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हर मां अपने बच्चे के देखभाल को लेकर चिंतित रहती है, ख़ासकर नई मांएं. यहां पर कई मांओं ने इसे लेकर अपने अनुभव साझा किए. यदि आप अपने मातृत्व के सफ़र को एंजॉय करेंगी, तब सब कुछ आसान होता चला जाएगा.

मौज से जीवन बिताएं. हर पल का आनंद उठाएं. क्योंकि आपका शिशु बहुत जल्द बढ़ता हैं और इससे पहले कि आप जाने, वह उड़ने के लिए तैयार हो जाता हैं. न्यूली मदर के लिए हर स्नान, हर मालिश, हर डायपर बदलने का काम बहुत ही महत्वपूर्ण और आनंददायक है, इसलिए इसे मिस न करें.
यह नम्रता दीपक सावधानी, जो सिटी एडिटर हैं का कहना है. उनके लिए मातृत्व अनगिनत अमिट यादों से भरी सबसे मधुर यात्रा रही है. वे कहती हैं, “यह एक शानदार अनुभव है और यह बात सिर्फ़ मैं अपने लिए नहीं, बल्कि सभी मांओं के लिए बोल रही हूं. मेरे बच्चे के जन्म से लेकर अब तक, जैसे मेरे बच्चे बड़े हुए, विकसित होते गए, उनके साथ मैं भी एक व्यक्ति के रूप में विकसित होती चली गई…
मैं दो बच्चों की मां हूं. इतने वर्षों में एक मां होने के नाते मैंने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि मेरे बच्चों को छोटी-छोटी परेशानियों का भी सामना न करना पडें. कोरोनो वायरस महामारी के कारण जारी लॉकडाउन के दौरान भी मेरी सीखने की यात्रा जारी है. जीवन का यह नया चरण कुछ ऐसा है, जिसके लिए हम में से कोई भी तैयार नहीं था. हमें इसमें एडजस्ट करने में कुछ समय लगा. लेकिन मेरे बच्चों ने मौजूदा हालत में ख़ुद को अच्छी तरह से ढाल लिया है. हमारी सभी बाहरी गतिविधियों को इनडोर प्लेटाइम में बदलना पड़ा. यह पहले तो चुनौतीपूर्ण था, लेकिन हमने एक अटूट बंधन भी विकसित किया और हमारे घर के हर कोनों को पहले से बेहतर बना लिया.
मुझे अब भी उनके बचपन के दिन याद हैं. मैं सभी माताओं को प्रोत्साहित करना चाहती हूं, विशेषकर उन्हें, जो इस लॉकडाउन में पहली बार मां बनी हैं.
उन्हें अपने शिशु की देखभाल करने के लिए खुद में विश्वास बढ़ाना होगा.
नई-नई मां बनी स्त्रियों को यह जानने की ज़रूरत है कि शिशु के कोमल त्वचा को बहुत ही नाज़ुक देखभाल की ज़रूरत होती है. इसलिए, उनके बेबी स्किन केयर उत्पादों का सही विकल्प चुनना महत्वपूर्ण है. विशेष रूप से बदलते मौसम में सही निर्णय आपकी कई चिंताओं को कम कर सकता है.
एक व्यस्क की त्वचा की तुलना में एक बच्चे की त्वचा बेहद नाज़ुक और संवेदनशील होती है और तेजी से नमी खो देती है. इसलिए सूखापन से बचाने के लिए मॉइश्चराइजिंग बहुत महत्वपूर्ण है.
साथ ही अभी माॅनसून के मौसम में, बच्चे की त्वचा को हाइड्रेट रखना महत्वपूर्ण है. अपने शिशुओं के लिए मुझे सही मॉइश्चराइज़र खोजने में कुछ समय लगा. मैं हमेशा उनकी नाजुक त्वचा के लिए एक जेंटल लोशन का उपयोग करना चाहती थी. मेरे शोध ने मुझे जॉनसन के बेबी लोशन तक पहुंचाया और इसने उनकी त्वचा पर अद्भुत काम किया. यह बच्चे के लिए सबसे अच्छा है और धीरे-धीरे त्वचा को पूरे दिन नर्म-मुलायम रखता है और इसे शिशु के चेहरे और शरीर पर उपयोग करने के लिए इसे काफ़ी हल्के ढंग से इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा, यह एक ऑल-सीजन मॉइश्चराइज़र है, जो प्राकृतिक त्वचा की नमी को बनाए रखने में मदद करता है.

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बेबी के नाज़ुक बालों को भी विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है. इसके लिए अच्छी क्वालिटी का बेबी शैम्पू का इस्तेमाल करें. यह बच्चे के सिर की कोमल त्वचा और बालों को साफ़ करता है और यह सुनिश्चित करता है कि आंखों को कोई लालिमा और चुभन न हो. इसने न केवल उनके बाल मुलायम, चमकदार बनते है, बल्कि एक नई ख़ुशबू भी बनी रहती है. बच्चों के लिए उच्च श्रेणी वाली कंपनी के प्रोड्क्ट इस्तेमाल करने से आपकी मदर जर्नी आसान और मज़ेदार हो जाती है.
मॉमजंक्शन की कंटेंट हेड, चंद्रमा देशमुख के अनुसार, मां बनना एक पूर्णकालिक और सबसे अधिक संतुष्टिदायक नौकरी है. मुझे याद है, जब मेरा बेटा एक छोटा था, इस ख़ूबसूरत यात्रा के हर पल ने मुझे ज़िन्दगी की सीख दी. क्योंकि जिस समय आप अपने हाथों में ख़ुशी के उस छोटे खज़ाने को लेते हैं, उसी वक़्त एक मां के रूप में आपका पुनर्जन्म भी होता है.
उनकी मासूम हंसी अनमोल हैं, उनकी मौजूदगी गर्मजोशी से भरी है. आनंद की आपकी छोटी-सी पोटली कोमल होती है, जिसे एक कोमल स्पर्श की आवश्यकता होती है.
ये शब्द ही सभी मांओं के लिए मेरे दिल से निकले सन्देश हैं. नई-नई मां बनी वर्तमान लॉकडाउन स्थिति में भ्रम और चिंता की स्थिति में होंगी. उन्हें सबसे पहले तो मानसिक तौर पर तैयार होने और शांत रहने की ज़रूरत हैं, ताकि वे इस समय अपने बच्चों की देखभाल ठीक से कर सके. अभी तो हालत यह है कि छोटी समस्याओं के लिए अस्पताल जाना भी मुश्किल है. बदलते मौसम के लिए अपनी शिशु देखभाल दिनचर्या को बदलना मददगार हो सकता है.

चूंकि माॅनसून का मौसम है, इसलिए रोज़ाना बच्चे को नहलाना ज़रूरी नहीं है. आप उन्हें हर दूसरे दिन स्नान करा सकती हैं. बस, यह सुनिश्चित करें कि पानी गर्म है और आप अपने बच्चे के साथ बातचीत करते हुए उन्हें नहलाएं. इस दौरान शिशु से बातचीत करती रहें, क्योंकि यह आपके बच्चे को पूरी प्रक्रिया के साथ सहज महसूस करने में मदद कर सकता है. मैं अपने बच्चे के जन्म के दिन से ही बेबी सोप का इस्तेमाल कर रही हूं. यह अल्ट्रा-माइल्ड वॉश होता है, जो आपके बच्चे की त्वचा और संवेदनशील आंखों के लिए कोमल होता है. यदि बच्चा एक नवजात शिशु है, तो एक कॉटन बॉल (रूई) या वॉशक्लॉथ के साथ इस हल्के क्लीन्ज़र का उपयोग करके बच्चे को पोंछ सकती है, चेहरे पर, आंखों के कोने, कान के पीछे, गर्दन आदि को साफ़ कर सकती है. उसके बाद धीरे से गुनगुना पानी डालें. इन साधारण उपायों का पालन करके आप अपने बच्चे को बेहतर तरीके से क्लीन कर सकती हैं. बच्चे को नहलाना जल्द ही बच्चे के साथ जुड़ने और बंधने के लिए एक मज़ेदार काम में बदल जाएगा.
शिशुओं में मां के स्पर्श को लेकर तेज इमोशन होती है. यह न केवल उन्हें आराम देता है, बल्कि उन्हें आरामदायक और सुरक्षित महसूस कराता है. अपने बच्चे को एक प्यारभरे स्नान के बाद सोने के लिए न केवल उन्हें शांत करना होगा, बल्कि आपको आराम की भावना भी देगा.
याद रखें, शिशु-दिनचर्या मौज-मस्ती, हंसी-ठिठोली में बदल सकती है, अगर आप ख़ुद को इस समय का आनंद लेने दें. मानें या न मानें, आपका शिशु भी इसे समझता है. मेरी मातृत्व यात्रा के दौरान जॉनसन बेबी हमेशा एक कूल केयर की तरह मेरे साथ रहा. आज भी, जब मैं बेबी सोप देखती हूं, तो यह मुझे नॉस्टैल्जिया से भर देता है और मुझे याद दिलाता है कि मैं कितनी खुशहाली भरी यात्रा करके आई हूं.
आपके बच्चे के स्वास्थ्य के विकास और बच्चे के साथ अपने बंधन को मज़बूत करने के लिए मालिश एक और महत्वपूर्ण काम है. धीरे-धीरे बच्चे की मालिश करने से आपके बच्चे के विकास, संचार और सीखने की प्रक्रिया तेज़ होती है. उसका समग्र विकास सुनिश्चित होता है. मैंने अपनी मम्मी से एक टिप सीखी थी बच्चे की मालिश करते समय, उचित रूप से तैयार किए गए तेल की थोड़ी मात्रा का उपयोग करना आदर्श है. मालिश हमेशा ऊपर की ओर हाथ ले जाकर करना चाहिए. इस काम के लिए मेरी पसंद हमेशा जॉनसन बेबी ऑयल रहा है और मैं इसे सभी को अपने बच्चे के लिए इस्तेमाल करने की सलाह देती हूं. एक और टिप यह सुनिश्चित करने के लिए है कि मालिश करने वाले कमरे का तापमान गर्म हो ताकि आपका शिशु ठंड से बच सके. इसके अलावा, मालिश के लिए अधिक तेल का उपयोग नहीं करना चाहिए, ख़ासकर अगर आपके बच्चे की त्वचा में जलन हो या उसमें चकत्ते हों.

– ऊषा गुप्ता

Baby Care Tips

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यूं तो पिता बनना और पितृत्‍व के लिए स्‍वयं को तैयार करना चुनौतीभरा काम होता है. लेकिन जब बात उन लोगों की हो, जिनके बच्‍चे समय पूर्व ही पैदा हो गए हों, तो यह मुश्किलोंभरा होता है. ख़ासकर कोरोना वायरस के कारण मौजूदा कोविड-19 के चलते महामारी की स्थिति में यह चुनौती और भी अधिक बढ़ जाती है. उन पिताओं पर अतिरिक्‍त दबाव व ज़िम्मेदारियां आ जाती हैं. आइए, आज फादर्स डे पर ऐसे ही पिता बने पुरुषों की आपबीती को जानते हैं.

Fathers Day Special

सभी चुनौतियों के बावजूद, पिता बनने की ख़ुशी का एहसास कभी भी कम नहीं हुआ…

असीम शाह जिन्हें जुड़वा बच्चे हुए थे इस कोरोना वायरस की महामारी के दिनों में ही. तब उन्होंने ना केवल कई चुनौतियों का सामना किया, बल्कि ख़ुद को भी हौसला देते रहे. जॉन्‍सन एंड जॉन्‍सन के ग्रुप एसएफई व एनालिटिक्‍स मैनेजर की अपनी पद व ड्यूटी को निभाते हुए वे इस लॉकडाउन में बहुत कुछ सीखते भी रहे. कोविड-19 के इस लॉकडाउन के दौरान पैदा हुए जुड़वा बेटों का पिता बनने के अपने अनुभवों के बारे में असीम कुछ यूं बताते हैं…
दो महीने पहले, मैं अपने सहकर्मियों के साथ एक महत्‍वपूर्ण वीडियो कॉल पर था, तभी मेरी पत्‍नी ने अचानक बताया कि उन्‍हें डिलीवरी के लिए हॉस्पिटल जाना पड़ेगा.
यह इमर्जेंसी डिलीवरी थी और हमारे बच्‍चे समय से चार हफ़्ते पहले ही पैदा हो गए. यह भी कमाल की बात थी. मैं दोपहर 3.30 बजे ऑफिस कॉल पर था और लगभग 4.00 बजे अपनी बांहों में दो-दो बच्‍चे थामे हुआ था. समय से पहले पैदा होने के चलते, बच्‍चों को एनआईसीयू में रखा गया. उनका लगातार ध्‍यान रखा जाना और उनकी देखभाल बेहद ज़रूरी था. मैं चाहता था कि मैं भी वहीं ठहरकर एनआईसीयू की कांच की दीवार के पीछे से उन्‍हें लगातार टकटकी लगाए देखता रहूं, लेकिन मुझे वापस घर लौटना पड़ा, क्‍योंकि कोविड के चलते हॉस्पिटल ने किसी को भी वहां ठहरने की इजाज़त नहीं दी.
यह स्थिति सामान्‍य से बिल्‍कुल अलग था और मुझे उन्‍हें उनके हाल पर छोड़कर वहां से जाना पड़ा. मुझे दिन में केवल एक बार उन्‍हें देखने की अनुमति थी. यह भावनात्‍मक रूप से तकलीफ़देह अनुभव था.

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लेकिन असली दिक़्क़त तो तब शुरू हुई, जब उन्‍हें हॉस्पिटल से डिस्‍चार्ज कर दिया गया और वो हफ़्तेभर में घर आ गए. जैसा कि मैंने बताया कि बच्‍चे समय से पूर्व हुए थे और बहुत छोटे थे. उनके लिए काफ़ी छोटे-छोटे डायपर्स की ज़रूरत होती थी. ज़रूरी डायपर्स, फॉर्म्‍यूला मिल्‍क, दवाएं आदि लेने के लिए मुझे 8-10 फार्मेसीज का चक्‍कर लगाना पड़ता था. लॉकडाउन के चलते, ये चीज़ें आसानी से उपलब्‍ध नहीं थीं और मैं इन अत्‍यावश्‍यक चीज़ों को सीमित स्‍टॉक में ही रख पाता था, जो बमुश्किल 3-4 दिन चल पाता. यह थोड़ी हताशाजनक स्थिति थी, पर मैंने हिम्मत नहीं हारी.
मुझे केवल अपने बच्‍चों के लिए उनके ज़रूरी सामानों को जुटाने की ही चिंता नहीं थी, बल्कि साथ ही मुझे बच्‍चों की देखभाल में अपनी पत्‍नी के साथ हाथ भी बंटाना था. बच्‍चों को संभाल पाना हम दोनों के लिए ही बहुत बड़ा काम था. कई बार तो ऐसा होता कि मैं काम करता और उसे बच्‍चों को संभालना पड़ता. हालांकि, मेरे सहकर्मियों और मेरी कंपनी ने मेरा काफ़ी सहयोग किया और मुझे अपनी इच्‍छानुसार शिफ्ट में काम करने की छूट दे दी, जो सबसे ज़रूरी था.
सभी चुनौतियों के बावजूद, पिता बनने की ख़ुशी का एहसास कभी भी कम नहीं हुआ. मुझे उन्‍हें सुलाने, खिलाने-पिलाने, उनके डायपर बदलने, कपड़े धोने, फीडिंग बॉटल धोने आदि में आनंद आता था. मैं हमारे नन्हें-मुन्‍नों के साथ अपनी पत्‍नी की हरसंभव मदद करना चाहता था. मैंने जाना कि किस तरह से माता-पिता दोनों को हाथ बंटाना ज़रूरी होता है और यह सब कुछ लॉकडाउन के चलते संभव हो सका.

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लॉकडाउन के चलते मेरी ज़िंदगी में आए पितृत्‍व के एहसास को शब्‍दों में बयां नहीं कर सकता…

यांसन इंडिया के सीनियर प्रोडक्‍ट मैनेजर, प्रणित सुराना बताते हैं कि किस तरह से उनके पांच महीने के बेटे ने उनके जीवन में बदलाव ला दिया है.
लॉकडाउन के दौरान, लोगों की ज़िम्मेदारी कई गुना बढ़ गई है और ख़ासकर उन पैरेंट्स की रिस्‍पांसबिलिटी बहुत बढ़ गई है, जिनके बच्‍चे अभी बहुत छोटे हैं. मुझे बताते हुए गर्व हो रहा है कि मैं अब एक पिता की ज़िम्मेदारियों को बेहतर समझने लगा हूं. मैं इस लॉकडाउन के चलते मेरी ज़िंदगी में आए पितृत्‍व के एहसास को शब्‍दों में बयां नहीं कर सकता. यह मेरे लिए आशा की किरण है. मैं लॉकडाउन से पहले ऑफिस के अपने उन दिनों की याद करता हूं, जब मैं अपने सहकर्मियों के साथ घूमता-फिरता और टी-ब्रेक पर गपशप किया करता था. यूं तो ये बातें सुनने में महत्‍वपूर्ण नहीं लगती, लेकिन उन पलों की मुझे बेहद याद आती है. लेकिन अभी जब मैं घर पर रहकर अपने बच्‍चे को संभालने के साथ फुलटाइम ऑफिस मैनेज कर रहा हूं, तो मुझे जीवनसाथी का अर्थ समझ आया. इसने मुझे आराम लेने और दैनिक कार्यों को प्रभावी तरीक़े से करने के महत्‍व को बता दिया है. घर पर रहकर काम करने से, ऑफिस का काम करने और व्‍यक्तिगत जीवन को संभालने के बीच की पतली रेखा और अधिक महीन हो गई है.

यदि मैं ऑफिस जाकर काम करता, तो अपने बच्‍चे को चलने की कोशिश करने और पेट के बल पलटना देखने जैसी अद्भुत ख़ुशी का किसी भी स्थिति में आनंद नहीं ले पाता. मुझे लगता है कि इस कोविड-19 इमर्जेंसी के बीच इन बहुमूल्‍य पलों को जीने से बड़ी ख़ुशी मुझे नहीं मिल सकती थी.

ऊषा गुप्ता

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Psychology Of Relationships

रिश्तों का मनोविज्ञान (The Psychology Of Relationships)

मेरी उम्र 27 साल है. सगाई हुए एक साल हो गया है. घरवाले शादी की जल्दी कर रहे हैं, पर मैं अभी भी शादी को लेकर, होनेवाले पति और उनके व्यवहार को लेकर काफ़ी असमंजस में हूं, इसलिए कोई भी फैसला लेने से हिचक रही हूं. मन में एक
अजीब-सा डर है.

– आशालता, चंडीगढ़.

कोई भी नया निर्णय लेना आसान नहीं होता. ख़ासकर तब, जब वह हमारे जीवन और भविष्य से संबंधित हो. शादी का निर्णय लेने से पहले कुछ बातों का ख़ास ख़्याल रखें, जैसे- शादी को लेकर आपकी अपेक्षाएं, आपकी शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तैयारी, क्या आप पूरी तरह से और यहां तक कि आर्थिक तौर पर भी तैयार हैं नए जीवन, नए रिश्तों व नए परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए? ख़ुद से यह सवाल करें, आत्म विश्‍लेषण करें. घर के बड़ों से, अनुभवी दोस्तों से सलाह लें. परिवार या समाज के दबाव में आकर कोई निर्णय ना लें.

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मेरी दो बेटियां हैं. एक की उम्र है 16 साल और दूसरी 14 साल की है. उनके आजकल के बर्ताव से बहुत परेशान रहती हूं. उनके कपड़ों का, जूते-चप्पलों का चयन भी बहुत बदल गया है. वो अपनी ही दुनिया में रहती हैं. किसी को कुछ समझती ही नहीं. मेरी किसी बात का उन पर कोई असर नहीं होता. दोस्तों का साथ उन्हें ज़्यादा पंसद है. क्या करूं, बेहद परेशान हूं.

– नौशीन, कोलकाता.

किशोरावस्था में बच्चों को संभालना अपने आप में एक चुनौती है. आजकल का इंटरनेट युग इसे और भी मुश्किल बना रहा है. आपको संयम से काम लेना होगा. उनसे बहुत ज़्यादा कठोरता से पेश न आएं. उनकी उम्र को देखते हुए आपको उनसे दोस्ताना व्यवहार करना होगा. घर-परिवार का माहौल प्यारभरा बनाए रखें और उनका विश्‍वास जीतें. बात-बात पर
रोक-टोक न करें. उनकी दोस्त बनकर रहेंगी, तो वो आपसे दूरी नहीं बानएंगी और मन की बात भी शेयर करने से नहीं हिचकिचाएंगी. हां, उनके दोस्तों के बारे में जानकारी ज़रूर रखें, ताकि वो ग़लत संगत में न पड़ जाएं, लेकिन ध्यान रहे कि आपकी बच्चियों को यह न लगे कि आप उनकी जासूसी करती हैं.

मेरे पति काम के सिलसिले में ज़्यादातर बाहर रहते हैं. मेरा एक छोटा बेटा है. घर-बाहर का सारा काम मुझे ही देखना पड़ता है. लगता है मानो मेरा सारा जीवन बस इन्हीं उलझनों में उलझकर रह गया है. अपने लिए तो समय ही नहीं रहा अब.

– रजनी शर्मा, मुंबई.

अभी आपका बेटा छोटा है और मां होने के नाते उसके प्रति आपकी ज़िम्मेदारी बनती है. पति काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं, तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि उनके पास ना होने से उनकी जगह भी आप लें. बेटे का बचपन और भविष्य सवांरने पर ध्यान दें. कुछ ही सालों में जब वह बड़ा हो जाएगा, आपके पास समय ही समय होगा अपने लिए. तब आप अपने बेटे के साथ को तरसेंगी. बेहतर है, आज जब वह आप पर निर्भर है और आप का समय और अटेंशन चाहता है, तो उसे वह सब दें, जिससे वो कामयाब जीवन की ओर बढ़ सके. जीवन के हर दौर का अपना एक अलग ही मज़ा होता है. हर दौर को भरपूर जीएं और उसका आनंद उठाएं. अगर नकारात्मक सोच रखेंगी, तो कभी ख़ुश नहीं रह पाएंगी. हां, यदि आप पर काम का बोझ अधिक बढ़ गया है, तो बेहतर होगा अपने पति से बात करें. हो सकता है वो कुछ अधिक समय आपके व बच्चे के लिए निकाल पाएं.

Zeenat Jahan

ज़ीनत जहान
एडवांस लाइफ कोच व
सायकोलॉजिकल काउंसलर

[email protected]

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कल तक हमारी हर बात में हां में हां मिलानेवाला बच्चा जब हमारे निर्णय पर सवाल उठाने लगता है, तो ज़्यादातर माता-पिता बच्चे के व्यवहार में आए इस बदलाव को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते, जिसका असर उनके ख़ूबसूरत रिश्ते पर पड़ने लगता है. काउंसलिंग सायकोलॉजिस्ट डॉ. माधवी सेठ बता रही हैं कि टीनएज बच्चों के व्यवहार में बदलाव क्यों आते हैं और उम्र के इस नाज़ुक दौर में उनके पैरेंट्स को बच्चों के साथ किस तरह डील करना चाहिए, ताकि रिश्तों की डोर मज़बूत बनी रहे.

Parent-Child Relations

शिकायतों का सिलसिला

अधिकतर टीनएज बच्चों के पैरेंट्स का यही रोना होता है कि उनका बच्चा पहले जैसा नहीं रहा. बात-बात पर ग़ुस्सा होना, उल्टा जवाब देना, दोस्तों को ही अपना सब कुछ समझना… तक़रीबन हर दूसरे पैरेंट्स की अपने टीनएज बच्चे से यही शिकायत होती है. वहीं दूसरी तरफ़ बच्चे इस बात की कंप्लेन करते हैं कि उनके अभिभावक उन्हें समझते ही नहीं और न ही उन पर विश्‍वास करते हैं.

क्यों आते हैं बदलाव?

12 से 18 साल की उम्र मेंबच्चों में बहुत-से हार्मोनल व इमोशनल चेंजेज़ आते हैं. प्यूबर्टी के हिसाब से देखा जाए, तो टीनएन में चार प्रकार के बदलाव आते हैं.

शारीरिक बदलावः 11-12 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते बच्चों के शरीर में बदलाव आने शुरू हो जाते हैं. यह बदलाव बहुत-से बच्चों के लिए मुश्किलोंभरे होते हैं, जिससे वे आसानी से डील नहीं पाते. उदाहरण के लिए बचपन में जिस गोलमटोल बच्चे को ‘क्यूट’ कहकर सब उसे प्यार करते थे, जब वही बच्चा 11-12 साल की उम्र में पहुंचता है, तो मोटापे के कारण लोग उसे रिजेक्ट करने लगते हैं या उसकी खिल्ली उड़ाने लगते हैं. ऐसे में बच्चे को ख़ुद भी समझ में नहीं आता कि आख़िर लोग अब उसे क्यों नापसंद करने लगे हैं. इससे कुछ बच्चों को साइकोलॉजिकल ट्रॉमा होता है.

सामाजिक बदलावः इस उम्र में आते-आते बच्चों को ख़ुद को देखने का नज़रिया और लोगों का उनके प्रति नज़रिया, दोनों ही बदलने लगता है. उनकी सोशल इमेज बनना शुरू हो जाती है. वे अपना व्यक्तित्व विकसित करने की कोशिश करते हैं. बच्चे ख़ुद से ‘मैं क्या हूं’ जैसे सवाल करते हैं. ऐसे में अपनी इंडीविज़ुएलिटी सेट करने में किसी बच्चे को ज़्यादा समय लगता है, तो किसी को कम.

मनोवैज्ञानिक बदलावः इस अवस्था में बच्चों में बहुत-से मनोवैज्ञानिक बदलाव भी आते हैं, लेकिन सारे साइकोलॉजिकल बदलाव सकारात्मक नहीं होते. कुछ बच्चे अकेलापन, असुरक्षा इत्यादि महसूस करने लगते हैं.

आध्यात्मिक बदलावः  चौथा बदलाव स्पिरिच्युअल होता है. इस उम्र में बच्चों के ख़्यालात बदलने लगते हैं. उनका ज़िंदगी को देखने का नज़रिया बदल जाता है. वो नज़रिया उनका अपना होता है. उसमें किसी का कोई योगदान नहीं होता. बच्चे यह चाहते भी नहीं हैं कि उसमें कोई दख़ल दे.

इतने सारे बदलावों के कारण ही किशोरावस्था को ज़िंदगी का सबसे कठिन दौर कहा जाता है. इन सभी बदलावों को स्वीकार करने में 3 से 5 साल यानी तक़रीबन पूरी किशोरावस्था लग जाती है. इन्हीं बदलावों के कारण इस दौर में पैरेंट्स का रोल भी काफ़ी हद तक बदल जाता है, लेकिन ज़्यादातर पैेंरेट्स बदलाव के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं होते.

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पैरेंट्स से कहां होती है चूक?

पैरेंट्स के लिए बच्चा हमेशा बच्चा ही रहता है. वे हमेशा ही करेक्शन मोड में रहते हैं.  बच्चा जब 10 साल का होता है तब भी वे उसे करेक्ट करने में लगे रहते हैं और जब वह 12-13 साल का हो जाता है, तब भी वे उसी ढर्रे पर चलते रहते हैं. ऐसे बैठो, ऐसे बात करो, ऐसे कपड़े मत पहनो, यहां मत जाओ… इत्यादि. वे बच्चे को अपनी तरह से रखना चाहते हैं. स्वाभाविक है कि बढ़ते बच्चों को इतनी रोक-टोक पसंद नहीं आती, क्योंकि वे माता-पिता के प्री-डिफाइंड दायरे में नहीं रहना चाहते. भले ही अभी तक उन्होंने दुनिया को माता-पिता की उंगली पकड़कर देखा हो, लेकिन अब वे अपने अनुभव ख़ुद अर्जित करना चाहते हैं. अपनी सीमा, अपनी दिशा ख़ुद तलाशना चाहते हैं और वहीं से बच्चे व माता-पिता के बीच संबंध बिगड़ने शुरू हो जाते हैं.

क्या तरीक़ा है सही?

बच्चे को सही रास्ता दिखाना कोई ग़लत बात नहीं है, लेकिन उसका तरीक़ा सही होना चाहिए.

बोलिए कम, सुनिए ज़्यादाः  इस उम्र के बच्चों को समझाने का तरीक़ा अलग होता है, जो पैरेंट्स को डेवलप करना चाहिए, क्योंकि डांट-डपटकर बात समझाने से बात बनने की बजाय बिगड़ सकती है. टीनएज से बात करते समय कान बड़े और ज़ुबान छोटी रखनी चाहिए यानी बोलना कम और सुनना ज़्यादा चाहिए. उनकी बात सुनिए और जब वे पूछें, तो ही अपनी राय रखिए. अगर वे राय नहीं मांगें, तो स़िर्फ सुनिए. बिना मांगे राय मत दीजिए. यदि राय देनी भी हो, तो तरीक़ा रिक्वेस्ट वाला होना चाहिए, न कि ऑर्डर वाला.

दूसरों से सीखिएः हर किसी को टीनएज बच्चे को डील करने का तरीक़ा नहीं पता होता और इसमें कोई बुराई भी नहीं है, लेकिन यह तरीक़ा सीखना ज़रूरी है. अभिभावकों के लिए ज़रूरी है कि वे बच्चे में आए बदलावों के साथ एडजस्ट करें. टीनएज पैरेंटिंग एक कला है. कला में निपुण होने के लिए अभ्यास की ज़रूरत होती है. अपने आस-पास पड़ोस या रिश्तेदारी में आपको जिसकी पैरेंटिंग स्टाइल पसंद हो, उसके साथ हेल्दी डिस्कशन कीजिए. उनकी पैरेंटिंग स्टाइल पर राय लीजिए. रास्ते अपने आप बनते जाएंगे.

कमियों को स्वीकारेंः इस उम्र के बच्चे को भी अटेंशन चाहिए होता है. उसके क़रीब जाने के लिए उसकी तारीफ़ कीजिए. उसके फेलियर को भी स्वीकार करना सीखिए और उसकी कोशिशों के लिए उसका हौसला बढ़ाइए. इससे उसका स्ट्रेस लेवल कम होगा और वो आपके क़रीब आएगा.

रिश्तों में खुलापन लाइएः  अभिभावक को अपने बच्चे के साथ ऐसा रिलेशन डेवलप करना चाहिए, जिससे उनका बच्चा बिना डर या झिझक के उनके साथ अपनी  हर तरह की बात शेयर कर सके. बच्चे को अकेलेपन का एहसास नहीं होने देना चाहिए. पैरेंट्स के दिमाग़ में इतना खुलापन होना चाहिए कि वे इस बात को स्वीकार कर सकें कि अगर बच्चा कुछ ग़लत भी कर रहा है, तो बच्चा नहीं, बल्कि उसका काम ग़लत है. अगर आप बच्चे को ही ग़लत ठहरा देंगे तो सारे रास्ते बंद हो जाएंगे, इसलिए पैरेंट्स को बच्चे के व्यवहार को ग़लत ठहराना चाहिए, न कि बच्चे को. कहने का अर्थ यह है कि बच्चे को रिजेक्ट न करें. पैरेंट्स को अपने बच्चे को इतनी छूट देनी  चाहिए कि कोई ग़लती होने पर वो उनके पास आकर उसे स्वीकारें, न कि डर के मारे उस पर परदा डाल दें.

रिएक्ट, नहीं एक्ट कीजिएः अभिभावकों को बच्चे की ग़लती पर तुरंत किसी तरह का रिएक्शन नहीं देना चाहिए. अगर आप उन पर ग़ुस्से से चिल्लाएंगे, तो वो भी आप पर चिल्ला सकता है, इसलिए उसकी बात सुनिए और तुरंत रिएक्ट करने की बजाय एक्ट कीजिए. एक्ट करने का मतलब है कि सोच-समझकर बोलना या फैसला देना.

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ज़िम्मेदारी सौंपिएः बढ़ते बच्चे के स्वतंत्र व्यक्तित्व को मान्यता देना ज़रूरी है. उसे रोकने-टोकने की बजाय ज़िम्मेदारी सौंपें. यानी इंस्ट्रक्टर नहीं, फेसिलिटेटर बनिए. यदि आप चाहते हैं कि बच्चा आपके मुताबिक़ चले, तो उसे अपनी जायदाद न समझिए. अपने अहम् को परे रखकर परिस्थिति को देखने का प्रयास करिए. बच्चों के साथ चर्चा करते रहिए. उसके लक्ष्य और उद्देश्य को सिरे से ख़ारिज करने से बचिए.

– वेदिका शर्मा

अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करेंः Parenting Guide

अक्सर परीक्षा (Exam) को लेकर बच्चों (Kids) के मन में एक अनजाना-सा डर बना ही रहता है. ऐसे में पैरेंट्स के साथ-साथ टीचर्स की भी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों पर इसका नकारात्मक प्रभाव न पड़ने दें. इसलिए एग्ज़ाम के पहले और दौरान अभिभावकों को विशेष ध्यान देना चाहिए कि बच्चे के दिलोदिमाग़ पर किसी बात का बुरा असर न पड़े. इस संबंध में हिंदुजा हेल्थकेयर के कंसल्टेंट सायकोलॉजिस्ट डॉ. केरसी चावड़ा और परमिंदर निज्जर ने भी कई उपयोगी जानकारियां दीं.

Exam Guide

पैरेंटिंग केयर

* बच्चे को सकारात्मक और तनावमुक्त वातावरण दें. यानी घर में बेवजह के झगड़ों से बचें, ख़ासकर पति-पत्नी उलझें नहीं.

* मां बच्चे के भोजन में पौष्टिकता का ध्यान रखे. अक्सर मांएं लाड़-दुलार में या फिर बच्चे की ज़िद पर उसे जंक फूड, फास्ट फूड, सॉफ्ट ड्रिंक्स आदि ज़रूरत से अधिक पीने पर रोकती या टोकती नहीं हैं. यह ठीक नहीं है. परीक्षा के समय इस बात का विशेष ख़्याल रखें कि बच्चा घर का ही स्वादभरा, पर सिंपल भोजन करें.

* पिता भी बच्चे से पढ़ाई से जुड़ी परेशानियां को जानने-समझने की कोशिश करें. उन्हें और अधिक मेहनत करने के लिए प्रोत्साहित करते रहें.

* जब पैरेंट्स बच्चों की पढ़ाई को लेकर नियम बनाते हैं, तब उन्हें भी इसका अनुसरण करना चाहिए. यदि आप बच्चे को टीवी, फिल्म, मनोरंजन आदि के लिए मना करते हैं, तो परीक्षा के दिनों तक आप भी इनसे दूरी बनाए रखें.

* परीक्षा के दिनों में पढ़ाई को लेकर पैरेंट्स अधिक एग्रेसिव न बन जाएं यानी बच्चे को डांटना, मारना, पढ़ने के लिए अधिक दबाव बनाना आदि न करें. ध्यान रहे, इससे बच्चे को घबराहट, पेटदर्द, सांस लेने में तकलीफ़, तनाव आदि जैसी समस्या हो सकती है. इसलिए थोड़ा स्ट्रेस ठीक है, पर अधिक स्ट्रेस नुक़सानदायक हो सकता है.

* पढ़ने के लिए सुबह जल्दी उठना हो, तो यह ज़रूरी है कि बच्चे रात को समय पर जल्दी सोएं. इसके लिए पढ़ने की और रिविज़न करने की समय सीमा निर्धारित कर ली जाए, तो बेहतर है.

* अपने ऑफिस-घर आदि के कामों से समय निकालकर बच्चे की पढ़ाई व परीक्षा में दिलचस्पी लें, वरना कई पैरेंट्स बस स्कूल, ट्यूशन, क्लासेस लगा देने भर से ही अपनी ज़िम्मेदारियां ख़त्म समझते हैं. जबकि एग्ज़ाम के समय बच्चों को पैरेंट्स के साथ, सहयोग, प्रोत्साहन की ख़ास ज़रूरत होती है.

* यदि कोई रिश्तेदार या फिर मेहमान बच्चों की परीक्षा के दिनों में आना चाहे, तो विनम्रतापूर्वक उन्हें वस्तुस्थिति बताकर मना कर दें.

* यदि बच्चे को कोई सब्जेक्ट डिफिकल्ट लग रहा है, तो पैरेंट्स उसे डांटने-फटकराने, तुम करना नहीं चाहते… तुम पर कितने पैसे ख़र्च कर रहे हैं… जैसी निगेटिव बातें न कहें.  उसकी डिफिकल्टी को समझें और उसे दूर करने की कोशिश करें. साथ ही जिन विषयों में वो अच्छा कर रहा है, उसकी तारीफ़ करें, उसे शाबाशी दें.

टीचर्स डायरेक्शन

* पैरेंट्स को बच्चों की क्लास टीचर से परीक्षा से पहले ज़रूर मिलना चाहिए, ताकि वे जान सकें कि उनका बच्चा किस विषय में अच्छा और किसमें कमज़ोर है. इससे बच्चे की एक्स्ट्रा केयर करने में मदद मिलेगी.

* शिक्षकों का भी यह फर्ज़ बनता है कि वे परीक्षा से पहले स्टूडेंट्स के पैरेंट्स को उनके बच्चे हर तैयारी से अवगत कराएं.

* पैरेंट्स मीटिंग में बच्चे के दिए गए रिपोर्ट्स, इम्प्रूवमेंट आदि को चेक करके उसके अनुसार माता-पिता का मार्गदर्शन करें कि उन्हें परीक्षा के समय बच्चे की किन बातों पर अधिक ध्यान देना है.

* समय के साथ बहुत कुछ बदला है. दरअसल, एग्ज़ाम केवल बच्चे का ही नहीं होता, बल्कि उनके मम्मी-पापा, टीचर्स, परिवार, स्कूल आदि भी

जाने-अनजाने में इसमें शामिल होते हैं. फिर वो मानसिक रूप से हों या बौद्धिक तौर पर.

* आज टीचर्स की ज़िम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं. उन्हें भी स्टूडेंट्स की पढ़ाई के साथ-साथ उनके बैकग्राउंड, माहौल आदि के बारे में अपडेट होना पड़ता है, ताकि वे बच्चों को सही शिक्षा दे सकें और उनका उचित मार्गदर्शन कर सकें.

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Exam Guide

स्टूडेंट्स-मास्टर स्ट्रोक्स

* छात्र-छात्राओं दोनों को ही एग्ज़ाम को पॉज़िटिवली लेना चाहिए.

* सालभर उन्होंने जितनी मेहनत व पढ़ाई की है, उसी पर अधिक ध्यान दें. ऐन एग्ज़ाम के समय कुछ नया पढ़ने की कोशिश न करें.

* सभी विषय के हर चैप्टर का पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ रिविज़न करें.

* एग्ज़ाम फोबिया से बचें. यानी इसे लेकर डरें, घबराएं नहीं. ख़ुद पर और अपनी तैयारी पर विश्‍वास करें.

* एग्ज़ाम से एक दिन पहले जल्दी सो जाएं. यानी सब कुछ अभी तक पढ़ा नहीं, कुछ छूट गया है, ये भी महत्वपूर्ण है, अरे वो तो पढ़ना बाकी रह गया… इस तरह की दुविधा में न फंसें. आपने जितनी अच्छी तरह से जो पढ़ा है, बस परीक्षा से पहले उसे एक बार सरसरी तौर पर देख लें.

* एग्ज़ाम हॉल में समय से थोड़ा पहले पहुंचें, ताकि अपनी सीट, रूम आदि को देख-समझ सकें.

* सबसे ज़रूरी बात अपनी परीक्षा की तैयारी को बेहतर समझें और उसी सोच के साथ सकारात्मक होकर परीक्षा दें. ऑल द बेस्ट!

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एग्ज़ाम अलर्ट…

* एग्ज़ाम के समय अच्छी नींद लेना बहुत ज़रूरी है. यानी कम से कम 7-8 घंटे की नींद, ताकि अगले दिन परीक्षा के समय स्टूडेंट्स फ्रेश व एनर्जिटिक रहें.

* अक्सर परीक्षा के दिनों में बच्चे खाना कम खाते हैं या फिर नहीं खाते. ऐसा न करें, क्योंकि ऐसा करने से परीक्षा के समय घबराहट व हल्की बेचैनी-सी होने लगती है. इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि परीक्षा चाहे सुबह की हो या दोपहर की- स्टूडेंट्स अच्छी तरह से नाश्ता करके जाएं. इससे उनका एनर्जी लेवल बेहतर रहेगा.

* एग्ज़ाम के समय एक पेपर हो जाने के बाद उस पर चर्चा न करते बैठें. न ही बच्चे व अभिभावक माथापच्ची करते रहें कि इस सवाल को और भी अच्छे से कर सकते थे. इस सवाल पर इतना नंबर मिलेगा, इस पर अधिक नंबर कटेंगे इत्यादि करने की बजाय जो पेपर हो चुका है, उसे भूल जाएं और फ्रेश मूड से अगले पेपर की तैयारी करें.

* एग्ज़ाम के दौरान दिनभर पढ़ाई के अलावा बीच-बीच में ब्रेक ज़रूर लें. साथ ही आधा या एक घंटा कोई भी फिजिकल एक्टीविटीज़, जैसे- वॉकिंग, रनिंग, प्राणायाम, योग या फिर टहलना आदि ज़रूर करें. इससे बच्चे की बैटरी पूरी तरह चार्ज हो जाएगी और वे तरोताज़ा भी महसूस करेंगे.

* हर बच्चा युनीक होता है. फिर चाहे वो पढ़ाई में एवरेज हो या फिर बहुत अच्छा. यह ज़रूरी नहीं कि जो बच्चे 95-99% लाते हैं, वे ही ज़िंदगी में कामयाब होते हैं. कई बार देखा गया है कि जो बच्चे पढ़ाई में औसत दर्जे के रहे, वे भी जीवन में बेहद सफल रहे हैं. ध्यान रहे पढ़ाई जीवन का एक हिस्सा है, पूरा जीवन नहीं. अतः अच्छी सोच, ईमानदारीभरी मेहनत और कॉन्फिडेंस के साथ एग़्जाम दें.

– ऊषा गुप्ता

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Physical Exercise

अगर आपको लगता है कि बच्चे (Child) को पढ़ाई में अव्वल आने के लिए स़िर्फ किताबें रटवाना ज़रूरी है तो आप पूरी तरह ग़लत हैं. शैक्षिक प्रदर्शन और क्लास में बढ़िया ग्रेड्स लाने के लिए बच्चे की मानसिक क्षमता व बुद्धि सहित अन्य बहुत सी चीज़ें जिम्मेदार हैं. इसके लिए बच्चे की शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health) को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

शारीरिक सक्रियता और स्वास्थ्य व्यक्ति के सीखने की क्षमता को बढ़ाते हैं. नैशनल एकैडमी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, व्यायाम करने से बच्चे का स्वास्थ्य तो अच्छा रहता ही है, उसके सीखने की क्षमता और एकैडमिक परफॉर्मेंंस भी बेहतर होती है.

बच्चे के शैक्षिक योग्यता को प्रभावित करनेवाली चीज़ें

बच्चे की शिक्षा में आईक्यू लेवल के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, व्यक्तिगत पहलू और आस-पास का माहौल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इन सभी चीज़ें का प्रभाव अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग होता है. बच्चे की शिक्षा को प्रभावित करनेवाली ऐसी ही कुछ चीज़ें हैं-

* टीचर का सहयोग और पढ़ाने का तरीक़ा

* बच्चों के मानसिक  विकास के लिए एक्सरसाइज़ ज़रुरी मानसिक स्वास्थ्य

* दोस्तों का व्यवहार

* परिवार का एजुकेशनल बैकग्राउंड

* माता-पिता का सहयोग

* सामाजिक-आर्थिक तत्व

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एक्सरसाइज़ का पढ़ाई पर असर

बहुत से शोधों से यह सिद्ध हुआ है कि जो बच्चे रोज़ाना एक्सरसाइज़ करते हैं और शारीरिक रूप से ज़्यादा सक्रिय रहते हैं, उनमें ऐसा न करनेवाले बच्चों की तुलना में निम्न गुण पाए जाते हैं.

* वे ज़्यादा एकाग्र होते हैं.

* उनकी याद्दाश्त तेज़ होती हैं.

* उनकी कार्डियोवैस्कुलर फंक्शनिंग भी बेहतर होती है.

* फिटनेस लेवल अच्छी होती है.

* उनका मेटाबॉलिक फंक्शन बेहतर होता है.

* हड्डियां मज़बूत होती हैं.

* समस्या समाधान की क्षमता बेहतर होती है.

* एकैडमिक टेस्ट में बेहतर प्रदर्शन करते हैं.

* एकैडमिक परफॉर्मेंस भी धीरे-धीरे बेहतर होती जाती है.

* क्रिएटिव थिंकिंग और रिएक्शन टाइम भी अच्छी होती है.

* मूड सकारात्मक रहता है.

एक्सरसाइज़ का दिमाग़ पर असर

यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया में हुए शोध के अनुसार, नियमित रूप से एरोबिक एक्सरसाइज़ करने से मस्तिष्क के हिप्पोकैम्पस एरिया की फंक्शनिंग बेहतर होती है. यह एरिया लर्निंग और वर्बल मेमोरी में मदद करता है, जबकि अन्य तरह के एक्सरसाइज़, जैसे- बैलेंस एक्सरसाइज़ेज़, मसल्स टोनिंग एक्सरसाइज़ेज़ और रेसिस्टेंस ट्रेनिंग मस्तिष्क को अपेक्षाकृत कम प्रभावित करते हैं. यहां तक कि जो लोग नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करते हैं, उनका प्रीफ्रंटल कोर्टेक्स और मेडिकल कोर्टेक्स भी स्वस्थ रहता है. ग़ौरतलब है कि मस्तिष्क का यह हिस्सा सोचने की क्षमता और याद्दाश्त को प्रभावित करता है.

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कितनी देर एक्सरसाइज़ करना चाहिए?

6 से 17 वर्ष की आयुवाले बच्चों को रोज़ाना 1 घंटे व 18 से 64 वर्ष से वयस्कों को आधे घंटे शारीरिक रूप से सक्रिय रहना चाहिए. ऐसा माना जाता है कि एक्सरसाइज़ करने से एक्स्ट्रा क्लास से ज़्यादा फ़ायदा मिलता है. एक्सपर्ट्स के अनुसार, फिज़िकल एजुकेशन की क्लास सुबह के समय रखना ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है. बच्चों को शारीरिक रूप से सक्रिय बनाने के लिए स्कूल को फिज़िकल एजुकेशन क्लासेज़, स्कूल स्पोर्ट्स इत्यादि को बढ़ावा देना चाहिए

क्या कॉलेज स्टूडेंट्स को एक्सरसाइज़ से फ़ायदा मिलता है?

एक्सरसाइज़ से स़िर्फ स्कूल जानेवाले बच्चों को ही नहीं, कॉलेज स्टूडेंट को भी मदद मिल सकती है. हालांकि भारत के ज़्यादातर कॉलेज़ व यूनिवर्सिटी में फिज़िकल एजुकेशन पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं होता, लेकिन कुछ कॉलेज इस दिशा में काम कर रहे हैं.

– शिल्पी शर्मा

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बच्चे (Children) को क़ामयाब इंसान बनाने से पहले उसे अच्छा इंसान बनाना ज़रूरी है, क्योंकि अच्छा इंसान जहां भी जाता है, वहां अपने अच्छे गुणों से सबको अपना बना लेता है, फिर उसे क़ामयाब होने से कोई नहीं रोक सकता. बच्चों के सर्वांगीय विकास के लिए स्पिरिचुअल पैरेंटिंग (Spiritual Parenting) एक बेहतरीन माध्यम है. आप भी स्पिरिचुअल पैरेंटिंग से अपने बच्चे को एक बेहतर इंसान बना सकते हैं.

Parenting

 

गर्भ से करें शुरुआत

ये बात वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुकी है कि जब बच्चा मां के गर्भ में होता है, तो मां की मन:स्थिति का बच्चे पर भी असर होता है. अतः मां गर्भावस्था में अच्छे वातावरण में रहकर, अच्छी क़िताबें पढ़कर, अच्छे विचारों से बच्चे को गर्भ में ही अच्छे संस्कार देने की शुरुआत कर सकती है. आप भी जब पैरेंट बनने का मन बनाएं, तो अपनी संतान के मां के गर्भ में आते ही उसे अच्छे संस्कार देने की शुरुआत करें.

 पहले ख़ुद को बदलें

यदि आप अपने बच्चे को अच्छे संस्कार देना चाहते हैं, तो इसके लिए पहले अपनी बुरी आदतों को बदलें, क्योंकि बच्चा वही करता है जो अपने आसपास देखता है. यदि वो अपने पैरेंट्स को हमेशा लड़ते-झगड़ते देखता है, तो उसका व्यवहार भी झगड़ालू और नकारात्मक होने लगता है. अगर आप अपने बच्चे को सच्चा, ईमानदार, आत्मनिर्भर, दयालु, दूसरों से प्रेम करने वाला, अपने आप पर विश्‍वास करने वाला और बदलावों के अनुरूप ख़ुद को ढालने में सक्षम बनाना चाहते हैं, तो पहले आपको ख़ुद में ये गुण विकसित करने होंगे.

प्यार से काम लें

बच्चे के बात न मानने या किसी चीज़ के लिए ज़िद करने पर आमतौर पर हम उसे डांटते-फटकारते हैं, लेकिन इसका बच्चे पर उल्टा असर होता है. जब हम ज़ोर से चिल्लाते हैं, तो बच्चा भी तेज़ आवाज़ में रोने व चीखने-चिल्लाने लगता है. ऐसे में ज़ाहिर है आपका ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है, लेकिन इस स्थिति में ग़ुस्से से काम बिगड़ सकता है. अतः शांत दिमाग़ से उसे समझाने की कोशिश करें कि वो जो कर रहा है वो ग़लत है. यदि फिर भी वो आपकी बात नहीं सुनता तो कुछ देर के लिए शांत हो जाएं और उससे कुछ बात न करें. आपको चुप देखकर वो भी चुप हो जाएगा.

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ना कहना सीखें  

बच्चे से प्यार करने का ये मतलब कतई नहीं है कि आप उसकी हर ग़ैरज़रूरी मांग पूरी करें. यदि आप चाहते हैं कि आगे चलकर आपका बच्चा अनुशासित बने, तो अभी से उसकी ग़लत मांगों को मानना छोड़ दें. रोने-धोने पर अक्सर हम बच्चे को वो सब दे देते हैं जिनकी वो डिमांड करता है, लेकिन ऐसा करके हम उसका भविष्य बिगाड़ते हैं. ऐसा करने से बड़ा होने पर भी उसे अपनी मांगें मनवाने की आदत पड़ जाएगी और वो कभी भी अनुशासन का पालन करना नहीं सीख पाएगा. अतः बच्चे की ग़ैरज़रूरी डिमांड के लिए ना कहना सीखें,  लेकिन डांटकर नहीं, बल्कि प्यार से. प्यार से समझाने पर वो आपकी हर बात सुनेगा और आपके सही मार्गदर्शन से उसे सही-ग़लत की समझ भी हो जाएगी.

बच्चे के गुणों को पहचानें

हर बच्चा अपने आप में ख़ास होता है. हो सकता है, आपके पड़ोसी का बच्चा पढ़ाई में अव्वल हो और आपका बच्चा स्पोर्ट्स में. ऐसे में कम मार्क्स लाने पर उसकी तुलना दूसरे बच्चों से करके उसका आत्मविश्‍वास कमज़ोर न करें, बल्कि स्पोर्ट्स में मेडल जीतकर लाने पर उसकी प्रशंसा करें. आप उसे पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कह सकते हैं, लेकिन ग़लती सेभी ये न कहें कि फलां लड़का तुमसे इंटेलिजेंट है. ऐसा करने से बच्चे का आत्मविश्‍वास डगमगा सकता है और उसमें हीन भावना भी आ सकती है.

निर्णय लेना सिखाएं

माना बच्चे को सही-ग़लत का फ़र्क समझाना ज़रूरी है, लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि आप उसे अपनी मर्ज़ी से कोई फैसला लेने ही न दें. ऐसा करके आप उसकी निर्णय लेने की क्षमता को कमज़ोर कर सकते हैं. यदि आप चाहती हैं कि भविष्य में आपका बच्चा अपने ़फैसले ख़ुद लेने में समक्ष बने, तो अभी से उसे अपने छोटे-मोटे ़फैसले ख़ुद करने दें, जैसे- दोस्तों का चुनाव, छुट्टी के दिन की प्लानिंग आदि. बच्चे को अपने तरी़के से आगे बढ़ने दें. इससे न स़िर्फ वो आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि उसकी क्रिएटिविटी भी बढ़ेगी.

सकारात्मक माहौल बनाएं

माता-पिता जो भी कहते हैं उसका बच्चों पर गहरा असर होता है. अतः बच्चे से कुछ भी कहते समय ये ध्यान रखें कि आपकी बातों का उस पर सकारात्मक असर हो. उसका ख़ुद पर विश्‍वास बढ़े, उसके मन में दूसरों के प्रति दया का भाव रहे, वो निडर होकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित हो और सोच-समझकर किसी भी चीज़ का चुनाव करें.

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बच्चों की परवरिश से जुड़ी ज़रूरी बातें

बच्चे के व्यवहार और सोच पर उसकी परवरिश का बहुत असर पड़ता है. बच्चे की परवरिश जिस माहौल में होती है उसका असर भविष्य पर भी पड़ता है. अत: बच्चे की परवरिश से जुड़ी इन बातों पर पैरेंट्स को ध्यान देना ज़रूरी है. कैसी परवरिश का बच्चे के भविष्य पर क्या असर पढ़ता है? आइए, जानते हैं:

*    अगर बचपन से ही उसे आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है, तो वो दूसरों की निंदा करना ही सीखता है.

*    यदि वो बचपन से ही घर में लड़ाई-झगड़े देखता है, तो वो भी लड़ना सीख जाता है.

*    अगर छोटी उम्र से ही उसे किसी तरह के डर का सामना करना पड़ता है, तो बड़े होने पर वो हमेशा आशंकित या चिंतित रहता है.

*    यदि घर और बाहर हमेशा उसका मज़ाक उड़ाया जाता है, तो वो शर्मीला या संकोची बन जाता है.

*    अगर बच्चे की परवरिश ऐसे माहौल में हुई हो जहां उसे जलन की भावना का सामना करना पड़ा हो, तो बड़ा होने पर वो दुश्मनी सीखता है.

*    अगर शुरुआत से ही बच्चे को प्रोत्साहन मिलता है, तो वह आत्मविश्‍वासी बनता है.

*    यदि बच्चा अपने माता-पिता को बहुत कुछ सहते हुए देखता है, तो वह धैर्य और सहनशीलता सीखता है.

*    अगर शुरू से बच्चा तारी़फें पाता है, तो बड़ा होकर वो भी दूसरों की प्रशंसा करना सीखता है.

*    यदि बच्चा अपने घर व आसपास ईमानदारी देखता है, तो वो सच्चाई सीखता है.

*    अगर बच्चा सुरक्षित माहौल में रहता है, तो वो ख़ुद पर और दूसरों पर भरोसा करना सीखता है.

– शिल्पी शर्मा

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Pre-Mature Babies

भारत में एक साल में पैदा होने वाले कुल शिशुओं में से 13 फ़ीसदी शिशु समय से पहले यानी प्रीमैच्योर जन्म लेते हैं. बच्चे का जन्म 37 हफ़्ते की प्रेग्नेंसी से पहले होने पर उसे समय से पहले जन्म यानी प्रीमैच्योर बर्थ कहा जाता है. अब एक शोध में पता चला है कि प्रीमैच्योर्ड डिलीवरी में जन्म लेनेवाले बच्चे कुशाग्र बुद्धि के होते हैं. आइए जानते हैं इस लेख में कि कैसे प्रीमैच्योर्ड बच्चों का दिमाग़ इतना तेज़ चलता है.

अगर आपके यहां कोई बच्चा समय से पूर्व यानी प्रीमैच्योर्ड पैदा हो जाता है तो टेंशन बिल्कुल मत लीजिए. उसका अच्छी तरह पालन-पोषण कीजिए, क्योंकि आपके घर में कोई ऐरा-गैरा नहीं, बल्कि कुशाग्र बुद्धि का बच्चा पैदा हुआ है. एक रिसर्च में पाया गया है कि समय से पूर्व पैदा होने वाले बच्चे ज़्यादा प्रतिभाशाली होते हैं. कुशाग्र बुद्धिवाले इन बच्चों की सीखने की क्षमता ग़जब की होती है.

प्रीमैच्योर बच्चे तेज़

दरअसल, डिलीवरी डेट से पहले जन्म लेने वाले बच्चों ने भाषा और अनुभूति को लेकर जल्दी संबंध विकसित किया. रिसर्च में यह भी खुलासा हुआ कि इस तरह के बच्चों में भाषा की मज़बूत पकड़ विकसित होती है. गौरतलब है, भारत में समय से पहले जन्मे शिशुओं की दर लगातार बढ़ रही है. भारत सरकार की जनसंख्या विभाग की अधिकृत वेबसाइट पर पोस्ट डेटा के मुताबिक़, किसी भी अन्य देश की तुलना में भारत में सबसे ज़्यादा बच्चे समय से पहले जन्मे होते हैं. विश्वभर में होने वाले कुल समय से पूर्व जन्मे 23.6 फ़ीसदी यानी क़रीब-क़रीब एक चौथाई हिस्सा भारत का है.

पेट में बच्चे तंदुरुस्त

सामान्यत: माना जाता है कि प्रेग्नेंसी की अवधि के बाद बच्चा जितने दिन पेट में रहता है, बच्चे के स्वस्थ होने की उम्मीद उतनी ही ज़्यादा होती है, क्योंकि अगर मां स्वस्थ है तो गर्भ में बच्चे को सबसे अधिक पौष्टिक भोजन मिलता है. इससे बच्चे के अंग और ज़्यादा परिपक्व होते हैं, उसके फेफड़े अच्छी तरह से सांस लेने की अवस्था में आ जाते हैं और उसमें स्तनपान करने की ज़्यादा शक्ति हो जाती है.

गहन देखभाल की ज़रूरत

वैसे बेहतर मेडिकेयर के चलते समय से काफ़ी पहले जन्मे बच्चों की गहन देखभाल के तरी़के में पिछले कुछ दशकों में काफ़ी अच्छा सुधार हुआ है. ऐसे बच्चों के जीवित रहने की दर पहले की तुलना में काफ़ी ज़्यादा बढ़ गई है. हालांकि कई बार समय से ज़्यादा पहले जन्मे बच्चों में सेरेब्रल पाल्सी और सीखने में मुश्किल जैसे लंबी अवधि की विकृतियां आ सकती हैं.

धूम्रपान या शराब ख़तरनाक

इसलिए जो महिलाएं धूम्रपान करती हैं या फिर शौकिया तौर पर ड्रग्स का सेवन करती हैं, उन्हें इन आदतों को छोड़ने से समय से पहले डिलीवरी का ख़तरा वाक़ई कम हो सकता है. कम से कम अगली बार बच्चे के जल्दी आने की संभावना को देखते हुए वे पहले से तैयारी कर सकेंगी. साथ ही अपनी कम्युनिटी में बहुत से अन्य माता-पिता से पर्याप्त सहयोग पा सकती हैं.

बहरहाल, समय से पूर्व प्रसव से जन्मे बच्चे भाषा और संज्ञानात्मक कौशल को सीखने में पूर्णकालिक प्रसव के ज़रिए पैदा हुए बच्चों की तुलना में ज़्यादा बेहतर होते हैं. अमेरिका के इलिनोइस के नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के सांद्रा वाक्समान ने कहा कि इस अध्ययन से ऐसे शिशुओं के जल्द अनुभव करने की भूमिका को समझने और भाषा के संपर्क व परिपक्व स्थिति को जानने में मदद मिलती है.

शोधकर्ताओं की टीम ने स्वस्थ एवं समय से पूर्व पैदा हुए और पूर्णकालिक शिशुओं की एक ही उम्र वाले बच्चों की तुलना की. इसमें भाषा और वस्तु वर्गीकरण के बीच उनके संबंध के विकास का अध्ययन किया गया. इस शोध का प्रकाशन ऑनलाइन पत्रिका डेवेलपमेंटल साइंस में हुआ है.

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समय से पहले जन्म होने के क्या कारण हैं?

बच्चे प्रीमैच्योर्ड क्यों पैदा होते हैं, इस बात पर अभी तक कोई स्पष्ट राय नहीं है. हालांकि डॉक्टरों का मानना है कि महिलाओं की सेहत की गर्भावस्था पर ज़्यादा असर पड़ता है. अमूमन अगर कोई अनहोनी न हो तो स्वस्थ महिलाओं में गर्भावस्था पूरे नौ महीने चलने की संभावना ज़्यादा रहती है, जबकि बीमार और शारीरिक रूप से कमज़ोर महिलाओं की डिलीवरी प्रीमैच्योर होने की संभावना ज़्यादा रहती है. हालांकि यह बात तो डॉक्टर भी पूरे विश्‍वास के साथ नहीं बता सकते कि कौन से बच्चे समय से जन्म लेंगे और कौन बच्चे समय से पहले जन्म लेंगे. कहा जाता है कि ऐसे बहुत से चिकित्सकीय एवं सामाजिक कारण हैं, जिनकी वजह से समय से पहले प्रसव और जन्म की संभावना अधिक बढ़ जाती है.

प्रीमैच्योर डिलीवरी के बच्चे

35 हफ़्ते में जन्मे बच्चे

35 हफ़्ते में पैदा होनेवाले बच्चों को किसी तरह की अपंगता, विकृति या बीमारी होने की आशंका बहुत ही कम रहती है. हालांकि यह संभव होता है कि क़द में बच्चा थोड़ा छोटा हो सकता है या उसे कभी-कभी सांस लेने में थोड़ी मुश्किल भी हो सकती है. इस तरह के बच्चों की ट्रीटमेंट तो नहीं, हां, देखभाल की ज़्यादा ज़रूरत पड़ती है. हालांकि इस तरह के केसेज़ बहुत कम देखने को मिलते हैं.

28 से 34 हफ़्ते के बीच जन्मे बच्चे

34 हफ़्ते से भी कम समय तक गर्भ में रहे बच्चों को पूरी तरह विकसित होने का समय नहीं मिल पाता. इसके चलते उनके आंतरिक अंगों को पूरी तरह परिपक्व होना शेष होता है. ऐसे बच्चे बहुत ज़्यादा कमज़ोर होते हैं. उन्हें स्तनपान करने और सांस लेने में मुश्किल हो सकती है. ऐसे शिशुओं की देखभाल के लिए नवजात गहन चिकित्सा इकाई की ज़रूरत पड़ती है, जहां उनकी बेहतर देखभाल की जाती है.

वैसे डॉक्टर मानते हैं कि अच्छी चिकित्सकीय सुविधाएं मिलने पर 28 हफ़्ते की प्रेग्नेंसी में जन्म लेने वाले बच्चों के जीवित रहने की बहुत ज़्यादा संभावना रहती है.

28 हफ़्ते से पहले जन्मे बच्चे

दुर्भाग्यवश, 28 हफ़्ते की प्रेग्नेंसी से पहले पैदा हुए बच्चों का जीवित रहना बहुत ज़्यादा मुश्किल होता है. जो बच्चे किसी तरह मेडिकेयर की बदौलत जीवित रहने में सफल हो भी जाते हैं, उनमें भी मामूली से लेकर काफ़ी गंभीर क़िस्म की अपंगता हो सकती है या कोई बीमारी भी हो सकती है.

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प्रीमैच्योर्ड डिलीवरी कब होती है?

कई चिकित्सकीय कारण हैं, जिनके चलते बच्चे के समय से पहले ही पैदा होने की आशंका बढ़ जाती है:

वेजाइना में वायरस इंफेक्शन,

गर्भ में जुड़वा या इससे ज़्यादा बच्चे होना,

प्रेग्नेंसी के दौरान अत्याधिक ब्लीडिंग,

प्रेग्नेंसी की विकृति या असामान्यता,

ग्रीवा की कमज़ोरी,

गर्भपात करवाने के बाद,

घरेलू हिंसा का शिकार होना,

धूम्रपान व ड्रग्स का सेवन,

लंबे समय तक कठोर शारीरिक श्रम.

योजना महीप

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आंखें इंसान के शरीर का वो ख़ास अंग हैं- जिससे वो इस ख़ूबसूरत दुनिया को देखता है, लेकिन कई बार लोग आंखों में दर्द, जलन, खुजली और पानी आने की समस्या को गंभीरता से लेने की बजाय नज़रअंदाज़ कर देते हैं. ख़ासकर छोटे बच्चों की आंखों में होनेवाली इन समस्याओं को आम समझने की ग़लती उन्हें आंखों के कैंसर का मरीज़ बना सकती है. कई बार बच्चों में होनेवाले आंखों के कैंसर का पता एडवांस स्टेज में जाकर चलता है और ऐसी स्थिति में कीमो थेरेपी देना लगभग नामुमक़िन हो जाता है, जिसके चलते कई बच्चे हमेशा-हमेशा के लिए अपने आंखों को रोशनी गंवा बैठते हैं.

क्या है रेटिनोब्लास्टोमा?

5 साल से कम उम्र के बच्चों के रेटिना में होनेवाले कैंसर को रेटिनोब्लास्टोमा कहते हैं. ये रोग आंख में असामान्य कोशिकाओं की वृद्धि के कारण होता है और क़रीब 20 हज़ार बच्चों में से 1 बच्चा ही इसका शिकार होता है. हालांकि अधिकांश लोग यह भी नहीं जानते कि बच्चों की आंखों में भी कैंसर होता है, लेकिन समय रहते अगर इसके लक्षणों को पहचानकर इलाज कराया जाए, तो आंखों के बचने की संभावना 90 फ़ीसदी तक होती है.

कैसे पता लगाएं?

आपके बच्चे की आंखों में कहीं यह समस्या तो नहीं है, इसका पता आप ख़ुद भी बेहद आसानी से लगा सकते हैं. इसके लिए बच्चे के दोनों आंखों की मध्यम रोशनी के फ्लैश से फोटो खींचें. अगर इस तस्वीर में एक आंख लाल और दूसरी स़फेद नज़र आए, तो समझ लीजिए कि बच्चे को इस बीमारी का ख़तरा है. बच्चे की आंखों की सलामती के लिए आपको फ़ौरन डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

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लक्षण

अगर आपके बच्चे की आंखों में नीचे दिए गए लक्षण दिखाई देने लगें, तो संभल जाएं और वक़्त रहते इलाज करवाएं.

* रोशनी पड़ने पर रेटिना में स़फेद धब्बा दिखाई देना.

* आंखों का लाल होना और उसमें दर्द महसूस होना.

* दिखाई देने में दिक्कत और आंखों का बाहर उभर आना.

* दोनों आंखों की पुतलियों का रंग अलग हो जाना.

* आंखों का भेंगापन भी इस रोग का एक लक्षण है.

कारण

विशेषज्ञों की मानें तो 40 फ़ीसदी मामलों में यह बीमारी जेनेटिक कारणों से होती है. अगर किसी के पहले बच्चे को बीमारी हो, तो दूसरे बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उसके आंखों की जांच करानी चाहिए. टेस्ट हर तीन महीने में होना चाहिए. व़क्त पर लेज़र ट्रीटमेंट और कीमो थेरेपी से आंखों को बचाया जा सकता है, लेकिन कई बार ट्यूमर फैलने की वजह से आंख निकालने तक की नौबत आ जाती है.

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अलर्ट

* 5 साल से कम उम्र के बच्चों में रेटिना का कैंसर सामान्य.

* 20 हज़ार बच्चे में से एक में दिखता है यह रोग.

* इलाज में देरी छीन सकता है आंखों की रोशनी.

– डॉ. जे. एल. गुप्ता

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Effective Tips On How To Take Care Of Baby In Winter

मांएं सर्दी का मौसम आते ही अपने नवजात शिशुओं को ढेर सारे कपड़े पहनाकर, सिर पर ऊन की टोपी बांधकर उन्हें ऊनी कंबल में लपेटकर रखती हैं. उन्हें भय रहता है कि उनके नन्हें-मुन्ने लाडले को कहीं सर्दी न लग जाए. परंतु हम यहां नवजात शिशुओं को सर्दी से बचाए रखने के लिए कुछ विशिष्ट उपाय बता रहे हैं. इन उपायों पर अमल करने से बच्चों को कभी सर्दी नहीं लगेगी.

* नवजात शिशु के शरीर पर हल्के हाथों से राई के तेल की मालिश करके कम से कम कपड़े पहनाकर नंगे बदन ही सुबह की गुलाबी धूप का सेवन कराएं. यह प्रयोग नियमित रूप से करें. आपके शिशु को कभी सर्दी नहीं होगी और न कभी निमोनिया होगा.
* रात को सोते समय तुलसी का रस उसके नाक, कान और माथे पर मलें. तुलसी के रस के सेवन से सर्दी का प्रकोप कभी नहीं होगा. आप तुलसी के रस की एक बूंद शहद के साथ मिलाकर उन्हें चटा भी सकती हैं.
* सुबह नवजात शिशु को शहद चटाएं. इस प्रयोग से भी उस पर सर्दी का आक्रमण नहीं होगा.
* शिशु को स्नान कराने से पहले हाथों में शहद लगाकर उस पर नींबू का रस निचोड़कर उसकी छाती पर मलें. यह प्रयोग शिशु को सर्दी से बचाने के लिए कवच बन जाएगा.

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* नवजात शिशु के झूले के पास या उसके सोने के स्थान के आसपास कपड़े की एक पोटली में प्याज़ को कुचलकर बांधकर रख दें. हवा में प्याज़ की गंध मिल जाने से सर्दी का प्रभाव नहीं होगा.
* जिस कमरे में बच्चा सोता है, उसकी खिड़कियां बंद न करें.
* न कभी अंगीठी जलाकर रखें और न सर्दी से बचाव के लिए हीटर का प्रयोग करें.
* यदि आप खिड़की खोलकर वहां तुलसी के पौधे का गमला रख देंगे और आसपास दो-तीन ताज़े नींबू धागे से बांधकर लटका देंगे, तो नवजात शिशु का सर्दी से प्राकृतिक बचाव हो जाएगा.
* कभी-कभी गुनगुने पानी में नीम की पत्तियां उबालकर नवजात शिशु को उससे स्पंज करें. यह ध्यान रहे कि पानी का तापक्रम मात्र इतना होना चाहिए, नवजात शिशु की कोमल त्वचा सहन कर सके.

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* सर्दी के प्रभाव से नवजात शिशुओं को बचाए रखने के लिए आप उन्हें ख़ूब हंसाएं या फिर वे रोते हैं, तो कुछ पल उन्हें चुप न कराएं. सर्दी से बचाव करने का यह कुदरती प्राणायाम है.
* यदि बच्चा दिनभर चुप रहता है, तो अवश्य ही उसे सर्दी लग जाएगी. चुप रहनेवाले शिशुओं में प्रतिरोधात्मक शक्ति का अभाव होता है. अतः शिशु से बात करे, ताकि वो ख़ुश हो और मुस्कुराए.

– ऊषा गुप्ता

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बचपन से किशोवस्था की तरफ़ बढ़ते बच्चों की अपनी एक अलग ही दुनिया होती है. यह दुनिया उनके ख़्वाबों, चाहतों, पसंद-नापसंद, शरारतों व सीक्रेट्स से बनी होती है, जिसमें किसी की घुसपैठ उन्हें पसंद नहीं. ज़्यादातर लोगों के लिए यह दुनिया एक रहस्य के समान होती है, पर हमारे लिए नहीं, क्योंकि उनके सीक्रेट्स जानने के लिए हमने की उनसे कुछ ख़ास बातें. टीनएजर्स की इसी रहस्यमयी दुनिया से हम आपको करा रहे हैं रू-ब-रू, ताकि आप भी जान सकें उनके ख़ास सीक्रेट्स.

* एक बार मैंने बिना पापा की परमिशन के उनकी बाइक चलाई और एक छोटा-सा एक्सीडेंट हो गया. बाइक थोड़ी-सी डैमेज हो गई. पर घर में मैंने बताया कि बाइक मुझे इस हालात में पार्किंग लॉट में पड़ी मिली.

* जिस दिन मेरा स्कूल जाने का मन नहीं होता, उस रात मैं अलार्म बंद कर देता हूं और सुबह उठकर अलार्म न बजने का बहाना बना देता हूं.

* जब भी मुझे किसी पार्टी या मूवी के लिए जाना होता है, तो झूठ बोल देता हूं कि मैं दोस्त के घर पढ़ने या प्रोजेक्ट के काम से जा रहा हूं.

* घर पहुंचने से पहले मैं अपने मोबाइल फोन से कुछ मैसेजेज़ व कॉल हिस्ट्री डिलीट कर देता हूं, ताकि पैरेंट्स के टेंशनवाले सवालों से बच सकूं.

* मुझे सर्दियों में नहाना बिल्कुल पसंद नहीं, इसलिए सर्दियों में अक्सर मैं बाथरूम में जाकर बालों को गीला करके, हाथ-पैर व मुंह धो लेता हूं, थोड़ा डियोड्रेंट लगाता हूं और बाहर आकर कहता हूं कि पानी बहुत ठंडा था.

* मैं और मेरे कई दोस्त अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पार्ट टाइम जॉब करते हैं. पर हमने इस बारे में अपने पैरेंट्स को नहीं बताया, क्योंकि हम नहीं चाहते कि पॉकेटमनी कम हो जाए.

* कभी-कभी जब मम्मी मुझे बाज़ार से कुछ ख़रीदने के लिए पैसे देती हैं, तो मैं अक्सर थोड़े पैसे बचाकर रख लेता हूं. घर आकर मम्मी को बोल देता हूं कि चीज़ों के दाम तो आसमान छूने लगे हैं.

* मम्मी मुझे रोज़ाना बस का किराया देती हैं, पर बस से जाने की बजाय मैं पैदल जाता हूं, ताकि उन पैसों से अपना फेवरेट स्नैक्स ख़रीद सकूं.

* एक बार स्कूल में मोबाइल यूज़ करते व़क्त टीचर ने मुझे देख लिया और मोबाइल छीन लिया. घर पर मैंने बताया कि मोबाइल अचानक से ख़राब हो गया, तो मैंने रिपेयर के लिए दिया है.

* मेरे पैरेंट्स को मेरे कुछ दोस्त पसंद नहीं, इसलिए वे उनसे दूर रहने के लिए कहते हैं. मैं उनके मोबाइल नंबर सेव करने की बजाय याद कर लेता हूं, ताकि जब भी वे कॉल करें, मेरे फोन में उनका नाम न दिखे.

* जब भी हमें स्कूल-कॉलेज में हाफ डे मिलता है, तो हम घरवालों को बिना बताए, कहीं घूमने चले जाते हैं और ठीक समय पर घर पहुंच जाते हैं. हमारे पैरेंट्स को कभी इस बारे में शक भी नहीं हुआ.

* जब भी हमारे फ्रेंड सर्कल में किसी के पैरेंट्स शहर से बाहर जाते हैं, तो हम सारी सहेलियां मिलकर उसके घर पर रातभर पार्टी करते हैं. घर पर हम बता देते हैं कि कंबाइन प्रोजेक्ट पर काम करना है.

* कभी-कभी हम दोस्त मिलकर पैसे जमा करते हैं और एडल्ट मैग्ज़ीन ख़रीदकर देखते हैं.

* इस साल कुछ दिनों के लिए मुझे स्कूल से सस्पेंड कर दिया गया, पर मैंने घर पर नहीं बताया और रोज़ स्कूल जाने का नाटक करता रहा. स्कूलवाले घर पर फोन नहीं कर पाए, क्योंकि हमारे फोन ख़राब थे, पर उन्होंने लेटर भेजा, जो क़िस्मत से मेरे ही हाथ लगा और मैंने उसे फाड़कर फेंक दिया.

– सत्येन्द्र सिंह

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कहते हैं बिन रोये मां भी शिशु को दूध नहीं पिलाती. पर जब बच्चा थोड़ा बड़ा होने लगता है, तो वे ये जानने लगती हैं कि बच्चा क्यों रो रहा है. भूख की वजह से या पेट दर्द की वजह से. और थोड़ा बड़ा होने पर वह जानने लगती हैं कि वाक़ई पेट दर्द हो रहा है या स्कूल जाने के नाम से पेट दर्द हो रहा है. स्कूल जाने का समय निकल जाने पर पेट दर्द छू मंतर हो जायेगा. कभी ट्यूशन न जाने के लिए कोई बहाना है.

तू सब जानती है कह देना तो आसान है पर मां सब कभी नहीं समझ पाती क्योंकि किसी भी मन के भीतर क्या उमड़-घुमड़ रहा है भला कब जाना जा सकता है. अनजाने में ही हम बच्चों की उम्र की परवाह किये बिना उनसे बड़ी उम्मीदें करने लगते हैं और उनकी भावनाओं को समझ नहीं पाते हैं. हम बच्चों से बहुत बड़ी आशाएं करते हैं. अपने सपनों को उनके माध्यम से पूरा करने के अरमानों के चलते उसे समझ ही नहीं पाते हैं. हमसे कब भूल होती है. हम समझदारी के बहाने नासमझी करते हैं, ये जानने के लिए कई बार अपने ही व्यवहार का मूल्यांकन करना भी ज़रूरी होता है.
साइकोलॉजिस्टों का यह कहना कि अक्सर यह देखा जाता है कि ग़लती बच्चे के व्यवहार में नहीं बल्कि मां-बाप के व्यवहार में होती है वे ही अपने विचार, अपने स्टाइल उन पर थोपने की कोशिशों में उसे समझ नहीं पाते.

बहुत छोटी उम्र और बहुत बड़ी उम्मीदें

एक बार मेरी एक मित्र अपनी तीन साल की बेटी को ऑफिस लेकर आयी. मैंने उसे खाने के लिए बिस्कुट दिये. बड़े कांपते हाथों से उसने बिस्कुट लिया. खा ही रही थी कि मां ने डांटना शुरू किया. हाथ गंदे कर रही हो. मुंह साफ़ करो, क्यों खा रही हो. ब्रेकफास्ट करके आयी थी. डांट की एक लम्बी लिस्ट थी. उसने बिस्कुट खाना छोड़ दिया पर मेरे पुचकारने और मां को उसे कुछ न कहने की हिदायत पर उस दुबली-सी लड़की ने एक दो नहीं चार-पांच बिस्कुट खाये. उसका चेहरा अब तृप्त था पर सहमा हुआ. मैंने महसूस किया कि उस नन्हीं-सी जान को मां सुपर किड बनाना चाहती है. नन्हें कृष्ण गोपाल चेहरे पर इधर-उधर मक्खन लगे ही अच्छे लगते हैं. उन्हें पहले खाने तो दें फिर साफ-सफाई भी हो जायेगी. बहुत छोटी उम्र, खाना कपड़ों पर न गिरे, हाथ मुंह गंदे न हो खाना कपड़ों पर ही नहीं ज़मीन पर भी न बिखरे ऐसा भला क्या संभव है. उस उम्र से इतनी उम्मीदें न रखें. यदि ऐसी उम्मीदें रखेंगी तो लगेगा कि कहना नहीं मान रहा. उसकी उम्र को ज़रा समझने की कोशिश करें.

रोना-कभी नहीं रोना

गाने में भले ही यह गाना अच्छा लगे कि कभी नहीं रोना पर बच्चे रोते ही हैं. बच्चे क्या सभी रोते हैं. जब तकलीफ़ हो तो आंसू बाहर निकल जाए तो हर्ज़ ही क्या है. पर प्रश्न यह उठता है कि कोई बच्चा क्यों रो रहा है. उसका कारण क्या जानने की कोशिश की या उसे बहानेबाज समझ कर उसके रोने को यूं ही टाल दिया जाये.
* बहुत छोटा बेबी ज़रूरी नहीं कि इसलिए रो रहा हो कि उसे गोद में उठाया जाये. हो सकता है जो फैंसी ड्रेस आपने पहनायी हो उसका कोई पिन उसे चुभ रहा हो या फिर जूता तकलीफ़ दे रहा है.
* ये माना कि बच्चे रोकर अपनी ज़िद मनवा लेते हैं, पर हो सकता है कि उसकी ज़िद, ज़िद न हो और आप कभी भी उसकी बात तब तक न मानती हो जब तक वह रोता न हो.
* बच्चा स्कूल जाते समय रोता है. पढ़ना नहीं चाहता यह ज़रूरी नहीं हो सकता है कि स्कूल में टीचर डांटती हो, कोई दूसरा बच्चा तंग करता हो उसका सामान छीन लेता हो या किसी से उसका झगड़ा हो गया हो.
* कुछ बड़ी उम्र या किशोर वय का बच्चा मूड स्विंग्स के चलते तनावग्रस्त होकर छोटी-छोटी बातों से खीझ रहा है. ये भी सकता है कि चाइल्ड एब्यूज़ का शिकार हुआ हो. उसके रोेने के कारणों को आप नहीं समझेंगी तो कौन समझेगा?

बच्चे को बच्चा ही बना रहने दें

हमारे एक परिचित की बेटी सात वर्ष की उम्र में ही पूरा घर संभालती थी. घर ही नहीं दो जुड़वा छोटे भाईयों को भी वही संभालती थी. मेहमानबाजी भी उसी तरह करती थी जैसे घर की स्त्री करती है. उसके इस व्यवहार को मैं कभी सराहा नहीं सकी, क्योंकि उसकी मां ने उसका बचपन उससे स़िर्फ इसलिए छीन लिया कि तीन बच्चों की परवरिश और घर ऑफिस की जिम्मेदारी वे अकेले कैसे संभालती! जिस उम्र में बच्चे दूसरे बच्चों के साथ मिलकर धमाल मचाते हैं, सोफों पर कूदते हैं, पिलो एक-दूसरे को मारते हैं, सारे घर में इधर-उधर रेलगाड़ी बनाते घूमते हैं उस उम्र में उन्हें सब सामान क़रीने से रखने की उम्मीद करना, मेहमानों की आवभगत करना आना उसे चाय भी बनानी आनी चाहिए और दाल-चपाती भी, तो यह कुछ जल्दी ही चाह रही हैं. यकीं जाने की ये सब उम्र के साथ ही आ जाता है. मौज़-मस्ती के साल बहुत कम होते हैं. उसके बाद तो हर व़क़्त कोचिंग के चक्कर रहेंगे. उन्हें व़क़्त से पहले बड़ा बनाने की ये नाहक कोशिश न करें तो बच्चे भी सुखी होंगे और आप भी उनकी मस्ती एन्जॉय करेंगी.

बच्चा बिल्कुल नहीं सुनता

* सारा दिन शरारत और स़िर्फ शरारत यही बात तो आपको खिझाती है, पर शरारत भी नहीं करता और फिर भी कोई बात नहीं सुनता. इतना बदतमीज़, इतना ज़िद्दी कह देना आसान है, पर कभी यह सोचा कि हो सकता है उसकी लिसनिंग स्किल अपनी उम्र के मुताबिक़ विकसित न हुए हों.

* उसके कान में हियरिंग की प्राब्लम हो.

* उसका पढ़ने में मन नहीं लगता.

हो सकता है कि लर्निंग डिसएबिलिटी हो.

बच्चा हायपर एक्टिव हो सकता है या किसी अन्य बीमारी का शिकार, जिसे आप समझ नहीं पा रही हों.

* हायपर एक्टिव बच्चा यदि खाने की टेबल पर आने से पहले अपने कमरे की दीवार पर बॉल मारने की अंधाधुंध प्रैक्टिस किये जा रहा है, तो समझें कि उसकी एनर्जी को कहीं चैनलाइज करने की ज़रूरत है.

बच्चा ज़रूरत से ज़्यादा चुपचाप रहता है

* यह ज़रूरी नहीं संगत बिगड़ गयी हो.

* हो सकता है कि उसके किसी ख़ास दोस्त के परिवार में कुछ तकलीफ़ हो, जिसे वह आपसे शेयर नहीं करना चाहता.

* हो सकता है कि उसने आप पति-पत्नी को लड़ते या अंतरंग स्थिति में देखा हो.

* आपकी ज़िंदगी में चल रहे तनाव परेशानियों की वजह से भी कई बच्चे ख़ामोश रहने लगते हैं.

* यही नहीं पेपर ख़राब हो गया है या सहेली से तक़रार हो गया हो उसके उस ख़राब मूड की वजह तो आपको तलाशनी होगी.

* उससे संवाद आपको करना है. यदि कम्युनिकेशन नहीं कर पा रही हैं तो अपनी कोशिश जारी रखें.

आप चाहती हैं कि वे आपकी आवश्यकताएं आपका मूड समझें

* होना तो यह चाहिए कि आप समझें कि बच्चे क्या चाहते हैं.

* वे कब किस बात से परेशान है उनके बोले बिना आप समझ जाएं.

* उनका मूड क्यों उखड़ा है.

* वे क्यों खीझ रहे हैं, आप को समझना चाहिए. पर आप यह चाहती हैं कि वो आपको समझें.

* आपके ऑफ़िस में कोई प्रॉब्लम चल रही है और आप उन्हें डांट रही हैं और अपनी बेवजह डांट को उचित ठहराना चाहती हैं कि उन्हें समझना चाहिए कि मां-बाप के ऑफ़िस में प्रॉब्लम है इसलिए घूमने नहीं ले जा रहे हैं.

* आप अपनी तकलीफों से इतनी आक्रांत है कि बच्चे से उम्मीद कर रही हैं कि वे आपको समझें.
* घर में बर्तन वाली, सफाई वाली नहीं आयी आप सुबह से काम में उलझी हैं, सुबह से उठकर काम कर रही हैं और चाह रही हैं कि बेटी बिस्तर से उठकर आये और काम में हाथ बंटाये.

* उसको काम करना सिखाया नहीं, पर अब अचानक उससे उम्मीद रख खीझ रही हैं.

* पहले उन्हें अपनी तकलीफ़ की जानकारी दें फिर उम्मीद रखें पर आप तो उल्टा कर रही हैं.

बच्चों की आलोचना मत करें- प्रशंसा करें

* बच्चे हैं और उन्हें सही ग़लत की पहचान नहीं है और जब बड़े अपनी गलतियों से सीखते हैं तो बच्चे क्यों नहीं.

* पर आप उन्हें उनकी ग़लतियों को लेकर हर व़क़्त डांटती हैं और एक ही ग़लती का ताना हर बार देती हैं.

* उनकी ग़लती पर गुस्सा न हों, बल्कि प्यार से समझायें.

* यदि बार-बार समझाने पर भी न समझें तो ही डांटे.

* उनकी किसी ग़लती को उनके व्यवहार का रूप न बना डालें कि वह ऐसे ही करता है.

* हर व़क़्त की आलोचना उसे हठी बना सकती है. इसमें कोई दो राय नहीं है.

* जहां आलोचना उसे हठी बनाने के साथ उसका आत्मविश्वास को कमजोर करती है वह तिरस्कार महसूस करता है.

* वहीं प्यार के दो बोल उसकी प्रशंसा उसका मनोबल बढ़ाती है.
* कभी आपने यह सोचा है कि उसकी ग़लती पर आलोचना तो करती हैं, पर क्या अच्छा करने पर प्रशंसा भी करती हैं.

* यदि नहीं तो उसकी प्रशंसा किया करें.

* आपके कहे हर शब्द की बच्चों के लिए अहमियत होती है.

पर उपदेश कुशल बहुतेरेे

* जी हां उन्हें ईमानदारी, सच्चाई, न झगड़ने, दिन रात पढ़ने, सारा दिन टीवी देखने, कम्प्यूटर पर गेम खेलने जैसी एक लम्बी फेहरिस्त पर अमल करने से पहले उन पर स्वयं अमल करें.

* बच्चे जो देखते हैं वे उस पर अमल स्वतः करते हैं.

* आप बड़े-बुजुर्गों की इ़ज़्ज़त करती हैं, स्वयं पुस्तकें पढ़ती हैं.

* सारा दिन टीवी सीरियल में नहीं उलझी रहती हैं, तो वैसा व्यवहार वे भी सीख जाते हैं.
* आप उसे बहुत छोटी उम्र में वो उम्मीदें रख रही हैं, जो आपके व्यवहार में न हो.

* उसे दरवाज़े पर दस्तक देकर आपके कमरे में आना चाहिए.

* उसे आप पति-पत्नी बात कर रहे हों या आप किसी से बातचीत में व्यस्त हों,तो उसे आपको डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए.

* चार-पांच साल के बच्चे से यह बहुत बड़ी डिमांड है. आप उसे डांटकर ये जतलाना चाहती हैं कि उसे गुडमैनर्स नहीं है, जो सही नहीं है.

* उसे धीरे-धीरे अच्छी मैनर्स सिखायें, ताकि वे उन्हें सहजता से सीख पाए.

उनका इंकार करना

* उसने किसी काम को करने से मना कर दिया, आप यही सोचती हैं न कि निकम्मा है, आलसी है, कहना नहीं सुनता.

* हो सकता है कि वह उस समय तकलीफ़ में हो. उसका पेट दर्द कर रहा हो, हो सकता है या स्कूल में किसी व्यवहार से दुखी हो, इस प्रकार प्रतिक्रिया दे रहा हो.

* यह भी हो सकता है कि आपके व्यवहार को कॉपी कर रहा है.

* आप भी तो उसकी किसी भी फ़रमाइश को पूरी तरह सुने बिना पहले मना कर देती हैं.

* आपका हर वाक्य ‘नो’ से ही तो शुरू होता है.

* बच्चे के हर ज़़ज़्बात को समझ नहीं पा रही हैं, इसलिए अपनी पेरेंटिंग को दोष न दें और न ही अपराधबोध महसूस करें.

* बच्चा कोई व्यवहार क्यों कर रहा है उसका दोष ढूंढने से पहले अपने व्यवहार का विश्लेषण यदि करेंगी, तो पायेंगी कि ग़लती कई बार अपनी ही व्यवहार में हो रही होती है.

* पर समझदारी भी इसी में है कि अपने को सुधारते हुए उसको सुधारते चलें और मां बिना कहे ही सब समझ जाती है यह विश्वास पक्का हो जाए.

– कृष्णा रानी