poetry

नज़रें जो उनकी बदलीं, ज़माने बदल गए

मयखाना तो वही है, पैमाने बदल गए

Kavay

तुम पूछते हो उनके, जाने से क्या हुआ

होंठों के गुनगुनाते, तराने बदल गए

वादा वो करके आए थे, न आए हैं वो अब

हर रोज़ उनके न आने के, बहाने बदल गए

जज़्बा मुहब्बतों का, है पाक आज भी

फिर क्यों मुहब्बतों के, फसाने बदल गए

कहने को क्या नहीं है, अब आदमी के पास

लेकिन अब दौलतों के, ख़ज़ाने बदल गए

नज़रें जो उनकी बदलीं, ज़माने बदल गए

मयखाना तो वही है, पैमाने बदल गए

Dinesh Khanna

  दिनेश खन्ना

यह भी पढ़ेShayeri

Kavay

लिपटकर रो लेती गर तुम होते

ग़म कुछ कम होते गर तुम होते

बांहों में सिमट जाते खो जाते गर तुम होते

तुम्हारे हो जाते गर तुम होते

कल भी पुकारा था दोराहे पर

आंख न नम होती गर तुम होते

हां उसी मोड़ पर जाकर देखा है अभी

साथ-साथ चलती गर तुम होते

मुकम्मल हो जाती मुहब्बत मेरी

हां तुम गर तुम बस तुम होते…

 

– विद्यावती

यह भी पढ़ेShayeri

Kavay- Diwali

Kavay

यह भी पढ़े: Shayeri

Kavay

बिखरते ख़्वाबों को देखा

सिसकते जज़्बातों को देखा

रूठती हुई ख़ुशियां देखीं,

बंद पलकों से,

टूटते हुए अरमानों को देखा…

 

अपनों का बेगानापन देखा

परायों का अपनापन देखा

रिश्तों की उलझन देखी,

रुकती सांसों ने,

हौले से ज़िंदगी को मुस्कुराते देखा…

 

तड़प को भी तड़पते देखा

आंसुओं में ख़ुशियों को देखा

नफ़रत को प्यार में बदलते देखा

रिश्तों के मेले में,

कितनों को मिलते-बिछड़ते देखा…

 

नाकामियों का मंज़र देखा

डूबती उम्मीदों का समंदर देखा

वजूद की जद्दोज़ेहद देखी

एक ज़िंदगी ने,

हज़ारों ख़्वाहिशों को मरते देखा…

 

– ऊषा गुप्ता

 

यह भी पढ़ेShayeri

 

Hindi Kavita

सुनो ना…

सावन से पहले चले आना

बड़ा तरसी है आरज़ू तेरी ख़ातिर

इस बरस खुल के बरस जाना

मद्धिम हवा को साथ लिए

कुछ गुनगुनी बूंदों को हाथ लिए

जब दूर कहीं सूरज ढले

जब यहीं कहीं गगन धरा से मिले

दबे पांव

धीमी दस्तक से

दर मेरा खटखटाना

सुनो ना…

सावन से पहले चले आना

                                               – मंजू चौहान

 

मेरी सहेली वेबसाइट पर मंजू चौहान की भेजी गई कविता को हमने अपने वेबसाइट में शामिल किया है. आप भी अपनी कविता, शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं

यह भी पढ़ेShayeri

किसी की ज़िंदगी इतनी आसान

तो किसी की इतनी मुश्किल क्यों है?

काव्य

किसी के पास सब कुछ है

तो कोई कंगाल क्यों है?

 

कोई अकेले होकर भी किसी के साथ है

तो कोई भीड़ में भी तन्हा क्यों है?

 

कोई ग़मों में भी मुस्कुराता है

तो कोई ख़ुशियों में भी उदास क्यों है?

 

कोई एक लम्हे में ज़िंदगी जी लेता है

तो कोई ज़िंदगीभर उस एक लम्हे की

तलाश में क्यों है?

 

कोई अपने फैसलों में आज़ाद है

तो कोई रिश्तों की ज़ंजीरों में कैद क्यों है?

 

किसी को पल भर में ख़ुदा मिल जाता है

तो किसी का इंतज़ार इतना लंबा क्यों है?

 

किसी का सपना एक उड़ता हुआ गुब्बारा

तो किसी का आसमान क्यों है?

 

किसी के पास रास्ते ही रास्ते हैं

तो किसी के पास हर बार बंद दरवाज़ा क्यों है?

 

किसी की ज़िंदगी इतनी आसान

तो किसी इतनी मुश्किल आख़िर क्यों है?…

                                           – शिल्पी राय जेम्स

यह भी पढ़े: Shayeri

Hindi Gazal

जब भी मैंने देखा है दिलदार तुम्हारी आंखों में

चाहत का इक़रार मिला हर बार तुम्हारी आंखों में

 

रमता जोगी भूल गया है रस्ता अपनी मंज़िल का

देख लिया है उसने अब इक़रार तुम्हारी आंखों में

 

जो सदियों से गुम था मेरा, आज मिला दिल क़िस्मत से

उसको मैंने ढूंढ़ लिया दिलदार तुम्हारी आंखों में

 

जिसको योगी ढूंढ़ रहे थे, युगों युगों से जंगल में

मैंने है वो खोज लिया इसरार तुम्हारी आंखों में

 

हर कोई मेरी जां का दुश्मन बना हुआ है महफ़िल में

जाने कितने 1फ़ितने हैं सरकार तुम्हारी आंखों में

vedprakash pahwa

वेद प्रकाश पाहवा ‘कंवल’

  1. शरारतें

यह भी पढ़े: Shayeri

 

 

कौन कहता है अकेले ज़िंदगी नहीं गुज़रती

मैंने चांद को तन्हा देखा है सितारों के बीच में

Kavay

 

कौन कहता है ग़म में मुस्कुराया नहीं जाता

मैंने फूलों को हंसते देखा है कांटों के बीच में

कौन कहता है पत्थरों को एहसास नहीं होता

मैंने पर्वतों को रोते देखा है झरने के रूप मेंं

कौन कहता है दलदल में जाकर सब गंदे हो जाते हैं

मैंने कमल को खिलते देखा है कीचड़ के बीच में

कौन कहता है दूसरे की आग जला देती है

मैंने सूरज को जलते देखा है ख़ुद की आग में

कौन कहता है ज़िम्मेदारी निभाना आसान नहीं होता

मैंने प्यार से सबका बोझ उठाते देखा है धरती माता के रूप में

– रेश्मा कुरेशी

मेरी सहेली वेबसाइट पर रेश्मा कुरेशी की भेजी गई कविता को हमने अपने वेबसाइट में शामिल किया है. आप भी अपनी कविता, शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं…

यह भी पढ़े: Shayeri

 

Hindi Gazal

मेरे होंठों के तबस्सुम कहीं गुम हो गए हैं

जब से सुना है ग़ैर के वो हो गए हैं

मेरे अरमानों को ना अब जगाना

बड़ी मुश्किल से थक कर सो गए हैं

मेरी यादों को ज़ेहन से मिटा दिया उसने

आज इतने बुरे हम हो गए हैं

ग़ैर की छोड़िए अपनों से मुलाक़ात नहीं

सोच के दायरे अब कितने छोटे हो गए हैं

व़क्ते पीरी भी दुश्मनों ने याद रखा मुझे

दोस्त तो न जाने कहां गुम हो गए हैं

कौन निकला है सैरे गुलशन को

सारे कांटे गुलाब हो गए हैं

 

   दिनेश खन्ना

मेरी सहेली वेबसाइट पर दिनेश खन्ना की भेजी गई ग़ज़ल को हमने अपने वेबसाइट में शामिल किया है. आप भी अपनी कविता, शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं

यह भी पढ़े: Shayeri

Hindi Poems

बेटी तो होती है एक कली

अगर खिलेगी वह नन्ही कली

तो बनेगी एक दिन फूल वह कली

चाहे हो वह बेटी किसी की भी

बस तुम सम्हालो ख़ुद को

बेटी तो सम्हल जाएगी अपने आप

फिर चाहे तुम दो या ना दो साथ

 

तुम संभालो ख़ुद को

अपनी बुरी नज़र को

अपनी भूखी हवस को

अपनी झूठी मर्दानगी को

अपने वहशीपन को

अपनी दरिंदगी को

अपनी हैवानियत को

जगाओ अपनी इंसानियत को

फिर बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

 

तुम सम्हालो ख़ुद को

छोड़ो करना भेदभाव

छोड़ो करना अन्याय

छोड़ो कसना फ़ब्तियां उस पर

छोड़ो करना बदनाम उसे

छोड़ो डालना हीन दष्टि उस पर

छोड़ों जंजीरों में जकड़ना उसे

फिर बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

 

तुम सम्हालो ख़ुद को

मारो ना कोख में ही उसे

आने दो इस दुनिया में भी उसे

दो जीने का अधिकार उसे

दो उसका पूरा हक़ उसे

दो बराबरी का मौक़ा उसे

दो आगे बढ़ने का हौसला उसे

दो थोड़ा तो समय उसे

फिर बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

 

तुम सम्हालो ख़ुद को

बुनने दो कुछ सपने उसे

उड़ने दो खुले नभ में उसे

पढ़ने दो किताबें उसे

बढ़ाने दो आगे कदम उसे

करो उसका भी सम्मान

समझो उसे घर की शान

फिर बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

 

अगर तुम सम्हाल लोगे अभी ख़ुद को

सम्हालेगी बुढ़ापे में वह तुम्हें

जब होगे तुम बहुत लाचार

और चलना-फिरना भी होगा दुष्वार

बेटी तो सम्हल जाएगी ख़ुद अपने आप

फिर चाहे तुम दो या ना दो साथ

बस तुम सम्हालो खुद को…

– सुरेखा साहू

मेरी सहेली (Meri Saheli) वेबसाइट पर सुरेखा साहू की भेजी गई कविता (Poem) को हमने अपने वेबसाइट में शामिल किया है. आप भी अपनी कविता, शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं…

यह भी पढ़ेShayeri

Kavya, Bol Rahe Log, kavita

बोल रहे लोग कि दुनिया

बदल गई!

कहां बदली दुनिया?

औरत तो एक गठरी तले दब गई..

 

गठरी हो चाहे संस्कारों की,

रस्मों को, रिवाज़ों को निभाने की

बंधनों की, मर्यादाओं की,

औरत तो वही तक सिमट गई..

 

तहज़ीब और तालीम

घर हो या बाहर

ज़िम्मेदारी का ढेर

औरत उन्हीं ज़िम्मेदारियां को निभाने में रह गई..

 

भाव एक, भावनाएं अनेक

मन में आस

काश!

मुझे भी मिले एक आकाश

आकाश छूने की अभिलाषा

औरत तो काल्पनिक दुनिया में रह गई

 

लोगों के लिए दुनिया बदल गई

औरत जहां थीं वहीं रह गई…

 

अनूपा हर्बोला

मेरी सहेली वेबसाइट पर अनूपा हर्बोला की भेजी गई कविता को हमने अपने वेबसाइट में शामिल किया है. आप भी अपनी कविता, शायरी, गीत, ग़ज़ल, लेख, कहानियों को भेजकर अपनी लेखनी को नई पहचान दे सकते हैं…

यह भी पढ़े: Shayeri

Shayari, Nida Fazli Special
ग़ज़ल 1

गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया

होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया

इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था

उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया

पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की

बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया

जब तक था आसमान में सूरज सभी का था

फिर यूँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया

हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ

आलम तमाम चंद मचानों में बट गया

ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं

ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया

ग़ज़ल 2

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता

तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो

जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें

छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं

ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता

चराग़ जलते हैं बीनाई बुझने लगती है

ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता

यह भी पढ़ें: काव्य- जब भी मायके जाती हूं…

यह भी पढ़ें: मैं शायर तो नहीं…