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कैसा हो 0-3 साल तक के बच्चे का आहार? (Diet For Infants)

Diet For Infants

 

Diet For Infants

मां के गर्भ से बाहर आते ही नन्हा-सा शिशु स्वतंत्र आहार पर निर्भर हो जाता है. उसे क्या आहार दिया जाए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह आहार उसके पूरे जीवन को प्रभावित कर सकता है. निम्न प्रकार से शिशु को आहार देना चाहिए.

* पहले चार माह तक बच्चे को केवल मां के स्तनपान (ब्रेस्ट फिडिंग) पर रखा जाना चाहिए.
* पांचवें माह से उबालकर ठंडा किया हुआ पानी पहले चम्मच से, फिर छोटी ग्लास से पिलाया जाना चाहिए.
* किसी भी उम्र में बोतल से कोई आहार नहीं पिलाना चाहिए.
* इसके बाद धीरे-धीरे निम्न पदार्थों को बच्चे के आहार में शामिल करना चाहिए.
घर में बनाई गई दलिया, रवे की खीर, चावल की फिरनी एक से दो चम्मच की मात्रा में या बच्चा जितनी मात्रा सुगमता से पचा सके, सुबह-शाम पांचवें माह में देना चाहिए.
* छठे माह में केले को दूध में मसलकर दिन में एक बार देना चाहिए.

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* फिर धीरे-धीरे सेब, पपीता, चीकू, आम जैसे फलों को बच्चे के आहार में शामिल करना चाहिए.
* सप्ताह भर बाद अच्छी तरह पकाई गई सब्जियां मसलकर या मक्खन के साथ 2 से 4 चम्मच देना चाहिए.
* सातवें-आठवें महीने में दाल या खिचड़ी अच्छी तरह पकाकर एवं मसलकर दो से चार चम्मच देना प्रारंभ करें. बच्चे की रुचि के अनुसार इसकी मात्रा बढ़ाते जाएं.
* नौवें माह में गाय या भैंस का दूध ग्लास से देना प्रारंभ करें.
* मां का दूध बच्चा जब तक पीता है, जारी रखना चाहिए.
* एक वर्ष के बाद संतुलित व पूर्ण आहार, बच्चा जितना इच्छा से खा सके, खिलाना चाहिए.
इस तरह का आहार स्वतः ही बच्चे की सामान्य वृद्धि व वजन को नियंत्रित करता है.

– योजना गुप्ता

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कहीं आपका बच्चा मानसिक शोषण का शिकार तो नहीं? (Is Your Child A Victim To Mental Abuse?)

“तुम बहुत ही बेवकूफ़ हो…” “तुम ज़िंदगी में कुछ नहीं कर सकते…” “मैं तुमसे इसलिए प्यार नहीं करती, क्योंकि तुम इस लायक ही नहीं हो….” “तुमसे कोई काम सही नहीं होता, जो करते हो ग़लत ही करते हो….” देखने या सुनने में ये वाक्य भले ही आम लगे, लेकिन जब ये वाक्य बार-बार, हर बार दोहराए जाते हैं तो सुननेवाले के दिलो-दिमाग़ में यह बात घर करने लगती है. धीरे-धीरे उसके मन में यह बात बैठ जाती है कि अब वह किसी लायक नहीं है. व्यक्ति का पूरा व्यक्तित्व ही ख़त्म हो जाता है, यही है मेंटल एब्यूज़िंग या मानसिक शोषण. 

कहीं आप भी अपने बच्चे के साथ ऐसा ही तो नहीं कर रहे! माना कि माता-पिता बच्चों के दुश्मन नहीं होते, लेकिन बच्चों पर किस बात का क्या असर होगा, इसका फैसला आप स्वयं तो नहीं कर सकते. अक्सर कई माता-पिता कभी ज्ञान के अभाव में, तो कभी जान-बूझकर अपने बच्चों में कमियां निकाला करते हैं. उन्हें लगता है कि शायद इस बात से बच्चा अपनी ग़लती सुधारे और ज़िंदगी में क़ामयाब हो, लेकिन वे यह नहीं जानते कि वे अनजाने में अपने बच्चे के साथ कितना ज़ुल्म कर रहे हैं. इस तरी़के से वे अपने बच्चे को ज़िंदगी की दौड़ में और पीछे कर रहे हैं. इसके बारे में विस्तार से बता रहे हैं मुंबई के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. समीर दलवाई.

क्या है मानसिक शोषण?

साधारण शब्दों में यदि इसे परिभाषित किया जाए तो कहा जा सकता है कि बच्चों के प्रति किया गया ऐसा व्यवहार जो उसके लिए मानसिक रूप से ठीक न हो या उसके विकास में बाधा डाले, उसे मानसिक शोषण कहा जाता है. बच्चों के शारीरिक पीड़ा से कहीं ज़्यादा तकलीफ़देह है मानसिक पीड़ा, क्योंकि शरीर के ज़ख़्म तो भर जाते हैं पर ज़ुबां से निकले शब्द सीधे दिल पर लगते हैं और दिमाग़ को प्रभावित करते हैं. इसीलिए यह शारीरिक व यौन शोषण से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है. इसका असर कभी ख़त्म न होनेवाला होता है.

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मानसिक शोषण के लिए ज़िम्मेदार लोग

1. सबसे पहले ज़िम्मेदार होते हैं माता-पिता या गार्जियन (जिनकी देखरेख में बच्चे  पल-बढ़ रहे हों).

2. बहन-भाई

3. शिक्षक या कोच (जो किसी खेल का प्रशिक्षण दे रहे हों).

4. सहपाठी (बुलिंग करना).

कौन-कौन-सी बातें आती हैं?

मानसिक शोषण में कई बातें आती हैं, जैसे-

1. बच्चे को बार-बार सज़ा देना- अंधेरे कमरे में ज़्यादा समय तक बंद करना या हाथ-पैर बांध कर बैठाना.

2. उस पर हर बार ग़ुस्सा करना, गालियां देना,  चीखना-चिल्लाना, डराना-धमकाना.

3. दूसरों के सामने मज़ाक उड़ाना, किसी ख़ास तरह के नाम से बुलाना.

4. नज़रअंदाज़ करना- बच्चे पर ध्यान न देना. उसकी ज़रूरत के अनुसार चीज़ें उपलब्ध न कराना. उसकी भावनाओं व मानसिकता को न समझना.

5. किसी और के सामने शर्मिंदा या अपमानित करना.

6. दूसरे बच्चों या भाई-बहनों से उसकी तुलना करना.

7. प्यार में कमी – बच्चे को चुंबन या आलिंगन न करना या ऐसी बातें न कहना, जिससे ज़ाहिर  होता हो कि माता-पिता उन्हें प्यार करते       हैं. स्पर्श का एहसास बच्चों में प्यार की भावना जगाता है. बच्चे स्पर्श की भाषा ख़ूब समझते हैं और इसी की अपनों से अपेक्षा करते हैं.

8. आरोपित करना- बार-बार यह कहना कि सब तुम्हारी ग़लती है. यदि तुम ऐसा न करते तो ये न होता.

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मानसिक शोषण का बच्चों पर प्रभाव

भावनात्मक प्रभाव

* इस तरह के बच्चे आत्मकेंद्रित हो जाते हैं.

* व्यवहारिक नहीं होते.

* संकोची व डरपोक क़िस्म के होते हैं.

* ज़िंदगी में रिस्क लेने से डरते हैं. चुनौतियों से घबराते हैं.

* मन से विद्रोही हो जाते हैं.

* उत्साह की कमी होती है.

* उनमें उदासीनता आ जाती है. ऐसे बच्चे जल्दी ही डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं.

* इन्हें हर जगह प्यार की तलाश होती है, जल्दी से संतुष्ट नहीं होते.

* इनमें असुरक्षा की भावना बहुत ज़्यादा होती है.

* एकाग्रता की कमी होती है, एक जगह ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते.

* रिश्ते बनाने में मुश्किलें आती हैं.श्र व्यक्तित्व उभर कर नहीं आता.

* ऐसे बच्चे जल्दी गुमराह हो जाते हैं.

* ऐसी लड़कियां अक्सर कम उम्र में कुंआरापन खो देती हैं.

* शादीशुदा और सेक्स जीवन पर भी प्रभाव पड़ सकता है.

* यदि समस्या ज़्यादा बढ़ जाए तो मानसिक रूप से स्थिर नहीं रहता.

शारीरिक प्रभाव

स्वस्थ नहीं रहते. ताउम्र स्वास्थ्य संबंधी परेशानी चलती रहती है.बच्चों का मानसिक शोषण चाहे माता-पिता द्वारा हो या फिर किसी और द्वारा, यह उसके बचपन पर भी असर डालता है और बड़े होने पर उसके व्यक्तित्व के साथ उसकी ज़िंदगी को भी प्रभावित करता है. यदि बच्चे को परिवार और स्कूल दोनों ओर से अच्छा माहौल मिले तो उसका विकास अच्छा होता है, व्यक्तित्व उभरकर आता है. कई केस में यह भी देखने में आया है कि बच्चे को घर में इस तरह की स्थिति का सामना करना पड़ा है, लेकिन बाहर दोस्तों व शिक्षकों के सहयोग से वे अपने व्यक्तित्व को संतुलित करने में क़ामयाब भी हुए हैं.

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माता-पिता बनें जागरुक 

  • कई माता-पिता को तो इस बात का एहसास भी नहीं होता कि वे कुछ ग़लत कर रहे हैं.
  • उन्हें लगता है कि बार-बार बच्चे को डांटने से उसमें आगे बढ़ने की इच्छा पैदा होगी.
  • ज़िंदगी की कठिन चुनौतियों के लिए वे अपने बच्चे को तैयार करना चाहते हैं, इसलिए वे ऐसा कर रहे हैं. लेकिन वे नहीं जानते कि अपनी अज्ञानता के चलते वे अपने बच्चे को अंदर से ख़त्म करते जा रहे हैं.
  • इस तरह का व्यवहार करके उससे उसकी ख़ुशहाल ज़िंदगी छीन रहे हैं.
  • उसकी क़ामयाबी पर रोक लगा रहे हैं.
  • इस तरह आप उन्हें अपने आप से भी दूर करते हैं और साथ ही दुनिया से भी.
  • यदि घर पर आपके बच्चे को माहौल अच्छा मिल रहा है, तो स्कूल में शिक्षक व दोस्तों का ध्यान ज़रूर रखें कि कहीं बच्चा वहां से प्रताड़ित तो नहीं है.
  • बच्चे को स्कूल भेजकर निश्‍चिंत न हो जाएं.
  • बच्चों के प्रति माता-पिता की ज़िम्मेदारी कभी ख़त्म नहीं होती.
  • बच्चों की ज़रूरतें और शौक़ पूरे कर देने को परवरिश नहीं कहते, इसके लिए ज़रूरी है  बच्चों के दिमाग़ को समझना.
  • उनके मनोविज्ञान को समझें.
  • एक बच्चे के पूर्ण विकास के लिए शारीरिक विकास जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी है मानसिक विकास.
  • जिस तरह एक पौधे को पनपने के लिए खाद, धूप और पानी की ज़रूरत होती है, वैसे ही बच्चों के सही विकास के लिए लाड़-प्यार के साथ अच्छे संस्कार, शुद्ध विचार, प्रोत्साहन, ज़िंदगी की प्रेरणा, ख़ुशी व उत्साह का माहौल ज़रूरी है.

                                                                                                                                                            – सुमन शर्मा

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लाड़ली को दें पीरियड्स की जानकारी (Educate Your Daughter On Periods)

लाड़ली को दें पीरियड्स की जानकारी

 

लाड़ली को दें पीरियड्स की जानकारी

बदलती लाइफस्टाइल और खानपान में बदलाव के कारण जिस तरह महिलाओं में प्रीमेच्योर मेनोपॉज़ की तादाद बढ़ रही है, उसी तरह मासिक धर्म (मेन्स्ट्रुअल साइकल) की शुरुआत अब उम्र से पहले होने लगी है. ऐसे में ज़रूरी है कि आप इस विषय में अपनी लाड़ली से खुलकर बात करें. बेटी को कैसे दें पीरियड्स से जुड़ी सही व पूरी जानकारी? आइए, जानते हैं.

कैसे करें बात की पहल?
अगर आप अचानक बेटी को पीरियड्स के बारे में बताने से हिचकिचा रही हैं, तो निम्न तरी़के अपनाकर पहल कर सकती हैं-
* बेटी को पीरियड्स से जुड़ी जानकारी देने का सबसे अच्छा तरीक़ा है, टीवी पर दिखाए जानेवाले सैनिटरी नैपकिन के विज्ञापन से बात शुरू करना.
* स्कूलों में भी पीरियड्स से जुड़ी जानकारी देने के लिए ख़ासतौर पर लेक्चर्स रखे जाते हैं. आप चाहें तो इससे भी शुरुआत कर सकती हैं. अगर स्कूल में उसे जानकारी दी गई है, तो आप भी सहज होकर उसे समझा पाएंगी.
* अपना अनुभव साझा करके भी आप बात की पहल कर सकती हैं. ऐसे में उसे ये भी बताएं कि आपको इस विषय में जानकारी कैसे और किससे मिली, आपने ख़ुद को कैसे तैयार किया आदि.

तैयार रखें सवालों के जवाब
* जब आप अपनी बेटी को पीरियड्स से जुड़ी जानकारी देंगी या उसे कहीं बाहर से इस विषय में पता चलेगा, तो ज़ाहिर है, वो आपके आगे सवालों की झड़ी लगा देगी. ऐसे में ख़ुद को उन सवालों के जवाब देने के लिए तैयार रखें, ताकि आप बेटी को पीरियड्स से जुड़ी पूरी और सही जानकारी दे सकें. आमतौर पर बेटी निम्न सवाल कर सकती है:
– पीरियड्स स़िर्फ महिलाओं को ही क्यों होता है, पुरुषों को क्यों नहीं?
– क्या पीरियड्स के दौरान दर्द से जूझना पड़ता है?
– मेन्स्ट्रुअल साइकल कितने दिनों और कितने सालों तक होता है?
– क्या मैं पीरियड्स के दौरान खेल-कूद सकती हूं?
– जिन्हें पीरियड्स नहीं होते, उन्हें किस तरह की परेशानियां हो सकती हैं? हो सकता है, इन सवालों के जवाब देना आपके लिए आसान न हो, मगर इस बात का ख़्याल रखें कि आधी जानकारी हमेशा हानिकारक होती है. अतः बेटी को पूरा सच बताएं, ताकि उसके मन में किसी तरह की कोई शंका न रहे.

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बेसिक हाइजीन की जानकारी भी दें
पीरियड्स से जुड़ी सारी बातें बताने के साथ ही अपनी बेटी को पीरियड्स के दौरान बेसिक हाइजीन की जानकारी भी अवश्य दें, जैसे-
– सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल कैसे करना चाहिए?
– कब और कितने समय के बाद नैपकिन बदलना ज़रूरी है?
– सैनिटरी नैपकिन के इस्तेमाल के बाद हाथ क्यों धोना चाहिए?
– इस्तेमाल किए हुए सैनिटरी नैपकिन को कैसे और कहां फेंकना उचित है?
– इंफेक्शन से बचने के लिए पीरियड्स के दौरान प्राइवेट पार्ट्स की सफ़ाई पर किस तरह ध्यान देना चाहिए?
– साथ ही पैंटी की साफ़-सफ़ाई पर भी विशेष ध्यान देना क्यों ज़रूरी है?

हेल्दी टिप्स
* पीरियड्स के दौरान ख़ूब पानी पीएं. छाछ, नींबू पानी या नारियल पानी भी पी सकती हैं.
* नमक का सेवन कम से कम करें.
* हर 2 घंटे के अंतराल पर कुछ खाती-पीती रहें.
* मौसमी फल और सब्ज़ियों का सेवन करें, ख़ासकर गहरे रंग के, जैसे- बीटरूट, गाजर, कद्दू, पालक, लाल पत्तागोभी, पपीता, आम आदि.
* बीज का सेवन भी फ़ायदेमंद होता है, जैसे- अलसी, तिल आदि.
* फ्राइड और मसालेदार चीज़ों का सेवन न करें.
* कम से कम मीठा खाएं.
* रिफाइंड फूड भी न खाएं, जैसे- बिस्किट, बेकरी आइटम्स आदि.
* फ्रूट जूस से परहेज़ करें.

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कैसे पाएं पेट दर्द से राहत?
पीरियड्स के दौरान पेट दर्द होना आम बात है. ऐसे में दर्द से राहत पाने के लिए 1 कप दही में 1/4 कप भुना हुआ जीरा और 1 टेबलस्पून शक्कर मिलाकर खाने से दर्द से राहत मिलती है.

– अलका गुप्ता

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छोटे बच्चे की देखभाल के लिए घरेलू नुस्ख़े (Home Remedies For Child Care)

 

 

बच्चे का अचानक या अकारण रोना पैरेंट्स या परिवार के लिए बेहद चिन्ता का विषय बन जाता है. कभी-कभी तो कारण समझ में नहीं आता कि आख़िर बच्चा रो क्यों रहा है? बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. इसी कारण उन्हें बीमारियां जल्दी घेरती हैं. ऐसे में पैरेंट्स का चिन्तित होना स्वाभाविक है. यदि घर में कोई बड़ा या बुज़ुर्ग है, तो सलाह मिल जाती है, अन्यथा करें भी तो क्या? उन्हें तो खांसी-ज़ुकाम, उल्टी, दस्त, कब्ज़, गैस जैसी तकलीफ़ या दांत निकलने के दौरान होनेवाली परेशानियों के लिए भी डॉक्टर की सलाह लेनी ही पड़ेगी. वैसे ऐसे छोटे-मोटे रोगों के लिए कुछ एक घरेलू नुस्ख़े अपनाएं जा सकते हैं.

 

* बदन पर छोटी-छोटी फुंसियां हो जाएं, तो चंदन का लेप लगाने से आराम आ जाता है.
* खांसी होने पर एक चम्मच तुलसी रस, एक चम्मच अदरक का रस और एक चम्मच शहद मिलाकर दिन में तीन-चार बार चटाने से लाभ होगा.
* अंजीर चूसने से छाती में जमा बलगम साफ़ हो जाता है.
* हल्दी, गुड़ व घी का मिश्रण चटाने से भी खांसी से राहत मिलती है.
* सोते समय अजवाइन का तेल बनाकर (सरसों के तेल में अजवाइन पकाकर छान लें) छाती व गले पर लगाएं. ठंड के कारण हुई खांसी में लाभ होगा. इसी प्रकार गाय का घी भी लगाया जा सकता है.
* काली खांसी को खत्म करने के लिए बांस को जलाकर राख बना लें और शहद मिलाकर चटाएं, लाभ होगा.
* नवजात शिशु को शहद चटाने से जल्दी ठंड नहीं लगती है.
* बच्चे के आस-पास कुचली हुई प्याज़ की पोटली रख देने से भी सर्दी का प्रभाव जल्दी नहीं पड़ता.
* रात को सोते समय तुलसी का रस उसके नाक, कान और माथे पर मलें. तुलसी के रस का सेवन सर्दी से बचाव का अच्छा साधन है. इसमें शहद मिला कर भी चटाया जा सकता है.
* जायफल को पत्थर पर घिस कर चटाना भी सर्दी का अच्छा उपाय है.
* दांत निकलते समय बच्चों को काफ़ी तकलीफ़ होती है. वे बेवजह ही रोते दिखाई देते हैं. ऐसे में दस्त, कब्ज़, बुखार जैसे विकार सामने आने लगते हैं. दांत निकलने के दौरान भुना सुहागा व मुलहठी पीसकर बच्चों के मसूड़ों पर मलने से दांत आसानी से निकल आते हैं.

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* शहद और सुहागा पाउडर मसूड़ों पर मलने से भी दांत बिना कष्ट के निकल आते हैं.
* कच्चे आंवले व कच्ची हल्दी का रस मसूड़ों पर मलने से दांत आसानी से निकल आते हैं.
* अनार के रस में तुलसी का रस मिलाकर बच्चों को चटाने से उनके दांत सुगमता से निकल आते हैं और दस्त नहीं लगती.
* सुहागे की खील 125 ग्राम की मात्रा में मां के दूध में मिलाकर बच्चे को सुबह-शाम चटाएं. साथ ही इसे शहद में मिलाकर मसूड़ों पर मलें. बच्चे को इस दौरान तकलीफ़ नहीं होने पाएगी.
* अक्सर दांत निकलने के दौरान मतली या उल्टी होने लगती है. ऐसे में अदरक, नींबू व शहद समान मात्रा में मिलाकर चटाएं, आराम आ जाएगा.
* इलायची के छिलकों को जलाकर उसकी भस्म चटाने से भी मतली में लाभ होता है.
* अजवाइन और लौंग पाउडर की एक-एक चुटकी लेकर शहद में मिलाकर चटाएं.
* बच्चे को नैपी रैश हो जाने पर मक्खन में हल्दी मिलाकर उसका लेप लगाने से लाभ होता है.
* बच्चे को गैस की तकलीफ़ हो तो एक चम्मच लहसुन के रस में आधा चम्मच घी मिलाकर पिलाएं, गैस से तुरन्त राहत मिलेगी.
* हींग को भूनकर उसमें पानी मिलाकर नाभि के चारों ओर लेप करें, आराम आ जाएगा.
* कच्ची हींग व थोड़ा-सा बेसन मिलाकर हल्के हाथ से पेट पर मलें, गैस निकल जाएगी.
* अजवाइन पाउडर का लेप करने से भी राहत मिलती है.
* यदि बच्चे को कब्ज़ की शिकायत हो, तो चार मुनक्का रात को पानी में भिगो दें. सुबह उसे मसल कर उसका रस छान कर बच्चे को पिलाएं.
* बड़ी हरड़ को पानी के साथ घिसें. इसमें ज़रा-सा काला नमक मिलाकर हल्का-सा गर्म करके दिन में 2-3 बार पिलाएं, अवश्य लाभ होगा.
* यदि बच्चे के पेट में कीड़े हो गए हों तो शहद में काले जीरे का चूर्ण मिलाकर चटाएं.
* सौंफ का कपड़छान चूर्ण 1/4 चम्मच भर शहद के साथ सुबह-शाम चटाएं.

* नवजात शिशुओं को सर्दी के प्रभाव से बचाए रखने के लिए आप उन्हें खूब हंसाएं या फिर रोते समय कुछ पल उन्हें रोने दें. सर्दी से बचाव का यह कुदरती प्राणायाम है. इससे प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.

– प्रसून भार्गव
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टीनएजर्स ख़ुद को हर्ट क्यों करते हैं? (Why Do Teens Hurt Themselves?)

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आए दिन हम ऐसी ख़बरें सुनते-पढ़ते हैं कि किस तरह किसी किशोर या किशोरी ने ख़ुद को हानि पहुंचा ली है या आत्महत्या कर ली है. आत्महत्या का कारण कभी एक्ज़ाम स्ट्रेस होता है, तो कभी करियर से जुड़ी परेशानियां. कभी मामला पारिवारिक तनाव से जुड़ा होता है, तो कभी प्यार में दिल टूट जाना. कारण कुछ भी हो, आंकड़े बताते हैं कि ऐसे मामलों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है और यह समस्या गंभीर होती जा रही है.

टीनएजर्स और यंगस्टर्स के मन में ऐसा क्या, कब और किस अवस्था में आ जाता है कि वो ख़ुद को हर्ट कर बैठते हैं? कभी हाथ की नस काट लेना, सिगरेट से ख़ुद को जला लेना या कभी दीवार पर ज़ोर से सिर पटकना जैसी हरक़तों से वे ख़ुद को हर्ट कर लेते हैं. मोटे तौर पर तो यही कहा जा सकता है कि भावनात्मक आवेग या कुंठा की स्थिति में ही वे ख़ुद को हर्ट करते हैं या फिर आत्महत्या जैसा क़दम तक उठा लेते हैं.
अक्सर देखा गया है कि पारिवारिक सदस्य या प्रियजन ख़ुद सकते में आ जाते हैं कि आख़िर बच्चे ने ऐसा किया क्यों? क्योंकि ऊपरी तौर पर तो सब कुछ सामान्य ही लगता है. एक ओर वे बच्चे की मनोस्थिति को लेकर परेशान होते हैं, तो दूसरी ओर वे यह नहीं समझ पाते हैं कि उनकी तरफ़ से क्या ग़लती हो गई या क्या कमी रह गई कि बच्चे ने ऐसा क़दम उठाया.
मनोवैज्ञानिक श्रुति भट्टाचार्य के अनुसार- लड़कों की अपेक्षा लड़कियों में इस तरह की प्रवृत्ति ज़्यादा देखी जाती है. ज़्यादातर जो मामले सामने आते हैं, उनमें प्रायः भावनात्मक कमज़ोरी, संवेदनात्मक आवेग, कठिन स्थितियों को डील न कर पाना जैसी असमर्थता के कारण ऐसा क़दम उठाकर थोड़ी देर के लिए वो अपनी कुंठा, अवसाद संवेदनाओं से मुक्ति पा जाते हैं और पैरेंट्स व प्रियजनों को अपने साथ जोड़ लेते हैं.

ऐसी स्थिति क्यों आ जाती है?
ऐसी संवेदनाओं के पीछे अनेक कारण होते हैं-
स्ट्रेस- पैरेंट्स की आशाएं व महत्वाकांक्षाएं, पीयर प्रेशर, मज़ाक बनाया जाना, पढ़ाई का प्रेशर आदि अनेक ऐसे कारण हैं, जो बच्चों में स्ट्रेस पैदा करते हैं. आज पढ़ाई को लेकर बच्चों में ज़बरदस्त स्ट्रेस है. देखा गया है कि आत्महत्या के मामले प्रायः परीक्षा के पहले या बाद में बढ़ जाते हैं.
यदि पैरेंट्स बच्चे की योग्यता को पहचान लेते हैं और समय रहते उनकी मनोस्थिति को समझ लेते हैं, तो समस्या नहीं होती है, वरना निराशा की यह स्थिति उन्हें नुक़सान पहुंचाने या आत्महत्या तक के लिए प्रेरित कर सकती है.
कभी-कभी पैरेंट्स दूसरे बच्चों से तुलना करके इस तनाव को बढ़ा देते हैं. पढ़ने में कमज़ोर बच्चों का यदि साथी मज़ाक बनाते हैं, तब भी तनाव व स्ट्रेस की स्थिति आ जाती है. किशोर बच्चे यह बात न तो पैरेंट्स को बताना चाहते हैं, न ही दोस्तों से शेयर करते हैं.

डिप्रेशन- स्ट्रेस के बाद स्थिति आती है डिप्रेशन यानी अवसाद की. यहां प्रायः व्यक्ति को ख़ुद भी और उसके घरवालों को भी पता नहीं चल पाता है कि वो चाहता क्या है? अवसाद का कारण क्या है? अनजाने में ही वो ख़ुद को नुक़सान पहुंचा लेते हैं.
एक अध्ययन के अनुसार, आत्महत्या की ओर प्रवृत्त होनेवाले लोगों के शरीर में सिरोटोनिन हार्मोन का स्तर कम होता है. ये हार्मोन मूड, इमोशन्स, नींद व भूख को नियमित व नियंत्रित करने में सहायक होता है. इसलिए डिप्रेशन की अवस्था में उनकी सोच प्रभावित होने लगती है. वे केवल अपनी असफलता या निराशा के बारे में ही सोचते रहते हैं. डिप्रेशन जेनेटिक भी हो सकता है, जो विपरीत माहौल में बढ़ जाता है.

फ्रस्ट्रेशन- किसी भी स्थिति में यदि समाधान नहीं मिल पाता है या परिस्थितियां प्रतिकूल ही होती चली जाती हैं, तब उस फ्रस्ट्रेशन को किसी से शेयर न कर पाने की अवस्था में ग़लत विचार मन में आने लगते हैं.

कम्युनिकेशन गैप- यह आज की तारीख़ में एक अनचाही स्थिति है. भौतिक सुखों की प्राप्ति या बच्चों को ब्रांडेड चीज़ें देने और महंगे स्कूलों में पढ़ाने की लालसा ने मां को बच्चों से दूर कर दिया है. आज सारे सुख-साधनों को जुटाने के लिए दोनों पार्टनर्स के लिए काम करना ज़रूरी हो गया है. व्यस्त पैरेंट्स चाहकर भी बच्चों की भावनाओं व संवेदनाओं के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं. एकल परिवार में बुज़ुर्गों का साथ भी नहीं है. बच्चा अपने मन की उथल-पुथल किससे शेयर करे? वह दोस्तों के सामने भी नहीं खुल पाता है कि कहीं उसकी भावनाओं का मज़ाक न बन जाए. कभी अंतर्मन की कोई दुविधा या भय ग़लत सोच में बदल जाती है, तो कभी पैरेंट्स का ध्यान आकर्षित करने के लिए वे ख़ुद को हर्ट कर बैठते हैं.

जनरेशन गैप- जनरेशन गैप भी इस स्थिति का अप्रत्यक्ष कारण हो सकता है. चूंकि बातचीत के लिए पैरेंट्स के पास समय नहीं है, सब अपने-अपने रूटीन से बंधे होते हैं. ऐसे में भावनाओं को न जानने-समझने के कारण दूरियां बढ़ जाती हैं. इस स्थिति को संभालने के लिए पैरेंट्स को ही पहल करनी होगी, क्योंकि वे भी इस दौर से गुज़र चुके हैं. उन संवेदनाओं को जी चुके हैं.

सोशल समस्याएं- जो बच्चे कम उम्र में ही हिंसा, नशा, गरीबी अथवा शारीरिक, मानसिक या सेक्सुअल एब्यूज़ (दुर्व्यवहार) के अनुभव से गुज़रते हैं, उनमें इस तरह की प्रवृत्तियां ज़्यादा देखी जाती हैं. जिन बच्चों के परिवार में संतुलन व सामंजस्य की कमी है, वहां भी बच्चों की सोच ग़लत दिशा में मुड़ने लगती है.

रिलेशनशिप प्रॉब्लम्स- रिलेशनशिप की समस्याएं भी बच्चों के विवेक को प्रभावित करती हैं. असफल प्यार या दोस्ती, अनुचित रिलेशनशिप, पैरेंट्स के डायवोर्स आदि के कारण भी आत्मविश्‍वास व आत्मसम्मान टूटता है. व्यक्ति का ख़ुद पर से भरोसा उठ जाता है. व्यक्ति की सोच अपराधबोध में बदल जाती है और जीने की इच्छा ख़त्म होने लगती है. भावनाएं यदि ईर्ष्या प्रधान हो जाती हैं, तब भी व्यक्ति ख़ुद को या दूसरे को हर्ट करना चाहता है.

उनकी मदद कैसे करें?
* डिप्रेस्ड टीनएजर्स सुसाइड करने की या ख़ुद को नुक़सान पहुंचाने की कई बार प्लानिंग करते हैं और कई बार बिना कुछ सोचे अचानक ही ख़तरनाक क़दम उठा बैठते हैं.
* फ़िलहाल यह तो निश्‍चित है कि यह स्थिति किसी भावनात्मक पीड़ा से जुड़ी है. वो चाहते हैं कि उनकी बात कोई समझे, कोई उनकी मदद करे. अतः सबसे पहली ज़रूरत है इस स्थिति से निबटने के लिए पैरेंट्स अपने बच्चों की हर बात को गंभीरता व धैर्य के साथ सुनें, ताकि उन्हें यह महसूस हो कि उनकी भावनाओं को आप समझते हैं.
* उनके दिल की बात जानने के लिए भावनात्मक रवैया अपनाएं. उनसे कहें कि आप भी इस उम्र में कुछ इसी तरह के दौर से गुज़र चुके हैं.
* आपके किशोर बच्चे की बातें या सोच बहुत ग़लत हो सकती हैं, लेकिन आप शांत व नियंत्रण में रहें. प्रश्‍न करें, किंतु यह न कहें कि तुम्हारी सोच बिल्कुल ग़लत है, क्योंकि ऐसे वाक्य के बाद तो वह आपसे अपनी मनोव्यथा कहेगा ही नहीं.
* इसके अलावा घर का माहौल पॉज़िटिव रखें यानी अच्छी बात के लिए प्रशंसा करें, ग़लत बातों को नज़रअंदाज़ न करें, पर उन्हें हर व़क़्त दोषी भी न ठहराएं.
* बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं. उनके साथ डिनर करें. कुछ गेम्स या एक्टिविटीज़ ऐसी रखें, जिसमें पूरा परिवार शामिल हो.
* बच्चों की तुलना किसी दूसरे से न करें. व्यंग, मज़ाक या अत्यधिक अनुशासित रूटीन भी इस उम्र के लिए उचित नहीं है.
* बच्चों के सामने आपसी झगड़े या तर्क-वितर्क से बचें.
* यदि फिर भी लगता है कि बच्चे की सोच ग़लत दिशा में जा रही है, तो मेंटल हेल्थ प्रो़फेशनल से संपर्क करें. यह सोचकर हाथ पर हाथ धरे बैठे न रहें कि बड़ा होकर ठीक हो जाएगा.

कैसे जानें कि टीनएजर्स इस दौर से गुज़र रहे हैं?
बच्चे में अचानक या धीरे-धीरे आए बदलावों पर नज़र रखें. ये लक्षण हो सकते हैं-
– स्कूल या कॉलेज की एक्टिविटीज़ में रुचि न लेना.
– अकेले रहने की इच्छा, लोगों के साथ हंसना-बोलना बेव़कूफ़ी लगना.
– खाने-पीने या नींद का पैटर्न बदल जाना या ज़्यादा नींद आना.
– सिरदर्द या थकान की शिकायत.
– अपने लुक्स आदि पर ध्यान न देना.
– सुसाइड करनेवाले बच्चों में कई बार अचानक बदलाव दिखता है. उनका अपनी प्रिय वस्तुओं के प्रति भी मोह ख़त्म हो जाता है. वे उन्हें बांटना शुरू कर देते हैं.
– अपनी असफलताओं को ही याद करते रहना.
– पैरेंट्स से बार-बार कहना कि मैं आपका अच्छा बेटा/बेटी नहीं हूं. अब मैं आपको ज़्यादा परेशान नहीं करूंगा.
– कभी डिप्रेशन में, तो कभी एकदम ख़ुश दिखते हैं.
– ये तो कुछेक सामान्य से लक्षण हैं. इसके अलावा व्यक्तिगत व्यवहार में भी बदलाव आता है, इसलिए ज़रूरी है कि टीनएज़र्स के व्यवहार पर नज़र रखी जाए.

– प्रसून भार्गव
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क्या करें जब बच्चा पहली बार स्कूल जाए? (20 Tips Preparing Your Child For The First Day At School)

First Day At School

Jab Bachcha Pahli Baar School Jaye

घर की सुरक्षित चारदीवारी के बाद बच्चे का पहला क़दम उठता है स्कूल की ओर. सभी माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा स्कूल से डरे या घबराए नहीं. शर्म या संकोच के कारण औरों से पीछे न रह जाए, बल्कि आत्मविश्‍वास से भरा सफल व क़ामयाब विद्यार्थी बने. वैसे तो हर बच्चे का एक व्यक्तिगत स्वभाव होता है, किंतु कुछ कोशिश तो इस दिशा में पैरेंट्स भी कर ही सकते हैं, ताकि बच्चे का स्कूली जीवन आत्मविश्‍वास व उत्साह से परिपूर्ण रहे.
* छोटे बच्चे अक्सर स्कूल जाने के नाम से ही घबराने लगते हैं. उनकी इस घबराहट या डर को दूर करना पैरेंट्स का काम है.
* हो सकता है बच्चा आपसे देर तक दूर रहने का डर महसूस करता है, इसलिए उसे कितनी देर दूर रहना होगा यह कहने की बजाय उसके कार्यक्रम को वर्णित करें, जैसे- पहले प्रार्थना होगी, फिर टीचर कुछ खेल खेलाएंगी. फिर ये होगा, वो होगा और जैसे ही म्यूज़िक होगा, इसके बाद आप घर आ जाओगे.
* बच्चा स्कूल बस में अकेले जाने से डर सकता है. अतः उसे ड्राइवर या कंडक्टर के साथ बातचीत करना सिखाइए. बस स्टॉप पर साथ जानेवाले बच्चों से भी उसका परिचय कराइए.
* बच्चों के मन में टीचर के प्रति भी एक डर का एहसास होता है. उन्हें बताइए कि टीचर वहां आपकी मदद के लिए होते हैं.
* उन्हें समझाएं कि स्कूल में स़िर्फ पढ़ाई या खेल नहीं होते हैं, बल्कि बहुत-सी अन्य बातें भी सीखते हैं.
* ‘मैं खो जाऊंगा’, रास्ता भूल जाऊंगा’ जैसे ख़्याल भी उन्हें आते हैं, अतः रास्तों का परिचय, दाएं-बाएं की दिशा बताते हुए ये भी बताएं कि यदि रास्ता भूल जाएं तो क्या करें?
* नए बच्चों के लिए भी व अन्य बच्चों को भी उत्साहित करने के लिए तैयारी ऐसी हो कि बच्चे स्कूल खुलने का इंतज़ार करें.
* बच्चों के साथ स्कूल-स्कूल खेलें. कभी आप टीचर बनें, कभी उसे टीचर बनाएं, ताकि उसे थोड़ा-बहुत स्कूली माहौल समझ में आ सके व वो स्कूल का कार्य समझ सके.
* बच्चों को मानसिक रूप से स्कूल के लिए तैयार करें. उनकी दिनचर्या से हफ़्तेभर पहले से कुछ ऐसा शामिल करें, जिससे वो स्कूल जाने का इंतज़ार करने लगें.
* जूते, बैग, बॉटल जैसी चीज़ें स्कूल खुलने के दो दिन पहले ही ख़रीदें, ताकि इस्तेमाल के लिए वो उत्सुक होने लगें.
* टिफिन में क्या देना है पहले दिन से सोकर तैयारी कर लें. बेहतर होगा कि पूरे हफ़्ते का प्लान बना लें और बच्चे को बता दें टिफिन में क्या होगा? टिफिन की वेरायटी के बारे में सोचकर ही बच्चे उत्साहित हो जाते हैं.
* कई मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि स्कूल के पहले दिन स्कूल गेट पर बच्चे की फोटो खींचकर लगाने से बच्चा स्कूल को भी अपनी ख़ास जगह समझने लगता है.
* स्कूल में बच्चे का आत्मविश्‍वास व आत्मसम्मान बना रहे, इसके लिए कपड़ों व उसकी अन्य वस्तुओं का चुनाव भी महत्वपूर्ण है.

* बच्चों में भी संवेदना और दूसरों की नज़रों में प्रशंसा, सम्मान या तिरस्कार जैसे भावों को पहचानने की शक्ति होती है. किसी भी तरह के बुरे व्यवहार से उनकी भावनाएं आहत न हों, इसका ध्यान भी पैरेंट्स को रखना चाहिए.

बच्चे के विकास के लिए पैरेंट्स इन बातों पर भी ध्यान दें-

– बच्चों को कुछ समय अकेले भी खेलने दें. भले ही वो आधा घंटा तक बाल्टी में पानी भरता है और फेंकता है. डॉ. भट्टाचार्य के अनुसार, हर बच्चा स्वभाव से वैज्ञानिक होता है.
– बच्चों को बताएं कि ज़िंदगी में सीखना इतना आसान नहीं होता है, उन्हें जूझने दें. उनकी क्षमता विकसित होने दें. मदद के लिए तुरंत हाथ न बढ़ाएं. उन्हें बताएं कि ग़लतियां जीवन का एक हिस्सा हैं. ग़लतियों से इंसान सीखता है. स्कूल लर्निंग की जगह तो है, लेकिन वहां भी परेशानी महसूस हो सकती है.
– हॉबी विकसित करें. यदि विषय में रुचि है, तो लर्निंग आसान हो जाती है और कक्षा में वो अपनी कला के कारण ख़ास पहचान भी बना सकता है. मेंटल गेम, मेमोरी, पज़ल, क्रॉसवर्ड जैसी मेंटल एक्सरसाइज़ मस्तिष्क को एक्टिव रखती हैं.
– विभिन्न प्रकार की चीज़ों में रुचि उत्पन्न करने के लिए हर दिन कुछ अलग अवसर दीजिए, जैसे- एक दिन कलरिंग, दूसरे दिन क्राफ्ट, पिक्चर कटिंग आदि.
– बच्चों की कल्पनाशक्ति को उभारने के लिए भी पैरेंट्स को शुरू से ही कोशिश करनी चाहिए. छोटे बच्चों को खिलौना दिखाकर छुपा दें, फिर उसे सोचने दें. छुपाई हुई जगह से निकालकर दिखाएं, फिर छिपा दें. दो मिनट बाद बच्चा ढूंढ़ने की कोशिश में लग जाएगा. तरह-तरह की चीज़ें इकट्ठा करना, उन्हें मैच करना आदि बातों से बच्चे की कल्पनाशक्ति व रचनात्मकता दोनों ही बढ़ती है.
– बच्चों को हर समय स्पर्धा करना न सिखाएं, बल्कि लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना सिखाएं. स्कूल मात्र प्रतियोगिता का मैदान नहीं है, बल्कि जीवन के हर पहलू को विकसित करने की पाठशाला है. लक्ष्य तक पहुंचने का ज़रिया है. वैसे भी हर बच्चा अपने आप में अलग है, तो उसके लक्ष्य भी अलग होंगे. क़ामयाबी की सीढ़ियां भी अलग होंगी.

– प्रसून भार्गव

 

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टीनएज बेटी ही नहीं, बेटे पर भी रखें नज़र, शेयर करें ये ज़रूरी बातें (Raise Your Son As You Raise Your Daughter- Share These Important Points)

 

 

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बदलाव की ज़रूरत तो है, लेकिन हर बार बदलाव की सीख लड़कियों को ही नहीं देनी चाहिए. हर बात उन्हीं पर लागू करवाना, उन्हें ही समाज में फैल रही बुराई का ज़िम्मेदार मानना ग़लत है. बदलाव लड़कियों के कपड़े में नहीं, बल्कि समाज की उस सोच में करना चाहिए, जो स़िर्फ ये सोचते हैं कि अगर परिवर्तन की गुंजाइश कहीं है, तो वो स़िर्फ लड़कियों में ही है. इस सोच को बदलिए और हर प्रतिबंध और परिवर्तन अपनी टीनएज लड़की को समझाने के साथ ही टीनएज लड़कों को भी समझाएं.

अक्सर आप ये भूल कर बैठती हैं. जैसे-जैसे बेटी बड़ी होती है, आप उसके सामने क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए की लिस्ट हर दिन पकड़ाती रहती हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर अपने बेटे पर आपका ध्यान ही नहीं जाता. क्या कभी आपने सोचा कि लड़के और लड़कियों की उम्र समान है, तो ग़लतियां दोनों से हो सकती हैं. ऐसे में स़िर्फ लड़कियों को समझाने की बजाय अपने बेटे को भी समझाएं कुछ ज़रूरी बातें.

लड़कियों से व्यवहार करना

आमतौर पर परिवार में शिष्टाचार की सारी शिक्षा लड़कियों को ही दी जाती है, लेकिन अब ज़माना आ गया है कि आप अपने लड़कों को भी सारे पाठ सिखाएं. सबसे पहले उन्हें ये सिखाएं कि कैसे लड़कियों से व्यवहार करना चाहिए. किस तरह से उनसे बात करनी चाहिए और कैसे उनके साथ समय बिताना चाहिए. इन सारी बातों को बड़ी ही बारीक़ी से अपने लाड़ले को सिखाएं.

ग़लती का एहसास कराना

घर-घर की कहानी है ये. लड़कियों से कोई ग़लती होने से पहले ही उन्हें ग़लती न करने की सीख दी जाती है, लेकिन लड़कों को कभी एहसास भी नहीं कराया जाता कि उनसे भी ग़लती हो सकती है. शायद इसीलिए लड़कियां हर काम करने से पहले कई बार सोचती हैं और लड़कों के दिमाग़ में ये बात आती ही नहीं कि उनसे भी कोई ग़लती हो सकती है.

आज़ादी का ग़लत फ़ायदा

भारतीय परिवेश में आज भी लड़कियों की अपेक्षा लड़कों को ज़्यादा आज़ादी दी जाती है. कॉलेज में दोस्त बनाने की आज़ादी, दोस्तों के साथ ज़्यादा देर तक घूमने की आज़ादी, किसी भी लड़की पर कमेंट करने की आज़ादी, अपने मन मुताबिक़ हेयरस्टाइल रखने की आज़ादी, स्टाइलिश कपड़े पहनने की आज़ादी आदि. लेकिन जैसे ही बात लड़कियों पर आती है, पैरेंट्स टोका-टाकी करने लगते हैं. घर में आपका दोहरा व्यवहार देखने पर ही लड़के बाहर लड़कियों से अच्छी तरह से पेश नहीं आते. अब से आप उन्हें भी इस बात का एहसास कराएं कि आज़ादी उन्हें भी उतनी ही मिलेगी, जिससे किसी का नुक़सान न हो.

लड़कियों से समानता

बचपन से ही लड़के जब ग्रुप में खेलते हैं, तो किसी लड़की के आने पर वो उसके साथ न खेलने की बात कहते हैं. उन्हें ऐसा लगता है कि लड़कियां उनके साथ खेल नहीं सकतीं. बचपन में लड़के की इस बात पर हंसने की बजाय उसे उसी समय टोकें और कहें कि वो भी उनके समान है. यही बात जब आपका बेटा टीनएज में हो, तो उसे समझाएं. स्कूल के नोट्स शेयर करने से लेकर सारी बातों में वो उसे अपने समान ही समझे.

लड़कियों पर कमेंट करना

ये उम्र ऐसी होती है कि जब लड़कों के मन में कई तरह की भावनाएं उमड़ने-घुमड़ने लगती हैं. अपनी उम्र से थोड़े बड़े लड़कों में उनका उठना-बैठना होने लगता है. बड़े लड़कों की संगत से वो भी लड़कियों को देखकर कई तरह के कमेंट करने लगते हैं. लड़कियों की ड्रेस, उनकी बॉडी पर कमेंट करना लड़कों को आम बात लगती है. अपने बेटे को समझाएं कि ये ग़लत है.

अपने मज़े की वस्तु न समझें

लड़कों को ये बात समझाना बहुत ज़रूरी है कि लड़कियां उनके लिए किसी वस्तु की तरह नहीं हैं. वो भी उन्हीं की तरह हैं. अपने लाड़लों को इस उम्र में ये ज़रूर सिखाएं. उन्हें ऐसा लगता है कि वो आसानी से किसी भी लड़की को अपनी गर्लफ्रेंड बना सकते हैं, वो ना नहीं कह सकती. लड़के उसके साथ घूमने जा सकते हैं. ऐसे में उन्हें ये समझाना ज़रूरी है कि वो किसी भी लड़की को अपने कंफर्ट के अनुसार यूज़ नहीं कर सकते.

लड़कियों से फ़िज़िकल न होना

टीनएज लड़कों को लगता है कि वो बहुत मज़बूत हैं. वो लड़कियों को अपने से कमज़ोर समझते हैं और कई बार किसी बात पर बहस होने पर वो हाथ भी चला देते हैं. ऐसा नहीं है कि वो ये घर से बाहर करते हैं. ज़रा ग़ौर कीजिए, जब घर में बहन के साथ झगड़ा होता है, तब भी लड़के हाथा-पाई पर उतर आते हैं. बहन के साथ झगड़ा होने पर आप स़िर्फ बेटी को बोलने की बजाय बेटे को भी डांटें और कहें कि ऐसा करना ग़लत है. घर से ही ऐसी रोक लगने पर वो बाहर भी किसी लड़की से झगड़ा करने पर हाथ नहीं उठाएंगे.

कमज़ोर न समझें

लड़कों को लगता है कि दुनिया का कोई भी काम वो कर सकते हैं, लेकिन लड़कियां नहीं. इतना ही नहीं, टीनएज लड़के लड़कियों को ये कहकर भी चिढ़ाते हैं कि वो कमज़ोर हैं और कोई भी काम वो लड़कों के बिना नहीं कर सकतीं. अपने होनहार को इस बात से अवगत कराएं कि लड़कियां हर काम कर सकती हैं. बस, वो लड़कों को रिसपेक्ट देने के लिए उनसे मदद लेती हैं.

सिखाएं ये बातें भी

* टीनएज में लड़कों को सेक्स से जुड़ी बातें भी समझाएं.
* उनके शरीर में होनेवाले बदलाव से उन्हें अवगत कराएं.
* शारीरिक बदलाव के साथ उन्हें किस तरह से कोपअप करना चाहिए, ये
भी बताएं.
* लड़के होने का मतलब उन्हें समझाएं. उनके दिमाग़ में भरें कि लड़के होने से वो ज़्यादा आज़ाद नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार हैं.
* अगर उनके साथ कोई लड़की है और उसे मदद की ज़रूरत हो, तो उसे पूरा सहयोग करें.
* घर में अपने से बड़ों की बातों का आदर करें और उसका अनुकरण करें.
* उन्हें समझाएं कि अभी उनकी उम्र प्यार करने और ढेर सारी गर्लफ्रेंड बनाने की नहीं है.
* उन्हें इस बात से भी अवगत कराएं कि अगर उन्हें कोई ग़लत तरी़के से अप्रोच करता है, तो वो उससे दूरी बनाएं.
* स्कूल में भी बच्चे गुंडा गैंग बनाते हैं. अपने लाडले से कहें कि इस तरह के ग्रुप में शामिल होने से उसकी ज़िंदगी बर्बाद हो सकती है.
* इस उम्र में उन्हें पढ़ाई का महत्व समझाएं.

 

घर के पुरुषों को निभानी चाहिए ये ज़िम्मेदारी

हेड ऑफ द फैमिली होने के नाते आपकी ये ज़िम्मेदारी बनती है कि आप अपने बेटे को सही तरह से ये बात बताएं कि उसे महिलाओं की इज़्ज़त कैसे करनी चाहिए. ख़ुद आप भी अपनी पत्नी और मां को सम्मान दें, तभी आपका बेटा भी वैसा ही करेगा. हो सके तो बेटे को शारीरिक बदलाव के बारे में आप ख़ुद ही बताएं.

महिलाओं का सम्मान करना

आजकल के लड़कों को सबसे ज़रूरी है ये सिखाना कि कैसे वो किसी महिला का सम्मान करें. ऐसा उन्हें घर से ही करना सिखाएं. घर में पुरुष सदस्य को लड़के सम्मान तो देते हैं, लेकिन जब बात महिलाओं की आती है, तो वो उन्हें सम्मान देना तो दूर, उनसे डरते भी नहीं हैं. पापा की बात वो झट से मानकर काम को पूरा कर लेते हैं, लेकिन आपके किसी काम को कई बार कहने के बावजूद नहीं करते. आप इसे अगर लाड समझती हैं, तो ग़लत है. इससे बच्चा अपनी लाइफ में आनेवाली हर महिला के साथ वैसा ही व्यवहार करेगा. उसे लगेगा कि महिलाओं को सम्मान देना उचित नहीं है.

– श्‍वेता सिंह
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बच्चे का आहार (Baby Food Chart)

 

 

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मां के गर्भ से बाहर आते ही नन्हा-सा शिशु स्वतंत्र आहार पर निर्भर हो जाता है. उसे क्या आहार दिया जाए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह आहार उसके पूरे जीवन को प्रभावित कर सकता है. दादी मां के अनुसार निम्न प्रकार से शिशु को आहार देना चाहिए.

 

* पहले चार माह तक बच्चे को केवल मां के स्तनपान पर रखा जाना चाहिए.
* पांचवें माह से उबालकर ठंडा किया हुआ पानी पहले चम्मच से, फिर छोटी गिलास से पिलाया जाना चाहिए.
* किसी भी उम्र में बोतल से कोई आहार नहीं पिलाना चाहिए.
* इसके बाद धीरे-धीरे निम्न पदार्थों को बच्चे के आहार में शामिल करना चाहिए.
* घर में बनाई गई दलिया, रवे की खीर, चावल की फिरनी एक से दो चम्मच की मात्रा में या बच्चा जितनी मात्रा सुगमता से पचा सके, सुबह-शाम पांचवें माह में देना चाहिए.
* छठे माह में केले को दूध में मसलकर दिन में एक बार देना चाहिए, फिर धीरे-धीरे सेब, पपीता, चीकू, आम जैसे फलों को बच्चे के आहार में शामिल करना चाहिए.
* सप्ताह भर बाद अच्छी तरह पकाई गई सब्जियां मसलकर या मक्खन के साथ 2 से 4 चम्मच देना चाहिए.
* सातवें-आठवें महीने में दाल या खिचड़ी अच्छी तरह पकाकर एवं मसलकर दो से चार चम्मच देना प्रारंभ करें. बच्चे की रुचि के अनुसार इसकी मात्रा बढ़ाते जाएं.
* नौवें माह में गाय या भैंस का दूध गिलास से देना प्रारंभ करें.
* मां का दूध बच्चा जब तक पीता है, जारी रखना चाहिए.
* एक वर्ष के बाद संतुलित व पूर्ण आहार, बच्चा जितना इच्छा से खा सके, खिलाना चाहिए.
इस तरह का आहार स्वतः ही बच्चे की सामान्य वृद्धि व वजन को नियंत्रित करता है.

– परमिंदर निज्जर
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डरना मना है (Don’t be scared of all these…)

parenting tips

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हंसने-रोने की तरह ही डरना भी बच्चों के विकास का अहम् हिस्सा है, लेकिन यही डर कभी-कभी बच्चों के कोमल मन पर गहरी छाप छोड़ देता है. आमतौर पर ये डर उनकी काल्पनिक दुनिया से उपजते हैं, लेकिन इनका प्रभाव उनके वास्तविक जीवन पर पड़ता है. किस तरह के होते हैं ये डर और इन्हें कैसे दूर किया जा सकता है? बता रहे हैं अमजद हुसैन अंसारी.

 

अलग-अलग उम्र में बच्चों के डरने की वजहें अलग होती हैं. उनका डरना बिल्कुल सामान्य है. हां, यदि ये डर हर व़क़्त बच्चों के साथ रहे तो इसे हल्के में न लेते हुए डर के बुख़ार को दूर करने की कोशिश ज़रूर करें. आइए, बच्चों के डर के कारण और उन्हें दूर करने के उपायों के बारे में विस्तार से चर्चा करते हैं.

नन्हें बच्चों के छोटे-छोटे डर
2 से 3 साल की उम्र तक के बच्चे उन्हीं जगहों पर सहज महसूस करते हैं जिनसे वे परिचित होते हैं. किसी भी तरह की नई आवाज़, अनज़ान चेहरा या किसी जानवर के बेहद क़रीब आ जाने पर वे तुरंत डर जाते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चे घर के वातावरण से वाकिफ़ होते हैं, लेकिन वहां हो रही हर चीज़ को समझ पाना उनके लिए थोड़ा मुश्किल होता है. यही वजह है कि बच्चे मिक्सी या वैक्यूम क्लीनर की आवाज़ से भी डर जाते हैं. उन्हें यह पता होता है कि वैक्यूम क्लीनर धूल खींचता है, लेकिन साथ ही यह डर भी लगा रहता है कि कहीं यह उन्हें भी न खींच ले. कुछ बच्चों का डर उनके किसी बुरे अनुभव की वजह से होता है, जैसे- यदि बर्थ डे पार्टी में कान के आस पास अचानक गुब्बारा फूट जाए, तो बच्चे को दूसरे गुब्बारों से भी डर लगने लगता है. कुछ बच्चे अपने पैरेंट्स की सभी ऐक्टिविटीज़ को देखते हैं और उन्हीं चीज़ों से डरते हैं जिनसे उनके पैरेंट्स डरते हैं. पैरेंट्स को डरता देख बच्चे भी स्वाभाविक रूप से उनकी नकल करते हैं.

ऐसे डर से लड़ने की क्या हो स्ट्रैटेजी?
इस उम्र के बच्चे पैरेंट्स को अपने डर का कारण नहीं बता पाते. वे ये तो समझते हैं कि वे असहज महसूस कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अपने डर का कारण नहीं पता होता. इस बारे में 3 वर्षीय लड़के की मां आशा चौहान अपने अनुभव शेयर करते हुए बताती हैं कि उनका बेटा मानक कई बार कपड़े बदलते व़क़्त डर जाता था और उन्हें उसके डर का कारण समझ में नहीं आ रहा था. थोड़े दिनों तक कपड़े बदलते समय मानक की गतिविधियों पर ध्यान देने पर उन्हें समझ में आया कि मानक को स़िर्फ बटन वाले कपड़ों से डर लगता था. आशा ने अनुमान लगाया कि शायद मानक को बटन वाले कपड़ों में बंधा-बंधा सा महसूस होता है और वह घुटन महसूस करता है.
ऐसा ही कोई अनजाना डर आपके बच्चे के मन में भी हो तो उसके बारे में पता लगाकर डर को दूर भगाने की कोशिश ज़रूर करें. इसके लिए बच्चे का डर दूर करने का तरीक़ा ढूंढ़ते रहें.

बदलें बच्चे का नज़रिया
अगर बच्चा कीड़े-मकौड़ों से डरता है, तो उसे इनके बारे में अच्छी बातें बताएं. उसे इन कीड़े-मकौड़ों का स्केच दिखाएं ताकि बच्चे का डर कम हो और वह दुबारा इनका सामना आसानी से कर सके.

सही जानकारी दें
कुछ बच्चे बाल कटवाने से बहुत डरते हैं. उन्हें लगता है कि बाल कटवाने पर बालों से ख़ून निकलेगा, दर्द होगा या फिर नाई की कैंची से उनके कान भी कट सकते हैं. इस स्थिति में बच्चे का डर दूर करने के लिए उसे बताएं कि बाल काटने से ऐसा कुछ भी नहीं होता. जब कभी आप बाल कटवाने जाएं तो बच्चे को भी साथ ले जाकर उसे दिखाएं कि सभी बाल कटवाते हैं.

अपना डर जाहिर न होने दें
अगर आपको ख़ुद छिपकली या चूहे से डर लगता है, तो बच्चे के सामने अपने इस डर को कभी उजागर न होने दें. जब कभी बच्चा पास हो और छिपकली या चूहा दिख जाए, तो उसे घर से बाहर भगाने की ऐक्टिंग करें.

उम्र के साथ बड़े होते डर
4-5 साल की उम्र में बच्चे जब स्कूल जाना शुरू करते हैं तो उनकी कल्पना का दायरा भी बढ़ जाता है और यही वजह है कि उनके डर भी पहले से अधिक जटिल हो जाते हैं. इस उम्र में उनकी कल्पनाशक्ति भी अपने चरम पर होती है. वे उन चीज़ों से तो डरते ही हैं जो उन्हें दिखती हैं, लेकिन जिन चीज़ों को वे देख नहीं पाते उनकी कल्पना करके वे उनसे भी डरते हैं, जैसे- अगर मम्मी-पापा साथ नहीं सोएंगे तो क्या होगा? या अंधेरे में कहीं कोई आ जाएगा इत्यादि.

ऐसे डर से लड़ने की क्या हो स्ट्रैटेजी?
बच्चे की जिज्ञासा शांत करने की कोशिश करें. उससे डर का कारण पूछते हुए उसकी ग़लतफ़हमी या मन का डर दूर करने की कोशिश करें, जैसे- अगर बच्चा अचानक पड़ोसी के कुत्ते के सामने आने पर, उसके भौंकने या सूंघने से डर जाता है, तो उसे बताएं कि कुत्ता उसे पहचानने के लिए सूंघ रहा है व उसके पूंछ हिलाने का मतलब है कि आप उसे अच्छे लगे. ऐसी और भी सिचुएशन्स हैं जो अचानक बच्चे के सामने आ जाती हैं और वह आपसे जवाब चाहता है. अत: सवाल-जवाब के लिए ख़ुद को तैयार रखें.

बार-बार बात न करें
अगर बच्चा किसी बुरे सपने से डर गया हो तो उसके पास बैठकर पूछें कि उसने क्या देखा? सपना देखने के बाद यदि बच्चा अकेला न रहना चाहे तो उसके साथ ही सोएं, लेकिन दूसरे दिन इस स्वप्न के बारे में जिक्र न करें. ऐसा करने से बच्चा भी इस बात को गंभीरता से नहीं लेगा और धीरे-धीरे अपने इस डर को भूल जाएगा.

दूसरे बच्चों का उदाहरण दें
कई बार बच्चों के मन में सड़क पार करते व़क़्त दुर्घटना घटने या मैदान में खेलते हुए गिरने जैसा डर बैठ जाता है. कुछ बच्चे फ़ील्ड में खेलना नहीं चाहते, क्योंकि उन्हें जानवरों से डर लगता है. ऐसी स्थिति में बच्चे को दूसरे बच्चों का या उसके ही बड़े भाई-बहनों का उदाहरण दें और बताएं कि जिन बातों से वो डर रहा है वे महज कल्पना है.

बताएं डर का वैज्ञानिक पहलू
बच्चा अगर किसी चीज़ से डर रहा है तो उसका डर निकालने के लिए उसे उस चीज़ का सामना जबरदस्ती न कराएं. उसके मन से डर निकालने के लिए घटना का मुख्य कारण बताएं, जैसे- अगर बच्चा तेज़ हवा और बारिश से डर रहा है तो उसे तेज़ हवा और बारिश का वैज्ञानिक कारण बताएं. इस उम्र में बच्चे विज्ञान से जुड़ी सतही बातें समझने लगते हैं.

रखें हॉरर शोज़ से दूर
बच्चे को टीवी पर डरावने कार्यक्रम न देखने दें. इन कार्यक्रमों में कई अलग-अलग तरह की आवाज़ों व डरावनी तस्वीरों का इस्तेमाल होता है, जिससे बच्चे डरते हैं और एकांत में भी इनकी कल्पना करते हैं.

बड़े बच्चों के डर
बड़े बच्चे ये बात बख़ूबी समझते हैं कि कभी-कभी कुछ अनचाहा घट सकता है. स्कूल व ट्यूशन या कई बार घर के बड़ों को वे ऐसी घटनाएं, जैसे- चोरी, डकैती आदि के बारे में बात करते हुए सुनते हैं, लेकिन उन्हें इसके बारे में और कुछ पता नहीं होता. यह सब जानने-सुनने के बाद उनके मन में डर बैठ जाता है कि ऐसी कोई घटना उनके साथ घट जाए तो वे उससे कैसे निपटेंगे?

ऐसे डर से लड़ने की क्या हो स्ट्रैटेजी?
उन्हें रिलैक्स रहना सिखाएं. बड़े बच्चों के डर को मैनेज करना अपेक्षाकृत आसान होता है. उनके मन से डर निकालने के लिए उन्हें रिलैक्स करने वाली तकनीक, जैसे- मेडिटेशन या योग आदि सिखाएं, ताकि वे समझ सकें कि यदि उन्हें घबराहट हो रही है तो उन्हें सहज महसूस करने के लिए क्या करना चाहिए?

मीडिया के अत्यधिक एक्सपोज़र से बचाएं
बच्चों की नज़र में दुनिया बहुत सीमित होती है. मीडिया का ़ज़्यादा एक्सपोज़र उनके दिमाग़ पर बुरा प्रभाव डाल सकता है और उनके मन में डर पैदा कर सकता है. ऐसा प्रभाव मार-काट वाले विडियो गेम्स या कार्टून शोज़ से भी होता है. अत: उन्हें मार-काट वाले या हॉरर प्रोग्राम न देखने दें.

जीवन-मृत्यु की बातें भी करें
थोड़े बड़े बच्चे ज़िंदगी-मौत को लेकर भी सवाल कर सकते हैं, जैसे- उसका छोटा भाई या बहन कैसे पैदा हुई? आपकी मौत कब होगी? अत: बच्चों के ऐसे सवालों के जवाब के लिए ख़ुद को तैयार रखें.

आकस्मिक दुर्घटना के बारे में बताएं
इन दिनों बाढ़, अकाल, दंगा-फसाद, आतंकवाद जैसे मुद्दों पर चर्चा होना आम बात है. जाहिर है कि इन बातों से बच्चों को दूर रखना बेहद मुश्किल है. ऐसी बातें सुनकर या देखकर उनके मन में सवाल उभरना भी सामान्य है. ऐसे मौक़ों पर बच्चों से इस बारे में बातचीत करें और उन्हें बताएं कि ऐसी घटनाएं कभी-कभार ही होती है और ऐसी घटनाओं से सबको सुरक्षित रखने के लिए सरकार और समाज के पास कई उपाय हैं और आपने भी उनकी सुरक्षा के लिए इंतज़ाम कर रखा है.

बच्चों को कहां लेकर जाएं? (Where can you take your children along?)

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ज़्यादातर पैरेंट्स मानते हैं कि जब तक बच्चे उछलकूद करने लायक नहीं हो जाते, उन्हें साथ लेकर घूमना-फिरना आसान होता है, लेकिन एक्सपर्ट्स इस धारणा से सहमत नहीं. वे मानते हैं कि नवजात शिशु के साथ बाहर जाने पर अपेक्षाकृत ज़्यादा सावधानी बरतनी चाहिए. छोटे बच्चों को किन जगहों पर ले जाना ठीक नहीं और उन्हें ले जाते समय क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

 

पिक्चर हॉलः अपने छोटे बच्चे के साथ पहली बार फ़िल्म देखने जाते समय अक्सर मांओं को लगता है कि पिक्चर हॉल में अंधेरा होता है, इसलिए बच्चे को आराम से नींद आ जाएगी और वे इत्मिनान से फ़िल्म देख सकेंगी.
एक्सपर्ट्स कहते हैं- यह धारणा बिल्कुल ग़लत है. घर में वैक्यूम क्लीनर, मिक्सर आदि की आवाज़ ही जब छोटे बच्चे को परेशान कर देती है, तो अंदाज़ा लगाइए कि थियेटर का तेज़ साउंड बच्चे को कितना बेचैन करेगा. एक्सपर्ट्स के अनुसार, 90 डेसीबल या उससे तेज़ आवाज़ बच्चे की सुनने की शक्ति पर बुरा प्रभाव डालती है. आजकल तो बच्चों की फ़िल्मों में भी 130 डेसीबल तक का साउंड होता है. ऐसे में बच्चे का रोना लाज़मी है, जिससे आपके साथ-साथ आपके आसपास बैठे दर्शकों को भी परेशानी होती है.

क्या करें?

* छोटे बच्चे के साथ थियेटर जाने से परहेज़ करें. फ़िल्म की डीवीडी आने का इंतज़ार करें.

* अगर फ़िल्म देखने की बहुत इच्छा हो रही हो तो बच्चे की सेहत को ध्यान में रखते हुए ऐक्शन और स्पेशल इ़फेक्ट वाली फ़िल्मों के बजाय डायलॉग बेस्ड फ़िल्म देखें.

* इससे बच्चे को कम परेशानी होगी. हो सके तो थियेटर में पीछे व कोने की सीट की टिकट ख़रीदें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर बच्चे को लेकर आसानी से बाहर निकला जा सके.

शॉपिंग: बच्चे व अपने लिए नए कपड़े या अन्य सामान ख़रीदने के लिए अक्सर महिलाएं नवजात शिशु को स्ट्रॉलर में लिटाकर शॉपिंग के लिए निकल पड़ती हैं.
एक्सपर्ट्स कहते हैं- छोटे बच्चे के साथ शॉपिंग करने में कोई बुराई नहीं है. हां, इसके लिए थोड़ी प्लानिंग ज़रूर करनी चाहिए.

क्या करें?
* ऐसे मॉल का चुनाव करें जहां भरपूर खुली जगह हो और ड्रेसिंग रूम भी बड़ा हो, ताकि ज़रूरत पड़ने पर बच्चेे के कपड़े, डायपर आदि आसानी से बदले जा सकें.

* बच्चे के साथ पहली बार शॉपिंग थोड़ी मुश्किल हो सकती है, लेकिन इससे घबराएं नहीं.

* दो-तीन बार साथ जाने के बाद आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि बच्चा कितनी देर तक उस माहौल को एंजॉय करता है और कितनी देर बाद रोना शुरू कर देता है.

* शॉपिंग के दौरान ही अगर बच्चा रोना शुरू कर दे और उसके चुप होने के आसार नज़र न आएं तो मां के लिए घर लौटने में ही भलाई है.

शादी का फंक्शनः पैरेंट्स सोचते हैं कि बच्चे को परिवार के सभी सदस्यों और दोस्तों को दिखाने का इससे अच्छा मौक़ा हो ही नहीं सकता.
एक्सपर्ट्स कहते हैं- शादी-ब्याह के घर में चहल-पहल और हंसी-मज़ाक होना आम बात है. ऐसा माहौल बच्चे को रास नहीं आता और वो परेशान होने लगता है. साथ ही क़रीबी रिश्तेदार बच्चे को गोद में लेकर किस (चुंबन) करते रहते हैं. इससे न स़िर्फ बच्चे को इंफेक्शन का ख़तरा रहता है, बल्कि इतने सारे अनजान चेहरे देखकर वह डर भी सकता है.

क्या करें?

* बच्चे के साथ बहुत ज़रूरी फंक्शन में ही जाएं.

* साथ ही खुले मैदान में होने वाले फंक्शन में जाने से परहेज़ करें.

* घर में होने वाले फंक्शन में जाएं, ताकि ज़रूरत पड़ने पर बच्चे को लेकर अलग रूम में जाया जा सके.

* अगर समय या मौसम बच्चे के अनुकूल नहीं है तो अकेले जाने के बजाय साथ में किसी और को भी ले जाएं, जो बच्चे की देखभाल में मदद कर सके.

रेस्टॉरेंटः अधिकतर पैरेंट्स को लगता है कि बच्चे के मुंह में दूध की बोतल डालकर परिवार या दोस्तों के साथ आराम से बातें करते हुए खाने का लुत्फ़ उठाया जा सकता है.
एक्सपर्ट्स कहते हैं- रेस्टॉरेंट के शोरगुल भरे माहौल और खाने की महक के कारण अक्सर बच्चा बेचैन होकर रोने लगता है.

क्या करें?
* रेस्टॉरेंट जाने का मन है तो कम भीड़भाड़ वाले समय में जाएं.

* बच्चे का खिलौना साथ रखना न भूलें. नॉर्मल चेयर के बजाय थोड़ी गद्देदार कुर्सी पर बैठें.

* ऐसा खाना ऑर्डर करें जिसे एक हाथ से आसानी से खाया जा सके, ताकि दूसरे हाथ से बच्चे को पकड़ कर रखा जा सके.

* हो सके तो रेस्टॉरेंट जाने से पहले फ़ोन पर मैनेजर से पूछ लें कि छोटे बच्चों के लिए वह जगह उपयुक्तहै या नहीं.

– अमज़द हुसैन अंसारी

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कैसे कराएं बच्चों की क़िताबों से दोस्ती? (How to encourage your child to read books?)

Parenting Tips

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बच्चों के मानसिक और बौद्धिक विकास में क़िताबें महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं, लेकिन आज के हाईटेक युग में बच्चे क़िताबों के महत्व को भूलते जा रहे हैं. बच्चों को क़िताबों की दुनिया के क़रीब रखने के लिए पैरेंट्स को क्या करना चाहिए? जानने की कोशिश की है विजया कठाले निबंधे ने.

आजकल बच्चों के लिए बुक्स स़िर्फ स्कूल और कोर्स की पढ़ाई तक ही सीमित रह गई हैं. ऐसी स्थिति में बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करना अपने आप में एक बड़ा काम है. अचानक कुछ दिनों में ही बच्चों के अंदर क़िताबों के लिए लगाव पैदा नहीं किया जा सकता. यह एक लंबी प्रक्रिया है. विशेषज्ञों के अनुसार, अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा क़िताबें पढ़ना सीखे या क़िताबों से प्रेम करे, तो इसकी शुरुआत तब लेनी चाहिए जब वह चार से छह महीने का हो.अगर हम बच्चे को इसी उम्र से ही कहानियां, पिक्चर बुक्स इत्यादि पढ़कर सुनाएंगे, तो धीरे-धीरे बच्चे के मन में क़िताबों के प्रति अपने आप लगाव उत्पन्न होने लगेगा.
बच्चों में क़िताबों के प्रति रुचि पैदा करने में कुछ बाधाएं आती हैं. क्या हैं ये बाधाएं और इनसे कैसे निपटा जा सकता है?
इन सभी बातों की जानकारी के लिए हमने बात की साइकोलॉजिस्ट डॉ. राजाराम लोंढे से.

रुकावट-1
टीवी, वीडियो गेम्स व कंप्यूटर्स
डॉ. राजाराम कहते हैं, “ टीवी, वीडियो गेम्स, कंप्यूटर्स जैसी चीज़ें आज के बच्चों की सबसे बड़ी दुश्मन हैं.” इन सभी हाईटेक इंटरटेंटमेंट की ओर बच्चे ज़्यादा आकर्षित होते हैं, क्योंकि इनमें मूविंग पिक्चर्स, कलर्स सब कुछ हैं और इन्हें जानने-समझने के लिए किसी प्रकार की दिमाग़ी कसरत भी नहीं करनी पड़ती.

रुकावट-2
सीडी और डीवीडी

कुछ समय पहले तक कहानी व कविताओं का लुत्फ़ उठाने के लिए क़िताबें पढ़ना ज़रूरी था, पर आजकल यह सब सीडी और डीवीडीज़ में उपलब्ध है. इस माध्यम की ओर स़िर्फ बच्चे ही नहीं, पैरेंट्स भी आकर्षित हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें भी कहानी या अन्य चीज़ें पढ़कर सुनाने के लिए अलग से समय भी नहीं निकालना पड़ता.

रुकावट-3
समय की कमी
इन दिनों वर्किंग पैरेंट्स का ट्रेंड बढ़ता जा रहा है. काम की अधिकता और समय की कमी के कारण अक्सर माता-पिता बच्चों को टीवी के सामने बैठा देते हैं. यह क़दम आगे चलकर बहुत घातक सिद्ध होता है और बच्चे क़िताबी दुनिया से दूर होते चले जाते हैं.

बच्चों में डालें पढ़ने की आदत

पढ़ने की आदत डालने के लिए ज़रूरी है उनमें पढ़ने की रुचि निर्माण करना. इसके लिए माता-पिता को निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए.
छोटे बच्चों में पढ़ने की आदत डेवलप करने का सबसे बढ़िया माध्यम है स्टोरी बुक्स. यदि बच्चा 1-2 साल का है तो उसे रोज़ाना कम-से-कम आधे घंटे कहानी पढ़कर अवश्य सुनाएं.
छोटे बच्चे बहुत चंचल होते हैं. उनका ध्यान बहुत जल्दी भंग हो जाता है. अत: उन्हें एकांत जगह में ही कहानियां सुनाएं. अगर घर में ज़्यादा सदस्य हैं तो कहानियां सुनाते व़क़्त कमरा बंद कर दें.
बच्चे को तरह-तरह की क़िताबें पढ़ने के लिए दें. इससे क़िताबों के प्रति उसकी रुचि बनी रहेगी.
बच्चे को अपने साथ लायब्रेरी लेकर जाएं. एक साथ इतने लोगों को पढ़ता देख उसकी भी इच्छा बढ़ेगी.
बच्चे के लिए क़िताबें ख़रीदते समय उसे भी इनवॉल्व करें.
उससे पूछें कि वह क्या पढ़ना चाहता है?
धैर्य से काम लें. अगर बच्चा एक ही क़िताब बार-बार पढ़ना चाहता है, तो उसे वैसा करने दें. छोटे बच्चे चीज़ें दोहराकर जल्दी सीखते हैं.
जहां जाएं वहां से बच्चे के लिए एक क़िताब ज़रूर लाएं.

कैसे सलेक्ट करें क़िताबें?

बच्चे के लिए क़िताबें चुनते समय उसकी उम्र ध्यान में रखना बहुत ज़रूरी है.
0 से 3 साल तक के बच्चे
इस उम्र के बच्चों के लिए बड़ी-बड़ी चित्रोंवाली पुस्तकें ख़रीदें. इस उम्र के बच्चे सब्ज़ियां, फल, जानवर, खाने की चीज़ें इत्यादि चित्रों वाली क़िताबें पसंद करते हैं. इस उम्र में बच्चों को स़िर्फ विज़ुअल इ़फेक्ट्स ही समझ में आते हैं.
4 से 8 साल तक के बच्चे
इस उम्र के बच्चों को स़िर्फ चित्र नहीं, कहानियां भी पसंद आती हैं. अत: इनके लिए सरल भाषा की स्टोरी बुक्स ही चुनें.
9 से 12 साल तक के बच्चे
इस उम्र के बच्चों को क़िताब पढ़ने की आदत हो चुकी होती है और इन्हें पता होता है कि वे क्या पढ़ना चाहते हैं.
क्या ध्यान रखें?
डॉ. लोंढे के अनुसार, “ जिस तरह अभिभावक बच्चों के टीवी प्रोग्राम पर नज़र रखते हैं, उसी तरह उन्हें इस बात पर भी नज़र रखनी चाहिए कि वे क्या पढ़ रहे हैं, ख़ासकर आठ से पंद्रह साल के बच्चों पर. कभी-कभी बच्चे कुछ ऐसा साहित्य पढ़ते हैं, जिसे हैंडल करना उनके बस में नहीं होता.
कभी-कभी बच्चे पढ़ते-पढ़ते कहानी में पूरी तरह घुस जाते हैं और वैसा ही व्यवहार करते हैं.

बच्चे को जोख़िम से कैसे बचाएं? (How to save kids from mishaps?)

 

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खेल-खेल में बच्चे कई बार अपनी जान से ही खेल जाते हैं. कभी शर्ट की बटन को चॉकलेट समझकर निगल लेते हैं, तो कभी फिनायल को जूस समझकर पीने लगते हैं. अगर आपका बच्चा भी ऐसी हरकत करे, तो घबराने की बजाय क्या करें?

 

बच्चे नादानी में कई बार ऐसी हरकत कर बैठते हैं, जो उनके लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकती है. कई बार तो उनकी जान पर भी बन आती है. ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए? आइए, जानते हैं.

यदि नाक में कुछ फंस जाए
कई बार बच्चे खेलते-खेलते अपनी नाक में कोई छोटी-मोटी चीज़, जैसे- पेन कैप, मार्बल, थर्मोकॉल के छोटे बॉल आदि फंसा लेते हैं, जिन्हें हाथ से निकालना मुश्किल होता है.

ऐसी स्थिति में क्या करें?
* बच्चे को नाक की बजाय मुंह से सांस लेने की सलाह दें. नाक से सांस लेने पर फंसी हुई चीज़ और अंदर जा सकती है.
* नाक में फंसी हुई चीज़ को हेयर प्लकर से निकालने की कोशिश न करें, इससे फंसी हुई चीज़ गले में जा सकती है.
* स्वयं निकालने की बजाय इएनटी डॉक्टर से संपर्क करें.

यदि गले में कोई चीज़ फंस जाए
छोटे बच्चे कोई भी चीज़, जैसे- क्वॉइन, मार्बल, छोटे पत्थर, काग़ज़ के टुकड़े आदि उठाकर तुरंत मुंह में डाल लेते हैं, ऐसे में कई बार चीज़ें उनके गले में फंस जाती हैं.

ऐसी स्थिति में क्या करें?
* अपनी हथेली से बच्चे की पीठ ज़ोर-ज़ोर से थपथपाएं. ऐसा करने से कई बार धक्के की वजह से गले में फंसी हुई चीज़ बाहर निकल आती है.
* यदि स्थिति गंभीर लगे, तो बच्चे को तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं.

यदि त्वचा पर ज्वलनशील बाम लग जाए
बड़ों को देखकर बच्चे भी बाम लगाने लगते हैं. कई बार वे पूरे शरीर व चेहरे पर बाम लगा लेते हैं. इससे उनकी त्वचा में जलन होने लगती है.

ऐसी स्थिति में क्या करें?
* सबसे पहले प्रभावित जगह को पानी से अच्छी तरह धोकर सूखे कपड़े से पोंछ दें. फिर कोल्ड क्रीम लगाएं. ऐसा करने से जलन से राहत मिलेगी.
* आप चाहें तो प्रभावित स्थान पर बर्फ भी लगा सकती हैं. इससे भी जलन कम होगी.

यदि ग्लू (गम) से उंगली चिपक जाए
यदि आप किसी चीज़ को चिपकाने के लिए ग्लू का इस्तेमाल कर रही हैं, तो इस्तेमाल के तुरंत बाद इसे बच्चों की पहुंच से दूर रख दें, वरना बच्चे इससे खेलने लगेंगे या ग्लू का इस्तेमाल करने की कोशिश करेंगे. इससे उनकी उंगलियां आपस में चिपक सकती हैं.

ऐसी स्थिति में क्या करें?
* चिपकी हुई उंगलियों के बीच में वेजीटेबल ऑयल या घी लगाकर थोड़ी देर के लिए छोड़ दें. जब ग्लू पिघलने लगे तो कपड़े से रगड़कर उंगलियों को धीरे-धीरे छुड़ाएं.
* आप एसीटोन या मेडिसिनल अल्कोहल का इस्तेमाल भी कर सकती है. हां, स्थिति ज़्यादा गंभीर लगे, तो बिना देर किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

यदि कोई जानवर काट ले
बच्चे कुत्ते, बिल्ली जैसे पालतू जानवरों के साथ खेलते-खेलते कई बार उनके मुंह में ख़ुद ही हाथ डाल देते हैं या कभी पालतू जानवर ही चिढ़कर बच्चों को काट लेते हैं.

ऐसी स्थिति में क्या करें?
* सबसे पहले काटी हुई जगह पर साबुन लगाकर पानी से लगातार 5 मिनट तक धोएं, फिर घाव पर एंटीसेप्टिक मेडिसिन लगाएं. इससे इंफेक्शन का ख़तरा कम हो जाता है.
* इसके तुरंत बाद बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाएं और सही तरी़के से इलाज करवाएं, वरना आगे चलकर ये घाव गंभीर हो सकता है और तकलीफ़ बढ़ सकती है.

यदि बच्चा फिनायल पी ले
बेहतर होगा कि आप फिनायल, परफ्यूम आदि की बोतलें बच्चों की पहुंच से दूर रखें. ये रंगीन बोतलें और इनकी ख़ुशबू बच्चों को आकर्षित करती है, जिससे वे इन्हें पीने की कोशिश करते हैं.

ऐसी स्थिति में क्या करें?
* यदि बच्चा थोड़ा बड़ा है, तो उसे मुंह में पानी भरकर थूकने के लिए कहें. इससे कम से कम मुंह में लगा विषैला पदार्थ बाहर निकल जाएगा.
* इसके तुरंत बाद बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाएं. साथ में उस विषैले पेय पदार्थ की बोतल भी ले जाएं. ऐसा करने से डॉक्टर को इलाज करने में आसानी होगी.

+ इन तरक़ीबों को अपनाकर आप कुछ समय के लिए बच्चे को ख़तरे से बचा सकती हैं, परंतु समस्या से पूरी तरह निपटने के लिए डॉक्टर के पास ज़रूर जाएं.
+ यदि कभी बच्चा ऐसी कोई हरकत कर बैठे, तो घबराएं नहीं, हिम्मत से काम लें, वरना आपके चेहरे पर डर देखकर बच्चा और डर जाएगा व स्थिति ज़्यादा गंभीर हो जाएगी.
– नीलम चौहान