Poetries

इतनी क्यूं है हलचल
मन घबराए हर पल
बस जहां देखो वहीं है
इस मुए कोरोना वायरस की दहशत

वायरस है, आया है चला जाएगा
दुनिया को हाथ धोना सीखा जाएगा
खौफ़ और आतंक ना बनने दें इसे
यह तो सफ़ाई का सबक सीखा जाएगा

Poetries

मनुष्य जब ख़ुद को भगवान समझने लगे
हर चीज़ पर अपना हक़ जताने लगे
तब कुदरत की ख़ामोशी से एक लाठी चलती है
कहती है, आज भी अब भी हमारी चलती है

कल को यह चिंता शायद बेतुकी लगे
कल को यह खौफ़ शायद मज़ाक लगे
इस वक़्त की बस यही है गुहार
धोते रहो अपने हाथ बार-बार…

Poetries

यह भी ज़रूरी था…

बेलगाम हुई जा रही थी ज़िंदगी
सरपट अंधाधुंध दौड़ रही थी ज़िंदगी
थक-हारकर कहीं सांसें टूट ना जाएं
रफ़्तार को लगाम लगाना थोड़ा ज़रूरी था

धरती मां को जो हमने ज़ख़्म दिए
घायल किया ना जाने कितने दर्द दिए
इससे पहले कुदरत और रूद्र हो जाए
इसके ज़ख़्मों पर मलहम लगाना थोड़ा ज़रूरी था

मनुष्य ही मनुष्य का दुश्मन बन गया था
अपने ही अहम में चूर हो गया था
उसे इंसानियत से प्यार हो
अपने किए पर पश्चाताप हो
इसका एहसास दिलाना थोड़ा ज़रूरी था…

Priya Malhotra
प्रिया मल्होत्रा
Corona

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दिवाली की झालरें…

..टिम-टिम करती
रंग-बिरंगी झिलमिलाती हुईं झालरें
बतियाती रही रातभर
दो सहेलियों की तरह
कभी हंसतीं-खिलखिलाती..
कभी चुप-चुप
पोंछती आंसुओं को
एक-दूसरे के
दर्द.. कुछ क़िस्से..
कुछ तेरे.. कुछ मेरे..

शोर पटखों का भी अवाक् रहा..
“सहेलियां हमेशा बहुत बातूनी ही होतीं हैं”..
समझ से परे रही यह बात उनके लिए
अब तक…

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मैंने रोशनी सा झिलमिलाने की बात की…

जब-जब भी दिखा गाढ़ा अंधेरा कहीं
मैैंने रोशनी सा झिलमिलाने बात की..

यहां जब भी चलन था आगे बढ़ने का
मैंने बीते पलों को संजोने की बात की..

आता है तुम्हें दुनिया को जीने का हुनर
पर मैंने ख़ुद को जिए जाने की बात की..

जहां उलझनों में उलझना ही सबब था
मैंने आभावों में भी उड़ने की बात की..

तुम तो खो ही गए थे इस सफ़र में कहीं
मैंने अंत तक तुमको तलाशने की बात की..

जहां शोर था मिलने और बिछड़ने का ही
मैंने मौन में ही अपने मिलने की बात की..

चाहे कोई जवाब आए या न आए तुम्हारा
फिर भी रोज़ ख़त लिखने की बात की..

और..
जीते रहे समझौतों को सौग़ात समझकर
मैंने बिना शर्त प्रेम किए जाने की बात की…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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