Poems

तुम्हारे शहर की अजब कहानी है… काग़ज़ों की कश्ती है, बारिशों का पानी है…
मिलते तो हैं लोग मुस्कुराकर यहां, पर ये भी दिखावे की ही एक निशानी है…
चाशनी में लिपटे रिश्ते हैं, पर इनको अपना समझ बैठना महज़ एक नादानी है…
चेहरे पे चेहरा है, राज़ ये गहरा है… अपनों को ही ठगने की यहां रीत पुरानी है…
किसे अपना कहें, किसे पराया… यही तो सबसे बड़ी परेशानी है…
ज़ुबां है जुदा, आंखें हैं ख़फ़ा… ख़ाक हो गए ख़्वाब, सुनो ये दास्तान मेरी ही ज़ुबानी है…
बेलौस मुहब्बत हुआ करती थी कभी यहां भी… लेकिन अब खो सी गई उसकी जवानी है…
भीतर से बदरंग है सबकी काया… झूठा है बाहरी दिखावा, पर ये कहते हैं हमारा चेहरा नूरानी है…
कहने को रौनक़ें हैं, रातें भी गुलाबी हैं… पर वो इक शाम कहीं नज़र नहीं आती, जो तुम संग मुझे बितानी है…

  • गीता शर्मा

सर्द मौसम में सुबह की गुनगुनी धूप जैसी तुम… 

तपते रेगिस्तान में पानी की बूंद जैसी तुम…

सुबह-सुबह नर्म गुलाब पर बिखरी ओस जैसी तुम…

हर शाम आंगन में महकती रातरानी सी तुम…

मैं अगर गुल हूं तो गुलमोहर जैसी तुम… 

मैं मुसाफ़िर, मेरी मंज़िल सी तुम…

ज़माने की दुशवारियों के बीच मेरे दर्द को पनाह देती तुम…

मेरी नींदों में हसीन ख़्वाबों सी तुम… 

मेरी जागती आंखों में ज़िंदगी की उम्मीदों सी तुम… 

मैं ज़र्रा, मुझे तराशती सी तुम… 

मैं भटकता राही, मुझे तलाशती सी तुम… 

मैं इश्क़, मुझमें सिमटती सी तुम… 

मैं टूटा-बिखरा अधूरा सा, मुझे मुकम्मल करती सी तुम… 

मैं अब मैं कहां, मुझमें भी हो तुम… बस तुम… सिर्फ़ तुम!

गीता शर्मा

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