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मैं शायर तो नहीं… (Hindi Shayari: Main Shayar To Nahi…)

 

mansoon (1)

 अहमद फ़राज़ की ग़ज़ल

दिल को अब यूँ तेरी हर एक अदा लगती है

दिल को अब यूँ तेरी हर एक अदा लगती है
जिस तरह नशे की हालत में हवा लगती है

रतजगे खवाब परेशाँ से कहीं बेहतर हैं
लरज़ उठता हूँ अगर आँख ज़रा लगती है

ऐ, रगे-जाँ के मकीं तू भी कभी गौर से सुन,
दिल की धडकन तेरे कदमों की सदा लगती है

गो दुखी दिल को हमने बचाया फिर भी
जिस जगह जखम हो वाँ चोट सदा लगती है

शाखे-उममीद पे खिलते हैं तलब के गुनचे
या किसी शोख के हाथों में हिना लगती है

तेरा कहना कि हमें रौनके महफिल में “फराज़”
गो तसलली है मगर बात खुदा लगती है

मैं शायर तो नहीं… (Hindi Shayari: Main Shayer To Nahi…)

Hindi Shayari

love

बशीर बद्र की ग़ज़ल 

गाँव मिट जायेगा शहर जल जायेगा
ज़िन्दगी तेरा चेहरा बदल जायेगा!!

कुछ लिखो मर्सिया मसनवी या ग़ज़ल
कोई काग़ज़ हो पानी में गल जायेगा!!

अब उसी दिन लिखूँगा दुखों की ग़ज़ल
जब मेरा हाथ लोहे में ढल जायेगा!!

मैं अगर मुस्कुरा कर उन्हें देख लूँ
क़ातिलों का इरादा बदल जायेगा!!

आज सूरज का रुख़ है हमारी तरफ़
ये बदन मोम का है पिघल जायेगा!!

मैं शायर तो नहीं… (Hindi Shayari: Main Shayer To Nahi…)

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बशीर बद्र की उम्दा ग़ज़ल 

कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ,
वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ न सुना हुआ
जिसे ले गई अभी हवा, वे वरक़ था दिल की किताब का,
कहीँ आँसुओं से मिटा हुआ, कहीं, आँसुओं से लिखा हुआ
कई मील रेत को काटकर, कोई मौज फूल खिला गई,
कोई पेड़ प्यास से मर रहा है, नदी के पास खड़ा हुआ
मुझे हादिसों ने सजा-सजा के बहुत हसीन बना दिया,
मिरा दिल भी जैसे दुल्हन का हाथ हो मेंहदियों से रचा हुआ
वही शहर है वही रास्ते, वही घर है और वही लान भी,
मगर इस दरीचे से पूछना, वो दरख़्त अनार का क्या हुआ
वही ख़त के जिसपे जगह-जगह, दो महकते होंठों के चाँद थे,
किसी भूले बिसरे से ताक़ पर तहे-गर्द होगा दबा हुआ

मैं शायर तो नहीं… (Hindi Shayari: Main Shayer To Nahi.)

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निदा फ़ाज़ली की उम्दा ग़ज़ल 
बेसन की सोंधी रोटी पर 
खट्टी चटनी जैसी मां 
याद आती है चौका-बासन 
चिमटा फुकनी जैसी मां 
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर 
हर आहट पर कान धरे 
आधी सोई आधी जागी 
थकी दोपहरी जैसी मां 
चिड़ियों के चहकार में गूंजे
राधा-मोहन अली-अली 
मुर्गे की आवाज़ से खुलती 
घर की कुंडी जैसी मां 
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन 
थोड़ी-थोड़ी-सी सब में 
दिन भर इक रस्सी के ऊपर 
चलती नटनी जैसी मां 
बाँट के अपना चेहरा, माथा, 
आँखें जाने कहाँ गई 
फटे पुराने इक अलबम में 
चंचल लड़की जैसी मां…

मैं शायर तो नहीं… (Hindi Shayari: Main Shayer to Nahi…)

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मैं शायर तो नहीं… (Hindi Shayari: Main Shayer to nahi…)

 

मिर्ज़ा ग़ालिब की उम्दा शायरी 

चांदनी रात के ख़ामोश सितारों की क़सम,
दिल में अब तेरे सिवा कोई भी आबाद नहीं.

जी ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात दिन,
बैठे रहे तसव्वुर-ए-जहान किये हुए.

आया है बे-कसी-ए-इश्क पे रोना ग़ालिब,
किसके घर जायेगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद.

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया

ग़ैर ले महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहें यूं तश्ना-ऐ-लब पैगाम के
ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के

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