poetry

प्रेम कथाओं के पृष्ठों पर, जब-जब कहीं निहारा होगा
सच मानो मेरी आंखों में केवल चित्र तुम्हारा होगा

कभी याद तो करके देखो, भूले बिसरे चौराहों को
कान लगा कर सुनो कभी, अपने अंतर की चाहों को

कभी अधर तो सौंपे होंगे, अपनी चंदन सी बांहों को
कस्तूरी सी गंध समझ, हर संभव मुझे बिसारा होगा
सच मानो मेरी…

कई बरस तेरे माथे पर रखी मैंने काजल बिंदिया
कहीं उड़ाकर ले जाती थी, इन आंखों से मेरी निंदिया

संभवता कभी लगाई हूं, एकाकी क्षण में वो बिंदिया
क्या हुआ कभी आभास नहीं, यहीं कहीं बंजारा होगा
सच मानो मेरी…

यह सोच खुले ही छोड़ दिए, इस हृदय भुवन के द्वार सभी
कोई कुछ मुझको कहे मगर, भेडूंगी नहीं किवाड़ अभी

वापस लौट गए तुम यदि तो, यह ज्वाला न होगी शांत कभी
आहट-आहट कान लगाए, तुमने मुझे पुकारा होगा
सच मानो मेरी…

अब दूल्हा सा तुम सज धज, खड़े हुए हो इस आंगन में
लगा रहे हो आग और अब, इस रिमझिम-रिमझिम सावन में

और किसी की किन्तु धरोहर, शोभित हो इस मन दर्पण में
‘डाली’ मर्यादित प्रश्नों पर, किंचित नहीं विचारा होगा
सच मानो मेरी आंखों में, केवल चित्र तुम्हारा होगा

प्रेम कथाओं के पृष्ठों पर, जब-जब कहीं निहारा होगा
सच मानो मेरी…

अखिलेश तिवारी ‘डाली’

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हज़ारों तीर किसी की कमान से गुज़रे
ये एक हम ही थे जो फिर भी शान से गुज़रे

कभी ज़मीन कभी आसमान से गुज़रे
जुनून-ए-इश्क़ में किस-किस जहान से गुज़रे

किसी की याद ने बेचैन कर दिया दिल को
परिंदे उड़ते हुए जब मकान से गुज़रे

जिन्होंने अहदे-वफ़ा के दीये बुझाए थे
तमाम नाम वही दास्तान से गुज़रे

हमारे इश्क़ का आलम तो देखिए साहिब
रहे-वफ़ा में बड़ी आनबान से गुज़रे

न आया हर्फ़े-शिकायत कभी भी होंठों पर
हज़ार बार तिरे दर्मियान से गुज़रे

कभी दिमाग़ कभी दिल ने हार मानी है
तमाम उम्र यूं ही इम्तिहान से गुज़रे

जो आज बच के गुज़रते हैं बूढ़े बरगद से
कभी ये लोग इसी सायबान से गुज़रे

हमारे शेर हैं मशहूर इसलिए ‘डाॅली’
हमारे शेर तुम्हारी ज़ुबान से गुज़रे…

– अखिलेश तिवारी ‘डाॅली’

Gazal

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कशमकश में थी कि कहूं कैसे मैं मन के जज़्बात को
पढ़ा तुमको जब, कि मन मेरा भी बेनकाब हो गया

नहीं पता था कि असर होता है इतना ‘जज़्बातों’ में
लिखा तुमको तो हर एक शब्द बहकी शराब हो गया

‘संजोए’ रखा था जिसको कहीं ख़ुद से भी छिपाकर
हर्फ-दर-हर्फ वो बेइंतहा.. बेसबब.. बेहिसाब हो गया

हां, कहीं कोई कुछ तो कमी थी इस भरे-पूरे आंगन में
बस एक तेरे ही आ जाने से घर मेरा आबाद हो गया

मुद्दतों से एक ख़्वाहिश थी कि कहना है ‘बहुत कुछ’
तुम सामने जो आए, क्यों ये दिल चुपचाप हो गया

सोचती थी मैं जिसको सिर्फ़ ख़्यालों में ही अब तलक
मिला वो, तो बहुत ख़ूबसूरत मेरा ‘इंतज़ार’ हो गया

ये ‘वक़्त के लेखे’ मिटाए कब मिटे ‘मनसी’
जो था नहीं लकीरों में, आज राज़ वो सरेआम हो गया…

Namita Gupta 'Manasi'
नमिता गुप्ता’ मनसी’

Poetry

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मैं आज भी 
वही तो कह रहा हूं
जो सालों से कह रहा था
तुम भी तो सुन रहे हो
सालों से मुझे
मैं कह कहां रहा हूं
और तुम सुन कहां रहे हो
तुम सुन लेते तो
मेरा कहना रुक जाता
और मैं वह कह पाता
जो कहना चाहता था
 तो तुम समझ लेते और 
तुम्हारा सुनना रुक जाता
मुझे हमेशा लगता है
समझना तुम्हें है
और तुम मौन रह कर मुझे बताते हो
सुनना मुझे है
तुम्हारे मौन की भाषा
मैं समझ पाता तो
कुछ हो जाता
क्योंकि मेरे कहने भर से कुछ होता तो
अब तक हो जाता
मुझे सुनना सीखना चाहिए
मौन की भाषा को 
और अपनी बात कहने के लिए
शब्द नहीं
मौन का प्रयोग
करना चाहिए
हो सकता है
इस बहाने हम दोनों
एक-दूसरे की अनकही बात
सुन सकें…

Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
Gazal

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एक दिन मैं

अपनी ही धड़कनों से

नाराज़ हो गया

इतनी सी शिकायत लेकर

कि जब तुम

उसके सीने में नहीं धड़क सकती

तो मेरे सीने में धड़कने की

ज़रूरत क्या है

धड़कनों का मज़ा तो तभी है

जब वो महबूब के

दिल में धड़कना जानें

जैसे मेरे दिल में

तड़पती हुई

तुम्हारी धड़कन…

– शिखर प्रयाग

Gazal

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सुबहों को व्यस्त ही रखा, दुपहरियां थकी-थकी सी रही
कुछ जो न कह सकी, इन उदास शामों से क्या कहूं..

चुन-चुनकर रख लिए थे जब, कुछ पल सहेज कर
वो जो ख़र्चे ही नहीं कभी, उन हिसाबों का क्या कहूं..

न तुमने कुछ कहा कभी, मैं भी चुप-चुप सी ही रही
हर बार अव्यक्त जो रहा, उन एहसासों का क्या कहूं..

यूं तो गुज़र ही रहे थे हम-तुम, बगैर ही कुछ कहे-सुने
अब कि जब मिलें, छूटे हुए उन जज़्बातों से क्या कहूं..

हां है कोई चांद का दीवाना, कोई पूजा करे सूरज की
वो जो भटकते फिर रहे, मैं उन टूटे तारों से क्या कहूं..

न ख़त का ही इंतज़ार था, और न किसी फूल का
सिर्फ़ लिखी एक कविता, खाली लिफ़ाफ़ों से क्या कहूं…

Namita Gupta 'Manasi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’
Poetry

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मुहब्बत इस जहां के जर्रे जर्रे में समाई है
मुहब्बत संत सूफी पीर पैगम्बर से आई है
कोई ताकत मिटा पाई नहीं जड़ से मुहब्बत को
मुहब्बत देवताओं से अमर वरदान लाई है

मुहब्बत बहन की राखी है भाई की कलाई है
मुहब्बत बाप के आंगन से बेटी की विदाई है
मुहब्बत आमिना मरियम यशोदा की दुहाई है
मुहब्बत बाइबिल गीता और कुरान से आई है

मुहब्बत दो दिलों की दूरियों में भी समाई है
ये नफ़रत के मरीज़ों की बड़ी बेहतर शिफ़ाई है
मुहब्बत टूटते रिश्तों के जुड़ने की इकाई है
मुहब्बत मीरा की भक्ति है ग़ालिब की रूबाई है

मुहब्बत झील की गहराई पर्वत की ऊंचाई है
मुहब्बत इश्क ए दरिया का समंदर में मिलाई है
मुहब्बत आसमां में कहकशां बन कर के छाई है
मुहब्बत ढूंढ़ कर धरती पे हर जन्नत को लाई है…

Akhilesh Tiwari 'Dolly'
अखिलेश तिवारी ‘डॉली’

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मैं
तन्हाई में कहां जी रहा हूं
तुम एहसास की तरह मेरे साथ हो
ठीक वैसे ही
जैसे हमारी दुनिया में
चांद-सूरज
दूर-दूर
बिल्कुल अकेले नज़र आते हैं
लेकिन युगों युगों से
एक-दूसरे से जुड़े हैं
अपने-अपने
अस्तित्व के लिए
ब्रह्मांड में
उनका अस्तित्व
अलग दिखता है
पर है कहां?
चांद-सूरज न हों
तो धरती नहीं है
और धरती न हो तो
चांद-सूरज बेमानी…

– शिखर प्रयाग

Kavita

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न जाने क्यों, सुबह से ज़िंदगी ढूढ़ रहा हूं
बस उसे धन्यवाद देना था
ख़ुद से ही अपने लिए माफ़ी मांगनी थी
जी तो रहा था पर मुद्दत हो गई थी उससे मिले
कुछ नहीं बस कहना था ‘आई लव यू ज़िंदगी’
जब मैंने ख़ुद को आंसुओं में डूबा पाया
वह मुझे मुस्कुराती मिली
आज मैं शिकायतों के साथ नहीं था
जब ढेर सारी शिकायतों के साथ मिलता
तो मैं मुस्कुराता और वह रोती
मैं बचपन से लेकर आज तक उसके पास
सिर्फ़ शिकायतों के साथ ही तो खड़ा था
बचपन में अच्छी किताब
ढेर सारे कपड़ों
ट्यूशन और स्कूटर और
खिलौनों की शिकायतें
जवानी में
पैसे की कमीं
बड़े घर, गाड़ी और
मनचाही नौकरी की शिकायतें
कभी कुछ होने कभी कुछ बन जाने की
शिकायतें
कहां हैं आज वो शिकायतें…

Kavita


ऐ ज़िंदगी,
जिनकी लिस्ट
मेरी ख़्वाहिशों से बड़ी है
आज जब उस मोड़ पर खड़ा हूं
कि जहां सिर्फ़ वक़्त और सांस
चाहिए जीने के लिए
यह समझ पाया हूं तो
मुझे लगता है सब कुछ तो है मेरे पास
जिनके लिए तुझसे शिकायत करता था
बस नहीं बचा तो वक़्त
आह मुझे यहां से जाने से पहले
लव यू ज़िंदगी कहने का
हौसला दे दे
मुझे अपनी ग़लतियों की
माफ़ी मांगने का हौसला दे दे
मुझे ख़ुद को इक बार
गुनहगार समझने का अवसर दे दे…
हां ‘आई लव यू ज़िंदगी’
तू जितनी भी है, जैसी भी है
आई लव यू…

Kavita


जब मैं किताबें और ट्यूशन मांगता
तो भूल गया
तूने मुझे आईएएस
बनाने के लिए नहीं पैदा किया है
जब जवानी में दौलत, बंगला, गाड़ी
और ग्लैमर मांग रहा था
तो मुझे एहसास नहीं था
इनकी क़ीमत बहुत बड़ा दर्द है
जो बाहर से नहीं दिखता
मैं भूल गया था कि
तूने मुझे
तितलियों के रंग, फूल की सुगंध
सुबह-शाम का दृश्य देखने
इंसानों के दुख-दर्द
को जीने के लिए जन्म दिया है
मुझे माफ़ कर दो ऐ ज़िंदगी
कि मैंने तुम्हारे अर्थ को
अपने भीतर न खोज कर
कहीं और ढूढ़ने निकल पड़ा
और तुम्हारे साथ हो कर भी
तुमसे कोसों दूर
भटकता रहा

Hindi Poems


ऐ ज़िंदगी,
आज जब तुम
मुझे देख
मेरी अज्ञानता पर
मुस्कुरा रही हो
तो थोड़ा-सा हौसला भी दे दो
ख़ुद को ‘आई लव यू’
कहने का
मैं जानता हूं
मेरे हाथ कांपेंगे
किसी बगीचे से गुलाब तोड़ने में
बहुत डर लगेगा
रास्ते में तुम्हारा पीछा करने
या कोई सूनसान सा कोना ढूढ़ने में
मेरे होंठ कांपेंगे
तुम्हें ‘आई लव यू’
कहने में झिझक भी तो होगी
जानता हूं
तुम मुझे बार-बार पूछोगी
बोलो क्या कहना चाहते हो
मुस्कुराओगी
मुझे हिम्मत देने के लिए
लेकिन नहीं जुटा सकूंगा
हमेशा की तरह
तुम्हें ‘आई लव यू’
कहने का हौसला
क्योंकि
सिर्फ़ शिकायतों में ही तो
जीता रहा हूं तुम्हें
लेकिन नहीं
आज तुम्हारे लिए
अपनी बांहें फैलाए खड़ा हूं
सभी शिकायतों से दूर
मुझे जीने के लिए
वक़्त, सांस और हौसला दे दो
आई लव यू ज़िंदगी…

Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव

Hindi Poems

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मैं फिर लौट आऊंगी
धूप के उजास सी
कि करूंगी ढेरों मन भर बातें
उस जाती हुई ओस से भी
जिसके हिस्से में आती हैं सिर्फ़ रातें ही!

मैं फिर लौट आऊंगी
पहली बारिश सी
कि सिमट जाऊंगी मिट्टी में
और होती रहूंगी तृप्त
उसकी सोंधी-सोंधी सी महक में!

मैं फिर लौट आऊंगी
टूटे हुए तारे सी
कि सुन लूंगी हर एक दुआ
हर उस प्रेम-पथिक की
जिए जा रहा है जो ‘इंतज़ार’ में ही!

मैं फिर लौट आऊंगी
एक लाड़ली कविता सी
‘ख़ुशनुमा मौसम’ की ही तरह
बस, बची रह सकूं इस बार
किसी तरह इस प्रलयकारी तूफ़ान से…

Poem
नमिता गुप्ता ‘मनसी

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अलग फ़लसफ़े हैं हमेशा ही तेरे, सुन ऐ ज़िंदगी
बटोरकर डिग्रियां भी यूं लगे कि कुछ पढ़ा ही नहीं

ये पता कि सफ़र है ये, कुछ तो‌ छूटना ही था कहीं
पर वही क्यों छूटा, अब तक जो मिला ही नहीं

ये बात और है कि समझा ही लेंगे, ख़ुद को कैसे भी
मैं उसकी राह भी तकूं कैसे, जिसको आना ही नहीं

Kavya

अक्सर गुज़र जाती है ज़िंदगी, रास्ते तय करने में ही
वो जो मिले हैं पहली दफा, लगे आख़िरी भी नहीं

दोस्तों, कशमकश का दौर ये बहुत लंबा है शायद
हक़ जताऊं कैसे, न वो पराया है, पर हमारा भी नहीं…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’
Kavya

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हे प्रभु
जब मैं तुमसे
प्रेम मांगता था
तब तुमने
जीवन के संघर्ष के
रूप में
मुझे युद्ध प्रदान किया
आज मैं जीवन में
विभिन्न अस्त्र शस्त्र
व उनके संचालन की क्षमता में
पारंगत हो चुका हूं
तुम मुझे प्रेम
करने को कहते हो
आख़िर क्यों?
प्रभु मुस्कुराए और बोले
मैं तुम्हें वही दे सकता हूं
जो तुम्हारे पास नहीं है
बचपन में
तुम्हारे पास
जीवन के रणभूमि में
संघर्ष की
क्षमता नहीं थी
और वह मुझे तुम्हें
वरदान स्वरूप
प्रदान करनी पड़ी
आज तुम
युद्ध करते करते
इतनी दूर निकल आए हो
कि प्रेम भूल गए हो
सो तुम्हें मानवता से
प्रेम करने का वरदान
दे रहा हूं
एक बात और
तुम्हारी मांग
और मेरे प्रतिदान में
थोड़ा सा अंतर है
तुम बचपन में
व्यक्तिगत प्रेम में जीना
और सामाजिक संघर्ष
में निर्वाण चाहते थे
जबकि उस बिंदु पर संघर्ष
के व्यक्तिगत होने की आवश्यकता थी
अर्थात
संघर्षमय जीवन
तुम्हारे लिए
आवश्यक था
आज तुम
शक्ति के दुरुपयोग हेतु
व्यक्तिगत युद्ध
चाहते हो
और मैं तुम्हें
बचाने के लिए
सामाजिक प्रेम
प्रदान कर रहा हूं
बचपन में तुम्हें प्रेम
प्रदान करता
और आज तुम्हें युद्ध
प्रदान करता
तो तुम
भस्मासुर बन जाते
मानव नहीं…

Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
Poetry

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