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बड़े होते बच्चों को ज़रूर बताएं ये बातें (Important Things Growing Children Should Know)

Bade hote bachche final

यौवन को छू लेने की हसरत… बड़ों-सा बड़ा बनने की चाहत… कभी घंटों आईने में ख़ुद को निहारना… कभी छोटी-सी ही बात पर बिगड़ जाना… कभी धड़कनों का अचानक बेक़ाबू हो जाना, कभी बेपरवाह-सा जीने का मज़ा लेना… दोस्तों की संगत, अदाओं में अजीब-सी रंगत… हर बात पर ढेरों सवाल और कभी सवालों के बेतुके-से जवाब… कुछ अलग ही होता है इस उम्र का हिसाब…

जी हां, थोड़ी मासूमियत, थोड़ी नादानी, थोड़ा अल्हड़पन और बहुत-सी अपरिपक्वता… कुछ ऐसी ही होती है किशोरावस्था. कई सवाल मन में आते हैं, कई आशंकाएं होती हैं, असमंजस भी होता है, शंकाएं भी होती हैं… कुल मिलाकर कंफ्यूज़न की स्टेज व दौर से गुज़र रहे होते हैं इस उम्र में बच्चे. ऐसे में सही पैरेंटिंग से आप अपने बच्चों की ज़रूर मदद कर सकते हैं. उन्हें सही उम्र में उचित मार्गदर्शन देकर और उनके मन में सवालों के पनपने से पहले ही उनके जवाब व हल देकर. तो हर पैरेंट्स के लिए ज़रूरी है कि वो अपने बड़े होते बच्चों को कुछ बातें ज़रूर बताएं.

शरीर में होनेवाले बदलाव: किशोरावस्था की ओर बढ़ते बच्चों के शरीर में बहुत-से बदलाव होते हैं. अचानक शरीर में आ रहे इन परिवर्तनों से बच्चे घबरा जाते हैं. उनके मन में भी ढेर सारे प्रश्‍न उठते हैं. उन्हें बार-बार यह एश्योरेंस चाहिए होता है कि वे सामान्य हैं. ऐसे में पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी बनती है कि उन्हें यह महसूस कराएं कि ये तमाम बदलाव सामान्य हैं. आप भी जब उनकी उम्र में थे, तो इन्हीं बदलावों से गुज़रे थे.

प्यूबर्टी: प्यूबिक हेयर, आवाज़ में बदलाव, चेहरे पर अचानक ढेर सारे पिंपल्स, क़द का बढ़ना, हार्मोंस में परिवर्तन आदि के कारणों को बड़े होते बच्चे समझ नहीं पाते. हालांकि आज के इंटरनेट के युग में बहुत-सी चीज़ों के बारे में बच्चे पहले से ही जान ज़रूर लेते हैं, लेकिन वे उन्हें ठीक से समझ नहीं पाते. यहां पैरेंट्स के लिए सबसे ज़रूरी यह है कि आप इंतज़ार न करें कि बच्चा आकर आपसे सवाल करे. बेहतर होगा कि समय से पहले ही आप उन्हें बातचीत के दौरान या अन्य तरीक़ों से इन चीज़ों के बारे में एजुकेट करते रहें. इससे बच्चे मानसिक रूप से तैयार रहेंगे और ग़लत जगहों से जानकारी इकट्ठा नहीं करेंगे.

मासिक धर्म: अगर आप इस इंतज़ार में हैं कि जब बच्ची को पीरियड्स शुरू होंगे, तब इस बारे में उसे बताएंगी, तो आप ग़लत हैं. अगर आपकी बेटी को इस विषय में कोई भी जानकारी नहीं होगी, तो अचानक पीरियड्स होने पर ब्लड देखकर वो घबरा सकती है. बेहतर होगा कि उसे इस बात का अंदाज़ा पहले से हो कि पीरियड्स होना एक नेचुरल क्रिया है, जो एक उम्र के बाद हर लड़की को होता है और इसमें घबराने जैसी कोई बात ही नहीं है.

आकर्षण: टीनएज में हार्मोनल बदलावों के कारण अपोज़िट सेक्स के प्रति आकर्षण भी सहज ही उत्पन्न हो जाता है. आज भी हमारे देश में अधिकतर स्कूलों में सेक्स एजुकेशन नहीं दी जाती, लेकिन दूसरी तरफ़ पारिवारिक माहौल भी ऐसा ही होता है कि सेक्स शब्द को ही बुरा समझा जाता है. यही वजह है कि बच्चे न कुछ पूछ पाते हैं, न समझ पाते हैं और कुंठित हो जाते हैं. इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं, जैसे- वे ग़लत संगत में पड़ सकते हैं, भविष्य में सेक्स को लेकर विकृत मानसिकता बन सकती है, ग़लत काम कर सकते हैं. बेहतर होगा कि बच्चों को समझाएं कि आप जब उनकी उम्र के थे, तो आपको भी अपने क्लास की कोई लड़की/लड़का पसंद आया करता था, यह बहुत ही नॉर्मल है. लेकिन इस अट्रैक्शन को किस तरह से पॉज़ीटिविटी में बदला जाए, इसके टिप्स देने ज़रूरी हैं, जैसे-
* अगर कोई पसंद आ रहा है, तो उससे दोस्ती करने में, बातचीत करने में कोई बुराई नहीं है.
* लड़के-लड़की अच्छे दोस्त बन सकते हैं. एक-दूसरे की मदद भी कर सकते हैं.
* बच्चों को बताएं कि यह उम्र पढ़ाई और हेल्दी कॉम्पटीशन की है.

एसटीडी: सेक्सुअली ट्रांसमीटेड डिसीज़ के बारे में भी इस उम्र में ही बच्चों को बता देना और आगाह करना भी पैरेंट्स का फ़र्ज़ है. बच्चे इस उम्र में एक्सपेरिमेंट करते ही हैं, ख़ासतौर से सेक्स को लेकर अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने या उनके जवाब ढूंढ़ने के लिए वे बहुत ही उत्सुक रहते हैं. ऐसे में उन्हें सतर्क करना पैरेंट्स के लिए बेहद ज़रूरी है. बच्चों को एसटीडी, उससे जुड़े गंभीर परिणाम व उससे बचने के तरीक़ों के बारे में बताएं. इसी तरह आप उन्हें मास्टरबेशन के बारे में भी एजुकेट करें.
टीनएज प्रेग्नेंसी: आजकल एक्सपोज़र के चलते न स़िर्फ प्यूबर्टी जल्दी होने लगी है, बल्कि बच्चे सेक्स में भी जल्दी एंगेज होने लगे हैं. उन्हें सेक्स में जल्दी एंगेज होने के दुष्परिणामों के बारे में बताएं. किस तरह से ये चीज़ें सेहत, पढ़ाई और भविष्य को नुक़सान पहुंचा सकती हैं, इससे संबंधित लेख वगैरह पढ़ने को दे सकते हैं. टीनएज प्रेग्नेंसी के रेट्स और उससे होनेवाली समस्याओं से संबंधित आर्टिकल्स के ज़रिए भी आप बच्चों को एजुकेट व गाइड कर सकते हैं.

एडिक्शन्स: एक्सपेरिमेंट की इस उम्र में ऐसा नहीं है कि बच्चे स़िर्फ सेक्स को लेकर ही एक्सपेरिमेंट करते हैं, वो सिगरेट-शराब और बाकी चीज़ों की तरफ़ भी आकर्षित होते हैं. आप अगर बच्चों के रोल मॉडल बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपने व्यवहार को नियंत्रित रखना होगा. साथ ही अपने बच्चों को व्यसनों से होनेवाले सेहत व पैसों के नुक़सान के विषय में समझाना होगा. उनके दोस्तों व संगत पर भी ध्यान देना होगा और अनुशासन के महत्व पर ज़ोर देना होगा.

कम्यूनिकेशन व विश्‍वास: चाहे बच्चों से कितनी भी बड़ी ग़लती हो जाए, उनमें यह कॉन्फिडेंस जगाएं कि वो अपनी ग़लती स्वीकार करें और आपसे आकर बात करें. बच्चों को आप यह भरोसा दिलाएं कि आप हर क़दम पर उनके साथ हैं, उन्हें सपोर्ट करने के लिए. अगर उनसे कोई ग़लत क़दम उठ भी जाता है, तो भी घबराने की बजाय वो आपसे शेयर करें. बच्चों को रिलेशनशिप में कम्यूनिकेशन व विश्‍वास के महत्व का एहसास दिलाएं. आप उनसे कह सकते हैं कि न स़िर्फ उनकी उम्र में, बल्कि किसी भी उम्र में किसी से भी ग़लतियां हो सकती हैं. कोई भी परफेक्ट नहीं होता, इसलिए अपराधबोध महसूस न करके कम्यूनिकेट करें.

कैसे करें बच्चों को एजुकेट?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि कहना आसान है कि बच्चों को इन बातों के बारे में बताएं, लेकिन दरअसल पैरेंट्स के मन में कई तरह की दुविधाएं होती हैं. इस विषय पर विस्तार से हमें बता रही हैं सायकोथेरेपिस्ट डॉ. चित्रा मुंशी-
* आपकी बातचीत बहुत ही कैज़ुअल होनी चाहिए. आप कॉन्फिडेंट रहें और कोई अलग-सा माहौल बनाकर बात न करें, जिससे आप के साथ-साथ बच्चे भी असहज महसूस करें.
* बच्चों को उनके बॉडी डेवलपमेंट के बारे में इस तरह से बताएं कि जिस तरह तुम बड़े हो रहे हो, हाइट बढ़ रही है, उसी तरह बॉडी ऑर्गन्स भी धीरे-धीरे बड़े होते हैं.
* इसी तरह लड़कों को नाइटफॉल के बारे में समझाना चाहिए कि बॉडी में जो चीज़ एक्सेस हो जाती है, उसे बॉडी बाहर फेंक देती है. इसमें घबराने की कोई बात नहीं. तो 10 साल के बच्चों के लिए सेक्स एजुकेशन यही और इसी तरह से होनी चाहिए.
* यह ज़रूरी है कि बच्चों को प्यूबर्टी से पहले ही मानसिक रूप से धीरे-धीरे इस विषय पर तैयार किया जाए, लेकिन आजकल प्यूबर्टी जल्दी होने लगी है. बच्चियों को छठी कक्षा में ही पीरियड्स होने लगे हैं, तो ऐसे में क्या उन्हें पांचवीं क्लास से ही सेक्स एजुकेशन देनी शुरू करनी चाहिए? जबकि यह उम्र बहुत कम होगी सेक्स एजुकेशन के लिए.
* इसलिए यह ध्यान रखना भी बेहद ज़रूरी है कि बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार ही एजुकेट करें यानी बताने का तरीक़ा ‘एज फ्रेंडली’ होना चाहिए.
* बेटी को आप अगर यह बताएंगे कि पीरिड्स में ख़ून निकलता है, तो वह डर जाएगी. आप उसे यह कहें कि हमारे शरीर में बहुत से टॉक्सिन्स होते हैं, जिनका बाहर निकलना ज़रूरी भी है और नेचुरल भी. शरीर में ऐसे कई ग़ैरज़रूरी विषैले तत्व होते हैं, जिन्हें बॉडी ख़ुद बाहर निकाल देती है, ताकि हम हेल्दी रह सकें. आप उन्हें उदाहरण देकर समझा सकते हैं कि जिस तरह अगर आंखों में कचरा चला जाए, तो उसका बाहर निकलना ज़रूरी होता है, इसी तरह शरीर के अंदर भी अलग-अलग ऑर्गन्स में कचरा जम जाता है, जो समय-समय पर बाहर निकलता है. साथ ही बच्ची को यह भी बताएं कि जो बाहर निकलता है, वो दरअसल ब्लड नहीं होता, वो अनवॉन्टेड चीज़ है, जिसका बाहर निकलना हेल्दी रहने के लिए ज़रूरी है.
* फिज़िकल अट्रैक्शन के बारे में भी ज़रूर बताएं कि यह नॉर्मल है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वो इंटिमेट हो जाएं. बच्चे इस उम्र में एक्सपेरिमेंट करते ही हैं और शायद उन्हें पता ही नहीं चलता कि कब वो सीमाएं तोड़कर ग़लत क़दम उठा लेते हैं. यह भी उन्हें अच्छी तरह से समझाएं. बेहतर होगा इंटरनेट के इस्तेमाल के समय आप साथ बैठें, बहुत ज़्यादा बच्चों को घर पर अकेला न छोड़ें.
* बच्चों को एजुकेट करने का पहला क़दम व बेहतर तरीक़ा होगा कि उन्हें क़िताबें, लेख व अच्छी पत्रिकाओं के ज़रिए समझाना शुरू करें और फिर उन विषयों पर आप बात करके उनकी शंकाएं और मन में उठ रहे सवाल व दुविधाओं को दूर करें.
* सबसे ज़रूरी है कि अगर आप रोल मॉडल नहीं बन सकते, तो बच्चों को हिदायतें न ही दें. आपको देखकर ही बच्चे अनुशासन सीखेंगे. आप अगर ख़ुद सिगरेट-शराब पीते हैं, घंटों नेट पर, फोन या टीवी पर समय व्यतीत करते हैं, तो बच्चों को आपकी कही बातें मात्र लेक्चर ही लगेंगी.

पैरेंट्स यह भी जानें

* अक्सर पैरेंट्स इस बात को लेकर असमंजस में रहते हैं कि क्या मांएं बेटियों को और पिता बेटों को इस बारे में बता सकते हैं या मां भी बेटे को और पिता भी बेटी को एजुकेट कर सकते हैं. जबकि यह एक बेहतर तरीक़ा है कि अपोज़िट सेक्स के होने के बाद भी पैरेंट्स बच्चों से इस पर बात करें. इससे वो समझ सकेंगे कि एडल्ट्स के लिए यह सामान्य बात है कि स्त्री-पुरुष के शरीर के विषयों में वो सब कुछ जानते हैं और इसमें हिचकने की कोई बात नहीं है.
* क्या लड़कियों को लड़कों के विषय में और लड़कों को लड़कियों के विषय में भी एजुकेट करना सही होगा, यह भी एक सवाल पैरेंट्स के मन में आता है? जवाब यही है कि क्यों नहीं? बच्चों को अपने शरीर के प्रति जितना कम कॉन्शियस और जितना अधिक नॉलेजेबल बनाएंगे, उतना ही उनका मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य अच्छा रहेगा. लड़के-लड़कियों दोनों को पता होना चाहिए कि प्यूबर्टी सबके लिए सामान्य बात है, यह नेचुरल प्रोसेस है, जिससे सबको गुज़रना पड़ता है. इससे दोनों में एक-दूसरे के प्रति अधिक समानता की भावना, अधिक संवेदनशीलता व अधिक सम्मान भी पनपेगा.
* बच्चों से कभी भी सीबीआई की तरह इंटरोगेट न करें, बल्कि उनमें दिलचस्पी दिखाएं. अपनी दिनचर्या उन्हें बताएं और फिर बातों-बातों में उनकी दिनचर्या, दोस्तों का हाल, पढ़ाई, खेल, मूवीज़ आदि के बारे में पूछें. इससे रिश्ते सहज होंगे और शेयरिंग ज़्यादा से ज़्यादा होगी.
* बच्चों के दोस्तों को भी घर पर कभी डिनर, पार्टी या लंच पर आमंत्रित करें. इससे आपको अंदाज़ा होगा कि बच्चों के दोस्त कौन-कौन हैं और किस तरह की संगत में बच्चे दिनभर रहते हैं.
* बढ़ते बच्चों में बहुत जल्दबाज़ी होती है ख़ुद को परिपक्व व ज़िम्मेदार दिखाने की, क्योंकि वो चाहते हैं कि लोग उन्हें गंभीरता से लें. आप अपने बच्चों पर भरोसा जताकर उन्हें कुछ ज़िम्मेदारियां ज़रूर सौंपे. ऐसे में उनका आत्मविश्‍वास बढ़ेगा और वो ख़ुद को महत्वपूर्ण समझकर और भी परिपक्वता व ज़िम्मेदारी से काम लेंगे.

– गीता शर्मा

 

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क्या करें जब बच्चा हकलाए? (How To Help A Stammering Child?)

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छोटे बच्चों में हकलाने की समस्या बहुत गंभीर बात नहीं है. लेकिन इस कारण जब उसके संगी-साथी या पैरेन्ट्स मज़ाक उड़ाते हैं या नकल करते हैं, तो बच्चे में धीरे-धीरे हीनभावना आने लगती है और बच्चा लोगों से मिलने-जुलने से कतराने लगता है. ऐसा बच्चा उदास और गुमसुम रहने लगता है.

हकलाने वाले बच्चे एक ही अक्षर या शब्द को लम्बा खींचते हैं. कोई वाक्य बोलते वक्त अचानक किसी अक्षर या शब्द पर अटक जाते हैं और उसे बार-बार बोलने की कोशिश करते हैं. अलग-अलग बच्चों में इसके लक्षण भी अलग-अलग होते हैं. प्राय: हर सौ लोगों में एक इस दोष से पीड़ित होता है. कोई बार-बार किसी ख़ास अक्षर या शब्द पर ही अटकता है, तो कोई अचानक किसी भी शब्द पर अटक जाता है. कई बार सामान्य रूप से बातचीत करनेवाले बच्चे या बड़े भी भय, शर्म, तनाव, निराशा या आत्मविश्‍वास डगमगाने की स्थिति में हकलाने लगते हैं.
यह ज़रूरी नहीं कि हकलानेवाला बच्चा गा नहीं सकता. ऐसे कई मामले देखने में आते हैं कि सामान्य बातचीत में हकलाने वाला बच्चा किसी शब्द पर अटकता है, लेकिन कविता या गाना सुनाते वक्त उसी अक्षर या शब्द को बड़ी सहजता से बोल जाता है.

कब और क्यों हो सकती है समस्या?

हकलाहट अथवा स्टैमरिंग आमतौर पर तीन से पांच साल की उम्र में शुरू होती है. पांच से नौ साल के बच्चों में यह दोष धीरे-धीरे कम हो जाता है तथा 12-13 साल के बच्चों में बहुत कम पाया जाता है. चिकित्सकों के मुताबिक शुरुआती दौर में लगभग 5 फीसदी बच्चों में यह दोष पाया जाता है. इनमें से 5 फीसदी बच्चे बिना किसी मदद या इलाज के अपने आप ठीक बोलने लगते हैं.

एक दिलचस्प तथ्य यह है कि लड़कियों के मुक़ाबले लड़कों में यह भाषा संबंधी दोष 5 गुना ज़्यादा पाया जाता है. वैसे तो यह एक सामान्य दोष है और शुरुआती दौर में संभवत: बच्चे की भाषा पर बहुत अच्छी पकड़ न होने के कारण भी हो सकता है. फिर भी कई ऐसे मनोवैज्ञानिक कारण हैं, जिनकी वजह से ऐसा होता है. शारीरिक दोष तो बहुत कम बच्चों में पाया जाता है. मुख्यत: भावनाओं के भारी झंझावात और असमंजस की स्थिति में उलझने के कारण ही ऐसा होता है. बच्चा एक साथ अपनी स्कूल, घर, मित्र मंडली, पैरेन्ट्स, टीचर्स आदि की बातों में उलझा होता है, उसी के प्रभाव से ऐसा हो जाता है. कई बार किसी के भय से वह बोलना छोड देता है. इससे भी बोलने की क्षमता प्रभावित होती है.

उपचार क्या है?

* इस दोष का इलाज किसी दवा से नहीं किया जाता. स्पीच थेरेपिस्ट और मनोवैज्ञानिक ही इस समस्या का निदान कर सकते हैं.
* सर्वप्रथम हकलाहट का कारण जानने की कोशिश की जाती है.
* बच्चे के मन में किसी प्रकार का भय हो, तो उसे दूर करने की कोशिश होती है.
* उसके मन में आत्मविश्‍वास पैदा किया जाता है और दिमाग़ से यह बात दूर करने के प्रयास किए जाते हैं कि उसके अन्दर किसी प्रकार का दोष है.
* बच्चे को तनावमुक्त रखना ही मनोवैज्ञानिक और स्पीच थेरेपिस्ट का मुख्य उद्देश्य होता है.
* स्पीच थेरेपिस्ट उन्हीं शब्दों या अक्षरों को बच्चे से बार-बार बुलवाता है, जिन्हें बोलने में उसे परेशानी होती है.
* ज्यों-ज्यों निरन्तर अभ्यास के कारण बच्चे का उच्चारण सुधरता है, उसके मन में आत्मविश्‍वास आने लगता है.
* अधिकांश मामलों में सुधार स्पष्ट नज़र आने लगता है.

पैरेन्ट्स क्या करें?

* पेरेन्ट्स को सदैव इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा भयभीत या तनावग्रस्त न रहे.
* अगर बच्चा हकलाता है, तो उसका न स्वयं मज़ाक उड़ाएं न किसी को उड़ाने दें.
* आपका दो पल का मज़ाक उसे ज़िन्दगीभर के लिए तकलीफ़ दे सकता है.
* बच्चे को ज़्यादा से ज़्यादा बोलने के लिए प्रेरित करें.
* बच्चे की मौजूदगी में उसके दोष के बारे में चर्चा करने से बचें.
* बच्चे को कहानी, कविता, गीत आदि सुनाने के लिए प्रेरित करें व उसकी प्रशंसा कर उसे प्रोत्साहन दें.
* दूसरे बच्चों से तुलना करके उसे लज्जित करने का प्रयास बिल्कुल न करें.

* बच्चा कोई वाक्य बोलते वक्त अटकता हो, तो धैर्य से उसकी बात सुनें और उसे ही अपना वाक्य पूरा करने दें. आप उस वाक्य को पूरा न करें.

– अंजू जैन

बच्चों में बढ़ता मोटापा बढ़ा रहे हैं रोग (Obesity In Children Is Leading To Increased In Life-Threatening Diseases)

Obesity In Children

 

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बदलती लाइफ़स्टाइल, ग़लत खान-पान की आदतों से बच्चों में मोटापे की समस्या तेज़ी से बढ़ रही है, जिसका नतीज़ा बच्चों को कम उम्र में ही भुगतना पड़ रहा है. ज़रूरत से ज़्यादा वज़न के कारण ये बच्चे छोटी उम्र में ही बड़ी बीमारियों का शिकार हो रहे हैं.

 

छोटी-सी उम्र में भारी होता शरीर… बचपन में बड़ों जितना वज़न… बड़ों को होनेवाली बीमारियां… ढेर सारी कॉम्प्लिकेशन्स. जहां दूसरे बच्चे इस उम्र में खेलते-कूदते हैं, वहीं मोटापे के शिकार बच्चों को अपना काम करना भी मुश्किल लगता है, आख़िर क्यों होता है मोटापा और बच्चे मोटापे का शिकार ज़्यादा क्यों होने लगे हैं?

पिछले कुछ वर्षों में बच्चों में मोटापे की शिकायत बढ़ी है और बच्चों में बढ़ता मोटापा एक गंभीर समस्या के रूप में सामने आ रहा है. भारत में 10 से 12 प्रतिशत बच्चे मोटापे के शिकार हैं. वर्ष 2030 तक देश के लगभग आधे बच्चे इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं. हाल में किए गए सर्वे के अनुसार पिछले 50 सालों में भारतीय बच्चों में तेल पदार्थों का सेवन 20 प्रतिशत बढ़ा है. कैंडी, चॉकलेट, पिज़्ज़ा, फ्रेंच फ्राइज़ और स्वीट्स खानेवाले बच्चों में 11 से 20 वर्ष के बच्चों की संख्या लगभग 80 प्रतिशत बताई जा रही है.
कारण कई हैं और अगर समय रहते ध्यान दिया जाए तो इससे छुटकारा भी मिल सकता है.

मोटापे का कारण

अनुवांशिक, बायोलॉजिकल, लाइफ़स्टाइल आदि कई कारण मोटापे के लिए ज़िम्मेदार हैं. आमतौर पर मोटापा उन बच्चों को होता है, जो शरीर की ज़रूरत से ज़्यादा कैलोरी खाते हैं. इसके अलावा ये कारण भी ज़िम्मेदार होते हैं-

पारिवारिक कारण: जिन बच्चों के माता-पिता मोटे होते हैं, उनके मोटे होने की संभावना ज़्यादा होती है. इसके पीछे जेनेटिक कारण के अलावा माता-पिता के खान-पान और एक्सरसाइज़ की आदत भी होती है.
क्रियाशीलता की कमी: आजकल ज़्यादातर बच्चे अपना ़ज़्यादा समय टीवी देखते हुए गुज़ारते हैं. इस वजह से उनमें फिज़िकल मूवमेंट कम होता है. साथ ही टीवी देखने वाले बच्चे टीवी देखते समय कुछ न कुछ खाते रहते हैं, जिस वजह से उनका वज़न बढ़ता ही जाता है.

अनुवांशिक कारण: कुछ बच्चे ज़्यादा खाते भी नहीं, न ही घंटों टीवी के सामने गुज़ारते हैं, फिर भी उनका वज़न लगातार बढ़ता ही जाता है. हाल में हुए रिसर्च से पता चला है कि इसके पीछे अनुवांशिक कारण भी होता है. मोटी मांओं से पैदा हुए बच्चे भी मोटे और कम एक्टिव होते हैं.
जंक फूड की अधिकता: खाने-पीने में पोषक आहार की जगह जंक फूड ने ले ली है. यानी स्वाद तो बढ़ा है, लेकिन पोषण गायब हो गया है. नतीज़तन सेहत बिगड़ रही है और वज़न बढ़ रहा है.

मेडीकल कारण: एन्डोक्राइन या न्यूरोलॉजिकल बीमारी जैसी स्थितियां भी मोटापे का कारण बनती हैं. कुछ दवाइयों से भी मोटापा बढ़ता है.

अत्यधिक तनाव: माता-पिता में तलाक़, झगड़े, परिवार में किसी प्रिय की मौत या दूसरी पारिवारिक स्थितियां भी इसके लिए ज़िम्मेदार होती हैं.

मोटापे से जुड़े ख़तरे: मोटापे के कारण कई ख़तरे या कॉम्प्लिकेशन हो सकते हैं. छोटी उम्र में ही कई बड़े रोग घेर सकते हैं, जैसे कि-
* डायबिटीज़ टाइप 1, जिसमें इंसुलिन लेना ज़रूरी होता है.?
* छोटी उम्र में ही उच्च रक्तचाप के शिकार हो रहे हैं.
* दिल की बीमारियां उन्हें घेरने लगी हैं.
* सांस लेने में तकलीफ़.
* नींद संबंधी गड़बड़ियां.
इसके अलावा बच्चों और किशोरों में मोटापे के कारण कई भावनात्मक बीमारियां भी हो सकती हैं. ऐसे किशोरों में उत्साह की कमी, हीनभावना आदि समस्याएं भी देखने को मिलती हैं. तनाव, चिड़चिड़ापन आदि लक्षण भी उनमें मिल सकते हैं.

उपचार: बच्चे को किसी डॉक्टर को दिखाएं कि कहीं उसमें कोई शारीरिक दोष तो नहीं है और उसका इलाज कराएं. अगर कोई दोष नहीं है तो उसके डायट में से अतिरिक्त कैलोरीज़ घटाएं. शारीरिक
क्रिया बढ़ाएं. और यह तभी संभव है, जब बच्चे में वज़न कम करने के लिए उत्साह जगाया जाए.

मोटापे को कैसे मैनेज करें?

* वेट मैनेजमेंट प्रोग्राम शुरू करें.
* खान-पान की आदतों में बदलाव करें.
* अपना खाना प्लान करें और खाने के चुनाव पर भी ध्यान दें (वसायुक्त आहार कम करें. जंक और फास्ट फूड से बचें).
* कैलोरी की संख्या घटाएं.
* लाइफ़स्टाइल को और ज़्यादा एक्टिव बनाएं.
* हमेशा नज़र रखें कि आपका बच्चा स्कूल में क्या खाता है.
* परिवार में सब लोग इकट्ठे ही भोजन करें. टीवी देखते हुए या कम्प्यूटर के सामने लंच या डिनर करने की आदत को बदलें.
* खाना ज़रूरत के अनुसार खाएं, भूख नहीं लगी है, लेकिन मनपसंद चीज़ सामने आ गई है तो लालच वश खाने की आदत बदलें.
* हर व़क़्त कुछ न कुछ खाने की आदत को बदलें.

कुछ सवाल…

मोटापे के शिकार बच्चे के माता-पिता के मन में अपने बच्चे को लेकर कई सवाल उठते हैं. कुछ ऐसे ही सवाल और उनके जवाब-

अगर मेरा बच्चा अभी मोटा है तो क्या वो हमेशा ही इसी तरह मोटा रहेगा?
ज़रूरी नहीं है कि मोटे बच्चे बड़े होकर भी मोटे रहें. लेकिन हां, जैसे-जैसे वे बड़े होते जाते हैं, उनके मोटे ही रहने की संभावना बढ़ती जाती है.और अगर माता-पिता दोनों ही मोटे हों तो यह ख़तरा और भी बढ़ जाता है. इसलिए जितना जल्दी इस पर ध्यान दे दिया जाए, उतना ही बेहतर होता है.

क्या मेरे बेटे के मोटापे का कारण हार्मोन्स हो सकते हैं?
ज़्यादातर मोटे बच्चों को हार्मोनल असंतुलन नहीं होता. जिन बच्चों को हार्मोन संबंधी शिकायत होती है, उनका विकास आम बच्चों की तुलना में धीमी गति से होता है. उनमें थकान, क़ब्ज़ और त्वचा का रूखापन जैसी शिकायतें भी होती हैं. अगर आपके बेटे में ऐसे लक्षण दिख रहे हों तो उसे डॉक्टर को दिखाएं.

मैं अपने बच्चे का वज़न कम करने के लिए क्या करूं?
वज़न कम करने का सबसे सही तरीक़ा है स्वस्थ आहार लो और नियमित एक्सरसाइज़ करो. आप अपने बच्चे को इसके लिए प्रोत्साहित करें. अपने डॉक्टर से मिलकर एक बार परामर्श ले लें कि आपके बच्चे के लिए वज़न कम करने का सबसे अच्छा तरीक़ा क्या होगा. धैर्य रखें. इसमें थोड़ा समय लगेगा. अपने बच्चे के खाने-पीने पर रोक मत लगाएं, बल्कि उसे हेल्दी फूड खिलाएं.

मैं अपने बच्चे में हेल्दी फूड खाने की आदत डालने के लिए क्या करूं?
* बच्चे को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार को हेल्दी फूड खाने की आदत डालें. ये सबके लिए अच्छा भी होगा और आपका बच्चा ख़ुद को अलग-थलग भी नहीं समझेगा.
* डायटिशियन या डॉक्टर से मिलकर पूछ लें कि क्या खाएं, क्या नहीं. उसी के अनुसार अपना मेनू तय करें.
* बच्चे को स्किम मिल्क देने की आदत डालें. इसमें ़फैट कम होता है.
बच्चे में एक्सरसाइज़ की आदत डालने के लिए क्या करूं?
* टीवी देखने की आदत को कम करें.
* उनमें आउटडोर गेम खेलने की आदत डालें. बिल्डिंग या कॉलोनी के ग्राउंड में दूसरे बच्चों के साथ मिलकर उसे खेलने के लिए भेजें.
* अगर आपके घर पर कोई पालतू जानवर है तो उसे घुमाने की ज़िम्मेदारी अपने बच्चे को सौंप दें.
* पूरा परिवार वॉकिंग के लिए जाए.
क्या वज़न घटानेवाली दवाइयां बच्चे के लिए सुरक्षित होती हैं?
* बच्चों का वज़न कम करने के लिए दवाइयों का सहारा कभी न लें, क्योंकि ये ख़तरनाक हो सकती हैं. बेहतर होगा कि अपने फैमिली डॉक्टर से कंसल्ट करके वज़न कम करने का सही तरीक़ा अपनाएं.

– प्रतिभा तिवारी

बच्चों को ज़रूर सिखाएं ये बातें (Teach Your Children These Important Life-Lessons)

 

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बच्चों की अच्छी परवरिश में पैरेंट्स की भूमिका अहम् होती है. कहते हैं बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं, उन्हें जिस तरह से ढाला जाए, वे उसी तरह से ढल जाते हैं. इसलिए उन्हें बचपन से ही ऐसी छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण बातों के बारे में बताना बेहद ज़रूरी है, जो उनके स्वस्थ व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक हो.

 

हाइजीन की बातें: बच्चों को बचपन से ही बेसिक हाइजीन की बातें बताना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि अच्छी पर्सनल हाइजीन की आदतें न केवल बच्चों को स्वस्थ रखती हैं, बल्कि उन्हें संक्रामक बीमारियों (जैसे- हैजा, डायरिया, टायफॉइड आदि) से भी बचाती हैं और बच्चों में स्वस्थ शरीर और स्वस्थ व्यक्तित्व का निर्माण करने में मदद करती हैं. बच्चों को यह समझाना बहुत ज़रूरी है कि गंदगी से होनेवाली बीमारियों से उनकी ज़िंदगी को ख़तरा हो सकता है, इसलिए उन्हें ओरल हाइजीन, फुट एंड हैंड हाइजीन, स्किन एंड हेयर केयर, टॉयलेट हाइजीन और होम हाइजीन के बारे में बताएं.

टाइम मैनेजमेंट: इस टेकनीक को सिखाकर पैरेंट्स अपने बच्चे को स्मार्ट बना सकते हैं. पढ़ाई के बढ़ते प्रेशर को देखते हुए अब तो अनेक स्कूलों में भी बच्चों को टाइम मैनेजमेंट टेकनीक सिखाई जाने लगी है. टाइम मैनेजमेंट को सीखने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह टेकनीक उनके स्कूल लाइफ में ही नहीं, बल्कि भविष्य के लिए भी बहुत फ़ायदेमंद है. इसलिए पैरेंट्स को चाहिए कि उन्हें बचपन से ही टाइम मैनेज करना सिखाएं, जैसे-
* सबसे पहले महत्वपूर्ण काम/होमवर्क की लिस्ट बनाएं.
* किस तरह से काम/होमवर्क को कम समय में निपटाएं?
* अन्य क्लासेस/गतिविधियों के लिए समय निकालें.
* किस तरह से सेल्फ डिसिप्लिन में रहें?
* सोने, खाने-पीने और खेलने का समय तय करें.

मनी मैनेजमेंट: बच्चों को मनी मैनेजमेंट के बारे में समझाना बेहद ज़रूरी है, जिससे उन्हें बचपन से ही सेविंग व फ़िज़ूलख़र्ची का अंतर समझ में आ सके और वे भविष्य में फ़िज़ूलख़र्च करने से बचें. बचपन से ही उन्हें सिखाएं कि कहां और कैसे बचत और ख़र्च करना है?, उन्हें शॉर्ट टर्म इंवेस्टमेंट करना सिखाएं. इसी तरह से उनमें धीरे-धीरे कंप्यूटर, लैपटॉप आदि ख़रीदने के लिए लॉन्ग टर्म इंवेस्टमेंट करने की आदत भी डालें.

पीयर प्रेशर हैंडल करना: मनोचिकित्सकों का मानना है कि बच्चों में बचपन से ही पीयर प्रेशर का असर दिखना शुरू हो जाता है. आमतौर पर 11-15 साल तक के बच्चों पर दोस्तों का दबाव अधिक होता है, पर पैरेंट्स इस प्रेशर को समझ नहीं पाते. आज के बदलते माहौल में पीयर प्रेशर का बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, इसलिए पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि इस स्थिति में-
* बच्चों का मार्गदर्शन करें, जिससे उन्हें मानसिक सपोर्ट मिलेगा.
* उनमें सकारात्मक सोच विकसित करें.
* बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करें, ताकि अपनी हर बात वे आपके साथ शेयर करें.
* ग़लती होने पर प्यार से समझाएं.
* यदि बच्चा प्रेशर हैंडल नहीं कर पा रहा है या बच्चे के व्यवहार में किसी तरह का बदलाव महसूस हो, तो पैरेंट्स तुरंत उसके टीचर्स व दोस्तों से मिलें और विस्तार से जानकारी हासिल करें.

रिलेशनशिप मैनेजमेंट: बच्चों के भावनात्मक व सामाजिक विकास में रिलेशनशिप मैनेजमेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए पैरेंट्स होने के नाते आपकी ज़िम्मेदारी बनती है कि बच्चे में पॉज़िटिव रिलेशनशिप (रिलेशनशिप मैनेजमेंट) का विकास करने की शुरुआत करें, जैसे-
* उन्हें अपने फ्रेंड्स और फैमिली मेंबर्स से परिचित कराएं.
* समय-समय पर बच्चों को उनसे मिलवाएं या फोन पर बातचीत कराएं.
* उनके साथ ज़्यादा टाइम बिताने से बच्चों की उनके साथ बॉन्डिंग मज़बूत होगी और रिलेशनशिप भी स्ट्रॉन्ग होगी.
* बच्चों में कम्यूनिकेशन स्किल डेवलप करें, ताकि वे पूरे आत्मविश्‍वास के साथ लोगों से बातचीत कर सकें.
* बच्चों को सोशल एक्टिविटीज़ में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करें, जिससे वे अधिक से अधिक लोगों के संपर्क में आएं.
* बच्चों को चाइल्ड फ्रेंडली माहौल प्रदान करें, जिससे वे बेहिचक ‘हां’ या ‘ना’ बोल सकें.

सेल्फ कंट्रोल: यह ऐसा टास्क है, जिसकी ट्रेनिंग बचपन से ही ज़रूरी है. सेल्फ कंट्रोल के ज़रिए बच्चे वर्तमान में ही नहीं, भविष्य में भी अनेक पर्सनल व प्रोफेशनल समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं. सेल्फ कंट्रोल सिखाने के लिए-
* बच्चों को प्रोत्साहित करनेवाली गतिविधियों में डालें, जिससे उनमें सेल्फ कंट्रोल का निर्माण हो, जैसे- स्पोर्ट्स, म्यूज़िक सुनना आदि.
* उन्हें घर की छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियां सौंपें, जैसे- अपने कमरे की सफ़ाई करना, किड्स पार्टी का होस्ट बनाना, पेट्स की देखभाल की ज़िम्मेदारी आदि.
* उनकी सीमाएं तय करें. यदि बच्चा पैरेंट्स या अपने भाई-बहन के साथ बदतमीज़ी से बात करता है, तो तुरंत टोकें.
* उन्हें अनुशासन में रहना सिखाएं.

सिविक सेंस: बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने की ज़िम्मेदारी पैरेंट्स की होती है. अच्छा नागरिक बनने के लिए उन्हें बचपन से ही सिविक सेंस सिखाना बेहद ज़रूरी है. सिविक सेंस यानी समाज के प्रति अपने दायित्वों व कर्तव्य के बारे में उन्हें बताएं, जैसे-
* घर में नहीं, बाहर भी स्वच्छता का ध्यान रखें.
* रोड सेफ्टी नियमों का पालन करना.
* सार्वजनिक जगहों पर धैर्य रखना.
* लोगों को आदर-सम्मान देना.
* महिलाओं की इज़्ज़त करना.
* देशभक्ति की भावना आदि.
पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि वे बच्चों को अलग-अलग तरीक़ों से सिविक सेंस सिखाएं.

सोशल मीडिया अलर्ट: टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव से बच्चे भी अछूते नहीं हैं, इसलिए पैरेंटस की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों की सोशल मीडिया से जुड़ी एक्टिविटीज़ पर पैनी नज़र रखें. वे क्या ‘पोस्ट’ कर रहे हैं और किससे बातें कर रहे हैं? सोशल साइट्स पर कोई उन्हें परेशान तो नहीं कर रहा? हाल ही में हुए एक अध्ययन से यह साबित हुआ है कि जो बच्चे सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताते हैं, वे न केवल अपने समय का नुक़सान करते हैं, बल्कि इसका उनके मूड पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इसके अलावा स्कूल के टीचर्स का मानना है कि सोशल मीडिया पर वर्तनी और व्याकरण के कोई नियम नहीं होते. सोशल मीडिया पर चैट करते हुए ग़लत वर्तनी और व्याकरण के ग़लत नियमों का असर उनके स्कूली लेखन पर भी पड़ रहा है. इसलिए पैरेंट्स को चाहिए कि-
* लैपटॉप, स्मार्टफोन और टैबलेट का इस्तेमाल निर्धारित समय सीमा तक ही करने दें.
* स्मार्टफोन, टैबलेट और लैपटॉप को पासवर्ड प्रोटेक्टेड रखें.
* थोड़े-थोड़े समय बाद पासवर्ड बदलते रहें.
* नया पासवर्ड़ बच्चों को न बताएं. आपकी अनुमति के बिना वे इन्हें नहीं खोल पाएंगे.
* फिज़िकल एक्टिविटी के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें.

– पूनम नागेंद्र शर्मा

एग्ज़ाम टाइम को न बनाएं स्ट्रेस टाइम (How To Deal With Exam Stress?)

Exam Stress

 

Exam Stress
अक्सर एग्ज़ाम के समय स्टूडेंट्स बहुत अधिक तनाव से घिर जाते हैं. इसकी कई वजहें होती हैं, जैसे- सही प्लानिंग न करना, समय पर कोर्स पूरा न होना, पैरेंट्स का दबाव आदि. ये सभी प्रॉब्लम्स न हों, इसके लिए ज़रूरी है पैरेंट्स की समझदारी व अन्य ज़रूरी तैयारियां. आइए, इसी से जुड़ी छोटी-छोटी बातों के बारे में जानते हैं.

परीक्षाएं नज़दीक आने पर पढ़ाई का स्ट्रेस जितना बच्चों पर होता है, उतना ही पैरेंट्स पर भी बनना शुरू हो जाता है. ऐसे में यह ज़रूरी हो जाता है कि बच्चे व पैरेंट्स में बेहतर तालमेल हो. इसी संबंध में हमने कई छोटी-छोटी, पर महत्वपूर्ण बातों को बताने की कोशिश की है. साथ ही जसलोक हॉस्पिटल की सायकोलॉजिस्ट डॉ. माया कृपलानी ने भी इस बारे में उपयोगी जानकारी दी है.

पैरेंट्स वर्सेस बच्चे

* पैरेंट्स सकारात्मक सोच रखें और बच्चों को हमेशा शांत व प्यार से ही समझाएं.
* उन्हें कभी भी डांट-डपटकर न सिखाएं.
* बच्चों के सामने पैरेंट्स झगड़ा न करें.
* कभी भी पढ़ाई के लिए दबाव न बनाएं.
* दूसरे बच्चों के साथ तुलना न करें, ऐसे में बच्चों में हीनभावना उत्पन्न हो जाती है.
* कभी भी पढ़ाई को लेकर बच्चे को मारे-पीटे नहीं.
* पढ़ने के लिए बच्चे को हमेशा प्रोत्साहित करते रहें.
* बच्चा जिस विषय में कमज़ोर है, उस विषय पर अधिक ध्यान दें.
* हमेशा बच्चे के अंदर सकारात्मक सोच पैदा करते रहें.
* बच्चे को अधिक से अधिक समय दें.
* पढ़ाई के समय बच्चों को हैवी भोजन न दें. भोजन हल्का पर पौष्टिकता से भरपूर हो.
* बच्चों को आसान तरी़के से कमज़ोर विषयों को सिखाने की कोशिश करें.
* बच्चों को हमेशा रोचक विषयों की जानकारी देते रहें.
* अच्छे प्रेरक प्रसंग, कहानियां सुनाते रहें, जिससे बच्चे के अंदर आत्मविश्‍वास पैदा हो.
* यदि घर पर मेहमान हमेशा आते रहते हों, तो बच्चों की परीक्षाओं के समय मेहमानों को कह सकते हैं कि बच्चों की परीक्षाएं चल रही हैं, इसलिए जब भी वे आएं, तो कृपया फोन करके सूचित कर दें या फिर एग्ज़ाम के बाद आने के लिए कहें.

बच्चों के लिए एग्ज़ाम टिप्स

* एग्ज़ाम को लेकर अपने टीचर्स द्वारा बताए गए इम्पॉर्टेंट पॉइंट्स को हमेशा ध्यान में रखें.
* उनके द्वारा बताए गए प्रश्‍नों और पेपर पैटर्न से जुड़ी बातों को गंभीरतापूर्वक फॉलो करें.
* परीक्षा की तैयारी के लिए एक बैलेंस टाइम टेबल बनाएं.
* टाइम टेबल बनाकर पढ़ने से आपको किस विषय को कितना समय देना है, समझ में आ जाएगा. साथ ही डेली शेड्यूल भी बन जाएगा.
* इन सबसे स्ट्रेस कम होता है और आपको पता रहता है कि कौन-सा चैप्टर कब कंप्लीट करना है.
* आपके लिए क्या महत्वपूर्ण है, इसे आपसे बेहतर कोई नहीं जान सकता, इसलिए अपनी प्राथमिकताएं तय करें.
* आप किस समय पूरी तरह से कॉन्संट्रेशन के साथ पढ़ पाते हैं, जैसे- सुबह, शाम, रात, तो डिफिकल्ट सब्जेक्ट की पढ़ाई करने के लिए वही समय चुनें.
* भरपूर और अच्छी नींद लेने के साथ-साथ ही ख़ुश व तनावमुक्त रहें.
* अपने खानपान व डायट पर ध्यान दें.
* ख़ुद को प्रोत्साहित करें व शाबासी दें.
* पढ़ाई के समय मोबाइल फोन, चैटिंग, सोशल मीडिया आदि से दूर रहें.
* यदि इसके एडिक्ट हैं, तो कुछ समय तक मोबाइल में रिचार्ज ही न कराएं.
* स्वच्छ व शांत वातावरण में पढ़ाई करें.
* जब पढ़ने बैठें, तब डिफिकल्ट सब्जेक्ट को पहले पढ़ें, क्योंकि उस समय आपका मूड फ्रेश और कॉन्संट्रेशन लेवल हाई रहता है.
* पढ़ाई को गेम की तरह लें यानी जिस तरह गेम में कोई लेवल पार करने के बाद अवॉर्ड मिलता है, उसी तरह ख़ुद को पुरस्कृत करें.
* टेबल और डेस्क पर ही पढ़ाई करें. यदि चाहें, तो बीच-बीच में आराम करते रहें.
* गंभीरतापूर्वक पढ़ाई करें और अनुशासित रहें.
* अपने को शाबाशी दें, इनाम दें और ख़ुद से वादा करें कि इस निश्‍चित समय तक पढ़ाई कर लेने के बाद ब्रेक लेकर कुछ मनोरंजन करेंगे या फिर थोड़ी देर के लिए बाहर टहलने जाएंगे.
* यदि आप चाहें, तो बीच-बीच में थोड़ी-थोड़ी देर पर ब्रेक लेते रहें. फिर भी कम से कम आधे घंटे तक लगातार एकाग्र होकर पढ़ें. उसके बाद चाहें, तो थोड़ी देर के लिए टहलें या फिर जूस, शरबत, चाय-कॉफी आदि लेकर दोबारा पढ़ने के लिए बैठें.
* कोई चैप्टर कई बार कोशिश करने पर भी समझ नहीं आ रहा हो, तो टीचर्स, फ्रेंड्स या फिर इंटरनेट पर सर्च करके उसे समझने की कोशिश करें.
* ख़ुद को हमेशा बेहतर करने का चैलेंज देते रहें. दूसरों से तुलना करने की बजाय ख़ुद से तुलना करें.
* योग, प्राणायाम, मेडिटेशन, वर्कआउट्स आदि करते रहें. इससे एकाग्रता बढ़ती है.
* पॉज़िटिव रहें. सकारात्मकता आपको स्ट्रेस व घबराहट से बचाती है.

यह भी पढ़े: एग्ज़ाम के समय क्या करें पैरेंट्स?
ये न करें

* दूसरों की बनाई रूपरेखा के भरोसे रहना.
* टाइम टेबल फॉलो न करना.
* एग्ज़ाम के एक दिन पहले रात में अधिक देर तक पढ़ना.
* लंबे समय तक बिना ब्रेक के लगातार पढ़ते रहना.
* अधिक चाय-कॉफी, कोल्ड ड्रिंक्स लेना.

रीविज़न के लिए टिप्स

* रीविज़न के लिए पर्याप्त समय रखें, जिससे आख़िरी समय में स्ट्रेस न हो.
* इससे आपका आत्मविश्‍वास बढ़ेगा.
* इसके लिए एक टाइम टेबल बनाएं, ताकि आप अपनी तैयारी का अवलोकन कर सकें. थोड़ा समय बाकी चीज़ों के लिए भी रखें.
* अलग-अलग तरी़के से रीविज़न करें, जिससे आपको भी पढ़ने में मज़ा आए.

एग्ज़ाम के समय

* परीक्षा देने के एक दिन पहले अच्छी नींद ज़रूर लें.
* परीक्षा देने से पहले कुछ खाकर जाएं और एग्ज़ाम हॉल में समय से थोड़ा पहले पहुंचें.
* एग्ज़ाम के समय टेंशन न लें. रिलैक्स और कूल रहें.
* यदि असहज महसूस कर रहे हों, तो थोड़ी देर के लिए मन को शांत करें. गहरी सांस लें और छोड़ें.
* पेपर मिलते ही शांत मन से एक बार उसे अच्छी तरह से पढ़ लें.
* प्रत्येक प्रश्‍न के लिए समय बांट लें और कोशिश करें कि निर्धारित समय में उसे पूरा कर सकें.
* टॉपिक के मेन पॉइंट्स, सब हेडिंग को ज़रूर लिखें व हाइलाइट करें.
* जब समय कम हो और उत्तर अधिक लिखने हों, तो नए तथ्यों को संक्षिप्त में लिखकर जवाब समाप्त करें.
* पेपर में न पूछे गए सवालों के जवाब न दें यानी अपने मन से अन्य बातों को न लिखें.
* उत्तर को पैराग्राफ में न लिखें.
* शॉर्ट फॉर्म का इस्तेमाल न करें, जो पढ़नेवाले को भी पता न हो.
* उत्तर के बीच में ही निष्कर्ष न दें. क्रमानुसार प्रश्‍नों का उत्तर दें.

– ऊषा गुप्ता

यह भी पढ़े: बच्चों में एकाग्रता बढ़ाने के लिए स्मार्ट एक्टिविटीज़

जब पैरेंट्स हों एग्रेसिव (When parents turn aggressive towards their child)

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कभी बच्चों को अनुशासित करने के लिए तो कभी उनकी ग़लतियां सुधारने के नाम पर अक्सर पैरेंट्स बच्चों से सख़्ती से पेश आते हैं, लेकिन उनकी इस सख़्ती का बच्चों के मन पर बुरा असर होता है और इसका ख़ामियाज़ा कहीं न कहीं बच्चों को जीवनभर भुगतना पड़ता है.

 

अधिकतर घरों में यह देखा गया है कि पैरेंट्स गाहे-बगाहे अपने बच्चों को डांटते या फिर मारते-पीटते रहते हैं. लेकिन इससे बच्चों का आत्मविश्‍वास व आत्मसम्मान काफ़ी आहत होता है. उनके मन में यह बात बैठ जाती है कि मम्मी-पापा उनसे प्यार नहीं करते हैं और जब वे उनकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाते तो वे एग्रेसिव व डिस्ट्रक्टिव हो जाते हैं. वे सोचते हैं कि उनके पैरेंट्स हर समय चिल्लाते रहते हैं, क्योंकि वे छोटी-छोटी बातों पर ज़रूरत से ज़्यादा उग्र हो जाते हैं और जब बच्चे पैरेंट्स के ग़ुस्से का जवाब ग़ुस्से से देते हैं, तो पैरेंट्स और एग्रेसिव हो जाते हैं.

कंफ्यूज़ होते बच्चे

यदि पति-पत्नी के संबंध हेल्दी नहीं हैं, तो इसका असर सबसे ज़्यादा बच्चों पर ही पड़ता है. झगड़े के दौरान जब पैरेंट्स एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं या एक-दूसरे को भला-बुरा कहते हैं, तो बच्चा यह निर्णय नहीं ले पाता कि वह किसे सही माने. एक समय जो बात उसे सही कही जाती है, वही बाद में ग़लत ठहरा दी जाती है. कंफ्यूज़न में बच्चा टेंशन में रहने लगता है और वह पैरेंट्स की रिस्पेक्ट करना भी छोड़ देता है. यही नहीं, बच्चा कुछ हद तक स्वार्थी भी हो जाता है.

उग्र होकर अनुशासन न थोपें

हर पैरेंट्स चाहते हैं कि उनका बच्चा अनुशासित जीवन जीए और इसके लिए वे बचपन से ही उसे ट्रेनिंग देना शुरू कर देते हैं. यह सही भी है, क्योंकि अनुशासित जीवन बिताने की आदत डालने में कई बार बरसों लग जाते हैं, इसलिए यह कोशिश बचपन से ही करनी ज़रूरी होती है. लेकिन उसके लिए बच्चे को डांटना-फटकारना, मारना या चिल्लाना उचित नहीं है. चाइल्ड सायकोलॉजिस्ट के अनुसार, बच्चा वैसा ही करता है, जैसा आप करते हैं. आप उस पर चिल्लाएंगे तो वह भी पलटकर चिल्लाएगा और धीरे-धीरे ये उसके व्यवहार का हिस्सा बन जाएगा. उसे लगेगा कि इस तरह का व्यवहार करना नॉर्मल है, क्योंकि जब वह पैरेंट्स को छोटी-सी बात पर ग़ुस्सा होते देखता है, तो वह सोचता है कि ऐसा ही करना सही है. ऐसे में जब तक आप यह समझ पाते हैं कि अनुशासित करने की चाह में आपका एग्रेसिव होना ग़लत है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और एक प्रॉब्लम चाइल्ड आपके सामने होता है.
बच्चों को डरा-धमकाकर, ग़ुस्से में या दबाव में अनुशासित करना एक ग़लत तरीक़ा है. अनुशासित करने का मतलब सही व्यवहार करने के लिए बच्चे को गाइड करना होता है. उग्रता यदि शारीरिक ढंग से सज़ा देने के रूप में हो, तो उसका प्रभाव पॉज़िटिव नहीं होता, बल्कि इससे बच्चे के अंदर विद्रोह की भावना पनपने लगती है. फिर यह विद्रोह अक्सर एक ज्वालामुखी की तरह फटता है. पैरेंट्स द्वारा अव्यावहारिक मापदंडों को अपनाकर बच्चों से ज़रूरत से ज़्यादा अपेक्षाएं रखना भी उनके अंदर उग्रता का समावेश कर देता है.

क्या करें पैरेंट्स?

सकारात्मक अनुशासन का इस्तेमाल करें. बच्चा इस बात को समझ ले कि उसके ग़लत व्यवहार को सहन नहीं किया जाएगा. इसके लिए उसकी ग़लतियों को उजागर किए बिना अपनी भावनाओं को बताएं. बिहेवियर पर फोकस करें, न कि उसकी पर्सनैलिटी पर. यह कहने की बजाय कि ‘तुम कितने क्रूर हो, जो अपनी बहन को मारते हो’ कहें कि ‘अच्छे व दयालु लोग मारते नहीं हैं.’
•इस बात को समझने की कोशिश करें कि आपका बच्चा ग़लत व्यवहार क्यों कर रहा है? हो सकता है इसकी वजह आपका एग्रेसिव बिहेवियर ही हो.
बच्चे को मारने-डांटने से आप उसके व्यवहार में बदलाव नहीं ला सकते हैं. इसके लिए आपको अपना उदाहरण पेश करना होगा, जिसमें ग़ुस्से की जगह प्यार हो.
• बच्चा यदि आपकी बात न सुने तो उसे कंट्रोल करने की कोशिश न करें. पहले ख़ुद को शांत करें और फिर उसे शांत करें, वरना आप उसे केवल ग़ुस्सा करना और छोटी-सी बात पर निगेटिव ढंग से रिएक्ट करना ही सिखाएंगे.
• बच्चे से इस तरह का व्यवहार करना ज़रूरी है, जिससे उसे यह एहसास हो कि उसकी भी उतनी ही अहमियत है जितनी कि बड़ों की. प्यार, सम्मान व उपेक्षित न होने की भावना के साथ बच्चा अधिक बेहतर ढंग से ख़ुद को कंट्रोल कर पाता है. उसे वही सम्मान दें जिसका वह हक़दार है, इससे उसके अंदर आप दूसरों के प्रति आदर भावना व अच्छे संस्कारों के बीज रोप पाएंगे.
• पैरेंट्स के लिए सबसे ज़रूरी है अपने बच्चे का विश्‍वास जीतना और वो स़िर्फ प्यार से ही जीता जा सकता है. आप उसके दोस्त बनकर उसका विश्‍वास जीत सकते हैं. उसकी दुनिया में प्रवेश करने से एक अटूट रिश्ता क़ायम हो जाता है, जो ज़िंदगीभर एक मज़बूत नींव की तरह उसके काम आता है. उसे यह यक़ीन दिलाएं कि उसकी मुसीबत, तकलीफ़ व परेशानियों में आप हमेशा उसके साथ हैं.
• पैरेंट्स का बिहेवियर बच्चे के प्रति हमेशा उदार व खुले विचारोंवाला होना चाहिए. उसकी बात को समझनेवाला होना चाहिए. बच्चा जो भी कह रहा हो, उसे महत्व देते हुए उसकी भावनाओं को समझें. बीच में न तो टोकें, न ही एग्रेसिव होकर उसे चुप करा दें. बच्चा जो भी कह रहा है, उसकी उपेक्षा न करें. उसे कभी ऐसा न लगे कि उसके विचार या अभिव्यक्ति में आपकी दिलचस्पी नहीं है.

मनोवैज्ञानिक साधना प्रकाश के अनुसार, जहां पैरेंट्स अधिक एग्रेसिव स्वभाव के होते हैं, वहां बच्चा अपनी एक अलग दुनिया बना लेता है. उस दुनिया में वह आसपास की चीज़ों से ख़ुद को इतना काट लेता है कि केवल अपने बारे में सोचने के कारण वह स्वार्थी हो जाता है. वह अपनेपन व रिश्तों की क़द्र करना नहीं सीख पाता, जिससे बड़े होकर हर स्तर पर उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. पैरेंट्स के एग्रेेसिव बिहेवियर का सबसे बुरा प्रभाव बच्चे पर यह पड़ता है कि वह किसी पर भी विश्‍वास करना नहीं सीख पाता है. जब वह अपने पैरेंट्स से ही अपने मन की बात शेयर नहीं कर पाता, तो किसी बाहरी व्यक्ति के साथ कैसे कर सकता है? इसलिए हर पैरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चों के दोस्त बनें, न कि तानाशाह.

– सुमन बाजपेयी