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एग्ज़ाम टाइम में बच्चे को यूं रखें तनावमुक्त (Keep Your Child From Over Stressing Exams)

Keep Your Child From Over Stressing Exams

Keep Your Child From Over Stressing Exams

ख़ुद को सबसे आगे देखने की चाह और पैरेन्ट्स की उम्मीदों पर खरे उतरने की ज़द्दोज़हद में अक्सर बहुत से बच्चे परीक्षा के दौरान ज़रूरत से ज़्यादा स्ट्रेस लेते हैं. नतीज़तन कभी-कभी आते हुए सवालों का ज़वाब भी नहीं दे पाते. परीक्षा के दिनों में बच्चे को कैसे तनावमुक्त रखा जा सकता है? आइए, जानते हैं.

पैरेंट्स के लिए गाइडलाइन
गलाकाट कॉम्पटीशन के इस माहौल में बच्चों के लिए परीक्षा किसी युद्ध से कम नहीं है. इसके लिए एक हद तक अभिभावक ही
ज़िम्मेदार होते हैं. हम बच्चे के सामने करो या मरो जैसी स्थिति पैदा कर देते हैं. जिसका बच्चे पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. परीक्षा के दिनों में पैरेन्ट्स का अप्रोच व घर का माहौल कैसा होना चाहिए, यह जानने के लिए हमने बात कीकरियर काउंसलर श्री जसपाल सिंह से. श्री जसपाल ने हमें पैरेंट्स के लिए ये आसान गाइडलाइंस बताई.

टेंशन का माहौल न बनाएं
बच्चे को बार-बार डांटते रहने से वे तनाव में आ जाते हैं और इसका उनके परफ़ॉमेन्स पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. अत: घर में शांतिपूर्ण माहौल बनाये रखें. जहां तक हो सके, बच्चे को प्यार से समझाने की कोशिश करें. बच्चे को हर व़क़्त पढ़ने के लिए न कहें.

बच्चे की तुलना न करें
अपने बच्चे की तुलना दूसरे बच्चों व दोस्तों से न करें. इससे बच्चे का आत्मविश्‍वास कम होता है. बार-बार दूसरे बच्चों से तुलना करने पर बच्चा आप से चिढ़ जाएगा और आगे से आपको अपनी समस्याएं या अपने मन की बात नहीं बताएगा. इससे बच्चे और आपके बीच दूरी आ जाएगी.

ख़ुद पर कंट्रोल करें
बच्चे के बाहर आने-जाने और दूसरी चीज़ों पर रोक लगाने से पहले ख़ुद पर नियंत्रण रखने की कोशिश करें, ताकि बच्चे आपसे सबक लें. इसके लिए पार्टियों में आना-जाना कम कर दें. साथ ही बच्चों को मोबाइल पर घंटों बात करने से रोकने से पहले ख़ुद टेलीफ़ोन पर लंबी-लंबी बातें करना कम कर दें. टीवी का वॉल्यूम कम करके देखें. कुछ दिनों तक सभी मन-पसंद सीरियल देखना बंद कर दें.

म्यूज़िक फोन न लगाने दें
कुछ बच्चे म्यूज़िक फोन लगा कर पढ़ते हैं. उन्हें समझाएं कि ऐसा करने से ध्यान भंग हो सकता है.

पॉजिटिव अप्रोच रखें
बच्चा पेपर लिखने जाने से पहले नर्वस है तो उसे डांटें नहीं, बल्कि प्यार से समझाएं. उसे पॉजिटिव अप्रोच रखने के लिए कहें. स्वयं भी पॉजिटिव रहें. इस परीक्षा को अंतिम मानकर न चलें. यह बात पैरेन्ट्स और स्टूडेंट्स दोनों को ही दिमाग़ में रखनी चाहिए.

शोर-शराबे से दूर रखें
बच्चे की पढ़ाई का स्थान शोर-शराबे से दूर रखें. उसे बिस्तर पर बैठकर पढ़ने की बजाय स्टडी टेबल पर पढ़ने के लिए कहें.

स्टडी टेबल साफ़ रखें
स्टडी टेबल पर भी किताबों का लंबा ढेर न लगायें. बच्चा जो पुस्तक पढ़ रहा हो वही सामने रखने को कहें. पुस्तकों का ढेर बच्चे को नर्वस कर सकता है.

ईश्‍वर पर विश्‍वास रखें
किसी दैवी शक्ति पर अवश्य विश्‍वास रखें. इससे आपके ऊपर नेगेटिव विचार हावी नहीं होते हैं.

खान-पान पर ध्यान दें
इन दिनों में बच्चों को खाने-पीने की सुध नहीं रहती है. वे कभी-कभी बिना खाए ऐसे ही रह जाते हैं. अत: इस बात का विशेष ख़्याल रखें. उन्हें हेल्दी खाना ही बनाकर खिलाएं.

जंक फूड खाने से रोकें
जंक़ फूड से एसिडिटी बढ़ती है. खाने में फ्रूट्स व वेजीटेबल की मात्रा बढ़ा दें. खाना हल्का रखें, ताकि वह जल्दी पच सके. अधिक तैलीय व चटपटा खाने के बाद नींद आती है. अत: इससे बचें.

खेलने के लिए भी प्रोत्साहित करें
सारा दिन लगातार बैठकर पढ़ते रहने से बच्चे ऊब जाते हैं और वे ध्यान नहीं लगा पाते. अत: उन्हें खेलने का समय भी दें. एक बार खेलकर आने के बाद वे फ्रेश माइन्ड से ज़्यादा ध्यान लगाकर पढ़ाई कर पाएंगे.

एक्सरसाइज़ पर ध्यान दें

परीक्षा के दिनों में फ़िट रहने के लिए थोड़ी-बहुत शारीरिक गतिविधि भी ज़रूरी है. इसके लिए ट्यूशन सेंटर ़ज़्यादा दूर न हो तो पैदल जाने के लिए कहें. किसी विषय को याद करते-करते हाथों, गर्दन व पैरों का हल्का व्यायाम करना भी अच्छा होता है. यदि थोड़ा व़क़्त निकाल सकें, तो कोई दूसरा व्यायाम या योगासन करने के लिए प्रोत्साहित करें. ध्यान केंद्रित करने के लिए मेडिटेशन भी कर सकते हैं.

भरपूर नींद लेने को कहें
परीक्षा में अच्छा करने के लिए पढ़ाई के साथ-साथ नींद भी ज़रूरी है. अत: पढ़ाई के बीच-बीच में झपकी लेने को कहें. कुछ बच्चे परीक्षा के दिनों में रात-रात भर जागकर पढ़ते हैं और सुबह सोते हैं. परीक्षा शुरू होने के कुछ दिन पहले से उनके इस रूटीन को बदलें. अन्यथा परीक्षा के समय नींद आएगी. परीक्षा वाले दिन से पहले रात में नींद अवश्य लें. नहीं तो रात भर जाग कर पढ़ाई करने से परीक्षा हॉल में बार-बार नींद ही आती रहेगी.

बीमारियों से बचाएं
परीक्षा के दिनों में बच्चे की सेहत का विशेष ख़्याल रखें. खांसी-जुकाम या बुख़ार से बच्चे को बचाएं.सर्दी-जुकाम होने पर हल्के में न लें, तुरंत इलाज़ कराएं. हाइजीन का भी ख़ास ख़्याल रखें. हाथों की साफ़-सफ़ाई का पर्याप्त ध्यान दें, ताकि संक्रमण से बचाव हो.

गाइड फ़ॉर चाइल्ड
    परीक्षा की तैयारी
* अंतिम समय में पूरे साल भर की पढ़ाई करने न बैठें. इस सच्चाई को स्वीकार कर लें कि अब शत-प्रतिशत हासिल करने का समय नहीं है. उसके लिए तो पहले दिन से पढ़ना ज़रूरी था. अब जिस लेवल पर हैं उसके अगले लेवल तक पहुंचने का लक्ष्य रखें. लक्ष्य तय करते हुए यह सोचें कि मैं जितना कर सकता हूं उसको अच्छी तरह करूंगा.
* बाद के लिए कुछ भी न छोड़ें. यह अध्याय अभी नहीं, बाद में करूंगा, इस अप्रोच से दूर रहें.
* नियमित पढ़ाई करें. बार-बार रिविज़न करें.
* ज़्यादा-से-ज़्यादा सेम्पल पेपर हल करें. इससे आपकी प्रैक्टिस भी होगी और सवाल हल करने में कितना व़क़्त लगता है इसका भी अंदाजा लग जाएगा.
* व्यवहारिक लक्ष्य रखें. एक दिन में सारे चैप्टर कभी पूरी तरह रिवाइज़ नहीं होते.
* टेक्स्ट बुक के सभी अध्यायों को कम से कम दो बार अवश्य पढ़ें. हर विषयों पर समान समय दें. गाइड बुक के सहारे न रहें.

परीक्षा देते व़क़्त
* प्रत्येक प्रश्‍न को अच्छी तरह समझने के बाद ही सही व सटीक ज़वाब लिखें. प्रश्‍न के उत्तर की शब्द-सीमा अवश्य ध्यान में रखें.
* सही स्पेलिंग, व्याकरण के अनुसार वाक्य रचना और साफ़ लिखाई और प्वाइंट वाइज़ प्रश्‍नों के उत्तर यानी प्रेजेंटेशन और टाइमिंग व नीटनेस का विशेष ख़्याल रखें.
* दो प्रश्‍नों के उत्तर के बीच में स्थान अवश्य छोड़ें. प्रश्‍न संख्या अवश्य लिखें.

– केबी

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बच्चों की परीक्षा के लिए हेल्दी डायट चार्ट (Healthy Diet Chart For Kids During Exams)

Healthy Diet Chart For Kids During Exams

Healthy Diet Chart For Kids During Exams

परीक्षा के समय बच्चे देर रात तक जागते हैं या सुबह जल्दी उठते हैं. नींद से बचने के लिए  बच्चे इस समय चाय-कॉफी और जंक फूड अधिक खाते हैं, लेकिन ये उनकी सेहत के लिए ठीक नहीं है. परीक्षा का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है, इसलिए पढ़ाई के साथ-साथ इस समय बच्चों की डायट पर भी ध्यान देना ज़रूरी है. अत: परीक्षा के समय बच्चों के लिए हेल्दी डायट चार्ट तैयार करें, ताकि वे स्वस्थ और ऊर्जावान बने रहें.

सुबह का नाश्ता

कई बच्चे सुबह का नाश्ता नहीं करते, जिसके कारण उनमें ऊर्जा की कमी नज़र आती है. सुबह का नाश्ता बहुत ज़रूरी है, इसलिए बच्चों के सुबह के नाश्ते पर विशेष ध्यान दें.

कैसा हो सुबह का नाश्ता?

बच्चे के दिन की शुरुआत हेल्दी नाश्ते से करें. नाश्ते में आप बच्चे को दलिया, अंडा, उपमा, पोहा, ओट्स, कॉर्नफ्लेक्स आदि दे सकते हैं. सुबह के नाश्ते के ये सभी विकल्प हेल्दी होने के साथ ही बच्चे को एनर्जेटिक बनाए रखेंगे.

मिड मील

नाश्ता व दोपहर के खाने के बीच बच्चों को भूख लगती है इसलिए ज़्यादातर बच्चे इस समय चिप्स, बिस्किट आदि खाते हैं, लेकिन ऐसा करना सही नहीं है.

कैसा हो मिड मील?

नाश्ता व दोपहर के खाने के बीच जब बच्चों को भूख लगे, तब उन्हें मौसमी फल खाने को दें. ये एनर्जी के साथ-साथ विटामिन्स और मिनरल्स भी प्रदान करते हैं, जिससे रोग-प्रतिरोधक शक्ति भी बढ़ती है.

यह भी पढ़े: एग्ज़ाम के समय क्या करें पैरेंट्स? 

दोपहर का खाना

दोपहर का खाना बच्चे को हमेशा टाइम पर दें यानी खाने का एक टाइम फिक्स कर दें. दोपहर का भोजन बच्चे को दो बजे तक ज़रूर दे दें.

कैसा हो दोपहर का खाना?

दोपहर के खाने में यानी लंच में बच्चे को दाल-चावल, सब्जी-रोटी, सलाद और दही दें. इस बात का ध्यान रखें कि खाना बहुत स्पाइसी यानी मसालेदार न हो. बच्चे को हल्का और हेल्दी खाना दें. और हां, बच्चे को खाने के तुरंत बाद पढ़ने को न कहें. खाना पचाने के लिए कम से कम 15-20 मिनट की वॉक जरूर करें, ताकि पेट संबंधी कोई तकलीफ जैसे बदहज़मी आदि न हो.

शाम का नाश्ता

सुबह के नाश्ते की तरह ही बच्चों के लिए शाम का नाश्ता भी बेहद ज़रूरी है. अतः बच्चे को शाम के समय क्या दें, इसकी प्लानिंग भी पहले ही कर लें.

कैसा हो शाम का नाश्ता?

दोपहर की पढ़ाई के बाद थकान दूर करने और तरोताज़ा महसूस करने के लिए गर्म दूध या कम पत्ती वाली चाय पीना बेहतरीन विकल्प है. दूध या चाय के साथ आप बच्चे को ब्राउन ब्रेड सेंडविच, बिस्किट्स आदि दे सकते हैं. बच्चे को शाम का नाश्ता देते समय इस बात का ध्यान रखें कि नाश्ता हेल्दी, हल्का और सीमित मात्रा में हो.

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रात का खाना

रात का खाना भी हल्का और हेल्दी होना चाहिए, ताकि खाने के बाद बच्चे को पढ़ाई करने में आलस न आए. साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि बच्चा रात का खाना जल्दी खाए.

कैसा हो रात का खाना?

रात के खाने में रोटी, दाल, सब्ज़ी, सलाद, सूप, दलिया, खिचड़ी, ग्रिल्ड चिकन या फिश जैसे हेल्दी फूड खाए जा सकते हैं. खाना खाने के बाद बच्चे को कुछ देर टहलने को कहें, इससे खाना आसानी से पच जाएगा और बच्चे का पढ़ाई में मन लगेगा.

हेल्दी टिप्स

* बच्चे की पढ़ाई का टाइम टेबल इस तरह सेट करें कि उसे आठ घंटे की नींद मिल सके. नींद पूरी न होने पर बच्चे थकान और आलस महसूस करते हैं.

* बच्चे की डायट में कार्बोहाइड्रेट और वसा का होना भी ज़रूरी है. इनसे बच्चे को ऊर्जा और कैलोरी मिलती है, जो बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए ज़रूरी है.

* बच्चे के शारीरिक-मानसिक विकास के लिए प्रोटीन भी ज़रूरी है, इसलिए बच्चे की डायट में प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थ, जैसे-दूध व डेयरी प्रोडक्ट्स, दाल, अंडे, मछली आदि शामिल करें.

* बच्चों की डायट में हरी सब्ज़ियों को भी ज़रूर शामिल करें. इनमें आयरन, प्रोटीन, फाइबर और कैल्शियम होता है, जो दिमाग़ की सक्रियता को बढ़ाने का काम करता है.

* बच्चे के डायट में ड्रायफ्रूट्स, जैसे- अखरोट, बादाम, पिस्ता और काजू ज़रूर शामिल करें, इनसे ओमेगा-3 फैटी एसिड, ओमेगा 6 फैटी एसिड जैसे नेचुरल (मोनोसैचुरेटेड) फैट्स होते हैं, जिनसे बच्चों के दिमाग़ का पोषण होता है और याद्दाश्त तेज़ होती है.

* बच्चों की डायट में मांस, अंडा, हरी पत्तेदार सब्ज़ियां आदि आयरनयुक्त चीज़ें भी शामिल करें. आयरन खून बढ़ाने के साथ ही एकाग्रता बढ़ाने में भी सहायक है.

* बच्चों को हर रोज़ एक फ्रूट, जैसे- सेब, केला, संतरा आदि ज़रूर खिलाएं. फ्रूट्स में फाइबर्स की भरपूर मात्रा होती है, जिससे बच्चों को लंबे समय तक एनर्जी मिलती है.

* ख़ासकर परीक्षा के दिनों में बच्चों को बहुत मीठी, तली-भुनी व मसालेदार चीज़ें खाने के लिए न दें. इससे उन्हें आलस आएगा, पढ़ाई में मन नहीं लगेगा और उनकी सेहत भी बिगड़ सकती है.

* परीक्षा के दिनों में बच्चों को बाहर का खाना भी न दें. इससे उन्हें इंफेक्शन होने का खतरा हो सकता है.

* परीक्षा के दिनों में बच्चों को बहुत ज़्यादा कैफीनयुक्त चीज़ें, जैसे-चाय-कॉफी न दें. ये उनकी सेहत के लिए हानिकारक हैं.

* परीक्षा के दौरान बच्चों को बाहर का खाना खाने भी ना दें. इससे बच्चों में संक्रमण होने का खतरा बढ़ सकता है. जितना संभव हो सके, बाहर के खाने से बचें. कोशिश करें कि रेस्तरां का खाना ना खाएं.

– केबी

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ऐसे करें परीक्षा की तैयारी (Exam Preparation- 23 Study Tips)

Exam Preparation- 23 Study Tips

Exam Preparation- 23 Study Tips

मार्च का महीना होता है कई सारी परीक्षाओं का. बच्चे जहां किताबों को खंगालने में लगे रहते हैं, वहीं माता-पिता पुरज़ोर कोशिश कर रहे होते हैं कि वे अपने बच्चों की हर मुमकिन मदद कर सकें, क्योंकि यह समय सालभर मिले ज्ञान को कसौटी पर परखने का होता है. बच्चों के भीतर से परीक्षा का डर निकालने और परीक्षा की स्ट्रेस फ्री तैयारी कराने के लिए किन-किन बातों का रखें ख़ास ख़्याल, आइए जानते हैं.

परीक्षा के समय विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ-साथ अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना चाहिए, वहीं माता-पिता को अपने बच्चों का आत्मविश्‍वास बढ़ाना चाहिए. न्यूट्रीशनिस्ट डॉ. निमरजीत कौर बताती हैं कि वैसे तो बच्चों के खानपान का ध्यान हमेशा ही रखना चाहिए, पर परीक्षा के दौरान अगर बच्चों के खाने में कुछ स्मार्ट न्यूट्रीयंट्स शामिल किए जाएं, तो उनमें ऊर्जा और मानसिक शक्ति की कमी नहीं होगी.
वहीं एक निजी स्कूल की को-ऑर्डिनेटर के. सविथा बताती हैं कि इस समय बच्चों को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है सहयोग की. इस समय शिक्षकों का यह कर्त्तव्य है कि बच्चों की परीक्षा से जुड़ी छोटी-सी-छोटी उलझन को सुलझाएं. उन्हें बोर्ड परीक्षा से जुड़ी सभी जानकारी दें. परीक्षा की तैयारी कभी भी एक-दो दिन में नहीं होती, इसके लिए निरंतर अभ्यास करना बहुत ज़रूरी है. अगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाए, तो छात्रों को मदद मिलेगी.

पढ़ाई को पर्याप्त समय दें
यह बहुत ही पुराना नुस्ख़ा ज़रूर है, पर हमेशा कारगर रहा है. किसी भी चीज़ को सीखकर उसे याद रखना एक दिन का काम नहीं है. रोज़ थोड़ा-थोड़ा पढ़ने से परीक्षा के दिनों में आप पढ़ाई के अतिरिक्त भार से मुक्त रहते हैं. इसका अर्थ यह है कि पढ़ाई की शुरुआत तब हो जब परीक्षा में काफ़ी समय बचा हो.इसके लिए टाइम टेबल बनाना सबसे अच्छा सुझाव है, पर याद रखें, टाइम टेबल आपकी अपनी ज़रूरत के हिसाब से हो, किसी और के टाइम टेबल की नकल ना करें.

पढ़ाई के लिए हो खुली जगह
आप पढ़ने के लिए किस स्थान पर बैठते हैं, इसका आपकी पढ़ाई पर बहुत असर पड़ता है. पढ़ाई की जगह खुली, खाली और उजाले से भरपूर होनी चाहिए. पढ़ाई की मेज़ पर स़िर्फ ज़रूरत का ही सामान हो. अगर पढ़ने का कमरा या मेज़ फैला हुआ होगा, तो दिमाग़ पढ़ाई में नहीं लग पाएगा. इसके अलावा बैठने की कुर्सी आरामदायक होनी चाहिए. कुछ बच्चों को पढ़ने के लिए शांति चाहिए होती है, वहीं कुछ को पढ़ाई करते समय संगीत सुनने की आदत होती है. आप कैसे पढ़ना पसंद करते हैं, उसका चुनाव करें और ख़ुद के लिए वैसा माहौल बनाएं.

लिखकर करें पढ़ाई
जब पढ़ाई शुरू करें, तो जितना हो सके, चीज़ों को चित्रों या चार्ट के रूप में लिखकर रखें. मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि इस तरह पढ़ी हुई चीज़ें अच्छे से और लंबे समय तक याद रहती हैं. परीक्षा के कुछ दिन पहले रिवीज़न करने के लिए एक पेपर पर महत्वपूर्ण टॉपिक्स का एक फ्लो चार्ट बना लें. इससे आप कम समय में सभी चीज़ें एक साथ पढ़ लेंगे. इससे बोरियत भी नहीं होती.

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दूसरों को पढ़ाएं
यह बड़ा ही मज़ेदार तरीक़ा है पढ़ाई करने का. जब परीक्षा नज़दीक हो, तब आपने जो भी पढ़ा है, वह किसी को भी बिना देखे समझाएं. आप चाहें तो अपने किसी दोस्त या माता-पिता की भी मदद ले सकते हैं. ऐसा करने से आपको सब कुछ साफ़-साफ़ समझ में आ जाएगा और यह भी पता चलेगा कि कहां आपको ज़्यादा मेहनत करने की ज़रूरत है.

दोस्तों के साथ पढ़ाई
अगर आपका ध्येय आपके सामने साफ़ है और अगर आपका ध्यान पढ़ाई से ना भटके, तो यह एक अच्छा तरीक़ा है पढ़ने का. इससे आप एक-दूसरे की मुश्किलें भी हल कर सकते हैं और पढ़ाई भी अधिक रुचिकर हो जाती है, पर हां, ग्रुप स्टडी के नाम पर पढ़ाई का समय बर्बाद करना ग़लत है.

बहुत सारे टेस्ट पेपर्स सॉल्व करें
परीक्षा के लगभग 10 दिन पहले से हर विषय के टेस्ट पेपर्स सॉल्व करें. इसके कई सारे फ़ायदे हैं. पहला यह कि आपको पेपर पैटर्न के बारे में अच्छी जानकारी मिल जाएगी और अगर आप समय लगाकर टेस्ट देते हैं, तो आपको पेपर के हर सेक्शन को कितना समय देना है यह भी अच्छे से पता चल जाएगा. और दूसरा जब आप कुछ पेपर सॉल्व कर लेंगे, तो आपका आत्मविश्‍वास बढ़ जाएगा.

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अच्छा रहे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य
डॉ. निमरजीत बताती हैं कि इस समय बच्चों की दो ज़रूरतें होती हैं, पहली- उनकी शारीरिक ऊर्जा बनी रहे और दूसरी- वह परीक्षा में बहुत ज़्यादा तनाव व दबाव ना ले और ये दोनों ही ज़रूरतें अच्छे न्यूट्रीशन से पूरी हो सकती हैं.
* इसके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि बच्चे घर में बना खाना खाएं. भूख लगने पर उन्हें ड्रायफ्रूट्स, भुनी मूंगफली या फल आदि दें.
* ज़िंक, विटामिन बी और विटामिन सी तनाव को कम करते हैं, इसलिए परीक्षा के दिनों में जितना हो सके, हरी सब्ज़ियां, फल और अंडे खाएं.
* परीक्षा के समय नाश्ता हैवी होना चाहिए. नाश्ते में आलू के परांठे या उपमा आदि दे सकते हैं. इसके अलावा प्रोटीन बहुत महत्वपूर्ण है.

कुछ नोट्स टीचर की डायरी से
1. एक साथ चार या पांच घंटे पढ़ाई ना करें. हर एक घंटे में थोड़ी देर के लिए ब्रेक लें.
2. जब परीक्षा नज़दीक आ जाए, तो स्मार्ट नोट्स बनाकर पढ़ें. इसका अर्थ है कि सभी विषयों के कुछ महत्वपूर्ण टॉपिक्स की लिस्ट बना लें.
3. एग्ज़ाम हॉल में प्रवेश करने तक किताब ना पढ़ें. परीक्षा शुरू होने के कुछ समय पहले पढ़ाई बंद कर दें.
4. आख़िरी समय में किसी के बताने पर कोई नया टॉपिक पढ़ने की कोशिश ना करें. इससे आप कंफ्यूज़ हो जाएंगे.
5. चाहे आपकी परीक्षा सुबह देर से हो, पर कोई भी काम, जैसे- बैग में कंपास बॉक्स, उसमें एडमिट कार्ड रखना आदि रात को ही कर लें.
6. जितना संभव हो सके, ख़ुद को शांत रखें. इसके लिए ध्यान या प्राणायाम करना सबसे कारगर होगा.
7. अगर संभव हो, तो एक या दो दिन पहले अपने परीक्षा केंद्र में जाकर मुआयना कर लें.

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…ताकि परीक्षा में ना हो कोई टेंशन
डॉ़ निमरजीत बताती हैं कि स्मार्ट फूड से स्ट्रेस से हमेशा के लिए छुटकारा मिल सकता है-
1. प्रोटीन स्लो बर्नर होता है, इसलिए ऊर्जा से भरपूर है. खाने में इसे शामिल करें.
2. विटामिन सी और बी से भरपूर चीज़ें, जैसे- मूंगफली, अंडा, मछली या फल खाएं.
3. पानी भरपूर पीएं, ताकि शरीर में हाइड्रेशन अच्छा रहे. साथ ही मिल्क शेक या शरबत आदि लें.
5. नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करें.
6. चाय या कॉफी ज़्यादा ना लें.
7. दही, छाछ या नींबू पानी लें.

– विजया कठाले निबंधे

अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करेंः Parenting Guide 

पैरेंटिंग गाइड- बच्चों के दुश्मन पेट के कीड़े (Parenting Guide- Your Child May Be Suffering From Stomach Worms)

Parenting Guide, Child, Stomach Worms

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बच्चे माता-पिता ही नहीं, पूरे परिवार की जान होते हैं. इसीलिए उनके बीमार होने से पूरा परिवार परेशान हो उठता है. आजकल बच्चों के पेट में परजीवी कीड़े पड़ने की बात अक्सर सुनने को मिलती है. ये कीड़े बच्चे के आहार से पौष्टिक तत्व ही नहीं, उनका ख़ून भी चूसते हैं और उन्हें बीमार कर देते हैं. इसीलिए विश्‍व स्वास्थ्य संगठन इन कीड़ों के संक्रमण को रोकने के लिए डी-वॉर्मिंग को प्रमोट कर रही है.

अगर आपका बच्चा अक्सर पेटदर्द, मितली, एनस में खुजली की शिकायत करता है, रात में उठकर चिल्लाता है, खाने-पीने के बावजूद कमज़ोर है या उसे बार-बार खांसी आती है, तो एक बार उसे डॉक्टर को दिखाकर जांच कराएं. हो सकता है उसके पेट में परजीवी कीड़े हों.

क्यों होते हैं पेट में कीड़े?
बच्चों के पेट और अंतड़ियों में कई तरह के विकार होते हैं. कृमि रोग भी पेट या अंतड़ियों में पैदा होता है और पूरे शरीर में फैल जाता है. दुनिया भर में अब तक कृमि की क़रीब 20 प्रजातियों का पता चल चुका है. दरअसल, कृमि पेट में हवा की मात्रा बढ़ा देते हैं. इससे दिल की धड़कन बढ़ जाती है. कई बार बच्चे को उबकाई आती है और उसकी भोजन में दिलचस्पी ख़त्म हो जाती है. कृमि अंतड़ियों में घाव पैदा कर देते हैं, जिससे बच्चा बेचैन होकर रोने लगता है. बच्चे को चक्कर आने लगते हैं और प्यास अधिक लगती है.

कारण
मांस, मछली, गुड़, दही, सिरका, दूषित भोजन, मिट्टी खाने से या गंदे कपड़े पहनने व शरीर की उचित सफ़ाई न करने से पेट में किड़े हो जाते हैं. यह गंदगी के कारण होनेवाला रोग है. मक्खियां इस रोग की वाहक होती हैं. वे पहले गंदी चीज़ों पर फिर भोजन पर बैठती हैं, जिससे भोजन गंदा और दूषित हो जाता है. दूषित जल से इसका प्रसार तेज़ी से होता है. बच्चे की आंत से कृमि के अंडे शौच के साथ बाहर निकलकर फैल जाते हैं. ये लार्वा बड़े होकर ज़मीन या घास पर पैदल चलनेवाले के पांव में चिपक जाते हैं और उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं.

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नई डी-वॉर्मिंग योजना की शुरुआत
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने राष्ट्रीय डी-वॉर्मिंग पहल की शुरुआत की. इंसान और पशुओं को राउंड वॉर्म, हुक वॉर्म, फ्लूक वॉर्म और टेप वॉर्म जैसे परजीवी कीड़ों से बचाने के लिए एक एंटी हेलमिंटिक दवा दी जाती है. बच्चों का उपचार मेबेनडेजॉल और एलबेनडेजॉल जैसी दवाओं से कर सकते हैं. एलबेनडेजॉल की एक गोली से बच्चे को इन परजीवी कीड़ों से बचाया जा सकता है. यह दवा संक्रमित और गैर संक्रमित बच्चों के लिए सुरक्षित है. सबसे बड़ी बात यह दवा स्वादिष्ट भी है.

डब्ल्यूएचओ की सलाह
डी-वॉर्मिंग उपचार कठिन और महंगा नहीं है. इसका प्रचार स्कूलों के ज़रिए आसानी से किया जा सकता है. इस उपचार से बच्चों को बहुत फ़ायदा होता है. पूरी दुनिया में अभी भी हज़ारों, लाखों बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें कृमि संक्रमण का जोख़िम है. इनके उपचार के लिए स्कूल आधारित डी-वॉर्मिंग उपचार की नीति बनाई जानी चाहिए, ताकि स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास में तेज़ी आ सके. विश्‍व स्वास्थ्य संगठन ने परजीवी कीड़ों के संक्रमण को कम करने के लिए महामारी क्षेत्रों में रहनेवाले स्कूली बच्चों के इलाज के लिए इस दवा को देने की सिफ़ारिश की है. ज़्यादातर कीड़े मुंह से लेनेवाली दवा से ही मर जाते हैं. यह दवा सस्ती है और उसकी एक ही डोज़ दी जाती है. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक़, दुनिया में संक्रमित स्कूली बच्चों की संख्या 60 करोड़ है. अगर डी-वॉर्मिंग का विस्तार किया गया, तो बच्चों की सेहत ठीक रहेगी और वे सक्रिय रहेंगे.

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पेट के कीड़े दूर करने के टिप्स
* पेट में कीड़े होने पर सात दिन तक पपीते के 11-12 बीज रोज़ खाली पेट खाने चाहिए. छोटे बच्चों को कम बीज दें. गर्भवती महिलाओ को पपीते के बीज नहीं खिलाने चाहिए, इसका उन पर प्रतिकूल असर हो सकता है.
* दो चम्मच अनार का जूस पीने से पेट में पनप रहे कीड़े मर जाते हैं.
* करेले के पत्तों का जूस भी पेट के कीड़े मारने के लिए बेहतर दवा है. करेले का जूस निकालकर उसे गुनगुने पानी के साथ पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं. करेले का स्वाद कड़वा होने से अक्सर बच्चे इसे पीना पसंद नहीं करते.
* दस ग्राम नीम की पत्तियों का रस और दस ग्राम शहद लेकर दोनों को अच्छी तरह मिला लें. इस मिश्रण को दिन में तीन से चार बार पिलाएं. इसे पीने के बाद बच्चे के पेट के कीड़े मर जाएंगे और राहत महसूस होगी.
* अजवायन पाउडर व गुड़ को समान मात्रा में एक साथ मिलाकर उसकी एक-एक ग्राम की गोली बना लें. इसे एक साफ़ जार में भर के रख दें. तीन से पांच साल के बच्चे को रोज़ाना दिन में तीन बार एक-एक गोली खिलाएं. इससे पेट के कीड़े मर जाएंगे.
* एक चम्मच करेले का रस, एक चम्मच नीम की पत्तियों का रस, एक चम्मच पालक का रस और जरा-सा सेंधा नमक मिलाकर दो ख़ुराक बनाएं. सुबह-शाम भोजन के बाद इस रस का सेवन करने से कीड़े मरकर शौच के साथ बाहर निकल जाएंगे.

सरकार की पहल
देश में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत स्कूलों में स्वास्थ्य कार्यक्रम चलाया जा रहा है. इसमें यह प्रावधान किया गया है कि साल में दो बार निर्धारित अवधि में राष्ट्रीय दिशा-निर्देशों के मुताबिक़ डी-वॉर्मिंग की जाएगी. बिहार में विश्‍व की सबसे बड़ी स्कूल आधारित डी-वॉर्मिंग पहल की शुरुआत की गई थी. दिल्ली सरकार भी इसी तरह का अभियान चला रही है. विश्‍व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, एक से 14 वर्ष के क़रीब 24 करोड़ बच्चे आंतों में पलनेवाले परजीवी कीड़ों से प्रभावित होने के ख़तरे में हैं. इस पहल के लिए ज़रूरी है कि इसके साथ स्वच्छता में सुधार किया जाए और सुरक्षित पेय जल को उपलब्ध कराया जाए, ताकि परजीवी कीड़ों का जोख़िम न्यूनतम हो सके. इसके लिए महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, पंचायती राज मंत्रालय और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय की सक्रिय भागीदारी और साझेदारी ज़रूरी है.

 

– श्रद्धा संगीता

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बच्चों के पेट से कीड़े हटाने के 5 घरेलू उपाय, देखें वीडियो: 

 

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पैरेंटिंग गाइड- बच्चों के लिए इम्युनिटी बूस्टर फूड (Parenting Guide- Top 13 Immune System Boosting Foods For Kids)

Immune System Boosting Foods For Kids

 

मौसम बदलने के साथ सर्दी-ज़ुकाम, ख़ांसी-बुख़ार और वायरल इंफेक्शन्स बच्चों को अपनी चपेट में ले लेते हैं. उनका बार-बार बीमार पड़ना इस बात की ओर संकेत करता है कि बच्चे का इम्यून सिस्टम कमज़ोर है. हम यहां कुछ ऐसे ही ङ्गइम्युनिटी बूस्टर फूडफ के बारे में बता रहे हैं, जिन्हें खिलाकर आप बच्चों की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकते हैं.

दही
शोध में यह सिद्ध हुआ है कि जो बच्चे दही खाते हैं, उन्हें कान-गले का संक्रमण और सर्दी-ज़ुकाम के होने की संभावना 19% तक कम होती है. दही में गुड बैक्टीरिया (जिन्हें प्रोबायोटिक्स भी कहते हैं) होते हैं, जो बच्चों की इम्युनिटी को स्ट्रॉन्ग करते हैं.

कैसे खिलाएं?
* दही का स्मूदी व शेक बनाकर दें. दही में फल काटकर भी बच्चों को खिला सकते हैं.
* दही में शक्कर और रोस्टेड ड्राइफ्रूट्स मिलाकर चॉकलेट सॉस से सजाकर उन्हें खाने के लिए दें.

नट्स
इनमें प्रोटीन व फाइबर प्रचुर मात्रा में होते हैं. नट्स में रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ानेवाले ज़िंक, आयरन, मिनरल्स और विटामिन्स भी होते हैं.

कैसे खिलाएं?
* दलिया, फ्रूट सलाद, सब्ज़ी, करी या सीरियल्स में नट्स डालकर खाने को दें. इसके अलावा स्नैक्स के तौर पर नट्स खा सकते हैं.

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बेरीज
बेरीज़ का लाल, नीला और पर्पल कलर इस बात की ओर संकेत करता है कि उनमें एंथोसायनिन्स की मात्रा बहुत अधिक है.
एंथोसायनिन्स बहुत पावरफुल एंटीऑक्सीडेंट होता है, जो अनेक बीमारियों से बच्चों की रक्षा करता है. बेरीज़ में विटामिन सी भी प्रचुर मात्रा में होता है, जो इम्युनिटी को मज़बूत बनाने के साथ-साथ बच्चों में संक्रमण के जोखिम को भी कम करता है.

कैसे खिलाएं?
* ब्रेकफास्ट या हेल्दी स्नैक्स के तौर पर बेरीज़ को दलिया, दही या बेक्रफास्ट सीरियल में मिलाकर खिला सकते हैं.

अंडा
विटामिन और प्रोटीन का सबसे बेहतरीन स्रोत है अंडा. यह भी सुपर फूड की श्रेणी में आता है. एग योक में ज़िंक, सेलेनियम और मिनरल्स भी होते हैं, जो बच्चों के मस्तिष्क का विकास और आंखों की रोशनी को भी तेज़ करते हैं.

कैसे खिलाएं?
* एग पुलाव, एग उपमा, एग पकौड़ा, एग सैंडविच व एग परांठा बनाकर बच्चों को खिला सकते हैं.

सालमन
ओमेगा 3 फैटी एसिड का सबसे उत्तम स्रोत है सालमन. इसमें मौजूद फैट्स बच्चों के मानसिक विकास और इम्युनिटी को स्ट्रॉन्ग बनाने में मदद करता है.

कैसे खिलाएं?
* सालमन फिश के पकौड़े, टिक्की, कबाब और कटलेट बनाकर बच्चों को खिलाएं.

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लहसुन
लहसुन में ऐसे पोषक तत्व होते हैं, जो इम्युनिटी सेल्स में होनेवाले इंफेक्शन से लड़ने में सहायता करते हैं. यह बच्चों के शरीर में मौजूद सल्फर नामक तत्व को नियंत्रित करता है, ताकि उनके शरीर में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स की एक्टिविटीज़ तेज़ हो सके. इसलिए इसे इम्युनिटी बूस्टर फूड भी कहते हैं.

कैसे खिलाएं?
* दाल-सब्ज़ी के अलावा बच्चों को उनके फेवरेट फूड, जैसे- स्पेगेटी, पास्ता, सूप, गार्लिक ब्रेड, डिप्स-चटनी और ड्रेसिंग में भी लहसुन डालकर खिला सकते हैं.

टमाटर
लाल टमाटर में ऐसे पावरफुल एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो बच्चों में फ्री रैडिकल्स से होनेवाले डेमैज को रोकते हैं और उनकी इम्युनिटी क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं. इसमें विटामिन सी और बीटा-कैरोटीन नामक एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में होता है, जो इम्युनिटी सिस्टम में होनेवाले संक्रमण से बच्चों की रक्षा करता है.

कैसे खिलाएं?
* दाल-सब्ज़ी के अलावा टोमैटो प्यूरी, सॉस, सूप, सलाद, डिप बनाकर बच्चों को खिलाएं.
* 8 महीने से कम उम्रवाले बच्चों को टमाटर से बनी प्यूरी, डिप आदि न दें. इससे उन्हें रैशेज़ होने की संभावना होती है.

रंग-बिरंगी सब्ज़ियां
सब्ज़ियों में कलरफुल कंपोनेंट केरोटेनाइड्स (जैसे- बीटा कैरोटीन) नामक एंटीऑक्सीडेंट्स होता है, जो बच्चों की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है. गाजर में विटामिन्स ए, बी, सी और जी, पोटैशियम और सोडियम बहुत अधिक मात्रा में होते हैं, जो बच्चों की ग्लोइंग स्किन, आंखों की रोशनी, पाचन तंत्र और दांतों के लिए फ़ायदेमंद होते हैं. इसी तरह से लाल शिमला मिर्च में बीटा कैरोटीन और विटामिन सी बहुत अधिक मात्रा में होता है, जो बच्चों की आंख और त्वचा को हेल्दी बनाए रखने में मदद करता है.

कैसे खिलाएं?
* कलरफुल वेजीटेबल्स से सैंडविच, परांठा, रोल्स, कबाब, टिक्की आदि बनाकर बच्चों को खिला सकते हैं.

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हरी पत्तेदार सब्ज़ियां
हरी पत्तेदार सब्ज़ियों में आयरन प्रचुर मात्रा में होता है, जो शरीर में व्हाइट ब्लड सेल्स और एंडीबॉडीज़ के उत्पादन का काम करता है. जिन बच्चों में आयरन की कमी होती हैं, उन्हें बार-बार कोल्ड और फ्लू होने की संभावना होती है. हरी पत्तेदार सब्ज़ियों में बीटा-कैरोटीन सहित ऐसे अनेक एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो बच्चों के इम्युन सिस्टम को स्ट्रॉन्ग बनाते हैं.

कैसे खिलाएं?
* सब्ज़ी व परांठे के अलावा हरी सब्ज़ियों से बना चीला, डोसा और पूरी भी बच्चों को खिला सकते हैं.

ब्रोकोली
इसे सुपर फूड भी कहते हैं. ब्रोकोली में मौजूद मिनरल्स, विटामिन्स (ए, सी व ई), एंटीऑक्सीडेंट्स, एंटीइनफ्लेमेट्री और डिटॉक्सिफाइंग कंपोनेंट इम्युनिटी को स्ट्रॉन्ग करते हैं.

कैसे खिलाएं?
* पास्ता, सूप और डिप के साथ बच्चों को ब्रोकोली खिला सकते हैं. इसके अलावा उबली हुई ब्रोकोली में चीज़ डालकर अवन में सुनहरा होने तक बेक करें. फिर उन्हें खाने के लिए दें.

बीन्स, काबुली चना और दालें
बीन्स और दालों में फाइबर और अघुलनशील स्टार्च प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो पेट को स्ट्रॉन्ग बनानेवाले गुड बैक्टीरिया का निर्माण करते हैं, जिससे पाचन तंत्र और इम्युन सिस्टम मज़बूत होता है.

कैसे खिलाएं?
* दाल-बीन्स आदि से कबाब, टिक्की, रोल्स और पकौड़े बनाकर बच्चों को खिलाएं.

यह भी पढ़े: चाइल्ड केयर- बच्चों की खांसी के घरेलू उपाय

क्या करें पैरेंट्स?

बच्चों में इम्युनिटी सिस्टम को इंप्रूव करने के लिए
* बच्चे एक्सरसाइज़ करने से कतराते हैं, इसलिए पैरेंट्स उनके साथ मिलकर एक्सरसाइज़ करें.
* बच्चों की शारीरिक गतिविधियां, जैसे- स्विमिंग, साइकलिंग आदि को बढ़ावा दें.
* बच्चों को अधिक मात्रा में मीठा न दें.
* बच्चों पर तनाव हावी न होने दें.
* छोटे बच्चों को कम से कम 10-12 घंटे की नींद और स्कूल जानेवाले बच्चों को कम से कम 10 घंटे की नींद लेनी चाहिए.
* बच्चों को हाइज़ीन संबंधी आदतें सिखाएं.

– पूनम नागेंद्र शर्मा

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मदर्स गाइड- बच्चों के आम रोगों में उपयोगी घरेलू नुस्ख़े (Mother’s Guide- Home Remedies For Children’s Common illnesses)

Home Remedies For Children's Common illnesses

Home Remedies For Children's Common illnesses

जन्म के बाद से 5 वर्ष की उम्र बच्चे की परवरिश की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं. इस काल में शरीर में रक्त, मांस, सभी अवयव और मस्तिष्क आदि का विकास होता है. ऐसे समय में थोड़ी-सी लापरवाही या उनसे होने वाले रोग उनके शारीरिक या मानसिक विकास को रोक सकते हैं. इस उम्र में बच्चों को होने वाली छोटी-मोटी बीमारियों का घरेलू इलाज प्रस्तुत है.

नैपकिन रैश
प्रायः जन्म के बाद एक साल तक यह रोग पाया जाता है. मां के दूध में खराबी होने, टट्टी-पेशाब के बाद गुदा की उचित रूप से सफाई न करने या स्नान के बाद इस स्थान को अच्छी तरह न सुखाने से गुदा में फुंसियां निकल आती हैं. उनमें जलन व खुजली होती है और खुजलाते-खुजलाते उसमें घाव हो जाता है.
* लहसुन की 8-10 कलियों का रस निकाल कर 4 गुना जल में मिलाकर उससे रोगग्रस्त स्थान को धोएं.
* तुलसी के पत्तों का रस निकालकर या उसके पत्तों को पीसकर उसका लेप लगाने से नैपकिन रैश से राहत मिलती है.
* मक्खन में हल्दी मिलाकर उसका लेप लगाने से लाभ होता है.
* हरी दूब को अच्छी तरह पीस कर लेप लगाने से भी बच्चों को नैपकिन रैश से आराम मिलता है.

गैस
वायु के अवरोध से कभी-कभी बच्चे का पेट फूल जाता है. पेट में गुड़गुड़ आवाज होती है, दर्द होता है, कभी-कभी बच्चा तेज रोता है और बेचैन हो जाता है. ऐसे में निम्न नुस्ख़े कारगर सिद्ध होते हैं.
* एक चम्मच लहसुन के रस में आधा चम्मच घी मिलाकर पिलाएं. तुरंत गैस से राहत मिलेगी.
* सरसों भर सेंकी हुई हींग का चूर्ण घी में मिलाकर पिलाने से गैस से बच्चे को आराम मिलता है.
* जीरा या अजवायन को पीसकर पेट पर लेप करने से वायु का अवरोध दूर होता है और बच्चा राहत महसूस करता है.
* हींग को भूनकर उसे पानी में घिसकर नाभि के चारों ओर लेप करें. गैस का शमन होगा और बच्चा चैन की सांस लेगा.

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खांसी-जुकाम
बच्चों को अक्सर खांसी, जुकाम हो जाता है, इससे घबराएं नहीं. जिस कारण से यह रोग हुआ हो, उन खाद्य-पेयों से बच्चे को दूर रखें. गरम पानी पीने को दें. गर्म कपड़े पहनाकर रखें.
* आधा चम्मच तुलसी के रस में आधा चम्मच मधु मिलाकर दिन में तीन बार बच्चे को पिलाएं. इससे सर्दी-खांसी से तुरंत राहत मिलेगी.
* शिशु को खांसी-जुकाम हो तो थोड़ा-सा सरसों का तेल प्रतिदिन उसकी छाती पर मलें और गुदा में लगाएं, शीघ्र ही आराम होगा.
* थोड़ा-सा सोंठ का चूर्ण गुड़ व घी के साथ मिलाकर चटाने से बच्चे की खांसी-जुकाम ठीक होती है.
* आधा इंच अदरक व तेजपत्ता (1 ग्राम) को एक कप पानी में भिगोकर काढ़ा बनाएं. इसमें एक चम्मच मिश्री मिलाकर 1-1 चम्मच की मात्रा में तीन बार पिलाएं. खांसी-जुकाम दो दिन में ठीक हो जाएगा.

बुखार
बच्चे को हल्का बुखार होने पर निम्न नुस्ख़ों का प्रयोग करें. अवश्य लाभ होगा.
* कालीमिर्च का चूर्ण 125 मि.ग्रा. तुलसी के रस व शहद में मिलाकर दिन में तीन बार दें. बच्चे को बुखार से राहत मिलेगी.
* बुखार तेज हो तो प्याज को बारीक काटकर पेट व सिर पर रखें. बुखार कम होने लगेगा.
* बुखार में सिरदर्द हो तो गर्म जल या दूध में सोंठ का चूर्ण मिलाकर सिर पर लेप करें या जायफल पानी में पीसकर लगाएं.
* बुखार में पसीना अधिक हो, हाथ-पैरों में ठंड लगे तो सोंठ के चूर्ण को हल्के हाथों से लगाएं. लाभ होगा.

मतली
बच्चों की पाचन क्रिया ठीक न होने से कभी-कभी खट्टी, दुर्गंधयुक्त मतली आती है. दांत निकलते वक़्त भी मतली छूटती है.
* अदरक का रस एक चम्मच, नींबू का रस एक चम्मच और शहद एक चम्मच मिलाकर चटाएं.
* अजवायन और लौंग का चूर्ण 1-1 चुटकी लेकर शहद के साथ चटाएं.
* छोटी इलायची को भूनकर उसका कपड़छान चूर्ण बनाएं. चुटकी भर चूर्ण आधा चम्मच नींबू के रस में मिलाकर खिलाएं.
* हरी दूब का रस एक चम्मच लेकर सममात्रा में चावल के धोवन या मिश्री के साथ पिला दें.

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बच्चों की हिचकी
बच्चों को प्रायः हिचकी आती रहती है. वैसे यह लाभदायक है, क्योंकि यह शरीर के विकास की निशानी मानी जाती है. हिचकी से आंतें बढ़ती हैं और स्वस्थ रहती हैं. फिर भी यदि हिचकी बार-बार आती है और बच्चे को कष्ट होता हो तो निम्न नुस्खा प्रयोग करें.
* अदरक के रस में (4-5 बूंद) आधी चुटकी भर पीसी हुई सोंठ, काली मिर्च और दो बूंद नींबू का रस मिलाकर बच्चे को चटाएं. तुरंत
लाभ होगा.
* नारियल की जटा जलाकर उसकी थोड़ी-सी राख तीन चम्मच पानी में घोलकर और उसे छानकर बच्चे को पिलाने से हिचकी बंद हो
जाती है.

बच्चों में कब्ज़ की शिकायत
माता के अनुचित आहार-विहार के कारण उसका दूध दूषित हो जाता है, जिसकी वजह से बच्चे की पाचन शक्ति खराब होकर उसे वायु विकार हो जाता है और मल का सूख जाना, मल त्याग का अभाव, पेट में दर्द, गुड़गुड़ाहट, उल्टी आदि लक्षण पैदा हो जाते हैं और बच्चा रोते-रोते बेहाल हो जाता है.
* नीम के तेल का फाहा गुदा मार्ग में लगाने से कब्ज दूर होता है.
* रात को बीज निकाला हुआ छुहारा पानी में भिगो दें. सुबह उसे हाथ से मसलकर निचोड़ लें और छुहारे के गूदे को फेंक दें. छुहारे के इस पानी को बच्चे को आवश्यकतानुसार 3-4 बार पिलाएं. इससे कब्ज की शिकायत दूर होगी.
* बड़ी हरड़ को पानी के साथ घिसकर उसमें मूंग के दाने के बराबर काला नमक मिलाएं. इसे कुछ गुनगुना गर्म करके आवश्यकतानुसार दिन में 2-3 बार दें. अवश्य लाभ होगा.

मुंह में छाले
बच्चों के लिए यह रोग भी बहुत कष्टदायक होता है. मुख में तथा जीभ पर लाल-लाल छोटे-छोटे दाने निकल आते हैं. मुंह से लार टपकना, मुंह में पीड़ा व जलन आदि लक्षण मिलते हैं.
* सुहागे की खील को बारीक पीसकर शहद या ग्लिसरीन में मिलाकर छालों पर लगाने से शीघ्र लाभ होता है.
* पीपल की छाल तथा पीपल के पत्तों को पीसकर छालों पर लगाने से छाले नष्ट हो जाते हैं.
* आंवलों का रस निकालकर छालों पर मुलायम हाथों से लगाएं और राल बहने दें. तीन बार यह प्रयोग करने से छाले ठीक हो जाते हैं.

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नींद में डरना
आमाशय का दूषित प्रभाव मस्तिष्क में पहुंच जाने से बच्चा सोते समय नींद में डरावने सपने देखकर डरने लगता है और नींद से जाग उठता है. वह जोर-जोर से रोने लगता है. नींद में उसकी सांस घुटने लगती है और बच्चा चीख मारकर उठ बैठता है.
* रात को सोने से दो घंटा पहले बच्चे को खिला दिया करें, ताकि खाना भलीभांति पच जाए.
* सर्दी के मौसम में एक से दो ग्राम सौंफ पानी में उबालकर उसे छान लें. इसे रात को सोने से पहले बच्चे को पिला दें. इससे नींद में डरने की शिकायत दूर होगी.
* गर्मी के मौसम में छोटी इलायची का एक ग्राम अर्क सौंफ के उबले हुए पानी के साथ पिलाएं. नींद में डरने की आदत छूट जाएगी.

– रीटा गुप्ता

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…क्योंकि मां पहली टीचर है (Because Mom Is Our First Teacher)

Mom Is Our First Teacher

Mom Is Our First Teacher

यशोदा, कुंती, जीजाबाई… भारतीय इतिहास में ऐसी कई मांएं हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को वीरता, शौर्य, न्याय और मानवता का पाठ पढ़ाया. आज भी ऐसी कई कामयाब संतानें हैं, जिनकी सफलता में उनकी मां का बहुत बड़ा योगदान रहा है. आप अपनी संतान को कैसा इंसान बनाना चाहती हैं?

धूप में छांव जैसी मां
सुबह की आरती से लेकर, रसोई की खट-पट, छत पर कपड़े-अचार-पापड़ सुखाते हुए, कढ़ाई-बुनाई करते हुए… या फिर बालों में तेल लगाते हुए, रात में लोरी गाते हुए, कहानी सुनाते हुए… खनकती चूड़ियों से सजे हाथों से दिनभर की अपनी तमाम ज़िम्मेदारियां निभाते हुए बातों-बातों में जीवन की न जाने कितनी गूढ़ बातें सिखा जाना… ये हुनर स़िर्फ मां के पास होता है… न कोई क्लासरूम, न कोई किताब, न कोई सवाल-जवाब… वो बस अपने प्यार, अपनी बातों, अपने हाव-भाव से ही इतना कुछ सिखा जाती है कि हम बिना कोई प्रयास किए ही बहुत कुछ सीख जाते हैं, इसीलिए कहा जाता है कि मां हमारी पहली टीचर होती है. अपनी मां के साथ हम सब की ऐसी ही कई बेशक़ीमती यादें जुड़ी होती हैं, इसीलिए एक मां के रूप में स्त्री की अपनी संतान और समाज के प्रति कई ज़िम्मेदारियां होती हैं.

मां होना एक बड़ी ज़िम्मेदारी है
एक मां के रूप में स्त्री के लिए इतना ही कहना काफ़ी है कि दुनिया के सबसे कामयाब इंसान को जन्म देनेवाली भी एक स्त्री ही होती है. अतः एक मां के रूप में नारी की समाज के प्रति एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है. स्त्री चाहे तो समाज की रूपरेखा बदल सकती है. वो आनेवाली पीढ़ी को अच्छे संस्कार देकर एक नए युग का निर्माण कर सकती है, क्योंकि मां ही बच्चे की पहली टीचर होती है. वो अपने बच्चे को गर्भ से ही अच्छे संस्कार देना शुरू कर देती है. ये बात वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध हो चुकी है कि जब बच्चा मां के गर्भ में होता है, तो मां की मन:स्थिति का बच्चे पर भी असर होता है. अतः मां गर्भावस्था में अच्छे वातावरण में रहकर, अच्छी किताबें पढ़कर, अच्छे विचारों से बच्चे को गर्भ में ही अच्छे संस्कार देने की शुरुआत कर सकती है.

बचपन और मां का साथ
जन्म लेने के बाद बचपन का ज़्यादातर समय बच्चा अपनी मां के साथ बिताता है और सबसे ख़ास बात, जन्म से लेकर पांच साल की उम्र तक इंसान का ग्रास्पिंग पावर यानी सीखने की क्षमता सबसे ज़्यादा होती है. इस उम्र में बच्चे को जो भी सिखाया जाए, उसे वो बहुत जल्दी सीख जाता है. अतः हर मां को चाहिए कि वो अपने बच्चे की परवरिश इस तरह करे, जिससे वो एक अच्छा, सच्चा और कामयाब इंसान बने, उसका सर्वांगीण विकास हो. बच्चे की परवरिश में मां की भूमिका उस किसान की तरह होती है, जो बीज को फूलने-फलने के लिए सही माहौल तैयार करता है, उसकी खाद-पानी की ज़रूरतों को पूरा करता है. ठीक उसी तरह यदि आप अपने बच्चे में अच्छे संस्कार व गुण डालना चाहती हैं, तो उसे तनावमुक्त व सकारात्मक माहौल दें, लेकिन इस बात का भी ध्यान रखें कि उसे किसी बंधन में बांधने की बजाय अपने तरी़के से आगे बढ़ने दें. बच्चे को आत्मनिर्भर बनाएं, ताकि बड़ा होकर वो अकेला ही दुनिया का सामना कर सके, उसे आपका हाथ थामने की ज़रूरत न पड़े. ये बातें कहने में जितनी आसान लगती हैं, इस पर अमल करना उतना ही मुश्किल है. बच्चों की परवरिश के मुश्किल काम को कैसे आसान बनाया जा सकता है? आइए, जानते हैं.

पहले ख़ुद को बदलें
यदि आप अपने बच्चे को अच्छे संस्कार देना चाहती हैं, तो इसके लिए पहले अपनी बुरी आदतों को बदलें, क्योंकि बच्चा वही करता है जो अपने आसपास देखता है. यदि वो अपने पैरेंट्स को हमेशा लड़ते-झगड़ते देखता है, तो उसका व्यवहार भी झगड़ालू और नकारात्मक होने लगता है. अगर आप अपने बच्चे को सच्चा, ईमानदार, आत्मनिर्भर, दयालु, दूसरों से प्रेम करनेवाला, अपने आप पर विश्‍वास करने वाला और बदलावों के अनुरूप ख़ुद को ढालने में सक्षम बनाना चाहती हैं, तो पहले आपको ख़ुद में ये गुण विकसित करने होंगे.

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प्यार ज़रूरी है
बच्चे के बात न मानने या किसी चीज़ के लिए ज़िद करने पर आमतौर पर हम उसे डांटते-फटकारते हैं, लेकिन इसका बच्चे पर उल्टा असर होता है. जब हम ज़ोर से चिल्लाते हैं, तो बच्चा भी तेज़ आवाज़ में रोने व चीखने-चिल्लाने लगता है. ऐसे में ज़ाहिर है आपका ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है, लेकिन इस स्थिति में ग़ुस्से से काम बिगड़ सकता है. अतः शांत दिमाग़ से उसे समझाने की कोशिश करें कि वो जो कर रहा है वो ग़लत है. यदि फिर भी वो आपकी बात नहीं सुनता, तो कुछ देर के लिए शांत हो जाएं और उससे कुछ बात न करें. आपको चुप देखकर वो भी चुप हो जाएगा.

ना कहना भी ज़रूरी है
बच्चे से प्यार करने का ये मतलब कतई नहीं है कि आप उसकी हर ग़ैरज़रूरी मांग पूरी करें. यदि आप चाहती हैं कि आगे चलकर आपका बच्चा अनुशासित बने, तो अभी से उसकी ग़लत मांगों को मानना छोड़ दें.
रोने-धोने पर अक्सर हम बच्चे को वो सब दे देते हैं, जिसकी वो डिमांड करता है, लेकिन ऐसा करके हम उसका भविष्य बिगाड़ते हैं. ऐसा करने से बड़ा होने पर भी उसे अपनी मांगें मनवाने की आदत पड़ जाएगी और वो कभी भी अनुशासन का पालन करना नहीं सीख पाएगा. अतः बच्चे की ग़ैरज़रूरी डिमांड के लिए ना कहना सीखें, लेकिन डांटकर नहीं, बल्कि प्यार से. प्यार से समझाने पर वो आपकी हर बात सुनेगा और आपके सही मार्गदर्शन से उसे सही-ग़लत की समझ भी हो जाएगी.

बच्चे के गुणों को पहचानें
हर बच्चा अपने आप में यूनीक होता है. हो सकता है, आपके पड़ोसी का बच्चा पढ़ाई में अव्वल हो और आपका बच्चा स्पोर्ट्स में. ऐसे में कम मार्क्स लाने पर उसकी तुलना दूसरे बच्चों से करके उसका आत्मविश्‍वास कमज़ोर न करें, बल्कि स्पोर्ट्स में मेडल जीतकर लाने पर उसकी प्रशंसा करें. आप उसे पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कह सकती हैं, लेकिन ग़लती सेभी ये न कहें कि फलां लड़का तुमसे इंटेलिजेंट है. ऐसा करने से बच्चे का आत्मविश्‍वास डगमगा सकता है और उसमें हीनभावना भी आ सकती है.

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निर्णय लेना सिखाएं
माना बच्चे को सही-ग़लत का फ़र्क़ समझाना ज़रूरी है, लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि आप उसे अपनी मर्ज़ी से कोई ़फैसला लेने ही न दें. ऐसा करके आप उसकी निर्णय लेने की क्षमता को कमज़ोर कर सकती हैं. यदि आप चाहती हैं कि भविष्य में आपका बच्चा अपने फैसले ख़ुद लेने में सक्षम बने, तो अभी से उसे अपने छोटे-मोटे फैसले ख़ुद करने दें, जैसे- दोस्तों का चुनाव, छुट्टी के दिन की प्लानिंग आदि. बच्चे को अपने तरी़के से आगे बढ़ने दें, इससे न स़िर्फ वो आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि उसकी क्रिएटिविटी भी बढ़ेगी.

हर बात हो सकारात्मक
माता-पिता जो भी कहते हैं, उसका बच्चों पर गहरा असर होता है. अतः बच्चे से कुछ भी कहते समय ये ध्यान रखें कि आपकी बातों का उस पर सकारात्मक असर हो. उसका ख़ुद पर विश्‍वास बढ़े, उसके मन में दूसरों के प्रति दया का भाव रहे, वो निडर होकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित हो और सोच-समझकर किसी भी चीज़ का चुनाव करे.

ये बातें हैं काम की
बच्चे को अच्छा इंसान बनाने के लिए इन बातों पर अमल करना बहुत ज़रूरी है-
* यदि आप चाहती हैं कि बच्चा आपका और दूसरों का सम्मान करे, तो पहले बच्चे को सम्मान दें.
* अपने बच्चे पर विश्‍वास करें, ताकि वो भी दूसरों पर विश्‍वास करे.
* बच्चे को अनुशासित बनाने के लिए कुछ नियम ज़रूर बनाएं, लेकिन वो नियम ऐसे न हों जिन्हें बदलने की गुंजाइश न हो.
* बच्चे के आत्मविश्‍वास की रक्षा करें. उसे हर वो काम करने की स्वीकृति दें, जिससे उसका आत्मविश्‍वास बढ़े.
* बड़े होकर उसे क्या बनना है. ये उसे ख़ुद तय करने दें, उस पर अपने सपने और उम्मीदें न थोपें.
* बच्चे को प्यार की अहमियत सिखाएं. जब भी मौक़ा मिले उसे गले लगाएं और बताएं कि आप उसे कितना प्यार करती हैं. इससे बच्चा दूसरों से प्यार करना सीखता है.
* जब भी बच्चा आपके सामने आए, तो आपकी आंखों में ख़ुशी दिखाई दे, परेशानी या उदासी नहीं.
* यदि आप चाहती हैं कि आपका बच्चा चीज़ों की कद्र करे, तो उसे सिखाएं कि जीवन में जो भी मिलता है, उसके लिए हमें ईश्‍वर का शुक्रगुज़ार होना चाहिए.

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कैसी परवरिश का क्या असर होता है बच्चे पर?
बच्चे के व्यवहार और सोच पर उसकी परवरिश का बहुत असर पड़ता है. बच्चे की परवरिश जिस माहौल में होती है उसका असर भविष्य पर भी पड़ता है-
* अगर बचपन से ही उसे आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है, तो वो दूसरों की निंदा करना ही सीखता है.
* यदि वो बचपन से ही घर में लड़ाई-झगड़े देखता है, तो वो भी लड़ना सीख जाता है.
* अगर छोटी उम्र से ही उसे किसी तरह के डर का सामना करना पड़ता है, तो बड़े होने पर वो हमेशा आशंकित या चिंतित रहता है.
* यदि घर और बाहर हमेशा उसका मज़ाक उड़ाया जाता है, तो वो शर्मीला या संकोची बन जाता है.
* अगर बच्चे की परवरिश ऐसे माहौल में हुई हो जहां उसे जलन की भावना का सामना करना पड़ा हो, तो बड़ा होने पर वो दुश्मनी सीखता है.
* अगर शुरुआत से ही बच्चे को प्रोत्साहन मिलता है, तो वह आत्मविश्‍वासी बनता है.
* यदि बच्चा अपने माता-पिता को बहुत कुछ सहते हुए देखता है, तो वह धैर्य और सहनशीलता सीखता है.
* अगर शुरू से बच्चा तारी़फें पाता है, तो बड़ा होकर वो भी दूसरों की प्रशंसा करना सीखता है.
* यदि बच्चा अपने घर व आसपास ईमानदारी देखता है, तो वो सच्चाई सीखता है.
* अगर बच्चा सुरक्षित माहौल में रहता है, तो वो ख़ुद पर और दूसरों पर भरोसा करना सीखता है.

– कमला बडोनी

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चाइल्ड केयर- बच्चों की खांसी के घरेलू उपाय (Child Care- Health Tips For Cough in Babies)

Health Tips For Cough in Babies

Health Tips For Cough in Babies

जाड़े के मौसम अथवा बदलते मौसम के कारण अक्सर बच्चों को खांसी की शिकायत हो जाती है. सर्दी-जुकाम, ठंडा वातावरण भी खासी के प्रमुख कारणों में से एक है. धूल भरे वातावरण में रहना, गंदी जगह और भीड़वाले इलाके, औद्योगिक क्षेत्र, धुओं की तरह अन्य प्रदूषणों के कारण भी खांसी के जन्मदाता हैं. खांसी से बचने के लिए उपरोक्त कारणों से बचने की भरसक कोशिश करनी चाहिए. ठंडी के दिनों में गर्म कपड़ों का प्रयोग करना चाहिए. बच्चे और बूढ़े सर्दी से अधिक प्रभावित होते हैं. अतः इनका विशेष ध्यान रखना चाहिए. खांसी होने पर निम्न घरेलू उपाय करें.

* एक चम्मच तुलसी का रस, एक चम्मच अदरक का रस और एक चम्मच शहद मिलाकर दिन में तीन बार सेवन करने से कफ तथा खांसी से राहत मिलती है.
* अंजीर खाने से छाती में जमा बलगम निकल जाता है और खांसी से छुटकारा मिलता है.
* बड़ी इलायची का चूर्ण दो-दो ग्राम दिन में तीन बार पानी के साथ लेने से सभी प्रकार की खांसी से आराम मिलता है.
* काली खांसी होने पर कपूर की धूनी सूंघने से लाभ होता है.
* खांसी को कम करने के लिए मिश्री के साथ अदरक का एक छोटा-सा टुकड़ा मुंह में रखकर चबाइए. इससे खांसी से शीघ्र आराम मिलेगा.
* अदरक का रस शहद के साथ रात को सोते समय चाटें. इसके बाद पानी न पीएं. इससे खांसी में राहत पहुंचेगी.

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* कालीमिर्च तथा मिश्री या मुलहठी को मुख में रखकर चूसें. इससे सूखी खांसी में आराम मिलता है.
* तवे पर फिटकरी भून लें और उसका चूर्ण बनाकर मिश्री या शहद के साथ सेवन करें. सूखी खांसी से राहत मिलेगी.
* एक चम्मच सोंठ का चूर्ण (भूना हुआ), थोड़ा-सा गुड़ और एक चुटकी अजवाइन इन तीनों को एक साथ मिलाकर खाएं और ऊपर से गर्म दूध पीकर कम्बल ओढ़कर सो जाएं. खांसी से छुटकारा मिलेगा.
* काली खांसी को खत्म करने के लिए काले बांस को जलाकर राख बना लें. इसे शहद के साथ मिलाकर चाटें.
* एक तोला मुलहठी, चौथाई तोला काली मिर्च, आधा तोला सोंठ, आधा तोला अदरक- इन सबको बारीक पीसकर छान लें और दो तोले गुड़ में मिलाकर बेर के बराबर गोलियां बना लें. 1-1 गोली सुबह-शाम गर्म पानी के साथ सेवन करें. इससे काली खांसी खत्म हो जाएगी.
* बादाम की 5 गिरी, 5 मुनक्का और 5 काली मिर्च- इन्हें मिश्री के साथ पीसकर गोली बना लें. चार-चार घंटे पर एक गोली चूसें. इससे खांसी दूर हो जाएगी.
* खांसी में थोड़े-से नमक में बराबर मात्रा में हल्दी मिलाकर फांक लें और ऊपर से एक कप गुनगुना दूध पी लें.
* चाय के पानी में चुटकीभर नमक मिलाकर सोते समय गरारे करने से भी खांसी में लाभ होता है.
* खांसी आने पर अरवी की सब्जी खाएं. इससे खांसी तुरंत ठीक हो जाएगी.
* अकरकरा और गुड़ की गोली बनाकर चूसने से खांसी तुरंत ठीक हो जाती है.

– भावना वर्मा

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बच्चे को डांटें नहीं हो जाएगा बीमार (Yelling On Your Child Can Make Him/Her Fall Sick)

Yelling On Your Child Can Make Him/Her Fall Sick

Yelling On Your Child Can Make Him/Her Fall Sick

अगर पैरेंट्स चाहते हैं कि बच्चे की सेहत दुरुस्त रहे, तो उसे डांटें कतई मत. अगर आप बच्चे को डांटेंगे, तो उसकी सेहत ख़राब हो जाएगी और बड़ा होने पर भी वह बीमार रहेगा. यानी बच्चे को तंदुरुस्त देखने के अभिलाषी माता-पिता को उसके साथ बहुत अच्छा व्यवहार करना होगा. जब पैरेंट्स बच्चे के साथ हमेशा अच्छी तरह पेश आएंगे और उसके साथ मधुर संबंध कायम करेंगे, तो यक़ीन मानिए, बच्चा ख़ुश और तंदुरुस्त होगा.

बच्चों का स्वास्थ्य हर पैरेंट्स के लिए हमेशा से चिंता का विषय रहा है, इसीलिए हर कोई चाहता है और पूरी कोशिश करता है कि उसका बच्चा हरदम तंदुरुस्त रहे. इसके लिए बच्चे को खाने के लिए पौष्टिक भोजन और पीने के लिए टॉनिक दिया जाता है. लेकिन कभी-कभी बच्चा पौष्टिक भोजन और टॉनिक से भी स्वस्थ नहीं हो पाता. इससे अमूमन हर दंपति परेशान रहते हैं.

* बच्चों की सेहत से जुड़ी इस पहेली को सुलझाया है अमेरिका में हुए रिसर्च ने. अमेरिका के टेक्सास में बायलोर यूनिवर्सिटी में हुए रिसर्च में कहा गया है कि माता-पिता के व्यवहार का असर बच्चों की सेहत पर होता है. रिसर्च में शामिल लोगों ने कहा है कि अगर माता-पिता का व्यवहार बच्चे के साथ बहुत अच्छा है, तो बच्चा स्वस्थ रहता है और बड़ा होकर भी वह तंदुरुस्त ही रहता है.
* बायलोर यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर और रिसर्चर मैथ्यू एंडरसन ने कहा कि माता-पिता से बच्चों के अच्छे संबंध बच्चे के खाने, सोने और उसके दैनिक गतिविधि को प्रेरित करने के लिए ज़रूरी हो सकते हैं. इसलिए शोध में शामिल लोगों को सलाह दी गई है कि अपने बच्चे के साथ हमेशा बहुत बढ़िया संबंध बनाकर रखें.
* इस अध्ययन में पता चला है कि अगर माता-पिता से बच्चे का संबंध तनावपूर्ण अथवा अपमानजनक हैं, तो इसका प्रतिकूल असर बच्चे की खाने-पीने की आदतों पर पड़ता है और बच्चे का भोजन पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता.
* यहीं से बच्चे की सेहत ख़राब होनी शुरू हो जाती है. ऐसे में बच्चे पौष्टिक आहार लेने की बजाय ज़्यादा शुगर या ज़्यादा ऑयली डिश खाने लगते हैं और धीरे-धीरे अनहाइजेनिक फूड खाने की उनकी आदत पड़ जाती है.

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* ज़्यादा शुगर या तेल खानेवाले बच्चों की आदत ही ख़राब हो जाती है. इसके चलते उनकी रोज़मर्रा की दूसरी गतिविधियां भी अनियमित हो जाती हैं.
* बच्चों में स्वस्थ जीवनशैली और सामाजिक, भावनात्मक विकास का होना उसकी लंबी आयु के लिए बहुत ज़रूरी है.
* आर्थिक रूप से कमज़ोर घरों में माता-पिता बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर पाते. माता-पिता और बच्चे के बीच इस तरह के व्यवहार का असर बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ता है.
* अंततः इसका असर बच्चे की बढ़ती उम्र के साथ उसके सामाजिक-आर्थिक स्तर पर दिखता है और बच्चा बीमार और नकारात्मक प्रवृत्ति का हो जाता है.
* इसी तरह कम शिक्षित और कमज़ोर आर्थिक स्थितिवाले माता-पिता बच्चों को धमकी देने या ज़बरदस्ती आज्ञा मनवाने की बजाय रचनात्मक बातचीत की सहायता लेते हैं, इससे उनके रिश्तों में गर्माहट बढ़ती है.
* अच्छे घर में और अच्छे माता-पिता के बच्चे बड़े होने का असर उसके शारीरिक स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद होता है.
* रिसर्च में यह भी कहा गया है कि अगर पैरेंट्स का अपने बच्चे से संबंध अच्छा नहीं है, तो इसका असर बच्चे की सेहत पर पड़ता है. इतना ही नहीं, ऐसे माहौल में पलनेवाले बच्चे का स्वास्थ्य बड़े होने पर भी ठीक नहीं रहता है.

– अटलजी

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कैसे पता करें, बच्चा स्ट्रेस में है? (Identifying Signs Of Stress In Your Children)

Signs Of Stress In Your Children

Signs Of Stress In Your Children

बच्चा अगर तनाव में है, तो तीन बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है. उसके व्यवहार के साथ उसमें शारीरिक और भावनात्मक बदलाव भी होते हैं. तनाव से घिरे बच्चों के इन तीनों संकेतों को समझना ज़रूरी है, तभी उन्हें स्ट्रेस से बाहर निकाला जा सकता है.

व्यवहार पर रखें नज़र
अगर बच्चा तनाव में है, तो सबसे पहला असर उसके व्यवहार में नज़र आएगा, जैसे- हर बात में मूड ख़राब हो जाना, छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाना या कभी अचानक से ग़ुमसुम हो जाना. बिना बात के घंटों रोना या उदास रहना आदि. इन बातों को अनदेखा न करें.

बिस्तर गीला करना
छोटे बच्चे अक्सर नींद में बिस्तर गीला करते हैं. देखा गया है कि 3-4 साल की उम्र में बच्चे इस पर क़ाबू पा लेते हैं, पर बढ़ती उम्र में इसकी वजह भावनात्मक भी हो सकती है. माता-पिता का अटेंशन न मिलने की वजह से बच्चा तनाव महसूस करता है और नींद में अक्सर बिस्तर गीला कर देता है.

पसंदीदा चीज़ों से दूर हो जाना
अगर आपका बच्चा अपनी पसंदीदा चीज़ें, जैसे- खिलौने, फेवरिट कॉर्टून्स, पसंदीदा डिश या फिर जिसके बिना वो पूरे दिन नहीं रह सकता, उनसे दूरी बनाने लगे, तो हो सकता है कि वो किसी ना किसी प्रकार के स्ट्रेस में है.

स्कूल से बच्चे की शिकायतें आना
कभी-कभार स्कूल से बच्चे की शिकायत आना नॉर्मल है, क्योंकि बच्चे स्कूल में मस्ती करते रहते हैं, लेकिन शिकायतों का ये सिलसिला अगर अचानक बढ़ जाए, तो समझ जाइए कुछ गड़बड़ है. स्ट्रेस बच्चों को मानसिक रूप से भी प्रभावित करता है, बच्चा स्कूल में कॉन्संट्रेट नहीं कर पाता, दोस्तों के साथ ठीक से घुल-मिल नहीं पाता.

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नाख़ून चबाना
बच्चे जब ज़रूरत से ज़्यादा सोचते हैं या परेशान होते हैं, तो अनजाने में अपने नाख़ून चबाने लगते हैं.

अगर बच्चा करे ये शिकायतें
तनाव का सीधा असर बच्चे की सेहत पर पड़ता है. बच्चे को अक्सर सर्दी-ज़ुकाम होने लगता है. इसके अलावा सिरदर्द और पेटदर्द जैसी परेशानियां भी होती हैं. तनाव में अक्सर बच्चा सुस्त हो जाता है.

खाने-सोने की आदतों में परिवर्तन
जब बच्चा तनाव महसूस करता है, तो उसकी खाने और सोने की आदतों में बदलाव आ जाता है. कई बार तनावग्रस्त बच्चे बहुत ज़्यादा खाने या सोने लगते हैं जबकि कई बार ऐसा भी होता है कि बच्चे खाना छोड़ देते हैं और उनकी नींद भी कम हो जाती है.

हर बात में शिकायत करना
स्ट्रेस कई बार बच्चों को इतना चिड़चिड़ा बना देता है कि वो हर छोटी बात में ही शिकायत करने लगते हैं.

* ह्यूस्टन यूनिवर्सिटी की स्टडी के मुताबिक़ तनाव में लंबे समय तक रहनेवाले बच्चे अक्सर 18 साल की उम्र तक मोटे हो जाते हैं.
* कई बच्चे मां के गर्भ में ही तनाव के शिकार हो जाते हैं. प्रेग्नेंसी के दौरान मां के तनाव का असर गर्भ में बच्चे पर पड़ता है. ऐसे बच्चे अक्सर परेशान रहते हैं और उनमें कॉन्संट्रेशन की कमी होती है. इसलिए डॉक्टर्स गर्भावस्था में स्ट्रेस ना लेने की सलाह देते हैं.

तनाव कुछ व़क्त के लिए होता है. विपरीत परिस्थितियों में अक्सर बच्चे तनाव के शिकार होते हैं. लेकिन जहां तक बात है डिप्रेशन की, तो ये तनाव से गंभीर अवस्था है. डिप्रेशन एक सायकियाट्रिक डिसऑर्डर है. लंबे व़क्त तक डिप्रेशन में रहनेवाले कई बच्चे अपनी जान भी ले लेते हैं. डिप्रेशन के शिकार बच्चों को साइकोलॉजिकल मदद की ज़रूरत होती है. साथ ही माता-पिता को भी ऐसे बच्चों का ख़ास ध्यान रखना चाहिए.

– डॉ. धीरेन गाला

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19 आसान टिप्स बच्चों के हाइट बढ़ाने के (19 Easy Tips To Help Your Child Grow Taller)

टिप्स बच्चों के हाइट बढ़ाने के

 

टिप्स बच्चों के हाइट बढ़ाने के

माता-पिता अक्सर अपने बच्चे की हाइट को लेकर परेशान रहते हैं. बच्चे की हाइट बढ़ाने के लिए न जाने क्या-क्या करते हैं. लेकिन एक बात समझनी ज़रूरी है कि हर बच्चे की विकास दर अलग होती है. अगर आप भी चाहते हैं कि आपके बच्चे की हाइट और वज़न परफेक्ट हो, तो अपनी लाइफस्टाइल व हैबिट्स में बदलाव करें.

हाइट बढ़ने की उम्र
* जब बच्चा एक साल का होता है, तो उसकी लंबाई बढ़ने की गति धीमी होती है, लेकिन जब वो किशोरावस्था तक पहुंचता है, तब विकास दर बढ़ जाती है, जिसमें लड़कियों की हाइट 8 और 13 वर्ष की उम्र के बीच तेज़ी से बढ़ती है, जबकि लड़के 10 से 15 की उम्र के बीच तेज़ी से बढ़ते हैं.
बच्चे की हाइट इन बातों पर निर्भर करती है
* बढ़ते बच्चे कई शारीरिक, मानसिक और हॉर्मोनल बदलाव से गुज़रते हैं. बच्चों की लंबाई 18 से 20 साल तक बढ़ती है.
* लंबाई बढ़ने के लिए ह्यूमन ग्रोथ हॉर्मोन यानी एचजीएच ज़िम्मेदार होता है. ये हार्मोन पिट्यूटेरी ग्लैंड से निकलता है.
* नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ की मानें, तो 1 से 3 साल के बच्चे को रोज़ाना 700 एमजी, 4 से 8 साल के बच्चे को 1000 एमजी, 9 से 18 साल के बच्चे के लिए 1300 एमजी कैल्शियम ज़रूरी होता है.

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आदतें बदलें, हाइट बढ़ाएं
* बढ़ते बच्चे के लिए कम से कम 10 से 12 घंटे की नींद ज़रूरी होती है, इसलिए बच्चे को रात में जल्दी सुलाने की कोशिश करें. आराम न मिलने की वजह से बच्चे की हाइट पर असर पड़ता है.
* बच्चे के आहार में ज़्यादा से ज़्यादा प्रोटीन शामिल करें. प्रोटीन के लिए फिश, लीन मीट आदि खिलाएं.
* प्रोटीन के साथ इस बात का ध्यान भी रखें कि उसके आहार में आयरन, विटामिन्स और कैल्शियम की मात्रा भी भरपूर हो. हरी सब्ज़ियों और डेयरी प्रोडक्ट्स में कैल्शियम अधिक होता है.
* बच्चों को टेलीविज़न, लैपटॉप, कंप्यूटर, टैबलेट जैसी चीज़ों से दूर रखें. बच्चे घंटों इन पर एक जगह बैठकर अपना समय बर्बाद करते हैं.
* उन्हें आउटडोर ऐक्टिविटी करवाएं. खेलने के लिए बाहर भेजें. एक्सरसाइज़ ऐक्टिविटीज़, जैसे- साइकल चलाना, फुटबॉल, बास्केटबॉल, रस्सी कूदना, बैडमिंटन खेलना आदि बच्चों की हाइट बढ़ाने में मदद करेगा, साथ ही इन ऐक्टिविटीज़ से मोटापा भी घटेगा.
* स्ट्रेचिंग और हैंगिंग एक्सरसाइज़ कराएं.
* योग भी बच्चों के लिए बेस्ट है. सूर्य नमस्कार, चक्रासन जैसे आसन हाइट बढ़ाने में कारगर हैं.

 

* बच्चे के वज़न और हाइट पर नज़र रखें. डॉक्टर से भी रूटीन चेकअप कराते रहें. अगर बच्चे के विकास में कोई भी बाधा आ रही होगी, तो रूटीन चेकअप की वजह से शुरुआती दौर में ही इसका पता चल जाएगा.
* बैलेंस डायट दें. ऐसी डायट जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और फैट्स सब शामिल हों. बर्गर, पिज़्ज़ा, कोल्ड ड्रिंक जैसे जंक फूड से बच्चे को दूर रखें. कार्बोहाइड्रेट के लिए गेहूं की रोटी, ब्राउन ब्रेड आदि दे सकते हैं.
* विटामिन डी युक्त आहार भी डायट में शामिल करें. इसके अलावा बच्चे को विटामिन डी के लिए सूर्य की रोशनी में भी जाने के लिए कहें. विटामिन डी शरीर और मसल्स के विकास के लिए बेहद ज़रूरी है.
* ज़िंक शरीर के विकास में सहायता करता है. ज़िंक रिच फूड, जैसे- गेहूं, मूंगफली, केवड़ा और कद्दू को अपने डेली डायट में शामिल करें.
* बच्चों के लिए दिन के तीनों व़क्त का आहार ज़रूरी हैं. मेटाबॉलिज़्म को मज़बूत बनाए रखने के लिए तीनों व़क्त के आहार के साथ बीच-बीच में 4 से 5 छोटे-छोटे हेल्दी स्नैक्स भी दें.
* विकास के लिए सबसे ज़रूरी है इम्यून सिस्टम का मज़बूत होना. अगर इम्यून सिस्टम कमज़ोर होगा, तो बच्चा अक्सर बीमार रहेगा. बीमारी शरीर के विकास में बाधा बनती है. इम्यून सिस्टम स्ट्रॉन्ग बनाने के लिए विटामिन सी की मात्रा आहार में बढ़ाएं.
* कैफीन युक्त पेय, जैसे- चाय, कॉफी की आदत न डालें.
* 8 से 10 ग्लास पानी पीने की आदत डालें.
* बैठते और खड़े रहते व़क्त बच्चों के बॉडी पॉश्‍चर पर ध्यान दें. स्कूल बैग्स की वजह से कई बार बच्चे झुककर चलने लगते हैं. स्पाइन सीधी रहनी चाहिए और कंधे आगे की ओर झुके नहीं होने चाहिए. इससे ग्रोथ पर असर पड़ता है.
* अगर बच्चे की हाइट कम भी है, तो उसका कॉन्फिडेंस बढ़ाने की कोशिश करें. उसके खानपान का ध्यान रखने के साथ उसे स्कूल की स्पोर्ट्स या दूसरी ऐक्टिविटी में भाग लेने के लिए कहें. उसे ऐसे फेमस लोगों के उदाहरण दें, जिनकी हाइट कम है, फिर भी वो कामयाब हैं.
* हाइट बढ़ाने वाले विज्ञापनों की ओर ध्यान न दें. विज्ञापन देखकर बच्चे को कोई दवा या कैप्सूल्स न दें. ये ख़तरनाक हो सकते हैं.
* पौष्टिक आहार, एक्सरसाइज़ और सारी बातों का ध्यान रखने के बाद भी अगर हाइट नहीं बढ़ रही है, तो डॉक्टर से संपर्क ज़रूर करें.

– नरेंद्र भुल्लर

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बच्चों में नींद न आने के 7 कारण व उपाय (7 Causes Of Sleeplessness In Children And Its Solutions)

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जिस ऱफ़्तार से व़क़्त बदल रही है, उससे भी कहीं तेज़ी से बदल रही है हमारी लाइफ़स्टाइल, जिसने न स़िर्फ बड़ों, बल्कि मासूम बच्चों को भी तनाव, अवसाद का शिकार बना दिया है और उनकी रातों की नींद तक ग़ायब कर दी है… अब बड़े ही नहीं, बच्चे भी नींद न आने की बीमारियों से जूझ रहे हैं.

मां की लोरियां सुनकर सोना तो ख़ैर अब बीते ज़माने की बात होती जा रही हैं, क्योंकि आज की कामकाजी मां के पास न तो बच्चे को लोरी सुनाने का समय है और न ही आज के बच्चों को इसमें कोई रुचि है. उनके पास चटपटे कार्यक्रम परोसता टेलीविज़न, इंटरनेट या फिर मोबाइल फ़ोन जो है… और बच्चों की इन हरकतों पर अफ़सोस करने का भी हमें कोई हक़ नहीं है, क्योंकि बच्चों को ये सारी सुख-सुविधाएं या यूं कह लें मन बहलाव के साधन हमने ही मुहैया कराए हैं. आज के कामकाजी माता-पिता के पास बच्चों के लिए पर्याप्त समय तो होता नहीं, ऐसे में अपना अपराधबोध दूर करने के लिए वो बच्चों को तमाम लक्ज़री आइटम ख़रीदकर दे देते हैं, बिना ये सोचे-समझे कि इनका बच्चों के शारीरिक-मानसिक विकास पर क्या असर पड़ेगा. आज ख़ासकर बड़े शहरों के ज़्यादातर घरों में खाने, सोने, मनोरंजन की आदतें इतनी बेतरतीब हो गई हैं कि इसका सीधा असर परिवार के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है और इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं मासूम बच्चे. वे जाने-अनजाने नींद न आने की तमाम बीमारियों से जूझ रहे हैं.

श्‍वेता (परिवर्तित नाम) सातवीं कक्षा में पढ़ती है. उसके अब तक के परफॉर्मेंस से न केवल उसके माता-पिता, बल्कि टीचर भी काफ़ी ख़ुश थे. लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसका पढ़ाई में मन नहीं लग रहा. टीचर ने कई बार जब उसे स्कूल में सोते पाया, तो उसके माता-पिता से शिकायत की. माता-पिता भी जब उसकी हरकतों से परेशान हो गए तो मनोचिकित्सक को दिखाया. उन्होंने सबसे पहले उसकी दिनचर्या का अध्ययन किया, तो पाया कि श्‍वेता रात एक-डेढ़ बजे तक टीवी सीरियल देखती थी और फिर दूसरे दिन स्कूल जाने के लिए उसे सुबह 6 बजे उठना पड़ता था. इस तरह रूटीन बिगड़ जाने से उसमें चिड़चिड़ापन भी आ गया था और उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता था. श्‍वेता पढ़ाई में अच्छी थी, इसलिए माता-पिता उसकी हरकतों पर ध्यान ही नहीं देते थे. माता-पिता की इसी लापरवाही ने श्‍वेता को देर रात तक टीवी देखने की छूट दे दी और उसका पढ़ाई में से मन हटने लगा.
ख़ैर, श्‍वेता के माता-पिता ने तो व़क़्त रहते उसकी आदतों, दिनचर्या में बदलाव लाकर उसे संभाल लिया, लेकिन कई माता-पिता तो जान भी नहीं पाते कि उनके बच्चे को नींद न आने का कारण क्या है? कई घरों के बच्चे नींद में बड़बड़ाते हैं, डरावने सपने देखकर चीखते-चिल्लाते हैं, नींद में ही चलने लगते हैं, लेकिन माता-पिता इसे बच्चे की आदत समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं और बच्चे का रोग बढ़ता ही चला जाता है. नतीजा- न स़िर्फ बच्चे की नींद पूरी नहीं होती, बल्कि कई बार उसका शारीरिक-मानसिक विकास तक रुक जाता है. बच्चों के लिए पर्याप्त नींद कितनी ज़रूरी है बता रहे हैं- चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. समीर दलवाई.
डॉ. दलवाई के अनुसार, “पर्याप्त नींद हमारे लिए बेहद ज़रूरी है, क्योंकि नींद से हमारे शारीरिक व मानसिक विकास पर प्रभाव पड़ता है. सोने से ज़्यादा हार्मोन सक्रिय होते हैं, जिससे व्यक्तिगत विकास अच्छा होता है. ख़ासकर बच्चों के शारीरिक-मानसिक विकास पर नींद का बहुत असर पड़ता है. नींद पूरी न होने से बच्चे का विकास धीमा या फिर रुक सकता है. उम्र के हिसाब से बच्चे को भरपूर नींद मिलनी ही चाहिए, जैसे- पैदा होने के कुछ समय तक बच्चे का 20 घंटे सोना ज़रूरी है. इसी तरह 2 साल तक 12 से 14 घंटे, 2 से 5 साल तक 12 घंटे, 6 से 12 साल तक 10 घंटे और 12 साल के बाद 9 घंटे की नींद लेनी ही चाहिए.

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नींद न आने के कारण

1. शारीरिक कारण– इसमें वातावरण, घर-परिवार के लोगों का भरपूर सहयोग होते हुए भी शारीरिक तकली़फें नींद न आने का कारण बनती हैं. ज़्यादातर मामलों में खर्राटे लेना, मुंह खोलकर सोना, सांस रुक जाना, नींद में फिट आना, टॉन्सिल आदि मेडिकल तकलीफ़ों के कारण भी बच्चों में नींद न आने की शिकायत पाई जाती है.

2. लाइफ़स्टाइल– हमारी आज की लाइफ़स्टाइल यानी एकल परिवारों की बढ़ती तादाद, जो बच्चों को अपनी तरह से बचपन जीने नहीं देती. आज ख़ासकर बड़े शहरों में मम्मी-पापा दोनों कामकाजी हैं. ऐसे में बच्चा देर रात तक माता-पिता की राह देखता है. फिर उनके साथ खेलने, भोजन करने आदि में एक-डेढ़ तो बज ही जाते हैं. उस पर स्कूल जाने के लिए सुबह जल्दी उठने के कारण उन्हें स़िर्फ 5-6 घंटे की ही नींद मिल पाती है. छोटी उम्र में इतनी कम नींद लेने से बच्चे के विकास पर इसका असर पड़ता है. जबकि यूरोप, अमेरिका आदि देश बच्चों के मामले में काफ़ी सजग हैं. यहां पर बच्चों को 7 बजे डिनर कराकर आठ-नौ बजे तक सुला दिया जाता है, ताकि बच्चों को पर्याप्त नींद मिल सके.

3. पारिवारिक माहौल– कई बार माता-पिता के बीच चलने वाले झगड़े भी बच्चों के दिमाग़ पर गहराई तक असर डालते हैं. बच्चे ऐसे माहौल में ख़ुद को असुरक्षित महसूस करते हैं. इस डर से भी वो सो नहीं पाते और स्कूल या अन्य गतिविधियों में भी सक्रिय नहीं रह पाते. यानी माता-पिता के आपस के झगड़े का भी बच्चों के शारीरिक व मानसिक विकास पर बुरा असर पड़ता है.

4. टेलीविज़न का बढ़ता प्रभाव– नींद पूरी न होने या नींद न आने की एक और बड़ी वजह है टेलीविजन यानी मीडिया. आजकल बच्चों के चैनल भी चौबीसों घंटे चलते रहते हैं और बच्चे यदि रात में टीवी ना भी देखें, तो मांओं के सास-बहू के प्रोग्राम देर रात तक चलते रहते हैं. ऐसे में बच्चे यदि सोना भी चाहें तो घर का वातावरण उन्हें सोने नहीं देता. फिर नींद पूरी न होने के कारण इसका असर उनकी पढ़ाई पर भी पड़ता है. उनका पढ़ाई में मन नहीं लगता और वे स्कूल में भी झपकी लेते रहते हैं.

5. डरावने सपने आना– कई बच्चे नींद में बुरे सपने देख डरकर उठ जाते हैं या चीखने-चिल्लाने लगते हैं. यदि ऐसा कभी-कभार होता है, तब तो ठीक है, लेकिन यदि ऐसा रोज़ ही होता है या एक महीने से ज़्यादा लंबे समय से हो रहा है, तो आपको सचेत हो जाना चाहिए.

6. नींद में बड़बड़ाना– अक्सर कई बच्चे दिन में उन्होंने जो क्रिकेट मैच खेला होता है या दोस्तों के साथ जो भी गतिविधियां की हैं, वैसी ही बातचीत नींद में भी करते हैं. यदि ऐसा कभी-कभार होता है, तब तो ठीक है, लेकिन यदि बच्चा रोज़ ही ऐसा करता है या नींद में डरता है तो यह खतरे का संकेत है. ऐसा तनाव, डर या फिर बुरे सपनों के कारण भी हो सकता है. अतः इसका कारण जानने की कोशिश करें और बच्चे को उस डर से बाहर निकालें.

7. खर्राटे और नींद में चलना– बच्चा यदि नींद में खर्राटे ले, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें, क्योंकि ये इनसोम्निया यानी नींद की बीमारी का लक्षण हो सकता है. इसमें बच्चे को सांस लेने में तकलीफ़ होती है और कई बार नींद में ही दम घुट जाने की भी गुंजाइश रहती है. अतः इसे हल्के से न लें और बच्चे का उचित इलाज कराएं. ज़्यादातर मामलों में ज़रूरत से ज़्यादा मोटे बच्चे नींद में खर्राटे लेते हैं.
कई बच्चों में नींद में चलने की समस्या पाई जाती है और उन्हें याद भी नहीं रहता कि वे नींद में चले थे. हालांकि कई मामलों में उम्र बढ़ने के साथ-साथ ये समस्या अपने आप ठीक हो जाती है, लेकिन एहतियात के तौर पर माता-पिता को डॉक्टर से भी संपर्क कर लेना चाहिए.

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नींद न आने के दुष्परिणाम
आईक्यू कम होना, तनाव, चिड़चिड़ापन, थकान, काम में ध्यान न लगना, हाइपर एक्टीविटी आदि की समस्या हो सकती है. ऐसी किसी भी स्थिति में मेडिकल ट्रीटमेंट ज़रूरी है.

कब जाएं डॉक्टर के पास
नींद न आने के ज़्यादातर मामलों में बच्चे की दिनचर्या या सोने की आदतों में बदलाव लाकर नींद की समस्या को दूर किया जा सकता है. लेकिन यदि यह शिकायत एक महीने से ज्यादा से है, तो आपको डॉक्टर से संपर्क कर लेना चाहिए. समस्या चाहे शारीरिक हो या मानसिक दोनों ही भयंकर रूप ले सकती हैं, यदि व़क़्त पर इलाज न किया जाए.

क्या करें कि नींद आ जाए-
* कोशिश करें कि आपके सोने और उठने का समय हमेशा एक ही हो.
* हो सके, तो अपना लाइफ़स्टाइल पैटर्न बदलें, जैसे- ऑफ़िस से जल्दी घर आना, जल्दी भोजन करना, जल्दी सोना और सुबह भी जल्दी ही उठना आदि.
* घर या बाहर की देर रात तक चलनेवाली गतिविधियां कम करें.
* बच्चों को भी बच्चों के कार्यक्रम देर रात तक न देखने दें और न ही माता-पिता देखें. यानी बच्चों के सोने के लिए घर का माहौल शांत रखें.
* घर में लड़ाई-झगड़े का माहौल न रखें. ऐसी कोई बात या व्यवहार न करें, जिससे बच्चा डरे और सो न सके, क्योंकि इसका भी बच्चों के विकास पर विपरीत असर पड़ता है.
* इस बात का ख़ास ख़याल रखें कि बच्चा किसी भी हाल में ख़ुद को असुरक्षित न महसूस करे.
* सोने से पहले बच्चे को स्नान करने या पुस्तक पढ़ने की आदत दिलाएं, इससे भी उसे अच्छी नींद आएगी.
* बच्चे का सोने का स्थान शांत व आरामदायक है या नहीं, इसका भी ध्यान रखें.

– कमला बडोनी

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