा होता है, तब कई पैरेंट्स उसे खाना खिलाते हैं, ताकि वो ज़्यादा खा सके. लेकिन इस तरह खिलाने से आपका बच्चा ओवर ईटिंग का शिकार हो सकता है. बच्चों के कमरे में टीवी न लगाएं. इसके साथ ही यह सुनिश्‍चित करें कि सोने से 2 घंटे पहले तक बच्चा टीवी या दूसरे गैजेट्स के साथ समय न बिताए. सोते समय बच्चों को कहानी सुनाना या फिर उनसे बातें करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है.

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साथ बैठकर खाना खाएं
बच्चे जो देखते हैं वही सीखते हैं. बच्चे खाने-पीने की अच्छी आदतों को अपनाएं, इसके लिए ज़रूरी है कि आप अपने बच्चों और परिवार के साथ बैठकर समय पर खाना खाएं. खाना खाने के दौरान टीवी और दूसरे गैजेट्स से दूरी बनाकर रखें. खाते समय न तो ख़ुद इन चीज़ों का इस्तेमाल करें और न ही अपने बच्चों को करने दें.

समय पर वैक्सिन दिलाएं
हर एक माता-पिता की यह ज़िम्मेदारी है कि वो अपने बच्चों को सही समय पर वैक्सिन दिलाएं. इस बात का ख़ास ख़्याल रखें कि वैक्सिनेशन दो साल में ही ख़त्म नहीं हो जाते, बल्कि 5 से 10 साल तक के बच्चों को समय-समय पर वैक्सिनेशन की आवश्यकता पड़ती है. वैक्सिनेशन के अलावा इस बात का भी ख़्याल रखें कि आपके बच्चे को पर्याप्त मात्रा में आयरन, कैल्शियम और प्रोटीन मिल रहा है, क्योंकि इनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत 9-15 साल की उम्र के दौरान पड़ती है.

गैजेट्स का इस्तेमाल घर पर नहीं
माता-पिता अपने बच्चों के लिए आदर्श और उनके प्रेरणास्रोत होते हैं. आप बच्चों के सामने अपनी जैसी छवि पेश करेंगे, बच्चे भी वैसा ही बनने की कोशिश करेंगे, इसलिए बेहतर होगा कि आप जब घर पर अपने बच्चों के साथ हों, तब कम से कम मोबाइल और कंप्यूटर का इस्तेमाल करें और अगर ज़रूरत न हो तो इसका इस्तेमाल घर पर न करें.

आउटडोर गेम्स के लिए करें प्रेरित
आजकल ज़्यादातर पैरेंट्स अपने बच्चों को खेलने के लिए घर से बाहर नहीं जाने देते हैं, जबकि बच्चों को शारीरिक रूप से मज़बूत और एक्टिव बनाने के लिए उन्हें हर रोज़ एक घंटे घर से बाहर खेलने देना चाहिए. हेल्दी विकास के लिए सभी उम्र के बच्चों को आउटडोर गेम्स खेलने चाहिए. इसके अलावा अपने बच्चों को स्विमिंग, एरोबिक्स, डांस जैसी आउटडोर एक्टिविटीज़ के लिए भी प्रेरित करें.

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योग का अभ्यास करवाएं
छोटी उम्र से ही बच्चों को योग का अभ्यास करवाना उनकी सेहत के लिए फ़ायदेमंद होता है. ख़ासकर ब्रिदिंग एक्सरसाइज़ से बच्चों के दिमाग़ी विकास में मदद मिलती है और पढ़ाई में उनका ध्यान बढ़ता है. ऐसे योग आसन से बच्चों के फेफड़े मज़बूत होते हैं और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, इसलिए ख़ुद भी योग करें और अपने बच्चों को भी योग अभ्यास के लिए प्रेरित करें.

सिखाएं स्वच्छता की अहमियत
बच्चे धूल-मिट्टी में खेलने के बाद बगैर हाथ धोए खाने पर टूट पड़ते हैं. इससे बच्चों के हाथों से हानिकारक बैक्टीरिया उनके पेट में जा सकते हैं और उन्हें बीमार कर सकते हैं. अतः अपने बच्चों को स्वच्छता की अहमियत समझाएं और उन्हें खाने-पीने से पहले हाथ धोने और खेल-कूद कर आने के बाद हाथ-पैर धोने की अच्छी आदत सिखाएं.

बच्चों को कोल्ड ड्रिंक्स से दूर रखें
आजकल के बच्चे दूध देखकर नाक-मुंह सिकोड़ने लगते हैं, जबकि कोल्ड ड्रिंक्स जैसे पेय पदार्थों को देखकर उनका मन ललचाने लगता है. ज़रा सोचिए, कोल्ड ड्रिंक जब बड़ों की सेहत के लिए हानिकारक है तो फिर बच्चों के लिए फ़ायदेमंद कैसे हो सकता है? इसलिए अपने बच्चों को कार्बोनेटेड ड्रिंक्स से जितना हो सके, उतना दूर रखें, ख़ासकर एनर्जी ड्रिंक से. इन सभी पेय पदार्थों में कैलोरीज़ की मात्रा अधिक होती है, जो आपके साथ-साथ आपके बच्चे को भी मोटापे की गिरफ़्त में ले सकती है.

– शिल्पी शर्मा

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कैसे करें बच्चों की सेफ्टी चेक? (How To Keep Your Children Safe?)

Children Safe

ज़रा इन आंकड़ों पर नज़र डालें

* नेशनल क्राइम ब्यूरो के अनुसार- साल 2015 में देशभर में बच्चों के ख़िलाफ़ क्राइम के 94,172 मामले दर्ज़ हुए.

* इनमें सबसे ज़्यादा मामले 11,420 उत्तर प्रदेश में दर्ज़ किए गए.

* वर्ष 2014 से तुलना करें, तो बच्चों के ख़िलाफ़ होनेवाले आपराधिक मामले में 12.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी पाई गई.

देशभर में मासूम बच्चों के साथ यौन शोषण, बलात्कार, हत्या की ख़बरें रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं, लेकिन स़िर्फ स्कूल, समाज या प्रशासन को दोष देने से कुछ नहीं होगा. हर माता-पिता को भी जागरूक होना होगा. ख़ुद भी सतर्क होना होगा और बच्चों को भी सतर्क करना होगा. उन्हें सेफ्टी से जुड़ी छोटी-छोटी बातें बतानी होंगी, तभी आपका बच्चा सुरक्षित रह सकेगा.

छोटे बच्चों के लिए

स्कूल में कैसे करें सेफ्टी चेक?

* बच्चा प्ले स्कूल या नर्सरी में जाता है, तो ये सुनिश्‍चित करें कि उसे अपना पूरा नाम, पैरेंट्स का नाम, घर का पता और कम से कम दो फोन नंबर याद हों.

* बच्चा अगर स्कूल बस या वैन से स्कूल जाता है, तो बस की सुरक्षा की भी तसल्ली कर लें. ये ज़रूर चेक करें कि बस के ड्राइवर और अटेंडेंट का पुलिस वेरिफिकेशन हुआ है या नहीं. अगर बच्चे का स्टॉप सबसे आख़िरी स्टॉप है, तो चेक करें कि उसके साथ कोई अटेंडेंट रहता है या नहीं.

* बस के ड्राइवर और कंडक्टर का नंबर रखें, ताकि उनसे संपर्क में रहें.

* कोशिश करें कि घर के नज़दीक ही किसी स्कूल में एडमिशन कराएं. एडमिशन के समय ही ये चेक कर लें कि स्कूल के सभी क्लास, हॉल, गार्डन एरिया में सीसीटीवी लगा है या नहीं और बच्चों की सेफ्टी के लिए स्कूल की क्या तैयारी है.

* स्कूल के बाथरूम-टॉयलेट कितने सुरक्षित हैं, इस पर भी नज़र रखें. वहां कोई अटेंडेंट बैठता है या नहीं, ये चेक करें और बच्चों से भी इस बारे में समय-समय पर पूछते रहें.

* बच्चों को गुड टच-बैड टच के बारे में ज़रूर बताएं. उन्हें सिखाएं कि किसी के बुरे बर्ताव करने या बैड टच करने पर कैसे शोर मचाना है.

* बच्चे को समझाएं कि स्कूल छूटने के बाद वो अपने फ्रेंड्स के साथ ही रहें. इसके अलावा स्कूल छूटने के बाद टॉयलेट अकेले न जाएं.

* बच्चे की एक्टिविटीज़ पर नज़र रखें. उसके व्यवहार या आदत में कोई बदलाव नज़र आए, तो इसे अनदेखा न करें. बच्चे को विश्‍वास में लेकर उससे सच जानने की कोशिश करें.

* बच्चे में बचपन से ही ये आदत डालें कि वो आपसे कोई बात छिपाए नहीं. इसके लिए एक रूटीन बनाएं कि रोज़ उसके साथ थोड़ा टाइम बिताएं और इस दौरान उसकी दिनभर की सारी एक्टिविटीज़ के बारे में जानने की कोशिश करें.

* सबसे ज़रूरी बात- बच्चे के सामने पैनिक न हों. उसे समझाएं कि स्कूल उसके लिए सुरक्षित जगह है और ये सारी एक्टिविटीज़ एहतियात के तौर पर करनी ज़रूरी है.

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दोस्तों-परिचितों पर भी रखें नज़र

कोई पड़ोसी, पारिवारिक मित्र या फिर दूर के रिश्तेदार- बच्चे इनके लिए ईज़ी टारगेट होते हैं और मौक़ा पाते ही उन्हें छूना, पोर्न क्लिपिंग दिखाना, सेक्स के लिए उकसाना जैसी हरकतें करने में इन्हें मज़ा आने लगता है. ज़्यादातर बच्चे डर के कारण इसका विरोध भी नहीं करते और सब कुछ चुपचाप चलता रहता है व माता-पिता को ख़बर भी नहीं होती. आपके बच्चे के साथ ऐसा कुछ न हो, वो सेक्सुअल एब्यूज़ का शिकार न हो, इसके लिए ज़रूरी है कुछ एहतियात.

* घर पर आनेवाले लोगों पर नज़र रखें. ऐसे लोगों को पहचानें, जो बच्चे के लिए ख़तरा बन सकते हैं और उन्हें अपने बच्चों से दूर रखें.

* बच्चों को सही उम्र में सेक्स एजुकेशन दें.

* उन्हें सेफ और अनसेफ टच व सही-ग़लत के बारे में बताएं.

* हर व़क्त उनके लिए उपलब्ध रहें. उन्हें बताएं कि वो किसी भी टॉपिक पर कभी भी आपसे बात कर सकते हैं.

* उन्हें ना कहना सिखाएं. उन्हें बताएं कि किसी से डरकर उनकी सही-ग़लत बात मानना ज़रूरी नहीं.

बड़े होते बच्चों के लिए

अगर आपका बच्चा 10-12 साल का है, तो अभी वो बहुत छोटा है और उसे एक्स्ट्रा केयर की ज़रूरत है. ऐसे बच्चों की सेफ्टी के प्रति भी सावधानी ज़रूरी है.

इंटरनेट सेफ्टी है ज़रूरी

सोशल नेटवर्किंग अब बच्चों की दुनिया का ज़रूरी हिस्सा बन गया है. लेकिन आए दिन साइबर क्राइम की घटनाओं और इंटरनेट पर उपलब्ध सही-ग़लत कंटेन्ट से पैरेंट्स परेशान हैं कि अपने बच्चे को इन सबसे सुरक्षित कैसे रखें.

* सबसे पहले तो आप ख़ुद को एजुकेट करें. अगर आप इंटरनेट के बारे में सब कुछ जानते हैं, तो अपने बच्चे को भी समझा सकेंगे और उसके प्लस और माइनस पॉइंट्स के बारे में उसे बता पाएंगे.

* इंटरनेट को बिल्कुल बैन न कर दें,  बल्कि इंटरनेट के इस्तेमाल के लिए अपने बच्चे के लिए एक समय सीमा निर्धारित करें. एक गाइडलाइन बनाएं और बच्चे को समझाएं कि उनकी सुरक्षा के लिए ये गाइडलाइन ज़रूरी है.

* बच्चों को देर रात तक मोबाइल या लैपटॉप पर रहने की इजाज़त न दें.

* आजकल कई ऐसे सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं, जो विभिन्न साइट्स और उनके कंटेन्ट को फिल्टर करते हैं. इन्हें अपने मोबाइल या कंप्यूटर में इंस्टॉल करवाएं, ताकि आपका बच्चा कोई ग़ैरज़रूरी साइट न ओपन कर सके.

* उनकी ऑनलाइन एक्टीविटीज़ और फ्रेंड्स पर नज़र रखें.

* ब्राउज़र प्रोग्राम में जाकर हिस्ट्री बटन का इस्तेमाल करें. इससे आप जान सकेंगे कि आपके बच्चे ने किस साइट पर विज़िट किया है.

* कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स, जैसे- फेसबुक, ट्विटर में साइनअप करने के लिए एक आयु सीमा निर्धारित की गई है. ये आपके बच्चे की सुरक्षा के लिए ज़रूरी है. इसे अनदेखा न करें.

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सेफ्टी @ होम

* बच्चे को घर पर अकेला न छोड़ें. अगर बच्चा समझदार है, तो उसे सावधान व सजग रहने को कहें.

* बच्चे को समझाएं कि अगर वो घर पर अकेला है और किसी का फोन आता है, तो वो कॉल करनेवाले को ये भनक बिल्कुल भी न लगने दे कि वो घर पर अकेला है.

* उसे बताएं कि किसी अजनबी के लिए दरवाज़ा न खोले, न ही अपना पता और पर्सनल जानकारियां दे.

* आन्सरिंग मशीन या कॉलर आईडी यूनिट लगवाएं, ताकि फोन करनेवाले का नंबर देखा जा सके. बच्चे को बताएं कि वो ऐसे ही लोगों के फोन उठाए जिसे वो जानता हो.

* ऐसे लोगों के नाम व कॉन्टैक्ट नंबर की लिस्ट फोन के पास ही रखें, जो इमर्जेंसी में फ़ौरन काम आ सकते हैं.

 

टीनएजर बच्चों के लिए

अगर बच्चा कहीं बाहर जा रहा है

* सबसे पहले तो उसे लेट नाइट कहीं बाहर रहने की इजाज़त न दें. वो कहीं जा ही रहा है, तो उसे समय पर घर लौट आने को कहें. उसे समझाएं कि वो घर लौटने का सुरक्षित रास्ता चुने.

* उसे समझाएं कि रात में अकेले बाहर जाना रिस्की है. अगर बहुत ज़रूरी हो, तो उसे ग्रुप में ही बाहर भेजें.

* उसे हिदायत दें कि वो सुनसान रास्ते पर जाने से बचे. वहां दुर्घटना होने की संभावना ज़्यादा होती है.

* आपको पता होना चाहिए कि वो कहां जा रहा है और कब तक लौटेगा. वो जहां जा रहा हो, वहां का फोन नंबर भी नोट कर लें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर कॉन्टैक्ट किया जा सके.

* उसके मोबाइल पर घर का लैंडलाइन नंबर और पैरेंट्स के मोबाइल नंबर्स को स्पीड डायल पर रखें, ताकि इमर्जेंसी में वो तुरंत संपर्क कर सके.

* कुछ एक्स्ट्रा पैसे उसके पास ज़रूर रखें, ताकि कहीं फंसने की स्थिति में टैक्सी से ट्रैवल कर सके. ये पैसे इमर्जेंसी में भी काम आ सकते हैं. लेकिन पैसे इतने ज़्यादा भी न दें कि वही दुर्घटना का कारण बन जाए.

* अनजान लोगों के साथ या ऐसे लोगों के साथ, जिन पर आपको भरोसा न हो, उनके साथ उसे न भेजें.

अगर फ्रेंड्स के साथ पार्टी में जा रहे हैं

* आजकल टीनएज पार्टीज़ में ड्रग या अल्कोहल का क्रेज़ बढ़ा है, इसलिए पहले कंफर्म कर लें. ऐसी पार्टी में उसे भेजने से बचें, जहां ड्रिंक भी सर्व किया जानेवाला हो.

* हमेशा ग्रुप में या किसी फ्रेंड के साथ ही उसे पार्टी में भेजें. उसकी सेफ्टी के लिए ये ज़रूरी है.

* उसे समझाएं कि पार्टी में वे अनजान लोगों से दूर रहे. साथ ही अनजान लोगों द्वारा सर्व किया गया कोई भी ड्रिंक लेने से बचे.

* आपका बच्चा स्कूल या कॉलेज की ओर से कैम्प या पिकनिक वगैरह पर जा रहा है, तो भी सतर्क रहें. उसे अच्छी तरह समझा दें कि वो कहीं झाड़ियों या सुनसान जगह पर जाने से बचे.

सबसे अहम् बात– बच्चे की सुरक्षा को लेकर सजग रहना ज़रूरी है. लेकिन ध्यान रखें कि इस चक्कर में आप बच्चे को इतना डरा न दें कि वो कहीं बाहर आना-जाना ही छोड़ दे. उसे समझाएं कि ये सारे एहतियात सुरक्षात्मक क़दम हैं. किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है, बस एलर्ट रहना होगा.

– प्रतिभा तिवारी

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बच्चों को यूं रखे जंक फूड से दूर (5 Ways To Keep Your Child Away From Junk Food)

Junk Food

जॉनी-जॉनी, यस पापा, ईटिंग शुगर, नो पापा… नर्सरी से ही बच्चों को इस पोयम के ज़रिए हेल्दी खाना खाने की आदत डालने की कोशिश पैरेंट्स करते हैं, लेकिन क्या सच में वो सफल होते हैं? नहीं ना. बच्चों की  बात छोड़िए, ख़ुद आप भी न जाने कितनी बार कोशिश करके हार चुके होंगे. तो हम बता रहे हैं कि आप कैसे बच्चों को जंक फूड से दूर रख सकते हैं? 

“सक्षम… चलो बेटा झट से दूध का ग्लास फिनिश करो, ये चिप्स का पैकेट रखो… मुझे ग़ुस्सा दिला रहे हो अब तुम, जल्दी पीओ दूध. जब देखो चिप्स खाते रहते हो, खाना खाने के नाम पर बुखार चढ़ जाता है.” 7 साल के सक्षम की मां शालिनी हर दिन बेटे के खाने को लेकर परेशान रहती हैं. स़िर्फ वो ही क्यों, हर मां-बाप ये चाहते हैं कि उनका बच्चा हेल्दी खाए, लेकिन बच्चे तो बच्चे हैं. जो मज़ा उन्हें चिप्स, पिज़्ज़ा, बर्गर आदि खाने में आता है, वो दूध, दाल-चावल खाने में नहीं. कुछ बच्चे तो इतने स्मार्ट होते हैं कि मां के सामने दूध का ग्लास पकड़ तो लेंगे, लेकिन उनके जाते ही उसे कभी गमले, कभी डॉगी, तो कभी घर के नौकर को पिला देते हैं और अंत में बचे हुए दूध से अपनी मूंछ बनाते हुए मां को दूध का ग्लास पकड़ाते हुए मां का दुलारा बन जाते हैं. इस तरह मां को लगता है कि बच्चे ने दूध पी लिया और फिर वो उसे ख़ुद ही चिप्स का पैकेट बड़े प्यार से पकड़ा देती हैं. यदि आप सचमुच बच्चे को जंक फूड से दूर रखना चाहते हैं, तो थोड़ी-सी स्मार्टनेस दिखाइए.

धीरे-धीरे करें शुरुआत

ये आप भी जानते हैं कि बच्चों की पसंद की किसी चीज़ पर अचानक रोक लगाने से वो बहुत ज़िद करने लगते हैं और आपसे नाराज़ भी हो जाते हैं. जानकार बताते हैं कि किसी भी चीज़ पर अचानक रोक लगाने की बजाय धीरे-धीरे शुरुआत करें. उदाहरण के लिए, किसी भी दिन उठकर उनके हाथ से बर्गर, पिज़्ज़ा छीनने की बजाय, उन्हें कहें कि ये आज के दिन का आख़िरी जंक फूड है. इसी तरह अगर बच्चे को दिनभर में चिप्स के कई पैकेट खाने की आदत है, तो अचानक सारे चिप्स के पैकेट छुपाने की बजाय पूरे दिन में बच्चे को 1-2 पैकेट ही दें और उसे समझाने की कोशिश करें. बाकी समय में बच्चे को हेल्दी फूड की आदत डालें.

स्मार्ट आइडिया

टिफिन में 3 दिन बच्चों की पसंद का खाना दें और 2 दिन अपनी पसंद का हेल्दी खाना.

जंक फूड ख़रीदना बंद करें

वर्किंग पैरेंट्स पर ये बात ज़्यादा लागू होती है. अक्सर ऑफिस से देर से आने पर घर में खाना बनाने का समय नहीं बचता, जिसके कारण वे बाहर से ही पिज़्ज़ा, बर्गर आदि पैक करा लाते हैं. धीरे-धीरे बच्चों को इसकी आदत पड़ जाती है और वो घर का खाना खाने की बजाय बाहर का खाना ज़्यादा पसंद करते हैं. बच्चों को अगर इससे दूर रखना है, तो आपको सबसे पहले इन्हें घर पर लाना बंद करना पड़ेगा.

स्मार्ट आइडिया

घर पर ही पिज़्ज़ा, बर्गर आदि बनाएं. बनाते समय इस बात का ध्यान रखें कि वो पूरी तरह हेल्दी हों. बर्गर की टिक्की बनाते समय उसमें सब्ज़ियां मिक्स करें.

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बनाएं स्वादिष्ट खाना

वर्किंग होने के कारण मां के पास अच्छा और टेस्टी खाना बनाने का समय नहीं होता. टेस्टी न होने के कारण बच्चे खाना नहीं खाते. ऐसे में मां ये सोचती है कि बच्चा कुछ भी खा ले, जिससे उसके पेट में कुछ तो जाए, लेकिन ये कुछ तो ही आपके बच्चे को अनहेल्दी खाने की ओर आकर्षित करता है. जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसे इसी तरह के खाने की आदत पड़ जाती है और हमेशा वो सेहत की बजाय स्वाद को तवज्जो देता है. इस आदत को आप बदल सकती हैं.

स्मार्ट आइडिया

हर दिन न सही, लेकिन कभी-कभार टेस्टी खाना बनाएं. इसके लिए पनीर के साथ बाकी वेजीटेबल मिक्स करके चाट मसाला डालकर स्नैक्स बनाएं, फ्रूट भेल बनाएं. परांठे को टेस्टी बनाने के लिए उसमें मिक्स वेजीटेबल के साथ थोड़ा चीज़ डालें.

जंक फूड का प्रॉमिस

अक्सर बच्चे जब खाना नहीं खाते या पढ़ाई नहीं करते, तो मां उन्हें पिज़्ज़ा, चिप्स, बर्गर आदि अनहेल्दी फूड का लालच देती हैं. इस तरह  बच्चों को अनहेल्दी खाने की आदत हो जाती है और वो उसी पर डिपेंड रहने लगते हैं. आपको अपनी ओर से ऐसा करने से बचना चाहिए.

स्मार्ट आइडिया

अगर प्रॉमिस कर ही दिया है, तो बाहर खाने की बजाय उसे घर पर ही बनाएं. इससे आपकी प्रॉमिस भी पूरी हो जाएगी और जंक फूड भी थोड़ा हेल्दी बन जाएगा.

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ख़ुद भी फॉलो करें

बच्चे पैरेंट्स को फॉलो करते हैं. आप जैसा करते हैं, जैसा उन्हें सिखाते हैं, वैसा ही वो करते हैं. ऐसे में उन्हें जंक फूड से दूर रखने के लिए पहले ख़ुद आप हेल्दी डायट फॉलो करें. उदाहरण के लिए जब भी बच्चों के साथ बाहर जाएं, तो पानीपूरी, समंोसा आदि खाने की बजाय फ्रूट जूस, सूप आदि पीएं. इससे बच्चा भी बाहर जाने पर उसी तरह की डिमांड करेगा.

स्मार्ट आइडिया     

सुबह के नाश्ते से करें शुरुआत. एक ग्लास दूध के साथ कभी फ्रूट सलाद परोसें, तो कभी फ्रूट शेक, दूध में कटे हुए फ्रूट मिक्स करके दें.

मां के हाथ का स्वाद

कहते हैं, मां के हाथ में जादू होता है. आपने भी ये महसूस किया होगा. वास्तविकता ये है कि बचपन में मां अपने बच्चे को जो खिलाती है, बच्चे को उसकी आदत हो जाती है और बड़े होने के बाद भी उस खाने जैसा स्वाद कहीं और नहीं मिलता. आप भी इसकी शुरुआत करें. बचपन में बच्चे के रोने पर झट से उसे कुछ भी बाहरी फूड देने की बजाय घर में कुछ इंटरेस्टिंग बनाएं और बच्चे को उसकी आदत लगाएं. ऐसे में आपके बच्चे को आपके हाथ का बना खाना जितना टेस्टी लगेगा, उतना पिज़्ज़ा, बर्गर नहीं. ये ट्रिक बहुत कारगर है.

–  अनुरीता त्रिपाठी

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कहीं बच्चों को संवेदनहीन तो नहीं बना रहा आपका व्यवहार? (Are You Responsible For Your Child’s Growing Insensitivity?)

Child's Growing Insensitivity

Child's Growing Insensitivity

कहते हैं कि बच्चे कच्चे घड़े की तरह होते हैं, उन्हें जैसा ढालेंगे, वो वैसा ढल जाते हैं. बात चाहे व्यक्तित्व को निखारने की हो या व्यावहारिकता सिखाने की, बच्चे वही सीखते हैं, जो वो घर में देखते हैं. ऐसे में बच्चों के सामने पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है. बच्चे में कमी ढूंढ़ने से पहले ख़ुद के व्यवहार को परखें, कहीं आपका व्यवहार ही तो उन्हें ऐसा नहीं बना रहा?     

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि संवेदनशीलता या व्यवहार बच्चे कभी सिखाने से नहीं सीखते, बल्कि यह सब वह देखकर और ऑब्ज़र्व करके सीखते हैं. अगर पैरेंट्स बच्चों के सामने असंवेदनशील व्यवहार करेंगे, तो बच्चे कभी भी संवेदनशील नहीं होंगे.

बच्चों में संवेदनहीनता के लक्षण

* बच्चा ऐसे ही खेल खेलता है, जिसमें वह अकेला खिलाड़ी हो या जिसमें किसी टीम के साथ ना रहना पड़े.

* अक्सर ही वह चिड़चिड़ा या उखड़ा हुआ रहता हो.

* अगर घर का कोई सदस्य या मित्र परेशानी में हो तो बच्चा प्रभावित नहीं होता.

* घर या अपने आस-पास के वातावरण से अक्सर ही उसका कोई लेना-देना नहीं होता.

* घर या समाज के कामों, उत्सवों या पारिवारिक समारोहों में बहुत कम सहयोग देता है.

* लोगों से मिलना-जुलना पसंद नहीं करता.

* अपनी भावनाओं को प्रकट नहीं कर पाता.

क्यों होने लगते हैं बच्चे संवेदनहीन?

काउंसलर राधा रवीश भावे बताती हैं कि बच्चों के सामने हमेशा किसी की बुराई करना, उन्हें अपशब्द कहना, ख़ुद उनके सामने यह जताना कि आपको किसी की परवाह ही नहीं है आदि सभी कारणों से बच्चों में संवेदनाओं की कमी हो सकती है. उदाहरण के तौर पर अगर किसी मेहमान के घर आने की ख़बर आपको झुंझला देती है, तो आपका बच्चा भी उस मेहमान को लेकर असंवेदनशीलता दिखाएगा. अगर किसी घर में माता-पिता अपने ग़ुस्से को बड़ी सहजता से शांतिपूर्वक नियंत्रित करते हैं, तो निश्‍चित तौर पर बच्चा भी देखकर वैसा ही करेगा. इसके अलावा बच्चों के असंवेदनशील होने के कुछ और कारण हैं, जो इस प्रकार हैं-

* बच्चों को अपनी ही भावनाओं को समझने में तकलीफ़ होना.

* परिवारों का आकार छोटा होना.

* घरवालों या पैरेंट्स से अच्छा कम्यूनिकेशन ना होना.

* बाहरी दुनिया की असुरक्षा और बढ़ते अपराधों के कारण पैरेंट्स का अपने बच्चों को सोशल फंक्शन्स से दूर रखना है.

* बच्चों के सामने पैसे को सबसे महत्वपूर्ण बताना.क्या करें जब बच्चा बनने लगे संवेदनहीन?

डॉ. राधा बताती हैं, “आज बाहर की दुनिया बहुत प्रैक्टिकल है. ऐसे में यह बहुत ज़रूरी है कि बच्चे अपनी भावनाओं को समझें और सही तरी़के से प्रदर्शित करें. ऐसा करना बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए भी आवश्यक है. इससे उनकी पर्सनालिटी स्ट्रॉन्ग होगी. बच्चों के लिए ‘प्ले थेरेपी’ बहुत ही अच्छा तरीक़ा है, जिसमें बच्चों को अलग-अलग तरह के गेम्स के माध्यम से भावनाओं की अभिव्यक्ति सिखाई जाती है.”

निजी स्कूल की शिक्षिका रुतुजा शर्मा कहती हैं, “ऐसा नहीं है कि सभी बच्चे भावनाओं की कद्र नहीं करते, पर हां, अब बच्चे पहले जैसे नहीं हैं, क्योंकि घर, परिवार, रिश्ते, एक्सपोज़र सब कुछ बदल गया है. आजकल स्कूलों में भी इस बात का ख़ास ख़्याल रखा जाता है. बच्चों में संवेदनाएं ज़िंदा रहें, इसके लिए पैरेंट्स और टीचर्स को मिलकर कोशिश करनी होगी.”

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बड़ों के मनमुटाव उन तक ही सीमित हों

यह ग़लती हम अक्सर करते हैं कि बच्चों के सामने दूसरों को कोसते या भला-बुरा कहते हैं. ख़ासकर स्त्रियों को ध्यान रखना चाहिए कि अगर उनकी अपने ससुराल या किसी रिश्तेदार से नहीं बनती, तो भी बच्चों के सामने किसी भी प्रकार का असंवेदनशील वार्तालाप ना करें. बच्चों को पैसा नहीं, अपना समय दें

अपने व्यवहार में यह कभी झलकने ना दें कि आज की दुनिया में पैसा ही सब कुछ है. उन्हें अपने व्यवहार से यह बताएं कि रिश्ते या लोग सबसे ज़रूरी हैं. बच्चों को कुछ अच्छा करने पर कोई गिफ्ट देने की जगह अपना समय दें. उनके साथ ऐसी जगह समय बिताएं, जो उनकी पसंदीदा हो, जैसे- परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास होने पर उन्हें पिकनिक पर ले जाएं, उनके साथ ख़ूब खेलें आदि.

भावनाओं से रू-ब-रू करवाएं

कभी-कभी बच्चे बिना किसी वजह के या बहुत छोटी-सी बात पर ग़ुस्सा या नाराज़ हो जाते हैं. ऐसा अक्सर उस समय होता है, जब उनमें कुछ भावनाएं या एहसास नए-नए जन्म लेते हैं. ऐसे में उनके ग़ुस्से पर उन्हें डांटें नहीं, बल्कि शांति से बैठकर उन्हें उनकी भावनाओं के बारे में बताएं.

ज़रूरी है भावनाओं का प्रदर्शन

डॉ. राधा बताती हैं कि भावनाओं का प्रदर्शन कभी ग़लत नहीं होता. हम इंसान हैं और भावनाएं हमारा बेसिक फीचर हैं. बच्चों के सामने अपनी भावनाओं का प्रदर्शन करने से हिचकिचाएं नहीं, वे आपसे सीख रहे हैं.

रहस्यमयी ना हो घर का वातावरण

कई घरों में बच्चों से काफ़ी सारी चीज़ें छिपाकर रखी जाती हैं, पर अगर आप बच्चे को कुछ नहीं भी बताना चाहते हैं, तो उनके सामने ऐसा मत जताइए कि आप कुछ छिपा रहे हैं. रहस्यमयी वातावरण बच्चों के लिए अच्छा नहीं है. इससे बच्चों का बड़ों पर से विश्‍वास कम हो जाता है, फिर आप चाहे कुछ अच्छा सिखा भी रहे हों, फिर भी वे आपका अनुकरण नहीं करेंगे.

हमेशा यथाशक्ति लोगों की मदद करें

घर की ग़ैरज़रूरी चीज़ें दूसरों में बांट दें. अगर कोई ज़रूरतमंद है, तो उसकी मदद करें. अगर रास्ते पर कोई दुर्घटना हुई हो, तो ज़रूर रुककर मदद करें. स़िर्फ ‘शेयरिंग इज़ केयरिंग’ कहने से कुछ नहीं होगा. वह केयरिंग आपको अपने व्यवहार में दिखानी पड़ेगी.

बच्चों को बताएं कि इमोशनल होना कोई बुरी बात नहीं है, पर हां संवेदनहीन होना हमारी नस्ल के लिए ख़तरनाक हो सकता है. बच्चों को सकारात्मकता के साथ जीवन के लिए ये अमूल्य पाठ ज़रूर पढ़ाएं.

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स्मार्ट टिप्स

  1. जब बच्चे आसपास हों, तो आपका पूरा अटेंशन उनको मिलना चाहिए. बच्चों के साथ समय बिताते समय मोबाइल का उपयोग ना करें.
  2. स्कूलों में सबसे ज़्यादा दूसरों की मदद करनेवाले बच्चों को पारितोषिक दिया जाना चाहिए.
  3. बच्चों के साथ गेम खेलें, जिसमें उनको दिनभर में महसूस हुए सबसे स्ट्रॉन्ग इमोशंस लिखने के लिए कहें और आप भी उसके साथ लिखें.
  4. बच्चों के साथ मिलकर ध्यान करें.
  5. बच्चों को उनकी भावनाओं का प्रदर्शन करने के लिए शब्दों के चुनाव में मदद करें.
  6. उन्हें बताएं कि किस तरह से हर भावना का अपना अलग महत्व है.
  7. सप्ताह में एक बार बच्चे के साथ बैठकर अपने दूर या पास के रिश्तेदारों को वीडियो कॉल करें.

                  – विजया कठाले निबंधे

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क्या होता है जब पैरेंट्स बन जाते हैं बच्चों के फ्रेंड? देखें वीडियो:

 

बच्चों का दिमाग़ तेज़ करने के उपाय (Effective Tips To Make Your Kid Smarter And Sharper)

Effective Tips Kid Smarter And Sharper

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जन्म के समय नवजात शिशु के मस्तिष्क में 100 अरब न्यूरॉन्स होते हैं. उसके बाद अगले कुछ वर्षों तक बच्चे का मस्तिष्क बहुत तेज़ी से विकसित होता है. उनका मस्तिष्क प्रति सेकेंड दस लाख न्यूरॉन्स का उत्पादन करता है. मस्तिष्क के विकास को बहुत-सी चीज़ें प्रभावित करती हैं, जैसे- घर का वातावरण, बच्चे का घर के सदस्यों के साथ रिश्ता व उसके अनुभव. अगर बच्चे के आस-पास का वातावरण अच्छा  है, तो मस्तिष्क का विकास ज़्यादा तेज़ गति से होता है. एक अभिभावक के रूप में आप कुछ ऐसे क़दम उठा सकते हैं, जिससे आपके बच्चे के मस्तिष्क का विकास तीव्र गति से हो.

गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान न करें

बच्चे के जन्म से पहले उसके स्वस्थ शुरुआत के लिए यह ज़रूरी है कि गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान से दूर रहा जाए. प्रेग्नेंसी के दौरान धूम्रपान करने से भ्रूण के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है. सिगरेट के धुएं में मौजूद हानिकारक केमिकल्स गर्भ में मौजूद शिशु के मस्तिष्क को बहुत हानि पहुंचा सकते हैं. जब कोई महिला गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान करती है तो सिगरेट में मौजूद विषाक्त पदार्थ रक्त में मिल जाते हैं, जो बच्चे के लिए ऑक्सिजन व पोषक तत्व का एकमात्र सोर्स होता है. वर्ष 2015 में हुए एक अध्ययन के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान करने से भ्रूण के मस्तिष्क के विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. ऐसी मांओं के बच्चों को लर्निंग डिस्ऑर्डर, बिहेवियरल प्रॉब्लम्स और अपेक्षाकृत लो आईक्यू जैसी समस्याएं होती हैं.

बच्चे को स्तनपान कराएं

नवजात शिशुओं के लिए मां का दूध बहुत ज़रूरी होता है. यह उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ उनके दिमाग़ को तेज़ बनाने में मदद करता है. मां के दूध में पाया जानेवाला फैट और कोलेस्ट्रॉल शिशु के मस्तिष्क के विकास में अहम् भूमिका निभाता है. वर्ष 2010 में पेडियाट्रिक रिसर्च में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, जो मांएं अपने बच्चों को स्तनपान कराती हैं, उनका कॉग्निटिव लेवल (बोध प्रक्रिया से संबंधित) ज़्यादा होता है.  वर्ष 2016 में जरनल ऑफ पेडियाट्रिक्स में छपे एक अध्ययन के अनुसार, समय से पहले पैदा हुए जिन शिशुओं को पहले 28 दिन तक स्तनपान कराया गया, उनकी याद्दाश्त, आईक्यू लेवल व मोटर फंक्शन मां का दूध नहीं पीनेवाले बच्चों से बेहतर था. यानी अब आपको स्तनपान कराने का एक और फ़ायदा पता चल गया. मात्र कुछ हफ़्तों तक स्तनपान कराने से बच्चे की बुद्धि व उसके मोटर स्किल्स में अधिक तेज़ी से विकास होता है.

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संगीत सुनने की आदत डालें

जितनी जल्दी हो सके, बच्चे में संगीत सुनने की आदत डालें, इससे उसके मस्तिष्क का तेज़ी से विकास होता है. संगीत बौद्धिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करती है. संगीत सुनने से डोपामाइन नामक हार्मोन का स्राव होता है, जिससे सीखने की इच्छाशक्ति बढ़ती है. म्यूज़िक पढ़ाई को मज़ेदार बनाने में मदद करता है, जिससे बच्चा कोई भी चीज़ जल्दी सीख लेता है. कम उम्र में संगीत सीखने से बच्चे के मस्तिष्क के विकास में भी सार्थक बदलाव आता है.  वर्ष 2006 में छपे एक अध्ययन के अनुसार, म्यूज़िकल ट्रेनिंग और मस्तिष्क के विकास के बीच गहरा कनेक्शन होता है. अध्ययनकर्ताओं ने पाया कि छोटी उम्र से जो बच्चे संगीत की शिक्षा लेते हैं, उनका दिमाग़ अन्य बच्चों की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से विकसित होता है. वर्ष 2013 में जरनल ऑफ न्यूरोसाइंस में छपे एक अन्य अध्ययन के अनुसार, 7 साल की उम्र से पहले बच्चों को संगीत की शिक्षा देने से उनके मस्तिष्क के विकास में मदद मिलती है. जो बच्चे कम उम्र में म्यूज़िक सीखने लगते हैं, उनके लेफ्ट व राइट साइड ब्रेन के बीच बेहतर कनेक्शन होता है.

टीवी टाइम नियंत्रित रखें

चाहे आप कितने भी व्यस्त क्यों न हों, इसे बच्चे के अधिक टीवी या मोबाइल फोन देखने का बहाना न बनने दें. अमेरिकन अकेडमी ऑफ पेडियाट्रिक्स के अनुसार, दो वर्ष से छोटे बच्चों को बिल्कुल भी टीवी नहीं देखना चाहिए. उससे बड़े बच्चों को भी दो घंटे से ज़्यादा टीवी या स्मार्टफोन नहीं देखना चाहिए. ज़्यादा टीवी देखने से उनकी पढ़ाई पर असर तो पड़ता ही है, उन्हें रचनात्मक खेलों के लिए भी कम समय मिलता है और साथ ही मोटापा, हिंसक प्रवृती, नींद व बिहेवियरल प्रॉब्लम्स होते हैं. इतना ही नहीं, ज़्यादा टीवी देखने के कारण बच्चे और अभिभावक के बीच में कम बातचीत होती है, जो बच्चे के संपूर्णविकास में बाधा बन सकती है. एक अभिभावक के रूप में आपके लिए ज़रूरी है कि आप बच्चे के साथ समय व्यतीत करें, न कि उसे टीवी या मोबाइल फोन देखने में व्यस्त रखें.

बच्चे को पढ़कर सुनाएं

बच्चे में कम उम्र में ही किताबें पढ़ने की आदत डालें. ऐसा करने के लिए शुरुआत से ही उसे कुछ न कुछ पढ़कर सुनाएं. सोने जाने से पहले बच्चे को कुछ म़जेदार किताबें पढ़कर सुनाएं. हालांकि छोटे बच्चे सभी शब्दों को नहीं समझ पाते, लेकिन उन्हें इस बात का ज्ञान होता है कि किताब, मैग्ज़ीन्स या अख़बार से जानकारी मिलती है. इससे किताबों में उनकी रुचि बढ़ती है. वर्ष 2015 में छपे एक अध्ययन के अनुसार, बच्चे को किताबें पढ़कर सुनाने से भाषा व साहित्य पर उनकी पकड़ मज़बूत होती है.

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व्यायाम है ज़रूरी

चाहे बच्चा हो या वयस्क इंसान, व्यायाम सबके लिए ज़रूरी है, यहां तक कि छोटे शिशुओं के लिए भी. वास्तव में नियमित रूप से व्यायाम करने से बच्चे के मानसिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इससे यद्दाश्त व सीखने की क्षमता तेज़ होती है और बड़ी उम्र में मानसिक दुर्बलता व डिमेंशिया होने का ख़तरा कम होता है. व्यायाम करने से मस्तिष्क में ऑक्सिजन व ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है, जिससे नर्व फंक्शनिंग बेहतर होती है और बच्चे का संपूर्ण शारीरिक व मानसिक विकास होता है. वर्ष 2008 में एज्युकेशनल साइकोलॉजी में छपे एक अध्ययन के अनुसार, सिस्टमेटिक एक्सरसाइज़ प्रोग्राम्स विशेष प्रकार के मेंटर प्रोसेसिंग के विकास में मदद करते हैं, जिससे बच्चे को पढ़ाई व अन्य चुनौतियों में बेहतर प्रदर्शन करने में मदद मिलती है. वर्ष 2010 में छपे एक अन्य अध्ययन के अनुसार, जो बच्चे शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हैं, उनका हिप्पोकैम्पस (ब्रेन का वह भाग, जो याद्दाश्त, इमोशन व मोटिवेशन नियंत्रित करता है) बड़ा होता है और वे मेमोरी टेस्ट में अन्य बच्चों की तुलना में ज़्यादा अच्छा प्रदर्शन करते हैं.

बच्चे को हेल्दी खाना खिलाएं

बचपन से ही बच्चों में हेल्दी खाना खाने की आदत डालनी चाहिए. बढ़ते हुए बच्चे के लिए पौष्टिक खाना स़िर्फ उनके शारीरिक विकास के लिए ही नहीं, बल्कि मानसिक विकास के लिए भी ज़रूरी होता है. उन्हें पालक, ओटमील, डार्क चॉकलेट, संतरा, तरबूज़ इत्यादि खिलाने की आदत डालें. जंक फूड्स, प्रोसेस्ड फूड, फास्ट फूड्स व कोल्ड ड्रिंक्स इत्यादि से दूर रखें. ऐसे फूड्स बच्चे को पोषक तत्व प्रदान नहीं करते और उसके स्वास्थ्य को नुक़सान भी पहुंचाते हैं. साथ ही बच्चे को हाथ से खाने के लिए प्रोत्साहित करें, इससे उसका मोटर स्किल डेवलप होता है. बच्चे का हैंड-आई कॉर्डिनेशन डेवलप होता है और वो खाने के टेक्सचर को समझने लगता है. चाहे कुछ भी हो जाए, बच्चे को टीवी देखते हुए खाने की आदत बिल्कुल न डालें.

क्रिएटिव खिलौने ख़रीदें

बाज़ार में अनगिनत खिलौने उपलब्ध हैं, लेकिन बच्चे के बेहतर मानसिक विकास के लिए उसमें क्रिएटिव टॉयज़ खेलने की आदत डालें. सही खिलौने से खेलने से लैंग्वेज, कम्यूनिकेशन व सोशल स्किल्स बेहतर होता है. ध्यान रखें कि खिलौने ज़्यादा महंगे नहीं होने चाहिए. खिलौने सादे व सुरक्षित होने चाहिए और उससे बच्चे की कल्पना को विकसित होने का मौक़ा मिलना चाहिए. एक बात ध्यान रखें, खिलौना ऐसा होना चाहिए, जिससे खेलते समय उसके हाथ भी इंगेज हों.

बच्चे के साथ समय बिताएं

अंतिम, मगर सबसे ज़रूरी शिशु के मानसिक विकास के लिए आपका उसके साथ पर्याप्त समय व्यतीत करना बेहद ज़रूरी है. स्पीच डेवलपमेंट जन्म के साथ शुरू हो जाता है. मांओं को स्तनपान कराते समय बच्चे से बात करना चाहिए या फिर उसे गाना गाकर सुनाना चाहिए. बाहर जाने पर चीज़ों की तरफ़ हाथ से इशारा करके उनके नाम बताएं. उन्हें घुमाते समय, पार्क में व खाना खिलाते समय उससे बातें करें. अगर बच्चा कुछ इशारा करता है या कहने की कोशिश करता है तो उसकी बात ध्यान से सुनें. बच्चे के स्ट्रेस को कम करने व उसे सुरक्षा का एहसास दिलाने के लिए उसके शरीर की मालिश करें.

– मूरत गुप्ता

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मदर केयरः जब शिशु को हो गैस-कब्ज़ की समस्या (Mother Care: 7 Home Remedies To Treat Gas In Babies)

Home Remedies To Treat Gas In Babies

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वायु के अवरोध से कभी-कभी बच्चे का पेट फूल जाता है. पेट में गुड़गुड़ आवाज होती है, दर्द होता है, कभी-कभी बच्चा तेज रोता है और बेचैन हो जाता है. ऐसे में गैस की समस्या के लिए निम्न नुस्ख़े कारगर सिद्ध होते हैं.

* एक चम्मच लहसुन के रस में आधा चम्मच घी मिलाकर पिलाएं. तुरंत गैस से राहत मिलेगी.
* सरसों भर सेंकी हुई हींग का चूर्ण घी में मिलाकर पिलाने से गैस से बच्चे को आराम मिलता है.
* जीरा या अजवायन को पीसकर पेट पर लेप करने से वायु का अवरोध दूर होता है और बच्चा राहत महसूस करता है.
* हींग को भूनकर उसे पानी में घिसकर नाभि के चारों ओर लेप करें. गैस का शमन होगा और बच्चा चैन की सांस लेगा.

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कब्ज़ की शिकायत होने पर…
माता के अनुचित आहार-विहार के कारण उसका दूध दूषित हो जाता है, जिसकी वजह से बच्चे की पाचन शक्ति ख़राब होकर उसे वायु विकार हो जाता है और मल का सूख जाना, मल त्याग का अभाव, पेट में दर्द, गुड़गुड़ाहट, उल्टी आदि लक्षण पैदा हो जाते हैं और बच्चा रोते-रोते बेहाल हो जाता है.
* नीम के तेल का फाहा गुदा मार्ग में लगाने से कब्ज दूर होता है.
* रात को बीज निकाला हुआ छुहारा पानी में भिगो दें. सुबह उसे हाथ से मसलकर निचोड़ लें और छुहारे के गूदे को फेंक दें. छुहारे के इस पानी को बच्चे को आवश्यकतानुसार 3-4 बार पिलाएं. इससे कब्ज की शिकायत दूर होगी.
* बड़ी हरड़ को पानी के साथ घिसकर उसमें मूंग के दाने के बराबर काला नमक मिलाएं. इसे कुछ गुनगुना गर्म करके आवश्यकतानुसार दिन में 2-3 बार दें. अवश्य लाभ होगा.

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बच्चों की हिचकी
बच्चों को प्रायः हिचकी आती रहती है. वैसे यह लाभदायक है, क्योंकि यह शरीर के विकास की निशानी मानी जाती है. हिचकी से आंतें बढ़ती हैं और स्वस्थ रहती हैं. फिर भी यदि हिचकी बार-बार आती है और बच्चे को कष्ट होता हो तो निम्न नुस्खा प्रयोग करें.
* अदरक के रस में (4-5 बूंद) आधी चुटकी भर पीसी हुई सोंठ, काली मिर्च और दो बूंद नींबू का रस मिलाकर बच्चे को चटाएं. तुरंत लाभ होगा.
* नारियल की जटा जलाकर उसकी थोड़ी-सी राख तीन चम्मच पानी में घोलकर और उसे छानकर बच्चे को पिलाने से हिचकी बंद हो जाती है.

– श्रद्धा संगीता

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पैरेंटिंग गाइड- बच्चों को स्ट्रेस-फ्री रखने के स्मार्ट टिप्स (Parenting Guide- Smart Tips To Make Your Kids Stress-Free)

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स्ट्रेस, ये शब्द जितना छोटा है, सेहत के लिए उतना ही ख़तरनाक. आपको जानकर हैरानी होगी कि हमेशा मौज-मस्ती में चूर रहनेवाले नटखट बच्चे भी स्ट्रेस का शिकार हो रहे हैं. एक सर्वे के मुताबिक 100 में तक़रीबन 13 बच्चे किसी ना किसी तरह के स्ट्रेस में रहते हैं. बच्चों को कैसे रखा जाए स्ट्रेस से दूर, ताकि उनका बचपन रहे ख़ुशियों से भरा, ये बता रहे हैं सायकियाट्रिस्ट एंड काउंसलर, डॉक्टर पवन सोनार.

क्यों होता है स्ट्रेस?

बच्चों में स्ट्रेस के कई कारण हो सकते हैं. तनाव किसी भी उम्र में हो सकता है. 1 साल से लेकर 15 साल तक के बच्चों में तनाव के कारण अलग-अलग हो सकते हैं.

1-2 साल की उम्र

  • ये उम्र तनाव लेने की नहीं होती और ना ही बच्चा समझ पाता है कि वो किसी तरह के स्ट्रेस में है.
  • इस उम्र में स्ट्रेस का कारण हो सकता है, मां के प्रति उसका लगाव.
  • अगर मां किसी और बच्चे को गोद में लेती है, तो मां का प्यार बंटने के डर से भी बच्चा रोने लगता है.
  • मां का डांटना भी बच्चे को पसंद नहीं आता. कई बार बच्चे इतने तनावग्रस्त हो जाते हैं कि दूध पीना छोड़ देते हैं और उनकी नींद भी कम हो जाती है.

3-6 साल की उम्र

  • तीन साल का बच्चा ख़ासा समझदार होता है. इस उम्र में तनाव की सबसे बड़ी वजह होती है स्कूल.
  • भारत में तीन साल की उम्र से स्कूलिंग शुरू हो जाती है.
  • बच्चा जब नर्सरी में क़दम रखता है, तो उसका सबसे बड़ा डर होता है मां से अलग होने का.
  • तीन घंटे स्कूल में बिना मां के अनजान लोगों के बीच रहना बच्चे के लिए किसी जंग से कम नहीं होता.
  • तीन साल तक बच्चे ख़ुद को पढ़ाई, स्कूल और टीचर्स के अनुसार ढालने में रह जाते है

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7-11 साल की उम्र

  • इस उम्र में तनाव की सबसे बड़ी वजह है पढ़ाई.
  • बच्चों के सिर पर स्कूल के बैग से लेकर अच्छे मार्क्स लाने का बोझ होता है, ऐसे में भला बच्चे कैसे तनाव से बच सकते हैं.
  • माता-पिता की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए बच्चे अपनी क्षमता से ज़्यादा मेहनत करने लगते हैं.

12-15 साल की उम्र

  • ये उम्र बेहद ही नाज़ुक उम्र होती है. 12-15 साल में बच्चा ख़ुद को बहुत बड़ा समझने लगता है.
  • किसी तरह की रोक-टोक पसंद नहीं करता.
  • कठिन सेलेबस पूरा करने का प्रेशर, स्कूल में दूसरे बच्चों से आगे निकलने की होड़, उसे स्ट्रेस का शिकार बना देती है.
  • इस उम्र में कई शारीरिक बदलाव भी आते हैं, जैसे- लड़कियों के पीरियड्स शुरू हो जाना, स्तन का विकास होना, जबकि लड़कों का लिंग बढ़ने लगता है.
  • इन बदलावों के साथ तालमेल बिठाना उनके लिए काफ़ी स्ट्रेसफुल हो जाता है.

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तनाव के और भी कारण हैं

माता-पिता का तलाक: बच्चा माता-पिता के साथ सुरक्षित महसूस करता है. तलाक की वजह से उसे दोनों में से एक को चुनना पड़ता है. किसी एक की भी कमी बच्चे के तनाव का कारण बनती है.

मृत्यु का असर: बच्चा घर में जिससे अधिक प्यार करता हो या फिर माता-पिता में से किसी की मौत हो जाने का असर उसके मस्तिष्क पर पड़ सकता है. हमेशा के लिए किसी प्रियजन से बिछड़ने का ग़म बच्चे को तनाव में ले जाता है.

गैजेट्स से भी होता है तनाव: आजकल बच्चे काफ़ी टेक्नोफ्रेंडली हो गए हैं. ज़्यादा वक्त मोबाइल या कंप्यूटर पर बिताते हैं. वीडियो गेम्स और सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपने दोस्तों से आगे निकलने की होड़ भी उन्हें स्ट्रेस देने लगती है.

पारिवारिक झगड़े: परिवार में कलह, माता-पिता के बीच लड़ाई-झगड़ा, चीखना-चिल्लाना, इन सब बातों का असर भी बच्चे के दिमाग़ पर पड़ता है. ऐसे माहौल में वह अकेला महसूस करने लगता है.

नई जगह का असर: बच्चे कई बार नई जगह को भी अपना नहीं पाते, फिर चाहे वो नया स्कूल हो या नया घर और नए दोस्त. पुराने घर और दोस्तों की यादों से बाहर निकलने में उन्हें व़क्त लगता है.

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स्ट्रेस-फ्री रखने के स्मार्ट टिप्स
  • बच्चों के सबसे अच्छे दोस्त उनके माता-पिता ही बन सकते हैं. बच्चा अपने पैरेंट्स के सबसे क़रीब होता है. विपरीत हालात से कैसे निपटना है, ये बातें पैरेंट्स ही बच्चे को समझा सकते हैं.
  • अगर आपको लगता है कि आपका बच्चा स्ट्रेस में है, तो उसके साथ ज़्यादा से ज़्यादा व़क्त बिताएं, उसके पास बैठें, उससे बात करें, सिर पर प्यार से हाथ फेरें, बच्चा रो रहा हो, तो उसे अपनी गोद में बिठा लें ताकि वो अकेला ना महसूस करे.
  • बच्चे को स्पेशल फील कराना ज़रूरी है.
  • उनकी पसंद-नापसंद को महत्व दें. जैसे, उनसे पूछें कि वो पहले खाना पसंद करेंगे या खेलना? ऐसे सवाल पूछने से बच्चों को लगता है कि घर में उनकी राय की भी अहमियत है.
  • अपने बच्चे की क्षमता को समझें. दूसरे बच्चों से उसकी तुलना ना करें.
  • बच्चा खेलकूद या पढ़ाई में जैसा भी है उसकी सराहना करें.
  • दूसरों से तुलना करने की बजाय बच्चे की कमज़ोरी को समझें और उसका हौसला बढ़ाएं, ताकि ख़ुद के प्रति बच्चे में आत्मविश्‍वास बढ़े.
  • बच्चे अक्सर टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल पर गेम्स खेलते रहते हैं या फिर सोशल साइट्स पर बिज़ी रहते हैं. गैजेट्स से बच्चे को दूर रखें. तनाव का एक कारण ये गैजेट्स भी हैं.
  • टीचर्स को भी बच्चे को डांटने की बजाय उसकी मनोदशा समझ कर सही काउंसलिंग करनी चाहिए.
  • बच्चों के दिमाग़ और शरीर को आराम की ज़रूरत होती है, इसलिए उनको 8-10 घंटे की नींद ज़रूरी है.
  • पैरेंट्स अगर स्ट्रेस में होंगे, तो बच्चों पर भी इसका असर होगा, इसलिए पहले ख़ुद तनावमुक्त रहें. घर की समस्याओं या आपसी झगड़े से बच्चों को दूर रखें.
  • बच्चों में तनाव का एक कारण है ग़लती हो जाने का डर. पैरेंट्स को बच्चों को बताना चाहिए कि ग़लती से बिल्कुल नहीं डरें, बल्कि उससे सीख लें.
  • ग़लती हो जाने पर तनाव लेने या डरने की बजाय उस ग़लती को सुधार कर आगे बढ़ने की कला सिखाएं.
  • जब बच्चा तनाव में होता है, तो बहुत ज़्यादा खाने लगता है, मोटापे की वजह बन सकता है. ऐसे में सबसे पहले बच्चे को जंक फूड से दूर रखना आवश्यक है.
  • उसकी सेहत ख़राब ना हो, इसके लिए उसे बैलेंस डायट दें. ज़्यादा शक्कर या कैफीनयुक्त आहार से दूर रखें.
  • कई बच्चों को पालतू जानवर पसंद होते हैं. उनके लिए ख़ास पालतू जानवर घर ले आएं, जिनके साथ वो व्यस्त रहें.
  • बच्चे को बाग़वानी सिखाएं, नया पौधा लगाना सिखाएं और उसे पौधे में रोज़ाना पानी डालने का काम दें. जिस काम में बच्चे का मन लगे, वो उसे करने दें.

– अंशी

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एग्ज़ाम टाइम में बच्चे को यूं रखें तनावमुक्त (Keep Your Child From Over Stressing Exams)

Keep Your Child From Over Stressing Exams

Keep Your Child From Over Stressing Exams

ख़ुद को सबसे आगे देखने की चाह और पैरेन्ट्स की उम्मीदों पर खरे उतरने की ज़द्दोज़हद में अक्सर बहुत से बच्चे परीक्षा के दौरान ज़रूरत से ज़्यादा स्ट्रेस लेते हैं. नतीज़तन कभी-कभी आते हुए सवालों का ज़वाब भी नहीं दे पाते. परीक्षा के दिनों में बच्चे को कैसे तनावमुक्त रखा जा सकता है? आइए, जानते हैं.

पैरेंट्स के लिए गाइडलाइन
गलाकाट कॉम्पटीशन के इस माहौल में बच्चों के लिए परीक्षा किसी युद्ध से कम नहीं है. इसके लिए एक हद तक अभिभावक ही
ज़िम्मेदार होते हैं. हम बच्चे के सामने करो या मरो जैसी स्थिति पैदा कर देते हैं. जिसका बच्चे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. परीक्षा के दिनों में पैरेन्ट्स का अप्रोच व घर का माहौल कैसा होना चाहिए, यह जानने के लिए हमने बात कीकरियर काउंसलर श्री जसपाल सिंह से. श्री जसपाल ने हमें पैरेंट्स के लिए ये आसान गाइडलाइंस बताई.

टेंशन का माहौल न बनाएं
बच्चे को बार-बार डांटते रहने से वे तनाव में आ जाते हैं और इसका उनके परफ़ॉमेन्स पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. अत: घर में शांतिपूर्ण माहौल बनाये रखें. जहां तक हो सके, बच्चे को प्यार से समझाने की कोशिश करें. बच्चे को हर व़क़्त पढ़ने के लिए न कहें.

बच्चे की तुलना न करें
अपने बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों व दोस्तों से न करें. इससे बच्चे का आत्मविश्‍वास कम होता है. बार-बार दूसरे बच्चों से तुलना करने पर बच्चा आप से चिढ़ जाएगा और आगे से आपको अपनी समस्याएं या अपने मन की बात नहीं बताएगा. इससे बच्चे और आपके बीच दूरी आ जाएगी.

ख़ुद पर कंट्रोल करें
बच्चे के बाहर आने-जाने और दूसरी चीज़ों पर रोक लगाने से पहले ख़ुद पर नियंत्रण रखने की कोशिश करें, ताकि बच्चे आपसे सबक लें. इसके लिए पार्टियों में आना-जाना कम कर दें. साथ ही बच्चों को मोबाइल पर घंटों बात करने से रोकने से पहले ख़ुद टेलीफ़ोन पर लंबी-लंबी बातें करना कम कर दें. टीवी का वॉल्यूम कम करके देखें. कुछ दिनों तक सभी मन-पसंद सीरियल देखना बंद कर दें.

म्यूज़िक फोन न लगाने दें
कुछ बच्चे म्यूज़िक फोन लगा कर पढ़ते हैं. उन्हें समझाएं कि ऐसा करने से ध्यान भंग हो सकता है.

पॉजिटिव अप्रोच रखें
बच्चा पेपर लिखने जाने से पहले नर्वस है तो उसे डांटें नहीं, बल्कि प्यार से समझाएं. उसे पॉजिटिव अप्रोच रखने के लिए कहें. स्वयं भी पॉजिटिव रहें. इस परीक्षा को अंतिम मानकर न चलें. यह बात पैरेन्ट्स और स्टूडेंट्स दोनों को ही दिमाग़ में रखनी चाहिए.

शोर-शराबे से दूर रखें
बच्चे की पढ़ाई का स्थान शोर-शराबे से दूर रखें. उसे बिस्तर पर बैठकर पढ़ने की बजाय स्टडी टेबल पर पढ़ने के लिए कहें.

स्टडी टेबल साफ़ रखें
स्टडी टेबल पर भी किताबों का लंबा ढेर न लगायें. बच्चा जो पुस्तक पढ़ रहा हो वही सामने रखने को कहें. पुस्तकों का ढेर बच्चे को नर्वस कर सकता है.

ईश्‍वर पर विश्‍वास रखें
किसी दैवी शक्ति पर अवश्य विश्‍वास रखें. इससे आपके ऊपर नेगेटिव विचार हावी नहीं होते हैं.

खान-पान पर ध्यान दें
इन दिनों में बच्चों को खाने-पीने की सुध नहीं रहती है. वे कभी-कभी बिना खाए ऐसे ही रह जाते हैं. अत: इस बात का विशेष ख़्याल रखें. उन्हें हेल्दी खाना ही बनाकर खिलाएं.

जंक फूड खाने से रोकें
जंक़ फूड से एसिडिटी बढ़ती है. खाने में फ्रूट्स व वेजीटेबल की मात्रा बढ़ा दें. खाना हल्का रखें, ताकि वह जल्दी पच सके. अधिक तैलीय व चटपटा खाने के बाद नींद आती है. अत: इससे बचें.

खेलने के लिए भी प्रोत्साहित करें
सारा दिन लगातार बैठकर पढ़ते रहने से बच्चे ऊब जाते हैं और वे ध्यान नहीं लगा पाते. अत: उन्हें खेलने का समय भी दें. एक बार खेलकर आने के बाद वे फ्रेश माइन्ड से ज़्यादा ध्यान लगाकर पढ़ाई कर पाएंगे.

एक्सरसाइज़ पर ध्यान दें

परीक्षा के दिनों में फ़िट रहने के लिए थोड़ी-बहुत शारीरिक गतिविधि भी ज़रूरी है. इसके लिए ट्यूशन सेंटर ़ज़्यादा दूर न हो तो पैदल जाने के लिए कहें. किसी विषय को याद करते-करते हाथों, गर्दन व पैरों का हल्का व्यायाम करना भी अच्छा होता है. यदि थोड़ा व़क़्त निकाल सकें, तो कोई दूसरा व्यायाम या योगासन करने के लिए प्रोत्साहित करें. ध्यान केंद्रित करने के लिए मेडिटेशन भी कर सकते हैं.

भरपूर नींद लेने को कहें
परीक्षा में अच्छा करने के लिए पढ़ाई के साथ-साथ नींद भी ज़रूरी है. अत: पढ़ाई के बीच-बीच में झपकी लेने को कहें. कुछ बच्चे परीक्षा के दिनों में रात-रात भर जागकर पढ़ते हैं और सुबह सोते हैं. परीक्षा शुरू होने के कुछ दिन पहले से उनके इस रूटीन को बदलें. अन्यथा परीक्षा के समय नींद आएगी. परीक्षा वाले दिन से पहले रात में नींद अवश्य लें. नहीं तो रात भर जाग कर पढ़ाई करने से परीक्षा हॉल में बार-बार नींद ही आती रहेगी.

बीमारियों से बचाएं
परीक्षा के दिनों में बच्चे की सेहत का विशेष ख़्याल रखें. खांसी-जुकाम या बुख़ार से बच्चे को बचाएं.सर्दी-जुकाम होने पर हल्के में न लें, तुरंत इलाज़ कराएं. हाइजीन का भी ख़ास ख़्याल रखें. हाथों की साफ़-सफ़ाई का पर्याप्त ध्यान दें, ताकि संक्रमण से बचाव हो.

गाइड फ़ॉर चाइल्ड
    परीक्षा की तैयारी
* अंतिम समय में पूरे साल भर की पढ़ाई करने न बैठें. इस सच्चाई को स्वीकार कर लें कि अब शत-प्रतिशत हासिल करने का समय नहीं है. उसके लिए तो पहले दिन से पढ़ना ज़रूरी था. अब जिस लेवल पर हैं उसके अगले लेवल तक पहुंचने का लक्ष्य रखें. लक्ष्य तय करते हुए यह सोचें कि मैं जितना कर सकता हूं उसको अच्छी तरह करूंगा.
* बाद के लिए कुछ भी न छोड़ें. यह अध्याय अभी नहीं, बाद में करूंगा, इस अप्रोच से दूर रहें.
* नियमित पढ़ाई करें. बार-बार रिविज़न करें.
* ज़्यादा-से-ज़्यादा सेम्पल पेपर हल करें. इससे आपकी प्रैक्टिस भी होगी और सवाल हल करने में कितना व़क़्त लगता है इसका भी अंदाजा लग जाएगा.
* व्यवहारिक लक्ष्य रखें. एक दिन में सारे चैप्टर कभी पूरी तरह रिवाइज़ नहीं होते.
* टेक्स्ट बुक के सभी अध्यायों को कम से कम दो बार अवश्य पढ़ें. हर विषयों पर समान समय दें. गाइड बुक के सहारे न रहें.

परीक्षा देते व़क़्त01
* प्रत्येक प्रश्‍न को अच्छी तरह समझने के बाद ही सही व सटीक ज़वाब लिखें. प्रश्‍न के उत्तर की शब्द-सीमा अवश्य ध्यान में रखें.
* सही स्पेलिंग, व्याकरण के अनुसार वाक्य रचना और साफ़ लिखाई और प्वाइंट वाइज़ प्रश्‍नों के उत्तर यानी प्रेजेंटेशन और टाइमिंग व नीटनेस का विशेष ख़्याल रखें.
* दो प्रश्‍नों के उत्तर के बीच में स्थान अवश्य छोड़ें. प्रश्‍न संख्या अवश्य लिखें.

– केबी

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