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बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताने के 11 आसान तरी़के (10+ Ways To Spend Quality Time With Your Kids)

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी हैरान हूं मैं… तेरे मासूम सवालों से परेशान हूं मैं… सच है, कई बार बच्चे व ज़िंदगी में हम इस कदर उलझ जाते हैं कि किससे सवाल करें, किसे जवाब दें… पर यह तो जगज़ाहिर है कि बच्चे मासूम होते हैं, वे इस गणित से परे होते हैं… उन्हें तो बस साथ चाहिए, प्यार चाहिए… और पैरेंट्स का साथ तो मानो सारे जहां की ख़ुशियां… आइए, जानते हैं कुछ स्मार्ट ट्रिक्स, जिसे अपनाकर पैरेंट्स बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिता सकते हैं. 

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बच्चे तो बच्चे होते हैं, उन्हें चाहे सारी दुनिया की ख़ुशियां दे दो, पर उन्हें पैरेंट्स का साथ सबसे अधिक प्रिय होता है. यही हाल अभिभावकों का भी होता है. माता-पिता दोनों चाहते हैं कि अपने बच्चे को ढेर सारा प्यार, ख़ुशियां और समय दें, पर ऐसा कम ही हो पाता है, ख़ासकर समय के मामले में. वर्किंग कपल्स के साथ यह समस्या अधिक होती है. यहां पर हम कुछ आसान तरी़के बता रहे हैं, जिससे आप अपने बच्चों के साथ अधिक क्वालिटी समय बिता सकेंगे.

  1. मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करें

जब भी आप बच्चों के साथ रहें, मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करें या फिर बहुत ज़रूरी हो, तभी करें. इस तरह आप बच्चों के साथ अधिक क्वालिटी टाइम बिता सकेंगे. बच्चे भी ख़ुशी-ख़ुशी अपने दिनभर की एक्टिविटीज़ के बारे में आपको बताएंगे, जैसे- उन्होंने दिनभर क्या किया, स्कूल में कैसा समय बीता, कोई परेशानी हुई हो, तो उसे भी ज़रूर बताएंगे. ध्यान रहे, जब वे ऐसा कर रहे हों, तो उस समय भूल से भी अपने मोबाइल फोन पर कोई ज़रूरी काम न करते रहें, बल्कि कुछ समय के लिए ख़ुद को फोन से डिसकनेक्ट कर लें. बच्चों को यह बिल्कुल पसंद नहीं होता कि पैरेंट्स उनसे बातचीत करते समय फोन पर बिज़ी रहें. अतः इस बात का ख़्याल रखें.

  1. शॉपिंग में कटौती की जा सकती है

इसमें कोई दो राय नहीं कि आज शॉपिंग करना लोगों का पसंदीदा काम बन गया है, लेकिन बच्चों के साथ अधिक अच्छा समय बिताने के लिए इसमें भी कटौती की जा सकती है. स्मार्ट शॉपिंग का तरीक़ा अपनाएं यानी घर से बाहर जाकर शॉपिंग करने की बजाय आप ऑनलाइन शॉपिंग कर सकते हैं. इसके अलावा ज़रूरी सामानों के लिए होम डिलीवरी की भी सुविधा ली जा सकती है. इससे आप बच्चों के साथ अधिक क्वालिटी टाइम बिता सकेंगे.

  1. घर की बजाय बच्चों पर अधिक ध्यान दें

अक्सर हम घर की साफ़-सफ़ाई, अन्य ग़ैरज़रूरी कामों में बेवजह का अधिक समय ख़र्च कर देते हैं, ऐसा न करें. यह ज़रूरी नहीं कि घर के सभी काम आपको ही करना है. आप मेड रख सकते हैं. इसके अलावा घर के अन्य सदस्य, ख़ासकर पति-पत्नी आपस में काम बांट सकते हैं. इस तरह वे बच्चों के साथ अधिक समय बिता सकेंगे.

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  1. सोशल साइट्स को भी विराम दें

आजकल हर किसी का सोशल साइट्स, जैसे- फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर, व्हाट्सऐप आदि पर अधिक समय बिताना शग़ल-सा बन गया है. यदि आपको भी यह बीमारी है, तो इसका तुरंत इलाज कराएं. इन सबका कम इस्तेमाल करें. उस समय को बच्चे के साथ खेलने, घूमने-फिरने, मौज-मस्ती करने में बिताएं. इन सबसे बच्चे पैरेंट्स से अधिक जुड़ते हैं और पैरेंट्स को भी संतुष्टि रहती है कि वे बच्चों को पर्याप्त समय दे रहे हैं.

  1. बच्चों के साथ मिलकर काम करें

अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों से काम लेना पसंद नहीं करते, जो ठीक नहीं है. वे खाना बनाने से लेकर साफ़-सफ़ाई करने, पौधों को पानी देने आदि छोटे-मोटे काम करते समय बच्चों की मदद ले सकते हैं. उनके साथ मिलकर काम करने से दो फ़ायदे होंगे, एक तो काम जल्दी हो जाएगा और दूसरा आप बच्चों के साथ अधिक से अधिक समय बिता सकेंगे.

  1. ऑफिस के बाद बच्चों का साथ

पैरेंट्स ऑफिस से आने के बाद तुरंत टीवी पर सीरियल, न्यूज़, मनोरंजन आदि में बिज़ी न हो जाएं, बल्कि सबसे पहले थोड़ा-सा समय बच्चों को ज़रूर दें. इसके लिए चाहे आपको अपने पसंदीदा टीवी सीरियल का भी त्याग क्यों न करना पड़े या फिर ज़रूरी न्यूज़ ही क्यों न छूट जाए… पर ऐसा करके आप अपने बच्चे के क़ीमती बचपन को और भी निखार-संवार सकते हैं.

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  1. वीकेंड बच्चों की चॉइस

हर हफ़्ते शनिवार की शाम या रात बच्चों की इच्छानुसार बिताएं. फिर चाहे वो कोई मूवी देखना हो या बाहर डिनर करना या फिर रविवार को पिकनिक ही मनाना क्यों न हो. इससे बच्चों के साथ आपकी बॉन्डिंग भी मज़बूत होगी और सभी एनर्जेटिक भी महसूस करेंगे.

  1. बच्चों के साथ करें एक्सरसाइज़

यदि आप मॉर्निंग वॉक, जिम, योग आदि करते हैं, तो बच्चों को भी इसमें इन्वॉल्व करें. इससे फैमिली की फिटनेस और क्रिएटिविटी बढ़ेगी और पैरेंट्स-बच्चों का रिश्ता भी बेहतर होगा.

  1. गार्डनिंग मिलकर करें

बच्चों को गार्डनिंग का भी ख़ूब शौक़ होता है. आप उनके साथ मिलकर बागवानी कर सकते हैं. इससे जहां उन्हें फूल-पौधों की जानकारी मिलेगी, वहीं उनका बौद्धिक विकास भी होगा.

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  1. अपने व बच्चे के शौक़ को साझा करें

व़क्त के साथ बहुत कुछ बदला है, यहां तक कि बच्चे व पैरेंट्स के शौक़ भी मिलते-जुलते से हो गए हैं. ऐसा बहुत बार देखा गया है कि मां भी बेटी के साथ म्यूज़िक, डांस, कुकिंग आदि सीख रही है, तो वहीं पिता भी बेटे के साथ स्विमिंग, ट्रैकिंग, गिटार, तबला आदि में हाथ आज़मा रहे हैं. इस तरह बच्चे-अभिभावक दोनों ही जहां अपने शौक़ को पूरा करते हैं, वहीं एक-दूसरे के साथ बहुत अच्छा समय भी बिता पाते हैं.

  1. कभी बच्चों के साथ बच्चे बन जाएं

यह ज़रूरी नहीं कि आप हमेशा अपने बड़े होने का मुखौटा ओढ़े रहें. कभी-कभी अपने मैच्योरिटी के आवरण को हटाकर बच्चों की तरह हो जाएं. उनके साथ हर वो काम करें, जो उन्हें पसंद हैं, फिर चाहे वो खिलौनों से खेलना हो, ड्रॉइंग करना, क्राफ्ट, मिट्टी से घर बनाना हो, साइकिलिंग करना या वीडियो गेम खेलना. इससे बच्चे को बेइंतहा ख़ुशी मिलेगी और वे आपको अपना प्यारा दोस्त भी समझने लगेंगे.

बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना बेहद ज़रूरी है…

पैरेंट्स को यह समझना होगा कि बच्चों को हर तरह की सुविधा व महंगी चीज़ें देना, उनकी सभी डिमांड मान लेना ही अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा कर देना नहीं है. इन सबसे बढ़कर ज़रूरी है बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि आप अपने बच्चों के साथ जितना अधिक समय बिताएंगे, उतना आप उनके क़रीब आएंगे. एक रिसर्च के अनुसार, बच्चों में 75% इंफेक्शनल डिसीज़ उनके शुरुआती पांच सालों में होती हैं. अतः अभिभावक इस दौरान बच्चों के भावनात्मक पहलुओं पर अधिक ध्यान दें और उन्हें अधिक से अधिक समय दें. बच्चों को सब कुछ सहज होकर सीखने दें. उन पर बेवजह का दबाव न डालें. उनकी परवरिश ख़ुशनुमा माहौल में करें. उनकी पसंद, शौक़ और भावनाओं को समझने की कोशिश करें और उन्हें पर्याप्त समय दें, क्योंकि यही वो समय होता है, जब बच्चों के व्यक्तित्व की पुख़्ता नींव रखी जाती है.

– ऊषा गुप्ता

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दबाव नहीं, प्रेरणा ज़रूरी (Don’t Pressurize, Rather Encourage Your Children)

Encourage Your Children

किसी भी काम को करवाने के लिए बच्चों (Children) को सज़ा या लालच देने की बजाय उन्हें प्रेरणा दी जाए तो उसके परिणाम बेहतर होंगे. उन्हें डराने-धमकाने से बात नहीं बनने वाली. बच्चों, ख़ासतौर पर टीनएज बच्चों की सही तरी़के से परवरिश के लिए पैरेंटिंग के कुछ मूल मंत्रों का ज्ञान होना ज़रूरी है.

क्या आपका बच्चा भी अपनी उम्र के पहले या दूसरे दशक से गुज़र रहा है? क्या आपको उसे ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए रास्ता दिखाने में परेशानी होती है? क्योंकि वो कुछ सुनना या समझना नहीं चाहता? वास्तव में यह उम्र बच्चों के लिए काफ़ी उथल-पुथल भरी होती है. वे कई तरह के शारीरिक व मानसिक बदलावों से गुजर रहे होते हैं. वे अपनी पहचान तलाश रहे होते हैं. इसलिए उन्हें अपनी बातें सही लगती हैं और बाक़ी दुनिया ग़लत. दूसरी तरफ़ अभिभावक चाहते हैं कि बच्चे उनकी बात सुनें. इसके लिए वे उन्हें कभी लालच देते हैं, तो कभी सज़ा. लेकिन ये तरी़के सही नहीं हैं. आपको कुछ ऐसे तरी़के अपनाने होंगे, जिनसे वे ख़ुद ही चीज़ों को करने के लिए प्रेरित हों.

कमियां निकालने की बजाय उसकी प्रशंसा करें

यदि आप बच्चे को सही मायने में प्रोत्साहित करना चाहते हैं तो उस पर अपनी मर्ज़ी न थोपें. आपका बच्चा जो कुछ भी हासिल करता है, उस पर गर्व करना बहुत ज़रूरी है. उदाहरण के लिए यदि आपके बेटे ने डांस क्लास में अच्छा प्रदर्शन किया है, तो उसकी प्रशंसा करें. ऐसे ही अगर बेटी कुछ आर्ट में रुचि दिखाती है तो उसकी सराहना करें.

जबरन बहुत सारी गतिविधियों का हिस्सा न बनाएं

बच्चों को कुछ समय के लिए फ्री भी रहने दें. वैसे भी वे स्कूल में काफ़ी व्यस्त रहते हैं. वे भी ख़ुद के लिए समय चाहते हैं. उन्हें ढेर सारी गतिविधियों का हिस्सा न बनाएं. किसी भी गतिविधि का हिस्सा बनाने से पहले बच्चों की क्षमता को समझें. ऐसा करने से बच्चा भी ख़ुश रहेगा.

निर्णय लेने का मौक़ा दें

बच्चों का सही विकास तभी हो सकता है, जब वे अपने फ़ैसले ख़ुद लेना सीखते हैं. अगर आपकी बेटी ड्रॉइंग सीखना चाहती है और आप चाहते हैं कि वह डांस सीखे तो बेहतर होगा कि उसे मन-मुताबिक़ ड्रॉइंग ही सीखने दें, क्योंकि निर्णय थोपने से वो मन मारकर काम करेगी और आपको मनचाहा परिणाम नहीं मिलेगा.

यह भी पढ़े: बेटी की शादी का ख़र्च बड़ा हो या पढ़ाई का? (Invest More In Your Daughter’s Education Rather Than Her Wedding)

हार को स्वीकार करना सिखाएं

बच्चों को अपनी हार स्वीकारना सिखाएं. उन्हें हारने से डराने की बजाय डटकर लड़ने और हर तरह की परिस्थिति का सामना करने के गुर सिखाएं. उनसे कहें कि चिंता मत करो, जीवन में आगे बढ़ने के और भी मौ़के मिलेंगे.

दूसरों से तुलना न करें

हर बच्चा अपनेआप में अलग होता है और हर बच्चे की सीखने और आगे बढ़ने की गति अलग-अलग होती है. ज़रूरी नहीं कि आपके दोस्त के बच्चे की तरह ही आपका बच्चा भी क्लास में अव्वल आए. हो सकता है आपके बच्चे में कोई ऐसा गुण हो, जो उसके बाक़ी साथियों में न हो. अतः दूसरों से अपने बच्चे की तुलना न करें.

प्रेरणास्रोत बनें

बच्चे अपने माता-पिता को बहुत ध्यान से देखते हैं. अगर आप अपने बच्चे से कुछ चाहते हैं तो उसे स़िर्फ बताने की बजाय करके दिखाएं. बच्चे देखकर ज़्यादा सीखते हैं.  आप जिस तरह का व्यवहार करेंगे, बच्चा वही सीखेगा. अतः आप बच्चे को जैसा बनाना चाहते हैं, वैसा ख़ुद बनकर दिखाएं. अपने बच्चे की भावनाओं को समझें. ऐसा करने पर वो भी आपकी इच्छाओं का सम्मान करेगा.

– शिल्पी शर्मा

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बेटी की शादी का ख़र्च बड़ा हो या पढ़ाई का? (Invest More In Your Daughter’s Education Rather Than Her Wedding)

Daughter’s Education

हमारे देश में आज भी बेटी की पढ़ाई (Daughter’s Education) से ज़्यादा उसकी शादी (Wedding) पर ख़र्च किया जाता है. यदि पढ़ाई और शादी में से कोई एक विकल्प चुनना हो, तो अधिकतर माता-पिता बेटी की शादी के ख़र्च को प्राथमिकता देते हैं. क्या ऐसा करना उचित है? क्या बेटी की शादी का ख़र्च उसकी पढ़ाई से ज़्यादा ज़रूरी है?

हमारे देश में बेटी के जन्म पर आज भी चेहरे मुरझा जाते हैं और जन्म के साथ ही बेटी के भविष्य की नहीं, उसकी अच्छे घर में शादी की चिंता माता-पिता के चेहरे पर दिखाई देने लगती है. जन्म लेते ही बेटी को पराया धन मान लिया जाता है और पराया धन समझकर ही उसकी परवरिश की जाती है.

ये है सोच का असर

सदियों से हम ये बातें सुनते आ रहे हैं कि बेटियां तो पराया धन हैं, शादी के बाद इन्हें दूसरे घर जाना है… बेटियों को पढ़ाकर क्या होगा, ज़्यादा पढ़ लेंगी तो शादी में और दिक्कत होगी, लड़का ढूंढ़ना मुश्किल हो जाएगा… बेटियों को घर के कामकाज सिखाओ, तभी ससुराल में सबका दिल जीत पाएंगी… बेटियों के भविष्य की रूपरेखा आज भी इतना डर-सहमकर तैयार की जाती है कि एक इंच भी इधर-उधर सोचने से माता-पिता घबरा जाते हैं. बेटी को जैसे-तैसे पाल-पोषकर उसके ससुराल पहुंचा देने के बाद ही माता-पिता राहत की सांस ले पाते हैं, तब तक उन पर समाज और रिश्तेदारों का इतना दबाव बना रहता है कि वे अपनी और बेटी की इच्छाओं के बारे में कुछ सोच ही नहीं पाते.

दहेज है सबसे बड़ा कारण

बैंक कर्मचारी अंजलि गुप्ता कहती हैं, “दरअसल,  माता-पिता पर बेटियों की शादी पर होने वाले खर्च का दबाव दहेज के कारण आता है. न चाहते हुए भी मजबूरन माता-पिता को अपनी हैसियत से बढ़कर बेटी की शादी में ख़र्च करना पड़ता है, जिसके कारण वो अपनी कई ज़रूरतों में कटौती करते हैं, कर्ज़ लेते हैं. ऐसे में बेटी की पढ़ाई और करियर प्रभावित होना स्वाभाविक है. बेटी जितना ज़्यादा पढ़ेगी, उतना ज़्यादा पढ़ा-लिखा लड़का उसके लिए ढूंढ़ना पड़ता है और जितना काबिल लड़का, उतना ज़्यादा दहेज… इस डर से बेटियों के माता-पिता उन्हें ज़्यादा पढ़ाने से भी डरते हैं. बेटी की शादी की चिंता उसके अभिभावकों को इतनी ज़्यादा होती है कि उसकी तैयारी में वे अपनी बेटी के हुनर, उसकी काबीलियत पर भी ध्यान नहीं दे पाते. सख़्त क़ानून बन जाने के बाद भी दहेज के लेन-देन का सिलसिला बदस्तूर जारी है. जब तक दहेज का लेन-देन बंद नहीं होगा, तब तक बेटियों की स्थिति में सुधार नहीं हो सकता.”

कहां है औरत का घर?

स्कूल टीचर रितु सोनी कहती हैं, “मेरी सास अक्सर मेरे बेटे और बेटी में भेदभाव करती हैं. बात-बात पर बेटी को ये एहसास दिलाती हैं कि ये उसका घर नहीं है. मेरी 8 साल की बेटी जब अपनी सहेलियों से कहती है कि आज हम सब हमारे घर में खेलेंगे, तो मेरी सास फ़ौरन उसे टोक देती है कि ये तेरा घर नहीं, तेरे भैया का घर है. तेरा घर तो न जाने कहां होगा. मेरी सास की ऐसी बातों से मेरी बेटी बहुत चिढ़ जाती है. वो बार-बार मुझसे ये सवाल करती है कि मां, क्या ये सच में मेरा घर नहीं है. उसके मासूम सवाल सुनकर मैं अक्सर सोचती हूं कि आख़िर कहां है औरत का घर? मायकेवाले कहते हैं कि अपने शौक़ अपने घर (ससुराल) जाकर पूरे करना और ससुरालवाले कहते हैं कि अपने घर में ठाठ कर लिए, अब ससुराल की ज़िम्मेदारियां संभालो… तो कहां है औरत का घर, कौन समझता है उसकी भावनाओं को, उसकी पीड़ा को..? हम कितनी भी बड़ी-बड़ी बातें कर लें, लेकिन लोगों की सोच बदलने में अभी भी बहुत व़क्त लगेगा. बेटियों की स्थिति अभी भी बहुत अच्छी नहीं है. आज भी सब को जैसे-तैसे बेटियों को ससुराल भेज देने की जल्दी रहती है, उसके भविष्य, उसकी इच्छाओं-आकांक्षाओं के बारे में कोई नहीं सोचता. बेटी की शादी में भले ही कर्ज़ लेकर ख़र्च कर लेंगे, लेकिन उसकी पढ़ाई या करियर पर कोई ख़र्च नहीं करना चाहता.”

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शुरुआत घर से होनी चाहिए

मीडिया प्रोफेशनल समीक्षा भट्ट कहती हैं, “मेरी बेटी पढ़ाई में मेरे बेटे से बहुत अच्छी है. वो हमेशा क्लास में अव्वल आती है. फिर जब उसने आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाने का ़फैसला किया, तो घर में बहस छिड़ गई. मेरे सास-ससुर का कहना था कि इसकी पढ़ाई पर इतने पैसे फूंक देंगे, तो शादी का ख़र्च कहां से लाएंगे. मेरे पति भी उसे पढ़ाई के लिए विदेश भेजने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन मैंने और मेरे बेटे ने ज़िद पकड़ ली. मुझे बहुत अच्छा लगा जब मेरे बेटे ने अपनी बहन के लिए घर में आवाज़ उठाई और ये माना कि उसकी बहन उससे ज़्यादा काबिल है, इसलिए उसे विदेश जाकर पढ़ाई करने का पूरा हक़ है. मेरे ख़्याल से यदि हम अपने बच्चों को घर में सही माहौल दें और बेटा-बेटी में कोई फ़र्क़ न करें, तो बेटियों के लिए आगे बढ़ने के रास्ते बेहद आसान हो जाएंगे. आज मेरी बेटी इतनी सक्षम है कि अपने साथ-साथ अपने भाई के भविष्य के ़फैसले भी ख़ुद लेती है और उसका भाई हर समय उसके साथ खड़ा रहता है.”

एक पहल ऐसी

प्रोफेसर डॉ. रागिनी सिंह अपने कॉलेज की हिंदी डिपार्टमेंट की हेड हैं. पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहीं और आज अपनी मेहनत से इस मुक़ाम पर हैं. जब घर में उनकी शादी की बात चलने लगी, तो लड़केवालों की तरफ़ से दहेज की लंबी-चौड़ी फ़रमाइश भी आने लगी. ऐसे में रागिनी ने एक ़फैसला किया, उन्होंने घर में साफ़ कह दिया कि वो उसी लड़के से शादी करेंगी, जो दहेज नहीं लेगा. शादी में देरी ज़रूर हुई, लेकिन आज रागिनी की शादी एक ऐसे लड़के से हुई है, जो न स़िर्फ उन्हें समझता है, बल्कि उनके प्रोफेशन की भी इज़्ज़त करता है. रागिनी और उसके परिवार की तरह ही लोगों को अपनी सोच बदलने की ज़रूरत है. बेटी की शादी करने से पहले उसे इतना काबिल बना दें कि वो अपनी एक अलग पहचान बना सके, अपनी ज़िंदगी के फैसले ख़ुद ले सके.

ये बदलाव ज़रूरी है 

आज भी कई घरों में बेटियों को बात-बात पर ये एहसास दिलाया जाता है कि वो बेटों से कम हैं. उनके हंसने-बोलने, उठने-बैठने के लिए अलग नियम बनाए जाते हैं. उन्हें ये बताया जाता है कि वो लड़कों से कमज़ोर हैं, इसलिए उन्हें हर बात चुपचाप सहन कर लेनी चाहिए. ऐसे माहौल में बेटियों का आत्मविश्‍वास कमज़ोर हो जाता है और वो ये मानने लग जाती हैं कि वो वाकई कमज़ोर हैं. ऐसे में जब उनके साथ कोई अन्याय या अत्याचार होता है, तो लड़कियां अपने ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठा पातीं. वहीं घर के लड़के ये मान लेते हैं कि घर के सर्वेसर्वा वही हैं, घर के हर ़फैसले उनके अनुरूप ही होंगे. ऐसे में वो महिलाओं का सम्मान नहीं करते और घर के बाहर भी महिलाओं के साथ बदसलूकी करते हैं. महिलाओं के सम्मान और उनकी स्थिति में सुधार की शुरुआत घर से ही होनी चाहिए. सरकार बेटियों की स्थिति में सुधार लाने के लिए सुकन्या समृद्धि योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी कई मुहिम चला रही है, लेकिन इसकी शुरुआत जब तक घर से नहीं होगी, तब तक कुछ नहीं हो सकता. यदि आप अपने बेटे और बेटी को एक जैसी परवरिश देते हैं, उनमें कोई भेदभाव नहीं करते, तो बेटियों की स्थिति में अपने आप सुधार आ जाएगा. फिर आपको बेटी की शादी के ख़र्च की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं होगी, क्योंकि आपकी आत्मनिर्भर, सक्षम बेटी अपनी ज़िंदगी की राह ख़ुद बना लेगी, वो भी अपने दम पर.

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क्या कहते हैं आंकड़े?

* पिछले 3 सालों में दहेज के कारण 24, 771 महिलाओं की मौत हुई है और 8 लाख से भी ज़्यादा मामले धारा 304 बी यानी डाउरी डेथ के तहत दर्ज हुए हैं.

* दहेज़ के कारण हुई मौतों में सबसे आगे है उत्तर प्रदेश, फिर बिहार और फिर मध्यप्रदेश.

* नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक़ 3. 48 लाख मामले पति और उनके परिवार द्वारा घरेलू हिंसा के दर्ज हुए हैं.

* भारत में हर तीन लड़की में से एक की शादी 18 साल की उम्र से पहले करवा दी जाती है.

* एक सर्वे के मुताबिक़ 41% लड़कियां 19 की उम्र पार करते-करते किसी न किसी अत्याचार या घरेलू हिंसा का शिकार हो जाती हैं.

शादी का ख़र्च स्टेटस सिंबल है

हमारे देश में शादियों पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है. लोग शादी के ख़र्च को अपने स्टेटस से जोड़कर देखते हैं. इसीलिए कई लोग कर्ज़ लेकर भी शादी पर ख़र्च करते हैं. उस पर यदि बेटी की शादी हो, तो दहेज का ख़र्च और बढ़ जाता है. ससुरालवालों की फरमाइश और दहेज की लिस्ट इतनी लंबी होती है कि उन्हें पूरा करते-करते लड़कीवालों की कमर टूट जाती है. बेटी चाहे कितनी ही काबिल क्यों न हो, फिर भी उसके माता-पिता को उसकी शादी में दहेज देना ही पड़ता है.

– कमला बडोनी

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कहीं आपके बच्चे को नशे की लत तो नहीं? (Does Your Child Have An Addiction Problem?)

Child Addiction Problems

बच्चों की परवरिश करना किसी चुनौती से कम नहीं है. जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगते हैं, उनके स्वभाव और व्यवहार में बदलाव आने लगता है. ये बदलाव इतने साधारण होते हैं कि पैरेंट्स इन्हें समझ ही नहीं पाते हैं या फिर किशोरावस्था का कारण समझकर चुप रह जाते हैं और इन संकेतों को नज़रअंदाज़ करने लगते हैं. पर क्या पैरेंट्स यह जानते हैं कि उनकी यह अनदेखी उनके बच्चों को नशे का शिकार बना रही है.

पता लगाएं कि बच्चा नशा तो नहीं करता

किशोर बच्चे अपना अधिकतर समय स्कूल-कॉलेज और कोचिंग क्लासों में अपने दोस्तों के साथ बिताते हैं. उनके साथ समय बिताते हुए कई बार वे ग़लत संगत में पड़ जाते हैं और नशा करने लगते हैं, जिसका पैरेंट्स को अंदाज़ा भी नहीं होता. हम यहां पर कुछ ऐसे संकेत दे रहे हैं, जिनसे पैरेंट्स यह अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कहीं उनका बच्चा नशे के शिकंजे में तो नहीं फंस रहा है.

* बच्चा यदि स्कूल-कॉलेज और कोचिंग क्लास ख़त्म होने के बाद घर आने की बजाय इधर-उधर चला जाए.

* जब बच्चा देरी से घर आने लगे.

* अगर वह रात को अपने दोस्तों के घर रुकने के लिए पैरेंट्स पर दबाव बनाने लगे.

* बच्चा जब ज़रूरत से ज़्यादा पॉकेटमनी मांगने लगे.

* जब वह अधिकतर समय अकेले बिताने लगे या फिर आपकी उपस्थिति उसे खलने लगे.

* नशे की तलब लगने पर पैरेंट्स को बिना बताए घर से चला जाए.

* घर के ज़रूरी कामों को छोड़कर बच्चा जब अचानक उठकर बाहर चला जाए.

* जो बच्चा पहले कभी माउथफ्रेशनर इस्तेमाल नहीं करता था और अब अचानक च्युंगम, टॉफी, सौंफ, हरी इलायची आदि खाना शुरू कर दे, तो पैरेंट्स को इस बात को हल्के में नहीं लेना चाहिए. हो सकता है उनका बच्चा नशे की दुर्गंध को छिपाने के लिए माउथफ्रेशनर इस्तेमाल कर रहा हो.

* बच्चे के स्कूल-कॉलेज आदि जगहों से आने के बाद अगर उसके मुंह से माउथफ्रेशनर की ख़ुशबू आए, तो भी पैरेंट्स सावधान हो जाएं.

* जब बच्चा पैंरेट्स से दूर से बात करे, इसका अर्थ है कि बच्चा आपसे मुंह की दुर्गंध को छिपाने की कोशिश कर रहा है.

* बच्चे के पॉकेट या बैग से माचिस, लाइटर या रोल किया हुआ कोई काग़ज़ मिले.

* उसके चेहरे को, विशेष रूप से उसकी आंखों को ग़ौर से देखें.

* अगर बच्चा दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होता जा रहा हो या फिर अपनी डायट से ज़्यादा खा रहा हो.

उपरोक्त बताई गई बातें स़िर्फ एक संकेत हैं, ज़रूरी नहीं कि आपका बच्चा नशे की गिरफ़्त में हो. बच्चे से पूरी बात जानने-पूछने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचें.

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पैरेंट्स कैसे करें तहकीकात?

* अगर आपको शक है कि आपका बच्चा नशे का आदी हो रहा है, तो सबसे पहले उसके फ्रेंड्स और टीचर्स आदि से संपर्क करें.

* बिना बताए उसके स्कूल, कॉलेज और कोचिंग सेंटर में पहुंच जाएं.

* वहां पर बच्चा आपको देख ले, तो उससे छिपने की बजाय बात करें.

* ऐसा कोई बहाना बनाएं, जिससे उसको असलियत का पता न चले.

* इस बात का विशेष ध्यान रखें कि सोशल मीडिया में वह किस तरह की पोस्ट करता है.

* आजकल के बच्चे सोशल मीडिया पर  सबसे ज़्यादा एक्टिव रहते हैं, इसलिए उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर पैनी नज़र रखें.

* अगर बच्चा हॉस्टल में रहता है, तो वहां के वॉर्डन, टीचर्स, फें्रड्स आदि से बच्चे की गतिविधियों के बारे में पूछें.

* अगर पैरेंट्स को यह संदेह है कि उनका बच्चा नशे के शिकंजे में फंसता जा रहा है, तो उसे डांटने-मारने की बजाय प्यार से समझाएं.

* उसे इस बात का एहसास कराएं, ‘आपको उसकी ज़रूरत है, आप उससे बहुत प्यार करते हैं’.

* पैरेंट्स को भी समझना चाहिए कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ बच्चों को आज़ादी ज़रूर दें, लेकिन वे इस आज़ादी का नाजायज़ फ़ायदा न उठाएं. आज़ादी देने के साथ-साथ उन पर पैनी नज़र भी रखें.

बच्चे में दिखें ये लक्षण, तो पैरेंट्स हो जाएं सावधान

इन लक्षणों को ध्यान में रखकर पैरेंट्स अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उनका बच्चा कहीं नशे का आदी तो नहीं हो रहा है-

* चिड़चिड़ापन, बेचैनी, घबराहट, पसीना और ग़ुस्सा आना.

* नींद न आना, शरीर में ऐंठन होना, सिर में तेज़ दर्द होना, भूख कम लगना.

* अचानक मूड स्विंग होना, छोटी-छोटी बातों पर कंफ्यूज़ होना, मानसिक तनाव होना आदि.

बच्चे में अगर उपरोक्त लक्षण दिखाई दें, तो ज़रूरी नहीं कि वह नशे का शिकार हो. ये लक्षण किसी अन्य बीमारी के भी हो सकते हैं, पर पैरेंट्स का अलर्ट होना बहुत ज़रूरी है.

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बच्चे क्यों फंस जाते हैं नशे के शिकंजे में?

बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि-

* अधिकतर बच्चे अपने दोस्तों के उकसाने पर नशे की शुरुआत करते हैं. जब बच्चा अपने दोस्तों को नशा करते हुए देखता है, तो उसके मन में भी नशे को टेस्ट करने की जिज्ञासा उठने लगती है और धीरे-धीरे वह नशे के शिकंजे में फंसता चला जाता है.

* जब बच्चा परिवार में अपने किसी बड़े को नशा (स्मोकिंग या ड्रिंक) करते हुए देखता है, तो उसके मन में भी नशे का स्वाद चखने की इच्छा उठने लगती है.

* नशे के मायाजाल में फंसने का एक कारण फिल्में और टेलीविज़न भी है. दरअसल, जब बच्चे फिल्म और टीवी कलाकारों को नशा करते हुए देखते हैं, तो वे भी उनकी नकल करने की कोशिश करने लगते हैं.

* वर्किंग पैरेंट्स होने के कारण बच्चों के साथ  क्वालिटी टाइम न बिताना, मार्गदर्शन न करना, अनचाही डिमांड को पूरी करना, दोस्तों की तरफ़ ध्यान न देना आदि ऐसे अनेक कारण हैं, जिनके कारण बच्चे ग़लत संगति में पड़ जाते हैं.

पैरेंट्स कैसे करें नशे की गिरफ़्त में फंसे बच्चे की मदद?

* अगर बच्चा नशे का आदी है, तो सबसे पहले उसे ख़ुद पर नियंत्रण रखना सिखाएं.

* उसे समझाएं कि जब भी उसका मन नशा करने का करे, तो अपना ध्यान वहां से हटाकर कहीं और लगाने का प्रयास करे.

* जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगते हैं, उनके दोस्तों का दायरा भी बढ़ने लगता है. अत: ग़लत संगति से बचाने के लिए ज़रूरी है कि उसे बिना बताए उसके दोस्तों पर कड़ी नज़र रखें.

* नशे की गिरफ़्त से बचाने के लिए ज़रूरी है कि बच्चे को नशे के दुष्परिणामों के बारे में विस्तार से बताएं.

* किसी ऐसे व्यक्ति का उदाहरण देकर समझाएं,  जिसका जीवन नशे के कारण बर्बाद हो गया हो.

* पैरेंट्स को भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों से कभी भी नशेवाली चीज़ें न मंगवाएं.

* घर में होनेवाली पार्टियों और घर आए मेहमान के सामने नशेवाली चीज़ें सर्व न करें.

* कभी भी बच्चे के सामने नशा न करें. इससे उसके मन में इन चीज़ों के प्रति जिज्ञासा पनपने लगती है.

* अगर घर में कॉकटेल पार्टियां होती हैं, तो बच्चे को वहां से हटाकर अन्य गेम्स आदि में व्यस्त रखें.

* यदि बच्चा नशे की आदत नहीं छोड़ पा रहा है, तो बिना समय बर्बाद किए काउंसलर और एक्सपर्ट्स की सलाह लें.

* यदि स्थिति दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही हो, तो बच्चे को नशा मुक्ति केंद्र ले जाएं.

                            – पूनम नागेंद्र शर्मा

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बच्चे को ज़रूर सिखाएं ये बातें (Important Things You Must Teach Your Child)

 

हर पैरेंट्स (Parents) की चाह रहती है कि उनका बच्चा (Child) समझदार, आज्ञाकारी, ज़िम्मेदार व स्मार्ट बने. इसी वजह से वे उसे हर वो चीज़ बताने व सिखाने की कोशिश करते हैं, जो उसके लिए ज़रूरी होती है. फिर चाहे वो प्रेशर हैंडल करना हो, हाइजीन हो या फिर सिविक सेंस ही क्यों न हो.

 

Child Learning

बच्चे कैसे सीखते हैं, कौन-सी चीज़ उन्हें अधिक प्रेरित करती है? इसका कोई निश्‍चित मापदंड नहीं है, पर पैरेंट्स व बड़ों के मार्गदर्शन व प्रोत्साहन से वे बहुत कुछ सीखते हैं. इस संदर्भ में फोर्टिस के एसएल रहेजा हॉस्पिटल की पीडियाट्रिशियन व नियोनैटोलॉजिस्ट कंसल्टेंट डॉ. अस्मिता महाजन ने उपयोगी जानकारियां दीं.

सेल्फ कंट्रोल

इन दिनों बच्चों में सहनशीलता की कमी आती जा रही है और इसका असर उनकी पर्सनैलिटी पर भी पड़ रहा है. ऐसे में धैर्य रखना, सब्र करना आदि के लिए सेल्फ कंट्रोल ज़रूरी है.

* सायकोलॉजिस्ट के अनुसार, जो बच्चे पढ़ने में अच्छे नहीं होते या फिर कमज़ोर होते हैं, वे सोशली एक्टिव भी कम होते हैं. ऐसे बच्चों को सेल्फ कंट्रोल यानी आत्म केंद्रित होना सिखाना आसान नहीं होता.

* बच्चों को सहनशीलता का पाठ बचपन से ही पढ़ाना चाहिए, जैसे- यदि वो किसी चीज़ की ज़िद करें, तो यह ज़रूरी नहीं कि आप उसे तुरंत पूरी कर दें. उन्हें धैर्य रखने के फ़ायदे बताएं. उन्हें समझाएं कि यह चीज़ सही व़क्त आने पर ज़रूर मिलेगी.

* सेल्फ कंट्रोल के लिए बच्चों को ध्यान यानी मेडिटेशन सिखाएं.

* यदि पैरेंट्स भी बच्चे के साथ मेडिटेशन करें, तो बच्चों को प्रोत्साहन मिलेगा.

* मेडिटेशन करने से रिलैक्स होने के साथ-साथ बच्चों में पॉज़िटिवनेस भी बढ़ती है.

परिस्थितियों के अनुसार ना कहना

बच्चे मासूम होते हैं और इस उम्र में उनके लिए सही-ग़लत की पहचान करना भी आसान नहीं होता. ऐसे में उनकी सुरक्षा का बेहतरीन उपाय यह है कि वे ना कहना सीखें. किन परिस्थितियों में बच्चे ना कहें, इस बारे में पैरेंट्स उन्हें समय-समय पर बताते रहें.

* यदि कोई अजनबी उन्हें छूने की कोशिश करे, तो उसे मना करें या उससे दूर हट जाएं.

* बच्चों को गुड टच व बैड टच के बारे में अच्छी तरह समझाएं. साथ ही उन्हें बेसिक सेक्स एजुकेशन भी दें.

* बच्चों को समझाएं कि अकेले होने पर कोई परिचित, पड़ोसी खिलौने, चॉकलेट या कोई तोह़फे आदि देने की कोशिश करे, तो मना कर दें.

* स्कूल, क्लास आदि में आपको पहुंचने में देरी हो रही हो और उसी समय कोई अजनबी बच्चे को घर पहुंचाने के लिए लिफ्ट दे, तो उसे ना कहें.

यह भी पढ़े: मदर्स गाइड- बच्चों के आम रोगों में उपयोगी घरेलू नुस्ख़े (Mother’s Guide- Home Remedies For Children’s Common Illnesses)

हाइजीन बेहद ज़रूरी

* बच्चों को समझाएं कि साफ़-सफ़ाई से रहने से हम हेल्दी रहते हैं और हमारा आत्मविश्‍वास भी बढ़ता है. उन्हें हाइजीन से जुड़ी हेल्दी हैबिट्स के बारे में बताएं.

* रोज़ नहाना, साफ़-सुथरा रहना, खाने से पहले हाथ धोना, टॉयलेट हाइजीन, छींकते-खांसते समय नाक-मुंह पर रुमाल रखना आदि हाइजीन से जुड़ी बेसिक बातें बच्चों को बचपन से ही सिखानी चाहिए.

* ओरल हाइजीन भी ज़रूरी है. इसके लिए सुबह और रात में ब्रश करना, दांतों व जीभ को अच्छी तरह से क्लीन करना सिखाएं, ताकि सांसों की बदबू व दांतों को ख़राब होने से बचाया जा सके.

* हाथ-पैर के नाख़ून को साफ़ रखने और हफ़्ते में एक बार नाख़ून काटने को कहें.

* कुछ बच्चों को दांत से नाख़ून काटने की आदत होती है. उन्हें समझाएं कि दांतों से नाख़ून काटने से मैल व रोगाणु पेट में जाकर उन्हें बीमार बना सकते हैं.

* बच्चों को बताएं कि नहाते समय नाक और अपने प्राइवेट पार्ट्स को भी क्लीन करें.

* बच्चों को बताएं अगर वे हाइजीन का ख़्याल रखेंगे, तो उनका इम्यून सिस्टम स्ट्रॉन्ग होगा और वे बीमार नहीं पड़ेंगे.

* स्कूल से आने, खेलकर आने आदि के बाद हाथों को अच्छी तरह से धोएं.

* खाना खाने के पहले और बाद में हाथ ज़रूर धोएं.

* फलों आदि को खाने से पहले उन्हें साफ़ पानी से धोकर खाएं.

* छोटे बच्चों के लिए 8-10 घंटे की नींद बहुत ज़रूरी है. स्लीप हाइजीन में उन आदतों को शामिल किया जाता है, जो बच्चों को गहरी नींद सोने में सहायता करें. अगर बच्चे पूरी नींद नहीं लेंगे, तो उनका शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होगा.

* बच्चों के सोने व उठने का एक नियत समय बना दें, ताकि बचपन से ही उनका इंटरनल क्लॉक सेट हो जाए.

लाइफ व रिलेशनशिप मैनेजमेंट

लाइफ मैनेजमेंट और रिलेशनशिप मैनेजमेंट दोनों का ही एक-दूसरे से कनेक्शन है. यदि आपकी ज़िंदगी ख़ुशहाल व सुव्यवस्थित रहेगी, तो यक़ीनन आपके रिश्ते भी मधुर व मज़बूत होंगे.

* बच्चों को अनुशासित रहना और हर काम समय पर करने की सीख बचपन से ही दें.

* बच्चों को अपनी सभी चीज़ें, फिर चाहे वो स्कूल बैग, क़िताबें, खिलौने, अन्य ज़रूरी चीज़ें ही क्यों न हों, व्यवस्थित तरी़के से रखना सिखाएं.

* छोटे बच्चे यानी 4-5 साल के बच्चों को अपने कपड़े सिलेक्ट करना, मम्मी-पापा की चीज़ों को पहचानना सिखाएं. इससे उनका कॉन्फिडेंस लेवल बढ़ता है.

* उनमें बचपन से ही शेयरिंग की आदत डालें.

* रिश्तेदारों के यहां जाएं, तो उनके साथ विनम्रता से पेश आएं. काम में उन्हें सहयोग दें.

* बच्चों को दूसरों की ज़रूरतों को समझना सिखाना भी ज़रूरी है.

* बच्चों को हर रोज़ रात को सोने से पहले कुछ अच्छी बातें बताएं या फिर पढ़कर सुनाएं. इससे उनमें अच्छी आदतें विकसित होती हैं.

यह भी पढ़े: खेल-खेल में बच्चों से करवाएं एक्सरसाइज़ और ख़ुद भी रहें फिट (Indulge In Fitness With Your Children And Get In Shape)

Child Care

सिविक सेंस

* जब कभी आप बस या ट्रेन में सफ़र कर रहे हों, तो इस दौरान कोई प्रेग्नेंट वुमन या बुज़ुर्ग खड़े हों, तो उसे अपनी सीट दें और फिर अपने बच्चों को भी बताएं कि आपने उसकी मदद क्यों की है. इससे बच्चों को दूसरों की मदद करने की प्रेरणा मिलेगी.

* बच्चे को विनम्रता से बात करना सिखाएं और जब भी आप किसी से कुछ मांगें, तो ध्यान रहे कि ‘प्लीज़’ कहकर ही बात करें.

* बच्चे को सिखाएं कि देश की सार्वजनिक संपत्ति, जैसे- सड़क, ट्रेन, गार्डन आदि को गंदा न करें और कूड़ा-कचरा डस्टबिन में ही फेंकें.

* पौधे लगाएं. लोगों को पेड़ों को काटने से रोकें.

* बच्चे को ईमानदार और सच के रास्ते पर चलना सिखाएं.

* बच्चे को संविधान के नियमों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करना सिखाएं.

* बतौर ज़िम्मेदार अभिभावक बच्चे को समझाएं कि ख़ुद को साफ़-सुथरा रखने के साथ-साथ अपने घर, पास-पड़ोस, सोसाइटी, स्कूल, खेल का मैदान आदि को भी साफ़ रखना चाहिए.

आमतौर पर हर बच्चा अपनी क्षमता व रुचि के अनुसार सीखता है, लेकिन हमें भी बच्चों को सीखने के लिए निरंतर प्रेरित करते रहना चाहिए.

ऊषा पन्नालाल गुप्ता

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कहीं आपके बच्चे का व्यवहार असामान्य तो नहीं? (9 Behavioral Problems Of Children And Their Solutions)

कभी-कभार बच्चे (Children) अपने माता-पिता के सब्र का इम्तिहान लेते हैं. यह बहुत सामान्य बात है. लेकिन अगर बच्चा बार-बार एक ही तरह की ग़लती दोहराने लगे तो यह ख़तरे की घंटी हो सकती है, इसलिए अभिभावकों के लिए ज़रूरी है कि बच्चे के व्यवहार (Behavior) पर ध्यान दें, ताकि भविष्य में अपने आचरण व आदतों के कारण उसे किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े. हम आपको बच्चों की 7 ग़लत आदतों (Bad Habits) के बारे में बता रहे हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं करना चाहिए.   

Behavioral Problems Of Children

  1. बदला लेने की आदत

बच्चों को कठिन परिस्थितियों से बाहर निकलना आना चाहिए. यही वजह है कि अभिभावक अपने बच्चों को स्थिति का सामना करना और मुसीबत आने पर पीछे हटने की बजाय उससे सामना करना सिखाते हैं, लेकिन कुछ बच्चे इसे बेहद गंभीरता से ले लेते हैं. कोई उनके साथ ग़लत तरी़के से पेश आए तो वे उसे सबक सिखाए बिना बाज नहीं आते. अगर आपका बच्चा भी माफ़ करने की बजाय हमेशा बदला लेने के बारे में सोचता है तो यह ग़लत संकेत है.

क्या करें?

अपने बच्चे को माफ़ करने के फ़ायदे बताएं. उसे अपनी भावनाओं के साथ-साथ दूसरे की बात को समझने को कहें, ताकि उसे झगड़े या असहमति की वजह का पता चल सके. साथ ही उसे अरुचिकर परिस्थिति से बाहर निकलना भी सिखाएं.

 

  1. ग़ैरज़िम्मेदाराना व्यवहार

कुछ बच्चे बेहद ग़ैरज़िम्मेदार किस्म के होते हैं. वे किसी भी काम की ज़िम्मेदारी नहीं लेते. और तो और कोई ग़लती करने पर सारा दोष अपने भाई-बहन या दोस्तों पर थोप देते हैं.

क्या करें?

बच्चे में ज़िम्मेदारी का भाव पैदा करने के लिए उसे कोई ऐसा काम सौंपें, जिसकी जवाबदेही उसे लेनी पड़े. साथ ही उससे समस्या और बुरे बर्ताव का कारण जानने की कोशिश करें.

 

  1. बेहद ज़िद्दी और अकड़ू स्वभाव

अपने विचारों का समर्थन करना और अपनी बात रखना अच्छी बात होती है, लेकिन हमेशा अपनी बात पर अड़े रहना ग़लत होता है. बच्चे को परिस्थिति के अनुसार समझौता करना आना चाहिए. माता-पिता को कोशिश करनी चाहिए कि बच्चे में यह गुण पैदा हो.

क्या करें?

बच्चे की भावना को समझने की कोशिश करें और उसके ज़िद की वजह जानने की कोशिश करें. उसे अपनी और दूसरे की भावना को समझने का गुण सिखाएं. उसे बताएं कि वो क्या कर सकता है और क्या नहीं. शांत तरी़के से उसे समझाने की कोशिश करें. लेकिन उसे किसी चीज़ का लालच देकर अपनी बात मनवाने की ग़लती न करें.

 

  1. चालबाज़ी

कभी-कभी बच्चे अपनी बात मनवाने के लिए कोई भी तरीक़ा अपनाने से नहीं कतराते, जैसे अगर उन्हें कोई चीज़ चाहिए तो भरे बाज़ार में रोना शुरू कर देते हैं. ऐसे में पैरेंट्स के पास उनकी बात मानने के अलावा कोई चारा ही नहीं होता. अगर आपका बच्चा ऐसा करे तो उसे समझाने की कोशिश करें कि उसका ऐसा व्यवहार किसी को भी अच्छा नहीं लगता व सब उसे नापसंद करेंगे.

क्या करें?

आमतौर पर बच्चा इस तरह का व्यवहार तब करता है, जब उसे अपने माता-पिता का ध्यान आकर्षित करना होता है. इसलिए ज़रूरी है कि  बच्चे के साथ ज़्यादा से ज़्यादा समय बिताएं. अगर बच्चा ग़लत तरी़के से काम करे या बात मनवाने के लिए चालाकी करने की कोशिश करें तो आपा खोने की बजाय शांत दिमाग़ से काम लें. यह थोड़ा मुश्क़िल होता है, लेकिन इसके नतीज़े बहुत अच्छे होते हैं.

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  1. बदलाव से डर

3-4 साल तक के बच्चों का नए वातावरण और माहौल से घबराना सामान्य है, लेकिन 5 साल से बड़े बच्चों को नए वातावरण व नई चीज़ों को स्वीकार करना सीखना चाहिए. आजकल के माहौल में नई परिस्थितियों को अपनाने की कला जानना ज़रूरी है. ऐसा नहीं होने पर बच्चे को एडजस्टमेंट में बहुत दिक्कत होती है. उदाहरण के लिए यदि आपका बच्चा किंडरगार्डन जाता है और जब वहां कोई उसकी पेसिंल या टिफिन किसी अलग जगह पर रख देता है तो वह रोने लगता है, तो समझ लीजिए कि उसे बदलाव से डर लगता है. ऐसे में आपको उसके व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए.

क्या करें?

बच्चे को बदलाव के बारे में हमेशा बताते रहें और उसे पहले से ही बदलाव के लिए तैयार रखें. अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखें, क्योंकि बच्चे हावभाव को बहुत जल्दी समझ लेते हैं और आपकी चिंता को भांप लेते हैं. कोशिश करें कि बच्चे को अच्छे दोस्त मिलें, क्योंकि बच्चे दोस्तों के साथ मिलकर चुनौतियों का सामना अपेक्षाकृत आसानी से कर लेते हैं. बच्चे से बात करें, ताकि उसे एहसास हो कि आप उसकी भावनाओं को समझ रहे हैं. ध्यान रखें कि बच्चों के लिए छोटी-छोटी चीज़ें भी बहुत मायने रखती हैं.

 

  1. उग्र व्यवहार

कुछ बच्चे स्वभाव से बहुत उग्र होते हैं और वे बिना सोचे-समझे और रिजल्ट की परवाह किए बिना कोई भी कार्य कर देते हैं. ऐसे में अभिभावक का यह फ़र्ज बनता है कि बच्चे को उसके व्यवहार के परिणाम के बारे में पहले ही आगाह कर दें.

क्या करें?

शांत दिमाग़ से काम लें. बच्चे के साथ बैठकर उसके व्यवहार का आंकलन करें और यह जानने की कोशिश करें कि वो ऐसा काम क्यों कर रहा है. बच्चे को आत्म नियंत्रण करना सिखाएं और उसे बताएं कि वो कितना ग़लत व्यवहार कर रहा है.

 

  1. एडजेस्टमेंट में असमर्थ

रूस की एक चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट, कैटेरिना मुराशोवा ने 68 टीनएज़र्स (12-18 वर्ष) पर एक शोध किया. उन्हें 8 घंटे किसी दोस्त या गैजेट के बिना अकेले रहने को कहा. 68 में से स़िर्फ 3 ही इस टास्क को आसानी से कर पाए, दूसरे बच्चों को बहुत दिक्कत हुई.

छोटे बच्चे अकेले नहीं रह सकते और यह सामान्य भी है. लेकिन 10 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों को अकेले स्थिति का सामना करना आना चाहिए. अगर बच्चा ऐसा करने में असमर्थ होता है, तो उसे अपनी भावना पर भी नियंत्रण करने में परेशानी होती है. उसे छोटी-छोटी चीज़ें व्यथित करती हैं, जैसे फोन बंद हो जाना इत्यादि.

क्या करें?

बच्चे को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश करें. अचानक ऐसा करना मुमक़िन नहीं है, इसलिए बेहतर होगा कि छुटपन से ही उसमें ऐसी आदत डालने की कोशिश की जाए, ताकि बड़ा होकर उसे किसी तरह की समस्या न हो.

 

  1. गाली-गलौज

ग़ुस्सा आने पर बच्चे अक्सर चिल्लाते या रोते हैं, लेकिन अगर 10 साल से भी छोटी उम्र में वे गाली देना शुरू कर दें, तो आपको इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए.

क्या करें?

इस बात का ध्यान रखें कि आप कभी बच्चे के सामने ग़लत भाषा का प्रयोग न करें और अगर बच्चा ग़लत भाषा का प्रयोग करे तो उसे कड़े शब्दों में समझाएं कि ऐसा बिल्कुल नहीं चलेगा. अगर 3-4 साल का छोटा बच्चा इस तरह की भाषा का प्रयोग करता है तो उसे तुरंत समझाएं कि ये बुरे शब्द हैं और अगर वो इस तरह के शब्द बोलेगा तो कोई उससे बात नहीं करेगा.

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  1. झूठ बोलना

झूठ बोलना बच्चों की सामान्य आदत है. बच्चे जब झूठ बोलते हैं तो माता-पिता को बहुत बुरा लगता है, उन्हें समझ में नहीं आता कि आख़िर उनकी परवरिश में क्या कमी रह गई, जिससे बच्चे ने झूठ बोलना सीख लिया. वे ठगा-सा महूसस करते हैं.

क्या करें?

इसे दिल पर न लें, बल्कि यह सोचने की कोशिश करें कि आख़िर किस कारण से बच्चा झूठ बोलने पर विवश हो गया. अक्सर बच्चों को लगता है कि सच बोलने पर उन्हें बहुत डांट पड़ेगी तो वे झूठ बोलने लगते हैं. अत: बच्चे को सच बोलने के लिए प्रेरित करें और ख़ुद उसके रोल मॉडल बनें. अगर इतने प्रयास करने के बाद भी वो झूठ  बोलना न छोड़े, तो उसे दंड दें.

ख़तरे के संकेत

* अगर आप एक महीने से ज़्यादा समय से बच्चे के व्यवहार से परेशान हैं.

* आप स्थिति पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं.

* दूसरे लोग भी आपके बच्चे के व्यवहार से परेशान हैं.

* अगर बच्चे का व्यवहार अचानक बिना किसी कारण से बदल जाएं, जैसे-आपका बच्चा अचानक अपने दोस्तों से बात करना या मिलना-जुलना एकदम कम कर दे.

* बच्चे को स्कूल में भी समस्या हो रही है, जैसे- उसके मार्क्स खराब आने लगें, वो झगड़े करने लगे या क्लास मिस करने लगे.

* नींद, साफ-सफाई और खाने-पीने की आदतों में बदलाव.

– शिल्पी शर्मा

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बच्चों के कानों की देखभाल (Parenting Guide- Baby Ear Care Tips)

छोटे बच्चे बहुत नाजुक होते हैं. उनके प्रत्येक अंग की उचित देखरेख ज़रूरी होती है. लेकिन कानों की देखरेख, उनकी सफ़ाई के लिए क्या करना आवश्यक है, इसके बारे में कुछ सुझाव यहां प्रस्तुत हैं.

Parenting Guide

* कानों में मैल जमा हो जाने से बच्चे कान खुजलाने लगते हैं. ऐसे में कानों में इयर ड्रॉप्स डालकर कान साफ करें.

* स्नान करते समय बच्चों के कान में पानी चले जाने की आशंका रहती है. लिहाज़ा नर्म तौलिए से बच्चों के कानों को अच्छी तरह से पोंछ दें.

* नहलाते समय बच्चों के कानों में रुई के फाहे डालकर कानों में पानी जाने से रोक सकते हैं.

* सर्दी-जुकाम होने पर तुरंत बच्चे का उपचार करें.

यह भी पढ़े: कहीं अंजाने में अपने बच्चों को ग़लत आदतें तो नहीं सिखा रहे हैं? (Is Your Child Learning Bad Habits From You?)

* पान के कुनकुने रस की कुछ बूंदें कान में डालें. इससे ठंडी के कारण बच्चे के कान में होनेवाली पीड़ा शांत होती है.

* बच्चे का कान बहता हो, तो मां के दूध की धार उसके कानों में डालें. कौड़ी की राख कान में डालने से भी कान का बहना बंद हो जाता है.

* पटाखों और ऊंची आवाजों से बच्चों को बचाना चाहिए, खासकर छोटे शिशुओं को. ऊंची आवाज़ें बच्चों को बुरी तरह प्रभावित करती हैं.

* छोटे शिशुओं के कान में जाड़े के दिनों में ऊन से बनी टोपी पहनाए रखें. इससे अधिक ठंड से उनके कानों की रक्षा होगी.

– सूर्यकांत ओमप्रकाश

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कहीं अंजाने में अपने बच्चों को ग़लत आदतें तो नहीं सिखा रहे हैं? (Is Your Child Learning Bad Habits From You?)

आपका आचरण आपके बच्चों के लिए आदर्श होता है. आप भले ही उन्हें बड़े-बड़े लेक्चर दे लें, लेकिन वो वही बातें ग्रहण करते हैं, जो आपको देखकर सीखते हैं. ऐसे में आपको उन्हें क्या सिखाना है और किन आदतों से बचाना है, यह आपको ही तय करना है, क्योंकि अक्सर अंजाने में आप अपनी ग़लत आदतें अपने बच्चों को सिखा देते हैं. बेहतर होगा, बच्चों को सही बातें सिखाने के लिए पहले ख़ुद सही आचरण करें.

Child Learning
झूठ बोलना: कभी रिश्तेदारों के सामने, तो कभी दोस्तों के साथ या कभी बच्चों से ही हम झूठ बोलते हैं. किसी का फोन आता है, तो हम बच्चों को बोलते हैं कि कह दो पापा/मम्मी घर पर नहीं हैं… ये तमाम बातें बच्चे हमसे ही सीख लेते हैं और फिर वो उनके व्यवहार में भी शामिल होने लगती हैं. उन्हें लगता है झूठ बोलना ग़लत नहीं है. मम्मी-पापा भी तो बोलते हैं. ख़ुद को बचाने के लिए, तो कभी यूं ही बिना किसी वजह के वो टीचर से, दोस्तों से और यहां तक कि हमसे भी झूठ बोलने लगते हैं.

क्या करें?
झूठ, फरेब व निंदा से बचें. बच्चों से छोटे-मोटे झूठ न बुलवाएं. आपको भले ही यह लग रहा हो कि बच्चा अपने खेल में मग्न है, लेकिन बच्चे दरअसल बहुत बारीक़ी से हमें ऑब्ज़र्व करते हैं और ऐसी चीज़ें जल्दी सीखते हैं.

हाइजीन पर ध्यान न देना: बुलबुल की टीचर अक्सर एक बात नोटिस कर रही हैं कि बुलबुल कुछ भी खाने के बाद अपने हाथ अपनी स्कर्ट से पोंछ लेती है. उन्होंने कई बार टोका भी, पर बुलबुल यह व्यवहार दोहराती रही. एक दिन उसकी टीचर ने पूछा, तो वो दंग रह गईं कि बुलबुल की मम्मी भी अक्सर खाना बनाते समय अपने हाथ अपनी नाइटी से ही पोंछती रहती हैं. बस, उसने भी यही सीख लिया.

क्या करें?
अच्छा होगा कि सुबह का रूटीन हम बच्चों के साथ ही करें. उन्हें टाइम पर उठाएं, उनके साथ सली़के से ब्रश करें. टॉयलेट ट्रेनिंग दें.
यहां-वहां कचरा न फेंकें. डस्टबिन का ही इस्तेमाल करें. खाने से पहले हाथ धोना, खाने के बाद भी हाथ धोकर टॉवेल से पोंछना… आदि बातें उन्हें करके दिखाएं.

पंक्चुअल यानी समय का पाबंद नहीं होना: हम में से अधिकांश लोगों की सोच यही होती है कि सबसे पहले पहुंचकर अपना महत्व क्यों कम करना… आख़िर सभी लोग लेट आते हैं, तो हम क्यों जल्दी जाएं. यही आदत हमारे बच्चे भी सीख जाते हैं. उन्हें भी लगता है कि लेट जाने का मतलब है अपना महत्व बढ़ाना.

क्या करें?
बच्चों को समय का महत्व समझाने से पहले हमें ख़ुद समय को महत्व देना होगा. हम अगर अनुशासन में रहेंगे, तो बच्चों को भी अनुशासित रखना व अनुशासन व समय का महत्व समझाना आसान होगा.

अनहेल्दी डायट: कभी पूरियां खाने का मन करता है, कभी समोसे, तो कभी पिज़्ज़ा… माना आप खाने के शौक़ीन हैं, लेकिन अपने बच्चों को जंक फूड खाने से रोकना चाहते हैं, तो ये उनके साथ अन्याय ही होगा. हम इतने बड़े होकर अपने खाने की आदतों को नहीं बदल पाते, तो छोटे बच्चों से कैसे उम्मीद करते हैं कि वो हेल्दी फूड खाएंगे?

क्या करें?
हेल्दी डायट स़िर्फ बच्चों के लिए ही नहीं सभी के लिए ज़रूरी है. आप हेल्दी खाएंगे, तो बच्चों को बेहतर तरी़के से कंविन्स कर पाएंगे कि वो भी जंक फूड कम खाएं.

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आलस करना: बच्चों को कहते हैं कि अर्ली टु बेड, अर्ली टु राइज़… पर ख़ुद लेट नाइट पार्टीज़ या फिर देर तक लैपटॉप पर ऑफिस का काम करना… सोशल साइट्स पर एक्टिव रहना, सुबह जल्दी उठने में आनाकानी करना, पानी का ग्लास तक भी ख़ुद उठकर न लेना, नहाने में आलस करना… ये तमाम बातें अपने आप में विरोधी हैं.

क्या करें?
घर में जल्दी सोने व समय पर उठने का माहौल शुरू से बनाएं. अपने-अपने काम ख़ुद करने की ट्रेनिंग सबको दें. अपने पानी व दूध का ग्लास, खाने के बर्तन ख़ुद उठाकर रखना, अपने कपड़ों को सही जगह पर रखना आदि सभी को करना चाहिए. इससे एक व्यक्ति पर काम का अधिक बोझ भी नहीं होगा और सबको अपने काम करने व अनुशासन में रहने की आदत भी पड़ेगी.

एक्सरसाइज़ न करना: फिटनेस की आदत सबको होनी चाहिए. आप ख़ुद सोफे पर पड़े रहते हैं, दिनभर टीवी देखते रहते हैं और बच्चों से अपेक्षा रखते हैं कि वो एक्टिव रहें, हेल्दी रहें. कम उम्र में मोटे न हों.

क्या करें?
बच्चों को अपने साथ योग व प्राणायाम करवाएं या उन्हें योगा क्लास जॉइन करवाएं. उनके साथ स्विमिंग, साइकिलिंग या जॉगिंग भी कर सकते हैं. आपका साथ उन्हें मोटिवेट करेगा और आपका व्यवहार उनका आदर्श बनेगा.

अव्यवस्थित रहना: कपड़े कहीं पड़े हैं, आलमारी में फाइल्स अव्यवस्थित हैं, किचन में सामान यहां-वहां है… कभी घर की चाभी ढूंढ़ते रहते हैं आप, तो कभी कोई ख़ास रंग का सूट या साड़ी… बच्चे स्कूल से आते हैं, बस्ता वहीं पटककर खेलने चले जाते हैं. मोज़े कहीं, जूते कहीं और कपड़े कहीं और ही… आप उन पर बरसते हैं कि यह क्या तरीक़ा है? अपना सामान ढंग से व सही जगह पर रखा करो… क्या वो आपकी बात सुनेंगे?

क्या करें?
रोज़ अगले दिन की प्लानिंग करें, वो भी बच्चों के सामने, इससे बच्चों में यह संदेश जाएगा कि उन्हें एडवांस प्लानिंग करनी चाहिए, ताकि सुबह की भागदौड़ से बचा जा सके. कोशिश करें कि घर को व अन्य सामान को व्यवस्थित रखने में बच्चों की भी मदद लें. इससे उन्हें भी पता चलेगा कि जो सामान जहां से उठाया, वहीं रखना ज़रूरी है, ताकि ज़रूरत के व़क्त वो आसानी से मिल जाए.

रेस्पेक्ट न करना: हो सकता अपनी सास से आपकी ट्यूनिंग इतनी अच्छी न हो या हो सकता है कोई पड़ोसी आपको पसंद न हो, पर अपना आक्रोश व रोष बच्चों के सामने जताने से बचें. आप अगर दूसरों को इज़्ज़त नहीं देंगे, तो बच्चे आपको भी रेस्पेक्ट नहीं देंगे. वो भी अपनी दादी से, अपने अंकल से दूर होते जाएंगे और उनकी नज़रों में उनका सम्मान कम होता जाएगा.

क्या करें?
आपसी मतभेद कितने भी गहरे हों, एक-दूसरे को अपशब्द कहने से बचें. बच्चों के सामने अपने ग़ुस्से पर नियंत्रण रखें. अपनी शिकायतें आपसी बातचीत से हल करने की कोशिश करें. बच्चों के सामने चुगली व निंदा करने से बचें.

गाली देना या ग़लत भाषा का प्रयोग: अधिकांश पुरुष न स़िर्फ ग़ुस्से में, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी व बातचीत में भी गालियों का बहुत प्रयोग करते हैं. उनके लिए यह एक सामान्य बात है, यहां तक कि वो घर पर भी इसी तरह से बात करने से परहेज़ नहीं करते. पर ध्यान रखें कि आपका बच्चा आपको गाली देते देखेगा, तो बाहर जाकर दोस्तों के बीच उसका प्रयोग भी करेगा.

क्या करें?
ज़ाहिर-सी बात है, गाली देने से बचें. मज़ाक में भी बच्चों के सामने ऐसी भाषा का प्रयोग न करें. सबको सम्मान देना, सबसे प्यार से बात करना कितना ज़रूरी है, इसका महत्व बच्चों को समझाना ज़रूरी है और वो आप ख़ुद अपने व्यवहार से ही समझा सकते हैं.

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अल्कोहल/स्मोकिंग: शिकागो में हुए अध्ययन के मुताबिक बच्चे अगर अपनी गुड़िया या खिलौनों से भी खेलते हैं, तो वो पैरेंट्स का ही अनुसरण करते हैं. वो अपने गुड्डे को भी खेल-खेल में सिगरेट और शराब ऑफर करते हैं और उसी तरह व्यवहार व बातें करते हैं, जो पैरेंट्स को दोस्तों के साथ पार्टीज़ या गेट टु गेदर में करते देखते हैं.

क्या करें?
घर पर पार्टी करें, तो इन चीज़ों से जितना हो सके, बचें. बच्चों के सामने थोड़ा सतर्क रहना ज़रूरी है. यदि संभव हो, तो ये बुरी लत छोड़ ही दें.

ईटिंग हैबिट्स और टेबल मैनर्स: ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ करके खाना, खाने के बीच में उंगलियां चाटना, जूठे चम्मच से ही खाना लेना, जल्दी-जल्दी खाना, खाते समय बहुत ज़्यादा बोलना, फोन पर रहना आदि… ये तमाम चीज़ें आप अंजाने में करते हैं और फिर बच्चों को भी यही आदतें अंजाने में ही पास ऑन कर देते हैं.

क्या करें?
ख़ुद को सुधारें, बच्चे अपने आप सही बातें आपको देखकर सीख जाएंगे.

बहुत अधिक गैजेट्स का प्रयोग करना: हमेशा मोबाइल व लैपटॉप पर रहना और बच्चों से यह कहना कि मोबाइल इतना अधिक यूज़ मत करो, कितना जायज़ है?

क्या करें?
बच्चों के साथ-साथ अपना भी टाइम फिक्स करें कि इससे अधिक न तो आपको मोबाइल का इस्तेमाल करना है और न ही सोशल साइट्स पर रहना है. सबके लिए समान नियम रहेगा, तो बच्चों के लिए उसे व्यवहार में शामिल करना आसान होगा.

हर समय शिकायत करते रहना/ईर्ष्या करना: माना आपकी ज़िंदगी वैसी नहीं, जैसी आपने सोची थी, पर हर व़क्त शिकायत करते रहना, रोते रहना न स़िर्फ आपको नकारात्मक इंसान बनाएगा, आपके बच्चे को भी सकारात्मक नहीं बनने देगा. दूसरों की कामयाबी से ईर्ष्या रखना और उन्हें बुरा साबित करने की कोशिश करना भी नकारात्मक भाव है, जो बच्चों के मन में भी ईर्ष्या व द्वेष जैसी भावनाएं पैदा करते हैं.

क्या करें?
आप पहले ख़ुद को पॉज़िटिव बनाएं, यह सोचें कि आपकी ज़िंदगी भले ही आपकी कल्पना जैसी न हो, पर बहुतों से बेहतर है. अपने बच्चों को भी यही सिखाएं कि दूसरों के पास क्या है, इससे तुलना न करें, बल्कि यह देखें कि आपके पास क्या है, जो बहुत से लोगों के पास नहीं है. सकारात्मक पैरेंट्स व माहौल ही हेल्दी बच्चे के सफल भविष्य की नींव रख सकता है.

– विजयलक्ष्मी

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बढ़ने न दें बच्चों में मोटापा (How Parents Can Prevent Child Obesity?)

मॉडर्न लाइफस्टाइल, ग़लत खान-पान और व्यायाम न करने की आदत से न स़िर्फ वयस्क ही मोटापे की गिरफ्त में आ रहे हैं, बल्कि छोटे स्कूली बच्चे भी तेज़ी से मोटापे का शिकार हो रहे हैं. अगर आपके बच्चे का वज़न उसकी औसत लंबाई के हिसाब से अधिक है तो इसे हल्के में न लें, क्योंकि वो मोटापे का शिकार हो सकता है. आंकड़ों के मुताबिक़, दुनियाभर में तक़रीबन 16 से 33 फ़ीसदी बच्चे बढ़ते वज़न के शिकार हैं. बच्चों में बढ़ता हुआ मोटापा उन्हें छोटी-सी उम्र में ही कई बीमारियों का शिकार बना सकता है. चलिए जानते हैं बच्चों में मोटापा बढ़ने के कुछ आम कारण, ताकि व़क्त रहते आप अपने बच्चे को मोटापे की मार से बचा सकें.

Child Obesity

क्या है मोटापा?
जब शरीर में अत्यधिक फैट के कारण वज़न बेहिसाब बढ़ने लगता है और उसका सेहत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है, तो इस स्थिति को मोटापा कहते हैं. सामान्य तौर पर बच्चों में मोटापा तब तक नहीं बढ़ता, जब तक बच्चे का वज़न उसकी लंबाई व शारीरिक बनावट से 10 फ़ीसदी अधिक न हो जाए. दरअसल, बच्चों में वज़न बढ़ने की समस्या की शुरुआत 5-6 साल या किशोरावस्था में शुरू हो जाती है. एक अध्ययन के अनुसार, जो बच्चे 10 से 13 साल की उम्र में मोटापे के शिकार हो जाते हैं, उनके वयस्क होने पर भी उनमें मोटापा बढ़ने की संभावना दूसरों के मुक़ाबले अधिक होती है.

लक्षण
मोटापे के कारण शरीर में कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक परिवर्तन आते हैं और व्यक्ति में इसके लक्षण भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगते हैं, जो निम्न प्रकार के हैं.
– सांस फूलना.
– अधिक पसीना आना.
– तेज़ आवाज़ में खर्राटे लेना.
– अत्यधिक थकान महसूस होना.
– पीठ और जोड़ों में दर्द होना.
– आत्मविश्‍वास में कमी आना.
– अकेलापन महसूस करना.

कारण
अगर बच्चे के माता-पिता में से कोई एक मोटा है, तो बच्चे के मोटे होने की संभावना 50 फ़ीसदी तक होती है और अगर माता-पिता दोनों ही मोटे हैं, तो बच्चे में मोटापे की संभावना 80 फ़ीसदी तक होती है. इसके अलावा कई और कारण भी हो सकते हैं.

बाहर का खाना
अधिकांश बच्चे घर के बने खाने की बजाय बाज़ार में मिलने वाली खाने की चीज़ों को बड़े ही चाव से खाते हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में हुए एक अध्ययन के मुताबिक, जो बच्चे बाहर का खाना खाते हैं, उनमें क़रीब 30 फ़ीसदी बच्चे मोटापे के शिकार हो जाते हैं. इस सर्वे में यह भी पाया गया कि जो बच्चे चिप्स और सोडा जैसी चीज़ें खाने में दिलचस्पी रखते हैं, उनमें मोटापा अधिक बढ़ता है.

टीवी देखना
जो बच्चे घंटों बैठकर टीवी देखते हैं या फिर ऑनलाइन वीडियो गेम खेलते हैं, उनमें मोटापा तेज़ी से बढ़ता है. कई अध्ययनों में यह ख़ुलासा हुआ है कि ज़्यादा टीवी देखने से बच्चों में मोटापा बढ़ता है. एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि जो लड़कियां रोज़ाना ढाई घंटे या उससे अधिक टीवी देखती हैं, वे दो घंटे टीवी देखने वालों के मुक़ाबले ज़्यादा मोटी होती हैं.

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आर्थिक संपन्नता
आर्थिक रूप से संपन्न परिवारों में जन्म लेने वाले बच्चों में मोटापा आम बच्चों की तुलना में अधिक होता है. एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि संपन्न परिवार के बच्चे पौष्टिक भोजन की बजाय बाज़ार में मिलने वाले जंक फूड और फास्ट फूड का सेवन ज़्यादा करते हैं. इस तरह की चीज़ों को खाने से मोटापा बढ़ता है. इसके अलावा जो बच्चे खाने के बाद बैठे रहते हैं उनके शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा हो जाती है.

पढ़ाई का प्रेशर
स्कूली बच्चों के माता-पिता अक्सर पढ़ाई को लेकर उन पर दबाव बनाते रहते हैं, लेकिन वो इस बात से बेख़बर होते हैं कि उनका इस तरह से बच्चे पर दबाव बनाना उसे मोटापे का शिकार बना सकता है. दरअसल, पढ़ाई का बढ़ता दबाव और खेल-कूद या शारीरिक व्यायाम में कमी आना, बच्चे के वज़न बढ़ने के कारणों में से एक हो सकता है.

नौकरीपेशा मां
साल 2011 में बच्चों के विकास पर हुए एक अध्ययन के मुताबिक, जो महिलाएं ऑफिस जाती हैं उनके बच्चे घर पर रहने वाली घरेलू औरतों के बच्चों के मुक़ाबले ज़्यादा मोटे होते हैं. इस अध्ययन से यह भी पता चला है कि किसी भी नौकरीपेशा महिला के बच्चे का घर पर रहने वाली महिला के बच्चे की तुलना में पांच महीने में एक पाउंड ज़्यादा वज़न बढ़ जाता है और उनका बीएमआई दूसरे बच्चों की तुलना में ज़्यादा होता है.

डिजिटल एडिक्शन
बच्चों का अधिक टेक सेवी होना और उनमें बढ़ता डिजिटल एडिक्शन उन्हें मोटापे का शिकार बना रहा है. साल 2010 में फैमिली फाउंडेशन द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक, 8 से 18 साल तक की उम्र वाले बच्चे प्रतिदिन अपना डेढ़ घंटा आई फोन या अन्य प्रकार के गैजेट्स पर बिताते हैं, जिससे उनकी शारीरिक गतिविधियों में कमी आई है और इसका सीधा असर उनके बीएमआई पर पड़ रहा है.

Child Obesity

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अन्य कारण
– भूख से ज़्यादा खाना या ओवरईटिंग.
– खेल-कूद या शारीरिक गतिविधियों में कमी.
– मोटापे का पारिवारिक इतिहास.
– न्यूरोलॉजिकल समस्या और दवाइयां.
– तनावपूर्ण घटना या अन्य भावनात्मक समस्या.

कैसे करें बचाव?
मोटापे के शिकार बच्चों को मेडिकल जांच की ज़रूरत होती है, जिससे उनके मोटापे की असली वजह का पता लगाया जाता है. हालांकि कुछ सावधानियां बरतकर आप अपने बच्चे को मोटापे की मार से बचा सकते हैं.

– बच्चों को दें हेल्दी लाइफस्टाइल.
– बच्चे को घर का बना खाना ही खिलाएं.
– खेल-कूद व शारीरिक गतिविधियों में भाग लेनें दें.
– बच्चों के टीवी देखने का समय निर्धारित करें.
– उन्हें इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से दूर रखें.
– हर समय उन पर पढ़ाई का दबाव न बनाएं.
– बच्चे के साथ समय बिताएं.

– कमला बडोनी

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बच्चों की परवरिश को यूं बनाएं हेल्दी (Give Your Child A Healthy Upbringing)

दुनिया के हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चों की परवरिश सही और हेल्दी तरी़के से हो. इसके लिए वो हर मुमक़िन कोशिश भी करते हैं. हालांकि बच्चों की अच्छी परवरिश और उनका स्वस्थ विकास किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है. ख़ासकर तब जब माता-पिता दोनों ही नौकरीपेशा हों. दरअसल, दिन का ज़्यादातर समय ऑफिस में बिताने के कारण अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों के साथ ज़्यादा समय नहीं बिता पाते हैं, बावजूद इसके इस लेख में बताए गए निम्न तरीक़ों से आप अपने बच्चों की परवरिश को हेल्दी बना सकते हैं.

 

मोटापे पर रखें नज़र
फास्ट फूड व आधुनिक गैजेट्स के कारण स्कूली बच्चों में मोटापा एक कॉमन और गंभीर समस्या बन चुकी है. आज के इस डिजिटल युग में एक ही जगह पर घंटों बैठकर खेलना, अनहेल्दी खाना, देर से सोना, देर रात खाना आदि कारणों से बच्चों में मोटापा बढ़ने लगता है. अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा हेल्दी और फिट रहे, तो आपको यह सुनिश्‍चित करना चाहिए कि वो हेल्दी खाए, समय पर सोए और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से दूर रहे.

बच्चों के साथ समय बिताएं
आपकी दिनचर्या कितनी भी व्यस्त क्यों न हो, अपने बच्चों के लिए थोड़ा समय ज़रूर निकालें. उन्हें बिज़ी रखने के लिए गैजेट्स थमाने के बजाय उनका हाथ थामकर उन्हें बाहर घुमाने ले जाएं. दफ़्तर से लौटने के बाद और छुट्टी के दिन बच्चों के साथ समय बिताएं. उन्हें कहानियां सुनाएं और आउटडोर गेम्स के लिए प्रेरित करें.

टीवी पर लगाएं लगाम
जब बच्चा टीवी देख रहा होता है, तब कई पैरेंट्स उसे खाना खिलाते हैं, ताकि वो ज़्यादा खा सके. लेकिन इस तरह खिलाने से आपका बच्चा ओवर ईटिंग का शिकार हो सकता है. बच्चों के कमरे में टीवी न लगाएं. इसके साथ ही यह सुनिश्‍चित करें कि सोने से 2 घंटे पहले तक बच्चा टीवी या दूसरे गैजेट्स के साथ समय न बिताए. सोते समय बच्चों को कहानी सुनाना या फिर उनसे बातें करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है.

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साथ बैठकर खाना खाएं
बच्चे जो देखते हैं वही सीखते हैं. बच्चे खाने-पीने की अच्छी आदतों को अपनाएं, इसके लिए ज़रूरी है कि आप अपने बच्चों और परिवार के साथ बैठकर समय पर खाना खाएं. खाना खाने के दौरान टीवी और दूसरे गैजेट्स से दूरी बनाकर रखें. खाते समय न तो ख़ुद इन चीज़ों का इस्तेमाल करें और न ही अपने बच्चों को करने दें.

समय पर वैक्सिन दिलाएं
हर एक माता-पिता की यह ज़िम्मेदारी है कि वो अपने बच्चों को सही समय पर वैक्सिन दिलाएं. इस बात का ख़ास ख़्याल रखें कि वैक्सिनेशन दो साल में ही ख़त्म नहीं हो जाते, बल्कि 5 से 10 साल तक के बच्चों को समय-समय पर वैक्सिनेशन की आवश्यकता पड़ती है. वैक्सिनेशन के अलावा इस बात का भी ख़्याल रखें कि आपके बच्चे को पर्याप्त मात्रा में आयरन, कैल्शियम और प्रोटीन मिल रहा है, क्योंकि इनकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत 9-15 साल की उम्र के दौरान पड़ती है.

गैजेट्स का इस्तेमाल घर पर नहीं
माता-पिता अपने बच्चों के लिए आदर्श और उनके प्रेरणास्रोत होते हैं. आप बच्चों के सामने अपनी जैसी छवि पेश करेंगे, बच्चे भी वैसा ही बनने की कोशिश करेंगे, इसलिए बेहतर होगा कि आप जब घर पर अपने बच्चों के साथ हों, तब कम से कम मोबाइल और कंप्यूटर का इस्तेमाल करें और अगर ज़रूरत न हो तो इसका इस्तेमाल घर पर न करें.

आउटडोर गेम्स के लिए करें प्रेरित
आजकल ज़्यादातर पैरेंट्स अपने बच्चों को खेलने के लिए घर से बाहर नहीं जाने देते हैं, जबकि बच्चों को शारीरिक रूप से मज़बूत और एक्टिव बनाने के लिए उन्हें हर रोज़ एक घंटे घर से बाहर खेलने देना चाहिए. हेल्दी विकास के लिए सभी उम्र के बच्चों को आउटडोर गेम्स खेलने चाहिए. इसके अलावा अपने बच्चों को स्विमिंग, एरोबिक्स, डांस जैसी आउटडोर एक्टिविटीज़ के लिए भी प्रेरित करें.

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योग का अभ्यास करवाएं
छोटी उम्र से ही बच्चों को योग का अभ्यास करवाना उनकी सेहत के लिए फ़ायदेमंद होता है. ख़ासकर ब्रिदिंग एक्सरसाइज़ से बच्चों के दिमाग़ी विकास में मदद मिलती है और पढ़ाई में उनका ध्यान बढ़ता है. ऐसे योग आसन से बच्चों के फेफड़े मज़बूत होते हैं और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, इसलिए ख़ुद भी योग करें और अपने बच्चों को भी योग अभ्यास के लिए प्रेरित करें.

सिखाएं स्वच्छता की अहमियत
बच्चे धूल-मिट्टी में खेलने के बाद बगैर हाथ धोए खाने पर टूट पड़ते हैं. इससे बच्चों के हाथों से हानिकारक बैक्टीरिया उनके पेट में जा सकते हैं और उन्हें बीमार कर सकते हैं. अतः अपने बच्चों को स्वच्छता की अहमियत समझाएं और उन्हें खाने-पीने से पहले हाथ धोने और खेल-कूद कर आने के बाद हाथ-पैर धोने की अच्छी आदत सिखाएं.

बच्चों को कोल्ड ड्रिंक्स से दूर रखें
आजकल के बच्चे दूध देखकर नाक-मुंह सिकोड़ने लगते हैं, जबकि कोल्ड ड्रिंक्स जैसे पेय पदार्थों को देखकर उनका मन ललचाने लगता है. ज़रा सोचिए, कोल्ड ड्रिंक जब बड़ों की सेहत के लिए हानिकारक है तो फिर बच्चों के लिए फ़ायदेमंद कैसे हो सकता है? इसलिए अपने बच्चों को कार्बोनेटेड ड्रिंक्स से जितना हो सके, उतना दूर रखें, ख़ासकर एनर्जी ड्रिंक से. इन सभी पेय पदार्थों में कैलोरीज़ की मात्रा अधिक होती है, जो आपके साथ-साथ आपके बच्चे को भी मोटापे की गिरफ़्त में ले सकती है.

– शिल्पी शर्मा

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कैसे करें बच्चों की सेफ्टी चेक? (How To Keep Your Children Safe?)

Children Safe

ज़रा इन आंकड़ों पर नज़र डालें

* नेशनल क्राइम ब्यूरो के अनुसार- साल 2015 में देशभर में बच्चों के ख़िलाफ़ क्राइम के 94,172 मामले दर्ज़ हुए.

* इनमें सबसे ज़्यादा मामले 11,420 उत्तर प्रदेश में दर्ज़ किए गए.

* वर्ष 2014 से तुलना करें, तो बच्चों के ख़िलाफ़ होनेवाले आपराधिक मामले में 12.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी पाई गई.

देशभर में मासूम बच्चों के साथ यौन शोषण, बलात्कार, हत्या की ख़बरें रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं, लेकिन स़िर्फ स्कूल, समाज या प्रशासन को दोष देने से कुछ नहीं होगा. हर माता-पिता को भी जागरूक होना होगा. ख़ुद भी सतर्क होना होगा और बच्चों को भी सतर्क करना होगा. उन्हें सेफ्टी से जुड़ी छोटी-छोटी बातें बतानी होंगी, तभी आपका बच्चा सुरक्षित रह सकेगा.

छोटे बच्चों के लिए

स्कूल में कैसे करें सेफ्टी चेक?

* बच्चा प्ले स्कूल या नर्सरी में जाता है, तो ये सुनिश्‍चित करें कि उसे अपना पूरा नाम, पैरेंट्स का नाम, घर का पता और कम से कम दो फोन नंबर याद हों.

* बच्चा अगर स्कूल बस या वैन से स्कूल जाता है, तो बस की सुरक्षा की भी तसल्ली कर लें. ये ज़रूर चेक करें कि बस के ड्राइवर और अटेंडेंट का पुलिस वेरिफिकेशन हुआ है या नहीं. अगर बच्चे का स्टॉप सबसे आख़िरी स्टॉप है, तो चेक करें कि उसके साथ कोई अटेंडेंट रहता है या नहीं.

* बस के ड्राइवर और कंडक्टर का नंबर रखें, ताकि उनसे संपर्क में रहें.

* कोशिश करें कि घर के नज़दीक ही किसी स्कूल में एडमिशन कराएं. एडमिशन के समय ही ये चेक कर लें कि स्कूल के सभी क्लास, हॉल, गार्डन एरिया में सीसीटीवी लगा है या नहीं और बच्चों की सेफ्टी के लिए स्कूल की क्या तैयारी है.

* स्कूल के बाथरूम-टॉयलेट कितने सुरक्षित हैं, इस पर भी नज़र रखें. वहां कोई अटेंडेंट बैठता है या नहीं, ये चेक करें और बच्चों से भी इस बारे में समय-समय पर पूछते रहें.

* बच्चों को गुड टच-बैड टच के बारे में ज़रूर बताएं. उन्हें सिखाएं कि किसी के बुरे बर्ताव करने या बैड टच करने पर कैसे शोर मचाना है.

* बच्चे को समझाएं कि स्कूल छूटने के बाद वो अपने फ्रेंड्स के साथ ही रहें. इसके अलावा स्कूल छूटने के बाद टॉयलेट अकेले न जाएं.

* बच्चे की एक्टिविटीज़ पर नज़र रखें. उसके व्यवहार या आदत में कोई बदलाव नज़र आए, तो इसे अनदेखा न करें. बच्चे को विश्‍वास में लेकर उससे सच जानने की कोशिश करें.

* बच्चे में बचपन से ही ये आदत डालें कि वो आपसे कोई बात छिपाए नहीं. इसके लिए एक रूटीन बनाएं कि रोज़ उसके साथ थोड़ा टाइम बिताएं और इस दौरान उसकी दिनभर की सारी एक्टिविटीज़ के बारे में जानने की कोशिश करें.

* सबसे ज़रूरी बात- बच्चे के सामने पैनिक न हों. उसे समझाएं कि स्कूल उसके लिए सुरक्षित जगह है और ये सारी एक्टिविटीज़ एहतियात के तौर पर करनी ज़रूरी है.

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दोस्तों-परिचितों पर भी रखें नज़र

कोई पड़ोसी, पारिवारिक मित्र या फिर दूर के रिश्तेदार- बच्चे इनके लिए ईज़ी टारगेट होते हैं और मौक़ा पाते ही उन्हें छूना, पोर्न क्लिपिंग दिखाना, सेक्स के लिए उकसाना जैसी हरकतें करने में इन्हें मज़ा आने लगता है. ज़्यादातर बच्चे डर के कारण इसका विरोध भी नहीं करते और सब कुछ चुपचाप चलता रहता है व माता-पिता को ख़बर भी नहीं होती. आपके बच्चे के साथ ऐसा कुछ न हो, वो सेक्सुअल एब्यूज़ का शिकार न हो, इसके लिए ज़रूरी है कुछ एहतियात.

* घर पर आनेवाले लोगों पर नज़र रखें. ऐसे लोगों को पहचानें, जो बच्चे के लिए ख़तरा बन सकते हैं और उन्हें अपने बच्चों से दूर रखें.

* बच्चों को सही उम्र में सेक्स एजुकेशन दें.

* उन्हें सेफ और अनसेफ टच व सही-ग़लत के बारे में बताएं.

* हर व़क्त उनके लिए उपलब्ध रहें. उन्हें बताएं कि वो किसी भी टॉपिक पर कभी भी आपसे बात कर सकते हैं.

* उन्हें ना कहना सिखाएं. उन्हें बताएं कि किसी से डरकर उनकी सही-ग़लत बात मानना ज़रूरी नहीं.

बड़े होते बच्चों के लिए

अगर आपका बच्चा 10-12 साल का है, तो अभी वो बहुत छोटा है और उसे एक्स्ट्रा केयर की ज़रूरत है. ऐसे बच्चों की सेफ्टी के प्रति भी सावधानी ज़रूरी है.

इंटरनेट सेफ्टी है ज़रूरी

सोशल नेटवर्किंग अब बच्चों की दुनिया का ज़रूरी हिस्सा बन गया है. लेकिन आए दिन साइबर क्राइम की घटनाओं और इंटरनेट पर उपलब्ध सही-ग़लत कंटेन्ट से पैरेंट्स परेशान हैं कि अपने बच्चे को इन सबसे सुरक्षित कैसे रखें.

* सबसे पहले तो आप ख़ुद को एजुकेट करें. अगर आप इंटरनेट के बारे में सब कुछ जानते हैं, तो अपने बच्चे को भी समझा सकेंगे और उसके प्लस और माइनस पॉइंट्स के बारे में उसे बता पाएंगे.

* इंटरनेट को बिल्कुल बैन न कर दें,  बल्कि इंटरनेट के इस्तेमाल के लिए अपने बच्चे के लिए एक समय सीमा निर्धारित करें. एक गाइडलाइन बनाएं और बच्चे को समझाएं कि उनकी सुरक्षा के लिए ये गाइडलाइन ज़रूरी है.

* बच्चों को देर रात तक मोबाइल या लैपटॉप पर रहने की इजाज़त न दें.

* आजकल कई ऐसे सॉफ्टवेयर उपलब्ध हैं, जो विभिन्न साइट्स और उनके कंटेन्ट को फिल्टर करते हैं. इन्हें अपने मोबाइल या कंप्यूटर में इंस्टॉल करवाएं, ताकि आपका बच्चा कोई ग़ैरज़रूरी साइट न ओपन कर सके.

* उनकी ऑनलाइन एक्टीविटीज़ और फ्रेंड्स पर नज़र रखें.

* ब्राउज़र प्रोग्राम में जाकर हिस्ट्री बटन का इस्तेमाल करें. इससे आप जान सकेंगे कि आपके बच्चे ने किस साइट पर विज़िट किया है.

* कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स, जैसे- फेसबुक, ट्विटर में साइनअप करने के लिए एक आयु सीमा निर्धारित की गई है. ये आपके बच्चे की सुरक्षा के लिए ज़रूरी है. इसे अनदेखा न करें.

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सेफ्टी @ होम

* बच्चे को घर पर अकेला न छोड़ें. अगर बच्चा समझदार है, तो उसे सावधान व सजग रहने को कहें.

* बच्चे को समझाएं कि अगर वो घर पर अकेला है और किसी का फोन आता है, तो वो कॉल करनेवाले को ये भनक बिल्कुल भी न लगने दे कि वो घर पर अकेला है.

* उसे बताएं कि किसी अजनबी के लिए दरवाज़ा न खोले, न ही अपना पता और पर्सनल जानकारियां दे.

* आन्सरिंग मशीन या कॉलर आईडी यूनिट लगवाएं, ताकि फोन करनेवाले का नंबर देखा जा सके. बच्चे को बताएं कि वो ऐसे ही लोगों के फोन उठाए जिसे वो जानता हो.

* ऐसे लोगों के नाम व कॉन्टैक्ट नंबर की लिस्ट फोन के पास ही रखें, जो इमर्जेंसी में फ़ौरन काम आ सकते हैं.

 

टीनएजर बच्चों के लिए

अगर बच्चा कहीं बाहर जा रहा है

* सबसे पहले तो उसे लेट नाइट कहीं बाहर रहने की इजाज़त न दें. वो कहीं जा ही रहा है, तो उसे समय पर घर लौट आने को कहें. उसे समझाएं कि वो घर लौटने का सुरक्षित रास्ता चुने.

* उसे समझाएं कि रात में अकेले बाहर जाना रिस्की है. अगर बहुत ज़रूरी हो, तो उसे ग्रुप में ही बाहर भेजें.

* उसे हिदायत दें कि वो सुनसान रास्ते पर जाने से बचे. वहां दुर्घटना होने की संभावना ज़्यादा होती है.

* आपको पता होना चाहिए कि वो कहां जा रहा है और कब तक लौटेगा. वो जहां जा रहा हो, वहां का फोन नंबर भी नोट कर लें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर कॉन्टैक्ट किया जा सके.

* उसके मोबाइल पर घर का लैंडलाइन नंबर और पैरेंट्स के मोबाइल नंबर्स को स्पीड डायल पर रखें, ताकि इमर्जेंसी में वो तुरंत संपर्क कर सके.

* कुछ एक्स्ट्रा पैसे उसके पास ज़रूर रखें, ताकि कहीं फंसने की स्थिति में टैक्सी से ट्रैवल कर सके. ये पैसे इमर्जेंसी में भी काम आ सकते हैं. लेकिन पैसे इतने ज़्यादा भी न दें कि वही दुर्घटना का कारण बन जाए.

* अनजान लोगों के साथ या ऐसे लोगों के साथ, जिन पर आपको भरोसा न हो, उनके साथ उसे न भेजें.

अगर फ्रेंड्स के साथ पार्टी में जा रहे हैं

* आजकल टीनएज पार्टीज़ में ड्रग या अल्कोहल का क्रेज़ बढ़ा है, इसलिए पहले कंफर्म कर लें. ऐसी पार्टी में उसे भेजने से बचें, जहां ड्रिंक भी सर्व किया जानेवाला हो.

* हमेशा ग्रुप में या किसी फ्रेंड के साथ ही उसे पार्टी में भेजें. उसकी सेफ्टी के लिए ये ज़रूरी है.

* उसे समझाएं कि पार्टी में वे अनजान लोगों से दूर रहे. साथ ही अनजान लोगों द्वारा सर्व किया गया कोई भी ड्रिंक लेने से बचे.

* आपका बच्चा स्कूल या कॉलेज की ओर से कैम्प या पिकनिक वगैरह पर जा रहा है, तो भी सतर्क रहें. उसे अच्छी तरह समझा दें कि वो कहीं झाड़ियों या सुनसान जगह पर जाने से बचे.

सबसे अहम् बात– बच्चे की सुरक्षा को लेकर सजग रहना ज़रूरी है. लेकिन ध्यान रखें कि इस चक्कर में आप बच्चे को इतना डरा न दें कि वो कहीं बाहर आना-जाना ही छोड़ दे. उसे समझाएं कि ये सारे एहतियात सुरक्षात्मक क़दम हैं. किसी से डरने की ज़रूरत नहीं है, बस एलर्ट रहना होगा.

– प्रतिभा तिवारी

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बच्चों को यूं रखे जंक फूड से दूर (5 Ways To Keep Your Child Away From Junk Food)

Junk Food

जॉनी-जॉनी, यस पापा, ईटिंग शुगर, नो पापा… नर्सरी से ही बच्चों को इस पोयम के ज़रिए हेल्दी खाना खाने की आदत डालने की कोशिश पैरेंट्स करते हैं, लेकिन क्या सच में वो सफल होते हैं? नहीं ना. बच्चों की  बात छोड़िए, ख़ुद आप भी न जाने कितनी बार कोशिश करके हार चुके होंगे. तो हम बता रहे हैं कि आप कैसे बच्चों को जंक फूड से दूर रख सकते हैं? 

“सक्षम… चलो बेटा झट से दूध का ग्लास फिनिश करो, ये चिप्स का पैकेट रखो… मुझे ग़ुस्सा दिला रहे हो अब तुम, जल्दी पीओ दूध. जब देखो चिप्स खाते रहते हो, खाना खाने के नाम पर बुखार चढ़ जाता है.” 7 साल के सक्षम की मां शालिनी हर दिन बेटे के खाने को लेकर परेशान रहती हैं. स़िर्फ वो ही क्यों, हर मां-बाप ये चाहते हैं कि उनका बच्चा हेल्दी खाए, लेकिन बच्चे तो बच्चे हैं. जो मज़ा उन्हें चिप्स, पिज़्ज़ा, बर्गर आदि खाने में आता है, वो दूध, दाल-चावल खाने में नहीं. कुछ बच्चे तो इतने स्मार्ट होते हैं कि मां के सामने दूध का ग्लास पकड़ तो लेंगे, लेकिन उनके जाते ही उसे कभी गमले, कभी डॉगी, तो कभी घर के नौकर को पिला देते हैं और अंत में बचे हुए दूध से अपनी मूंछ बनाते हुए मां को दूध का ग्लास पकड़ाते हुए मां का दुलारा बन जाते हैं. इस तरह मां को लगता है कि बच्चे ने दूध पी लिया और फिर वो उसे ख़ुद ही चिप्स का पैकेट बड़े प्यार से पकड़ा देती हैं. यदि आप सचमुच बच्चे को जंक फूड से दूर रखना चाहते हैं, तो थोड़ी-सी स्मार्टनेस दिखाइए.

धीरे-धीरे करें शुरुआत

ये आप भी जानते हैं कि बच्चों की पसंद की किसी चीज़ पर अचानक रोक लगाने से वो बहुत ज़िद करने लगते हैं और आपसे नाराज़ भी हो जाते हैं. जानकार बताते हैं कि किसी भी चीज़ पर अचानक रोक लगाने की बजाय धीरे-धीरे शुरुआत करें. उदाहरण के लिए, किसी भी दिन उठकर उनके हाथ से बर्गर, पिज़्ज़ा छीनने की बजाय, उन्हें कहें कि ये आज के दिन का आख़िरी जंक फूड है. इसी तरह अगर बच्चे को दिनभर में चिप्स के कई पैकेट खाने की आदत है, तो अचानक सारे चिप्स के पैकेट छुपाने की बजाय पूरे दिन में बच्चे को 1-2 पैकेट ही दें और उसे समझाने की कोशिश करें. बाकी समय में बच्चे को हेल्दी फूड की आदत डालें.

स्मार्ट आइडिया

टिफिन में 3 दिन बच्चों की पसंद का खाना दें और 2 दिन अपनी पसंद का हेल्दी खाना.

जंक फूड ख़रीदना बंद करें

वर्किंग पैरेंट्स पर ये बात ज़्यादा लागू होती है. अक्सर ऑफिस से देर से आने पर घर में खाना बनाने का समय नहीं बचता, जिसके कारण वे बाहर से ही पिज़्ज़ा, बर्गर आदि पैक करा लाते हैं. धीरे-धीरे बच्चों को इसकी आदत पड़ जाती है और वो घर का खाना खाने की बजाय बाहर का खाना ज़्यादा पसंद करते हैं. बच्चों को अगर इससे दूर रखना है, तो आपको सबसे पहले इन्हें घर पर लाना बंद करना पड़ेगा.

स्मार्ट आइडिया

घर पर ही पिज़्ज़ा, बर्गर आदि बनाएं. बनाते समय इस बात का ध्यान रखें कि वो पूरी तरह हेल्दी हों. बर्गर की टिक्की बनाते समय उसमें सब्ज़ियां मिक्स करें.

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बनाएं स्वादिष्ट खाना

वर्किंग होने के कारण मां के पास अच्छा और टेस्टी खाना बनाने का समय नहीं होता. टेस्टी न होने के कारण बच्चे खाना नहीं खाते. ऐसे में मां ये सोचती है कि बच्चा कुछ भी खा ले, जिससे उसके पेट में कुछ तो जाए, लेकिन ये कुछ तो ही आपके बच्चे को अनहेल्दी खाने की ओर आकर्षित करता है. जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसे इसी तरह के खाने की आदत पड़ जाती है और हमेशा वो सेहत की बजाय स्वाद को तवज्जो देता है. इस आदत को आप बदल सकती हैं.

स्मार्ट आइडिया

हर दिन न सही, लेकिन कभी-कभार टेस्टी खाना बनाएं. इसके लिए पनीर के साथ बाकी वेजीटेबल मिक्स करके चाट मसाला डालकर स्नैक्स बनाएं, फ्रूट भेल बनाएं. परांठे को टेस्टी बनाने के लिए उसमें मिक्स वेजीटेबल के साथ थोड़ा चीज़ डालें.

जंक फूड का प्रॉमिस

अक्सर बच्चे जब खाना नहीं खाते या पढ़ाई नहीं करते, तो मां उन्हें पिज़्ज़ा, चिप्स, बर्गर आदि अनहेल्दी फूड का लालच देती हैं. इस तरह  बच्चों को अनहेल्दी खाने की आदत हो जाती है और वो उसी पर डिपेंड रहने लगते हैं. आपको अपनी ओर से ऐसा करने से बचना चाहिए.

स्मार्ट आइडिया

अगर प्रॉमिस कर ही दिया है, तो बाहर खाने की बजाय उसे घर पर ही बनाएं. इससे आपकी प्रॉमिस भी पूरी हो जाएगी और जंक फूड भी थोड़ा हेल्दी बन जाएगा.

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ख़ुद भी फॉलो करें

बच्चे पैरेंट्स को फॉलो करते हैं. आप जैसा करते हैं, जैसा उन्हें सिखाते हैं, वैसा ही वो करते हैं. ऐसे में उन्हें जंक फूड से दूर रखने के लिए पहले ख़ुद आप हेल्दी डायट फॉलो करें. उदाहरण के लिए जब भी बच्चों के साथ बाहर जाएं, तो पानीपूरी, समंोसा आदि खाने की बजाय फ्रूट जूस, सूप आदि पीएं. इससे बच्चा भी बाहर जाने पर उसी तरह की डिमांड करेगा.

स्मार्ट आइडिया     

सुबह के नाश्ते से करें शुरुआत. एक ग्लास दूध के साथ कभी फ्रूट सलाद परोसें, तो कभी फ्रूट शेक, दूध में कटे हुए फ्रूट मिक्स करके दें.

मां के हाथ का स्वाद

कहते हैं, मां के हाथ में जादू होता है. आपने भी ये महसूस किया होगा. वास्तविकता ये है कि बचपन में मां अपने बच्चे को जो खिलाती है, बच्चे को उसकी आदत हो जाती है और बड़े होने के बाद भी उस खाने जैसा स्वाद कहीं और नहीं मिलता. आप भी इसकी शुरुआत करें. बचपन में बच्चे के रोने पर झट से उसे कुछ भी बाहरी फूड देने की बजाय घर में कुछ इंटरेस्टिंग बनाएं और बच्चे को उसकी आदत लगाएं. ऐसे में आपके बच्चे को आपके हाथ का बना खाना जितना टेस्टी लगेगा, उतना पिज़्ज़ा, बर्गर नहीं. ये ट्रिक बहुत कारगर है.

–  अनुरीता त्रिपाठी

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