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बच्चों में नींद न आने के 7 कारण व उपाय (7 Causes Of Sleeplessness In Children And Its Solutions)

बच्चों में, नींद न आने के कारण, उपाय, Causes Of Sleeplessness, In Children, Solutions

 

बच्चों में, नींद न आने के कारण, उपाय, Causes Of Sleeplessness, In Children, Solutions

 

जिस ऱफ़्तार से व़क़्त बदल रही है, उससे भी कहीं तेज़ी से बदल रही है हमारी लाइफ़स्टाइल, जिसने न स़िर्फ बड़ों, बल्कि मासूम बच्चों को भी तनाव, अवसाद का शिकार बना दिया है और उनकी रातों की नींद तक ग़ायब कर दी है… अब बड़े ही नहीं, बच्चे भी नींद न आने की बीमारियों से जूझ रहे हैं.

मां की लोरियां सुनकर सोना तो ख़ैर अब बीते ज़माने की बात होती जा रही हैं, क्योंकि आज की कामकाजी मां के पास न तो बच्चे को लोरी सुनाने का समय है और न ही आज के बच्चों को इसमें कोई रुचि है. उनके पास चटपटे कार्यक्रम परोसता टेलीविज़न, इंटरनेट या फिर मोबाइल फ़ोन जो है… और बच्चों की इन हरकतों पर अफ़सोस करने का भी हमें कोई हक़ नहीं है, क्योंकि बच्चों को ये सारी सुख-सुविधाएं या यूं कह लें मन बहलाव के साधन हमने ही मुहैया कराए हैं. आज के कामकाजी माता-पिता के पास बच्चों के लिए पर्याप्त समय तो होता नहीं, ऐसे में अपना अपराधबोध दूर करने के लिए वो बच्चों को तमाम लक्ज़री आइटम ख़रीदकर दे देते हैं, बिना ये सोचे-समझे कि इनका बच्चों के शारीरिक-मानसिक विकास पर क्या असर पड़ेगा. आज ख़ासकर बड़े शहरों के ज़्यादातर घरों में खाने, सोने, मनोरंजन की आदतें इतनी बेतरतीब हो गई हैं कि इसका सीधा असर परिवार के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है और इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं मासूम बच्चे. वे जाने-अनजाने नींद न आने की तमाम बीमारियों से जूझ रहे हैं.

श्‍वेता (परिवर्तित नाम) सातवीं कक्षा में पढ़ती है. उसके अब तक के परफॉर्मेंस से न केवल उसके माता-पिता, बल्कि टीचर भी काफ़ी ख़ुश थे. लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसका पढ़ाई में मन नहीं लग रहा. टीचर ने कई बार जब उसे स्कूल में सोते पाया, तो उसके माता-पिता से शिकायत की. माता-पिता भी जब उसकी हरकतों से परेशान हो गए तो मनोचिकित्सक को दिखाया. उन्होंने सबसे पहले उसकी दिनचर्या का अध्ययन किया, तो पाया कि श्‍वेता रात एक-डेढ़ बजे तक टीवी सीरियल देखती थी और फिर दूसरे दिन स्कूल जाने के लिए उसे सुबह 6 बजे उठना पड़ता था. इस तरह रूटीन बिगड़ जाने से उसमें चिड़चिड़ापन भी आ गया था और उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता था. श्‍वेता पढ़ाई में अच्छी थी, इसलिए माता-पिता उसकी हरकतों पर ध्यान ही नहीं देते थे. माता-पिता की इसी लापरवाही ने श्‍वेता को देर रात तक टीवी देखने की छूट दे दी और उसका पढ़ाई में से मन हटने लगा.
ख़ैर, श्‍वेता के माता-पिता ने तो व़क़्त रहते उसकी आदतों, दिनचर्या में बदलाव लाकर उसे संभाल लिया, लेकिन कई माता-पिता तो जान भी नहीं पाते कि उनके बच्चे को नींद न आने का कारण क्या है? कई घरों के बच्चे नींद में बड़बड़ाते हैं, डरावने सपने देखकर चीखते-चिल्लाते हैं, नींद में ही चलने लगते हैं, लेकिन माता-पिता इसे बच्चे की आदत समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं और बच्चे का रोग बढ़ता ही चला जाता है. नतीजा- न स़िर्फ बच्चे की नींद पूरी नहीं होती, बल्कि कई बार उसका शारीरिक-मानसिक विकास तक रुक जाता है. बच्चों के लिए पर्याप्त नींद कितनी ज़रूरी है बता रहे हैं- चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. समीर दलवाई.
डॉ. दलवाई के अनुसार, “पर्याप्त नींद हमारे लिए बेहद ज़रूरी है, क्योंकि नींद से हमारे शारीरिक व मानसिक विकास पर प्रभाव पड़ता है. सोने से ज़्यादा हार्मोन सक्रिय होते हैं, जिससे व्यक्तिगत विकास अच्छा होता है. ख़ासकर बच्चों के शारीरिक-मानसिक विकास पर नींद का बहुत असर पड़ता है. नींद पूरी न होने से बच्चे का विकास धीमा या फिर रुक सकता है. उम्र के हिसाब से बच्चे को भरपूर नींद मिलनी ही चाहिए, जैसे- पैदा होने के कुछ समय तक बच्चे का 20 घंटे सोना ज़रूरी है. इसी तरह 2 साल तक 12 से 14 घंटे, 2 से 5 साल तक 12 घंटे, 6 से 12 साल तक 10 घंटे और 12 साल के बाद 9 घंटे की नींद लेनी ही चाहिए.

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नींद न आने के कारण

1. शारीरिक कारण– इसमें वातावरण, घर-परिवार के लोगों का भरपूर सहयोग होते हुए भी शारीरिक तकली़फें नींद न आने का कारण बनती हैं. ज़्यादातर मामलों में खर्राटे लेना, मुंह खोलकर सोना, सांस रुक जाना, नींद में फिट आना, टॉन्सिल आदि मेडिकल तकलीफ़ों के कारण भी बच्चों में नींद न आने की शिकायत पाई जाती है.

2. लाइफ़स्टाइल– हमारी आज की लाइफ़स्टाइल यानी एकल परिवारों की बढ़ती तादाद, जो बच्चों को अपनी तरह से बचपन जीने नहीं देती. आज ख़ासकर बड़े शहरों में मम्मी-पापा दोनों कामकाजी हैं. ऐसे में बच्चा देर रात तक माता-पिता की राह देखता है. फिर उनके साथ खेलने, भोजन करने आदि में एक-डेढ़ तो बज ही जाते हैं. उस पर स्कूल जाने के लिए सुबह जल्दी उठने के कारण उन्हें स़िर्फ 5-6 घंटे की ही नींद मिल पाती है. छोटी उम्र में इतनी कम नींद लेने से बच्चे के विकास पर इसका असर पड़ता है. जबकि यूरोप, अमेरिका आदि देश बच्चों के मामले में काफ़ी सजग हैं. यहां पर बच्चों को 7 बजे डिनर कराकर आठ-नौ बजे तक सुला दिया जाता है, ताकि बच्चों को पर्याप्त नींद मिल सके.

3. पारिवारिक माहौल– कई बार माता-पिता के बीच चलने वाले झगड़े भी बच्चों के दिमाग़ पर गहराई तक असर डालते हैं. बच्चे ऐसे माहौल में ख़ुद को असुरक्षित महसूस करते हैं. इस डर से भी वो सो नहीं पाते और स्कूल या अन्य गतिविधियों में भी सक्रिय नहीं रह पाते. यानी माता-पिता के आपस के झगड़े का भी बच्चों के शारीरिक व मानसिक विकास पर बुरा असर पड़ता है.

4. टेलीविज़न का बढ़ता प्रभाव– नींद पूरी न होने या नींद न आने की एक और बड़ी वजह है टेलीविजन यानी मीडिया. आजकल बच्चों के चैनल भी चौबीसों घंटे चलते रहते हैं और बच्चे यदि रात में टीवी ना भी देखें, तो मांओं के सास-बहू के प्रोग्राम देर रात तक चलते रहते हैं. ऐसे में बच्चे यदि सोना भी चाहें तो घर का वातावरण उन्हें सोने नहीं देता. फिर नींद पूरी न होने के कारण इसका असर उनकी पढ़ाई पर भी पड़ता है. उनका पढ़ाई में मन नहीं लगता और वे स्कूल में भी झपकी लेते रहते हैं.

5. डरावने सपने आना– कई बच्चे नींद में बुरे सपने देख डरकर उठ जाते हैं या चीखने-चिल्लाने लगते हैं. यदि ऐसा कभी-कभार होता है, तब तो ठीक है, लेकिन यदि ऐसा रोज़ ही होता है या एक महीने से ज़्यादा लंबे समय से हो रहा है, तो आपको सचेत हो जाना चाहिए.

6. नींद में बड़बड़ाना– अक्सर कई बच्चे दिन में उन्होंने जो क्रिकेट मैच खेला होता है या दोस्तों के साथ जो भी गतिविधियां की हैं, वैसी ही बातचीत नींद में भी करते हैं. यदि ऐसा कभी-कभार होता है, तब तो ठीक है, लेकिन यदि बच्चा रोज़ ही ऐसा करता है या नींद में डरता है तो यह खतरे का संकेत है. ऐसा तनाव, डर या फिर बुरे सपनों के कारण भी हो सकता है. अतः इसका कारण जानने की कोशिश करें और बच्चे को उस डर से बाहर निकालें.

7. खर्राटे और नींद में चलना– बच्चा यदि नींद में खर्राटे ले, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें, क्योंकि ये इनसोम्निया यानी नींद की बीमारी का लक्षण हो सकता है. इसमें बच्चे को सांस लेने में तकलीफ़ होती है और कई बार नींद में ही दम घुट जाने की भी गुंजाइश रहती है. अतः इसे हल्के से न लें और बच्चे का उचित इलाज कराएं. ज़्यादातर मामलों में ज़रूरत से ज़्यादा मोटे बच्चे नींद में खर्राटे लेते हैं.
कई बच्चों में नींद में चलने की समस्या पाई जाती है और उन्हें याद भी नहीं रहता कि वे नींद में चले थे. हालांकि कई मामलों में उम्र बढ़ने के साथ-साथ ये समस्या अपने आप ठीक हो जाती है, लेकिन एहतियात के तौर पर माता-पिता को डॉक्टर से भी संपर्क कर लेना चाहिए.

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नींद न आने के दुष्परिणाम
आईक्यू कम होना, तनाव, चिड़चिड़ापन, थकान, काम में ध्यान न लगना, हाइपर एक्टीविटी आदि की समस्या हो सकती है. ऐसी किसी भी स्थिति में मेडिकल ट्रीटमेंट ज़रूरी है.

कब जाएं डॉक्टर के पास
नींद न आने के ज़्यादातर मामलों में बच्चे की दिनचर्या या सोने की आदतों में बदलाव लाकर नींद की समस्या को दूर किया जा सकता है. लेकिन यदि यह शिकायत एक महीने से ज्यादा से है, तो आपको डॉक्टर से संपर्क कर लेना चाहिए. समस्या चाहे शारीरिक हो या मानसिक दोनों ही भयंकर रूप ले सकती हैं, यदि व़क़्त पर इलाज न किया जाए.

क्या करें कि नींद आ जाए-
* कोशिश करें कि आपके सोने और उठने का समय हमेशा एक ही हो.
* हो सके, तो अपना लाइफ़स्टाइल पैटर्न बदलें, जैसे- ऑफ़िस से जल्दी घर आना, जल्दी भोजन करना, जल्दी सोना और सुबह भी जल्दी ही उठना आदि.
* घर या बाहर की देर रात तक चलनेवाली गतिविधियां कम करें.
* बच्चों को भी बच्चों के कार्यक्रम देर रात तक न देखने दें और न ही माता-पिता देखें. यानी बच्चों के सोने के लिए घर का माहौल शांत रखें.
* घर में लड़ाई-झगड़े का माहौल न रखें. ऐसी कोई बात या व्यवहार न करें, जिससे बच्चा डरे और सो न सके, क्योंकि इसका भी बच्चों के विकास पर विपरीत असर पड़ता है.
* इस बात का ख़ास ख़याल रखें कि बच्चा किसी भी हाल में ख़ुद को असुरक्षित न महसूस करे.
* सोने से पहले बच्चे को स्नान करने या पुस्तक पढ़ने की आदत दिलाएं, इससे भी उसे अच्छी नींद आएगी.
* बच्चे का सोने का स्थान शांत व आरामदायक है या नहीं, इसका भी ध्यान रखें.

– कमला बडोनी

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तलाक़ का बच्चों पर असर… (How Divorce Affects Children?)

Divorce

Talaq ka bachcho par asar

तलाक़ स़िर्फ कपल्स के रिश्तों को ही नहीं तोड़ता, बल्कि ये बच्चों के कोमल दिल को भी गहरी ठेस पहुंचाता है. पैरैंट्स का अलगाव उन्हें अकेला और तनावग्रस्त कर देता है. बच्चों को तलाक़ के पीड़ादायक अनुभव से कैसे बचाया जा सकता है? जानने के लिए अरुण कुमार ने बात की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट पूनम राजभर से.

 

बच्चों की सही परवरिश के लिए माता-पिता दोनों के साथ, प्यार व दुलार क़ी ज़रूरत होती है, लेकिन तलाक़ के बाद बच्चा माता-पिता में से किसी एक से दूर हो जाता है, और ये अलगाव उसके कोमल मन को अंदर से तोड़ देता है. माता-पिता के बीच आई इस दूरी को कुछ बच्चे आसानी से सहन नहीं कर पातें और डिप्रेश हो जाते हैं. हाल ही में हुए एक अध्ययन में भी ये बात सामने आई है कि तलाक़शुदा दंपत्तियों के बच्चों का सामाजिक व मानसिक विकास ठीक से नहीं हो पाता. वो पढ़ाई में भी अन्य बच्चों से पिछड़ जाते हैं. माता-पिता के अलगाव का अलग-अलग उम्र के बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है? आइए, जानते हैं.

0-4 साल
4 साल की उम्र तक के बच्चे अपने आसपास रहनेवाले लोगों से ज़्यादा जुड़े रहते हैं, लेकिन उन्हें आसपास होनेवाली बातों व घटनाओं की समझ नहीं होती. ऐसे में यदि पैरेंट्स अलग होते हैं, तो बच्चे को ज़्यादा कुछ समझ नहीं आता. तलाक़ के बाद यदि बच्चे की कस्टडी मां के पास है, तो वो पिता की अनुपस्थिति का आदी हो जाता है, लेकिन हालात तब बिगड़ सकते हैं जब बच्चे को संभालने के लिए परिवार में मां के अलावा कोई और जैसे नाना, नानी या अन्य सदस्य न हों. इस उम्र के बच्चे भले ही पारिवारिक ढांचे को न समझ पाएं, लेकिन उन्हें ये ज़रूर महसूस होता है कि उनके आसपास सब कुछ सामान्य नहीं है.

पैरेंट्स क्या करें?
पति-पत्नी को चाहिए कि वे बच्चे की कस्टडी का मामला कोर्ट-कचहरी में ले जाने की बजाय आपसी सहमति से सुलझा लें. चूंकि इस उम्र में बच्चों को मां की ज़्यादा ज़रूरत होती है, इसलिए बेहतर होगा कि उसे मां के पास ही रहने दिया जाए (यदि मां आर्थिक रूप से सक्षम हो). यदि मां आर्थिक रूप से कमज़ोर है, तो उसे आर्थिक सहायता उपलब्ध करना पिता की ज़िम्मेदारी है.

5-10 साल
इस उम्र में बच्चे चीज़ों को समझने लगते हैं और अपनी इच्छाओं को भी अभिव्यक्त करते हैं. सीखने के लिहाज़ से ये उम्र बच्चों के लिए बहुत अहम होती है. ऐसे में तलाक़ के बाद उपजे तनाव से वो आत्मकेंद्रित, दुखी और कुंठित हो सकते हैं. इस उम्र के बच्चे तलाक़ जैसी चीज़ों को समझ नहीं पातें. इसलिए वो बार-बार यही सोचते रहते हैं कि आख़िर मेरे मम्मी-पापा अलग क्यों रह रहे हैं? मेरे दूसरे दोस्तों की तरह मेरे पैरेंट्स साथ क्यों नहीं रहते? ऐसे सवाल बार-बार बच्चों को परेशान करते रहते हैं. इतना ही नहीं इसका उनके मानसिक विकास पर भी नकारात्मक असर होता है.

क्या करें पैरेंट्स?
बच्चों की ख़ातिर घर का महौल ख़ुशनुमा बनाएं रखने का प्रयास करें. बच्चे को ज़्यादा से ज़्यादा समय देने की कोशिश करें. उसके सामने अपने पार्टनर (पति/पत्नी) की बुराई न करें. अगर बच्चा कोई सवाल पूछता है, तो प्यार से उसका जवाब दें. उसके सवालों से झलाएं नहीं. आपके तलाक़ की वजह से बच्चे को स्कूल फियर भी हो सकता है, क्योंकि स्कूल में दूसरे बच्चों द्वारा उसके पैरेंट्स के बारे में पूछे जाने पर वो शर्मिंदगी व अधूरापन महसूस कर सकता है. अतः बच्चे का आत्मविश्‍वास बढ़ाएं, उसे समझाएं कि किसी चीज़ से डरने की ज़रूरत नहीं है, आप हर समय उसके साथ हैं. अगर मुमक़िन हो, तो तलाक़ के बाद भी बच्चे को दूसरे पार्टनर से मिलने दें. भले ही उनकी मुलाक़ात हफ़्ते या महीने में ही क्यों न हो, पर इससे बच्चे के अकेलेपन व अधूरेपन का एहसास दूर हो जाएगा.

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11-15 साल
इस उम्र तक बच्चे समझदार हो जाते हैं. हार्मोनल बदलावों की वजह से वो किसी भी चीज़ की ओर तेज़ी से आकर्षित होते हैं. इस उम्र के बच्चे अपने माता-पिता के तलाक़ को लेकर परेशान हो जाते हैं कि आख़िर ये हो क्या रहा है? ये मेरे साथ ही क्यों हो रहा है? उम्र के इस दौर में बच्चे को इमोशनली मज़बूत बनाने के लिए माता-पिता दोनों के प्यार व मार्गदर्शन की ज़रूरत होती है. दरअसल, इस उम्र के बच्चे अपने पैरेंट्स के अलगाव को जल्दी स्वीकार नहीं कर पातें. अपने सबसे क़रीबी रिश्ते को टूटता देख उनका रिश्तों पर से विश्‍वास उठ सकता है. अक्सर देखा गया है कि माता-पिता दोनों का साथ व प्यार न मिल पाने की वजह से बच्चे ज़िद्दी बन जाते हैं. जब वो दूसरे बच्चों को अपने पैरेंट्स के साथ देखते हैं, तो उसका कोमल मन आहत हो जाता है और वो ख़ुद को अनलकी (दुर्भाग्यशाली) मानकर परेशान हो जाते हैं. शारीरिक विकास के चलते इस उम्र में लड़कियों को मां की स़ख्त ज़रूरत होती है, ऐसे में अगर उनकी कस्टडी पिता के पास है, तो अपनी भावनाओं व परेशानियों को किसी से शेयर न कर पाने की वजह से वो कुंठित हो सकती है. तलाक़ के बाद घर के तनावपूर्ण माहौल का बच्चों की पढ़ाई पर भी बुरा असर पड़ पड़ता है.

क्या करें पैरेंट्स?
बच्चे पर विशेष ध्यान दें. उनके हर प्रश्‍न का सकारात्मक उत्तर दें. उसे माता-पिता दोनों का प्यार देने की कोशिश करें, ताकि उसे आपके पार्टनर की कमी ज़्यादा न खले. मगर बिना सोचे-समझे उनकी हर डिमांड पूरी करने की ग़लती न करें, वरना वो ज़िद्दी बन जाएंगे. यह ज़रूरी है कि आप बच्चे से दोस्ताना संबंध बनाएं और उसकी बातें ध्यान से सुनें. हो सके तो उसे अपनी समस्याएं भी बताएं, लेकिन ये सब करते हुए बच्चे को ये न जताएं कि आप हालात से बेहद निराश हो चुकी हैं. आपकी बातें हमेशा सकारात्मक होनी चाहिए. साथ ही बच्चे को ऐसे संस्कार दें कि वो रिश्तों की अहमियत समझ सके. इसके अलावा अगर बच्चे को स्वीमिंग, डांसिंग, सिंगिंग या खेलों में दिलचस्पी है, तो उसे इसके लिए प्रोत्साहित करें. पढ़ाई को लेकर हर समय उसके पीछे न पड़ी रहें, लेकिन ऐसा भी न हो कि आप इस मामले में कुछ बोले ही न. आप उसके स्कूली अनुभवों को एक दोस्त की तरह सुनें और सही-ग़लत का फ़र्क समझने में उसकी मदद करें, लेकिन ध्यान रखें कि बच्चे को ऐसा न लगे कि आप ख़ुद को उस पर थोप रही हैं.

16- 20 साल
ये उम्र बेहद महत्वपूर्ण है. इस उम्र में बच्चों की एक अलग दुनिया होती है, वो अपने आनेवाले कल को संवारने की कोशिशों में लगे रहते हैं. ऐसे में पैरेंट्स का अलगाव उनके लिए पैरों तले ज़मीन खिसकने जैसा है. भविष्य के सपने संजोते, करियर को लेकर गंभीर बच्चों को तो माता-पिता का तलाक़ दुनिया उजड़ने जैसा लगता है. कई तो इस सदमे से ज़िंदगी के प्रति बिल्कुल उदासीन हो जाते हैं. घर का निराशाजनक माहौल उन्हें भी मायूस और निराश कर देता है. इतना ही नहीं तलाक़ को लेकर दोस्तों के सवाल या मज़ाक भी उन्हें परेशान करते हैं. बच्चा माता-पिता दोनों से ही दूर हो जाता है. इस हालात के लिए वो माता-पिता दोनों या किसी एक को स्वार्थी समझने लगते हैं और उनके प्रति उसके मन में नफ़रत की भावना घर कर लेती है. यानी तलाक़ स़िर्फ कपल्स को ही एक-दूसरे से अलग नहीं करता, बल्कि बच्चे को भी पैरेंट्स से दूर कर देता है.

क्या करें पैरेंट्स?
इस उम्र के बच्चों पर बिना किसी तरह का दबाव डालें उन्हें परिस्थितियों को स्वीकार करने के लिए तैयार करें. उसे समझाएं कि हर हाल में आप उसके साथ रहेंगी और आप दोनों मिलकर परिस्थितियों को बेहतर बना लेंगे. हो सके तो उसे तलाक़ की असली वजह समझाने की कोशिश करें ताकि वो आपको स्वार्थी न समझें. चूंकि इस उम्र के बच्चे हर चीज़ अच्छी तरह समझ सकते हैं, इसलिए आप उनसे अपनी समस्याएं भी डिस्कस कर सकती हैं. इस उम्र में बच्चे पढ़ाई और करियर को लेकर बेहद गंभीर होते हैं. ऐसे में उन्हें सही रास्ता दिखाना आपकी ज़िम्मेदारी है. उनके बेहतर भविष्य के लिए उन्हें नकारात्मक और तनावपूर्ण माहौल से दूर रखने की कोशिश करें. पैरेंट्स के अलगाव से परेशान बच्चे कई बार ग़लत संगत व नशे के भी आदी हो जाते हैं. अतः इस मुश्किल हालात में बच्चे का ख़ास ख़्याल रखें. उससे इस तरह पेश आएं कि वो अपने दिल की हर बात आपसे शेयर कर सके.

 

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बच्चों से जुड़ी मनोवैज्ञानिक समस्याएं (Psychological Problems Associated With Children)

Bachcho se judi manovgyani samsaye

‘चाइल्ड इज़ द फादर ऑफ मैन’ यानी एक बच्चे के मन के भीतर एक पूरा का पूरा इंसान छिपा होता है. यदि हम एक शांत व विकासशील समाज की चाह रखते हैं, तो बच्चों के मन को अशांत होने से बचाना हमारी ज़िम्मेदारी बन जाती है. मनोवैज्ञानिकों द्वारा कराए गए एक सर्वे में पाया गया कि अपने बच्चों को बुरी तरह से प्रताड़ित करनेवाले अधिकतर अभिभावक ऐसे थे, जो बचपन में अपने पैरेंट्स द्वारा उपेक्षित व पीड़ित किए गए थे. बच्चों की तमाम मानसिक परेशानियों के बारे में हमने सायकोलॉजिस्ट डॉ. माधवी सेठ से बात की. आइए, संक्षेप में जानते हैं.

बच्चों से जुड़ी कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं हैं, जैसे- एकेडैमिक मेंटल प्रॉब्लम, फिज़िकल मेंटल प्रॉब्लम, शरीर में कोई कमी, एकाग्र न होना, चिड़चिड़ापन आदि. ऐसे में यह देखना चाहिए कि बच्चे में ज़रूरी विटामिन्स जैसे बी12, बी3 पर्याप्त है या नहीं या फिर हीमोग्लोबिन की कमी तो नहीं है. यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो आज बच्चों में मिक्स प्रॉब्लम्स यानी मेंटल, एकेडैमिक, सायकोलॉजिकल, फिज़िकल- सभी का मिला-जुला रूप है.

एकैडेमिक से जुड़ी समस्याएं

पढ़ाई को लेकर बच्चों को होनेवाली समस्याओं, जैसे- तनाव, डर, असफलता की ग्लानि/आत्महत्या की प्रवृत्ति आदि को देखते हुए सरकारी शिक्षा नीति में उल्लेखनीय परिवर्तन किए गए. लेकिन इसके बावजूद छह से बारह साल तक के बच्चों की पढ़ाई को लेकर कुछ मानसिक समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं, ख़ासतौर पर अपने पैरेंट्स और टीचर्स की अपेक्षाओं को पूरा करने की कशमकश.
* 10 से 20% बच्चे कम्पटीशन के चलते इतना ज़्यादा पढ़ते हैं कि उनकी सोशल लाइफ ज़ीरो हो जाती है. इस तरह के बच्चे हमेशा टेेंशन में रहते हैं. अपने परफॉर्मेंस को लेकर, ख़ासकर जो बच्चा कई सालों से फर्स्ट आ रहा हो, तो उस पर इसे मेंटेन करने का दबाव बना रहता है. यह ज़रूरी नहीं कि जो बच्चा पहली-दूसरी कक्षा में फर्स्ट आता रहा है, वो नौंवीं में भी फर्स्ट ही आए. ब्रिलियंट स्टूडेंट्स भी उतार-चढ़ाव से गुज़रते हैं.
* ऐसे बच्चों के पैरेंट्स को उन्हें सोशल होने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. रिश्तेदार-दोस्तों से मिलने-जुलने के लिए प्रेरित करना चाहिए.
* बच्चों को भी पढ़ाई के अलावा दूसरी बातों के लिए थोड़ा स्पेस दें.
* टाइम टेबल बनाना अच्छी बात है, पर उसमें आधा से ज़्यादा समय पढ़ाई और कुछ देर ही मनोरंजन के लिए हो, यह ठीक नहीं है. * बच्चे के लिए पढ़ाई बहुत ज़रूरी है, बस ज़रूरत है बच्चों के दिलो-दिमाग़ में उसके प्रति दिलचस्पी और लगाव पैदा किया जाए.
* कई स्कूलों में बिहेवियर प्रॉब्लम्स, एकेडैमिक प्रॉब्लम्स, स्लो लर्नर आदि समस्याओं से जुड़े बच्चों के लिए क्लासेस व प्रोग्राम कराए जाते हैं.

शारीरिक समस्याओं को नज़रअंदाज़ न करें

जो बच्चे पढ़ने में कमज़ोर होते हैं, उन्हें पैरेंट्स के ताने-उलाहने सुनने पड़ते हैं, जिससे वे तनाव और हीनभावना से भी ग्रस्त हो जाते हैं. हो सकता है बच्चे को लर्निंग डिसएबिलिटी की समस्या हो या फिर एडीएचडी (अटेंशन डिफिट हायपरएक्टविटी डिसऑर्डर) या एडीडी (अटेंशन डिफिट डिसऑर्डर) की समस्या हो. पैरेंट्स-टीचर्स को बच्चे की इस समस्या को समझने की कोशिश करनी चाहिए.
* ऑटिज़्म बीमारी भी दिमाग़ी तंत्र से जुड़ी है. इससे ग्रस्त बच्चे का संवेदी तंत्र अव्यवस्थित होता है, जिससे वो सामान्य बच्चों की तरह नहीं रहता. इन बच्चों को भी विशेष देखभाल, प्यार और प्रोत्साहन की ज़रूरत होती है.
* एसपर्जर, यह ऑटिज़्म का ही माइनर प्रॉब्लम है. इसमें बच्चा आई कॉन्टेक्ट कम रखता है, कम बोलता व सुनता है. केवल हां-ना में ही अधिक बात करता है. कभी-कभी तो ज़िंदगीभर इसका पता ही नहीं चलता है, जिसकी वजह से पैरेंट्स कोई ट्रीटमेंट भी नहीं करवा पाते हैं. लेकिन समय रहते मालूम होने पर इसका इलाज संभव है. फिर भी इस समस्या को बहुत कम लोग ही समझ पाते हैं.
* व़क्त के साथ लड़कियों के प्यूबर्टी पीरियड में बदलाव आया है. अब 6-7 कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते लड़कियों को पीरियड होने लगते हैं. ऐसे में पैरेंट्स के लिए इसे डील करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है. लड़कियां भी अपने शरीर के इस बदलाव को लेकर कई बार तनावग्रस्त और हताश-परेशान हो जाती हैं.
* बेटियों के पैरेंट्स ख़ासकर मांएं बेसिक हार्मोंनल चेंजेस, पीरियड्स होने के कारण और केयर, सुरक्षित रख-रखाव आदि के बारे में उन्हें बताएं और समझाएं. बेटियों किो समझाएं कि इन बातों को वे जितनी सहजता से लेंगी, उतना ही रिलैक्स और तनावमुक्त रहेंगी.

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बिहेवियर प्रॉब्लम्स

आज बच्चों के बीच बिहेवियर इश्यू सबसे बड़ी मनोवैज्ञानिक समस्या बन गई है. एक ज़माना था, जब कई बच्चे होते थे और छोटों के लिए उनके बड़े भाई-बहन भी रोल मॉडल हुआ करते थे, पर अब एकल परिवार और एक ही बच्चा पालने की प्रवृत्ति ने बहुत कुछ बदल दिया है.

बच्चों का आक्रामक होनाः बच्चों के लिए आक्रामक व्यवहार उनकी इच्छापूर्ति का साधन होता है. उनमें धैर्य की कमी होती है. बच्चे को अपने आवेश पर नियंत्रण करना सिखाएं और उसे अपनी भावनाओं को शारीरिक माध्यम के स्थान पर शब्दों में अभिव्यक्त करने के लिए समझाएं. उसे समझाएं कि इस प्रकार उसके मित्र भी अधिक बनेंगे.
* बच्चे से धैर्य से बात करें और उसके असामान्य व्यवहार के कारणों को जानने की कोशिश करें. हो सकता है वो ख़ुद को असुरक्षित अनुभव कर रहा हो. आपका प्यार-दुलार उसकी मानसिक पीड़ा को शांत करेगा.
* हाइपर चाइल्ड है, तो हर रोज़ घर से बाहर, बगीचे या खेल के मैदान में ले जाएं. जहां वह पूरी आज़ादी से खेल सके, भागदौड़ सके.

ज़िद करनाः बच्चों को अपनी परिस्थिति से अवगत कराएं. उन्हें मॉरल वैल्यू के बारे में शुरू से समझाएं, क्योंकि इसी से अच्छे व्यक्तित्व की नींव बनती है. जब बच्चे बहुत छोटे होते हैं, तब शौक़ और ख़ुशी के चलते अभिभावक बच्चों की हर सही-ग़लत मांग पूरी करते जाते हैं, ऐसा न करें. इसी से थोड़ा बड़ा होने पर उसे शह मिलती है और वो अपनी बात को मनवाने के लिए ज़िद का सहारा लेने लगता है.

झूठ बोलनाः बच्चे के टीचर्स से मिलकर उसकी झूठ बोलने की आदत के बारे में बात करें. कहीं पैरेंट्स या टीचर्स की सख़्ती और मार के डर से तो बच्चा झूठ नहीं बोल रहा. बच्चे के झूठ बोलने पर सज़ा देने की बजाय प्यार से झूठ बोलने के कारणों के बारे में जानने की कोशिश करें. यदि पैरेंट्स बच्चों को खुला और स्वस्थ माहौल दें, तो बच्चे शायद ही झूठ बोलें.

डरपोक और दब्बू होनाः अक्सर पैरेंट्स द्वारा बचपन में बच्चों को भूत-अंधेरे आदि का डर दिखाया जाता है. ये सभी बातें उनके अंतर्मन में कहीं न कहीं गहराई तक पैठ जाती हैं. वे नहीं जानते कि ऐसा करके जाने-अनजाने में वे अपने बच्चे का आत्मविश्‍वास कमज़ोर कर रहे हैं. ऐसा न करें. बेहतर होगा कि पैरेंट्स बच्चों के साथ एडवेंचर्स से भरपूर गेम्स खेलें. बहादुर और प्रेरणास्त्रोत महान लोगों की क़िस्से-कहानियां सुनाएं. यदि ज़रूरत हो, तो पर्सनैलिटी इम्प्रूवमेंट क्लास या फिर काउंसलर की मदद लेने से भी न हिचकें.

चोरी करना या चीज़ों को बिना बताए उठानाः चीज़ों को बिना पूछे उठा लेना यानी अप्रत्यक्ष रूप से चोरी करना आदि. कई बच्चे अनजाने में ऐसा करते हैं. इसे क्लेटो मेनिया कहते हैं. इसमें ज़रूरी नहीं कि बच्चा क़ीमती चीज़ें ही उठाए, वो ढेर सारे पेन-पेंसिल आदि भी उठा सकता है.
जब बच्चा पहली बार चोरी करे, तो शांत रहें. आकलन करें और चोरी का कारण ढूंढ़ें. बच्चे की मानसिक अवस्था को समझते हुए अच्छे उदाहरणों और प्यार से हैंडल करने पर बच्चा अपनी ग़लतियों में ज़रूर सुधार करेगा.
आईएमसी लेडीज़ विंग की प्रेसिडेंट लीना वैद्य का मानना है कि आज के दौर में बच्चे असुरक्षित माहौल, ज़िंदगी से अधिक महत्वाकाक्षांओं की उड़ान, थकान, तनाव आदि के साथ पल-बढ़ रहे हैं. नए-नए वीडियो गेम्स, प्ले स्टेशन ने उनकी आउटडोर एक्टिविटी़ज़, आउटडोर गेम्स आदि को भी कम कर दिया है. उस पर पढ़ाई व उनके पर्सनैलिटी से जुड़े अलग-अलग क्लासेस में भी वे उलझे रहते हैं. ऐसे में बच्चे सहजता से जीना नहीं सीख पाते, बल्कि हर समय प्रतिद्वंद्विता, पाने और आगे बढ़ने की होड़ के लिए ट्रेन्ड होते रहते हैं. इन सभी से बच्चे के अधिक दोस्त नहीं बन पाते और वे अकेलेपन से जूझते रहते हैं. इस तरह मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें, तो ऐसे बच्चे दूसरों के साथ सहनशील होना और सामंजस्य बैठाना नहीं सीख पाते हैं. यदि पैरेंट्स अपने एटिट्यूड में थोड़ा-सा बदलाव लाएं, तो इसमें काफ़ी मदद मिल सकती है. पैरेंट्स अपने बच्चे की अन्य बच्चे से तुलना करने की बजाय उसमें मौजूद गुणों को प्रोत्साहित करें, बिना शर्त अपना प्यार-स्नेह लुटाएं, तो यक़ीनन बच्चे आत्मविश्‍वासी बनेंगे और ज़िंदगी की हर चुनौती का डटकर सामना करेंगे. साथ ही फिज़िकली, मेंटली और इमोशनली ख़ुशमिज़ाज इंसान भी बन सकेंगे.

एक्सपोज़र से उभरती सेक्सुअल समस्याएं

इन दिनों पांचवीं-छठी क्लास के बच्चों में इंटरनेट पर अश्‍लील चीज़ों को देखने जैसी समस्याएं भी उभरकर आने लगी हैं. माना पढ़ाई और व़क्त की मांग के चलते नेट सर्फिंग करना, कंप्यूटर आदि बच्चों के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है, पर इसमें कुछ बच्चे जहां 25 चीज़ें काम की देखते हैं, तो 26 वीं ग़लत व अश्‍लील भी होती है. कई बार पोर्नोग्राफी देख उनमें एक्सपेरिमेंट की चाह बढ़ती है. लर्निंग डिसएबिलिटी पनपती है. ऐसे में सेक्स एजुकेशन ज़रूरी हो जाता है. साथ ही बच्चों को यह भी समझाया जाए कि क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं. काउंसलर्स का कहना है कि उनके यहां तीसरी-चौथी के बच्चों के केस आते हैं, जो स्कूल में टॉयलेट में अधिक जाते हैं, जहां वे अपने प्राइवेट पार्ट्स से खेलते हैं. मास्टरबेशन करते हैं आदि. यदि छह महीने का बच्चा अपने पेनीस से खेलता है, तो यह एक नॉर्मल बात है. लेकिन 7-8 साल का बच्चा करें, तो एब्नॉर्मल समझा जाता है. इसलिए पैरेंट्स अपने बच्चों के बिहेवियर पर भी बारीक़ी से नज़र रखें, क्योंकि ऐसे समय में उन्हें अपनों के सही मार्गदर्शन की सख़्त ज़रूरत होती है, ताकि सेक्स को लेकर भी उनका विकास सामान्य हो, मन में ग़लत बातें व ग्रंथियां न पनपें.

– ऊषा गुप्ता

 

अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करें – Parenting Guide 

होमवर्क हेडेक से कैसे बचें? (How to get rid of homework pressure?)

 

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बच्चों को होमवर्क कराना पैरेंट्स के लिए किसी सिरदर्द से कम नहीं होता, क्योंकि एक तरफ जहां बच्चे होमवर्क के महत्व से अनजान होते हैं, वहीं होमवर्क न करने पर बच्चे क्लास में पीछे न रह जांए, इस बात से पैरेंट्स भी परेशान रहते हैं. अगर आप होमवर्क कराने से पहले बच्चे का मूड, होमवर्क का टाइम, स्टडी रूम का माहौल आदि बातों का ध्यान रखें, तो ये काम आसान हो सकता है. कैसे? आइए जानते हैं.

 

घर का साइलेंस ज़ोन चुनें

* बच्चे को होमवर्क कराने के लिए कोई ऐसा कमरा चुनें, जहां आने जाने वालों की संख्या कम हो टीवी या कंप्यूटर न चल रहा हो.

* इससे आप बिना किसी डिस्टर्बेंस के बच्चे को पढ़ा सकेंगी और बच्चे का भी पूरा ध्यान होमवर्क में ही लगेगा.

हेल्प करें, होमवर्क नहीं

* होमवर्क करते हुए बच्चे को गाइड करना आपकी ड्यूटी है.

* अत: आप उन्हें केवल गाइड करें, उनका होमवर्क ख़ुद न करें.

* कई बार पैरेंट्स बच्चों को पढ़ाते हुए उनका होमवर्क ख़ुद ही कंप्लीट कर देते हैं.

* ऐसा करने से बच्चे आलसी और पढ़ाई के प्रति लापरवाह होने लगते हैं.

प्यार से कराएं होमवर्क

* होमवर्क करते-करते कई बार बच्चे बोर होने लगते हैं और उनमें चिड़चिड़ापन आ जाता है. \

* ऐसी स्थिति में अपना भी मूड ऑफ़ न होने दें.

* सुलझे दिमाग़ से काम लें और बच्चे को उसकी पढ़ाई में होमवर्क का महत्व समझाएं.

होमवर्क को सेक्शन में डिवाइड करें

* यदि आपके बच्चे का होमवर्क ज़्यादा है, तो उसे सब्जेक्ट या सेक्शन वाइज़ कुछ हिस्सों में बांट लें.

* हर सेक्शन का वर्क ख़त्म करने के बाद बच्चे को कुछ देर का ब्रेक दें.

* ऐसे में बच्चे होमवर्क के हर पार्ट को फ्रेश मूड से एंजॉय करते हैं.

टाइम मैनेजमेंट

होमवर्क के लिए ऐसा समय तय करें, जिसमें आप और बच्चा दोनों कंफर्टेबल हों.

* ध्यान रहे कि ये टाइम आपके स्ट्रेस लेवल को बढ़ाने वाला न हो यानी ऐेसा समय न चुनें जब आप ऑफ़िस से तुरंत लौटती हों या बच्चा स्कूल से लौटते हो.

* नियमित रूप से इसी समय होमवर्क कराने की कोशिश करें.

अपने काम को भी महत्व दें

बच्चे को होमवर्क कराते समय अपने निजी कामों को नज़रअंदाज न करें.

* बच्चे को पूरा होमवर्क कराने के बजाय स़िर्फ उसके कठिन प्रश्‍नों को हल करने में मदद करें.

पढ़ाई के दौरान उसकी परेशानियों को दूर करके अपने काम में व्यस्त हो जाएं.

* बीच-बीच में उसे नोटिस ज़रूर करते रहें.

ट्यूशन भी है ऑप्शन

* आपके पास समय की कमी हो, तो बच्चे को ट्यूशन भेज सकती हैं.

* ट्यूशन ज्वाइन कराने से पहले टीचर को बच्चे के वीक प्वाइंट्स बताएं, ताकि वे बच्चे की अधिक मदद कर सकें.

* बच्चे का होमवर्क नियमित रूप से चेक करें और उसकी पढ़ाई पर हमेशा निगरानी रखें.

– रेषा गुप्ता

अपने बच्चे को बनाएं सोशली एक्टिव (How to make your child socially active?)

 

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बच्चे को सोशल बनाने के लिए बातचीत की कला, भावनात्मक संयम और इंटरपर्सनल स्किल आदि गुणों की ज़रूरत होती है. इन गुणों को विकसित करने की ज़िम्मेदारी पैरेंट्स की होती है, लेकिन पैरेंट्स के सामने अहम् समस्या यह होती है कि इन गुणों को किस तरह से विकसित किया जाए? हम यहां पर कुछ ऐसी ही महत्वपूर्ण बातें बता रहे हैं, जिन्हें ध्यान में रखकर आप अपने बच्चे को बना सकते हैं सोशली एक्टिव.

चाइल्ड डेवलपमेंट एक्सपर्ट्स के अनुसार, बच्चे जन्म से ही सामाजिक होते हैं. उनमें प्राकृतिक रूप से सामाजिक होने का गुण होता है, इसलिए उनका सबसे पहला सोशल इंटरेक्शन अपने माता-पिता से होता है, जो उनके लिए इमोशनल कोच की भूमिका अदा करते हैं. यही इमोशनल फीलिंग्स बच्चों में भावनात्मक संयम और बातचीत करने की कला विकसित करती है, जो उन्हें सोशल बनाने में मदद करती है. इसलिए-

शुरुआत जल्दी करें

बच्चों को अलग-अलग तरह की एक्टिविटीज़ और खेलों में शामिल करें. वहां पर आपका बच्चा अपने हमउम्र बच्चों के साथ कंफर्टेबल महसूस करेगा. इन एक्टिविटीज़ और खेलों को बच्चा एंजॉय करेगा और दूसरे बच्चों के साथ उसका इंटरेक्शन भी होगा. इस दौरान वह अपने को स्वतंत्र महसूस करेगा, जिसके कारण बच्चे का सामाजिक विकास तेज़ी से होगा.

इंडोर की बजाय आउटडोर गेम्स को महत्व दें

बच्चे को खिलौनों में व्यस्त रखने की बजाय आउटडोर गेम्स खेलने के लिए प्रोत्साहित करें. आउटडोर गेम्स खेलते हुए वह अन्य बच्चों के संपर्क में आएगा और नई-नई बातें सीखेगा, जिससे बच्चे के सामाजिक और मानसिक विकास में वृद्धि होगी.

शेयरिंग की भावना जगाएं

एक्टिविटीज़/खेलों के दौरान अपने बच्चे को खिलौने या फूड आइटम्स आदि चीज़ों को शेयर करने को कहें. उसे शेयरिंग का महत्व समझाएं.

मैनर्स-एटीकेट्स सिखाएं

बच्चों को एक्टिविटीज़ में व्यस्त रखने के साथ-साथ ‘प्लीज़’, ‘सॉरी’ और ‘थैंक्यू’ जैसे बेसिक मैनर्स और एटीकेट्स भी सिखाएं. पार्टनर्स जिस तरह से आपस में बातचीत करते हैं, बच्चे भी अपने फ्रेंड्स के साथ उसी तरी़के से बात करते हैं.

अधिक से अधिक संवाद करें

शोधों में भी यह बात साबित हुई है कि जो पैरेंट्स अपने बच्चों के साथ बहुत अधिक बातचीत और विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, उन बच्चों का सामाजिक विकास तेज़ी से होता है. समय के साथ-साथ उन बच्चों में बेहतर बातचीत करने की कला भी विकसित होती है. पैरेंट्स को भी चाहिए कि वे बच्चों के साथ हमेशा आई-कॉन्टैक्ट करते हुए बातचीत करें. जब भी बच्चे दूसरे लोगों से बातें करें, तो उनकी बातों को ध्यान से सुनें.

भावनात्मक तौर पर मज़बूत बनाएं

बड़े लोगों की तरह छोटे बच्चों में भी नकारात्मक विचार और स्वार्थी प्रवृति/इच्छाओं का होना आम बात है, इसलिए पैरेंट्स का सबसे पहला और महत्वपूर्ण काम है कि वे बच्चे में नकारात्मकता को हावी न होने दें. बच्चे के साथ बातचीत करते हुए उसके विचारों व इच्छाओं को जानने का प्रयास करें और उसकी भावनाओं की कद्र करें.

निगरानी करें, मंडराएं नहीं

हैलीकॉप्टर टाइप पैरेंट्स बनने का प्रयास न करें. टीनएजर बच्चों पर पैनी नज़र रखें, लेकिन हर समय उनके आसपास मंडराने की कोशिश न करें. पैरेंट्स को समझना चाहिए कि बच्चों को भी स्पेस की ज़रूरत होती है. उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनमें समझदारी भी आने लगती है. ज़्यादा रोक-टोक करने की बजाय उन्हें अपने निर्णय लेने दें, बल्कि निर्णय लेने में उनकी मदद भी करें. जो पैरेंट्स अपने बच्चों के आसपास मंडराते रहते हैं, वे अपने बच्चों में सोशल स्किल को डेवलप नहीं होने देते.

बदलें अपना पैरेंटिंग स्टाइल

जिन अभिभावकों के पैरेंटिंग स्टाइल में नियंत्रण अधिक और प्यार कम होता है, उनके बच्चे अधिक सोशल नहीं होते. अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि जो पैरेंट्स दबंग क़िस्म के होते हैं, उनके बच्चों का स्वभाव अंतर्मुखी होता है और इनके दोस्त भी बहुत कम होते हैं. ऐसे पैरेंट्स अपने बच्चे को बातचीत के दौरान हतोत्साहित करते हैं और कई बार तो सज़ा देने से भी नहीं चूकते. समय के साथ-साथ ऐसे बच्चे अनुशासनहीन, विद्रोही और अधिक आक्रामक हो जाते हैं.

कुछ ज़रूरी बातें
– बाहरी दुनिया के संपर्क में आने से बच्चा सोशल तो बनता है, लेकिन ध्यान रखें कि कहीं बच्चा बुलिंग का शिकार तो नहीं हो रहा है.
– समय-समय पर बच्चे की सोशल लाइफ को मॉनिटर करें यानी उसके दोस्तों के बारे में पूरी जानकारी रखें.
– बाहरी लोगों के फेशियल एक्सप्रेशन समझने में बच्चों की मदद करें.
– पूनम नागेंद्र शर्मा

बच्चों की ग़लतियों पर पर्दा न डालें (Do not ignore your children’s mistakes)

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अपने बच्चे सभी को प्यारे होते हैं. उसकी हर हरकत, हर बात माता-पिता को अच्छी लगती है और कई बार तो लाड़-प्यार के कारण वे अपने बच्चों की ग़लतियों को भी नज़रअंदाज़ कर देते हैं, बगैर यह सोचे कि यह उनके भविष्य के लिए कितना नुक़सानदायक हो सकता है. कहीं आप भी तो ये ग़लती नहीं कर रहे हैं?children

 

फटी कमीज़, धूल से सना शरीर और नाक से बहता हुआ ख़ून. अपने सात वर्षीय बेटे गौतम की ऐसी हालत देखते ही सपना समझ गई कि यह सब सोनू की करतूत है. अपने रोते हुए बच्चे का हाथ पकड़ कर जब सपना सोनू की मां के पास उसकी शिकायत करने पहुंची तो उल्टे वह अपने बदमाश बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “मेरा सोनू ऐसा नहीं है, ज़रूर शुरुआत तुम्हारे बेटे ने ही की होगी.”
जबकि पूरी बिल्डिंग के लोग जानते हैं कि सोनू बहुत शैतान और झगड़ालू क़िस्म का बच्चा है. फिर भी जब भी कोई उसकी शिकायत लेकर उसकी मां के पास जाता, वह फौरन अपने बच्चे की ग़लती को ढंकने की कोशिश करती. किन्तु एक दिन जब पैसा न देने पर सोनू ने अपनी ही मां का पेपर वेट से सिर फोड़ दिया तो उसके होश ठिकाने आ गए.
यूं तो हर माता-पिता को अपने बच्चे सर्वश्रेष्ठ लगते हैं, फिर भी हर बच्चे में कुछ न कुछ कमी तो होती ही है. वैसे भी बच्चे शरारती होते हैं, ख़ासतौर पर लड़के. किन्तु बहुत-सी मांएं ऐसी होती हैं, जिन्हें अक्सर अपने बच्चों की कमियां नज़र नहीं आतीं. अगर नज़र आती भी हैं तो वे उन्हें नज़रअंदाज़ कर देती हैं. वहीं कुछ मांएं ऐसी भी होती हैं, जिन्हें अपने बच्चों की कमियां या ग़लतियां नज़र आती तो हैं, पर वे उस पर पर्दा डालने की कोशिश करती हैं.

बच्चे तो आख़िर बच्चे हैं

कहते हैं, बच्चे तो गीली मिट्टी जैसे होते हैं. उनके अभिभावक उन्हें जैसा चाहें, गढ़ सकते हैं. कुछ हद तक यह बात सही भी है. शुरुआत में बच्चों में इतनी समझ नहीं होती है कि वे सही और ग़लत में फ़र्क़ कर सकें. जब वे कुछ ग़लत करते हैं तो ये अभिभावक का कर्त्तव्य होता है कि वे उसे समझाएं कि वह जो कर रहा है, वह ग़लत है. साथ ही उन्हें यह भी बताना ज़रूरी है कि सही क्या है, क्योंकि जब तक बच्चे के ग़लत व्यवहार पर उसे टोका नहीं जाता, तब तक वह सोचता है कि वह जो कर रहा है, वह सही है और उसे आगे भी दोहराता रहता है.

ग़लतियों को नज़रअंदाज़ न करें

लंदन की एक दुकान पर जब एक सभ्रांत महिला चोरी करती हुई पकड़ी गई तो उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उसने बताया, “जब मैं बहुत छोटी थी तो आदतन अपने सहपाठियों की पेंसिल, रबर, खिलौने और बुक्स चुरा कर घर लाती थी और मेरे अति व्यस्त माता-पिता मेरी हर ग़लती को देख कर भी अनदेखा कर देते थे. उन्होंने मुझे कभी इसके लिए टोका नहीं तो मुझे लगा कि चोरी करने में कोई बुराई नहीं है. आज मेरे पास किसी भी चीज़ की कमी नहीं है, किन्तु मैं अपनी इस आदत को छोड़ नहीं पाई हूं.”
बचपन में माता-पिता द्वारा बरती गई इस तरह की लापरवाही अक्सर आगे चलकर बच्चों को अपराधी बना देती है. सब कुछ होते हुए भी चोरी करने की इस आदत को मनोवैज्ञानिक ‘पिक पॉकेटिंग’ समस्या बताते हैं.

पूर्वाग्रही न बनें

अक्सर पूर्वाग्रहों से ग्रस्त माता-पिता दूसरों के बच्चों में तो कमियां ढूंढ़ लेते हैं, किन्तु अपने बच्चों में उन्हें कोई दोष नज़र नहीं आता. शिखा ने जब अपनी भाभी से कहा कि उसका बेटा बात-बात पर गालियां देता है तो वह तुनक गई, “मेरा मनु तो गालियां देना जानता ही नहीं. ज़रूर उसने तुम्हारे बेटे से ही सीखी होंगी ये गंदी आदतें.”
इसी तरह दस साल के विकी को जब उसकी पड़ोसन ने अपने पापा की सिगरेट पीते हुए पकड़ा तो उसकी मां यह मानने को तैयार ही नहीं हुई कि उसका बच्चा ऐसी हरकत कर सकता है. उसने उल्टे अपनी पड़ोसन को ही डांट दिया कि वह झूठ बोल रही है.
वास्तव में एक बच्चे के लिए तो सारी दुनिया ही रहस्यमय होती है. वह रोज़ एक नई चीज़ सीखता है और नए-नए अनुभव प्राप्त करना चाहता है. ऐसे में अभिभावकों को चाहिए कि वे देखें कि उनका बच्चा जो सीख रहा है, वह ग़लत है अथवा सही.

व्यस्तता में भी बच्चों के लिए समय निकालें

आज के भौतिकवादी युग में अधिक पैसा कमाने की होड़ में अक्सर अभिभावक इतने व्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें अपने बच्चों की देखभाल तक का समय नहीं मिल पाता. अठारह वर्षीय रोनित को जब बेहोशी की हालत में अस्पताल में भर्ती किया गया तो उसके करोड़पति माता-पिता डॉक्टर से अपने बच्चे की ज़िन्दगी के लिए गिड़गिड़ा रहे थे. बिज़नेस और क्लब पार्टीज़ के शौक़ीन साहनी दम्पति के इकलौते बेटे रोनित का बचपन आया और नौकरों के बीच ही बीता था. दिन-रात उन्हीं के बीच उठते-बैठते उसे तम्बाकू और फिर धीरे-धीरे ड्रग्स की लत लग गई. जब कभी साहनी दम्पति के कोई शुभचिंतक अथवा रोनित के शिक्षक उसकी ग़लत आदतों की चर्चा करते तो वे लापरवाही से झिड़क देते, “हमारा बाबा ऐसा नहीं है, आपको ज़रूर कोई ग़लतफ़हमी हुई होगी.” अभिभावकों की लापरवाही और अपने प्रति बरती गई उदासीनता ने अंत में रोनित को ड्रग एडिक्ट बना दिया.
इस तरह एक नहीं, अनेक उदाहरण अपने आस-पास मिल जाते हैं, जहां माता-पिता की अपनी लापरवाहियों और कमियों की वजह से बच्चों का भविष्य दांव पर लग जाता है. अक्सर अभिभावक अपने बच्चों की किसी ग़लत आदत को यह सोच कर भी नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि अभी तो यह बच्चा है, बाद में सुधर जाएगा. किन्तु वे भूल जाते हैं कि सद्व्यवहार और अच्छे आचरण की नींव बचपन में ही पड़ती है.

प्यार और समझदारी से काम लें

कभी भी अपने बच्चों की ग़लतियों अथवा कमियों को अनदेखा न करें. किन्तु यह भी बहुत ज़रूरी है कि यदि आपके बच्चे से कोई ग़लती हो रही है तो उसे दूसरों के सामने न तो डांटें और न ही प्रताड़ित करें. दिल्ली स्थित इन्स्टीट्यूट ऑफ़ ह्यूमन बिहेवियर एंड एप्लाइड साइंस के मनौवैज्ञानिक डॉ. उदय कुमार सिन्हा के अनुसार, “बच्चों को डांटने अथवा मारने से उनकी भावनाएं दमित होती हैं और विचार कुंठित होते हैं, अतः उन्हें प्यार से समझाना और सुधारना चाहिए.”
अक्सर कुछ अभिभावक लाड़-दुलार की वजह से भी बच्चों की ग़लतियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं. वे उसकी तोड़-फोड़ करने अथवा मारपीट की आदत को टालते रहते हैं. किन्तु इस तरह बच्चों को बढ़ावा मिलता है और वे ज़िद्दी और उद्दंड होते चले जाते हैं. लखनऊ के मनोवैज्ञानिक डॉ. एस. नायडू के अनुसार, “बच्चों के साथ न अधिक प्यार और न अधिक ग़ुस्से का बर्ताव करें. एक संतुलित व्यवहार ही बच्चों को अच्छा इंसान बना सकता है.”
कहते हैं, बच्चों की पहली पाठशाला मां होती है. घर से ही उसकी शिक्षा की शुरुआत होती है. इसलिए बच्चे को अच्छे संस्कार देने की ज़िम्मेदारी भी माता-पिता की ही होती है. उसे अच्छा या बुरा इंसान बनाना भी आप पर ही निर्भर करता है. आप चाहें तो समझदारी, संतुलित व्यवहार और उचित देखभाल से अपने बच्चों को एक अच्छा इंसान बना सकते हैं. अतः उसकी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ नहीं, बल्कि नज़र में रखें और दूर करने की कोशिश करें.

– गीता सिंह

बचें इन ३० पैरेंटिंग मिस्टेक्स से

ना तो कोई पैरेंट परफेक्ट होता है, ना हर बच्चा आदर्श होता है. हां हर पैरेंट की ये ख़्वाहिश ज़रूर होती है कि उनका बच्चा दुनिया का सबसे अच्छा बच्चा हो, बड़ा होकर खूब नाम कमाए, उसे ज़िंदगी की हर ख़ुशी मिले. इस चक्कर में वे कभी बहुत ज़्यादा उदार हो जाते हैं तो कभी बहुत ज़्यादा सख़्त और कई ग़लतियां भी कर बैठते हैं. यहां हम कुछ ऐसी ही ग़लतियों पर चर्चा कर रहे हैं, जो अक्सर पैरेंट्‌स कर बैठते हैं और जिसका बच्चे के मन पर बुरा असर होता है.

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१. अपना पैरेन्टल अधिकार बनाए रखें: भले ही बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करें, लेकिन सीमा ज़रूर निर्धारित करें. शेयरिंग, केअरिंग, हंसने-खेलने में उनका रोल भी समान होना चाहिए, किंतु पथ-प्रदर्शन, शिक्षा, सुरक्षा व अनुशासन आपकी ज़िम्मेदारी है.

२. खिलौना हो या पुस्तक- स्वतंत्रता हो या जिम्मेदारी- न उसे समय से पहले दें, न ज़रूरत से ज़्यादा, ताकि वो चीज़ों व भावनाओं की कद्र करना जाने.

३. बच्चों से यदि कोई वादा किया है तो उसे निभाएं ज़रूर. कभी-कभी पैरेंट्‌स को समय नहीं मिल पाता और वो चाहते हुए भी उसे समय पर नहीं निभा पाते हैं. ऐसे में बच्चा आपको झूठा समझ लेता हे.

४. हर बात में नुक्ताचीनी न करें. वो आपसे भले ही कुछ न कहें, लेकिन अपनी मित्रमंडली में दूसरों को टोकना, छेड़ना या बुली करना उनका स्वभाव बन सकता है.

५. उनके डर का मज़ाक न बनाएं. कोई बच्चा अंधेरे से डरता है, कोई प्लास्टिक की छिपकली से तो कोई पेड़ की टहनी से. उनके डर का मज़ाक न उड़ाएं, ना ही बार-बार उस स्थिति में उसे ले जाएं, जिससे वो डर रहा है.

६. अपने बच्चों को लेकर बहुत अधिक महत्वाकांक्षी न बनें. अक्सर माता-पिता की महत्वाकांक्षा पर खरे न उतर पाने पर बच्चे कुंठाग्रस्त हो जाते हैं और आत्महत्या जैसे मामले सामने आते हैं.

७. बच्चों के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों की अनदेखी न करें. पैरेंन्टस की लापरवाही एक ओर बच्चों को गैर ज़िम्मेदार बनाती है तो दूसरी ओर मनमाना रवैया अपनाने में उसे देर भी नहीं लगती.

८. उनकी बातों को ध्यान से सुनें. हमारी इंडियन फैमिलीज़ में इसे ज़्यादा ज़रूरी नहीं समझा जाता. ज़्यादातर पैरेंट्‌स बोलते हैं और बच्चे उनकी हर बात सुनते हैं, किंतु चाइल्ड सायकोलॉजिस्ट का कहना है कि बच्चे को अपनी बात कहने का मौका दिया जाना चाहिए और उसे ध्यान से सुना भी जाना चाहिए. इस प्रकार बच्चे को दिशा देना आसान हो जाता है.

९. हर व़क़्त उन्हें अनुशासन के दायरे में न रखें, ना ही एक दिनचर्या बनाकर उसका अनुसरण कराएं. इस तरह बच्चे की अपनी रचनात्मकता तथा व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता.

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१०. दायरा संकुचित न करें. बच्चे को जितना अधिक एक्सपोज़र या खुलापन मिलेगा, वो जितनी ज़्यादा दुनिया देखेगा, जितनी ज़्यादा पुस्तकें पढ़ेगा, उतना ही ज़्यादा मानसिक विकास होगा.
११. पॉकेटमनी देने के बाद यह आशा न करें कि वह आपकी मर्ज़ी के मुताबिक ख़र्च करे. हां पैसे की क़ीमत, प्राथमिकताएं और बचत अवश्य समझाएं.

१२. उम्र के फासले या जेनरेशन गैप को लेकर विचारों में टकराव न आने दें. हमेशा ही पीढ़ियों के अंतर के कारण बदलते समय के साथ विचार भी बदल जाते हैं. देखना ये है कि समय और परिस्थिति के साथ किसके विचार सही हैं.

१३. संकोची बच्चे को बार-बार संकोची न कहें और न ही उसके व्यवहार की दूसरों के सामने चर्चा करें, वरना बच्चा और भी संकोची हो जाएगा. उसके प्रति हमेशा प्रेरणात्मक रवैया अपनाएं.

१४. बच्चों के दोस्तों की आलोचना न करें, ख़ासकर किशोर बच्चों के मित्रों की. १५. बच्चों की ज़िद को उनका स्वभाव न समझें. ज़िद करना बाल सुलभ स्वभाव है. आपके समझदारीपूर्ण रवैये से ये यह आदत स्वत: ही बदल जाएगी.

१६. बच्चों के सामने तर्क, कुतर्क या अपशब्दों का प्रयोग कभी न करें. इस तरह उनमें असुरक्षा की भावना पैदा होने लगती है और वो घर से बाहर मित्रों या मित्र परिवार के बीच समय गुज़ारना पसंद करने लगते हैं. प़ढ़ाई के प्रति कॉन्सेंट्रेशन भी कम होने लगता है.

१७. ख़ुद को इतना व्यस्त न करें कि बच्चों के लिए समय ही न हो. बच्चों के विकास और दिनचर्या में शामिल होना भी बच्चों के संपूर्ण विकास का हिस्सा है.

१८. बच्चों के सामने झूठ न बोलें और यदि झूठ बोलना ही पड़ा है तो आगे-पीछे उसकी वजह बताएं और उसे विश्‍वास दिलाएं कि अगली बार आप सच्चाई के साथ परिस्थिति का सामना करेंगी.

१९. बच्चों को अपने संघर्ष की कहानी सुनाकर उनके साथ अपनी तुलना न करें. यदि आप संपन्न हैं तो उन्हें ख़ुशहाल बचपन दें. आपका संघर्ष उनकी प्रेरणा बन सकता है.

२०. पढ़ाई को लेकर ताने न मारें. बेहतर होगा, उनकी टीचर्स से संपर्क करें. कक्षा में ज़्यादा अंक प्राप्त करनेवाले बच्चे से उसकी तुलना न करें.

२१. पीयर प्रेशर(दोस्तों की देखादेखी) को अनदेखा न करें. इससे बच्चों में कॉम्प्लेक्स आ सकता है.

२२. बच्चों को अपने आपसी झगड़ों के बीच इस्तेमाल न करें और न ही फैमिली पॉलिटिक्स की चर्चा करें. इसका बच्चे के दिलोदिमाग पर बुरा असर हो सकता है.

२३. बच्चों की जिज्ञासा की अवहेलना न करें. बच्चे नई चीज़ छूना या देखना चाहते हैं. बड़ों के बीच होनेवाले वार्तालाप में अचानक ही प्रश्न कर बैठते हैं. ऐसे में उन्हें डांट कर चुप करा देने की बजाय उन्हें सही तरीका बताएं.

२४. हर उम्र में बच्चों से समान व्यवहार की अपेक्षा न करें. कल तक बच्चा आपकी हर बात मानता रहा है, लेकिन हो सकता है कि आज उसी बात के लिए प्रश्न करने लगे.

२५. बच्चे को गुस्सा आए तो उसे दंड न दें. साथ ही अनुशासन को भी दंड न बनाएं

२६. बच्चों को बहुत जल्दी आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश न करें. उम्र के अनुसार उन्हें उतनी ही ज़िम्मेदारी सौंपें जितनी वो संभाल सकें.

२७. डॉमिनेटिंग पैरेंट न बनें. जैसे कहते हैं वैसा करो वाली भाषा न बोलें, बल्कि अच्छे रोल मॉडल बनकर उनके भावनात्मक व संवेदनात्मक विकास को सही रूप से हैंडल करें.

२८. स्कूली समस्याओं के प्रति उदासीन न हों, बच्चे की प्रॉब्लम को सुनें और उसे सॉल्व करने की कोशिश करें.

२९. चोरी-छिपे बच्चों की बातें सुनना या ताका-झांकी करना ग़लत है. इस तरह आपके प्रति उनका आदर कम होगा. आपकी इस आदत को वो पॉज़िटिव रूप में नहीं लेंगे.

३०. टीनएज के विद्रोह को चुनौती न समझें. उनके अंदर कुछ कर दिखाने का ज़ज़्बा होता है, औरों से अलग कुछ करने की चाहत होती है. इसे सहज रूप से लें.