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जिनकी मासूम आंखों में कई भोले-से सपने पलते हैं, जिनकी एक मुस्कान से कई उदास चेहरे भी खिल उठते हैं… जिनकी कोमल छुअनसे दिल के ज़ख़्म भी भर जाते हैं… वो बच्चे जब समाज के नियम-क़ायदों से कुछ अलग होते हैं तो खुद ही सहम जाते हैं… लेकिन ये बच्चे ख़ास होते हैं, ऐसे ख़ास बच्चों में खूबियां भी ख़ास होती है जिनकी उभारने के लिए उनको आम बच्चों से कुछ अलग तरह सेसिखाने-पढ़ाना पड़ता है, क्योंकि इनको आगे बढ़ाने के लिए इनके दिमाग़ नहीं, दिल तक जाना पड़ता है.

ऐसे ही स्पेशल बच्चों के लिए स्पेशल काम कर रही हैं अनुराधा पटपटिया. ये एक ऐसा नाम है जिन्होंने ऐसे ही खास बच्चों के दिलों मेंअपनी खास जगह बनाई है, क्योंकि उन्होंने इनके दिलों को छुआ है. आज वो REACH (रेमेडियल एजुकेशन एंड सेंटर फ़ॉर होलिस्टिकडेवलपमेंट) की फ़ाउंडर और डायरेक्टर हैं, जो स्पेशल चाइल्ड एजुकेशन और उनके संपूर्ण विकास के लिए खड़ा किया गया है. लेकिन येसफ़र अनुराधा जी के लिए भी आसान नहीं था. यहां तक पहुंचने के लिए उन्होंने न सिर्फ़ मेहनत की, बल्कि मज़बूत इच्छा शक्ति, जोश, जुनून और जज़्बा क़ायम रखा. 

कैसा रहा उनका ये सफ़र और क्या-क्या करने पड़े संघर्ष ये जानने के लिए हमने खुद अनुराधा जी से बात की… 

पहला और सीधा सवाल- शुरुआत कहां से हुई और ये ख़याल कैसे पनपा कि ऐसा कुछ करना है?

शुरुआत हुई जब मैंने साल 1996-98 के दौरान हैदराबाद में मदर टेरेसा के यहां काम करना, सोशल वर्क करना शुरू किया. मेरे पतिका जॉब ऐसा था जिसमें उनका ट्रान्स्फ़र होता रहता था इसीलिए मुझे भी अपना बैंक का जॉब छोड़ना पड़ा, लेकिन घर पर बैठने की मुझे आदत नहीं थी और मुझे कुछ न कुछ करना ही था इसलिए मैंने उनके स्पेशल चाइल्ड स्कूल में काम करना शुरू कर दिया. वहां मेरा कामथा स्पेशल चाइल्ड को एडमिशन में हेल्प करना और ऐसा नहीं है कि मैं सिर्फ़ टाइम पास के लिए ये काम कर रही थी. वहां भी मैं नियमित रूप से पूरे डेडिकेशन के साथ अपना काम करती थी. तब मैंने इन बच्चों को क़रीब से देखा और मुझे ये पता चला कि स्पेशल चिल्ड्रन कोजो टीचर्स पढ़ाते हैं वो दरअसल ट्रेंड होते हैं, स्पेशल एजुकेशन में बीएड किया जाता है और इसके लिए अलग से कोर्स करना पड़ता है. तब मुझे ख़याल आया कि मुझे भी इन बच्चों के साथ जुड़ना है और इनके लिए काम करना है. 

फिर मैं मुंबई आई, तक़रीबन 1998-99 में और चूंकि मुंबई में कम्फ़र्टेबल थी तो यहां आकार मैंने पता किया. एसएनडीटी में ये कोर्सहोता था और मैंने जॉइन कर लिया. मैं तब 42 साल की हो चुकी थी. मेरे दोनों बच्चे भी बड़े हो गए थे तो इसलिए मुझे लगा ये सहीसमय है कुछ करने का और सिर्फ़ समय बिताना मेरा मक़सद नहीं था, मुझे वाक़ई में कुछ करना था और कुछ बेहतर करने के लिए ज़रूरीथा कि क्वालिफ़ायड होकर करूं बजाय ऐसे ही समय बिताने के. वैसे भी एसएनडीटी मुंबई यूनिवर्सिटी से जुड़ा था तो कोई एज बार नहींथा और ये एक साल का कोर्स था. काफ़ी डिफ़िकल्ट था, क्योंकि ये फुल टाइम कोर्स था और बच्चे मेरे भले ही बड़े थे लेकिन पढ़ाई कररहे थे. पर घरवालों और मेरे मां के सपोर्ट से मैंने ये कोर्स पूरा किया.

इसे करने के बाद मुझे एक दिशा मिली क्योंकि मैं अब समझ पा रही थी कि रेमेडियल थेरपी क्या होती है, किस-किस तरह की होती है. साल 2002 में मैंने ये पक्का कर लिया कि घर पर जो 2-4 बच्चे मेरे पास आते थे उनके लिए और उनके जैसे अन्य बच्चों के लिए एकअलग से जगह होनी चाहिए ताकि हम बेहतर ढंग से उनको पढ़ा पाएं.

मैंने एक छोटी सी जगह ली और एसएनडीटी से भी मेरे पास स्पेशल बच्चे आते थे और फिर बच्चों की संख्या बढ़ने लगी. साल 2004 मेंमैंने अपने साथ मेरी एसएनडीटी की साथी जो मुझसे 20 साल छोटी थी, क्योंकि मैं तब खुद 42 साल की थी, तो वो भी मेरी ही तरहकाफ़ी उत्साहित थी इस काम को लेकर, उसका नाम हीरल था तो उसको भी जोड़ा अपने साथ ताकि लर्निंग डिसएबिलिटी वाले बच्चों केलिए हम बेहतर काम कर सकें. धीरे-धीरे अन्य लोग भी जुड़ने लगे. 

लर्निंग डिसेबिलिटी का अगर अर्थ देखने जाएं तो उसका मतलब यही है कि वो लर्न यानी सीख सकते हैं लेकिन अलग तरीक़े से. अगरआप सीधे-सीधे उनको बोर्ड पर या पेन-पेंसिल से लिख कर या बोलकर पढ़ाओगे तो वो नहीं समझेंगे लेकिन अगर आप उनको ब्लॉक्स दिखा कर या अन्य तरीक़े से समझाएंगे तो वो सीख जाएंगे. वो मूल रूप से काफ़ी इंटेलिजेंट होते हैं और कई-कई तो बहुत क्रीएटिव होते हैं. कई बच्चों का आईक्यू लेवल बहुत हाई होता है तो उनको अलग तरह से सिखाना पढ़ता है.

लेकिन समस्या ये थी कि जागरूकता नहीं थी. स्कूल्स में ऐसे बच्चों को समझा नहीं जाता था और वो एडमिशन नहीं देते थे. पैरेंट्स परेशान रहते थे कि बच्चा बार-बार फेल हो रहा है, कितना भी सिखाओ सीखता ही नहीं. स्पेलिंग याद नहीं होती… पर अब काफ़ी जागरूकता आ चुकी है. 

लेकिन हम उस वक्त भी वर्कशॉप्स करते थे. स्कूल्स में भी वर्क शॉप्स करते थे ताकि टीचर्स ये समझ पाएं कि ऐसे बच्चों को कैसे हैंडलकरना है. ये ज़रूरी था क्योंकि बार-बार बच्चे को डांट खानी पड़ती थी टीचर से भी और पैरेंट्स से भी. जिससे बच्चे सहम जाते थे. इनकामोरल डाउन हो जाता है. लेकिन इन बच्चों को अगर बार-बार सामान्य तरीक़े से स्पेलिंग सिखाओगे तो वो नहीं सीखेंगे, उनको आपकोशब्द ब्रेक करके, साउंड और प्रोनाउंसिएशन के साथ समझाकर सिखाना पड़ता है.

इन सबके बीच आपको काफ़ी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा होगा, तो उनसे कैसे डील किया?

बिल्कुल चुनैतियां तो थीं और मेरी सबसे बड़ी चुनौती थी कि मैंने कभी भी पैसों को ध्यान में रखते हुए कुछ नहीं सोचा. न ही मेरे पास इतनेज़्यादा पैसे थे और न मैंने इस काम को पैसा कमाने यानी कमर्शियल करने के हिसाब से देखा. मेरा उद्देश्य था कि इन बच्चों को पढ़ाकरबेहतर ज़िंदगी और अपने पैरों पर खड़ा करने की दिशा में योगदान दे सकूं. इसके चलते मुझे आर्थिक तौर पर काफ़ी चुनौती झेलनी पड़ीक्योंकि बार-बार जगह बदलनी पड़ती थी. किराए की जगह पर हम स्कूल चलाते थे लेकिन हर साल किराया बढ़ा दिया जाता था, जिस वजह से हमको दूसरी थोड़ी सस्ती जगह ढूंढ़नी पड़ती थी.

लेकिन हमारे जज़्बे को देख कर हमारे दोस्तों और बच्चों के पैरेंट्स ने भी काफ़ी मदद की. जब लोगों ने देखा कि हम इस काम को लेकरवाक़ई गंभीर हैं तो डोनर्स ने काफ़ी सहायता की.

दरअसल आर्थिक परेशानी की एक बड़ी वजह ये भी रही कि हम कभी भी गरीब बच्चों को ना नहीं बोलते थे. हम हमेशा गरीब परिवार सेआए बच्चों को भी प्राथमिकता देते थे और आज भी देते हैं, क्योंकि जब गरीब घर के बच्चों को स्कूल से निकाल दिया जाता है तो उनकेसाथ क्या होता है- लड़की को घरों में बर्तन, झाड़ू आदि के काम के लिए भेजा जाने लगता है और लड़के को किसी साइकल या चाय कीदुकान पर बैठा दिया जाता है, जो कि ग़लत है, इसीलिए 25-30% हम ऐसे बच्चों के लिए एजुकेशन की सहूलियत रखते हैं. 

ऊपरवाले की दया से हमें बहुत अच्छे डोनर्स मिले आज तक. जब कभी कोई बच्चा फ़ीस नहीं भर पता तब हम डोनर्स की मदद लेते हैं. आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवार के बच्चों के लिए भी हम बेसिक फ़ीस ही रखते हैं क्योंकि अगर सबको फ्री पढ़ाएंगे तो सर्वाइव ही नहींकर पाएंगे, दूसरे टीचर्स की भी सैलरी निकालनी ज़रूरी है. लेकिन इन सबके बीच हम ये ध्यान में रखते हैं कि हाई फ़ीस न रखें क्योंकिऐसे बच्चे जब बड़े होते जाते हैं तो पैरेंट्स को भी काफ़ी थेरपी वग़ैरह में जाना पड़ता है जिससे काफ़ी खर्च बढ़ जाता है. ऐसे हर बच्चे केसाथ इन्वेस्टमेंट तो है ही इसलिए मैं हमेशा पैरेंट्स की तरफ़ से सोचती हूं क्योंकि मैं खुद भी पैरेंट हूं तो उनकी परेशानी समझ सकती हूं.

उसमें भी हर बच्चे की अलग समस्या होती है- किसी को पढ़ने में दिक़्क़त है, किसी हो मेमरी में तो किसी को कुछ और… ऐसे में हर बच्चेका आईक्यू देखना पढ़ता है कि लर्निंग प्रॉब्लम है या कुछ और डिसएबिलिटी, क्योंकि हर बच्चा अलग होता है और इसीलिए हर 5 बच्चेके साथ एक टीचर रखा है हमने. 

आज कुल मिलाकर 35 बच्चे हैं मेरे पास, 9 टीचर्स और 3 एसिस्टेंट टीचर्स हैं. ताकि हर बच्चे पर पूरा ध्यान दिया जा सके, क्योंकि हरबच्चे पर बहुत मेहनत करनी पड़ती है और उन सबके बीच बार-बार जगह बदलने का चैलेंज भी था पर अब साल 2015 से हम कुछसेटल फ़ील कर रहे हैं क्योंकि मुंबई के विलेपार्ले में एक संस्था ने बेहद कम किराए पर एक बंगला दिया है और सात सालों से हम वहींपर हैं. 

आपको ऐसे भी पैरेंट्स मिलते होंगे जो दुविधा में होते होंगे कि क्या पता बच्चा कुछ सीख या कर पाएगा या नहीं… ऐसे पैरेंट्स को आपकैसे भरोसा दिलाती हैं?

जी हां, इस चीज़ पर मैं सबसे ज़्यादा मेहनत करती हूं और उनको विश्वास दिलाती हूं कि मुझ पर भरोसा करो और साथ में खुद को औरबच्चे को भी वक्त दो. मैं अकेले तो जादू नहीं कर सकती, इसके लिए मुझे, बच्चे को और उनके पैरेंट्स को मिलकर काम करना होगा. किसी भी बच्चे में इम्प्रूवमेंट नज़र आने के लिए कम से कम 6 महीने का वक्त तो लगता ही है.

हर बच्चे के साथ अलग टेक्नीक यूज़ करनी पड़ती है और हम NIOS बोर्ड करते हैं. नेशनल ओपन स्कूल का फायदा ये है कि 5 सब्जेक्ट्स हैं और नौ लैंग्वेजेस. ये 5 सब्जेक्ट्स 5 साल में मल्टीपल अटेम्प्ट्स में कर सकते हैं. वो ब्रेक करके कभी 2 सब्जेक्ट कियाकभी एक तो इस तरह से काफ़ी फायदा क्योंकि आप कितने भी अटेम्प्ट्स कर सकते हो. इस तरह मेरे अब तक सौ के क़रीब एक्सस्टूडेंट्स हैं. इनमें से सभी वेल प्लेस्ड और सेटल्ड हैं. कोई होटेल इंडस्ट्री में है, कोई मीडिया में है, फ़ैशन डिज़ाइनिंग में है कोई.

इस तरह ये सफ़र बेहद ख़ुशगवार रहा मेरे लिए, क्योंकि उन बच्चों को जब कामयाब देखती हूं तो वही मेरी भी सबसे बड़ी कामयाबी होतीहै. 

ये बच्चे क्रीएटिव तो होते हैं और हम इनके लिए अलग से करिकुलम बनाते हैं. कलर कोडिंग से लेकर मार्किंग जैसी टेकनीक यूज़ करते हैंताकि वो सिर्फ़ ज़रूरी चीजें ही पढ़ें, एक्स्ट्रा सब हम निकाल देते हैं जो किताबों को मोटा बनाती हैं, क्योंकि मोटी किताब देखकर बच्चा पहले ही डर जाता है. 

इसके अलावा हम परीक्षा भी पारम्परिक तरीक़े से नहीं लेते, जैसे- कोई बच्चा वन वर्ड आन्सर लिख रहा है तो कोई एक्स्प्लेन करके, तोकोई ओरल बोलकर जवाब दे रहा है… क्योंकि हमारा मुख्य लक्ष्य यही है कि बच्चा सीख और समझ रहा है फिर चाहे वो उसको अलग-अलग तरीक़े से दर्शाए.

अब हम रीच में आठ साल से कम उम्र के बच्चों को नहीं लेते क्योंकि इससे कम उम्रवाले बच्चों को थेरेपीज़ की ज़्यादा ज़रूरत होती हैस्कूलिंग की बजाय. हमने भी थेरेपीज़ इंट्रड्यूस की हैं हमारे डोनर्स की मदद से, थेरेपी रूम बनाया और अब आज 20 सालों के बाद मुझेथोड़ा सा सेटल लग रहा है सब, क्योंकि इससे पहले तो संघर्ष ही चल रहा था कि कैसे करना है, कैसे करेंगे… 

परिवार का रवैया कैसा रहा इस बीच? कभी आपके पति या किसी भी सदस्य ने कहा कि बहुत संघर्ष है, कैसे करोगी…?

परिवार ने और पति ने भी काफ़ी सपोर्ट किया. हां, ये तो ज़रूर कहते थे कि बहुत मेहनत है, कितना स्ट्रगल करोगी लेकिन जब उनकोलगा कि मैं ये दिल से करना चाहती हूं तो सबने सहयोग दिया. रीच नाम हमने मिलकर तय किया जिसका अर्थ ही है पहुंचना… इसकालोगो मेरी बेटी ने डिज़ाइन किया जब वो कॉलेज में थी. अब वो खुद मीडिया में है.

कोई ख़ास मैसेज देना चाहेंगी? 

मैं बस यही कहना चाहती हूं कि जब आप दिल से कुछ करना चाहते हो तो वो होता ही है. मेरे बच्चे जब कॉलेज में जाते हैं तब उनकेमाता-पिता के चेहरे पर जो एक संतुष्टि का भाव मैं देखती हूं तो मेरे लिए वही सबसे बड़ा इनाम होता है. पैरेंट्स को जब तसल्ली होजाती है कि हां, अब मेरा बच्चा दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलेगा और आगे बढ़ेगा तो उससे बड़ी ख़ुशी कोई और नहीं. आज भी मेरेएक्स स्टूडेंट मुझे फ़ोन करते हैं जब कभी भी उनको मर्गदर्शन की ज़रूरत पड़ती है, वो चाहे 30-32 साल के ही क्यों न हो गए हों पर मैंहमेशा उनकी टीचर रहूंगी, गाइड रहूंगी… यही मेरी सबसे बड़ी कमाई है. 

कहा जाता है बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं, उनको जिस सांचे में ढालोगे वो ढल जाएंगे. वैसे भी आजकल हम ये महसूस कर रहे हैंकि बच्चों में काफ़ी बदलाव आ गया है, उनकी मासूमियत कम हो रही है और वो परिवार व अपनेपन की भावना से दूर हो रहे हैं.ऐसे मेंउन्हें अपने परिवार, अपनी संस्कृति से रूबरू कराना बेहद ज़रूरी है और इसमें सबसे अहम भूमिका निभा सकते हैं हमारे त्योहार. 

ऐसा भी देखा गया है कि बच्चों के लिए त्योहारों का भी अर्थ बदल सा गया है, वो त्योहारों के पीछे छिपे असली अर्थ को न समझते हुएबस इतना ही जान पाते हैं कि होली में हड़दंग मचाना है और दिवाली में पटाखे फोड़ना व खाना-पीना. इसीलिए ये और भी ज़रूरी होजाता है कि हम उनको अपने त्योहारों का असली मतलब बताएं और उनको बेहतर इंसान बनाएं. 

क्या है त्योहारों के असली मायने?

अपने बच्चों को हर त्योहार के पीछे छिपे धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक व वैज्ञानिक महत्व और मायने बताएं. हर त्योहार को मनाने कीख़ास वजह होती है, चाहे वो ऋतु परिर्वतन हो या फिर कोई सामाजिक सीख व शिक्षा- इससे अपने बच्चों को वाक़िफ़ करवाएं. सिर्फ़कर्म-कांड ही नहीं उनके पीछे के वैज्ञानिक पहलुओं के बारे में समझाएं. उनसे जुड़ी कहानियां व कहानियों की सीख के बारे में बताएं. स्वास्थ्य से इनका क्या कनेक्शन है ये भी बताएं, ताकि बच्चे भी उत्सुक होकर त्योहारों को उत्साह के साथ मनाएं. 

अपनेपन का सबब होते हैं त्योहार…

आजकल माइक्रो फ़ैमिली हो गई है. सिंगल फ़ैमिली कल्चर बहुत बढ़ चुका है जिससे बच्चे अपने सभी परिवार के सदस्यों को न तोपहचानते हैं और न ही उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं. यहां तक कि कोई नाते-रिश्तेदार आ भी जाएं तो बच्चों को बहुत अखरता है. वो न तोउनके साथ घुलना-मिलना चाहते हैं और न ही अपना कमरा व अपनी चीजें शेयर करना चाहते हैं, ऐसे में बच्चों को फ़ेस्टिवल के दौरानअपनों के साथ मेल-मिलाप बढ़ाने का मौक़ा मिलता है. आप बच्चों को रिश्तेदारों के यहां लेकर जाएं या उनको अपने यहां बुलाएं. इससेबच्चों का अकेलापन दूर होगा और उनको फ़ैमिली कल्चर का पता चलेगा. ऐसा भी किया जा सकता है कि आप बच्चों से कहें कि इसबार होली या दिवाली या फिर जन्माष्टमी गांवकी मनाएंगे और आप कहीं और हॉलिडे प्लान करने की बजाए गांव जाकर सभी के साथत्योहार का आनंद उठाएं. बच्चे भी जब अपने बड़ों और अपने कज़िन्स से मिलेंगे तो उनको ख़ुशी होगी और अपनेपन की भावना बढ़ेगी.

मिल-जुलकर काम करने की भावना बढ़ाते हैं त्योहार… 

फ़ेस्टिवल टाइम में सारा परिवार मिल-जुलकर घर की साफ़-सफ़ाई, कुकिंग, शॉपिंग और अन्य प्लानिंग करते हैं. इसमें बच्चों को भीशामिल करें और कुछ कामों की ज़िम्मेदारी उनको भी सौंपें. इससे वो काम-काज में हाथ बंटाना सीखेंगे. वैसे भी रीसर्च कहता है कि घरका काम करने से बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ता है. बच्चों को भी ये एहसास होगा कि उनको भी घर की ज़िम्मेदारियों में हिस्सेदार बनायाजाता है तो उनमें ज़िम्मेदारी की भावना पनपेगी और त्योहारों के प्रति उनका उत्साह भी बढ़ेगा. आजकल फ़ेस्टिवल को लेकर को ठंडापनऔर दिखावे का कल्चर बढ़ रहा है इससे उनको बचाया जा सकता है. 

सिर्फ़ अपने ही नहीं, अन्य धर्मों के त्योहारों की भी जानकारी व महत्व समझाएं… 

बच्चों को हर धर्म का सम्मान करना सिखाएं. आजकल बच्चे दूसरे तो दूर की बात है अपने धर्म का भी सम्मान नहीं करते. उनको सब कुछढकोसला लगता है, लेकिन आप इंटरनेट और सोशल मीडिया की मदद से अपना भी ज्ञान बढ़ाएं और अपने बच्चों को भी अपने व अन्यधर्मों के त्योहारों का असली अर्थ समझाएं. 

त्योहारों से जागती है सुरक्षा, प्यार और माफ़ करने की भावना… 

फ़ेस्टिवल हमको क़रीब लाते हैं. अगर कोई दोस्त या रिश्तेदार लम्बे समय से नाराज़ है तो त्योहार इस नाराज़गी को दूर करने काबेहतरीन अवसर हमें देते हैं. ये बाद बच्चों को भी सिखाएं कि अगर कोई नाराज़ है तो उससे माफ़ी मांग लें और अगर कोई और माफ़ीमांगे तो उसको माफ़ कर दें. त्योहार हमें अपने बैर दूर करने का मौक़ा देते हैं. 

इसके अलावा वो अपनी भावनाएं व प्यार दर्शाने का भी अवसर देते हैं, हम इसी वजह से गिफ़्ट या मिठाई देते हैं. बच्चों को फ़ेस्टिवल केलिए अपने फ़ेवरेट रिश्तेदार या दोस्त के लिए हाथों से ग्रीटिंग कार्ड बनाने या पेंटिंग करने को कहें.

क्वालिटी टाइम बिताने और ख़ुश रहने का बेहतरीन अवसर देते हैं त्योहार… 

भागदौड़ भरी जीवनशैली में त्योहार ही हैं जो हमको अपनों के साथ वक्त बिताने और वो भी क्वालिटी टाइम सपेंड करने का मौक़ा देते हैं. ये बात बच्चों को ज़रूर समझाएं कि किस तरह इन दिनों सभी लोग ख़ुश रहते हैं, उत्साह के साथ काम करते हैं, हंसी-मज़ाक़ करते हैं, अंताक्षरी खेलते हैं, एक साथ खाना खाते हैं… जिससे सारा स्ट्रेस दूर हो जाता है और हम रिफ़्रेश हो जाते हैं.

आप कैसे अपने बचपन में उत्साह से त्योहार मनाया करते थे इस बारे में बताएं… 

अपने बचपन के अनुभव बच्चों को बताएं. आपके दिनों में कैसे ये त्योहार मनाए जाते थे इस बारे में बताएं. उस वक्त इंटरनेट और फ़ोननहीं हुआ करते थे लेकिन फिर भी लोगों के दिलों के तार ज़्यादा व बेहतर ढंग से कनेक्टेड थे इसके महत्व को बताएं. आज सब सुविधाएंहैं लेकिन समय नहीं और अपनापन भी कम है तो किस तरह त्योहार ही हमको क़रीब ला सकते हैं ये बताएं… 

संस्कृति-संस्कारों से जोड़ते हैं त्योहार और सभ्यता, इंसानियत का पाठ भी पढ़ाते हैं और शेयरिंग-केयरिंग की भावना भी बढ़ाते हैं… 

त्योहार हमें हमारी संस्कृति से जोड़ते भी हैं और उसके बारे में बताते भी हैं. बच्चों को बताएं कि यही वजह है हमको ये सिखाया जाता हैकि त्योहार के दिन न किसी के बारे में बुरा बोलना चाहिए, न बुरा सोचना और न बुरा करना चाहिए. ख़ुश व सकारात्मक रहना सिखाते हैंत्योहार. इंसानियत की सीख देते हैं. हम इस दिन अपनों के साथ तो क्या अंजनों के साथ भी मिल-जुलकर ख़ुशियां बांटते हैं. अपने हाथोंसे बना खाना-मिठाई व पकवान आस-पड़ोस में सभी के साथ शेयर करते हैं. यही शेयरिंग व केयरिंग की भावना का विस्तार करते हैंत्योहार और यही हैं हमारे सच्चे व असली संस्कार… 

  • गीता शर्मा 

एग्ज़ाम का नाम सुनते ही बच्चों के साथ मम्मियों की भी टेंशन बढ़ जाती है. इसीलिए हमने जुटाए हैं एग्ज़ाम की टेंशन दूर करने के स्मार्ट टिप्स ताकि बच्चे बिना तनाव के पढ़ाई पर फोकस कर सकें और क्लास में अव्वल भी आएं.

कैसे करें एग्ज़ाम की तैयारी?


सफलता के लिए तैयारी ज़रूरी है, इस बात को ध्यान में रखें और बच्चों के साथ एग्ज़ाम की तैयारी में जुट जाएं. तैयारी अच्छी होगी, तभी बच्चे अच्छे नंबर से पास हो पाएंगे. बच्चों के साथ मिलकर कैसे करें एग्ज़ाम की तैयारी? बता रही हैं करियर काउंसलर मालिनी शाह.

स्टडी मटेरियल जुटाएंः बहुत कम बच्चे ऐसे होते हैं, जो रोज़ाना पढ़ाई करते हैं. ज़्यादातर बच्चे एग्ज़ाम के दौरान पढ़ लेंगे, ये सोचकर खेल-कूद में लगे रहते हैं. ऐसे में एग्ज़ाम क़रीब आते ही वो स्टडी मटेरियल की तलाश में जुट जाते हैं, जिससे उनका सारा समय स्टडी मटेरियल जुटाने में ही बर्बाद हो जाता है और वो पढ़ नहीं पाते. अतः एग्ज़ाम के महीनेभर पहले ही बच्चों के साथ मिलकर उनका स्टडी मटेरियल इकट्ठा कर लें ताकि एग्ज़ाम के दौरान वो अपना ज़्यादा समय पढ़ाई को दे सकें.

टाइम टेबल सेट करें
पढ़ाई शुरू करने से पहले बच्चों के साथ मिलकर उनका स्टडी टाइम टेबल सेट करें. इससे उन्हें पढ़ने में आसानी होगी. टाइम टेबल सेट करने से पहले कुछ बातों को ध्यान में रखेंः

  • टाइम टेबल ऐसा बनाएं जिसमें बच्चों के उठने, सोने, स्कूल जाने, खेलने आदि का वक़्त तय हो.
  • पढ़ाई की शुरुआत उनके मनपसंद सब्जेक्ट से करने को कहें. इससे पढ़ाई में उनकी दिलचस्पी बढ़ेगी और बहुत कम समय में उनकी पढ़ाई पूरी भी हो जाएगी.
  • कठिन विषय या ऐसे विषय जो बच्चों को नापसंद हों, उसके लिए ज़्यादा समय निकालें, क्योंकि उस सब्जेक्ट को कवर करने में बच्चे ज़्यादा समय लेते हैं.
  • मैथ्स के सवाल बच्चों को ख़ुद हल करने को कहें, इससे बच्चे एग्ज़ाम के दौरान कंफ्यूज़ नहीं होंगे और सवाल भी आसानी से हल करते जाएंगे.
  • बाकी विषयों के बड़े या छोटे उत्तर को याद करने की बजाय उन्हें उनका उत्तर समझने को कहें, इससे वो अपने शब्दों में उत्तर लिख पाएंगे.
  • बच्चों को प्रश्‍नों के उत्तर लिखकर पढ़ने को कहें, क्योंकि ज़्यादातर बच्चे पढ़ तो लेते हैं, मगर लिख नहीं पाते. इससे उन्हें एग्ज़ाम के दौरान लिखने में आसानी होगी.

स्टडी ब्रेक भी है ज़रूरी


दिन-रात पढ़ने पर ही बच्चे पास होते हैं, इस ग़लतफ़हमी में न रहें. हर 40 से 45 मिनट के बाद उन्हें छोटा ब्रेक लेने को कहें. इस दौरान उन्हें पानी पीने को कहें. चाहें तो अपनी जगह से उठकर एक्सरसाइज़ भी कर सकते हैं या फिर माइंड रिफ्रेश करने के लिए उन्हें लाइट म्यूज़िक सुनने को कह सकती हैं. इससे थोड़े समय के लिए उनका मन बहल जाएगा, मगर ध्यान रहे, बहुत ज़्यादा देर के लिए उन्हें टीवी या गार्डन में खेलने की इजाज़त न दें, इससे उनका माइंड डाइवर्ट हो सकता है.

फ्रेशनेस के लिए करें एक्सरसाइज़ एक ही जगह बैठे रहने से बॉडी पेन की शिकायत भी हो सकती है. इसलिए उन्हें थोड़े-थोड़े समय के अंतराल पर अपनी जगह से उठने और हल्की-फुल्की एक्सरसाइज़ करने को कहें. चाहें तो अपने स्टडी टेबल की साफ़-सफ़ाई करके भी वो थोड़े समय के लिए रिफ्रेश हो सकते हैं.

है आराम की भी ज़रूरत
काम करते-करते जब मशीनें थक जाती हैं, तो बच्चे तो ख़ैर बच्चे हैं, इसलिए उन्हें भी पढ़ने, खेलने, सोने के साथ ही कुछ समय आराम करने को भी कहें. आराम करने से वो तरोताज़ा महसूस करेंगे और पढ़ाई पर पूरा फोकस कर पाएंगे.

इनसे परहेज़ करेंः

  • एग्ज़ाम के दौरान बच्चों को मीठी चीज़ें कम से कम दें, जैसे- चॉकलेट, आइस्क्रीम, कुकीज़, बिस्किट्स आदि. इससे ब्लड में शुगर का लेवल बढ़ता है और बच्चों को सुस्ती महूसस होती है.
  • एग्ज़ाम के वक़्त बच्चों को बाहर का खाना देने की ग़लती न करें, क्योंकि एग्ज़ाम के दौरान उनका स्ट्रेस लेवल हाई और इम्यूनिटी लो होती है, जिससे इंफेक्शन की संभावना दुगुनी हो जाती है.
  • आलू, सूरन, अरबी, शकरकंद जैसी सब्ज़ियां देने से भी बचें. इन सब्ज़ियों में स्टार्च होता है, जिसे खाने से बच्चों को नींद आती है.
  • बच्चे सूजी से बनी चीज़ें, जैसे- हलवा, उपमा आदि खाना पसंद करते हैं, परंतु एग्ज़ाम के दौरान उन्हें ये देने से बचें.
  • चाय या कॉफी पीने से नींद नहीं आती, इस ग़लतफ़हमी में पड़कर बच्चों को चाय या कॉफी देने की ग़लती न करें, इससे एसिडिटी की शिकायत हो सकती है.
  • जंक फूड, जैसे- समोसा, पिज़्ज़ा, सैंडविच, बर्गर, हॉट डॉग आदि भी बच्चों को न दें. जंक फूड से बच्चों के दिमाग़ की गति धीमी पड़ जाती है, जिससे वो पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते.

कैसा हो बच्चों का डायट प्लान?


जिस तरह मौसम के अनुसार आप बच्चों के डायट प्लान में बदलाव करती हैं, उसी तरह एग्ज़ाम के दौरान भी उनके डायट प्लान में बदलाव लाएं ताकि उनका दिमाग़ तेज़ी से चले और वो पढ़ाई में भी अव्वल रहें. एग्ज़ाम के दौरान कैसा हो बच्चों का डायट प्लान? जानने के लिए हमने बात की न्यूट्रीशनिस्ट एवं डायट कंसल्टंट शिल्पा मित्तल से.

शुरुआत करें हेल्दी ब्रेकफास्ट सेः बच्चों के दिन की शुरुआत हेल्दी ब्रेकफास्ट से करें. सुबह उठने के बाद बच्चों को नाश्ते में प्रोटीनयुक्त आहार दें जैसे- दूध, मिल्कशेक, पनीर, टोफू, अंडा, सोया, अंकुरित मूंग, चना आदि. हेल्दी ब्रेकफास्ट से बच्चे दिनभर एक्टिव रहेंगे और एनर्जी से भरपूर भी.

हैवी नहीं हेल्दी फूड दें
लंच या डिनर के नाम पर थाली में बहुत ज़्यादा हैवी फूड न परोसें और ना ही फूड की डिफरेंट वैरायटी की कतार लगाएं. हैवी की बजाय बच्चों को हेल्दी फूड परोेसें, परंतु एकसाथ नहीं, थोड़े-थोड़े अंतराल पर, जैसे- फ्रेश फ्रूट्स, फ्रूट जूस, फ्रूट्स या वेज सलाद, ड्राई फ्रूट्स, नट्स, सूप, ब्राउन राइस, दाल, हरी सब्ज़ी, गाजर, अंडा, फिश आदि.

बच्चों को हाइड्रेट रखें
पढ़ाई के दौरान बच्चों के शरीर में नमी बरक़रार रहे इसलिए उन्हें हाइड्रेट करती रहें. उनके सामने पानी से भरी बोतल रखें. चाहें तो पानी की बजाय फ्रूट जूस, नींबू पानी, छाछ, लस्सी, नारियल पानी, गाजर-बीटरूट का जूस, सूप आदि भी दे सकती हैं. इससे वो हाइड्रेट रहेंगे और एनर्जेटिक भी.

स्ट्रेस लेवल कम करें
एग्ज़ाम का नाम सुनते ही बच्चों का स्ट्रेस लेवल बढ़ जाता है. स्ट्रेस की वजह से बच्चे पढ़ाई की तरफ़ ध्यान नहीं दे पाते. ऐेसे में ज़रूरत होती है विटामिन्स और मिनरल्स की. अतः बच्चों के डायट प्लान में विटामिन ए, बी, सी, ई और बी कॉम्प्लेक्स युक्त फूड भी ज़रूर शामिल करें. डार्क शेड के फ्रूट व वेजीटेबल, जैसे- गाजर, बीटरूट, टमाटर, हरी सब्ज़ी, पपीता, कद्दू आदि खाने से बच्चों का स्टे्रस लेवल कम होता है.

याददाश्त बढ़ाएं
एग्ज़ाम में सवाल का सही जवाब लिखने के लिए ज़रूरी है कि बच्चों की याददाश्त तेज़ हो. इसके लिए उनके डायट प्लान में मेमरी बढ़ाने वाले फूड्स शामिल करें, जैसे- बादाम, अखरोट, फिश, ककड़ी, तिल, कद्दू के बीज, तरबूज आदि. इससे बच्चों की याददाश्त तेज़ होती है.

भरपूर नींद भी है ज़रूरी
एग्ज़ाम की तैयारी में बच्चों को रातभर जागने की हिदायत न दें. उन्हें भरपूर नींद लेने को कहें. इससे वो स्वस्थ रहेंगे और जो भी पढ़ेंगे, उन्हें वो लंबे समय तक याद रहेगा. अधूरी नींद से हो सकता है, पेपर लिखते वक़्त उन्हें नींद आने लगे. सुकून की नींद के लिए आप उन्हें बनाना मिल्कशेक या हल्दी वाला दूध भी दे सकती हैं.

वास्तु व फेंगशुई टिप्स से बनाएं बच्चों को बुद्धिमान

वास्तु व फेंगशुई के कौन-से टिप्स पढ़ाई की दृष्टि से बच्चों के लिए कारगर साबित हो सकते हैं? आइए जानते हैं.

  • उज्ज्वल भविष्य के लिए अपनी लाड़ली का बेडरूम उत्तर-पश्‍चिम दिशा और लाड़ले का बेडरूम मकान की उत्तर या पूर्व दिशा में बनवाएं.
  • बच्चों का बेड दक्षिण, पश्‍चिम या दक्षिण-पश्‍चिम दिशा में रखें. बच्चों को पूर्व दिशा में सिर और पश्‍चिम दिशा में पैर करके सोने को कहें. ऐसा करने से बच्चों की याददाश्त तेज़ होती है.
  • इस बात का विशेष ध्यान रखें कि बेडरूम का दरवाज़ा सिंगल डोर का हो, डबल डोर का नहीं. ये भी ध्यान रखें कि बेडरूम का दरवाज़ा उत्तर या पूर्व दिशा में हो.
  • दरवाज़े की ठीक विपरीत दिशा में खिड़की बनवाएं. खिड़की बहुत ज़्यादा छोटी या बहुत बड़ी न बनवाएं. इस बात का ख़्याल रखें कि खिड़की से सूर्य की पर्याप्त रोशनी बेडरूम में प्रवेश कर सके.
  • बच्चों के बेडरूम के लिए हरे रंग का पेंट उपयुक्त होता है. इससे बच्चों का दिमाग़ स्थिर और शांत रहता है. वो आसानी से पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं.
  • बच्चों के बेडरूम में टीवी दक्षिण-पूर्व दिशा में रखें और कंप्यूटर के लिए उत्तर दिशा का चुनाव करें. हां, रात में सोते वक़्त टीवी, कंप्यूटर, मिरर आदि परदे से ढंक दें, वरना इससे नकारात्मकता फैलती है.
  • बच्चों के बेडरूम में स्टडी टेबल रखने के लिए दक्षिण दिशा चुनें और बच्चों से पूर्व, उत्तर या फिर उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुंह करके पढ़ने को कहें.
  • बच्चों की अच्छी सेहत के लिए बेडरूम की दक्षिण-पूर्व दिशा में लाइट्स लगवाएं. इस बात का ध्यान रखें कि लाइट्स शार्प न हों. इससे बच्चे डिस्टर्ब हो सकते हैं.

बच्चों के बेडरूम में रखें फेंगशुई आइटम्सः बच्चों का बेडरूम नए सिरे से नहीं बनवा सकतीं, तो कुछ ख़ास फेंगशुई आइटम्स घर में स्थापित करके भी आप बच्चों को बुद्धिमान बना सकती हैं. आइए, जानते हैं वो ख़ास फेंगशुई आइटम्स कौन-से हैं?

एज्युकेशन टावरः एज्युकेशन टावर ज्ञान और शांति का मंदिर माना जाता है. ये
इमारत 5, 7 या 9 मंज़िल की होती है. इसे घर में रखने से बच्चे पढ़ाई में तेज़ होते हैं.

ड्रैगन कार्पः स्टडी रूम में ड्रैगन कार्प की प्रतिमा रखने से बच्चों का पढ़ाई में मन लगता है और उनकी बुद्धि भी तेज़ी से चलती है.

कॉन्च शैलः कॉन्च शैल यानी समुद्री शंख भी बच्चों की पढ़ाई के लिए शुभ माने जाते हैं. इनकी मौजूदगी बच्चों को बुद्धिमान बनाती है.

क्रिस्टल ग्लोबः क्रिस्टल ग्लोब भी बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए सौभाग्यवर्द्धक माने जाते हैं. पढ़ाई की दृष्टि से भी ये बच्चों के लिए मददगार साबित होते हैं.

क्वान कुंगः क्वान कुंग की प्रतिमा बच्चों के बेडरूम में प्रवेश करने वाली नकारात्मक ऊर्जा का नाश करती है, जिससे बच्चों का मन पढ़ाई से भटकता नहीं है.

ग्रीन क्रिस्टल लोटसः बाज़ार में उपलब्ध ग्रीन क्रिस्टल लोटस भी बच्चों के बेडरूम में ज़रूर रखें, ये प्रतिमा बैड लक को गुड लक में बदल देती है.

बचपन अपने आप को तरंगित करता है खिलौने से. कभी कोई बच्चा अनमना-सा हो, तो एक खिलौना दीजिए, वो चहकने लगेगा. इसीलिए किसी भी शहर, नगर, कस्बे का बाज़ार खिलौनों पर बहुत प्रयोग करता है. बाल मनोविज्ञान के हिसाब से बने परंपरागत खिलौने, इलेक्‍ट्रॉनिक टॉय, प्‍लस टॉय, पजल तथा गेम्‍स सहित आधुनिक खिलौने से सराबोर खिलौने देखकर उदास और सुस्त बच्चा भी किलक कर उत्साहित हो जाता है. उसका मन मचल उठता है. वो क्रियाशील होने लगता है. तब समझ मे आता है कि इन खिलौनों का हर बच्चे के जीवन में विशेष महत्व होता है. कह सकते हैं कि बच्चों की साइकोमोटर क्षमताओं को प्रभावित करते हैं खिलौने. खिलौने जहां हर उम्र के बच्चे के मानसिक व शारीरिक विकास के लिए ज़रूरी होते हैं, वहीं उन्हें शिक्षित करने का भी एक माध्यम हैं.
वर्तमान में बच्चों की तर्कशक्ति व मानसिक विकास के लिए हर तरह के खिलौने बाज़ार में उपलब्ध हैं. सस्ते और टिकाऊ भारतीय खिलौने बच्चों के सामाजिक और मानसिक विकास में यूं भी बहुत सहायक होते हैं. धागे और गत्ते के समायोजन से बने विभिन्न खिलौने हर मेले उत्सव में एक रुपए से भी कम क़ीमत में मिल जाते हैं.


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हमारे यहां खिलौने की समृद्ध परंपरा रही है. दादी-नानी के खिलौने पीढ़ियों से चले आ रहे हैं. उसमें स्मृति की महक होती है. मनोरंजन करनेवाले दिमाग़ सक्रिय करनेवाले और बगीचे के लिए उपयोगी खिलौने तो कमाल ही होते हैं. ज़रा-सी धागा खींचने पर डम-डम की आवाज़ करनेवाले खिलौने तोते उड़ा देती है और बगीचों में फलों की रक्षा करती है.
बच्चा अपने आसपास के लोगों, खिलौनों, घर और प्रकृति की हर चीज़ को निहारता है और उससे खेलता है. बच्चे के शारीरिक और बौद्धिक विकास के बारे में थोड़ी-सी भी जानकारी और समझ से माता-पिता बच्चे को सही उम्र में सही खिलौने व उचित वातावरण दे कर उसके विकास को सही दिशा प्रदान कर सकते हैं. बच्चों और खिलौनों का तो चोली-दामन का साथ रहा है.
पहले बच्चे घर में रुई, कपड़े और मिट्टी के खिलौनों से खेलते थे, पर आज इलेक्ट्राॅनिक खिलौनों का युग है. बाज़ार में महंगे से महंगे खिलौने उपलब्ध हैं, लेकिन खिलौनों के महत्व एवं उपयोगिता को उनकी क़ीमत से नहीं आंका जा सकता. खिलौनों से खेल कर बच्चे की बुद्धि कुशाग्र होती है, कल्पनाशक्ति बढ़ती है, शरीर तंदुरुस्त होता है, जिससे उसकी योग्यता बढ़ती है. अच्छे खिलौने बच्चों की कार्यक्षमता, कार्यकुशलता और रचनात्मकता को बढ़ाते हैं.
ऐसा खिलौना, जो बच्चों को अपनी कल्पनाशक्ति से कुछ नया रचने के लिए प्रोत्साहित करे, उन खिलौनों से बेहतर है, जिनसे कुछ पूर्व निर्धारित चीज़ें ही बन सकती हैं. खिलौने ख़रीदते समय बच्चे की उम्र का ध्यान ज़रूर रखें.
आइए, देखें कि किस उम्र में बच्चों को किस प्रकार के खिलौनों की ज़रूरत होती है.

Intellectual Ability Of Children


खिलौने के साथ भारत का पुराना रिश्ता रहा है. यह रिश्ता उतना ही पुराना है, जितना इस भू-भाग का है. भारतीय खिलौने में ज्ञान होता है, तो विज्ञान भी होता है. मनोरंजन होता है, तो मनोविज्ञान भी होता है. प्राचीन काल से जब दुनिया के यात्री भारत आते थे, तो वे यहां खेल सीखते भी थे और उसे अपने साथ लेकर भी जाते थे.
हमें खेल और खिलौने की भूमिका को अवश्य समझना चाहिए. बच्चों के विकास में इसकी जो भूमिका है, उसे समझना चाहिए. हमारे खिलौने बच्‍चों के मस्तिष्क विकास में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. साथ ही मनोवैज्ञानिक गतिविधि तथा ज्ञान की कुशलता बढ़ाने में बच्‍चों की मदद करते हैं.
खेल और खिलौने के क्षेत्र में स्वयं को आत्मनिर्भर बनाना है. हमारे खिलौने में मूल्य, संस्कार और शिक्षाएं भी होनी चाहिए. उसकी गुणवत्ता अंतर्राष्ट्रीय मानकों के हिसाब से होनी चाहिए.


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खिलौने बच्चों के खेल के साथ-साथ उनका शारीरिक एवं बौद्धिक विकास भी करते हैं. माता-पिता सिर्फ़ अच्छे खिलौने देकर उनके विकास की प्राकृतिक प्रगति को गति प्रदान कर सकते हैं.
बच्चों के शुरुआती वर्षों यानी बचपन के महत्व को भूल से भी अनदेखा नहीं करना चाहिए. बच्चे के जीवन के पहले पांच वर्ष संरचनात्मक होते हैं. खिलौने और बच्चों की एक रोचक बात और है कि उच्च आय वर्ग वाले माता-पिता, तो क़ीमती खिलौनों में अपने बच्चों को व्यस्त कर देते हैं, मगर उनके मुक़ाबले कम आय या मध्यम आमदनीवाले माता-पिता अपने बच्चों को ज़्यादा समय देेते हैं. इस वर्ग की कामकाजी महिलाएं भी अपने बच्चों को ज़्यादा समय देने के लिए प्रयासरत रहती हैं.
कम आमदनीवाले पर‍िवारों में बच्चों की ख़ुशी और आनंद को लेकर भी ज़्यादा सजगता देखी गई है. चूंकि वो अपने बच्चों को ख़ुद ही पढ़ाना पसंद करते हैं, इसलिए अपने बच्चों की कमज़ोरियों और कमियों को बेहतर समझ पाते हैं.
ऐसे में समय रहते माता-पिता अपने बच्चों की कमियों को दूर करने की काेश‍िश करते हैं. इससे बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ता है. इससे पहले किए गए एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने दावा किया था कि जिन बच्चों के पिता महंगे खिलौने की बजाय घर पर खिलौने बनाकर खेलने में मदद करते हैं, वो बच्चे ख़ुश रहते हैं और उनका स्कूल में प्रदर्शन बेहतर होता है.

– पूनम पांडे

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झूठ के सहारे बच्चों को खाना खिलाने या उनकी बुरी आदतें छुड़ाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन कोई भी झूठ बोलते समय इस बात का ध्यान रखें कि आगे चलकर इसका बच्चों पर कोई ग़लत असर न पड़े, क्योंकि कुछ झूठ बच्चों के लिए बुरे साबित हो सकते हैं. कौन-कौन से हैं वो झूठ जिनसे बिगड़ सकते हैं बच्चे? चलिए, हम बताते हैं.

जब मैं छोटी थी, तब मेरे बाल बहुत लंबे थे, क्योंकि अपनी मम्मा के कहने पर मैं ढेर सारा खाना खाती थी. अगर तुम भी मेरी तरह लंबे बाल चाहती हो, तो तुम्हें भी रोज़ाना ख़ूब सारा खाना खाना होगा.” मिसेज़ खन्ना अपनी पांच वर्षीया बेटी अनु को रोज़ाना इसी झूठ के बहाने खाना खिलाती हैं. ज़ाहिर है, मिसेज़ खन्ना की तरह आप भी कभी बच्चों की भलाई तो कभी अपनी सहूलियत के हिसाब से झूठ बोलती होंगी, पर आपका बच्चा आपके हर एक झूठ को सकारात्मक रूप से ले, ये ज़रूरी नहीं. आपका एक मामूली झूठ न स़िर्फ बच्चे, बल्कि आपके रिश्ते पर भी भारी पड़ सकता है. आपके कौन-कौन से झूठ का बच्चों पर ग़लत असर हो सकता है? आइए, हम आपको बताते हैं.

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मैं बचपन में बहुत बहादुर था/थी

जब बच्चे किसी चीज़ से डरते हैं, तो पैरेंट्स अक्सर उन्हें अपने बारे में ये कहते हैं कि जब मैं तुम्हारे जितना छोटा था/छोटी थी, तब बहुत बहादुर था/थी, किसी भी चीज़ से नहीं डरता था/डरती थी ताकि बच्चे हिम्मती बनें. फिर चाहे पैरेंट्स बचपन में बहादुर हों या न हों.

क्या होता है असर?
आपका ये झूठ कुछ हद तक आपके बच्चे पर असर कर सकता है, लेकिन आपका बच्चा अगर थोड़ा भी साहसी है और आप उसे और बहादुर बनाने के लिए बार-बार इस तरह से परेशान करते रहे, तो हो सकता है, इससे आपके बच्चे का आत्मविश्‍वास कमज़ोर हो जाए.

मैं तुम्हारे लिए फलां चीज़ लाऊंगा/लाऊंगी

जब बच्चे पैरेंट्स के साथ कहीं चलने की ज़िद्द करते हैं, तो आमतौर पर पैरेंट्स उन्हें उनकी पसंद की चीज़ दिलाने का लालच देते हैं. कई बार अपनी बात मनवाने के लिए भी पैरेंट्स बच्चों से कहते हैं कि वो अगर उनकी बात मान जाएगा, तो वे उसके लिए फलां चीज़ लेकर आएंगे.

क्या होता है असर?
साइकोलॉजिस्ट निमिषा रस्तोगी कहती हैं, “बच्चों को प्रोत्साहित करने के लिए ऐसा करना ग़लत नहीं है, मगर उनसे झूठा वादा करना यानी उनकी मनपसंद चीज़ लाने को कहना और फिर न लाना, बच्चों के मन में पैरेंट्स के प्रति विश्‍वास कमज़ोर कर देता है. ऐसा करने पर बच्चा पैरेंट्स की किसी बात पर यक़ीन नहीं करेगा.”

तुम गॉड गिफ्ट हो

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बच्चों के मन में जन्म से जुड़ी बातें जानने की बहुत जिज्ञासा होती है इसलिए वो पैरेंट्स से जानने की कोशिश करते हैं कि वो दुनिया में कब और कैसे आए. ऐसे में पैरेंट्स हिचकिचाहटवश उनकी बातों को टालने के लिए उनसे यूं ही कह देते हैं कि तुम गॉड गिफ्ट हो. भगवान ने ख़ुद तुम्हें हमारे पास भेजा है.

क्या होता है असर?
ये ज़रूरी नहीं कि आप इस विषय में बच्चे से पूरा सच ही कहें, मगर आप गॉड गिफ्ट हो, बच्चों से ऐसा कहना भी सही नहीं है. साइकोलॉजिस्ट निमिषा के अनुसार, “इस तरह की ग़लत जानकारी बच्चों के व्यवहार को प्रभावित करती है. ख़ुद को गॉड गिफ्ट जानने के बाद वो ख़ुद को सबसे ख़ास महसूस करते हैं और बाकी बच्चों को कम आंकने लगते हैं.”

मैं बस पहुंच रही/रहा हूं

आप यहां कब तक पहुंचने वाले हैं? दूसरों के ऐसा पूछने पर भले आप ये झूठ कह दें कि मैं बस पहुंच रहा/रही हूं या पहुंचने वाला/वाली हूं, मगर जब कभी घर में मौजूद आपका बच्चा आपसे ये सवाल करे, तो उससे आपका इस तरह झूठ कहना बिल्कुल भी सही नहीं है.

क्या होता है असर?
बच्चों को इस तरह का झूठा आश्‍वासन देना सही नहीं है. जब आप बच्चे से कोई वादा करते हैं, तो बच्चे उम्मीद लगाकर बैठ जाते हैं और जब आप उनकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते, तो वो निराश हो जाते हैं. आपके बार-बार ऐसा करने से बच्चे चिड़चिड़े या ग़ुस्सैल भी बन
जाते हैं.

मैं पढ़ने में बहुत अच्छा था/अच्छी थी


पढ़ाई में बच्चों की रुचि बढ़ाने के लिए आप उन्हें बेशक़ ये कह सकते हैं कि मैं पढ़ने में बहुत अच्छा था/अच्छी थी, मगर तब जब वाक़ई ये सच हो. इस तरह का झूठ कहना सही नहीं, जिसका सच कभी न कभी सामने आ ही जाए. हो सकता है, कभी आपके पैरेंट्स या फ्रेंड्स बच्चों के सामने आपकी पोल खोल दें या फिर बच्चों के हाथ ही आपका रिज़ल्ट आदि लग जाए.

क्या होता है असर?
कहते हैं, झूठ तभी बोलना चाहिए, जब आपकी याददाश्त तेज़ हो, वरना पकड़े जाने पर मुसीबत में पड़ना स्वाभाविक है. अतः बच्चे से ऐसा झूठ न कहें जो पकड़ा जाए. अगर ऐसा हुआ तो बच्चे आपको झूठा समझेंगे.

लंबे नाख़ून वाली औरत तुम्हें उठा ले जाएगी


बच्चों को कुछ ग़लत करने से रोकने के लिए तो कभी उन्हें डराने के लिए भी पैरेंट्स बच्चों से बड़ी आसानी से ये कह देते हैं कि तुमने अगर ऐसा किया या मेरी बात न मानी, तो लंबे नाख़ून वाली औरत तुम्हें उठा ले जाएगी. इसी तरह वो बच्चों को और भी कई काल्पनिक नाम या एहसास से डराने की कोशिश
करते हैं.

क्या होता है असर?
अगर बच्चों को कुछ बुरा करने से रोकना है, तो उन्हें ये बताएं कि ऐसा करने पर उसका बुरा असर क्या होगा, न कि उन्हें किसी इंसान या जानवर का डर बताएं. इससे बच्चों के मन में डर समा जाता है और बच्चे अंदर ही अंदर कमज़ोर हो जाते हैं.

अपनी संतान को सुसंस्कृत, योग्य, बुद्धिमान और तेजस्वी बनाने के लिए आज के मॉडर्न पैरेंट्स स्पिरिचुअल पैरेंटिंग के कॉन्सेप्ट को अपना सकते हैं. आज के मॉडर्न पैरेंट्स ऐसे बना सकते हैं अपने बच्चों को उत्तम संतान…

Concept Of Spiritual Parenting

गर्भ से करें शुरुआत
ये बात वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो चुकी है कि जब बच्चा मां के गर्भ में होता है, तो मां की मन:स्थिति का बच्चे पर भी असर होता है. अतः मां गर्भावस्था में अच्छे वातावरण में रहकर, अच्छी क़िताबें पढ़कर, अच्छे विचारों से बच्चे को गर्भ में ही अच्छे संस्कार देने की शुरुआत कर सकती है. आप भी जब पैरेंट बनने का मन बनाएं, तो अपनी संतान के मां के गर्भ में आते ही उसे अच्छे संस्कार देने की शुरुआत करें.

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पहले आपको खुद को बदलना होगा
यदि आप अपने बच्चे को अच्छे संस्कार देना चाहते हैं, तो इसके लिए पहले अपनी बुरी आदतों को बदलें, क्योंकि बच्चा वही करता है जो अपने आसपास देखता है. यदि वो अपने पैरेंट्स को हमेशा लड़ते-झगड़ते देखता है, तो उसका व्यवहार भी झगड़ालू और नकारात्मक होने लगता है. अगर आप अपने बच्चे को सच्चा, ईमानदार, आत्मनिर्भर, दयालु, दूसरों से प्रेम करने वाला, अपने आप पर विश्‍वास करने वाला और बदलावों के अनुरूप ख़ुद को ढालने में सक्षम बनाना चाहते हैं, तो पहले आपको ख़ुद में ये गुण विकसित करने होंगे.

ऐसा करके आप बच्चे को गुस्सैल बना सकते हैं
बच्चे के बात न मानने या किसी चीज़ के लिए ज़िद करने पर आमतौर पर हम उसे डांटते-फटकारते हैं, लेकिन इसका बच्चे पर उल्टा असर होता है. जब हम ज़ोर से चिल्लाते हैं, तो बच्चा भी तेज़ आवाज़ में रोने व चीखने-चिल्लाने लगता है. ऐसे में ज़ाहिर है आपका ग़ुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है, लेकिन इस स्थिति में ग़ुस्से से काम बिगड़ सकता है. अतः शांत दिमाग़ से उसे समझाने की कोशिश करें कि वो जो कर रहा है वो ग़लत है. यदि फिर भी वो आपकी बात नहीं सुनता तो कुछ देर के लिए शांत हो जाएं और उससे कुछ बात न करें. आपको चुप देखकर वो भी चुप हो जाएगा.

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बच्चे की हर बात न मानें
बच्चे से प्यार करने का ये मतलब कतई नहीं है कि आप उसकी हर ग़ैरज़रूरी मांग पूरी करें. यदि आप चाहते हैं कि आगे चलकर आपका बच्चा अनुशासित बने, तो अभी से उसकी ग़लत मांगों को मानना छोड़ दें. रोने-धोने पर अक्सर हम बच्चे को वो सब दे देते हैं जिनकी वो डिमांड करता है, लेकिन ऐसा करके हम उसका भविष्य बिगाड़ते हैं. ऐसा करने से बड़ा होने पर भी उसे अपनी मांगें मनवाने की आदत पड़ जाएगी और वो कभी भी अनुशासन का पालन करना नहीं सीख पाएगा. अतः बच्चे की ग़ैरज़रूरी डिमांड के लिए ना कहना सीखें, लेकिन डांटकर नहीं, बल्कि प्यार से. प्यार से समझाने पर वो आपकी हर बात सुनेगा और आपके सही मार्गदर्शन से उसे सही-ग़लत की समझ भी हो जाएगी.

ऐसे पहचानें बच्चे के गुणों को
हर बच्चा अपने आप में ख़ास होता है. हो सकता है, आपके पड़ोसी का बच्चा पढ़ाई में अव्वल हो और आपका बच्चा स्पोर्ट्स में. ऐसे में कम मार्क्स लाने पर उसकी तुलना दूसरे बच्चों से करके उसका आत्मविश्‍वास कमज़ोर न करें, बल्कि स्पोर्ट्स में मेडल जीतकर लाने पर उसकी प्रशंसा करें. आप उसे पढ़ाई पर ध्यान देने के लिए कह सकते हैं, लेकिन ग़लती सेभी ये न कहें कि फलां लड़का तुमसे इंटेलिजेंट है. ऐसा करने से बच्चे का आत्मविश्‍वास डगमगा सकता है और उसमें हीन भावना भी आ सकती है.

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बच्चे को निर्णय लेना सिखाएं
माना बच्चे को सही-ग़लत का फ़र्क समझाना ज़रूरी है, लेकिन इसका ये मतलब कतई नहीं है कि आप उसे अपनी मर्ज़ी से कोई फैसला लेने ही न दें. ऐसा करके आप उसकी निर्णय लेने की क्षमता को कमज़ोर कर सकते हैं. यदि आप चाहती हैं कि भविष्य में आपका बच्चा अपने फैसले ख़ुद लेने में समक्ष बने, तो अभी से उसे अपने छोटे-मोटे फैसले ख़ुद करने दें, जैसे- दोस्तों का चुनाव, छुट्टी के दिन की प्लानिंग आदि. बच्चे को अपने तरी़के से आगे बढ़ने दें. इससे न स़िर्फ वो आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि उसकी क्रिएटिविटी भी बढ़ेगी.

बच्चे के लिए सकारात्मक माहौल बनाएं
माता-पिता जो भी कहते हैं उसका बच्चों पर गहरा असर होता है. अतः बच्चे से कुछ भी कहते समय ये ध्यान रखें कि आपकी बातों का उस पर सकारात्मक असर हो. उसका ख़ुद पर विश्‍वास बढ़े, उसके मन में दूसरों के प्रति दया का भाव रहे, वो निडर होकर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित हो और सोच-समझकर किसी भी चीज़ का चुनाव करें.

उत्तम संतान के लिए रोज़ सुनें ये मंत्र, जाप और श्लोक, देखें वीडियो:

स्पिरिचुअल पैरेंटिंग से जुड़ी ज़रूरी बातें
बच्चे के व्यवहार और सोच पर उसकी परवरिश का बहुत असर पड़ता है. बच्चे की परवरिश जिस माहौल में होती है उसका असर भविष्य पर भी पड़ता है. अत: बच्चे की परवरिश से जुड़ी इन बातों पर पैरेंट्स को ध्यान देना ज़रूरी है. कैसी परवरिश का बच्चे के भविष्य पर क्या असर पढ़ता है? आइए, जानते हैं:

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  • अगर बचपन से ही उसे आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है, तो वो दूसरों की निंदा करना ही सीखता है.
  • यदि वो बचपन से ही घर में लड़ाई-झगड़े देखता है, तो वो भी लड़ना सीख जाता है.
  • अगर छोटी उम्र से ही उसे किसी तरह के डर का सामना करना पड़ता है, तो बड़े होने पर वो हमेशा आशंकित या चिंतित रहता है.
  • यदि घर और बाहर हमेशा उसका मज़ाक उड़ाया जाता है, तो वो शर्मीला या संकोची बन जाता है.
  • अगर बच्चे की परवरिश ऐसे माहौल में हुई हो जहां उसे जलन की भावना का सामना करना पड़ा हो, तो बड़ा होने पर वो दुश्मनी सीखता है.
  • अगर शुरुआत से ही बच्चे को प्रोत्साहन मिलता है, तो वह आत्मविश्‍वासी बनता है.
  • यदि बच्चा अपने माता-पिता को बहुत कुछ सहते हुए देखता है, तो वह धैर्य और सहनशीलता सीखता है.
  • अगर शुरू से बच्चा तारी़फें पाता है, तो बड़ा होकर वो भी दूसरों की प्रशंसा करना सीखता है.
  • यदि बच्चा अपने घर व आसपास ईमानदारी देखता है, तो वो सच्चाई सीखता है.
  • अगर बच्चा सुरक्षित माहौल में रहता है, तो वो ख़ुद पर और दूसरों पर भरोसा करना सीखता है.

– कमला बडोनी

बच्चे की हर अच्छी-बुरी आदत के लिए आप ज़िम्मेदार हैं, क्योंकि वो वही करते हैं जैसा पैरेंट्स को करता हुआ देखते हैं. साइकोलॉजिस्ट पूनम राजभर बता रही हैं आप बच्चे को बुरी आदतों व व्यवहार से कैसे दूर रख सकती हैं

Children Wrong Habits

1) चीखना-चिल्लाना
ऑफिस में बढ़ता वर्कलोड, टेंशन, परिवार की ज़रूरतें पूरी करने की चिंता ने आजकल पैरैंट्स को बहुत बिज़ी बना दिया है और उनका यही बिज़ी शेड्यूल अक्सर उन्हें तनावग्रस्त कर देता है. नतीजतन कई बार घर में बच्चों के सामने उनका ग़ुस्सा फूट पड़ता है. बच्चे अपने माता-पिता के ऐसे व्यवहार को बहुत ध्यान से देखते हैं और बाद में उसे दोहराने लगते हैं. 35 वर्षीया रीता बताती हैं, “कई बार घर-ऑफिस की टेंशन के बीच मेरा अपने पति से झगड़ा हो जाता है हम-दोनों एक दूसरे पर चिल्लाने लगते हैं जिसे बच्चे देखते रहते हैं. बाद में मेरा बेटा और बेटी दोनों आपस में वैसे ही झगड़ते हैं. उन्हें ऐसा करता देख मुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ और अब मैं कोशिश करती हूं कि बच्चों के सामने किसी से बहस या झगड़ा न हो.” दरअसल, बच्चों को लगता है कि जो मम्मी-पापा ने किया वो सही है इसलिए वो भी उसी का अनुकरण करने लगते हैं.

एक्सपर्ट एडवाइस
यदि आपका बच्चा कुछ अच्छा करता है तो उसकी तारीफ़ करें. इसी तरह कुछ ग़लत करने पर उसे अकेले में ले जाकर समझाएं. सबके सामने चिल्लाने पर बच्चे तनावग्रस्त हो सकते हैं. पैरेंट्स को ऑफिस की टेंशन घर नहीं लानी चाहिए. पैरेंट्स को बच्चों के सामने आपस में उलझने से भी बचना चाहिए. आपसी मतभेद को अकेले में बातचीत से सुलझाएं.

Children Wrong Habits

2) सेलफोन एडिक्शन
ज़रूरत कहें, फैशन या फिर एडिक्शन आजकल पैरेंट्स फोन पर ज़्यादा बिज़ी रहते हैं. बैंकिंग सेक्टर से जुड़ी श्र्रेया कहती हैं, “मेरी 8 वर्षीय बेटी को मुझसे शिकायत रहती है कि मैं हमेशा फोन पर रहती हूं. कुछ दिनों पहले वो भी सेलफोन की डिमांड कर रही थी. उसकी बातें सुनकर लगा कि अब मुझे फोन पर बात कम करनी पड़ेगी.” स़िर्फ फोन ही नहीं आपकी टीवी देखने की लत का भी बच्चों पर असर होता है. यदि आप घंटों सास-बहू सीरियल देखती हैं और ये उम्मीद करती हैं की बच्चा चुपचाप अपना काम करेगा, तो संभव नहीं है. आपकी देखा देखी वो भी होमवर्क छोड़ टीवी देखेगा.

एक्सपर्ट एडवाइस
आधा-एक घंटा टीवी देखने में कोई हर्ज़ नहीं है, लेकिन पैरेंट्स को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वो जो देख रहे हैं उसका बच्चों पर कोई बुरा प्रभाव न पड़े. ऐसे प्रोग्राम सेलेक्ट करें जिससे बच्चों की नॉलेज बढ़े. साथ ही ये भी सुनिश्‍चित करें कि होमवर्क ख़त्म करने के बाद ही वो टीवी के सामने बैठें. जहां तक फोन का सवाल है तो पैरेंट्स को फोन पर बहुत लंबी बातचीत से बचना चाहिए.

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Children Wrong Habits

3) फिटनेस पर ध्यान न देना
अनहेल्दी पैरेंट्स के बच्चे भी अनहेल्दी होते हैं, भले ही आप इस बात से इत्तेफ़ाक न रखें, लेकिन ये सच है. यदि बच्चा आपको एक्सरसाइज़ या आउटडोर एक्टिविटी में शामिल होता नहीं देखेगा तो वो भी ऐसा करने के लिए प्रेरित नहीं होगा. होम मेकर दिप्ती बताती हैं “मैं बहुत ज़्यादा फिटनेस फ्रीक नहीं हूं, लेकिन मेरे हसबैंड हैं. वो दोनों बच्चों को हमेशा स्विमिंग के लिए ले जाते हैं और देखते हैं कि दोनों रोज़ाना एक्सरसाइज़ करें.” बच्चे अपनी आदतें और व्यवहार सब कुछ पैरेंट्स से ही सीखते हैं. तो यदि आप चाहती हैं कि आपका बच्चा फिट और हेल्दी रहे तो रेग्युलर एक्सरसाइज़ के साथ ही हेल्दी डायट की भी आदत डाल लें.

एक्सपर्ट एडवाइस
पैरंट्स को स़िर्फ बच्चों की स्कूल एक्टिविटिज़, होमवर्क आदि का ही ध्यान नहीं रखना चाहिए, बल्कि उसकी फिटनेस को भी प्राथमिकता देनी चाहिए. पैरेंट्स को अपनी डायट और एक्सरसाइज़ का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि बच्चे उन्हें ही फॉलो करते हैं. रोज़ाना कम-से-कम एक घंटे की एक्सरसाइज़ ज़रूरी है. ये दौड़ना, गेम खेलना या वर्कआउट किसी भी रूप में हो सकता है. बच्चों के लिए फिज़ीकली एक्टिव रहना ज़रूरी है. अतः बच्चे को इंडोर की बजाय आउटडोर गेम खेलने के लिए प्रेरित करें.”

Children Wrong Habits

4) जंक फूड की आदत
आजकल वर्किंग पैरेंट्स ख़ुद तो फास्ट व जंक फूड खाते ही हैं साथ ही बच्चों के टिफिन में भी पोटैटो चिप्स, फ्रेंच फ्राइस, बर्गर जैसी चीज़ें देकर उनकी आदत और सेहत दोनों बिगाड़ रहे हैं. कई बार तो घर पर भी स्नैक्स के तौर पर उन्हें जंक फूड ही देते हैं. जब पैरेंट्स ख़ुद ही जंक फूड को बढ़ावा दे रहे हैं, तो बच्चों को इसके नुक़सान समझाना मुश्किल है. कई बार पैरेंट्स ईनाम के रूप में बच्चे को पिज़्ज़ा, बर्गर, फ्राइस आदि की ट्रीट देते हैं इससे बच्चे जंक फूड खाने के लिए प्रोत्साहित होते हैं और वो इसे अनहेल्दी फूड नहीं समझते. यदि आप घर पर खाना बनाने की बजाय ज़्यादातर होटल से खाना मंगाती है तो बच्चे को भी इसकी लत लग जाएगी और उसे घर का हेल्दी खाना अच्छा नहीं लगेगा.

एक्सपर्ट एडवाइस
बच्चे को स़िर्फ जंक फूड खाने के लिए मना करना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि उसकी डेली डायट में ताज़े फल और सब्ज़ियों को शामिल करना भी ज़रूरी है. आप बच्चे को जंक फूड से पूरी तरह दूर तो नहीं कर सकतीं, लेकिन उसकी डायट में हेल्दी चीज़ें शामिल करके उसे बैलेंस ज़रूर कर सकती हैं, जैसे- यदि आपका लाड़ला आपसे बर्गर की डिमांड करे तो बर्गर के साथ उसे एक कटोरी सलाद दें न कि कोला या फ्रेंच फ्राइस. पैरेंट्स को ख़ुद हेल्दी डायट का रूल फॉलो करना चाहिए इससे बच्चे ख़ुद-ब-ख़ुद उनकी देखा-देखी सब खाने लगेंगे.

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5) पूरी नींद न लेना
कई पैरेंट्स लेट नाइट पार्टीज़, टीवी शो, देर रात तक फिल्म देखते रहते हैं, जिससे बच्चे भी वैसा ही करने लगते हैं. नतीजतन बच्चों की नींद पूरी नहीं होती और वो सुबह जल्दी नहीं उठ पातें, अगर उठ भी जाएं तो उन्हें क्लासरूम में नींद आने लगती है. मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाली दिव्या कहती हैं, “मुझे देर रात तक फिल्में देखना पंसद है, लेकिन जब मैंने देखा कि मेरा बेटा भी मुझे फॉलो करने लगा और देर रात सोने के बाद वो सुबह जल्दी नहीं उठ पाता था. नतीजतन पढ़ाई पर असर दिखने लगा. फिर मैंने अपनी आदत बदल डाली अब मैं न तो देर रात बाहर रहती हूं और न ही फिल्म देखती हूं.” अच्छी और बुरी बच्चों की सभी आदतों के लिए पैरंट्स ही ज़िम्मेदार होते हैं.

एक्सपर्ट एडवाइस
हेल्दी और फ्रेश रहने के लिए नींद पूरी होनी ज़रूरी है. ख़ासतौर पर बच्चों को सही टाइम पर सोना और उठना चाहिए, लेकिन वो ऐसा तभी करेंगे जब आप ऐसा करेंगी. 7-8 साल के बच्चों को कम से कम 8-9 घंटे सोना चाहिए. टीनेजर्स के लिए 7-8 घंटे की नींद ज़रूरी है. बच्चों के सोने का समय नियमित रखें. वीकेंड्स पर रिलैक्स होने के लिए उन्हें कुछ घंटों के लिए बाहर ज़रूर ले जाएं, लेकिन बहुत देर या लेट नाइट बाहर रहने से बचें. बच्चों की ख़ातिर आपको अपनी आदत थोड़ी बदलनी होगी.”

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हेलीकॉप्टर मॉम, टाइगर मॉम, ड्रैगन मॉम…. पैरेंटिंग स्टाइल से तो मांओं के कई टाइप्स मिल जाएंगे. पर यहां हम बता रहे हैं मांओं की आदतों के आधार पर मांओं के कुछ दिलचस्प टाइप्स. हालांकि इन सभी शेड्स में मां प्यारी हैं और अपने बच्चों को उतना ही प्यार करती हैं.

सोशली एक्टिव मॉमः

Types Of Moms


इस तरह की मांएं सोशली एक्टिव होती हैं और अपनी सारी एनर्जी ये अपने सोशल ग्रुप्स और फ्रेंड्स से जुटाती हैं. इन्हें बस किसी हॉल में अजनबियों के बीच छोड़ दीजिए, ये सारी मम्मियों को फ्रेंड बनाकर उनके फोन नंबर्स जुटा लाएंगी. इतना ही नहीं उन सबको व्हाट्सएप्प ग्रुप में भी जोड़ देंगी. ऐसी सोशली एक्टिव मम्मियों के पास बच्चों को हैंडल करने के सैकड़ों टिप्स होते हैं, जो वो अपनी फ्रेंड मम्मियों को बांटती रहती हैं और उनसे भी बच्चों को संभालने के टिप्स पूछती रहती हैं. ऐसी मांओं के बेचारे बच्चों पर दुनियाभर के टिप्स आजमाए जाते हैं. हां इन बच्चों को एक फायदा ज़रूर होता है, मां के साथ सोशल फंक्शन्स पर जाते रहने से इनकी भी बहुत सारे बच्चों के साथ दोस्ती हो जाती है.

परफेक्शनिस्ट मॉम:


परफेक्शनिस्ट मॉम को हर काम में परफेक्शन चाहिए होता है. इनकी दिनचर्या घड़ी की सूइयों के हिसाब से चलती है और इनकी पूरी कोशिश होती है कि इनके बच्चे भी इन्हीं की तरह बनें. इसलिए ये बच्चे के सिर पर सवार रहती हैं और बच्चे के हर काम को क्रॉस चेक करती रहती हैं. चाहे होमवर्क हो, इवनिंग पार्क टाइम, दूध पीना हो या डिनर- इनके बच्चे का सब काम टाइम टेबल के हिसाब से ही होता है. परफेक्शनिस्ट मॉम की पूरी कोशिश होती है बच्चों के रूटीन के बीच ना कोई वेकेशन आए, न ही कोई फैमिली कमिटमेंट या गेट टुगेदर. ये अपने बच्चे को हमेशा टॉप पर देखना चाहती हैं. इनकी कोशिश होती है कि उनका बच्चा स्कूल के हर एग्ज़ाम में टॉप स्कोरर ही हो. रहन-सहन, कपड़े हर बात में वो अपने बच्चे को भी अपनी तरह ही परफेक्शनिस्ट बनाने की कोशिश में जुटी रहती हैं.

हमेशा बच्चे का बखान करनेवाली मां:

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वैसे तो हर मां को अपना बच्चा दुनिया का सबसे अच्छा बच्चा लगता है, लेकिन इस तरह की मां अपने बच्चों को लेकर कुछ ज़्यादा ही पजेसिव होती हैं. इनकी हर बातचीत का केंद्र इनका बच्चा ही रहता है. इनका बस चले, तो अपने बच्चे की छोटी से छोटी उपलब्धि को भी ये पूरी दुनिया को बता दें. और ये ऐसा करती भी हैं. चाहे पार्क हो, ऑफिस, फैमिली गेट टुगेदर या आस-पड़ोस, फ्रेंड्स- ये हर जगह बस अपने बच्चे का ही गुणगान करती रहती हैं. इतना ही नहीं, इनके दो साल के बच्चे का भी सोशल मीडिया एकाउंट होता है.

अपने लिए जीने की ख़्वाहिश रखनेवाली मॉमः


इस तरह की मांओं की दुनिया सिर्फ अपने बच्चों तक ही सीमित नहीं रहती. ये मांएं थोड़ा आज़ाद ख़्याल की होती हैं और मानती हैं कि घर-परिवार के अलावा उनकी अपनी भी पर्सनल लाइफ है, जिसे वो अपने हिसाब से जीना चाहती हैं. अगर फ्रेंड्स के साथ उनकी पार्टी की प्लानिंग है तो वो अपना प्लान किसी भी शर्त पर नहीं बदलेंगी, भले ही अगले दिन बच्चे की एग्ज़ाम क्यों न हो. ऐसा नहीं है कि ऐसी मांएं ज़िम्मेदार नहीं होतीं, बस उन्हें अपने पर्सनल स्पेस में कोई रुकावट पसंद नहीं. ये अक्सर अपनी फ्रेंड्स के साथ पिकनिक या गेट टुगेदर प्लान करती रहती हैं और उनके साथ ख़ुश रहती हैं. ऐसी मांओं के बच्चे बहुत जल्दी आत्मनिर्भर बन जाते हैं और अपना काम ख़ुद करना सीख जाते हैं.

अंधविश्‍वासी मांः


ऐसी मांओं को हमेशा ये डर लगा रहता है कि कहीं कोई उनके बच्चे को नज़र न लगा दे. इसलिए इनकी कोशिश होती है कि अपने बच्चे का बखान किसी के सामने न ही करें. चाहे इनका बच्चा क्लास में फर्स्ट ही क्यों न आए, ये अपने बच्चे की तारीफ करने की जगह उसकी कमियां गिनाने लग जाएंगी- अरे ये तो मेरी सुनता ही नहीं, खाना नहीं खाता, बड़ा शरारती है और भी न जाने क्या-क्या. और इन सब के पीछे उनका यही डर रहता है कि तारीफ करूंगी, तो मेरे बच्चे को नज़र लग जाएगी. नज़र उतारना इन्हें हर प्रॉब्लम का सोल्यूशन लगता है और हफ्ते में दो दिन तो ये अपने बच्चे की नज़र उतार ही लेती हैं.

मास्टरशेफ मॉमः

Types Of Moms


जैसा कि टाइटल से ही ज़ाहिर है ऐसी मांओं को कुकिंग का बहुत शौक होता है. चाहे पास्ता-पिज्ज़ा बनाना हो, केक-पेस्ट्री या कोई स्नैक्स- ये सब घर पर बना लेती हैं. ऐसी मांएं घंटों किचन में ही बिता देती हैं. ऐसी मांओं के बच्चे बहुत लकी होते हैं. इन्हें टिफिन में रोज़ नई वेरायटी मिलती है और इनके फ्रेंड्स को हमेशा टेस्टी ट्रीट.

हमेशा चिंता में डूबी रहनेवाली मॉमः

कहीं मेरा बच्चा बीमार तो नहीं पड़ जाएगा… स्कूल में उसके साथ कोई बुली तो नहीं करता होगा… वो अकेले में डरता तो नहीं होगा… पार्क में खेलते व़क्त कोई उसे धक्का न दे दे…  कुछ मांएं हर समय बच्चे की चिंता में ही डूबी रहती हैं और कई बार तो उनकी चिंता बेवजह भी होती है. ऐसी मांएं जब भी उनका बच्चा उनसे दूर होता है, पता नहीं क्या सोच-सोच कर परेशान होती रहती हैं. ये बच्चे द्वारा अकेले बिताए गए हर मिनट का ब्यौरा जानना चाहती हैं. ये अगर पैरेंट-टीचर मीटिंग में जाती हैं, तो अपने सवालों से टीचर को परेशान करके ही छोड़ती हैं.

फैशनिस्टा मॉमः

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फैशनिस्टा मॉम ख़ुद तो हमेशा स्टाइल ऑइकॉन नज़र आती ही हैं, अपने बच्चे को भी फैशनेबल ही देखना चाहती हैं. किसी भी पार्टी-फंक्शन में चले जाइए, ये मां-बच्चे आपको स्टाइलिश अंदाज़ में ही नज़र आएंगे. ऐसी मांएं हमेशा हाई स्ट्रीट स्टोर्स से शॉपिंग करती हैं और अपने व अपने बच्चे के लिए यूनिक स्टाइल क्रिएट करती हैं. इनकी हेयरस्टाइल से लेकर कपड़े, फुटवेयर, एक्सेसरीज़ और मेकअप तक हर चीज़ खास होती है और इनके बच्चे में इनका ही रिफ्लेक्शन नज़र आता है. यानि इनके बच्चे भी हाइली फैशनेबल और क्लासी होते हैं.

शॉपोहोलिक मॉमः

Types Of Moms

ऐसी मांएं घर में कम शॉपिंग मॉल में ज़्यादा नज़र आती हैं. इन्हें सभी ऑनलाइन किड्स स्टोर्स के बारे में पता होता है और हर स्टोर्स की जानकारी होती है. किस स्टोर से बेस्ट और सस्ते कपड़े लिए जा सकते हैं. कौन-सी शॉप वेस्टर्न वेयर के लिए बेस्ट है और कौन-सी इंडियन वेयर के लिए… एक्सेसरीज़ की शॉपिंग कहां से करना बेस्ट होता है, सारी बातों की जानकारी होती है इनके पास और ये अपना ज़्यादातर समय शॉपिंग में ही बिताती हैं.

हर मां अपने बच्चे के देखभाल को लेकर चिंतित रहती है, ख़ासकर नई मांएं. यहां पर कई मांओं ने इसे लेकर अपने अनुभव साझा किए. यदि आप अपने मातृत्व के सफ़र को एंजॉय करेंगी, तब सब कुछ आसान होता चला जाएगा.

मौज से जीवन बिताएं. हर पल का आनंद उठाएं. क्योंकि आपका शिशु बहुत जल्द बढ़ता हैं और इससे पहले कि आप जाने, वह उड़ने के लिए तैयार हो जाता हैं. न्यूली मदर के लिए हर स्नान, हर मालिश, हर डायपर बदलने का काम बहुत ही महत्वपूर्ण और आनंददायक है, इसलिए इसे मिस न करें.
यह नम्रता दीपक सावधानी, जो सिटी एडिटर हैं का कहना है. उनके लिए मातृत्व अनगिनत अमिट यादों से भरी सबसे मधुर यात्रा रही है. वे कहती हैं, “यह एक शानदार अनुभव है और यह बात सिर्फ़ मैं अपने लिए नहीं, बल्कि सभी मांओं के लिए बोल रही हूं. मेरे बच्चे के जन्म से लेकर अब तक, जैसे मेरे बच्चे बड़े हुए, विकसित होते गए, उनके साथ मैं भी एक व्यक्ति के रूप में विकसित होती चली गई…
मैं दो बच्चों की मां हूं. इतने वर्षों में एक मां होने के नाते मैंने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि मेरे बच्चों को छोटी-छोटी परेशानियों का भी सामना न करना पडें. कोरोनो वायरस महामारी के कारण जारी लॉकडाउन के दौरान भी मेरी सीखने की यात्रा जारी है. जीवन का यह नया चरण कुछ ऐसा है, जिसके लिए हम में से कोई भी तैयार नहीं था. हमें इसमें एडजस्ट करने में कुछ समय लगा. लेकिन मेरे बच्चों ने मौजूदा हालत में ख़ुद को अच्छी तरह से ढाल लिया है. हमारी सभी बाहरी गतिविधियों को इनडोर प्लेटाइम में बदलना पड़ा. यह पहले तो चुनौतीपूर्ण था, लेकिन हमने एक अटूट बंधन भी विकसित किया और हमारे घर के हर कोनों को पहले से बेहतर बना लिया.
मुझे अब भी उनके बचपन के दिन याद हैं. मैं सभी माताओं को प्रोत्साहित करना चाहती हूं, विशेषकर उन्हें, जो इस लॉकडाउन में पहली बार मां बनी हैं.
उन्हें अपने शिशु की देखभाल करने के लिए खुद में विश्वास बढ़ाना होगा.
नई-नई मां बनी स्त्रियों को यह जानने की ज़रूरत है कि शिशु के कोमल त्वचा को बहुत ही नाज़ुक देखभाल की ज़रूरत होती है. इसलिए, उनके बेबी स्किन केयर उत्पादों का सही विकल्प चुनना महत्वपूर्ण है. विशेष रूप से बदलते मौसम में सही निर्णय आपकी कई चिंताओं को कम कर सकता है.
एक व्यस्क की त्वचा की तुलना में एक बच्चे की त्वचा बेहद नाज़ुक और संवेदनशील होती है और तेजी से नमी खो देती है. इसलिए सूखापन से बचाने के लिए मॉइश्चराइजिंग बहुत महत्वपूर्ण है.
साथ ही अभी माॅनसून के मौसम में, बच्चे की त्वचा को हाइड्रेट रखना महत्वपूर्ण है. अपने शिशुओं के लिए मुझे सही मॉइश्चराइज़र खोजने में कुछ समय लगा. मैं हमेशा उनकी नाजुक त्वचा के लिए एक जेंटल लोशन का उपयोग करना चाहती थी. मेरे शोध ने मुझे जॉनसन के बेबी लोशन तक पहुंचाया और इसने उनकी त्वचा पर अद्भुत काम किया. यह बच्चे के लिए सबसे अच्छा है और धीरे-धीरे त्वचा को पूरे दिन नर्म-मुलायम रखता है और इसे शिशु के चेहरे और शरीर पर उपयोग करने के लिए इसे काफ़ी हल्के ढंग से इस्तेमाल किया जाता है. इसके अलावा, यह एक ऑल-सीजन मॉइश्चराइज़र है, जो प्राकृतिक त्वचा की नमी को बनाए रखने में मदद करता है.

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बेबी के नाज़ुक बालों को भी विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है. इसके लिए अच्छी क्वालिटी का बेबी शैम्पू का इस्तेमाल करें. यह बच्चे के सिर की कोमल त्वचा और बालों को साफ़ करता है और यह सुनिश्चित करता है कि आंखों को कोई लालिमा और चुभन न हो. इसने न केवल उनके बाल मुलायम, चमकदार बनते है, बल्कि एक नई ख़ुशबू भी बनी रहती है. बच्चों के लिए उच्च श्रेणी वाली कंपनी के प्रोड्क्ट इस्तेमाल करने से आपकी मदर जर्नी आसान और मज़ेदार हो जाती है.
मॉमजंक्शन की कंटेंट हेड, चंद्रमा देशमुख के अनुसार, मां बनना एक पूर्णकालिक और सबसे अधिक संतुष्टिदायक नौकरी है. मुझे याद है, जब मेरा बेटा एक छोटा था, इस ख़ूबसूरत यात्रा के हर पल ने मुझे ज़िन्दगी की सीख दी. क्योंकि जिस समय आप अपने हाथों में ख़ुशी के उस छोटे खज़ाने को लेते हैं, उसी वक़्त एक मां के रूप में आपका पुनर्जन्म भी होता है.
उनकी मासूम हंसी अनमोल हैं, उनकी मौजूदगी गर्मजोशी से भरी है. आनंद की आपकी छोटी-सी पोटली कोमल होती है, जिसे एक कोमल स्पर्श की आवश्यकता होती है.
ये शब्द ही सभी मांओं के लिए मेरे दिल से निकले सन्देश हैं. नई-नई मां बनी वर्तमान लॉकडाउन स्थिति में भ्रम और चिंता की स्थिति में होंगी. उन्हें सबसे पहले तो मानसिक तौर पर तैयार होने और शांत रहने की ज़रूरत हैं, ताकि वे इस समय अपने बच्चों की देखभाल ठीक से कर सके. अभी तो हालत यह है कि छोटी समस्याओं के लिए अस्पताल जाना भी मुश्किल है. बदलते मौसम के लिए अपनी शिशु देखभाल दिनचर्या को बदलना मददगार हो सकता है.

चूंकि माॅनसून का मौसम है, इसलिए रोज़ाना बच्चे को नहलाना ज़रूरी नहीं है. आप उन्हें हर दूसरे दिन स्नान करा सकती हैं. बस, यह सुनिश्चित करें कि पानी गर्म है और आप अपने बच्चे के साथ बातचीत करते हुए उन्हें नहलाएं. इस दौरान शिशु से बातचीत करती रहें, क्योंकि यह आपके बच्चे को पूरी प्रक्रिया के साथ सहज महसूस करने में मदद कर सकता है. मैं अपने बच्चे के जन्म के दिन से ही बेबी सोप का इस्तेमाल कर रही हूं. यह अल्ट्रा-माइल्ड वॉश होता है, जो आपके बच्चे की त्वचा और संवेदनशील आंखों के लिए कोमल होता है. यदि बच्चा एक नवजात शिशु है, तो एक कॉटन बॉल (रूई) या वॉशक्लॉथ के साथ इस हल्के क्लीन्ज़र का उपयोग करके बच्चे को पोंछ सकती है, चेहरे पर, आंखों के कोने, कान के पीछे, गर्दन आदि को साफ़ कर सकती है. उसके बाद धीरे से गुनगुना पानी डालें. इन साधारण उपायों का पालन करके आप अपने बच्चे को बेहतर तरीके से क्लीन कर सकती हैं. बच्चे को नहलाना जल्द ही बच्चे के साथ जुड़ने और बंधने के लिए एक मज़ेदार काम में बदल जाएगा.
शिशुओं में मां के स्पर्श को लेकर तेज इमोशन होती है. यह न केवल उन्हें आराम देता है, बल्कि उन्हें आरामदायक और सुरक्षित महसूस कराता है. अपने बच्चे को एक प्यारभरे स्नान के बाद सोने के लिए न केवल उन्हें शांत करना होगा, बल्कि आपको आराम की भावना भी देगा.
याद रखें, शिशु-दिनचर्या मौज-मस्ती, हंसी-ठिठोली में बदल सकती है, अगर आप ख़ुद को इस समय का आनंद लेने दें. मानें या न मानें, आपका शिशु भी इसे समझता है. मेरी मातृत्व यात्रा के दौरान जॉनसन बेबी हमेशा एक कूल केयर की तरह मेरे साथ रहा. आज भी, जब मैं बेबी सोप देखती हूं, तो यह मुझे नॉस्टैल्जिया से भर देता है और मुझे याद दिलाता है कि मैं कितनी खुशहाली भरी यात्रा करके आई हूं.
आपके बच्चे के स्वास्थ्य के विकास और बच्चे के साथ अपने बंधन को मज़बूत करने के लिए मालिश एक और महत्वपूर्ण काम है. धीरे-धीरे बच्चे की मालिश करने से आपके बच्चे के विकास, संचार और सीखने की प्रक्रिया तेज़ होती है. उसका समग्र विकास सुनिश्चित होता है. मैंने अपनी मम्मी से एक टिप सीखी थी बच्चे की मालिश करते समय, उचित रूप से तैयार किए गए तेल की थोड़ी मात्रा का उपयोग करना आदर्श है. मालिश हमेशा ऊपर की ओर हाथ ले जाकर करना चाहिए. इस काम के लिए मेरी पसंद हमेशा जॉनसन बेबी ऑयल रहा है और मैं इसे सभी को अपने बच्चे के लिए इस्तेमाल करने की सलाह देती हूं. एक और टिप यह सुनिश्चित करने के लिए है कि मालिश करने वाले कमरे का तापमान गर्म हो ताकि आपका शिशु ठंड से बच सके. इसके अलावा, मालिश के लिए अधिक तेल का उपयोग नहीं करना चाहिए, ख़ासकर अगर आपके बच्चे की त्वचा में जलन हो या उसमें चकत्ते हों.

– ऊषा गुप्ता

Baby Care Tips

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यूं तो पिता बनना और पितृत्‍व के लिए स्‍वयं को तैयार करना चुनौतीभरा काम होता है. लेकिन जब बात उन लोगों की हो, जिनके बच्‍चे समय पूर्व ही पैदा हो गए हों, तो यह मुश्किलोंभरा होता है. ख़ासकर कोरोना वायरस के कारण मौजूदा कोविड-19 के चलते महामारी की स्थिति में यह चुनौती और भी अधिक बढ़ जाती है. उन पिताओं पर अतिरिक्‍त दबाव व ज़िम्मेदारियां आ जाती हैं. आइए, आज फादर्स डे पर ऐसे ही पिता बने पुरुषों की आपबीती को जानते हैं.

Fathers Day Special

सभी चुनौतियों के बावजूद, पिता बनने की ख़ुशी का एहसास कभी भी कम नहीं हुआ…

असीम शाह जिन्हें जुड़वा बच्चे हुए थे इस कोरोना वायरस की महामारी के दिनों में ही. तब उन्होंने ना केवल कई चुनौतियों का सामना किया, बल्कि ख़ुद को भी हौसला देते रहे. जॉन्‍सन एंड जॉन्‍सन के ग्रुप एसएफई व एनालिटिक्‍स मैनेजर की अपनी पद व ड्यूटी को निभाते हुए वे इस लॉकडाउन में बहुत कुछ सीखते भी रहे. कोविड-19 के इस लॉकडाउन के दौरान पैदा हुए जुड़वा बेटों का पिता बनने के अपने अनुभवों के बारे में असीम कुछ यूं बताते हैं…
दो महीने पहले, मैं अपने सहकर्मियों के साथ एक महत्‍वपूर्ण वीडियो कॉल पर था, तभी मेरी पत्‍नी ने अचानक बताया कि उन्‍हें डिलीवरी के लिए हॉस्पिटल जाना पड़ेगा.
यह इमर्जेंसी डिलीवरी थी और हमारे बच्‍चे समय से चार हफ़्ते पहले ही पैदा हो गए. यह भी कमाल की बात थी. मैं दोपहर 3.30 बजे ऑफिस कॉल पर था और लगभग 4.00 बजे अपनी बांहों में दो-दो बच्‍चे थामे हुआ था. समय से पहले पैदा होने के चलते, बच्‍चों को एनआईसीयू में रखा गया. उनका लगातार ध्‍यान रखा जाना और उनकी देखभाल बेहद ज़रूरी था. मैं चाहता था कि मैं भी वहीं ठहरकर एनआईसीयू की कांच की दीवार के पीछे से उन्‍हें लगातार टकटकी लगाए देखता रहूं, लेकिन मुझे वापस घर लौटना पड़ा, क्‍योंकि कोविड के चलते हॉस्पिटल ने किसी को भी वहां ठहरने की इजाज़त नहीं दी.
यह स्थिति सामान्‍य से बिल्‍कुल अलग था और मुझे उन्‍हें उनके हाल पर छोड़कर वहां से जाना पड़ा. मुझे दिन में केवल एक बार उन्‍हें देखने की अनुमति थी. यह भावनात्‍मक रूप से तकलीफ़देह अनुभव था.

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लेकिन असली दिक़्क़त तो तब शुरू हुई, जब उन्‍हें हॉस्पिटल से डिस्‍चार्ज कर दिया गया और वो हफ़्तेभर में घर आ गए. जैसा कि मैंने बताया कि बच्‍चे समय से पूर्व हुए थे और बहुत छोटे थे. उनके लिए काफ़ी छोटे-छोटे डायपर्स की ज़रूरत होती थी. ज़रूरी डायपर्स, फॉर्म्‍यूला मिल्‍क, दवाएं आदि लेने के लिए मुझे 8-10 फार्मेसीज का चक्‍कर लगाना पड़ता था. लॉकडाउन के चलते, ये चीज़ें आसानी से उपलब्‍ध नहीं थीं और मैं इन अत्‍यावश्‍यक चीज़ों को सीमित स्‍टॉक में ही रख पाता था, जो बमुश्किल 3-4 दिन चल पाता. यह थोड़ी हताशाजनक स्थिति थी, पर मैंने हिम्मत नहीं हारी.
मुझे केवल अपने बच्‍चों के लिए उनके ज़रूरी सामानों को जुटाने की ही चिंता नहीं थी, बल्कि साथ ही मुझे बच्‍चों की देखभाल में अपनी पत्‍नी के साथ हाथ भी बंटाना था. बच्‍चों को संभाल पाना हम दोनों के लिए ही बहुत बड़ा काम था. कई बार तो ऐसा होता कि मैं काम करता और उसे बच्‍चों को संभालना पड़ता. हालांकि, मेरे सहकर्मियों और मेरी कंपनी ने मेरा काफ़ी सहयोग किया और मुझे अपनी इच्‍छानुसार शिफ्ट में काम करने की छूट दे दी, जो सबसे ज़रूरी था.
सभी चुनौतियों के बावजूद, पिता बनने की ख़ुशी का एहसास कभी भी कम नहीं हुआ. मुझे उन्‍हें सुलाने, खिलाने-पिलाने, उनके डायपर बदलने, कपड़े धोने, फीडिंग बॉटल धोने आदि में आनंद आता था. मैं हमारे नन्हें-मुन्‍नों के साथ अपनी पत्‍नी की हरसंभव मदद करना चाहता था. मैंने जाना कि किस तरह से माता-पिता दोनों को हाथ बंटाना ज़रूरी होता है और यह सब कुछ लॉकडाउन के चलते संभव हो सका.

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लॉकडाउन के चलते मेरी ज़िंदगी में आए पितृत्‍व के एहसास को शब्‍दों में बयां नहीं कर सकता…

यांसन इंडिया के सीनियर प्रोडक्‍ट मैनेजर, प्रणित सुराना बताते हैं कि किस तरह से उनके पांच महीने के बेटे ने उनके जीवन में बदलाव ला दिया है.
लॉकडाउन के दौरान, लोगों की ज़िम्मेदारी कई गुना बढ़ गई है और ख़ासकर उन पैरेंट्स की रिस्‍पांसबिलिटी बहुत बढ़ गई है, जिनके बच्‍चे अभी बहुत छोटे हैं. मुझे बताते हुए गर्व हो रहा है कि मैं अब एक पिता की ज़िम्मेदारियों को बेहतर समझने लगा हूं. मैं इस लॉकडाउन के चलते मेरी ज़िंदगी में आए पितृत्‍व के एहसास को शब्‍दों में बयां नहीं कर सकता. यह मेरे लिए आशा की किरण है. मैं लॉकडाउन से पहले ऑफिस के अपने उन दिनों की याद करता हूं, जब मैं अपने सहकर्मियों के साथ घूमता-फिरता और टी-ब्रेक पर गपशप किया करता था. यूं तो ये बातें सुनने में महत्‍वपूर्ण नहीं लगती, लेकिन उन पलों की मुझे बेहद याद आती है. लेकिन अभी जब मैं घर पर रहकर अपने बच्‍चे को संभालने के साथ फुलटाइम ऑफिस मैनेज कर रहा हूं, तो मुझे जीवनसाथी का अर्थ समझ आया. इसने मुझे आराम लेने और दैनिक कार्यों को प्रभावी तरीक़े से करने के महत्‍व को बता दिया है. घर पर रहकर काम करने से, ऑफिस का काम करने और व्‍यक्तिगत जीवन को संभालने के बीच की पतली रेखा और अधिक महीन हो गई है.

यदि मैं ऑफिस जाकर काम करता, तो अपने बच्‍चे को चलने की कोशिश करने और पेट के बल पलटना देखने जैसी अद्भुत ख़ुशी का किसी भी स्थिति में आनंद नहीं ले पाता. मुझे लगता है कि इस कोविड-19 इमर्जेंसी के बीच इन बहुमूल्‍य पलों को जीने से बड़ी ख़ुशी मुझे नहीं मिल सकती थी.

ऊषा गुप्ता

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Psychology Of Relationships

रिश्तों का मनोविज्ञान (The Psychology Of Relationships)

मेरी उम्र 27 साल है. सगाई हुए एक साल हो गया है. घरवाले शादी की जल्दी कर रहे हैं, पर मैं अभी भी शादी को लेकर, होनेवाले पति और उनके व्यवहार को लेकर काफ़ी असमंजस में हूं, इसलिए कोई भी फैसला लेने से हिचक रही हूं. मन में एक
अजीब-सा डर है.

– आशालता, चंडीगढ़.

कोई भी नया निर्णय लेना आसान नहीं होता. ख़ासकर तब, जब वह हमारे जीवन और भविष्य से संबंधित हो. शादी का निर्णय लेने से पहले कुछ बातों का ख़ास ख़्याल रखें, जैसे- शादी को लेकर आपकी अपेक्षाएं, आपकी शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तैयारी, क्या आप पूरी तरह से और यहां तक कि आर्थिक तौर पर भी तैयार हैं नए जीवन, नए रिश्तों व नए परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए? ख़ुद से यह सवाल करें, आत्म विश्‍लेषण करें. घर के बड़ों से, अनुभवी दोस्तों से सलाह लें. परिवार या समाज के दबाव में आकर कोई निर्णय ना लें.

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मेरी दो बेटियां हैं. एक की उम्र है 16 साल और दूसरी 14 साल की है. उनके आजकल के बर्ताव से बहुत परेशान रहती हूं. उनके कपड़ों का, जूते-चप्पलों का चयन भी बहुत बदल गया है. वो अपनी ही दुनिया में रहती हैं. किसी को कुछ समझती ही नहीं. मेरी किसी बात का उन पर कोई असर नहीं होता. दोस्तों का साथ उन्हें ज़्यादा पंसद है. क्या करूं, बेहद परेशान हूं.

– नौशीन, कोलकाता.

किशोरावस्था में बच्चों को संभालना अपने आप में एक चुनौती है. आजकल का इंटरनेट युग इसे और भी मुश्किल बना रहा है. आपको संयम से काम लेना होगा. उनसे बहुत ज़्यादा कठोरता से पेश न आएं. उनकी उम्र को देखते हुए आपको उनसे दोस्ताना व्यवहार करना होगा. घर-परिवार का माहौल प्यारभरा बनाए रखें और उनका विश्‍वास जीतें. बात-बात पर
रोक-टोक न करें. उनकी दोस्त बनकर रहेंगी, तो वो आपसे दूरी नहीं बानएंगी और मन की बात भी शेयर करने से नहीं हिचकिचाएंगी. हां, उनके दोस्तों के बारे में जानकारी ज़रूर रखें, ताकि वो ग़लत संगत में न पड़ जाएं, लेकिन ध्यान रहे कि आपकी बच्चियों को यह न लगे कि आप उनकी जासूसी करती हैं.

मेरे पति काम के सिलसिले में ज़्यादातर बाहर रहते हैं. मेरा एक छोटा बेटा है. घर-बाहर का सारा काम मुझे ही देखना पड़ता है. लगता है मानो मेरा सारा जीवन बस इन्हीं उलझनों में उलझकर रह गया है. अपने लिए तो समय ही नहीं रहा अब.

– रजनी शर्मा, मुंबई.

अभी आपका बेटा छोटा है और मां होने के नाते उसके प्रति आपकी ज़िम्मेदारी बनती है. पति काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं, तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि उनके पास ना होने से उनकी जगह भी आप लें. बेटे का बचपन और भविष्य सवांरने पर ध्यान दें. कुछ ही सालों में जब वह बड़ा हो जाएगा, आपके पास समय ही समय होगा अपने लिए. तब आप अपने बेटे के साथ को तरसेंगी. बेहतर है, आज जब वह आप पर निर्भर है और आप का समय और अटेंशन चाहता है, तो उसे वह सब दें, जिससे वो कामयाब जीवन की ओर बढ़ सके. जीवन के हर दौर का अपना एक अलग ही मज़ा होता है. हर दौर को भरपूर जीएं और उसका आनंद उठाएं. अगर नकारात्मक सोच रखेंगी, तो कभी ख़ुश नहीं रह पाएंगी. हां, यदि आप पर काम का बोझ अधिक बढ़ गया है, तो बेहतर होगा अपने पति से बात करें. हो सकता है वो कुछ अधिक समय आपके व बच्चे के लिए निकाल पाएं.

Zeenat Jahan

ज़ीनत जहान
एडवांस लाइफ कोच व
सायकोलॉजिकल काउंसलर

[email protected]

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कल तक हमारी हर बात में हां में हां मिलानेवाला बच्चा जब हमारे निर्णय पर सवाल उठाने लगता है, तो ज़्यादातर माता-पिता बच्चे के व्यवहार में आए इस बदलाव को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते, जिसका असर उनके ख़ूबसूरत रिश्ते पर पड़ने लगता है. काउंसलिंग सायकोलॉजिस्ट डॉ. माधवी सेठ बता रही हैं कि टीनएज बच्चों के व्यवहार में बदलाव क्यों आते हैं और उम्र के इस नाज़ुक दौर में उनके पैरेंट्स को बच्चों के साथ किस तरह डील करना चाहिए, ताकि रिश्तों की डोर मज़बूत बनी रहे.

Parent-Child Relations

शिकायतों का सिलसिला

अधिकतर टीनएज बच्चों के पैरेंट्स का यही रोना होता है कि उनका बच्चा पहले जैसा नहीं रहा. बात-बात पर ग़ुस्सा होना, उल्टा जवाब देना, दोस्तों को ही अपना सब कुछ समझना… तक़रीबन हर दूसरे पैरेंट्स की अपने टीनएज बच्चे से यही शिकायत होती है. वहीं दूसरी तरफ़ बच्चे इस बात की कंप्लेन करते हैं कि उनके अभिभावक उन्हें समझते ही नहीं और न ही उन पर विश्‍वास करते हैं.

क्यों आते हैं बदलाव?

12 से 18 साल की उम्र मेंबच्चों में बहुत-से हार्मोनल व इमोशनल चेंजेज़ आते हैं. प्यूबर्टी के हिसाब से देखा जाए, तो टीनएन में चार प्रकार के बदलाव आते हैं.

शारीरिक बदलावः 11-12 की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते बच्चों के शरीर में बदलाव आने शुरू हो जाते हैं. यह बदलाव बहुत-से बच्चों के लिए मुश्किलोंभरे होते हैं, जिससे वे आसानी से डील नहीं पाते. उदाहरण के लिए बचपन में जिस गोलमटोल बच्चे को ‘क्यूट’ कहकर सब उसे प्यार करते थे, जब वही बच्चा 11-12 साल की उम्र में पहुंचता है, तो मोटापे के कारण लोग उसे रिजेक्ट करने लगते हैं या उसकी खिल्ली उड़ाने लगते हैं. ऐसे में बच्चे को ख़ुद भी समझ में नहीं आता कि आख़िर लोग अब उसे क्यों नापसंद करने लगे हैं. इससे कुछ बच्चों को साइकोलॉजिकल ट्रॉमा होता है.

सामाजिक बदलावः इस उम्र में आते-आते बच्चों को ख़ुद को देखने का नज़रिया और लोगों का उनके प्रति नज़रिया, दोनों ही बदलने लगता है. उनकी सोशल इमेज बनना शुरू हो जाती है. वे अपना व्यक्तित्व विकसित करने की कोशिश करते हैं. बच्चे ख़ुद से ‘मैं क्या हूं’ जैसे सवाल करते हैं. ऐसे में अपनी इंडीविज़ुएलिटी सेट करने में किसी बच्चे को ज़्यादा समय लगता है, तो किसी को कम.

मनोवैज्ञानिक बदलावः इस अवस्था में बच्चों में बहुत-से मनोवैज्ञानिक बदलाव भी आते हैं, लेकिन सारे साइकोलॉजिकल बदलाव सकारात्मक नहीं होते. कुछ बच्चे अकेलापन, असुरक्षा इत्यादि महसूस करने लगते हैं.

आध्यात्मिक बदलावः  चौथा बदलाव स्पिरिच्युअल होता है. इस उम्र में बच्चों के ख़्यालात बदलने लगते हैं. उनका ज़िंदगी को देखने का नज़रिया बदल जाता है. वो नज़रिया उनका अपना होता है. उसमें किसी का कोई योगदान नहीं होता. बच्चे यह चाहते भी नहीं हैं कि उसमें कोई दख़ल दे.

इतने सारे बदलावों के कारण ही किशोरावस्था को ज़िंदगी का सबसे कठिन दौर कहा जाता है. इन सभी बदलावों को स्वीकार करने में 3 से 5 साल यानी तक़रीबन पूरी किशोरावस्था लग जाती है. इन्हीं बदलावों के कारण इस दौर में पैरेंट्स का रोल भी काफ़ी हद तक बदल जाता है, लेकिन ज़्यादातर पैेंरेट्स बदलाव के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं होते.

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पैरेंट्स से कहां होती है चूक?

पैरेंट्स के लिए बच्चा हमेशा बच्चा ही रहता है. वे हमेशा ही करेक्शन मोड में रहते हैं.  बच्चा जब 10 साल का होता है तब भी वे उसे करेक्ट करने में लगे रहते हैं और जब वह 12-13 साल का हो जाता है, तब भी वे उसी ढर्रे पर चलते रहते हैं. ऐसे बैठो, ऐसे बात करो, ऐसे कपड़े मत पहनो, यहां मत जाओ… इत्यादि. वे बच्चे को अपनी तरह से रखना चाहते हैं. स्वाभाविक है कि बढ़ते बच्चों को इतनी रोक-टोक पसंद नहीं आती, क्योंकि वे माता-पिता के प्री-डिफाइंड दायरे में नहीं रहना चाहते. भले ही अभी तक उन्होंने दुनिया को माता-पिता की उंगली पकड़कर देखा हो, लेकिन अब वे अपने अनुभव ख़ुद अर्जित करना चाहते हैं. अपनी सीमा, अपनी दिशा ख़ुद तलाशना चाहते हैं और वहीं से बच्चे व माता-पिता के बीच संबंध बिगड़ने शुरू हो जाते हैं.

क्या तरीक़ा है सही?

बच्चे को सही रास्ता दिखाना कोई ग़लत बात नहीं है, लेकिन उसका तरीक़ा सही होना चाहिए.

बोलिए कम, सुनिए ज़्यादाः  इस उम्र के बच्चों को समझाने का तरीक़ा अलग होता है, जो पैरेंट्स को डेवलप करना चाहिए, क्योंकि डांट-डपटकर बात समझाने से बात बनने की बजाय बिगड़ सकती है. टीनएज से बात करते समय कान बड़े और ज़ुबान छोटी रखनी चाहिए यानी बोलना कम और सुनना ज़्यादा चाहिए. उनकी बात सुनिए और जब वे पूछें, तो ही अपनी राय रखिए. अगर वे राय नहीं मांगें, तो स़िर्फ सुनिए. बिना मांगे राय मत दीजिए. यदि राय देनी भी हो, तो तरीक़ा रिक्वेस्ट वाला होना चाहिए, न कि ऑर्डर वाला.

दूसरों से सीखिएः हर किसी को टीनएज बच्चे को डील करने का तरीक़ा नहीं पता होता और इसमें कोई बुराई भी नहीं है, लेकिन यह तरीक़ा सीखना ज़रूरी है. अभिभावकों के लिए ज़रूरी है कि वे बच्चे में आए बदलावों के साथ एडजस्ट करें. टीनएज पैरेंटिंग एक कला है. कला में निपुण होने के लिए अभ्यास की ज़रूरत होती है. अपने आस-पास पड़ोस या रिश्तेदारी में आपको जिसकी पैरेंटिंग स्टाइल पसंद हो, उसके साथ हेल्दी डिस्कशन कीजिए. उनकी पैरेंटिंग स्टाइल पर राय लीजिए. रास्ते अपने आप बनते जाएंगे.

कमियों को स्वीकारेंः इस उम्र के बच्चे को भी अटेंशन चाहिए होता है. उसके क़रीब जाने के लिए उसकी तारीफ़ कीजिए. उसके फेलियर को भी स्वीकार करना सीखिए और उसकी कोशिशों के लिए उसका हौसला बढ़ाइए. इससे उसका स्ट्रेस लेवल कम होगा और वो आपके क़रीब आएगा.

रिश्तों में खुलापन लाइएः  अभिभावक को अपने बच्चे के साथ ऐसा रिलेशन डेवलप करना चाहिए, जिससे उनका बच्चा बिना डर या झिझक के उनके साथ अपनी  हर तरह की बात शेयर कर सके. बच्चे को अकेलेपन का एहसास नहीं होने देना चाहिए. पैरेंट्स के दिमाग़ में इतना खुलापन होना चाहिए कि वे इस बात को स्वीकार कर सकें कि अगर बच्चा कुछ ग़लत भी कर रहा है, तो बच्चा नहीं, बल्कि उसका काम ग़लत है. अगर आप बच्चे को ही ग़लत ठहरा देंगे तो सारे रास्ते बंद हो जाएंगे, इसलिए पैरेंट्स को बच्चे के व्यवहार को ग़लत ठहराना चाहिए, न कि बच्चे को. कहने का अर्थ यह है कि बच्चे को रिजेक्ट न करें. पैरेंट्स को अपने बच्चे को इतनी छूट देनी  चाहिए कि कोई ग़लती होने पर वो उनके पास आकर उसे स्वीकारें, न कि डर के मारे उस पर परदा डाल दें.

रिएक्ट, नहीं एक्ट कीजिएः अभिभावकों को बच्चे की ग़लती पर तुरंत किसी तरह का रिएक्शन नहीं देना चाहिए. अगर आप उन पर ग़ुस्से से चिल्लाएंगे, तो वो भी आप पर चिल्ला सकता है, इसलिए उसकी बात सुनिए और तुरंत रिएक्ट करने की बजाय एक्ट कीजिए. एक्ट करने का मतलब है कि सोच-समझकर बोलना या फैसला देना.

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ज़िम्मेदारी सौंपिएः बढ़ते बच्चे के स्वतंत्र व्यक्तित्व को मान्यता देना ज़रूरी है. उसे रोकने-टोकने की बजाय ज़िम्मेदारी सौंपें. यानी इंस्ट्रक्टर नहीं, फेसिलिटेटर बनिए. यदि आप चाहते हैं कि बच्चा आपके मुताबिक़ चले, तो उसे अपनी जायदाद न समझिए. अपने अहम् को परे रखकर परिस्थिति को देखने का प्रयास करिए. बच्चों के साथ चर्चा करते रहिए. उसके लक्ष्य और उद्देश्य को सिरे से ख़ारिज करने से बचिए.

– वेदिका शर्मा

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