poetry

कभी कभी सोचता हूं
तमन्ना में
जी लूं वह अधूरी ज़िंदगी
कि जिसे जीने की
ख़्वाहिश में
उम्र गुज़र गई
क्योंकि
जिनके साथ हम होते हैं
उनके साथ हम
वह ज़िंदगी जी ही नहीं पाते
जो जीना चाहते हैं
कभी कभी तमन्ना
इतनी छोटी होती है
कि उसे सोच कर
शर्म आती है
जो उम्र से परे निकल जाती है
और एक दिन
यह छोटी छोटी तमन्नाएं
इतनी बड़ी हो जाती हैं
कि उन्हें बस
ख़्वाब में जीना पड़ता है
बहुत ज़रूरी था
कि तुम मुझे मिलते
वर्ना मैं तो
इन अधूरी तमन्नाओं के
ख़्वाब देखना भी
भूल गया था…

– शिखर प्रयाग


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प्रभु इतनी सद्बुद्धि देना हमें
उज्जवल सबकी दिवाली हो

कोई न घायल या बीमार पड़े
कल भी घर में ख़ुशहाली हो

लाडला आपका कोई न

कल नेबुलाइजर पर हांफता हो

प्यारा डॉगी या परिंदा न
सहमा भूखा कांपता हो

अपनापन बांटें दीप जलाएं
गाती चहुंदिशा हरियाली हो

प्रभु इतनी सद् बुद्धि देना हमें
उज्जवल सबकी दिवाली हो…

bhaavana prakaash
भावना प्रकाश
Poetry

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जीवन की आपाधापी में
शौक सिंगार का सोया सा
फिर पुलक उठा, मुस्काया
सखी फिर करवा चौथ आया
दीवान के निपट अंधेरे में
दबा-सिमटा सुहाग का जोड़ा
पा मेरे हाथों की आहट
बिसरे लम्हों संग मुस्काया
सखी फिर करवा चौथ आया
‘तुमको अच्छे लगते हैं
इसलिए बरे, फरे बनाऊंगी मैं’
‘ज़्यादा थकना नहीं, कि व्रत है
जो भी होगा, मैं खा लूंगा’
सुन प्यार की पावन बातचीत
पति-पत्नी का रिश्ता इठलाया
सखी फिर करवा चौथ आया…

bhaavana prakaash
भावना प्रकाश
Karwa Chauth

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दुख में भीगे मन के काग़ज़
सूख गयी कलम की स्याही
बीच विरह की लंबी रात है
कैसे मिलन के गीत लिखूँ

एक छोर पर तुम बह रहे
एक छोर पर मेरी धारा
दो दिशाओं में दोनों के मन
कैसे किनारों का गठबंधन लिखूँ

विकल उधर तुम्हारे प्राण है
व्याकुल इधर मेरा अंतर्मन
अश्रुओं से धुँधलाए नयन हैं
कैसे प्रेम के ढाई आखर लिखूँ

कितनी पीड़ा भरी हृदय में
साँसें रुक सी जाती हैं
रोम-रोम विरह में तपता
कहो कैसे श्रृंगार लिखूँ

इन नयनों को दरस दे जाओ
तप्त हृदय को छाँह मिले
आलिंगन से पावन कर दो
जीवन तुम्हारे नाम लिखूँ

Dr. Vinita Rahurikar
विनीता राहुरीकर

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क्या कहें आज क्या माजरा हो गया

ज़िंदगी से मेरा वास्ता हो गया

इक ख़ुशी क्या मिली मैं निखरती गई

ये तबस्सुम मेरा आईना हो गया

ग़म के साये तले हम पले थे मगर

ये हंसी आज साथी नया हो ग़म


कोई ग़म क्यूं रहे आंख नम क्यूं रहे

मुस्कुराने का अब इक नशा हो गया

हर कठिन दौर में हम अकेले थे पर

जब बढ़ाई कदम क़ाफ़िला हो गया

अब किसी से हमें कोई शिकवा नहीं

वो खुदा अब मेरा रहनुमा हो गया

      – रेखा भारती मिश्रा







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1
वसुदेव चले शिशु शीश धरे, तट तीर-लता हरषाय रहीं।
चम से चमके नभ दामिनियाँ, तम चीरत राह दिखाय रहीं।
तट तोड़ चलीं ‘सरिता’ लहरें, हरि पाद पखारन आय रहीं।
अवलोकत देव खड़े नभ में, कलियाँ बिहँसीं मुसकाय रहीं।

Geet

2
वृषभानु लली सखि संग चली, निज शीश धरे दधि की मटकी l
मग बीच मिले जसुदा ललना, झट से झटकी दधि की मटकी ll
सुन कान्हा हमे नहि भावत है, बरजोरि अरे झटको मटकी l
तुम कोप करो नहि आज सखी, नहि फोर दऊँ तुमरी मटकी ll

Geet

3
तकते-तकते थकतीं अँखियाँ, अबहूँ नहि आवत साँवरिया l
गगरी सरपे रख गोरि चली, अब लागत नाहि गुलेल पिया ll
नहि गूँजत है जमुना तट पे, प्रिय गोपिन की हँसि ओ छलिया l
अब तो विनती सुन लो रसिया, फिर आओ लिए कर बाँसुरिया ll

Geet

– अखिलेश तिवारी ‘डाली’

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बड़ी चीज़ें कहां मांगता हूं
मुझे वक़्त बीतने के बाद भी
बस छोटी-छोटी
चीज़ों से प्यार है

मैं तो बस
वह मांगता हूं
जिन्हें तुम ख़ुश हो कर
आसानी से दे दो

जैसे अपने माथे की वो
छोटी-सी हल्की गुलाबी बिंदी
जो ड्रेसिंग टेबिल के शीशे पे
कई महीनों से चिपकी है

वो नेलपॉलिश, वही थोड़ा बिंदी से
ज़्यादा गुलाबी नज़र आनेवाली
जिसकी डिब्बी अब सूखनेवाली है
मुझे दे दो

अपने कानों के वो बूंदें दे दो
जिसकी एक बाली
टूटने के बाद
तुमने सालों से नहीं पहना है

सुनो वो जो चूड़ियां टूट जाती हैं
जिन्हें करीने से उठा कर तुम
डस्टबिन में फेंक देती हो
मुझे दे दिया करो

हो सके तो अपने हाथों से
उतरी मेहंदी की लोई दे देना मुझे
बहुत प्यार से सोचता हूं इसमें क्या छुपा है
जो तुम्हारी हथेलियों को लाल कर देता है

ऐसे ही ढेर-सी चीज़ें होंगी तुम्हारे पास
कुछ जज़्बात, कुछ बीते लम्हे
कुछ आंसू भी होंगे तुम्हारे पास
हो सके तो मुझे दे देना वह सब
जो तुम्हारे काम नहीं आता

क्या करूंगा मैं?
ज़्यादा तो कुछ नहीं बस
अपनी डायरी के पन्ने पर
सब से ऊपर चिपका दूंगा

इस ढेर सारी
अनमोल दौलत को
जिससे हर पन्ने पर
तुम्हारा अक्स उभर आए

यह जो तुम्हारा स्टेटस है
वहां परियों की तस्वीर लगा दो
अबाउट में थोड़ी-सी
स्माइल भर दो

जानता हूं
जो मांग रहा हूं
यह सब मांगने का
हक़ कहां है मुझे

पर क्या करूं
मैं ऐसा नहीं हूं कि जो कुछ तुम दोगी
उसे यादों की तिजोरी में बंद कर
चुपके से निहारूंगा आंखों में आसूं भरकर

मैं तो इन सब से
ख़ुशहाल ज़िंदगी की
तस्वीर बनाने निकला हूं
जो तुम्हारी स्माइल से पैदा होती है…

– शिखर प्रयाग

Geet

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देख लेती हूं तुम्हें ख़्वाब में सोते-सोते
चैन मिलता है शब-ए-हिज्र में रोते-रोते

इक तेरे ग़म के सिवा और बचा ही क्या है
बच गई आज ये सौगात भी खोते-खोते

प्यार फलने ही नहीं देते बबूलों के शजर
थक गए हम तो यहां प्यार को बोते-बोते

बेवफ़ा कह के उसे छेड़े हैं दुनिया वाले
मर ही जाए न वो इस बोझ को ढोते-ढोते

इतनी दीवानी बनाया है किसी ने मुझको
प्यार की झील में खाती रही गोते-गोते

ऐसा इल्ज़ामे-तबाही ये लगाया उसने
मुद्दतें हो गईं इस दाग़ को धोते-धोते

आ गया फिर कोई गुलशन में शिकारी शायद
हर तरफ़ दिख रहे आकाश में तोते-तोते

तेरे जैसा ही कोई शख़्स मिला था ‘डाली’
बच गए हम तो किसी और के होते-होते…

– अखिलेश तिवारी ‘डाली’

Gazals

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अभी वक़्त गुजरा कहां है
अभी भोर होते ही
आसमां में
सुबह की लाली नज़र आती है
सुबह टहलने निकले तो
कानों में कोयल की कूक सुनाई पड़ती है
कभी-कभी दिख जाते हैं
मोर भी
नाचते हुए
कोई गीत सुन लेता हूं
अपने ही भीतर
उठती लहरों के साथ
मुस्कुरा उठता हूं
अभी हाथों में कलम पकड़ कर
लिख सकता हूं
अभी चल सकता हूं
थोड़ा दौड़ भी तो लेता हूं
नेत्रों में सौंदर्य की अनुभूति का
एहसास बचा है
अभी कुछ कहने की ताकत
मेरे भीतर है
कुछ करने का
हौसला भी तो
बरक़रार है
अभी मेरे दिल ने
हार कहां मानी है
अभी वक़्त गुजरा कहां है
अभी वक़्त गुजरा कहां है…

– मुरली

Kavita

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प्रेम कथाओं के पृष्ठों पर, जब-जब कहीं निहारा होगा
सच मानो मेरी आंखों में केवल चित्र तुम्हारा होगा

कभी याद तो करके देखो, भूले बिसरे चौराहों को
कान लगा कर सुनो कभी, अपने अंतर की चाहों को

कभी अधर तो सौंपे होंगे, अपनी चंदन सी बांहों को
कस्तूरी सी गंध समझ, हर संभव मुझे बिसारा होगा
सच मानो मेरी…

कई बरस तेरे माथे पर रखी मैंने काजल बिंदिया
कहीं उड़ाकर ले जाती थी, इन आंखों से मेरी निंदिया

संभवता कभी लगाई हूं, एकाकी क्षण में वो बिंदिया
क्या हुआ कभी आभास नहीं, यहीं कहीं बंजारा होगा
सच मानो मेरी…

यह सोच खुले ही छोड़ दिए, इस हृदय भुवन के द्वार सभी
कोई कुछ मुझको कहे मगर, भेडूंगी नहीं किवाड़ अभी

वापस लौट गए तुम यदि तो, यह ज्वाला न होगी शांत कभी
आहट-आहट कान लगाए, तुमने मुझे पुकारा होगा
सच मानो मेरी…

अब दूल्हा सा तुम सज धज, खड़े हुए हो इस आंगन में
लगा रहे हो आग और अब, इस रिमझिम-रिमझिम सावन में

और किसी की किन्तु धरोहर, शोभित हो इस मन दर्पण में
‘डाली’ मर्यादित प्रश्नों पर, किंचित नहीं विचारा होगा
सच मानो मेरी आंखों में, केवल चित्र तुम्हारा होगा

प्रेम कथाओं के पृष्ठों पर, जब-जब कहीं निहारा होगा
सच मानो मेरी…

अखिलेश तिवारी ‘डाली’

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हज़ारों तीर किसी की कमान से गुज़रे
ये एक हम ही थे जो फिर भी शान से गुज़रे

कभी ज़मीन कभी आसमान से गुज़रे
जुनून-ए-इश्क़ में किस-किस जहान से गुज़रे

किसी की याद ने बेचैन कर दिया दिल को
परिंदे उड़ते हुए जब मकान से गुज़रे

जिन्होंने अहदे-वफ़ा के दीये बुझाए थे
तमाम नाम वही दास्तान से गुज़रे

हमारे इश्क़ का आलम तो देखिए साहिब
रहे-वफ़ा में बड़ी आनबान से गुज़रे

न आया हर्फ़े-शिकायत कभी भी होंठों पर
हज़ार बार तिरे दर्मियान से गुज़रे

कभी दिमाग़ कभी दिल ने हार मानी है
तमाम उम्र यूं ही इम्तिहान से गुज़रे

जो आज बच के गुज़रते हैं बूढ़े बरगद से
कभी ये लोग इसी सायबान से गुज़रे

हमारे शेर हैं मशहूर इसलिए ‘डाॅली’
हमारे शेर तुम्हारी ज़ुबान से गुज़रे…

– अखिलेश तिवारी ‘डाॅली’

Gazal

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कशमकश में थी कि कहूं कैसे मैं मन के जज़्बात को
पढ़ा तुमको जब, कि मन मेरा भी बेनकाब हो गया

नहीं पता था कि असर होता है इतना ‘जज़्बातों’ में
लिखा तुमको तो हर एक शब्द बहकी शराब हो गया

‘संजोए’ रखा था जिसको कहीं ख़ुद से भी छिपाकर
हर्फ-दर-हर्फ वो बेइंतहा.. बेसबब.. बेहिसाब हो गया

हां, कहीं कोई कुछ तो कमी थी इस भरे-पूरे आंगन में
बस एक तेरे ही आ जाने से घर मेरा आबाद हो गया

मुद्दतों से एक ख़्वाहिश थी कि कहना है ‘बहुत कुछ’
तुम सामने जो आए, क्यों ये दिल चुपचाप हो गया

सोचती थी मैं जिसको सिर्फ़ ख़्यालों में ही अब तलक
मिला वो, तो बहुत ख़ूबसूरत मेरा ‘इंतज़ार’ हो गया

ये ‘वक़्त के लेखे’ मिटाए कब मिटे ‘मनसी’
जो था नहीं लकीरों में, आज राज़ वो सरेआम हो गया…

Namita Gupta 'Manasi'
नमिता गुप्ता’ मनसी’

Poetry

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