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पहला अफेयर- हस्ताक्षर! (Pahla Affair)

pahla affair

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पहला प्यार! एक उम्र का सफ़र तय करने के बाद जब पीछे मुड़कर बहुत पुरानी किसी उम्र की गलियों में मन यादों की खाक़ में ढूंढ़ता है, तो पहला प्यार अक्सर किसी पुरानी डायरी के पन्नों के बीच दबे हुए गुलाब के फूल के रूप में मन के कोने में रिसते हुए घाव के रूप में या बहुत जतन से दबाकर सबकी नज़रों से छुपाकर रखे गए पत्र के रूप में बचा रह जाता है.

मेरा पहला प्यार भी तो बस जतन से संभालकर रखे गए ऐसे ही एक प्रतीक के रूप में आज तक मेरी क़िताबों के बीच सुरक्षित रखा हुआ है. एक डायरी में उसके हस्ताक्षर के रूप में सहेजा हुआ है.

वो बारहवीं का साल था. सोलह बसंत पूरे करके सत्रहवें बसंत में पांव रखा ही था मैंने. तभी हमारी क्लास में एक नए लड़ने ने प्रवेश लिया- प्रवीण! जैसाकि नाम था, वो सचमुच बहुत मेधावी था. मासूम-सा चेहरा, बहुत ही सुंदर, सपनों में खोई-खोई-सी आंखें. हमेशा चुप-चुप-सा, पढ़ाई में डूबा रहता. जहां क्लास के सारे लड़के लड़कियों के आगे-पीछे मंडराते रहते, कमेंट्स करते, वहीं उसे मैंने कभी किसी लड़की की ओर आंख उठाकर देखते हुए भी नहीं देखा. वो बाकी सब लड़कों से बहुत अलग था. उसका यह अलग-सा होना ही दिल के दरवाज़े पर अनायास मासूम-सी दस्तक दे गया. एक नितांत नई भावना का हृदय में उठना. एक प्यारे-से मीठे से भाव का उदय. हृदय के खाली वीरान आकाश पर एक चंद्रमा का उग आना. मन के रंगमंच पर एक अपरिचित, अनजान मेहमान का अनाधिकार, बलात् प्रवेश. दिल का दरवाज़ा खुला और मैं एक बहुत ही ख़ुशगवार, रूमानी दुनिया में पहुंच गई.

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अब तो बीमार होऊं, चाहे घर में मेहमान हों, कोई भी ज़रूरी काम हो, मैं कभी स्कूल से छुट्टी नहीं करती थी. पूरे रास्ते, स्कूल के गेट और क्लास रूम के दरवाज़े पर पहुंचने तक मन कितना बेचैन हो जाता था. आंखें बस एक ही चेहरा तलाशती रहती थीं. आपस में कभी भी हमारी बात नहीं हो पाई, लेकिन तुम्हारा उसी कमरे में होना कितना रोमांचित कर जाता था मुझे. एक मीठा-सा सुकून कि तुम पास हो, बहुत पास. न जाने कब कलम, साइंस के प्रैक्टिकल लिखने की जगह कविताएं लिखने लगीं. मासूम दिल की मासूम-सी चाहतें और उन सारी चाहतों, ख़्वाहिशों का एक-एक कर काग़ज़ पर उतरना.

और कब स़िर्फ उसे देखते रहने की सुकून में ही पूरा साल निकल गया. कुछ दिन और बचे थे और फिर प्रिपरेशन लीव, फिर परीक्षा… उसके बाद पता नहीं कौन किस कॉलेज में जाता है. मन की उदासी गहराने लगी थी. मूक प्यार को शब्द देने का साहस नहीं था तब. परीक्षा के लिए क्लासेस बंद होने के एक दिन पहले अपने सभी सहपाठियों के लिए हाथ से ग्रीटिंग बनाए और प्रवीण के लिए ख़ास लाल गुलाबवाला कार्ड बनाया. अपनी ऑटोग्राफ डायरी साथ ले गई और सभी लोगों के ऑटोग्राफ लिए. तब न मोबाइल थे और न ही सबके घरों में टेलीफोन ही थे. उस दिन छूटा हुआ पहला प्यार हमेशा के लिए दिल में याद बनकर और डायरी में हस्ताक्षर बनकर ही रह गया. जब भी उसके हस्ताक्षर देखती हूं, सोचती हूं क्या उनके मन के किसी कोने में मैं भी लाल गुलाब के कार्ड के रूप में बसी होऊंगी?

– डॉ. विनीता राहुरीकर

 

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