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किस उम्र में क्या सेक्स एजुकेशन दें? (Sex Education For Children According To Their Age)

किस उम्र में क्या सेक्स एजुकेशन दें?

किस उम्र में क्या सेक्स एजुकेशन दें?

भारत में हमेशा से गोपनीय समझे जानेवाले सेक्स जैसे अहम् विषय पर बात या चर्चा करने से पढ़े-लिखे जागरुक लोग आज भी हकलाने लगते हैं, फिर बच्चों को सेक्स शिक्षा देना तो बहुत दूर की बात है… लेकिन हमारी ये हिचक हमारे बच्चों के भविष्य पर क्या असर डाल सकती है, इस बारे में कभी सोचा है हमने…? क्या ये सच नहीं कि आज बच्चों के इन सवालों का जवाब देना फिर भी आसान है, लेकिन कल उनकी समस्याओं को सुलझाना बहुत मुश्किल हो जाएगा…?

अक्सर माता-पिता बच्चों को सेक्स के बारे में यह सोचकर कोई जानकारी देना ज़रूरी नहीं समझते कि उन्हें भी तो उनके माता-पिता ने इस बारे में कुछ नहीं बताया था… तो क्या इससे उनके सेक्स जीवन पर कोई बुरा प्रभाव पड़ा? फिर आज तो ज़माना इतना एडवांस हो गया है कि उम्र से पहले ही बच्चों को सब कुछ पता चल जाता है… फिर अलग से कुछ बताने-समझाने की ज़रूरत ही क्या है? लेकिन अक्सर हमारी यही सोच बच्चों के लिए हानिकारक साबित होती है.
हम अपने बच्चों को सेक्स शिक्षा दें या न दें, उन्हें अश्‍लील पत्र-पत्रिकाओं, टीवी, फ़िल्म, इंटरनेट, यहां तक कि शौचालय की दीवारों से भी सेक्स संबंधी ऐसी कई आधी-अधूरी व उत्तेजक जानकारियां मिल ही जाती हैं, जो उन्हें गुमराह करने के लिए काफ़ी होती हैं. उस पर उनका चंचल मन अपने शरीर की अपरिपक्वता को देखे-जाने बिना ही सेक्स को लेकर कई तरह के प्रयोग करने के लिए मचलने लगता है और कई मामलों में वे इसे हासिल भी कर लेते हैं… और नतीजा? अनेक शारीरिक-मानसिक बीमारियां, आत्मग्लानि, पछतावा… और पढ़ाई, करियर का नुक़सान सो अलग…
लेकिन हमारी विडंबना ये है कि 21वीं सदी के जेट युग में जीते हुए भी अभी तक हम ये नहीं तय कर पा रहे हैं कि हम अपने बच्चों को सेक्स एज्युकेशन दें या न दें और दें तो कब और कैसे…? जबकि अब समय आ गया है कि सेक्स एजुकेशन दें या न दें से परे हम ये सोचें कि कैसे और किस उम्र से बच्चों को सेक्स शिक्षा दी जाए. बच्चों को सेक्स-शिक्षा देने का मापदंड और सही तरीक़ा क्या हो, बता रहे हैं सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. राजन भोसले.

जन्म से ही शुरुआत करें
चूंकि बच्चा भी हमारी तरह आम इंसान है और हर इंसान में सेक्स की भावना विद्यमान होती है, अतः बच्चे में भी जन्म से ही यह भावना मौजूद रहती है और वह अपने शरीर के सभी अंगों के बारे में जानने के लिए उत्सुक भी रहता है, जो कि बिल्कुल सामान्य बात है. लेकिन अधिकतर अभिभावक इस ओर ध्यान ही नहीं देते और बच्चों को सही मार्गदर्शन भी नहीं दे पाते.
कई बार ऐसा भी होता है कि हम स्वयं ही बच्चे के नाज़ुक मन में बचपन से ही सेक्स के बारे में उत्सुकता जगाने लगते है. बच्चा जब पैदा होता है तो उसे दुनिया-जहान यहां तक कि अपने शरीर के बारे में भी कुछ पता नहीं होता. ऐसे में जब कभी बच्चा अन्य अंगों की तरह अपने प्राइवेट पार्ट्स को हाथ लगाता है या सबके सामने बिना कपड़े पहने आ जाता है तो माता-पिता तुरंत उसे झिड़क देते हैं. उस समय उस मासूम को अपनी ग़लती का एहसास तो होता नहीं, उल्टे मन में उत्सुकता जागने लगती है कि आख़िर मेरे शरीर के इस हिस्से को छूने के लिए मना क्यों किया जाता है. अतः माता-पिता की डांट से बचने के लिए वह अकेले में अपने गुप्तांगों को छूने-सहलाने लगता है और माता-पिता को ख़बर तक नहीं होती. अतः माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों की सामान्य क्रियाओं पर भी उन्हें डराएं-धमकाएं नहीं, समय के साथ उनका व्यवहार ख़ुब-ब-ख़ुद बदल जाएगा.

3-4 वर्ष की उम्र में क्या बताएं?
3-4 साल की उम्र से ही समझा दें कि बेटा जिस तरह सभी लोगों के ब्रश, टॉवेल आदि बिल्कुल निजी और अलग-अलग होते हैं तथा उन्हें किसी और को इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, ठीक उसी तरह तुम्हारे शरीर के ये हिस्से भी बिल्कुल निजी हैं, जिन्हें आपको किसी दूसरे के सामने नहीं खोलना चाहिए. साथ ही यह भी बताएं कि यदि कोई उसके इन अंगों को छूए या सहलाए तो वह फौरन आपको बता दे. ऐसा करने से हम बच्चों को उनके गुप्तांगों की निजता की जानकारी के साथ-साथ उन्हें बाल यौन शोषण से भी बचा सकेंगे.

5-6 वर्ष की उम्र में क्या बताएं
5-6 साल के बच्चे से मां कह सकती है कि आपको अब अपने प्राइवेट पार्ट्स मुझे भी नहीं दिखाने चाहिए, अतः अब आपको स्वयं स्नान करना होगा. इस तरह वे जान सकेंगे कि उनके प्राइवेट पार्ट बिल्कुल निजी हैं, जिन्हें किसी को भी देखने या छूने का हक़ नहीं.

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6-7 वर्ष में क्या बताएं
6-7 साल की उम्र के आस-पास के बच्चे माता-पिता पर बहुत ज़्यादा विश्‍वास करते हैं. वे अपने पिता को हीरो और मां को आदर्श मानने लगते हैं. उनके माता-पिता की कही बातें उनके लिए अंतिम वचन होती हैं. ऐसे में माता-पिता की ज़िम्मेदारी और भी ज़्यादा बढ़ जाती है कि वे अपने बच्चे के सामने ऐसी कोई हरकत या बात न करें, जिससे बच्चे के मन पर उनकी बुरी छवि बने, क्योंकि माता-पिता यदि इस उम्र में उनके सवालों का ग़लत जवाब देते हैं और बाद में उन्हें इसका पता चलता है, तो उनका माता-पिता पर से विश्‍वास उठने लगता है और उनके मन में बनी अपने अभिभावकों की श्रेष्ठ छवि भी धराशायी होने लगती है. अतः इस उम्र में माता-पिता को बहुत सतर्कता बरतनी चाहिए और बच्चों द्वारा पूछे सवालों का सही व तर्कपूर्ण जवाब देना चाहिए.

प्री-टीन्स (8 से 12 वर्ष)
इस समय बच्चों को उनके शरीर में आनेवाले बदलावों यानी माहवारी, स्तनों का विकास, गुप्तांगों में आनेवाले बाल आदि के बारे में बताएं. वैसे भी इस उम्र में लड़के-लड़कियां अपने शरीर में आनेवाले बदलावों को लेकर असमंजस की स्थिति में रहते हैं, ऐसे में आपका मार्गदर्शन उनकी कई उलझनें दूर कर सकता है.
अमूमन 12 वर्ष की उम्र में बच्चे सेक्स या बच्चे के जन्म-संबंधी बातों को समझने के लिए तैयार हो जाते हैं. उनके मन में सेक्स व सामाजिक संबंधों के बारे में जानने की उत्सुकता भी जागने लगती है. इस समय में उन्हें एसटीडी (सेक्सुअली ट्रांसमीटेड डिसीज़), टीन प्रेगनेंसी के नुक़सान आदि के बारे में बताएं, ताकि आगे चलकर वे ग़लत क़दम न उठा सकें.

टीनएजर्स (13 से 19 वर्ष)
ये उम्र का वो दौर होता है, जहां बच्चों को अपनी आज़ादी बेहद प्यारी होती है और उन पर अपने दोस्तों का बेहद असर होता है. कई बार न चाहते हुए भी दोस्तों की बातों में आकर युवा सेक्स को लेकर एक्सपेरिमेंट करने लगते हैं. फिर कई बार दोस्तों द्वारा मिला आधा-अधूरा ज्ञान उन्हें गुमराह भी कर देता है. दूसरे, सेक्स को लेकर इस उम्र में काफ़ी कुछ जानने की उत्सुकता भी रहती है. ऐसे में उत्तेजक जानकारियां उन्हें सेक्स के लिए उकसाने का भी काम कर सकती हैं. अतः इस उम्र में आप उन्हें टीन प्रेगनेंसी, सेक्सुअली ट्रांसमीटेड डिसीज़, गर्भपात से होनेवाली शारीरिक-मानसिक तकलीफ़ों से अवगत कराएं, ताकि वे गुमराह होने से बच सकें.

यूं करें बच्चे को सतर्क
बच्चों को अच्छे व बुरे स्पर्श के बारे में बताएं. यहां तक कि यदि कोई करीबी रिश्तेदार, पड़ोसी, टीचर या डॉक्टर आदि भी उन्हें ग़लत नीयत से छुए तो उन्हें ये हिदायत देकर रखें कि वे तुरंत आपको सूचित करें. आपकी ये ट्रेनिंग बच्चे को सेक्सुअल एब्यूज़ से बचाए रखेगी. क्योंकि कई बार ऐसा भी होता है कि करीबी लोगों के ग़लत स्पर्श को भी बच्चे ग़लत नहीं समझ पाते और जाने-अनजाने उनके मोहपाश में फंसते चले जाते हैं और माता-पिता को उनके सेक्सुअल शोषण की ख़बर तक नहीं लगती. और जब तक सच्चाई सामने आती है, तब तक कई बार बहुत देर हो चुकी होती है.

बच्चों के प्रश्‍नों का ग़लत जवाब न दें
अक्सर बच्चे माता-पिता से सवाल करते हैं कि उनका जन्म कैसे हुआ? इसके जवाब में कभी ‘तुम्हें हॉस्पिटल से लाए’, ‘भगवान जी से मांगा’ जैसे जवाब माता-पिता देते हैं, लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं. आप बच्चे को इतना तो बता ही सकते हैं कि वो मां के गर्भ में अंडा बनकर आया, फिर गर्भ में ही बड़ा हुआ और वेजाइना के रास्ते बाहर आया. यानी बच्चे जब भी पूछें, उनके किसी भी सवाल का संतुष्टिपूर्ण जवाब अवश्य दें, ताकि उन्हें सही जानकारी भी मिले और उनका आप पर पूरा विश्‍वास भी बना रहे और आगे भी वे अपने मन में उपजी हर जिज्ञासा आपसे पूछ सकें. यदि आपको बच्चे द्वारा पूछे गए सवाल का फ़िलहाल कोई उत्तर नहीं सूझ रहा है तो उससे कहें कि आप उसके सवाल का जवाब थोड़ी देर बाद देंगे और फिर सोच-समझकर बच्चे के प्रश्‍नों का तथ्यपूर्ण उत्तर दें. इसके अलावा यदि आपका बच्चा सेक्स संबंधी कोई प्रश्‍न न पूछे तो इसका मतलब ये नहीं कि आप इस विषय को नज़रअंदाज़ कर दें. आप बच्चे को शरीर विज्ञान के तौर पर सेक्स एज्युकेशन दे सकते हैं.

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सेक्स को टालना सिखाएं
यदि आपके टीनएजर बच्चे के मन में सेक्स के बारे में जानने या सेक्स पर प्रयोग करने की भावनाएं आती हैं, तो इसमें कोई बुराई नहीं. लेकिन ये हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम उन्हें इसे सही समय तक टालना सिखाएं. हम अपने बच्चों को इस तरह समझा सकते हैं कि जिस तरह खाने-पीने, सोने-जागने का उचित समय होता है, जिस तरह जीवन में हर चीज़ के लिए अनुशासन ज़रूरी है, उसी तरह सेक्स जीवन में प्रवेश करने की भी एक उम्र होती है. शारीरिक-मानसिक रूप से अपरिपक्व युवा जब सेक्स का आनंद लेने की कोशिश करते हैं तो उन्हें सिवाय पछतावे, ग्लानि और शारीरिक-मानसिक तकलीफ़ के और कुछ भी हासिल नहीं होता. सेक्स स़िर्फ इच्छापूर्ति का ज़ारिया नहीं, बल्कि प्रेम के इज़हार और उत्तम संतान की उत्पत्ति का सशक्त माध्यम भी है. अतः उन्हें समझाएं कि सेक्स को मात्र भोग या हवस पूरी करने का माध्यम न मानकर जीवन के अहम पहलू के तौर पर लिया जाना चाहिए, ताकि सेक्स जीवन का सही आनंद लिया जा सके.

क्यों ज़रूरी है सेक्स एजुकेशन?
यूं तो हमारे न बताने पर भी बच्चों को दोस्तों, पत्र-पत्रिकाओं या फिर इंटरनेट के ज़रिए सेक्स की जानकारी मिल ही जाती है, फिर भी क्यों हमें उन्हें सेक्स एजुकेशन देना चाहिए, आइए जानते हैं-
* उन्हें अपने शरीर के बारे में संपूर्ण जानकारी हो सके.
* वे लड़का-लड़की दोनों के ही साथ कंफ़र्टेबल होकर बातचीत व व्यवहार कर सकें.
* उनके साथ या किसी अन्य के साथ हो रहे सेक्सुअल शोषण, बलात्कार आदि को समझ सकें और उसे रोकने में सहयोग कर सकें.
* किशोरावस्था में होनेवाले शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सेक्सुअल बदलावों को जानने-समझने के लिए तैयार हो सकें.
* आगे चलकर जब उनके मन में सेक्स की भावना उत्पन्न हो, तो उसे हेल्दी तरी़के से ले सकें तथा इसे लेकर उनके मन में कोई अपराध भावना न जन्म ले.
* एसटीडी (सेक्सुअली ट्रांसमीटेड डिसीज़) से बचाव को लेकर जागरुक हो सकें.
* आगे चलकर एक सुखद वैवाहिक जीवन जी सकें तथा आदर्श अभिभावक की ज़िम्मेदारी निभाने के लायक बन सकें.

स्कूलों में सेक्स शिक्षा दी जाए या नहीं
बच्चों को सेक्स शिक्षा देना बेहद ज़रूरी है, लेकिन भारतीय स्कूलों में यदि सेक्स शिक्षा दी जाए तो निम्न बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है-
* सेक्स शिक्षा वही शिक्षक दें, जिनकी इस विषय पर अच्छी पकड़ हो तथा जो बच्चों के सवालों का जवाब वैज्ञानिक तथ्यों के साथ अर्थपूर्ण तरी़के से दे सकें.
* प्यूबर्टी पीरियड के शुरू होने से पहले सेक्स शिक्षा दी जाए.
* बच्चों को सेक्स शिक्षा देते समय भाषा तथा शब्दों पर विशेष ध्यान दिया जाए.
* धार्मिक या सांस्कृतिक मान्यताओं से परे वैज्ञानिक व सामाजिक मापदंडों को ध्यान में रखकर सेक्स शिक्षा दी जाए.
* लड़के-लड़कियों को एक साथ सेक्स शिक्षा दी जाए, ताकि आगे चलकर इस मुद्दे पर बात करते समय वे हिचकिचाएं नहीं.
* सेक्स शिक्षा देते समय स्केचेज़, डायग्राम, चार्ट, स्लाइड्स आदि का प्रयोग किया जाए, नग्न तस्वीरों, पोर्नोग्राफ़ी आदि का बिल्कुल भी प्रयोग न हो.
* बच्चों को उनके सवाल लिखकर देने का सुझाव भी दें, ताकि बच्चे पूछने से हिचकिचाएं नहीं तथा शिक्षक उनके मन को अच्छी तरह जान-समझ सकें.
* सेक्स शिक्षा हमेशा ग्रुप में दी जाए, अकेले नहीं.

– कमला बडोनी

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तलाक़ का बच्चों पर असर… (How Divorce Affects Children?)

Divorce

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तलाक़ स़िर्फ कपल्स के रिश्तों को ही नहीं तोड़ता, बल्कि ये बच्चों के कोमल दिल को भी गहरी ठेस पहुंचाता है. पैरैंट्स का अलगाव उन्हें अकेला और तनावग्रस्त कर देता है. बच्चों को तलाक़ के पीड़ादायक अनुभव से कैसे बचाया जा सकता है? जानने के लिए अरुण कुमार ने बात की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट पूनम राजभर से.

 

बच्चों की सही परवरिश के लिए माता-पिता दोनों के साथ, प्यार व दुलार क़ी ज़रूरत होती है, लेकिन तलाक़ के बाद बच्चा माता-पिता में से किसी एक से दूर हो जाता है, और ये अलगाव उसके कोमल मन को अंदर से तोड़ देता है. माता-पिता के बीच आई इस दूरी को कुछ बच्चे आसानी से सहन नहीं कर पातें और डिप्रेश हो जाते हैं. हाल ही में हुए एक अध्ययन में भी ये बात सामने आई है कि तलाक़शुदा दंपत्तियों के बच्चों का सामाजिक व मानसिक विकास ठीक से नहीं हो पाता. वो पढ़ाई में भी अन्य बच्चों से पिछड़ जाते हैं. माता-पिता के अलगाव का अलग-अलग उम्र के बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है? आइए, जानते हैं.

0-4 साल
4 साल की उम्र तक के बच्चे अपने आसपास रहनेवाले लोगों से ज़्यादा जुड़े रहते हैं, लेकिन उन्हें आसपास होनेवाली बातों व घटनाओं की समझ नहीं होती. ऐसे में यदि पैरेंट्स अलग होते हैं, तो बच्चे को ज़्यादा कुछ समझ नहीं आता. तलाक़ के बाद यदि बच्चे की कस्टडी मां के पास है, तो वो पिता की अनुपस्थिति का आदी हो जाता है, लेकिन हालात तब बिगड़ सकते हैं जब बच्चे को संभालने के लिए परिवार में मां के अलावा कोई और जैसे नाना, नानी या अन्य सदस्य न हों. इस उम्र के बच्चे भले ही पारिवारिक ढांचे को न समझ पाएं, लेकिन उन्हें ये ज़रूर महसूस होता है कि उनके आसपास सब कुछ सामान्य नहीं है.

पैरेंट्स क्या करें?
पति-पत्नी को चाहिए कि वे बच्चे की कस्टडी का मामला कोर्ट-कचहरी में ले जाने की बजाय आपसी सहमति से सुलझा लें. चूंकि इस उम्र में बच्चों को मां की ज़्यादा ज़रूरत होती है, इसलिए बेहतर होगा कि उसे मां के पास ही रहने दिया जाए (यदि मां आर्थिक रूप से सक्षम हो). यदि मां आर्थिक रूप से कमज़ोर है, तो उसे आर्थिक सहायता उपलब्ध करना पिता की ज़िम्मेदारी है.

5-10 साल
इस उम्र में बच्चे चीज़ों को समझने लगते हैं और अपनी इच्छाओं को भी अभिव्यक्त करते हैं. सीखने के लिहाज़ से ये उम्र बच्चों के लिए बहुत अहम होती है. ऐसे में तलाक़ के बाद उपजे तनाव से वो आत्मकेंद्रित, दुखी और कुंठित हो सकते हैं. इस उम्र के बच्चे तलाक़ जैसी चीज़ों को समझ नहीं पातें. इसलिए वो बार-बार यही सोचते रहते हैं कि आख़िर मेरे मम्मी-पापा अलग क्यों रह रहे हैं? मेरे दूसरे दोस्तों की तरह मेरे पैरेंट्स साथ क्यों नहीं रहते? ऐसे सवाल बार-बार बच्चों को परेशान करते रहते हैं. इतना ही नहीं इसका उनके मानसिक विकास पर भी नकारात्मक असर होता है.

क्या करें पैरेंट्स?
बच्चों की ख़ातिर घर का महौल ख़ुशनुमा बनाएं रखने का प्रयास करें. बच्चे को ज़्यादा से ज़्यादा समय देने की कोशिश करें. उसके सामने अपने पार्टनर (पति/पत्नी) की बुराई न करें. अगर बच्चा कोई सवाल पूछता है, तो प्यार से उसका जवाब दें. उसके सवालों से झलाएं नहीं. आपके तलाक़ की वजह से बच्चे को स्कूल फियर भी हो सकता है, क्योंकि स्कूल में दूसरे बच्चों द्वारा उसके पैरेंट्स के बारे में पूछे जाने पर वो शर्मिंदगी व अधूरापन महसूस कर सकता है. अतः बच्चे का आत्मविश्‍वास बढ़ाएं, उसे समझाएं कि किसी चीज़ से डरने की ज़रूरत नहीं है, आप हर समय उसके साथ हैं. अगर मुमक़िन हो, तो तलाक़ के बाद भी बच्चे को दूसरे पार्टनर से मिलने दें. भले ही उनकी मुलाक़ात हफ़्ते या महीने में ही क्यों न हो, पर इससे बच्चे के अकेलेपन व अधूरेपन का एहसास दूर हो जाएगा.

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11-15 साल
इस उम्र तक बच्चे समझदार हो जाते हैं. हार्मोनल बदलावों की वजह से वो किसी भी चीज़ की ओर तेज़ी से आकर्षित होते हैं. इस उम्र के बच्चे अपने माता-पिता के तलाक़ को लेकर परेशान हो जाते हैं कि आख़िर ये हो क्या रहा है? ये मेरे साथ ही क्यों हो रहा है? उम्र के इस दौर में बच्चे को इमोशनली मज़बूत बनाने के लिए माता-पिता दोनों के प्यार व मार्गदर्शन की ज़रूरत होती है. दरअसल, इस उम्र के बच्चे अपने पैरेंट्स के अलगाव को जल्दी स्वीकार नहीं कर पातें. अपने सबसे क़रीबी रिश्ते को टूटता देख उनका रिश्तों पर से विश्‍वास उठ सकता है. अक्सर देखा गया है कि माता-पिता दोनों का साथ व प्यार न मिल पाने की वजह से बच्चे ज़िद्दी बन जाते हैं. जब वो दूसरे बच्चों को अपने पैरेंट्स के साथ देखते हैं, तो उसका कोमल मन आहत हो जाता है और वो ख़ुद को अनलकी (दुर्भाग्यशाली) मानकर परेशान हो जाते हैं. शारीरिक विकास के चलते इस उम्र में लड़कियों को मां की स़ख्त ज़रूरत होती है, ऐसे में अगर उनकी कस्टडी पिता के पास है, तो अपनी भावनाओं व परेशानियों को किसी से शेयर न कर पाने की वजह से वो कुंठित हो सकती है. तलाक़ के बाद घर के तनावपूर्ण माहौल का बच्चों की पढ़ाई पर भी बुरा असर पड़ पड़ता है.

क्या करें पैरेंट्स?
बच्चे पर विशेष ध्यान दें. उनके हर प्रश्‍न का सकारात्मक उत्तर दें. उसे माता-पिता दोनों का प्यार देने की कोशिश करें, ताकि उसे आपके पार्टनर की कमी ज़्यादा न खले. मगर बिना सोचे-समझे उनकी हर डिमांड पूरी करने की ग़लती न करें, वरना वो ज़िद्दी बन जाएंगे. यह ज़रूरी है कि आप बच्चे से दोस्ताना संबंध बनाएं और उसकी बातें ध्यान से सुनें. हो सके तो उसे अपनी समस्याएं भी बताएं, लेकिन ये सब करते हुए बच्चे को ये न जताएं कि आप हालात से बेहद निराश हो चुकी हैं. आपकी बातें हमेशा सकारात्मक होनी चाहिए. साथ ही बच्चे को ऐसे संस्कार दें कि वो रिश्तों की अहमियत समझ सके. इसके अलावा अगर बच्चे को स्वीमिंग, डांसिंग, सिंगिंग या खेलों में दिलचस्पी है, तो उसे इसके लिए प्रोत्साहित करें. पढ़ाई को लेकर हर समय उसके पीछे न पड़ी रहें, लेकिन ऐसा भी न हो कि आप इस मामले में कुछ बोले ही न. आप उसके स्कूली अनुभवों को एक दोस्त की तरह सुनें और सही-ग़लत का फ़र्क समझने में उसकी मदद करें, लेकिन ध्यान रखें कि बच्चे को ऐसा न लगे कि आप ख़ुद को उस पर थोप रही हैं.

16- 20 साल
ये उम्र बेहद महत्वपूर्ण है. इस उम्र में बच्चों की एक अलग दुनिया होती है, वो अपने आनेवाले कल को संवारने की कोशिशों में लगे रहते हैं. ऐसे में पैरेंट्स का अलगाव उनके लिए पैरों तले ज़मीन खिसकने जैसा है. भविष्य के सपने संजोते, करियर को लेकर गंभीर बच्चों को तो माता-पिता का तलाक़ दुनिया उजड़ने जैसा लगता है. कई तो इस सदमे से ज़िंदगी के प्रति बिल्कुल उदासीन हो जाते हैं. घर का निराशाजनक माहौल उन्हें भी मायूस और निराश कर देता है. इतना ही नहीं तलाक़ को लेकर दोस्तों के सवाल या मज़ाक भी उन्हें परेशान करते हैं. बच्चा माता-पिता दोनों से ही दूर हो जाता है. इस हालात के लिए वो माता-पिता दोनों या किसी एक को स्वार्थी समझने लगते हैं और उनके प्रति उसके मन में नफ़रत की भावना घर कर लेती है. यानी तलाक़ स़िर्फ कपल्स को ही एक-दूसरे से अलग नहीं करता, बल्कि बच्चे को भी पैरेंट्स से दूर कर देता है.

क्या करें पैरेंट्स?
इस उम्र के बच्चों पर बिना किसी तरह का दबाव डालें उन्हें परिस्थितियों को स्वीकार करने के लिए तैयार करें. उसे समझाएं कि हर हाल में आप उसके साथ रहेंगी और आप दोनों मिलकर परिस्थितियों को बेहतर बना लेंगे. हो सके तो उसे तलाक़ की असली वजह समझाने की कोशिश करें ताकि वो आपको स्वार्थी न समझें. चूंकि इस उम्र के बच्चे हर चीज़ अच्छी तरह समझ सकते हैं, इसलिए आप उनसे अपनी समस्याएं भी डिस्कस कर सकती हैं. इस उम्र में बच्चे पढ़ाई और करियर को लेकर बेहद गंभीर होते हैं. ऐसे में उन्हें सही रास्ता दिखाना आपकी ज़िम्मेदारी है. उनके बेहतर भविष्य के लिए उन्हें नकारात्मक और तनावपूर्ण माहौल से दूर रखने की कोशिश करें. पैरेंट्स के अलगाव से परेशान बच्चे कई बार ग़लत संगत व नशे के भी आदी हो जाते हैं. अतः इस मुश्किल हालात में बच्चे का ख़ास ख़्याल रखें. उससे इस तरह पेश आएं कि वो अपने दिल की हर बात आपसे शेयर कर सके.

 

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बच्चों के लिए किस तरह बनाएं सेफ होम? (Home Safety Tips For Kids)

 

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अक्सर पैरेंट्स प्यार-दुलार में बच्चों को ऐसी चीज़ें मुहैया कराने में लगे रहते हैं, जिनका उनकी सुरक्षा और मनोरंजन से कोई लेना-देना नहीं होता. घर में बच्चों की सुरक्षा का किस तरह से ख़्याल रखें, आइए, इसके बारे में जानते हैं.

 

क्या आपने इस बात की तसल्ली कर ली है कि वो घर जिसे आपने ज़रूरत के हर समान से सजाया है, वह घर के सबसे छोटे सदस्य यानी बच्चे के लिए भी अनुकूल है? या फिर घर में बच्चों की सुरक्षा का भी ख़्याल रखा गया है. इसलिए एक बार घर को बच्चों की नज़र से भी देख लें. कहीं कोई अनजान ख़तरा बच्चों की तरफ़ क़दम तो नहीं बढ़ा रहा? आइए, इन्हीं बातों पर नज़र डालें.

* बच्चों के लिए घर तैयार करने से पहले उनकी तीन बातों को समझना ज़रूरी है- पहला उनका खेलना, दूसरा उनके खाने-पीने, सोने आदि रोज़मर्रा की दिनचर्या और तीसरा चोट व अन्य बीमारियों सेउनकी सुरक्षा.
* कम ऊंचाई और कोनों से गोलाई लिए फर्नीचर को घर में रखना अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करें.
* दीवारों पर नॉन टॉक्सिक पेंट्स लगाएं.
* दरअसल, सोते हुए बच्चों का पलटी मारना, चलना-गिरना स्वाभाविक क्रिया है, इसलिए कमरे में अधिक ऊंचाई का फर्नीचर न रखें. यानी जब बच्चे बहुत छोटे हों, तब कमरे में रखा बेड और सोफा छह इंच से अधिक ऊंचा न रखें, क्योंकि अनजाने में यदि बच्चा पलंग से गिरे भी, तो उसे अधिक चोट न आए.
* परदे की डोरी कई बार छोटे बच्चों के लिए ख़तरा बन जाती है, क्योंकि इससे खेल-खेल में गला घुटने की संभावना रहती है.
* किचन में गैस के क़रीब छोटे स्टूल/कुर्सी न रखें. कभी भी बच्चा इस पर चढ़कर गैस के बटन से छेड़छाड़ कर सकता है.
* यदि बच्चा बहुत छोटा है, तो घर की खिड़कियों में जाली और सीढ़ियों के पास हो सके, तो बेबी गेट लगवाएं.
* ज़मीन पर पानी गिरा हुआ न रहने दें. असावधानीवश बच्चे के फिसलने से चोट लगने या फ्रैक्चर होने का डर रहता है.
* टेबल या स्टैंड फैन न रखें. बच्चा बटन दबाकर फैन ऑन कर सकता है या उसकी उंगलियां पंखे में आ सकती हैं.
* ड्रेसिंग टेबल पर बाहर की तरफ़ क्रीम, पाउडर, सिंदूर आदि न रखें. बच्चा इन्हें मुंह में डाल सकता है, जो कभी-कभी जोख़िमभरा हो सकता है.
* मेनडोर खुला न रखें. बच्चे का हाथ दरवाज़े में आ सकता है या फिर बच्चा घर के बाहर निकलकर सीढ़ियों से नीचे गिर सकता है.
* इलेक्ट्रिक स्विच बोर्ड दीवारों पर नीचे की तरफ़ न लगाएं, बच्चे उनके बटन से खेलते हैं या फिर प्लग के साथ छेड़खानी करते हैं.
* किसी भी प्लग के ऊपर प्लास्टिक का आउटलेट लगाना एक सस्ता तरीक़ा है, पर यह ध्यान रहना चाहिए कि प्लग के यूज़ के बाद कवर को वापस लगा दें.
* यदि बालकनी है, तो रेलिंग में ग्रिल/जाली ज़रूर लगाएं, वरना बच्चे के गिरने का डर रहता है.
* आयरन, टोस्टर आदि ज़मीन पर ऑन करके इधर-उधर न जाएं, अनजाने में बच्चा जल सकता है.
* तमाम चीज़ें तभी आपको सुकून देंगी, जब घर में साफ़-सफ़ाई की उचित व्यवस्था होगी. हाइजीन का अच्छा स्तर बच्चों को कई तरह के इंफेक्शन से बचाता है.
* बाथरूम को हमेशा साफ़-सुथरा रखें.
* मोबाइल फोन, टेबलेट, आई पैड आदि छोटे बच्चों की पहुंच से दूर रखें. वे इनसे छेड़छाड़ करते हुए ख़ुद को नुक़सान पहुंचा सकते हैं.
* छोटे बच्चे किसी भी चीज़ को अपने मुंह में रख लेते हैं और इसका प्रभाव काफ़ी बुरा हो सकता है.
* इस बात का ध्यान रखें कि इस्तेमाल की हुई दवाइयां या ख़तरनाक केमिकल को कूड़े में डालकर उस पर कसकर ढक्कन लगा दें.
* इन्हें किचन या बाथरूम के डस्ट बिन में न डालें, जहां आपका बच्चा आसानी से पहुंच सकता है.

– ऊषा गुप्ता

बच्चों को कितनी पॉकेटमनी दें? (What Should Be Your Child’s Pocket Money?)

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पॉकेटमनी बच्चों को मनी मैनेजमेंट का पाठ सिखाने के साथ-साथ उनमें आर्थिक आत्मनिर्भरता के गुण भी विकसित करता है. बच्चों को पॉकेटमनी देने की सही उम्र क्या है और पैसे देते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? जानने की कोशिश की है मृदुला शर्मा ने.
कब शुरू करें पॉकेटमनी?

* वैसे तो पॉकेटमनी शुरू करने की कोई तय उम्र सीमा नहीं है, लेकिन आमतौर पर 7-8 साल के बाद की उम्र सही मानी जाती है.

* इस उम्र तक पहुंचते-पहुंचते बच्चे पैसे की वैल्यू समझने लगते हैं, साथ ही पैसे संभालना भी सीख जाते हैं.

* अत: यह उम्र पॉकेटमनी शुरू करने का सही समय माना जाता है.

* शुरुआत में कम पैसे दें.

* पूरे महीने का ख़र्च एक साथ देने के बजाय ह़फ़्ते के हिसाब से पॉकेटमनी दें और उसे समझाएं कि किन चीज़ों पर पैसे ख़र्च कर सकता है?

* अगर आप शुरुआत में बच्चे को पॉकेटमनी ख़र्च करने में दिशा-निर्देशन नहीं करेंगी तो हो सकता है कि वो सारे पैसे एक साथ ही ख़र्च कर दे और फिर से पैसे मांगने लगे.

* इससे बचने के लिए बच्चे का ख़र्च पूछें और पॉकेटमनी मैनेज करने में उसकी मदद करें.

* किसी तरह की परेशानी होने पर आप से डिस्कस करने के लिए कहें.

* साथ ही उसे यह हिदायत भी दें कि तय समय के पहले पैसे ख़र्च करने पर उसे फिर से पैसे नहीं मिलेंगे.

* इससे बच्चे में योजनाबद्ध तरी़के से ख़र्च करने की आदत पड़ेगी.

पॉकेटमनी में शामिल ख़र्च

बच्चे को पॉकेटमनी देते समय अच्छी तरह से समझा दें कि किन चीज़ों का ख़र्च उसे पॉकेटमनी से निकालना होगा. हो सके तो उसे पॉकेटमनी में शामिल किए जाने वाले ख़र्च की लिस्ट बनाकर दें, ताकि उसे ध्यान में रखकर बच्चा ख़र्च व बचत का हिसाब लगा सके. आमतौर पर छोटे-मोटे ख़र्चे, जैसे- स्कूल कैंटीन का ख़र्च, स्टेशनरी इत्यादि का ख़र्च बच्चे अपने पॉकेटमनी से निकालते हैं. थोड़े बड़े बच्चे पॉकेटमनी से अपनी मनपसंद चीज़ें, जैसे-आइसक्रीम, स्वीट, छोटे-मोटे खिलौने व अपने फ्रेंड के लिए बर्थडे ग़िफ़्ट भी ख़रीदते हैं.

कितना पॉकेटमनी है सही?

बच्चे की ज़रूरत व आवश्यकता को ध्यान में रखकर पॉकेटमनी की राशि तय करें. राशि तय करने से पहले हो सके तो बच्चे के फ्रेंड के पैरेंट्स से डिस्कस कर लें. पॉकेटमनी उसके दोस्तों से न तो बहुत ज़्यादा, न ही बहुत कम होनी चाहिए. ज़्यादा पैसे मिलने पर उसे फ़िजूलख़र्ची की आदत पड़ सकती है, वहीं दोस्तों की तुलना में कम पैसे मिलने पर वह हीनभावना से ग्रसित हो सकता है. शुरुआत में उतने ही पैसे दें, जिससे वे अपने लिए छोटी-छोटी चीज़ें, जैसे- मनपसंद टॉफ़ी, पेंसिल, स्टीकर आदि ख़रीद सके.

कब बंद करें?

* बच्चे को पॉकेटमनी तब तक देते रहें, जब तक वो फुलटाइम जॉब न करने लगे.

* अगर वो पार्ट टाइम जॉब करता है तो भी उसकी पॉकेटमनी बंद न करें.

* हां, हर महीने पॉकेटमनी देने के बजाय दो-तीन महीने में तय रकम दे दें या फिर उसके ज़रूरत का सामान ख़रीदने में मदद करें.

एसोसिएट चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा किए गए सर्वे के अनुसार, पिछले एक दशक में बच्चों को मिलने वाले पॉकेटमनी की राशि में 6 गुना वृद्धि हुई है. लड़के अपनी पॉकेटमनी इलेक्ट्रॉनिक आइटम पर ख़र्च करते हैं, जबकि लड़कियां कपड़े, जूते, बैग्स व मेकअप आइटम पर ख़र्च करती हैं.

 

बच्चों में टेक एडिक्शन के साइड इफेक्ट्स

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बच्चों में बढ़ता मोबाइल और कंप्यूटर का इस्तेमाल उन्हें स्मार्ट तो बना रहा है, लेकिन इसके अत्यधिक इस्तेमाल से कई नुक़सान भी हो सकते हैं. इसलिए ज़रूरी है बच्चों को टेक एडिक्शन से बचाना.
क्या है टेक एडिक्शन?

टेक्नोलॉजी यानी मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट आज हमारी ज़रूरत बन गए हैं और इस टेक्नोलॉजी ने ज़िंदगी को आसान भी बना दिया है. लेकिन जब यही टेक्नोलॉजी ज़िंदगी की ज़रूरत बन जाए, इतनी ज़्यादा ज़रूरी लगने लगे कि इसके बिना कुछ घंटे बिताना भी मुश्किल हो जाए. ज़्यादातर व़क्त बस मोबाइल या सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर ही बीतने लगे, इस वजह से परिवार, रिश्तेदार और सोसायटी से भी कटने लगें, तो समझ जाइए कि आप टेक एडिक्शन का शिकार हो गए हैं.

बच्चे ज़्यादा हो रहे हैं शिकार

हालांकि तय गाइडलाइन के अनुसार 15-16 वर्ष के पहले बच्चों को मोबाइल फोन या कंप्यूटर नहीं देना चाहिए, लेकिन आज की बिज़ी लाइफ की मजबूरी कहें या अपने बच्चों की सुरक्षा की चिंता या बच्चों को टेक्नोफ्रेंडली बनाने की चाहत, पैरेंट्स बहुत ही कम उम्र में बच्चों को मोबाइल-लैपटॉप दे देते हैं और एक बार गैजेट्स हाथ में आ जाएं, तो बच्चे इंटरनेट, ऑनलाइन गेम्स, सोशल नेटवर्किंग को ही अपनी दुनिया बना लेते हैं.
हालांकि टेक एडिक्शन कोई मानसिक बीमारी नहीं है, लेकिन इसके कई साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं. ये साइड इफेक्ट्स सोशल, बिहेवियरल या हेल्थ से संबंधित हो सकते हैं.

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टेक एडिक्शन के साइड इफेक्ट्स
बच्चे को क्लासरूम में भी अक्सर नींद आती है. वो हर व़क्त उनींदा-सा रहता है.
 अपने असाइनमेंट समय पर पूरे नहीं कर पाता.
खान-पान संबंधी उसकी आदतें भी बदल जाती हैं. अब न उसे खाने का ध्यान रहता है, न सोने का.
दोस्तों से मिलने की बजाय कंप्यूटर या मोबाइल पर समय बिताना ज़्यादा पसंद करता है.
कंप्यूटर या वीडियो गेम के बारे में झूठ भी बोलता है.
सोशल होने से कतराता है. फैमिली गेट टुगेदर या आउटडोर स्पोर्ट्स उसे बोरिंग लगने लगते हैं.
अगर ऑनलाइन न हो, तो अजीब-सी बेचैनी और चिड़चिड़ाहट उसके चेहरे पर साफ़ दिखाई देती है.
ऑफलाइन रहने पर भी या तो पहले की ऑनलाइन एक्टिविटीज़ के बारे में सोचता रहता है या फिर ऑनलाइन आने पर क्या करेगा, इसकी प्लानिंग करता रहता है. इसके अलावा टेक एडिक्शन से बच्चे को हेल्थ प्रॉब्लम्स भी हो सकती हैं.
वो ओबेसिटी, हाइपरटेंशन या इनसोमनिया का शिकार हो सकता है.
लगातार स्क्रीन पर देखते रहने से आंखों पर स्ट्रेस पड़ता है. इससे उसकी आंखों की रोशनी बहुत कम उम्र में प्रभावित हो सकती है.
बच्चा कंप्यूटर विज़न सिंड्रोम का शिकार हो सकता है.
लगातार कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल के इस्तेमाल से गर्दन और कंधे में दर्द की शिकायत हो सकती है.
ग़लत पोश्‍चर से कम उम्र में ही कमरदर्द या पीठदर्द भी हो सकता है.
लगातार कीपैड यूज़ करने से उंगलियों और कलाई में दर्द की शिकायत हो सकती है.
मोबाइल हो, कंप्यूटर-लैपटॉप या टीवी- बच्चे हेडफोन यूज़ करते ही हैं. हेडफोन के अधिक इस्तेमाल से सुनने की क्षमता पर असर पड़ता है. इससे एकाग्रता में भी कमी आती है.
एक सर्वे के अनुसार, 9 से 12 साल के उम्र के 60% स्टूडेंट दिन में लगभग 3 घंटे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बिताते हैं.   3
तो क्या करें पैरेंट्स?

बच्चे को मोबाइल या कंप्यूटर से पूरी तरह दूर रखना मुश्किल है और ऐसा करना भी नहीं चाहिए. इसलिए पैरेंट्स को कुछ ऐसे तरी़के तलाशने होंगे कि वे मोबाइल या कंप्यूटर यूज़ करने पर कंट्रोल कर सकें. इसके लिए पैरेंट्स ये ट्रिक्स ट्राई कर सकते हैं.

बच्चे को मोबाइल, लैपटॉप या कोई और गैजेट्स देने से पहले ही कुछ नियम बना लें और बच्चे से पहले ही कह दें कि उसे इन नियमों का पालन करना ही होगा.
ध्यान रहे, किसी भी चीज़ के लिए एकदम बैन न लगाएं, बल्कि इन गैजेट्स के इस्तेमाल के संबंध में अपने बच्चे के लिए एक समय सीमा निर्धारित करें. एक गाइडलाइन बनाएं और बच्चे को समझाएं कि उनकी सुरक्षा के लिए ये गाइडलाइन ज़रूरी है.
♦ बच्चों को देर रात तक मोबाइल, कंप्यूटर या इंटरनेट पर रहनेे की इजाज़त न दें.
♦ उनकी ऑनलाइन एक्टीविटीज़ और फ्रेंड्स पर नज़र रखें. बच्चे के पासवर्ड, स्क्रीन नेम और अन्य अकाउंट इंफॉर्मेशन की जानकारी रखें.
♦ आजकल कई ऐसे सॉफ्टवेयर और ऐप्स उपलब्ध हैं, जो विभिन्न साइट्स और उनके कंटेन्ट को फिल्टर करते हैं. इन्हें अपने कंप्यूटर और मोबाइल में इंस्टॉल करवाएं, ताकि आपका बच्चा कोई गैरज़रूरी साइट न ओपन कर सके.
उसे इन टेक्नोलॉजी के अधिक इस्तेमाल से होनेवाले नुक़सान के बारे में भी समझाएं. यक़ीन मानिए एक बार उसे समझ आ जाएगा, तो वो सतर्क रहेगा.
आज जबकि दुनिया हाईटेक हो रही है, तो ऐसे में बच्चों को टेक्नोलॉजी से दूर रखना ना तो मुमकिन है और न ही ऐसा करना समझदारी है. ऐसे में पैरेंट्स को ही गाइडलाइन बनानी होगी, बच्चों को टेक एडिक्शन के साइट इफेक्ट्स के बारे में बताना होगा, ताकि बच्चा टेक्नोफ्रेंडली भी बने और उसे किसी तरह का नुक़सान भी न हो.
                                                           

– श्रेया तिवारी