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यूं करें अकेले बच्चे की परवरिश (Learn ways to raise a happy single child)

Parenting Tips
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वजहें चाहे जो भी हों, लेकिन इन दिनों अधिकतर कपल्स एक ही बच्चा पैदा करने में भरोसा रखने लगे हैं और इस बदलते परिवेश में ‘ओनली चाइल्ड-लोनली चाइल्ड’ वाली कहावत भी अब पूरी तरह सही नहीं बैठती. अकेले बच्चे को किस तरह दी जा सकती है अच्छी परवरिश, आइए जानें.

 

एज्युकेटेड और करियर को लेकर सचेत रहनेवाले कपल्स की संख्या जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे परिवार और छोटे होते जा रहे हैं. कभी ‘हम दो हमारे दो’ का हिट स्लोगन अब ‘हम दो हमारा एक’ तक आ पहुंचा है. समय, जगह या पैसों की कमी… वजहें चाहे जो हों, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि एक ही बच्चा पैदा करने वाले कपल्स की संख्या अब तेज़ी से बढ़ रही है. बच्चों की परवरिश वैसे ही बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है, उस पर जब एक ही बच्चा हो तो यह ज़िम्मेदारी और ख़ास बन जाती है कि उसे किस तरह सही परवरिश मिले.

अपना नज़रिया बदलें

यदि आप इकलौते बच्चे के पैरेंट्स हैं, तो सबसे पहले अपना नज़रिया बदलें और मन में किसी भी तरह की हीनभावना न पालें. अकेला बच्चा होने के सकारात्मक पहलुओं पर ग़ौर करें, जैसे- यदि दो या अधिक बच्चे होते, तो आपको उनके साथ भी क्वालिटी टाइम बिताना होता, लेकिन चूंकि वो अकेला है, इसलिए आप अपना सारा व़क़्त उसके साथ बिताकर पैरेंटिंग का पूरा लुत्फ़ उठा सकते हैं. आपके पास उपलब्ध सभी साधनों का इस्तेमाल आप बच्चे को ज़िम्मेदार नागरिक बनाने में कर सकते हैं आदि. आपकी सोच सकारात्मक होगी तो बच्चे को कभी अकेलापन महसूस नहीं होगा और यक़ीनन उसकी परवरिश करना आपके लिए आसान होगा.

बच्चे को पूरा समय दें

बच्चे की अच्छी परवरिश के लिए उसके साथ समय बिताएं. केवल अच्छे-अच्छे उपहार देने भर से आपकी ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं हो जाती. माना आप अपने करियर की वजह से ही परिवार नहीं बढ़ा रहे हैं, लेकिन अपने बच्चे को सही-ग़लत की जानकारी देना भी आपकी ही ज़िम्मेदारी है और इसके लिए आपको उसके साथ समय बिताना ही होगा. समय न दे पाने की जगह यदि आप पॉकेटमनी, उसके जन्मदिन पर फैंसी बर्थडे पार्टी या ग़िफ़्ट दे कर अपनी ज़िम्मेदारी से बचेंगे तो बच्चे को ग़लत संदेश मिलेगा. यदि आपके ऑफ़िस आवर्स ज़्यादा हैं तो घर के कामों के लिए कोई हेल्पर रखें और ऑफ़िस के बाद का अधिकांश समय बच्चे के साथ ही बिताएं.

बच्चे को व्यस्त रखें

अकेले बच्चे अक्सर बोर होने लगते हैं और बोरियत दूर करने के लिए अमूमन उन्हें टीवी, वीडियो गेम या इंटरनेट आदि का चस्का लग जाता है. इससे उनकी सेहत को नुक़सान पहुंचता है और उनके विकास पर भी नकारात्मक असर पड़ता है. अतः बच्चे को किसी रचनात्मक कार्य में व्यस्त रखें. आजकल सभी शहरों में बच्चों के लिए क्रिएटिव क्लासेज़ उपलब्ध हैं. बच्चे की रुचि के अनुसार आप उसे इन क्लासेज़ में भेज सकते हैं. क्लास का समय वह चुनें, जब आप ऑफ़िस में रहते हों, ताकि आपकी ग़ैरमौजूदगी में बच्चा रचनात्मक कार्य में लगा रहे और ऑफ़िस से लौटने के बाद तो आप उसके साथ होंगे ही.

मनोरंजन का ख़्याल रखें

बच्चे के मनोरंजन का पूरा ख़्याल रखें. टीवी, इंटरनेट, खेल-कूद और क़िताबें सभी बच्चों का भरपूर मनोरंजन करते हैं. बस, ज़रूरत है कि आप उन्हें इस तरह ग्रूम करें कि वे टीवी, इंटरनेट या वीडियो गेम जैसे मनोरंजन के साधनों का कम और खेल-कूद व क़िताबों का ज़्यादा उपयोग करें. अकेले बच्चों का क़िताबों से बेहतर कोई साथी नहीं हो सकता और उनमें क़िताबों के प्रति रुचि जगाना भी आसान है, लेकिन इसकी शुरुआत तभी कर दें, जब वे छोटे हों.

रिश्ते निभाना सिखाएं

अधिकतर अकेले बच्चे रिश्तों को निभाने में थोड़ा पीछे रह जाते हैं. अतः आप शुरू से ही उन्हें रिश्तों की जानकारी दें, उन्हें फ्रेंड्स बनाने को प्रोत्साहित करें और दोस्तों तथा दोस्ती का महत्व भी बताएं. अकेले बच्चों को दूसरों के साथ अपना सामान शेयर करना भी पसंद नहीं होता, लेकिन यदि आप रोल मॉडल बन कर उन्हें सिखाएंगे तो वे आसानी से अपनी चीज़ों को शेयर करना सीख जाएंगे.

ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान न दें

बच्चा इकलौता हो तो स्वाभाविक रूप से पैरेंट्स उस पर ज़्यादा ध्यान देने लगते हैं, ख़ासतौर पर तब, जब मां होममेकर हो. इससे बचने लिए ज़रूरी है कि ऐसी मांएं केवल बच्चों की ओर ही नहीं, बल्कि अपनी हॉबीज़ की ओर भी ध्यान दें. यदि पूरे व़क़्त बच्चे पर ध्यान दिया जाए तो उसके व्यक्तित्व का समग्र विकास नहीं हो पाता. अतः पैरेंट्स को अकेले बच्चे पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देने से बचना चाहिए.

– ऊषा गुप्ता

बच्चों में गैजेट एडिक्शन- कितना अच्छा-कितना बुरा? (Gadget Addiction In Kids Good Or Bad?)

 

Gadget Addiction
हाईटेक होते ज़माने में जहां हर चीज़ मोबाइल ऐप पर उपलब्ध होती जा रही है, ऐसे में बच्चों को गैजेट्स से दूर रखना क्या सही है? आज के दौर में हम बच्चों को गैजेट्स से पूरी तरह दूर तो नहीं रख सकते, मगर इनके इस्तेमाल की समयसीमा ज़रूर तय कर सकते हैं. बच्चों में गैजेट एडिक्शन कितना सही या ग़लत है? बता रही हैं प्राची भारद्वाज.

माता-पिता की जागरूकता के बावजूद आज दो साल के बच्चे भी टच स्क्रीन फोन चलाना, स्वाइप करना, लॉक खोलना और कैमरे पर फोटो खींचना जानते हैं. एक नए शोध (82 प्रश्‍नावली के आधार पर) के अनुसार, 87% अभिभावक प्रतिदिन औसतन 15 मिनट अपने बच्चों को स्मार्टफोन खेलने के लिए देते हैं, जबकि 62% ने बताया कि वे अपने बच्चों के लिए ऐप्स डाउनलोड करते हैं. स्मार्टफोन के मालिक हर 10 में से 9 अभिभावकों ने बताया कि उनके नन्हें-मुन्ने फोन स्वाइप करना जानते हैं, 10 में से 5 ने बताया कि उनके बच्चे फोन को अनलॉक कर सकते हैं, जबकि कुछ अभिभावकों ने माना कि उनके बच्चे फोन के अन्य फीचर भी ढूंढ़ते हैं. मनोवैज्ञानिकों की मानें, तो पिछले 3 वर्षों में तकनीक पर आश्रित लोगों की संख्या 30 गुना बढ़ गयी है.

गैजेट के अधिक इस्तेमाल से सेहत पर असर

माइकल कोहेन ग्रुप द्वारा किए गए शोध से पता चला कि टीनएजर्स गैजेट्स से खेलना ज़्यादा पसंद करते हैं. गैजेट्स लेकर दिनभर बैठे रहने के कारण उनमें मोटापे की समस्या बढ़ रही है. साथ ही आईपैड, लैपटॉप, मोबाइल आदि पर बिज़ी रहने के कारण वो समय पर सो भी नहीं पाते, जिससे उन्हें शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है. गैजेट के अधिक इस्तेमाल से बच्चों में व्यग्रता, उत्कंठा, अवसाद, आत्मकेंद्रित, मनोरोग व अन्य समस्याएं हो रही हैं.

कुछ फ़ायदे भी हैं

बच्चे विकिपीडिया, गूगल, स्मार्ट वॉइस असिस्टेंट इत्यादि से महत्वूर्ण जानकारी हासिल कर सकते हैं. कुछ स्कूलों में तो छोटी क्लास से ही टैबलेट इस्तेमाल किया जाने लगा है. ऐसे ही एक स्कूल की टीचर आशिका भाटिया कहती हैं, “टैबलेट की मदद से बच्चे रंग, आकार, नए शब्दों या अंकों को आसानी से पहचानते हैं और ख़ुशी से सीखते हैं, लेकिन इसका इस्तेमाल समयसीमा में ही होना चाहिए.” कुछ ऐसा ही कहना है गुड़गांव में क्लीनिक चलाने वाली डॉ. सोनल का. उनके मुताबिक़, बदलते व़क्त में गैजेट में बिज़ी रहने के कारण बच्चे घर में ही रहते हैं, जिससे माता-पिता को उनकी सुरक्षा की चिंता नहीं होती. बस, ज़रूरत है तो गैजेट के इस्तेमाल की समयसीमा तय करने की.

क्या हो समय सीमा?

अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की स्टडी के मुताबिक़, दो वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी तरह की स्क्रीन से दूर रखना चाहिए. तीन से पांच वर्ष के बच्चे एक घंटा और टीनएज बच्चों को केवल 30 मिनट प्रतिदिन तक गैजेट इस्तेमाल की अनुमति दी जानी चाहिए.

कैसे पहचानें बच्चे के गैजेट एडिक्शन को?

यदि आपके बच्चे में निम्न लक्षण दिखें, तो समझ जाइए कि वो गैजेट एडिक्शन का शिकार हो चुका है.
* गैजेट चलाने की अनुमति न मिलने पर ग़ुस्सा आना, चिड़चिड़ापन, उदास हो जाना आदि.
* गैजेट के इस्तेमाल के कारण खाने, सोने आदि का समय बदलना.
* ध्यान में कमी, याददाश्त कमज़ोर होना, व्यावहारिक दिक्क़तें, कुछ नया सीखने में मुश्किल आदि.
* सोशल होने से आनाकानी करना.

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क्या करें पैरेंट्स?

* बच्चों को ख़ुश करने की बजाय उनकी भलाई के बारे में सोचना चाहिए. उन्हें अनुशासन में रखने के साथ ही कुछ अन्य बातों का ध्यान रखकर गैजेट की लत से बचाया जा सकता है.
* टीवी, कंप्यूटर या फोन अपने बच्चों को किसी भी स्क्रीन का उपयोग केवल 30 मिनट प्रतिदिन तक ही करने दें.
* बच्चों को इनाम में गैजेट की बजाय कुछ और उपयोगी वस्तु दें.
* अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार, खाना खाते समय, होमवर्क करते समय, सोते समय बच्चों को गैजेट से दूर रखें.
* कोशिश करें कि बच्चा जब टीवी, कंप्यूटर पर बिज़ी हो, तो आप उसके साथ रहें ताकि ये देख सकें कि वो स्क्रीन पर क्या देख रहा है.
* मोबाइल पर गेम खेलते देख उसे नज़रअंदाज़ करने की बजाय बच्चे को बाहर जाकर दोस्तों के साथ खेलने के लिए प्रेरित करें.
* बच्चे की फिज़िकल एक्टिविटी बढ़ाएं.
* यदि बच्चा आपकी बात मानते हुए आपके द्वारा तय समय तक ही गैजेट का इस्तेमाल करता है, तो उसे प्रोत्साहित करना न भूलें. आज के दौर में आप उन्हें गैजेट्स से पूरी तरह दूर तो नहीं रख सकते, लेकिन संतुलन बनाकर उन्हें इसका आदी होने से ज़रूर बचा सकते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

मुंबई की सादिया वंजारा कहती हैं, “छोटे बच्चे झुककर, बैठकर टीवी, कंप्यूटर आदि में खोये रहते हैं, जिससे उनकी गर्दन, पीठ, कंधों में तकलीफ़ हो जाती है.”
साइकोलॉजिस्ट डॉ. हरीश शेट्टी का मानना है कि मोबाइल फोन के द्वारा बच्चा इंटरनेट, ऑनलाइन खेल के साथ-साथ पॉर्न की दुनिया में भी झांक सकता है और ये उसके लिए कतई ठीक नहीं.
चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. दलवई एक केस का ज़िक्र करते हुए बताते हैं कि एक 3 वर्षीय बच्चे को सबने आत्मकेंद्रित (ऑटिस्टिक) समझ लिया था, क्योंकि वो किसी से नज़रें नहीं मिलाता था, बातचीत नहीं करता था और अन्य बच्चों के साथ खेलता भी नहीं था, लेकिन इन सबकी असली वजह थी उसका घंटों तक ऑनलाइन शो देखते रहना. डॉ. दलवई के अनुसार, “गैजेट से स़िर्फ एकतरफ़ा संचार संभव है. टच-पैड की बजाय बच्चे को कोई पेट (पालतू जानवर) लाकर दें. गैजेट के आदी बच्चों की दुनिया बस वहीं तक सिमटकर रह जाती है.”

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न करें बच्चे की ग़लतियों को नज़रअंदाज़ (Don’t overlook your children’s mistakes)

Parenting

हर माता-पिता अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं और उनकी अच्छी परवरिश करने की कोशिश करते हैं, मगर कई बार बच्चों के प्रति अंधा प्यार उन्हें ग़लत दिशा में ले जाता है. जाने-अनजाने बच्चों की ग़लतियां छुपाकर या उन पर परदा डालकर माता-पिता अपने बच्चों का भविष्य बिगाड़ते हैं. आपके ऐसा करने पर आगे चलकर बच्चे के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी. बच्चों के झूठ को छुपाना क्यों सही नहीं है? बता रही हैं पल्लवी राघव.

 

संजना का 6 साल का बेटा रोहन स्कूल में सबको मारता रहता है. शाम को पार्क में खेलते हुए भी वह ऐसा ही करता है. संजना को कई बार दूसरे बच्चों की मांओं ने रोहन के इस बर्ताव के बारे में आगाह भी किया, लेकिन वो इस बात को मानने को तैयार ही नहीं होती. किसी के शिकायत करने पर वो कोई बहाना बनाकर वहां से उठ जाती है या फिर बात को टालने की कोशिश करती है. कभी-कभी वह रोहन को प्यार से झूठी डांट लगाती है और अगले ही पल उसे वहां से ले जाती है. धीरे-धीरे बच्चों ने रोहन के साथ खेलना बंद कर दिया. संजना दिनभर अपने पति रोहित से दूसरे बच्चों की शिकायत करती कि बच्चों का अपना ग्रुप है और कोई रोहन के साथ नहीं खेलना चाहता, लेकिन रोहित भली-भांति जानते थे कि ग़लती रोहन की है. वे संजना को बार-बार समझाने की कोशिश करते कि रोहन की भी ग़लती हो सकती है, परंतु संजना जैसे यह मानने को तैयार ही नहीं थी. यदि आप भी संजना जैसी ही मां हैं, तो संभल जाइए, क्योंकि ऐसा करके आप अपने बच्चे को ख़ुद ही बिगाड़ रही हैं. आइए, जानते हैं कि पैरेंट्स के इस व्यवहार के पीछे क्या वजह होती है?

बच्चों के प्रति सख़्त न होना

ऐसे कई मामलों में देखा गया है कि मांएं इतनी कम उम्र में बच्चे के साथ सख़्ती से पेश नहीं आना चाहतीं, लेकिन वो शायद यह बात नहीं समझतीं कि परवरिश स़िर्फ ममता न्योछावर करके नहीं की जा सकती. बच्चों की परवरिश करते हुए कई बार हमें कठोर भी होना पड़ता है. यदि कम उम्र से ही बच्चों को सिखाया जाए कि दोस्तों की रिस्पेक्ट करनी चाहिए, उनकी बात सुननी चाहिए, उनके साथ मिलकर रहना चाहिए, तो यक़ीनन बच्चे ये बात गांठ बांध लेंगे. जब कोई आकर आपसे बच्चे की शिकायत करे, कोई रिश्तेदार या पड़ोसी/मित्र उसके बारे में कोई राय दे, तो उनकी बात ग़ौर से सुनें और बच्चे के व्यवहार पर ख़ुद नज़र रखें. यदि बर्ताव में कुछ ग़लत लग रहा है, तो उसे सुधारने की कोशिश करें. हो सकता है, अपने बच्चे को समझाने के लिए आपको कभी-कभार उससे सख़्ती से भी पेश आना पड़े, लेकिन इसमें कुछ ग़लत नहीं है. आपकी डांट बच्चे का भविष्य सुधार सकती है, लेकिन उसकी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करने पर उसका भविष्य ख़राब हो सकता है.

बच्चे के प्रति अंधा स्नेह

अपने बच्चे से तो हर किसी को प्यार होता है, मगर कुछ मांएं बच्चे के प्यार में इस कदर अंधी हो जाती हैं कि उन्हें कभी उसकी ग़लती दिखाई नहीं देती. वो हर हाल में अपने बच्चे को ही सही ठहराती हैं, भले ही उसने कितनी भी बड़ी ग़लती क्यों न की हो. अक्सर देखा गया है कि जिन कपल्स को बच्चा देर से होता है, उनमें बच्चे के प्रति अंधा स्नेह ज़्यादा होता है. वो हर हाल में बच्चे को ख़ुश देखना चाहते हैं, लेकिन उन्हें इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं होता कि उनका ये अंधा प्यार उनके लाड़ले/लाड़ली के भविष्य को अंधकारमय बना सकता है. विशेषज्ञों के मुताबिक़, बच्चों को छोटी उम्र से ही सही-ग़लत की शिक्षा दी जानी चाहिए. उन्हें अपनी ग़लती का एहसास होना चाहिए और जब तक आप उन्हें ग़लती सुधारने के लिए नहीं कहेंगी, वो आगे भी इसे दोहराते रहेंगे. जब आप उन्हें प्यार से समझाएंगी, तो निश्‍चय ही उन्हें अपनी ग़लती का एहसास होगा और वो उसे सुधारने की पूरी कोशिश करेंगे.

अपनी परवरिश को सही मानना

दुनिया में कोई भी इंसान हर चीज़ में परफेक्ट नहीं होता, मगर कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्हें लगता है कि वो परफेक्ट मॉम हैं और बच्चे की परवरिश का उनका तरीक़ा सही है. ऐसी मांएं दूसरों की नसीहतें नहीं मानतीं. यदि कोई इनसे इनके बेटे/बेटी की शिकायत करता है, तो ये उल्टे शिकायत करने वाले पैरेंट्स और उस बच्चे को ज़िम्मेदार ठहराने लगती हैं. मेरा बच्चा ऐसा कर ही नहीं सकता, मैं उसे अच्छी तरह जानती हूं, ज़रूर आपके बच्चे ने ही कोई शरारत की होगी… इस तरह वो सामनेवाले पर ही बरस पड़ती हैं. ज़रा सोचिए, यदि मां-बाप ही बच्चों की ग़लतियों पर परदा डालने लगेंगे, तो बच्चा बिगड़ेगा ही. साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि दूसरों की बात सुनने का ये मतलब नहीं है कि आप बच्चे की बात सुने बिना ही उसे डांटने लगें. पहले उससे पूछें कि उसने इस तरह का बर्ताव क्यों किया? कारण जानने के बाद उसे प्यार से समझाएं.

ग़लतियों पर परदा डालने के साइड इफेक्ट

बच्चे को लाड़-प्यार करना अलग बात है, मगर उसकी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करना आगे चलकर आपको भारी पड़ सकता है. इससे बच्चे के व्यक्तित्व पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा.
ऐसा करके पैरेंट्स ख़ुद बच्चे के भविष्य के दुश्मन बन जाते हैं. यह जानते हुए भी कि वो अन्य बच्चों को परेशान कर रहा है, बड़ों से तमीज़ से पेश नहीं आ रहा, उसने झूठ बोलना शुरू कर दिया है और आपसे भी बातें छुपा रहा है, बावजूद इसके यदि आप उसकी इन हरक़तों को नज़रअंदाज़ करती हैं, तो आगे चलकर वो आपके साथ भी बदतमीज़ी कर सकता है.
बच्चे हमेशा अपने मन की ही करते हैं. हर बात के लिए ज़िद्द करते हैं, क्योंकि वो जानते हैं कि माता-पिता से वो अपनी बातें मनवा सकते हैं. ऐसे बच्चों के अभिभावक बाद में बच्चों से बदलाव की अपेक्षा करते हैं, लेकिन तब ये बहुत मुश्किल हो जाता है.
छोटी उम्र से ही बच्चों में अच्छी आदतें व संस्कार डालने चाहिए, तब कहीं जाकर बड़े होने पर भी वो संस्कारी बनेंगे और सबका सम्मान करेंगे. अतः बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उनकी ग़लतियों पर परदा डालने की भूल न करें.
जब कोई आपके बच्चे के बारे में कुछ कहे, तो उसे ध्यान से सुनिए. यदि आप किसी की बात नहीं सुनेंगी, तो लोग आपसे और आपके बच्चे से हमेशा दूरी बनाए रखेंगे और कोई भी आपके बच्चे से दोस्ती करना पसंद नहीं करेगा.
अपने बच्चों के व्यवहार पर नज़र रखें और समय रहते उन्हें उनकी ग़लतियों के लिए टोकें.
बच्चे तभी सफल होंगे जब उनमें अच्छे संस्कार हों. मॉडर्न होने के साथ साथ अपने रीति-रिवाज़ों को भी समझें और उनके बारे में बच्चों को भी बताएं.

कैसे करें बच्चों का मॉर्निंग रूटीन तैयार? (How to make your children ready for morning routine?)

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क्या आपको लगता है कि सुबह के 9 बजे तक घर का काम निपटाते-निपटाते आप मैराथॉन दौड़ आई हैं. आजकल की व्यस्त ज़िंदगी में जहां बच्चों की परवरिश मुश्किल होती जा रही है, उससे भी ज़्यादा मुश्किल होता है एक मां के लिए दिनचर्या को नियंत्रित कर पाना. सूरज उगने से पहले पूरे परिवार के लिए खाना बनाना, बच्चों का टिफिन तैयार करना, उन्हें स्कूल के लिए तैयार करना किसी चुनौती से कम नहीं होता. एक नौकरीपेशा मां के लिए ये काम और भी मुश्किल होता है. आपकी मुश्किल को आसान बनाने के लिए सुषमा विश्‍वकर्मा बता रही हैं कुछ कारगर टिप्स.

अक्सर मम्मियों को बातें करते देखा जाता है कि किस तरह उन्हें रात से ही सुबह की चिंता रहती है कि वो समय से उठ पाएंगी या नहीं, टिफिन तैयार कर पाएंगी या नहीं, कहीं आज बच्चे को स्कूल जाने में देर न हो जाए आदि. हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ आसान तरी़के, जिससे आपकी हर सुबह होगी सुकून भरी और ख़ुशहाल नींद हो पूरी बच्चों को हैंडल करना आसान काम नहीं है. सुबह के समय तो सारा काम एक तरफ़ और बच्चा एक तरफ़. आप अगर चाहती हैं कि आपका बच्चा समय पर उठे और नखरे न करे, तो उसके लिए आपको उसे जल्दी सोने की आदत सिखानी होगी. रात में जल्दी सोने पर सुबह वह समय पर उठ जाएगा. उसकी नींद पूरी हो जाएगी और वह आपको परेशान नहीं करेगा.
रात में ही करें तैयारी सुबह के नाश्ते और बच्चों के टिफिन की तैयारी रात में ही कर लें. जो सब्ज़ी सुबह बनानी है, उसे रात में काटकर रखें आटा गूंध लें. यूनिफॉर्म रात में ही तैयार करके रखें, ताकि सुबह उठने के बाद आपको यूनिफॉर्म रेडी करने का टेंशन न रहे. शूज़, वॉटर बॉटल, बैग, टिफिन, सब जगह पर रखें, जिससे आपको सुबह उठकर इन चीज़ों को ढूंढ़ना न पड़े. रात में की गई ये तैयारी सुबह आपके क़ीमती समय को बचाने में मदद करेगी.

जल्दी उठें

बच्चों के रूटीन के साथ-साथ आप अपना भी एक रूटीन बनाएं. बच्चों के उठने से पहले का अलार्म लगाएं, ताकि उनके उठने से पहले आप सभी ज़रूरी काम निपटा लें. इत्मिनान से एक कप चाय पी लें और दिन की शुरुआत बेहतर तरी़के से कर पाएं. सुबह जल्दी उठने से आप टेंशन फ्री रहेंगी और आपका पूरा दिन अच्छा बीतेगा.

वर्कलिस्ट बनाएं

अपने हर काम की लिस्ट तैयार करें. बच्चे को क्या-क्या काम करना है, रात में उसे एक पेपर पर लिखकर बच्चे के कमरे में चिपका दें. इससे सुबह बच्चा उस लिस्ट को फॉलो करके आधा काम ख़ुद ही कर लेगा और बचा हुआ काम आप कर सकती हैं. उदाहरण के लिए ब्रश करना है, नहाना है, यूनिफॉर्म पहननी है, बालों में कंघी करनी है, नाश्ता करना है, जूते पहनने हैं, अपना बैग तैयार करना है, लंचबॉक्स लेना है, पानी की बोतल लेनी है आदि. इन कामों की एक लिस्ट बनाएं और बच्चे को समझाएं. बच्चे को बताएं कि हर दिन सुबह उठकर उसे ये सारे काम ख़ुद करने हैं. हो सकता है, एक-दो दिन बच्चा काम करने में कुछ भूल जाए, लेकिन यक़ीन मानिए, कुछ दिनों बाद उसकी दिनचर्या सेट हो जाएगी.

जब तब का फॉर्मूला अपनाएं

सुनकर अजीब लगता है, लेकिन ये जब तब का फॉर्मूला बहुत कारगर सिद्ध हो सकता है, अगर आप अच्छी तरह इसे फॉलो करें. आप पता करें कि सुबह आपके बच्चे को क्या काम करने में मज़ा आता है? जैसे- अगर आपके बच्चे को नहाना पसंद है, तो उसे आप अपनी लिस्ट में सबसे पहले शामिल करें. फिर उससे कहें कि जब आप ब्रश कर लेंगे तब आपको नहाना है. अगर बच्चे को ब्रेकफास्ट करना पसंद है, तो उससे कहें कि आप जल्दी से ये काम कर लो फिर आपको ब्रेकफास्ट मिलेगा. इससे वो भी ख़ुशी-ख़ुशी और जल्दी-जल्दी काम करेगा. डॉ. नताशा नितिन साटम ने भी जब तब का फॉर्मूला अपनाया है. उनकी बेटी को गार्डन में खेलना बहुत पसंद है, इसीलिए जब वो अपनी बेटी को सुबह उठाती हैं, तो उसे गार्डन में चलने की बात कहती हैं. इससे उनकी बेटी ख़ुश हो जाती है और सारे काम जल्दी-जल्दी कर लेती है. इस जब तक की प्रक्रिया से उनकी सुबह टेंशन में नहीं, बल्कि ख़ुशी-ख़ुशी बीतती है.

कूल मॉम बनें

आज के बच्चे हमारे भी गुरु होते हैं. ऐसे में उनके साथ अगर शांति से पेश नहीं आया जाए, तो वो ग़लत तरह से ब्लैकमेल करते हैं. वैसे भी एक कहावत है कि जल्दबाज़ी में हर काम बिगड़ जाता है. सुबह-सुबह जल्दबाज़ी में काम करना, बच्चे पर चिल्लाना, ज़बर्दस्ती उसके हाथ में दूध का ग्लास पकड़ाना, उसे जल्दी-जल्दी नाश्ता खिलाना आदि बच्चे पर बुरा असर डालता है. इससे बच्चे को ऐसा लगने लगता है कि इन कामों की वजह से आपको टेंशन होती है. इसके कारण बहुत जल्द बच्चा इसके विपरीत काम करने लगता है. कई बार स्कूल जाने से भी आनाकानी करता है.

मॉम टाइम

सुबह के समय बच्चे को आपका साथ ज़्यादा चाहिए होता है. वो चाहता है कि आप उसे दुलारते और प्यार करते हुए गोद में लेकर जगाएं, उसे प्यार से सहलाएं, पप्पियां लें. जब बच्चे की सुबह इस तरह से होती है, तो उसका पूरा दिन बहुत अच्छा गुज़रता है. अतः सुबह किचन से ही ज़ोर से चिल्लाकर बच्चे को जगाने की कोशिश न करें. घर के किसी दूसरे मेंबर से भी जगाने को न कहें. ख़ुद ही स़िर्फ 5 मिनट बच्चे को दें.

वीकेंड को बनाएं स्पेशल

हफ़्ते के 5-6 दिन बच्चे के साथ-साथ आपकी दिनचर्या भी एक-सी रहती है. ऐसे में सप्ताह के आख़िरी दिन यानी छुट्टी को दिलचस्प बनाने की पूरी कोशिश करें. इस एक दिन बच्चे के साथ-साथ आप भी देर तक सोएं. सबकी पसंद का खाना बनाएं. छुट्टी के दिन काम की लिस्ट को फॉलो न करें. बच्चे का जो मन करे, उसे करने दें. शाम को उसे मार्केट ले जाएं. थोड़ी आउटिंग करें.

स्मार्ट टिप्स
बच्चों के स्कूल जाने के बाद कुछ मिनट के लिए रिलैक्स करें. इसके लिए आप अपना फेवरेट म्यूज़िक सुनें.
अगर सुबह के समय को आप अच्छी तरह मैनेज नहीं कर पा रही हैं और आपकी पड़ोसन इसमें परफेक्ट है, तो आप भी उसकी तरह काम करने की कोशिश करें.
होम केयर या पैरेंटिंग की जानकारी हासिल करने के लिए अच्छी मैगज़ीन पढ़ें या टीवी शो देखें.
जॉइंट फैमिली है, तो सासू मां से कुछ हेल्प लें. आमतौर पर बच्चे अपनी दादी से ज़्यादा जुड़े होते हैं. ऐसे में वो उनसे ही तैयार होना, खाना खाना आदि पसंद करते हैं.

बच्चों के लिए प्ले थेरेपी (Play therapy for child)

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यूं तो बच्चों के खेल को अक्सर मौज-मस्ती के रूप में देखा जाता है, लेकिन जब यही खेल उनकी समस्या और बीमारी को दूर करने का साधन बन जाए तो क्या कहने? जी हां. इलाज की इस प्रक्रिया को ‘प्ले थेरेपी’ कहते हैं, जहां बच्चों के खेल की रुचि और पसंद को देखकर सायकोलॉजिस्ट उनका इलाज करते हैं.

एक प्रचलित मुहावरा है- बच्चों का खेल. आमतौर पर हम इस मुहावरे का इस्तेमाल तब करते हैं, जब कोई काम हद दर्जे तक आसान लगे. इतना आसान कि चुटकी बजाते ही हो जाए. लेकिन ज़रा सोचिए, क्या बच्चों का खेल इतना आसान और नज़रअंदाज कर देनेवाला होता है? दरअसल, जब आपका बच्चा खेल रहा होता है तो वह काम कर रहा होता है. वह काम उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना कि हमारे अन्य काम या यूं कहें कि उससे भी कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है बच्चों का खेल.

बच्चों द्वारा खेले जानेवाले खेल उनके विकास क्रम का एक अहम् हिस्सा होता है. बच्चे जो भी देखते और सुनते हैं, खेलने के दौरान उसकी नकल करते हैं. डांटने वाले पापा, लोरियां सुनाने वाली मम्मी, माला फिरानेवाली दादी से लेकर बात-बात में चपत लगाने वाली टीचर तक के क़िरदारों में ख़ुद को ढालते हैं. एक तरह से देखा जाए तो बच्चे खेलते समय अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा बड़ा बनने की कोशिश करते हैं. दरअसल, खेलते समय बच्चों का रचनात्मक मस्तिष्क काम कर रहा होता है, इसलिए बच्चे किसी भी वस्तु को खिलौना समझकर खेल सकते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो बच्चों का खेल एक भाषा है, ख़िलौने इस भाषा के शब्द हैं. बच्चे इसी भाषा के माध्यम से अपनी भावनाओं से दूसरों को अवगत कराने का प्रयत्न करते हैं.
बच्चों के खेल कई मायनों में इसलिए भी अहम् हो जाते हैं कि देखा गया है कि खेल के माध्यम से बच्चे आनेवाली किसी चुनौती या डर का सामना करने के लिए पूर्वाभ्यास करते हैं, मसलन- इंजेक्शन लगवाने से डरनेवाले बच्चे डॉक्टर के पास जाने से पहले अपने भाई-बहन के साथ ‘डॉक्टर-डॉक्टर’ खेलते हुए इंजेक्शन लगवाने का पूर्वाभ्यास करते हुए देखे जाते हैं, इसलिए बड़ों को चाहिए कि वे बच्चों द्वारा खेले जानेवाले खेलों को महज़ बच्चों का खेल न समझें. ये खेल बच्चों के मानसिक, सामाजिक और व्यावहारिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं.

प्ले थेरेपी- खेल खेल में इलाज

बच्चों के खेल का महत्व तब बढ़ जाता है, जब आपका बच्चा किसी व्यावहारिक या मानसिक समस्या से ग्रसित हो. प्ले थेरेपी (खेल चिकित्सा) बच्चों की ऐसी मनोवैज्ञानिक समस्याओं से निज़ात दिलाने का अहम् साधन है. मानसिक समस्याओं से जूझ रहे बच्चों के लिए प्ले थेरेपी बहुत ही सहायक साबित हो सकती है ऐसा कहना है मनोचिकित्सक डॉ. अंजलि छाबरिया का. वे कहती हैं, “जब एक वयस्क व्यक्ति दु:खी होता है या उसे ग़ुस्सा आता है, तो वह बोलकर, चिल्लाकर अपनी भावनाओं को जता सकता है, जबकि बच्चों के साथ यह समस्या है कि वे अपनी भावनाओं को प्रकट नहीं कर पाते हैं. इसी वजह से वे कटे-कटे से रहने लगते हैं. साथ ही आज के वर्किंग पैरेन्ट्स के युग में अभिभावकों के पास इतना समय भी नहीं होता कि वे उनसे इत्मीनान से बात कर सकें, उनके दु:ख को समझने की कोशिश कर सकें.
ऐसे में ‘प्ले थेरेपी’ का महत्व और बढ़ जाता है. प्ले थेरेपिस्ट बच्चों के साथ खेलते हैं. बच्चों के साथ बच्चों जैसा व्यवहार करते हैं. खेलने के दौरान वे बच्चों से बातचीत भी करते हैं. दोस्ताना माहौल बन जाने पर बातों ही बातों में वे उनकी समस्या को जानने का प्रयत्न करते हैं. वे खेलते हुए बच्चों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण करते हैं कि बच्चे किस तरह से खेलते हैं. कौन-से खिलौने चुनते हैं. इस तरह वे बच्चों की मानसिक प्रक्रिया का अंदाज़ा लगाते हैं. बच्चों द्वारा चुने गए खिलौने, उसका खेलने का तरीक़ा खेल चिकित्सक को बच्चे के व्यक्तित्व, उसकी समस्या, मानसिक अवस्था इत्यादि के बारे में बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है. उन्होंने बताया कि यह ज़रूरी नहीं है कि डॉक्टर एक ही बार में बच्चे की समस्या समझ लें और बच्चा ठीक हो जाए. इसमें दो-तीन महीने भी लग सकते हैं.
डॉ. अंजलि छाबरिया ने आगे बताते हुए कहा कि आजकल प्ले थेरेपी के लिए आनेवाले बच्चों की मुख्य समस्या होती है एज्युकेशनल प्रेशर (शैक्षणिक दबाव). बचपन के दिन जहां खेलने-कूदने के लिए होते हैं, वहीं बच्चों पर बढ़ रहे पढ़ाई के दबाव से वे समय से पहले ही बड़े होने के लिए बाध्य हो रहे हैं, जो कि उनके सामान्य विकास में बड़ी बाधा है. वे आत्मकेंद्रित हो जाते हैं. उनका ज्ञान व्यावहारिक न होकर क़िताबी हो जाता है. वे अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं, इसीलिए धीरे-धीरे उनका व्यवहार ईर्ष्यालु और दब्बू हो जाता है.
उन्होंने बताया कि बच्चों में सायकोलॉजिकल प्रॉब्लम का दूसरा सबसे बड़ा कारण है माता-पिता का तनावपूर्ण वैवाहिक जीवन. जिन वैवाहिक जोड़ों के संबंध तनावपूर्ण रहते हैं, आमतौर पर उनके बच्चे शंकालू, डरपोक, चिड़चिड़े, अधिक ग़ुस्सा करनेवाले तथा एकाकी हो जाते हैं. इन बच्चों में असुरक्षा का भाव अधिक होता है. इसी तरह के एक केस का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह उन्होंने प्ले थेरेपी द्वारा 10 वर्ष के राहुल (परिवर्तित नाम) का सफलतापूर्वक इलाज किया.
राहुल के मम्मी-पापा का वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण था. वे तलाक़ लेना चाहते थे. लेकिन इसका सबसे अधिक असर हुआ राहुल के हंसते-खेलते बचपन पर. वह सहमा-सहमा सा रहता था. मम्मी-पापा को लड़ते-झगड़े देख रोने लगता था. स्कूल में भी वह किसी से बात नहीं करता था. पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता था. उसका स्वास्थ्य भी ख़राब रहने लगा. जब उसे प्ले थेरेपी के लिए लाया गया, तो यहां पर भी वह गुमसुम ही रहता था. इसलिए उसकी चचेरी बहन को भी उसके साथ खेलने के लिए बुलाने लगे. धीरे-धीरे जब वह घुल-मिल गया तो उसने बताया कि उसे डर लगता है कि अगर उसके पैरेन्ट्स उसे छोड़ देंगे, तो उसका क्या होगा? वह ख़ुद को असुरक्षित महसूस करता है. राहुल की समस्या मालूम होने के बाद उसके मम्मी-पापा को बुलाया गया. उनकी काउंसलिंग की गई. उन्हें भी यह बात समझ में आयी कि तनावपूर्ण वैवाहिक जीवन का बच्चे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. वे अपने सारे मतभेद भुलाकर एक हो गए. राहुल आज काफ़ी ख़ुश है, उसकी मानसिक स्थिति सामान्य है.

अभिभावकों का सकारात्मक व्यवहार भी है ज़रूरी

प्ले थेरेपी द्वारा थेरेपिस्ट बच्चों की मानसिक समस्याओं का पता तो लगा सकता है, किंतु उन समस्याओं को दूर करने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उनके अभिभावकों की होती है, क्योंकि बच्चे ज़्यादातर समय उनके साथ ही रहते हैं. अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को बताएं कि वे उनसे कितना प्यार करते हैं, उनके लिए वे कितने महत्त्वपूर्ण हैं.
जब आपका बच्चा किसी बात से डर जाए तो उन्हें समझाएं, न कि और डराने का प्रयत्न करें. उस व़क़्त उनके साथ रहें, जिससे उन्हें महसूस हो कि आप उनके साथ हैं उनकी रक्षा के लिए. अगर आपका बच्चा कुछ अच्छा कर रहा हो या उसने किसी स्पर्धा में कोई पुरस्कार प्राप्त किया हो, तो उसकी सराहना करें. यह न देखें कि प्रतियोगिता कितनी छोटी या बड़ी थी. इससे उसमें ख़ुद के महत्वपूर्ण होने का भाव जागेगा.
अगर कभी निंदा करनी पड़े तो उसके ग़लत व्यवहार की निंदा करें, न कि उसकी. वह ग़लती करे तो यह न कहें कि तुम बड़े ख़राब हो या शैतान हो. इसके बजाय उसे यह समझाने का प्रयत्न करें कि उसने क्या ग़लत किया है.
इन सबके साथ सबसे ज़रूरी बात यह है कि बच्चों को खेलने की पूरी आज़ादी दें. खेलते समय उनको ध्यान से देखें, हो सके तो साथ में कुछ समय खेलें और उनका मार्गदर्शन करें. इस दौरान उनकी रुचियों और पसंद-नापसंद को परखें. उनके खेल में बाधा न डालें, क्योंकि बच्चों द्वारा खेले जानेवाले खेल ‘बच्चों का खेल’ नहीं होते, बल्कि वयस्क बनने की दिशा में इनके द्वारा किया जानेवाला पूर्वाभ्यास होता है.

‘प्ले थेरेपी’ कब ज़रूरी?

अगर बच्चों में नीचे दी गई कोई समस्या हो तो प्ले थेरेपी से उसे दूर किया जा सकता है.
* यदि बच्चे या टीनएजर्स उपेक्षित, समाज या परिवार से कटे हुए हों.
* वे बच्चे जो पारिवारिक या सामाजिक समस्याओं से ग्रस्त हों, मसलन- माता-पिता के बीच अलगाव होने से मानसिक तौर पर परेशान या किसी नए परिवेश में ख़ुद को ढालने के लिए प्रयत्नशील हों.
* यदि यौन शोषण के शिकार हों.
* वे बच्चे जो बीमार हों या किसी ऐसी शारीरिक व्याधि से जूझ रहे हों, जो उनके सामान्य विकास में अवरोधक हो.
* जो हिंसा के शिकार हों.
* जो एज्युकेशनल प्रेशर का शिकार हों.
* वे बच्चे जो भावनात्मक और व्यावहारिक परेशानियों का सामना कर रहे हों, जैसे- मानसिक तनाव, डिप्रेशन या चिड़चिड़ापन, ज़्यादा क्रोध आना इत्यादि.

– अमरेन्द्र यादव

समय से पहले बड़े होते बच्चे

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दिल्ली के एक स्कूल में 2 बच्चों ने आपत्तिजनक स्थिति में अपना एमएमएस बनाया और दोस्तों को भेज दिया… एक टीनएज बच्चे ने छोटी बच्ची के साथ बलात्कार किया… कुछ बच्चे स्कूल में असामान्य अवस्था में पाए गए और जब उनसे पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि हम रेप गेम खेल रहे थे… माता-पिता अपने बच्चों के बारे में ऐसी बातें सपने में भी नहीं सोच सकते, पर ये आज की सच्चाई है. आज बच्चे तेज़ी से अपनी उम्र से पहले ही बड़े हो रहे हैं. ऐसे में पैरेंट्स को उन्हें हैंडल करना किसी चैलेंज से कम नहीं.

 

मुझे चांद-खिलौना ला दो मां… मुझे तारों तक पहुंचा दो मां… नन्हीं-सी गुड़िया ला दो मां… प्यारी-सी चुनरी दिला दो मां… पहन चुनरिया नाचूंगी, गुड़िया का ब्याह रचाऊंगी…” ऐसी ही ख़्वाहिशें थीं और कुछ ऐसा ही था हमारा बचपन और शायद 20-25 साल पहले तक भी बच्चों का बचपन कुछ ऐसा ही मासूमियत भरा था, लेकिन आज बचपन ऐसा नहीं है. आज के बच्चे कच्ची उम्र में ही जाने-अनजाने वयस्कों की तरह व्यवहार करने लगे हैं और उसे सही भी समझते हैं.

बोल्ड होते बच्चे

पुरानी पीढ़ी जिन विषयों पर युवावस्था में भी बातें करने से कतराती थी, वो बातें मासूम बच्चे या टीनएजर बेहिचक करने लगे हैं. 30 वर्षीया विनिता अपनी 4 साल की बेटी के साथ खिलौने की दुकान पर गई थी. वहां एक डॉल देखकर वो मचल गई कि बस यही चाहिए. विनिता के मना करने पर बच्ची ने कहा, “प्लीज़ मम्मा, ले दो ना. देखो ना कितनी हॉट और सेक्सी लग रही है.” 4 साल की बेटी के मुंह से निकले ऐसे शब्दों ने उसे अंदर तक हिला दिया, लेकिन आज ऐसे शब्द बोलचाल की भाषा मेंे बच्चे बड़ी सहजता से इस्तेमाल कर रहे हैं, भले ही वे इसका अर्थ समझें या न समझें. इतना ही नहीं, वे सेक्स की आधी-अधूरी जानकारी के साथ एक्सपेरिमेंट करने से भी नहीं कतराते. इस बात का खुलासा करते हुए सिनेमा हॉल में टिकट बुकिंग विंडो पर बैठनेवाले महेश कहते हैं, “बच्चे नकली आईडी प्रूफ़ के साथ एडल्ट फ़िल्म आराम से देखते हैं. शक के बावजूद हम कुछ नहीं कर पाते हैं.”
आजकल बच्चियांं मल्लिका व राखी बनना चाहती हैं. मुन्नी-शीला जैसा डांस करना चाहती हैं. छोटे-छोटे लड़कों की पसंद भी मुन्नी-शीला है. आज 4-10 साल की उम्र में ही बच्चे हॉट और सेक्सी की चाहत में सेक्सी कपड़े पहनना चाहते हैं. उत्तेजित क़िस्म के डांस करना चाहते हैं.

मीडिया व मॉडर्न लाइफ़स्टाइल भी ज़िम्मेदार

चाइल्ड सायकोलॉजी की टीचर वंदना उपाध्याय कहती हैं, “बच्चे ये सब कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें अपने आसपास यही सब दिखाई दे रहा है. मीडिया व मॉडर्न लाइफ़स्टाइल उन्हें सिखा रहा है कि सुंदर व सेक्सी दिखने के आगे अन्य गुणों का मोल फीका है. बच्चों को सुपरस्टार बनाने की होड़ में कभी-कभी पैरेंट्स भी अनजाने ही इन चीज़ों को बढ़ावा दे जाते हैं.”
सायकोलॉजिस्ट अरुणेश कुमार का कहना है, “हमारे बच्चों का दिमाग़ पहले से ही इंटरनेट से मिलनेवाली आधी-अधूरी जानकारी से भरा हुआ है. इसके साथ जो दूसरी समस्या जुड़ी है, वो यह है कि हमारे घरों में अभी भी सेक्स जैसे विषय पर बातचीत नहीं की जाती है, तो उन्हें सही ज्ञान या सीमा के बारे में कहां से समझ में आएगा?”
महानगरीय संस्कृति ने भी इन बातों को बढ़ावा दिया है. वर्किंग पैरेंट्स अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं. बच्चे घर से बाहर जाकर मस्ती न करें, इसलिए उन्हें कंप्यूटर और वीडियो गेम थमा देते हैं, ताकि वो घर पर ही एंजॉय कर सकें. उन्हें ़ज़्यादा से ज़्यादा सुविधाएं प्रदान करते हैं. अब बच्चे घर पर रह कर क्या रहे हैं, भला इसका पैरेंट्स को कहां पता होता है? ऐसे में वो इंटरनेट का ग़लत इस्तेमाल भी करने लग जाते हैं.
हालांकि आज बच्चों के साथ किसी बात के लिए जोर-ज़बरदस्ती नहीं की जानी चाहिए. इस तरह उन्हें रोका भी नहीं जा सकता है, लेकिन यह कहकर भी पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता है कि ‘हम क्या करें. बच्चे सुनते ही नहीं हैं, समझना ही नहीं चाहते हैं’ आज ब्लैक एंड व्हाइट का ज़माना नहीं है. बच्चों की दुनिया में रंगीन सपने हैं. अतः उनके सपनों में रंग भरना भी पैरेंट्स की ही ज़िम्मेदारी है. शुरू से उन्हें संतुलित मनोरंजन व अनुशासन की आदत होनी चाहिए और उन्हें जानना चाहिए कि हर चीज़ या हर बात की एक उम्र होती है.
बच्चों के ऐसे व्यवहार के पीछे कई कारण हो सकते हैं. आइए, इनमें से कुछ आम कारणों पर नज़र डालें-
जिज्ञासु प्रवृत्ति- बच्चों में हर बात को जानने की जिज्ञासा होती है. यह उनकी सहज प्रवृत्ति है. वे कहीं कुछ भी होता देखते हैं, तो उसे ख़ुद भी करके देखना चाहते हैं. उनके मन में विपरीत सेक्स के शारीरिक अंगों के प्रति भी जिज्ञासा होती है. यदि इस जिज्ञासा को सही तरी़के से हैंडल न किया गया, तो ये ग़लत मनोभावों को जन्म देती है.
खुलकर बातचीत न होना- हमारे देश में आज भी पैरेंट्स अपने बच्चों से सेक्स के विषय में बात नहीं करते हैं. बच्चा यदि सवाल करता है, तो उसे डांटकर चुप करा दिया जाता है. धीरे-धीरे बच्चे इधर-उधर से आधी-अधूरी जानकारी हासिल करने लगते हैं और ग़लत राह पर भटक जाते हैं. उम्र के साथ उनको सेक्स से संबंधित ज़रूरी जानकारी भी दी जानी चाहिए. बेहतर तो यही है कि पैरेंट्स स्वयं उनसे बात करें और सही ज्ञान दें.
प्राइवेसी व स्पेस- प्राइवेसी ने जहां एक तरफ़ बच्चे को थोड़ा आत्मनिर्भर बनाया है, वहीं दूसरी तरफ़ उन्हें बिगाड़ने में भी कमी नहीं रखी है. 14 वर्षीय राहुल दिनभर अपने कमरे में रहता है. कंप्यूटर जैसी सब सुविधाएं हैं, दोस्त भी आते हैं. गेम्स भी खेलते हैं. एक दिन मम्मी के अचानक प्रवेश करने पर राहुल ने तुरंत टोक दिया, “मम्मी, नॉक करके आया कीजिए.” जब चुपचाप छानबीन की गई, तो ड्रग्स, अश्‍लील साहित्य व अनेक नग्न चित्र मिले. स्पेस व प्राइवेसी आत्मनिर्भता के लिए सही है, लेकिन यह देखना भी ज़रूरी है कि एकांत में बच्चे करते क्या हैं. कहीं वे एकांत का नाजायज़ फ़ायदा तो नहीं उठा रहे हैं.
भावनात्मक जुड़ाव का अभाव- कुछ लोगों का मानना है कि वर्किंग पैरेंट्स बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते, इसलिए बच्चे बिगड़ जाते हैं. ये सच नहीं है. समस्या तब बढ़ती है, जब पैरेंट्स साथ होकर भी भावनात्मक रूप से उनसे जुड़ नहीं पाते हैं, बल्कि उनकी ज़रूरतें पूरी करके और पैसे कमाकर यह समझ लेते हैं कि बच्चों को पूरा प्यार दे रहे हैं. वे साथ खाना तो खाते हैं, लेकिन टीवी देखते हुए. धीरे-धीरे घर में पसरता कम्यूनिकेशन गैप बच्चों को दोस्तों के क़रीब ले आता है. फिर तो सही-ग़लत की दुनिया या आधी-अधूरी जानकारी का रास्ता भी दोस्त ही बनते हैं.
शक्की पैरेंट्स- 15 वर्षीय रोहित अपने मम्मी-पापा के शक्की स्वभाव से परेशान है. कहीं मीडिया में बच्चों के बिगड़ने की कोई ख़बर आई नहीं कि रोहित पर पाबंदियां बढ़ जाती हैं. उसके दोस्तों पर शक किया जाने लगता है. पैरेंट्स ऐसे व्यवहार करते हैं, मानो बच्चे कुछ छुपा रहे हैं. बच्चों को जब महसूस होता है कि पैरेंट्स को उन पर भरोसा नहीं है, तो वो भी उनसे बातें छुपाने लगते हैं. इस तरह बच्चा साथ रहकर भी अकेला हो जाता है और उसके ग़लत रास्ते की ओर बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है.

क्या करें पैरेंट्स?

कम्यूनिकेशन गैप न आने दें- समस्याएं तभी बढ़ती हैं, जब आपसी बातचीत का ज़रिया रुक जाता है और बातें अनकही रह जाती हैं. साथ ही बच्चों से बातचीत करते समय उनकी समस्या को समझने के लिए आपको उनके स्तर पर आना होगा, क्योंकि आप उनकी उम्र के दौर से गुज़र चुके हैं. वो आपकी उम्र की विचार शक्ति तक नहीं पहुंचे हैं.
रिश्तों व संस्कारों की अहमियत समझाएं- बचपन से ही सही व अच्छे संस्कारों के साथ उनकी परवरिश करें. आदर्श माता-पिता बनें, तभी वो सही दृष्टिकोण को अपना सकेंगे और रिश्तों को समझेंगे. उनमें पॉज़िटिव सोच बढ़ेगी और ग़लत हरकतों से दूर रह पाएंगे.
अलग कमरा दें, अलग ज़िंदगी नहीं- यदि सुविधा है और आपने अपने बच्चों को अलग कमरा दिया है, तो शुरू से ही उसके कमरे में आते-जाते रहें. वहां बैठकर बातें करें और पूरी कोशिश करें कि उसकी ज़िंदगी उस कमरे में सिमटकर न रह जाए. अपनी आलमारी अरेंज करते समय उसकी मदद लें और उसके कमरे की साफ़-सफ़ाई में उसकी मदद करें, ताकि आपस में खुलापन बना रहे.
अच्छी क़िताबें पढ़ने की आदत डालें- क़िताबों से बच्चों का परिचय एक वर्ष की उम्र के अंदर ही हो जाना चाहिए. जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगें, उम्र के अनुसार उन्हें अच्छी क़िताबें पढ़ने के लिए दें, ताकि शुरू से अच्छा साहित्य व अच्छी पुस्तकों के प्रति सम्मान बना रहे. अच्छी क़िताबें पढ़ने से तर्क बुद्धि विकसित होती है तथा सही-ग़लत की पहचान समय पर आने लगती है.
पैसे से प्यार को न जोड़ें- प्यार के नाम पर बच्चों की हर सही-ग़लत मांग को पूरा न करें. आप उन्हें समय नहीं दे पा रहे हैं, इस कारण हीनभावना या अपराधबोध मन में मत पालें, क्योंकि आप जो कर रहे हैं, उन्हीं के लिए कर रहे हैं. बच्चों की हर मांग को पूरी करने से पहले देखें कि वो कितनी ज़रूरी है. उसे ख़ुश करने के लिए पैसे मत दें.
दोस्त बनें- बच्चों को हर बात शेयर करने की छूट दें. कई बार पैरेंट्स पूरी बात सुने बिना ही अपनी टिप्पणी या निर्णय दे बैठते हैं. ऐसे में बच्चा अपनी बात शेयर नहीं करना चाहता. बच्चों को समझने के आपके तरी़के सही हो सकते हैं, लेकिन उनकी उम्र और उस उम्र की जिज्ञासा को समझना ज़रूरी है. उनके साथ टीवी प्रोग्राम देखें. साथ डिनर करें. उसके दोस्त बनें. फिर देखिए वो अपनी हर बात आपसे शेयर करने लगेगा.
उपदेश देनेे की बजाय बच्चे की भी सुनें- हमारे यहां बड़े हमेशा बच्चों को उपदेश देते रहते हैं यानी उन्हें समझाते रहते हैं. यदि पिता की उम्र 60 की है और बेटे की 35, तो भी पिता उसे उपदेश देना अपना अधिकार समझते हैं. ऐसा करने से बचें. बच्चों को सही दिशा देने या उनकी ग़लत बातों को जानने के लिए ज़रूरी है कि धैर्य के साथ उन्हें सुना जाए. अपनी बात रखने का उन्हें मौक़ा दिया जाए. हम जितना ज़्यादा बच्चों को सुनेंगे, उतनी अच्छी तरह उनकी मनोवृत्ति समझ पाएंगे व उनके क़दम बहकने से पहले ही उन्हें रोक पाएंगे.

– प्रसून भार्गव

प्ले स्कूल फैशन, ट्रेंड या ज़रूरत?

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ज़माने के साथ-साथ बच्चों की शिक्षा का स्तर और उनके स्कूल जाने की उम्र भी बदल गई है. पहले जहां 5 साल के बाद बच्चा स्कूल में पहला क़दम रखता था, अब वहीं डेढ़-दो साल की छोटी-सी उम्र में ही पैरेंट्स उसे प्ले स्कूल में भेज रहे हैं. आख़िर क्यों कर रहे हैं पैरेंट्स ऐसा?

 

बदलते ट्रेंड ने मटेरियल लाइफ को पूरी तरह बदल दिया है. अच्छा, सबसे अच्छा बनने की चाह में आज माता-पिता ख़ुद के साथ अपने बच्चों को भी रेस में सबसे आगे निकालने के लिए प्रयासरत हैं. तहज़ीब, बात करने का ढंग, पढ़ाई में अव्वल होने के लिए वो अब स्कूल तक के समय का इंतज़ार नहीं कर रहे हैं. डेढ़ साल की उम्र में ही वो अपने बच्चे को प्ले स्कूल में डाल रहे हैं. प्ले स्कूल के बढ़ते फैशन के कारण कई पैरेंट्स दूसरों की देखा-देखी भी अपने बच्चे को प्ले स्कूल में भेजने लगते हैं. क्या प्ले स्कूल वाक़ई बच्चों के लिए फ़ायदेमंद है? आइए, जानने की कोशिश करते हैं.

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फ़ायदे

* सामाजिक बनते हैं

चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट अंशु कुलकर्णी के अनुसार, “स्कूल के पहले प्ले स्कूल में बच्चों का एडमिशन कराने से वो सामाजिक बनते हैं. बहुत से बच्चे ऐसे होते हैं, जो घर के लोगों के अलावा बाहरी लोगों से बात करने में हिचकिचाते हैं. दूसरों से डरते हैं. प्ले स्कूल में जाने से वो दूसरे बच्चों और टीचर के संपर्क में आते हैं, जिससे धीरे-धीरे उनकी हिचक दूर हो जाती है.”

* शेयरिंग

घर में प्यार-दुलार की वजह से बच्चे अपनी चीज़ों के इतने आदी हो जाते हैं कि किसी दूसरे के छूने मात्र से वो रोना या चिल्लाना शुरू कर देते हैं. प्ले स्कूल में एक ही खिलौने से कई बच्चों को खेलते देख और एक ही झूले पर बारी-बारी से दूसरे बच्चों को झूलते देख उनमें समझदारी और शेयरिंग की भावना विकसित होती है.

* स्कूल जाने में मदद

3 साल तक आपके साथ रहने से बच्चे को आपकी और परिवार की आदत हो जाती है. ऐसे में जब पहली बार उसे आप स्कूल के गेट तक छोड़ने जाती हैं, तो वो आपको छोड़ना नहीं चाहता. आपसे दूर जाने पर वो बहुत रोता है. आपकी दशा भी कुछ ऐसी ही होती है. ऐसे में शुरुआत से ही जब बच्चा आपसे कुछ घंटे ही सही, दूर रहने लगता है, तो वो सेपरेशन ब्लू यानी आपसे दूर जाने की बात को आसानी से सह लेता है.

* क्विक लर्नर

कम उम्र में ही प्ले स्कूल में जाने से बच्चे में सीखने की प्रवृत्ति बढ़ती है. टीचर द्वारा सिखाए पोएम को वो बार-बार दोहराता है. इससे उसका आधार मज़बूत होता है. स्कूल जाने के बाद उसे चीज़ों को समझने में आसानी होती है.

* पैरेंट्स भी यूज़ टू होते हैं

फर्स्ट टाइम पैरेंट्स बने कपल्स के लिए स्कूल में बच्चे के एडमिशन से लेकर उसे स्कूल भेजने तक का काम किसी चुनौती से कम नहीं होता. बच्चे के साथ उनके लिए भी ये नया अनुभव होता है. ऐसे में कई बार ख़ुद पैरेंट्स ही बच्चों से दूर जाने पर रोने लगते हैं, तो कई स्कूल सही समय पर नहीं पहुंच पाते. प्ले स्कूल के ज़रिए उन्हें स्कूल के नियम-क़ानून को समझने में मदद मिलती है.

नुक़सान

प्ले स्कूल के बहुत से फ़ायदों के साथ कुछ नुक़सान भी हैं.
  सही माहौल न मिलने की वजह से बच्चा ख़ुद को वहां एडजस्ट नहीं कर पाता और रोता है.
  प्ले स्कूल के बढ़ते क्रेज़ की वजह से कई बार मिडल क्लास फैमिली को न चाहते हुए भी स्कूल के पहले से ही आर्थिक तंगी का तनाव झेलना पड़ता है.
  स्कूलवाली ज़िम्मेदारी प्ले स्कूल से ही पैरेंट्स को उठानी पड़ती है, जैसे- सही समय पर बच्चे को स्कूल छोड़ना, स्कूल थीम के अनुसार उसे ड्रेसअप करना, स्कूल के नियम मानना आदि.
  कम उम्र में ही पैरेंट्स से दूर रहने की आदत बच्चे के कोमल मन को प्रभावित करती है.

होममेकर सुषमा विश्‍वकर्मा की प्ले स्कूल के बारे में अपनी राय है. सुषमा कहती हैं, “प्ले स्कूल एक अच्छा ज़रिया है बच्चों को सोशल बनाने का. मैंने अपनी 2 साल की बेटी आरवी को तब प्ले स्कूल में डाला जब वो डेढ़ साल की थी. प्ले ग्रुप कोई स्कूल नहीं है. वहां बच्चे एंजॉय करते हैं. ख़ुद मैंने भी जाकर देखा है. जिस तरह वहां बच्चों को ट्रीट किया जाता है, वो बहुत अच्छा लगता है. मेरी बेटी वहां जाकर एंजॉय करती है और जब वो लौटते समय अपनी टूटी-फूटी भाषा में कोई पोएम गुनगुनाती है, तो बहुत अच्छा लगता है. प्ले स्कूल जाने की आदत से अब वो स्कूल जाने में मुझे परेशान नहीं करेगी. मेरा एक और बेबी है. इसकी वजह से मैंने अपनी बच्ची को जल्दी ही प्ले स्कूल में डाल दिया, क्योंकि मैं उसको क्वालिटी टाइम नहीं दे पाती थी. दूसरा बेबी नहीं होता तो मैं अपनी बेटी को 2 साल की उम्र में प्ले स्कूल में डालती, लेकिन भेजती ज़रूर.”

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मुंबई में रहनेवाली पेशे से टीचर माला सिंह कहती हैं, “प्ले स्कूल की ज़रूरत मैंने अपने 3 साल के बेटे लक्ष्य के लिए कभी महसूस नहीं की. मुझे ऐसा लगता है कि बच्चों को हम घर में जो कुछ सिखा सकते हैं, वो प्ले स्कूलवाले नहीं सिखाते. शुरुआत के यही तीन साल होते हैं जब पूरा दिन बच्चा परिवार के साथ समय बिताता है. कुछ लोग तो बच्चों से पीछा छुड़ाने के लिए ही उन्हें प्ले स्कूल में डालते हैं. उन्हें ऐसा लगता है कि कुछ समय के लिए ही सही वो बच्चे की ज़िम्मेदारी से दूर रहेंगे.”
क्या ज़रूरी है प्ले स्कूल?
अपने आसपास के लोगों के बच्चे को प्ले स्कूल में जाते देख बहुत से माता-पिता के मन में ये बात आती है कि क्या वाक़ई स्कूल से पहले प्ले स्कूल में दाख़िला करवाना ज़रूरी है? जानकारों की मानें, तो प्ले स्कूल में दाख़िला करवाने का हर माता-पिता का अपना विचार और रुचि है. ज़रूरी नहीं कि स्कूल से पहले प्ले स्कूल में बच्चे को भेजा ही जाए. घर में बच्चे को क्वालिटी टाइम देकर आप उसे वो सारी चीज़ें सिखा सकती हैं, जो बच्चा प्ले स्कूल में सीखता है. अतः सबसे पहले अपनी स्थिति को परख लें. अपनी सुविधानुसार ही कोई निर्णय लें. दबाव में आकर या दूसरों की देखा-देखी में अपने बच्चे को प्ले स्कूल में न भेजें.
– श्‍वेता सिंह

घर को बनाएं किड्स सेफ

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घर वह जगह होती है, जहां बच्चा ख़ुद को सुरक्षित महसूस करता है. लेकिन बच्चे को वह सुरक्षा कैसे उपलब्ध कराई जाए, इसकी सारी ज़िम्मेदारी पैरेंट्स की होती है. उनकी थोड़ी-सी लापरवाही किसी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है. हम यहां पर ऐसी ही कुछ ज़रूरी बातों के बारे में बता रहे हैं, जिन्हें अपनाकर आप अपने घर के हर कोने को बच्चों के लिए सुरक्षित बना सकते हैं.

 

बेडरूम

♦ अगर बच्चा छह साल से छोटा है, तो बेडरूम में बंक बेड रखने की जगह केबिन बेड रखें. बंक बेड की ऊंचाई अधिक होती है और उसमें सीढ़ियां भी होती हैं, जिससे गिरने पर बच्चे को चोट लग सकती है.
♦ बेडरूम में रखे फर्नीचर के लोअर ड्रॉअर्स पर चाइल्डप्रूफ लॉक लगाएं. खुले ड्रॉअर्स में पैर रखकर बच्चे ऊपर चढ़ने की कोशिश करते हैं, जिससे उन्हें चोट लग सकती है.
♦ बेड के ऊपर हैवी शेल्फ या अन्य भारी सामान रखने की जगह न बनाएं.
♦ यदि घर अधिक ऊंचाई पर है, तो खिड़कियों पर ग्रिल ज़रूर लगवाएं.
♦ अगर बेडरूम की खिड़कियां खोलनी हों, तो खिड़कियां ज़्यादा न खोलें. जब भी खिड़कियां खोलनी हों, तो पैरेंट्स बच्चों के साथ रहें.
♦ खिड़कियों पर विंडो सेफ्टी लॉक ज़रूर लगाएं.
♦ एसी, लैंप आदि के वायर्स को ऊपर की ओर लपेटकर रखें.
♦ अक्सर छोटे बच्चों को बिजली के सॉकेट्स में उंगली डालने की बुरी आदत होती है. इसलिए इनको कवर करके रखें.
♦ बेड के ऊपर हैवी पेंटिंग, पिक्चर या आईना न लगाएं.
♦ खिड़की के ठीक नीचे बेड या फर्नीचर नहीं रखें. इनकी सहायता से बच्चे खिड़की पर चढ़ जाते हैं, संतुलन न बनने पर गिरकर उन्हें चोट भी लग सकती है.

किचन

♦ डिशवॉशर का इस्तेमाल करते समय ही उसमें कास्टिक सोडा मिलाएं. कई बार बच्चे डिशवॉशर का दरवाज़ा खोलकर कांच के बर्तन या चाकू आदि से खुद को नुक़सान पहुंचा सकते हैं.
♦ डिशवॉशर का दरवाज़ा हमेशा बंद रखें.
♦ किचन में आग बुझाने वाला यंत्र ज़रूर रखें.
♦ काम ख़त्म होने के बाद गैस को पीछे की ओर खिसकाकर रखें. इसी तरह से खाना बनाने के बाद गरम कुकर-पैन के हैंडल को दाएं-बाएं या पीछे की ओर रखें.
♦ गैस पर स्टोव गार्ड लगाएं, ताकि गरम बर्तन या गैस तक उनका हाथ नहीं पहुंच सके.
♦ खाना बनाने के बाद गैस के नॉब को कवर करके रखें. कई बार बच्चे खेल-खेल में गैस का नॉब ऑन कर देते हैं.
♦ गरम अवन जब तक पूरी तरह से ठंडा न हो जाए, तब तक उसका दरवाज़ा बंद ही रखें.
♦ सिंक के नीचे बने हुए केबिनेट में यदि स्टोर क्लीनिंग प्रोडक्ट्स, जैसे- लिक्विड, सोप आदि रखे हैं, तो केबिनेट पर ताला लगाकर रखें.
♦ किचन का काम ख़त्म होने के बाद किचन काउंटर/स्लैब से मिक्सर, ब्लेंडर आदि बिजली के उपकरणों को हटा दें.
♦ डायनिंग टेबल पर अधिक बड़ा और लंबा मेज़पोश न बिछाएं. बच्चे मेज़पोश को खींचकर उस पर रखे सामान को अपने ऊपर गिरा सकते हैं.
♦ क्रॉकरी, प्लास्टिक बैग्स, नुकीले धारवाले और मसालेवाले ड्रॉअर्स व केबिनेट्स पर ताला लगाकर रखें.
♦ फ्रिज पर लगाए हुए कलरफुल फ्रूट या शेप्स वाले मैगनेट को हटा दें. अनजाने में बच्चे इन्हें मुंह में डाल सकते हैं.

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बाथरूम

♦ नहाते समय बीच-बीच में बच्चों का निरीक्षण करते रहें, उन्हें बाथरूम में अकेला नहीं छोड़ें.
♦ लोअर वॉटर हीटर के थर्मोस्टेट को 120 डिग्री पर रखें. इस तापमान में रखने पर बच्चों को कोई नुक़सान नहीं होता.
♦ बाथरूम में बने शेल्फ और केबिनेट में केमिकल्स, डिटर्जेंट और क्लीनर्स आदि रखे रहते हैं. इन्हें बच्चों की पहुंच से दूर रखें.
♦ सुरक्षा की दृष्टि से इन केबिनेट्स और शेल्फ्स पर ताले लगाकर रखें.
♦ गीज़र, हीटर और लाइट के प्लग और सॉकेट्स को ऊंचाई पर लगाएं, जहां पर बच्चों का हाथ नहीं पहुंच पाए.
♦ गीलेपन के कारण बाथरूम में पैर फिसलने का डर रहता है. इसलिए बाथरूम में नॉन स्लिपिंग टाइल्स लगवाएं या वुडन फ्लोरिंग करवाएं.
♦ नल के नीचे नहाते समय कई बार बच्चों के सिर पर चोट लग जाती है. इसलिए फिटिंग कराते समय नल के मुख पर सॉफ्ट कवर चढ़ाकर रखें. ये कवर बाज़ार में आसानी से मिल जाते हैं.
♦ बाथरूम में रखे डस्टबीन में रेज़र या ब्लेड जैसी ख़तरनाक चीज़ें न फेंकें.
♦ यदि घर में 2 साल से छोटा बच्चा है, तो काम ख़त्म होने के बाद बाथरूम का दरवाज़ा बंद करके रखें.
♦ बाथरूम में पानी की बाल्टी भरकर न रखें.

दरवाज़े और खिड़कियां

♦ अक्सर बच्चेे खिड़कियों व दरवाज़ों पर अपनी उंगलियां फंसा लेते हैं. इसलिए दरवाज़ों और खिड़कियों पर बाई-फोल्ड लॉक लगाएं.
♦ दरवाज़ों पर डोर होल्डर, डोर पिंच गार्ड/फिंगर पिंच गार्ड या स्टॉपर लगवाएं.
♦ यदि घर अधिक ऊंचाई पर है, तो खिड़कियों पर ग्रिल ज़रूर लगाएं.
♦ अगर खिड़कियों पर ग्रिल नहीं है, तो खिड़कियां अधिक न खोलें. खिड़कियां खोलते समय विंडो स्टॉपर लगाना न भूलें.
♦ स्लाइडिंग वाले दरवाज़ों पर स्लाइडिंग डोर फ्लिप लॉक लगाएं.
♦ खिड़कियों पर चढ़ने से बच्चों को अक्सर चोट लग जाती है. इस स्थिति से बचने के लिए खिड़कियों पर विंडो गार्ड या ग्रिल लगाएं.
♦ खिड़की पर लटकने वाली विंडो ब्लांइड कॉर्ड को लपेटकर रखें. खेल-खेल में बच्चे इस कॉर्ड को गले में लपेट लेते हैं.

फर्नीचर सेफ्टी

♦ फोल्डिंग चेयर, टेबल और एक्सरसाइज़ इक्वीपमेंट्स को बच्चों से दूर रखें.
♦ मेज़ और कुर्सियों में नीचे की तरफ़ कोई नुकीली कील या पेच निकला हो, तो उन्हें तुरंत ठीक करवा लें.
♦ ड्रॉअर्स और हैंडल को चेक करें. यदि वे नुकीले हैं, तो उन्हें बदलवा लें. बच्चों को इनसे चोट लग सकती है.
♦ ग्लास टॉपवाला डायनिंग या सेंटर टेबल न ख़रीदें.
♦ स्टिरियो केबिनेट्स, फाइल केबिनेट्स और दूसरे केबिनेट्स पर किड्स सेफ लैच लगाएं.
♦ टीवी और डीवीडी की सुरक्षा के लिए उन पर टीवी गार्ड और डीवीडी गार्ड लगाकर रखें.
♦ लंबे लैंप और रैक को ऐसी जगह पर रखें, जहां पर बच्चों का हाथ न पहुंच पाए.
♦ फर्नीचर और टेबल की नुकीली साइड पर कॉर्नर कुशन रखें, ताकि बच्चों को चोट न लगे.

इलेक्ट्रिकल

♦ घर के हर कमरे में लगे बिजली के सॉकेट्स को कवर करके रखें.
♦ इन सॉकेट्स को कवर करने के लिए आउटलेट प्रोटेक्टर्स मिलते हैं, जिन्हें बच्चे आसानी से नहीं निकाल सकते.
♦ ये आउटलेट प्रोटेक्टर्स आकार में बड़े होते हैं, जिन्हें बच्चे मुंह में नहीं डाल सकते.
♦ लैंप आदि एक्सेसरीज़ के तारों को छोटा ही रखें.
♦ पोर्टेबल हीटर और फैन को ऐसी जगह पर रखें, जहां पर बच्चों का हाथ न पहुंच पाए.
♦ दीवारों पर लटकी हुई वायर और कॉर्ड्स को वायर गार्ड से कवर करके रखें.

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पैरेंट्स के लिए कुछ ज़रूरी बातें

♦  इमर्जेंसी के लिए फर्स्ट एड किट घर में ज़रूर रखें.
♦ सभी इमर्जेंसी फोन नंबर्स और सेफ्टी कॉन्टैक्ट को एक डायरी में लिखकर रखें. आपातकालीन स्थिति में घबराने की बजाय तुरंत अपने एरिया के इमर्जेंसी नंबर्स पर संपर्क करें.

– नागेंद्र शर्मा

बच्चों में टेक एडिक्शन के साइड इफेक्ट्स

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बच्चों में बढ़ता मोबाइल और कंप्यूटर का इस्तेमाल उन्हें स्मार्ट तो बना रहा है, लेकिन इसके अत्यधिक इस्तेमाल से कई नुक़सान भी हो सकते हैं. इसलिए ज़रूरी है बच्चों को टेक एडिक्शन से बचाना.
क्या है टेक एडिक्शन?

टेक्नोलॉजी यानी मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट आज हमारी ज़रूरत बन गए हैं और इस टेक्नोलॉजी ने ज़िंदगी को आसान भी बना दिया है. लेकिन जब यही टेक्नोलॉजी ज़िंदगी की ज़रूरत बन जाए, इतनी ज़्यादा ज़रूरी लगने लगे कि इसके बिना कुछ घंटे बिताना भी मुश्किल हो जाए. ज़्यादातर व़क्त बस मोबाइल या सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ही बीतने लगे, इस वजह से परिवार, रिश्तेदार और सोसायटी से भी कटने लगें, तो समझ जाइए कि आप टेक एडिक्शन का शिकार हो गए हैं.

बच्चे ज़्यादा हो रहे हैं शिकार

हालांकि तय गाइडलाइन के अनुसार 15-16 वर्ष के पहले बच्चों को मोबाइल फोन या कंप्यूटर नहीं देना चाहिए, लेकिन आज की बिज़ी लाइफ की मजबूरी कहें या अपने बच्चों की सुरक्षा की चिंता या बच्चों को टेक्नोफ्रेंडली बनाने की चाहत, पैरेंट्स बहुत ही कम उम्र में बच्चों को मोबाइल-लैपटॉप दे देते हैं और एक बार गैजेट्स हाथ में आ जाएं, तो बच्चे इंटरनेट, ऑनलाइन गेम्स, सोशल नेटवर्किंग को ही अपनी दुनिया बना लेते हैं.
हालांकि टेक एडिक्शन कोई मानसिक बीमारी नहीं है, लेकिन इसके कई साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं. ये साइड इफेक्ट्स सोशल, बिहेवियरल या हेल्थ से संबंधित हो सकते हैं.

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टेक एडिक्शन के साइड इफेक्ट्स
बच्चे को क्लासरूम में भी अक्सर नींद आती है. वो हर व़क्त उनींदा-सा रहता है.
 अपने असाइनमेंट समय पर पूरे नहीं कर पाता.
खान-पान संबंधी उसकी आदतें भी बदल जाती हैं. अब न उसे खाने का ध्यान रहता है, न सोने का.
दोस्तों से मिलने की बजाय कंप्यूटर या मोबाइल पर समय बिताना ज़्यादा पसंद करता है.
कंप्यूटर या वीडियो गेम के बारे में झूठ भी बोलता है.
सोशल होने से कतराता है. फैमिली गेट टुगेदर या आउटडोर स्पोर्ट्स उसे बोरिंग लगने लगते हैं.
अगर ऑनलाइन न हो, तो अजीब-सी बेचैनी और चिड़चिड़ाहट उसके चेहरे पर साफ़ दिखाई देती है.
ऑफलाइन रहने पर भी या तो पहले की ऑनलाइन एक्टिविटीज़ के बारे में सोचता रहता है या फिर ऑनलाइन आने पर क्या करेगा, इसकी प्लानिंग करता रहता है. इसके अलावा टेक एडिक्शन से बच्चे को हेल्थ प्रॉब्लम्स भी हो सकती हैं.
वो ओबेसिटी, हाइपरटेंशन या इनसोमनिया का शिकार हो सकता है.
लगातार स्क्रीन पर देखते रहने से आंखों पर स्ट्रेस पड़ता है. इससे उसकी आंखों की रोशनी बहुत कम उम्र में प्रभावित हो सकती है.
बच्चा कंप्यूटर विज़न सिंड्रोम का शिकार हो सकता है.
लगातार कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल के इस्तेमाल से गर्दन और कंधे में दर्द की शिकायत हो सकती है.
ग़लत पोश्‍चर से कम उम्र में ही कमरदर्द या पीठदर्द भी हो सकता है.
लगातार कीपैड यूज़ करने से उंगलियों और कलाई में दर्द की शिकायत हो सकती है.
मोबाइल हो, कंप्यूटर-लैपटॉप या टीवी- बच्चे हेडफोन यूज़ करते ही हैं. हेडफोन के अधिक इस्तेमाल से सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है. इससे एकाग्रता में भी कमी आती है.
एक सर्वे के अनुसार, 9 से 12 साल के उम्र के 60% स्टूडेंट दिन में लगभग 3 घंटे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बिताते हैं.   3
तो क्या करें पैरेंट्स?

बच्चे को मोबाइल या कंप्यूटर से पूरी तरह दूर रखना मुश्किल है और ऐसा करना भी नहीं चाहिए. इसलिए पैरेंट्स को कुछ ऐसे तरी़के तलाशने होंगे कि वे मोबाइल या कंप्यूटर यूज़ करने पर कंट्रोल कर सकें. इसके लिए पैरेंट्स ये ट्रिक्स ट्राई कर सकते हैं.

बच्चे को मोबाइल, लैपटॉप या कोई और गैजेट्स देने से पहले ही कुछ नियम बना लें और बच्चे से पहले ही कह दें कि उसे इन नियमों का पालन करना ही होगा.
ध्यान रहे, किसी भी चीज़ के लिए एकदम बैन न लगाएं, बल्कि इन गैजेट्स के इस्तेमाल के संबंध में अपने बच्चे के लिए एक समय सीमा निर्धारित करें. एक गाइडलाइन बनाएं और बच्चे को समझाएं कि उनकी सुरक्षा के लिए ये गाइडलाइन ज़रूरी है.
♦ बच्चों को देर रात तक मोबाइल, कंप्यूटर या इंटरनेट पर रहनेे की इजाज़त न दें.
♦ उनकी ऑनलाइन एक्टीविटीज़ और फ्रेंड्स पर नज़र रखें. बच्चे के पासवर्ड, स्क्रीन नेम और अन्य अकाउंट इंफॉर्मेशन की जानकारी रखें.
♦ आजकल कई ऐसे सॉफ्टवेयर और ऐप्स उपलब्ध हैं, जो विभिन्न साइट्स और उनके कंटेन्ट को फिल्टर करते हैं. इन्हें अपने कंप्यूटर और मोबाइल में इंस्टॉल करवाएं, ताकि आपका बच्चा कोई गैरज़रूरी साइट न ओपन कर सके.
उसे इन टेक्नोलॉजी के अधिक इस्तेमाल से होनेवाले नुक़सान के बारे में भी समझाएं. यक़ीन मानिए एक बार उसे समझ आ जाएगा, तो वो सतर्क रहेगा.
आज जबकि दुनिया हाईटेक हो रही है, तो ऐसे में बच्चों को टेक्नोलॉजी से दूर रखना ना तो मुमकिन है और न ही ऐसा करना समझदारी है. ऐसे में पैरेंट्स को ही गाइडलाइन बनानी होगी, बच्चों को टेक एडिक्शन के साइट इफेक्ट्स के बारे में बताना होगा, ताकि बच्चा टेक्नोफ्रेंडली भी बने और उसे किसी तरह का नुक़सान भी न हो.
                                                           

– श्रेया तिवारी

बच्चों को सिखाएं शिष्टाचार

सभी पैरेंट्स चाहते हैं कि लोग उनके बच्चे के व्यवहार से प्रभावित हों, उनकी प्रशंसा करें, मगर बच्चे अक्सर लोगों के सामने ऊटपटांग हरकतें करना शुरू कर देते हैं. उनके व्यवहार के कारण कभी-कभी पैरेंट्स को शर्मिंदा भी होना पड़ता है. इसी शर्मिंदगी से बचने के लिए बच्चों को एटीकेट यानी शिष्टाचार सिखाना बहुत ज़रूरी है.

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इंट्रोडक्शन एटीकेट्स

आपके बच्चों को आपसे बेहतर कोई नहीं सिखा सकता, इसलिए यह पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि वे बच्चों को ये बातें सिखाएं-
अक्सर घर में मेहमान आने पर बच्चे अपने काम या खेल में व्यस्त रहते हैं. उन्हें यह सिखाएं कि जब भी घर पर कोई मिलने आए, तो अपनी जगह पर ही बैठे न रहें, बल्कि खड़े होकर मुस्कुराकर ‘नमस्ते’ से उनका अभिवादन करें.
कुछ बच्चे बड़ों की बातों को सुनते हुए भी अनसुना कर देते हैं, अगर घर पर कोई मेहमान आ रहा है या आप कहीं बाहर जा रहे हैं, तो बच्चों को पहले से ही समझाएं कि वे बड़ों की बातों को ध्यान से सुनें और उसमें रुचि दिखाएं. यह उनके प्रति आदर दिखाने का एक तरीक़ा है.
आजकल घर आनेवाले ज़्यादातर मेहमान छोटे बच्चों से भी हैंडशेक करना पसंद करते हैं. इसलिए आपके बच्चे को हैंडशेक करना आना चाहिए.
हैंडशेक के बाद बच्चे से ‘नाइस टू मीट यू’ या ‘आपसे मिलकर ख़ुशी हुई’ अवश्य कहलवाएं. मेहमान को यह बहुत अच्छा लगेगा और आपके द्वारा दिए गए अच्छे संस्कारों की वे प्रशंसा किए बगैर नहीं रह पाएंगे.
फोन पर किसी से कैसे बात करें, यह भी बच्चे को शुरू से ही सिखाएं. उन्हें बताएं कि जब भी अपने दोस्त के घर फोन करें, तो पहले अपना नाम बताएं. यदि फोन पर कोई बड़ा व्यक्ति हो, तो उन्हें ‘नमस्ते’ कहें और पूछें कि ‘क्या मैं अमुक व्यक्ति से बात कर सकता हूं.’

टॉकिंग एटीकेट्स

‘प्लीज़’ और ‘थैंक यू’ कहने में भले ही दो छोटे लफ़्ज़ हैं, पर ये आपके अच्छे संस्कार दर्शाते हैं. बच्चों को बचपन से ही यह सिखाएं कि जब भी किसी से कुछ मांगें तो ‘प्लीज़’ और जब भी कोई उन्हें कुछ दे, तो ‘थैंक यू’ ज़रूर कहें.
कुछ बच्चे घर में तो ख़ूब बोलते हैं, लेकिन रिश्तेदारों के सामने एकदम चुप्पी साध लेते हैं, जो ठीक नहीं है. इसलिए बच्चों को सिखाएं कि जब भी कोई उनसे पूछे “बेटा कैसे हो?” तो मुस्कुराकर जवाब दें. साथ ही उनसे भी पूछें कि वे कैसे हैं?
जब भी बच्चा अपने दोस्तों के साथ समय बिताने या अन्य किसी काम से उनके घर जाए, तो निकलते व़क्त दोस्त के पैरेंट्स को साथ में समय बिताने, ध्यान रखने और खाने-पीने की चीज़ें देने के लिए ‘धन्यवाद’ अवश्य कहना चाहिए.
बच्चों को यह सिखाना बहुत ज़रूरी है कि जब भी बड़े लोग आपस में बातें कर रहे हों, तो वे बीच में न बोलें.
ग़ुस्से में अक्सर बच्चे अपशब्दों का प्रयोेग करते हैं. ऐसे में पैरेंट्स उन्हें शुरू से ही सिखाएं कि वे गाली-गलौज न करें, क्योंकि उन्हें     गाली-गलौज करते देख दूसरे उनके बारे में ग़लत राय बनाएंगे.
बच्चों को सिखाएं कि जब भी टीचर से बात करें, तो हाथ हमेशा पीछे रखें और सीधे खड़े होकर बात करें. अगर टीचर्स उनकी कोई समस्या सुलझाएं, तो उन्हें ‘थैंक यू’ कहना न भूलें.

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सोशल एटीकेट्स

बच्चों को बचपन से ही सिखाएं कि जब भी छींक या खांसी आ रही हो, तो अपने मुंह पर हाथ या रूमाल रखें. सबके सामने नाक या मुंह में उंगली ना डालें.
अक्सर स्कूल के कार्यक्रम या असेंबली में बच्चे अपने दोस्तों के साथ मिलकर शोर-शराबा करते हैं, उन्हें समझाएं कि ये कार्यक्रम ख़ास उनके लिए ही बहुत मेहनत से तैयार किए जाते हैं, इसलिए ख़ुद भी एंजॉय करें और दूसरों को भी करने दें.
अक्सर शरारती बच्चे कमज़ोर या शांत रहनेवाले बच्चों को डराते हैं या उन्हें टारगेट बनाकर तंग करते हैं. जैसे ही आपको इस बारे में पता चले, तो बच्चों को प्यार से समझाएं कि यह ग़लत है. कभी किसी का मज़ाक न उड़ाएं और न ही बेवजह सताएं.
बचपन से ही बच्चों में दूसरों की मदद करने की आदत डालें. उन्हें सिखाएं कि घर या बाहर जब भी कोई उनसे मदद मांगे, तो मुस्कुराते हुए उनकी मदद करें.
बच्चों को यह सिखाना भी बहुत ज़रूरी है कि जब भी वो किसी के घर जाएं, तो हमेशा दरवाज़े पर ‘दस्तक’ ज़रूर दें. बिना दस्तक दिए या कॉलबेल बजाए किसी के घर में न जाएं.
शेयरिंग बहुत अच्छी आदत है. चाहे घर पर हों या बाहर बच्चों को अपने दोस्तों और दूसरे बच्चों के साथ खिलौने शेयर करने की आदत डालें.
बच्चों को शिष्टाचार सिखाते व़क्त यह भी ध्यान रखें कि आप जो बातें उन्हें सिखा रहे हैं, उन्हें पहले ख़ुद अमल में लाएं, क्योंकि बच्चे देखकर जल्दी सीखते हैं.

ईटिंग एटीकेट्स

बच्चों को सिखाएं कि खाना खाते समय गर्दन के नीचे नैपकिन अवश्य लगाएं. बीच-बीच में मुंह पोंछें. कई बार खाना मुंह पर लग जाता है और पता ही नहीं चलता, जो देखने में बहुत बुरा लगता है. बड़े बच्चे पेपर नैपकिन्स का इस्तेमाल कर सकते हैं.
बच्चों को खाना छोटे-छोटे कौर लेकर धीरे-धीरे चबाकर खाने के लिए कहें. ध्यान रखें कि खाना खाते समय चबाने की आवाज़ न आए और न ही खाना खाते समय वो बात करें.
यदि बच्चे की पसंदवाली खाने की चीज़ें नहीं हैं, तो बच्चे को समझाएं कि उसका इश्यू न बनाएं. इससे पैरेंट्स को शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी.

पार्टी एटीकेट्स

बच्चे पार्टी में अपने दोस्तों के साथ मस्ती करने में इतने खो जाते हैं कि कई बार सारे मैनर्स भूल जाते हैं. दूसरों की बर्थडे पार्टी के गिफ्ट्स उत्सुकतावश खोलकर देखना शुरू कर देते हैं. पार्टी में जाने से पहले उन्हें अच्छी तरह समझाएं कि वहां ऐसा न करें.
कई बार बच्चे शर्म व संकोच के कारण बर्थडे पार्टी में खेले जानेवाले गेम्स में भाग नहीं लेते. बच्चे को वहीं डांटने की बजाय पार्टी में ले जाने से पहले ही उसे बताएं कि ये गेम्स उन्हीं के लिए रखे गए हैं और अगर वे भाग नहीं लेंगे, तो उनके दोस्त को बुरा लगेगा.
यदि आपके घर में बर्थडे पार्टी है, तो बच्चे को मेहमानों के साथ सही व्यवहार का तरीक़ा सिखाएं, यह भी बताएं कि मिलनेवाले गिफ्ट्स सबके सामने न खोलें.
अपनी बर्थडे पार्टी में गिफ्ट मिलने पर ‘थैंक यू’ कहें. यदि आप पार्टी में रिटर्न गिफ्ट दे रहे हैं, तो उस पर ‘थैंक यू’ नोट लगाकर दें. बड़े बच्चे सोशल नेटवर्किंग साइट्स या मैसेजिंग के ज़रिए भी ‘थैंक यू नोट’ भेज सकते हैं. इससे सामनेवाले पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता है.
                                                                                                                                                             – डॉ. सुषमा श्रीराव

पैरेंट्स की 5 ग़लतियां

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बदलती लाइफस्टाइल में बड़ों के साथ ही बच्चे भी तनावग्रस्त होते जा रहे हैं. पढ़ाई की टेंशन और पीयर प्रेशर के साथ ही बच्चों के तनाव का एक कारण पैरेंट्स का प्रेशर भी होता है. बच्चे को ख़ुश और स्ट्रेस फ्री रखने के लिए पैरेंट्स को किन ग़लतियों से बचना चाहिए? बता रही हैं कंचन सिंह.

जरा याद कीजिए अपना बचपन, 4-5 साल की उम्र में आप क्या करते थे? पड़ोस/गली के बच्चों के साथ धमा-चौकड़ी मचाते होंगे, शायद ही आपके माता-पिता छड़ी लेकर होमवर्क करवाने के लिए आपके सिर पर खड़े रहते होंगे… अल्फाबेट्स और पोएम के बारे में भी शायद ही आपको कुछ पता होगा… मगर आजकल के बच्चों को वो सुकून नसीब नहीं है. डेढ़-दो साल की उम्र से ही प्ले स्कूल, फिर नर्सरी, केजी यानी पढ़ाई का सिलसिला शुरू हो जाता है. इतना ही नहीं, इसी उम्र से बाकी बच्चों से बेहतर करने के लिए पैरेंट्स भी उन पर दबाव डालना शुरू कर देते हैं. यदि आप भी ऐसा करते हैं, तो अब ख़ुद को थोड़ा बदलिए और फ़र्क़ देखिए.

मिस्टेक 1- आजकल के पैरेंट्स की सबसे बड़ी ग़लती है बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम न बिताना. कई घरों में तो डिनर टेबल पर भी बच्चे पैरेंट्स के साथ नहीं बैठते, क्योंकि उस व़क्त वो किसी और काम में बिज़ी रहते हैं. ऐसे में माता-पिता को पता ही नहीं चलता कि उनके बच्चे की ज़िंदगी में क्या चल रहा है.
क्या करें? बड़े शहरों व मेट्रो सिटीज़ में कामकाजी होने के चलते पैरेंट्स के पास बच्चों के लिए ज़्यादा व़क्त नहीं रहता. ऐसे में कम से कम डिनर साथ में करने की आदत डालें ताकि खाना खाते समय ही सही, पर आप बच्चे के साथ हों और उससे बातचीत कर सकें. आप बच्चे से जितना ज़्यादा बात करेंगे आपका रिश्ता उतना ही मज़बूत बनेगा और कोई समस्या होने पर बच्चा बेझिझक आपसे बोल सकेगा.

मिस्टेक 2- एग्ज़ाम में अच्छे मार्क्स लाने पर गिफ्ट के रूप में अधिकतर पैरेंट्स बच्चों को मोबाइल, आइपैड या उसकी कोई भी पसंदीदा चीज़ दे देते हैं. ये सुनने में भले ही अच्छा लगे, मगर पैरेंट्स का ये तरीक़ा सही नहीं है. ज़्यादातर पैरेंट्स स़िर्फ मार्क्स देखते हैं, कई बार ऐसा भी होता है कि बच्चे ने तो अपनी तरफ़ से पूरी मेहनत और लगन से पढ़ाई की, मगर अच्छे नंबर नहीं आए. ज़रा सोचिए, ऐेसे में आपके लाड़ले/लाड़ली के दिल पर क्या बीतेगी.
क्या करें? बच्चे ने जो हासिल किया उसके लिए उपहार देने की बजाय लक्ष्य को पाने के लिए उसके द्वारा की गई मेहनत की तारीफ़ करें और उसका हौसला बढ़ाएं. भले ही वो अपने लक्ष्य में सौ फीसदी सफल न रहा हो, मगर उसने अपनी तरफ़ से कोशिश तो की. अतः अगली बार उसे उसकी कोशिश के लिए इनाम दें, न कि रिज़ल्ट के लिए.

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मिस्टेक 3- अक्सर पैरेंट्स अपने बच्चे की तुलना उसके दोस्तों या भाई-बहन से करते हैं. उन्हें लगता है कि ऐसा करके वो बच्चे को बेहतर करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, मगर इसका उल्टा असर होता है. बार-बार ऐसा करने पर बच्चे को लगता है कि उसकी कोई अहमियत नहीं है और वो ख़ुद को अयोग्य समझने लगता है.
क्या करें? हर बच्चा अलग होता है और हर किसी की अपनी क्षमता/योग्यता होती है. पैरेंट्स होने के नाते आपको उसकी क्षमताओं का ध्यान रखते हुए उसे प्रोत्साहित करना चाहिए. साथ ही उसे इस बात का भी एहसास कराएं कि वो जैसा भी है. आपके लिए सबसे ख़ास है. दूसरों से उसकी तुलना करने की आदत छोड़ दीजिए.

मिस्टेक 4- घर और ऑफिस के काम के बाद आप भी थोड़ा रिलैक्स होकर ख़ुद को रिचार्ज करते होंगे यानी अपना कोई पसंदीदा काम, जैसे- म्यूज़िक सुनना, गेम खेलना, बुक पढ़ना आदि. इससे आप फ्रेश महसूस करते हैं और दोबारा नई ऊर्जा के साथ काम कर पाते हैं. इसी तरह बच्चों को भी ख़ुद को रिचार्ज करने के लिए थोड़ा खाली समय चाहिए, जिसमें स्कूल/ट्यूशन के होमवर्क से अलग वो अपना मनपसंद काम कर सकें. वैसे आजकल के बच्चों के पास समय की बहुत कमी है, क्योंकि स्कूल/ट्यूशन से आने के बाद वो अपने गैजेट्स में बिज़ी हो जाते हैं. अतः पैरेंट्स को हमेशा बच्चे के पीछे नहीं पड़ना चाहिए.
क्या करें? हर पैरेंट्स की ये ज़िम्मेदारी है कि बच्चे की बाकी ज़रूरतों का ध्यान रखने के साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि उनके लाड़ले/लाड़ली को हर रोज़ थोड़ा समय उनके मनमुताबिक काम के लिए भी मिलना चाहिए. इस खाली समय में वो चाहें तो बाहर खेलने जाएं, म्यूज़िक सुनें या फिर दोस्तों के साथ टाइम पास करें. यदि आपको लगे कि बच्चा तनाव की वजह से ठीक से सो नहीं पा रहा है, तो सोने के क़रीब एक घंटे पहले से ही उसे मोबाइल, लैपटॉप, आइपैड आदि से दूर रहने को कहें. गैजेट्स के ज़्यादा इस्तेमाल से बच्चों की नींद और सेहत प्रभावित होती है, ये बात कई रिसर्च से भी साबित हो चुकी है.

मिस्टेक 5- एग्ज़ाम पीरियड में बच्चों का तनावग्रस्त होना आम बात है, मगर तनाव का असर यदि उनके व्यवहार पर बहुत ज़्यादा और लंबे समय तक दिखने लगे, तो इसका मतलब है कि आपका बच्चा उस सिच्युएशन से अच्छी तरह डील नहीं कर पा रहा है. स्ट्रेस के कारण बच्चे बहुत थके हुए दिखते हैं, खाना नहीं खाते, उदास और रोने जैसी शक्ल बनाए रहते हैं. साथ ही उन्हें सिरदर्द की भी शिकायत हो सकती है. अतः पैरेंट्स को इन संकेतों को नज़रअंदाज़ करने की ग़लती नहीं करनी चाहिए.
क्या करें? बच्चे को समझाएं कि एग्ज़ाम उनकी ज़िंदगी का एक हिस्सा है, पूरी ज़िंदगी नहीं. यदि वो अच्छे ग्रेड नहीं ला पाते, तो इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. अगली बार वो फिर कोशिश कर सकते हैं या उनके पास और भी विकल्प रहेंगे. अतः एग्ज़ाम की तैयारी रिलैक्स होकर करें, तनाव लेकर नहीं. यदि समस्या ज़्यादा गंभीर लगे तो काउंसलर की मदद लें.

 

कैसे सुधारें बच्चों की हैंडराइटिंग?

कंप्यूटर के बढ़ते इस्तेमाल ने न स़िर्फ बच्चों की हैंडराइटिंग बिगाड़ दी है, बल्कि लिखने के प्रति उनकी दिलचस्पी भी कम कर दी है. अगर आप भी अपने बच्चे की ख़राब हैंडराइटिंग से परेशान हैं तो आपकी परेशानी दूर करने के लिए हमने जुटाए हैं हैंडराइटिंग सुधारने के कुछ यूज़़फुल टिप्स.

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कंप्यूटर और एसएमएस के बढ़ते चलन के कारण हैंडराइटिंग की अहमियत कम हो गई है. आजकल के बच्चों को हाथ से लिखने की बजाय कंप्यूटर पर टाइप करना ज़्यादा आसान और मॉडर्न लगता है. यही वजह है कि हैंडराइटिंग सुधारने की तरफ़ न तो बच्चे ध्यान देते हैं और न ही टीचर्स इस दिशा में प्रयास करने की ज़हमत उठाते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि भविष्य में सफल होने के लिए हैंडराइटिंग अच्छी होनी बहुत ज़रूरी है. आइए, अच्छी हैंडराइटिंग की आवश्यकता और उसे सुधारने के तरीक़ों पर एक नज़र डालते हैं.

 

क्यों ज़रूरी है अच्छी हैंडराइटिंग?

आमतौर पर बच्चे हैंडराइटिंग की तरफ़ ध्यान नहीं देते. उन्हें लगता है कि पढ़ाई में अच्छा परफ़ॉर्म करने के लिए हैंडराइटिंग का सुंदर होना उतना ज़रूरी नहीं है, लेकिन उनकी ये सोच तब ग़लत साबित हो जाती है जब परीक्षा में सारे सही जवाब लिखने के बावजूद गंदी लिखावट के कारण उन्हें कम मार्क्स मिलते हैं. लिखावट ख़राब होने के कारण टीचर्स उनके पेपर्स ठीक से पढ़ नहीं पाते, जिसके कारण जवाब सही होते हुए भी उन्हें कम मार्क्स मिलते हैं. अतः लिखावट का सुंदर और स्पष्ट होना बेहद ज़रूरी है. अगर आप भी अपने बच्चे की ख़राब हैंडराइटिंग को उसकी सफलता की राह का रोड़ा नहीं बनने देना चाहती हैं, तो हैंडराइटिंग सुधारने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखें.

स्टडी टेबल की ऊंचाई सही होः बच्चे के स्टडी टेबल की ऊंचाई सही होनी चाहिए. टेबल इतनी ऊंची होनी चाहिए, जिस पर बच्चा आराम से कोहनियां टिका कर लिख सके. साथ ही कुर्सी भी ऐसी होनी चाहिए, जिस पर बैठने पर बच्चे के पैर आसानी से ज़मीन तक पहुंच जाएं.

 

पेंसिल ग्रिपः बच्चे को पेंसिल पकड़ने का सही तरीक़ा बताएं. ग़लत तरी़के से पेंसिल पकड़ने से लिखने में कठिनाई होती है और लिखावट भी बिगड़ जाती है. बच्चे को पेंसिल अंगूठे और दूसरी उंगली के बीच में रखकर पेंसिल के ऊपरी भाग को पक़ड़कर लिखना सिखाएं. इस तरह से पेंसिल पकड़ने से बच्चे को लिखने में आसानी होगी.

 

न्यू स्टाइलः अगर आप अपने बच्चे को अलग-अलग तरह की राइटिंग स्टाइल सिखाना चाहती हैं, तो बच्चे के सामने उस स्टाइल का मॉडल होना ज़रूरी है. इसके लिए नोटबुक के हर पन्ने पर एक-एक अल्फ़ाबेट लिखकर बच्चे को प्रैक्टिस करने को कहें. ऐसा करने से वह नई स्टाइल आसानी से सीख पाएगा.

 

पहला पाठः छोटे बच्चे को लिखना सिखाने के लिए डेस्कटॉप व्हाइट बोर्ड व मार्कर का इस्तेमाल करें. बोर्ड पर कुछ लिखकर बच्चे को बताएं कि लेटर किस तरह से शुरू किया जाता है और किस तरह से स्ट्रोक बनाए जाते हैं? बच्चे को तब तक इस लेटर की कॉपी करने दें जब तक वह इसे सही ढंग से लिखना नहीं सीख जाता. एक बार जब बच्चा बोर्ड पर लिखना सीख जाए तो उसे पेपर पर लाइन के बीच में लिखना सिखाएं. अपनी निगरानी में उससे प्रैक्टिस करवाएं और उसकी हैंडराइटिंग पर ध्यान दें. अच्छा लिखने पर बच्चे की तारीफ़ करें, इससे उसका उत्साह बढ़ेगा और वो ़ज़्यादा अच्छी हैंडराइटिंग में लिखने की कोशिश करेगा.

 

राइटिंग प्रोजेक्ट्स

राइटिंग प्रोजेक्ट्स देकर भी बच्चे को हैंडराइटिंग सुधारने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है. आप उसे निम्न प्रॉजेक्ट्स दे सकती हैं.

– दोस्त को लेटर लिखने के लिए कहें.

– फैंसी पेपर पर कविता लिखने के लिए कहें और उसे दीवार पर लटकाएं.

– कोई कविता कॉपी करने के लिए कहें और इसे पोइट्री बुलेटिन बोर्ड या बच्चे की नोटबुक में रखें.

– अलग-अलग तरह के कार्ड बनाने के लिए प्रोत्साहित करें.

– ड्रॉइंग बनाकर उसका शीर्षक लिखने के लिए कहें.

 

अच्छी हैंडराइटिंग के लिए स्मार्ट टिप्स

 

– बिना कट-पिट किए लिखने की कोशिश करें, ओवर राइट न करें. अगर कुछ ग़लत हो गया है तो उसे स़िर्फ एक सिंगल लाइन से क्रॉस करें.

– सभी अक्षर एक ही लाइन में लिखें.

– सभी लेटर एक जैसे होने चाहिए. इस बात का भी ध्यान रखें कि कुछ लेटर सीधे और कुछ झुके हुए न हों.

– शब्दों के बीच कितनी जगह छोड़नी है, इसका भी ध्यान रखें.

– नया पैराग्राफ़ शुरू करने से पहले दो उंगली का गैप छोड़ें.

 

आपके बच्चे की लिखावट उसके व्यक्तित्व को दर्शाती है

हैंडराइटिंग को राइटिंग ऑफ़ ब्रेन कहा जाता है, क्योंकि इसके ज़रिए ही हैंडराइटिंग विशेषज्ञ लिखने वाले व्यक्ति के मन की भावनाओं को जान पाते हैं. हर व्यक्ति के लिखने का ढंग अलग होता है, जैसे- अक्षरों की बनावट, स्पीड, प्रेशर में अंतर आदि. इन्हीं बातों पर ग़ौर करके व्यक्ति का स्वभाव व व्यक्तित्व जाना जा सकता है.