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Tips For Parenting

बच्चे तो सभी प्यारे होते हैं, पर कुछ ख़ास मासूम भी होते हैं, जिन्हें विशेष देखभाल की ज़रूरत होती है. ऐसे ही होते हैं ऑटिज्म ग्रस्त बच्चे भी. आज अंतर्राष्ट्रीय विकलांगता व्यक्ति दिवस (International day of disabled persons) पर ऑटिज्म कंसल्टेंट गोपिका कपूर ने इस तरह के बच्चों की देखभाल से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें संक्षेप में बताई.
इससे उन अभिभावकों को काफ़ी मदद मिलेगी, जिनके बच्चे ऑटिज्म ग्रस्त हैं. आइए जानते हैं गोपिकाजी से ऑटिज्म के बारे में. उनका कहना है-

न्यूरोडेवलपमेंट कंडीशन…
मेरे राय में ऑटिज्म एक विश्वभर में बढ़ता हुआ कंडीशन है. रिसर्च दिखाता है कि ऑटिज्म के स्टैटिसटिक्स या नंबर जो है, वह 54 में एक बच्चे को ऑटिज्म होता है. यह एक न्यूरोडेवलपमेंट कंडीशन है. न्यूरो यानी यह दिमाग़ पर असर करता है और डेवलपमेंटल का मतलब है कि यह बच्चों के विकास पर असर करता है.

चिंतित माता-पिता…
जब माता-पिता को पता चलता है कि उनके बच्चे को ऑटिज्म है, तब मैंने देखा है कि ज़्यादातर पैरेंट्स बहुत ही उदास-परेशान हो जाते हैं. उन्हें चिंता रहती है कि हम बच्चे के साथ क्या करेंगे, कैसे सिखाएंगे, क्या वह स्कूल जाएगा, क्या वह बड़ा होकर नौकरी कर पाएगा… ये तमाम चिंताएं उनके दिमाग़ में आती है. जिन माता-पिता को उनके परिवार का साथ मिलता है और जो माता-पिता अपने आपको संभाल पाते हैं, उनके बच्चे ज़्यादातर विकास करते हैं. इसका मतलब यह है कि माता-पिता की मानसिक स्थिति पर ध्यान देना बहुत ही ज़रूरी है. ऑटिज्म एक ऐसा कंडीशन है, जिसका असर सिर्फ़ बच्चे पर नहीं, बल्कि परिवार पर भी होता है. इसलिए हमें यह ध्यान देना चाहिए कि सिर्फ़ बच्चा ही नहीं सीख रहा है, बल्कि पूरे परिवार का विकास हो रहा है. उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए.

Child With Autism

प्रोत्साहित करें…
जब हम ऑटिस्टिक बच्चों के साथ काम करते हैं, तब हमें सबसे पहले यह ध्यान में रखना चाहिए कि उनसे वह अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए, जो हम एक न्यूरोटिपिकल बच्चे के साथ रखते हैं. अगर हम किसी व्यक्ति के साथ काम कर रहे हैं, जो देख नहीं पाते हैं, तो हम उनसे यह अपेक्षा थोड़ी रखते हैं कि एक दिन वह देख पाएंगे? इसी तरह से हमें उनके साथ यह अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए कि वह न्यूरोटिपिकल बन जाएंगे. साथ ही हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि बच्चों को क्या पसंद है. इन बच्चों में मोटिवेशन बहुत ही कम होता है. इसलिए जो भी चीज़ उनको पसंद है, भले ही वह दूसरे बच्चों को जो पसंद है वह नहीं हो, उस चीज़ के साथ हमें उनके साथ काम करना है. उनके लगातार प्रोत्साहित करते रहना है. इससे उनका मोटिवेशन बढ़ेगा और वह काम करना पसंद करेंगे.

मानसिक स्तिथि…
ऑटिस्टिक बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को सही रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कभी भी हमें उन्हें यह महसूस नहीं होने देना है कि वह हम से कम हैं. वह अलग ज़रूर हो सकते हैं, लेकिन कम नहीं है. उनमें कोई कमी का एहसास उन्हें हमें कभी महसूस नहीं होने देना चाहिए. इससे उनका मानसिक स्वास्थ्य सही रहेगा. उनको जो अच्छा लगता है, उसी को ध्यान में रखकर उनके साथ काम करना चाहिए. उनकी जो रूचि है, उसे बढ़ानी चाहिए. कई इस तरह के बच्चे हैं, जिन्होंने उनकी रुचि को लेकर करियर बनाया. कई बच्चे बहुत सफल भी हुए, इसलिए उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए. उनकी मानसिक स्थिति को बनाए रखना चाहिए. उन्हें यह कभी महसूस नहीं करने देना चाहिए कि उनमें कोई कमी है. इसकी बजाय उनके जो अच्छे पॉइंट है, उस पर ध्यान देना चाहिए. उन्हें उनके बारे में बताना चाहिए और उनकी मुश्किलों पर काम करना चाहिए, पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए. इसी तरह से हम उनकी मानसिक स्थिति को बनाए रख सकते हैं.

Child With Autism

अभिभावकों का नज़रिया…
हमारे घर में जो वातावरण है वह बहुत ही ख़ुशनुमा वातावरण है. हम सब हंसते-खेलते हैं, बहुत ही ख़ुश हैं. हां पहले-पहले बच्चे की अवस्था को लेकर तनाव होता रहता था, हम बहुत परेशान होते रहते थे. लेकिन धीरे-धीरे हमने सब संभाल लिया. अब हमारे घर का वातावरण ख़ुशनुमा है.

पैरेंटिंग गाइड…
दूसरे बच्चों के माता-पिता को मैं यही कहूंगी कि अगर आप हर वक़्त उदास रहेंगे, हर समय तनाव में रहेंगे, तो यह एंग्जाइटी आपके बच्चों पर आएगी. वह अच्छी तरह से सीख नहीं पाएंगे. आपका तनाव उनके ऊपर आ जाएगा. तो इसकी बजाय आप अपने पास जो बच्चा है, उसे लेकर ख़ुश रहना सीखें. उसके साथ काम करना सीखें. धीरे-धीरे आप देखेंगे कि आपका बच्चा ना केवल अच्छी तरह से सीख पाएगा, बल्कि वह बहुत ख़ुश भी रहेगा. यही तो सभी पैरेंट्स अपने बच्चों के लिए चाहते हैं.

– ऊषा गुप्ता


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माता-पिता द्वारा अपने नवजात शिशु को प्‍यार व स्‍नेहभरा स्‍पर्श किए जाने के साथ ही उनके रिश्‍ते का पहला बंधन बंधता है. शिशुओं के रोज़ाना ख़्याल रखने की बात हो या फिर उनकी कोमल त्‍वचा की देखभाल, उन्‍हें विशेष रूप से अतिरिक्‍त देखभाल एवं सुरक्षा की आवश्‍यकता होती है. वयस्‍क की तुलना में शिशु की त्‍वचा लगभग 20-30% कम पतली होती है और इसमें जलन या खुजली पैदा होने का अधिक ख़तरा होता है, इसलिए उनकी त्‍वचा की उचित देखभाल अत्‍यावश्‍यक है. क्‍योंकि शिशु के स्‍वस्‍थ विकास में हेल्दी स्किन का महत्‍वपूर्ण योगदान होता है.
इस नवजात शिशु देखभाल सप्‍ताह के अवसर पर, जॉन्‍सन एंड जॉन्‍सन कंज्‍यूमर हेल्‍थ इंडिया की जनरल मैनेजर डॉ. प्रीति ठाकोर ने सर्वोत्‍तम ढंग से त्‍वचा की देखभाल के तरीक़ों के बारे में बताया, जो नवजात शिशु के संपूर्ण विकास में सहायक हो सकते हैं.

स्‍पर्श का प्रभाव
कहा जाता है कि नवजात शिशु सबसे पहले जिस भाषा को समझता है, वो होती है स्‍पर्श की भाषा. यह संवाद का प्रभावशाली तरीक़ा भी है. शुरू-शुरू में त्‍वचा से लगातार स्‍पर्श, बच्‍चे के संपूर्ण स्‍वास्‍थ्‍य में सहायक होता है. विशेष तौर पर जन्‍म के तुरंत बाद अधिक समय तक त्‍वचा से त्‍वचा के संपर्क से शिशु को स्‍तनपान शुरू करने में मदद मिलती है. अध्‍ययनों से पता चला है कि नियमित स्‍पर्श से शिशु के शारीरिक, भावनात्‍मक एवं सामाजिक विकास को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है.

मालिश है ज़रूरी
शिशु के साथ अपने रिश्‍ते को मज़बूत बनाने का शानदार तरीक़ा है मालिश. शिशु के नियमित मसाज से स्‍वस्‍थ विकास में सहायता मिलती है. यह पैरेंट्स और शिशु के संबंध को मज़बूत बनाने का बेहतरीन ज़रिया भी है.

मसाज टिप्स

  • मालिश हल्‍के-हल्‍के और प्‍यार से सहलाकर करें और ध्यान रहे कि पूरे शरीर का मसाज हो.
  • आपको मालिश के लिए ऐसे तेल का चुनाव करना चाहिए, जिसकी सौम्‍यता चिकित्‍सकीय दृष्टि से प्रमाणित हो और जो नवजात शिशु की त्‍वचा के लिए उपयुक्‍त हो.
  • यह ऐसी होनी चाहिए जिसे त्‍वचा जल्द सोख ले.
  • जिसमें त्‍वचा को नम व कोमल बनानेवाले तत्‍व मौजूद हों.
  • प्राकृतिक तेलों के उपयोग को नवजात शिशु की त्‍वचा की देखभाल के लिए उत्‍तम माना जाता है.
  • वनस्‍पति तेल, नारियल तेल और कपास के बीज से निकाले गए अर्कयुक्‍त तेल का इस्तेमाल बेहतर है, क्‍योंकि इसमें विटामिन ई भरपूर मात्रा में होते हैं. यह शिशु की नर्म-मुलायम त्‍वचा के लिए लाभदायक भी होता है.

आनंदायक तरीक़े से स्नान कराएं
ऐसा माना जाता है कि स्नान का समय अपने शिशु के साथ जुड़ाव पैदा करने के लिहाज से सबसे उपयुक्‍त समय होता है. रिसर्च से पता चला है कि बच्‍चे के मस्तिष्‍क के विकास को आकार देने में विभिन्‍न इन्द्रियों से जुड़े अनुभव महत्‍वपूर्ण होते हैं. स्नान के समय शिशु को रूप, रस, गंध, स्‍पर्श एवं ध्‍वनि का बोध एक साथ मिलता है. नवजात शिशु के साथ प्यारभरी बातें करते और हंसते-खेलते हुए इस प्रक्रिया को मज़ेदार बनाएं. .
बच्‍चे की कोमल त्‍वचा की सुरक्षा के लिहाज से उन्‍हें नहलाने के लिए सही उत्‍पादों का चुनाव महत्‍वपूर्ण होता है.
इसलिए, उन्‍हें नहलाने के लिए माइल्ड सोप-शैंपू का इस्तेमाल करें.
जो हल्‍का हो, जिससे त्‍वचा में जरा भी जलन न हो. साथ ही ध्यान रहे कि यह चिकित्‍सकीय रूप से भी प्रामाणिक तौर पर सौम्‍य हो.
यह हाइपोएलर्जेनिक तत्‍वों से तैयार किया गया हो, तो अच्छा है.

डायपर
नवजात शिशु की त्वचा को बाहरी दुनिया के अनुरूप ढलने में समय लगता है. इसी कारण अक्सर उन्हें त्‍वचा संबंधी सामान्‍य समस्याएं होती रहती हैं, जैसे- फुंसी, त्‍वचा पर दाने, डायपर रैश आदि. शिशु की त्‍वचा की देखभाल के लिए सही चीज़ों का चुनाव इसमें कारगर साबित होता है. उदाहरण के लिए शिशु को पर्याप्‍त डायपर्स ब्रेक देकर डायपर रैश से बचाया जा सकता है. यदि शिशु अधिक समय तक गिला डायपर ही पहना रहे, तो उससे रैशेज हो जाएंगे. इस कारण उन्हें परेशानी होने लगती है.
डायपर पहनाई जानेवाली जगह साफ़ और सूखी हुई होनी चाहिए. इसके लिए त्‍वचा को रगड़ने की बजाय उसे सहलाकर सूखा लें. आप इसके लिए बेबी वाइप्‍स या नरम कपड़े के साथ पानी का इस्‍तेमाल कर सकते हैं.

त्‍वचा को नम बनाए रखें
शिशु की त्‍वचा को बराबर नम यानी माॅइश्चराइज़ रखा जाना महत्‍वपूर्ण है. सामान्‍य तौर पर नवजात शिशुओं में स्किन पीलिंग एवं ड्राई स्किन जैसी समस्‍याएं देखने को मिलती हैं, इसलिए शिशु की त्वचा को नम बनाए रखना ज़रूरी है. इसके लिए ऐसे क्रीम का उपयोग करें, जो विशेष तौर पर नवजात शिशु की संवेदनशील त्‍वचा को ध्यान में रखकर बनाई गई हो. जो चिपचिपी न हो. आप शिशु के शरीर पर ऐसे लोशन का भी इस्‍तेमाल कर सकते हैं, जिनका पीएच नवजात शिशु के लिए संतुलित हो और जो त्‍वचा को तुरंत नमी प्रदान करे. साथ ही चौबीस घंटे तक त्‍वचा नम बनी रहे. सबसे अच्‍छा तो यही है कि शिशु को नहलाने के तुरंत बाद लोशन या क्रीम लगाएं. वैसे इसे किसी भी समय में लगाया जा सकता है.

ऊषा गुप्ता

Baby Care Tips

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कोविड महामारी ने हमारे जीवन को काफ़ी बदल दिया है. भले ही लॉकडाउन के कई सकारात्मक पहलू हैं, जैसे- परिवारों को एक साथ समय बिताने का मौक़ा मिला और हम अपने दोस्तों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ सामाजिक रूप से अधिक सक्रिय हुए. हमें प्रकृति का सबसे अच्छा दृश्य भी देखने मिला, हमने इनडोर शौक का भरपूर आनंद लिया. लेकिन दूसरी तरफ़ स्कूलों के बंद होने, क्लासमेट से आमने-सामने बातचीत न कर पाने, डिजिटल क्लासेस शुरू होने और नए वर्चुअल स्कूल के मापदंडों को अपनाने के भार की वजह से बच्चों की पढ़ाई का भी बेहद नुक़सान हुआ. यह बच्चों के लिए कई चुनौतियां लेकर आया, जिसकी वजह से कुछ बच्चों में अचानक एग्रेसिवनेस और ग़ुस्सा आना एक आम भावनात्मक प्रतिक्रिया यूं कहें समस्या सी बन गई. आइए, इस विषय पर डॉ. विक्रम गगनेजा, जो नई दिल्ली के एचसीएमसीटी मणिपाल हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट पीडियाट्रिक्स हैं, से मिली महत्वपूर्ण जानकारियां द्वारा इसे समझें.

यह हम सभी जानते हैं कि कोविड-19 ने दुनियाभर में खलबली मचा दी है. साथ ही इसने बच्चों और परिवारों के जीवन को भी काफ़ी हद तक बदल दिया है. यदि बच्चों के माता-पिता घर से काम कर रहे हैं या वे आवश्यक सेवा या फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं, तो दोनों ही स्थितियों में वे ज़्यादातर समय अपने काम में व्यस्त रहते हैं. इससे बच्चे के जीवन में अधिक समस्याएं भी उत्पन्न हो रही हैं. बच्चों सहित हम सभी के लिए यह चिंताजनक स्थिति है, जिसका सामना हमने पहले कभी नहीं किया था.
घर पर बच्चों को मीडिया के माध्यम से सभी प्रकार की जानकारियां मिल रही हैं. बच्चों ने अपने दैनिक जीवन में वायरस के व्यापक असर को महसूस किया है. कोविड-19 से प्रेरित इस नई जीवनशैली में बच्चों का ग़ुस्सा होना स्वाभाविक है. लेकिन यह भी सच है कि ग़ुस्सा केवल स्वाभाविक नहीं, बल्कि स्वस्थ प्रतिक्रिया है, पर यह लंबे समय तक रहे और मन शांत न हो, तो यह एक गंभीर समस्या बन सकती है.

बच्चों के ग़ुस्से, चिड़चिड़ापन और आक्रामकता के कई कारण होते हैं…
निराशा एक प्रमुख कारण है. जब बच्चे को वह नहीं मिलता है, जो वह चाहता है, तो उसके व्यवहार में बदलाव आने लगता है.
एक अनुमान के अनुसार, जेनेटिक्स और अन्य जैविक कारक ग़ुस्से/आक्रामकता में अहम भूमिका निभाते हैं. इसमें माहौल का भी योगदान है.
बच्चों में ग़ुस्से की समस्याओं को संभालने के लिए माता-पिता को पहले ग़ुस्से की वजह को समझना होगा. इसके लिए उन्हें बच्चों को धैर्यपूर्वक सुनना बेहद ज़रूरी है.

बच्चे अपनी परेशानियों को कैसे व्यक्त करते हैं?
इस सन्दर्भ में प्रख्यात मनोचिकित्सक एलिसाबेथ कुब्लर-रॉस ने एक मॉडल विकसित किया है, जो बच्चों की मानसिक स्थिति को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकता है. इसमें परेशानी या दुख के पांच सामान्य अवस्थाओं के बारे में बताया गया है. ये कोविड-19 के दरमियान हमारे लिए उपयोगी मार्गदर्शक का काम कर सकता है. इन्हें समझकर बच्चों की चिंता और क्रोध की समस्या का सामना करने में मदद मिल सकती है.

इंकार…
इसकी शुरुआत इन्कार के साथ होती है, जिसे नज़रअंदाज़ करने, भ्रम, सदमे और डर जैसी प्रतिक्रियाओं से समझा जा सकता है.
बच्चे स्कूल बंद होने और नई जीवनशैली में ऑनलाइन कक्षाओं के कारण परेशान और भ्रमित हो सकते हैं.
सोशल डिस्टैंसिंग उन्हें दोस्तों से मिलने और उनके साथ खेलने से वंचित करता है.
ऐसे में इस वायरस को दोष देकर बच्चों को मना लेना, पैरेंट्स के लिए मुश्किलभरा होता है.

ग़ुस्सा करना…
यह दूसरा चरण है. इसे निराशा और चिंता से समझा जा सकता है. इस अवस्था में अब तक दबी हुई भावनाएं बाहर आती हैं.
कोविड-19 के परिणामस्वरूप बच्चे अपने दोस्तों और शिक्षकों से उपेक्षित महसूस कर सकते हैं.
उन्हें अपनी ज़िंदगी में सुरक्षा और नियंत्रण का अभाव महसूस हो सकता है.
घर या परिवार में ठीक से समर्थन न मिलने से बच्चे कमज़ोर पड़ सकते है, क्योंकि वे स्कूलों और दोस्तों को अधिक सहायक पाते हैं.
बच्चों के पास बड़ों की तुलना में ज़िंदगी में कठिन परिस्थितियों से निपटने का अनुभव नहीं होता है, इसलिए वे अपने मानसिक तनाव को अक्सर अकड़न, बिस्तर गीला करने, सोने में कठिनाई, अंगूठा चूसने, ग़ुस्सा दिखाने, नखरे करने और ध्यान केंद्रित करने में व्यक्त करते हैं.

सौदेबाज़ी…
बच्चे इस नई परिस्थिति जिसने उनकी ज़िंदगी को कई तरीक़ों से प्रभावित करना शुरू कर दिया है को लेकर अपने माता-पिता से सौदेबाज़ी करने की कोशिश करते हैं.
उदाहरण के लिए वे ब्लैकमेल करते हैं कि यदि आप उन्हें अपने दोस्तों के साथ खेलने की अनुमति देते हैं, तो ही वे अपने हाथ सैनिटाइज़ करेंगे या अपने हाथों को बार-बार धोएंगे.

डिप्रेशन…
यह एक गंभीर स्थिति है और यह चौथी अवस्था है. यह बेबसी की भावना है.
हमें इस स्थिति पर काफ़ी कड़ी नज़र रखनी होगी. इस स्तिथि में बच्चा अपने माता-पिता या भाई-बहनों के साथ घुलने-मिलने से बचने की, मनोरंजन या खेल खेलने से बचने और हमेशा दूर भागने की कोशिश कर सकता है.

सुरक्षा…
पांचवीं स्थिति को सुरक्षा की भावना से समझा जा सकता है. इसके साथ बच्चों को नई दिनचर्या, सच्चाई और जीवन की स्थिति के महत्व का एहसास होता है.

पैरेंट्स के लिए गाइडलाइंस

  • बच्चों को समझाएं कि ग़ुस्से पर काबू न कर पाने कारण उन्हें मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से नुक़सान पहुंच सकता है.
  • यदि ज़रूरत पड़े, तो बच्चों के साथ उनकी चिंता और नाराज़गी दूर करने के लिए प्लानिंग करें.
  • माता-पिता को सहानुभूति भी विकसित करनी होगी, जिसका अर्थ है बच्चों के हालात समझने की क्षमता.
  • तर्कसंगत सोच के साथ सहानुभूति, सहिष्णुता और धैर्य विकसित करें और साथ ही ग़ुस्से को नियंत्रित करके संयम के साथ यह स्वीकारें कि सभी समस्याओं को तुरंत हल नहीं किया जा सकता है.
  • इससे पहले चरण में ग़ुस्से की बारंबारता और तीव्रता को कम करने में मदद मिलती है.
  • उन चीज़ों की लिस्ट बनाएं, जिससे बच्चे को ग़ुस्सा आता है.
  • फिर बच्चे को इसका रिकॉर्ड रखते हुए साप्ताहिक प्रदर्शन का विश्लेषण करने के लिए कहें.
  • समय-समय पर बच्चे के प्रशंसनीय प्रदर्शन के लिए इनाम भी दें. इससे उनका प्रोत्साहन बना रहेगा.
  • विभिन्न तरीक़ों से भी बच्चे को शांत किया जा सकता है, जैसे- अपने ग़ुस्से से ध्यान हटाकर रचनात्मक चीज़ों में ध्यान लगाना, शारीरिक गतिविधियां, योगाभ्यास, 10-100 तक की गिनती या अपने सकारात्मक पहलुओं के बारे में सोचना आदि.
  • बच्चों को इस कोरोना महामारी और लोगों पर इसके हानिकारक प्रभावों के बारे में सही जानकारी दें. इससे उन्हें ग़लत सूचना और बढ़ती चिंताओं की वजह से होनेवाली समस्याओं से बचने में मदद मिलेगी.
  • दरअसल, बच्चों की दैनिक दिनचर्या में अप्रत्याशित रूप से रुकावट आने से वे ख़ुद को ठगा-सा महसूस करते हैं. इसी मानसिकता के कारण उनके व्यवहार में बदलाव आता है.
  • बच्चों को उनके कुछ रोज़मर्रा के कार्य ख़ुद करने दें. इससे उन्हें तनाव का सामना करने में भी मदद मिलेगी.
  • बच्चों से बहुत ज़्यादा अपेक्षाएं न रखें.
  • बच्चों का दिमाग़ बहुत फ्लेक्सिबल होता है और प्रियजन के समर्थन से वे किसी भी मुश्किल हालात और जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना आसानी से कर सकते हैं
  • हमें उन्हें साथ देने और जब भी वे मदद मांगे, तो उनका मार्गदर्शन करने के लिए तैयार रहना है.
  • उनके आसपास प्यार, केयर और सुखद माहौल बनाने की ज़रूरत है.
  • उन्हें सुरक्षित महसूस कराना चाहिए.
  • अगर हम उन्हें अपनी भावनाओं को सहजता से व्यक्त करने की सहूलियत देते हैं, तो उनका तनाव, चिंता और ग़ुस्सा दूर हो जाएगा.
  • उन्हें रचनात्मक गतिविधियों, जैसे- ड्राॅइंग, पत्रिका में लिखना, गाने, डांस करने, क्राफ्ट या फोटोग्राफी के माध्यम से ख़ुद को व्यक्त करने की सुविधा दें.
    माता-पिता सदा यह याद रखें कि आप मुस्कुराएंगे, तो आपके बच्चे आपके साथ मुस्कुराएंगे… और अगर आप उन्हें ग़ुस्सा दिखाएंगे, तो यही आपको अनजाने में ही प्रतिउत्तर में मिलेगा.

ऊषा गुप्ता

Child Anger

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दुनियाभर में अचानक आए सोशल आइसोलेशन या क्वारंटाइन जैसी स्थिति में, लोगों का भयभीत और चिंतित होना स्‍वाभाविक है. ऐसे में इसका बच्‍चों पर भी काफ़ी असर पड़ रहा है. उनके मन में भी एक अनकहा डर बैठ जाना कोई बड़ी बात नहीं है. इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि लॉकडाउन के चलते वर्किंग पैरेंट्स को उनके बच्‍चों के साथ अधिक समय गुज़ारने का मौक़ा मिल रहा है, लेकिन इसकी अपनी चुनौतियां भी बहुत हैं. लॉकडाउन हो जाने से, परिवारों को दिनभर बच्‍चों को संभालना पड़ रहा है. अधिकांश बच्‍चों की परीक्षाएं रद्द हो गई हैं और अभी उन पर पढ़ाई-लिखाई का दबाव भी नहीं है. लेकिन साथ ही पैरेंट्स को घर से ही काम करना पड़ रहा है और ऐसे में बच्‍चों को दिनभर व्‍यस्‍त रखना आसान काम नहीं है.
यहां डॉ. शौनक अजिंक्‍या, जो कोकिलाबेन धीरूभाई अम्‍बानी हॉस्पिटल के कंसल्‍टेंट साइकिएट्रिस्ट ने कुछ महत्‍वपूर्ण जानकारियां दी हैं, जिन्‍हें अभी और आगे के लिए भी ध्‍यान में रखा जा सकता है.

सोशल मीडिया का प्रभाव
इन दिनों सोशल मीडिया चौबीस घंटे उपलब्ध है. ऐसे में पैरेंटिंग के मायने पूरी तरह से बदल गए हैं. व्हाट्सएप पर ऐसे अनेक मैसेज प्राप्त होते हैं, जिनमें कई वेबसाइट्स व ऐप्‍स के बारे में जानकारी दी गई होती है. इन वेबसाइट्स व ऐप्‍स के ज़रिए आप छुट्टियों के दिनों में अपने बच्‍चों को दिनभर न केवल व्‍यस्‍त रख सकेंगे, बल्कि इनमें बताई गई गतिविधियों को करने से उनकी दिमाग़ी क्षमता भी बढ़ेगी. लेकिन ज़रूरी नहीं कि ये सारी जानकारियां बच्‍चों के लिए उपयोगी ही हों. ऐसे में पैरेंट्स का यह दायित्‍व है कि वो अपने बच्‍चों के लिए सही व उपयोगी ऐप्‍स व साइट्स का चुनाव करें.

अनुशासन
बच्‍चों से जुड़ी कुछ चीज़ों को लेकर समझौता न करें, जैसे- भोजन का समय, पढ़ने का समय, दैनिक व्‍यायाम और उचित व्यवहार. बाकी चीज़ों के बारे में बच्‍चों को स्‍वयं से निर्णय लेने दें. कठोर अनुशासन के चलते किसी भी गतिविधि के प्रति उनका उत्‍साह समाप्‍त हो सकता है. बच्‍चों को उनके इच्‍छानुसार शेड्यूल्‍स तय करने दें और उन्‍हें यह निर्णय लेने की छूट दें कि वो किस गतिविधि को कैसे करना चाहते हैं.

सहानुभूति
अपने बच्चों को इस समय का उपयोग उनके मन लायक तरीक़े से करने दें. यह उनके लिए ऐसा सुनहरा समय हो सकता है, जो शायद ही कभी दोबारा आए. नियमों को लेकर दिन में हर समय कठोरता न बरतें.

मज़ेदार चीज़ें करें
फिर ऐसी चीजें भी हैं, जो आप मस्ती के लिए एक साथ कर सकते हैं, जैसे- खाना पकाना, वीडियो गेम या इनडोर बोर्ड गेम खेलना. अगर बच्चे बहुत छोटे हैं, तो उन्हें कहानियां पढ़कर सुनाना भी उनके साथ समय बिताने का एक अच्छा तरीक़ा है.

सामाजिक दायित्‍व
बच्चों को सामाजिक दायित्‍व के बारे में बताएं. उन्हें बताएं कि हम घरों में इसलिए हैं, क्‍योंकि अभी ऐसा करने में ही इस देश और यहां के लोगों की भलाई है. इससे ही हम बीमारी का डटकर मुक़ाबला कर सकते हैं.

तुलना न करें
हम स्‍वयं से बहुत अधिक उम्मीदें लगा लेते हैं. हमेशा अपनी और अपने बच्‍चे की तुलना दूसरों से न करें. कोई भी परफेक्‍ट नहीं होता है.

बार-बार सलाह न दें
ऐसी सलाह न दिया करें, जिनका पालन आप स्‍वयं न कर सकें. वहीं काम करें, जो आपको सबसे अच्‍छा लगे.

बच्‍चों की भी बातें मानें
बच्चों को उनके अपने तरीक़े से ख़ुश रहने दें. अपने बच्चे से पूछे कि उन्हें किन चीज़ों को करने से ख़ुशी मिलती है. अपने निर्णयों में अपने बच्‍चे को भी शामिल करें, इससे उन्‍हें लगेगा कि उनकी सोच व उनके एहसास आपके लिए मायने रखते हैं. बच्चों को ख़ुश देखकर पैंरेंट्स को भी दुनिया की सबसे बड़ी खुशी मिल जाती है.

पहले ख़ुद का ध्‍यान रखें
यदि आप अपना ध्यान नहीं रखते हैं, तो आप किसी और की देखभाल नहीं कर सकते. आपकी भावनात्‍मक क्रियाशीलता सर्वोच्‍च स्‍तर की होनी चाहिए, ताकि आप उस समय अपने बच्‍चे के साथ मौजूद हों, जब उसे वास्‍तव में आपकी ज़रूरत हो. ओवर कमिटिंग या ओवर एक्‍सटेंडिंग से बचने के लिए ख़ुद के लिए समय निकालना भी अच्‍छी आदत है, जो आपके बच्‍चे को सीखने को मिलेगी. बच्‍चे केवल अपने माता-पिता की कही हुई बातों से ही नहीं सीखते हैं, बल्कि वो उनके द्वारा किए जानेवाले कार्यों का भी अनुसरण करते हैं. यदि पैरेंट्स ख़ुशहाल रहेंगे, तो बच्‍चे भी ख़ुशहाल रहेंगे.

नई पीढ़ी का स्‍वागत करें
जनरेशन ज़ेड, मिलेनियल जनरेशन के बाद वाली पीढ़ी है, जो इस सेंचुरी के शुरू में या उसके बाद पैदा हुए हैं. पिछली पीढ़ियों की तुलना में जनरेशन ज़ेड के लिए घरों के अंदर रहकर वर्चुअल वर्ल्‍ड से जुड़े रहना अधिक आसान होगा. जनरेशन ज़ेड इस मायने में पिछली पीढ़ियों से अलग है, क्‍योंकि वे अधिक ग्‍लोबल और विविधतापूर्ण हैं. उनके पास अनगिनत ऐसे प्‍लेटफॉर्म्‍स व चैनल्‍स हैं, जिनसे वो जुड़ सकते हैं और कंट्रिब्‍यूट कर सकते हैं. युवाओं में हमेशा से मानवता को नए-नए तरीक़ों से परिभाषित किया है, लेकिन आज यह पहले से कहीं अधिक तेज़ी से और अधिक बार हो रहा है. जैसे-जैसे टेक्‍नोलॉजी और कनेक्टिविटी तेज़ी से बढ़ेगी, वैसे वैसे पीढ़ियां भी उभरेगी और आगे बढ़ेंगी.
अतः इस कोरोना काल में अपने बच्चों को अधिक-से-अधिक प्यार, सहयोग और प्रोत्साहन दें, ताकि वे परिस्थितियों का सहजता से सामना कर सकें और सकारात्मक रह सकें.

– ऊषा गुप्ता

Child Care

अक्सर देखा गया है कि जो महिलाएं पहली बार मां बनती हैं, वे कई बातों को लेकर परेशान या दुविधा में रहती हैं, ख़ासकर जब बच्चा पैदा होता है. जैसे-जैसे शिशु बढ़ता है उसकी खानपान, उसमें होनेवाले परिवर्तन को लेकर भी कई तरह की बातें नई-नई बनी मां के दिमाग़ में चलती रहती हैं.
डॉ. ज्योत्सना भगत के अनुसार, बच्चे के पैदा होने से लेकर सालभर तक का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है. यहां पर हम कुछ छोटी-छोटी बातें बता रहे हैं, जिससे आप जान सकेंगी कि आपके शिशु की परवरिश सही हो रही है. बस, आपको ध्यान देने और सावधानी बरतने की ज़रूरत है.

  • मां का पहला दूध शिशु को देना बहुत ज़रूरी है, इसमें प्रचुर मात्रा में प्रोटीन एंटीबॉडीज होते हैं, जो बच्चे को पहले साल में इंफेक्शन से बचाते हैं.
  • ध्यान रहे, हर रोज़ बच्चे के वज़न में 25 से 30 ग्राम की बढ़ोतरी होती है.
  • बच्चे के पैदा होने पर दूध पिलाने को लेकर कोई ख़ास नियम नहीं है, विशेषकर शुरुआती कुछ दिन. जब बच्चा चाहे उसे दूध पिलाए यानी भूख लगने, रोने पर उसे तुरंत दूध पिलाएं. फिर चाहे वो आधा घंटा हो या एक-दो घंटा.
  • यदि शिशु काफ़ी कमज़ोर पैदा हुआ है, तो उसे जगाकर भी दूध दिया जा सकता है.
  • चार-पांच दिन बाद उसे दो घंटे में केवल मां का प्यार ही दूध दें. उसे ऊपर से ग्राइप वॉटर आदि ना दें.
  • कुछ लोग शिशु की मालिश पैदा होने के अगले दिन से शुरू कर देते हैं, तो कुछ 4-5 दिन बाद में करते हैं.
  • बच्चे के लिए मालिश बहुत ज़रूरी है. इससे रक्त का संचार बढ़ता है.
  • शिशु की मालिश किसी भी बेबी ऑयल या फिर सौम्य तेल से करें.
  • मां के लिए बच्चे को मसाज करना इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि इससे शिशु-मां के बीच संवाद बनता है और बच्चे को भी मां का मालिश करना अच्छा लगता है.
  • तेल मालिश के आधे घंटे बाद शिशु को स्नान ज़रूर कराएं, वरना उसके रोमछिद्र बंद हो जाएंगे.
  • शुरुआती दिनों में शिशु अधिकतर सोते रहते हैं. उनकी नींद 16 से 20 घंटे तक भी हो सकती हैं.
  • यदि बच्चा दूध पीने के बाद सो रहा है, तो इसका मतलब है वह अपना पूरा आहार ले रहा है.
  • शिशु को सूती या नर्म-मुलायम कपड़े ही पहनाएं.
  • नैपी बदलने का ध्यान रखें.
  • उसके सारे कपड़े धोने के बाद थोड़ा-सा डेटॉल डालकर एक बार फिर से पानी से निकाल लें.
  • शिशु के कपड़े धूप में सुखाएं.
  • अक्सर मां को लगता है मेरा दूध बच्चे को पूरा नहीं होता, यह सोच सही नहीं. दरअसल हम यह नहीं देख सकते हैं कि बच्चे के पेट में कितना दूध जा रहा है. कुछ मिनट तक ब्रेस्ट फीडिंग यानी स्तनपान करने के बाद वो अलग हो जाता है. यदि वो दूध पीने के बाद सो रहा है, तो इसका मतलब है कि शिशु अपना पूरा आहार ले रहा है, क्योंकि गौर करनेवाली बात है कि भूखा बच्चा सोएगा नहीं.
  • जो शिशु हल्के-फुल्के होते हैं, वे जल्दी बैठने लगते हैं, जबकि भारी शिशु थोड़ा देर से बैठते हैं.
  • इस बात का ख़्याल रखे कि बच्चे का वज़न नहीं बढ़ रहा है, तो हो सकता है कि मां का दूध उसे पूरा नहीं पड़ रहा हो.
  • वर्किंग मांएं चार महीने के बाद शिशु को ऊपरी भोजन शुरू कर सकती हैं.
  • सबसे पहले उसे चावल का पानी देना शुरू करें, क्योंकि ये सुपाच्य होता है.
  • इसके बाद चावल का दलिया, राइस फ्लेक्स पका कर दे सकते हैं.
  • 15 से 20 दिन के अंदर दिन में दो बार चावल देना शुरू कर सकते हैं.
  • कुछ दिनों बाद उसके भोजन में कोई फल भी देना शामिल कर सकते हैं.
  • कुछ बच्चों की दांत चार-पांच महीने में आ जाते हैं, तो कुछ बच्चों के दांत आने में नौ महीने या सालभर भी लगता है.
  • कम वज़नवाला बच्चा जल्दी चलता है, भारी वज़न के बच्चे देर से चलना शुरू करते हैं.
  • सालभर के बच्चे को वो सब खाने को दें, जो घर में बनता है, जितनी कैलोरी बड़े लेते हैं, उससे आधी कैलोरी उसे दें.
  • ऊषा गुप्ता
newborn baby

सर्दियों के मौसम में छोटे बच्चों को ख़ास देखभाल की ज़रूरत होती है. इन दिनों उन्हें इंफेक्शन व स्किन से जुड़ी समस्याओं का होना आम बात होती है. उन्हें स्किन की समस्या न हो और वे बीमारियों से भी दूर रहें, इसके लिए डॉ. अजय राणा ने कई उपयोगी टिप्स बताएं.

Tips To Take Care Of Your Children

* विंटर में छोटे बच्चों के स्नान के लिए माइल्ड सोप व शैंपू का इस्तेमाल करें. यदि आयुर्वेदिक साबुन हो, तो और भी अच्छा है, क्योंकि शिशुओं के शरीर के लिए यह अधिक प्रभावकारी होता है.

* ठंड के मौसम में बच्चों में ड्राई स्किन या खुजली की समस्या भी बहुत होती है. ऐसे में यह ज़रूरी है कि उन्हें गुनगुने पानी से नहलाएं और अधिक देर तक स्नान न कराएं यानी 10 मिनट से अधिक तो बिल्कुल भी नहीं.

* बच्चों के लिए ऐसा मॉइश्‍चराइज़र चुनें, जिसमें ऑलिव ऑयल और बादाम का तेल भी शामिल हो. इससे बच्चे की त्वचा नर्म-मुलायम रहती है.

* शिशुओं को पेट्रोलियम जेली या एक्वाफोर, एसेरिन जैसे मॉइश्‍चराइज़र लगाएं. इससे न केवल त्वचा नर्म-मुलायम हो जाती है, बल्कि दाग़-धब्बेवाली त्वचा को ठीक करने में भी मदद मिलती है.

यह भी पढ़ेपढ़ने के लिए बच्चे को कैसे करें प्रोत्साहित? (How To Motivate Your Child For Studies)

* सर्दियों में छोटे बच्चे कई परतों में कपड़े पहनते हैं, जिससे उनकी स्किन नमी, गर्मी और जलन की चपेट में होती है, जिसके कारण उन्हें रैशेज हो जाते हैं. ऐसे में उनके डायपर को चेक करते रहना चाहिए. समय-समय पर गंदे डायपर बदलें. बच्चे को दिनभर में एक बार बिना कपड़ों के भी थोड़ी देर रखें, ताकि त्वचा को हवा मिल सके. ऐसा करने से उन्हें रैशेज़ होने की संभावना काफ़ी कम होती है.

* रिसर्च के अनुसार, बच्चों को रात में भारी कंबल, चद्दर आदि से ढंककर न सुलाएं. इससे उन्हें एसआईडीएस यानी अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम का ख़तरा हो सकता है. बेहतर होगा कि बच्चे को गर्म कपड़े पहनाकर सुलाएं.

* सर्दियों में बच्चा स्वस्थ रहे और उसके शरीर को अच्छी तरह से गर्माहट मिले, इसके लिए मसाज ज़रूर करें. नारियल का तेल या फिर बादाम तेल से बच्चे की मालिश करना बेहतर है.

* विंटर में एक्ज़िमा से पीड़ित बच्चों की त्वचा में नमी की समस्या रहती है. रूखी त्वचा के कारण कई बार ठंडी में त्वचा फट भी जाती है. ऐसे में बच्चों को ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत होती है.

* सर्दियों में खुली त्वचा पर तापमान में बदलाव होने के कारण बच्चों में फ्रॉस्टनीप इंफेक्शन का ख़तरा रहता है. इससे बचाव के लिए बच्चों के हाथ-पैर को दस्ताने, जूते-मोजे, टोपी आदि से ढंककर रखें.

यह भी पढ़ेबच्चों की शिकायतें… पैरेंट्स के बहाने… (5 Mistakes Which Parents Make With Their Children)  

* सर्दियों में यूवी किरणें के कारण शिशुओं के गालों पर रेड पैचेज हो जाने की समस्या बहुत आम है. ऐसे में सनस्क्रीन का उपयोग करना न भूलें. एसपीएफ 30 सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें.

* मौसम व कमरे के तापमान के अनुसार शिशु को कपड़े पहनाएं. यदि बच्चे को बाहर ले जा रहे हैं, तो ठंड का ख़्याल रखते हुए अच्छी तरह से गर्म कपड़े पहनाएं, ताकि सर्दी-ज़ुकाम या फिर ठंड लगने से वो बच सके.

ऊषा गुप्ता

अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करेंः Parenting Guide

सभी पैरेंट्स चाहते हैं कि उनका बच्चा क्लास में टॉप करे, स्पोर्ट्स में अव्वल आए और एक्स्ट्रा करिकुलर में भी बेस्ट करे यानी कुल मिलाकर ऑलराउंडर बन जाए. लेकिन जब बेचारा बच्चा ऐसा नहीं कर पाता, तो पैरेंट्स उस पर अपना इमोशनल बोझा लादना शुरू कर देते हैं, जिससे बच्चे परेशान हो जाते हैं. क्या है पैरेंट्स का ये इमोशनल बोझा और कैसे बचें, इससे आइए जानते हैं. 

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क्या है इमोशनल बोझा?

अपेक्षाएं रखना मानवीय स्वभाव है, पर उन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए अत्यधिक भावनात्मक दबाव डालना ही इमोशनल बोझा है. बच्चे अति संवेदनशील होते हैं. ऐसे में पैरेंट्स अगर उन पर अपने सपने और वो सब कुछ करने की ज़िम्मेदारी लगातार थोपते रहते हैं, जो वो कभी नहीं कर पाए, तो बच्चों पर इमोशनल दबाव बहुत बढ़ जाता है, जो उनके मानसिक विकास के लिए ठीक नहीं है.

तरह-तरह के इमोशनल बोझ

मेरा बच्चा बड़ा होकर इंजीनियर बनेगा: सर्वे में भी यह बात साबित हो चुकी है कि ज़्यादातर भारतीय पैरेंट्स अपने बच्चों को इंजीनियर बनाना पसंद करते हैं. आज भी यह परंपरागत सोच बच्चों को कुछ नया करने से रोकती है. बच्चे के हुनर को पहचाने बगैर अपना सपना उस पर थोपना बोझा लादना ही है.

हमारे परिवार में सब डॉक्टर ही बनते हैं: माता-पिता डॉक्टर हों, तो बच्चे को भी मेडिकल ही पढ़ाते हैं. वो चाहते हैं कि उनका बच्चा उनसे भी बड़ा डॉक्टर बने और अपना ख़ुद का अस्पताल खोले. ज़्यादातर बच्चे पैरेंट्स की इच्छा समझ उसी में जुट जाते हैं, पर हर कोई सफल नहीं हो पाता. अपने मन का न कर पाने की छटपटाहट नकारात्मक रूप से ग़ुस्से और चिड़चिड़ेपन के रूप में बाहर निकलती है.

तुम्हें हमेशा टॉप करना है: ये बहुत ख़तरनाक बोझा है, जो हर पैरेंट अपने बच्चों के सर पर रखते हैं. बच्चा अगर औसत हो, तो कितनी भी कोशिश कर ले, पढ़ाई में बहुत अच्छा नहीं कर पाएगा. हो सकता है, वो खेलकूद में अच्छा हो, आर्ट या म्यूज़िक में अच्छा कर पाए. अकैडमिक स्कोर के चक्कर में बच्चे पर बेवजह बोझा न लादें.

हमें तुमसे बहुत उम्मीदें हैं: बच्चों से अपेक्षाएं और उम्मीदें रखना बिल्कुल ग़लत नहीं, पर हर व़क्त यह जताते रहने से उन पर भावनात्मक दबाव पड़ता है. उनके मन में डर बैठने लगता है, जिससे उनका आत्मविश्‍वास डगमगाने लगता है. डर और आत्मविश्‍वास की कमी से बच्चे एंज़ायटी से जूझने लगते हैं.

टूटे परिवार का बोझ: माता-पिता के टूटे रिश्ते का असर बच्चों पर इस प्रकार पड़ता है कि वो भावनात्मक रूप से काफ़ी संवेदनशील हो जाते हैं. शादी-ब्याह से विश्‍वास उठ जाना, दुनिया में सब मतलबी होते हैं, प्यार जैसा कुछ नहीं होता आदि भावनाएं उनमें घर कर लेती हैं.

एग्ज़ाम टाइम को कर्फ्यू में तब्दील कर देना: कुछ पैरेंट्स एग्ज़ाम टाइम में बच्चों को बाहरी दुनिया से पूरी तरह डिस्कनेक्ट कर देते हैं. परीक्षा मतलब स़िर्फ पढ़ाई करना हो जाता है. ऐसा माहौल बच्चों के लिए मुश्किलोंभरा हो जाता है, तभी तो वो बाहर जाने और वहां से निकलने के लिए छटपटाने लगते हैं, इसलिए एग्ज़ाम  को हौवा न बनाएं.

यह भी पढ़ेबच्चों की शिकायतें… पैरेंट्स के बहाने… (5 Mistakes Which Parents Make With Their Children)  

बच्चों में होनेवाले नकारात्मक बदलाव

एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ इमोशनल बोझ का बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण उनमें कुछ बदलाव नज़र आते हैं. अगर आपके बच्चे में भी ये लक्षण नज़र आते हैं, तो किसी चाइल्ड काउंसलर से मिलें.

* एकाग्रता में कमी होना

* छोटी-छोटी बातों पर ओवर रिएक्ट करना

* होमवर्क करने में दिलचस्पी न दिखाना

* हर व़क्त ग़ुस्सा और चिड़चिड़ापन रहना

* जो भी कहा जाए, उसका उल्टा करना

* हर व़क्त गुमसुम रहना

* वायलेंट गेम्स खेलना

* अचानक कम या ज़्यादा खाना शुरू करना

यह भी पढ़ेएग्ज़ाम गाइड- कैसे करें परीक्षा की तैयारी? (Exam Guide- How To Prepare For The Examination?)

डिप्रेशन-एंज़ायटी के बढ़ते मामले

बच्चों में बढ़ते इमोशनल दबाव का ही प्रभाव है कि बढ़ती उम्र के बच्चे एंज़ायटी और डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं और जो बच्चे इनसे जूझ नहीं पाते, वो आत्महत्या जैसा गंभीर कदम भी उठा लेते हैं.

हर घंटे एक विद्यार्थी कर रहा है आत्महत्या

2015 में आए नेशनल ब्यूरो ऑफ क्राइम रिकॉर्ड्स के मुताबिक़, हमारे देश में हर साल 8,934 विद्यार्थी आत्महत्या करते हैं यानी लगभग हर घंटे एक छात्र. यह आंकड़ा हमारे लिए बेहद चिंता का विषय है, क्योंकि न स़िर्फ परिवार के रूप में बल्कि एक सभ्य समाज के रूप में भी यह हमारी हार है.

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कैसे कम करें इमोशनल बोझा?

* स्कूलों में वैसे ही पढ़ाई का बहुत ज़्यादा दबाव बच्चों पर रहता है, आप भी उसे बहुत ज़्यादा अलग-अलग क्लासेस में लगाकर इंगेज न रखें. उसे खेलने-कूदने और परिवार के साथ समय बिताने का पर्याप्त समय मिले, इसका ध्यान रखें.

* हर बात पर बच्चों को यह कहकर इमोशनली ब्लैकमेल न करें कि हमारे समय पर ऐसा होता था, हम तो ये करते थे, वो करते थे. आपको समझना होगा कि आपका ज़माना अलग था और बच्चे का समय अलग है. आपको आज के बदलते माहौल को ध्यान में रखकर उसे उदाहरण देने चाहिए.

* यूनिट टेस्ट हो या सेमिस्टर एग्ज़ाम, उसका हौवा न बनाएं. बच्चा पहले से ही एग्ज़ाम के नाम से डरा होता है. आप ऐसा माहौल बनाकर उसे और डरा देते हैं. ऐसा न करें. एग्ज़ाम टाइम में भी घर का माहौल सामान्य रखें. बच्चों को स्ट्रेस फ्री होने के लिए थोड़ा फ्री टाइम भी दें.

* ज़्यादातर मांएं इमोशनल कार्ड खेलती हैं. दूसरों के बच्चों के उदाहरण दे-देकर बच्चों पर और दबाव डालती हैं. आपको समझना होगा कि हर बच्चा अलग और ख़ास होता है. आपके बच्चे में जो ख़ूबियां हैं, शायद ये ख़ूबियां उस बच्चे में न हों, तो तुलना किस बात की.

* वर्किंग कपल्स के बच्चों की परवरिश एक बड़ा टास्क है. उन्हें समय न दे पाना और उनके लिए हर व़क्त मौजूद न रहनेवाली भावना उन्हें इस कदर इमोशनल बना देती है कि वो बच्चों को ज़रूरत से ज़्यादा छूट दे देते हैं. यह भी सही नहीं है. बच्चों की सही परवरिश के लिए नियमों से लेकर पैंपरिंग तक को संतुलित रखना ज़रूरी है.

 

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पैरेंट्स की उम्मीदों का दिलचस्प डाटा

एचएसबीसी द्वारा की गई स्टडी ‘होप्स एंड एक्सपेक्टेशन ऑफ पैरेंट्स ऑन देयर चिल्ड्रेन्स एजुकेशन’ में दुनिया के अलग-अलग देशों में बच्चों की पढ़ाई और करियर से जुड़ी बातों पर दिलचस्प डाटा तैयार किया गया है. आप भी देखें फैक्ट्स.

* भारत के 51% पैरेंट्स चाहते हैं कि उनके बच्चों का सक्सेसफुल करियर हो, जबकि बाकी देशों में बच्चों की ख़ुशी और अच्छी लाइफस्टाइल को ज़्यादा तवज्जो दिया जाता है.

* जब भारतीय पैरेंट्स को अपने बच्चे के लिए तीन सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य निर्धारित करने के लिए कहा गया, तो 51% ने सफल करियर, 49% ने जीवन में ख़ुशहाली, 33% ने स्वस्थ जीवनशैली और 22% ने कहा कि इतना कमा ले, जिससे ज़िंदगी

आसानी से जी सके और स़िर्फ 17% ने कहा कि वो अपनी काबीलियत के अनुसार जो भी करना चाहे, उसमें वो मदद करेंगे.

* वहीं अमेरिका, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पैरेंट्स ने सफल करियर को उतनी तवज्जो नहीं दी. यहां स़िर्फ 17% पैरेंट्स ने सफल करियर की बात कही.

* बच्चे की ख़ुशी के मामले में दुनिया के ज़्यादातर देश हम भारतीयों से आगे हैं. जहां फ्रांस में 86%, कनाडा में 78%, इंग्लैंड में 77%, यूएई में 60% हॉन्गकॉन्ग में 58% और इंडोनेशिया में 56% है, वही आंकड़ा भारत में 49% है यानी हमें अपने बच्चों की ख़ुशी का और ध्यान रखना होगा.

* जब बात शिक्षा की हो, तो ज़्यादातर भारतीय पैरेंट्स चाहते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर इंजीनियर बने, जबकि ‘मैन्यूफैक्चरिंग का हब’ कहे जानेवाले चीन में भी पैरेंट्स इंजीनियरिंग को उतनी तवज्जो नहीं देते, जितना हमारे देश में. हमारे देश के पैरेंट्स की रुचि को देखें, तो 23% इंजीनियरिंग, 22% फाइनांस, 16% कंप्यूटर और इंफॉर्मेशन साइंस, 14% मेडिकल और 2% अपने बच्चों को लॉ पढ़ाना चाहते हैं.

* भारत में 88% पैरेंट्स बच्चों को मास्टर्स या पीएचडी करवाना चाहते हैं, जबकि बाकी देशों में बारहवीं के बाद कोई कोर्स या डिग्री को लोग ज़्यादा प्राथमिकता देते हैं. हायर एजुकेशन की लालसा सभी पैरेंट्स को नहीं होती.

– संतारा सिंह

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अक्सर देखा गया है कि अभिभावकों को अपने बच्चों से ढेर सारी शिकायतें रहती हैं. उन्हें अक्सर कहते हुए देखा जाता है कि बच्चे उनका कहना नहीं मानते, बहुत ज़िद करते हैं, पढ़ाई नहीं करते, होमवर्क समय पर पूरा नहीं करते, खाना नहीं खाते आदि. लेकिन क्या आपने सोचा है कि पैरेंट्स से कई ज़्यादा शिकायतें बच्चों को भी उनसे रहती हैं, जिस पर अक्सर ध्यान ही नहीं दिया जाता.

parenting mistakes

सनी को अपने पापा से ढेर सारी कंप्लेन हैं. वे हमेशा उसे डांटते रहते हैं. उसके साथ खेलते नहीं, पड़ोसी के बेटे सागर से उसकी तुलना करते हैं कि सागर कितना अच्छा है, बड़ों का कहना मानता है, सब काम अच्छे से करता है… सनी यह सब सुनकर दुखी हो जाता है. वो पापा को बताना चाहता है कि वो उससे बेहतर करता है, पर पापा उस पर ध्यान दें तब ना.

यह सनी ही नहीं उसके जैसे तमाम बच्चों की शिकायतें हैं, जिस पर पैरेंट्स ध्यान ही नहीं देते. वैसे देखा जाए, तो शिकायतें भी दो तरह की होती हैं, एक वो जो बच्चे लाड़ दिखाते हुए करते हैं और दूसरी वो जो गंभीरता से करते हैं, पर मम्मी-पापा उसे हल्के में लेते हैं.

सायकोलॉजिस्ट परमिंदर निज्जर का कहना है कि ऐसा अक्सर होता है कि बच्चा अपनी भावनाओं व समस्याओं को माता-पिता से कहता है, पर वे बच्चा है समझकर उसकी कई बातों को अनदेखा कर देते हैं. सभी अभिभावकों को यह समझना चाहिए कि बच्चे मासूम व अति संवेदनशील होते हैं. यदि शुरू से ही उन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो वे ख़ुद को उपेक्षित महसूस कर गुमराह हो सकते हैं या फिर ग़लत रास्ता भी अख़्तियार कर सकते हैं. आइए, बच्चों की कुछ आम शिकायतों के बारे में जानते हैं.

शिकायत नं. 1

मम्मी-पापा हमेशा पड़ोसी या कज़िन बच्चे से मेरी तुलना करते हैं…

यह अधिकतर बच्चों की शिकायत होती है कि उनके पैरेंट्स अपने पड़ोस, रिश्तेदार या फिर उनके दोस्तों से उनकी तुलना करते हैं.

पैरेंट्स के बहाने

* हम उसके माता-पिता हैं, जो भी कहते हैं, बच्चे के भले के लिए कहते हैं.

* अभी वो बच्चा है. उसे भला सही-ग़लत की क्या समझ.

* हर पैरेंट्स चाहते हैं कि उनका बच्चा स्मार्ट व ऑलराउंडर बने.

पैरेंट्स गाइडलाइन

* बच्चे यह कभी बर्दाश्त नहीं कर पाते कि उनकी तुलना अन्य बच्चों से की जाए, इसलिए यदि आप ऐसा करते हैं, तो इसे तुरंत बंद कर दें.

* कोई और उदाहरण या फिर प्रेरक कहानियों द्वारा उन्हें पढ़ने-लिखने या फिर किसी भी चीज़ के लिए जो आप चाह रहे हैं, प्रोत्साहित करें.

* बच्चे की आपसी तुलना उसे कमतर होने का एहसास कराती है. हो सकता है बच्चा ख़ुद को हानि पहुंचा ले.

* इससे वो हीनभावना से भी ग्रस्त हो सकता है, अतः तुलना की बजाय सकारात्मक पहलुओं को देखते हुए धैर्य से काम लें.

यह भी पढ़ेबढ़ते बच्चे बिगड़ते रिश्ते (How Parent-Child Relations Have Changed)

शिकायत नं. 2

ना पापा के पास मेरे लिए टाइम है और न ही मम्मी मेरे साथ अधिक समय बिताती हैं…

आज की भागदौड़भरी ज़िंदगी व महंगाई के चलते पति-पत्नी दोनों ही कामकाजी होते हैं, ख़ासकर महानगरों में. ऐसे में बच्चों के लिए अधिक समय वे नहीं निकाल पाते हैं.

पैरेंट्स के बहाने

* आख़िर हम बच्चे के लिए ही तो सब कर रहे हैं.

* यदि पति-पत्नी दोनों ही नौकरी नहीं करेंगे, तो बच्चे को अच्छी पढ़ाई-लिखाई और अन्य सुविधाएं कैसे दे पाएंगे.

* हमारी भी इच्छा होती है बच्चों के साथ व़क्त बिताने की, पर जॉब भी तो ज़रूरी है.

पैरेंट्स गाइडलाइन

* घर और ऑफिस को टाइम मैनेजमेंट के साथ मैनेज किया जा सकता है.

* अपने बच्चों को क्वांटिटी नहीं क्वालिटी टाइम दें.

* सोशल मीडिया, टीवी, चैटिंग या फिर अपनी शॉपिंग आदि में कटौती करके बच्चों को अधिक समय दें.

* वीकेंड में बच्चों के साथ भरपूर समय बिताएं और कहीं घूमने-फिरने, पिकनिक मनाने, मूवी देखने या फिर डिनर के लिए होटल भी जा सकते हैं.

शिकायत नं. 3

मॉम-डैड अपनी बात पर टिके नहीं रहते, अक्सर प्रॉमिस तोड़ देते हैं…

बच्चों को सबसे अधिक अपेक्षा और आशा अपने मम्मी-पापा से ही होती है. उन्हें यह विश्‍वास होता है कि उनकी हर मांग को वे ज़रूर पूरा करेंगे, जो कई बार होता नहीं है.

पैरेंट्स के बहाने

* पैरेंट्स के अनुसार, अक्सर बच्चों की ज़िद को टालने के लिए किसी बात का वादा कर देते हैं, पर वो हम करें, यह ज़रूरी नहीं है.

* हमारी ज़िंदगी कितनी तनावग्रस्त है, भला बच्चे कैसे समझ पाएंगे, उन्हें तो बस फ़िज़ूल की डिमांड करनी होती है.

* ऑफिस से थककर आने के बाद बच्चा यह चाहे कि पैरेंट्स उसे बाहर ले जाएं, तो अक्सर बाद में ले जाएंगे की प्रॉमिस कर देते हैं.

पैरेंट्स गाइडलाइन

* यदि आप बच्चे की कोई मांग पूरी नहीं कर सकते, तो उसे बाद में करने की हामी न भरें.

* झूठे आश्‍वासन या वादे न करें. वो ही बात कहें, जो आप पूरा कर सकते हैं.

* बचपन से ही बच्चे में यह भावना विकसित करें कि जो मुनासिब होगा और सार्मथ्य में होगा, उसे किया जाएगा.

* बच्चों का अपने पैरेंट्स पर अटूट विश्‍वास होता है. आपके बार-बार प्रॉमिस तोड़ने से न केवल उनका दिल टूटता है, बल्कि विश्‍वास भी चकनाचूर होता है.

यह भी पढ़ेदबाव नहीं, प्रेरणा ज़रूरी (Don’t Pressurize, Rather Encourage Your Children)

शिकायत नं. 4

पैरेंट्स अक्सर दोस्तों के सामने बेइज्ज़ती कर देते हैं, हाथ तक उठा देते हैं…

ऐसा अक्सर देखा गया है कि अभिभावकों की नज़र में बच्चे का मान-सम्मान या सेल्फ रिस्पेक्ट कोई मायने नहीं रखता. वे बच्चों पर अपना इतना अधिकार समझते हैं कि वे कुछ भी कर सकते हैं

पैरेंट्स के बहाने

* बच्चा ग़लती करेगा, तो डांट-फटकार, मार खाएगा ही.

* यदि अभी उनके साथ सख़्ती से पेश नहीं आएंगे, तो आगे चलकर बात बिगड़ सकती है.

* हमें ख़ुद थोड़ी अच्छा लगता है बच्चे को मारना, पर क्या करें. वो हरकतें ही ऐसे करते हैं कि हाथ उठ जाता है.

पैरेंट्स गाइडलाइन

* जैसे बड़े अपने मान-सम्मान के प्रति सचेत रहते हैं, वैसे ही बच्चों को भी अपने सेल्फ रिस्पेक्ट का ख़ूब ख़्याल रहता है, ख़ासकर उनके दोस्तों के सामने. इसलिए उनके सामने बच्चे को कभी भी डांटें-फटकारें नहीं.

* बच्चे की ग़लतियों के पीछे की वजह या फिर उस सिचुएशन को समझने की कोशिश करें.

* बच्चे को भरपूर प्यार के साथ सम्मान भी दें. इससे उन्हें दुगुनी ख़ुशी मिलेगी और वे आपकी हर बात मानेंगे.

* यदि बचपन से ही बच्चों की छोटी-बड़ी हर बात को गंभीरता से समझा जाए और सही तरी़के से ट्रीट किया जाए, तो यह समस्या आएगी ही नहीं.

शिकायत नं. 5

मां-पिताजी छोटे भाई-बहन को उससे अधिक प्यार करते हैं…

यह घर-घर की कहानी है यानी अधिकतर घरों में देखा गया है कि बड़े बच्चे को लगता है कि माता-पिता उनकी अपेक्षा छोटे भाई या फिर बहन को अधिक प्यार-स्नेह करते हैं. इसका बड़े बच्चे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

पैरेंट्स के बहाने

* वो अब बड़ा हो गया है, उसे इस बात को समझना चाहिए कि छोटे को देखभाल की अधिक ज़रूरत है.

* हमारे लिए सभी बच्चे बराबर है, पर छोटे बच्चे का अधिक ध्यान रखना भी तो ज़रूरी है.

* जब बड़ा बच्चा छोटा था, तब उसकी भी हर छोटी-बड़ी बात को मान लेते थे और उसका भी भरपूर ख़्याल रखते थे.

पैरेंट्स गाइडलाइन

* बच्चे छोटे-बड़े नहीं, बल्कि मासूम और नादान होते हैं, इसलिए उन्हें सावधानी से हैंडल करना चाहिए.

* कहीं न कहीं भेदभाव करके या आप अपने व्यवहार से बच्चों के बीच ही प्रतिस्पर्धा पैदा कर देते हैं.

* आपके ग़लत ट्रीटमेंट के कारण बड़ा बच्चा अपने छोटे भाई या फिर बहन को अपना दुश्मन समझने लगता है, इसलिए ऐसा न करें.

* सभी बच्चों को एक समान प्यार-स्नेह और अपनापन दें. आपका सही व उचित व्यवहार ही बच्चे के योग्य बनने की नींव रखेगा.

– ऊषा गुप्ता

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कल तक हमारी हर बात में हां में हां मिलानेवाला बच्चा जब हमारे निर्णय पर सवाल उठाने लगता है, तो ज़्यादातर माता-पिता बच्चे के व्यवहार में आए इस बदलाव को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते, जिसका असर उनके ख़ूबसूरत रिश्ते पर पड़ने लगता है. काउंसलिंग सायकोलॉजिस्ट डॉ. माधवी सेठ बता रही हैं कि टीनएज बच्चों के व्यवहार में बदलाव क्यों आते हैं और उम्र के इस नाज़ुक दौर में उनके पैरेंट्स को बच्चों के साथ किस तरह डील करना चाहिए, ताकि रिश्तों की डोर मज़बूत बनी रहे.

Parent-Child Relations

शिकायतों का सिलसिला

अधिकतर टीनएज बच्चों के पैरेंट्स का यही रोना होता है कि उनका बच्चा पहले जैसा नहीं रहा. बात-बात पर ग़ुस्सा होना, उल्टा जवाब देना, दोस्तों को ही अपना सब कुछ समझना… तक़रीबन हर दूसरे पैरेंट्स की अपने टीनएज बच्चे से यही शिकायत होती है. वहीं दूसरी तरफ़ बच्चे इस बात की कंप्लेन करते हैं कि उनके अभिभावक उन्हें समझते ही नहीं और न ही उन पर विश्‍वास करते हैं.

क्यों आते हैं बदलाव?

12 से 18 साल की उम्र मेंबच्चों में बहुत-से हार्मोनल व इमोशनल चेंजेज़ आते हैं. प्यूबर्टी के हिसाब से देखा जाए, तो टीनएन में चार प्रकार के बदलाव आते हैं.

शारीरिक बदलावः 11-12 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते बच्चों के शरीर में बदलाव आने शुरू हो जाते हैं. यह बदलाव बहुत-से बच्चों के लिए मुश्किलोंभरे होते हैं, जिससे वे आसानी से डील नहीं पाते. उदाहरण के लिए बचपन में जिस गोलमटोल बच्चे को ‘क्यूट’ कहकर सब उसे प्यार करते थे, जब वही बच्चा 11-12 साल की उम्र में पहुंचता है, तो मोटापे के कारण लोग उसे रिजेक्ट करने लगते हैं या उसकी खिल्ली उड़ाने लगते हैं. ऐसे में बच्चे को ख़ुद भी समझ में नहीं आता कि आख़िर लोग अब उसे क्यों नापसंद करने लगे हैं. इससे कुछ बच्चों को साइकोलॉजिकल ट्रॉमा होता है.

सामाजिक बदलावः इस उम्र में आते-आते बच्चों को ख़ुद को देखने का नज़रिया और लोगों का उनके प्रति नज़रिया, दोनों ही बदलने लगता है. उनकी सोशल इमेज बनना शुरू हो जाती है. वे अपना व्यक्तित्व विकसित करने की कोशिश करते हैं. बच्चे ख़ुद से ‘मैं क्या हूं’ जैसे सवाल करते हैं. ऐसे में अपनी इंडीविज़ुएलिटी सेट करने में किसी बच्चे को ज़्यादा समय लगता है, तो किसी को कम.

मनोवैज्ञानिक बदलावः इस अवस्था में बच्चों में बहुत-से मनोवैज्ञानिक बदलाव भी आते हैं, लेकिन सारे साइकोलॉजिकल बदलाव सकारात्मक नहीं होते. कुछ बच्चे अकेलापन, असुरक्षा इत्यादि महसूस करने लगते हैं.

आध्यात्मिक बदलावः  चौथा बदलाव स्पिरिच्युअल होता है. इस उम्र में बच्चों के ख़्यालात बदलने लगते हैं. उनका ज़िंदगी को देखने का नज़रिया बदल जाता है. वो नज़रिया उनका अपना होता है. उसमें किसी का कोई योगदान नहीं होता. बच्चे यह चाहते भी नहीं हैं कि उसमें कोई दख़ल दे.

इतने सारे बदलावों के कारण ही किशोरावस्था को ज़िंदगी का सबसे कठिन दौर कहा जाता है. इन सभी बदलावों को स्वीकार करने में 3 से 5 साल यानी तक़रीबन पूरी किशोरावस्था लग जाती है. इन्हीं बदलावों के कारण इस दौर में पैरेंट्स का रोल भी काफ़ी हद तक बदल जाता है, लेकिन ज़्यादातर पैेंरेट्स बदलाव के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं होते.

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पैरेंट्स से कहां होती है चूक?

पैरेंट्स के लिए बच्चा हमेशा बच्चा ही रहता है. वे हमेशा ही करेक्शन मोड में रहते हैं.  बच्चा जब 10 साल का होता है तब भी वे उसे करेक्ट करने में लगे रहते हैं और जब वह 12-13 साल का हो जाता है, तब भी वे उसी ढर्रे पर चलते रहते हैं. ऐसे बैठो, ऐसे बात करो, ऐसे कपड़े मत पहनो, यहां मत जाओ… इत्यादि. वे बच्चे को अपनी तरह से रखना चाहते हैं. स्वाभाविक है कि बढ़ते बच्चों को इतनी रोक-टोक पसंद नहीं आती, क्योंकि वे माता-पिता के प्री-डिफाइंड दायरे में नहीं रहना चाहते. भले ही अभी तक उन्होंने दुनिया को माता-पिता की उंगली पकड़कर देखा हो, लेकिन अब वे अपने अनुभव ख़ुद अर्जित करना चाहते हैं. अपनी सीमा, अपनी दिशा ख़ुद तलाशना चाहते हैं और वहीं से बच्चे व माता-पिता के बीच संबंध बिगड़ने शुरू हो जाते हैं.

क्या तरीक़ा है सही?

बच्चे को सही रास्ता दिखाना कोई ग़लत बात नहीं है, लेकिन उसका तरीक़ा सही होना चाहिए.

बोलिए कम, सुनिए ज़्यादाः  इस उम्र के बच्चों को समझाने का तरीक़ा अलग होता है, जो पैरेंट्स को डेवलप करना चाहिए, क्योंकि डांट-डपटकर बात समझाने से बात बनने की बजाय बिगड़ सकती है. टीनएज से बात करते समय कान बड़े और ज़ुबान छोटी रखनी चाहिए यानी बोलना कम और सुनना ज़्यादा चाहिए. उनकी बात सुनिए और जब वे पूछें, तो ही अपनी राय रखिए. अगर वे राय नहीं मांगें, तो स़िर्फ सुनिए. बिना मांगे राय मत दीजिए. यदि राय देनी भी हो, तो तरीक़ा रिक्वेस्ट वाला होना चाहिए, न कि ऑर्डर वाला.

दूसरों से सीखिएः हर किसी को टीनएज बच्चे को डील करने का तरीक़ा नहीं पता होता और इसमें कोई बुराई भी नहीं है, लेकिन यह तरीक़ा सीखना ज़रूरी है. अभिभावकों के लिए ज़रूरी है कि वे बच्चे में आए बदलावों के साथ एडजस्ट करें. टीनएज पैरेंटिंग एक कला है. कला में निपुण होने के लिए अभ्यास की ज़रूरत होती है. अपने आस-पास पड़ोस या रिश्तेदारी में आपको जिसकी पैरेंटिंग स्टाइल पसंद हो, उसके साथ हेल्दी डिस्कशन कीजिए. उनकी पैरेंटिंग स्टाइल पर राय लीजिए. रास्ते अपने आप बनते जाएंगे.

कमियों को स्वीकारेंः इस उम्र के बच्चे को भी अटेंशन चाहिए होता है. उसके क़रीब जाने के लिए उसकी तारीफ़ कीजिए. उसके फेलियर को भी स्वीकार करना सीखिए और उसकी कोशिशों के लिए उसका हौसला बढ़ाइए. इससे उसका स्ट्रेस लेवल कम होगा और वो आपके क़रीब आएगा.

रिश्तों में खुलापन लाइएः  अभिभावक को अपने बच्चे के साथ ऐसा रिलेशन डेवलप करना चाहिए, जिससे उनका बच्चा बिना डर या झिझक के उनके साथ अपनी  हर तरह की बात शेयर कर सके. बच्चे को अकेलेपन का एहसास नहीं होने देना चाहिए. पैरेंट्स के दिमाग़ में इतना खुलापन होना चाहिए कि वे इस बात को स्वीकार कर सकें कि अगर बच्चा कुछ ग़लत भी कर रहा है, तो बच्चा नहीं, बल्कि उसका काम ग़लत है. अगर आप बच्चे को ही ग़लत ठहरा देंगे तो सारे रास्ते बंद हो जाएंगे, इसलिए पैरेंट्स को बच्चे के व्यवहार को ग़लत ठहराना चाहिए, न कि बच्चे को. कहने का अर्थ यह है कि बच्चे को रिजेक्ट न करें. पैरेंट्स को अपने बच्चे को इतनी छूट देनी  चाहिए कि कोई ग़लती होने पर वो उनके पास आकर उसे स्वीकारें, न कि डर के मारे उस पर परदा डाल दें.

रिएक्ट, नहीं एक्ट कीजिएः अभिभावकों को बच्चे की ग़लती पर तुरंत किसी तरह का रिएक्शन नहीं देना चाहिए. अगर आप उन पर ग़ुस्से से चिल्लाएंगे, तो वो भी आप पर चिल्ला सकता है, इसलिए उसकी बात सुनिए और तुरंत रिएक्ट करने की बजाय एक्ट कीजिए. एक्ट करने का मतलब है कि सोच-समझकर बोलना या फैसला देना.

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ज़िम्मेदारी सौंपिएः बढ़ते बच्चे के स्वतंत्र व्यक्तित्व को मान्यता देना ज़रूरी है. उसे रोकने-टोकने की बजाय ज़िम्मेदारी सौंपें. यानी इंस्ट्रक्टर नहीं, फेसिलिटेटर बनिए. यदि आप चाहते हैं कि बच्चा आपके मुताबिक़ चले, तो उसे अपनी जायदाद न समझिए. अपने अहम् को परे रखकर परिस्थिति को देखने का प्रयास करिए. बच्चों के साथ चर्चा करते रहिए. उसके लक्ष्य और उद्देश्य को सिरे से ख़ारिज करने से बचिए.

– वेदिका शर्मा

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बच्चे तो ग़लतियां करते ही हैं, लेकिन कई बार पैरेंट्स भी ऐसी कुछ आम ग़लतियां कर बैठते हैं, जो उन्हें नहीं करनी चाहिए. आइए, इसी के बारे में संक्षेप में जानते हैं.

Common Mistakes Parents Make

बच्चों को बिगाड़ना

सभी पैरेंट्स अपने बच्चों को बहुत लाड़-प्यार से पालते हैं, लेकिन कुछ बच्चे उनके इसी लाड़-प्यार का नाजायज़ फ़ायदा उठाते हैं, जब उन्हें इस बात का पता चलता है कि उनके घर में दूसरा नन्हा मेहमान आनेवाला है, तो वे अपने को असुरक्षित महसूस करने लगते हैं. धीरे-धीरे असुरक्षा की यह भावना उनके मन में घर करने लगती है, जो आगे चलकर ईर्ष्या में बदल जाती है. कई बार बच्चे अवसाद में भी चले जाते हैं और दूसरे बच्चे के सामने उन्हें अपना अस्तित्व ख़तरे में लगने लगता है.

बच्चों को ज़रूरत से ज़्यादा सुरक्षा देना

जब पैरेंट्स बच्चों को ज़रूरत से ज़्यादा सुरक्षा प्रदान करते हैं, तो उनका आत्मविश्‍वास कमज़ोर पड़ने लगता है. जब उनके सामने आत्मविश्‍वास से भरपूर बच्चे आते हैं, तो उनमें ईर्ष्या या हीनभावना पनपने लगती है.

अन्य बच्चों के साथ तुलना करना

प्रतिस्पर्धा के दौर में अधिकतर पैरेंट्स अपने बच्चों की तुलना अन्य बच्चों से करते हैं, जिसका ख़ामियाज़ा बच्चों को भुगतना पड़ता है, परिणामस्वरूप उनमेंईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ने लगती है और उनका आत्मविश्‍वास कम होने लगता है.

यह भी पढ़ेख़तरनाक हो सकती है बच्चों में ईर्ष्या की भावना (Jealousy In Children Can Be Dangerous)

ब़ड़े की उपेक्षा कर छोटे बच्चे पर अधिक ध्यान देना

अधिकतर पैरेंट्स को इस स्थिति का सामना करना पड़ता है. पहला बच्चा जब बड़ा हो जाता है, तो छोटा होने के कारण दूसरे बच्चे की तरफ़ पैरेंट्स का अधिक ध्यान देना स्वाभाविक है, जिसके कारण पहले बच्चे में जलन की भावना बढ़ने लगती है.

ओवर कंट्रोल करना

बच्चों को अनुशासित रखने के लिए कुछ पैरेंट्स उन पर ज़रूरत से ज़्यादा नियंत्रण और सख्ती करते हैं. उनकी इस ग़लती के कारण बच्चों में ईर्ष्या पैदा होने लगती है. बिना बताए उनके साथ सख्ती करना या उन्हें नियंत्रण में रखने के लिए ज़बर्दस्ती नियम-क़ानून थोपने से बच्चों में आत्मविश्‍वास की कमी होने लगती है और वह ख़ुद को अपने भाई-बहन और दोस्तों से कमतर आंकने लगते हैं.

माता-पिता से बच्चों के अच्छे संबंध बच्चे के खाने, सोने और उसके दैनिक गतिविधि को प्रेरित करने के लिए ज़रूरी हो सकते हैं, इसलिए अपने बच्चे के साथ हमेशा बढ़िया संबंध बनाकर रखें.

   – पूनम शर्मा

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ईर्ष्या (Jealousy) एक ऐसी भावना है, जो बड़ों के ही नहीं, बच्चों (Children) के जीवन में दबे पांव कभी भी आ सकती है. बच्चों में ईर्ष्या की भावना अपने छोटे भाई-बहन, दोस्तों और सहपाठियों को देखकर आती है. अगर बचपन से ही उनमें ईर्ष्या को कंट्रोल न किया जाए, तो आगे चलकर पैरेंट्स को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं.

 Jealousy in Children

बच्चों में चार तरह की होती है ईर्ष्या

  1. मटेरियल जेलेसी (खिलौने आदि भौतिक चीज़ों को लेकर होनेवाली ईर्ष्या): जब बच्चा बाहरी दुनिया के संपर्क में आता है, तो अपने दोस्तों, सहपाठियों और भाई-बहनों से वह जो चाहता है, जब उसे नहीं मिलता है, तो वह उनसे ईर्ष्या करने लगता है, जिसे ‘मटेरियल जेलेसी’ कहते हैं.
  2. शैक्षणिक योग्यता व कौशल से जुड़ी ईर्ष्या: जब बच्चा अपने सहपाठियों से शैक्षणिक व खेल संबंधी ईर्ष्या करता है, तो इससे उसकी ख़ुद की परफॉर्मेंस पर बुरा प्रभाव पड़ता है. इसका मतलब है कि वह अपने को दूसरे बच्चों से कमतर आंकता है और ख़ुद को अयोग्य महसूस करता है.
  3. सोशल जेलेसी: जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होने लगता है, उसमें अपने दोस्तों (गर्लफ्रेंड/बॉयफ्रेंड) को लेकर ईर्ष्या पनपने लगती है. सोशल जेलेसी, जो बचपन में नहीं थी, लेकिन किशोरावस्था आने तक स्वत: ही बढ़ने लगती है.
  4. भाई-बहनों के बीच होनेवाली ईर्ष्या: (सिबलिंग जेलेसी): ईर्ष्या का वह रूप है, जो बचपन में हमें आसपास देखने को मिलता है. इस स्थिति में ईर्ष्यालु बच्चा अपने ही भाई-बहनों से ईर्ष्या करता है, जिसके कारण वह हेल्दी सिबलिंग रिलेशनशिप को ख़राब कर देता है.

बच्चों में ईर्ष्या की भावना जब ख़तरनाक होने लगती है, तो- 

* उनके आत्मविश्‍वास में कमी आने लगती है.

* अन्य बच्चों के साथ आक्रामक व्यवहार करने लगते हैं.

* वे ख़ुद को बेबस और लाचार महसूस करते हैं.

* दूसरे बच्चों की बुलिंग करते हैं.

* अपने दोस्तों और सहपाठियों से अलग-थलग रहते हैं.

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कैसे निबटें पैरेंट्स बच्चों में पनपनेवाली ईर्ष्या से?

* जब बच्चे मटेरियल जेलेसी से ग्रस्त होते हैं, तो पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि वे बच्चों को समझाएं कि हर परिवार की आर्थिक स्थिति अलग-अलग होती है, इसलिए अन्य बच्चों के खिलौनों आदि चीज़ों से ईर्ष्या करने की बजाय अपने पास जो है, उसी में ख़ुश रहें.

* शैक्षणिक व कौशल संबंधी ईर्ष्या से ग्रस्त होने पर पैरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चों की योग्यता को पहचानें और उनके भीतर छिपी हुई ईर्ष्या को दूर करने की कोशिश करें. बच्चों का ध्यान उनकी व्यक्तिगत योग्यता और विशेषताओं की ओर आकर्षित करें. इसके अलावा जिन विषयों या क्षेत्रों में वे कमज़ोर हैं, उनमें सुधार करें.

* बच्चों में सोशल जेलेसी होने पर पैरेंट्स को उनकी भावनाएं समझनी चाहिए. उन्हें अकेला छोेड़ने की बजाय उनके साथ समय बिताएं. पैरेंट्स का सपोर्ट उनमें सकारात्मक सोच बढ़ाएगा.

* सिबलिंग के बीच होनेवाले मतभेदों को दूर करना पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है. उनके बीच होनेवाली नकारात्मक बातों पर रोक लगाएं और सभी बच्चों पर पूरा ध्यान दें.

* बच्चों में ईर्ष्या की भावना दूर करने के लिए ज़रूरी है कि घर, स्कूल, पार्क आदि जगहों पर दोस्तों के साथ होनेवाली उनकी बातों को ध्यान से सुनें, जैसे- वे किस बात से ख़ुश हैं, किस बात से परेशान हैं, किसी कारण से उन्हें जलन, तनाव, अवसाद या चिड़चिड़ापन तो नहीं है. इनके पीछे छिपे कारणों को जानने का प्रयास करें. जलन की भावना दूर करने के लिए-

  1. उन्हें महान लोगों के प्रेरक प्रसंग सुनाएं, जिससे उनका खोया हुआ आत्मविश्‍वास वापस लौट आए.
  2. उनमें नकारात्मक विचारों को दूर करके सकारात्मक सोच बढ़ाएं.
  3. उनकी उपलब्धियों को सराहें.

4.अच्छा काम करने पर उन्हें प्रोत्साहित करें.

5.उनके अच्छे सेंस ऑफ ह्यूमर की तारीफ़ करें.

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* ईर्ष्याग्रस्त होने पर बच्चों को अपनी बात अपने फ्रेंड्स या फैमिली मेंबर से शेयर करने के लिए प्रेरित करें, ताकि पैरेंट्स ईर्ष्या का कारण जान सकें.

* यदि बच्चे ईर्ष्या का कारण नहीं बताते हैं, तो उन्हें डायरी में लिखने के लिए कहें. लिखने के बाद पैरेंट्स उसे दो-तीन बार पढ़ने के लिए कहें. ईर्ष्या का कारण जानने के बाद उससे निबटने के तरी़के भी पैरेंट्स व बच्चों को समझ में आने लगेंगे.

* हर बच्चा अपने आप में ख़ास होता है, इसलिए पैरेंट्स बात-बात पर दूसरे बच्चों के साथ उसकी तुलना न करें. बार-बार तुलना करने पर बच्चों के दिमाग़ में यह बात घर कर जाती है कि पैरेंट्स उन्हें प्यार नहीं करते. धीरे-धीरे उनके मन में जलन की भावना बढ़ने लगती है और उनका आत्मविश्‍वास कमज़ोर होने लगता है.

* छोटे बच्चों को समझाना मुश्किल काम होता है, लेकिन कुछ बातों के बारे में उन्हें बताना बहुत ज़रूरी है, जैसे- ईर्ष्या. यदि बच्चे अपने छोटे भाई-बहन से ईर्ष्या करते हैं, तो पैरेंट्स को चाहिए कि प्यार और धैर्य के साथ बड़े बच्चों को समझाएं कि नए सदस्य के आने पर या छोटे भाई-बहनों के कारण उनके प्यार में कोई कमी नहीं आएगी. पैरेंट्स यदि प्यार, धैर्य और विश्‍वास के साथ उन्हें समझाएंगे, तो बच्चे ज़रूर समझेंगे.

* पैरेंट्स और बच्चों के बीच संबंधों की मज़बूती और ईर्ष्या को कम करने के लिए ज़रूरी है कि बच्चों को ‘स्पेशल फील’ कराएं, जैसे- उन्हें घुमाने के लिए बाहर ले जाएं, उनकी फेवरेट चीज़ें उपहार में दें आदि. पैरेंट्स के ऐसा करने से बच्चों को महसूस होगा कि पैरेंट्स अभी भी उनसे उतना ही प्यार करते हैं और उनके साथ समय बिताना चाहते हैं.

* बचपन से ही बच्चों में शेयरिंग की भावना विकसित करें. उन्हें शेयरिंग का महत्व समझाएं. शेयरिंग से वे हमेशा ख़ुश रहेंगे और उनके मन में कभी भी ईर्ष्या पैदा नहीं होगी.

                             – पूनम नागेंद्र शर्मा

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आज हम जिस युग में और जिस तरह की लाइफस्टाइल जी रहे हैं, उसमें हर चीज़ में केमिकल्स (Chemicals) की भरमार है. ऐसे में बेहद मुश्किल है ख़ुद को और अपने बच्चों (Children) को भी इनसे बचाना, लेकिन कुछ कोशिश करके केमिकल्स से बचा भी जा सकता है और उन्हें हेल्दी व सेफ भी रखा जा सकता है.

 How To Protect Your Children

केमिकल्स से बचने के लिए ज़रूरी नहीं कि हर चीज़ ऑर्गैनिक ही ख़रीदें: यह संभव भी नहीं कि हर चीज़ ऑर्गैनिक हो, लेकिन आप अपनी लाइफस्टाइल में थोड़ा-सा बदलाव करके केमिकल्स की चपेट से बच सकते हैं. अपने घर को व बच्चों को ज़हरीले तत्वों के संपर्क में आने से बचा सकते हैं.

नेचुरल हवा आने दें: खिड़की, दरवाज़ों से जितना संभव हो नेचुरल लाइट व हवा आने दें, ताकि अंदर मौजूद प्रदूषण भी बाहर निकल सके. क्रॉस वेंटिलेशन ज़रूरी है.

पर्सनल केयर व क्लीनिंग प्रोडक्ट्स के लेबल्स ज़रूर पढ़ें: ऐसे ब्रान्ड्स लें, जिनमें पैराबेन्स, ऑक्सिबेनज़ोन, पैथालेट्स न हों, क्योंकि ये केमिकल्स एंडोक्राइन सिस्टम में गड़बड़ी पैदा करते हैं. फ्रेग्रेंस फ्री प्रोडक्ट्स बेहतर होते हैं, लेकिन कुछ फ्रेग्रेंसवाले भी ऐसे होते हैं, जो ज़्यादा केमिकल्स यूज़ नहीं करते. एक उपाय यह भी है कि आप घर पर ही केमिकल फ्री सोल्यूशन बनाएं- विनेगर और पानी को समान मात्रा में मिलाएं, साथ ही थोड़ा-सा नींबू का रस भी मिक्स कर लें.

फुटवेयर को कमरे के अंदर न लाएं: आपको अंदाज़ा भी नहीं कि आपके जूते-चप्पल न जाने कितने तरह के ज़हरीले केमिकल्स अपने साथ लाते हैं. बेहतर होगा उन्हें घर या कमरे के बाहर ही रखें.

प्लास्टिक का इस्तेमाल सीमित कर दें: बच्चों को अक्सर आप खाना-पानी प्लास्टिक के टिफिन व बोतल में देती होंगी. इसके अलावा घर पर भी प्लास्टिक का इस्तेमाल होता ही होगा. बेहतर होगा प्लास्टिक की जगह स्टील या कांच का उपयोग बढ़ा दें. प्लास्टिक को माइक्रोवेव में गर्म न करें, न ही प्लास्टिक के बर्तनों में गर्म खाना परोसें. इसके ज़रिए ज़हरीले केमिकल्स आसानी से शरीर में पहुंच जाते हैं.

खिलौनों को समय-समय पर क्लीन करें: खिलौनों को बच्चे मुंह में ले जाते हैं, कभी-कभी रबर के बने खिलौनों को चबाने लगते हैं, इसी तरह प्लास्टिक के खिलौने भी बच्चों के पास होते हैं. बेहतर होगा खिलौनों की क्वालिटी पर ध्यान दें, साथ ही उनकी साफ़-सफ़ाई पर भी. इनके ज़रिए धूल-मिट्टी व कई तरह के केमिकल्स बच्चों के शरीर में पहुंच सकते हैं.

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बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रखें: बच्चे खेल-खेल में क्लीनिंग प्रोडक्ट्स व सोल्यूशन्स की तरफ़ चले जाते हैं और यदि आपका ध्यान न हो, तो वो उन्हें मुंह में भी ले जाते हैं. बच्चों की इस तरह की गतिविधियों पर ध्यान दें और इन प्रोडक्ट्स को उनकी पहुंच से दूर रखें. इन प्रोडक्ट्स को ऊपर शेल्व्स में रखें, जहां तक बच्चे पहुंच न पाएं. बच्चों के सामने भी इन प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल न करें. लापरवाही में इन्हें खुला न छोड़ दें.

हाइजीन की आदत डलवाएं: बच्चों को साबुन से हाथ धोने का महत्व व कब-कब हाथ धोना ज़रूरी हैं, यह भी बताएं. इससे वो बहुत-से हानिकारक केमिकल्स से बच सकते हैं.

किस तरह के केमिकल्स किस रूप में हो सकते हैं?

लेड: बच्चों का पालना, घर का पेंट, कुर्सी, पेंटेड टॉयज़ आदि यदि बहुत पुराने हो चुके हैं या पहले के बने व पेंट किए हुए हैं, तो बहुत हद तक संभव है कि इनमें लेड की मौजूदगी हो. इनका इस्तेमाल न करें.

रैट पॉयज़न, पेस्टिसाइड्स, स्प्रेज़: इन सबको खुले में न छोड़ें, जो बच्चों के हाथ लग जाएं. न ही इस तरह के ज़हरीले स्प्रेज़ का इस्तेमाल मैट, मैट्रेस, चादर आदि पर करें, जिससे बच्चे प्रभावित हो सकें.

बीपीए: यह एक तरह का इंडस्ट्रियल केमिकल होता है, जो कुछ तरह के प्लास्टिक्स बनाने के काम आता है. इस तरह से यह बच्चों तक पहुंच सकता है.

मेडिसिन्स: किसी भी तरह की मेडिसिन्स बच्चों की पहुंच से दूर रखें. ग़लती से वो उन्हें खा सकते हैं. मेडिसिन्स में भी कई तरह के ख़तरनाक केमिकल्स होते हैं, इसलिए कोशिश करें कि बच्चों को इनसे दूर रखें.

अल्कोहल: बच्चों के सामने पार्टीज़ में या कैज़ुअली भी अल्कोहल का सेवन अवॉइड करें और घर पर अल्कोहल रखते हों, तो कोशिश करें कि बच्चों की पहुंच से दूर हों.

फूड एक्स्ट्रैक्ट्स: वेनीला या आल्मंड जैसे फूड एक्स्ट्रैक्ट्स में अल्कोहल हो सकता है, जो बच्चों के लिए काफ़ी हानिकारक हो सकता है. इसी तरह से माउथवॉश भी बच्चों को यूज़ न करने दें, क्योंकि इनमें भी अल्कोहल हो सकता है.

कॉस्मैटिक्स और टॉयलेट्रीज़: बच्चे कॉस्मैटिक्स के प्रति बहुत आकर्षित होते हैं, लेकिन आपकी लिपस्टिक से लेकर परफ्यूम, हेयर डाय, आईलाइनर, नेलपॉलिश आदि तक केमिकल्स से भरपूर होते हैं. इसी तरह से शू पॉलिश, टॉयलेट क्लीनर्स, फर्नीचर पॉलिश, डिश क्लीनर्स, फेस वॉश, सोप्स, हैंड सैनिटाइज़र्स आदि में भी काफ़ी केमिकल्स होते हैं, इन्हें बच्चों की पहुंच से दूर ही रखें. ये उनकी सेहत को प्रभावित कर सकते हैं.

अनहेल्दी खाना व केमिकल से पके फल/सब्ज़ियां: कैन्ड फूड, प्रिज़र्वेटिव्स से भरपूर फूड, एरिएटेड ड्रिंक्स, नकली पके फल-सब्ज़ियों से भी बच्चों को बचाना ज़रूरी है. बेहतर होगा फल-सब्ज़ियों को अच्छी तरह से धोकर और यदि संभव हो, तो छीलकर खाएं, इससे केमिकल का असर कम होगा.

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कैसे बचाव करें?

* घर को पूरी तरह से केमिकल फ्री करना तो संभव नहीं, लेकिन कुछ प्रयास कर सकते हैं.

* कभी भी वॉशिंग पाउडर, सोडा, फिनाइल जैसी चीज़ें खाली फूड कंटेनर्स में भरकर न रखें. बच्चा ग़लती से इन्हें खाने की चीज़ समझ सकता है.

* बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रखें. बहुत ज़्यादा मोबाइल/कंप्यूटर आदि पर न खेलने दें, उनमें से भी केमिकल व हानिकारक वेव्स व रेज़ निकलती हैं.

* हेल्दी ईटिंग हैबिट्स और हाइजीन की आदत डालें. टॉयलेट यूज़ करने के बाद, खाना खाने से पहले, खाना खाने के बाद, बाहर से खेलकर आने पर, पब्लिक प्लेस से आने के बाद, डोर के हैंडल्स, लैचेस आदि यूज़ करने के बाद साबुन से हाथ धोने की आदत डलवाएं. रिसर्च बताते हैं कि इन हेल्दी हैबिट्स से बच्चे फ्लू, डायरिया, टायफॉइड व अन्य कई तरह की बीमारियों से काफ़ी हद तक बच सकते हैं व स्कूल में भी उनकी अनुपस्थिति में कमी आने लगती है.

* खिलौने ख़रीदते व़क्त ध्यान रखें कि अच्छे ब्रांड के ही लें. सस्ते प्लास्टिक से बने खिलौने अवॉइड करें. बच्चे इन्हें मुंह में डालते हैं, जिससे उन्हें नुक़सान हो सकता है.

– ब्रह्मानंद शर्मा

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