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ख़तरनाक हो सकती है बच्चों में ईर्ष्या की भावना (Jealousy In Children Can Be Dangerous)

ईर्ष्या (Jealousy) एक ऐसी भावना है, जो बड़ों के ही नहीं, बच्चों (Children) के जीवन में दबे पांव कभी भी आ सकती है. बच्चों में ईर्ष्या की भावना अपने छोटे भाई-बहन, दोस्तों और सहपाठियों को देखकर आती है. अगर बचपन से ही उनमें ईर्ष्या को कंट्रोल न किया जाए, तो आगे चलकर पैरेंट्स को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं.

 Jealousy in Children

बच्चों में चार तरह की होती है ईर्ष्या

  1. मटेरियल जेलेसी (खिलौने आदि भौतिक चीज़ों को लेकर होनेवाली ईर्ष्या): जब बच्चा बाहरी दुनिया के संपर्क में आता है, तो अपने दोस्तों, सहपाठियों और भाई-बहनों से वह जो चाहता है, जब उसे नहीं मिलता है, तो वह उनसे ईर्ष्या करने लगता है, जिसे ‘मटेरियल जेलेसी’ कहते हैं.
  2. शैक्षणिक योग्यता व कौशल से जुड़ी ईर्ष्या: जब बच्चा अपने सहपाठियों से शैक्षणिक व खेल संबंधी ईर्ष्या करता है, तो इससे उसकी ख़ुद की परफॉर्मेंस पर बुरा प्रभाव पड़ता है. इसका मतलब है कि वह अपने को दूसरे बच्चों से कमतर आंकता है और ख़ुद को अयोग्य महसूस करता है.
  3. सोशल जेलेसी: जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होने लगता है, उसमें अपने दोस्तों (गर्लफ्रेंड/बॉयफ्रेंड) को लेकर ईर्ष्या पनपने लगती है. सोशल जेलेसी, जो बचपन में नहीं थी, लेकिन किशोरावस्था आने तक स्वत: ही बढ़ने लगती है.
  4. भाई-बहनों के बीच होनेवाली ईर्ष्या: (सिबलिंग जेलेसी): ईर्ष्या का वह रूप है, जो बचपन में हमें आसपास देखने को मिलता है. इस स्थिति में ईर्ष्यालु बच्चा अपने ही भाई-बहनों से ईर्ष्या करता है, जिसके कारण वह हेल्दी सिबलिंग रिलेशनशिप को ख़राब कर देता है.

बच्चों में ईर्ष्या की भावना जब ख़तरनाक होने लगती है, तो- 

* उनके आत्मविश्‍वास में कमी आने लगती है.

* अन्य बच्चों के साथ आक्रामक व्यवहार करने लगते हैं.

* वे ख़ुद को बेबस और लाचार महसूस करते हैं.

* दूसरे बच्चों की बुलिंग करते हैं.

* अपने दोस्तों और सहपाठियों से अलग-थलग रहते हैं.

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कैसे निबटें पैरेंट्स बच्चों में पनपनेवाली ईर्ष्या से?

* जब बच्चे मटेरियल जेलेसी से ग्रस्त होते हैं, तो पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि वे बच्चों को समझाएं कि हर परिवार की आर्थिक स्थिति अलग-अलग होती है, इसलिए अन्य बच्चों के खिलौनों आदि चीज़ों से ईर्ष्या करने की बजाय अपने पास जो है, उसी में ख़ुश रहें.

* शैक्षणिक व कौशल संबंधी ईर्ष्या से ग्रस्त होने पर पैरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चों की योग्यता को पहचानें और उनके भीतर छिपी हुई ईर्ष्या को दूर करने की कोशिश करें. बच्चों का ध्यान उनकी व्यक्तिगत योग्यता और विशेषताओं की ओर आकर्षित करें. इसके अलावा जिन विषयों या क्षेत्रों में वे कमज़ोर हैं, उनमें सुधार करें.

* बच्चों में सोशल जेलेसी होने पर पैरेंट्स को उनकी भावनाएं समझनी चाहिए. उन्हें अकेला छोेड़ने की बजाय उनके साथ समय बिताएं. पैरेंट्स का सपोर्ट उनमें सकारात्मक सोच बढ़ाएगा.

* सिबलिंग के बीच होनेवाले मतभेदों को दूर करना पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है. उनके बीच होनेवाली नकारात्मक बातों पर रोक लगाएं और सभी बच्चों पर पूरा ध्यान दें.

* बच्चों में ईर्ष्या की भावना दूर करने के लिए ज़रूरी है कि घर, स्कूल, पार्क आदि जगहों पर दोस्तों के साथ होनेवाली उनकी बातों को ध्यान से सुनें, जैसे- वे किस बात से ख़ुश हैं, किस बात से परेशान हैं, किसी कारण से उन्हें जलन, तनाव, अवसाद या चिड़चिड़ापन तो नहीं है. इनके पीछे छिपे कारणों को जानने का प्रयास करें. जलन की भावना दूर करने के लिए-

  1. उन्हें महान लोगों के प्रेरक प्रसंग सुनाएं, जिससे उनका खोया हुआ आत्मविश्‍वास वापस लौट आए.
  2. उनमें नकारात्मक विचारों को दूर करके सकारात्मक सोच बढ़ाएं.
  3. उनकी उपलब्धियों को सराहें.

4.अच्छा काम करने पर उन्हें प्रोत्साहित करें.

5.उनके अच्छे सेंस ऑफ ह्यूमर की तारीफ़ करें.

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* ईर्ष्याग्रस्त होने पर बच्चों को अपनी बात अपने फ्रेंड्स या फैमिली मेंबर से शेयर करने के लिए प्रेरित करें, ताकि पैरेंट्स ईर्ष्या का कारण जान सकें.

* यदि बच्चे ईर्ष्या का कारण नहीं बताते हैं, तो उन्हें डायरी में लिखने के लिए कहें. लिखने के बाद पैरेंट्स उसे दो-तीन बार पढ़ने के लिए कहें. ईर्ष्या का कारण जानने के बाद उससे निबटने के तरी़के भी पैरेंट्स व बच्चों को समझ में आने लगेंगे.

* हर बच्चा अपने आप में ख़ास होता है, इसलिए पैरेंट्स बात-बात पर दूसरे बच्चों के साथ उसकी तुलना न करें. बार-बार तुलना करने पर बच्चों के दिमाग़ में यह बात घर कर जाती है कि पैरेंट्स उन्हें प्यार नहीं करते. धीरे-धीरे उनके मन में जलन की भावना बढ़ने लगती है और उनका आत्मविश्‍वास कमज़ोर होने लगता है.

* छोटे बच्चों को समझाना मुश्किल काम होता है, लेकिन कुछ बातों के बारे में उन्हें बताना बहुत ज़रूरी है, जैसे- ईर्ष्या. यदि बच्चे अपने छोटे भाई-बहन से ईर्ष्या करते हैं, तो पैरेंट्स को चाहिए कि प्यार और धैर्य के साथ बड़े बच्चों को समझाएं कि नए सदस्य के आने पर या छोटे भाई-बहनों के कारण उनके प्यार में कोई कमी नहीं आएगी. पैरेंट्स यदि प्यार, धैर्य और विश्‍वास के साथ उन्हें समझाएंगे, तो बच्चे ज़रूर समझेंगे.

* पैरेंट्स और बच्चों के बीच संबंधों की मज़बूती और ईर्ष्या को कम करने के लिए ज़रूरी है कि बच्चों को ‘स्पेशल फील’ कराएं, जैसे- उन्हें घुमाने के लिए बाहर ले जाएं, उनकी फेवरेट चीज़ें उपहार में दें आदि. पैरेंट्स के ऐसा करने से बच्चों को महसूस होगा कि पैरेंट्स अभी भी उनसे उतना ही प्यार करते हैं और उनके साथ समय बिताना चाहते हैं.

* बचपन से ही बच्चों में शेयरिंग की भावना विकसित करें. उन्हें शेयरिंग का महत्व समझाएं. शेयरिंग से वे हमेशा ख़ुश रहेंगे और उनके मन में कभी भी ईर्ष्या पैदा नहीं होगी.

                             – पूनम नागेंद्र शर्मा

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इन केमिकल्स से बचाएं अपने बच्चों को… (Protect Your Children From These Chemicals)

आज हम जिस युग में और जिस तरह की लाइफस्टाइल जी रहे हैं, उसमें हर चीज़ में केमिकल्स (Chemicals) की भरमार है. ऐसे में बेहद मुश्किल है ख़ुद को और अपने बच्चों (Children) को भी इनसे बचाना, लेकिन कुछ कोशिश करके केमिकल्स से बचा भी जा सकता है और उन्हें हेल्दी व सेफ भी रखा जा सकता है.

 How To Protect Your Children

केमिकल्स से बचने के लिए ज़रूरी नहीं कि हर चीज़ ऑर्गैनिक ही ख़रीदें: यह संभव भी नहीं कि हर चीज़ ऑर्गैनिक हो, लेकिन आप अपनी लाइफस्टाइल में थोड़ा-सा बदलाव करके केमिकल्स की चपेट से बच सकते हैं. अपने घर को व बच्चों को ज़हरीले तत्वों के संपर्क में आने से बचा सकते हैं.

नेचुरल हवा आने दें: खिड़की, दरवाज़ों से जितना संभव हो नेचुरल लाइट व हवा आने दें, ताकि अंदर मौजूद प्रदूषण भी बाहर निकल सके. क्रॉस वेंटिलेशन ज़रूरी है.

पर्सनल केयर व क्लीनिंग प्रोडक्ट्स के लेबल्स ज़रूर पढ़ें: ऐसे ब्रान्ड्स लें, जिनमें पैराबेन्स, ऑक्सिबेनज़ोन, पैथालेट्स न हों, क्योंकि ये केमिकल्स एंडोक्राइन सिस्टम में गड़बड़ी पैदा करते हैं. फ्रेग्रेंस फ्री प्रोडक्ट्स बेहतर होते हैं, लेकिन कुछ फ्रेग्रेंसवाले भी ऐसे होते हैं, जो ज़्यादा केमिकल्स यूज़ नहीं करते. एक उपाय यह भी है कि आप घर पर ही केमिकल फ्री सोल्यूशन बनाएं- विनेगर और पानी को समान मात्रा में मिलाएं, साथ ही थोड़ा-सा नींबू का रस भी मिक्स कर लें.

फुटवेयर को कमरे के अंदर न लाएं: आपको अंदाज़ा भी नहीं कि आपके जूते-चप्पल न जाने कितने तरह के ज़हरीले केमिकल्स अपने साथ लाते हैं. बेहतर होगा उन्हें घर या कमरे के बाहर ही रखें.

प्लास्टिक का इस्तेमाल सीमित कर दें: बच्चों को अक्सर आप खाना-पानी प्लास्टिक के टिफिन व बोतल में देती होंगी. इसके अलावा घर पर भी प्लास्टिक का इस्तेमाल होता ही होगा. बेहतर होगा प्लास्टिक की जगह स्टील या कांच का उपयोग बढ़ा दें. प्लास्टिक को माइक्रोवेव में गर्म न करें, न ही प्लास्टिक के बर्तनों में गर्म खाना परोसें. इसके ज़रिए ज़हरीले केमिकल्स आसानी से शरीर में पहुंच जाते हैं.

खिलौनों को समय-समय पर क्लीन करें: खिलौनों को बच्चे मुंह में ले जाते हैं, कभी-कभी रबर के बने खिलौनों को चबाने लगते हैं, इसी तरह प्लास्टिक के खिलौने भी बच्चों के पास होते हैं. बेहतर होगा खिलौनों की क्वालिटी पर ध्यान दें, साथ ही उनकी साफ़-सफ़ाई पर भी. इनके ज़रिए धूल-मिट्टी व कई तरह के केमिकल्स बच्चों के शरीर में पहुंच सकते हैं.

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बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रखें: बच्चे खेल-खेल में क्लीनिंग प्रोडक्ट्स व सोल्यूशन्स की तरफ़ चले जाते हैं और यदि आपका ध्यान न हो, तो वो उन्हें मुंह में भी ले जाते हैं. बच्चों की इस तरह की गतिविधियों पर ध्यान दें और इन प्रोडक्ट्स को उनकी पहुंच से दूर रखें. इन प्रोडक्ट्स को ऊपर शेल्व्स में रखें, जहां तक बच्चे पहुंच न पाएं. बच्चों के सामने भी इन प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल न करें. लापरवाही में इन्हें खुला न छोड़ दें.

हाइजीन की आदत डलवाएं: बच्चों को साबुन से हाथ धोने का महत्व व कब-कब हाथ धोना ज़रूरी हैं, यह भी बताएं. इससे वो बहुत-से हानिकारक केमिकल्स से बच सकते हैं.

किस तरह के केमिकल्स किस रूप में हो सकते हैं?

लेड: बच्चों का पालना, घर का पेंट, कुर्सी, पेंटेड टॉयज़ आदि यदि बहुत पुराने हो चुके हैं या पहले के बने व पेंट किए हुए हैं, तो बहुत हद तक संभव है कि इनमें लेड की मौजूदगी हो. इनका इस्तेमाल न करें.

रैट पॉयज़न, पेस्टिसाइड्स, स्प्रेज़: इन सबको खुले में न छोड़ें, जो बच्चों के हाथ लग जाएं. न ही इस तरह के ज़हरीले स्प्रेज़ का इस्तेमाल मैट, मैट्रेस, चादर आदि पर करें, जिससे बच्चे प्रभावित हो सकें.

बीपीए: यह एक तरह का इंडस्ट्रियल केमिकल होता है, जो कुछ तरह के प्लास्टिक्स बनाने के काम आता है. इस तरह से यह बच्चों तक पहुंच सकता है.

मेडिसिन्स: किसी भी तरह की मेडिसिन्स बच्चों की पहुंच से दूर रखें. ग़लती से वो उन्हें खा सकते हैं. मेडिसिन्स में भी कई तरह के ख़तरनाक केमिकल्स होते हैं, इसलिए कोशिश करें कि बच्चों को इनसे दूर रखें.

अल्कोहल: बच्चों के सामने पार्टीज़ में या कैज़ुअली भी अल्कोहल का सेवन अवॉइड करें और घर पर अल्कोहल रखते हों, तो कोशिश करें कि बच्चों की पहुंच से दूर हों.

फूड एक्स्ट्रैक्ट्स: वेनीला या आल्मंड जैसे फूड एक्स्ट्रैक्ट्स में अल्कोहल हो सकता है, जो बच्चों के लिए काफ़ी हानिकारक हो सकता है. इसी तरह से माउथवॉश भी बच्चों को यूज़ न करने दें, क्योंकि इनमें भी अल्कोहल हो सकता है.

कॉस्मैटिक्स और टॉयलेट्रीज़: बच्चे कॉस्मैटिक्स के प्रति बहुत आकर्षित होते हैं, लेकिन आपकी लिपस्टिक से लेकर परफ्यूम, हेयर डाय, आईलाइनर, नेलपॉलिश आदि तक केमिकल्स से भरपूर होते हैं. इसी तरह से शू पॉलिश, टॉयलेट क्लीनर्स, फर्नीचर पॉलिश, डिश क्लीनर्स, फेस वॉश, सोप्स, हैंड सैनिटाइज़र्स आदि में भी काफ़ी केमिकल्स होते हैं, इन्हें बच्चों की पहुंच से दूर ही रखें. ये उनकी सेहत को प्रभावित कर सकते हैं.

अनहेल्दी खाना व केमिकल से पके फल/सब्ज़ियां: कैन्ड फूड, प्रिज़र्वेटिव्स से भरपूर फूड, एरिएटेड ड्रिंक्स, नकली पके फल-सब्ज़ियों से भी बच्चों को बचाना ज़रूरी है. बेहतर होगा फल-सब्ज़ियों को अच्छी तरह से धोकर और यदि संभव हो, तो छीलकर खाएं, इससे केमिकल का असर कम होगा.

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कैसे बचाव करें?

* घर को पूरी तरह से केमिकल फ्री करना तो संभव नहीं, लेकिन कुछ प्रयास कर सकते हैं.

* कभी भी वॉशिंग पाउडर, सोडा, फिनाइल जैसी चीज़ें खाली फूड कंटेनर्स में भरकर न रखें. बच्चा ग़लती से इन्हें खाने की चीज़ समझ सकता है.

* बच्चों की गतिविधियों पर नज़र रखें. बहुत ज़्यादा मोबाइल/कंप्यूटर आदि पर न खेलने दें, उनमें से भी केमिकल व हानिकारक वेव्स व रेज़ निकलती हैं.

* हेल्दी ईटिंग हैबिट्स और हाइजीन की आदत डालें. टॉयलेट यूज़ करने के बाद, खाना खाने से पहले, खाना खाने के बाद, बाहर से खेलकर आने पर, पब्लिक प्लेस से आने के बाद, डोर के हैंडल्स, लैचेस आदि यूज़ करने के बाद साबुन से हाथ धोने की आदत डलवाएं. रिसर्च बताते हैं कि इन हेल्दी हैबिट्स से बच्चे फ्लू, डायरिया, टायफॉइड व अन्य कई तरह की बीमारियों से काफ़ी हद तक बच सकते हैं व स्कूल में भी उनकी अनुपस्थिति में कमी आने लगती है.

* खिलौने ख़रीदते व़क्त ध्यान रखें कि अच्छे ब्रांड के ही लें. सस्ते प्लास्टिक से बने खिलौने अवॉइड करें. बच्चे इन्हें मुंह में डालते हैं, जिससे उन्हें नुक़सान हो सकता है.

– ब्रह्मानंद शर्मा

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मिशन एडमिशन: पैरेंट्स न करें ये ग़लतियां (Mission Admission- Parents Don’t Make These Mistakes)

आजकल के पैरेंट्स (Parents) बहुत समझदार हो गए हैं. वो अपने बच्चे को डॉक्टर-इंजीनियर (Doctor-Engineer) बनाने की रेस में शामिल नहीं होते, बच्चे को अपना करियर ख़ुद चुनने की पूरी छूट देते हैं, लेकिन क्या ये काफ़ी है? बात जब बच्चे के एडमिशन की हो, तो आज भी पैरेंट्स कुछ ग़लतियां (Mistakes) कर जाते हैं. यदि आप भी अपने बच्चे का कॉलेज में एडमिशन कराने जा रहे हैं, तो समझिए यह लेख आपके लिए ही है. 

Admission Guide

बच्चों का सही कॉलेज में एडमिशन बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है, क्योंकि इस पर आपके बच्चे का भविष्य निर्भर होता है. बच्चों का एडमिशन कराते समय पैरेंट्स अक्सर कौन-सी ग़लतियां कर जाते हैं और उन ग़लतियों से कैसे बचा जा सकता है, ये जानने के लिए हमने बात की काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट डॉ. माधवी सेठ से. उनके अनुसार, जानकारी के अभाव में आज भी पैरेंट्स बच्चों के एडमिशन के समय कई ग़लतियां कर जाते हैं. पैरेंट्स की कुछ आम ग़लतियों के बारे में उन्होंने हमें इस तरह बताया.

बच्चे पर ज़रूरत से ज़्यादा विश्‍वास

पहले पैरेंट्स बच्चों पर अपनी इच्छाएं थोपते थे, लेकिन आज के पैरेंट्स इतने उदार हो गए हैं कि वो वही करते हैं, जो उनका बच्चा चाहता है. लेकिन आपका बच्चा क्या अभी इतना मैच्योर है कि वो अपनी ज़िंदगी का इतना बड़ा ़फैसला अकेले ले पाए? बस, यहीं पैरेंट्स चूक कर जाते हैं. अपने बच्चे पर विश्‍वास ज़रूर करें, लेकिन अपनी ज़िम्मेदारी भी समझें. आपके बच्चे को कौन-सा करियर चुनना है, इसके लिए पहले उससे बात करें. साथ ही ये भी ज़रूर देखें कि आपका बच्चा जिस क्षेत्र में करियर बनाना चाहता है? क्या उसमें वाकई उसकी रुचि है? अक्सर बच्चे अपने आसपास, दोस्तों या फिल्मों से प्रभावित होकर ये मान लेते हैं कि उन्हें भी इसी क्षेत्र में करियर बनाना है, लेकिन ऐसा करना बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना भी हो सकता है. उदाहरण के लिए, माना आपका बच्चा आपसे कहता है कि उसे गेम डेवलपर बनना है, लेकिन उसके लिए आपको ये देखना होगा कि बच्चे की फिज़िक्स, मैथ्स और टेक्निकल नॉलेज कितनी है? यदि ऐसा नहीं है, तो आप बच्चे को ये समझाएं कि गेम खेलना जितना आसान है, गेम डेवलप करना उतना ही मुश्किल काम है.

एडमिशन कराकर निश्‍चिंत हो जाना

बच्चे ने जिस क्षेत्र में चाहा, वहां उसका एडमिशन कराकर और उसके लिए मोटी फीस भरकर आपकी ज़िम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती. आपको ये भी देखना होगा कि क्या आपके बच्चे का पढ़ाई में मन लग रहा है. कई बार एडमिशन के बाद बच्चे को लगने लगता है कि उससे वो पढ़ाई नहीं हो पा रही है. ऐसे में ये देखना आपकी ज़िम्मेदारी है कि आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है. माना आपने बच्चे के कहने पर उसका इंजीनियरिंग में एडमिशन करा दिया, लेकिन एडमिशन के बाद बच्चे को ये महसूस हो रहा है कि उसे वो पढ़ाई मुश्किल लग रही है, तो ऐसे में सबसे पहले इसका कारण जानने की कोशिश करें. यदि कोई हल नहीं निकल रहा है, तो बच्चे का टाइम बर्बाद करने की बजाय आपको उसका दूसरे क्षेत्र में एडमिशन करा देना चाहिए. कई पैरेंट्स बच्चों पर ये दबाव डालते हैं कि इतनी मोटी फीस भरी है, अब तो तुम्हें पढ़ना ही होगा, लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं है. इससे आपका पैसा, बच्चे का समय और एनर्जी सब कुछ बेकार चला जाएगा. यदि बच्चे के एडमिशन में आपसे ग़लती हो भी गई है, तो उसे दोहराने की बजाय व़क्त रहते उसे सुधार लें.

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रिसर्च की कमी

आज भी कई पैरेंट्स बच्चे का एडमिशन कराने से पहले रिसर्च नहीं करते, जिसके कारण वो सही फैसला नहीं ले पाते. पैरेंट्स को सबसे पहले यह जानना चाहिए कि आपके बच्चे की किस क्षेत्र में रुचि है. इसके लिए सबसे पहले बच्चे का ऐप्टीट्यूड टेस्ट करवाएं. इससे आपको बच्चे का करियर चुनने में आसानी होगी. इसके साथ ही बच्चे को बचपन से हर एक्टीविटी के लिए प्रोत्साहित करें. इससे आपको ये जानने में आसानी होगी कि आपके बच्चे की रुचि किस चीज़ में है, वो किस क्षेत्र में अच्छा परफॉर्म कर सकता है. कई बार बच्चे दूसरों की देखादेखी में उनकी रुचि को अपनी रुचि बना लेते हैं, ऐसे में पैरेंट्स के लिए ये जानना ज़रूरी है कि बच्चे की ये रुचि कुछ समय के लिए है या वाकई उसे वो काम बहुत पसंद है. बच्चे को अपनी पसंद-नापसंद चुनने की आज़ादी दें, लेकिन उसकी पसंद सही है या नहीं, ये देखना आपकी ज़िम्मेदारी है. बच्चे की पढ़ाई के लिए मोटी फीस भर देना काफ़ी नहीं, बच्चे के भविष्य के लिए रिसर्च करना ज़्यादा ज़रूरी है.

बच्चे को ज़रूरत से ज़्यादा प्रोत्साहित या निरुत्साहित करना

कई पैरेंट्स अपने बच्चे को इतना ज़्यादा प्रोत्साहित करते हैं कि उसके छोटे से छोटे काम को भी बड़ा बताते हैं. वो बच्चे से कहते हैं कि तुम कुछ भी कर सकते हो, लेकिन जब बच्चा ऐसा नहीं कर पाता, तो उसका आत्मविश्‍वास कम होने लगता है. इसी तरह कई पैरेंट्स अपने बच्चे को इतना निरुत्साहित करते हैं कि उसके हर काम में कमी निकालते हैं. पैरेंट्स की इस हरक़त की वजह से बच्चे का आत्मविश्‍वास कम हो जाता है और वो ख़ुद पर भरोसा नहीं कर पाता. आप ऐसी ग़लती कभी न करें, बच्चे को न अति उत्साहित करें और न ही उसका कॉन्फिडेंस कम करें. अपने बच्चे को उसका सही पोटेंशियल बताकर उसे गाइड करें. जहां बच्चे को कुछ समझ न आए, वहां उसकी मदद करें.

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एडमिशन से पहले इन बातों पर ध्यान दें

* बच्चे का एडमिशन आपकी इन्फॉर्म्ड चॉइस होनी चाहिए यानी आपका बच्चा क्या कर रहा है, ये उसे और आपको अच्छी तरह से पता होना चाहिए. आप जब एक साड़ी ख़रीदने जाती हैं, तो उसके लिए पहले कई साड़ियां देखती हैं, तब जाकर एक साड़ी ख़रीदती हैं, फिर ये तो आपके बच्चे के भविष्य का सवाल है, इसके लिए आपको पूरी रिसर्च करनी चाहिए.

* बच्चे के करियर के लिए अब आपके पास बहुत सारे विकल्प मौजूद हैं, इसलिए आपको सोच-समझकर फैसला लेना चाहिए. पहले सारे विकल्पों के बारे में पता कर लें, फिर फैसला लें. बच्चे का एडमिशन कराते समय इमोशनल होकर डिसीज़न न लें, अच्छी तरह सोच-समझकर ही फैसला लें.

* किसी बच्चे से अपने बच्चे की तुलना कभी न करें. जब दो जुड़वां बच्चे एक जैसे नहीं हो सकते, तो आपका बच्चा किसी के जैसा कैसे हो सकता है.

* बच्चे का एडमिशन कराते समय ये बात भी दिमाग़ में रखें कि आपका बच्चा यदि ये पढ़ाई नहीं कर पाया, तो आपके पास अगला विकल्प क्या होगा. ऐसे में बच्चे की पूरी फीस एक साथ भरने की बजाय किश्तों में फीस भरने का विकल्प चुनें.

एवरेज बच्चे क्यों निकल जाते हैं आगे?

आमतौर पर एवरेज बच्चे इसलिए आगे निकल जाते हैं, क्योंकि वो एक्स्ट्रा करिक्यूलर एक्टिविटीज़ में ज़्यादा हिस्सा लेते हैं, जिससे उनकी ओवरऑल ग्रोथ होती है और वो ज़िंदगी की दौड़ में आगे निकल जाते हैं. आप भी अपने बच्चे को बचपन से ही एक्सपोज़र दें, उसे हर एक्टिविटी में हिस्सा लेने को कहें. जिस एक्टिविटी में उसकी रुचि होगी, उसे वो ख़ुशी-ख़ुशी करेगा. कई बार बच्चे दूसरों की देखादेखी किसी चीज़ में रुचि लेते हैं, लेकिन कुछ समय में ही वो उससे बोर होने लगते हैं.  लेकिन उस एक्टिविटी में यदि उनकी रुचि वाकई है, तो वो कभी बोर नहीं होंगे.

– कमला बडोनी

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रिश्तेदारों से क्यों कतराने लगे हैं बच्चे? (Why Do Children Move Away From Relatives?)

क्या-क्यों, कैसे-कब, ऐसा मत करो, ये करो… कुछ ऐसे सवाल होते हैं, जो रिश्तेदार बच्चों (Children) से ख़ूब करते हैं. कई बार इन वजहों से भी बच्चे रिश्तेदारों (Relatives) से दूरी बना लेते हैं. इसके अलावा हम उन तमाम संभावनाओं को जानने की भी कोशिश करते हैं, जिससे बच्चे रिश्तेदारों से कतराते हैं.

Children Problems

एक समय था जब बच्चों में बड़ा उमंग-उत्साह रहता था रिश्तेदारों के घर जाने का. लेकिन व़क्त के साथ बहुत कुछ बदलता चला गया. अब चेहरों पर मुस्कान रहती है, पर दिल में उतनी ख़ुशी नहीं रहती. क्या बच्चों की सोच बदल गई है? क्या बच्चों को नाते-रिश्तेदार खटकने लगे हैं? या फिर उनका दायरा सीमित हो गया है? ऐसे तमाम सवालात हैं, जिनके जवाब खोजना निहायत ज़रूरी है.

बच्चों का मनोविज्ञान

सबसे पहले हमें बच्चों के मनोविज्ञान को समझना होगा. आख़िर बच्चा क्यों रिश्तेदारों को पसंद नहीं कर रहा? उनसे हिलमिल नहीं रहा.. बातचीत नहीं कर रहा.. उन्हें अनदेखा करता रहता है… मनोवैज्ञानिक रेनू गिरजा के अनुसार, बच्चे मासूम होते हैं, लेकिन अतीत में उनके साथ कुछ ऐसा हुआ होता है, जिसका प्रभाव उनके व्यवहार पर पड़ता है. इसके अलावा हो सकता है बच्चे को कुछ रिश्तेदारों का स्वभाव नापसंद हो. उनका ज़रूरत से ज़्यादा सवाल करना, बच्चे के बारे में मीनमेख निकालना उसे नागवार गुज़रता हो. इस बात की भी संभावना है कि रिश्तेदार बच्चों की तुलना करते हो कि फलां रिश्तेदार का बेटा देखो पढ़ने में कितना होशियार है, फर्स्ट आता है… तुम्हारा तो पढ़ने पर ध्यान ही नहीं है… तुम्हारी यह आदत अच्छी नहीं है… हर व़क्त फोन पर रहते हो… इस तरह की बातें करनेवाले रिश्तेदारों से यक़ीनन बच्चे दूर भागते हैं, क्योंकि उनको देखते ही बच्चों का मन कह उठता है, लो आई मुसीबत… फिर वे किसी अप्रिय घटना के होने या अपना मूड ख़राब करने से बेहतर यही समझते हैं कि उनके सामने ही न जाएं.

बच्चों का स्वभाव

* कुछ बच्चे शर्मीले व संकोची स्वभाव के होते हैं. वे बहुत कम ही किसी से मिल-जुल पाते हैं या खुल पाते हैं.

* इसके विपरीत मुंहफट व हाज़िरजवाब बच्चे भी होते हैं, जो अपनी दुनिया में मस्त रहना पसंद करते हैं. उन्हें अपने सिवा किसी से कोई लेना-देना नहीं रहता.

* गंभीर बच्चों का तो यह हाल है कि वे अपने पैरेंट्स से भी अधिक नहीं बोल पाते, तो भला रिश्तेदारों की क्या बिसात.

* पढ़ाकू स्वभाव के बच्चों को तो रिश्तेदार विलेन की तरह लगते हैं. वे परीक्षा हो या फिर अन्य ज़रूरी प्रोजेक्ट्स, कॉम्पटीशन आदि इन सब में इस कदर जुड़े रहते हैं कि उन्हें इसमें किसी की भी दख़लअंदाज़ी या फिर रुकावट पसंद नहीं आती और इसमें रिश्तेदार उनकी टॉप लिस्ट में होते हैं.

* ज़िद्दी स्वभाव के बच्चे भी रिश्तेदारों को बहुत कम ही अहमियत देते हैं. वे केवल अपनी ज़रूरत से मतलब रखते हैं.

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गेम्स-मोबाइल का नशा

* दरअसल, उस समय वे अपने गेम में इस कदर गुम रहते हैं कि उसके आगे उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता.

* वे अधिकतर समय एक ही जगह पर बैठे रहकर बस इनमें मग्न रहते हैं. तब उन्हें किसी की भी दखलंदाज़ी पसंद नहीं आती, फिर चाहे वो रिश्तेदार ही क्यों न हों.

* वीडियो गेम्स व मोबाइल फोन की आदतों ने बच्चों को रिश्तों से दूर कर दिया है.

* कुछ बच्चे तो जैसे ही कोई मेहमान, रिश्तेदार आते हैं, तो अपना फोन लेकर दूसरे कमरे में चले जाते हैं या फिर घर से बाहर चले जाते हैं.

* उस पर स्मार्टफोन के एडिक्शन ने तो बच्चों को रिश्तेदार क्या, अपनों से भी दूर कर रखा है.

* वैसे सोशल मीडिया ने भी हम सभी की जीवनशैली में बहुत अधिक दख़लअंदाज़ी की है, ख़ासकर बच्चों के व्यवहार को अधिक प्रभावित किया है.

कई बार पैरेंट्स भी ज़िम्मेदार…

* अक्सर घर पर आए हुए कुछ रिश्तेदारों के जाने के बाद घरवाले उन्हें लेकर

तरह-तरह की बातें करते हैं कि ये रिश्तेदार उन्हें पसंद नहीं. रिश्तेदारों को लेकर कई तरह की नकारात्मक बातें भी करते रहते हैं. उनकी इन सब बातों का बच्चे के दिलोदिमाग़ पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. फिर अनजाने में वो भी उन रिश्तेदारों को नापसंद करने लगता है.

* अक्सर अभिभावक अपने बच्चों की तुलना परिवार, रिश्तेदार के अन्य बच्चों से करते हैं. इससे भी बच्चे उन रिश्तेदारों या चचेरे, ममेरे भाई-बहनों को नापसंद करने लगते हैं.

* कई बार पैरेंट्स रिश्तेदारों के सामने अलग तरह का व्यवहार करते हैं, जिनमें बनावटीपन, औपचारिकता, नाटकीयता अधिक रहती है. इससे भी बच्चे असमंजस में पड़ जाते हैं. फिर उनका व्यवहार भी बदलता है.

* प्रायः अभिभावक परिवारिक रिश्तेदारों से यह झूठ बोलते रहते हैं कि वे बहुत व्यस्त थे, इस कारण मिल नहीं पाए, जबकि हक़ीक़त यह रहती है कि वे उनसे बातचीत ही नहीं करना चाहते, इसलिए व्यस्तता का बहाना बनाते रहते हैं. आगे चलकर बच्चे भी उनकी इस आदत को अपनाने लगते हैं और बड़े होने पर इसी तरह का व्यवहार करने लगते हैं.

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कुछ इस तरह करें कि बात बन जाए…

* बच्चों पर किसी तरह का दबाव न डालें. उन्हें प्यार से अपनेपन व रिश्ते की अहमियत समझाएं.

* जिस तरह वे अपने दोस्त को अपना सब कुछ मानते हैं, उसी तरह रिश्तेदार को भी अपने जीवन में जगह दें, इनके महत्व को बच्चों को बताएं.

* बच्चे को उदाहरण के तौर पर यह तर्क भी दिया जा सकता है कि जिस तरह वे रिश्तेदारों से नहीं मिलते, उसी तरह हम भी किसी के यहां जाते हैं, तो उन रिश्तेदारों के बच्चे भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं.

* बच्चे मासूम व संवेदनशील होते हैं, उन्हें प्यार से सभी पहलुओं पर गौर करते हुए समझाया जाए, तो वे वस्तुस्थिति को बेहतर ढंग से समझ पाते हैं.

* समय-समय पर बच्चों को रिश्तेदारों के यहां ज़रूर ले जाया करें, जिससे उन्हें घुलने-मिलने में आसानी होगी.

– ऊषा गुप्ता

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बच्चों की छुट्टियों को कैसे बनाएं स्पेशल? (How To Make Children’s Summer Vacations Special?)

हम सब की ज़िंदगी में गर्मी की छुट्टियों (Summer Vacations) की यादें बहुत ख़ास होती हैं. जब भी हम अपने बचपन को याद करते हैं, तो उसमें हमारी गर्मी की छुट्टियों की यादें ज़रूर शामिल होती हैं. अपनी छुट्टियों की तरह हम अपने बच्चों की छुट्टियों को कैसे ख़ास और क्रिएटिव बनाएं, आइए जानते हैं..

Summer Vacations Plans

समर वेकेशन यानी गर्मी की छुट्टियां बच्चों के लिए जितनी ख़ास होती हैं, पैरेंट्स के लिए उतनी ही ज़िम्मेदारीभरी होती हैं. यही वो समय होता है जब आप खेल-खेल में अपने बच्चों को बहुत कुछ सिखा सकते हैं. आज के वर्किंग पैरेंट्स के पास समय की कमी है, इसलिए बच्चों की गर्मी की छुट्टियों की ज़िम्मेदारी समर कैम्प और क्लासेस ने ले ली है, लेकिन आपके बच्चे के लिए क्या सही है, इसका चुनाव आपको बहुत सोच-समझकर करना चाहिए. बच्चे को छुट्टियों में बिज़ी रखने के लिए किसी भी क्लासेस में भेज देना सही नहीं है. बच्चों की समर वेकेशन का सही प्रयोग कैसे किया जा सकता है, ये जानने के लिए हमने बात की काउंसलर, साइकोथेरेपिस्ट काव्यल सेदानी से. उन्होंने बताया कि समर वेकेशन में सबसे पहले अपने बच्चों को गैजेट्स से दूर रखें, क्योंकि इनका बच्चों के शरीर और दिमाग़ पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है.

ऐसे प्लान करें बच्चों का समर वेकेशन

काव्यलजी कहती हैं, समर वेकेशन में बच्चे को किसी भी क्लासेस में भेजने से पहले अपने बच्चे की पर्सनैलिटी को समझें, उसकी रुचि और क्षमता के अनुसार ही उसे समर क्लासेस में भेजें. यदि आपके घर में सभी संगीतकार हैं और आपके बच्चे को संगीत में रुचि नहीं है, तो वो बहुत जल्दी बोर हो जाएगा. ऐसे में पैरेंट्स शिकायत करते हैं कि उनका बच्चा एक जगह बैठकर काम नहीं कर पाता, लेकिन उस काम में जब बच्चे की रुचि ही नहीं है, तो वो उस काम में मन कैसे लगा पाएगा. पैरेंट्स के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी है कि आपके बच्चे की रुचि किस चीज़ में है.

पब्लिक स्पीकिंग

पब्लिक स्पीकिंग बच्चों के लिए ही नहीं, हर किसी के लिए ज़रूरी है. बच्चों को ये सिखाना ज़रूरी है कि अपनी बात दूसरों के सामने कैसे रखें. पब्लिक स्पीकिंग से बच्चों का आत्मविश्‍वास बढ़ता है और वो किसी भी प्ऱेजेंटेशन के लिए घबराते नहीं हैं.

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डांस/ड्रामा/एक्टिंग

ये वो क्षेत्र हैं जहां बच्चे को स्टेज प्रेज़ेंस मिलता है और उसका कॉन्फिडेंस बढ़ता है और बॉडी लैंग्वेंज पॉज़िटिव हो जाती है. डांस, ड्रामा व एक्टिंग आगे चलकर भले ही आपके बच्चे का करियर न बनें, लेकिन इनसे उसकी क्रिएटिविटी और कॉन्फिडेंस बढ़ता है, साथ ही बच्चे की पर्सनैलिटी में पॉज़िटिव बदलाव आते हैं.

स्पोर्ट्स

आपके बच्चे की जिस स्पोर्ट्स में रुचि हो, उसे उसके लिए प्रोत्साहित ज़रूर करें. आजकल अधिकतर बच्चों में विटामिन डी3 और विटामिन बी12 की कमी इसीलिए पाई जाती है, क्योंकि वो सारा दिन घर के अंदर अपने गैजेट्स के साथ बिज़ी रहते हैं और उनकी फिज़िकल एक्टिविटी नहीं हो पाती. समर वेकेशन में बच्चों को ख़ासकर ऐसे क्लासेस में भेजें, जहां उन्हें आउटडोर स्पोर्ट्स सिखाए जाएं और उनकी फिज़िकल एक्टिविटी हो सके.

प्रैक्टिकल साइंस

प्रैक्टिकल साइंस से जुड़े क्लासेस बच्चों के लिए बहुत फ़ायदेमंद हैं. किताबें पढ़कर बच्चे उतना नहीं समझ पाते, जितना वो ख़ुद एक्सपेरिमेंट करके सीखते हैं. यदि आपके बच्चे को साइंस में रुचि है, तो उसे ऐसे क्लासेस में भेजें जहां उसे साइंस के एक्सपेरिमेंट्स कराए जाएं. इससे बच्चे की साइंस में रुचि और बढ़ जाएगी और वो किताबी ज्ञान के साथ ही प्रैक्टिकल साइंस को भी समझ पाएगा.

कुकिंग

आपको अपने बच्चों को कुकिंग ज़रूर सिखानी चाहिए. चाहे बेटा हो या बेटी, बेसिक कुकिंग हर बच्चे को आनी चाहिए. यदि आप अपने बेटे को भी कुकिंग सिखाती हैं, तो उसे ये पता चलता है कि कुकिंग में कितनी मेहनत लगती है और जितने प्यार से आप कुकिंग करते हैं, उसमें उतना ही स्वाद आता है. कुकिंग सीखने के बाद आपके बच्चे भोजन का महत्व समझ पाएंगे और खाना बर्बाद नहीं करेंगे.

गार्डनिंग

यदि आप अपने बच्चे को कहीं बाहर नहीं ले जा पा रहे हैं या किसी क्लासेस में नहीं भेज पा रहे हैं, तो उसे घर पर ही किचन गार्डनिंग सिखाएं. गार्डनिंग करने से बच्चे को ये पता चलता है कि हम जो भी खाते-पीते हैं, वो इतनी आसानी से नहीं मिलता, उसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है. आप अपने बच्चे को घर में ही आसानी से उगनेवाले पौधे जैसे- हरी मिर्च, हरा धनिया, टमाटर आदि उगाना सिखा सकते हैं. जब आपका बच्चा ख़ुद गार्डनिंग करेगा, तो उसकी घर में बने खाने में रुचि बढ़ेगी, क्योंकि बच्चे अपनी उगाई हुई हर चीज़ चखना चाहते हैं. गार्डनिंग सिखाकर आप अपने बच्चे को भोजन का महत्व और हेल्दी ईटिंग हैबिट सिखा सकते हैं.

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समर कैम्प

गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों को ऐसे समर कैम्प में भेजें, जहां बच्चों को 4-5 दिन के लिए घर और पैरेंट्स से दूर ले जाया जाता है. वहां बच्चों को किसी भी तरह के गैजेट्स ले जाने की इजाज़त नहीं होती. ऐसे कैम्प में बच्चों को ढेर सारी फिज़िकल एक्टिविटीज़ कराने के साथ ही बच्चों से उनके बेसिक काम ख़ुद करवाए जाते हैं. ऐसे कैम्प में बच्चे आत्मनिर्भर बनना सीखते हैं और गैजेट्स से भी दूर रहते हैं. बच्चों के सेल्फ मैनेजमेंट के लिए ऐसे समर कैम्प बहुत फ़ायदेमंद होते हैं. कैम्प में अपने परिवार से दूर रहकर जब बच्चे अपनी लाइफ को मैनेज करते हैं, तो इससे उनका आत्मविश्‍वास बढ़ता है और मानसिक विकास भी होता है.

– कमला बडोनी

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ख़तरनाक हो सकती है बच्चे की चुप्पी (Your Child’s Silence Can Be Dangerous)

किशोरावस्था (Adolescence) में होनेवाले बदलावों को स्वीकार करना टीनएज बच्चों (Kids) और पैरेंट्स (Parents) के लिए आसान नहीं होता है. लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब टीनएज बच्चे अपनी बातों को पैरेंट्स से शेयर न करके ख़ामोशी का रास्ता चुन लेते हैं. उनकी यह चुप्पी पैरेंट्स के लिए साइलेंट किलर का काम करती है. आइए जानें कैसे?

Child's Care

रीमा वर्किंग मदर है. जब भी उसे व़क्त मिलता है, तो वह अपनी बेटी के साथ समय बिताना चाहती है. पर उसकी बेटी मधुरा, जो बारहवीं में पढ़ती है, को लगता है कि मम्मी उसे स्पेस नहीं देना चाहती, इसलिए वह उससे कटी-कटी रहने लगी है.

बेटी मधुरा का कहना है कि जब भी मैं मम्मी को अपने किसी दोस्त, चाहे वह लड़का हो या लड़की, के बारे में बताती हूं, तो वह ग़ुस्सा हो जाती हैं. इस बात पर अक्सर मेरी उनसे लड़ाई हो जाती है. तंग आकर मैंने उन्हें कुछ बताना ही छोड़ दिया और चुप्पी को अपना विरोध जताने का माध्यम बना लिया है.

रीमा की तरह बहुत से ऐसे पैरेंट्स हैं, जो इस बात से परेशान रहते हैं कि उनके किशोर बच्चे अपनी बातें शेयर करने की बजाय चुप रहते हैं. पैरेंट्स को उनकी यह चुप्पी बहुत अखरती है. ख़ासकर तब जब पैरेंट्स को पता हो कि उनकी तरफ़ से कोई बदलाव नहीं आया है. लेकिन यह भी सच है कि किशोर बच्चे पैरेंट्स से कितनी ही दूरी क्यों न बना लें, पर उनका पैरेंट्स से जुड़ा रहना और मन की बातें शेयर करना भी ज़रूरी है.

मनोवैज्ञानिक नीलम पंत के अनुसार,  माता-पिता को बच्चे के मन की बातें जानने के लिए कई तरह के जतन करने पड़ते हैं. कई बार पैरेंट्स के लिए यह काम बेहद मुश्किल होता है. कारण होता है- पैरेंट्स और बच्चों के बीच दोस्ताना रिश्ते न होना. कई मामलों में तो पैरेंट्स और बच्चों के बीच बहुत अच्छे संबंध होते हैं, फिर भी वे अपने मन की बात खुलकर अपने पैरेंट्स से नहीं कह पाते हैं. ऐसा बढ़ती उम्र के साथ होनेवाले बदलावों की वजह से होता है.

पर्सनल स्पेस

बच्चों को जितनी अपने पैरेंट्स की ज़रूरत होती है, उतनी ही अपने पर्सनल स्पेस की भी. उन्हें इतनी आज़ादी ज़रूर दें कि वे अपने छोटे-छोटे फैसले ख़ुद कर सकें. इससे उनमें आत्मविश्‍वास आएगा. उनका मार्गदर्शन करें, पर अपने फैसले उन पर न थोपें. बच्चों पर जितनी बंदिशें लगाएंगे, वे उतने ही अपनी बातें शेयर करने से कतराते हैं. उन्हें लगने लगता है कि पैरेंट्स से बातें शेयर करना बेकार है. वे उन्हें समझेंगे नहीं, तो वे चुप्पी को अपना विरोध जताने का हथियार बना लेते हैं.

बच्चे की हर डिमांड पूरी करना हो सकता है ख़तरनाक, देखें वीडियो:

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असीमित उम्मीदें

जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगते हैं, पैरेंट्स की उम्मीदें भी बढ़ने लगती हैं. वे अपनी अधूरी इच्छाओं को उनके ज़रिए पूरा करना चाहते हैं. बच्चे जब उन उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाते हैं, तो वे अपने और पैरेंट्स के बीच दूरी बनाने लगते हैं. यहीं से शुरू होता है संवादहीनता का सिलसिला. अगर आपका बच्चा भी चुप रहने लगे, तो आप उससे कोई उम्मीद न करें, बल्कि उस दूरी को कम करने की कोशिश करें.

डांटें-फटकारें नहीं

छोटा बच्चा पैरेंट्स से हर बात शेयर करता है, लेकिन अक्सर वे उसे झिड़ककर या डांटकर चुप करा देते हैं. नतीजतन बच्चा पैरेंट्स से बातें छुपाने लगता है. पैरेंट्स को पता ही नहीं चलता. धीरे-धीरे वह पैरेंट्स से दूरी बनाना शुरू कर देता है. तुलना कर देती है कुंठित अधिकतर पैरेंट्स बच्चे की तुलना उसके दूसरे भाई-बहन या दोस्तों से करते हैं या फिर रिश्तेदारों के सामने ही उनकी कमियों-ख़ूबियों का बखान करने लगते हैं, जो सही नहीं है. हर बच्चे की क्षमता और सामर्थ्य अलग-अलग होती है. पैरेंट्स को ध्यान रखना चाहिए कि ज़्यादा तारीफ़ और ज़्यादा आलोचना दोनों ही बच्चे के लिए ठीक नहीं हैं. पैरेंट्स का कर्त्तव्य है कि उनमें जितनी योग्यता और क्षमता है, उसे निखारने में उनकी मदद करें. उन्हें एहसास कराएं कि वे हर पल उनके साथ हैं.

बच्चे को सोशल बनाएं

सिंगल चाइल्ड के बढ़ते कॉन्सेप्ट और वर्किंग पैरेंट्स होने के कारण बच्चा मेड के भरोसे पलता है या अकेले. ऐसे में उसका दायरा बहुत सीमित हो जाता है. सुरक्षा की दृष्टि से पैरेंट्स उसे घर से अकेले बाहर नहीं जाने देते हैं. नतीजा यह होता है कि वह सोशल नहीं बन पाता है. वह दूसरे बच्चों के साथ घुलना-मिलना नहीं जानता. अपनी बातें मन में दबाए रखता है, लेकिन वर्किंग पैरेंट्स के पास उसकी बातें सुनने का समय नहीं होता.

मनोवैज्ञानिक अंजना भार्गव कहती हैं कि भावनाओं को व्यक्त न कर पाने की स्थिति में धीरे-धीरे वह अपने में ही सिमटता जाता है. अगर वह कुछ कहना भी चाहता है, तो पैरेंट्स के पास सुनने का समय नहीं होता. जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, तो हो सकता है उसमें बदलाव आए, पर ऐसा तभी संभव है जब वह सोशल हो और बाहरी दुनिया के साथ तालमेल बिठा सके. उसकी चुप्पी का लावा जब फूटता है, तो उसका नतीज़ा बहुत ख़तरनाक हो सकता है. बेहतर होगा कि बच्चे को उसके हमउम्र बच्चों के साथ समय बिताने दें.

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कहीं वह चाइल्ड एब्यूज़ का शिकार तो नहीं?

बच्चा अगर अचानक चुप रहने लगे, तो पैरेंट्स जानने की कोशिश करें कि कहीं वह चाइल्ड एब्यूज़ का शिकार तो नहीं है. मनोवैज्ञानिक नीलम पंत का कहना है कि चाइल्ड एब्यूज़ का हल ढूंढ़ने की राह पैरेंट्स से शुरू होती है और वहीं ख़त्म भी. अगर बच्चा पैरेंट्स को अपने साथ हुई किसी घटना के बारे में बताना चाहता है, तो उसे डांटने-फटकारने की जगह उसकी बात सुनें. अपने स्तर पर छानबीन करने की कोशिश करें. पैरेंट्स को यह समझना ज़रूरी है कि चाइल्ड एब्यूज़ एक बहुत बड़ी समस्या है और इसका शिकार कोई भी बच्चा हो सकता है.

कुछ लक्षणों के आधार पर पैरेंट्स यह अंदाज़ा लगा सकते हैं कि बच्चा परेशानी में क्यों है.

* चाइल्ड एब्यूज़ का शिकार बच्चा अगर बड़ी उम्र का है, तो वह गुमसुम हो जाता है, ख़ुद में खोया रहता है. अपनी बात किसी से शेयर नहीं करता.

* बेहद कम उम्र के बच्चे चाइल्ड एब्यूज़ का शिकार होते हैं, तो वे सेक्सुअल हाव-भाव करने लगते हैं और वैसी ही भाषा का प्रयोग भी करने लगते हैं.

इन लक्षणों को समय रहते पहचानें और उनका कारण जानने की कोशिश करें.

पैरेंट्स को अपने बच्चे को एक ऐसा खुला माहौल देना होगा, जिसमें वह अपनी बात उनसे शेयर कर सके. अगर चाइल्ड एब्यूज़ के शिकार बच्चे को सही देखभाल और काउंसलिंग नहीं मिलती है, तो उसका आत्मविश्‍वास ख़त्म हो जाता है. इसलिए एक पैरेंट के रूप में यह ज़रूरी है कि आप उस पर और उसकी बातों पर विश्‍वास करें.

पैरेंट्स रखें इन बातों का ख़्याल

बच्चे के व्यवहार पर नज़र रखें: अगर बच्चा कई दिनों से चुप-चुप लग रहा है, तो पैरेंट्स उसके मन में छिपी बातों को जानने का प्रयास करें. उसे ख़ुशनुमा माहौल दें, ताकि वह अपने मन की बात आपको बता सके. ध्यान रखें, अगर वह कुछ ग़लत कर रहा है, तो तुरंत अपनी प्रतिक्रिया न दें. अन्यथा वह दोबारा आपसे अपने मन की बात शेयर नहीं करेगा.

टीचर के संपर्क में रहें: यदि बच्चा छोटा है, तो उसकी रोज़ाना की गतिविधियों के बारे में जानने के लिए उसकी टीचर से संपर्क करें. हो सकता है कि वह कुछ बातें अपनी टीचर से शेयर करता हो और आपको न बताता हो.

बच्चे के सामने उसके दोस्तों की बुराई न करें: किशोरावस्था में बच्चों को नसीहतें या अपने दोस्तों के बारे में कुछ सुनना अच्छा नहीं लगता है. बेहतर होगा कि उनके दोस्तों से मिलें-जुलें. इससे पैरेंट्स को बच्चे के दोस्तों की जानकारी भी रहेगी.

– सुमन बाजपेयी

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बचें इन पैरेंटिंग मिस्टेक्स से (Parenting Mistakes You Should Never Make)

हर पैरेंट (Parent) की ये ख़्वाहिश ज़रूर होती है कि उनका बच्चा दुनिया का सबसे अच्छा बच्चा हो, बड़ा होकर ख़ूब नाम कमाए, उसे ज़िंदगी की हर ख़ुशी मिले. इस चक्कर में वे कभी बहुत ज़्यादा उदार हो जाते हैं, तो कभी बहुत ज़्यादा सख़्त और कई ग़लतियां (Mistakes) भी कर बैठते हैं. यहां हम कुछ ऐसी ही ग़लतियों की बात कर रहे हैं, जो अक्सर पैरेंट्स कर बैठते हैं और जिसका बच्चे के मन पर बुरा असर पड़ता है.

Parenting Mistakes

* अपना पैरेंटल अधिकार बनाए रखें. बच्चों के फ्रेंड बनें, लेकिन उसकी सीमा ज़रूर निर्धारित करें.

* मोबाइल हो या गेम्स- आज़ादी हो या ज़िम्मेदारी- न उन्हें समय से पहले दें, न ज़रूरत से ज़्यादा, ताकि वो चीज़ों व भावनाओं की कद्र करना सीखें.

* हर बात में टोका-टोकी न करें. वो आपसे भले ही कुछ न कहें, लेकिन अपनी मित्रमंडली में दूसरों को टोकना, छेड़ना या बुली करना उनका स्वभाव बन सकता है.

* उनकी बातों को ध्यान से सुनें. हमारी इंडियन फैमिलीज़ में इसे ़ज़्यादा ज़रूरी नहीं समझा जाता. ज़्यादातर पैरेंट्स बोलते हैं और बच्चे उनकी हर बात सुनते हैं, किंतु चाइल्ड सायकोलॉजिस्ट का कहना है कि बच्चे को अपनी बात कहने का मौक़ा दिया जाना चाहिए और उसे ध्यान से सुना भी जाना चाहिए.

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* हर व़क़्त बच्चे को अनुशासन या एक ही दिनचर्या में बांधकर न रखें. इससे बच्चे की क्रिएटिविटी तथा पर्सनैलिटी का विकास नहीं हो पाएगा.

* बच्चों की ज़िद को उनका स्वभाव न समझें. ज़िद करना बाल सुलभ स्वभाव है. आपके समझदारीपूर्ण रवैये से उम्र के साथ यह आदत अपने आप ही बदल जाएगी.

* बच्चों के सामने बहस या अपशब्दों का प्रयोग कभी न करें. इस तरह उनमें असुरक्षा की भावना पैदा होने लगती है और वो घर से बाहर मित्रों या मित्र के परिवार के बीच समय गुज़ारना पसंद करने लगते हैं.

* ख़ुद को इतना व्यस्त न करें कि बच्चों के लिए समय ही न हो. बच्चों के विकास और दिनचर्या में शामिल होना भी बच्चों के संपूर्ण विकास का हिस्सा है.

* बच्चों के सामने झूठ न बोलें और यदि झूठ बोलना ही पड़ रहा है, तो आगे-पीछे उसकी वजह बताएं और उसे विश्‍वास दिलाएं कि अगली बार आप सच्चाई के साथ परिस्थिति का सामना करेंगी.

बच्चे झूठ क्यों बोलते हैं? जानने के लिए देखें वीडियो:

* बच्चों को अपने संघर्ष की कहानी सुनाकर उनके साथ अपनी तुलना न करें. यदि आप संपन्न हैं, तो उन्हें ख़ुशहाल बचपन दें. आपका संघर्ष उनकी प्रेरणा बन सकता है.

* बच्चों को पैरेंट्स अपने आपसी झगड़ों के बीच इस्तेमाल न करें और न ही उनके सामने फैमिली पॉलिटिक्स की चर्चा करें. इसका बच्चे के दिलोदिमाग़ पर बुरा असर हो सकता है.

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* हर उम्र में बच्चों से समान व्यवहार की अपेक्षा न करें. कल तक बच्चा आपकी हर बात मानता रहा है, लेकिन हो सकता है कि आज उसी बात के लिए प्रश्‍न करने लगे.

* डॉमिनेटिंग पैरेंट न बनें. ‘जैसा कहते हैं वैसा करो’ वाली भाषा न बोलें, बल्कि अच्छे रोल मॉडल बनकर उनके भावनात्मक व संवेदनात्मक विकास को सही रूप से हैंडल करें.

* स्कूली समस्याओं के प्रति उदासीन न हों, बच्चे की प्रॉब्लम को सुनें और उसे सॉल्व करने की कोशिश करें.

* चोरी-छिपे बच्चों की बातें सुनना या ताका-झांकी करना ग़लत है. इस तरह आपके प्रति उनका आदर प्रभावित होगा. आपकी इस आदत को वो पॉज़िटिव रूप में नहीं लेंगे.

– लता कुंदर

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बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताने के 11 आसान तरी़के (10+ Ways To Spend Quality Time With Your Kids)

तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी हैरान हूं मैं… तेरे मासूम सवालों से परेशान हूं मैं… सच है, कई बार बच्चे व ज़िंदगी में हम इस कदर उलझ जाते हैं कि किससे सवाल करें, किसे जवाब दें… पर यह तो जगज़ाहिर है कि बच्चे मासूम होते हैं, वे इस गणित से परे होते हैं… उन्हें तो बस साथ चाहिए, प्यार चाहिए… और पैरेंट्स का साथ तो मानो सारे जहां की ख़ुशियां… आइए, जानते हैं कुछ स्मार्ट ट्रिक्स, जिसे अपनाकर पैरेंट्स बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिता सकते हैं. 

parenting tips

बच्चे तो बच्चे होते हैं, उन्हें चाहे सारी दुनिया की ख़ुशियां दे दो, पर उन्हें पैरेंट्स का साथ सबसे अधिक प्रिय होता है. यही हाल अभिभावकों का भी होता है. माता-पिता दोनों चाहते हैं कि अपने बच्चे को ढेर सारा प्यार, ख़ुशियां और समय दें, पर ऐसा कम ही हो पाता है, ख़ासकर समय के मामले में. वर्किंग कपल्स के साथ यह समस्या अधिक होती है. यहां पर हम कुछ आसान तरी़के बता रहे हैं, जिससे आप अपने बच्चों के साथ अधिक क्वालिटी समय बिता सकेंगे.

  1. मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करें

जब भी आप बच्चों के साथ रहें, मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करें या फिर बहुत ज़रूरी हो, तभी करें. इस तरह आप बच्चों के साथ अधिक क्वालिटी टाइम बिता सकेंगे. बच्चे भी ख़ुशी-ख़ुशी अपने दिनभर की एक्टिविटीज़ के बारे में आपको बताएंगे, जैसे- उन्होंने दिनभर क्या किया, स्कूल में कैसा समय बीता, कोई परेशानी हुई हो, तो उसे भी ज़रूर बताएंगे. ध्यान रहे, जब वे ऐसा कर रहे हों, तो उस समय भूल से भी अपने मोबाइल फोन पर कोई ज़रूरी काम न करते रहें, बल्कि कुछ समय के लिए ख़ुद को फोन से डिसकनेक्ट कर लें. बच्चों को यह बिल्कुल पसंद नहीं होता कि पैरेंट्स उनसे बातचीत करते समय फोन पर बिज़ी रहें. अतः इस बात का ख़्याल रखें.

  1. शॉपिंग में कटौती की जा सकती है

इसमें कोई दो राय नहीं कि आज शॉपिंग करना लोगों का पसंदीदा काम बन गया है, लेकिन बच्चों के साथ अधिक अच्छा समय बिताने के लिए इसमें भी कटौती की जा सकती है. स्मार्ट शॉपिंग का तरीक़ा अपनाएं यानी घर से बाहर जाकर शॉपिंग करने की बजाय आप ऑनलाइन शॉपिंग कर सकते हैं. इसके अलावा ज़रूरी सामानों के लिए होम डिलीवरी की भी सुविधा ली जा सकती है. इससे आप बच्चों के साथ अधिक क्वालिटी टाइम बिता सकेंगे.

  1. घर की बजाय बच्चों पर अधिक ध्यान दें

अक्सर हम घर की साफ़-सफ़ाई, अन्य ग़ैरज़रूरी कामों में बेवजह का अधिक समय ख़र्च कर देते हैं, ऐसा न करें. यह ज़रूरी नहीं कि घर के सभी काम आपको ही करना है. आप मेड रख सकते हैं. इसके अलावा घर के अन्य सदस्य, ख़ासकर पति-पत्नी आपस में काम बांट सकते हैं. इस तरह वे बच्चों के साथ अधिक समय बिता सकेंगे.

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  1. सोशल साइट्स को भी विराम दें

आजकल हर किसी का सोशल साइट्स, जैसे- फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर, व्हाट्सऐप आदि पर अधिक समय बिताना शग़ल-सा बन गया है. यदि आपको भी यह बीमारी है, तो इसका तुरंत इलाज कराएं. इन सबका कम इस्तेमाल करें. उस समय को बच्चे के साथ खेलने, घूमने-फिरने, मौज-मस्ती करने में बिताएं. इन सबसे बच्चे पैरेंट्स से अधिक जुड़ते हैं और पैरेंट्स को भी संतुष्टि रहती है कि वे बच्चों को पर्याप्त समय दे रहे हैं.

  1. बच्चों के साथ मिलकर काम करें

अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों से काम लेना पसंद नहीं करते, जो ठीक नहीं है. वे खाना बनाने से लेकर साफ़-सफ़ाई करने, पौधों को पानी देने आदि छोटे-मोटे काम करते समय बच्चों की मदद ले सकते हैं. उनके साथ मिलकर काम करने से दो फ़ायदे होंगे, एक तो काम जल्दी हो जाएगा और दूसरा आप बच्चों के साथ अधिक से अधिक समय बिता सकेंगे.

  1. ऑफिस के बाद बच्चों का साथ

पैरेंट्स ऑफिस से आने के बाद तुरंत टीवी पर सीरियल, न्यूज़, मनोरंजन आदि में बिज़ी न हो जाएं, बल्कि सबसे पहले थोड़ा-सा समय बच्चों को ज़रूर दें. इसके लिए चाहे आपको अपने पसंदीदा टीवी सीरियल का भी त्याग क्यों न करना पड़े या फिर ज़रूरी न्यूज़ ही क्यों न छूट जाए… पर ऐसा करके आप अपने बच्चे के क़ीमती बचपन को और भी निखार-संवार सकते हैं.

parenting tips

  1. वीकेंड बच्चों की चॉइस

हर हफ़्ते शनिवार की शाम या रात बच्चों की इच्छानुसार बिताएं. फिर चाहे वो कोई मूवी देखना हो या बाहर डिनर करना या फिर रविवार को पिकनिक ही मनाना क्यों न हो. इससे बच्चों के साथ आपकी बॉन्डिंग भी मज़बूत होगी और सभी एनर्जेटिक भी महसूस करेंगे.

  1. बच्चों के साथ करें एक्सरसाइज़

यदि आप मॉर्निंग वॉक, जिम, योग आदि करते हैं, तो बच्चों को भी इसमें इन्वॉल्व करें. इससे फैमिली की फिटनेस और क्रिएटिविटी बढ़ेगी और पैरेंट्स-बच्चों का रिश्ता भी बेहतर होगा.

  1. गार्डनिंग मिलकर करें

बच्चों को गार्डनिंग का भी ख़ूब शौक़ होता है. आप उनके साथ मिलकर बागवानी कर सकते हैं. इससे जहां उन्हें फूल-पौधों की जानकारी मिलेगी, वहीं उनका बौद्धिक विकास भी होगा.

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  1. अपने व बच्चे के शौक़ को साझा करें

व़क्त के साथ बहुत कुछ बदला है, यहां तक कि बच्चे व पैरेंट्स के शौक़ भी मिलते-जुलते से हो गए हैं. ऐसा बहुत बार देखा गया है कि मां भी बेटी के साथ म्यूज़िक, डांस, कुकिंग आदि सीख रही है, तो वहीं पिता भी बेटे के साथ स्विमिंग, ट्रैकिंग, गिटार, तबला आदि में हाथ आज़मा रहे हैं. इस तरह बच्चे-अभिभावक दोनों ही जहां अपने शौक़ को पूरा करते हैं, वहीं एक-दूसरे के साथ बहुत अच्छा समय भी बिता पाते हैं.

  1. कभी बच्चों के साथ बच्चे बन जाएं

यह ज़रूरी नहीं कि आप हमेशा अपने बड़े होने का मुखौटा ओढ़े रहें. कभी-कभी अपने मैच्योरिटी के आवरण को हटाकर बच्चों की तरह हो जाएं. उनके साथ हर वो काम करें, जो उन्हें पसंद हैं, फिर चाहे वो खिलौनों से खेलना हो, ड्रॉइंग करना, क्राफ्ट, मिट्टी से घर बनाना हो, साइकिलिंग करना या वीडियो गेम खेलना. इससे बच्चे को बेइंतहा ख़ुशी मिलेगी और वे आपको अपना प्यारा दोस्त भी समझने लगेंगे.

क्या होता है जब पैरेंट्स अपने बच्चे के दोस्त बन जाते हैं, देखें वीडियो:

बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना बेहद ज़रूरी है…

पैरेंट्स को यह समझना होगा कि बच्चों को हर तरह की सुविधा व महंगी चीज़ें देना, उनकी सभी डिमांड मान लेना ही अपनी ज़िम्मेदारी को पूरा कर देना नहीं है. इन सबसे बढ़कर ज़रूरी है बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि आप अपने बच्चों के साथ जितना अधिक समय बिताएंगे, उतना आप उनके क़रीब आएंगे. एक रिसर्च के अनुसार, बच्चों में 75% इंफेक्शनल डिसीज़ उनके शुरुआती पांच सालों में होती हैं. अतः अभिभावक इस दौरान बच्चों के भावनात्मक पहलुओं पर अधिक ध्यान दें और उन्हें अधिक से अधिक समय दें. बच्चों को सब कुछ सहज होकर सीखने दें. उन पर बेवजह का दबाव न डालें. उनकी परवरिश ख़ुशनुमा माहौल में करें. उनकी पसंद, शौक़ और भावनाओं को समझने की कोशिश करें और उन्हें पर्याप्त समय दें, क्योंकि यही वो समय होता है, जब बच्चों के व्यक्तित्व की पुख़्ता नींव रखी जाती है.

– ऊषा गुप्ता

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दबाव नहीं, प्रेरणा ज़रूरी (Don’t Pressurize, Rather Encourage Your Children)

Encourage Your Children

किसी भी काम को करवाने के लिए बच्चों (Children) को सज़ा या लालच देने की बजाय उन्हें प्रेरणा दी जाए तो उसके परिणाम बेहतर होंगे. उन्हें डराने-धमकाने से बात नहीं बनने वाली. बच्चों, ख़ासतौर पर टीनएज बच्चों की सही तरी़के से परवरिश के लिए पैरेंटिंग के कुछ मूल मंत्रों का ज्ञान होना ज़रूरी है.

क्या आपका बच्चा भी अपनी उम्र के पहले या दूसरे दशक से गुज़र रहा है? क्या आपको उसे ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए रास्ता दिखाने में परेशानी होती है? क्योंकि वो कुछ सुनना या समझना नहीं चाहता? वास्तव में यह उम्र बच्चों के लिए काफ़ी उथल-पुथल भरी होती है. वे कई तरह के शारीरिक व मानसिक बदलावों से गुजर रहे होते हैं. वे अपनी पहचान तलाश रहे होते हैं. इसलिए उन्हें अपनी बातें सही लगती हैं और बाक़ी दुनिया ग़लत. दूसरी तरफ़ अभिभावक चाहते हैं कि बच्चे उनकी बात सुनें. इसके लिए वे उन्हें कभी लालच देते हैं, तो कभी सज़ा. लेकिन ये तरी़के सही नहीं हैं. आपको कुछ ऐसे तरी़के अपनाने होंगे, जिनसे वे ख़ुद ही चीज़ों को करने के लिए प्रेरित हों.

कमियां निकालने की बजाय उसकी प्रशंसा करें

यदि आप बच्चे को सही मायने में प्रोत्साहित करना चाहते हैं तो उस पर अपनी मर्ज़ी न थोपें. आपका बच्चा जो कुछ भी हासिल करता है, उस पर गर्व करना बहुत ज़रूरी है. उदाहरण के लिए यदि आपके बेटे ने डांस क्लास में अच्छा प्रदर्शन किया है, तो उसकी प्रशंसा करें. ऐसे ही अगर बेटी कुछ आर्ट में रुचि दिखाती है तो उसकी सराहना करें.

जबरन बहुत सारी गतिविधियों का हिस्सा न बनाएं

बच्चों को कुछ समय के लिए फ्री भी रहने दें. वैसे भी वे स्कूल में काफ़ी व्यस्त रहते हैं. वे भी ख़ुद के लिए समय चाहते हैं. उन्हें ढेर सारी गतिविधियों का हिस्सा न बनाएं. किसी भी गतिविधि का हिस्सा बनाने से पहले बच्चों की क्षमता को समझें. ऐसा करने से बच्चा भी ख़ुश रहेगा.

निर्णय लेने का मौक़ा दें

बच्चों का सही विकास तभी हो सकता है, जब वे अपने फ़ैसले ख़ुद लेना सीखते हैं. अगर आपकी बेटी ड्रॉइंग सीखना चाहती है और आप चाहते हैं कि वह डांस सीखे तो बेहतर होगा कि उसे मन-मुताबिक़ ड्रॉइंग ही सीखने दें, क्योंकि निर्णय थोपने से वो मन मारकर काम करेगी और आपको मनचाहा परिणाम नहीं मिलेगा.

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हार को स्वीकार करना सिखाएं

बच्चों को अपनी हार स्वीकारना सिखाएं. उन्हें हारने से डराने की बजाय डटकर लड़ने और हर तरह की परिस्थिति का सामना करने के गुर सिखाएं. उनसे कहें कि चिंता मत करो, जीवन में आगे बढ़ने के और भी मौ़के मिलेंगे.

दूसरों से तुलना न करें

हर बच्चा अपनेआप में अलग होता है और हर बच्चे की सीखने और आगे बढ़ने की गति अलग-अलग होती है. ज़रूरी नहीं कि आपके दोस्त के बच्चे की तरह ही आपका बच्चा भी क्लास में अव्वल आए. हो सकता है आपके बच्चे में कोई ऐसा गुण हो, जो उसके बाक़ी साथियों में न हो. अतः दूसरों से अपने बच्चे की तुलना न करें.

प्रेरणास्रोत बनें

बच्चे अपने माता-पिता को बहुत ध्यान से देखते हैं. अगर आप अपने बच्चे से कुछ चाहते हैं तो उसे स़िर्फ बताने की बजाय करके दिखाएं. बच्चे देखकर ज़्यादा सीखते हैं.  आप जिस तरह का व्यवहार करेंगे, बच्चा वही सीखेगा. अतः आप बच्चे को जैसा बनाना चाहते हैं, वैसा ख़ुद बनकर दिखाएं. अपने बच्चे की भावनाओं को समझें. ऐसा करने पर वो भी आपकी इच्छाओं का सम्मान करेगा.

– शिल्पी शर्मा

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बेटी की शादी का ख़र्च बड़ा हो या पढ़ाई का? (Invest More In Your Daughter’s Education Rather Than Her Wedding)

Daughter’s Education

हमारे देश में आज भी बेटी की पढ़ाई (Daughter’s Education) से ज़्यादा उसकी शादी (Wedding) पर ख़र्च किया जाता है. यदि पढ़ाई और शादी में से कोई एक विकल्प चुनना हो, तो अधिकतर माता-पिता बेटी की शादी के ख़र्च को प्राथमिकता देते हैं. क्या ऐसा करना उचित है? क्या बेटी की शादी का ख़र्च उसकी पढ़ाई से ज़्यादा ज़रूरी है?

हमारे देश में बेटी के जन्म पर आज भी चेहरे मुरझा जाते हैं और जन्म के साथ ही बेटी के भविष्य की नहीं, उसकी अच्छे घर में शादी की चिंता माता-पिता के चेहरे पर दिखाई देने लगती है. जन्म लेते ही बेटी को पराया धन मान लिया जाता है और पराया धन समझकर ही उसकी परवरिश की जाती है.

ये है सोच का असर

सदियों से हम ये बातें सुनते आ रहे हैं कि बेटियां तो पराया धन हैं, शादी के बाद इन्हें दूसरे घर जाना है… बेटियों को पढ़ाकर क्या होगा, ज़्यादा पढ़ लेंगी तो शादी में और दिक्कत होगी, लड़का ढूंढ़ना मुश्किल हो जाएगा… बेटियों को घर के कामकाज सिखाओ, तभी ससुराल में सबका दिल जीत पाएंगी… बेटियों के भविष्य की रूपरेखा आज भी इतना डर-सहमकर तैयार की जाती है कि एक इंच भी इधर-उधर सोचने से माता-पिता घबरा जाते हैं. बेटी को जैसे-तैसे पाल-पोषकर उसके ससुराल पहुंचा देने के बाद ही माता-पिता राहत की सांस ले पाते हैं, तब तक उन पर समाज और रिश्तेदारों का इतना दबाव बना रहता है कि वे अपनी और बेटी की इच्छाओं के बारे में कुछ सोच ही नहीं पाते.

दहेज है सबसे बड़ा कारण

बैंक कर्मचारी अंजलि गुप्ता कहती हैं, “दरअसल,  माता-पिता पर बेटियों की शादी पर होने वाले खर्च का दबाव दहेज के कारण आता है. न चाहते हुए भी मजबूरन माता-पिता को अपनी हैसियत से बढ़कर बेटी की शादी में ख़र्च करना पड़ता है, जिसके कारण वो अपनी कई ज़रूरतों में कटौती करते हैं, कर्ज़ लेते हैं. ऐसे में बेटी की पढ़ाई और करियर प्रभावित होना स्वाभाविक है. बेटी जितना ज़्यादा पढ़ेगी, उतना ज़्यादा पढ़ा-लिखा लड़का उसके लिए ढूंढ़ना पड़ता है और जितना काबिल लड़का, उतना ज़्यादा दहेज… इस डर से बेटियों के माता-पिता उन्हें ज़्यादा पढ़ाने से भी डरते हैं. बेटी की शादी की चिंता उसके अभिभावकों को इतनी ज़्यादा होती है कि उसकी तैयारी में वे अपनी बेटी के हुनर, उसकी काबीलियत पर भी ध्यान नहीं दे पाते. सख़्त क़ानून बन जाने के बाद भी दहेज के लेन-देन का सिलसिला बदस्तूर जारी है. जब तक दहेज का लेन-देन बंद नहीं होगा, तब तक बेटियों की स्थिति में सुधार नहीं हो सकता.”

कहां है औरत का घर?

स्कूल टीचर रितु सोनी कहती हैं, “मेरी सास अक्सर मेरे बेटे और बेटी में भेदभाव करती हैं. बात-बात पर बेटी को ये एहसास दिलाती हैं कि ये उसका घर नहीं है. मेरी 8 साल की बेटी जब अपनी सहेलियों से कहती है कि आज हम सब हमारे घर में खेलेंगे, तो मेरी सास फ़ौरन उसे टोक देती है कि ये तेरा घर नहीं, तेरे भैया का घर है. तेरा घर तो न जाने कहां होगा. मेरी सास की ऐसी बातों से मेरी बेटी बहुत चिढ़ जाती है. वो बार-बार मुझसे ये सवाल करती है कि मां, क्या ये सच में मेरा घर नहीं है. उसके मासूम सवाल सुनकर मैं अक्सर सोचती हूं कि आख़िर कहां है औरत का घर? मायकेवाले कहते हैं कि अपने शौक़ अपने घर (ससुराल) जाकर पूरे करना और ससुरालवाले कहते हैं कि अपने घर में ठाठ कर लिए, अब ससुराल की ज़िम्मेदारियां संभालो… तो कहां है औरत का घर, कौन समझता है उसकी भावनाओं को, उसकी पीड़ा को..? हम कितनी भी बड़ी-बड़ी बातें कर लें, लेकिन लोगों की सोच बदलने में अभी भी बहुत व़क्त लगेगा. बेटियों की स्थिति अभी भी बहुत अच्छी नहीं है. आज भी सब को जैसे-तैसे बेटियों को ससुराल भेज देने की जल्दी रहती है, उसके भविष्य, उसकी इच्छाओं-आकांक्षाओं के बारे में कोई नहीं सोचता. बेटी की शादी में भले ही कर्ज़ लेकर ख़र्च कर लेंगे, लेकिन उसकी पढ़ाई या करियर पर कोई ख़र्च नहीं करना चाहता.”

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शुरुआत घर से होनी चाहिए

मीडिया प्रोफेशनल समीक्षा भट्ट कहती हैं, “मेरी बेटी पढ़ाई में मेरे बेटे से बहुत अच्छी है. वो हमेशा क्लास में अव्वल आती है. फिर जब उसने आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाने का ़फैसला किया, तो घर में बहस छिड़ गई. मेरे सास-ससुर का कहना था कि इसकी पढ़ाई पर इतने पैसे फूंक देंगे, तो शादी का ख़र्च कहां से लाएंगे. मेरे पति भी उसे पढ़ाई के लिए विदेश भेजने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन मैंने और मेरे बेटे ने ज़िद पकड़ ली. मुझे बहुत अच्छा लगा जब मेरे बेटे ने अपनी बहन के लिए घर में आवाज़ उठाई और ये माना कि उसकी बहन उससे ज़्यादा काबिल है, इसलिए उसे विदेश जाकर पढ़ाई करने का पूरा हक़ है. मेरे ख़्याल से यदि हम अपने बच्चों को घर में सही माहौल दें और बेटा-बेटी में कोई फ़र्क़ न करें, तो बेटियों के लिए आगे बढ़ने के रास्ते बेहद आसान हो जाएंगे. आज मेरी बेटी इतनी सक्षम है कि अपने साथ-साथ अपने भाई के भविष्य के ़फैसले भी ख़ुद लेती है और उसका भाई हर समय उसके साथ खड़ा रहता है.”

एक पहल ऐसी

प्रोफेसर डॉ. रागिनी सिंह अपने कॉलेज की हिंदी डिपार्टमेंट की हेड हैं. पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहीं और आज अपनी मेहनत से इस मुक़ाम पर हैं. जब घर में उनकी शादी की बात चलने लगी, तो लड़केवालों की तरफ़ से दहेज की लंबी-चौड़ी फ़रमाइश भी आने लगी. ऐसे में रागिनी ने एक ़फैसला किया, उन्होंने घर में साफ़ कह दिया कि वो उसी लड़के से शादी करेंगी, जो दहेज नहीं लेगा. शादी में देरी ज़रूर हुई, लेकिन आज रागिनी की शादी एक ऐसे लड़के से हुई है, जो न स़िर्फ उन्हें समझता है, बल्कि उनके प्रोफेशन की भी इज़्ज़त करता है. रागिनी और उसके परिवार की तरह ही लोगों को अपनी सोच बदलने की ज़रूरत है. बेटी की शादी करने से पहले उसे इतना काबिल बना दें कि वो अपनी एक अलग पहचान बना सके, अपनी ज़िंदगी के फैसले ख़ुद ले सके.

ये बदलाव ज़रूरी है 

आज भी कई घरों में बेटियों को बात-बात पर ये एहसास दिलाया जाता है कि वो बेटों से कम हैं. उनके हंसने-बोलने, उठने-बैठने के लिए अलग नियम बनाए जाते हैं. उन्हें ये बताया जाता है कि वो लड़कों से कमज़ोर हैं, इसलिए उन्हें हर बात चुपचाप सहन कर लेनी चाहिए. ऐसे माहौल में बेटियों का आत्मविश्‍वास कमज़ोर हो जाता है और वो ये मानने लग जाती हैं कि वो वाकई कमज़ोर हैं. ऐसे में जब उनके साथ कोई अन्याय या अत्याचार होता है, तो लड़कियां अपने ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठा पातीं. वहीं घर के लड़के ये मान लेते हैं कि घर के सर्वेसर्वा वही हैं, घर के हर ़फैसले उनके अनुरूप ही होंगे. ऐसे में वो महिलाओं का सम्मान नहीं करते और घर के बाहर भी महिलाओं के साथ बदसलूकी करते हैं. महिलाओं के सम्मान और उनकी स्थिति में सुधार की शुरुआत घर से ही होनी चाहिए. सरकार बेटियों की स्थिति में सुधार लाने के लिए सुकन्या समृद्धि योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी कई मुहिम चला रही है, लेकिन इसकी शुरुआत जब तक घर से नहीं होगी, तब तक कुछ नहीं हो सकता. यदि आप अपने बेटे और बेटी को एक जैसी परवरिश देते हैं, उनमें कोई भेदभाव नहीं करते, तो बेटियों की स्थिति में अपने आप सुधार आ जाएगा. फिर आपको बेटी की शादी के ख़र्च की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं होगी, क्योंकि आपकी आत्मनिर्भर, सक्षम बेटी अपनी ज़िंदगी की राह ख़ुद बना लेगी, वो भी अपने दम पर.

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क्या कहते हैं आंकड़े?

* पिछले 3 सालों में दहेज के कारण 24, 771 महिलाओं की मौत हुई है और 8 लाख से भी ज़्यादा मामले धारा 304 बी यानी डाउरी डेथ के तहत दर्ज हुए हैं.

* दहेज़ के कारण हुई मौतों में सबसे आगे है उत्तर प्रदेश, फिर बिहार और फिर मध्यप्रदेश.

* नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक़ 3. 48 लाख मामले पति और उनके परिवार द्वारा घरेलू हिंसा के दर्ज हुए हैं.

* भारत में हर तीन लड़की में से एक की शादी 18 साल की उम्र से पहले करवा दी जाती है.

* एक सर्वे के मुताबिक़ 41% लड़कियां 19 की उम्र पार करते-करते किसी न किसी अत्याचार या घरेलू हिंसा का शिकार हो जाती हैं.

शादी का ख़र्च स्टेटस सिंबल है

हमारे देश में शादियों पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है. लोग शादी के ख़र्च को अपने स्टेटस से जोड़कर देखते हैं. इसीलिए कई लोग कर्ज़ लेकर भी शादी पर ख़र्च करते हैं. उस पर यदि बेटी की शादी हो, तो दहेज का ख़र्च और बढ़ जाता है. ससुरालवालों की फरमाइश और दहेज की लिस्ट इतनी लंबी होती है कि उन्हें पूरा करते-करते लड़कीवालों की कमर टूट जाती है. बेटी चाहे कितनी ही काबिल क्यों न हो, फिर भी उसके माता-पिता को उसकी शादी में दहेज देना ही पड़ता है.

– कमला बडोनी

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कहीं आपके बच्चे को नशे की लत तो नहीं? (Does Your Child Have An Addiction Problem?)

Child Addiction Problems

बच्चों की परवरिश करना किसी चुनौती से कम नहीं है. जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगते हैं, उनके स्वभाव और व्यवहार में बदलाव आने लगता है. ये बदलाव इतने साधारण होते हैं कि पैरेंट्स इन्हें समझ ही नहीं पाते हैं या फिर किशोरावस्था का कारण समझकर चुप रह जाते हैं और इन संकेतों को नज़रअंदाज़ करने लगते हैं. पर क्या पैरेंट्स यह जानते हैं कि उनकी यह अनदेखी उनके बच्चों को नशे का शिकार बना रही है.

पता लगाएं कि बच्चा नशा तो नहीं करता

किशोर बच्चे अपना अधिकतर समय स्कूल-कॉलेज और कोचिंग क्लासों में अपने दोस्तों के साथ बिताते हैं. उनके साथ समय बिताते हुए कई बार वे ग़लत संगत में पड़ जाते हैं और नशा करने लगते हैं, जिसका पैरेंट्स को अंदाज़ा भी नहीं होता. हम यहां पर कुछ ऐसे संकेत दे रहे हैं, जिनसे पैरेंट्स यह अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कहीं उनका बच्चा नशे के शिकंजे में तो नहीं फंस रहा है.

* बच्चा यदि स्कूल-कॉलेज और कोचिंग क्लास ख़त्म होने के बाद घर आने की बजाय इधर-उधर चला जाए.

* जब बच्चा देरी से घर आने लगे.

* अगर वह रात को अपने दोस्तों के घर रुकने के लिए पैरेंट्स पर दबाव बनाने लगे.

* बच्चा जब ज़रूरत से ज़्यादा पॉकेटमनी मांगने लगे.

* जब वह अधिकतर समय अकेले बिताने लगे या फिर आपकी उपस्थिति उसे खलने लगे.

* नशे की तलब लगने पर पैरेंट्स को बिना बताए घर से चला जाए.

* घर के ज़रूरी कामों को छोड़कर बच्चा जब अचानक उठकर बाहर चला जाए.

* जो बच्चा पहले कभी माउथफ्रेशनर इस्तेमाल नहीं करता था और अब अचानक च्युंगम, टॉफी, सौंफ, हरी इलायची आदि खाना शुरू कर दे, तो पैरेंट्स को इस बात को हल्के में नहीं लेना चाहिए. हो सकता है उनका बच्चा नशे की दुर्गंध को छिपाने के लिए माउथफ्रेशनर इस्तेमाल कर रहा हो.

* बच्चे के स्कूल-कॉलेज आदि जगहों से आने के बाद अगर उसके मुंह से माउथफ्रेशनर की ख़ुशबू आए, तो भी पैरेंट्स सावधान हो जाएं.

* जब बच्चा पैंरेट्स से दूर से बात करे, इसका अर्थ है कि बच्चा आपसे मुंह की दुर्गंध को छिपाने की कोशिश कर रहा है.

* बच्चे के पॉकेट या बैग से माचिस, लाइटर या रोल किया हुआ कोई काग़ज़ मिले.

* उसके चेहरे को, विशेष रूप से उसकी आंखों को ग़ौर से देखें.

* अगर बच्चा दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होता जा रहा हो या फिर अपनी डायट से ज़्यादा खा रहा हो.

उपरोक्त बताई गई बातें स़िर्फ एक संकेत हैं, ज़रूरी नहीं कि आपका बच्चा नशे की गिरफ़्त में हो. बच्चे से पूरी बात जानने-पूछने के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचें.

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पैरेंट्स कैसे करें तहकीकात?

* अगर आपको शक है कि आपका बच्चा नशे का आदी हो रहा है, तो सबसे पहले उसके फ्रेंड्स और टीचर्स आदि से संपर्क करें.

* बिना बताए उसके स्कूल, कॉलेज और कोचिंग सेंटर में पहुंच जाएं.

* वहां पर बच्चा आपको देख ले, तो उससे छिपने की बजाय बात करें.

* ऐसा कोई बहाना बनाएं, जिससे उसको असलियत का पता न चले.

* इस बात का विशेष ध्यान रखें कि सोशल मीडिया में वह किस तरह की पोस्ट करता है.

* आजकल के बच्चे सोशल मीडिया पर  सबसे ज़्यादा एक्टिव रहते हैं, इसलिए उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर पैनी नज़र रखें.

* अगर बच्चा हॉस्टल में रहता है, तो वहां के वॉर्डन, टीचर्स, फें्रड्स आदि से बच्चे की गतिविधियों के बारे में पूछें.

* अगर पैरेंट्स को यह संदेह है कि उनका बच्चा नशे के शिकंजे में फंसता जा रहा है, तो उसे डांटने-मारने की बजाय प्यार से समझाएं.

* उसे इस बात का एहसास कराएं, ‘आपको उसकी ज़रूरत है, आप उससे बहुत प्यार करते हैं’.

* पैरेंट्स को भी समझना चाहिए कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ बच्चों को आज़ादी ज़रूर दें, लेकिन वे इस आज़ादी का नाजायज़ फ़ायदा न उठाएं. आज़ादी देने के साथ-साथ उन पर पैनी नज़र भी रखें.

बच्चे में दिखें ये लक्षण, तो पैरेंट्स हो जाएं सावधान

इन लक्षणों को ध्यान में रखकर पैरेंट्स अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उनका बच्चा कहीं नशे का आदी तो नहीं हो रहा है-

* चिड़चिड़ापन, बेचैनी, घबराहट, पसीना और ग़ुस्सा आना.

* नींद न आना, शरीर में ऐंठन होना, सिर में तेज़ दर्द होना, भूख कम लगना.

* अचानक मूड स्विंग होना, छोटी-छोटी बातों पर कंफ्यूज़ होना, मानसिक तनाव होना आदि.

बच्चे में अगर उपरोक्त लक्षण दिखाई दें, तो ज़रूरी नहीं कि वह नशे का शिकार हो. ये लक्षण किसी अन्य बीमारी के भी हो सकते हैं, पर पैरेंट्स का अलर्ट होना बहुत ज़रूरी है.

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बच्चे क्यों फंस जाते हैं नशे के शिकंजे में?

बाल मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि-

* अधिकतर बच्चे अपने दोस्तों के उकसाने पर नशे की शुरुआत करते हैं. जब बच्चा अपने दोस्तों को नशा करते हुए देखता है, तो उसके मन में भी नशे को टेस्ट करने की जिज्ञासा उठने लगती है और धीरे-धीरे वह नशे के शिकंजे में फंसता चला जाता है.

* जब बच्चा परिवार में अपने किसी बड़े को नशा (स्मोकिंग या ड्रिंक) करते हुए देखता है, तो उसके मन में भी नशे का स्वाद चखने की इच्छा उठने लगती है.

* नशे के मायाजाल में फंसने का एक कारण फिल्में और टेलीविज़न भी है. दरअसल, जब बच्चे फिल्म और टीवी कलाकारों को नशा करते हुए देखते हैं, तो वे भी उनकी नकल करने की कोशिश करने लगते हैं.

* वर्किंग पैरेंट्स होने के कारण बच्चों के साथ  क्वालिटी टाइम न बिताना, मार्गदर्शन न करना, अनचाही डिमांड को पूरी करना, दोस्तों की तरफ़ ध्यान न देना आदि ऐसे अनेक कारण हैं, जिनके कारण बच्चे ग़लत संगति में पड़ जाते हैं.

पैरेंट्स कैसे करें नशे की गिरफ़्त में फंसे बच्चे की मदद?

* अगर बच्चा नशे का आदी है, तो सबसे पहले उसे ख़ुद पर नियंत्रण रखना सिखाएं.

* उसे समझाएं कि जब भी उसका मन नशा करने का करे, तो अपना ध्यान वहां से हटाकर कहीं और लगाने का प्रयास करे.

* जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगते हैं, उनके दोस्तों का दायरा भी बढ़ने लगता है. अत: ग़लत संगति से बचाने के लिए ज़रूरी है कि उसे बिना बताए उसके दोस्तों पर कड़ी नज़र रखें.

* नशे की गिरफ़्त से बचाने के लिए ज़रूरी है कि बच्चे को नशे के दुष्परिणामों के बारे में विस्तार से बताएं.

* किसी ऐसे व्यक्ति का उदाहरण देकर समझाएं,  जिसका जीवन नशे के कारण बर्बाद हो गया हो.

* पैरेंट्स को भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चों से कभी भी नशेवाली चीज़ें न मंगवाएं.

* घर में होनेवाली पार्टियों और घर आए मेहमान के सामने नशेवाली चीज़ें सर्व न करें.

* कभी भी बच्चे के सामने नशा न करें. इससे उसके मन में इन चीज़ों के प्रति जिज्ञासा पनपने लगती है.

* अगर घर में कॉकटेल पार्टियां होती हैं, तो बच्चे को वहां से हटाकर अन्य गेम्स आदि में व्यस्त रखें.

* यदि बच्चा नशे की आदत नहीं छोड़ पा रहा है, तो बिना समय बर्बाद किए काउंसलर और एक्सपर्ट्स की सलाह लें.

* यदि स्थिति दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही हो, तो बच्चे को नशा मुक्ति केंद्र ले जाएं.

                            – पूनम नागेंद्र शर्मा

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बच्चे को ज़रूर सिखाएं ये बातें (Important Things You Must Teach Your Child)

 

हर पैरेंट्स (Parents) की चाह रहती है कि उनका बच्चा (Child) समझदार, आज्ञाकारी, ज़िम्मेदार व स्मार्ट बने. इसी वजह से वे उसे हर वो चीज़ बताने व सिखाने की कोशिश करते हैं, जो उसके लिए ज़रूरी होती है. फिर चाहे वो प्रेशर हैंडल करना हो, हाइजीन हो या फिर सिविक सेंस ही क्यों न हो.

 

Child Learning

बच्चे कैसे सीखते हैं, कौन-सी चीज़ उन्हें अधिक प्रेरित करती है? इसका कोई निश्‍चित मापदंड नहीं है, पर पैरेंट्स व बड़ों के मार्गदर्शन व प्रोत्साहन से वे बहुत कुछ सीखते हैं. इस संदर्भ में फोर्टिस के एसएल रहेजा हॉस्पिटल की पीडियाट्रिशियन व नियोनैटोलॉजिस्ट कंसल्टेंट डॉ. अस्मिता महाजन ने उपयोगी जानकारियां दीं.

सेल्फ कंट्रोल

इन दिनों बच्चों में सहनशीलता की कमी आती जा रही है और इसका असर उनकी पर्सनैलिटी पर भी पड़ रहा है. ऐसे में धैर्य रखना, सब्र करना आदि के लिए सेल्फ कंट्रोल ज़रूरी है.

* सायकोलॉजिस्ट के अनुसार, जो बच्चे पढ़ने में अच्छे नहीं होते या फिर कमज़ोर होते हैं, वे सोशली एक्टिव भी कम होते हैं. ऐसे बच्चों को सेल्फ कंट्रोल यानी आत्म केंद्रित होना सिखाना आसान नहीं होता.

* बच्चों को सहनशीलता का पाठ बचपन से ही पढ़ाना चाहिए, जैसे- यदि वो किसी चीज़ की ज़िद करें, तो यह ज़रूरी नहीं कि आप उसे तुरंत पूरी कर दें. उन्हें धैर्य रखने के फ़ायदे बताएं. उन्हें समझाएं कि यह चीज़ सही व़क्त आने पर ज़रूर मिलेगी.

* सेल्फ कंट्रोल के लिए बच्चों को ध्यान यानी मेडिटेशन सिखाएं.

* यदि पैरेंट्स भी बच्चे के साथ मेडिटेशन करें, तो बच्चों को प्रोत्साहन मिलेगा.

* मेडिटेशन करने से रिलैक्स होने के साथ-साथ बच्चों में पॉज़िटिवनेस भी बढ़ती है.

परिस्थितियों के अनुसार ना कहना

बच्चे मासूम होते हैं और इस उम्र में उनके लिए सही-ग़लत की पहचान करना भी आसान नहीं होता. ऐसे में उनकी सुरक्षा का बेहतरीन उपाय यह है कि वे ना कहना सीखें. किन परिस्थितियों में बच्चे ना कहें, इस बारे में पैरेंट्स उन्हें समय-समय पर बताते रहें.

* यदि कोई अजनबी उन्हें छूने की कोशिश करे, तो उसे मना करें या उससे दूर हट जाएं.

* बच्चों को गुड टच व बैड टच के बारे में अच्छी तरह समझाएं. साथ ही उन्हें बेसिक सेक्स एजुकेशन भी दें.

* बच्चों को समझाएं कि अकेले होने पर कोई परिचित, पड़ोसी खिलौने, चॉकलेट या कोई तोह़फे आदि देने की कोशिश करे, तो मना कर दें.

* स्कूल, क्लास आदि में आपको पहुंचने में देरी हो रही हो और उसी समय कोई अजनबी बच्चे को घर पहुंचाने के लिए लिफ्ट दे, तो उसे ना कहें.

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हाइजीन बेहद ज़रूरी

* बच्चों को समझाएं कि साफ़-सफ़ाई से रहने से हम हेल्दी रहते हैं और हमारा आत्मविश्‍वास भी बढ़ता है. उन्हें हाइजीन से जुड़ी हेल्दी हैबिट्स के बारे में बताएं.

* रोज़ नहाना, साफ़-सुथरा रहना, खाने से पहले हाथ धोना, टॉयलेट हाइजीन, छींकते-खांसते समय नाक-मुंह पर रुमाल रखना आदि हाइजीन से जुड़ी बेसिक बातें बच्चों को बचपन से ही सिखानी चाहिए.

* ओरल हाइजीन भी ज़रूरी है. इसके लिए सुबह और रात में ब्रश करना, दांतों व जीभ को अच्छी तरह से क्लीन करना सिखाएं, ताकि सांसों की बदबू व दांतों को ख़राब होने से बचाया जा सके.

* हाथ-पैर के नाख़ून को साफ़ रखने और हफ़्ते में एक बार नाख़ून काटने को कहें.

* कुछ बच्चों को दांत से नाख़ून काटने की आदत होती है. उन्हें समझाएं कि दांतों से नाख़ून काटने से मैल व रोगाणु पेट में जाकर उन्हें बीमार बना सकते हैं.

* बच्चों को बताएं कि नहाते समय नाक और अपने प्राइवेट पार्ट्स को भी क्लीन करें.

* बच्चों को बताएं अगर वे हाइजीन का ख़्याल रखेंगे, तो उनका इम्यून सिस्टम स्ट्रॉन्ग होगा और वे बीमार नहीं पड़ेंगे.

* स्कूल से आने, खेलकर आने आदि के बाद हाथों को अच्छी तरह से धोएं.

* खाना खाने के पहले और बाद में हाथ ज़रूर धोएं.

* फलों आदि को खाने से पहले उन्हें साफ़ पानी से धोकर खाएं.

* छोटे बच्चों के लिए 8-10 घंटे की नींद बहुत ज़रूरी है. स्लीप हाइजीन में उन आदतों को शामिल किया जाता है, जो बच्चों को गहरी नींद सोने में सहायता करें. अगर बच्चे पूरी नींद नहीं लेंगे, तो उनका शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित होगा.

* बच्चों के सोने व उठने का एक नियत समय बना दें, ताकि बचपन से ही उनका इंटरनल क्लॉक सेट हो जाए.

लाइफ व रिलेशनशिप मैनेजमेंट

लाइफ मैनेजमेंट और रिलेशनशिप मैनेजमेंट दोनों का ही एक-दूसरे से कनेक्शन है. यदि आपकी ज़िंदगी ख़ुशहाल व सुव्यवस्थित रहेगी, तो यक़ीनन आपके रिश्ते भी मधुर व मज़बूत होंगे.

* बच्चों को अनुशासित रहना और हर काम समय पर करने की सीख बचपन से ही दें.

* बच्चों को अपनी सभी चीज़ें, फिर चाहे वो स्कूल बैग, क़िताबें, खिलौने, अन्य ज़रूरी चीज़ें ही क्यों न हों, व्यवस्थित तरी़के से रखना सिखाएं.

* छोटे बच्चे यानी 4-5 साल के बच्चों को अपने कपड़े सिलेक्ट करना, मम्मी-पापा की चीज़ों को पहचानना सिखाएं. इससे उनका कॉन्फिडेंस लेवल बढ़ता है.

* उनमें बचपन से ही शेयरिंग की आदत डालें.

* रिश्तेदारों के यहां जाएं, तो उनके साथ विनम्रता से पेश आएं. काम में उन्हें सहयोग दें.

* बच्चों को दूसरों की ज़रूरतों को समझना सिखाना भी ज़रूरी है.

* बच्चों को हर रोज़ रात को सोने से पहले कुछ अच्छी बातें बताएं या फिर पढ़कर सुनाएं. इससे उनमें अच्छी आदतें विकसित होती हैं.

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Child Care

सिविक सेंस

* जब कभी आप बस या ट्रेन में सफ़र कर रहे हों, तो इस दौरान कोई प्रेग्नेंट वुमन या बुज़ुर्ग खड़े हों, तो उसे अपनी सीट दें और फिर अपने बच्चों को भी बताएं कि आपने उसकी मदद क्यों की है. इससे बच्चों को दूसरों की मदद करने की प्रेरणा मिलेगी.

* बच्चे को विनम्रता से बात करना सिखाएं और जब भी आप किसी से कुछ मांगें, तो ध्यान रहे कि ‘प्लीज़’ कहकर ही बात करें.

* बच्चे को सिखाएं कि देश की सार्वजनिक संपत्ति, जैसे- सड़क, ट्रेन, गार्डन आदि को गंदा न करें और कूड़ा-कचरा डस्टबिन में ही फेंकें.

* पौधे लगाएं. लोगों को पेड़ों को काटने से रोकें.

* बच्चे को ईमानदार और सच के रास्ते पर चलना सिखाएं.

* बच्चे को संविधान के नियमों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्र गान का आदर करना सिखाएं.

* बतौर ज़िम्मेदार अभिभावक बच्चे को समझाएं कि ख़ुद को साफ़-सुथरा रखने के साथ-साथ अपने घर, पास-पड़ोस, सोसाइटी, स्कूल, खेल का मैदान आदि को भी साफ़ रखना चाहिए.

आमतौर पर हर बच्चा अपनी क्षमता व रुचि के अनुसार सीखता है, लेकिन हमें भी बच्चों को सीखने के लिए निरंतर प्रेरित करते रहना चाहिए.

ऊषा पन्नालाल गुप्ता

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