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बचपन से किशोवस्था की तरफ़ बढ़ते बच्चों की अपनी एक अलग ही दुनिया होती है. यह दुनिया उनके ख़्वाबों, चाहतों, पसंद-नापसंद, शरारतों व सीक्रेट्स से बनी होती है, जिसमें किसी की घुसपैठ उन्हें पसंद नहीं. ज़्यादातर लोगों के लिए यह दुनिया एक रहस्य के समान होती है, पर हमारे लिए नहीं, क्योंकि उनके सीक्रेट्स जानने के लिए हमने की उनसे कुछ ख़ास बातें. टीनएजर्स की इसी रहस्यमयी दुनिया से हम आपको करा रहे हैं रू-ब-रू, ताकि आप भी जान सकें उनके ख़ास सीक्रेट्स.

* एक बार मैंने बिना पापा की परमिशन के उनकी बाइक चलाई और एक छोटा-सा एक्सीडेंट हो गया. बाइक थोड़ी-सी डैमेज हो गई. पर घर में मैंने बताया कि बाइक मुझे इस हालात में पार्किंग लॉट में पड़ी मिली.

* जिस दिन मेरा स्कूल जाने का मन नहीं होता, उस रात मैं अलार्म बंद कर देता हूं और सुबह उठकर अलार्म न बजने का बहाना बना देता हूं.

* जब भी मुझे किसी पार्टी या मूवी के लिए जाना होता है, तो झूठ बोल देता हूं कि मैं दोस्त के घर पढ़ने या प्रोजेक्ट के काम से जा रहा हूं.

* घर पहुंचने से पहले मैं अपने मोबाइल फोन से कुछ मैसेजेज़ व कॉल हिस्ट्री डिलीट कर देता हूं, ताकि पैरेंट्स के टेंशनवाले सवालों से बच सकूं.

* मुझे सर्दियों में नहाना बिल्कुल पसंद नहीं, इसलिए सर्दियों में अक्सर मैं बाथरूम में जाकर बालों को गीला करके, हाथ-पैर व मुंह धो लेता हूं, थोड़ा डियोड्रेंट लगाता हूं और बाहर आकर कहता हूं कि पानी बहुत ठंडा था.

* मैं और मेरे कई दोस्त अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पार्ट टाइम जॉब करते हैं. पर हमने इस बारे में अपने पैरेंट्स को नहीं बताया, क्योंकि हम नहीं चाहते कि पॉकेटमनी कम हो जाए.

* कभी-कभी जब मम्मी मुझे बाज़ार से कुछ ख़रीदने के लिए पैसे देती हैं, तो मैं अक्सर थोड़े पैसे बचाकर रख लेता हूं. घर आकर मम्मी को बोल देता हूं कि चीज़ों के दाम तो आसमान छूने लगे हैं.

* मम्मी मुझे रोज़ाना बस का किराया देती हैं, पर बस से जाने की बजाय मैं पैदल जाता हूं, ताकि उन पैसों से अपना फेवरेट स्नैक्स ख़रीद सकूं.

* एक बार स्कूल में मोबाइल यूज़ करते व़क्त टीचर ने मुझे देख लिया और मोबाइल छीन लिया. घर पर मैंने बताया कि मोबाइल अचानक से ख़राब हो गया, तो मैंने रिपेयर के लिए दिया है.

* मेरे पैरेंट्स को मेरे कुछ दोस्त पसंद नहीं, इसलिए वे उनसे दूर रहने के लिए कहते हैं. मैं उनके मोबाइल नंबर सेव करने की बजाय याद कर लेता हूं, ताकि जब भी वे कॉल करें, मेरे फोन में उनका नाम न दिखे.

* जब भी हमें स्कूल-कॉलेज में हाफ डे मिलता है, तो हम घरवालों को बिना बताए, कहीं घूमने चले जाते हैं और ठीक समय पर घर पहुंच जाते हैं. हमारे पैरेंट्स को कभी इस बारे में शक भी नहीं हुआ.

* जब भी हमारे फ्रेंड सर्कल में किसी के पैरेंट्स शहर से बाहर जाते हैं, तो हम सारी सहेलियां मिलकर उसके घर पर रातभर पार्टी करते हैं. घर पर हम बता देते हैं कि कंबाइन प्रोजेक्ट पर काम करना है.

* कभी-कभी हम दोस्त मिलकर पैसे जमा करते हैं और एडल्ट मैग्ज़ीन ख़रीदकर देखते हैं.

* इस साल कुछ दिनों के लिए मुझे स्कूल से सस्पेंड कर दिया गया, पर मैंने घर पर नहीं बताया और रोज़ स्कूल जाने का नाटक करता रहा. स्कूलवाले घर पर फोन नहीं कर पाए, क्योंकि हमारे फोन ख़राब थे, पर उन्होंने लेटर भेजा, जो क़िस्मत से मेरे ही हाथ लगा और मैंने उसे फाड़कर फेंक दिया.

– सत्येन्द्र सिंह

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कहते हैं बिन रोये मां भी शिशु को दूध नहीं पिलाती. पर जब बच्चा थोड़ा बड़ा होने लगता है, तो वे ये जानने लगती हैं कि बच्चा क्यों रो रहा है. भूख की वजह से या पेट दर्द की वजह से. और थोड़ा बड़ा होने पर वह जानने लगती हैं कि वाक़ई पेट दर्द हो रहा है या स्कूल जाने के नाम से पेट दर्द हो रहा है. स्कूल जाने का समय निकल जाने पर पेट दर्द छू मंतर हो जायेगा. कभी ट्यूशन न जाने के लिए कोई बहाना है.

तू सब जानती है कह देना तो आसान है पर मां सब कभी नहीं समझ पाती क्योंकि किसी भी मन के भीतर क्या उमड़-घुमड़ रहा है भला कब जाना जा सकता है. अनजाने में ही हम बच्चों की उम्र की परवाह किये बिना उनसे बड़ी उम्मीदें करने लगते हैं और उनकी भावनाओं को समझ नहीं पाते हैं. हम बच्चों से बहुत बड़ी आशाएं करते हैं. अपने सपनों को उनके माध्यम से पूरा करने के अरमानों के चलते उसे समझ ही नहीं पाते हैं. हमसे कब भूल होती है. हम समझदारी के बहाने नासमझी करते हैं, ये जानने के लिए कई बार अपने ही व्यवहार का मूल्यांकन करना भी ज़रूरी होता है.
साइकोलॉजिस्टों का यह कहना कि अक्सर यह देखा जाता है कि ग़लती बच्चे के व्यवहार में नहीं बल्कि मां-बाप के व्यवहार में होती है वे ही अपने विचार, अपने स्टाइल उन पर थोपने की कोशिशों में उसे समझ नहीं पाते.

बहुत छोटी उम्र और बहुत बड़ी उम्मीदें

एक बार मेरी एक मित्र अपनी तीन साल की बेटी को ऑफिस लेकर आयी. मैंने उसे खाने के लिए बिस्कुट दिये. बड़े कांपते हाथों से उसने बिस्कुट लिया. खा ही रही थी कि मां ने डांटना शुरू किया. हाथ गंदे कर रही हो. मुंह साफ़ करो, क्यों खा रही हो. ब्रेकफास्ट करके आयी थी. डांट की एक लम्बी लिस्ट थी. उसने बिस्कुट खाना छोड़ दिया पर मेरे पुचकारने और मां को उसे कुछ न कहने की हिदायत पर उस दुबली-सी लड़की ने एक दो नहीं चार-पांच बिस्कुट खाये. उसका चेहरा अब तृप्त था पर सहमा हुआ. मैंने महसूस किया कि उस नन्हीं-सी जान को मां सुपर किड बनाना चाहती है. नन्हें कृष्ण गोपाल चेहरे पर इधर-उधर मक्खन लगे ही अच्छे लगते हैं. उन्हें पहले खाने तो दें फिर साफ-सफाई भी हो जायेगी. बहुत छोटी उम्र, खाना कपड़ों पर न गिरे, हाथ मुंह गंदे न हो खाना कपड़ों पर ही नहीं ज़मीन पर भी न बिखरे ऐसा भला क्या संभव है. उस उम्र से इतनी उम्मीदें न रखें. यदि ऐसी उम्मीदें रखेंगी तो लगेगा कि कहना नहीं मान रहा. उसकी उम्र को ज़रा समझने की कोशिश करें.

रोना-कभी नहीं रोना

गाने में भले ही यह गाना अच्छा लगे कि कभी नहीं रोना पर बच्चे रोते ही हैं. बच्चे क्या सभी रोते हैं. जब तकलीफ़ हो तो आंसू बाहर निकल जाए तो हर्ज़ ही क्या है. पर प्रश्न यह उठता है कि कोई बच्चा क्यों रो रहा है. उसका कारण क्या जानने की कोशिश की या उसे बहानेबाज समझ कर उसके रोने को यूं ही टाल दिया जाये.
* बहुत छोटा बेबी ज़रूरी नहीं कि इसलिए रो रहा हो कि उसे गोद में उठाया जाये. हो सकता है जो फैंसी ड्रेस आपने पहनायी हो उसका कोई पिन उसे चुभ रहा हो या फिर जूता तकलीफ़ दे रहा है.
* ये माना कि बच्चे रोकर अपनी ज़िद मनवा लेते हैं, पर हो सकता है कि उसकी ज़िद, ज़िद न हो और आप कभी भी उसकी बात तब तक न मानती हो जब तक वह रोता न हो.
* बच्चा स्कूल जाते समय रोता है. पढ़ना नहीं चाहता यह ज़रूरी नहीं हो सकता है कि स्कूल में टीचर डांटती हो, कोई दूसरा बच्चा तंग करता हो उसका सामान छीन लेता हो या किसी से उसका झगड़ा हो गया हो.
* कुछ बड़ी उम्र या किशोर वय का बच्चा मूड स्विंग्स के चलते तनावग्रस्त होकर छोटी-छोटी बातों से खीझ रहा है. ये भी सकता है कि चाइल्ड एब्यूज़ का शिकार हुआ हो. उसके रोेने के कारणों को आप नहीं समझेंगी तो कौन समझेगा?

बच्चे को बच्चा ही बना रहने दें

हमारे एक परिचित की बेटी सात वर्ष की उम्र में ही पूरा घर संभालती थी. घर ही नहीं दो जुड़वा छोटे भाईयों को भी वही संभालती थी. मेहमानबाजी भी उसी तरह करती थी जैसे घर की स्त्री करती है. उसके इस व्यवहार को मैं कभी सराहा नहीं सकी, क्योंकि उसकी मां ने उसका बचपन उससे स़िर्फ इसलिए छीन लिया कि तीन बच्चों की परवरिश और घर ऑफिस की जिम्मेदारी वे अकेले कैसे संभालती! जिस उम्र में बच्चे दूसरे बच्चों के साथ मिलकर धमाल मचाते हैं, सोफों पर कूदते हैं, पिलो एक-दूसरे को मारते हैं, सारे घर में इधर-उधर रेलगाड़ी बनाते घूमते हैं उस उम्र में उन्हें सब सामान क़रीने से रखने की उम्मीद करना, मेहमानों की आवभगत करना आना उसे चाय भी बनानी आनी चाहिए और दाल-चपाती भी, तो यह कुछ जल्दी ही चाह रही हैं. यकीं जाने की ये सब उम्र के साथ ही आ जाता है. मौज़-मस्ती के साल बहुत कम होते हैं. उसके बाद तो हर व़क़्त कोचिंग के चक्कर रहेंगे. उन्हें व़क़्त से पहले बड़ा बनाने की ये नाहक कोशिश न करें तो बच्चे भी सुखी होंगे और आप भी उनकी मस्ती एन्जॉय करेंगी.

बच्चा बिल्कुल नहीं सुनता

* सारा दिन शरारत और स़िर्फ शरारत यही बात तो आपको खिझाती है, पर शरारत भी नहीं करता और फिर भी कोई बात नहीं सुनता. इतना बदतमीज़, इतना ज़िद्दी कह देना आसान है, पर कभी यह सोचा कि हो सकता है उसकी लिसनिंग स्किल अपनी उम्र के मुताबिक़ विकसित न हुए हों.

* उसके कान में हियरिंग की प्राब्लम हो.

* उसका पढ़ने में मन नहीं लगता.

हो सकता है कि लर्निंग डिसएबिलिटी हो.

बच्चा हायपर एक्टिव हो सकता है या किसी अन्य बीमारी का शिकार, जिसे आप समझ नहीं पा रही हों.

* हायपर एक्टिव बच्चा यदि खाने की टेबल पर आने से पहले अपने कमरे की दीवार पर बॉल मारने की अंधाधुंध प्रैक्टिस किये जा रहा है, तो समझें कि उसकी एनर्जी को कहीं चैनलाइज करने की ज़रूरत है.

बच्चा ज़रूरत से ज़्यादा चुपचाप रहता है

* यह ज़रूरी नहीं संगत बिगड़ गयी हो.

* हो सकता है कि उसके किसी ख़ास दोस्त के परिवार में कुछ तकलीफ़ हो, जिसे वह आपसे शेयर नहीं करना चाहता.

* हो सकता है कि उसने आप पति-पत्नी को लड़ते या अंतरंग स्थिति में देखा हो.

* आपकी ज़िंदगी में चल रहे तनाव परेशानियों की वजह से भी कई बच्चे ख़ामोश रहने लगते हैं.

* यही नहीं पेपर ख़राब हो गया है या सहेली से तक़रार हो गया हो उसके उस ख़राब मूड की वजह तो आपको तलाशनी होगी.

* उससे संवाद आपको करना है. यदि कम्युनिकेशन नहीं कर पा रही हैं तो अपनी कोशिश जारी रखें.

आप चाहती हैं कि वे आपकी आवश्यकताएं आपका मूड समझें

* होना तो यह चाहिए कि आप समझें कि बच्चे क्या चाहते हैं.

* वे कब किस बात से परेशान है उनके बोले बिना आप समझ जाएं.

* उनका मूड क्यों उखड़ा है.

* वे क्यों खीझ रहे हैं, आप को समझना चाहिए. पर आप यह चाहती हैं कि वो आपको समझें.

* आपके ऑफ़िस में कोई प्रॉब्लम चल रही है और आप उन्हें डांट रही हैं और अपनी बेवजह डांट को उचित ठहराना चाहती हैं कि उन्हें समझना चाहिए कि मां-बाप के ऑफ़िस में प्रॉब्लम है इसलिए घूमने नहीं ले जा रहे हैं.

* आप अपनी तकलीफों से इतनी आक्रांत है कि बच्चे से उम्मीद कर रही हैं कि वे आपको समझें.
* घर में बर्तन वाली, सफाई वाली नहीं आयी आप सुबह से काम में उलझी हैं, सुबह से उठकर काम कर रही हैं और चाह रही हैं कि बेटी बिस्तर से उठकर आये और काम में हाथ बंटाये.

* उसको काम करना सिखाया नहीं, पर अब अचानक उससे उम्मीद रख खीझ रही हैं.

* पहले उन्हें अपनी तकलीफ़ की जानकारी दें फिर उम्मीद रखें पर आप तो उल्टा कर रही हैं.

बच्चों की आलोचना मत करें- प्रशंसा करें

* बच्चे हैं और उन्हें सही ग़लत की पहचान नहीं है और जब बड़े अपनी गलतियों से सीखते हैं तो बच्चे क्यों नहीं.

* पर आप उन्हें उनकी ग़लतियों को लेकर हर व़क़्त डांटती हैं और एक ही ग़लती का ताना हर बार देती हैं.

* उनकी ग़लती पर गुस्सा न हों, बल्कि प्यार से समझायें.

* यदि बार-बार समझाने पर भी न समझें तो ही डांटे.

* उनकी किसी ग़लती को उनके व्यवहार का रूप न बना डालें कि वह ऐसे ही करता है.

* हर व़क़्त की आलोचना उसे हठी बना सकती है. इसमें कोई दो राय नहीं है.

* जहां आलोचना उसे हठी बनाने के साथ उसका आत्मविश्वास को कमजोर करती है वह तिरस्कार महसूस करता है.

* वहीं प्यार के दो बोल उसकी प्रशंसा उसका मनोबल बढ़ाती है.
* कभी आपने यह सोचा है कि उसकी ग़लती पर आलोचना तो करती हैं, पर क्या अच्छा करने पर प्रशंसा भी करती हैं.

* यदि नहीं तो उसकी प्रशंसा किया करें.

* आपके कहे हर शब्द की बच्चों के लिए अहमियत होती है.

पर उपदेश कुशल बहुतेरेे

* जी हां उन्हें ईमानदारी, सच्चाई, न झगड़ने, दिन रात पढ़ने, सारा दिन टीवी देखने, कम्प्यूटर पर गेम खेलने जैसी एक लम्बी फेहरिस्त पर अमल करने से पहले उन पर स्वयं अमल करें.

* बच्चे जो देखते हैं वे उस पर अमल स्वतः करते हैं.

* आप बड़े-बुजुर्गों की इ़ज़्ज़त करती हैं, स्वयं पुस्तकें पढ़ती हैं.

* सारा दिन टीवी सीरियल में नहीं उलझी रहती हैं, तो वैसा व्यवहार वे भी सीख जाते हैं.
* आप उसे बहुत छोटी उम्र में वो उम्मीदें रख रही हैं, जो आपके व्यवहार में न हो.

* उसे दरवाज़े पर दस्तक देकर आपके कमरे में आना चाहिए.

* उसे आप पति-पत्नी बात कर रहे हों या आप किसी से बातचीत में व्यस्त हों,तो उसे आपको डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए.

* चार-पांच साल के बच्चे से यह बहुत बड़ी डिमांड है. आप उसे डांटकर ये जतलाना चाहती हैं कि उसे गुडमैनर्स नहीं है, जो सही नहीं है.

* उसे धीरे-धीरे अच्छी मैनर्स सिखायें, ताकि वे उन्हें सहजता से सीख पाए.

उनका इंकार करना

* उसने किसी काम को करने से मना कर दिया, आप यही सोचती हैं न कि निकम्मा है, आलसी है, कहना नहीं सुनता.

* हो सकता है कि वह उस समय तकलीफ़ में हो. उसका पेट दर्द कर रहा हो, हो सकता है या स्कूल में किसी व्यवहार से दुखी हो, इस प्रकार प्रतिक्रिया दे रहा हो.

* यह भी हो सकता है कि आपके व्यवहार को कॉपी कर रहा है.

* आप भी तो उसकी किसी भी फ़रमाइश को पूरी तरह सुने बिना पहले मना कर देती हैं.

* आपका हर वाक्य ‘नो’ से ही तो शुरू होता है.

* बच्चे के हर ज़़ज़्बात को समझ नहीं पा रही हैं, इसलिए अपनी पेरेंटिंग को दोष न दें और न ही अपराधबोध महसूस करें.

* बच्चा कोई व्यवहार क्यों कर रहा है उसका दोष ढूंढने से पहले अपने व्यवहार का विश्लेषण यदि करेंगी, तो पायेंगी कि ग़लती कई बार अपनी ही व्यवहार में हो रही होती है.

* पर समझदारी भी इसी में है कि अपने को सुधारते हुए उसको सुधारते चलें और मां बिना कहे ही सब समझ जाती है यह विश्वास पक्का हो जाए.

– कृष्णा रानी

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आज के पढ़े-लिखे मॉडर्न पैरेंट्स भले ही अपने बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखने का दावा करें, लेकिन सेक्स जैसे मुद्दे पर बच्चों के साथ बात करते हुए उनकी ज़ुबान लड़खड़ाने लगती है. बच्चे के सेक्स से जुड़े किसी भी सवाल का जवाब देने में वो आज भी हिचकिचाते हैं. सेक्स जैसे ज़रूरी मुद्दे पर अपने बच्चों से बात करते हुए क्यों झिझकते हैं पैरेंट्स? 

टैबू है सेक्स

मॉडर्न होने का दंभ भरने वाले आज के शिक्षित अभिभावक भी बच्चों के मुंह से सेक्स शब्द सुनकर झेप जाते हैं. एक जानी मानी मीडिया ग्रुप से जुड़ी कविता कहती हैं, “मेरे 10 साल के बेटे ने जब अखबार में छपे सेक्स शब्द को देखकर पूछा ‘मम्मा, SEX का क्या मतलब है?’ तो मैं सन्न रह गई. मुझे समझ नहीं आया कि उसके सवाल का मैं क्या जवाब दूं.” हमारे देश में ज़्यादातर पैरेंट्स का हाल कविता जैसा ही है, वो अपने बच्चे के साथ दोस्ताना व्यवहार तो रखते हैं, लेकिन जब बात सेक्स की आती है, तो बच्चे को समझाने की बजाय उसके सवाल को टाल जाते हैं. ऐसे में वो इंटरनेट व दोस्तों के ज़रिए अपनी जिज्ञासा शांत करने की कोशिश करता है, जिसका ज़्यादातर नकारात्मक असर ही देखने को मिलता है, क्योंकि इन स्रोतों से सही व पूरी नहीं, बल्कि अधकचरी जानकारी ही मिलती है.
अपनी सेक्स जिज्ञासा को शांत करने के लिए टीनएजर्स बेझिझक यौन संबंध बना रहे हैं, जिससे न स़िर्फ उनका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य, बल्कि करियर भी प्रभावित होता है. साइकोलॉजिस्ट कीर्ति बक्षी के मुताबिक, “सेक्स को टैबू की बजाय नैचुरल चीज़ की तरह पेश करके, सहजता से बात करके, रियल-अनरियल सेक्स यानी नैचुरल सेक्स और पोर्नोग्राफ़ी का फ़र्क समझाकर बच्चों को अपराध की राह पर चलने से रोका जा सकता है.”

क्यों झेंपते हैं पैरेंट्स?
साइकोलॉजिस्ट प्रमिला श्रीमंगलम् पैरेंट्स की झिझक की वजह उनकी सोच को मानती हैं. उनके मुताबिक, “सोच के अलावा डर, शर्मिंदगी का एहसास, नैतिक मूल्य और संस्कार भी खुले तौर पर पैरेंट्स को बच्चों से सेक्स संबंधी मुद्दे पर बात करने से रोकते हैं.फफ दरअसल, हमारा समाज और परवरिश का माहौल ही ऐसा है जहां सेक्स जैसे शब्द को हमेशा परदे के पीछे रखा गया है. यही वजह है कि पैरेंट्स चाहते हुए भी इस मुद्दे पर बच्चे से खुलकर बात नहीं कर पाते.”
सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. राजीव आनंद की भी कुछ ऐसी ही राय है. उनके अनुसार, “पैरेंट्स जिस माहौल में पले-बढ़े और शिक्षित हुए हैं, वहां सेक्स को हमेशा एक बुरी चीज़ के रूप में पेश किया गया है. सेक्स का मतलब स्त्री और पुरुष के बीच का अंतरंग संबंध… इसी सोच के चलते अभिभावक बच्चों के साथ इस बारे में बात करने में असहज महसूस करते हैं.”

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समय की मांग है सही सेक्स एज्युकेशन
दिनोंदिन सेक्स संबंधी अपराधों में बच्चों, ख़ासकर टीनएजर्स की बढ़ती भागीदारी न स़िर्फ पैरेंट्स, बल्कि पूरे समाज के लिए ख़तरे की घंटी है. ऐसे में सेक्स एज्युकेशन के ज़रिए ही बच्चों को सही-ग़लत का फ़र्क समझाया जा सकता है. डॉ. आनंद कहते हैं, “आज के दौर में जहां एक्सपोज़र और ऑपोज़िट सेक्स के साथ इंटरेक्शन बहुत ज़्यादा बढ़ गया है, ऐसे में टीनएजर्स को सेक्स के बारे में सही जानकारी होनी ज़रूरी है. बढ़ती उम्र के साथ टीनएजर्स की उत्तेजना और फैंटेसी भी बढ़ने लगती है, लेकिन उन्हें इस पर क़ाबू रखना नहीं आता, जो सेक्स एज्युकेशन से ही संभव है. सेक्स एज्युकेशन को स़िर्फ अंतरंग संबंधों से जोड़कर ही नहीं देखा जाना चाहिए.”

बदलाव की ज़रूरत
आमतौर पर पैरेंट्स ये तो चाहते हैं कि उनके बच्चे को सेक्स के बारे में सही जानकारी मिले, लेकिन ख़ुद इस मुद्दे पर वे बात नहीं करते. ज़्यादातर पैरेंट्स सेक्स को शादी के बाद वाली चीज़ के रूप में देखते हैं, लेकिन उन्हें अपनी इस सोच में बदलाव लाना होगा और कपड़ों के साथ ही अपने विचारों को भी मॉडर्न बनाकर एक दोस्त की तरह बच्चे को उसके शारीरिक अंगों और उनके विकास के बारे में जानकारी देनी होगी. इतना ही नहीं, उन्हेें ये भी बताएं कि कोई यदि उन्हें ग़लत तरी़के से छूता है, तो उसका विरोध करें या तुरंत स्कूल/घर में उसकी शिकायत करें. आजकल न स़िर्फ बाहर, बल्कि घर की चहारदीवारी में भी रिश्तेदारों द्वारा बच्चों के शोषण के कई मामले सामने आए हैं. बहुत- से मामलों में तो बच्चे समझ ही नहीं पाते कि उनके साथ कुछ ग़लत हो रहा है.

मीडिया एक्सपोज़र से बहकते क़दम
डॉ. आनंद के मुताबिक, “टीवी सीरियल, फ़िल्में, मैगज़ीन, फैशन शो आदि में जिस तरह खुलेआम अश्‍लीलता परोसी जा रही है, बच्चों का उनसे प्रभावित होना लाज़मी है. इन सब माध्यमों की वजह से वे उम्र से पहले ही बहुत कुछ जान लेते हैं और परदे पर दिखाई गई चीज़ों को असल ज़िंदगी में करने की कोशिश में ग़लत राह पर चल पड़ते हैं. इसके लिए बहुत हद तक पैरेंट्स भी ज़िम्मेदार हैं, उनके द्वारा इस मुद्दे पर बात न किए जाने के कारण बच्चे उत्सुकतावश या उतावलेपन में सेक्स अपराधों में लिप्त हो जाते हैं.”

सेक्सुअली एक्टिव होते बच्चे
कई अध्ययनों से ये बात साबित हो चुकी है कि आजकल 10-11 साल की उम्र में ही बच्चों में प्युबर्टी पीरियड शुरू हो जाता है. साइकोलॉजिस्ट प्रमिला श्रीमंगलम् कहती हैं, “बदलती लाइफ़स्टाइल के कारण बच्चे वक़्त से पहले बड़े हो रहे हैं और इस दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव उन्हें सेक्स के प्रति उत्तेजित कर देते हैं. ऐसे में सही जानकारी के अभाव में और पैरेंट्स द्वारा नज़रअंदाज़ किए जाने पर बच्चे अपनी उत्सुकता शांत करने के लिए इंटरनेट, सोशल साइट्स, पब, फ़िल्म व दोस्तों का सहारा लेते हैं, जिसका नतीजा सेक्सुअल एक्सपेरिमेंट्स के रूप में सामने आता है.”

कैसे करें बात?
ये सच है कि भारतीय पैरेंट्स के लिए बच्चों से सेक्स संबंधी मुद्दे पर बात करना आसान नहीं, लेकिन आप अगर अपने बच्चे की भलाई चाहते हैं, तो झिझक व संकोच छोड़कर आपको इस मामले पर बात करनी ही होगी. साइकोलॉजिस्ट प्रमिला श्रीमंगलम् कहती हैं, “पैरेंट्स को अपने और बच्चों के बीच के संवाद के पुल को मज़बूत बनाए रखना चाहिए और जब बच्चा सेक्स से जुड़े सवाल करने लगे, तो टालकर उसकी उत्सुकता बढ़ाने की बजाय सहजता से उसके सवालों का जवाब दें. बच्चे से नज़रें मिलाकर बात करें और ज़रूरत पड़े तो उसे सेक्स से जुड़ी कुछ अच्छी किताबें लाकर दें, ताकि उसे सही जानकारी मिले. सेक्स एज्युकेशन से बच्चों को न स़िर्फ अपने शारीरिक विकास के बारे में पता चलेगा, बल्कि सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ और अनवांटेड प्रेग्नेंसी (अनचाहा गर्भ) के बारे में भी पता चलेगा, जो उन्हें ग़लत रास्ते पर जाने से रोकेगी. वैसे कई स्कूलों में सेक्स एज्युकेशन का टॉपिक कवर किया गया है, लेकिन प्युबर्टी और सेक्सुअल डेवलपमेंट के बारे में बच्चों को बताने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी पैरेंट्स की ही है.”

डॉ. राजीव आनंद कहते हैं, “पैरेंट्स को बच्चों के सामने स्त्री/परुष के शारीरिक अंगों के बारे में गंदे और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और न ही उसे मज़ाक या उत्सुकता का विषय बनाना चाहिए. बच्चे को उसकी उम्र और समझ के मुताबिक बॉडी पार्ट्स और उनकी अहमियत समझानी चाहिए. साथ ही अभिभावकों को ये भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे को कब, क्या और कितना बताना है.”
बहरहाल, ये साफ़ है कि आज के दौर में अपने बच्चे की बेहतरी के लिए पैरेंट्स को झिझक छोड़कर सेक्स एज्युकेशन के लिए पहल करनी ही होगी.

 

– कंचन सिंह

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बच्चों की परवरिश में शुरुआती वर्ष बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. जन्म के साथ ही व्यवहार व संस्कारों के प्रति माता-पिता यदि सचेत रहें और कोशिश करें कि बच्चे बड़े-बुज़ुर्गों की छत्रछाया में अच्छे संस्कार, अच्छा व्यवहार व अच्छी आदतों का पालन करना सीखें, तो इसमें कोई दो राय नहीं कि आगे चलकर वे एक बेहतर इंसान बनेंगे.

 

चाइल्ड सायकोलॉजिस्ट व एक्सपर्ट्स की राय में शुरुआत के वर्षों में शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक विकास की प्रक्रिया तीव्र होती है. बच्चा जो कुछ भी इन वर्षों में देखता, सुनता या समझता है, उसका प्रभाव आजीवन बना रहता है. वैसे भी व्यक्ति के निजी स्वभाव में कुछ जन्मजात प्रवृत्तियां शामिल होती हैं और कुछ वातावरण का प्रभाव होता है. बच्चों को समझने के लिए इन दोनों पर ध्यान देना ज़रूरी है, अन्यथा हम अपने ही बच्चों को अनजाने में हानि पहुंचा सकते हैं, जिसका नकारात्मक प्रभाव उनके भविष्य को ग़लत मोड़ दे सकता है.

कई बार बच्चों के ग़लत व्यवहार के कारण माता-पिता परेशान भी होते हैं और शर्मिन्दा भी, किंतु यदि बच्चों के व्यवहार पर ग़ौर किया जाए, तो निश्‍चय ही बच्चे के क्रोध, चिड़चिड़ेपन या मिसबिहेव करने के पीछे कोई ऐसा कारण सामने आएगा, जिसे या तो हम समझ ही नहीं पाए हैं या अनदेखा कर बैठे हैं. ये कारण बहुत ही मामूली और मासूम से हो सकते हैं, जैसे –

भूख- ज़रूरी नहीं है कि भूख स़िर्फ खाना खाने की हो. कभी-कभी किसी विशेष आहार की कमी या अधिकता के कारण भी बच्चा चिड़चिड़ा हो सकता है और परेशान कर सकता है, ताकि वो आपका ध्यान आकर्षित कर सके. भूख के अलावा प्यास के कारण भी बच्चों का ध्यान भटकता है और उनकी एकाग्रता टूटने लगती है.

थकान- स्कूल से लौटने पर उन्हें खिला-पिलाकर या तो हम चाहते हैं कि बच्चा होमवर्क करने बैठ जाए या खेलने जाए, जबकि बच्चा अगर थका है, तो हो सकता है कि वो स़िर्फ बैठना या बात करना चाहता हो. एक के बाद एक एक्टिविटी भी बच्चे को थका देती है. हर समय पैरेंट्स के मन मुताबिक कुछ न कुछ करते रहने से भी बच्चे ऊब जाते हैं और पलटकर जवाब देना या काम को टालना शुरू कर देते हैं.

निराशा- किसी बात से दुखी-निराश होने पर भी बच्चे का व्यवहार प्रतिकूल होने लगता है. शरीर में कहीं दर्द या मानसिक डर, पैरेंट्स से दूर होना, पैरेंट्स का किया हुआ वादा तोड़ना, उनकी ज़रूरतों को न समझना, ज़रूरत के समय पैरेंट्स का साथ न मिल पाना आदि बातें बच्चों को निराश करती हैं.

उपेक्षा- छोटे भाई-बहन के कारण, मेहमानों के कारण, किसी नए उपकरण के कारण या अन्य किसी भी वजह से यदि आप व्यस्त हो जाते हैं, तो बच्चा उपेक्षित महसूस करता है अथवा उसके किसी क्रिएशन पर आपका ध्यान न गया हो या जब वो आपसे कुछ शेयर करना चाहता हो और आप व्यस्त हों, वो आपके साथ बैठना चाहता हो और आप फोन पर बातें करने में बिज़ी हों, तो वो ख़ुद को उपेक्षित महसूस करता है. अक्सर देखा गया है कि जब मां फोन पर बात करती है, तो उस समय बच्चा मां का अटेंशन पाने के लिए कुछ ऐसा कर बैठता है कि वो बात नहीं कर पाती है. बच्चे हर समय माता-पिता का ध्यान ख़ुद पर चाहते हैं. न मिलने पर वो निगेटिव बिहेवियर करने लगते हैं, ताकि आप किसी भी तरह रिएक्ट करें और उसे आपका अटेंशन मिले.

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विभिन्न स्थितियों में बच्चों को कैसे हैंडल करें?
ग़लत व्यवहार को नज़रअंदाज़ करें- यदि बच्चा तीन वर्ष से कम उम्र का है और उसने आपका ध्यान आकर्षित करने के लिए रोने की आदत बना ली है, तो उसके रोने पर ध्यान न दें. हां, ज़रूरत इस बात को समझने की भी है कि रोना किस कारण से है. साथ ही शांतिपूर्वक व्यवहार दर्शाने पर प्रशंसा करना न भूलें. धीरे-धीरे बच्चा पॉज़ीटिव व निगेटिव व्यवहार के अंतर को समझने लगता है.

ध्यान हटाएं- जिस चीज़ के लिए बच्चा ज़िद कर रहा है, उससे उसका ध्यान हटाने के लिए किसी दूसरी मज़ेदार वस्तु के प्रति उसे आकर्षित करें या बात ऐसे बदलें कि वो रोना-चिल्लाना भूलकर बहल जाए, लेकिन आजकल ङ्गचिड़िया ले गईफ या ङ्गचंदा मामा लाएगाफ जैसी बातें निरर्थक हैं, क्योंकि बच्चे काफ़ी स्मार्ट हैं.

प्रतिक्रिया बदलें- तीन साल से बड़ी उम्र के बच्चों के लिए उपेक्षा करना या ध्यान हटाने जैसी क्रियाएं बेमानी हो जाती हैं. बेहतर होगा, उनसे बात करें. उनकी बात बिना रोक-टोक के सुनें और फिर अपनी प्रतिक्रिया उसके अनुरूप बदलें. सही-ग़लत के अंतर को समझाएं. हां, बात करते समय सही शब्दों के चुनाव व सही तरीक़ा अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें.

सलाह दें- किसी बड़े-बुज़ुर्ग के पास जाकर शिकायत करने के बाद कभी-कभी बच्चे अच्छा महसूस करते हैं और उनसे समाधान भी चाहते हैं, लेकिन कई बार पैरेंट्स की प्रतिक्रिया विपरीत होती है, जैसे- ङ्गक्या बार-बार शिकायत करने आ जाते हो, आपस में निबट लो.फ ऐसा न कहें, क्योंकि वो आपसे सलाह व समाधान चाहते हैं.

शेयर करना सिखाएं- शेयर करना एक महत्वपूर्ण सामाजिक गुण है. इस गुण के साथ बच्चे छोटे-बड़े, भाई-बहन व दोस्तों के साथ गेम्स या अपने खिलौनों को शेयर करके एंजॉय कर सकते हैं. ऐसी बातों के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें और उनकी प्रशंसा भी करें.

हट जाना सिखाएं- जब बच्चों के बीच झगड़ा बढ़ता हुआ लगे, तो उन्हें बताएं कि ऐसी स्थिति में वहां से चुपचाप हट जाना झगड़े को शांत करने का एक अच्छा तरीक़ा है. बुलीज़ के साथ डील करने का सबसे अच्छा तरीक़ा यही है. सामने रहकर तर्क-वितर्क करने से बेहतर है, वहां से
चले जाना.

पिटाई न करें- इस विषय पर दो राय हो सकती है. कुछ पैरेंट्स को लगता है कि सुधारने या अनुशासित करने के लिए पिटाई ज़रूरी है, क्योंकि ये पिटाई उनके भले के लिए ही तो होती है, लेकिन मुख्य बात तो ये है कि पिटाई करके आप बच्चे को मारना सिखा रहे हैं. वो अपने ही छोटे भाई-बहनों या दोस्तों पर हाथ उठाने में झिझकेगा नहीं. साथ ही हिंसा व क्रोध को भी ग़लत नहीं समझेगा.

धैर्य रखें- यदि मेहमानों के सामने या सार्वजनिक स्थानों पर बच्चा मिसबिहेव करने लगे, तो शांत रहें. धैर्य से काम लें. उसे समझाने की कोशिश करें, फिर भी वो न माने, तो वहां से बच्चे को हटा दें. किसी भी स्थिति में चिल्लाना या मार-पीट उचित नहीं.

सम्मान दें- बच्चों के साथ हमेशा बड़ों जैसा ही व्यवहार किया जाना चाहिए. बच्चे भी चाहते हैं कि उनसे अच्छी तरह बात की जाए, उन्हें महत्वपूर्ण समझा जाए, इसलिए उनसे संबंधित बातों में उनकी राय ली जा सकती है.

– प्रसून भार्गव

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परवरिश के लिए ज़रूरी है अच्छा माहौल
बच्चे के व्यवहार और सोच पर उसकी परवरिश का बहुत असर पड़ता है. बच्चे की परवरिश जिस माहौल में होती है उसका असर उसके भविष्य पर भी पड़ता है.

अगर शुरुआत से ही बच्चे को प्रोत्साहन मिलता है, तो वह आत्मविश्‍वासी बनता है.

यदि बच्चा अपने माता-पिता को बहुत कुछ सहते हुए देखता है, तो उनकी सहनशीलता देखकर वह धैर्य रखना सीखता है.
अगर शुरू से बच्चा तारी़फें पाता है, तो बड़े होकर वह दूसरों की प्रशंसा करना सीखता है.
यदि बच्चा अपने घर व आसपास ईमानदारी देखता है, तो वह सच्चाई सीखता है.
अगर बच्चा सुरक्षित माहौल में रहता है, तो वह ख़ुद पर और दूसरों पर भरोसा करना सीखता है.

अगर बचपन से ही उसे आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है, तो वह भी दूसरों की निंदा करना सीखता है.
यदि बच्चा बचपन से घर में लड़ाई-झगड़े देखता है तो वो भी लड़ना सीख जाता है.
अगर छोटी उम्र से ही उसे किसी तरह के डर का सामना करना पड़ता है, तो बड़े होने पर वो हमेशा आशंकित या चिंतित रहता है.
यदि घर और बाहर हमेशा उसका मज़ाक उड़ाया जाता है, तो वह शर्मीला व संकोची बन जाता है.
अगर बच्चे की परवरिश ऐसे माहौल में हुई हो जहां उसे जलन की भावना का सामना करना पड़ा हो, तो बड़ा होने पर वो दुश्मनी सीखता है.

पैरेंट्स के लिए ज़रूरी बातें
बच्चे को अच्छा इंसान बनाने के लिए माता-पिता को कुछ बातों पर अमल करना चाहिए, जैसे-
यदि आप चाहते हैं कि बच्चा आपका और दूसरों का सम्मान करे, तो पहले बच्चे को सम्मान दें.
अपने लाड़ले/लाड़ली पर विश्‍वास करें.
बच्चे को अनुशासित बनाने के लिए कुछ नियम ज़रूर बनाएं, लेकिन वो ऐसे न हों जिन्हें बदलने की गुंजाइश न रहे.
पैरेंट्स बच्चों को सिखाते हैं, साथ ही वे बच्चों से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं.
बच्चे के आत्मविश्‍वास की रक्षा करें. उसे हर वो काम करने की स्वीकृति दें जिससे उसका आत्मविश्‍वास बढ़ता हो.
बड़ा होने पर उसे ये ख़ुद तय करने दें कि आगे उसे क्या करना है. उस पर अपने सपने और उम्मीदें न थोपें.
बच्चे को प्यार की अहमियत समझाएं. जब भी मौक़ा मिले उसे गले लगाएं और बताएं कि आप उसे कितना प्यार करते हैं. इससे वह दूसरों से प्यार करना सीखता है.
जब भी बच्चा आपके सामने आए, तो आपकी आंखों में ख़ुशी दिखनी चाहिए, परेशानी या उदासी नहीं.
यदि आप चाहते हैं कि बच्चा चीज़ों की क़द्र करे, तो उसे सिखाएं कि जीवन में जो भी मिलता है उसके लिए वह ईश्‍वर का शुक्रगुज़ार रहे.
– नलिनी एस.
Parenting Tips
वजहें चाहे जो भी हों, लेकिन इन दिनों अधिकतर कपल्स एक ही बच्चा पैदा करने में भरोसा रखने लगे हैं और इस बदलते परिवेश में ‘ओनली चाइल्ड-लोनली चाइल्ड’ वाली कहावत भी अब पूरी तरह सही नहीं बैठती. अकेले बच्चे को किस तरह दी जा सकती है अच्छी परवरिश, आइए जानें.

 

एज्युकेटेड और करियर को लेकर सचेत रहनेवाले कपल्स की संख्या जैसे-जैसे बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे परिवार और छोटे होते जा रहे हैं. कभी ‘हम दो हमारे दो’ का हिट स्लोगन अब ‘हम दो हमारा एक’ तक आ पहुंचा है. समय, जगह या पैसों की कमी… वजहें चाहे जो हों, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि एक ही बच्चा पैदा करने वाले कपल्स की संख्या अब तेज़ी से बढ़ रही है. बच्चों की परवरिश वैसे ही बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है, उस पर जब एक ही बच्चा हो तो यह ज़िम्मेदारी और ख़ास बन जाती है कि उसे किस तरह सही परवरिश मिले.

अपना नज़रिया बदलें

यदि आप इकलौते बच्चे के पैरेंट्स हैं, तो सबसे पहले अपना नज़रिया बदलें और मन में किसी भी तरह की हीनभावना न पालें. अकेला बच्चा होने के सकारात्मक पहलुओं पर ग़ौर करें, जैसे- यदि दो या अधिक बच्चे होते, तो आपको उनके साथ भी क्वालिटी टाइम बिताना होता, लेकिन चूंकि वो अकेला है, इसलिए आप अपना सारा व़क़्त उसके साथ बिताकर पैरेंटिंग का पूरा लुत्फ़ उठा सकते हैं. आपके पास उपलब्ध सभी साधनों का इस्तेमाल आप बच्चे को ज़िम्मेदार नागरिक बनाने में कर सकते हैं आदि. आपकी सोच सकारात्मक होगी तो बच्चे को कभी अकेलापन महसूस नहीं होगा और यक़ीनन उसकी परवरिश करना आपके लिए आसान होगा.

बच्चे को पूरा समय दें

बच्चे की अच्छी परवरिश के लिए उसके साथ समय बिताएं. केवल अच्छे-अच्छे उपहार देने भर से आपकी ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं हो जाती. माना आप अपने करियर की वजह से ही परिवार नहीं बढ़ा रहे हैं, लेकिन अपने बच्चे को सही-ग़लत की जानकारी देना भी आपकी ही ज़िम्मेदारी है और इसके लिए आपको उसके साथ समय बिताना ही होगा. समय न दे पाने की जगह यदि आप पॉकेटमनी, उसके जन्मदिन पर फैंसी बर्थडे पार्टी या ग़िफ़्ट दे कर अपनी ज़िम्मेदारी से बचेंगे तो बच्चे को ग़लत संदेश मिलेगा. यदि आपके ऑफ़िस आवर्स ज़्यादा हैं तो घर के कामों के लिए कोई हेल्पर रखें और ऑफ़िस के बाद का अधिकांश समय बच्चे के साथ ही बिताएं.

बच्चे को व्यस्त रखें

अकेले बच्चे अक्सर बोर होने लगते हैं और बोरियत दूर करने के लिए अमूमन उन्हें टीवी, वीडियो गेम या इंटरनेट आदि का चस्का लग जाता है. इससे उनकी सेहत को नुक़सान पहुंचता है और उनके विकास पर भी नकारात्मक असर पड़ता है. अतः बच्चे को किसी रचनात्मक कार्य में व्यस्त रखें. आजकल सभी शहरों में बच्चों के लिए क्रिएटिव क्लासेज़ उपलब्ध हैं. बच्चे की रुचि के अनुसार आप उसे इन क्लासेज़ में भेज सकते हैं. क्लास का समय वह चुनें, जब आप ऑफ़िस में रहते हों, ताकि आपकी ग़ैरमौजूदगी में बच्चा रचनात्मक कार्य में लगा रहे और ऑफ़िस से लौटने के बाद तो आप उसके साथ होंगे ही.

मनोरंजन का ख़्याल रखें

बच्चे के मनोरंजन का पूरा ख़्याल रखें. टीवी, इंटरनेट, खेल-कूद और क़िताबें सभी बच्चों का भरपूर मनोरंजन करते हैं. बस, ज़रूरत है कि आप उन्हें इस तरह ग्रूम करें कि वे टीवी, इंटरनेट या वीडियो गेम जैसे मनोरंजन के साधनों का कम और खेल-कूद व क़िताबों का ज़्यादा उपयोग करें. अकेले बच्चों का क़िताबों से बेहतर कोई साथी नहीं हो सकता और उनमें क़िताबों के प्रति रुचि जगाना भी आसान है, लेकिन इसकी शुरुआत तभी कर दें, जब वे छोटे हों.

रिश्ते निभाना सिखाएं

अधिकतर अकेले बच्चे रिश्तों को निभाने में थोड़ा पीछे रह जाते हैं. अतः आप शुरू से ही उन्हें रिश्तों की जानकारी दें, उन्हें फ्रेंड्स बनाने को प्रोत्साहित करें और दोस्तों तथा दोस्ती का महत्व भी बताएं. अकेले बच्चों को दूसरों के साथ अपना सामान शेयर करना भी पसंद नहीं होता, लेकिन यदि आप रोल मॉडल बन कर उन्हें सिखाएंगे तो वे आसानी से अपनी चीज़ों को शेयर करना सीख जाएंगे.

ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान न दें

बच्चा इकलौता हो तो स्वाभाविक रूप से पैरेंट्स उस पर ज़्यादा ध्यान देने लगते हैं, ख़ासतौर पर तब, जब मां होममेकर हो. इससे बचने लिए ज़रूरी है कि ऐसी मांएं केवल बच्चों की ओर ही नहीं, बल्कि अपनी हॉबीज़ की ओर भी ध्यान दें. यदि पूरे व़क़्त बच्चे पर ध्यान दिया जाए तो उसके व्यक्तित्व का समग्र विकास नहीं हो पाता. अतः पैरेंट्स को अकेले बच्चे पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान देने से बचना चाहिए.

– ऊषा गुप्ता

 

Gadget Addiction
हाईटेक होते ज़माने में जहां हर चीज़ मोबाइल ऐप पर उपलब्ध होती जा रही है, ऐसे में बच्चों को गैजेट्स से दूर रखना क्या सही है? आज के दौर में हम बच्चों को गैजेट्स से पूरी तरह दूर तो नहीं रख सकते, मगर इनके इस्तेमाल की समयसीमा ज़रूर तय कर सकते हैं. बच्चों में गैजेट एडिक्शन कितना सही या ग़लत है? बता रही हैं प्राची भारद्वाज.

माता-पिता की जागरूकता के बावजूद आज दो साल के बच्चे भी टच स्क्रीन फोन चलाना, स्वाइप करना, लॉक खोलना और कैमरे पर फोटो खींचना जानते हैं. एक नए शोध (82 प्रश्‍नावली के आधार पर) के अनुसार, 87% अभिभावक प्रतिदिन औसतन 15 मिनट अपने बच्चों को स्मार्टफोन खेलने के लिए देते हैं, जबकि 62% ने बताया कि वे अपने बच्चों के लिए ऐप्स डाउनलोड करते हैं. स्मार्टफोन के मालिक हर 10 में से 9 अभिभावकों ने बताया कि उनके नन्हें-मुन्ने फोन स्वाइप करना जानते हैं, 10 में से 5 ने बताया कि उनके बच्चे फोन को अनलॉक कर सकते हैं, जबकि कुछ अभिभावकों ने माना कि उनके बच्चे फोन के अन्य फीचर भी ढूंढ़ते हैं. मनोवैज्ञानिकों की मानें, तो पिछले 3 वर्षों में तकनीक पर आश्रित लोगों की संख्या 30 गुना बढ़ गयी है.

गैजेट के अधिक इस्तेमाल से सेहत पर असर

माइकल कोहेन ग्रुप द्वारा किए गए शोध से पता चला कि टीनएजर्स गैजेट्स से खेलना ज़्यादा पसंद करते हैं. गैजेट्स लेकर दिनभर बैठे रहने के कारण उनमें मोटापे की समस्या बढ़ रही है. साथ ही आईपैड, लैपटॉप, मोबाइल आदि पर बिज़ी रहने के कारण वो समय पर सो भी नहीं पाते, जिससे उन्हें शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है. गैजेट के अधिक इस्तेमाल से बच्चों में व्यग्रता, उत्कंठा, अवसाद, आत्मकेंद्रित, मनोरोग व अन्य समस्याएं हो रही हैं.

कुछ फ़ायदे भी हैं

बच्चे विकिपीडिया, गूगल, स्मार्ट वॉइस असिस्टेंट इत्यादि से महत्वूर्ण जानकारी हासिल कर सकते हैं. कुछ स्कूलों में तो छोटी क्लास से ही टैबलेट इस्तेमाल किया जाने लगा है. ऐसे ही एक स्कूल की टीचर आशिका भाटिया कहती हैं, “टैबलेट की मदद से बच्चे रंग, आकार, नए शब्दों या अंकों को आसानी से पहचानते हैं और ख़ुशी से सीखते हैं, लेकिन इसका इस्तेमाल समयसीमा में ही होना चाहिए.” कुछ ऐसा ही कहना है गुड़गांव में क्लीनिक चलाने वाली डॉ. सोनल का. उनके मुताबिक़, बदलते व़क्त में गैजेट में बिज़ी रहने के कारण बच्चे घर में ही रहते हैं, जिससे माता-पिता को उनकी सुरक्षा की चिंता नहीं होती. बस, ज़रूरत है तो गैजेट के इस्तेमाल की समयसीमा तय करने की.

क्या हो समय सीमा?

अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स की स्टडी के मुताबिक़, दो वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी तरह की स्क्रीन से दूर रखना चाहिए. तीन से पांच वर्ष के बच्चे एक घंटा और टीनएज बच्चों को केवल 30 मिनट प्रतिदिन तक गैजेट इस्तेमाल की अनुमति दी जानी चाहिए.

कैसे पहचानें बच्चे के गैजेट एडिक्शन को?

यदि आपके बच्चे में निम्न लक्षण दिखें, तो समझ जाइए कि वो गैजेट एडिक्शन का शिकार हो चुका है.
* गैजेट चलाने की अनुमति न मिलने पर ग़ुस्सा आना, चिड़चिड़ापन, उदास हो जाना आदि.
* गैजेट के इस्तेमाल के कारण खाने, सोने आदि का समय बदलना.
* ध्यान में कमी, याददाश्त कमज़ोर होना, व्यावहारिक दिक्क़तें, कुछ नया सीखने में मुश्किल आदि.
* सोशल होने से आनाकानी करना.

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क्या करें पैरेंट्स?

* बच्चों को ख़ुश करने की बजाय उनकी भलाई के बारे में सोचना चाहिए. उन्हें अनुशासन में रखने के साथ ही कुछ अन्य बातों का ध्यान रखकर गैजेट की लत से बचाया जा सकता है.
* टीवी, कंप्यूटर या फोन अपने बच्चों को किसी भी स्क्रीन का उपयोग केवल 30 मिनट प्रतिदिन तक ही करने दें.
* बच्चों को इनाम में गैजेट की बजाय कुछ और उपयोगी वस्तु दें.
* अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के अनुसार, खाना खाते समय, होमवर्क करते समय, सोते समय बच्चों को गैजेट से दूर रखें.
* कोशिश करें कि बच्चा जब टीवी, कंप्यूटर पर बिज़ी हो, तो आप उसके साथ रहें ताकि ये देख सकें कि वो स्क्रीन पर क्या देख रहा है.
* मोबाइल पर गेम खेलते देख उसे नज़रअंदाज़ करने की बजाय बच्चे को बाहर जाकर दोस्तों के साथ खेलने के लिए प्रेरित करें.
* बच्चे की फिज़िकल एक्टिविटी बढ़ाएं.
* यदि बच्चा आपकी बात मानते हुए आपके द्वारा तय समय तक ही गैजेट का इस्तेमाल करता है, तो उसे प्रोत्साहित करना न भूलें. आज के दौर में आप उन्हें गैजेट्स से पूरी तरह दूर तो नहीं रख सकते, लेकिन संतुलन बनाकर उन्हें इसका आदी होने से ज़रूर बचा सकते हैं.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

मुंबई की सादिया वंजारा कहती हैं, “छोटे बच्चे झुककर, बैठकर टीवी, कंप्यूटर आदि में खोये रहते हैं, जिससे उनकी गर्दन, पीठ, कंधों में तकलीफ़ हो जाती है.”
साइकोलॉजिस्ट डॉ. हरीश शेट्टी का मानना है कि मोबाइल फोन के द्वारा बच्चा इंटरनेट, ऑनलाइन खेल के साथ-साथ पॉर्न की दुनिया में भी झांक सकता है और ये उसके लिए कतई ठीक नहीं.
चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. दलवई एक केस का ज़िक्र करते हुए बताते हैं कि एक 3 वर्षीय बच्चे को सबने आत्मकेंद्रित (ऑटिस्टिक) समझ लिया था, क्योंकि वो किसी से नज़रें नहीं मिलाता था, बातचीत नहीं करता था और अन्य बच्चों के साथ खेलता भी नहीं था, लेकिन इन सबकी असली वजह थी उसका घंटों तक ऑनलाइन शो देखते रहना. डॉ. दलवई के अनुसार, “गैजेट से स़िर्फ एकतरफ़ा संचार संभव है. टच-पैड की बजाय बच्चे को कोई पेट (पालतू जानवर) लाकर दें. गैजेट के आदी बच्चों की दुनिया बस वहीं तक सिमटकर रह जाती है.”

Parenting

हर माता-पिता अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं और उनकी अच्छी परवरिश करने की कोशिश करते हैं, मगर कई बार बच्चों के प्रति अंधा प्यार उन्हें ग़लत दिशा में ले जाता है. जाने-अनजाने बच्चों की ग़लतियां छुपाकर या उन पर परदा डालकर माता-पिता अपने बच्चों का भविष्य बिगाड़ते हैं. आपके ऐसा करने पर आगे चलकर बच्चे के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी. बच्चों के झूठ को छुपाना क्यों सही नहीं है? बता रही हैं पल्लवी राघव.

 

संजना का 6 साल का बेटा रोहन स्कूल में सबको मारता रहता है. शाम को पार्क में खेलते हुए भी वह ऐसा ही करता है. संजना को कई बार दूसरे बच्चों की मांओं ने रोहन के इस बर्ताव के बारे में आगाह भी किया, लेकिन वो इस बात को मानने को तैयार ही नहीं होती. किसी के शिकायत करने पर वो कोई बहाना बनाकर वहां से उठ जाती है या फिर बात को टालने की कोशिश करती है. कभी-कभी वह रोहन को प्यार से झूठी डांट लगाती है और अगले ही पल उसे वहां से ले जाती है. धीरे-धीरे बच्चों ने रोहन के साथ खेलना बंद कर दिया. संजना दिनभर अपने पति रोहित से दूसरे बच्चों की शिकायत करती कि बच्चों का अपना ग्रुप है और कोई रोहन के साथ नहीं खेलना चाहता, लेकिन रोहित भली-भांति जानते थे कि ग़लती रोहन की है. वे संजना को बार-बार समझाने की कोशिश करते कि रोहन की भी ग़लती हो सकती है, परंतु संजना जैसे यह मानने को तैयार ही नहीं थी. यदि आप भी संजना जैसी ही मां हैं, तो संभल जाइए, क्योंकि ऐसा करके आप अपने बच्चे को ख़ुद ही बिगाड़ रही हैं. आइए, जानते हैं कि पैरेंट्स के इस व्यवहार के पीछे क्या वजह होती है?

बच्चों के प्रति सख़्त न होना

ऐसे कई मामलों में देखा गया है कि मांएं इतनी कम उम्र में बच्चे के साथ सख़्ती से पेश नहीं आना चाहतीं, लेकिन वो शायद यह बात नहीं समझतीं कि परवरिश स़िर्फ ममता न्योछावर करके नहीं की जा सकती. बच्चों की परवरिश करते हुए कई बार हमें कठोर भी होना पड़ता है. यदि कम उम्र से ही बच्चों को सिखाया जाए कि दोस्तों की रिस्पेक्ट करनी चाहिए, उनकी बात सुननी चाहिए, उनके साथ मिलकर रहना चाहिए, तो यक़ीनन बच्चे ये बात गांठ बांध लेंगे. जब कोई आकर आपसे बच्चे की शिकायत करे, कोई रिश्तेदार या पड़ोसी/मित्र उसके बारे में कोई राय दे, तो उनकी बात ग़ौर से सुनें और बच्चे के व्यवहार पर ख़ुद नज़र रखें. यदि बर्ताव में कुछ ग़लत लग रहा है, तो उसे सुधारने की कोशिश करें. हो सकता है, अपने बच्चे को समझाने के लिए आपको कभी-कभार उससे सख़्ती से भी पेश आना पड़े, लेकिन इसमें कुछ ग़लत नहीं है. आपकी डांट बच्चे का भविष्य सुधार सकती है, लेकिन उसकी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करने पर उसका भविष्य ख़राब हो सकता है.

बच्चे के प्रति अंधा स्नेह

अपने बच्चे से तो हर किसी को प्यार होता है, मगर कुछ मांएं बच्चे के प्यार में इस कदर अंधी हो जाती हैं कि उन्हें कभी उसकी ग़लती दिखाई नहीं देती. वो हर हाल में अपने बच्चे को ही सही ठहराती हैं, भले ही उसने कितनी भी बड़ी ग़लती क्यों न की हो. अक्सर देखा गया है कि जिन कपल्स को बच्चा देर से होता है, उनमें बच्चे के प्रति अंधा स्नेह ज़्यादा होता है. वो हर हाल में बच्चे को ख़ुश देखना चाहते हैं, लेकिन उन्हें इस बात का ज़रा भी एहसास नहीं होता कि उनका ये अंधा प्यार उनके लाड़ले/लाड़ली के भविष्य को अंधकारमय बना सकता है. विशेषज्ञों के मुताबिक़, बच्चों को छोटी उम्र से ही सही-ग़लत की शिक्षा दी जानी चाहिए. उन्हें अपनी ग़लती का एहसास होना चाहिए और जब तक आप उन्हें ग़लती सुधारने के लिए नहीं कहेंगी, वो आगे भी इसे दोहराते रहेंगे. जब आप उन्हें प्यार से समझाएंगी, तो निश्‍चय ही उन्हें अपनी ग़लती का एहसास होगा और वो उसे सुधारने की पूरी कोशिश करेंगे.

अपनी परवरिश को सही मानना

दुनिया में कोई भी इंसान हर चीज़ में परफेक्ट नहीं होता, मगर कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं जिन्हें लगता है कि वो परफेक्ट मॉम हैं और बच्चे की परवरिश का उनका तरीक़ा सही है. ऐसी मांएं दूसरों की नसीहतें नहीं मानतीं. यदि कोई इनसे इनके बेटे/बेटी की शिकायत करता है, तो ये उल्टे शिकायत करने वाले पैरेंट्स और उस बच्चे को ज़िम्मेदार ठहराने लगती हैं. मेरा बच्चा ऐसा कर ही नहीं सकता, मैं उसे अच्छी तरह जानती हूं, ज़रूर आपके बच्चे ने ही कोई शरारत की होगी… इस तरह वो सामनेवाले पर ही बरस पड़ती हैं. ज़रा सोचिए, यदि मां-बाप ही बच्चों की ग़लतियों पर परदा डालने लगेंगे, तो बच्चा बिगड़ेगा ही. साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि दूसरों की बात सुनने का ये मतलब नहीं है कि आप बच्चे की बात सुने बिना ही उसे डांटने लगें. पहले उससे पूछें कि उसने इस तरह का बर्ताव क्यों किया? कारण जानने के बाद उसे प्यार से समझाएं.

ग़लतियों पर परदा डालने के साइड इफेक्ट

बच्चे को लाड़-प्यार करना अलग बात है, मगर उसकी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करना आगे चलकर आपको भारी पड़ सकता है. इससे बच्चे के व्यक्तित्व पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा.
ऐसा करके पैरेंट्स ख़ुद बच्चे के भविष्य के दुश्मन बन जाते हैं. यह जानते हुए भी कि वो अन्य बच्चों को परेशान कर रहा है, बड़ों से तमीज़ से पेश नहीं आ रहा, उसने झूठ बोलना शुरू कर दिया है और आपसे भी बातें छुपा रहा है, बावजूद इसके यदि आप उसकी इन हरक़तों को नज़रअंदाज़ करती हैं, तो आगे चलकर वो आपके साथ भी बदतमीज़ी कर सकता है.
बच्चे हमेशा अपने मन की ही करते हैं. हर बात के लिए ज़िद्द करते हैं, क्योंकि वो जानते हैं कि माता-पिता से वो अपनी बातें मनवा सकते हैं. ऐसे बच्चों के अभिभावक बाद में बच्चों से बदलाव की अपेक्षा करते हैं, लेकिन तब ये बहुत मुश्किल हो जाता है.
छोटी उम्र से ही बच्चों में अच्छी आदतें व संस्कार डालने चाहिए, तब कहीं जाकर बड़े होने पर भी वो संस्कारी बनेंगे और सबका सम्मान करेंगे. अतः बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उनकी ग़लतियों पर परदा डालने की भूल न करें.
जब कोई आपके बच्चे के बारे में कुछ कहे, तो उसे ध्यान से सुनिए. यदि आप किसी की बात नहीं सुनेंगी, तो लोग आपसे और आपके बच्चे से हमेशा दूरी बनाए रखेंगे और कोई भी आपके बच्चे से दोस्ती करना पसंद नहीं करेगा.
अपने बच्चों के व्यवहार पर नज़र रखें और समय रहते उन्हें उनकी ग़लतियों के लिए टोकें.
बच्चे तभी सफल होंगे जब उनमें अच्छे संस्कार हों. मॉडर्न होने के साथ साथ अपने रीति-रिवाज़ों को भी समझें और उनके बारे में बच्चों को भी बताएं.

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क्या आपको लगता है कि सुबह के 9 बजे तक घर का काम निपटाते-निपटाते आप मैराथॉन दौड़ आई हैं. आजकल की व्यस्त ज़िंदगी में जहां बच्चों की परवरिश मुश्किल होती जा रही है, उससे भी ज़्यादा मुश्किल होता है एक मां के लिए दिनचर्या को नियंत्रित कर पाना. सूरज उगने से पहले पूरे परिवार के लिए खाना बनाना, बच्चों का टिफिन तैयार करना, उन्हें स्कूल के लिए तैयार करना किसी चुनौती से कम नहीं होता. एक नौकरीपेशा मां के लिए ये काम और भी मुश्किल होता है. आपकी मुश्किल को आसान बनाने के लिए सुषमा विश्‍वकर्मा बता रही हैं कुछ कारगर टिप्स.

अक्सर मम्मियों को बातें करते देखा जाता है कि किस तरह उन्हें रात से ही सुबह की चिंता रहती है कि वो समय से उठ पाएंगी या नहीं, टिफिन तैयार कर पाएंगी या नहीं, कहीं आज बच्चे को स्कूल जाने में देर न हो जाए आदि. हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ आसान तरी़के, जिससे आपकी हर सुबह होगी सुकून भरी और ख़ुशहाल नींद हो पूरी बच्चों को हैंडल करना आसान काम नहीं है. सुबह के समय तो सारा काम एक तरफ़ और बच्चा एक तरफ़. आप अगर चाहती हैं कि आपका बच्चा समय पर उठे और नखरे न करे, तो उसके लिए आपको उसे जल्दी सोने की आदत सिखानी होगी. रात में जल्दी सोने पर सुबह वह समय पर उठ जाएगा. उसकी नींद पूरी हो जाएगी और वह आपको परेशान नहीं करेगा.
रात में ही करें तैयारी सुबह के नाश्ते और बच्चों के टिफिन की तैयारी रात में ही कर लें. जो सब्ज़ी सुबह बनानी है, उसे रात में काटकर रखें आटा गूंध लें. यूनिफॉर्म रात में ही तैयार करके रखें, ताकि सुबह उठने के बाद आपको यूनिफॉर्म रेडी करने का टेंशन न रहे. शूज़, वॉटर बॉटल, बैग, टिफिन, सब जगह पर रखें, जिससे आपको सुबह उठकर इन चीज़ों को ढूंढ़ना न पड़े. रात में की गई ये तैयारी सुबह आपके क़ीमती समय को बचाने में मदद करेगी.

जल्दी उठें

बच्चों के रूटीन के साथ-साथ आप अपना भी एक रूटीन बनाएं. बच्चों के उठने से पहले का अलार्म लगाएं, ताकि उनके उठने से पहले आप सभी ज़रूरी काम निपटा लें. इत्मिनान से एक कप चाय पी लें और दिन की शुरुआत बेहतर तरी़के से कर पाएं. सुबह जल्दी उठने से आप टेंशन फ्री रहेंगी और आपका पूरा दिन अच्छा बीतेगा.

वर्कलिस्ट बनाएं

अपने हर काम की लिस्ट तैयार करें. बच्चे को क्या-क्या काम करना है, रात में उसे एक पेपर पर लिखकर बच्चे के कमरे में चिपका दें. इससे सुबह बच्चा उस लिस्ट को फॉलो करके आधा काम ख़ुद ही कर लेगा और बचा हुआ काम आप कर सकती हैं. उदाहरण के लिए ब्रश करना है, नहाना है, यूनिफॉर्म पहननी है, बालों में कंघी करनी है, नाश्ता करना है, जूते पहनने हैं, अपना बैग तैयार करना है, लंचबॉक्स लेना है, पानी की बोतल लेनी है आदि. इन कामों की एक लिस्ट बनाएं और बच्चे को समझाएं. बच्चे को बताएं कि हर दिन सुबह उठकर उसे ये सारे काम ख़ुद करने हैं. हो सकता है, एक-दो दिन बच्चा काम करने में कुछ भूल जाए, लेकिन यक़ीन मानिए, कुछ दिनों बाद उसकी दिनचर्या सेट हो जाएगी.

जब तब का फॉर्मूला अपनाएं

सुनकर अजीब लगता है, लेकिन ये जब तब का फॉर्मूला बहुत कारगर सिद्ध हो सकता है, अगर आप अच्छी तरह इसे फॉलो करें. आप पता करें कि सुबह आपके बच्चे को क्या काम करने में मज़ा आता है? जैसे- अगर आपके बच्चे को नहाना पसंद है, तो उसे आप अपनी लिस्ट में सबसे पहले शामिल करें. फिर उससे कहें कि जब आप ब्रश कर लेंगे तब आपको नहाना है. अगर बच्चे को ब्रेकफास्ट करना पसंद है, तो उससे कहें कि आप जल्दी से ये काम कर लो फिर आपको ब्रेकफास्ट मिलेगा. इससे वो भी ख़ुशी-ख़ुशी और जल्दी-जल्दी काम करेगा. डॉ. नताशा नितिन साटम ने भी जब तब का फॉर्मूला अपनाया है. उनकी बेटी को गार्डन में खेलना बहुत पसंद है, इसीलिए जब वो अपनी बेटी को सुबह उठाती हैं, तो उसे गार्डन में चलने की बात कहती हैं. इससे उनकी बेटी ख़ुश हो जाती है और सारे काम जल्दी-जल्दी कर लेती है. इस जब तक की प्रक्रिया से उनकी सुबह टेंशन में नहीं, बल्कि ख़ुशी-ख़ुशी बीतती है.

कूल मॉम बनें

आज के बच्चे हमारे भी गुरु होते हैं. ऐसे में उनके साथ अगर शांति से पेश नहीं आया जाए, तो वो ग़लत तरह से ब्लैकमेल करते हैं. वैसे भी एक कहावत है कि जल्दबाज़ी में हर काम बिगड़ जाता है. सुबह-सुबह जल्दबाज़ी में काम करना, बच्चे पर चिल्लाना, ज़बर्दस्ती उसके हाथ में दूध का ग्लास पकड़ाना, उसे जल्दी-जल्दी नाश्ता खिलाना आदि बच्चे पर बुरा असर डालता है. इससे बच्चे को ऐसा लगने लगता है कि इन कामों की वजह से आपको टेंशन होती है. इसके कारण बहुत जल्द बच्चा इसके विपरीत काम करने लगता है. कई बार स्कूल जाने से भी आनाकानी करता है.

मॉम टाइम

सुबह के समय बच्चे को आपका साथ ज़्यादा चाहिए होता है. वो चाहता है कि आप उसे दुलारते और प्यार करते हुए गोद में लेकर जगाएं, उसे प्यार से सहलाएं, पप्पियां लें. जब बच्चे की सुबह इस तरह से होती है, तो उसका पूरा दिन बहुत अच्छा गुज़रता है. अतः सुबह किचन से ही ज़ोर से चिल्लाकर बच्चे को जगाने की कोशिश न करें. घर के किसी दूसरे मेंबर से भी जगाने को न कहें. ख़ुद ही स़िर्फ 5 मिनट बच्चे को दें.

वीकेंड को बनाएं स्पेशल

हफ़्ते के 5-6 दिन बच्चे के साथ-साथ आपकी दिनचर्या भी एक-सी रहती है. ऐसे में सप्ताह के आख़िरी दिन यानी छुट्टी को दिलचस्प बनाने की पूरी कोशिश करें. इस एक दिन बच्चे के साथ-साथ आप भी देर तक सोएं. सबकी पसंद का खाना बनाएं. छुट्टी के दिन काम की लिस्ट को फॉलो न करें. बच्चे का जो मन करे, उसे करने दें. शाम को उसे मार्केट ले जाएं. थोड़ी आउटिंग करें.

स्मार्ट टिप्स
बच्चों के स्कूल जाने के बाद कुछ मिनट के लिए रिलैक्स करें. इसके लिए आप अपना फेवरेट म्यूज़िक सुनें.
अगर सुबह के समय को आप अच्छी तरह मैनेज नहीं कर पा रही हैं और आपकी पड़ोसन इसमें परफेक्ट है, तो आप भी उसकी तरह काम करने की कोशिश करें.
होम केयर या पैरेंटिंग की जानकारी हासिल करने के लिए अच्छी मैगज़ीन पढ़ें या टीवी शो देखें.
जॉइंट फैमिली है, तो सासू मां से कुछ हेल्प लें. आमतौर पर बच्चे अपनी दादी से ज़्यादा जुड़े होते हैं. ऐसे में वो उनसे ही तैयार होना, खाना खाना आदि पसंद करते हैं.

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यूं तो बच्चों के खेल को अक्सर मौज-मस्ती के रूप में देखा जाता है, लेकिन जब यही खेल उनकी समस्या और बीमारी को दूर करने का साधन बन जाए तो क्या कहने? जी हां. इलाज की इस प्रक्रिया को ‘प्ले थेरेपी’ कहते हैं, जहां बच्चों के खेल की रुचि और पसंद को देखकर सायकोलॉजिस्ट उनका इलाज करते हैं.

एक प्रचलित मुहावरा है- बच्चों का खेल. आमतौर पर हम इस मुहावरे का इस्तेमाल तब करते हैं, जब कोई काम हद दर्जे तक आसान लगे. इतना आसान कि चुटकी बजाते ही हो जाए. लेकिन ज़रा सोचिए, क्या बच्चों का खेल इतना आसान और नज़रअंदाज कर देनेवाला होता है? दरअसल, जब आपका बच्चा खेल रहा होता है तो वह काम कर रहा होता है. वह काम उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना कि हमारे अन्य काम या यूं कहें कि उससे भी कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है बच्चों का खेल.

बच्चों द्वारा खेले जानेवाले खेल उनके विकास क्रम का एक अहम् हिस्सा होता है. बच्चे जो भी देखते और सुनते हैं, खेलने के दौरान उसकी नकल करते हैं. डांटने वाले पापा, लोरियां सुनाने वाली मम्मी, माला फिरानेवाली दादी से लेकर बात-बात में चपत लगाने वाली टीचर तक के क़िरदारों में ख़ुद को ढालते हैं. एक तरह से देखा जाए तो बच्चे खेलते समय अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा बड़ा बनने की कोशिश करते हैं. दरअसल, खेलते समय बच्चों का रचनात्मक मस्तिष्क काम कर रहा होता है, इसलिए बच्चे किसी भी वस्तु को खिलौना समझकर खेल सकते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो बच्चों का खेल एक भाषा है, ख़िलौने इस भाषा के शब्द हैं. बच्चे इसी भाषा के माध्यम से अपनी भावनाओं से दूसरों को अवगत कराने का प्रयत्न करते हैं.
बच्चों के खेल कई मायनों में इसलिए भी अहम् हो जाते हैं कि देखा गया है कि खेल के माध्यम से बच्चे आनेवाली किसी चुनौती या डर का सामना करने के लिए पूर्वाभ्यास करते हैं, मसलन- इंजेक्शन लगवाने से डरनेवाले बच्चे डॉक्टर के पास जाने से पहले अपने भाई-बहन के साथ ‘डॉक्टर-डॉक्टर’ खेलते हुए इंजेक्शन लगवाने का पूर्वाभ्यास करते हुए देखे जाते हैं, इसलिए बड़ों को चाहिए कि वे बच्चों द्वारा खेले जानेवाले खेलों को महज़ बच्चों का खेल न समझें. ये खेल बच्चों के मानसिक, सामाजिक और व्यावहारिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं.

प्ले थेरेपी- खेल खेल में इलाज

बच्चों के खेल का महत्व तब बढ़ जाता है, जब आपका बच्चा किसी व्यावहारिक या मानसिक समस्या से ग्रसित हो. प्ले थेरेपी (खेल चिकित्सा) बच्चों की ऐसी मनोवैज्ञानिक समस्याओं से निज़ात दिलाने का अहम् साधन है. मानसिक समस्याओं से जूझ रहे बच्चों के लिए प्ले थेरेपी बहुत ही सहायक साबित हो सकती है ऐसा कहना है मनोचिकित्सक डॉ. अंजलि छाबरिया का. वे कहती हैं, “जब एक वयस्क व्यक्ति दु:खी होता है या उसे ग़ुस्सा आता है, तो वह बोलकर, चिल्लाकर अपनी भावनाओं को जता सकता है, जबकि बच्चों के साथ यह समस्या है कि वे अपनी भावनाओं को प्रकट नहीं कर पाते हैं. इसी वजह से वे कटे-कटे से रहने लगते हैं. साथ ही आज के वर्किंग पैरेन्ट्स के युग में अभिभावकों के पास इतना समय भी नहीं होता कि वे उनसे इत्मीनान से बात कर सकें, उनके दु:ख को समझने की कोशिश कर सकें.
ऐसे में ‘प्ले थेरेपी’ का महत्व और बढ़ जाता है. प्ले थेरेपिस्ट बच्चों के साथ खेलते हैं. बच्चों के साथ बच्चों जैसा व्यवहार करते हैं. खेलने के दौरान वे बच्चों से बातचीत भी करते हैं. दोस्ताना माहौल बन जाने पर बातों ही बातों में वे उनकी समस्या को जानने का प्रयत्न करते हैं. वे खेलते हुए बच्चों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण करते हैं कि बच्चे किस तरह से खेलते हैं. कौन-से खिलौने चुनते हैं. इस तरह वे बच्चों की मानसिक प्रक्रिया का अंदाज़ा लगाते हैं. बच्चों द्वारा चुने गए खिलौने, उसका खेलने का तरीक़ा खेल चिकित्सक को बच्चे के व्यक्तित्व, उसकी समस्या, मानसिक अवस्था इत्यादि के बारे में बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है. उन्होंने बताया कि यह ज़रूरी नहीं है कि डॉक्टर एक ही बार में बच्चे की समस्या समझ लें और बच्चा ठीक हो जाए. इसमें दो-तीन महीने भी लग सकते हैं.
डॉ. अंजलि छाबरिया ने आगे बताते हुए कहा कि आजकल प्ले थेरेपी के लिए आनेवाले बच्चों की मुख्य समस्या होती है एज्युकेशनल प्रेशर (शैक्षणिक दबाव). बचपन के दिन जहां खेलने-कूदने के लिए होते हैं, वहीं बच्चों पर बढ़ रहे पढ़ाई के दबाव से वे समय से पहले ही बड़े होने के लिए बाध्य हो रहे हैं, जो कि उनके सामान्य विकास में बड़ी बाधा है. वे आत्मकेंद्रित हो जाते हैं. उनका ज्ञान व्यावहारिक न होकर क़िताबी हो जाता है. वे अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं, इसीलिए धीरे-धीरे उनका व्यवहार ईर्ष्यालु और दब्बू हो जाता है.
उन्होंने बताया कि बच्चों में सायकोलॉजिकल प्रॉब्लम का दूसरा सबसे बड़ा कारण है माता-पिता का तनावपूर्ण वैवाहिक जीवन. जिन वैवाहिक जोड़ों के संबंध तनावपूर्ण रहते हैं, आमतौर पर उनके बच्चे शंकालू, डरपोक, चिड़चिड़े, अधिक ग़ुस्सा करनेवाले तथा एकाकी हो जाते हैं. इन बच्चों में असुरक्षा का भाव अधिक होता है. इसी तरह के एक केस का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह उन्होंने प्ले थेरेपी द्वारा 10 वर्ष के राहुल (परिवर्तित नाम) का सफलतापूर्वक इलाज किया.
राहुल के मम्मी-पापा का वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण था. वे तलाक़ लेना चाहते थे. लेकिन इसका सबसे अधिक असर हुआ राहुल के हंसते-खेलते बचपन पर. वह सहमा-सहमा सा रहता था. मम्मी-पापा को लड़ते-झगड़े देख रोने लगता था. स्कूल में भी वह किसी से बात नहीं करता था. पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता था. उसका स्वास्थ्य भी ख़राब रहने लगा. जब उसे प्ले थेरेपी के लिए लाया गया, तो यहां पर भी वह गुमसुम ही रहता था. इसलिए उसकी चचेरी बहन को भी उसके साथ खेलने के लिए बुलाने लगे. धीरे-धीरे जब वह घुल-मिल गया तो उसने बताया कि उसे डर लगता है कि अगर उसके पैरेन्ट्स उसे छोड़ देंगे, तो उसका क्या होगा? वह ख़ुद को असुरक्षित महसूस करता है. राहुल की समस्या मालूम होने के बाद उसके मम्मी-पापा को बुलाया गया. उनकी काउंसलिंग की गई. उन्हें भी यह बात समझ में आयी कि तनावपूर्ण वैवाहिक जीवन का बच्चे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. वे अपने सारे मतभेद भुलाकर एक हो गए. राहुल आज काफ़ी ख़ुश है, उसकी मानसिक स्थिति सामान्य है.

अभिभावकों का सकारात्मक व्यवहार भी है ज़रूरी

प्ले थेरेपी द्वारा थेरेपिस्ट बच्चों की मानसिक समस्याओं का पता तो लगा सकता है, किंतु उन समस्याओं को दूर करने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उनके अभिभावकों की होती है, क्योंकि बच्चे ज़्यादातर समय उनके साथ ही रहते हैं. अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को बताएं कि वे उनसे कितना प्यार करते हैं, उनके लिए वे कितने महत्त्वपूर्ण हैं.
जब आपका बच्चा किसी बात से डर जाए तो उन्हें समझाएं, न कि और डराने का प्रयत्न करें. उस व़क़्त उनके साथ रहें, जिससे उन्हें महसूस हो कि आप उनके साथ हैं उनकी रक्षा के लिए. अगर आपका बच्चा कुछ अच्छा कर रहा हो या उसने किसी स्पर्धा में कोई पुरस्कार प्राप्त किया हो, तो उसकी सराहना करें. यह न देखें कि प्रतियोगिता कितनी छोटी या बड़ी थी. इससे उसमें ख़ुद के महत्वपूर्ण होने का भाव जागेगा.
अगर कभी निंदा करनी पड़े तो उसके ग़लत व्यवहार की निंदा करें, न कि उसकी. वह ग़लती करे तो यह न कहें कि तुम बड़े ख़राब हो या शैतान हो. इसके बजाय उसे यह समझाने का प्रयत्न करें कि उसने क्या ग़लत किया है.
इन सबके साथ सबसे ज़रूरी बात यह है कि बच्चों को खेलने की पूरी आज़ादी दें. खेलते समय उनको ध्यान से देखें, हो सके तो साथ में कुछ समय खेलें और उनका मार्गदर्शन करें. इस दौरान उनकी रुचियों और पसंद-नापसंद को परखें. उनके खेल में बाधा न डालें, क्योंकि बच्चों द्वारा खेले जानेवाले खेल ‘बच्चों का खेल’ नहीं होते, बल्कि वयस्क बनने की दिशा में इनके द्वारा किया जानेवाला पूर्वाभ्यास होता है.

‘प्ले थेरेपी’ कब ज़रूरी?

अगर बच्चों में नीचे दी गई कोई समस्या हो तो प्ले थेरेपी से उसे दूर किया जा सकता है.
* यदि बच्चे या टीनएजर्स उपेक्षित, समाज या परिवार से कटे हुए हों.
* वे बच्चे जो पारिवारिक या सामाजिक समस्याओं से ग्रस्त हों, मसलन- माता-पिता के बीच अलगाव होने से मानसिक तौर पर परेशान या किसी नए परिवेश में ख़ुद को ढालने के लिए प्रयत्नशील हों.
* यदि यौन शोषण के शिकार हों.
* वे बच्चे जो बीमार हों या किसी ऐसी शारीरिक व्याधि से जूझ रहे हों, जो उनके सामान्य विकास में अवरोधक हो.
* जो हिंसा के शिकार हों.
* जो एज्युकेशनल प्रेशर का शिकार हों.
* वे बच्चे जो भावनात्मक और व्यावहारिक परेशानियों का सामना कर रहे हों, जैसे- मानसिक तनाव, डिप्रेशन या चिड़चिड़ापन, ज़्यादा क्रोध आना इत्यादि.

– अमरेन्द्र यादव

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दिल्ली के एक स्कूल में 2 बच्चों ने आपत्तिजनक स्थिति में अपना एमएमएस बनाया और दोस्तों को भेज दिया… एक टीनएज बच्चे ने छोटी बच्ची के साथ बलात्कार किया… कुछ बच्चे स्कूल में असामान्य अवस्था में पाए गए और जब उनसे पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि हम रेप गेम खेल रहे थे… माता-पिता अपने बच्चों के बारे में ऐसी बातें सपने में भी नहीं सोच सकते, पर ये आज की सच्चाई है. आज बच्चे तेज़ी से अपनी उम्र से पहले ही बड़े हो रहे हैं. ऐसे में पैरेंट्स को उन्हें हैंडल करना किसी चैलेंज से कम नहीं.

 

मुझे चांद-खिलौना ला दो मां… मुझे तारों तक पहुंचा दो मां… नन्हीं-सी गुड़िया ला दो मां… प्यारी-सी चुनरी दिला दो मां… पहन चुनरिया नाचूंगी, गुड़िया का ब्याह रचाऊंगी…” ऐसी ही ख़्वाहिशें थीं और कुछ ऐसा ही था हमारा बचपन और शायद 20-25 साल पहले तक भी बच्चों का बचपन कुछ ऐसा ही मासूमियत भरा था, लेकिन आज बचपन ऐसा नहीं है. आज के बच्चे कच्ची उम्र में ही जाने-अनजाने वयस्कों की तरह व्यवहार करने लगे हैं और उसे सही भी समझते हैं.

बोल्ड होते बच्चे

पुरानी पीढ़ी जिन विषयों पर युवावस्था में भी बातें करने से कतराती थी, वो बातें मासूम बच्चे या टीनएजर बेहिचक करने लगे हैं. 30 वर्षीया विनिता अपनी 4 साल की बेटी के साथ खिलौने की दुकान पर गई थी. वहां एक डॉल देखकर वो मचल गई कि बस यही चाहिए. विनिता के मना करने पर बच्ची ने कहा, “प्लीज़ मम्मा, ले दो ना. देखो ना कितनी हॉट और सेक्सी लग रही है.” 4 साल की बेटी के मुंह से निकले ऐसे शब्दों ने उसे अंदर तक हिला दिया, लेकिन आज ऐसे शब्द बोलचाल की भाषा मेंे बच्चे बड़ी सहजता से इस्तेमाल कर रहे हैं, भले ही वे इसका अर्थ समझें या न समझें. इतना ही नहीं, वे सेक्स की आधी-अधूरी जानकारी के साथ एक्सपेरिमेंट करने से भी नहीं कतराते. इस बात का खुलासा करते हुए सिनेमा हॉल में टिकट बुकिंग विंडो पर बैठनेवाले महेश कहते हैं, “बच्चे नकली आईडी प्रूफ़ के साथ एडल्ट फ़िल्म आराम से देखते हैं. शक के बावजूद हम कुछ नहीं कर पाते हैं.”
आजकल बच्चियांं मल्लिका व राखी बनना चाहती हैं. मुन्नी-शीला जैसा डांस करना चाहती हैं. छोटे-छोटे लड़कों की पसंद भी मुन्नी-शीला है. आज 4-10 साल की उम्र में ही बच्चे हॉट और सेक्सी की चाहत में सेक्सी कपड़े पहनना चाहते हैं. उत्तेजित क़िस्म के डांस करना चाहते हैं.

मीडिया व मॉडर्न लाइफ़स्टाइल भी ज़िम्मेदार

चाइल्ड सायकोलॉजी की टीचर वंदना उपाध्याय कहती हैं, “बच्चे ये सब कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें अपने आसपास यही सब दिखाई दे रहा है. मीडिया व मॉडर्न लाइफ़स्टाइल उन्हें सिखा रहा है कि सुंदर व सेक्सी दिखने के आगे अन्य गुणों का मोल फीका है. बच्चों को सुपरस्टार बनाने की होड़ में कभी-कभी पैरेंट्स भी अनजाने ही इन चीज़ों को बढ़ावा दे जाते हैं.”
सायकोलॉजिस्ट अरुणेश कुमार का कहना है, “हमारे बच्चों का दिमाग़ पहले से ही इंटरनेट से मिलनेवाली आधी-अधूरी जानकारी से भरा हुआ है. इसके साथ जो दूसरी समस्या जुड़ी है, वो यह है कि हमारे घरों में अभी भी सेक्स जैसे विषय पर बातचीत नहीं की जाती है, तो उन्हें सही ज्ञान या सीमा के बारे में कहां से समझ में आएगा?”
महानगरीय संस्कृति ने भी इन बातों को बढ़ावा दिया है. वर्किंग पैरेंट्स अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं. बच्चे घर से बाहर जाकर मस्ती न करें, इसलिए उन्हें कंप्यूटर और वीडियो गेम थमा देते हैं, ताकि वो घर पर ही एंजॉय कर सकें. उन्हें ़ज़्यादा से ज़्यादा सुविधाएं प्रदान करते हैं. अब बच्चे घर पर रह कर क्या रहे हैं, भला इसका पैरेंट्स को कहां पता होता है? ऐसे में वो इंटरनेट का ग़लत इस्तेमाल भी करने लग जाते हैं.
हालांकि आज बच्चों के साथ किसी बात के लिए जोर-ज़बरदस्ती नहीं की जानी चाहिए. इस तरह उन्हें रोका भी नहीं जा सकता है, लेकिन यह कहकर भी पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता है कि ‘हम क्या करें. बच्चे सुनते ही नहीं हैं, समझना ही नहीं चाहते हैं’ आज ब्लैक एंड व्हाइट का ज़माना नहीं है. बच्चों की दुनिया में रंगीन सपने हैं. अतः उनके सपनों में रंग भरना भी पैरेंट्स की ही ज़िम्मेदारी है. शुरू से उन्हें संतुलित मनोरंजन व अनुशासन की आदत होनी चाहिए और उन्हें जानना चाहिए कि हर चीज़ या हर बात की एक उम्र होती है.
बच्चों के ऐसे व्यवहार के पीछे कई कारण हो सकते हैं. आइए, इनमें से कुछ आम कारणों पर नज़र डालें-
जिज्ञासु प्रवृत्ति- बच्चों में हर बात को जानने की जिज्ञासा होती है. यह उनकी सहज प्रवृत्ति है. वे कहीं कुछ भी होता देखते हैं, तो उसे ख़ुद भी करके देखना चाहते हैं. उनके मन में विपरीत सेक्स के शारीरिक अंगों के प्रति भी जिज्ञासा होती है. यदि इस जिज्ञासा को सही तरी़के से हैंडल न किया गया, तो ये ग़लत मनोभावों को जन्म देती है.
खुलकर बातचीत न होना- हमारे देश में आज भी पैरेंट्स अपने बच्चों से सेक्स के विषय में बात नहीं करते हैं. बच्चा यदि सवाल करता है, तो उसे डांटकर चुप करा दिया जाता है. धीरे-धीरे बच्चे इधर-उधर से आधी-अधूरी जानकारी हासिल करने लगते हैं और ग़लत राह पर भटक जाते हैं. उम्र के साथ उनको सेक्स से संबंधित ज़रूरी जानकारी भी दी जानी चाहिए. बेहतर तो यही है कि पैरेंट्स स्वयं उनसे बात करें और सही ज्ञान दें.
प्राइवेसी व स्पेस- प्राइवेसी ने जहां एक तरफ़ बच्चे को थोड़ा आत्मनिर्भर बनाया है, वहीं दूसरी तरफ़ उन्हें बिगाड़ने में भी कमी नहीं रखी है. 14 वर्षीय राहुल दिनभर अपने कमरे में रहता है. कंप्यूटर जैसी सब सुविधाएं हैं, दोस्त भी आते हैं. गेम्स भी खेलते हैं. एक दिन मम्मी के अचानक प्रवेश करने पर राहुल ने तुरंत टोक दिया, “मम्मी, नॉक करके आया कीजिए.” जब चुपचाप छानबीन की गई, तो ड्रग्स, अश्‍लील साहित्य व अनेक नग्न चित्र मिले. स्पेस व प्राइवेसी आत्मनिर्भता के लिए सही है, लेकिन यह देखना भी ज़रूरी है कि एकांत में बच्चे करते क्या हैं. कहीं वे एकांत का नाजायज़ फ़ायदा तो नहीं उठा रहे हैं.
भावनात्मक जुड़ाव का अभाव- कुछ लोगों का मानना है कि वर्किंग पैरेंट्स बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते, इसलिए बच्चे बिगड़ जाते हैं. ये सच नहीं है. समस्या तब बढ़ती है, जब पैरेंट्स साथ होकर भी भावनात्मक रूप से उनसे जुड़ नहीं पाते हैं, बल्कि उनकी ज़रूरतें पूरी करके और पैसे कमाकर यह समझ लेते हैं कि बच्चों को पूरा प्यार दे रहे हैं. वे साथ खाना तो खाते हैं, लेकिन टीवी देखते हुए. धीरे-धीरे घर में पसरता कम्यूनिकेशन गैप बच्चों को दोस्तों के क़रीब ले आता है. फिर तो सही-ग़लत की दुनिया या आधी-अधूरी जानकारी का रास्ता भी दोस्त ही बनते हैं.
शक्की पैरेंट्स- 15 वर्षीय रोहित अपने मम्मी-पापा के शक्की स्वभाव से परेशान है. कहीं मीडिया में बच्चों के बिगड़ने की कोई ख़बर आई नहीं कि रोहित पर पाबंदियां बढ़ जाती हैं. उसके दोस्तों पर शक किया जाने लगता है. पैरेंट्स ऐसे व्यवहार करते हैं, मानो बच्चे कुछ छुपा रहे हैं. बच्चों को जब महसूस होता है कि पैरेंट्स को उन पर भरोसा नहीं है, तो वो भी उनसे बातें छुपाने लगते हैं. इस तरह बच्चा साथ रहकर भी अकेला हो जाता है और उसके ग़लत रास्ते की ओर बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है.

क्या करें पैरेंट्स?

कम्यूनिकेशन गैप न आने दें- समस्याएं तभी बढ़ती हैं, जब आपसी बातचीत का ज़रिया रुक जाता है और बातें अनकही रह जाती हैं. साथ ही बच्चों से बातचीत करते समय उनकी समस्या को समझने के लिए आपको उनके स्तर पर आना होगा, क्योंकि आप उनकी उम्र के दौर से गुज़र चुके हैं. वो आपकी उम्र की विचार शक्ति तक नहीं पहुंचे हैं.
रिश्तों व संस्कारों की अहमियत समझाएं- बचपन से ही सही व अच्छे संस्कारों के साथ उनकी परवरिश करें. आदर्श माता-पिता बनें, तभी वो सही दृष्टिकोण को अपना सकेंगे और रिश्तों को समझेंगे. उनमें पॉज़िटिव सोच बढ़ेगी और ग़लत हरकतों से दूर रह पाएंगे.
अलग कमरा दें, अलग ज़िंदगी नहीं- यदि सुविधा है और आपने अपने बच्चों को अलग कमरा दिया है, तो शुरू से ही उसके कमरे में आते-जाते रहें. वहां बैठकर बातें करें और पूरी कोशिश करें कि उसकी ज़िंदगी उस कमरे में सिमटकर न रह जाए. अपनी आलमारी अरेंज करते समय उसकी मदद लें और उसके कमरे की साफ़-सफ़ाई में उसकी मदद करें, ताकि आपस में खुलापन बना रहे.
अच्छी क़िताबें पढ़ने की आदत डालें- क़िताबों से बच्चों का परिचय एक वर्ष की उम्र के अंदर ही हो जाना चाहिए. जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगें, उम्र के अनुसार उन्हें अच्छी क़िताबें पढ़ने के लिए दें, ताकि शुरू से अच्छा साहित्य व अच्छी पुस्तकों के प्रति सम्मान बना रहे. अच्छी क़िताबें पढ़ने से तर्क बुद्धि विकसित होती है तथा सही-ग़लत की पहचान समय पर आने लगती है.
पैसे से प्यार को न जोड़ें- प्यार के नाम पर बच्चों की हर सही-ग़लत मांग को पूरा न करें. आप उन्हें समय नहीं दे पा रहे हैं, इस कारण हीनभावना या अपराधबोध मन में मत पालें, क्योंकि आप जो कर रहे हैं, उन्हीं के लिए कर रहे हैं. बच्चों की हर मांग को पूरी करने से पहले देखें कि वो कितनी ज़रूरी है. उसे ख़ुश करने के लिए पैसे मत दें.
दोस्त बनें- बच्चों को हर बात शेयर करने की छूट दें. कई बार पैरेंट्स पूरी बात सुने बिना ही अपनी टिप्पणी या निर्णय दे बैठते हैं. ऐसे में बच्चा अपनी बात शेयर नहीं करना चाहता. बच्चों को समझने के आपके तरी़के सही हो सकते हैं, लेकिन उनकी उम्र और उस उम्र की जिज्ञासा को समझना ज़रूरी है. उनके साथ टीवी प्रोग्राम देखें. साथ डिनर करें. उसके दोस्त बनें. फिर देखिए वो अपनी हर बात आपसे शेयर करने लगेगा.
उपदेश देनेे की बजाय बच्चे की भी सुनें- हमारे यहां बड़े हमेशा बच्चों को उपदेश देते रहते हैं यानी उन्हें समझाते रहते हैं. यदि पिता की उम्र 60 की है और बेटे की 35, तो भी पिता उसे उपदेश देना अपना अधिकार समझते हैं. ऐसा करने से बचें. बच्चों को सही दिशा देने या उनकी ग़लत बातों को जानने के लिए ज़रूरी है कि धैर्य के साथ उन्हें सुना जाए. अपनी बात रखने का उन्हें मौक़ा दिया जाए. हम जितना ज़्यादा बच्चों को सुनेंगे, उतनी अच्छी तरह उनकी मनोवृत्ति समझ पाएंगे व उनके क़दम बहकने से पहले ही उन्हें रोक पाएंगे.

– प्रसून भार्गव

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ज़माने के साथ-साथ बच्चों की शिक्षा का स्तर और उनके स्कूल जाने की उम्र भी बदल गई है. पहले जहां 5 साल के बाद बच्चा स्कूल में पहला क़दम रखता था, अब वहीं डेढ़-दो साल की छोटी-सी उम्र में ही पैरेंट्स उसे प्ले स्कूल में भेज रहे हैं. आख़िर क्यों कर रहे हैं पैरेंट्स ऐसा?

 

बदलते ट्रेंड ने मटेरियल लाइफ को पूरी तरह बदल दिया है. अच्छा, सबसे अच्छा बनने की चाह में आज माता-पिता ख़ुद के साथ अपने बच्चों को भी रेस में सबसे आगे निकालने के लिए प्रयासरत हैं. तहज़ीब, बात करने का ढंग, पढ़ाई में अव्वल होने के लिए वो अब स्कूल तक के समय का इंतज़ार नहीं कर रहे हैं. डेढ़ साल की उम्र में ही वो अपने बच्चे को प्ले स्कूल में डाल रहे हैं. प्ले स्कूल के बढ़ते फैशन के कारण कई पैरेंट्स दूसरों की देखा-देखी भी अपने बच्चे को प्ले स्कूल में भेजने लगते हैं. क्या प्ले स्कूल वाक़ई बच्चों के लिए फ़ायदेमंद है? आइए, जानने की कोशिश करते हैं.

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फ़ायदे

* सामाजिक बनते हैं

चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट अंशु कुलकर्णी के अनुसार, “स्कूल के पहले प्ले स्कूल में बच्चों का एडमिशन कराने से वो सामाजिक बनते हैं. बहुत से बच्चे ऐसे होते हैं, जो घर के लोगों के अलावा बाहरी लोगों से बात करने में हिचकिचाते हैं. दूसरों से डरते हैं. प्ले स्कूल में जाने से वो दूसरे बच्चों और टीचर के संपर्क में आते हैं, जिससे धीरे-धीरे उनकी हिचक दूर हो जाती है.”

* शेयरिंग

घर में प्यार-दुलार की वजह से बच्चे अपनी चीज़ों के इतने आदी हो जाते हैं कि किसी दूसरे के छूने मात्र से वो रोना या चिल्लाना शुरू कर देते हैं. प्ले स्कूल में एक ही खिलौने से कई बच्चों को खेलते देख और एक ही झूले पर बारी-बारी से दूसरे बच्चों को झूलते देख उनमें समझदारी और शेयरिंग की भावना विकसित होती है.

* स्कूल जाने में मदद

3 साल तक आपके साथ रहने से बच्चे को आपकी और परिवार की आदत हो जाती है. ऐसे में जब पहली बार उसे आप स्कूल के गेट तक छोड़ने जाती हैं, तो वो आपको छोड़ना नहीं चाहता. आपसे दूर जाने पर वो बहुत रोता है. आपकी दशा भी कुछ ऐसी ही होती है. ऐसे में शुरुआत से ही जब बच्चा आपसे कुछ घंटे ही सही, दूर रहने लगता है, तो वो सेपरेशन ब्लू यानी आपसे दूर जाने की बात को आसानी से सह लेता है.

* क्विक लर्नर

कम उम्र में ही प्ले स्कूल में जाने से बच्चे में सीखने की प्रवृत्ति बढ़ती है. टीचर द्वारा सिखाए पोएम को वो बार-बार दोहराता है. इससे उसका आधार मज़बूत होता है. स्कूल जाने के बाद उसे चीज़ों को समझने में आसानी होती है.

* पैरेंट्स भी यूज़ टू होते हैं

फर्स्ट टाइम पैरेंट्स बने कपल्स के लिए स्कूल में बच्चे के एडमिशन से लेकर उसे स्कूल भेजने तक का काम किसी चुनौती से कम नहीं होता. बच्चे के साथ उनके लिए भी ये नया अनुभव होता है. ऐसे में कई बार ख़ुद पैरेंट्स ही बच्चों से दूर जाने पर रोने लगते हैं, तो कई स्कूल सही समय पर नहीं पहुंच पाते. प्ले स्कूल के ज़रिए उन्हें स्कूल के नियम-क़ानून को समझने में मदद मिलती है.

नुक़सान

प्ले स्कूल के बहुत से फ़ायदों के साथ कुछ नुक़सान भी हैं.
  सही माहौल न मिलने की वजह से बच्चा ख़ुद को वहां एडजस्ट नहीं कर पाता और रोता है.
  प्ले स्कूल के बढ़ते क्रेज़ की वजह से कई बार मिडल क्लास फैमिली को न चाहते हुए भी स्कूल के पहले से ही आर्थिक तंगी का तनाव झेलना पड़ता है.
  स्कूलवाली ज़िम्मेदारी प्ले स्कूल से ही पैरेंट्स को उठानी पड़ती है, जैसे- सही समय पर बच्चे को स्कूल छोड़ना, स्कूल थीम के अनुसार उसे ड्रेसअप करना, स्कूल के नियम मानना आदि.
  कम उम्र में ही पैरेंट्स से दूर रहने की आदत बच्चे के कोमल मन को प्रभावित करती है.

होममेकर सुषमा विश्‍वकर्मा की प्ले स्कूल के बारे में अपनी राय है. सुषमा कहती हैं, “प्ले स्कूल एक अच्छा ज़रिया है बच्चों को सोशल बनाने का. मैंने अपनी 2 साल की बेटी आरवी को तब प्ले स्कूल में डाला जब वो डेढ़ साल की थी. प्ले ग्रुप कोई स्कूल नहीं है. वहां बच्चे एंजॉय करते हैं. ख़ुद मैंने भी जाकर देखा है. जिस तरह वहां बच्चों को ट्रीट किया जाता है, वो बहुत अच्छा लगता है. मेरी बेटी वहां जाकर एंजॉय करती है और जब वो लौटते समय अपनी टूटी-फूटी भाषा में कोई पोएम गुनगुनाती है, तो बहुत अच्छा लगता है. प्ले स्कूल जाने की आदत से अब वो स्कूल जाने में मुझे परेशान नहीं करेगी. मेरा एक और बेबी है. इसकी वजह से मैंने अपनी बच्ची को जल्दी ही प्ले स्कूल में डाल दिया, क्योंकि मैं उसको क्वालिटी टाइम नहीं दे पाती थी. दूसरा बेबी नहीं होता तो मैं अपनी बेटी को 2 साल की उम्र में प्ले स्कूल में डालती, लेकिन भेजती ज़रूर.”

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मुंबई में रहनेवाली पेशे से टीचर माला सिंह कहती हैं, “प्ले स्कूल की ज़रूरत मैंने अपने 3 साल के बेटे लक्ष्य के लिए कभी महसूस नहीं की. मुझे ऐसा लगता है कि बच्चों को हम घर में जो कुछ सिखा सकते हैं, वो प्ले स्कूलवाले नहीं सिखाते. शुरुआत के यही तीन साल होते हैं जब पूरा दिन बच्चा परिवार के साथ समय बिताता है. कुछ लोग तो बच्चों से पीछा छुड़ाने के लिए ही उन्हें प्ले स्कूल में डालते हैं. उन्हें ऐसा लगता है कि कुछ समय के लिए ही सही वो बच्चे की ज़िम्मेदारी से दूर रहेंगे.”
क्या ज़रूरी है प्ले स्कूल?
अपने आसपास के लोगों के बच्चे को प्ले स्कूल में जाते देख बहुत से माता-पिता के मन में ये बात आती है कि क्या वाक़ई स्कूल से पहले प्ले स्कूल में दाख़िला करवाना ज़रूरी है? जानकारों की मानें, तो प्ले स्कूल में दाख़िला करवाने का हर माता-पिता का अपना विचार और रुचि है. ज़रूरी नहीं कि स्कूल से पहले प्ले स्कूल में बच्चे को भेजा ही जाए. घर में बच्चे को क्वालिटी टाइम देकर आप उसे वो सारी चीज़ें सिखा सकती हैं, जो बच्चा प्ले स्कूल में सीखता है. अतः सबसे पहले अपनी स्थिति को परख लें. अपनी सुविधानुसार ही कोई निर्णय लें. दबाव में आकर या दूसरों की देखा-देखी में अपने बच्चे को प्ले स्कूल में न भेजें.
– श्‍वेता सिंह