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अमीर और क़ामयाब बनना है तो सीखें ये आदतें (How To Become Rich And Successful)

अमीर और कामयाब (Rich and Successful) बनने के लिए आपको क्या करना होगा, ये हम आपको बताने जा रहे हैं. जो लोग बहुत अमीर और कामयाब हो जाते हैं, उनमें आखिर ऐसा क्या गुण होता है, जो उन्हें इतनी सफलता दिलाता है. बिल गेट्स ने इतनी बड़ी सफलता कैसे हासिल की, ये सब हम आपको बताने जा रहे हैं. अब आप भी कामयाबी के सपने (Dreaming Of Success) देखना शुरू कर दीजिए, क्योंकि नामुमकिन कुछ भी नहीं है.

Become Successful

क्या आप भी अमीर और कामयाब बनना चाहते हैं?
यदि आप भी कामयाब बनना चाहते हैं, तो सबसे पहले कामयाबी के सपने देखना शुरू कर दीजिए. ऐसा करने से आपमें कामयाब होने की प्रबल इच्छा जागने लगेगी. जब आपकी कामयाब होने की इच्छा प्रबल होने लगेगी, तो आप इस बारे में दिन-रात सोचना शुरू कर देंगे, इसके लिए योजनाएं बनाना शुरू कर देंगे. ऐसा करते हुए आपको अपने आप रास्ते नज़र आने लगेंगे. ये काम इतना आसान नहीं है, लेकिन नामुमकिन भी नहीं है.

बिल गेट्स (Bill Gates) से सीखें अमीर और क़ामयाब बनने का राज़
अमीर और कामयाब कैसे बना जा सकता है, ये बताने के लिए हम आपको बिल गेट्स का उदाहरण देकर समझाते हैं. अब जानिए बिल गेट्स की कहानी- हुआ यूं कि एक स्कूली छात्र की प्रबल इच्छा थी कि वो अरबपति बने. अपनी इस इच्छा को पूरा करने के लिए उसने एक सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू की- माइक्रोसॉफ्ट. इसी बीच इस छात्र ने हावर्ड विश्‍वविद्यालय में प्रवेश लिया. जब वह अपने स्नातक पाठ्यक्रम के द्वितीय वर्ष में था. कंपनी ने बहुत लाभ कमाना शुरू कर दिया. उसने अपनी पढ़ाई छोड़ दी, क्योंकि कंपनी का विस्तार हो चुका था. उसने अपने लक्ष्य को पहचाना और अपनी महत्वाकांक्षाओं को मात्र बीस वर्ष की छोटी उम्र में ही पूरा कर लिया.

Bill Gates

कामयाबी के लिए सपने देखना ज़रूरी है
विश्‍व के सबसे धनी कहे जाने वाले व्यक्ति बिल गेट्स ने भी कामयाबी पाने से पहले कामयाबी के सपने देखे, फिर उस दिशा में कदम बढ़ाया और बहुत जल्द अपने सपने को सच कर दिखाया. आप भी ऐसा करते हैं.

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हां, सपने सच होते हैं
हम यदि अपने अतीत के बारे में सोचें, तो पाएंगे कि हम आज जो भी हैं, वो सब हमारी सोच और मेहनत का ही नतीजा है. आपकी सोच जितनी बड़ी होगी, आपकी कामयाबी भी उतनी ही बड़ी होगी. इसलिए बड़े सपने देखें और उन्हें सच कर दिखाने की कोशिश में जुट जाएं. यकीन मानिए, आपने जो भी सोचा है, वो सच हो सकता है और आप ही उसे सच कर सकते हैं.

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किस्मत चमकाने के लिए करें ये उपाय, देखें वीडियो:

ज़िंदगी रुकती नहीं (Life Doesn’t Stop And Neither Should You)

ज़िंदगी रुकती नहीं, बदस्तूर चलती रहती है. हां, ज़िंदगी में कई बार ऐसे वाकये या हादसे हो जाते हैं जो ज़िंदगी की चाल ही बदल देते हैं, या यूं कहें कि आपको बेहद मायूस या हताश कर देते हैं, तोड़कर रख देते हैं, लेकिन ऐसे हालात से हार मानकर जीना छोड़ा नहीं जा सकता. ऐसे हालात में भी आगे बढ़कर ज़िंदगी को संवारना और नए सिरे से ज़िंदगी की शुरुआत करना ही ज़िंदादिली है. काम ज़रा मुश्किल है, मगर नामुमक़िन नहीं.

Life

चलना ही जीवन है
कितनी भी बड़ी आपदा या हादसा क्यों न हो जाए ज़िंदगी नहीं ठहरती. हां, कुछ समय के लिए इसकी रफ़्तार ज़रूरी धीमी पड़ जाती है, लेकिन फिर उसे अपने पुराने ढर्रे पर आना ही पड़ता है. चाहे जापान में आई सुनामी हो या उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा. इतने बड़े विनाश के बाद भी दोबारा ज़िंदगी धीरे-धीरे ही सही पटरी पर आने लगती है. क्योंकि जो हो गया हम उसे तो बदल नहीं सकते, जो अपना चला गया हम उसे वापस तो ला नहीं सकते, लेकिन अपने आने वाले कल को संवारने की कोशिश तो कर ही सकते हैं. हमें अपने और अपने आसपास के बाकी लोगों की ख़ातिर जो हो गया उसे भुलाकर जीवन में आगे बढ़ना ही पड़ता है.

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जब तक है आस
बात चाहे कुदरत के विनाश की हो या ज़िंदगी में किसी अन्य तरह की असफलता की, आगे बढ़ने के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है उम्मीद. माना किसी प्रोजेक्ट पर कई हफ्तों तक दिन-रात मेहनत करने के बाद वो डेटा किसी कारणवश आपके कंप्यूटर से उड़ गया. ऐसे में निश्‍चय ही आपके पैरों तले से ज़मीन खिसक जाएगी, लेकिन उस वक़्त अपना मानसिक संतलुन खोकर ख़ुद पर या किसी और पर ग़ुस्सा करने या फिर उदास होकर बैठ जाने से समस्या हल नहीं होगी. यदि आपको ख़ुद को साबित करना है, करियर में आगे बढ़ना हैं, तो दोबारा मेहनत करनी ही पड़ेगी. माना इसमें वक़्त लगेगा, मगर आगे बढ़ने के लिए तो आपको ये करना ही होगा. यक़ीन मानिए, यदि आप सकारात्मक सोच के साथ नई शुरुआत करते हैं, तो देर से ही सही आपको सफलता ज़रूर मिलेगी.

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जो बीत गई सो बात गई
‘टूटे तारों पर कब अंबर शोक मनाता है, जो बीत गई सो बात गई’, हरिवंश राय बच्चन की कविता की इन पंक्तियों का सही अर्थ समझकर यदि आप जीवन में उतार लेंगे, तो मुश्किल से मुश्किल हालात से भी ख़ुद को उबारकर जीवन में आगे बढ़ सकेंगे. ज़िंदगी में बहुत से ऐसे लोग, चीज़ें, बातें और पल होते हैं, जिनके छिन जाने पर आपको बहुत दुख होता है या आपकी पूरी ज़िंदगी ही बदल जाती है. कई बार तो लगता है जैसे जीने का कोई मक़सद ही नहीं बचा, मगर जब तक आप ज़िंदा है आपको अतीत को भुलाकर आगे बढ़ना ही होगा, वरना आप ज़िंदा होकर भी ज़िंदगी जी नहीं पाएंगे.

क्या वाकई रिश्ते स्वर्ग में तय होते हैं? जानने के लिए देखें वीडियो: 

अटेंशन पाने की चाहत आपको बना सकती है बीमार! (10 Signs Of Attention Seekers: How To Deal With Them)

अटेंशन पाने की चाहत तो सभी में होती है लेकिन जब ये चाहत ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ जाए, तो ये मेंटल डिसऑर्डर का रूप ले लेती है. अटेंशन सीकिंग बिहेवियर के शिकार लोगों से डील करना बहुत मुश्किल होता है. ऐसे लोग हर पल, हर घड़ी हर किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं और इसके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. यदि आप भी हर पल लोगों का अटेंशन पाना चाहते हैं, तो संभल जाइए..! आपकी अटेंशन पाने की चाहत दूसरों के लिए आफत और आपके लिए मेंटल डिसऑर्डर का कारण बन सकती है.

Attention Seekers

अटेंशन सीकर्स यानी हर पल अटेंशन पाने की चाहत रखने वालों के ये 10 लक्षण होते हैं:

1) अटेंशन सीकिंग बिहेवियर एक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर है. इसके शिकार लोग बहुत संवेदनशील होते हैं और हर पल अटेंशन पाना चाहते हैं. ऐसे लोग वास्तविकता से दूर अपनी काल्पनिक दुनिया में ही खोए रहना पसंद करते हैं, उनमें सच का सामना करने की हिम्मत नहीं होती. महिलाएं अटेंशन सीकिंग डिसऑर्डर की सबसे ज़्यादा शिकार होती हैं.
2) अटेंशन सीकर्स का व्यवहार काफ़ी उग्र होता है. हर पल अटेंशन पाने की चाहत रखने वाले व्यक्ति की शादीशुदा ज़िंदगी में भी दरार पड़ सकती है, क्योंकि किसी भी व्यक्ति के लिए ये संभव नहीं है कि वो 24 घंटे स़िर्फ अपने पार्टनर पर ही ध्यान दे, उसकी तारीफ़ करे या फिर हर समय उससे प्यार से ही बात करे. ऐसे में ज़रा से इग्नोरेंस से उनका स्वाभिमान आहत हो जाता है.
3) मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक, जब कोई व्यक्ति चिल्लाकर या कुछ अजीब हरकतें जैसे- झूठी बीमारी या चोट लगने का बहाना बनाकर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करे, तो समझ लीजिए कि वो अटेंशन सीकिंग बिहेवियर यानी ASB का शिकार है.
4) अगर कोई अटेंशन सीकर्स पर ध्यान नहीं देता, तो वे असहज महसूस करने लगते हैं और अजीब हरक़तें करने लगते हैं, जैसे- कोई मनगढंत किस्सा सुनाना, जोर-जोर बातें करना आदि.
5) अटेंशन सीकर्स हर समय भावनात्मक सहारा ढूंढ़ते रहते हैं. इन्हें हर समय एक ऐसे साथी की ज़रूरत होती है, जो इनकी हां में हां मिलाए और इनकी हर बात को सही कहे. ज़रूरत से ज़्यादा अटेंशन पाने की चाह रखने वालों की निजी ज़िंदगी में समस्याएं आने लगती हैं. उनके अजीब बर्ताव के कारण धीरे-धीरे दोस्त भी उनसे दूर हो जाते हैं या फिर उनकी अनदेखी करने लगते हैं. ऐसे में व्यक्ति तनाव व अकेलेपन का शिकार हो सकता है.
6) अटेंशन सीकर्स के मुख्य लक्षण हैं- हमेशा एक्टिंग व दिखावा करना, झूठी बीमारी का बहाना, ख़ुद अपनी तारीफ़ करना, अपनी भावनाओं को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाना आदि.
7) अटेंशन सीकर्स दूसरों का ध्यान आकर्षित करने लिए भड़कीले कपड़े पहनते हैं, अजीबोगरीब हेयर स्टाइल बनाते हैं, महिलाएं लाउड मेकअप करती हैं.
8) अटेंशन सीकर्स ख़ुद से बेहतर किसी को समझते ही नहीं हैं इसलिए ये दूसरों की सफलता देख नहीं पाते और दूसरों की सफलता पर उनसे ईर्ष्या करने लगते हैं.
9) विशेषेज्ञों के मुताबिक, अटेंशन सीकर्स अपनी अयोग्यता व असुरक्षा की भावना को छुपाने के लिए अजीबोगरीब हरकतें करके दूसरों का ध्यान आकर्षित करते हैं. दरअसल, आत्मविश्‍वास की कमी के चलते अटेंशन सीकर्स ख़ुद कोे दूसरों से कम आंकते हैं. यही वजह है कि अटेंशन पाने के लिए वो कुछ भी करने को तैयार रहते हैं.
10) घमंडी और ओवरकॉन्फिडेंट लोगों को अटेंशन की ज़्यादा चाह होती है. उन्हें लगता है कि अटेंशन पाना उनका हक़ है, लेकिन इस तरह की सोच उनकी अपरिपक्वता को दर्शाती है. विशेषज्ञों के मुताबिक, इमोशनली इमैच्योर यानी भावनात्मक रूप से अपरिपक्व लोग हमेशा सेंटर ऑफ अट्रैक्शन बने रहना चाहते हैं. ऐसे लोग अटेंशन पाने के लिए छल-कपट, धोखेबाज़ी और किसी को धमकाने से भी पीछे नहीं हटते.

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अटेंशन सीकिंग बिहेवियर के निम्न कारण होते हैं:

* अटेंशन सीकिंग बिहेवियर आनुवांशिक भी होता है इसलिए यदि बच्चे के पैरेंट्स अटेंशन सीकर्स हैं, तो बच्चे में भी अटेंशन सीकिंग बिहेवियरे देखा जाता है.
* अटेंशन सीकिंग बिहेवियर के लिए व्यक्ति की शिक्षा, परिवार और आस-पास का माहौल भी ज़िम्मेदार होता है.
* कई बार पैरेंट्स द्वारा समय न दिए जाने के कारण बच्चा ख़ुद को उपेक्षित महसूस करने लगता है. इसके अलावा बात-बात पर पैरेंट्स के डांटने-फटकारने, बच्चों की भावनाओं की अनदेखी करने या फिर उनके इमोशन को दबाने के कारण भी बच्चे में अटेंशन पाने की चाहत बढ़ जाती है. बड़े होने पर ऐसे ही बच्चे अटेंशन सीकिंग बिहेवियर के शिकार हो जाते हैं.

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अटेंशन सीकर्स से कैसे करें डील?

* अटेंशन सीकिंग बिहेवियर से डील करने के लिए सबसे पहले ऐसे व्यवहार के लिए ज़िम्मेदार कारणों का पता लगाकर उन्हें दूर करने की कोशिश की जानी चाहिए.
* साइकोलॉजिस्ट ऐसे व्यक्तियों को डांस, म्यूज़िक, पेंटिंग, क्रिएटिव राइटिंग जैसे एक्सप्रेसिव आर्ट में शामिल होने की सलाह देते हैं. इनके ज़रिए अपनी भावनाओं को व्यक्त करने से उन्हें ख़ुशी का अनुभव होता है और उनकी आंतरिक शक्ति बढ़ती है.
* पैरेंट्स अगर छोटी उम्र से ही बच्चों को ख़ुद से प्यार और अपना सम्मान करना सिखाएं, उनका आत्मविश्‍वास बढ़ाने की कोशिश करें, तो बड़े होने पर उनमें अटेंशन पाने की चाह या यूं कहें कि अटेंशन की भूख नहीं रहेगी.
* यदि अटेंशन सीकर्स का व्यवहार कंट्रोल में न हो और समस्या ज़्यादा गंभीर हो जाए, तो साइकोथेरेपिस्ट की मदद लेनी चाहिए.

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अपने मुंह मियां मिट्ठू (Self Praise: Are You Hurting Or Helping?)

अपने मुंह मियां मिट्ठू लोग अपने सिवाय किसी और को कुछ समझते ही नहीं हैं. अपने मुंह मियां मिट्ठू लोगों को आत्मप्रशंसा की इतनी बुरी लत होती है कि हर किसी के सामने अपनी बड़ाई करने लगते हैं. उन्हें लगता है कि ऐसा करके वे ख़ुद को श्रेष्ठ साबित कर सकते हैं, जबकि आत्मप्रशंसा ओछेपन की निशानी है.

Self Praise

 

बड़े बड़ाई न करें, बड़े बोले न बोल
रहिमन हीरा कब कहे, लाख टका मेरा मोल

रहीमदास का ये कथन बिल्कुल सटीक है. जो लोग वाकई में ज्ञानी और गुणवान होते हैं वो अपने गुणों का बखान नहीं करते, बल्कि चुपचाप अपना काम करते रहते हैं. क्योंकि उनका काम ही उनके बारे में सब कुछ कह देता है. इसकी जीती जागती मिसाल स्वामी विवेकानंद, रविंद्रनाथ टैगौर, महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस जैसे इतिहास पुरुष हैं, जिनका लोहा पूरी दुनिया मानती है, लेकिन उन्होंने ख़ुद कभी अपनी शेखी नहीं बघारी.

अपने मुंह मियां मिट्ठू लोग दरअसल अपनी कमियां छुपाते हैं
जिन लोगों में योग्यता नहीं होती वो ही ख़ुद की प्रशंसा करके अपनी कमियां छुपाने की कोशिश करते हैं. अपनी हार के लिए ख़ुद को ज़िम्मेदार मानने की बजाय उसका दोष परिस्थितियों व दूसरे लोगों पर मढ़ देते हैं, जैसे जॉब या प्रमोशन न
मिलने पर ऐसे शख़्स कहेंगे, “मुझे काम का अनुभव तो था, लेकिन लोगों को इसकी कद्र नहीं… मेरी सिफ़ारिश करने वाला कोई नहीं था या मेरी किसी बड़े आदमी से पहचान नहीं थी, इसलिए मुझे ये नौकरी/प्रमोशन नहीं मिली.’ माना किसी संदर्भ में ये बातें सही हो सकती है, लेकिन आप में यदि प्रतिभा व योग्यता है, तो निश्‍चय ही आपको सफलता मिलेगी. इसके लिए आपको अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने की ज़रूरत नहीं.

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अपने मुंह मियां मिट्ठू लोग छोटी सोच के होते हैं
अपनी तारीफ़ करके यदि आपको ऐसा लगता है कि दूसरे आपसे प्रभावित हो जाएंगे और उनकी नज़रों में आपका क़द बढ़ जाएगा तो आप ग़लत हैं. उल्टा आप उनकी नज़रों में छोटे बन जाएंगे, क्योंकि कोई भी इंसान अपनी कथनी से नहीं, बल्कि करनी से बड़ा होता है. शांति व संजीदगी सज्जन व ज्ञानी व्यक्तियों की पहचान है. जिस तरह पूरा भरा घड़ा छलकता नहीं है वैसे ही योग्य व सक्षम व्यक्ति भी ख़ुद अपनी बड़ाई नहीं करते, बल्कि दुनिया उनके गुणों का बखान करती है. दरअसल, प्रशंसा की भूख अयोग्य व्यक्तियों में ही होती है. इस संदर्भ में महात्मा गांधी ने बिल्कुल सही कहा है, “जो लोग अपनी प्रशंसा के भूखे होते हैं, वो साबित कर देते हैं कि उनमें योग्यता नहीं है.”

अपने मुंह मियां मिट्ठू लोग स़िर्फ अपनी शेखी बघारते हैं
आप अपने परिवार व समाज में सबकी मदद करते हैं, मुश्किल हालात में जी जान लगाकर आप उनकी सहायता करते हैं. इस काम के लिए जब दूसरे आपकी प्रशंसा करें तब तो ठीक है, लेकिन आप अगर ख़ुद ही अपनी शेखी बघारने लगेंगे तो आपके सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा. तुलसीदास जी ने भी कहा है “आत्मप्रशंसा वह आग है जिसमें कर्तव्य का जंगल जल जाता है.”

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सफलता के 10 सूत्र (10 Ways To Achieve Your Dream)

सफलता के 10 सूत्र आपकी ज़िंदगी बदल सकते हैं. सफल बनने और अपने सपनों को पूरा करने के लिए आप भी अपनाएं सफलता के 10 सूत्र.

10 Ways To Achieve Your Dream

1) निर्धारित लक्ष्य के बिना आप जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो सकते. यदि आपको अपनी मंजिल का ही पता नहीं होगा तो भला रास्ता कैसे तय करेंगे? स्पष्ट लक्ष्य के अभाव में आप अंजान रास्तों पर यूं ही भटकते रहेंगे. अतः क़ामयाबी पाने के लिए सबसे पहले अपना लक्ष्य निर्धारित करिए और फिर पूरी ईमानदारी और मेहनत से उसे हासिल करने में जुट जाइए.

2) कठिनाइयों में भी अपने लक्ष्यों का पीछा करते रहें, और विपत्तियों को अवसरों में बदल दें.
– धीरूभाई अंबानी

3 ) कोई लक्ष्य मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं, हारा वही जो लड़ा नहीं.
– अज्ञात

4) आप कभी भी लक्ष्य निर्धारित करने या नया सपना देखने के लिए बहुत बूढ़े नहीं होते.
– सी.एस. लुईस

5) अपने मिशन में क़ामयाब होने के लिए आपको अपने लक्ष्य के प्रति एकचित्त निष्ठावान होना पड़ेगा.
– अज्ञात

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6) लक्ष्यों के बारे में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ है उनका होना.
– जेफ्री ऍफ ऐबर्ट

7 ) स्पष्ट और लिखित लक्ष्य जिनके होते हैं, वे कम समय में ही इतनी सफलता प्राप्त करते हैं जितनी कि बिना ऐसे लक्ष्यों वाले सोच भी नहीं सकते.
– ब्रायन ट्रेसी

8 ) लक्ष्य न होने के साथ समस्या ये है कि आप अपना समस्त जीवन मैदान में ऊपर नीचे दौड़ते रहने के बाद भी कोई जीत हासिल नहीं कर पाते.
– बिल कोपलेंड

9 )जब कोई व्यक्ति अपने लक्ष्य को इतनी गहराई से चाहे कि वह उसके लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने के लिए तैयार हो, तो उसका जीतना सुनिश्‍चित है.
– नेपोलियन हिल

10 ) मुट्ठीभर संकल्पवान लोग जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ़ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं.
– महात्मा गांधी

जानें ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी की सफलता का राज़, देखें वीडियो:

 

महिलाओं को क्यों चाहिए मी-टाइम? (Why Women Need Me-Time?)

Women, Time

आज की स्मार्ट और समझदार महिलाएं घर-परिवार-करियर की तमाम ज़िम्मेदारियां निभाते हुए अपने मी टाइम को भी एंजॉय कर रही हैं. जी हां, महिलाएं बदल रही हैं और उनमें आए इस बदलाव को उनका परिवार और समाज भी स्वीकारने लगा है. और सबसे ख़ास बात, इस बदलाव से महिलाओं की ज़िंदगी और भी ख़ूबसूरत हो गई है. महिलाओं के लिए क्यों और कितना ज़रूरी है मी-टाइम? आइए, जानते हैं.

Women, Time

ये बात तो हम सभी जानते हैं कि यदि आप ख़ुद ख़ुश नहीं हैं तो आप दूसरों को कभी ख़ुश नहीं रख सकते, इसलिए सबसे पहले आपका ख़ुश होना ज़रूरी है. आज की स्मार्ट और सुलझी हुई महिलाएं ये बात अच्छी तरह जानती हैं इसलिए वो घर-परिवार, करियर की तमाम ज़िम्मेदारियां निभाते हुए अपने लिए अलग से व़क्त निकालती हैं और अपने मी-टाइम को पूरी तरह एंजॉय करती हैं. ये टाइम स़िर्फ उनका होता है, जिसे वो अपनी फ्रेंड्स के साथ बिताना पसंद करती हैं.

महिलाओं में मी-टाइम कोई नई बात नहीं
साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ कहती हैं, “महिलाओं में मी-टाइम का चलन कोई नई बात नहीं है. बहुत पहले से ही, जब महिलाओं को बहुत एक्सपोज़र नहीं मिला था, तब भी उनके मी टाइम को ध्यान में रखते हुए उन्हें पीरियड्स के दौरान 5 दिनों का और बच्चे के जन्म के बाद 40 दिनों का मी टाइम दिया जाता था. इसी तरह साल में 2-3 बार त्योहार या रीति-रिवाज़ के नाम पर महिलाओं को उनके मायके भेज दिया जाता था, ताकि वो वहां पर अपना मी टाइम एंजॉय कर सकें. मोहल्ले की तमाम महिलाओं का इकट्ठा होकर गप्पे लड़ाना या गॉसिप करना भी उनका मी-टाइम ही होता था. पीरियड्स के दौरान महिलाएं अपने मी टाइम को अपनी इच्छानुसार बीताती थीं. इसी तरह जब महिलाएं अपने मायके जाती थीं, तो मायके वाले इस बात का ख़ास ध्यान रखते थे कि वो अपने इस टाइम को पूरी तरह एंजॉय कर सकें. मायके जाकर महिलाएं अपनी सहेलियों, भाभी, कज़िन्स आदि के साथ क्वालिटी टाइम बिताती थीं और रिफ्रेश होकर ससुराल लौटती थीं.”

करियर वुमन के लिए ज़्यादा ज़रूरी है मी-टाइम
जब तक महिलाओं की दुनिया घर की चारदीवारी तक सिमटी थी, तब तक तो उन्हें अपनी ननद, भाभी, पड़ोसन आदि के साथ मी टाइम बिताने का मौक़ा मिल जाता था, दिक्कत तब शुरू हुई जब महिलाओं ने घर से बाहर क़दम रखा और घर-बाहर दोनों जगहों की ज़िमेदारियां संभालनी शुरू की. धीरेधीरे महिलाओं को करियर बनाने की आज़ादी तो मिलने लगी, लेकिन उनकी घर की ज़िममेदारियों का बोझ कम नहीं हुआ. परिवार के लोगों को लगने लगा कि बहू को नौकरी पर भेजकर उन्होंने उस पर एहसान किया है इसलिए उसे करियर के साथ-साथ घर की ज़िममेदारियां भी पूरी तरह निभानी चाहिए. इसका नतीजा ये हुआ कि करियर वुमन की आर्थिक स्थिति तो सुधरने लगी, लेकिन उसका मी-टाइम छिन गया. करियर वुमन की ज़िंदगी घड़ी की सूइयों की नोक पर घूमने लगी. कॉलेज प्रोफेसर सुमन सिंह कहती हैं, “मुझे तो लगता है करियर वुमन होना किसी अभिषाप से कम नहीं. हमारी अपनी कोई ज़िंदगी ही नहीं होती. महिलाओं ने नौकरी करनी क्या शुरू की परिवार के लोगों ने उन्हें सुपर वुमन बना दिया. घर के सारे काम के अलावा बच्चों की पढ़ाई, घर के सारे बिल, बैंक के काम… धीरे-धीरे मर्दों ने अपने सारे काम महिलाओं की ओर सरका दिए. कभी-कभी तो लगता है कि हमसे सुखी वो महिलाएं थीं, जिन्हें घर के चूल्हे-चौके के अलावा और किसी काम से कोई मतलब नहीं था. महिलाओं के काम करते ही पुरुष जैसे रिलैक्स हो गए, अब उन्हें लगता है कि उनकी बीवी सबकुछ संभाल लेगी, लेकिन बीवी को कौन संभालेगा, इसकी किसी को परवाह नहीं रहती.”

…क्योंकि बदलाव ज़रूरी था
साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ के अनुसार, “महिलाओं ने यदि मी-टाइम की डिमांड करनी शुरू की, तो इसमें कुछ ग़लत नहीं है. अति किसी भी चीज़ की अच्छी नहीं होती. महिलाएं जब घर और करियर दोनों जगहों पर अपनी क्षमता से ज़्यादा काम करती हैं, तो इससे उनकी मेंटल और फिज़िकल हेल्थ बिगड़ने लगती है, जो न उनके लिए सही है और न ही उनके परिवार के लिए. लंबे समय तक घर-बाहर की दोहरी ज़िममेदारियां निभाते हुए महिलाओं को ये महसूस होने लगा कि उनके साथ ज़्यादती हो रही है, इसीलिए उन्होंने मी-टाइम की डिमांड करनी शुरू कर दी. आप इसे महिलाओं का मी-टाइम और शी-टाइम भी कह सकते हैं, क्योंकि अपने इस टाइम को वो परिवार के साथ नहीं, बल्कि अपनी फ्रेंड्स के साथ बिताना पसंद करती हैं. जहां न उन्हें कोई रोकने-टोकने वाला हो और न ही उन पर किसी तरह की कोई ज़िम्मेदारी हो.”

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इसलिए ज़रूरी है मी टाइम-शी टाइम
दिन-रात मेहनत करते हुए जब कुछ समय बेफिक्रे होकर अपने फ्रेंड्स के साथ बिताने का मौक़ा मिलता है, तो आप एक बार फिर से चार्जअप हो जाते हैं. इससे आपको नई ऊर्जा मिलती है और आप अपना काम और तमाम ज़िम्मेदारियां ख़ुशी-ख़ुशी पूरी कर लेते हैं. महिलाएं जब फ्रेंड्स के साथ शॉपिंग, डिनर या हॉलिडेज़ पर जाती हैं, तो उस समय उन पर किसी तरह का बोझ नहीं होता, लेकिन जब वो परिवार के साथ घूमने जाती हैं, तो उनका पूरा समय परिवार के सभी सदस्यों की सेवा-टहल में ही गुज़र जाता है और वो अपने हॉलिडेज़ को एंजॉय नहीं कर पातीं. हॉलिडेज़ पर भी परिवार के सदस्य यही उम्मीद करते हैं कि घर की महिलाएं वहां भी उनकी ज़रूरत की हर चीज़ उनके हाथ में दे. लेकिन महिलाएं जब अपनी फ्रेंड्स के साथ घूमने जाती हैं, तो वो पूरी तरह आज़ाद होती हैं और अपने हॉलिडेज़ को ज़्यादा एंजॉय कर पाती हैं.

मिल रहा है परिवार का सपोर्ट
कुछ समय पहले तक जब महिलाएं स़िर्फ घर और करियर के बीच ही उलझी रहती थीं, तो उनके काम के बोझ का असर उनकी सेहत और व्यवहार पर भी पड़ने लगा, जिससे कपल्स के बीच झगड़े होना, परिवार में वाद-विवाद की स्थिति बढ़ने लगी. ऐसे में सुलझे हुए परिवार के लोगों को भी ये समझ आने लगा कि उनके घर की महिलाएं ख़ुश नहीं हैं और ऐसा होना परिवार के लिए ठीक नहीं है. ऐसे में घर की महिलाओं ने जब मी-टाइम की डिमांड करनी शुरू की, तो परिवार के लोगों को भी उनकी मांग सही लगी और उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी महिलाओं को अपने इस स्पेशल टाइम को एंजॉय करने की इजाज़त देनी शुरू कर दी. बस, यहीं से एक बार फिर शुरुआत हुई महिलाओं के मी-टाइम की. अब तो महिलाएं बकायदा वीकेंड पर या महीने में एक बार अपनी फ्रेंड्स के साथ मी टाइम ज़रूर बीताती हैं. साथ ही अब महिलाएं एक साथ हॉलिडेज़ पर जाने लगी हैं और उनके परिवार भी उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी घूमने जाने देते हैं. महिलाओं में आया ये बदलाव उनकी फिज़िकल-मेंटल हेल्थ के लिए बहुत अच्छा है. रिटायर्ड बैंक ऑफिसर माधवी शर्मा ने बताया, “हमारे ज़माने में इतना ही काफ़ी था कि ससुराल वाले हमें नौकरी करने की इजाज़त दे रहे हैं. मी-टाइम के बारे में सोचने की तो कभी हिम्मत ही नहीं हुई. किसी भी महिला के लिए घर और करियर दोनों एक साथ संभलना आसान नहीं होता. सबकी इच्छाएं पूरी करते-करते महिलाएं अपने बारे में सोचना ही भूल जाती हैं. मैंने झेला है इस तकलीफ़ को इसलिए मैं अपनी बहू के साथ ऐसा नहीं होने देना चाहती. वो दिन-रात हम सबके लिए इतनी मेहनत करती है, मेरे बेटे के जितना ही कमाती भी है, तो क्या ये हमारी ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि हम भी उसकी ख़ुशी के बारे में सोचें.”

ट्रैवल कंपनियां देती हैं स्पेशल पैकेज
महिलाओं में बढ़ते मी-टाइम और शी-टाइम को देखते हुए अब ट्रैवल कंपनियां भी लेडीज़ स्पेशल ट्रैवल पैकेज देने लगी हैं, जिसमें महिलाओं की सेफ्टी और कंफर्ट का ख़ास ध्यान रखा जाता है. महिलाएं अपनी फ्रेंड्स के साथ इन ट्रैवल पैकेज का जमकर लुत्फ़ उठा रही हैं और अपने मी-टाइम को और भी ख़ास बना रही हैं. आरती अपनी चार सहेलियों के साथ हर साल एक हफ्ते के लिए घूमने का प्लान बनाती हैं और फ्रेंडस के साथ ख़ूब एंजॉय करती हैं. आरती ने बताया, “हम पांचों सहेलियां वर्किंग हैं और दिन-रात अपने काम में बहुत बिज़ी रहती हैं, लेकिन हम सब महीने में एक दिन ज़रूर मिलते हैं और उस दिन हम स़िर्फ अपने मन की करते हैं. वो एक दिन हम सबके लिए स्ट्रेस बस्टर का काम करता है और महीनेभर मेहनत करने की ऊर्जा देता है. हम सब साल में एक बार हफ्तेभर के लिए हॉलिडेज़ पर भी जाते हैं और ये हमारा गोल्डन टाइम होता है. परिवार-ऑफिस की सभी झंझटों से दूर इस एक हफ्ते को हम जी भर के जी लेते हैं. मुझे लगता है महिलाओं का मी टाइम उनकी ख़ुशी से ज़्यादा उनके मेंटल और फिज़िकल हेल्थ के लिए ज़रूरी है.

गर्लफ्रेंड के साथ घूमना इसलिए है फ़ायदेमंद
साइकोलॉजिस्ट माधवी सेठ कहती हैं, “जब एक लड़का और लड़की साथ घूमने जाते हैं, तो वो घूमना एंजॉय करने के बजाय एक-दूसरे को इंप्रेस करने में लगे रहते हैं, जिससे वो खुलकर नहीं रह पाते, लेकिन जब स़िर्फ लड़कियों या स़िर्फ लड़कों का ग्रुप कहीं घूमने जाता है, तो उनके बीच कोई फॉर्मेलिटीज़ नहीं होतीं, जिससे वो अपनी ट्रीप को पूरी तरह एंजॉय कर पाते हैं. यही वजह है कि मैरिड कपल भी एक-दूसरे के बजाय अपने फ्रेंड्स ग्रुप के साथ घूमने जाना ज़्यादा पसंद करते हैं और इसमें कुछ ग़लत नहीं है.”

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ये हैं महिलाओं में बढ़ते मी टाइम की ख़ास वजहें
* अपनी आज़ादी को महसूस करने और ख़ुशी के पल जुटाने की चाह.
* कुछ समय के लिए घर-परिवार, करियर की तमाम ज़िम्मेदारियों से ख़ुद को अलग करने की चाह.
* अपना मेंटल स्ट्रेस कम करने के लिए महिलाएं चाहती हैं मी टाइम.
* वर्किंग वुमन को कई बार काम के कमिटमेंट के कारण बच्चों की छुट्टियों में भी मायके जाने का मौक़ा नहीं मिलता इसलिए वो फ्री टाइम में फ्रेंड्स के साथ घूमना पसंद करती हैं.
* वो अपनी आर्थिक आज़ादी को महसूस करना चाहती है और ऐसा वो अपने मी टाइम में ही कर पाती है.

– कमला बडोनी

ग़ुस्सा कम करने और मन शांत करने के आसान उपाय (Anger Management: How To Deal With Anger)

Anger Management, How To Deal With Anger

आज के कॉम्पटीशन के युग में जितनी सुख-सुविधाएं मौजूद हैं, तनाव उससे भी कहीं ़ज़्यादा हैं. घर में सुख-सुविधाएं जुटाने का तनाव, ऑफ़िस में अच्छे परफ़ॉर्मेंस का तनाव… नतीज़ा, बात-बात में ग़ुस्सा, चिड़चिड़ापन… चाहकर भी हम नॉर्मल नहीं रह पाते. बढ़ते काम के घंटों ने जैसे दिन रात के फ़र्क़ को ही मिटा दिया है, जिसके चलते अक्सर ऑफ़िस का तनाव घर तक आ पहुंचता है और हमारी पर्सनल लाइफ़ को भी डिस्टर्ब करने लगता है. ग़ुस्से की स्थिति में हम बात-बात पर चिढ़ने लगते हैं, किसी का ग़ुस्सा किसी और पर निकालने लगते हैं. इससे न स़िर्फ हमारा मूड ख़राब रहता है, बल्कि सेहत भी बिगड़ने लगती है.

Anger Management, How To Deal With Anger
ग़ुस्से के कारण निवारण के बारे में जानते हुए भी आख़िर क्यों हम इस पर काबू नहीं कर पाते..? क्योंकि हम दूसरों से ही नहीं, अपने आप से भी ज़रूरत से ़ज़्यादा उम्मीदें करने लगते हैं. हम हर बात में बेस्ट और पऱफेक्शन ढूंढ़ने लगते हैं, जोकि हर बार मुमक़िन नहीं होता और ये भी मुमक़िन नहीं है कि किसी व्यक्ति को कभी ग़ुस्सा न आए. ख़ुशी, ग़म, प्यार-दुलार जैसी तमाम भावनाओं की तरह ही ग़ुस्सा आना भी मानव स्वभाव है. हां, जब इसकी अति होने लगती है तो इसके परिणाम भी नकारात्मक होने लगते हैं.

थोड़ा ग़ुस्सा ज़रूरी है
ग़ुस्सा हमारी ताकत बन सकता है, यदि हम उसका सही समय पर सही प्रयोग करें. कई बार हम ग़ुस्से में वो काम भी कर जाते हैं, जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती है. यानी ग़ुस्सा जब ताकत बन जाए, तो व्यक्ति को असाधारण प्रतिभा का धनी भी बना सकता है, लेकिन ग़ुस्सा तभी असरदार हो सकता है, जब वह किसी का अहित न करे, किसी को आहत न करे. अतः थोड़ा-बहुत ग़ुस्सा आता भी है, तो उसे अपनी ताक़त बनाइए, कमज़ोरी नहीं.

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कब आता है ग़ुस्सा?
जब हम कोई काम बड़ी लगन व मेहनत से करते हैं, लेकिन संतुष्टिजनक नतीज़ा नहीं मिलता.
जब कभी हार का सामना करना पड़ता है.
हालात, आस-पास के लोग या फिर ज़िंदगी की गाड़ी जब हमारे हिसाब से नहीं चलती. शारीरिक कमज़ोरी या लंबी बीमारी.

कैसे पाएं ग़ुस्से पर काबू?
* कारण जानने की कोशिश करें.
* यदि स्थिति आपके अनुरूप नहीं हो सकती तो ख़ुद को स्थिति के अनुरूप ढाल दें.
* जिस माहौल या लोगों के बीच आपको ग़ुस्सा आता है, उनसे दूर रहने की कोशिश करें.
* ग़ुस्से की स्थिति में अपना मन उन चीज़ों में लगाने की कोशिश करें, जिनसे आपको ख़ुशी या संतुष्टि मिलती है.
* जब ग़ुस्सा आए, तो अपने आपको किसी रचनात्मक कार्य में व्यस्त कर दें.
* उल्टी गिनती गिनें. इससे ग़ुस्से पर से आपका ध्यान हट जाएगा.
* लंबी-लंबी सांसें लें. ये एक तरह से डी-टॉक्सीन का काम कर के मन को शांत करता है.

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चेहरे पर न बांधें अहंकार की पट्टी (Signs Of An Arrogant Person)

Signs Of An Arrogant Person

किसी को ख़ूबसूरती का घमंड होता है, किसी को शिक्षा का तो किसी को धन का. अहंकार चाहे किसी भी चीज़ को हो ये व्यक्ति की सेहत के लिए अच्छा नहीं होता. अहंकार के नशे में चूर व्यक्ति स्वयं को ही सर्वोपरी समझता है और दूसरों को छोटा, लेकिन अहं के इस मद में वो ये भूल जाता है कि अहंकार ने बड़े-ब़डे संत महात्माओं का भी सर्वनाश कर दिया. सफलता के शिखर पर पहुंच आसान नहीं है लेकिन उससे भी ज़्यादा मुश्किल हैं वहां टिके रहना. जिसके लिए अहंकार से कोसो दूर रहना ज़रूरी है, क्योंकि जिस दिन आपके अंदर अंह आ गया समझ लीजिए उसी दिन से आपके पतन की उल्टी गिनती शुरू हो गई.

Signs Of An Arrogant Person

अहंकार से होता है विनाश
अहंकार किस तरह मनुष्य का विनाश कर सकती है इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण रावण है. महाज्ञानी रावण को अपनी शक्ति और ज्ञान का इतना अंह हो गया था कि वो ख़ुद को ईश्‍वर से भी ऊपर समझने लगा था और उसके इसी अहंकार ने उसका अस्तित्व मिटा दिया. आप कितने भी ज्ञानी व परोपकारी क्यों न हो अगर आप में अहंकार का ज़रा सा भी समावेश वो गया तो आपके सारे गुण अवगुण समान हो जाएंगे. जैसे आपने आज सुबह किसी गरीब व्यक्ति को दान तो किया लेकिन आप मन ही मन सोच रहे थे कि आप बहुत श्रेष्ठ हैं इसलिए आपके पास धन हैं, तो आपको दान का फल नहीं मिलेगा. अहंकार की पट्टी आंखों पर बंध जाने पर इंसान को अच्छे-बुरे, सही-ग़लत का भी ज्ञान नहीं रहता. अहंकार में अंधे व्यक्ति को अपना ग़लत काम भी सही लगने लगता है, और उसका यही रवैया उसो लोगों की नफ़रत का पात्र बना देती है.

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प्रगति में बाधक है अंहकार
कई लोगों को ये बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगती कि कोई उनके काम पर उगंली उठाएं. वो हर हाल में ख़ुद को सही साबित करने की कोशिश करते हैं (चाहे वो ग़लत ही क्यों न हों). अगर कोई उनसे कह दे “आपका ये काम ठीक नहीं है” तो उन पर आसमान टूट पड़ता है, उनके अहं को ठेस पहुंच जाती हैं और ग़लती सुधारने की बजाय वो सोचने लगते हैं “उसकी इतनी मजाल कि वो मेरे काम में ग़लती निकाले.” ऐसे लोग जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पातें, क्योंकि वो अपनी ग़लती स्वीकार करके उसे सुधारने की कोशिश ही नहीं करतें. उल्टे ग़लती बताने वाले को ही भला-बुरा कहने लगते हैं. शायद इन लोगों को ज़रूरत है कबीर का ये दोहा पढ़ने की.
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय

अहंकार से बचाती है विनम्रता
अगर आप जीवन में सफल होना चाहते हैं तो अहंकार को त्याग कर विनम्रता का दामन थाम लें. विनम्रता अहंकार को दूर रखती हैं. और ये संकट से भी बचाती है. आंधी-तूफान में एक सूखा पेड़ तो तुरंत टूट जाता है लेकिन फलों से लदा पेड़ नहीं टूटता, क्यों? क्योंकि वो झुका रहता है सूखे पेड़ की तरह अकड़कर खड़ा नहीं रहता. इसी तरह आप भी विनम्र बनकर मुश्किल परिस्थितियों का सामना कर सकते हैं. आज से आप भी विनम्रता को अपने जीवन का हिस्सा बना लीजिए फिर देखिए ज़िंदगी कितनी बदल जाती है. कल तक आपसे नफ़रत करने वाले लोग भी अब आपकी तरफ़ प्यार भरी नज़रों से देखने लगेंगे.

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क्या आप भी करते हैं दूसरों की बुराई? (How To Avoid Gossiping)

How To Avoid Gossiping

“बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत कहो” गांधीजी के ये वाक्य भले ही हमने रट लिए हों, लेकिन उन्हें जीवन में उतारने की कोशिश हमने आज तक नहीं की. तो क्यों न अब इस ओर एक प्रयास किया जाए?

How To Avoid Gossiping

क्योंकि निंदा करना बुरी बात है
कुछ बातें ऐसी होती हैं, जो हमें बचपन से सिखाई जाती हैं, जैसे- झूठ बोलना पाप है, चोरी करना गलत बात है आदि. इसी तरह निंदा करना बुरी बात है यह वाक्य भी कई बार हम अपने बड़े-बूढ़ों के मुंह से सुन चुके हैं, लेकिन आश्‍चर्य इस बात का है कि आज भी हमारी सुबह और शाम पड़ोसी, रिश्तेदार व सखी-सहेली से जुड़ी निंदक बातों से शुरू और खत्म होती है. जब कि हम सब इस बात से भलीभांति अवगत हैं कि निंदा करना बुरी बात है.

निंदा करना और सुनना दोनों ही पाप है
कहते हैं, अन्याय करनेवाले और सहनेवाले दोनों ही बराबर के दोषी होते हैं. ठीक उसी तरह हिंदू वेद-पुराण के अनुसार परनिंदा करनेवाले और सुननेवाले दोनों ही पाप के समान भागीदार होते हैं. अतः अगर धार्मिक किताबों में आपकी निष्ठा है, तो अब से न ही दूसरों की निंदा करें और न ही किसी की निंदक बातों में दिलचस्पी लें.

परनिंदा से बेहतर है संतगुणों की प्रसंशा
काहू कि नहिं निन्दिये, चाहै जैसा होय।
फिर फिर ताको बन्दिये, साधु लच्छ है सोय॥
संत कबीर दासजी कहते हैं कि भले ही कोई व्यक्ति कितना भी बुरा हो, परंतु उसकी निंदा न करें, क्योंकि इससे स़िर्फ समय की बर्बादी होती है और कुछ नहीं, इसलिए अच्छा यह होगा कि आप अपना समय उन लोगों की प्रशंसा में व्यतीत करें, जो स्वभाव से सरल हों, जिनके भीतर साधू के लक्षण विद्यमान हों अथवा जो सतगुणों की खान हों.

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परनिंदा से केवल समय की बर्बादी होती है
यह बात सौ आने सच है कि परनिंदा से केवल समय की बर्बादी होती है और कुछ नहीं, क्योंकि आप जिस व्यक्ति की निंदा करते हैं, उसे इस बात की ख़बर तक नहीं होती कि आप उसके बारे में यूं भला-बुरा कह रहे हैं, नतीजतन वह व्यक्ति तो अपने काम में मस्त रहता है, परंतु उस वक्त उसकी निंदा करने के चक्कर में आपके काम पर अल्पविराम लग जाता है, इसलिए अब से अपना बेशक़ीमती समय दूसरों की निंदा में बर्बाद करने की बजाय अपने काम में मन लगाएं.

परनिंदा से पहले करें स्वयं का परीक्षण
जब हम दूसरों की तरफ एक उंगुली दिखाते हैं, तब हम ये भूल जाते हैं कि बाकी बची चार उंगुलियां हमारी ओर इशारा करती हैं. अर्थात जब हम फलाना व्यक्ति को एक उंगली से परिभाषित करते हैं, तो उस वक्त हमारी चार उंगलियां हमें परिभाषित कर रही होती हैं. इसका मतलब आप उस व्यक्ति से ज़्यादा अवगुणी हैं. अतः किसी और पर दोषारोपण करने से पहले अपने गुण-दोष का परिक्षण करें और ख़ुद से पूछें कि क्या आप दूसरों की निंदा करने के लायक हैं? और उत्तर मिलने के बाद ही किसी की निंदा करें या सुनें.

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क्या आप इमोशनली इंटेलिजेंट हैं? (How Emotionally Intelligent Are You?)

How Emotionally Intelligent Are You

आपके साथ भी ऐसा कई बार हुआ होगा जब आपने जाने-अनजाने अपने पैरेंट्स, पार्टनर या क़रीबी दोस्तों का दिल दुखाया होगा. उस समय ग़ुस्से में आपने उन्हें भला-बुरा कह तो दिया होगा, लेकिन बाद में पछताए होंगे कि आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था. क्या आप अपने ऐसे व्यवहार या हरक़तों को बदल सकते हैं? बेशक, आप अपने दिमाग़ को अपनी भावनाओं पर कंट्रोल करना सिखा सकते हैं, ताकि आगे से आपकी ज़ुबान से ऐसा कोई वाक्य न निकले, जिसके लिए आपको बाद में पछताना पड़े. हां, इसके लिए आपको थोड़ी प्रैक्टिस ज़रूर करनी पड़ेगी.

How Emotionally Intelligent Are You

तलाशें नए रंग
रोज़ सुबह ये कल्पना करें कि आपका मन एक कोरी क़िताब है, जिस पर आपको स़िर्फ अच्छी बातें लिखनी हैं. अपनी कल्पनाओं के रंग भरने हैं. अब तक आपने या दूसरों ने जो भी बुरी बातें कहीं या सुनी, उन्हें आप अपने मन की क़िताब से मिटा देंगे और उनकी जगह ढेर सारी नई, अनोखी, दिलचस्प बातें लिखेंगे. यक़ीन मानिए, आपके ये पॉज़िटिव विचार आपके व्यवहार में भी झलकने लगेंगे. ऐसे में यदि कोई आपके सामने बुरा व्यवहार करता भी है, तो आप उसे अपने मन तक पहुंचने नहीं देंगे और हमेशा ख़ुश व एनर्जेटिक महसूस करेंगे.

कह दें मन की बात
जो लोग बीती बातों का बोझ मन में लिए फिरते हैं, उनके लिए मन को साफ़ रखना आसान नहीं होता. अतः किसी से भी कोई शिकवा-गिला हो तो उसे बातचीत द्वारा सुलझा लें, ताकि आपके मन में कोई ऐसी बात न रह जाए, जिसे आप कह न पाए हों, क्योंकि मन की कड़ुवाहट ही कई बार जाने-अनजाने ज़ुबान से आ जाती है. वैसे भी कह देने से मन हल्का हो जाता है.

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जब आए ग़ुस्सा
शॉपिंग करते समय यदि बच्चे ग़ैर ज़रूरी चीज़ के लिए ज़िद करने लगें, पति महोदय हमेशा की तरह बच्चे के स्कूल की पैंरेट्स टीचर्स मीटिंग में जाने से इनकार कर दें या फिर ऑफ़िस से थक कर आने पर सासू मां घर के कामों की लंबी लिस्ट थमा दें, तो आपको ग़ुस्सा आना लाज़मी है. ऐसी स्थिति में भी अपने ग़ुस्से पर कंट्रोल रख पाना ही इमोशनली इंटेलिजेंट होना है. आप अपनी भावनाओं पर जितना कंट्रोल रख पाएंगी, विपरीत स्थितियों से उतनी ही आसानी से निकल पाएंगी.

समाधान आसान है
ग़ुस्सा करने से पहले सोचें कि क्या इस स्थिति में आपका ग़ुस्सा करना वाजिब है? क्या आपके ग़ुस्सा करने से स्थिति सुधर जाएगी? ग़ुस्सा करने के अलावा आपके पास और क्या विकल्प है? हो सकता है, पति के साथ प्यार से बातचीत करके आप उन्हें अगली बार बच्चे की पैंरेट्स टीचर्स मीटिंग में जाने के लिए तैयार कर दें. इसी तरह सास व बच्चों को भी प्यार से अपने मन की बात समझा सकें.

हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होती है, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता है और उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती होती है.
– स्वामी विवेकानंद

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हार कर जीतने वाले को बाजीगर कहते हैं! (How To Overcome Failure)

How To Overcome Failure

हार कर जीतने वाले को बाज़ीगर कहते हैं! शाहरुख़ ख़ान की फिल्म बाज़ीगर का ये डायलॉग यूं ही मशहूर नहीं हो गया. इस डायलॉग में जीवन का सार छुपा है. जब हम हार से हारते नहीं, लगातार जीतने की कोशिश करते रहते हैं, तो हमारी जीत निश्‍चित होती है. हम तब तक नहीं हारते, जब तक हम हार नहीं मान लेते.

How To Overcome Failure

 

सुपरस्टार भी हारते हैं
सुपरस्टार अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ ख़ान से लेकर उद्योग जगत के बादशाह टाटा और बिड़ला तक सबने एक ही प्रयास में सफलता का स्वाद नहीं चखा, बल्कि हर बार हारने पर दुगुने जोश से आगे बढ़कर आज वो क़ामयाबी की बुलंदियों पर हैं. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन बार-बार चुनाव हारते रहे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और आख़िरकार 52 वर्ष की उम्र में राष्ट्रपति का पद हासिल किया. कहने का अर्थ है कि आपकी हार में जीत का रास्ता छुपा होता है. ज़रूरत है तो बस उसे पहचानने की.

हार को जीत में बदलें
परिक्षा या प्यार में असफल हो जाने, नौकरी न मिलने और ऑफिस में कोई प्रॉजेक्ट हाथ से निकल जाने पर आप मायूस हो जाते हैं, लेकिन क्या मायूस होने से आपकी हार जीत में बदल सकती है? नहीं, क्योंकि कमान से निकला तीर और जुबान से निकले शब्द की ही तरह बीता व़क़्त भी लौटकर नहीं आता. आप अपने बीते कल को तो नहीं बदल सकते, लेकिन हार में छुपी जीते के अवसर को पहचानकर आप आने वाले कल को ज़रूर संवार सकते हैं.

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क्योंकि हारना ज़रूरी है
अगर आपको पता ही न हो कि कड़वाहट क्या होती है तो क्या आप कभी मिठास का असली म़जा ले सकते हैं? नहीं न, उसी तरह जब तक आप असफलता का स्वाद नहीं चख लेते, तब तक आपको सफलता के असली मायने समझ नहीं आएंगे. जिस तरह दुख के बाद मिली ख़ुशी अनमोल होती है, उसी तरह हार के बाद मिली जीत का कोई मोल नहीं होता. बार-बार प्रयास करके हासिल की गई चीज़ की अहमियत एक बार प्रयास करने पर मिली चीज़ से कहीं ़ज़्यादा होती है. हार के रूप में मिली ठोकरें हमें मज़बूत बनाती हैं, इसलिए इसे सकारात्मक रूप में लें.

हार से लें सबक
हार के आगे नतमस्तक होने की बजाय उसे एक सीख की तरह लें. एक बार यह जानने की कोशिश करें कि आख़िर आप हारे क्यों? क्या आपके प्रयासों में कहीं कोई कमी रह गई थी? अगर हां, तो अगली बार उसे दुुगुनी मेहनत से उन्हें सुधारने की कोशिश करें. और अगर नहीं, तो भी उदास न हों, बल्कि एक नए जोश से फिर आगे बढ़ने की कोशिश करें. हो सकता है, इससे बेहतर मौक़ा आपका इंतज़ार कर रहा हो. एक बात हमेशा याद रखें कि गिरते वही हैं जो आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं.

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इसलिए सिखाएं बच्चों को हेल्दी कॉम्पटीशन (Why Healthy Competition Is Good For Kids)

Why Healthy Competition Is Good For Kids

कॉम्पटीशन दो तरह की होती है- पॉज़िटिव और निगेटिव. पॉज़िटिव कॉम्पटीशन में इंसान ख़ुद को अपने प्रतिस्पर्धी से आगे ले जाने के लिए जीतोड़ मेहनत करता है और उससे आगे निकल जाता है. इसे हेल्दी कॉम्पटीशन कहते हैं. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो ख़ुद तो कुछ नहीं करते, लेकिन दूसरों को भी आगे नहीं बढ़ने देते. ऐसे लोग अपने से क़ामयाब लोगों की बुराई करते रहते हैं, उनके काम में रुकावट डालने की कोशिश करते रहते हैं. ऐसे लोग न ख़ुद आगे बढ़ पाते हैं और न ही दूसरों को आगे बढ़ता देख सकते हैं. ऐसे लोग अपने आसपास स़िर्फ निगेटिविटी ही फैलाते हैं. अत: सभी पैरेंट्स के लिए ये बेहद ज़रूरी है कि वे अपने बच्चों को हेल्दी कॉम्पटीशन सिखाएं, ताकि उनके बच्चे अपने दम पर आगे बढ़ें और क़ामयाबी हासिल करें.

Why Healthy Competition Is Good For Kids

बचपन से सिखाएं ये आदत
कई बच्चे जब खेल में हारने लगते हैं, तो गेम छोड़कर चले जाते हैं या फिर अपने दोस्तों से झगड़ने लगते हैं. ख़ुद चीटिंग करने के बावजूद वो दोस्तों पर इसका इल्ज़ाम लगाते हैं. ऐसे बच्चों को दूसरे बच्चे गेम में शामिल नहीं करना चाहते, जिससे उनके दोस्त भी नहीं बन पाते. उससे भी बड़ी समस्या ये है कि ऐसे बच्चे आगे चलकर कॉम्पटीशन का प्रेशर नहीं झेल पाते. अत: पैरेंट्स को चाहिए कि वे छोटी उम्र से ही अपने बच्चों को हेल्दी कॉम्पटीशन के बारे में सिखाएं. उन्हें बताएं कि गेम में जीत-हार तो लगी रहती है. आज आपका दोस्त जीता है, कल आप जीत सकते हैं, लेकिन गेम में आगे रहने के लिए आपको हमेशा मेहनत करनी होगी. तभी आप हमेशा गेम में आगे रह सकते हैं. ऐसा ही उसे पढ़ाई के बारे में भी बताएं कि अच्छे नंबर लाने के लिए उसे हमेशा ज़्यादा मेहनत करनी होगी.

ज़रूरी है हेल्दी कॉम्पटीशन
आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हाईप्रोफाइल लाइफ़ स्टाइल की चाहत ने लोगों की प्रतिस्पर्धात्मक भावना को भी बढ़ा दिया है. हर कोई एक-दूसरे से बेहतर जीवन शैली चाहता है और इस चाहत को पूरा करने के चक्कर में लोग सामने वाले के पैर खींचकर आगे बढ़ने से भी परहेज नहीं करते. जबकि प्रतिस्पर्धा का मतलब दूसरों को पीछे खींचना नहीं, बल्कि ख़ुद आगे बढ़ना होता है. अगर आप चाहते हैं कि आपका बच्चा सही मायने में और अपने दम पर क़ामयाबी पाए, तो उसे अभी से हेल्दी कॉम्पटीशन का महत्व और उसके गुण सिखाएं.

हर मोड़ पर है कॉम्पटीशन
आज के दौर में बिना कॉम्पटीशन के जीवन के किसी क्षेत्र मेें आगे बढ़ने की कल्पना ही नहीं की जा सकती. स्कूल-कॉलेज से लेकर ऑफिस तक इसका दायरा बहुत बड़ा है. स्कूल-कॉलेज में छात्रों के बीच एक-दूसरे से अच्छे नंबर लाने की होड़ लगी रहती है, तो ऑफिस में दूसरों को नीचा दिखाकर ख़ुद को श्रेष्ठ साबित करने वालों की तादाद ज़्यादा होती है. प्रतिस्पर्धा अगर ईमानदारी से की जाए तो इससे काम की गुणवत्ता सुधरती है, क्योंकि अपने सहकर्मी को अच्छा काम करता देखकर दूसरा व्यक्ति भी उससे आगे बढ़ने के लिए अपने काम में सुधार करेगा. लेकिन प्रतिस्पर्धा में अगर ईमानदारी न हो, तो इसका परिणाम हमेशा नकारात्मक ही होता है. अत: अपने बच्चे को सिखाएं कि अच्छे नंबर लाने या खेल में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए उसे अपने सहपाठियों से ज़्यादा मेहनत करनी होगी, तभी वो उनसे आगे बढ़ सकता है.

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आगे बढ़ने का भाव
अपने बच्चे को सिखाएं कि ज़िंदगी में किसी क़ामयाब इंसान को देखकर उसकी तरह बनने या उससे आगे बढ़ने की बात सोचने में कोई हर्ज़ नहीं है. अपने सहपाठी से आगे बढ़ने के लिए अगर आप जी तोड़ मेहनत करते हैं, तो उसमें भी कुछ ग़लत नहीं है, क्योंकि ये सब आप अपनी तरक़्क़ी के लिए कर रहे हैं. लेकिन आप अगर किसी को पीछे धकेल कर या किसी को नीचे गिराकर आगे बढ़ रहे हैं, तो ये प्रतिस्पर्धा की श्रेणी में कतई नहीं आएगा. अपने बच्चे को यह भी समझाएं कि ग़लत तरी़के से मिली क़ायमाबी की उम्र ज़्यादा लंबी नहीं होती इसलिए हमेशा ख़ुद को बेहतर बनाने का प्रयास करते रहना चाहिए और इसके हमेशा मेहनत करनी चाहिए.

नफ़रत या ईर्ष्या का भाव
कई बार आपका बच्चा भी अपने दोस्त को पढ़ाई या खेल में उससे आगे बढ़ते देख निराश हो जाता होगा, ऐसा भी हो सकता है कि आपके बच्चे में अपने दोस्त को लेकर जलन या ईर्ष्या की भावना आ जाए. ऐसा होना स्वाभाविक है, क्योंकि हर कोई आगे बढ़ना चाहता है और ख़ुद को दूसरों से बेहतर साबित करना चाहता है. यदि आपका बच्चा भी ऐसा सोचता है, तो इसमें कोई बुराई नहीं है. ऐसी स्थिति में अपने बच्चे को सिखाएं कि सफलता की राह में आगे बढ़ने के लिए वो अपने प्रतिस्पर्धी भाव को जीवित रखते हुए सच्चे दिल व पूरी लगन से अपना काम करता रहे. पढ़ाई या खेल में आगे बढ़ने के लिए जी-जान से मेहनत करे. ऐसा करके जल्दी ही वो अपने दोस्त से आगे निकल सकता है. अपने बच्चे को सिखाएं कि दिल से की गई मेहनत कभी बेकार नहीं जाती. देर से ही सही, मेहनत का फल अवश्य मिलता है.

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