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राइट टु प्राइवेसी के बारे में कितना जानते हैं आप? (All You Need To Know About Right To Privacy In India)

ज़रा सोचें अगर कोई चौबीसों घंटे हम पर नज़र रखे, तो कैसा लगेगा? यक़ीनन किसी के लिए भी इस तरह जीना बहुत मुश्किल है, क्योंकि हर किसी को प्राइवेसी (Privacy) चाहिए. चाहे घर हो या ऑफिस, पब्लिक प्लेस हो या प्राइवेट, सोशल मीडिया हो या फिर इंटरनेट पोर्टल. सुकूनभरी ख़ुशहाल ज़िंदगी के लिए ज़रूरी है कि समाज का हर व्यक्ति एक-दूसरे की प्राइवेसी का सम्मान करे. क्या है प्राइवेसी और क्या है इसके मायने, आइए देखते हैं.

Right To Privacy In India

प्राइवेसी एक ऐसा विषय है, जिस पर बहुत कम लोग बात करते हैं. शायद एक तबका इस बारे में सोचता हो, पर मध्यम व निम्न वर्ग के लोगों को न ही इस बारे में अधिक जानकारी है और न ही वो इसे ज़्यादा तवज्जो देते हैं. लेकिन ज़रा सोचिए कल आपकी और आपके पार्टनर की प्राइवेट पार्टी की तस्वीर किसी वेब पोर्टल पर दिखे या फिर आपका सोशल मीडिया अकाउंट हैक हो जाए और उससे लोगों को अनाप-शनाप मैसेज सर्कुलेट हों, तो क्या तब भी आपको फ़र्क़ नहीं पड़ेगा? भले ही यह एक भूला हुआ विषय है, पर ऑनलाइन होती दुनिया में प्राइवेसी के बारे में सतर्क रहने की ज़रूरत तो हर किसी को है.

क़रीब 10 साल पहले पुणे का एक मामला काफ़ी चर्चित हुआ था, जहां 58 वर्षीय मकान मालिक को इसलिए सज़ा मिली थी, क्योंकि उन्होंने अपने यहां किराए पर रहनेवाली लड़कियों पर नज़र रखने के लिए अपने घर में स्पाई कैमरे लगवाए थे. इस तरह किसी के कमरे में कैमरे लगवाना क़ानूनन जुर्म है. इस घटना के बाद स्पाई कैमरों और छिपे हुए कैमरों को लेकर लोगों ने काफ़ी मुहिम भी चलाई थी, लेकिन प्राइवेसी पर छिड़ी यह जंग जल्द ही शांत पड़ गई थी.

हम कहां जाते हैं, क्या ख़रीदते हैं, क्या खाते हैं, कैसी सर्विसेज़ लेते हैं और अपने घर में कैसे रहते हैं, यह हमारा निजी मामला है. अपने घर की चारदीवारी में हम वो सब कर सकते हैं, जो एक सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए ज़रूरी है. कोई अचानक हमारे घर आकर बेवजह हमारी तलाशी नहीं ले सकता और न ही हम पर निगरानी रख सकता है.

क्या है राइट टु प्राइवेसी (निजता का अधिकार)?

हर व्यक्ति को यह अधिकार है कि वो एक सम्मानजनक जीवन बिताए और अगर कोई उसकी ज़िंदगी में बेवजह खलल डालने की कोशिश करे, तो उसे सज़ा दिलवाने का भी पूरा अधिकार रखता है. प्राइवेसी का अर्थ है निजता, गुप्तता या फिर एकांतता. अपने घर, परिवार, कामकाज आदि से जुड़ी ऐसी बहुत-सी बातें होती हैं, जो हम प्राइवेट रखना पसंद करते हैं. ये प्राइवेट बातें हमारी सेफ्टी के लिए बहुत अहम् हैं, इसलिए ज़रूरी है कि कोई इनसे छोड़छाड़ न करे.

समझें अपनी प्राइवेसी को

70 सालों से चली आ रही क़ानूनी लड़ाई के बाद आख़िरकार सुप्रीम कोर्ट ने राइट टु प्राइवेसी को मूल अधिकारों में शामिल कर इसे संवैधानिक मान्यता दे दी है. इसके हमारे लिए क्या मायने हैं, आइए समझते हैं.

–     प्राइवेसी के अधिकार के कारण कोई भी आपकी मर्ज़ी के बिना आपकी तस्वीर न ही खींच सकता है और न ही कहीं प्रकाशित कर सकता है.

–     आपकी निजी ज़िंदगी में तांक-झांक करने का किसी को कोई अधिकार नहीं है. किसी पर नज़र रखने के लिए स्पाई कैमरा लगाना क़ानूनन अपराध है.

–     फोन पर बातचीत करते व़क्त कोई आपकी पर्सनल बातें सुनने के लिए किसी इलेक्ट्रॉनिक का इस्तेमाल करता है या फिर आपको बात करने के दौरान  जान-बूझकर रोक-टोक करता है, तो यह निजता का उल्लंघन माना जाएगा.

–     आपकी अनुमति के बिना आपकी गंभीर बीमारी से जुड़ी कोई भी बात डॉक्टर या अस्पताल प्रशासन सार्वजनिक नहीं कर सकता. हालांकि एड्स के मरीज़ों के नाम गुप्त रखने का प्रावधान पहले से ही हमारे देश में है.

–     कोई आपके या आपके परिवार से जुड़े राज़ को दुनिया के सामने नहीं रख सकता.

–     लड़कियों के कमरों या पब्लिक टॉयलेट में तांक-झांक करना क़ानूनन अपराध है.

–     किसी के फोटो या वीडियो को बिना अनुमति के कमर्शियली इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

कैसे रखें प्राइवेसी?

–     अपनी प्राइवेसी को लेकर आपको ख़ुद थोड़ा अलर्ट रहना होगा.

–     कहीं भी अपनी निजी जानकारी शेयर करने से पहले पता कर लें कि आपकी उस जानकारी को किस तरह इस्तेमाल किया जाएगा.

–     जब तक अनिवार्य न हो, अपनी जन्म तारीख़ और ईमेल आईडी किसी भी फॉर्म में न भरें.

–     होटल वगैरह में रूम बुक करने से पहले उसकी विश्‍वसनीयता के बारे में जानकारी इकट्ठा कर लें.

–     मॉल के चेंजिंग रूम में कपड़े बदलते समय या फिर पब्लिक टॉयलेट इस्तेमाल करते समय देख लें कि वहां कोई छिपा हुआ

कैमरा तो नहीं है.

–   इस तरह के अपराधों के लिए आप सिविल कोर्ट या फिर लॉ ऑफ टॉर्ट के तहत अपराधी को सज़ा दिला सकते हैं. आप चाहें, तो मानहानि का मुक़दमा भी कर सकते हैं.

यह भी पढ़ें: जब मेडिकल लापरवाही के हों शिकार, तो कहां करें शिकायत? (Medical Negligence: Consumer Rights And The Law)

Privacy Rights In India
प्राइवेसी और डाटा कंपनियां

क्या आपने कभी ग़ौर किया है कि इंटरनेट पर कुछ सर्च करते ही वो चीज़ आपको अपने हर वेबसाइट से लेकर सोशल मीडिया तक क्यों नज़र आती है? ऑर्गैनिक सामान ख़रीदो, तो उससे जुड़े मैसेजेस आपको आने लगते हैं, कंपनी को पता चल गया कि ग्राहक प्रेग्नेंट है, तो उसके लिए बेबी प्रोडक्ट्स के कूपन्स आने लगते हैं, किसी ने ऑनलाइन हेल्थ इंश्योरेंस के बारे में सर्च किया, तो मेडिकल पॉलिसी बेचनेवाली कंपनियों के फोन आने शुरू हो जाते हैं.

इससे पता चलता है कि ऑनलाइन से लेकर ऑफलाइन तक हम जो भी करते हैं, उस पर डाटा कंपनियों की नज़र रहती है. अब तक हमारे देश में प्राइवेसी के अधिकार को मूल अधिकार नहीं माना गया था, इसलिए ये कंपनियां हमारा पर्सनल डाटा बिज़नेस कंपनियों को बेचती आ रही थीं, पर अब ऐसा नहीं हो पाएगा. इंटरनेट प्रोवाइडर्स को भी सावधानियां बरतनी पड़ेंगी.

प्राइवेसी और आधार कार्ड 

–     जब से देश में आधार कार्ड बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई, तब से लोगों के फिंगर प्रिंट, आंखों के स्कैन और चेहरे के स्कैन को लेकर कुछ लोगों ने इसे प्राइवेसी के अधिकार का हनन बताया था.

–     आधार को पैन कार्ड और मोबाइल से लिंक होने के बाद भी प्राइवेसी का सवाल उठा था, क्योंकि इससे आपकी हर एक्टिविटी का रिकॉर्ड कंपनियों और सरकार के पास जमा हो जाता है.

–     लंबे समय से चल रही यह लड़ाई अभी भी जारी है, पर आधार कार्ड को प्राइवेसी का उल्लंघन माननेवालों को बता दें कि ऐसी कई सरकारी योजनाओं को ग़रीब लोगों तक पहुंचाने में आधार काफ़ी कारगर साबित हुआ है.

–     इससे न स़िर्फ सरकारी योजनाओं में हो रही धांधली रुकी है, बल्कि राशन वितरण में हो रही काला बाज़ारी पर भी लगाम लगी है.

ऑनलाइन प्राइवेसी

पिछले कुछ सालों में टेक्नोलॉजी बहुत एडवांस हो चुकी है. आजकल ई कॉमर्स वेबसाइट्स और सोशल मीडिया के कारण हमारी ऑनलाइन प्राइवेसी ख़तरे में रहती है. कभी हैकिंग का ख़तरा, तो कभी ऑनलाइन फाइनेंशियल फ्रॉड का डर बना ही रहता है, ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि आप अपना पर्सनल डाटा, पासवर्ड्स, ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स आदि सुरक्षित रखें.

प्राइवेसी प्रोटेक्शन टिप्स

–    सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अपने बारे में बहुत ज़्यादा जानकारी शेयर न करें. कुछ भी शेयर करने से पहले याद रखें कि ये आपके दोस्तों के अलावा बहुत से अजनबी भी देख रहे हैं, जिनका मक़सद लोगों को फंसाना होता है.

–     अपनी कोई भी प्राइवेट जानकारी पब्लिक स्टोरेज में न रखें, जैसे- अकाउंट पासवर्ड्स, ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स के स्कैन आदि गूगल डॉक्स या ड्रॉप बॉक्स में न रखें.

–     जब भी आप किसी वेबसाइट पर जाते हैं, तो आपका वेब ब्राउज़र उस वेबसाइट को आपसे संबंधित कुछ जानकारी भेजता है.

–     जहां ज़रूरी हो, वहीं अपनी ईमेल आईडी और फोन नंबर शेयर करें, वरना स्पैम ईमेल्स और प्रमोशनल फोन कॉल्स आपको परेशान कर देंगे.

–     अपने पासवर्ड्स स्ट्रॉन्ग और बड़े रखें, ताकि आसानी से कोई इन्हें हैक न कर सके. कोशिश करें 12 कैरेक्टर का पासवर्ड बनाएं, जिसमें नंबर्स और स्पेशल कैरेक्टर्स भी हों.

–     बहुत-से ऐप किसी भी तरह की फंक्शनिंग के लिए आपसे परमिशन मांगते हैं, जिससे वो आपकी लोकेशन, मीडिया, कैमरा आदि के बारे में जानकारी इकट्ठा कर सकें. सभी ऐप्स को परमिशन न दें, बेहद ज़रूरी ऐप्स को ही ये सहूलियत दें.

–     कई लोग स्क्रीन लॉक करने के लिए पासवर्ड्स रखते हैं, पर नोटिफिकेशन लॉक नहीं करते, जिससे कोई भी आते-जाते आपके नोटिफिकेशन्स देख सकता है. सेटिंग्स में जाकर इसे डिसेबल करें.

प्राइवेसी में दख़ल देने की सज़ा

पहले यह मूलभूत अधिकारों की लिस्ट में शामिल नहीं था, पर कुछ समय पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने इसे मूलभूत अधिकारों की श्रेणी में जगह दी है. अभी तक इसके लिए अलग से कोई क़ानून नहीं बनाया गया है, हालांकि आईटी एक्ट में इसके लिए पहले ही सज़ा का प्रावधान था-

–    अगर कोई आपकी मर्ज़ी के बिना आपकी फोटो प्रकाशित करे या इलेक्ट्रॉनिक तरी़के से सर्कुलेट करे, तो आईटी एक्ट की धारा 66ई के तहत उसे तीन साल तक की जेल या फिर दो लाख से लेकर 10 लाख तक का जुर्माना या फिर दोनों ही हो सकते हैं.

– अनीता सिंह

यह भी पढ़ें: दहेज उत्पीड़न के ख़िलाफ़ कहीं भी केस दर्ज करा सकती हैं महिलाएं- सुप्रीम कोर्ट (Women Can File Dowry Harassment Cases From Anywhere- Supreme Court)

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कैसे करें प्राइवेसी मेंटेन? (maintain your privacy at social networking sites )

दिनोंदिन सोशल मीडिया का क्रेज़ युवाओं में तेज़ी से ब़ढ़ता जा रहा है. अपनी हर छोटी से छोटी पर्सनल बातों और गतिविधियों से फैमिली व फ्रेंड्स को रू-ब-रू करना उनकी आदत बनती जा रही है. मिनट-मिनट की अपडेट्स देकर वे अपनी फैमिली व फ्रेंड्स के साथ संवाद तो क़ायम रख सकते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि कोई अजनबी शख़्स उनकी प्रोफेशनल और पर्सनल प्राइवेसी में सेंध लगा रहा है, जिससे वे अंजान हैं. सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर आपकी प्राइवेसी में किसी का कोई दख़ल न हो, इसलिए ज़रूरी है कि ऑनलाइन प्राइवेसी का ध्यान रखा जाए. कैसे, आइए जानें? social networking sites

social

फेसबुक

गोपनीयता की जांच करने के लिए अपने पीसी वेब ब्राउज़र में फेसबुक पेज खोलें. फेसबुक मेनू बार (फेसबुक पर दिखनेवाली ब्लू पट्टी) के राइट कॉर्नर में दिए लॉक सिंबल (प्राइवेसी शॉर्टकट) पर जाएं. क्लिक करने पर Privacy Check-up आएगा, जिसके 3 स्टेप्स हैं:

 पहला स्टेप

आपकी पोस्ट कौन-कौन देख सकते हैं: यहां पर क्लिक करने पर यदि “Public’ आता है, तो इसका अर्थ है कि इंटरनेट पर मौजूद हर व्यक्ति आपकी पोस्ट देख सकता है. इसलिए वहां पर “Friends’ ऑप्शन सिलेक्ट करें. इससे आपके फ्रेंड्स ही देख सकते हैं.

दूसरा स्टेप

चेक करें कि कौन से ऐप्स आपकी टाइमलाइन पर इंफॉर्मेशन पोस्ट कर सकते हैं: यहां पर दिए गए ऑप्शन्स में से “Only Me’ सेट करें.

तीसरा स्टेप

अपने प्रोफाइल (ईमेल एड्रेस, बर्थडे और रिलेशनशिप स्टेटस) को दोबारा चेक करें: जिसमें फे्रंड्स को आपकी विज़ीबिलिटी दिखाई दे, अपनी कौन-सी पोस्ट गोपनीय रखना चाहते हैं- इनका सिलेक्शन करें.

कौन-से फे्रंडस आपसे कॉन्टैक्ट करना चाहते हैं, पहले उसे कंट्रोल करें.

– क्लिक करें Privacy Shortcut >Who Can Contact Me?

– वहां पर दिए गए ऑप्शन पर क्लिक करें कि आपको कौन-कौन लोग फ्रेंड्स रिक्वेस्ट भेज सकते हैं. इसके लिए Privacy Shortcut >Who Can Contact Me? को सिलेक्ट करें.

जो ऐप्स आपके बारे में जानकारी देते हैं, उन्हें चेक करें
– पीसी वेब ब्राउज़र में www.facebook.com/setting/?tab=application पर जाएं.

– Logged in with Facebook पर क्लिक करें.

– किसी ऐप पर क्लिक करके चेक करें कि आपने कौन-सी इंफॉर्मेशन (अपनी प्रोफाइल डिटेल्स, फें्रड लिस्ट आदि) शेयर की है, इस ऐप के ज़रिए आप यह जान सकते हैं कि किसने आपकी पोस्ट देखी है और किसने आपको नोटिफिकेशन भेजा है.

कैसे चेक करें कि लोग आपके बारे में क्या कहते हैं?

– फेसबुक मेनू बार के राइट कॉर्नर के आख़िर में प्राइवेसी शॉर्टकट के बाद आपको Triangular drop-down list (ट्रायएंगुलर ड्राप-डाउन लिस्ट) दिखाई देगी. इस पर क्लिक करने पर कई ऑप्शन्स मिलेंगे. उनमें से “Activity Log’ को क्लिक करें.

– फिर लेफ्ट साइडबार में जाकर “Timeline Review’ पर क्लिक करें. फिर अप्रूव/रिजेक्ट या ऐड/इग्नोर का ऑप्शन आएगा.

– फिर Tag Review को क्लिक करके अपने टैग्स को मैनेज करें.

– अंत में, “Post you are Tagged in’ में क्लिक करें. इसमें क्लिक करने पर आप सभी पोस्ट को देख सकते हैं, जिन्हें आपने टैग-अनटैग किया है.

गूगल: गोपनीयता की जांच करने के लिए

– myaccount.google.com/privacycheckup पर जाएं.

– आप Google+ पर कौन-सी इंफॉर्मेशन दूसरों के साथ शेयर करना चाहते हैं. फिर “Dont feature my publicly shared Google+Photos as background
images को सिलेक्ट करें.

– उसके बाद “Edit Your Shared Endorsement Setting’ पर क्लिक करें. वहां पर दिए गए ऑप्शन को अनचेक करें.

– फिर उन लोगों को allow/disallow करें, जो Google पर आपकी पर्सनल
इंफॉर्मेशन को देख रहे थे और आपका फोन नंबर सर्च कर रहे थे.

– इसी तरह से यूट्यूब पर भी आप अपनी गोपनीयता बनाए रख सकते हैं. उसके लिए Manage your Google Photos Settings पर क्लिक करके उसे डिसेबल करें.

ऐप्स और साइट्स की प्राइवेसी को कैसे कंट्रोल करें?

– myaccount.google.com/security#connectedapps पर जाएं.

– “Manage app’ को क्लिक करें. इससे मालूम चलेगा कि कौन-से ऐप्स आपके गूगल अकाउंट से कनेक्टेड हैं.

– जिन ऐप्स को आप ज़्यादा यूज़ नहीं करते, उन्हें डिलीट करने के लिए रिमूव पर क्लिक करें.

– अंत में Allow Less Secure Apps सेट करके उसे “OFF’ करें.

ट्विटर: गोपनीयता की जांच करने के लिए

– twitter.com/setting/security पर जाएं और Privacy सेक्शन पर स्क्रोल करें.

– Photo Tagging पर क्लिक करें कि कौन-कौन आपकी फोटो को टैग कर सकते हैं?

– फिर Tweet Privacy को लॉक करें. इससे आपकी पोस्ट को केवल आपके द्वारा अप्रूव्ड फॉलोवर्स ही देख पाएंगे.

– Tweet Location को डिसेबल करें. चाहें, तो आप अपने पिछले ट्वीट के लोकेशन संबंधी डाटा को भी डिलीट कर सकते हैं.

– यह जानने के लिए कि ट्विटर पर कौन आपको, आपका फोन नंबर और ईमेल एड्रेस सर्च कर रहा है, इसके लिए Discoverability को सेट करें.

– Personalization को डिसेबल करें. ऐसा करने पर कोई भी आपकी ब्राउज़िंग हिस्ट्री को नहीं देख पाएगा.

– Promote Content को भी डिसेबल करें, जिसमें आपके पर्सनल इंफॉर्मेशन और इंट्रेस्ट बेस्ड विज्ञापन दिखाई देते हैं.

– फिर Direct Message में जाकर “receive direct messages from
anyone’ ऑप्शन को डिसेबल करें.

ऐप्स को एक्सेस करें

– twitter.com/setting/application पर जाएं.

– अपने ट्विटर अकाउंट पर जाकर “Revoke access’ पर क्लिक करके अनट्रस्टेड ऐप्स एंड सर्विस को स्टॉप करें, जिन्हें आपने कभी-कभी एक्सेस किया हो.

इंस्टाग्राम पर गोपनीयता की जांच

कंट्रोल करें कि कौन आपकी पोस्ट देख रहा है?

अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर “Private>’ सेट करने के लिए: अपने इंस्टाग्राम मोबाइल ऐप को ओपन करें. Profile टाइप करने पर तीन वर्टिकल
डॉट्स दिखाई देंगे फिर Options में जाकर Private Account सेट करें. अब
फॉलोवर्स को आपकी इंस्टाग्राम फीड देखने के लिए आपके अप्रूवल की
ज़रूरत होगी.

टैग्ड को कैसे कंट्रोल करें?

– अपनी फोटो को अनटैग करने के लिए: इंस्टाग्राम ऐप में फोटो पर क्लिक करें. फिर Options>Photo Options>Remove Tag करें.

– अपनी सभी फोटोज़ को टैग करने के लिए Profile>Photo of you>Options करें.

यहां पर आप मैन्युअली भी अपनी इच्छानुसार किसी भी फोटो को टैग कर सकते हैं. इसके लिए Tagging Options>Add Manually करना होगा. इसके अलावा, आप उन सभी फोटोज़ को रिमूव कर सकते हैं, जो आपने कुछ समय पहले/हाल ही में टैग की हैं. इसके लिए आपको Profile>Photo of you>Options>Hide Photo करना होगा.

– पूनम नागेंद्र शर्मा

समय से पहले बड़े होते बच्चे

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दिल्ली के एक स्कूल में 2 बच्चों ने आपत्तिजनक स्थिति में अपना एमएमएस बनाया और दोस्तों को भेज दिया… एक टीनएज बच्चे ने छोटी बच्ची के साथ बलात्कार किया… कुछ बच्चे स्कूल में असामान्य अवस्था में पाए गए और जब उनसे पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि हम रेप गेम खेल रहे थे… माता-पिता अपने बच्चों के बारे में ऐसी बातें सपने में भी नहीं सोच सकते, पर ये आज की सच्चाई है. आज बच्चे तेज़ी से अपनी उम्र से पहले ही बड़े हो रहे हैं. ऐसे में पैरेंट्स को उन्हें हैंडल करना किसी चैलेंज से कम नहीं.

 

मुझे चांद-खिलौना ला दो मां… मुझे तारों तक पहुंचा दो मां… नन्हीं-सी गुड़िया ला दो मां… प्यारी-सी चुनरी दिला दो मां… पहन चुनरिया नाचूंगी, गुड़िया का ब्याह रचाऊंगी…” ऐसी ही ख़्वाहिशें थीं और कुछ ऐसा ही था हमारा बचपन और शायद 20-25 साल पहले तक भी बच्चों का बचपन कुछ ऐसा ही मासूमियत भरा था, लेकिन आज बचपन ऐसा नहीं है. आज के बच्चे कच्ची उम्र में ही जाने-अनजाने वयस्कों की तरह व्यवहार करने लगे हैं और उसे सही भी समझते हैं.

बोल्ड होते बच्चे

पुरानी पीढ़ी जिन विषयों पर युवावस्था में भी बातें करने से कतराती थी, वो बातें मासूम बच्चे या टीनएजर बेहिचक करने लगे हैं. 30 वर्षीया विनिता अपनी 4 साल की बेटी के साथ खिलौने की दुकान पर गई थी. वहां एक डॉल देखकर वो मचल गई कि बस यही चाहिए. विनिता के मना करने पर बच्ची ने कहा, “प्लीज़ मम्मा, ले दो ना. देखो ना कितनी हॉट और सेक्सी लग रही है.” 4 साल की बेटी के मुंह से निकले ऐसे शब्दों ने उसे अंदर तक हिला दिया, लेकिन आज ऐसे शब्द बोलचाल की भाषा मेंे बच्चे बड़ी सहजता से इस्तेमाल कर रहे हैं, भले ही वे इसका अर्थ समझें या न समझें. इतना ही नहीं, वे सेक्स की आधी-अधूरी जानकारी के साथ एक्सपेरिमेंट करने से भी नहीं कतराते. इस बात का खुलासा करते हुए सिनेमा हॉल में टिकट बुकिंग विंडो पर बैठनेवाले महेश कहते हैं, “बच्चे नकली आईडी प्रूफ़ के साथ एडल्ट फ़िल्म आराम से देखते हैं. शक के बावजूद हम कुछ नहीं कर पाते हैं.”
आजकल बच्चियांं मल्लिका व राखी बनना चाहती हैं. मुन्नी-शीला जैसा डांस करना चाहती हैं. छोटे-छोटे लड़कों की पसंद भी मुन्नी-शीला है. आज 4-10 साल की उम्र में ही बच्चे हॉट और सेक्सी की चाहत में सेक्सी कपड़े पहनना चाहते हैं. उत्तेजित क़िस्म के डांस करना चाहते हैं.

मीडिया व मॉडर्न लाइफ़स्टाइल भी ज़िम्मेदार

चाइल्ड सायकोलॉजी की टीचर वंदना उपाध्याय कहती हैं, “बच्चे ये सब कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें अपने आसपास यही सब दिखाई दे रहा है. मीडिया व मॉडर्न लाइफ़स्टाइल उन्हें सिखा रहा है कि सुंदर व सेक्सी दिखने के आगे अन्य गुणों का मोल फीका है. बच्चों को सुपरस्टार बनाने की होड़ में कभी-कभी पैरेंट्स भी अनजाने ही इन चीज़ों को बढ़ावा दे जाते हैं.”
सायकोलॉजिस्ट अरुणेश कुमार का कहना है, “हमारे बच्चों का दिमाग़ पहले से ही इंटरनेट से मिलनेवाली आधी-अधूरी जानकारी से भरा हुआ है. इसके साथ जो दूसरी समस्या जुड़ी है, वो यह है कि हमारे घरों में अभी भी सेक्स जैसे विषय पर बातचीत नहीं की जाती है, तो उन्हें सही ज्ञान या सीमा के बारे में कहां से समझ में आएगा?”
महानगरीय संस्कृति ने भी इन बातों को बढ़ावा दिया है. वर्किंग पैरेंट्स अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं. बच्चे घर से बाहर जाकर मस्ती न करें, इसलिए उन्हें कंप्यूटर और वीडियो गेम थमा देते हैं, ताकि वो घर पर ही एंजॉय कर सकें. उन्हें ़ज़्यादा से ज़्यादा सुविधाएं प्रदान करते हैं. अब बच्चे घर पर रह कर क्या रहे हैं, भला इसका पैरेंट्स को कहां पता होता है? ऐसे में वो इंटरनेट का ग़लत इस्तेमाल भी करने लग जाते हैं.
हालांकि आज बच्चों के साथ किसी बात के लिए जोर-ज़बरदस्ती नहीं की जानी चाहिए. इस तरह उन्हें रोका भी नहीं जा सकता है, लेकिन यह कहकर भी पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता है कि ‘हम क्या करें. बच्चे सुनते ही नहीं हैं, समझना ही नहीं चाहते हैं’ आज ब्लैक एंड व्हाइट का ज़माना नहीं है. बच्चों की दुनिया में रंगीन सपने हैं. अतः उनके सपनों में रंग भरना भी पैरेंट्स की ही ज़िम्मेदारी है. शुरू से उन्हें संतुलित मनोरंजन व अनुशासन की आदत होनी चाहिए और उन्हें जानना चाहिए कि हर चीज़ या हर बात की एक उम्र होती है.
बच्चों के ऐसे व्यवहार के पीछे कई कारण हो सकते हैं. आइए, इनमें से कुछ आम कारणों पर नज़र डालें-
जिज्ञासु प्रवृत्ति- बच्चों में हर बात को जानने की जिज्ञासा होती है. यह उनकी सहज प्रवृत्ति है. वे कहीं कुछ भी होता देखते हैं, तो उसे ख़ुद भी करके देखना चाहते हैं. उनके मन में विपरीत सेक्स के शारीरिक अंगों के प्रति भी जिज्ञासा होती है. यदि इस जिज्ञासा को सही तरी़के से हैंडल न किया गया, तो ये ग़लत मनोभावों को जन्म देती है.
खुलकर बातचीत न होना- हमारे देश में आज भी पैरेंट्स अपने बच्चों से सेक्स के विषय में बात नहीं करते हैं. बच्चा यदि सवाल करता है, तो उसे डांटकर चुप करा दिया जाता है. धीरे-धीरे बच्चे इधर-उधर से आधी-अधूरी जानकारी हासिल करने लगते हैं और ग़लत राह पर भटक जाते हैं. उम्र के साथ उनको सेक्स से संबंधित ज़रूरी जानकारी भी दी जानी चाहिए. बेहतर तो यही है कि पैरेंट्स स्वयं उनसे बात करें और सही ज्ञान दें.
प्राइवेसी व स्पेस- प्राइवेसी ने जहां एक तरफ़ बच्चे को थोड़ा आत्मनिर्भर बनाया है, वहीं दूसरी तरफ़ उन्हें बिगाड़ने में भी कमी नहीं रखी है. 14 वर्षीय राहुल दिनभर अपने कमरे में रहता है. कंप्यूटर जैसी सब सुविधाएं हैं, दोस्त भी आते हैं. गेम्स भी खेलते हैं. एक दिन मम्मी के अचानक प्रवेश करने पर राहुल ने तुरंत टोक दिया, “मम्मी, नॉक करके आया कीजिए.” जब चुपचाप छानबीन की गई, तो ड्रग्स, अश्‍लील साहित्य व अनेक नग्न चित्र मिले. स्पेस व प्राइवेसी आत्मनिर्भता के लिए सही है, लेकिन यह देखना भी ज़रूरी है कि एकांत में बच्चे करते क्या हैं. कहीं वे एकांत का नाजायज़ फ़ायदा तो नहीं उठा रहे हैं.
भावनात्मक जुड़ाव का अभाव- कुछ लोगों का मानना है कि वर्किंग पैरेंट्स बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते, इसलिए बच्चे बिगड़ जाते हैं. ये सच नहीं है. समस्या तब बढ़ती है, जब पैरेंट्स साथ होकर भी भावनात्मक रूप से उनसे जुड़ नहीं पाते हैं, बल्कि उनकी ज़रूरतें पूरी करके और पैसे कमाकर यह समझ लेते हैं कि बच्चों को पूरा प्यार दे रहे हैं. वे साथ खाना तो खाते हैं, लेकिन टीवी देखते हुए. धीरे-धीरे घर में पसरता कम्यूनिकेशन गैप बच्चों को दोस्तों के क़रीब ले आता है. फिर तो सही-ग़लत की दुनिया या आधी-अधूरी जानकारी का रास्ता भी दोस्त ही बनते हैं.
शक्की पैरेंट्स- 15 वर्षीय रोहित अपने मम्मी-पापा के शक्की स्वभाव से परेशान है. कहीं मीडिया में बच्चों के बिगड़ने की कोई ख़बर आई नहीं कि रोहित पर पाबंदियां बढ़ जाती हैं. उसके दोस्तों पर शक किया जाने लगता है. पैरेंट्स ऐसे व्यवहार करते हैं, मानो बच्चे कुछ छुपा रहे हैं. बच्चों को जब महसूस होता है कि पैरेंट्स को उन पर भरोसा नहीं है, तो वो भी उनसे बातें छुपाने लगते हैं. इस तरह बच्चा साथ रहकर भी अकेला हो जाता है और उसके ग़लत रास्ते की ओर बढ़ने की संभावना बढ़ जाती है.

क्या करें पैरेंट्स?

कम्यूनिकेशन गैप न आने दें- समस्याएं तभी बढ़ती हैं, जब आपसी बातचीत का ज़रिया रुक जाता है और बातें अनकही रह जाती हैं. साथ ही बच्चों से बातचीत करते समय उनकी समस्या को समझने के लिए आपको उनके स्तर पर आना होगा, क्योंकि आप उनकी उम्र के दौर से गुज़र चुके हैं. वो आपकी उम्र की विचार शक्ति तक नहीं पहुंचे हैं.
रिश्तों व संस्कारों की अहमियत समझाएं- बचपन से ही सही व अच्छे संस्कारों के साथ उनकी परवरिश करें. आदर्श माता-पिता बनें, तभी वो सही दृष्टिकोण को अपना सकेंगे और रिश्तों को समझेंगे. उनमें पॉज़िटिव सोच बढ़ेगी और ग़लत हरकतों से दूर रह पाएंगे.
अलग कमरा दें, अलग ज़िंदगी नहीं- यदि सुविधा है और आपने अपने बच्चों को अलग कमरा दिया है, तो शुरू से ही उसके कमरे में आते-जाते रहें. वहां बैठकर बातें करें और पूरी कोशिश करें कि उसकी ज़िंदगी उस कमरे में सिमटकर न रह जाए. अपनी आलमारी अरेंज करते समय उसकी मदद लें और उसके कमरे की साफ़-सफ़ाई में उसकी मदद करें, ताकि आपस में खुलापन बना रहे.
अच्छी क़िताबें पढ़ने की आदत डालें- क़िताबों से बच्चों का परिचय एक वर्ष की उम्र के अंदर ही हो जाना चाहिए. जैसे-जैसे बच्चे बड़े होने लगें, उम्र के अनुसार उन्हें अच्छी क़िताबें पढ़ने के लिए दें, ताकि शुरू से अच्छा साहित्य व अच्छी पुस्तकों के प्रति सम्मान बना रहे. अच्छी क़िताबें पढ़ने से तर्क बुद्धि विकसित होती है तथा सही-ग़लत की पहचान समय पर आने लगती है.
पैसे से प्यार को न जोड़ें- प्यार के नाम पर बच्चों की हर सही-ग़लत मांग को पूरा न करें. आप उन्हें समय नहीं दे पा रहे हैं, इस कारण हीनभावना या अपराधबोध मन में मत पालें, क्योंकि आप जो कर रहे हैं, उन्हीं के लिए कर रहे हैं. बच्चों की हर मांग को पूरी करने से पहले देखें कि वो कितनी ज़रूरी है. उसे ख़ुश करने के लिए पैसे मत दें.
दोस्त बनें- बच्चों को हर बात शेयर करने की छूट दें. कई बार पैरेंट्स पूरी बात सुने बिना ही अपनी टिप्पणी या निर्णय दे बैठते हैं. ऐसे में बच्चा अपनी बात शेयर नहीं करना चाहता. बच्चों को समझने के आपके तरी़के सही हो सकते हैं, लेकिन उनकी उम्र और उस उम्र की जिज्ञासा को समझना ज़रूरी है. उनके साथ टीवी प्रोग्राम देखें. साथ डिनर करें. उसके दोस्त बनें. फिर देखिए वो अपनी हर बात आपसे शेयर करने लगेगा.
उपदेश देनेे की बजाय बच्चे की भी सुनें- हमारे यहां बड़े हमेशा बच्चों को उपदेश देते रहते हैं यानी उन्हें समझाते रहते हैं. यदि पिता की उम्र 60 की है और बेटे की 35, तो भी पिता उसे उपदेश देना अपना अधिकार समझते हैं. ऐसा करने से बचें. बच्चों को सही दिशा देने या उनकी ग़लत बातों को जानने के लिए ज़रूरी है कि धैर्य के साथ उन्हें सुना जाए. अपनी बात रखने का उन्हें मौक़ा दिया जाए. हम जितना ज़्यादा बच्चों को सुनेंगे, उतनी अच्छी तरह उनकी मनोवृत्ति समझ पाएंगे व उनके क़दम बहकने से पहले ही उन्हें रोक पाएंगे.

– प्रसून भार्गव