Parents behavior

Child Pronlems

इस तथ्य को सभी जानते हैं कि प्रत्येक समाज में बच्चों को दुर्व्यवहार, हिंसा, मानसिक और शारीरिक शोषण का सामना करना पड़ता है. घर में माता-पिता पिटाई करते हैं. कक्षा में शिक्षक भी या फिर जाति धर्म के आधार पर उनके साथ भेदभाव किया जाता है. पुत्री की गर्भ में या जन्म के बाद हत्या कर दी जाती है. जन्म लेने के बाद भी उन्हें परिवार या समाज में भेदभाव का शिकार होना पड़ता है. बालिकाओं को बाल विवाह, बलात्कार या फिर तिरस्कार की मार झेलनी पड़ती है.
बच्चे कई तरह से प्रताड़ित होते हैं, जैसे- शारीरिक दंड, मानसिक शोषण, अपमानजनक व्यवहार, उपेक्षा, बालयौन उत्पीड़न आदि.
यह सब अगर सामाजिक रूप से या स्कूल आदि में हो तो माता-पिता बच्चे की सुरक्षा करते हैं. लेकिन अफ़सोस तब होता है, जब यही अत्याचार बच्चों के साथ स्वयं उनके अपने पैरेंट्स ही कर देते हैं और बच्चे अपने माता के ख़िलाफ कुछ कर ही नहीं पाते, सिवाय सहने के.

शारीरिक दंड…
बच्चों को अनुशासन में रखने के लिए माता-पिता द्वारा उनकी पिटाई किया जाना बहुत ही सामान्य बात है. लेकिन कभी-कभी यह बहुत ही हिंसक हो जाता है. एक-दूसरे का ग़ुस्सा बच्चों पर उतार देना, पिता द्वारा नशे में पिटाई. अपनी असफलताओं से घिर कर बच्चे मानसिक तनाव उतारने का उनके लिए साॅफ्ट टारगेट बन जाते हैं. बच्चों ने ज़रा-सा उनके मन की नहीं की, तो बुरी तरह पिट जाते हैं. अत्यन्त क्रोधी माता या पिता भी छोटी-छोटी बात पर बच्चों की भयंकर पिटाई कर देते हैं. कभी-कभी तो बच्चों की इतनी पिटाई हो जाती है कि जान के लाले पड़ जाते हैं. डाॅक्टर तक के पास जाने की ज़रूरत पड़ जाती है.
इसके अलावा छोटे बच्चों को सज़ा देने के लिए बाथरूम में बंद कर देना, अंधेरे कमरे में अकेले बंद कर देना, भूखा रखना, कई घंटों के लिए कमरे के एक कोने में खड़ा कर देना आदि कई अन्य तरीक़े से भी पैरेंट्स बच्चों को शारीरिक दंड देते हैं. पिता द्वारा बच्चे को फंदे से लटकाकर पीटा गया, बच्चे को ज़मीन पर पटक कर पीटा गया आदि. पिता के हैवानियत की कई घटनाएं अख़बारों में छपकर चर्चा का विषय बन चुकी हैं. नन्हें बच्चे को हवा में उछालना भी एक तरह की शारीरिक पीड़ा ही है.
किसी भी रूप में दिया जानेवाला शारीरिक दंड बच्चे के विकास तथा उसकी पूर्ण क्षमता को प्रभावित करता है. यह बच्चे के अंदर क्रोध उत्पन्न करता है. जिसके फलस्वरूप बच्चे का व्यवहार उग्र व आक्रामक हो जाता है. उसका चरित्र विघ्वंसक प्रकृति का बन जाता है. ऐसे बच्चों में आत्मविश्‍वास व आत्मसम्मान की भावना में कमी आती है. चिंता बढ़ जाती है. निद्रा संबधी समस्या उत्पन्न होती है. यहां तक कि आत्महत्या की प्रवृत्ति जन्म लेने लगती है.


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मानसिक शोषण…
”तुम बहुत बेवकूफ़ हो, तुम किसी क़ाबिल नहीं हो, तुम ज़िंदगी में कुछ नहीं कर सकते आदि…” ऐसे कुछ वाक्य अमूमन माता-पिता बोल देते हैं. लेकिन इनका असर बहुत दूरगामी होता है और बच्चे का आत्मविश्‍वास भी कम होने लगता हैं.
कोई भी पैरेंट्स बच्चों के दुश्मन नहीं होते, पर अनजाने में ऐसी बहुत-सी बातें बच्चों को बोल व कर देते हैं, जो बच्चों का मानसिक रूप से शोषण करते हैं. बच्चे को बार बार सज़ा देना, ग़ुस्से में उन पर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना, डराना-धमकाना, गालियां देना, दूसरों के सामने मजा़क उड़ाना, बच्चे को नज़रअंदाज़ करना, उसकी ज़रूरतों पर ध्यान न देना, उसकी भावनाओं व मानसिकता को न समझना, दूसरे बच्चों व भाई-बहन से तुलना करना, दूसरों के सामने शर्मिंदा या अपमानित करना, बच्चे को चुंबन या आलिंगन न करना, जिससे बच्चा माता-पिता के प्यार को एहसास कर सके, क्योंकि स्पर्श का एहसास बच्चे में प्यार व सुरक्षा की भावना जगाता है. बच्चे से ग़लती हो जाने पर कई अभिभावक उसे बार-बार आरोपित करते रहते हैं.
ऐसा कोई भी व्यवहार, जो बच्चे के लिए मानसिक रूप से ठीक न हो या उसके विकास में बाधा डाले, मानसिक शोषण कहलाता है. यह बच्चों के लिए शारीरिक पीड़ा से कहीं ज़्यादा तकलीफ़देह होता है. क्योंकि शारीरिक ज़ख्म तो भर जाते हैं, पर ज़ुबान से निकले शब्द सीधे बच्चे के दिलोंदिमाग़ पर असर डालते हैं और इसका असर कभी ख़त्म न होनेवाला होता है.

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अपमानजनक व्यवहार…
माता-पिता अनजाने में बच्चे का अपमान कई तरह से करते हैं. बच्चे से कोई ग़लती हो जाने पर उसे सबके सामने डांटना बच्चे को सबसे ज़्यादा अपमानित करता है. भाई-बहन या बहनों में या भाईयों में कोई ज़्यादा सुंदर, गोरा और योग्य है, तो उसे हमेशा प्राथमिकता देना, साथ में ले जाना, दूसरों के सामने सिर्फ़ उसी के गुणों की व सुंदरता का बखान करना, दूसरे बच्चे को हीनभावना से भरता है. बच्चे का भाई-बहन के साथ या उसके दोस्तों से तुलनात्मक विश्लेषण या उसकी ग़लतियों या कमियों को उसके दोस्तों के सामने कह देने से बच्चा अपने दोस्तों के बीच ख़ुद को बहुत कमतर पाकर मन-ही-मन हमेशा अपमानित महसूस करता रहता है. अक्सर उसके दोस्त इन बातों को दूसरों में भी फैला देते हैं. जिससे बच्चा इन बातों पर हर समय दुखी रहता है व घुटन महसूस करता है, जो उसके संपूर्ण विकास पर बहुत प्रभाव डालते हैं.
बच्चा ख़ुद को बहुत हीन समझने लगता है और दूसरों से मिलने-जुलने से कतराने लगता है. इससे उसका सामाजिक जीवन ख़त्म होता है, जो उसकी आदत में शामिल हो जाता है. ऐसा बच्चा बाद में जाकर अंर्तमुखी स्वभाव का बन जाता है.

उपेक्षा…
पैरेंट्स शायद ही कभी बच्चों की जान-बूझकर उपेक्षा करते हों. पर घर की परिस्थितियां, जैसे- वित्तीय कठिनाइयां, पति-पत्नी के बीच पारस्परिक कटु संबध, पति या पत्नी की मृत्यु या अन्य तरह की कठिनाइयां, जैसे अनेक कारण बच्चे की उपेक्षा का कारण बन जाते हैं. इसका बच्चे पर गंभीर नकारात्मक असर पड़ता है.
ऐसी उपेक्षित परवरिश बच्चे पर बुरा प्रभाव डालती है. बच्चे बचपन में जिस माहौल में रहते हैं, उसी माहौल से सामाजिक व्यवहार के बारे में सीखते हैं. अगर घर पर उनके साथ हमेशा उपेक्षित व्यवहार किया जाता है, तो दूसरों को अनदेखा करना बच्चे के लिए स्वीकार्य सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बन जाता है. अध्ययनों से पता चलता है कि उचित सामाजिक अंतःक्रिया न होने से वे सामाजिक रूप से अलग-थलग हो सकते हैं. असामाजिक व्यवहार प्रदर्शित कर सकते हैं और सामाजिक रूप से उत्कंठित हो सकते हैं.


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बाल यौन उत्पीड़न…
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अध्ययन ‘चाइल्ड एब्यूज इन इंडिया के मुताबिक़ भारत में 53.22 प्रतिशत बच्चों के साथ एक या एक से ज़्यादा तरह का यौन दुर्व्यवहार और उत्पीड़न हुआ है. ऐसे में कौन कह सकता है कि मेरे घर में बच्चों का लैंगिक शोषण नहीं हुआ है.
भारत में मौजूदा क़ानूनी प्रावधान पाॅक्सो के अनुसार, ‘बच्चे को ग़लत तरीक़े से छूना, उसके सामने ग़लत हरकतें करना और उसे अश्लील चीज़ें दिखाना-सुनाना भी इसी दायरे में आता है. बच्चे के साथ ये कहीं भी हो सकता हैं. घर, स्कूल, पास-पड़ोस आदि. ऐसी घटनाओं को अंजाम देनेवाले हमेशा परिवार के क़रीबी होते हैं. जिनका आना-जाना घर में बना रहता है और घर के बड़े भी उन पर अंधविश्वास करते हैं. बच्चे भी उनके क़रीब हो जाते हैं. वे बच्चे के साथ इतने ख़ुश दिखाई देते हैं कि समझा नहीं जा सकता है कि उनके इरादे इतने घिनौने हैं. आज के समय में माता-पिता बच्चों को नौकरों के सहारे बहुत छोड़ने लगे हैं. कई तरह के क़िस्से नौकरों के ख़िलाफ ही सुनने को मिल जाते हैं.
सबसे पहला बिन्दु तो यह है कि जब परिजन, पिता, भाई, शिक्षक, रिश्तेदार ही शोषण कर रहे हैं. तब सवाल ये पैदा होता है कि आख़िर बच्चे कहां सुरक्षित हैं. भारत में बच्चों के संरक्षण और देखरेख के लिए ढेर सारे संस्थान, केन्द्र और गृह हैं, लेकिन उनमें ज़्यादातर पंजीकृत नहीं है. बच्चे इन सुरक्षा केन्द्रों में भी सुरक्षित नहीं है.
जो बच्चा किसी भी रूप में यौन उत्पीड़न का शिकार होता है. वह खुलकर इस विषय में किसी से बात भी नहीं कर पाता. इसलिए इस दिशा में बच्चे को शिक्षित करना आवश्यक है, जिससे बच्चा खुलकर अपने साथ हो रही घटना को दूसरों के सामने कह सके.
यौन शोषण ग्रसित बच्चे बहुत डरे हुए होते हैं या बहुत ज़्यादा ग़ुस्सैल और चिड़चिड़े हो जाते हैं. कुछ बच्चे बहुत शर्मीले हो जाते हैं. किसी से बात करने में ख़ुद को असहज महसूस करते हैं. कुछ बच्चे बहुत बदतमीज़ भी हो जाते हैं. कई बच्चे डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं और मानसिक रोगी की तरह बर्ताव करने लगते हैं. ऐसे बच्चे आसानी से अपराधिक गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं.
वे सभी कारण जो एक बच्चे को दूसरे बच्चों से अलग दिखाए, उनके ऐसे बर्ताव के पीछे बाल शोषण, एक अपराध, शामिल हो सकता है. इसलिए सभी को गंभीरता से इस दिशा में कार्य करने की ज़रूरत है. ताकि रक्षक ही बच्चे के भक्षक न बन पाएं.
बच्चे देश का भविष्य हैं. उनके उचित व संतुलित विकास पर कल के पूरे समाज व देश के परिवेश की रूपरेखा तय होती है. इसलिए माता-पिता व परिजनों का ये सबसे पहला कर्तव्य बनता है कि बच्चों के पालन-पोषण व उनकी सुरक्षा को हल्के में न लिया जाए. बल्कि बच्चे का उचित व सुरक्षित परवरिश किसी भी पैरेंट्स का सबसे पहला कर्तव्य है और इसे उन्हें अपने निजि स्वार्थों से ऊपर उठकर करना चाहिए.

– सुधा जुगरान

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Yelling On Your Child Can Make Him/Her Fall Sick

अगर पैरेंट्स चाहते हैं कि बच्चे की सेहत दुरुस्त रहे, तो उसे डांटें कतई मत. अगर आप बच्चे को डांटेंगे, तो उसकी सेहत ख़राब हो जाएगी और बड़ा होने पर भी वह बीमार रहेगा. यानी बच्चे को तंदुरुस्त देखने के अभिलाषी माता-पिता को उसके साथ बहुत अच्छा व्यवहार करना होगा. जब पैरेंट्स बच्चे के साथ हमेशा अच्छी तरह पेश आएंगे और उसके साथ मधुर संबंध कायम करेंगे, तो यक़ीन मानिए, बच्चा ख़ुश और तंदुरुस्त होगा.

बच्चों का स्वास्थ्य हर पैरेंट्स के लिए हमेशा से चिंता का विषय रहा है, इसीलिए हर कोई चाहता है और पूरी कोशिश करता है कि उसका बच्चा हरदम तंदुरुस्त रहे. इसके लिए बच्चे को खाने के लिए पौष्टिक भोजन और पीने के लिए टॉनिक दिया जाता है. लेकिन कभी-कभी बच्चा पौष्टिक भोजन और टॉनिक से भी स्वस्थ नहीं हो पाता. इससे अमूमन हर दंपति परेशान रहते हैं.

* बच्चों की सेहत से जुड़ी इस पहेली को सुलझाया है अमेरिका में हुए रिसर्च ने. अमेरिका के टेक्सास में बायलोर यूनिवर्सिटी में हुए रिसर्च में कहा गया है कि माता-पिता के व्यवहार का असर बच्चों की सेहत पर होता है. रिसर्च में शामिल लोगों ने कहा है कि अगर माता-पिता का व्यवहार बच्चे के साथ बहुत अच्छा है, तो बच्चा स्वस्थ रहता है और बड़ा होकर भी वह तंदुरुस्त ही रहता है.
* बायलोर यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर और रिसर्चर मैथ्यू एंडरसन ने कहा कि माता-पिता से बच्चों के अच्छे संबंध बच्चे के खाने, सोने और उसके दैनिक गतिविधि को प्रेरित करने के लिए ज़रूरी हो सकते हैं. इसलिए शोध में शामिल लोगों को सलाह दी गई है कि अपने बच्चे के साथ हमेशा बहुत बढ़िया संबंध बनाकर रखें.
* इस अध्ययन में पता चला है कि अगर माता-पिता से बच्चे का संबंध तनावपूर्ण अथवा अपमानजनक हैं, तो इसका प्रतिकूल असर बच्चे की खाने-पीने की आदतों पर पड़ता है और बच्चे का भोजन पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता.
* यहीं से बच्चे की सेहत ख़राब होनी शुरू हो जाती है. ऐसे में बच्चे पौष्टिक आहार लेने की बजाय ज़्यादा शुगर या ज़्यादा ऑयली डिश खाने लगते हैं और धीरे-धीरे अनहाइजेनिक फूड खाने की उनकी आदत पड़ जाती है.

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* ज़्यादा शुगर या तेल खानेवाले बच्चों की आदत ही ख़राब हो जाती है. इसके चलते उनकी रोज़मर्रा की दूसरी गतिविधियां भी अनियमित हो जाती हैं.
* बच्चों में स्वस्थ जीवनशैली और सामाजिक, भावनात्मक विकास का होना उसकी लंबी आयु के लिए बहुत ज़रूरी है.
* आर्थिक रूप से कमज़ोर घरों में माता-पिता बच्चों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर पाते. माता-पिता और बच्चे के बीच इस तरह के व्यवहार का असर बच्चे के स्वास्थ्य पर पड़ता है.
* अंततः इसका असर बच्चे की बढ़ती उम्र के साथ उसके सामाजिक-आर्थिक स्तर पर दिखता है और बच्चा बीमार और नकारात्मक प्रवृत्ति का हो जाता है.
* इसी तरह कम शिक्षित और कमज़ोर आर्थिक स्थितिवाले माता-पिता बच्चों को धमकी देने या ज़बरदस्ती आज्ञा मनवाने की बजाय रचनात्मक बातचीत की सहायता लेते हैं, इससे उनके रिश्तों में गर्माहट बढ़ती है.
* अच्छे घर में और अच्छे माता-पिता के बच्चे बड़े होने का असर उसके शारीरिक स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद होता है.
* रिसर्च में यह भी कहा गया है कि अगर पैरेंट्स का अपने बच्चे से संबंध अच्छा नहीं है, तो इसका असर बच्चे की सेहत पर पड़ता है. इतना ही नहीं, ऐसे माहौल में पलनेवाले बच्चे का स्वास्थ्य बड़े होने पर भी ठीक नहीं रहता है.

– अटलजी

अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करेंः Parenting Guide 

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पैरेंट्स बच्चों के रोल मॉडल होते हैं, इसलिए जैसा व्यवहार वे बच्चों के साथ करते हैं, बड़े होकर बच्चे भी वैसे ही बनते हैं और यहीं से उनके व्यक्तित्व की नींव भी तैयार होती है. लेकिन आज समय के साथ-साथ स्थितियां भी बदलने लगी हैं. पैरेंट्स और बच्चों के व्यवहार में भी परिवर्तन आने लगा है. आइए जानें, कुछ ऐसे ही पैरेंटिंग स्टाइल और बच्चों के स्वभाव पर पड़ने वाले उसके प्रभाव के बारे में.

 

पैरेंट्स का व्यवहार: ज़रूरत से ज़्यादा केयरिंग.
बच्चे बनेंगे: चिपकू.

 

    कैसी बनेंगी स्थितियां?

ऐसे पैरेंट्स जो अपने बच्चों को ओवर प्रोटेक्ट करते हैं या उनकी ज़रूरत से ज़्यादा केयर करते हैं, बड़े होकर उनके बच्चों को काफ़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. वे अपने बच्चों को ज़िदंगी की मुश्किलों व सच्चाइयों से रू-ब-रू नहीं होने देते, जिसके कारण बच्चा हर छोटी से छोटी बात के लिए पूरी तरह से उन पर ही निर्भर रहने लगता है. ऐसे बच्चों में बोल्डनेस नहीं होती. हर काम, हर निर्णय लेने के लिए पैरेंट्स की तरफ़ भागता है. बच्चों पर हमेशा मंडराने वाली अपनी आदत के चलते ही इन पैरेंट्स को ‘हेलीकॉप्टर पैरेंट्स’ कहा जाता है.

पैरेंट्स के लिए टिप्स

पैरेंट्स का ऐसा व्यवहार बच्चों के भावनात्मक और मानसिक विकास में बाधक बनता है.
बच्चों की उंगली पकड़कर चलाने की बजाय उन्हें अपनी आंखों से दुनिया देखने व समझने का मौक़ा दें.
जहां बच्चों को आपकी ज़रूरत हो, वहां उनको सहयोग ज़रूर दें.
पैरेंट्स का बच्चों के प्रति ज़्यादा केयरिंग बिहेवियर उन्हें आत्मनिर्भर बनने से रोकता है.
बच्चों को अपने छोटे-छोटे काम स्वयं करने दें. ऐसा करने से वे बचपन से ही ज़िम्मेदार व आत्मनिर्भर बनेंगे.

पैरेंट्स का व्यवहार: शक्की.
बच्चे बनेंगे: किसी पर भी विश्‍वास न करनेवाले और झूठ बोलनेवाले.

 

    कैसी बनेंगी स्थितियां?

सभी पैरेंट्स अपने बच्चों पर पैनी नज़र रखते हैं कि कहीं उनका बच्चा ग़लत राह पर तो नहीं जा रहा, लेकिन शक्की स्वभाव वाले पैरेंट्स ज़रूरत से ज़्यादा ही निगरानी रखते हैं अपने बच्चों पर. ऐसे पैरेंट्स भूल जाते हैं कि उनका ऐसा व्यवहार बच्चों के लिए कितनी मुश्किलें खड़ी कर देता है. यदि बच्चा किसी काम से बाहर गया है तो उनका बार-बार फ़ोन या मैसेज देखते ही वह परेशान हो जाएगा और अपने आप को बचाने के लिए उनसे झूठ भी बोलने लगेगा.
शक्की स्वभाव वाले पैरेंट्स हर स्थिति को लेकर अपने बच्चे के मन में एक डर बैठा देते हैं और इसी डर के साथ उनके बच्चे बड़े होने लगते हैं. ऐसे बच्चों में आत्मविश्‍वास की कमी होती है. वे किसी पर भी आसानी से विश्‍वास करने लगते हैं.

पैरेंट्स के लिए टिप्स

बच्चों पर कड़ी नज़र रखने की बजाय उनसे खुलकर बातें करें.
आपस में मिल-जुलकर समस्या का हल निकालें.
बच्चों पर शक करने की बजाय उन्हें आज़ादी दें, लेकिन उन्हें इतनी छूट भी न दें कि वे लापरवाह ही हो जाएं.
पैरेंट्स अपने शक्की स्वभाव को छोड़कर बच्चों पर विश्‍वास करना सीखें.
यह मानकर चलें कि बच्चे ग़लतियों से ही सीखते हैं, बजाय आपके समझाने के.

पैरेंट्स का व्यवहार: अभद्र भाषा बोलनेवाले.
बच्चे बनेंगे: बेक़ाबू.

 

  कैसी बनेंगी स्थितियां?

ग़लती करने पर बच्चे को उसकी ग़लती का एहसास कराना ज़रूरी है, लेकिन उसके साथ बदतमीज़ी से बात करना या उसे मारना-पीटना सही नहीं है. पैरेंट्स द्वारा ऐसा व्यवहार करने पर उनके मन-मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ेगा.
अभद्र भाषा (गाली-गलौज) का प्रयोग करनेवाले पैरेंट्स अपने बच्चों के विकास को रोककर उनके आत्मविश्‍वास को कम करते हैं. ऐसे पैरेंट्स के बच्चे अनुशासन में न रहने वाले, तोड़-फोड़ करने वाले, बेक़ाबू और अनेक तरह की मानसिक परेशानियों से घिरे होते हैं. इन बच्चों में बिस्तर गीला करना, डिप्रेशन, पढ़ाई में कमज़ोर होना आदि जैसी समस्याएं देखने में आती हैं.

पैरेंट्स के लिए टिप्स

ग़लती करने पर बच्चे को उसकी ग़लती का एहसास ज़रूर कराएं.
अपना आपा खोने से पहले स्थिति को समझने की कोशिश करें. बेवजह गाली-गलौज न करें.
बच्चों के सामने अपशब्दों का प्रयोग न करें, क्योंकि जिस ढंग से आप अपने बच्चे से बात करेंगे, बच्चा भी उसी तरी़के से आपसे बात करेगा. इसलिए स्थितियां चाहे कैसी भी हों, बच्चों के साथ सहज व सौम्य व्यवहार करें.
बच्चों के सामने अनावश्यक झूठ न बोलें, क्योंकि बच्चे अपने पैरेंट्स की नकल करते हैं.
पैरेंंट्स बच्चों के आदर्श होते हैं. इसलिए वह बच्चों के साथ जैसा आचरण करेंगे, वे भी वैसा ही सीखेंगे.

 

पैरेंट्स का व्यवहार: बच्चों पर जीत का दबाव बनानेवाले.
बच्चे बनेंगे: आत्महत्या की प्रवृत्तिवाले.

 

  कैसी बनेंगी स्थितियां?

कॉम्पिटीशन के इस दौर में ऐसे महत्वाकांक्षी पैरेंट्स की संख्या बढ़ती जा रही है, जो अपने बच्चों को हमेशा विजेता के रूप में देखना चाहते हैं या उन पर जीत के लिए हमेशा दबाव बनाए रखते हैं. ऐसे पैरेंट्स जाने-अनजाने में अपने बच्चों पर मानसिक बोझ लाद देते हैं. मानसिक बोझ तले दबे ऐसे बच्चे नर्वस ब्रेकडाउन और डिप्रेशन का शिकार होकर आत्महत्या जैसा क़दम उठा लेते हैं.
जीत का दबाव बनाने वाले पैरेंट्स अपने बच्चों की छोटी से छोटी असफलताओं को भी बर्दाश्त नहीं कर पाते. धीरे-धीरे उन पर भी तनाव हावी होने लगता है. दूसरों की अपेक्षाओं पर खरे न उतरने के कारण वे उनसे कतराने लगते हैं और ख़ुद को नकारा समझने लगते हैं. ऐसे पैरेंट्स हाइपर पैरेंटिंग सिंड्रोम से पीड़ित होते हैं, जो बच्चों को नॉर्मल तरीक़े से बड़ा भी नहीं होने देते.

पैरेंट्स के लिए टिप्स

बच्चों पर प्रेशर बनाने की बजाय उनमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार करें.
उनके सामने नकारात्मक बातें कर उनका आत्मविश्‍वास कम करने की कोशिश न करें.
किसी कॉम्पिटीशन में हारने के बाद भी बच्चे को डांटने-फटकारने की बजाय उत्साहित करें, ओवर रिएक्ट न करें.
बच्चों से बहुत ज़्यादा अपेक्षाएं न रखें.
अक्सर पैरेंट्स अपनी अधूरी महत्वाकांक्षाओं को बच्चों के ज़रिए पूरा करना चाहते है, इसलिए उन पर अधिक दबाव बनाते हैं, जो सही नहीं है.

पैरेंट्स का व्यवहार: तुलना करनेवाले.
बच्चे बनेंगे: दिखावा करनेवाले.

 

  कैसी बनेंगी स्थितियां?

तुलना करने वाले पैरेंट्स अपने बच्चों को सही तरी़के से समझ नहीं पाते हैं. इसलिए दूसरे बच्चों के साथ अपने बच्चों की तुलना करने लगते हैं. बच्चों की सही बात को सुने-समझे बिना अपनी बातों को ज़बर्दस्ती उन पर लादने की कोशिश करते हैं.
ऐसे पैरेंट्स के बच्चे स्वयं को किसी लायक नहीं समझते. वे अपनी क्षमता को नहीं पहचान पाते और स्वयं को बेवकूफ़ समझने लगते हैं. कई बार तो स्थितियां उलट भी होती हैं, जब पैरेंट्स अपने समझदार बच्चे की तुलना किसी कमज़ोर बच्चे से करते हैं तो वह ख़ुद को बहुत स्पेशल और ओवर कॉन्फिडेंट समझने लगता है.

पैरेंट्स के लिए टिप्स

भाई-बहनों की भी आपस में तुलना न करें.
दूसरे बच्चों के साथ तुलनात्मक व्यवहार करने से उनमें सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स आ जाता है.
बच्चों की छोटी से छोटी सफलता पर भी उनकी तारीफ़ करें. माता-पिता द्वारा की गई प्रशंसा बच्चों में आत्मविश्‍वास जगाती है और वे भविष्य में बेहतर प्रदर्शन करने का प्रयास करते हैं.
यदि पैरेंट्स बच्चों की किसी बात पर सहमत नहीं हैं तो उनकी तुलना करने के बजाय उन्हें पॉज़ीटिव फील कराएं.
बच्चों को समझाते समय दिल दुखाने वाले शब्दों का प्रयोग न करें, बल्कि प्यार व नम्रता से उनके साथ पेश आएं.
हर बच्चे का स्वभाव अलग-अलग होता है. इसलिए उसके अच्छे गुणों को परखना, हर पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी होती है.

पैरेंट्स का व्यवहार: बच्चों में दिलचस्पी न लेने वाले.
बच्चे बनेंगे: घमंडी.

 

  कैसी बनेंगी स्थितियां?

काम के बढ़ते बोझ और तनाव के चलते आजकल के पैरेंट्स के पास इतना व़क़्त ही नहीं है कि अपने बच्चों केलिए व़क़्त निकाल सकें. यदि पैरेंट्स बच्चों के लिए कुछ व़क़्त निकालते भी हैं तो उनके साथ बेरुखी और सख़्ती से पेश आते हैं.
पैरेंट्स का ऐसा व्यवहार बच्चों के मन पर बुरा प्रभाव डालता है और वे उनसे दूर और मन ही मन दुखी रहने लगते हैं. ऐसे पैरेंट्स बच्चों की सारी डिमांड्स पूरी करते हैं. उनकी मामूली-सी बात को भी नकार नहीं पाते, जिसके कारण बच्चे ज़िद्दी और घमंडी बन जाते हैं. ऐसे बच्चे अपनी आलोचना कभी बर्दाश्त नहीं कर पाते.

पैरेंट्स के लिए टिप्स

बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताएं. उनकी दिनचर्या में शामिल होना भी बच्चों के संपूर्ण विकास का ही हिस्सा है.
बच्चों के साथ पेंटिंग करने, कहानी सुनाने, पार्क में जाने जैसी एक्टिविटीज़ में शामिल हों.
बच्चों के द्वारा ग़लतियां करने पर उन्हें प्यार से समझाएं.
बच्चों की हर ज़िद, इच्छा को पूरा न करें. जो उनके लिए ज़रूरी हो, उन्हीं पर ध्यान दें. यदि बच्चा इस दौरान रोने-चिल्लाने लगे, तो उसकी इस एक्टिविटी को नज़रअंदाज़ करें, नहीं तो आपका ऐसा व्यवहार उसकी आदतों को और भी बिगाड़ सकता है.
थोड़ी-सी समझदारी से पैरेंट्स बच्चों के इस स्वभाव को हैंडल करें तो उनकी यह आदत धीरे-धीरे अपने आप ही छूट जाएगी.

– पूनम नागेन्द्र शर्मा
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