poem

सुनो कवि..
पहाड़ी के उस पार
वो स्त्री.. रोप रही है नई-नई पौध
सभ्यताओं की
और उधर.. गंगा के किनारे
विवश खड़ी है.. वो स्त्री
एक और ‘कर्ण’ लिए
तर-बतर हैं दोनों की ही आंखें
बताओ तो
क्या गीले नहीं हुए अब भी तुम्हारे शब्द!

सुनो लेखक..
पीठ पर बच्चा बांधे
वह स्त्री कर रही है मजदूरी
और उधर, व्यस्त है वो स्त्री कब से
सरकारें बनाने-गिराने में
कहो न
क्यों तुम्हारी बहस में शामिल नहीं होते वो नाम
जो संभाले रहते हैं गृहस्थी को अंत तक!

सुनो ईश्वर..
तुमने तुलसी को गढ़ा, लक्ष्मी को भेजा..
दुर्गा, सीता, राधा, मीरा..
जब भी दफ़नाया होगा उसने अपने सपनों को
थोड़ा-बहुत तुम भी मृत ज़रूर हुए होंगे
बता सकते हो
क्यों हर बार रखा तुमने उसको पराश्रित ही!

नहीं है कोई जवाब.. किसी के पास भी!

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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झूठ-मूठ खांसा क्या बहू ने बन गए झटपट काम
पलंग छोड़ सासू भागी, उनका जीना हुआ हराम
जीना हुआ हराम सोचें, ‘क्यूं बाई की छुट्टी कर दी’
मन मसोस के बोलीं, ‘बहू तुमने तो हद ही कर दी’
जा कर करो आराम कमरे के बाहर मत आना
ख़बरदार जो आ पास मेरे अब पांव-हाथ दबाना
धो-धोकर हाथ थक गई, सासूजी कर कर काम
लाख समझाया फिर भी दूर से उसे किया सलाम…

लेटे लेटे देख रहा था टीवी, त्राहि त्राहि करोना करोना
थमा दिया बीवी ने झाड़ू प्रियतम कुछ तुम भी करो ना प्यारी वोडका से ऐसे डिस्पेंन्सर भर डाले, कुछ पूछो ना
छिला कलेजा उससे हाथों को सबका रह रह के धोना…

कोई कुछ करने नहीं देता कहता
घर में रहो ना
फिर भी ये शब्द हर ज़ुबां पे गूंजा
करोना… करोना…

कोरोना- एक अलग पहलू यह भी…

क्यों है कोरोना को रोना
कोरोना कोरोना, क्या रोना,
सब जो ठाने वो ही होना,
बस 3 एहतियात बरतना,
बाहर ज़रूरी तो ही जाना.
वरना घर का पकड़ो कोना

सबसे 3 फ़ीट दूर रहो ना,
इसी दूरी से बात करो ना.
हर 20 मिनट,20 सेकेंड,
तुम अपने हाथों को धोना.

शेष हुई प्रकृति की मर्ज़ी
उससे खिलवाड़ करो ना
अब धर्मों का छोड़ो रोना
तुम केवल इंसान बनो ना…

 
Corona Qahar
Dr. Neerja Srivastava 'Neeru'
डॉ. नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू’

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एक चुप होती हुई स्त्री कहती है बहुत कुछ…

तुलसी जताती है नाराज़गी
नहीं बिखेरती वो मंजरी
सारी फुलवारियां गुमसुम हो जाती हैं
घर की
कनेर.. सूरजमुखी..
सबके चेहरे नहीं दिखते
पहले जैसे
छौंका-तड़का हो जाता है और भी तीखा
रसोईघर में
नहीं मोहती ज़्यादा
भीने पकवानों की ख़ुशबू
और..
दूध उफन बाहर आता है रोज़

एक चुप होती हुई स्त्री..
मानो पृथ्वी का रुके रह जाना
अपनी धुरी पर

एक चुप होती हुई स्त्री..
लांघती है मन ही मन
खोखले रिश्तों की दीवारें
और प्रस्थान कर जाती देहरी के बाहर
बिना कोई आवाज़ किए हुए ही

एक चुप होती हुई स्त्री..
और भी बहुत कुछ सोचती है
वह ‘आती’ तो है
हां, उसे आना ही पड़ता है
पर, वह फिर कभी नहीं लौटती
पहले की तरह…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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Kavya

इस से पहले कि
मैं तुम्हें
आई लव यू
कहने का साहस जुटा सकूं
डरता हूं
कहीं ये तीन शब्द
डिक्शनरी से
डिलीट न हो जाएं
वजह इतनी आसान होती
तो बता देता
न जाने क्यों
वे सारे शब्द डिक्शनरी में हैं
जो बोले और कहे जा सकते हैं
और मुझे अपना प्यार
उन शब्दों से परे लगता है
जो बोले कहे लिखे जा सकें
या इस जहां में कहीं भी
किसी भी डिक्शनरी में मौजूद हों…

– शिखर प्रयाग

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Kavita

जिस दिन
तमन्ना बड़ी और
हौसला छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन
राजनीति बड़ी
और दोस्ती छोटी हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन रिश्ते में
अहंकार बड़ा
और प्यार छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन
दौलत बड़ी
और आदमी छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन काम बड़ा
और उसे करनेवाले छोटे हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन
सरहद बड़ी
और बलिदान छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम

जिस दिन
दिमाग़ बड़ा
और दिल छोटा हो जाए
समझना कि
हार गए तुम…

Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
Kavya

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आज के हालातों में
हर कोई ‘बचा’ रहा है कुछ न कुछ
पर, नहीं सोचा जा रहा है
‘प्रेम’ के लिए
कहीं भी..

हां, शायद
‘उस प्रलय’ में भी
नाव में ही बचा रह गया था ‘कुछ’
कुछ संस्कृति..
कुछ सभ्यताएं..
और
.. थोड़ा सा आदमी!

प्रेम तब भी नहीं था
आज भी नहीं है
.. वही ‘छूटता’ है हर बार
हर प्रलय में
पता नहीं क्यों…

Hindi Kavita
Namita Gupta
नमिता गुप्ता

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सांस, ख़ुशबू गुलाब की हो

धड़कन ख़्वाब हो जाए

उम्र तो ठहरी रहे

हसरत जवान हो जाए

बहार उतरे तो कैमरा लेकर

तेरी सूरत से प्यार ले जाए

जो नाचता है मोर सावन में

तेरी सीरत उधार ले जाए

लहर गुज़रे तेरे दर से तमन्ना बनकर

तेरे यौवन का भार ले जाए

आज मौसम में कुछ नमी उतरे

तेरी परछाईं बहार ले जाए

रात ख़ामोश हो गई क्यूं कर

अपना सन्नाटा चीर दे बोलो

तेरी आंखों से प्यार ले जाए

ऐ दोस्त ‘तेरी हस्ती’ लिखूं कैसे

फ़क्र हो अगर ‘तुझ पे’

मेरी हस्ती निसार हो जाए…

– शिखर प्रयाग

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Kavya
Poetry

तेरी तस्वीर…

मैं जहां में
कुछ अनोखी चीज़
ढूंढ़ने निकला
और शहर में मुझे
सिर्फ़ आईना मिला
जो मेरी बेबसी पर
मुस्कुराता दिखा
वही
जब दिल के सामने रखा
तो बेसाख्ता
तेरी तस्वीर देख
जवाब मिल गया…

ज़िंदगी के पन्ने

दे देना
वे शब्द
मुझे जो
तुम्हारे दिल के
क़रीब होकर गुज़रे
होंगे शब्द वो
तुम्हारे लिए
अनजाने ही वो
मेरे लिए
ज़िंदगी के
पन्ने हो जाएंगे…

Poetry

Murali Srivastava
मुरली श्रीवास्तव

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वह स्त्री..
बचाए रखती है कुछ ‘सिक्के’
पुरानी गुल्लक में
पता नहीं कब से
कभी खोलती भी नहीं
कभी-कभार देखकर हो जाती है संतुष्ट

वह स्त्री..
बचाए रखती है कुछ ‘पल’
फ़ुर्सत के
सहेजती ही रहती है
पर, फ़ुर्सत कहां मिलती है
उन्हें एक बार भी जीने की

वह स्त्री..
बचाए रखती है कुछ ‘स्पर्श’
अनछुए से
महसूस करती रहती है
कभी छू ही नहीं पाती
अंत तक

वह स्त्री..
झाड़ती-बुहारती है सब जगह
सजाती है करीने से
एक-एक कोना
सहजे रखती है कुछ ‘जगहें’
आगंतुकों के लिए
पर, तलाशती रहती है ‘एक कोना’
अपने लिए
अपने ही घर में
अंत तक…

Kavita

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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बरखा रानी लगता है तुम, युगों के बाद आई हो
धरती की प्यास बुझाने, कितनी ठंडक लाई हो

मीठी यादें, अल्हड़ सपने, तुम झोली में भर लाई हो
तपते-जलते आकुल मन में, बनके शांति मुस्काई हो

सूरज की तपिश झेलकर, तुम वाष्प बन जाती हो
फिर अंबर के आंगन में, संगठित हो जाती हो

अपने अस्तित्व को खोकर, सबकी प्यास बुझाती हो
परिवर्तन और त्याग ही जीवन है, ये पाठ पढ़ाती हो

bhaavana prakaash
भावना प्रकाश

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Kavita- Barkha Rani

वृक्षों से ही वन बनते हैं, धरती हरी-भरी करते हैं।
वर्षा के कारण हैं जंगल, जिससे होता सबका मंगल।

वृक्षों बिन क्या जीवन होता, प्राण वायु हर कोई खोता।
काट-काट वृक्षों को ढोता, बिन वर्षा किस्मत को रोता।

जंगल धरती क्षरण बचायें, वर्षा जल भूतल पहुँचायें।
बाढ़ जनित विपदाएं आयें, अपनी करनी का फल पायें।

कितने प्राणी वन में रहते, प्रकृति संतुलन सब मिल करते।
जीव सभी हैं इन पर निर्भर, वनवासी के भी हैं ये घर।

औषधि भोजन लकड़ी देते, नहीं कभी कुछ वापस लेते।
अर्थव्यवस्था इनसे चलती, सारी दुनिया इन पर पलती।

औषधियाँ दें कितनी सारी, हरते हैं हारी बीमारी।
अंग-अंग गुणवान वनों का, संयम से संधान वनों का।

लकड़ी जो पेड़ों से मिलती, आग तभी चूल्हों में जलती।
अब विकल्प इसका आया, हमने नव ईंधन अपनाया।

काष्ठ शिल्प बिन वन कब होता, जीवनयापन साधन खोता।
घर के खिड़की अरु दरवाजे, गाड़ी हल लकड़ी से साजे।

वन की कीमत हम पहचानें, इन पर निर्भर सबकी जानें।
संरक्षण इनका है करना, सदा संतुलित दोहन करना।

काटना तनिक रोपना ज्यादा, करना होगा सबको वादा।
जीवन का आधार यही है, वन संरक्षण लक्ष्य सही है।

प्रवीण त्रिपाठी

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लो बीत गया
दिन एक और
चाहे जैसा गुज़रा
यह दिन
अब बंद हो चुका है
मेरी स्मृति की क़ैद में
और भी जाने कितने
अनगिनत दिन
बंद है इस क़ैद में
कब मिलेगा इन
छटपटाते दिनों को
इस क़ैद से छुटकारा
शायद तब, जब मौत करेगी
आकर आलिंगन मेरा
ये दिन तो छूट जाएंगे
इस क़ैद से
किंतु मैं स्वयं,
क़ैद होकर रह जाऊंगा
एक शून्य में…

दिनेश खन्ना
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