Play therapy

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यूं तो बच्चों के खेल को अक्सर मौज-मस्ती के रूप में देखा जाता है, लेकिन जब यही खेल उनकी समस्या और बीमारी को दूर करने का साधन बन जाए तो क्या कहने? जी हां. इलाज की इस प्रक्रिया को ‘प्ले थेरेपी’ कहते हैं, जहां बच्चों के खेल की रुचि और पसंद को देखकर सायकोलॉजिस्ट उनका इलाज करते हैं.

एक प्रचलित मुहावरा है- बच्चों का खेल. आमतौर पर हम इस मुहावरे का इस्तेमाल तब करते हैं, जब कोई काम हद दर्जे तक आसान लगे. इतना आसान कि चुटकी बजाते ही हो जाए. लेकिन ज़रा सोचिए, क्या बच्चों का खेल इतना आसान और नज़रअंदाज कर देनेवाला होता है? दरअसल, जब आपका बच्चा खेल रहा होता है तो वह काम कर रहा होता है. वह काम उतना ही महत्वपूर्ण होता है, जितना कि हमारे अन्य काम या यूं कहें कि उससे भी कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है बच्चों का खेल.

बच्चों द्वारा खेले जानेवाले खेल उनके विकास क्रम का एक अहम् हिस्सा होता है. बच्चे जो भी देखते और सुनते हैं, खेलने के दौरान उसकी नकल करते हैं. डांटने वाले पापा, लोरियां सुनाने वाली मम्मी, माला फिरानेवाली दादी से लेकर बात-बात में चपत लगाने वाली टीचर तक के क़िरदारों में ख़ुद को ढालते हैं. एक तरह से देखा जाए तो बच्चे खेलते समय अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा बड़ा बनने की कोशिश करते हैं. दरअसल, खेलते समय बच्चों का रचनात्मक मस्तिष्क काम कर रहा होता है, इसलिए बच्चे किसी भी वस्तु को खिलौना समझकर खेल सकते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो बच्चों का खेल एक भाषा है, ख़िलौने इस भाषा के शब्द हैं. बच्चे इसी भाषा के माध्यम से अपनी भावनाओं से दूसरों को अवगत कराने का प्रयत्न करते हैं.
बच्चों के खेल कई मायनों में इसलिए भी अहम् हो जाते हैं कि देखा गया है कि खेल के माध्यम से बच्चे आनेवाली किसी चुनौती या डर का सामना करने के लिए पूर्वाभ्यास करते हैं, मसलन- इंजेक्शन लगवाने से डरनेवाले बच्चे डॉक्टर के पास जाने से पहले अपने भाई-बहन के साथ ‘डॉक्टर-डॉक्टर’ खेलते हुए इंजेक्शन लगवाने का पूर्वाभ्यास करते हुए देखे जाते हैं, इसलिए बड़ों को चाहिए कि वे बच्चों द्वारा खेले जानेवाले खेलों को महज़ बच्चों का खेल न समझें. ये खेल बच्चों के मानसिक, सामाजिक और व्यावहारिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं.

प्ले थेरेपी- खेल खेल में इलाज

बच्चों के खेल का महत्व तब बढ़ जाता है, जब आपका बच्चा किसी व्यावहारिक या मानसिक समस्या से ग्रसित हो. प्ले थेरेपी (खेल चिकित्सा) बच्चों की ऐसी मनोवैज्ञानिक समस्याओं से निज़ात दिलाने का अहम् साधन है. मानसिक समस्याओं से जूझ रहे बच्चों के लिए प्ले थेरेपी बहुत ही सहायक साबित हो सकती है ऐसा कहना है मनोचिकित्सक डॉ. अंजलि छाबरिया का. वे कहती हैं, “जब एक वयस्क व्यक्ति दु:खी होता है या उसे ग़ुस्सा आता है, तो वह बोलकर, चिल्लाकर अपनी भावनाओं को जता सकता है, जबकि बच्चों के साथ यह समस्या है कि वे अपनी भावनाओं को प्रकट नहीं कर पाते हैं. इसी वजह से वे कटे-कटे से रहने लगते हैं. साथ ही आज के वर्किंग पैरेन्ट्स के युग में अभिभावकों के पास इतना समय भी नहीं होता कि वे उनसे इत्मीनान से बात कर सकें, उनके दु:ख को समझने की कोशिश कर सकें.
ऐसे में ‘प्ले थेरेपी’ का महत्व और बढ़ जाता है. प्ले थेरेपिस्ट बच्चों के साथ खेलते हैं. बच्चों के साथ बच्चों जैसा व्यवहार करते हैं. खेलने के दौरान वे बच्चों से बातचीत भी करते हैं. दोस्ताना माहौल बन जाने पर बातों ही बातों में वे उनकी समस्या को जानने का प्रयत्न करते हैं. वे खेलते हुए बच्चों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण करते हैं कि बच्चे किस तरह से खेलते हैं. कौन-से खिलौने चुनते हैं. इस तरह वे बच्चों की मानसिक प्रक्रिया का अंदाज़ा लगाते हैं. बच्चों द्वारा चुने गए खिलौने, उसका खेलने का तरीक़ा खेल चिकित्सक को बच्चे के व्यक्तित्व, उसकी समस्या, मानसिक अवस्था इत्यादि के बारे में बहुत कुछ स्पष्ट कर देता है. उन्होंने बताया कि यह ज़रूरी नहीं है कि डॉक्टर एक ही बार में बच्चे की समस्या समझ लें और बच्चा ठीक हो जाए. इसमें दो-तीन महीने भी लग सकते हैं.
डॉ. अंजलि छाबरिया ने आगे बताते हुए कहा कि आजकल प्ले थेरेपी के लिए आनेवाले बच्चों की मुख्य समस्या होती है एज्युकेशनल प्रेशर (शैक्षणिक दबाव). बचपन के दिन जहां खेलने-कूदने के लिए होते हैं, वहीं बच्चों पर बढ़ रहे पढ़ाई के दबाव से वे समय से पहले ही बड़े होने के लिए बाध्य हो रहे हैं, जो कि उनके सामान्य विकास में बड़ी बाधा है. वे आत्मकेंद्रित हो जाते हैं. उनका ज्ञान व्यावहारिक न होकर क़िताबी हो जाता है. वे अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं, इसीलिए धीरे-धीरे उनका व्यवहार ईर्ष्यालु और दब्बू हो जाता है.
उन्होंने बताया कि बच्चों में सायकोलॉजिकल प्रॉब्लम का दूसरा सबसे बड़ा कारण है माता-पिता का तनावपूर्ण वैवाहिक जीवन. जिन वैवाहिक जोड़ों के संबंध तनावपूर्ण रहते हैं, आमतौर पर उनके बच्चे शंकालू, डरपोक, चिड़चिड़े, अधिक ग़ुस्सा करनेवाले तथा एकाकी हो जाते हैं. इन बच्चों में असुरक्षा का भाव अधिक होता है. इसी तरह के एक केस का ज़िक्र करते हुए उन्होंने बताया कि किस तरह उन्होंने प्ले थेरेपी द्वारा 10 वर्ष के राहुल (परिवर्तित नाम) का सफलतापूर्वक इलाज किया.
राहुल के मम्मी-पापा का वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण था. वे तलाक़ लेना चाहते थे. लेकिन इसका सबसे अधिक असर हुआ राहुल के हंसते-खेलते बचपन पर. वह सहमा-सहमा सा रहता था. मम्मी-पापा को लड़ते-झगड़े देख रोने लगता था. स्कूल में भी वह किसी से बात नहीं करता था. पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता था. उसका स्वास्थ्य भी ख़राब रहने लगा. जब उसे प्ले थेरेपी के लिए लाया गया, तो यहां पर भी वह गुमसुम ही रहता था. इसलिए उसकी चचेरी बहन को भी उसके साथ खेलने के लिए बुलाने लगे. धीरे-धीरे जब वह घुल-मिल गया तो उसने बताया कि उसे डर लगता है कि अगर उसके पैरेन्ट्स उसे छोड़ देंगे, तो उसका क्या होगा? वह ख़ुद को असुरक्षित महसूस करता है. राहुल की समस्या मालूम होने के बाद उसके मम्मी-पापा को बुलाया गया. उनकी काउंसलिंग की गई. उन्हें भी यह बात समझ में आयी कि तनावपूर्ण वैवाहिक जीवन का बच्चे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. वे अपने सारे मतभेद भुलाकर एक हो गए. राहुल आज काफ़ी ख़ुश है, उसकी मानसिक स्थिति सामान्य है.

अभिभावकों का सकारात्मक व्यवहार भी है ज़रूरी

प्ले थेरेपी द्वारा थेरेपिस्ट बच्चों की मानसिक समस्याओं का पता तो लगा सकता है, किंतु उन समस्याओं को दूर करने की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उनके अभिभावकों की होती है, क्योंकि बच्चे ज़्यादातर समय उनके साथ ही रहते हैं. अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों को बताएं कि वे उनसे कितना प्यार करते हैं, उनके लिए वे कितने महत्त्वपूर्ण हैं.
जब आपका बच्चा किसी बात से डर जाए तो उन्हें समझाएं, न कि और डराने का प्रयत्न करें. उस व़क़्त उनके साथ रहें, जिससे उन्हें महसूस हो कि आप उनके साथ हैं उनकी रक्षा के लिए. अगर आपका बच्चा कुछ अच्छा कर रहा हो या उसने किसी स्पर्धा में कोई पुरस्कार प्राप्त किया हो, तो उसकी सराहना करें. यह न देखें कि प्रतियोगिता कितनी छोटी या बड़ी थी. इससे उसमें ख़ुद के महत्वपूर्ण होने का भाव जागेगा.
अगर कभी निंदा करनी पड़े तो उसके ग़लत व्यवहार की निंदा करें, न कि उसकी. वह ग़लती करे तो यह न कहें कि तुम बड़े ख़राब हो या शैतान हो. इसके बजाय उसे यह समझाने का प्रयत्न करें कि उसने क्या ग़लत किया है.
इन सबके साथ सबसे ज़रूरी बात यह है कि बच्चों को खेलने की पूरी आज़ादी दें. खेलते समय उनको ध्यान से देखें, हो सके तो साथ में कुछ समय खेलें और उनका मार्गदर्शन करें. इस दौरान उनकी रुचियों और पसंद-नापसंद को परखें. उनके खेल में बाधा न डालें, क्योंकि बच्चों द्वारा खेले जानेवाले खेल ‘बच्चों का खेल’ नहीं होते, बल्कि वयस्क बनने की दिशा में इनके द्वारा किया जानेवाला पूर्वाभ्यास होता है.

‘प्ले थेरेपी’ कब ज़रूरी?

अगर बच्चों में नीचे दी गई कोई समस्या हो तो प्ले थेरेपी से उसे दूर किया जा सकता है.
* यदि बच्चे या टीनएजर्स उपेक्षित, समाज या परिवार से कटे हुए हों.
* वे बच्चे जो पारिवारिक या सामाजिक समस्याओं से ग्रस्त हों, मसलन- माता-पिता के बीच अलगाव होने से मानसिक तौर पर परेशान या किसी नए परिवेश में ख़ुद को ढालने के लिए प्रयत्नशील हों.
* यदि यौन शोषण के शिकार हों.
* वे बच्चे जो बीमार हों या किसी ऐसी शारीरिक व्याधि से जूझ रहे हों, जो उनके सामान्य विकास में अवरोधक हो.
* जो हिंसा के शिकार हों.
* जो एज्युकेशनल प्रेशर का शिकार हों.
* वे बच्चे जो भावनात्मक और व्यावहारिक परेशानियों का सामना कर रहे हों, जैसे- मानसिक तनाव, डिप्रेशन या चिड़चिड़ापन, ज़्यादा क्रोध आना इत्यादि.

– अमरेन्द्र यादव