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टीवी के परफेक्शनिस्ट कहे जानेवाले वरुण बडोला किसी ऑलराउंडर से कम नहीं हैं. एक्टिंग, सिंगिंग, राइटिंग, डायरेक्शन… जाने कितनी खूबियों है उनमें. उनकी सीरियल ‘मेरे डैड की दुल्हन’ काफ़ी पसंद की जा रही है. इसमें भी अंबर शर्मा के रोल में ख़ूब छाए हुए हैं. एक पिता की दोस्ती, नाराज़गी, बचपना, ज़िद्दीपना इन सब की लाजवाब अभिनय अदायगी की है वरुण ने. इसमें अंजलि, जो उनकी बेटी निया बनी हैं, उनके साथ वरुण की बॉन्डिंग और ट्यूनिंग देखते ही बनती है. लेकिन दर्शक ख़ासकर उनकी और गुनित सिक्का यानी श्‍वेता तिवारी की नोकझोंक और प्यार को काफ़ी पसंद करते हैं.

इसी सीरियल से श्‍वेता तिवारी ने भी क़रीब तीन साल बाद छोटे पर्दे पर वापसी की है. वरुण-श्‍वेता की ऑन और ऑफ केमिस्ट्री लाजवाब है. सीरियल में तो दोनों काफ़ी लड़ते-झगड़ते और एक-दूसरे को अनजाने में प्यार भी करते हैं, मगर सेट पर भी दोनों ख़ूब एक-दूसरे की टांग खींचते हैं. उसमें सबसे आगे वरुण रहते हैं. दोनों के बीच काफ़ी हंसी-मजाक और शर्तें लगती रहती हैं.
एक बार ऐसे ही एक शर्त दोनों के बीच लगी थी. वरुण शर्त हार गए. यह तय हुआ थी कि जो हारेगा उसे जीतनेवाले का कहना मानना पड़ेगा और उसका काम करना पड़ेगा. तब उस दिन श्वेता तिवारी ने पूरे दिन वरुण से अपना मेकअप करवाया. जबकि सच्चाई यह है कि वरुण को मेकअप की एबीसी भी नहीं पता. इसके बावजूद बेचारे पूरे दिन जैसे-तैसे श्वेता का मेकअप करते रहे. दोनों के साथ अंजलि, जो मेरे डैड की दुल्हन में वरुण की बेटी बनी है, तीनों की केमेस्ट्री सीरियल में देखते ही बनती है और इसे लोग पसंद भी बेहद कर रहे हैं.
वरुण का मानना है कि श्‍वेता बहुत बढ़िया खाना बनाती हैं. उन्होंने सेट पर टीम के लिए कई बार भोजन भी बनाया है. सभी इसका ख़ूब स्वाद लेते हैं. सेट पर जब भी वक़्त मिलता है वरुण और श्वेता अक्सर चैस यानी शतरंज और डार्ट गेम खेलते हैं.
इसमें कोई दो राय नहीं कि वरुण बडोला एक अलग अंदाज़ में मेरे डैड की दुल्हन में नज़र आते हैं. इसमें एक पिता-बेटी का ख़ूबसूरत रिश्ता दिखाया गया है. आज के जमाने की तरह दोनों फादर-डॉटर नहीं, बल्कि दोस्त की तरह एक-दूसरे के साथ व्यवहार करते हैं. इसी सीरियल में वरुण किशोर कुमार के ज़बर्दस्त प्रशंसक है और ख़ुद भी गुनगुनाते रहते हैं. गाने सुनते नज़र आते हैं. श्‍वेता भी पसंद करती हैं किशोर दा को, तो दोनों की पसंद भी देखते बनती हैं. लेकिन रियल लाइफ में भी वरुण बढ़िया गाते हैं. अक्सर एक-से-एक पुराने गीतों के खज़ाने देखने को मिलते हैं उनके सोशल मीडिया अकाउंट पर. उनके फैंस भी फरमाइश करते रहते हैं कि और भी नए-नए वीडियो शेयर किया करें.
वरुण अपने अभिनय व काम में भी काफ़ी मेहनत करते हैं. छोटी-छोटी बारीकियों पर ध्यान देते हैं. एक बार तो ऐसा भी हुआ था कि मेरे डैड की दुल्हन के डायरेक्टर को काम से विदेश जाना पड़ा, क्योंकि इसकी कुछ शूटिंग विदेश में भी हुई थी. तब यहां का शूट वरुण बडोला ने ख़ुद सम्भाला और किया था यानी डायरेक्शन की ज़िम्मेदारी भी उन्होंने निभाई. अभिनय में आने से पहले उन्होंने राइटिंग, निर्देशन हर एक क्षेत्र में काम किया है.
वरुण बडोला ने राजेश्वरी सचदेवा से शादी की है. वह भी एक बेहतरीन अभिनेत्री और सिंगर हैं. दोनों पति-पत्नी कई शो में काम कर चुके हैं और नच बलिए पार्ट टू में तो दोनों सेमीफाइनल तक पहुंचे थे. तब दोनों का डांस टैलेंट भी देखने मिला था. अक्सर अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर वरुण पत्नी राजेश्वरी व बेटे देवागय के साथ गाते-गुनगुनाते रहते हैं.
एक बार वरुण ने रणवीर सिंह तक को चुनौती दे दी थी. किस्सा यूं था की 83 फिल्म, जो भारत के साल 1983 में पहली बार क्रिकेट वर्ल्ड कप जीतने पर आधारित है. इसमें रणवीर सिंह कपिल देव की भूमिका निभा रहे हैं. उस पर वरुण ने एक बार यह स्टेटमेंट दिया था कि माना रणवीर ने कपिल देव की वेशभूषा-स्टाइल सब कुछ बेहतरीन ढंग से की है, लेकिन बोलिंग में उनसे बेहतर हैं. वरुण का यह मानना है कि वह रणवीर से बहुत अच्छी पुल ऑफ बॉलिंग कर सकते हैं. वरुण अपनी बेबाकी के लिए भी जाने जाते हैं, जो उन्हें सही लगता है, वे बड़े सिंपल तरीक़े से कह देते हैं बिना लाग लपेट के.
वे महेंद्र सिंह धोनी के ज़बर्दस्त फैन भी हैं. एक बार अपने बड़े भाई के 25 सालगिरह में उनको महेंद्र सिंह धोनी से मिलने का मौक़ा मिला, तो उनके साथ फोटो खिंचवाकर उन्होंने सोशल मीडिया पर शेयर किया था. उन्होंने स्पेशली साक्षी को भी धन्यवाद कहा था कि एक पहाड़ी में दूसरे पहाड़ी की भावनाओं को समझा और मुलाक़ात करवाई.
समय-समय पर वरुण ने साबित किया है कि वे न केवल एक अच्छे अभिनेता हैं, बल्कि अच्छे गायक, निर्देशक लेखक और जिंदादिल इंसान भी हैं यानी सही मायने में परफेक्शनिस्ट और ऑलराउंडर.

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Phir wahi raat hai. Phir wahi, raat hai khwaab ki.

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Another gem from KK Da

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Trust me this is true.

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न जाने वे दिन कहां खो गए, जब सर्दियों की धूप में अलसाते हुए हम छत पर लेटे रहते थे… या फिर गर्मियों की शाम को बाहर बगीचे में चैन से सब्ज़ी काट रहे होते थे… न कोई टेंशन होती थी और न ही कोई जल्दबाज़ी. एक सुकून था जीवन में और थी एक सहजता. 

Disintegrating life

आज यह नज़ारा देखने तक को नहीं मिलता कि कहीं दो पल भी बैठकर कोई औरत, ख़ासकर कामकाजी, यूं ही सुस्ता ले. ऐसा सोचना तक संभव नहीं लगता, क्योंकि वह तो आज इतनी व्यस्त हो गई है कि केवल उसे काम समेटने की जल्दी रहती है. बस, किसी तरह से यह काम निपट जाए, तो वह दूसरा काम निपटाए. नतीजा, इस समेटने के चक्कर में अक्सर वह उन छोटी-छोटी ख़ुशियों को नज़रअंदाज कर देती है, जो जीवन की सहजता को बनाए रखने के लिए आवश्यक होती हैं. सहजता न हो, तो बिखराव अपनी जड़ें फैलाने लगता है.

क्यों बिखरने लगती है ज़िंदगी?

 

परफेक्शनिस्ट बनने की चाह
बदलती जीवनशैली और कामकाजी होने की ज़रूरत के कारण आज महिलाओं के पास समय की कमी होने लगी है. जो समय उनके पास है, उसमें ही वह बहुत कुछ करना चाहती हैं और वो भी एकदम परफेक्शन के साथ, ताकि कोई यह न कह सके कि वह घर और बाहर दोनों को एक साथ संभालने में अक्षम है. कोई यह आरोप न लगा सके कि उसने जो काम करने की राह चुनी है, वो उसका सबसे ग़लत फैसला है. घर की ज़िम्मेदारियों को सही तरह से निभा सके, इसलिए वह न स़िर्फ ख़ुद को एक अनुशासन के दायरे में बांधती है, बल्कि अपने परिवार को भी उसमें कैद कर लेती है. पति-बच्चे, जो एक सामान्य जीवन जीना चाहते हैं या सहज वातावरण चाहते हैं, उन पर अंकुश लग जाता है. यह अंकुश बोझिलता तो लाता ही है, साथ ही रिश्तों में बिखराव को भी आमंत्रित करता है. काम को समेटने की टेंशन उन्हें परफेक्शनिस्ट बना देती है और परफेक्शनिस्ट कभी संतुष्ट नहीं हो पाते हैं, बल्कि अपनी बात दूसरों पर थोपने की उन्हें आदत पड़ जाती है.

काम को एंजॉय नहीं करतीं
सच्चाई तो यही है कि ऐसी महिलाएं, जिन्हें हमेशा काम ख़त्म करने की जल्दी रहती है, वे अपने काम को कभी एंजॉय ही नहीं कर पाती हैं. उनके दिलो-दिमाग़ पर हमेशा एक बोझ-सा बना रहता है कि काम समेटना है. समय पर वह काम नहीं पूरा हुआ, तो दूसरे काम को वह कैसे पूरा कर पाएंगी. यह डर उन्हें हमेशा सताता रहता है. ज़ाहिर है, घर के सदस्यों पर इसका असर तो पड़ेगा ही. उनके अंदर भी एक झल्लाहट कायम हो जाती है और शुरू हो जाता है मन-मुटाव और दोषारोपण का सिलसिला.

अवास्तविक अपेक्षाएं
परफेक्शन और ऑर्गेनाइज़्ड तरह से काम करने की आदत या इसे एक सनक भी कह सकते हैं, अवास्तविक अपेक्षाओं को जन्म देती है. ऐसे लोगों के साथ व्यवहार करना मुश्किल हो जाता है. इस पर सायकोलॉजिस्ट मनु पारेख कहते हैं, जिन महिलाओं को हमेशा यह टेंशन घेरे रहती है कि जल्दी-जल्दी काम ख़त्म करना है, दरअसल, वे अवास्तविक अपेक्षाओं के साथ जीने लगती हैं. ऐसे में परिवार के सदस्यों का यह कर्तव्य बनता है कि वे भी उसे सहयोग दें. ये अवास्तविक अपेक्षाएं संबंधों में मतभेद का कारण बनती हैं. इतना ही नहीं, ऐसे लोगों की फिज़िकल और इमोशनल हेल्थ पर भी इसका असर पड़ता है. साथ ही वे डिप्रेशन के शिकार भी हो जाते हैं.

भूल जाते हैं खुलकर जीना
चाहे घर का काम हो या ऑफिस का या फिर किसी फंक्शन-पार्टी में जाना हो, काम समेटने का बोझ लेकर चलनेवालों को कुछ भी लुभाता नहीं. वे खुलकर जीना तो जैसे भूल ही जाते हैं और एक मशीन की तरह अपने दायित्वों को निभाते रहते हैं.

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क्या करें?

आपकी ज़िंदगी बिखरने लगे और बाद में केवल पछतावा ही हाथ आए, उससे पहले ही स्वयं को संभाल लें और काम समेटने की जल्दी करने की बजाय उसे ख़ुशी से करें.

अपनाएं कुछ टिप्स

एक समय सीमा निर्धारित करें
सच तो यह है कि घर के काम कभी ख़त्म नहीं होते हैं. चाहे आप कितनी ही सफ़ाई से आज घर के फर्श को साफ़कर लें, पर कल कोई गंदे जूते लेकर अंदर आ ही जाएगा. इस बात से ग़ुस्सा होने या उस पर चिल्लाने की बजाय या फिर घंटों सफ़ाई में जुटे रहने की बजाय सफ़ाई के लिए एक समय तय करें. जब टेंशन फ्री होकर काम करेंगी, तब काम जल्दी हो जाएगा और घर का माहौल भी ख़राब नहीं होगा.

इम्परफेक्ट होने के फ़ायदों पर ग़ौर करें
परफेक्शनिस्ट होना कोई गर्व की बात नहीं है. मनु पारेख मानते हैं कि परफेक्शनिस्ट एक व्यावहारिक इंसान की तुलना में काम पूरा करने या कमिटमेंट निभाने में ज़्यादा समय लेता है. वह अपने दायित्वों को ख़ुशी से नहीं, बल्कि बोझ की तरह पूरा करता है. उनका बिहेवियर कंट्रोल करनेवाला होता है, जिससे सहजता और काम की ख़ूबसूरती उन्हें नज़र नहीं आती और
उनके काम के स्तर के गिरने के साथ-साथ उसमें अधूरापन भी झलकता है. इम्परफेक्ट होकर देखें, आप अपना धैर्य भी नहीं खोएंगी और काम भी हो जाएगा. परिवार के लोग आपसे ख़ुश रहेंगे, तो आप भी रिश्तों को संभाले
रख पाएंगी.

मदद लें
सुपरवुमन बनने की बजाय घर के सदस्यों से मदद लें. काम बांटें. आपको उन्हें यह दिखाने की ज़रूरत नहीं है कि आप सब कर सकती हैं. साथ मिलकर काम करने से प्यार भी बढ़ता है और दूरियां भी नहीं आतीं.

रिलैक्स रहना सीखें
ग़लतियां आप भी कर सकती हैं, काम आप भी अधूरा छोड़ सकती हैं, तो इसमें बुरा क्या है. इसे स्वीकार करना सीखें. यक़ीन मानिए कोई आपको दोष नहीं देगा. रिलैक्स रहें और दूसरों को भी रहने दें. काम नहीं सिमट पाया, तो कोई पहाड़ तो नहीं टूट जाएगा. कल हो जाएगा, पर परिवार का साथ ज़रूरी है. बच्चों को समय दें. खाना नहीं बनाना है, तो बाहर से मंगा लें. इसको लेकर अपराधबोध न महसूस करें.

जीवन को जटिल नहीं, आसान बनाएं
ज़रूरी तो नहीं कि हर व़क्त जैसा आप चाहती हैं, वैसा ही हो. परिवारवालों की ख़ुशी के लिए अक्सर कुछ बातों को नज़रअंदाज़ करना पड़ता है. इसलिए आप भी जो चीज़ें जैसी हैं, उन्हें वैसा ही स्वीकार करें और फिर देखें जीवन कितना सहज और आसान हो जाएगा.

एक दिलचस्प कहानी

पॉटरी क्लास की एक दिलचस्प कहानी है. इसमें लोगों को दो समूहों में बांटा जाता है. पहले समूह को कहा जाता है कि उनके काम को पॉट्स के वज़न या मात्रा के अनुसार आंका जाएगा, जबकि दूसरे समूह को कहा जाता है कि उन्हें दो दिन दिए जाते हैं और उसमें उन्हें एकदम परफेक्ट पॉट तैयार करना है. अब ज़रा सोचिए, कौन-सा समूह ज़्यादा क्रिएटिव रहा होगा. बेशक, पहलेवाला, क्योंकि उन्होंने काम के दौरान ख़ूब मस्ती की, हंसे, कई पॉट भी तोड़े और ख़ूब हंगामा किया यानी अपने काम को पूरी तरह एंजॉय किया. लेकिन दूसरा समूह ऐसा नहीं कर पाया. एकदम परफेक्ट कलाकृति तैयार करने की टेंशन का आप अंदाज़ा लगा सकते हैं. मास्टर पीस बनाने की धुन में हंसना तो दूर की बात है, उन्होंने एक-दूसरे के साथ बात करना भी समय की बर्बादी समझी होगी.

– सुमन बाजपेयी