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समय से पूर्व जन्मे बच्चे जल्द सीखते हैं भाषा (Pre-Mature Babies Are Quick Language Learners)

Pre-Mature Babies

भारत में एक साल में पैदा होने वाले कुल शिशुओं में से 13 फ़ीसदी शिशु समय से पहले यानी प्रीमैच्योर जन्म लेते हैं. बच्चे का जन्म 37 हफ़्ते की प्रेग्नेंसी से पहले होने पर उसे समय से पहले जन्म यानी प्रीमैच्योर बर्थ कहा जाता है. अब एक शोध में पता चला है कि प्रीमैच्योर्ड डिलीवरी में जन्म लेनेवाले बच्चे कुशाग्र बुद्धि के होते हैं. आइए जानते हैं इस लेख में कि कैसे प्रीमैच्योर्ड बच्चों का दिमाग़ इतना तेज़ चलता है.

अगर आपके यहां कोई बच्चा समय से पूर्व यानी प्रीमैच्योर्ड पैदा हो जाता है तो टेंशन बिल्कुल मत लीजिए. उसका अच्छी तरह पालन-पोषण कीजिए, क्योंकि आपके घर में कोई ऐरा-गैरा नहीं, बल्कि कुशाग्र बुद्धि का बच्चा पैदा हुआ है. एक रिसर्च में पाया गया है कि समय से पूर्व पैदा होने वाले बच्चे ज़्यादा प्रतिभाशाली होते हैं. कुशाग्र बुद्धिवाले इन बच्चों की सीखने की क्षमता ग़जब की होती है.

प्रीमैच्योर बच्चे तेज़

दरअसल, डिलीवरी डेट से पहले जन्म लेने वाले बच्चों ने भाषा और अनुभूति को लेकर जल्दी संबंध विकसित किया. रिसर्च में यह भी खुलासा हुआ कि इस तरह के बच्चों में भाषा की मज़बूत पकड़ विकसित होती है. गौरतलब है, भारत में समय से पहले जन्मे शिशुओं की दर लगातार बढ़ रही है. भारत सरकार की जनसंख्या विभाग की अधिकृत वेबसाइट पर पोस्ट डेटा के मुताबिक़, किसी भी अन्य देश की तुलना में भारत में सबसे ज़्यादा बच्चे समय से पहले जन्मे होते हैं. विश्वभर में होने वाले कुल समय से पूर्व जन्मे 23.6 फ़ीसदी यानी क़रीब-क़रीब एक चौथाई हिस्सा भारत का है.

पेट में बच्चे तंदुरुस्त

सामान्यत: माना जाता है कि प्रेग्नेंसी की अवधि के बाद बच्चा जितने दिन पेट में रहता है, बच्चे के स्वस्थ होने की उम्मीद उतनी ही ज़्यादा होती है, क्योंकि अगर मां स्वस्थ है तो गर्भ में बच्चे को सबसे अधिक पौष्टिक भोजन मिलता है. इससे बच्चे के अंग और ज़्यादा परिपक्व होते हैं, उसके फेफड़े अच्छी तरह से सांस लेने की अवस्था में आ जाते हैं और उसमें स्तनपान करने की ज़्यादा शक्ति हो जाती है.

गहन देखभाल की ज़रूरत

वैसे बेहतर मेडिकेयर के चलते समय से काफ़ी पहले जन्मे बच्चों की गहन देखभाल के तरी़के में पिछले कुछ दशकों में काफ़ी अच्छा सुधार हुआ है. ऐसे बच्चों के जीवित रहने की दर पहले की तुलना में काफ़ी ज़्यादा बढ़ गई है. हालांकि कई बार समय से ज़्यादा पहले जन्मे बच्चों में सेरेब्रल पाल्सी और सीखने में मुश्किल जैसे लंबी अवधि की विकृतियां आ सकती हैं.

धूम्रपान या शराब ख़तरनाक

इसलिए जो महिलाएं धूम्रपान करती हैं या फिर शौकिया तौर पर ड्रग्स का सेवन करती हैं, उन्हें इन आदतों को छोड़ने से समय से पहले डिलीवरी का ख़तरा वाक़ई कम हो सकता है. कम से कम अगली बार बच्चे के जल्दी आने की संभावना को देखते हुए वे पहले से तैयारी कर सकेंगी. साथ ही अपनी कम्युनिटी में बहुत से अन्य माता-पिता से पर्याप्त सहयोग पा सकती हैं.

बहरहाल, समय से पूर्व प्रसव से जन्मे बच्चे भाषा और संज्ञानात्मक कौशल को सीखने में पूर्णकालिक प्रसव के ज़रिए पैदा हुए बच्चों की तुलना में ज़्यादा बेहतर होते हैं. अमेरिका के इलिनोइस के नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के सांद्रा वाक्समान ने कहा कि इस अध्ययन से ऐसे शिशुओं के जल्द अनुभव करने की भूमिका को समझने और भाषा के संपर्क व परिपक्व स्थिति को जानने में मदद मिलती है.

शोधकर्ताओं की टीम ने स्वस्थ एवं समय से पूर्व पैदा हुए और पूर्णकालिक शिशुओं की एक ही उम्र वाले बच्चों की तुलना की. इसमें भाषा और वस्तु वर्गीकरण के बीच उनके संबंध के विकास का अध्ययन किया गया. इस शोध का प्रकाशन ऑनलाइन पत्रिका डेवेलपमेंटल साइंस में हुआ है.

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समय से पहले जन्म होने के क्या कारण हैं?

बच्चे प्रीमैच्योर्ड क्यों पैदा होते हैं, इस बात पर अभी तक कोई स्पष्ट राय नहीं है. हालांकि डॉक्टरों का मानना है कि महिलाओं की सेहत की गर्भावस्था पर ज़्यादा असर पड़ता है. अमूमन अगर कोई अनहोनी न हो तो स्वस्थ महिलाओं में गर्भावस्था पूरे नौ महीने चलने की संभावना ज़्यादा रहती है, जबकि बीमार और शारीरिक रूप से कमज़ोर महिलाओं की डिलीवरी प्रीमैच्योर होने की संभावना ज़्यादा रहती है. हालांकि यह बात तो डॉक्टर भी पूरे विश्‍वास के साथ नहीं बता सकते कि कौन से बच्चे समय से जन्म लेंगे और कौन बच्चे समय से पहले जन्म लेंगे. कहा जाता है कि ऐसे बहुत से चिकित्सकीय एवं सामाजिक कारण हैं, जिनकी वजह से समय से पहले प्रसव और जन्म की संभावना अधिक बढ़ जाती है.

प्रीमैच्योर डिलीवरी के बच्चे

35 हफ़्ते में जन्मे बच्चे

35 हफ़्ते में पैदा होनेवाले बच्चों को किसी तरह की अपंगता, विकृति या बीमारी होने की आशंका बहुत ही कम रहती है. हालांकि यह संभव होता है कि क़द में बच्चा थोड़ा छोटा हो सकता है या उसे कभी-कभी सांस लेने में थोड़ी मुश्किल भी हो सकती है. इस तरह के बच्चों की ट्रीटमेंट तो नहीं, हां, देखभाल की ज़्यादा ज़रूरत पड़ती है. हालांकि इस तरह के केसेज़ बहुत कम देखने को मिलते हैं.

28 से 34 हफ़्ते के बीच जन्मे बच्चे

34 हफ़्ते से भी कम समय तक गर्भ में रहे बच्चों को पूरी तरह विकसित होने का समय नहीं मिल पाता. इसके चलते उनके आंतरिक अंगों को पूरी तरह परिपक्व होना शेष होता है. ऐसे बच्चे बहुत ज़्यादा कमज़ोर होते हैं. उन्हें स्तनपान करने और सांस लेने में मुश्किल हो सकती है. ऐसे शिशुओं की देखभाल के लिए नवजात गहन चिकित्सा इकाई की ज़रूरत पड़ती है, जहां उनकी बेहतर देखभाल की जाती है.

वैसे डॉक्टर मानते हैं कि अच्छी चिकित्सकीय सुविधाएं मिलने पर 28 हफ़्ते की प्रेग्नेंसी में जन्म लेने वाले बच्चों के जीवित रहने की बहुत ज़्यादा संभावना रहती है.

28 हफ़्ते से पहले जन्मे बच्चे

दुर्भाग्यवश, 28 हफ़्ते की प्रेग्नेंसी से पहले पैदा हुए बच्चों का जीवित रहना बहुत ज़्यादा मुश्किल होता है. जो बच्चे किसी तरह मेडिकेयर की बदौलत जीवित रहने में सफल हो भी जाते हैं, उनमें भी मामूली से लेकर काफ़ी गंभीर क़िस्म की अपंगता हो सकती है या कोई बीमारी भी हो सकती है.

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प्रीमैच्योर्ड डिलीवरी कब होती है?

कई चिकित्सकीय कारण हैं, जिनके चलते बच्चे के समय से पहले ही पैदा होने की आशंका बढ़ जाती है:

वेजाइना में वायरस इंफेक्शन,

गर्भ में जुड़वा या इससे ज़्यादा बच्चे होना,

प्रेग्नेंसी के दौरान अत्याधिक ब्लीडिंग,

प्रेग्नेंसी की विकृति या असामान्यता,

ग्रीवा की कमज़ोरी,

गर्भपात करवाने के बाद,

घरेलू हिंसा का शिकार होना,

धूम्रपान व ड्रग्स का सेवन,

लंबे समय तक कठोर शारीरिक श्रम.

योजना महीप

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…ताकि सलामत रहें बच्चों की आंखें (Take Care Of Your Kids Eyes)

eye Care, Kids Eyes care, eyes health

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आंखें इंसान के शरीर का वो ख़ास अंग हैं- जिससे वो इस ख़ूबसूरत दुनिया को देखता है, लेकिन कई बार लोग आंखों में दर्द, जलन, खुजली और पानी आने की समस्या को गंभीरता से लेने की बजाय नज़रअंदाज़ कर देते हैं. ख़ासकर छोटे बच्चों की आंखों में होनेवाली इन समस्याओं को आम समझने की ग़लती उन्हें आंखों के कैंसर का मरीज़ बना सकती है. कई बार बच्चों में होनेवाले आंखों के कैंसर का पता एडवांस स्टेज में जाकर चलता है और ऐसी स्थिति में कीमो थेरेपी देना लगभग नामुमक़िन हो जाता है, जिसके चलते कई बच्चे हमेशा-हमेशा के लिए अपने आंखों को रोशनी गंवा बैठते हैं.

क्या है रेटिनोब्लास्टोमा?

5 साल से कम उम्र के बच्चों के रेटिना में होनेवाले कैंसर को रेटिनोब्लास्टोमा कहते हैं. ये रोग आंख में असामान्य कोशिकाओं की वृद्धि के कारण होता है और क़रीब 20 हज़ार बच्चों में से 1 बच्चा ही इसका शिकार होता है. हालांकि अधिकांश लोग यह भी नहीं जानते कि बच्चों की आंखों में भी कैंसर होता है, लेकिन समय रहते अगर इसके लक्षणों को पहचानकर इलाज कराया जाए, तो आंखों के बचने की संभावना 90 फ़ीसदी तक होती है.

कैसे पता लगाएं?

आपके बच्चे की आंखों में कहीं यह समस्या तो नहीं है, इसका पता आप ख़ुद भी बेहद आसानी से लगा सकते हैं. इसके लिए बच्चे के दोनों आंखों की मध्यम रोशनी के फ्लैश से फोटो खींचें. अगर इस तस्वीर में एक आंख लाल और दूसरी स़फेद नज़र आए, तो समझ लीजिए कि बच्चे को इस बीमारी का ख़तरा है. बच्चे की आंखों की सलामती के लिए आपको फ़ौरन डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

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लक्षण

अगर आपके बच्चे की आंखों में नीचे दिए गए लक्षण दिखाई देने लगें, तो संभल जाएं और वक़्त रहते इलाज करवाएं.

* रोशनी पड़ने पर रेटिना में स़फेद धब्बा दिखाई देना.

* आंखों का लाल होना और उसमें दर्द महसूस होना.

* दिखाई देने में दिक्कत और आंखों का बाहर उभर आना.

* दोनों आंखों की पुतलियों का रंग अलग हो जाना.

* आंखों का भेंगापन भी इस रोग का एक लक्षण है.

कारण

विशेषज्ञों की मानें तो 40 फ़ीसदी मामलों में यह बीमारी जेनेटिक कारणों से होती है. अगर किसी के पहले बच्चे को बीमारी हो, तो दूसरे बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उसके आंखों की जांच करानी चाहिए. टेस्ट हर तीन महीने में होना चाहिए. व़क्त पर लेज़र ट्रीटमेंट और कीमो थेरेपी से आंखों को बचाया जा सकता है, लेकिन कई बार ट्यूमर फैलने की वजह से आंख निकालने तक की नौबत आ जाती है.

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अलर्ट

* 5 साल से कम उम्र के बच्चों में रेटिना का कैंसर सामान्य.

* 20 हज़ार बच्चे में से एक में दिखता है यह रोग.

* इलाज में देरी छीन सकता है आंखों की रोशनी.

– डॉ. जे. एल. गुप्ता

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सर्दियों में नवजात शिशुओं की देखभाल के 11 अचूक नुस्ख़े (11 Effective Tips On How To Take Care Of Baby In Winter)

Effective Tips On How To Take Care Of Baby In Winter

 

Effective Tips On How To Take Care Of Baby In Winter

मांएं सर्दी का मौसम आते ही अपने नवजात शिशुओं को ढेर सारे कपड़े पहनाकर, सिर पर ऊन की टोपी बांधकर उन्हें ऊनी कंबल में लपेटकर रखती हैं. उन्हें भय रहता है कि उनके नन्हें-मुन्ने लाडले को कहीं सर्दी न लग जाए. परंतु हम यहां नवजात शिशुओं को सर्दी से बचाए रखने के लिए कुछ विशिष्ट उपाय बता रहे हैं. इन उपायों पर अमल करने से बच्चों को कभी सर्दी नहीं लगेगी.

* नवजात शिशु के शरीर पर हल्के हाथों से राई के तेल की मालिश करके कम से कम कपड़े पहनाकर नंगे बदन ही सुबह की गुलाबी धूप का सेवन कराएं. यह प्रयोग नियमित रूप से करें. आपके शिशु को कभी सर्दी नहीं होगी और न कभी निमोनिया होगा.
* रात को सोते समय तुलसी का रस उसके नाक, कान और माथे पर मलें. तुलसी के रस के सेवन से सर्दी का प्रकोप कभी नहीं होगा. आप तुलसी के रस की एक बूंद शहद के साथ मिलाकर उन्हें चटा भी सकती हैं.
* सुबह नवजात शिशु को शहद चटाएं. इस प्रयोग से भी उस पर सर्दी का आक्रमण नहीं होगा.
* शिशु को स्नान कराने से पहले हाथों में शहद लगाकर उस पर नींबू का रस निचोड़कर उसकी छाती पर मलें. यह प्रयोग शिशु को सर्दी से बचाने के लिए कवच बन जाएगा.

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* नवजात शिशु के झूले के पास या उसके सोने के स्थान के आसपास कपड़े की एक पोटली में प्याज़ को कुचलकर बांधकर रख दें. हवा में प्याज़ की गंध मिल जाने से सर्दी का प्रभाव नहीं होगा.
* जिस कमरे में बच्चा सोता है, उसकी खिड़कियां बंद न करें.
* न कभी अंगीठी जलाकर रखें और न सर्दी से बचाव के लिए हीटर का प्रयोग करें.
* यदि आप खिड़की खोलकर वहां तुलसी के पौधे का गमला रख देंगे और आसपास दो-तीन ताज़े नींबू धागे से बांधकर लटका देंगे, तो नवजात शिशु का सर्दी से प्राकृतिक बचाव हो जाएगा.
* कभी-कभी गुनगुने पानी में नीम की पत्तियां उबालकर नवजात शिशु को उससे स्पंज करें. यह ध्यान रहे कि पानी का तापक्रम मात्र इतना होना चाहिए, नवजात शिशु की कोमल त्वचा सहन कर सके.

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* सर्दी के प्रभाव से नवजात शिशुओं को बचाए रखने के लिए आप उन्हें ख़ूब हंसाएं या फिर वे रोते हैं, तो कुछ पल उन्हें चुप न कराएं. सर्दी से बचाव करने का यह कुदरती प्राणायाम है.
* यदि बच्चा दिनभर चुप रहता है, तो अवश्य ही उसे सर्दी लग जाएगी. चुप रहनेवाले शिशुओं में प्रतिरोधात्मक शक्ति का अभाव होता है. अतः शिशु से बात करे, ताकि वो ख़ुश हो और मुस्कुराए.

– रीटा गुप्ता

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14 सीक्रेट्स जो टीनएजर्स कभी नहीं बताना चाहते? ( 14 Secrets Teenagers Never Want Parents To Know)

Secrets Teenagers Never Want Parents To Know

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बचपन से किशोवस्था की तरफ़ बढ़ते बच्चों की अपनी एक अलग ही दुनिया होती है. यह दुनिया उनके ख़्वाबों, चाहतों, पसंद-नापसंद, शरारतों व सीक्रेट्स से बनी होती है, जिसमें किसी की घुसपैठ उन्हें पसंद नहीं. ज़्यादातर लोगों के लिए यह दुनिया एक रहस्य के समान होती है, पर हमारे लिए नहीं, क्योंकि उनके सीक्रेट्स जानने के लिए हमने की उनसे कुछ ख़ास बातें. टीनएजर्स की इसी रहस्यमयी दुनिया से हम आपको करा रहे हैं रू-ब-रू, ताकि आप भी जान सकें उनके ख़ास सीक्रेट्स.

* एक बार मैंने बिना पापा की परमिशन के उनकी बाइक चलाई और एक छोटा-सा एक्सीडेंट हो गया. बाइक थोड़ी-सी डैमेज हो गई. पर घर में मैंने बताया कि बाइक मुझे इस हालात में पार्किंग लॉट में पड़ी मिली.

* जिस दिन मेरा स्कूल जाने का मन नहीं होता, उस रात मैं अलार्म बंद कर देता हूं और सुबह उठकर अलार्म न बजने का बहाना बना देता हूं.

* जब भी मुझे किसी पार्टी या मूवी के लिए जाना होता है, तो झूठ बोल देता हूं कि मैं दोस्त के घर पढ़ने या प्रोजेक्ट के काम से जा रहा हूं.

* घर पहुंचने से पहले मैं अपने मोबाइल फोन से कुछ मैसेजेज़ व कॉल हिस्ट्री डिलीट कर देता हूं, ताकि पैरेंट्स के टेंशनवाले सवालों से बच सकूं.

* मुझे सर्दियों में नहाना बिल्कुल पसंद नहीं, इसलिए सर्दियों में अक्सर मैं बाथरूम में जाकर बालों को गीला करके, हाथ-पैर व मुंह धो लेता हूं, थोड़ा डियोड्रेंट लगाता हूं और बाहर आकर कहता हूं कि पानी बहुत ठंडा था.

* मैं और मेरे कई दोस्त अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पार्ट टाइम जॉब करते हैं. पर हमने इस बारे में अपने पैरेंट्स को नहीं बताया, क्योंकि हम नहीं चाहते कि पॉकेटमनी कम हो जाए.

* कभी-कभी जब मम्मी मुझे बाज़ार से कुछ ख़रीदने के लिए पैसे देती हैं, तो मैं अक्सर थोड़े पैसे बचाकर रख लेता हूं. घर आकर मम्मी को बोल देता हूं कि चीज़ों के दाम तो आसमान छूने लगे हैं.

* मम्मी मुझे रोज़ाना बस का किराया देती हैं, पर बस से जाने की बजाय मैं पैदल जाता हूं, ताकि उन पैसों से अपना फेवरेट स्नैक्स ख़रीद सकूं.

* एक बार स्कूल में मोबाइल यूज़ करते व़क्त टीचर ने मुझे देख लिया और मोबाइल छीन लिया. घर पर मैंने बताया कि मोबाइल अचानक से ख़राब हो गया, तो मैंने रिपेयर के लिए दिया है.

* मेरे पैरेंट्स को मेरे कुछ दोस्त पसंद नहीं, इसलिए वे उनसे दूर रहने के लिए कहते हैं. मैं उनके मोबाइल नंबर सेव करने की बजाय याद कर लेता हूं, ताकि जब भी वे कॉल करें, मेरे फोन में उनका नाम न दिखे.

* जब भी हमें स्कूल-कॉलेज में हाफ डे मिलता है, तो हम घरवालों को बिना बताए, कहीं घूमने चले जाते हैं और ठीक समय पर घर पहुंच जाते हैं. हमारे पैरेंट्स को कभी इस बारे में शक भी नहीं हुआ.

* जब भी हमारे फ्रेंड सर्कल में किसी के पैरेंट्स शहर से बाहर जाते हैं, तो हम सारी सहेलियां मिलकर उसके घर पर रातभर पार्टी करते हैं. घर पर हम बता देते हैं कि कंबाइन प्रोजेक्ट पर काम करना है.

* कभी-कभी हम दोस्त मिलकर पैसे जमा करते हैं और एडल्ट मैग्ज़ीन ख़रीदकर देखते हैं.

* इस साल कुछ दिनों के लिए मुझे स्कूल से सस्पेंड कर दिया गया, पर मैंने घर पर नहीं बताया और रोज़ स्कूल जाने का नाटक करता रहा. स्कूलवाले घर पर फोन नहीं कर पाए, क्योंकि हमारे फोन ख़राब थे, पर उन्होंने लेटर भेजा, जो क़िस्मत से मेरे ही हाथ लगा और मैंने उसे फाड़कर फेंक दिया.

– सत्येन्द्र सिंह

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मां भी नहीं समझ पाती शायद… (How To Understand Your Child Better?)

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कहते हैं बिन रोये मां भी शिशु को दूध नहीं पिलाती. पर जब बच्चा थोड़ा बड़ा होने लगता है, तो वे ये जानने लगती हैं कि बच्चा क्यों रो रहा है. भूख की वजह से या पेट दर्द की वजह से. और थोड़ा बड़ा होने पर वह जानने लगती हैं कि वाक़ई पेट दर्द हो रहा है या स्कूल जाने के नाम से पेट दर्द हो रहा है. स्कूल जाने का समय निकल जाने पर पेट दर्द छू मंतर हो जायेगा. कभी ट्यूशन न जाने के लिए कोई बहाना है.

तू सब जानती है कह देना तो आसान है पर मां सब कभी नहीं समझ पाती क्योंकि किसी भी मन के भीतर क्या उमड़-घुमड़ रहा है भला कब जाना जा सकता है. अनजाने में ही हम बच्चों की उम्र की परवाह किये बिना उनसे बड़ी उम्मीदें करने लगते हैं और उनकी भावनाओं को समझ नहीं पाते हैं. हम बच्चों से बहुत बड़ी आशाएं करते हैं. अपने सपनों को उनके माध्यम से पूरा करने के अरमानों के चलते उसे समझ ही नहीं पाते हैं. हमसे कब भूल होती है. हम समझदारी के बहाने नासमझी करते हैं, ये जानने के लिए कई बार अपने ही व्यवहार का मूल्यांकन करना भी ज़रूरी होता है.
साइकोलॉजिस्टों का यह कहना कि अक्सर यह देखा जाता है कि ग़लती बच्चे के व्यवहार में नहीं बल्कि मां-बाप के व्यवहार में होती है वे ही अपने विचार, अपने स्टाइल उन पर थोपने की कोशिशों में उसे समझ नहीं पाते.

बहुत छोटी उम्र और बहुत बड़ी उम्मीदें

एक बार मेरी एक मित्र अपनी तीन साल की बेटी को ऑफिस लेकर आयी. मैंने उसे खाने के लिए बिस्कुट दिये. बड़े कांपते हाथों से उसने बिस्कुट लिया. खा ही रही थी कि मां ने डांटना शुरू किया. हाथ गंदे कर रही हो. मुंह साफ़ करो, क्यों खा रही हो. ब्रेकफास्ट करके आयी थी. डांट की एक लम्बी लिस्ट थी. उसने बिस्कुट खाना छोड़ दिया पर मेरे पुचकारने और मां को उसे कुछ न कहने की हिदायत पर उस दुबली-सी लड़की ने एक दो नहीं चार-पांच बिस्कुट खाये. उसका चेहरा अब तृप्त था पर सहमा हुआ. मैंने महसूस किया कि उस नन्हीं-सी जान को मां सुपर किड बनाना चाहती है. नन्हें कृष्ण गोपाल चेहरे पर इधर-उधर मक्खन लगे ही अच्छे लगते हैं. उन्हें पहले खाने तो दें फिर साफ-सफाई भी हो जायेगी. बहुत छोटी उम्र, खाना कपड़ों पर न गिरे, हाथ मुंह गंदे न हो खाना कपड़ों पर ही नहीं ज़मीन पर भी न बिखरे ऐसा भला क्या संभव है. उस उम्र से इतनी उम्मीदें न रखें. यदि ऐसी उम्मीदें रखेंगी तो लगेगा कि कहना नहीं मान रहा. उसकी उम्र को ज़रा समझने की कोशिश करें.

रोना-कभी नहीं रोना

गाने में भले ही यह गाना अच्छा लगे कि कभी नहीं रोना पर बच्चे रोते ही हैं. बच्चे क्या सभी रोते हैं. जब तकलीफ़ हो तो आंसू बाहर निकल जाए तो हर्ज़ ही क्या है. पर प्रश्न यह उठता है कि कोई बच्चा क्यों रो रहा है. उसका कारण क्या जानने की कोशिश की या उसे बहानेबाज समझ कर उसके रोने को यूं ही टाल दिया जाये.
* बहुत छोटा बेबी ज़रूरी नहीं कि इसलिए रो रहा हो कि उसे गोद में उठाया जाये. हो सकता है जो फैंसी ड्रेस आपने पहनायी हो उसका कोई पिन उसे चुभ रहा हो या फिर जूता तकलीफ़ दे रहा है.
* ये माना कि बच्चे रोकर अपनी ज़िद मनवा लेते हैं, पर हो सकता है कि उसकी ज़िद, ज़िद न हो और आप कभी भी उसकी बात तब तक न मानती हो जब तक वह रोता न हो.
* बच्चा स्कूल जाते समय रोता है. पढ़ना नहीं चाहता यह ज़रूरी नहीं हो सकता है कि स्कूल में टीचर डांटती हो, कोई दूसरा बच्चा तंग करता हो उसका सामान छीन लेता हो या किसी से उसका झगड़ा हो गया हो.
* कुछ बड़ी उम्र या किशोर वय का बच्चा मूड स्विंग्स के चलते तनावग्रस्त होकर छोटी-छोटी बातों से खीझ रहा है. ये भी सकता है कि चाइल्ड एब्यूज़ का शिकार हुआ हो. उसके रोेने के कारणों को आप नहीं समझेंगी तो कौन समझेगा?

बच्चे को बच्चा ही बना रहने दें

हमारे एक परिचित की बेटी सात वर्ष की उम्र में ही पूरा घर संभालती थी. घर ही नहीं दो जुड़वा छोटे भाईयों को भी वही संभालती थी. मेहमानबाजी भी उसी तरह करती थी जैसे घर की स्त्री करती है. उसके इस व्यवहार को मैं कभी सराहा नहीं सकी, क्योंकि उसकी मां ने उसका बचपन उससे स़िर्फ इसलिए छीन लिया कि तीन बच्चों की परवरिश और घर ऑफिस की जिम्मेदारी वे अकेले कैसे संभालती! जिस उम्र में बच्चे दूसरे बच्चों के साथ मिलकर धमाल मचाते हैं, सोफों पर कूदते हैं, पिलो एक-दूसरे को मारते हैं, सारे घर में इधर-उधर रेलगाड़ी बनाते घूमते हैं उस उम्र में उन्हें सब सामान क़रीने से रखने की उम्मीद करना, मेहमानों की आवभगत करना आना उसे चाय भी बनानी आनी चाहिए और दाल-चपाती भी, तो यह कुछ जल्दी ही चाह रही हैं. यकीं जाने की ये सब उम्र के साथ ही आ जाता है. मौज़-मस्ती के साल बहुत कम होते हैं. उसके बाद तो हर व़क़्त कोचिंग के चक्कर रहेंगे. उन्हें व़क़्त से पहले बड़ा बनाने की ये नाहक कोशिश न करें तो बच्चे भी सुखी होंगे और आप भी उनकी मस्ती एन्जॉय करेंगी.

बच्चा बिल्कुल नहीं सुनता

* सारा दिन शरारत और स़िर्फ शरारत यही बात तो आपको खिझाती है, पर शरारत भी नहीं करता और फिर भी कोई बात नहीं सुनता. इतना बदतमीज़, इतना ज़िद्दी कह देना आसान है, पर कभी यह सोचा कि हो सकता है उसकी लिसनिंग स्किल अपनी उम्र के मुताबिक़ विकसित न हुए हों.

* उसके कान में हियरिंग की प्राब्लम हो.

* उसका पढ़ने में मन नहीं लगता.

हो सकता है कि लर्निंग डिसएबिलिटी हो.

बच्चा हायपर एक्टिव हो सकता है या किसी अन्य बीमारी का शिकार, जिसे आप समझ नहीं पा रही हों.

* हायपर एक्टिव बच्चा यदि खाने की टेबल पर आने से पहले अपने कमरे की दीवार पर बॉल मारने की अंधाधुंध प्रैक्टिस किये जा रहा है, तो समझें कि उसकी एनर्जी को कहीं चैनलाइज करने की ज़रूरत है.

बच्चा ज़रूरत से ज़्यादा चुपचाप रहता है

* यह ज़रूरी नहीं संगत बिगड़ गयी हो.

* हो सकता है कि उसके किसी ख़ास दोस्त के परिवार में कुछ तकलीफ़ हो, जिसे वह आपसे शेयर नहीं करना चाहता.

* हो सकता है कि उसने आप पति-पत्नी को लड़ते या अंतरंग स्थिति में देखा हो.

* आपकी ज़िंदगी में चल रहे तनाव परेशानियों की वजह से भी कई बच्चे ख़ामोश रहने लगते हैं.

* यही नहीं पेपर ख़राब हो गया है या सहेली से तक़रार हो गया हो उसके उस ख़राब मूड की वजह तो आपको तलाशनी होगी.

* उससे संवाद आपको करना है. यदि कम्युनिकेशन नहीं कर पा रही हैं तो अपनी कोशिश जारी रखें.

आप चाहती हैं कि वे आपकी आवश्यकताएं आपका मूड समझें

* होना तो यह चाहिए कि आप समझें कि बच्चे क्या चाहते हैं.

* वे कब किस बात से परेशान है उनके बोले बिना आप समझ जाएं.

* उनका मूड क्यों उखड़ा है.

* वे क्यों खीझ रहे हैं, आप को समझना चाहिए. पर आप यह चाहती हैं कि वो आपको समझें.

* आपके ऑफ़िस में कोई प्रॉब्लम चल रही है और आप उन्हें डांट रही हैं और अपनी बेवजह डांट को उचित ठहराना चाहती हैं कि उन्हें समझना चाहिए कि मां-बाप के ऑफ़िस में प्रॉब्लम है इसलिए घूमने नहीं ले जा रहे हैं.

* आप अपनी तकलीफों से इतनी आक्रांत है कि बच्चे से उम्मीद कर रही हैं कि वे आपको समझें.
* घर में बर्तन वाली, सफाई वाली नहीं आयी आप सुबह से काम में उलझी हैं, सुबह से उठकर काम कर रही हैं और चाह रही हैं कि बेटी बिस्तर से उठकर आये और काम में हाथ बंटाये.

* उसको काम करना सिखाया नहीं, पर अब अचानक उससे उम्मीद रख खीझ रही हैं.

* पहले उन्हें अपनी तकलीफ़ की जानकारी दें फिर उम्मीद रखें पर आप तो उल्टा कर रही हैं.

बच्चों की आलोचना मत करें- प्रशंसा करें

* बच्चे हैं और उन्हें सही ग़लत की पहचान नहीं है और जब बड़े अपनी गलतियों से सीखते हैं तो बच्चे क्यों नहीं.

* पर आप उन्हें उनकी ग़लतियों को लेकर हर व़क़्त डांटती हैं और एक ही ग़लती का ताना हर बार देती हैं.

* उनकी ग़लती पर गुस्सा न हों, बल्कि प्यार से समझायें.

* यदि बार-बार समझाने पर भी न समझें तो ही डांटे.

* उनकी किसी ग़लती को उनके व्यवहार का रूप न बना डालें कि वह ऐसे ही करता है.

* हर व़क़्त की आलोचना उसे हठी बना सकती है. इसमें कोई दो राय नहीं है.

* जहां आलोचना उसे हठी बनाने के साथ उसका आत्मविश्वास को कमजोर करती है वह तिरस्कार महसूस करता है.

* वहीं प्यार के दो बोल उसकी प्रशंसा उसका मनोबल बढ़ाती है.
* कभी आपने यह सोचा है कि उसकी ग़लती पर आलोचना तो करती हैं, पर क्या अच्छा करने पर प्रशंसा भी करती हैं.

* यदि नहीं तो उसकी प्रशंसा किया करें.

* आपके कहे हर शब्द की बच्चों के लिए अहमियत होती है.

पर उपदेश कुशल बहुतेरेे

* जी हां उन्हें ईमानदारी, सच्चाई, न झगड़ने, दिन रात पढ़ने, सारा दिन टीवी देखने, कम्प्यूटर पर गेम खेलने जैसी एक लम्बी फेहरिस्त पर अमल करने से पहले उन पर स्वयं अमल करें.

* बच्चे जो देखते हैं वे उस पर अमल स्वतः करते हैं.

* आप बड़े-बुजुर्गों की इ़ज़्ज़त करती हैं, स्वयं पुस्तकें पढ़ती हैं.

* सारा दिन टीवी सीरियल में नहीं उलझी रहती हैं, तो वैसा व्यवहार वे भी सीख जाते हैं.
* आप उसे बहुत छोटी उम्र में वो उम्मीदें रख रही हैं, जो आपके व्यवहार में न हो.

* उसे दरवाज़े पर दस्तक देकर आपके कमरे में आना चाहिए.

* उसे आप पति-पत्नी बात कर रहे हों या आप किसी से बातचीत में व्यस्त हों,तो उसे आपको डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए.

* चार-पांच साल के बच्चे से यह बहुत बड़ी डिमांड है. आप उसे डांटकर ये जतलाना चाहती हैं कि उसे गुडमैनर्स नहीं है, जो सही नहीं है.

* उसे धीरे-धीरे अच्छी मैनर्स सिखायें, ताकि वे उन्हें सहजता से सीख पाए.

उनका इंकार करना

* उसने किसी काम को करने से मना कर दिया, आप यही सोचती हैं न कि निकम्मा है, आलसी है, कहना नहीं सुनता.

* हो सकता है कि वह उस समय तकलीफ़ में हो. उसका पेट दर्द कर रहा हो, हो सकता है या स्कूल में किसी व्यवहार से दुखी हो, इस प्रकार प्रतिक्रिया दे रहा हो.

* यह भी हो सकता है कि आपके व्यवहार को कॉपी कर रहा है.

* आप भी तो उसकी किसी भी फ़रमाइश को पूरी तरह सुने बिना पहले मना कर देती हैं.

* आपका हर वाक्य ‘नो’ से ही तो शुरू होता है.

* बच्चे के हर ज़़ज़्बात को समझ नहीं पा रही हैं, इसलिए अपनी पेरेंटिंग को दोष न दें और न ही अपराधबोध महसूस करें.

* बच्चा कोई व्यवहार क्यों कर रहा है उसका दोष ढूंढने से पहले अपने व्यवहार का विश्लेषण यदि करेंगी, तो पायेंगी कि ग़लती कई बार अपनी ही व्यवहार में हो रही होती है.

* पर समझदारी भी इसी में है कि अपने को सुधारते हुए उसको सुधारते चलें और मां बिना कहे ही सब समझ जाती है यह विश्वास पक्का हो जाए.

– कृष्णा रानी

सेक्स एज्युकेशन: ख़त्म नहीं हुई है पैरेंट्स की झिझक (sex education is necessary for child)

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आज के पढ़े-लिखे मॉडर्न पैरेंट्स भले ही अपने बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखने का दावा करें, लेकिन सेक्स जैसे मुद्दे पर बच्चों के साथ बात करते हुए उनकी ज़ुबान लड़खड़ाने लगती है. बच्चे के सेक्स से जुड़े किसी भी सवाल का जवाब देने में वो आज भी हिचकिचाते हैं. सेक्स जैसे ज़रूरी मुद्दे पर अपने बच्चों से बात करते हुए क्यों झिझकते हैं पैरेंट्स? 

टैबू है सेक्स

मॉडर्न होने का दंभ भरने वाले आज के शिक्षित अभिभावक भी बच्चों के मुंह से सेक्स शब्द सुनकर झेप जाते हैं. एक जानी मानी मीडिया ग्रुप से जुड़ी कविता कहती हैं, “मेरे 10 साल के बेटे ने जब अखबार में छपे सेक्स शब्द को देखकर पूछा ‘मम्मा, SEX का क्या मतलब है?’ तो मैं सन्न रह गई. मुझे समझ नहीं आया कि उसके सवाल का मैं क्या जवाब दूं.” हमारे देश में ज़्यादातर पैरेंट्स का हाल कविता जैसा ही है, वो अपने बच्चे के साथ दोस्ताना व्यवहार तो रखते हैं, लेकिन जब बात सेक्स की आती है, तो बच्चे को समझाने की बजाय उसके सवाल को टाल जाते हैं. ऐसे में वो इंटरनेट व दोस्तों के ज़रिए अपनी जिज्ञासा शांत करने की कोशिश करता है, जिसका ज़्यादातर नकारात्मक असर ही देखने को मिलता है, क्योंकि इन स्रोतों से सही व पूरी नहीं, बल्कि अधकचरी जानकारी ही मिलती है.
अपनी सेक्स जिज्ञासा को शांत करने के लिए टीनएजर्स बेझिझक यौन संबंध बना रहे हैं, जिससे न स़िर्फ उनका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य, बल्कि करियर भी प्रभावित होता है. साइकोलॉजिस्ट कीर्ति बक्षी के मुताबिक, “सेक्स को टैबू की बजाय नैचुरल चीज़ की तरह पेश करके, सहजता से बात करके, रियल-अनरियल सेक्स यानी नैचुरल सेक्स और पोर्नोग्राफ़ी का फ़र्क समझाकर बच्चों को अपराध की राह पर चलने से रोका जा सकता है.”

क्यों झेंपते हैं पैरेंट्स?
साइकोलॉजिस्ट प्रमिला श्रीमंगलम् पैरेंट्स की झिझक की वजह उनकी सोच को मानती हैं. उनके मुताबिक, “सोच के अलावा डर, शर्मिंदगी का एहसास, नैतिक मूल्य और संस्कार भी खुले तौर पर पैरेंट्स को बच्चों से सेक्स संबंधी मुद्दे पर बात करने से रोकते हैं.फफ दरअसल, हमारा समाज और परवरिश का माहौल ही ऐसा है जहां सेक्स जैसे शब्द को हमेशा परदे के पीछे रखा गया है. यही वजह है कि पैरेंट्स चाहते हुए भी इस मुद्दे पर बच्चे से खुलकर बात नहीं कर पाते.”
सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. राजीव आनंद की भी कुछ ऐसी ही राय है. उनके अनुसार, “पैरेंट्स जिस माहौल में पले-बढ़े और शिक्षित हुए हैं, वहां सेक्स को हमेशा एक बुरी चीज़ के रूप में पेश किया गया है. सेक्स का मतलब स्त्री और पुरुष के बीच का अंतरंग संबंध… इसी सोच के चलते अभिभावक बच्चों के साथ इस बारे में बात करने में असहज महसूस करते हैं.”

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समय की मांग है सही सेक्स एज्युकेशन
दिनोंदिन सेक्स संबंधी अपराधों में बच्चों, ख़ासकर टीनएजर्स की बढ़ती भागीदारी न स़िर्फ पैरेंट्स, बल्कि पूरे समाज के लिए ख़तरे की घंटी है. ऐसे में सेक्स एज्युकेशन के ज़रिए ही बच्चों को सही-ग़लत का फ़र्क समझाया जा सकता है. डॉ. आनंद कहते हैं, “आज के दौर में जहां एक्सपोज़र और ऑपोज़िट सेक्स के साथ इंटरेक्शन बहुत ज़्यादा बढ़ गया है, ऐसे में टीनएजर्स को सेक्स के बारे में सही जानकारी होनी ज़रूरी है. बढ़ती उम्र के साथ टीनएजर्स की उत्तेजना और फैंटेसी भी बढ़ने लगती है, लेकिन उन्हें इस पर क़ाबू रखना नहीं आता, जो सेक्स एज्युकेशन से ही संभव है. सेक्स एज्युकेशन को स़िर्फ अंतरंग संबंधों से जोड़कर ही नहीं देखा जाना चाहिए.”

बदलाव की ज़रूरत
आमतौर पर पैरेंट्स ये तो चाहते हैं कि उनके बच्चे को सेक्स के बारे में सही जानकारी मिले, लेकिन ख़ुद इस मुद्दे पर वे बात नहीं करते. ज़्यादातर पैरेंट्स सेक्स को शादी के बाद वाली चीज़ के रूप में देखते हैं, लेकिन उन्हें अपनी इस सोच में बदलाव लाना होगा और कपड़ों के साथ ही अपने विचारों को भी मॉडर्न बनाकर एक दोस्त की तरह बच्चे को उसके शारीरिक अंगों और उनके विकास के बारे में जानकारी देनी होगी. इतना ही नहीं, उन्हेें ये भी बताएं कि कोई यदि उन्हें ग़लत तरी़के से छूता है, तो उसका विरोध करें या तुरंत स्कूल/घर में उसकी शिकायत करें. आजकल न स़िर्फ बाहर, बल्कि घर की चहारदीवारी में भी रिश्तेदारों द्वारा बच्चों के शोषण के कई मामले सामने आए हैं. बहुत- से मामलों में तो बच्चे समझ ही नहीं पाते कि उनके साथ कुछ ग़लत हो रहा है.

मीडिया एक्सपोज़र से बहकते क़दम
डॉ. आनंद के मुताबिक, “टीवी सीरियल, फ़िल्में, मैगज़ीन, फैशन शो आदि में जिस तरह खुलेआम अश्‍लीलता परोसी जा रही है, बच्चों का उनसे प्रभावित होना लाज़मी है. इन सब माध्यमों की वजह से वे उम्र से पहले ही बहुत कुछ जान लेते हैं और परदे पर दिखाई गई चीज़ों को असल ज़िंदगी में करने की कोशिश में ग़लत राह पर चल पड़ते हैं. इसके लिए बहुत हद तक पैरेंट्स भी ज़िम्मेदार हैं, उनके द्वारा इस मुद्दे पर बात न किए जाने के कारण बच्चे उत्सुकतावश या उतावलेपन में सेक्स अपराधों में लिप्त हो जाते हैं.”

सेक्सुअली एक्टिव होते बच्चे
कई अध्ययनों से ये बात साबित हो चुकी है कि आजकल 10-11 साल की उम्र में ही बच्चों में प्युबर्टी पीरियड शुरू हो जाता है. साइकोलॉजिस्ट प्रमिला श्रीमंगलम् कहती हैं, “बदलती लाइफ़स्टाइल के कारण बच्चे वक़्त से पहले बड़े हो रहे हैं और इस दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव उन्हें सेक्स के प्रति उत्तेजित कर देते हैं. ऐसे में सही जानकारी के अभाव में और पैरेंट्स द्वारा नज़रअंदाज़ किए जाने पर बच्चे अपनी उत्सुकता शांत करने के लिए इंटरनेट, सोशल साइट्स, पब, फ़िल्म व दोस्तों का सहारा लेते हैं, जिसका नतीजा सेक्सुअल एक्सपेरिमेंट्स के रूप में सामने आता है.”

कैसे करें बात?
ये सच है कि भारतीय पैरेंट्स के लिए बच्चों से सेक्स संबंधी मुद्दे पर बात करना आसान नहीं, लेकिन आप अगर अपने बच्चे की भलाई चाहते हैं, तो झिझक व संकोच छोड़कर आपको इस मामले पर बात करनी ही होगी. साइकोलॉजिस्ट प्रमिला श्रीमंगलम् कहती हैं, “पैरेंट्स को अपने और बच्चों के बीच के संवाद के पुल को मज़बूत बनाए रखना चाहिए और जब बच्चा सेक्स से जुड़े सवाल करने लगे, तो टालकर उसकी उत्सुकता बढ़ाने की बजाय सहजता से उसके सवालों का जवाब दें. बच्चे से नज़रें मिलाकर बात करें और ज़रूरत पड़े तो उसे सेक्स से जुड़ी कुछ अच्छी किताबें लाकर दें, ताकि उसे सही जानकारी मिले. सेक्स एज्युकेशन से बच्चों को न स़िर्फ अपने शारीरिक विकास के बारे में पता चलेगा, बल्कि सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ और अनवांटेड प्रेग्नेंसी (अनचाहा गर्भ) के बारे में भी पता चलेगा, जो उन्हें ग़लत रास्ते पर जाने से रोकेगी. वैसे कई स्कूलों में सेक्स एज्युकेशन का टॉपिक कवर किया गया है, लेकिन प्युबर्टी और सेक्सुअल डेवलपमेंट के बारे में बच्चों को बताने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी पैरेंट्स की ही है.”

डॉ. राजीव आनंद कहते हैं, “पैरेंट्स को बच्चों के सामने स्त्री/परुष के शारीरिक अंगों के बारे में गंदे और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और न ही उसे मज़ाक या उत्सुकता का विषय बनाना चाहिए. बच्चे को उसकी उम्र और समझ के मुताबिक बॉडी पार्ट्स और उनकी अहमियत समझानी चाहिए. साथ ही अभिभावकों को ये भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे को कब, क्या और कितना बताना है.”
बहरहाल, ये साफ़ है कि आज के दौर में अपने बच्चे की बेहतरी के लिए पैरेंट्स को झिझक छोड़कर सेक्स एज्युकेशन के लिए पहल करनी ही होगी.

 

– कंचन सिंह

महत्वपूर्ण हैं परवरिश के शुरुआती दस वर्ष (parenting- initial ten years are important)

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बच्चों की परवरिश में शुरुआती वर्ष बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. जन्म के साथ ही व्यवहार व संस्कारों के प्रति माता-पिता यदि सचेत रहें और कोशिश करें कि बच्चे बड़े-बुज़ुर्गों की छत्रछाया में अच्छे संस्कार, अच्छा व्यवहार व अच्छी आदतों का पालन करना सीखें, तो इसमें कोई दो राय नहीं कि आगे चलकर वे एक बेहतर इंसान बनेंगे.

 

चाइल्ड सायकोलॉजिस्ट व एक्सपर्ट्स की राय में शुरुआत के वर्षों में शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक विकास की प्रक्रिया तीव्र होती है. बच्चा जो कुछ भी इन वर्षों में देखता, सुनता या समझता है, उसका प्रभाव आजीवन बना रहता है. वैसे भी व्यक्ति के निजी स्वभाव में कुछ जन्मजात प्रवृत्तियां शामिल होती हैं और कुछ वातावरण का प्रभाव होता है. बच्चों को समझने के लिए इन दोनों पर ध्यान देना ज़रूरी है, अन्यथा हम अपने ही बच्चों को अनजाने में हानि पहुंचा सकते हैं, जिसका नकारात्मक प्रभाव उनके भविष्य को ग़लत मोड़ दे सकता है.

कई बार बच्चों के ग़लत व्यवहार के कारण माता-पिता परेशान भी होते हैं और शर्मिन्दा भी, किंतु यदि बच्चों के व्यवहार पर ग़ौर किया जाए, तो निश्‍चय ही बच्चे के क्रोध, चिड़चिड़ेपन या मिसबिहेव करने के पीछे कोई ऐसा कारण सामने आएगा, जिसे या तो हम समझ ही नहीं पाए हैं या अनदेखा कर बैठे हैं. ये कारण बहुत ही मामूली और मासूम से हो सकते हैं, जैसे –

भूख- ज़रूरी नहीं है कि भूख स़िर्फ खाना खाने की हो. कभी-कभी किसी विशेष आहार की कमी या अधिकता के कारण भी बच्चा चिड़चिड़ा हो सकता है और परेशान कर सकता है, ताकि वो आपका ध्यान आकर्षित कर सके. भूख के अलावा प्यास के कारण भी बच्चों का ध्यान भटकता है और उनकी एकाग्रता टूटने लगती है.

थकान- स्कूल से लौटने पर उन्हें खिला-पिलाकर या तो हम चाहते हैं कि बच्चा होमवर्क करने बैठ जाए या खेलने जाए, जबकि बच्चा अगर थका है, तो हो सकता है कि वो स़िर्फ बैठना या बात करना चाहता हो. एक के बाद एक एक्टिविटी भी बच्चे को थका देती है. हर समय पैरेंट्स के मन मुताबिक कुछ न कुछ करते रहने से भी बच्चे ऊब जाते हैं और पलटकर जवाब देना या काम को टालना शुरू कर देते हैं.

निराशा- किसी बात से दुखी-निराश होने पर भी बच्चे का व्यवहार प्रतिकूल होने लगता है. शरीर में कहीं दर्द या मानसिक डर, पैरेंट्स से दूर होना, पैरेंट्स का किया हुआ वादा तोड़ना, उनकी ज़रूरतों को न समझना, ज़रूरत के समय पैरेंट्स का साथ न मिल पाना आदि बातें बच्चों को निराश करती हैं.

उपेक्षा- छोटे भाई-बहन के कारण, मेहमानों के कारण, किसी नए उपकरण के कारण या अन्य किसी भी वजह से यदि आप व्यस्त हो जाते हैं, तो बच्चा उपेक्षित महसूस करता है अथवा उसके किसी क्रिएशन पर आपका ध्यान न गया हो या जब वो आपसे कुछ शेयर करना चाहता हो और आप व्यस्त हों, वो आपके साथ बैठना चाहता हो और आप फोन पर बातें करने में बिज़ी हों, तो वो ख़ुद को उपेक्षित महसूस करता है. अक्सर देखा गया है कि जब मां फोन पर बात करती है, तो उस समय बच्चा मां का अटेंशन पाने के लिए कुछ ऐसा कर बैठता है कि वो बात नहीं कर पाती है. बच्चे हर समय माता-पिता का ध्यान ख़ुद पर चाहते हैं. न मिलने पर वो निगेटिव बिहेवियर करने लगते हैं, ताकि आप किसी भी तरह रिएक्ट करें और उसे आपका अटेंशन मिले.

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विभिन्न स्थितियों में बच्चों को कैसे हैंडल करें?
ग़लत व्यवहार को नज़रअंदाज़ करें- यदि बच्चा तीन वर्ष से कम उम्र का है और उसने आपका ध्यान आकर्षित करने के लिए रोने की आदत बना ली है, तो उसके रोने पर ध्यान न दें. हां, ज़रूरत इस बात को समझने की भी है कि रोना किस कारण से है. साथ ही शांतिपूर्वक व्यवहार दर्शाने पर प्रशंसा करना न भूलें. धीरे-धीरे बच्चा पॉज़ीटिव व निगेटिव व्यवहार के अंतर को समझने लगता है.

ध्यान हटाएं- जिस चीज़ के लिए बच्चा ज़िद कर रहा है, उससे उसका ध्यान हटाने के लिए किसी दूसरी मज़ेदार वस्तु के प्रति उसे आकर्षित करें या बात ऐसे बदलें कि वो रोना-चिल्लाना भूलकर बहल जाए, लेकिन आजकल ङ्गचिड़िया ले गईफ या ङ्गचंदा मामा लाएगाफ जैसी बातें निरर्थक हैं, क्योंकि बच्चे काफ़ी स्मार्ट हैं.

प्रतिक्रिया बदलें- तीन साल से बड़ी उम्र के बच्चों के लिए उपेक्षा करना या ध्यान हटाने जैसी क्रियाएं बेमानी हो जाती हैं. बेहतर होगा, उनसे बात करें. उनकी बात बिना रोक-टोक के सुनें और फिर अपनी प्रतिक्रिया उसके अनुरूप बदलें. सही-ग़लत के अंतर को समझाएं. हां, बात करते समय सही शब्दों के चुनाव व सही तरीक़ा अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें.

सलाह दें- किसी बड़े-बुज़ुर्ग के पास जाकर शिकायत करने के बाद कभी-कभी बच्चे अच्छा महसूस करते हैं और उनसे समाधान भी चाहते हैं, लेकिन कई बार पैरेंट्स की प्रतिक्रिया विपरीत होती है, जैसे- ङ्गक्या बार-बार शिकायत करने आ जाते हो, आपस में निबट लो.फ ऐसा न कहें, क्योंकि वो आपसे सलाह व समाधान चाहते हैं.

शेयर करना सिखाएं- शेयर करना एक महत्वपूर्ण सामाजिक गुण है. इस गुण के साथ बच्चे छोटे-बड़े, भाई-बहन व दोस्तों के साथ गेम्स या अपने खिलौनों को शेयर करके एंजॉय कर सकते हैं. ऐसी बातों के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें और उनकी प्रशंसा भी करें.

हट जाना सिखाएं- जब बच्चों के बीच झगड़ा बढ़ता हुआ लगे, तो उन्हें बताएं कि ऐसी स्थिति में वहां से चुपचाप हट जाना झगड़े को शांत करने का एक अच्छा तरीक़ा है. बुलीज़ के साथ डील करने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है. सामने रहकर तर्क-वितर्क करने से बेहतर है, वहां से
चले जाना.

पिटाई न करें- इस विषय पर दो राय हो सकती है. कुछ पैरेंट्स को लगता है कि सुधारने या अनुशासित करने के लिए पिटाई ज़रूरी है, क्योंकि ये पिटाई उनके भले के लिए ही तो होती है, लेकिन मुख्य बात तो ये है कि पिटाई करके आप बच्चे को मारना सिखा रहे हैं. वो अपने ही छोटे भाई-बहनों या दोस्तों पर हाथ उठाने में झिझकेगा नहीं. साथ ही हिंसा व क्रोध को भी ग़लत नहीं समझेगा.

धैर्य रखें- यदि मेहमानों के सामने या सार्वजनिक स्थानों पर बच्चा मिसबिहेव करने लगे, तो शांत रहें. धैर्य से काम लें. उसे समझाने की कोशिश करें, फिर भी वो न माने, तो वहां से बच्चे को हटा दें. किसी भी स्थिति में चिल्लाना या मार-पीट उचित नहीं.

सम्मान दें- बच्चों के साथ हमेशा बड़ों जैसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए. बच्चे भी चाहते हैं कि उनसे अच्छी तरह बात की जाए, उन्हें महत्वपूर्ण समझा जाए, इसलिए उनसे संबंधित बातों में उनकी राय ली जा सकती है.

– प्रसून भार्गव

परवरिश निखारती है बच्चे का व्यक्तित्व (Parenting influences personality of a child)

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परवरिश के लिए ज़रूरी है अच्छा माहौल
बच्चे के व्यवहार और सोच पर उसकी परवरिश का बहुत असर पड़ता है. बच्चे की परवरिश जिस माहौल में होती है उसका असर उसके भविष्य पर भी पड़ता है.

अगर शुरुआत से ही बच्चे को प्रोत्साहन मिलता है, तो वह आत्मविश्‍वासी बनता है.

यदि बच्चा अपने माता-पिता को बहुत कुछ सहते हुए देखता है, तो उनकी सहनशीलता देखकर वह धैर्य रखना सीखता है.
अगर शुरू से बच्चा तारी़फें पाता है, तो बड़े होकर वह दूसरों की प्रशंसा करना सीखता है.
यदि बच्चा अपने घर व आसपास ईमानदारी देखता है, तो वह सच्चाई सीखता है.
अगर बच्चा सुरक्षित माहौल में रहता है, तो वह ख़ुद पर और दूसरों पर भरोसा करना सीखता है.

अगर बचपन से ही उसे आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है, तो वह भी दूसरों की निंदा करना सीखता है.
यदि बच्चा बचपन से घर में लड़ाई-झगड़े देखता है तो वो भी लड़ना सीख जाता है.
अगर छोटी उम्र से ही उसे किसी तरह के डर का सामना करना पड़ता है, तो बड़े होने पर वो हमेशा आशंकित या चिंतित रहता है.
यदि घर और बाहर हमेशा उसका मज़ाक उड़ाया जाता है, तो वह शर्मीला व संकोची बन जाता है.
अगर बच्चे की परवरिश ऐसे माहौल में हुई हो जहां उसे जलन की भावना का सामना करना पड़ा हो, तो बड़ा होने पर वो दुश्मनी सीखता है.

पैरेंट्स के लिए ज़रूरी बातें
बच्चे को अच्छा इंसान बनाने के लिए माता-पिता को कुछ बातों पर अमल करना चाहिए, जैसे-
यदि आप चाहते हैं कि बच्चा आपका और दूसरों का सम्मान करे, तो पहले बच्चे को सम्मान दें.
अपने लाड़ले/लाड़ली पर विश्‍वास करें.
बच्चे को अनुशासित बनाने के लिए कुछ नियम ज़रूर बनाएं, लेकिन वो ऐसे न हों जिन्हें बदलने की गुंजाइश न रहे.
पैरेंट्स बच्चों को सिखाते हैं, साथ ही वे बच्चों से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं.
बच्चे के आत्मविश्‍वास की रक्षा करें. उसे हर वो काम करने की स्वीकृति दें जिससे उसका आत्मविश्‍वास बढ़ता हो.
बड़ा होने पर उसे ये ख़ुद तय करने दें कि आगे उसे क्या करना है. उस पर अपने सपने और उम्मीदें न थोपें.
बच्चे को प्यार की अहमियत समझाएं. जब भी मौक़ा मिले उसे गले लगाएं और बताएं कि आप उसे कितना प्यार करते हैं. इससे वह दूसरों से प्यार करना सीखता है.
जब भी बच्चा आपके सामने आए, तो आपकी आंखों में ख़ुशी दिखनी चाहिए, परेशानी या उदासी नहीं.
यदि आप चाहते हैं कि बच्चा चीज़ों की क़द्र करे, तो उसे सिखाएं कि जीवन में जो भी मिलता है उसके लिए वह ईश्‍वर का शुक्रगुज़ार रहे.
– नलिनी एस.

यूं करें अकेले बच्चे की परवरिश (Learn ways to raise a happy single child)

Parenting Tips
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वजहें चाहे जो भी हों, लेकिन इन दिनों अधिकतर कपल्स एक ही बच्चा पैदा करने में भरोसा रखने लगे हैं और इस बदलते परिवेश में ‘ओनली चाइल्ड-लोनली चाइल्ड’ वाली कहावत भी अब पूरी तरह सही नहीं बैठती. अकेले बच्चे को किस तरह दी जा सकती है अच्छी परवरिश, आइए जानें.

 

एज्युकेटेड और करियर को लेकर सचेत रहनेवाले कपल्स की संख्या जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे परिवार और छोटे होते जा रहे हैं. कभी ‘हम दो हमारे दो’ का हिट स्लोगन अब ‘हम दो हमारा एक’ तक आ पहुंचा है. समय, जगह या पैसों की कमी… वजहें चाहे जो हों, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि एक ही बच्चा पैदा करने वाले कपल्स की संख्या अब तेज़ी से बढ़ रही है. बच्चों की परवरिश वैसे ही बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है, उस पर जब एक ही बच्चा हो तो यह ज़िम्मेदारी और ख़ास बन जाती है कि उसे किस तरह सही परवरिश मिले.

अपना नज़रिया बदलें

यदि आप इकलौते बच्चे के पैरेंट्स हैं, तो सबसे पहले अपना नज़रिया बदलें और मन में किसी भी तरह की हीनभावना न पालें. अकेला बच्चा होने के सकारात्मक पहलुओं पर ग़ौर करें, जैसे- यदि दो या अधिक बच्चे होते, तो आपको उनके साथ भी क्वालिटी टाइम बिताना होता, लेकिन चूंकि वो अकेला है, इसलिए आप अपना सारा व़क़्त उसके साथ बिताकर पैरेंटिंग का पूरा लुत्फ़ उठा सकते हैं. आपके पास उपलब्ध सभी साधनों का इस्तेमाल आप बच्चे को ज़िम्मेदार नागरिक बनाने में कर सकते हैं आदि. आपकी सोच सकारात्मक होगी तो बच्चे को कभी अकेलापन महसूस नहीं होगा और यक़ीनन उसकी परवरिश करना आपके लिए आसान होगा.

बच्चे को पूरा समय दें

बच्चे की अच्छी परवरिश के लिए उसके साथ समय बिताएं. केवल अच्छे-अच्छे उपहार देने भर से आपकी ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं हो जाती. माना आप अपने करियर की वजह से ही परिवार नहीं बढ़ा रहे हैं, लेकिन अपने बच्चे को सही-ग़लत की जानकारी देना भी आपकी ही ज़िम्मेदारी है और इसके लिए आपको उसके साथ समय बिताना ही होगा. समय न दे पाने की जगह यदि आप पॉकेटमनी, उसके जन्मदिन पर फैंसी बर्थडे पार्टी या ग़िफ़्ट दे कर अपनी ज़िम्मेदारी से बचेंगे तो बच्चे को ग़लत संदेश मिलेगा. यदि आपके ऑफ़िस आवर्स ज़्यादा हैं तो घर के कामों के लिए कोई हेल्पर रखें और ऑफ़िस के बाद का अधिकांश समय बच्चे के साथ ही बिताएं.

बच्चे को व्यस्त रखें

अकेले बच्चे अक्सर बोर होने लगते हैं और बोरियत दूर करने के लिए अमूमन उन्हें टीवी, वीडियो गेम या इंटरनेट आदि का चस्का लग जाता है. इससे उनकी सेहत को नुक़सान पहुंचता है और उनके विकास पर भी नकारात्मक असर पड़ता है. अतः बच्चे को किसी रचनात्मक कार्य में व्यस्त रखें. आजकल सभी शहरों में बच्चों के लिए क्रिएटिव क्लासेज़ उपलब्ध हैं. बच्चे की रुचि के अनुसार आप उसे इन क्लासेज़ में भेज सकते हैं. क्लास का समय वह चुनें, जब आप ऑफ़िस में रहते हों, ताकि आपकी ग़ैरमौजूदगी में बच्चा रचनात्मक कार्य में लगा रहे और ऑफ़िस से लौटने के बाद तो आप उसके साथ होंगे ही.

मनोरंजन का ख़्याल रखें

बच्चे के मनोरंजन का पूरा ख़्याल रखें. टीवी, इंटरनेट, खेल-कूद और क़िताबें सभी बच्चों का भरपूर मनोरंजन करते हैं. बस, ज़रूरत है कि आप उन्हें इस तरह ग्रूम करें कि वे टीवी, इंटरनेट या वीडियो गेम जैसे मनोरंजन के साधनों का कम और खेल-कूद व क़िताबों का ज़्यादा उपयोग करें. अकेले बच्चों का क़िताबों से बेहतर कोई साथी नहीं हो सकता और उनमें क़िताबों के प्रति रुचि जगाना भी आसान है, लेकिन इसकी शुरुआत तभी कर दें, जब वे छोटे हों.

रिश्ते निभाना सिखाएं

अधिकतर अकेले बच्चे रिश्तों को निभाने में थोड़ा पीछे रह जाते हैं. अतः आप शुरू से ही उन्हें रिश्तों की जानकारी दें, उन्हें फ्रेंड्स बनाने को प्रोत्साहित करें और दोस्तों तथा दोस्ती का महत्व भी बताएं. अकेले बच्चों को दूसरों के साथ अपना सामान शेयर करना भी पसंद नहीं होता, लेकिन यदि आप रोल मॉडल बन कर उन्हें सिखाएंगे तो वे आसानी से अपनी चीज़ों को शेयर करना सीख जाएंगे.

ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान न दें

बच्चा इकलौता हो तो स्वाभाविक रूप से पैरेंट्स उस पर ज़्यादा ध्यान देने लगते हैं, ख़ासतौर पर तब, जब मां होममेकर हो. इससे बचने लिए ज़रूरी है कि ऐसी मांएं केवल बच्चों की ओर ही नहीं, बल्कि अपनी हॉबीज़ की ओर भी ध्यान दें. यदि पूरे व़क़्त बच्चे पर ध्यान दिया जाए तो उसके व्यक्तित्व का समग्र विकास नहीं हो पाता. अतः पैरेंट्स को अकेले बच्चे पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देने से बचना चाहिए.

– सुचेता फडनीस

बच्चों में गैजेट एडिक्शन- कितना अच्छा-कितना बुरा? (Gadget Addiction In Kids Good Or Bad?)

 

Gadget Addiction
हाईटेक होते ज़माने में जहां हर चीज़ मोबाइल ऐप पर उपलब्ध होती जा रही है, ऐसे में बच्चों को गैजेट्स से दूर रखना क्या सही है? आज के दौर में हम बच्चों को गैजेट्स से पूरी तरह दूर तो नहीं रख सकते, मगर इनके इस्तेमाल की समयसीमा ज़रूर तय कर सकते हैं. बच्चों में गैजेट एडिक्शन कितना सही या ग़लत है? बता रही हैं प्राची भारद्वाज.

माता-पिता की जागरूकता के बावजूद आज दो साल के बच्चे भी टच स्क्रीन फोन चलाना, स्वाइप करना, लॉक खोलना और कैमरे पर फोटो खींचना जानते हैं. एक नए शोध (82 प्रश्‍नावली के आधार पर) के अनुसार, 87% अभिभावक प्रतिदिन औसतन 15 मिनट अपने बच्चों को स्मार्टफोन खेलने के लिए देते हैं, जबकि 62% ने बताया कि वे अपने बच्चों के लिए ऐप्स डाउनलोड करते हैं. स्मार्टफोन के मालिक हर 10 में से 9 अभिभावकों ने बताया कि उनके नन्हें-मुन्ने फोन स्वाइप करना जानते हैं, 10 में से 5 ने बताया कि उनके बच्चे फोन को अनलॉक कर सकते हैं, जबकि कुछ अभिभावकों ने माना कि उनके बच्चे फोन के अन्य फीचर भी ढूंढ़ते हैं. मनोवैज्ञानिकों की मानें, तो पिछले 3 वर्षों में तकनीक पर आश्रित लोगों की संख्या 30 गुना बढ़ गयी है.

गैजेट के अधिक इस्तेमाल से सेहत पर असर

माइकल कोहेन ग्रुप द्वारा किए गए शोध से पता चला कि टीनएजर्स गैजेट्स से खेलना ज़्यादा पसंद करते हैं. गैजेट्स लेकर दिनभर बैठे रहने के कारण उनमें मोटापे की समस्या बढ़ रही है. साथ ही आईपैड, लैपटॉप, मोबाइल आदि पर बिज़ी रहने के कारण वो समय पर सो भी नहीं पाते, जिससे उन्हें शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है. गैजेट के अधिक इस्तेमाल से बच्चों में व्यग्रता, उत्कंठा, अवसाद, आत्मकेंद्रित, मनोरोग व अन्य समस्याएं हो रही हैं.

कुछ फ़ायदे भी हैं

बच्चे विकिपीडिया, गूगल, स्मार्ट वॉइस असिस्टेंट इत्यादि से महत्वूर्ण जानकारी हासिल कर सकते हैं. कुछ स्कूलों में तो छोटी क्लास से ही टैबलेट इस्तेमाल किया जाने लगा है. ऐसे ही एक स्कूल की टीचर आशिका भाटिया कहती हैं, “टैबलेट की मदद से बच्चे रंग, आकार, नए शब्दों या अंकों को आसानी से पहचानते हैं और ख़ुशी से सीखते हैं, लेकिन इसका इस्तेमाल समयसीमा में ही होना चाहिए.” कुछ ऐसा ही कहना है गुड़गांव में क्लीनिक चलाने वाली डॉ. सोनल का. उनके मुताबिक़, बदलते व़क्त में गैजेट में बिज़ी रहने के कारण बच्चे घर में ही रहते हैं, जिससे माता-पिता को उनकी सुरक्षा की चिंता नहीं होती. बस, ज़रूरत है तो गैजेट के इस्तेमाल की समयसीमा तय करने की.

क्या हो समय सीमा?

अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की स्टडी के मुताबिक़, दो वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी तरह की स्क्रीन से दूर रखना चाहिए. तीन से पांच वर्ष के बच्चे एक घंटा और टीनएज बच्चों को केवल 30 मिनट प्रतिदिन तक गैजेट इस्तेमाल की अनुमति दी जानी चाहिए.

कैसे पहचानें बच्चे के गैजेट एडिक्शन को?

यदि आपके बच्चे में निम्न लक्षण दिखें, तो समझ जाइए कि वो गैजेट एडिक्शन का शिकार हो चुका है.
* गैजेट चलाने की अनुमति न मिलने पर ग़ुस्सा आना, चिड़चिड़ापन, उदास हो जाना आदि.
* गैजेट के इस्तेमाल के कारण खाने, सोने आदि का समय बदलना.
* ध्यान में कमी, याददाश्त कमज़ोर होना, व्यावहारिक दिक्क़तें, कुछ नया सीखने में मुश्किल आदि.
* सोशल होने से आनाकानी करना.

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क्या करें पैरेंट्स?

* बच्चों को ख़ुश करने की बजाय उनकी भलाई के बारे में सोचना चाहिए. उन्हें अनुशासन में रखने के साथ ही कुछ अन्य बातों का ध्यान रखकर गैजेट की लत से बचाया जा सकता है.
* टीवी, कंप्यूटर या फोन अपने बच्चों को किसी भी स्क्रीन का उपयोग केवल 30 मिनट प्रतिदिन तक ही करने दें.
* बच्चों को इनाम में गैजेट की बजाय कुछ और उपयोगी वस्तु दें.
* अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार, खाना खाते समय, होमवर्क करते समय, सोते समय बच्चों को गैजेट से दूर रखें.
* कोशिश करें कि बच्चा जब टीवी, कंप्यूटर पर बिज़ी हो, तो आप उसके साथ रहें ताकि ये देख सकें कि वो स्क्रीन पर क्या देख रहा है.
* मोबाइल पर गेम खेलते देख उसे नज़रअंदाज़ करने की बजाय बच्चे को बाहर जाकर दोस्तों के साथ खेलने के लिए प्रेरित करें.
* बच्चे की फिज़िकल एक्टिविटी बढ़ाएं.
* यदि बच्चा आपकी बात मानते हुए आपके द्वारा तय समय तक ही गैजेट का इस्तेमाल करता है, तो उसे प्रोत्साहित करना न भूलें. आज के दौर में आप उन्हें गैजेट्स से पूरी तरह दूर तो नहीं रख सकते, लेकिन संतुलन बनाकर उन्हें इसका आदी होने से ज़रूर बचा सकते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

मुंबई की सादिया वंजारा कहती हैं, “छोटे बच्चे झुककर, बैठकर टीवी, कंप्यूटर आदि में खोये रहते हैं, जिससे उनकी गर्दन, पीठ, कंधों में तकलीफ़ हो जाती है.”
साइकोलॉजिस्ट डॉ. हरीश शेट्टी का मानना है कि मोबाइल फोन के द्वारा बच्चा इंटरनेट, ऑनलाइन खेल के साथ-साथ पॉर्न की दुनिया में भी झांक सकता है और ये उसके लिए कतई ठीक नहीं.
चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. दलवई एक केस का ज़िक्र करते हुए बताते हैं कि एक 3 वर्षीय बच्चे को सबने आत्मकेंद्रित (ऑटिस्टिक) समझ लिया था, क्योंकि वो किसी से नज़रें नहीं मिलाता था, बातचीत नहीं करता था और अन्य बच्चों के साथ खेलता भी नहीं था, लेकिन इन सबकी असली वजह थी उसका घंटों तक ऑनलाइन शो देखते रहना. डॉ. दलवई के अनुसार, “गैजेट से स़िर्फ एकतरफ़ा संचार संभव है. टच-पैड की बजाय बच्चे को कोई पेट (पालतू जानवर) लाकर दें. गैजेट के आदी बच्चों की दुनिया बस वहीं तक सिमटकर रह जाती है.”

न करें बच्चे की ग़लतियों को नज़रअंदाज़ (Don’t overlook your children’s mistakes)

Parenting

हर माता-पिता अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं और उनकी अच्छी परवरिश करने की कोशिश करते हैं, मगर कई बार बच्चों के प्रति अंधा प्यार उन्हें ग़लत दिशा में ले जाता है. जाने-अनजाने बच्चों की ग़लतियां छुपाकर या उन पर परदा डालकर माता-पिता अपने बच्चों का भविष्य बिगाड़ते हैं. आपके ऐसा करने पर आगे चलकर बच्चे के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी. बच्चों के झूठ को छुपाना क्यों सही नहीं है? बता रही हैं पल्लवी राघव.

 

संजना का 6 साल का बेटा रोहन स्कूल में सबको मारता रहता है. शाम को पार्क में खेलते हुए भी वह ऐसा ही करता है. संजना को कई बार दूसरे बच्चों की मांओं ने रोहन के इस बर्ताव के बारे में आगाह भी किया, लेकिन वो इस बात को मानने को तैयार ही नहीं होती. किसी के शिकायत करने पर वो कोई बहाना बनाकर वहां से उठ जाती है या फिर बात को टालने की कोशिश करती है. कभी-कभी वह रोहन को प्यार से झूठी डांट लगाती है और अगले ही पल उसे वहां से ले जाती है. धीरे-धीरे बच्चों ने रोहन के साथ खेलना बंद कर दिया. संजना दिनभर अपने पति रोहित से दूसरे बच्चों की शिकायत करती कि बच्चों का अपना ग्रुप है और कोई रोहन के साथ नहीं खेलना चाहता, लेकिन रोहित भली-भांति जानते थे कि ग़लती रोहन की है. वे संजना को बार-बार समझाने की कोशिश करते कि रोहन की भी ग़लती हो सकती है, परंतु संजना जैसे यह मानने को तैयार ही नहीं थी. यदि आप भी संजना जैसी ही मां हैं, तो संभल जाइए, क्योंकि ऐसा करके आप अपने बच्चे को ख़ुद ही बिगाड़ रही हैं. आइए, जानते हैं कि पैरेंट्स के इस व्यवहार के पीछे क्या वजह होती है?

बच्चों के प्रति सख़्त न होना

ऐसे कई मामलों में देखा गया है कि मांएं इतनी कम उम्र में बच्चे के साथ सख़्ती से पेश नहीं आना चाहतीं, लेकिन वो शायद यह बात नहीं समझतीं कि परवरिश स़िर्फ ममता न्योछावर करके नहीं की जा सकती. बच्चों की परवरिश करते हुए कई बार हमें कठोर भी होना पड़ता है. यदि कम उम्र से ही बच्चों को सिखाया जाए कि दोस्तों की रिस्पेक्ट करनी चाहिए, उनकी बात सुननी चाहिए, उनके साथ मिलकर रहना चाहिए, तो यक़ीनन बच्चे ये बात गांठ बांध लेंगे. जब कोई आकर आपसे बच्चे की शिकायत करे, कोई रिश्तेदार या पड़ोसी/मित्र उसके बारे में कोई राय दे, तो उनकी बात ग़ौर से सुनें और बच्चे के व्यवहार पर ख़ुद नज़र रखें. यदि बर्ताव में कुछ ग़लत लग रहा है, तो उसे सुधारने की कोशिश करें. हो सकता है, अपने बच्चे को समझाने के लिए आपको कभी-कभार उससे सख़्ती से भी पेश आना पड़े, लेकिन इसमें कुछ ग़लत नहीं है. आपकी डांट बच्चे का भविष्य सुधार सकती है, लेकिन उसकी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करने पर उसका भविष्य ख़राब हो सकता है.

बच्चे के प्रति अंधा स्नेह

अपने बच्चे से तो हर किसी को प्यार होता है, मगर कुछ मांएं बच्चे के प्यार में इस कदर अंधी हो जाती हैं कि उन्हें कभी उसकी ग़लती दिखाई नहीं देती. वो हर हाल में अपने बच्चे को ही सही ठहराती हैं, भले ही उसने कितनी भी बड़ी ग़लती क्यों न की हो. अक्सर देखा गया है कि जिन कपल्स को बच्चा देर से होता है, उनमें बच्चे के प्रति अंधा स्नेह ज़्यादा होता है. वो हर हाल में बच्चे को ख़ुश देखना चाहते हैं, लेकिन उन्हें इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं होता कि उनका ये अंधा प्यार उनके लाड़ले/लाड़ली के भविष्य को अंधकारमय बना सकता है. विशेषज्ञों के मुताबिक़, बच्चों को छोटी उम्र से ही सही-ग़लत की शिक्षा दी जानी चाहिए. उन्हें अपनी ग़लती का एहसास होना चाहिए और जब तक आप उन्हें ग़लती सुधारने के लिए नहीं कहेंगी, वो आगे भी इसे दोहराते रहेंगे. जब आप उन्हें प्यार से समझाएंगी, तो निश्‍चय ही उन्हें अपनी ग़लती का एहसास होगा और वो उसे सुधारने की पूरी कोशिश करेंगे.

अपनी परवरिश को सही मानना

दुनिया में कोई भी इंसान हर चीज़ में परफेक्ट नहीं होता, मगर कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्हें लगता है कि वो परफेक्ट मॉम हैं और बच्चे की परवरिश का उनका तरीक़ा सही है. ऐसी मांएं दूसरों की नसीहतें नहीं मानतीं. यदि कोई इनसे इनके बेटे/बेटी की शिकायत करता है, तो ये उल्टे शिकायत करने वाले पैरेंट्स और उस बच्चे को ज़िम्मेदार ठहराने लगती हैं. मेरा बच्चा ऐसा कर ही नहीं सकता, मैं उसे अच्छी तरह जानती हूं, ज़रूर आपके बच्चे ने ही कोई शरारत की होगी… इस तरह वो सामनेवाले पर ही बरस पड़ती हैं. ज़रा सोचिए, यदि मां-बाप ही बच्चों की ग़लतियों पर परदा डालने लगेंगे, तो बच्चा बिगड़ेगा ही. साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि दूसरों की बात सुनने का ये मतलब नहीं है कि आप बच्चे की बात सुने बिना ही उसे डांटने लगें. पहले उससे पूछें कि उसने इस तरह का बर्ताव क्यों किया? कारण जानने के बाद उसे प्यार से समझाएं.

ग़लतियों पर परदा डालने के साइड इफेक्ट

बच्चे को लाड़-प्यार करना अलग बात है, मगर उसकी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करना आगे चलकर आपको भारी पड़ सकता है. इससे बच्चे के व्यक्तित्व पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा.
ऐसा करके पैरेंट्स ख़ुद बच्चे के भविष्य के दुश्मन बन जाते हैं. यह जानते हुए भी कि वो अन्य बच्चों को परेशान कर रहा है, बड़ों से तमीज़ से पेश नहीं आ रहा, उसने झूठ बोलना शुरू कर दिया है और आपसे भी बातें छुपा रहा है, बावजूद इसके यदि आप उसकी इन हरक़तों को नज़रअंदाज़ करती हैं, तो आगे चलकर वो आपके साथ भी बदतमीज़ी कर सकता है.
बच्चे हमेशा अपने मन की ही करते हैं. हर बात के लिए ज़िद्द करते हैं, क्योंकि वो जानते हैं कि माता-पिता से वो अपनी बातें मनवा सकते हैं. ऐसे बच्चों के अभिभावक बाद में बच्चों से बदलाव की अपेक्षा करते हैं, लेकिन तब ये बहुत मुश्किल हो जाता है.
छोटी उम्र से ही बच्चों में अच्छी आदतें व संस्कार डालने चाहिए, तब कहीं जाकर बड़े होने पर भी वो संस्कारी बनेंगे और सबका सम्मान करेंगे. अतः बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उनकी ग़लतियों पर परदा डालने की भूल न करें.
जब कोई आपके बच्चे के बारे में कुछ कहे, तो उसे ध्यान से सुनिए. यदि आप किसी की बात नहीं सुनेंगी, तो लोग आपसे और आपके बच्चे से हमेशा दूरी बनाए रखेंगे और कोई भी आपके बच्चे से दोस्ती करना पसंद नहीं करेगा.
अपने बच्चों के व्यवहार पर नज़र रखें और समय रहते उन्हें उनकी ग़लतियों के लिए टोकें.
बच्चे तभी सफल होंगे जब उनमें अच्छे संस्कार हों. मॉडर्न होने के साथ साथ अपने रीति-रिवाज़ों को भी समझें और उनके बारे में बच्चों को भी बताएं.

कैसे करें बच्चों का मॉर्निंग रूटीन तैयार? (How to make your children ready for morning routine?)

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क्या आपको लगता है कि सुबह के 9 बजे तक घर का काम निपटाते-निपटाते आप मैराथॉन दौड़ आई हैं. आजकल की व्यस्त ज़िंदगी में जहां बच्चों की परवरिश मुश्किल होती जा रही है, उससे भी ज़्यादा मुश्किल होता है एक मां के लिए दिनचर्या को नियंत्रित कर पाना. सूरज उगने से पहले पूरे परिवार के लिए खाना बनाना, बच्चों का टिफिन तैयार करना, उन्हें स्कूल के लिए तैयार करना किसी चुनौती से कम नहीं होता. एक नौकरीपेशा मां के लिए ये काम और भी मुश्किल होता है. आपकी मुश्किल को आसान बनाने के लिए सुषमा विश्‍वकर्मा बता रही हैं कुछ कारगर टिप्स.

अक्सर मम्मियों को बातें करते देखा जाता है कि किस तरह उन्हें रात से ही सुबह की चिंता रहती है कि वो समय से उठ पाएंगी या नहीं, टिफिन तैयार कर पाएंगी या नहीं, कहीं आज बच्चे को स्कूल जाने में देर न हो जाए आदि. हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ आसान तरी़के, जिससे आपकी हर सुबह होगी सुकून भरी और ख़ुशहाल नींद हो पूरी बच्चों को हैंडल करना आसान काम नहीं है. सुबह के समय तो सारा काम एक तरफ़ और बच्चा एक तरफ़. आप अगर चाहती हैं कि आपका बच्चा समय पर उठे और नखरे न करे, तो उसके लिए आपको उसे जल्दी सोने की आदत सिखानी होगी. रात में जल्दी सोने पर सुबह वह समय पर उठ जाएगा. उसकी नींद पूरी हो जाएगी और वह आपको परेशान नहीं करेगा.
रात में ही करें तैयारी सुबह के नाश्ते और बच्चों के टिफिन की तैयारी रात में ही कर लें. जो सब्ज़ी सुबह बनानी है, उसे रात में काटकर रखें आटा गूंध लें. यूनिफॉर्म रात में ही तैयार करके रखें, ताकि सुबह उठने के बाद आपको यूनिफॉर्म रेडी करने का टेंशन न रहे. शूज़, वॉटर बॉटल, बैग, टिफिन, सब जगह पर रखें, जिससे आपको सुबह उठकर इन चीज़ों को ढूंढ़ना न पड़े. रात में की गई ये तैयारी सुबह आपके क़ीमती समय को बचाने में मदद करेगी.

जल्दी उठें

बच्चों के रूटीन के साथ-साथ आप अपना भी एक रूटीन बनाएं. बच्चों के उठने से पहले का अलार्म लगाएं, ताकि उनके उठने से पहले आप सभी ज़रूरी काम निपटा लें. इत्मिनान से एक कप चाय पी लें और दिन की शुरुआत बेहतर तरी़के से कर पाएं. सुबह जल्दी उठने से आप टेंशन फ्री रहेंगी और आपका पूरा दिन अच्छा बीतेगा.

वर्कलिस्ट बनाएं

अपने हर काम की लिस्ट तैयार करें. बच्चे को क्या-क्या काम करना है, रात में उसे एक पेपर पर लिखकर बच्चे के कमरे में चिपका दें. इससे सुबह बच्चा उस लिस्ट को फॉलो करके आधा काम ख़ुद ही कर लेगा और बचा हुआ काम आप कर सकती हैं. उदाहरण के लिए ब्रश करना है, नहाना है, यूनिफॉर्म पहननी है, बालों में कंघी करनी है, नाश्ता करना है, जूते पहनने हैं, अपना बैग तैयार करना है, लंचबॉक्स लेना है, पानी की बोतल लेनी है आदि. इन कामों की एक लिस्ट बनाएं और बच्चे को समझाएं. बच्चे को बताएं कि हर दिन सुबह उठकर उसे ये सारे काम ख़ुद करने हैं. हो सकता है, एक-दो दिन बच्चा काम करने में कुछ भूल जाए, लेकिन यक़ीन मानिए, कुछ दिनों बाद उसकी दिनचर्या सेट हो जाएगी.

जब तब का फॉर्मूला अपनाएं

सुनकर अजीब लगता है, लेकिन ये जब तब का फॉर्मूला बहुत कारगर सिद्ध हो सकता है, अगर आप अच्छी तरह इसे फॉलो करें. आप पता करें कि सुबह आपके बच्चे को क्या काम करने में मज़ा आता है? जैसे- अगर आपके बच्चे को नहाना पसंद है, तो उसे आप अपनी लिस्ट में सबसे पहले शामिल करें. फिर उससे कहें कि जब आप ब्रश कर लेंगे तब आपको नहाना है. अगर बच्चे को ब्रेकफास्ट करना पसंद है, तो उससे कहें कि आप जल्दी से ये काम कर लो फिर आपको ब्रेकफास्ट मिलेगा. इससे वो भी ख़ुशी-ख़ुशी और जल्दी-जल्दी काम करेगा. डॉ. नताशा नितिन साटम ने भी जब तब का फॉर्मूला अपनाया है. उनकी बेटी को गार्डन में खेलना बहुत पसंद है, इसीलिए जब वो अपनी बेटी को सुबह उठाती हैं, तो उसे गार्डन में चलने की बात कहती हैं. इससे उनकी बेटी ख़ुश हो जाती है और सारे काम जल्दी-जल्दी कर लेती है. इस जब तक की प्रक्रिया से उनकी सुबह टेंशन में नहीं, बल्कि ख़ुशी-ख़ुशी बीतती है.

कूल मॉम बनें

आज के बच्चे हमारे भी गुरु होते हैं. ऐसे में उनके साथ अगर शांति से पेश नहीं आया जाए, तो वो ग़लत तरह से ब्लैकमेल करते हैं. वैसे भी एक कहावत है कि जल्दबाज़ी में हर काम बिगड़ जाता है. सुबह-सुबह जल्दबाज़ी में काम करना, बच्चे पर चिल्लाना, ज़बर्दस्ती उसके हाथ में दूध का ग्लास पकड़ाना, उसे जल्दी-जल्दी नाश्ता खिलाना आदि बच्चे पर बुरा असर डालता है. इससे बच्चे को ऐसा लगने लगता है कि इन कामों की वजह से आपको टेंशन होती है. इसके कारण बहुत जल्द बच्चा इसके विपरीत काम करने लगता है. कई बार स्कूल जाने से भी आनाकानी करता है.

मॉम टाइम

सुबह के समय बच्चे को आपका साथ ज़्यादा चाहिए होता है. वो चाहता है कि आप उसे दुलारते और प्यार करते हुए गोद में लेकर जगाएं, उसे प्यार से सहलाएं, पप्पियां लें. जब बच्चे की सुबह इस तरह से होती है, तो उसका पूरा दिन बहुत अच्छा गुज़रता है. अतः सुबह किचन से ही ज़ोर से चिल्लाकर बच्चे को जगाने की कोशिश न करें. घर के किसी दूसरे मेंबर से भी जगाने को न कहें. ख़ुद ही स़िर्फ 5 मिनट बच्चे को दें.

वीकेंड को बनाएं स्पेशल

हफ़्ते के 5-6 दिन बच्चे के साथ-साथ आपकी दिनचर्या भी एक-सी रहती है. ऐसे में सप्ताह के आख़िरी दिन यानी छुट्टी को दिलचस्प बनाने की पूरी कोशिश करें. इस एक दिन बच्चे के साथ-साथ आप भी देर तक सोएं. सबकी पसंद का खाना बनाएं. छुट्टी के दिन काम की लिस्ट को फॉलो न करें. बच्चे का जो मन करे, उसे करने दें. शाम को उसे मार्केट ले जाएं. थोड़ी आउटिंग करें.

स्मार्ट टिप्स
बच्चों के स्कूल जाने के बाद कुछ मिनट के लिए रिलैक्स करें. इसके लिए आप अपना फेवरेट म्यूज़िक सुनें.
अगर सुबह के समय को आप अच्छी तरह मैनेज नहीं कर पा रही हैं और आपकी पड़ोसन इसमें परफेक्ट है, तो आप भी उसकी तरह काम करने की कोशिश करें.
होम केयर या पैरेंटिंग की जानकारी हासिल करने के लिए अच्छी मैगज़ीन पढ़ें या टीवी शो देखें.
जॉइंट फैमिली है, तो सासू मां से कुछ हेल्प लें. आमतौर पर बच्चे अपनी दादी से ज़्यादा जुड़े होते हैं. ऐसे में वो उनसे ही तैयार होना, खाना खाना आदि पसंद करते हैं.