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हार्मोंस कर सकते हैं दांतों को बीमार (Hormones And Dental Health)

Hormones And Dental Health

हमारे शरीर में अनेक प्रकार के हार्मोंस (Hormones) स्रावित होते हैं. किशोरावस्था से लेकर मेनोपॉज़ (Menospause) तक हार्मोंस के स्तर में बदलाव होता रहता है. यही बदलाव हमारे डेंटल हेल्थ (Dental Health) को भी प्रभावित करता है और हमें पता भी नहीं चलता. जीवन के इसी बदलाव की अन्य अवस्थाएं, जैसे- प्यूबर्टी (Puberty), पीरियड्स का आना (Periods), प्रेग्नेंसी (Pregnancy), ब्रेस्टफीडिंग (Breastfeeding) और मेनोपॉज़ डेंटल हेल्थ को किस तरह प्रभावित करते हैं, यह जानने के लिए हमने बात की डेंटिस्ट डॉ. नूपुर श्रीराव से.

Hormones And Dental Health

प्यूबर्टी: इस अवस्था में प्रोजेस्टेरॉन और एस्ट्रोजन का स्तर अधिक बढ़ जाता है, जिसके कारण कई बार मसूड़ों में सूजन और ब्लीडिंग होने लगती है. इन समस्याओं को नज़रअंदाज़ करने पर ‘जिंजिवाइटिस’ नामक दांतों की बीमारी हो जाती है. इस उम्र में लड़कियां मीठा, जंक फूड, कोल्ड ड्रिंक बहुत अधिक पीती हैं, जिससे हार्मोंस असंतुलित होने लगते हैं और इनका बुरा असर डेंटल हेल्थ पर पड़ने लगता है.

समाधान

  • डॉक्टर से दांतों की क्लीनिंग कराएं, अन्यथा दांतों में सड़न हो सकती है.
  • हेल्दी दांतों के लिए हेल्दी फूड और नट्स खाएं.
  • रोज़ाना दिन में 2 बार ब्रश करें.
  • नारियल पानी और नींबू पानी पीएं.

पीरियड्स आना: अक्सर महिलाएं पीरियड्स आने के पहले दांतों की समस्याएं, जैसे- मसूड़ों का फूलना, उनमें दर्द होना आदि शिकायतें करती हैं. पीरियड्स के दौरान शरीर में प्रोजेस्टेरॉन हार्मोन के स्तर में बदलाव होता है, जिसके कारण यह समस्या होती है.

समाधान

  • अन्न के कण दांतों में फंसे रहने के कारण उनमें सड़न होने लगती है, इसलिए हर बार खाना खाने के बाद कुल्ला करना न भूलें.
  • पानी में कुछ बूंदें एंटीबैक्टीरियल ऑयल, जैसे- लौंग का तेल, दालचीनी का तेल और यूकेलिप्टस ऑयल की डालकर गरारे करें.
  • कच्चा प्याज़ और लहसुन को भोजन में शामिल करें, क्योंकि इनमें ऐसे एंटीबैक्टीरियल तत्व होते हैं, जो इस समस्या से निजात दिलाते हैं.

प्रेग्नेंसी: गर्भवती महिलाओं में हार्मोंस का स्तर अस्थिर होता है. यह कभी कम, तो कभी ज़्यादा होता है. इससे कई बार दांतों की समस्याएं हो जाती हैं, जैसे- मसूड़ों का लाल होना, उनमें सूजन और दर्द होना आदि.

समाधान

  • दिन में 2 बार ब्रश करने और दांतों को फ्लॉस करने की आदत डालें.
  • कुछ भी खाने के बाद तुरंत कुल्ला करें.
  • प्रेग्नेंसी के दौरान गर्भवती महिला को कैल्शियम, विटामिन डी और फोलिक एसिड की अधिक मात्रा में ज़रूरत होती है, इसलिए डॉक्टरी सलाहानुसार इन्हें अपने भोजन में ज़रूर शामिल करें.

स्तनपान: प्रेग्नेंसी के बाद स्ट्रेस और तनाव के साथ-साथ थकान भी बहुत बढ़ जाती है. हार्मोंस में भी बहुत परिवर्तन होते हैं, जिसके कारण दांतों में सड़न और मसूड़ों की बीमारियां हो सकती हैं.

समाधान

  • स्तनपान करानेवाली महिलाएं कैल्शियम और ओमेगा 3 फैटी एसिडयुक्त आहार लें.
  • भोजन में हेल्दी फूड खाएं.
  • शरीर में पानी की कमी न होने दें.

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Hormones And Dental Health

मेनोपॉज़: मेनोपॉज़ के दौरान हार्मोंस असंतुलित होते रहते हैं, जिससे महिलाओं को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जैसे- मुंह का स्वाद ख़राब होना, मुंह में जलन होना, सेंसिटिविटी आदि. कई बार मसूड़ों और दांतों के रोग भी हो जाते हैं. मेनोपॉज़ में एस्ट्रोजन हार्मोन का स्तर कम होने लगता है, जिससे हड्डियां कमज़ोर होने लगती हैं.

समाधान

  • दांतों की सुरक्षा के लिए फ्लोरॉइड टूथपेस्ट का प्रयोग करें.
  • हड्डियों की मज़बूती के लिए डॉक्टर की सलाहानुसार अपनी डायट में कैल्शियम और विटामिन डी आवश्यक मात्रा में शामिल करें.
  • तली-भुनी, नमकीन, तीखी और दांतों में चिपकनेवाली चीज़ें न खाएं.
  • चाय, कॉफी, अल्कोहल और तंबाकू का सेवन कम करें.

गर्भ निरोधक गोलियां: गर्भ निरोधक गोलियों में प्रोजेस्टेरॉन हार्मोन होता है. अत: इनका अधिक सेवन करने से हार्मोन असंतुलित होने लगते हैं, जिससे मसूड़ों में सूजन और पेट की समस्याएं, जैसे- कब्ज़, पेट का फूलना आदि होती हैं. इन समस्याओं के कारण मुंह में बदबू आना और दांतों में सड़न भी हो सकती है.

समाधान

  • डॉक्टर की सलाह से प्रोबायोटिक टैबलेट और विटामिन बी कॉम्प्लेक्स की गोलियां लें.

स्वस्थ दांतों के लिए ईज़ी टिप्स

  • मीठा खाने की बजाय फल व सूखे मेवे खाएं.
  • कोल्ड ड्रिंक, कोल्ड कॉफी, फू्रट जूस के बदले नारियल पानी या नींबू पानी पीएं.
  • जिनके दांतों में बे्रसेस लगे हुए हैं, उन्हें दांतों की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि अन्न के कण दांतों में चिपक व फंस जाने के कारण दांतों में सड़न हो सकती है.
  • कुछ भी खाने-पीने के बाद अच्छी तरह से कुल्ला करें.
  • डॉक्टर की सलाह से रात को माउथवॉश से गरारे करके सोएं.
  • स्तनपान करानेवाली महिलाएं तिल व अलसी खाएं. इनमें कैल्शियम और ओमेगा 3 फैटी एसिड अधिक मात्रा में होता है, जो दांतों के लिए बहुत फ़ायदेमंद है.
  • 8-10 ग्लास पानी पीएं.
  • दांतों की छोटी सी समस्या को नज़रअंदाज़ न करें. तुरंत डॉक्टर को दिखाएं.

 

–  नेहा श्रीराव

रिलेशनशिप की 5 लेटेस्ट प्रॉब्लम्स व उनके स्मार्ट हल (5 latest Relationship problems and smart solutions)

Relationship problems and smart solutions

पति-पत्नी के रिश्ते की नाज़ुक डोर प्यार, विश्‍वास, भरोसे व अपनेपन जैसे मज़बूत धागों से बंधी होती है. इनमें ज़रा-सी भी उलझन दिलों में दरार डाल देती है और रिश्ते दरकने लगते हैं. कहीं आपकी शादीशुदा ज़िंदगी में भी तो कोई रिलेशनशिप प्रॉब्लम नहीं? अगर है, तो आइए जानें, रिलेशनशिप की 5 लेटेस्ट प्रॉब्लम्स (Relationship problems and smart solutions) व उनके स्मार्ट हल.

Relationship problems and smart solutions

1. कम्युनिकेशन गैप

हर सफल रिश्ते की नींव कम्युनिकेशन यानी बातचीत व सही व्यवहार पर टिकी होती है. जॉन ग्रे की क़िताब ङ्गमेन आर फ्रॉम मास, वुमन आर फ्रॉम वीनसफ में लेखक ने लिखा है, ङ्गस्त्री और पुरुष दोनों का संबंध अलग-अलग ग्रहों से है, इसलिए उनमें रिलेशन प्रॉब्लम्स होती हैं, जिससे महिलाएं चाहती हैं कि कोई उन्हें ध्यान से सुने, उनकी बातों परध्यान दे, पर पुरुष उन्हें समझ नहीं पाते और अपनी व्यस्तता के कारण उन्हें समाधानों की एक लंबी-चौड़ी लिस्ट थमा देते हैं.
अक्सर महिलाएं कहना कुछ चाहती हैं, पर वे कहती कुछ और हैं, जैसे- ङ्गकोई बात नहीं, मैं ये काम कर लूंगी,फ तो पुरुषों को समझ जाना चाहिए कि कुछ बात है और वह चाहती है कि आप उनसे कहें कि नहीं, नहीं मैं वो काम कर लूंगा, पर पुरुष इसे समझ ही नहीं पाते. इसी वजह से पत्नी को लगता है कि उसके पति उसे समझते ही नहीं, जिससे उनके रिश्ते में प्रॉब्लम्स आने लगती हैं.
ऐसी ही न जाने कितनी बातों की वजह से पति-पत्नी के रिश्ते में ख़ामोशी आने लगती है, जो धीरे-धीरे उनके रिश्ते को ख़ामोश करने लगती है, इसलिए अपने रिश्ते को बचाने के लिए उसमें कभी भी ख़ामोशी को न आने दें.
स्मार्ट हल
* कम्युनिकेशन यानी बातचीत का अर्थ केवल बोलना नहीं है, बल्कि सामनेवाले की बातों को ग़ौर से सुनना और समझना भी है.
* माना घर-गृहस्थी और करियर के चक्कर में आप एक-दूसरे के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं, पर आपके पार्टनर के बिना कैसी घर-गृहस्थी?
* पार्टनर के बीच बातचीत बहुत ज़रूरी है. एक-दूसरे की मजबूरियों और समस्याओं को समझने की कोशिश करें और कोई भी फैसला लेने से पहले खुलकर उस विषय पर बात करें.
* कितनी भी नाराज़गी क्यूं न हो, बात करना बंद न करें.
* इसके लिए किसी न किसी को तो पहल करनी ही होगी, तो उनके पहल करने का इंतज़ार न करें और अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त कर दें.
* हमेशा याद रखें कि ऐसी कोई समस्या नहीं है, जिसका हल बातचीत से नहीं निकल सकता. बड़ी से बड़ी समस्या का हल बैठकर निकाला जा सकता है.

2. नो टाइम फॉर सेक्स

शादीशुदा ज़िंदगी को सफल बनाने में सेक्सुअल रिलेशन अहम् भूमिका अदा करती है. आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में, जल्दी से जल्दी सब कुछ पा लेने की होड़ में अक्सर रिश्ते कहीं पिछड़ जाते हैं, ख़ासकर शहरों में, जहां दोनों ही पार्टनर्स कामकाजी हैं, एक-दूसरे के लिए क्वालिटी टाइम निकालना मुश्किल हो जाता है, जिसका असर उनके शादीशुदा जीवन पर पड़ता है.
स्मार्ट हल
* चाहे कितने भी बिज़ी हों, एक-दूसरे के लिए समय ज़रूर निकालें. ध्यान रखें, सेक्स शादीशुदा ज़िंदगी के लिए टॉनिक की तरह है.
* इसके लिए ज़रूरी है कि दोनों ही खुलकर अपनी भावनाएं एक-दूसरे से व्यक्त करें.
* वीकेंड पर या छुट्टी के दिन ऑफ़िस को भूल जाएं. पूरा दिन साथ-साथ बिताएं. रोमांटिक बातें करें. आउटिंग पर जाएं.
* एक-दूसरे को छोटे-छोटे गिफ्ट्स देकर भी आप अपनी भावनाओं को ज़ाहिर कर सकते हैं.
* शादीशुदा ज़िंदगी में ताज़गी बनाए रखने के लिए हर छह महीने पर या साल में कम से कम एक बार स़िर्फ आप दोनों घूमने जाएं. ऐसे में सारे गिले-शिकवे भी दूर हो जाते हैं और आपकी सेक्सुअल लाइफ भी रिन्यू हो जाती है.

3. फाइनेंशियल प्रॉब्लम्स

अक्सर पैसे ख़र्च करने के मामले में दोनों पार्टनर अलग होते हैं. एक को बहुत ख़र्च करना पसंद होता है, तो दूसरे को बचत करने की या कम ख़र्च करने की आदत होती है. कई बार तो पार्टनर के बीच इस बात को लेकर झगड़े हो जाते हैैं कि कौन कितना ख़र्च करेगा. व्यक्तिगत ख़र्च को प्राथमिकता देकर घर ख़र्च को अनदेखा करना भी इसका एक प्रमुख कारण है.
स्मार्ट हल
* दोनों पार्टनर्स बैठकर फाइनेंशियल प्लानिंग करें. इन्वेस्टमेंट आदि के अलावा घरेलू ख़र्चों में दोनों मिलकर सहयोग करें.
* हर महीने का बजट बनाएं, ताकि फ़िज़ूलख़र्ची न हो.
* अपने पार्टनर से अपने व्यक्तिगत ख़र्चों को छुपाए नहीं.

4. नो टाइम फॉर किड्स

कहते हैं, बच्चा पति-पत्नी के बीच के सभी गिले-शिकवे दूर कर उन्हें और क़रीब ले आता है, लेकिन आज कपल्स के पास इतना समय ही नहीं रहता कि वे बच्चे प्लान कर सकें. करियर बनाने और भविष्य को सुरक्षित करने के चक्कर में दोनों ही पार्टनर अपने रिश्ते से ज़्यादा काम को अहमियत देते हैं. बच्चे की ज़िम्मेदारी लेने के लिए उनके पास समय ही नहीं होता. लेकिन उम्र के एक पड़ाव पर उन्हें जब बच्चे की कमी का एहसास होता है, तब अपनी झुंझलाहट वो एक-दूसरे पर ही निकालते हैं और एक-दूसरे को दोषी ठहराते हैं, जिससे रिश्तों में खटास आने लगती है.
स्मार्ट हल
* दोनों को ही यह बात समझनी होगी कि करियर उनके रिश्ते से बढ़कर नहीं है और हर चीज़ की एक सही उम्र होती है, अगर उसी उम्र में वह हो जाए, तो ज़्यादा बेहतर है. इसलिए बच्चा प्लान करने में देरी न करें.
* ध्यान रखें कि बच्चे जीने के मक़सद होते हैं. पति-पत्नी के रिश्ते की कड़ी होते हैं, जो उन्हें स्नेह के बंधन से जोड़े रखते हैं.
* माना कि बच्चों की परवरिश एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है, लेकिन दोनों
के सहयोग से इसे आसान बनाया जा सकता है.

5. ऑफिस रोमांस

कॉम्पटीशन के इस दौर में हर कोई आगे निकलना चाहता है. ऐसे में ज़्यादा समय तक काम करना हमारी आदत में शुमार हो जाता है. घर से ज़्यादा वक़्त हम ऑफिस में गुज़ारते हैं, जिसकी वजह से कलीग्स में एक भावनात्मक लगाव हो जाता है. ऐसी कई बातें होती हैं, जो हम अपने पार्टनर से न शेयर करके अपने कलीग्स से शेयर करने लगते हैं. कभी-कभी यह लगाव अफेयर का रूप ले लेता है, जिसका असर उनकी शादीशुदा ज़िंदगी पर भी पड़ता है. यह स़िर्फ पुरुषों तक ही सीमित नहीं है, महिलाएं भी इसमें उतनी ही भागीदार हैं, इसलिए दोनों को ही अपने रिश्तों पर ग़ौर करने की ज़रूरत है.
स्मार्ट हल
* अगर आपको ऐसा एहसास हो रहा है कि आप अपने कलीग्स के साथ कुछ ज़्यादा ही इन्वॉल्व हो रहे हैं, तो वहीं पर अपने क़दम पीछे खींच लें.
* अपने पार्टनर के साथ ज़्यादा से ज़्यादा क्वालिटी समय बिताने की कोशिश करें.
* अपने पार्टनर से बेवफ़ाई की भावना आपको आत्मग्लानि से भर देगी और आपकी ख़ुशहाल ज़िंदगी ख़ुशहाल नहीं रह जाएगी, इसलिए अपने रिश्ते में ईमानदारी बनाए रखें.
* रिश्तों की अहमियत को समझने की कोशिश करें और साथ ही अपने पार्टनर को भी समझने की कोशिश करें.
जानें स्वस्थ रिश्तों के लक्षण
1. दो व्यक्तियों के बीच की आपसी समझ ही स्वस्थ रिश्ते का सबसे बड़ा लक्षण है. पति-पत्नी बिना बोले एक-दूसरे की भावनाओं को समझ जाते हैं, तो स्वस्थ रिश्ते का इससे बड़ा उदाहरण नहीं है.
2. पति-पत्नी दोनों ही ख़ुश व तनावमुक्त होते हैं.
3. दोनों ही अपनी ज़िम्मेदारियां दूसरे पर नहीं थोपते, बल्कि उन्हें बांटने का पूरा प्रयास करते हैं.
4. दोनों में मन-मुटाव कम ही होते हैं, क्योंकि दोनों हर समस्या का समाधान मिलकर निकालते हैं. हर अहम् ़फैसलों में दोनों की सहमति होती है.
5. दोनों न स़िर्फ एक-दूसरे के काम में हाथ बंटाते हैं, बल्कि उनके काम का सम्मान भी करते हैं और उनके तनाव को समझते हैं.
6. ऐसे कपल्स एक-दूसरे पर निर्भर नहीं होते, बल्कि हर क़दम पर एक-दूसरे का साथ निभाते हैं.
7. स्वस्थ रिश्तों में पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ भरपूर क्वालिटी समय बिताते हैं. एक-दूसरे को ख़ुश रखने की हर संभव कोशिश करते हैं.
8. दोनों ही एक-दूसरे पर इतना विश्‍वास करते हैं कि दूसरों के बहकावे में कभी नहीं आते.

– अनीता सिंह

मुफ़्त के सलाहकारों से रहें सावधान (Stay Away From Free And Unwanted Advises)

कैसे सुलझाएं इन लाइफस्टाइल संबंधी सेक्स प्रॉब्लम्स को? (How To Deal With Lifestyle Related Sex Problems?)

Lifestyle Related Sex Problems

कई बार ऐसा होता है कि एक पार्टनर की सेक्स की इच्छा होती है, जबकि दूसरे की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं होती (Lifestyle Related Sex Problems). ऐसे में कपल्स कई बार हफ़्तों, महीनों तक सेेक्स लाइफ एंजॉय नहीं कर पाते और अधिकतर मामलों में ग़लतफ़हमियों के कारण भी ऐसा होता है. इसी पहलू को जानने की कोशिश करते हैं.

Lifestyle Related Sex Problems

बढ़ते तनाव से इच्छा में कमी
कुछ लोगों का मानना है कि अधिक स्ट्रेस की स्थिति से सेक्सुअल डिज़ायर में कमी आती है, लेकिन यह बात पूरी सच नहीं है. काम का बोझ, बॉस की झिड़की, प्रेज़ेंटेशन का प्रेशर और काम के बढ़ते घंटे तनाव को काफ़ी बढ़ा देते हैं और तनाव को सेक्सुअल डिज़ायर में कमी का कारण मान लिया जाता है. इससे पार्टनर के बीच ग़लतफ़हमी की दीवार खड़ी हो जाती है. उन्हें लगता है कि उनका पार्टनर अब पहले की तरह उनसे प्यार नहीं करता और न ही पार्टनर की उनमें कोई दिलचस्पी है. बस, इसी बात पर झगड़े शुरू हो जाते हैं और इन सबका परिणाम ये होता है कि पुरुष अपनी सेक्सुअल पावर पर ही शक करने लगते हैं, जिससे बात और बिगड़ जाती है.

समाधान- वैवाहिक जीवन में सेक्सुअल डिज़ायर में कमी के पड़ाव आते-जाते रहते हैं, अतः इसके लिए तनाव को पूरी तरह दोषी नहीं माना जा सकता. तनाव के अलावा बिज़ी लाइफस्टाइल और खानपान की ग़लत आदतें भी सेक्स लाइफ पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं. इसके अलावा कम्यूनिकेशन गैप भी दिलों के बीच दूरियां बढ़ा देता है. इसलिए पार्टनर के साथ कम से कम उन बातों को ज़रूर शेयर करें, जो आपको परेशान कर रही हैं. इससे तनाव कम होगा और आप रिलैक्स महसूस करेंगे. फिर भी यदि लगे कि स्ट्रेस सेक्सुअल लाइफ पर हावी हो रहा है, तो काउंसलर या सेक्स थेरेपिस्ट की सलाह लें.

हार्मोंस का असंतुलन
लोगों का यह सोचना कि महिलाओं के मूड और सेक्स की इच्छा के लिए हार्मोंस असंतुलन ही ज़िम्मेदार हैं, पूरी तरह सच नहीं है.

समाधान- आपसी झगड़े, मन-मुटाव, कम्यूनिकेशन गैप आदि भी इसके कारण हो सकते हैं. सेक्सुअल डिज़ायर की कमी की मुख्य वजह नींद पूरी न होना भी हो सकती है. हर व्यक्ति को कम से कम 6 से 7 घंटे सोना चाहिए. इसके अलावा हमारा मानसिक स्वास्थ्य, ग़लत खानपान और थकान भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं. महिलाओं में सेक्स की इच्छा इस बात पर निर्भर करती है कि उनके अपने पार्टनर के साथ संबंध कैसे हैं? जो महिलाएं हीनभावना या नकारात्मक सोच की शिकार होती हैं, उनमें सेक्स की इच्छा कम होती है. अतः यह पुरुष पार्टनर की ज़िम्मेदारी बनती है कि उनकी नकारात्मक सोच को बदलें, उनका आत्मविश्‍वास बढ़ाएं, इसके लिए उन्हें खुलकर बातचीत करनी चाहिए, ताकि वैवाहिक संबंध मधुर बने रहें.

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हमेशा दवाइयों का इस्तेमाल
लोगों का मानना है कि दवाइयों के प्रयोग से सेक्सुअल डिज़ायर की कमी को दूर किया जा सकता है, लेकिन दवाइयों को हमेशा अंतिम विकल्प के रूप में रखा जाना चाहिए, क्योंकि कई बार इनका उल्टा असर भी होता है.

समाधान- सबसे पहले समस्या की जड़ तक जाएं और उसे दूर करने की कोशिश करें. कई बार समझाने से ही समस्या हल हो जाती है. आज की वर्किंग वुमन को पर्सनल और प्रोफेशनल लेवल पर ख़ुद को साबित करना पड़ता है. ऑफिस में बॉस और काम का टेंशन, घर में बच्चों को संभालना व गृहस्थी की ज़िम्मेदारी, इन सबको बैलेंस करते-करते वो इतनी थक जाती है कि सेक्स की इच्छा कहीं दबकर रह जाती है. ऐसे में पार्टनर यदि थोड़ी-बहुत ज़िम्मेदारी उठाए और ढेर सारा प्यार दे, तो समस्या आसानी से सुलझ सकती है. हां, इसके लिए धैर्य रखना ज़रूरी है.

इमोशनल इंटीमेसी
इमोशनल इंटीमेसी शेयर करनेवाले कपल्स ख़ुद को सेफ महसूस करते हैं, पर यह इमोशनल इंटीमेसी कई बार इतनी बढ़ जाती है कि न तो उन्हें सेक्स की ज़रूरत महसूस होती है और न ही सेक्स की इच्छा होती है. सेक्सुअल डिज़ायर की कमी के कारण वे सेक्स लाइफ को ठीक से एंजॉय नहीं कर पाते. उनके लिए सेक्स बस एक रूटीन बनकर रह जाता है.

समाधान- ऐसा न हो इसके लिए पार्टनर के साथ सेक्सी व रोमांटिक बातें करें, बेडरूम का माहौल रूमानी बनाएं, लाइट म्यूज़िक, कैंडल्स की हल्की रोशनी और सेक्सी ड्रेस पहनकर पार्टनर को इंप्रेस करें. सेक्सुअल लाइफ को रिचार्ज करने के लिए कुछ दिनों के लिए घर से दूर किसी रोमांटिक जगह पर कुछ पल साथ बिताएं.

एक की इच्छा, दूसरे की नहीं
कभी-कभी ऐसा होता है कि एक पार्टनर की सेक्स की इच्छा होती है और दूसरा नहीं चाहता. इसे सेक्सुअल डिज़ायर की कमी मान लिया जाता है. धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति गंभीर बन जाती है.

समाधान- यह बिल्कुल सामान्य समस्या है. अक्सर कई पुरुष अन्य तरी़के, जैसे- गिफ्ट देकर या मीठी-मीठी बातें करके पार्टनर का दिल बहलाने की कोशिश करते हैं, लेकिन ऐसा करते समय वे यह बात भूल जाते हैं कि महिलाएं गिफ्ट से ज़्यादा प्यार करने, बांहों में लेने और किस करने से ख़ुश होती हैं. वे पार्टनर का स्पर्श चाहती हैं, क्योंकि यही स्पर्श उन्हें प्यार का एहसास कराता है. अतः इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि अन्य किसी भी तरी़के से जताया गया प्यार फिज़िकल क्लोजनेस का पर्याय नहीं हो सकता. यदि सेक्स की इच्छा में कमी या सेक्स संबंधी कोई समस्या हो, तो उसे छुपाने की बजाय पार्टनर से इस बारे में खुलकर बात करें. इससे आप दोनों के बीच ग़लतफ़हमी नहीं होगी और आपके संबंध मधुर बने रहेंगे. यदि समस्या गहरी हो, तो डॉक्टर की सलाह लें.

प्यार में कमी
ऐसा माना जाता है कि एक पार्टनर की सेक्सुअल डिज़ायर में कमी से दूसरे पार्टनर का उसके प्रति प्यार कम होता जाता है.

समाधान- यह केवल वहम है. ऐसा कुछ भी नहीं होता. समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले तो यह पता लगाएं कि सेक्स की इच्छा में कमी का क्या कारण है? महिलाएं शादी के कुछ सालों बाद या बच्चे के जन्म के बाद अक्सर मोटी हो जाती हैं, जिससे उनका आत्मविश्‍वास कम हो जाता है. उन्हें लगता है कि अब उनकी बॉडी सेक्सी नहीं रही. उनका बेडौल शरीर देखकर पार्टनर क्या सोचेगा? यही नकारात्मक सोच उनकी सेक्स में दिलचस्पी कम कर देता है. कई बार मोटापे के कारण पुरुषों को भी संबंध बनाने में परेशानी होती है. डायट और नियमित एक्सरसाइज़ से मोटापे को कंट्रोल किया जा सकता है. नकारात्मक विचारों को दूर करने के लिए साइकोसेक्सुअल थेरेपिस्ट या काउंसलर की सलाह ली जा सकती है.

नशे का सहारा लेना
सेक्सुअल डिज़ायर को बढ़ाने के लिए लोग अल्कोहल, सिगरेट आदि का सेवन करते हैं. ऐसे लोगों की मान्यता है कि इससे सेक्स पावर बढ़ता है.

समाधान- यह बिल्कुल ग़लत है. वैसे भी पुरुष सेक्स को बहुत महत्व देते हैं. यदि उनकी सेक्सुअल डिज़ायर में कमी आती है, तो वे परेशान हो जाते हैं और मूड बनाने के लिए कई बार नशे का सहारा लेते हैं, जिससे शरीर में कई बदलाव आते हैं और इसका असर सेक्स लाइफ पर भी पड़ता है. सिगरेट में कई प्रकार के विषैले पदार्थ होते हैं, जो नपुंसकता पैदा करते हैं. इसी तरह अल्कोहल के सेवन से भी डिज़ायर में कमी आती है, लेकिन इन तथ्यों को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. यदि हेल्दी सेक्स लाइफ चाहते हैं, तो अल्कोहल और सिगरेट से दूर रहें.

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बाल मज़दूरी… कब तक और क्यों? (Child labor … how long and why?)

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अक्सर देखा है उन मासूम आंखों में सपनों को मरते हुए… रोज़ाना, हर दिन, हर पल… एक ख़्वाब को धीरे-धीरे दम तोड़ते हुए… अपने आस-पास ही रोज़ उन डूबते सपनों की सिसकियां हम सुनते हैं… कभी सिगनल पर नन्हें हाथों में फूल बेचते हुए… तो कभी कोई खिलौना, कोई क़िताब बेचते हुए ये बच्चे रोज़ अपनी रोटी का जुगाड़ करते नज़र आते हैं और हम इन्हें हिकारत की नज़र से देखकर मुंह मोड़ लेते हैं… इनका कुसूर स़िर्फ इतना है कि ये मजबूर हैं, क्योंकि ये बाल मज़दूर हैं.

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जी हां, बाल मज़दूर का अर्थ यूं तो हर देश, हर समाज, हर क़ानून अपनी तरह से लगाता है, लेकिन हमारी नज़र में हर वो बच्चा, जो अपना बचपन खोकर स़िर्फ रोटी के जुगाड़ में लगा रहता है, जो स्कूल नहीं जा सकता, जो सपने नहीं देख सकता और जो अपने हक़ के लिए लड़ नहीं सकता, बाल मज़दूर है. दुख की बात है कि भारत में बाल मज़दूरी विश्‍व में सबसे अधिक है.

क्यों होती है बाल मज़दूरी?

– ग़रीबी, अशिक्षा और पारिवारिक व सामाजिक असुरक्षा इसका सबसे बड़ा कारण है.

– शहरों में जिस तरह से घरेलू नौकर के रूप में बच्चों से काम करवाने का चलन बढ़ा है, वो चलन अब बेलगाम हो चुका है.

– कहने को तो चाइल्ड लेबर एक्ट है, लेकिन हम अपने आसपास ही देखते हैं कि छोटे-छोटे होटलों, ढाबों या गैराज में बच्चों से कितना काम करवाया जाता है, क्योंकि क़ानून में इस तरह के प्रावधान हैं कि इन जगहों पर बच्चों से आसानी से काम करवाते हुए भी क़ानून के शिकंजे से दूर रहा जा सकता है.

– यही नहीं, कई ऐसे काम हैं, जो बच्चों के लिए ख़तरनाक हैं और जहां बच्चों के काम करने पर पूरी तरह से पाबंदी है, लेकिन वहां भी ग़ैरक़ानूनी तरी़के से बच्चों से काम करवाया जाता है.

– इन जगहों पर अमानवीय हालातों में इन बच्चों से 14-16 घंटों तक लगातार काम करवाया जाता है. इसके अलावा घरों में भी जो बच्चे काम करते हैं उन पर भी कई तरह ज़्यादती होती हैं, जैसे- खाना न मिलना, पैसे न मिलना, हिंसक व्यवहार, यौन शोषण आदि. लेकिन फिर भी यह सिलसिला थम नहीं रहा.

– दरअसल, यह एक आर्थिक व सामाजिक समस्या है, जिसका निवारण स़िर्फ क़ानून नहीं कर सकता.

– 14 साल से कम उम्र के बच्चों से काम करवाना क़ानूनन अपराध है, लेकिन फिर भी हम बहुत ही कम उम्र के बच्चों को अपने आसपास काम करते देखते हैं.

– बच्चों के रूप में सस्ते लेबर मिल जाते हैं.

– बच्चों का शोषण आसान होता है.

– उन्हें डराया-धमकाया जा सकता है.

– वो विरोध नहीं कर पाते. इन्हीं सब वजहों से बाल मज़दूरी ख़त्म नहीं हो रही.

– ग़रीब व अशिक्षित लोग ख़ुद मजबूर होते हैं. वो बच्चों को स्कूल भेजना अफॉर्ड नहीं कर सकते, उनके लिए जो बच्चा दिनभर कुछ काम करके थोड़े-से पैसे घर ले आए, वही काम का है.

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एक्ट का इफेक्ट?

क्या कहता है क़ानून? क्या हैं प्रावधान और कहां कमियां रह गई हैं… इन तमाम बातों की जानकारी दे रहे हैं बॉम्बे हाइकोर्ट के सीनियर लॉयर एडवोकेट योगेश धनेश भारद्वाज.

– चाइल्ड लेबर एक्ट (प्रॉहिबिशन एंड रेग्युलेशन) 1986 के तहत 14 वर्ष तक की उम्र के बच्चे ख़तरनाक माने जानेवाले कामों व जगहों में काम नहीं कर सकते. ये ख़तरनाक काम कौन-कौन से हैं, इसकी लिस्ट में समय-समय पर संशोधन व विस्तार वर्ष 2006 व वर्ष 2008 में हुआ है.

– इससे पहले द फैक्टरीज़ एक्ट 1948 में 14 साल से कम आयु के बच्चों को किसी भी फैक्ट्री में काम करने से मनाही है. इस क़ानून में ये भी नियम बनाए गए हैं कि कौन, किस तरह से और कितने समय के लिए प्री एडल्ट्स (15-18 वर्ष की आयुवाले) को फैक्ट्री में काम करवा सकता है.

– द माइन्स एक्ट 1952 भी महत्वपूर्ण है. यह क़ानून 18 वर्ष की कम आयु के बच्चों को खदानों में काम करने से प्रतिबंधित करता है.

– द जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन) ऑफ चिल्ड्रन एक्ट 2000 के तहत बच्चों का ख़तरनाक कामों में संलिप्त होना अपराध माना जाएगा. इसमें उन लोगों के लिए सज़ा का भी प्रावधान है, जो बच्चों को इन कामों के लिए मजबूर करते हैं या बच्चों से बंधुआ मज़दूरी करवाते हैं.

– द राइट ऑफ चिल्ड्रन टु फ्री एंड कंपल्सरी एजुकेशन एक्ट 2009 में 6 से 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों को शिक्षा के अधिकार का आदेश दिया है. इसके अलावा इसमें यह भी आदेश है कि सभी प्राइवेट स्कूलों में 25% सीटें ग़रीब तबके व शारीरिक रूप से असक्षम बच्चों के लिए रखी जाएंगी.

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कितना कमज़ोर है क़ानून?
क़ानून भले ही बन जाते हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण होता है उन्हें लागू करवाना. विभिन्न विभागों में आपसी समन्वय की कमी से क़ानून लागू नहीं हो पाते. दूसरी तरफ़ बच्चों के पैरेंट्स ही ख़ुद नहीं चाहते कि उनके बच्चे का काम छूटे, क्योंकि उनकी रोज़ी-रोटी का ज़रिया कम हो जाएगा. चूंकि क़ानून में प्रावधान है कि बच्चे परिवार के काम (खेती या अन्य व्यवसाय आदि) में हाथ बंटा सकते हैं, तो इसका फ़ायदा आराम से उठाया जाता है, जिसके चलते बाल मज़दूरी ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही.
इसके अलावा बाल मज़दूरी से रिहा हुए बच्चों के पुनर्वसन को लेकर भी अब तक काफ़ी उदासीनता बनी रही, जिस वजह से समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा.
हालांकि अब सरकार मन बना रही है कि 14 वर्ष की आयु तक के बच्चों पर पूरी तरह से काम करने पर रोक लगा दी जाए, तो इस संदर्भ में एडवोकेट योगेश कहते हैं कि जहां तक क़ानून में संशोधन की बात है, तो इसमें कोई बुराई नहीं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इस बदलाव या संशोधन से वाकई कोई बदलाव आएगा? यहां भी फैमिली बिज़नेस या एंटरटेनमेंट से जुड़े कामों को करने की छूट तो मिल ही रही है, जिस वजह से बच्चों को बचाने और पढ़ाने की मुहिम प्रभावित ज़रूरी होगी.
मेरा स़िर्फ यही मानना है कि जहां तक बच्चों की सुरक्षा और अधिकारों की बात हो, वहां कोई समझौता या शर्त नहीं होनी चाहिए.
हर बच्चे को शिक्षा का और अपने पैरेंट्स के साथ रहने का पूरा अधिकार है और हमें हर शर्त पर उनके इन अधिकारों की रक्षा करनी ही चाहिए.
बावजूद इसके नए संशोधित क़ानून में कई सकारात्मक बातें भी हैं, जैसे अब तक तो 1986 के क़ानून के तहत ख़तरनाक जगहों पर काम करने पर स़िर्फ 14 साल से कम आयु के बच्चों पर ही रोक थी, लेकिन अब 15-18 साल की उम्र के बच्चों को भी इस श्रेणी में लाया गया है. यह बहुत ही अच्छा संकेत है. इसके अलावा और भी अच्छा प्रस्ताव है कि अब राज्य सरकार बाल मज़दूरी से बचाए गए बच्चों के पुनर्वसन के लिए अतिरिक्त निधि (चाइल्ड एंड एडॉलसेंट लेबर रिहैबिलिटेशन फंड) भी प्रदान करेगी.

बाल मज़दूरी का प्रभाव

जो बच्चे इसे झेलते हैं, उन पर इसका शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक प्रभाव पड़ता ही है.

– इन बच्चों को सामान्य बचपन नहीं मिलता.

– कुपोषण का शिकार होते हैं.

– अमानवीय व गंदे माहौल, जैसे- पटाखा बनाने के कारखानों, कोयला खदानें आदि में काम करने पर इनका स्वास्थ्य ख़राब होता है.

– कमज़ोरी के कारण ये जल्दी बीमार पड़ते हैं.

– ज़री के काम, डायमंड इंडस्ट्री, सिल्क इंडस्ट्री व कार्पेट बनाने के कामों में भी अधिकतर बच्चे ही जुटे रहते हैं, जहां इनसे लगातार कई घंटों तक काम करवाया जाता है, जिससे इनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है.

– घरेलू काम करनेवाले बच्चों की हालत भी कोई बहुत अच्छी नहीं होती. उनकी उम्र व क्षमता से अधिक उनसे काम करवाया जाता है.

– मानसिक रूप से भी यह सामान्य बच्चों की तरह नहीं रह पाते. अशिक्षा की वजह से इनका पूरा भविष्य ही अंधकारमय हो जाता है.

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एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में काम कर रहे बच्चे क्या बाल मज़दूर माने जाएंगे?

इस विषय पर काफ़ी बहस पहले ही की जा चुकी है. कुछ लोगों का यह मानना है कि उन पर रोक लगाने से आप उनके टैलेंट को भी दबा देंगे, क्योंकि जिन बच्चों में हुनर है, उसे बचपन से ही बढ़ावा न दिया गया, तो यह भी उनके साथ अन्याय ही होगा.
क़ानून में संशोधन के प्रयास पिछले काफ़ी समय से किए जा रहे हैं, लेकिन ये बिल पेंडिंग ही रहा, लेकिन अब इसे लागू करने का प्रयास फिर से हो रहा है. इसमें एंटरटेनमेंट से जुड़े क्षेत्र के बच्चों की वर्किंग कंडिशन और टाइम को भी नियंत्रित व बेहतर बनाने पर ज़ोर दिया गया है, जिससे बच्चों पर बोझ भी न पड़े और उनका टैलेंट भी प्रभावित न हो.

– गीता शर्मा

हेयर फॉल के ईज़ी सोल्यूशन्स

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मेथी
– एक कप मेथी के बीज को रातभर पानी में भिगोकर रखें. सुबह पीसकर पेस्ट बना लें. बालों में लगाकर शावर कैप से कवर कर लें. 40 मिनट बाद बाल धो लें. यह उपाय रोज़ाना 1 महीने तक करें.

रिसर्च: मेथी में एंटीसीडेंट्स नाम का हार्मोन होता है, जो हेयर फॉलिकल्स के निर्माण में मदद करता है और बालों को स्ट्रॉन्ग बनाता है. मेथी में प्रोटीन और निकोटिनिक एसिड भी होता है, जो हेयर ग्रोथ की प्रक्रिया को तेज़ करते हैं.

प्याज़

– 1 प्याज़ का रस निकालकर स्काल्प में लगाएं. आधे घंटे बाद शैंपू कर लें.

– 3 टेबलस्पून प्याज़ के रस में 2 टेबलस्पून एलोवीरा जेल और 1 टेबलस्पून ऑलिव ऑयल मिलाएं. इसे स्काल्प में लगाकर आधे घंटे बाद शैंपू कर लें.

रिसर्च: प्याज़ के रस में सल्फर होता है, जो बालों का झड़ना कम करता है, क्योंकि यह हेयर फॉलिकल्स में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाता है, हेयर फॉलिकल्स का पुनर्निमाण भी करता है और इंफ्लेमेशन को भी कम करता है. प्याज़ के रस में मौजूद एंटीबैक्टीरियल प्रॉपर्टीज़ के चलते यह जर्म्स और जीवाणुओं को ख़त्म करके स्काल्प को इंफेक्शन से बचाता है.

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एलोवीरा

– एलोवीरा जूस या पल्प को स्काल्प पर कुछ घंटों तक लगाकर रखें. गुनगुने पानी से बाल धो लें. यह हफ़्ते में 3-4 बार करें.

– रोज़ाना सुबह खाली पेट 1 टेबलस्पून एलोवीरा जूस पीने से भी बाल हेल्दी रहते हैं.

रिसर्च: एलोवीरा में जो एंज़ाइम्स होती हैं, वो हेल्दी हेयर ग्रोथ के लिए बहुत फ़ायदेमंद है. साथ ही यह स्काल्प का पीएच बैलेंस भी बनाए रखता है, जिससे बालों का झड़ना कम होता है.

ऑयल मसाज

– कोकोनट, आंवला, ऑलिव, आल्मंड या कैस्टर ऑयल- चाहे जो भी ऑयल आप यूज़ करें, उसमें कुछ बूंदें रोज़मेरी एसेंशियल ऑयल की भी मिक्स कर लें. इससे जल्दी फ़ायदा होगा. हफ़्ते में एक बार इनमें से किसी भी ऑयल से स्काल्प मसाज करें.

रिसर्च: बालों को मसाज करने से स्काल्प में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है और बाल भी कंडीशन होते हैं, जिससे बालों का झड़ना और टूटना कम होता है.

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बीटरूट

– बीटरूट के पत्तों को उबालकर पीस लें और मेहंदी के साथ मिक्स करके पेस्ट बना लें. 15-20 मिनट तक बालों में लगाकर रखें, फिर धो लें. यह उपाय हफ़्ते में 3-4 बार करें.

– बीटरूट जूस को अपने डायट में शामिल करें. बीटरूट के अलावा आप गाजर व पालक का जूस भी अपने डायट में शामिल करें.

रिसर्च: बीटरूट जूस में कार्बोहाइड्रेट्स, प्रोटीन, फॉसफोरस, कैल्शियम और विटामिन बी व सी होता है, जो बालों की हेल्दी ग्रोथ के लिए ज़रूरी है.

फ्लैक्ससीड्स

– हेयर लॉस से निपटने के लिए रोज़ सुबह 1 टेबलस्पून फ्लैक्ससीड पाउडर को पानी के साथ लें. आप चाहें, तो फ्लैक्ससीड को सलाद, दही या किसी भी चीज़ में मिलाकर ले सकते हैं.

– फ्लैक्ससीड ऑयल से बालों में मसाज करने से भी बालों का झड़ना कम होता है.

रिसर्च: फ्लैक्ससीड्स ओमेगा-3 फैटी एससिड से भरपूर होती हैं. ओमेगा-3 फैटी एसिड्स हेयर फॉल को रोककर हेयर ग्रोथ में मददगार होते हैं.

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कोकोनट मिल्क

– कोकोनट मिल्क से स्काल्प मसाज करके 20 मिनट बाद बाल धो लें.

– चाहें, तो इसमें कालीमिर्च पाउडर और मेथी पाउडर भी मिला सकते हैं.

रिसर्च: कोकोनट मिल्क प्रोटीन और एसेंशियल फैट्स से भरपूर होता है, जो बालों का झड़ना कम करके बालों को मज़बूत बनाता है.

 

लें सेक्सुअल लाइफ का हेल्थ टेस्ट (Health test for sexual life)

Health test for sexual life

जिस तरह हेल्दी बने रहने के लिए हम समय-समय पर ज़रूरी हेल्थ चेकअप्स (Health test for sexual life) कराते हैं, ठीक उसी तरह अपनी सेक्सुअल लाइफ को भी हेल्दी बनाए रखने के लिए हमें कुछ हेल्थ टेस्ट्स कराने चाहिए. इन टेस्ट्स के बारे में अधिक जानकारी के लिए हमने बात की सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. राजन भोसले (एमडी, ऑनरेबल प्रोफेसर एंड एचओडी, डिपार्टमेंट ऑफ सेक्सुअल मेडिसिन, केईएम हॉस्पिटल, मुंबई) से.

Health test for sexual life

सेक्सुअल हेल्थ चेकअप्स

हेल्दी सेक्स लाइफ के लिए आपका सेक्सुअली हेल्दी रहना बहुत ज़रूरी है. अगर आप सेक्सुअली एक्टिव नहीं हैं या किसी रिलेशनशिप में भी नहीं हैं, फिर भी ये हेल्थ चेकअप्स आपके लिए उतने ही ज़रूरी हैं.

कब कराएं चेकअप?

अगर आप सेक्सुअली एक्टिव हैं, तो आपको नियमित समय पर सेक्सुअल हेल्थ चेकअप्स कराते रहना चाहिए. अपनी लाइफस्टाइल और सेक्सुअल एक्टिविटी के आधार पर तय करें कि आपको कितने अंतराल पर टेस्ट कराने चाहिए. अगर इसमें से कोई भी स्थिति हो, तो सेक्सुअल हेल्थ टेस्ट कराएं-

– अगर आपको आशंका है कि आपको सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन (एसटीआई) हो सकता है.

– अगर आपने अनसेफ सेक्स किया हो और अच्छा फील न कर रहे हों.

– सेक्स के दौरान कंडोम फट या फिसल गया हो.

– आपके एक से अधिक पार्टनर से संबंध हैं.

– आपके पार्टनर के एक से अधिक पार्टनर हैं.

– आपको शक है कि बिना स्टरलाइज़ किया हुआ इंजेक्शन आपको लगाया गया है.

सेक्सुअल हेल्थ टेस्ट्स दो तरह के होते हैं-

1. लैंगिग क्षमता या क़ाबिलीयत को जाननेवाले टेस्ट

2. यौन संक्रमण या यौन रोगों की जांच के लिए टेस्ट

डॉ. राजन भोसले के अनुसार, अगर आपको कोई सेक्सुअल प्रॉब्लम है, गुप्तांगों में दर्द है या फिर आपको लगता है कि शायद आप सेक्सुअली फिट नहीं हैं, तो ये टेस्ट्स ज़रूर कराएं.

लैंगिग क्षमता परखनेवाले टेस्ट्स- महिलाओं-पुरुषों दोनों के लिए

सीरम टेस्टोस्टेरॉन लेवल: टेस्टोस्टेरॉन लेवल टेस्ट के ज़रिए ब्लड में मौजूद टेस्टोस्टेरॉन लेवल के बारे में जानकारी मिलती है. टेस्टोस्टेरॉन सेक्स हार्मोन है, जो महिलाओं और पुरुषों दोनों में होता है.

एसएचबीजी: सेक्स हार्मोन बाइंडिंग ग्लोबुलिन के ज़रिए जहां पुरुषों में टेस्टोस्टेरॉन की कमी की जांच की जाती है, वहीं महिलाओं में इसकी अधिकता के बारे में पता लगाया जाता है. इसकी कमी और अधिकता दोनों ही आपकी सेक्सुअल लाइफ के लिए हेल्दी नहीं.
सीरम प्रोलैक्टिन: यह एक तरह का ब्लड टेस्ट है, जिससे ब्लड में प्रोलैक्टिन के लेवल की जांच की जाती है. महिलाओं और पुरुषों दोनों के रिप्रोडक्टिव हेल्थ में यह अहम् भूमिका निभाता है. इसलिए बेवजह के सिरदर्द और सेक्सुअल ड्राइव में कमी की शिकायत पर डॉक्टर आपको इसकी सलाह दे सकते हैं.

एफएसएच टेस्ट: फॉलिकल स्टिमुलेटिंग हार्मोन टेस्ट महिलाओं और पुरुषों के रिप्रोडक्टिव सिस्टम में अहम् भूमिका निभाता है. महिलाओं में अनियमित पीरियड्स और इंफर्टिलिटी प्रॉब्लम्स और पुरुषों में लो स्पर्म काउंट और टेस्टिकुलर डिस्फंक्शन के लिए यह टेस्ट कराया जाता है.

एलएच टेस्ट: ल्युटिनाइंज़िंग हार्मोन टेस्ट ब्लड या यूरिन के ज़रिए किया जाता है. महिलाओं व पुरुषों के रिप्रोडक्टिव सिस्टम की जांच और ओवरी से निकलनेवाले एग्स का विश्‍लेषण किया जाता है. अगर कोई महिला कंसीव नहीं कर पाती है, तो पति-पत्नी दोनों को यह टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है.

टी3, टी4, टीएसएच: थायरॉइड की जांच के लिए ये टेस्ट्स कराए जाते हैं. थायरॉइड रिप्रोडक्टिव सिस्टम को बाधित करता है, जिससे महिलाएं कंसीव नहीं कर पातीं. बहुत से मामलों में महिलाओं को थायरॉइड होता है, पर उन्हें इसकी जानकारी नहीं होती, जिसके कारण वो कंसीव नहीं कर पातीं. ऐसे में थायरॉइड लेवल की जानकारी किसी के लिए भी बहुत ज़रूरी हो जाती है.

ब्लड शुगर: ब्लड शुगर जहां आपकी कामोत्तेजना में कमी लाता है, वहीं सेक्स के प्रति रुचि कम होने लगती है. ब्लड शुगर पुरुषों व महिलाओं दोनों में सेक्सुअल डिस्फंक्शन का कारण बनता है. ऐसे में अगर आपको लगता है कि आपकी कामोत्तेजना में कमी आ गई है, तो डॉक्टर की सलाह पर अपना ब्लड शुगर ज़रूर चेक करें.

लिपिड प्रोफाइल: कोलेस्ट्रॉल लेवल महिलाओं और पुरुषों में सेक्सुअल फंक्शन्स को प्रभावित करता है. कोलेस्ट्रॉल जितना आपके हार्ट के लिए नुक़सानदायक है, उतना ही आपकी सेक्सुअल लाइफ के लिए भी. ऐसे में अपनी सेक्सुअल लाइफ को हेल्दी बनाए रखने के लिए नियमित समय पर लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराना ज़रूरी हो जाता है.

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पुरुषों के लिए

पेनाइल डॉपलर स्टडी: गुप्तांग में रक्तसंचार के बारे में जानने के लिए यह टेस्ट किया जाता है. इस टेस्ट की मदद से पुरुषों में सबसे आम समस्या इरेक्टाइल डिस्फंक्शन के बारे में पता चलता है.

टेस्टिकल्स चेकअप: समय-समय पर पुरुषों को अपने टेस्टिकल्स की जांच कराते रहना चाहिए. इससे किसी भी तरह की असामान्य गांठ या सूजन होने पर आपको तुरंत पता चल जाएगा. यह इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि यह टेस्टिकल कैंसर का कारण भी हो सकता है. अगर आपको कुछ भी असामान्य लगे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

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महिलाओं के लिए

एस्ट्रोजेन व प्रोजेस्टेरॉन: ये दोनों ही हार्मोंस महिलाओं के लिए बहुत ज़रूरी होते हैं. महिलाओं की कार्यक्षमता को बेहतर बनाए रखने के साथ-साथ उनकी सेक्सुअल लाइफ को हेल्दी बनाने में ये अहम् भूमिका निभाते हैं.

यूटरस और ओवरीज़ की सोनोग्राफी: सोेनोग्राफी के ज़रिए यूटरस और ओवरीज़ की सही तरी़के से जांच हो पाती है, जिससे उनमें होनेवाली किसी भी तरह की समस्या की जांच की जा सकती है. महिलाओें की सेक्सुअल हेल्थ के लिए सोनोग्राफी के ज़रिए इनकी नियमित रूप से जांच ज़रूरी है.

गुप्तांगों की जांच: अगर आपको लगता है कि आपकी सेक्सुअल लाइफ में समस्या आ रही है, तो किसी अच्छे गायनाकोलॉजिस्ट से मिलकर फिज़िकल एक्ज़ामिनेशन करा लें.

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यौन संक्रमण या यौन रोगों की जांच के लिए टेस्ट

एसटीआई स्क्रीनिंग: यह एक ब्लड टेस्ट है, जिसके ज़रिए सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन्स की जांच होती है. अगर आपमें भी निम्नलिखित लक्षण नज़र आते हैं, तो एसटीआई स्क्रीनिंग ज़रूर कराएं. अगर आपके गुप्तांग से डिस्चार्ज हो रहा हो, पेशाब करते समय दर्द हो, गुप्तांग में फुंसी या छाले हों, खुजली हो, सेक्स के दौरान दर्द हो, तो ये टेस्ट ज़रूर कराएं.

एचआईवी1 और एचआईवी2: जैसा कि सभी को पता है कि एड्स के लक्षण दिखाई नहीं देते और सालों बाद जब वे हमारी रोगप्रतिरोधक क्षमता को कमज़ोर कर देते हैं, तब इनके बारे में पता चलता है. ऐसे में इनके प्रति सतर्कता ही आपको इनसे बचा सकती है. एचआईवी टेस्ट्स कराना आपके लिए ही फ़ायदेमंद होगा.

हर्पिस: यह एक आम सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ है. आमतौर पर इसके लक्षण दिखाई ही नहीं देते, जिससे व्यक्ति को पता ही नहीं चलता कि उसे हर्पिस है. संक्रामक होने के कारण इसकी जल्द से जल्द जांच ज़रूरी हो जाती है. अगर आपके गुप्तांगों में घाव हो, तो डॉक्टर को इस बारे में बताएं, वो एचएसवी1 और एचएसवी2 टेस्ट की सलाह देंगे.

वीडीआरएल: सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन का पता लगाने के लिए यह टेस्ट किया जाता है.

पुरुषों के लिए
प्रोस्टेट स्क्रीनिंग: प्रोस्टेट कैंसर की जांच के लिए प्रोस्टेट स्क्रीनिंग बहुत ज़रूरी है. उम्र बढ़ने के साथ ही प्रोस्टेट कैंसर की संभावना भी बढ़ने लगती है, ऐसे में यह टेस्ट ज़रूरी हो जाता है. फैमिली हिस्ट्रीवाले पुरुषों को ख़ास ध्यान रखना चाहिए. अगर आपको यूरिन पास करने में तकलीफ़ हो, यूरिन या सिमेन में ब्लड आए, तो तुरंत अपने डॉक्टर से सलाह लें.

महिलाओं के लिए
सर्वाइकल स्मीयर टेस्ट: स्मीयर टेस्ट को पैप टेस्ट भी कहते हैं. सर्विक्स यानी गर्भाशय ग्रीवा कितना हेल्दी है जानने के लिए ही यह टेस्ट किया जाता है. यह टेस्ट कैंसर की जांच के लिए नहीं है, पर इसकी मदद से कैंसर को टाला जा सकता है. 25-60 साल की सभी महिलाओं को हर 3-5 साल में यह टेस्ट कराना चाहिए.

ब्रेस्ट्स की जांच: ब्रेस्ट कैंसर से बचने के लिए नियमित रूप से ब्रेस्ट्स का सेल्फ एक्ज़ामिनेशन बहुत ज़रूरी है. हाल ही में हुई स्टडीज़ में यह बात पता चली है कि ब्रेस्ट कैंसर शहरी महिलाओं में मौत का प्रमुख कारण बन गया है. ऐसे में ब्रेस्ट्स की जांच बहुत ज़रूरी हो जाती है. ब्रेस्ट्स में सूजन या गांठ का महसूस होना, ब्रेस्ट्स के आकार व रंगत में बदलाव, निप्पल्स का अंदर की तरफ़ घुसा हुआ होना ब्रेस्ट कैंसर के लक्षण हो सकते हैं. हर महीने पीरियड्स के बाद सेल्फ ब्रेस्ट एक्ज़ामिनेशन ज़रूर करें.

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सेक्सुअल हेल्थ टिप्स

– 40 की उम्र के बाद सभी महिलाओं को सालाना मैमोग्राफी करानी चाहिए.

– 40 की उम्र के बाद सभी पुरुषों को सालाना प्रोस्टेट स्क्रीनिंग नियमित रूप से करानी चाहिए.

– महिलाओं को किसी भी तरह का डिस्चार्ज होने पर तुरंत गायनाकोलॉजिस्ट से मिलना चाहिए.

– किसी भी तरह के इंफेक्शन से बचने के लिए सेक्सुअल हाइजीन का ध्यान रखें.

– सेक्सुअल हेल्थ के लिए लो फैट व हाई फाइबर डायट लें.

– डायबिटीज़ और ब्लडप्रेशर को कंट्रोल में रखने के लिए खाने में शक्कर और नमक की मात्रा कम रखें.

– सेक्सुअल फिटनेस के लिए कंप्लीट बॉडी फिटनेस बहुत ज़रूरी है, इसलिए हफ़्ते में 5 दिन 40 मिनट तक ब्रिस्क वॉक (तेज़ चलना) करें.

– अनीता सिंह

रिश्तों में ज़रूरत से ज़्यादा स्पेस कहीं कर न दे अपनों को दूर…(Too much space in relationships can be dangerous)

Space in relationships

कभी हाथों में थामे हाथ, तो कभी लबों पर बस तेरी ही बात… धीरे-धीरे ख़्वाब छूटे… लबों पर बसे जज़्बात छूटे… दिल की हसरतें बाकी तो हैं अभी, पर न जाने किस मोड़ पर कुछ एहसास छूटे… न तुमको ख़बर हुई, न हमें पता चला… कब साथ चलते-चलते हमारे हाथ छूटे…

Space in relationships

अक्सर ऐसा होता है कि हम अपने रिश्ते में समझ ही नहीं पाते कि कब और कैसे इतनी दूरियां (Space in relationships) आ गईं, जबकि पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यही लगता है कि सब कुछ तो ठीक ही था… जी हां, ऐसा इसलिए होता है कि हम सो कॉल्ड स्पेस के नाम पर कुछ ज़्यादा ही दूरियां बना लेते हैं और कब ये दूरियां रिश्तों को ख़त्म करने लगती हैं, हमें एहसास ही नहीं होता.

अति किसी भी चीज़ की सही नहीं: चाहे कोई अच्छी ही चीज़ क्यों न हो, पर ओवरडोज़ किसी भी चीज़ का सही नहीं है.

– यह ठीक है कि आपको बार-बार पार्टनर को टोकना या उसके किसी भी काम में दख़ल देना पसंद नहीं, लेकिन इसका यह भी अर्थ नहीं कि बिल्कुल ही न टोकें.

– हो सकता है आपके न टोकने का कोई ग़लत मतलब निकाल ले. इससे न स़िर्फ रिश्ते में दूरियां बढ़ेंगी, बल्कि नीरसता भी आएगी.

– पार्टनर को लगेगा कि आपको तो उनकी किसी भी बात से कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता और दूसरी तरफ़ यह भी हो सकता है कि वो ग़लत राह पर भी चले जाएं.

विश्‍वास और अंधविश्‍वास के बीच का फ़र्क़ समझें: आप एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, यह अच्छी बात है. लेकिन चेक कर लें कि कहीं यह विश्‍वास अंधविश्‍वास में तो तब्दील नहीं हो गया?

– जी हां, अक्सर ऐसा ही होता है, जब हम आंख मूंदकर भरोसा करते हैं, तो भरोसा टूट भी सकता है. और तब बहुत अधिक तकलीफ़ होती है और इस बात का मलाल भी कि क्यों नहीं थोड़ी-सी सतर्कता व सावधानी बरती.

स्पेस का मतलब लापरवाह होना नहीं: हर बात पर आजकल यह जुमला चिपका दिया जाता है कि हर रिश्ते में स्पेस ज़रूरी है, लेकिन स्पेस कितना और किस हद तक, इसका दायरा भी तो हमें ही तय करना होगा.

– स्पेस के नाम पर आप अपने रिश्ते के प्रति इतने लापरवाह न हो जाएं कि एक-दूसरे की तरफ़ ध्यान ही न दें और धीरे-धीरे रिश्ते में से रोमांस ही गायब हो जाए.

कम्यूनिकेशन न के बराबर ही तो नहीं रह गया: यह सही है कि दिनभर जासूसों की तरह पार्टनर की ख़बर या उस पर नज़र रखना ठीक नहीं, लेकिन ख़बर ही न रखना ख़तरे की निशानी है.

– ऐसे में कम्यूनिकेशन गैप इस हद तक बढ़ जाता है कि यदि आप कुछ सवाल करते भी हैं, तो पार्टनर को वो दख़लअंदाज़ी लगने लगता है, क्योंकि उसको आदत ही नहीं इसकी.

स्पेस का सही अर्थ समझें: स्पेस का मतलब रिश्ते के प्रति बेपरवाह हो जाना नहीं होता.

– स्पेस(Space in relationships) उतना ही होना चाहिए, जितना रिश्ते को सांस लेने के लिए ज़रूरी हो. उसे खुली हवा में छोड़ देंगे, तो वो बेलगाम पतंग की तरह छूटता ही जाएगा.

– आजकल अक्सर कपल्स अपने-अपने फोन्स पर, विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बिज़ी रहते हैं और दोनों ही पार्टनर्स को इसमें दिलचस्पी कम ही रहती है कि उसका पार्टनर कहां किसके साथ बिज़ी है.

– फोन नहीं, तो लैपटॉप्स या टीवी देखने में लोग अधिक समय बिताना पसंद करते हैं, बजाय एक-दूसरे के साथ के.

– डिजिटल वर्ल्ड ने भी हमें स्पेस के नाम पर बहुत ज़्यादा ओपन स्पेस दे दिया है, जहां हम अपने रिश्तों से दूर होते जाते हैं और नए-नए रिश्तों के जाल में फंसते चले जाते हैं.

– बेहतर होगा इससे बचें या कम से कम इस पर नज़र रखें.

छूट के नाम पर असंतुलित तो नहीं हो गया रिश्ता: आपको अंदाज़ा भी नहीं हो पाता कि कब आपका वो रिश्ता असंतुलित हो गया, जिसे आप अब तक परफेक्ट समझ रहे थे.

– इतना स्पेस दिया कि आप दोनों के बीच अब स़िर्फ स्पेस ही रह गया. बैलेंस या संतुलन बेहद ज़रूरी है हर रिश्ते के लिए.

– पार्टनर का डेली रूटीन, उसके फ्रेंड्स, वो किससे बात करता है, किसके मेल्स उसे आते हैं आदि बातों की कम से कम हल्की-सी जानकारी ज़रूर रखें.

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क्या करें, क्या न करें?

– एक-दूसरे पर भरोसा करें, लेकिन आंखें न मूंद लें.

– इतने भी बेपरवाह न हो जाएं कि रिश्ते से रोमांस गायब होने लगे.

– रिश्ते में गर्माहट बनाए रखने के लिए रोमांटिक बातें करें, डेट्स प्लान करें.

– निजी पलों को जीने के लिए व़क्त ज़रूर निकालें. एक-दूसरे की कंपनी एंजॉय करें और कभी-कभी सरप्राइज़ भी दें.

– ऐसा न हो कि आप दोनों ही अपने-अपने फ्रेंड्स सर्कल के साथ ही पार्टी करते रह जाएं और यह भी याद न रहे कि आख़िरी बार आप दोनों ने साथ में व़क्त कब गुज़ारा था.

– अगर आपको लग रहा है कि आपका रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा, तो उसके कारणों पर आपस में बैठकर चर्चा करें और समाधान भी निकालें.

– थोड़ी रोक-टोक और दख़लअंदाज़ी रिश्तों में जीवंतता बनाए रखती है. इसे रिश्तों से गायब न होने दें.

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हर रिश्ते पर यही नियम लागू होता है

– चाहे पैरेंट्स हों, भाई-बहन, दोस्ती या अन्य कोई भी रिश्ता, ज़रूरत से ज़्यादा स्पेस आपके बीच दूरियां ही बढ़ाएगी.

– अगर पैरेंट्स बच्चों को ज़रूरत से ज़्यादा स्पेस देते हैं, तो हो सकता है वो भटक जाएं.

– बच्चों को अनुशासन में रखना उनकी ज़िम्मेदारी है, कुछ नियम और निर्देशों का पालन हर रिश्ते में ज़रूरी होता ही है, वरना प्रतिबद्धता और रिश्ते में भरोसा रह ही नहीं जाता.

– लेकिन आज की जनरेशन इसी अनुशासन को निजी जीवन में दख़लअंदाज़ी मानती है, जिससे सीमा रेखा तय करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है.

– एक व़क्त था, जब भाई-बहन या सिबलिंग्स आपस में बहुत-से सीक्रेट्स शेयर करते थे, लेकिन अब ‘स्पेस’ के नाम पर सब कुछ सीक्रेट ही रह जाता है और अगर किसी से कुछ पूछो, तो जवाब यही मिलता है कि ये हमारी पर्सनल लाइफ है, आख़िर हमें भी तो स्पेस चाहिए. 

– इसी चक्कर में एक व़क्त ऐसा आता है, जब स़िर्फ स्पेस ही रह जाता है. बेहतर होगा, व़क्त रहते इस स्थिति को समझें और अपने रिश्ते को सेफ करें.

– गीता शर्मा

नई शादी के साइड इफेक्ट्स (Side effects of new marriages)

Side effects of new marriages

शादी के शुरुआती दिनों के बाद जब प्यार की ख़ुमारी उतर जाती है और वास्तविकता से सामना होता है, तो अक्सर कपल्स को वे बातें बहुत ज़रूरी लगने लगती हैं, जिनके बारे में न तो उन्होंने कभी पहले सोचा था और न ही वे उनकी ज़िंदगी का हिस्सा थीं. अचानक कई मतभेद उनके बीच खड़े हो जाते हैं. मौज-मस्ती के एहसास को एक तरफ़ रखकर कपल्स कई बार अपनी नई शादी की चुनौतियों का सामना करने में बिज़ी हो जाते हैं. शादी के साइड इफेक्ट्स (Side effects of new marriages)उनके सामने यकायक आ जाते हैं.

Side effects of new marriages

पैरेंट ट्रैप- अपने घर को छोड़कर आई लड़की अपने पैरेंट्स व रिश्तेदारों को मिस कर रही होती है, तो इस कमी को पूरा करने के लिए वह अपनी सास की ओर देखती है, लेकिन वो पाती है कि वह तो उसकी सोच से बहुत ही अलग हैं. घर पर व्याप्त उनके एकाधिकार और अपनी तरह से सबको चलाने का शौक़ लड़की के सामने किसी शॉक से कम नहीं होता है. उनका घर चलाने का तरीक़ा एकदम अलग होता है.
टिप: शादी के बाद इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि मायकेवाला माहौल ससुराल में नहीं मिलेगा और ससुरालवालों से नए सिरे से तालमेल बैठाना होगा. ज़रूरी है कि पति को विश्‍वास में लेकर आप उनसे इस बारे में सहयोग लें, क्योंकि वह अपनी फैमिली के बारे में आपको सही तरह से समझाने में मदद कर सकते हैं.

भूमिकाएं तय करना- अधिकांशतः यही होता है कि कपल्स शादी के बाद आपस में एक-दूसरे की एक्सपेक्टेशंस पर बात करना नज़रअंदाज कर देते हैं. वे इस शादी से क्या उम्मीद रखते हैं, यह बताना वे ज़रूरी नहीं समझते और मानकर चलते हैं कि अपने आप सब होता चला जाएगा. यही सोच शादी के बाद साइड इफेक्ट्स के रूप में सामने आती है.
टिप: बेहतर यही होगा कि शादी से पहले ही अपनी भूमिकाएं तय कर लें. अपना फोकस इस बात पर रखें कि साथी किस तरह आपकी मदद करेगा और अगर शादी के बाद आपको लगे कि ऐसा नहीं हो रहा है, तो साथी पर दोष लगाने की बजाय समाधान तलाशने का प्रयास करें, ताकि दोनों मिलकर गृहस्थी को संभाल सकें. आजकल यह काम पुरुष का है या औरत का, ये चीज़ें नहीं चलतीं. जिसमें जो कंफर्टेबल फील करे, वह उस काम को कर सकता है.

मनी मैटर्स- पैसा बहुत ही सेंसिटिव विषय है और पार्टनर्स का इस मामले में एकमत होना अति आवश्यक है. शादी के बाद बिना किसी बजट प्लानिंग के पति-पत्नी दोनों ही खुले हाथों से ख़र्च करते हैं. पति पत्नी को इम्प्रेस करने के चक्कर में रहता है और पत्नी इस बात से ख़ुश रहती है कि उसके साथी को उसकी परवाह है, इसलिए वह उसकी इच्छाओं का ख़्याल रखता है. पर शादी के कुछ समय बाद स्थिति बदल जाती है. अगर पैसे को सोच-समझकर ख़र्च नहीं किया जाता है, तो बजट गड़बड़ा जाता है. कपल्स फिर
एक-दूसरे को ही इसके लिए दोषी मानने लगते हैं. फाइनेंशियल बैगेज शादी को बहुत बड़ा झटका दे सकता है.
टिप: बेहतर यही होगा कि शादी के शुरुआती दिनों से ही फाइनेंशियल प्लानिंग आरंभ कर दें, ताकि आप दोनों के बीच पैसे को लेकर तनाव न उत्पन्न हो. किस पर कितना ख़र्च करना है, यह हिसाब लगाएं. एक बार जब आप बजट बना लेते हैं, तो ज़िंदगी की गाड़ी को चलाना बहुत आसान हो जाता है. मनोवैज्ञानिक सपना पटनायक के अनुसार, एक-दूसरे की ख़र्च करने की आदत को देखकर अक्सर युगल हैरानी में पड़ जाते हैं. फाइनेंस के मामले में हो सके, तो शादी से पहले ही डिस्कस कर लें. जहां दोनों साथी कमा रहे होते हैं और आर्थिक स्वतंत्रता की आदत होती है, वहां शादी के बाद ज़्यादा परेशानी आती है, क्योंकि वे अपने मन से ख़र्च करने के आदी होते हैं. अचानक शादी के बाद इस मामले में दूसरे को जवाब देना या बताना उनके लिए आसान नहीं होता है. पर इस इफेक्ट से बचने के लिए ट्रांसपरेंसी रखें.

फैमिली ट्रेडिशंस- दोनों साथियों की चूंकि फैमिली बैकग्राउंड और परंपराएं भिन्न होती हैं, इसलिए शादी के बाद लड़की के लिए उनके साथ एडजस्ट करना सबसे बड़ी चुनौती होती है. रहन-सहन, खान-पान, त्योहार आदि हर चीज़ अलग हो सकती है. ऐसे में यदि लड़की से ज़रा-सी भी चूक हो जाती है, तो हर किसी को उससे शिकायत होती है.
टिप: अगर शादी से पहले ही लड़का अपने परिवार के तौर-तरीक़ों से लड़की को परिचित करवा दे, तो इस इफेक्ट का समाधान हो सकता है. लड़की मानसिक रूप से तैयार रहेगी कि किसके साथ कैसे बात करनी है, किसे क्या पसंद-नापसंद है आदि. शादी के बाद भी पति की ज़िम्मेदारी होती है कि वह पत्नी का हर क़दम पर साथ दे, उसे सलाह व मार्गदर्शन देकर उसकी राह आसान बनाए, ताकि वह नए माहौल में आराम से एडजस्ट हो सके.

फैमिली प्लानिंग- शादी का यह सबसे बड़ा साइड इफेक्ट होता है. अक्सर युगल न तो शादी से पहले और न ही शादी के बाद इस पर बात करते हैं. नतीजा कई बार अनचाही प्रेग्नेंसी के रूप में सामने आता है. सपना पटनायक का मानना है कि सोशल और बायोलॉजिकल कारणों की वजह से स्त्री बच्चा जल्दी चाहती है, जबकि पुरुष फाइनेंशियली और इमोशनली ख़ुद को पहले तैयार करने के बाद पिता बनना चाहता है. कई बार बच्चे के मामले में हुई देरी या जल्दी रिश्ते में दरार पैदा करने का कारण बन जाती है.
टिप: प्रेग्नेंसी का राइट टाइम क्या है, यह कोई निश्‍चित रूप से कभी भी तय नहीं कर सकता. यदि शादी से पहले इस बारे में बात नहीं हुई, तो बेहतर होगा कि शादी के तुरंत बाद कपल्स को इस मामले पर बात करके उसके अनुसार ही फैमिली प्लानिंग करनी चाहिए.

कम्यूनिकेशन गैप- मैरिज काउंसलर पूनम सचदेवा के अनुसार, आजकल लड़के-लड़कियां दोनों ही नौकरीपेशा होते हैं और इसलिए उनके लिए उनकी महत्वाकांक्षाएं व लक्ष्य बहुत ज़रूरी होते हैं. उन्हें पूरा करने के लिए अक्सर वे एक रेस में शामिल हो जाते हैं. वर्कप्लेस में आपस में प्यार हो जाने की संभावनाएं अधिक हो जाने से कपल्स समझ ही नहीं पाते कि वे एक-दूसरे के लिए बने भी हैं या नहीं. एक-दूसरे के लिए समय न निकाल पाने की वजह से शादी से पहले और बाद में भी विवाह से जुड़े मुद्दों पर बात करने का मौक़ा नहीं मिलता. कम्यूनिकेट न करने की वजह से साथी को समझना मुश्किल लग सकता है.
टिप: साथी की बातें सुनना व अपनी बातें शेयर करना दोनों ही ज़रूरी हैं. शेयरिंग प्यार को बनाए रखती है और आपसी समझ व भावनात्मक रिश्ता भी बढ़ाती है. कम्यूनिकेशन के ज़रिए ही आप दोनों एक-दूसरे की परेशानियां व ज़रूरतें समझ सकेंगे. बेहतर होगा कि शेयरिंग और केयरिंग को ही रिश्ते का आधार बनाएं.

सेक्स लाइफ पर बात न करना- हमारे समाज में आज भी सेक्स पर बात करना, ख़ासकर लड़कियों के लिए वर्जित ही माना जाता है. यही वजह है कि शादी से पहले तो क्या, शादी के बाद भी सेक्स पर आपस में पति-पत्नी कोई बात ही नहीं करते. जबकि सेक्स आपके रिश्ते में एक मज़बूत कड़ी की तरह काम करता है. शादी के बाद अगर खुलकर सेक्स संबंधों पर डिस्कस न किया जाए, तो परिणाम सुखद नहीं होते हैं. सेक्स के लिए प्लानिंग करना बुरी बात नहीं है. अगर इस पर ध्यान न दिया जाए, तो आप सेक्स को एंजॉय नहीं कर पाएंगे और यह समस्या शादी के बाद जटिल रूप ले सकती है.
टिप: अपने साथी से सेक्स से जुड़ी उसकी पसंद-नापसंद जानें, रोमांटिक वातावरण बनाएं और पहल आपको करनी पड़े, तो भी हिचकिचाएं नहीं. इस तरह साथी को आपके साथ व़क्त गुज़ारने का इंतज़ार रहेगा.

– सुमन बाजपेयी

लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप के फ़ायदे-नुक़सान (Long distance relationships pros and cons)

Long distance relationships pros and cons

लॉन्ग डिस्टेंस रिश्ते एक तरफ़ तो बहुत ग्लैमरस और आकर्षक लगते हैं, लेकिन जो इन रिश्तों को निभाते हैं, स़िर्फ वही जानते हैं कि इनसे जुड़ी ख़ूबियां हैं, तो ख़ामियां (Long distance relationships pros and cons) भी कम नहीं. यह बात भी सही है कि सभी को सब कुछ नहीं मिलता, लेकिन यदि कुछ ज़रूरी बातों को समझ लिया जाए, तो रिश्तों को बेहतर तरी़के से समझा व जिया जा सकता है. सब कुछ न सही, पर बहुत कुछ पाया जा सकता है.

Long distance relationships pros and cons

बेहतर करियर की चाह और तेज़ी से बढ़ते ऑप्शन्स के चलते चाहे स्त्री हो या पुरुष, अपने शहर या देश से बाहर भी नौकरी करने को तत्पर रहते हैं. तेज़ी से बढ़ती लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन्स (Long distance relationships pros and cons) की संख्या इस बात की निशानी है. अधिक पैसा कमाना या निरंतर तऱक्क़ी करना अच्छी बात है, पर इस रिश्ते के अगर कुछ फ़ायदे हैं, तो नुक़सान भी कम नहीं हैं.

फ़ायदे

क़द्र करते हैं: जब कोई चीज़ आपके सामने होती है और उस तक पहुंचना सहज होता है, तो उसकी क़द्र हमारी नज़रों में कम हो जाती है. इस स्थिति में हम रिश्तों को बहुत ही कैज़ुअली लेने लगते हैं. लेकिन वही चीज़ जब सामने नहीं होती या जिसे पाने के लिए ज़्यादा कोशिश करनी पड़ती है, तब अपने आप चीज़ों की क़द्र करना, उसका मूल्य समझना हम शुरू कर देते हैं. आपका साथी हमेशा साथ, हमेशा सामने होता है, तो वह भी आपकी दिनचर्या का एक हिस्सा बन जाता है. पर लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन में इसके विपरीत होता है. आप उसकी कमी महसूस करते हैं, उसे मिस करते हैं और हमेशा उससे बात करने को लालायित रहते हैं, जिसके लिए आप सोशल नेटवर्किंग साइट्स के ज़रिए या अन्य तरीक़ों से अपने साथी से चैट करने के लिए विशेष समय निकालते हैं. आप उसे बार-बार एहसास दिलाने लगते हैं कि आप उसे कितना मिस कर रहे हैं या कितना प्यार करते हैं, जबकि साथ रहते हुए आप अक्सर पर्सनल स्पेस न मिलने की ही शिकायत करते रहते हैं.

लड़ाई-झगड़े नहीं होते: साथी जब दूर बैठा हो, तो लड़ाई-झगड़े होने की संभावना न के बराबर होती है. उन्हें जो कुछ भी थोड़े-बहुत पल बात करने के लिए मिलते हैं या जब कुछ दिनों की मुलाक़ात होती है, तो वे उसे लड़ने-झगड़ने या शिकवा-शिकायत करने में बर्बाद करने से बचते हैं. समस्याओं को सुलझाने की कोशिश करते हैं, पर समाधान ढ़ूंढ़ते हुए न कि आक्षेपों के साथ कि तुम्हारी नौकरी की वजह से या तुम्हारे पर्याप्त समय न देने की वजह से ऐसा हो रहा है. उन पलों में वे ज़्यादा से ज़्यादा अपनी बात शेयर करने व साथी की बात सुनने की कोशिश करते हैं. ऐसे में लड़ना किसे याद रहता है? रूठने-मनाने में समय गंवाने का तो सवाल ही नहीं उठता है.

खट्टे-मीठे पलों को संजोकर रखते हैं: इस रिलेशनशिप में पति-पत्नी उन पलों को धरोहर की तरह संजोकर रखते हैं, जो उन्होंने साथ बिताए थे. जबकि साथ रहने पर रूमानियत और हंसी-दिल्लगी तो जैसे सपना बन जाती है. एक आदत-सी हो जाती है उन्हें साथ रहने की, जिसकी वजह से वे अपने खट्टे-मीठे पलों को संजोने की ज़रूरत ही नहीं समझते, पर लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन में इन्हीं पलों के सहारे उनका प्यार बढ़ता है और अकेले होने पर उन पलों को जीते हुए साथी के बग़ैर जीना थोड़ा कम मुश्किल लगता है. हाथ में हाथ डालकर बैठने या चुंबन देने का एहसास, जिसे आम युगल कभी गंभीरता से नहीं लेते हैं, उनके लिए सबसे ख़ूबसूरत पल बन जाते हैं.

इंडीविज़ुअल ग्रोथ होती है: आपके और आपके साथी के बीच की दूरी (स्थानों की) आपके व्यक्तित्व को उभारने में मदद करती है. साथ रहते हुए, हमेशा एक-दूसरे के इर्द-गिर्द घूमते हुए, दोनों का व्यक्तित्व अलग-अलग विकसित ही नहीं हो पाता है. वे हर काम एक साथ करते हैं. अक्सर चाहकर भी अलग-अलग कुछ नहीं कर पाते. हालांकि शुरू में यह बहुत अच्छा लगता है कि साथ रहने पर बहुत अच्छी अंडरस्टैंडिंग हो गई, लेकिन फिर धीरे-धीरे यही बात अखरने लगती है. साथी हावी हो रहा है वाली भावना घेरने लगती है. वैसे भी व्यक्तिगत ग्रोथ करने के लिए न तो समय मिलता है और न ही खुला आकाश. इसलिए दोनों की पहचान एक-दूसरे के अस्तित्व से परिभाषित होने लगती है. लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप में आपके पास स्वयं को खोजने का, अपनी हॉबीज़ के लिए समय होता है. आपके पास अपने ख़ुद के मूल्यों, लक्ष्यों और व्यक्तित्व को तराशने का समय होता है.

इमोशनल बॉन्ड मज़बूत होता है: लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन का सबसे बड़ा फ़ायदा यह होता है कि इसमें इमोशनल बॉन्ड मज़बूत होता है. शारीरिक रूप से दोनों पार्टनर एक-दूसरे से दूर होते हैं, उस खालीपन को भरने के लिए वे भावनात्मक रूप से नज़दीक आते जाते हैं, क्योंकि उनके पास एक-दूसरे से बात करने के लिए अधिक समय होता है. लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन विश्‍वास व संवाद को बढ़ावा देता है. ये दोनों ही बातें किसी भी रिश्ते के लिए महत्वपूर्ण हैं और इन्हीं से रिश्ता सहजता से चलता है.

आप विश्‍वास पैदा करते हैं: अलग-अलग शहरों या देशों में रहने के कारण एक-दूसरे को धोखा देने या झूठ बोलने के कई अवसर हो सकते हैं. वह भी इस डर के बिना कि दूसरे साथी को पता चल जाएगा. मनोवैज्ञानिक शीतल नारंग के अनुसार, “अगर आप शक करेंगे या ईर्ष्या पालेंगे कि आपका साथी किसी और से संबंध बना रहा है, तो आप तनाव में आ जाएंगे और रिश्तों में भी खटास आ जाएगी. इसलिए आपको अपने मन में साथी के प्रति एक विश्‍वास पैदा करना होगा और यह मानकर चलना होगा कि वह मेरा विश्‍वास नहीं तोड़ेगा. यही विश्‍वास रिश्ते को मज़बूती देता है.”

साथ एंजॉय करते हैं: इस रिलेशन में जब साथी हफ़्तों, महीनों या वर्षों बाद मिलते हैं, तो एक-दूसरे के साथ को बहुत ज़्यादा एंजॉय करते हैं. वे रिलैक्स महसूस करते हैं और मौज-मस्ती करने के साथ प्यार भी दोगुना करते हैं. जबकि दिन-रात साथ रहनेवालों के बीच अक्सर एक बोरियत व्याप्त हो जाती है, प्यार को भी एक रूटीन मान लेने के कारण वे उसे एंजॉय नहीं कर पाते हैं.

अधिक अर्थपूर्ण संवाद: कोर्नेल यूनिवर्सिटी, हांगकांग में हुए एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि आम युगल के बीच रोज़ संवाद
स्थापित होता है, जबकि हज़ारों मील दूर रहनेवाले युगलों के बीच निरंतर संवाद स्थापित न होने के बावजूद अधिक व अर्थपूर्ण संवाद क़ायम होता है. यही नहीं, वे एक ‘कम्युनिकेशन डायरी’ भी बनाकर रखते हैं, जिसमें उन बातों को नोट करके रखते हैं, जो उन्हें अपने पार्टनर से कहनी होती है.

Long distance relationships pros and cons
नुक़सान

अकेलापन: इस रिश्ते का सबसे बड़ा नुक़सान है अकेलापन और कई बार उससे उपजी हताशा. दूरी होने के कारण कोई पास नहीं होता, जिसके साथ साथी अपना ग़म, अपनी समस्याएं बांट सके. रोने का मन करे, तो कोई कंधा नहीं होता, जिस पर सिर रखकर रो सकें. हंसने का मन करे, तो साथ ख़ुशियां बांटनेवाला कोई नहीं होता. छोटी-छोटी बातें शेयर करनेवाला या अकेलापन बांटनेवाला कोई नहीं होता. अक्सर ऐसे युगल अवसाद का शिकार हो जाते हैं या उनका रिश्ता टूट जाता है.

डर घेरे रहता है: इस रिश्ते में चूंकि दूरी व्याप्त रहती है और मिलने का समय तय नहीं होता है, इसलिए इस बात का डर पति-पत्नी दोनों को घेरे रहता है कि कहीं उनका साथी उन्हें धोखा तो नहीं दे रहा है. उसकी ज़िंदगी में कोई और तो नहीं है. अक्सर अपने अकेलेपन को भरने या शारीरिक ज़रूरतों की पूर्ति के लिए किसी साथी के भटकने की संभावना बनी रहती है. यही डर शक को जन्म देता है. अगर नियत समय पर फोन नहीं आया या मिले हुए लंबा समय बीत गया, तो मन में अनेक तरह की आशंकाएं पैदा हो जाती हैं. एक तरफ़ किसी दुर्घटना का विचार आता है, तो दूसरी तरफ़ साथी के नज़रअंदाज़ करने का भी ख़्याल मन को डराता है.

इमोशनल और फिज़िकल स्ट्रेस: साथी के पास न होने पर ज़िम्मेदारियां बढ़ने और अकेले ही घर-बाहर और बच्चों को संभालने की वजह से फिज़िकल स्ट्रेस बहुत ज़्यादा हो जाता है. कपल्स मिलकर काम बांटते हैं, तो वह बोझ नहीं लगता. पर अकेले ही सब कुछ करना थका देता है. इमोशनली भी इंसान टूट जाता है. पति, परिवार व अपनों से दूर स्वयं के खालीपन को भरने के प्रयास में लगा रहता है और पत्नी अपने मन की बात न कहने के तनाव से जूझती रहती है.

ख़र्चे बढ़ जाते हैं: लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन में असल में दो घर बन जाते हैं. इसका फाइनेंशियल स्थिति पर भी बहुत असर पड़ता है. अगर पत्नी कमाती न हो, तो पति पर पैसों का दबाव हमेशा बना रहता है. या तो उसे अपने ख़र्चे कम करने पड़ते हैं या पैसों की तंगी के कारण पत्नी के ताने सुनने पड़ते हैं. यही नहीं, जब पति-पत्नी बीच-बीच में एक-दूसरे से मिलने जाते हैं, तो यात्रा का ख़र्च, घूमना या शॉपिंग करना भी उनके बजट को बिगाड़ देता है.

बच्चों पर असर पड़ता है: पिता के घर से दूर रहने पर अक्सर मां उनकी कमी को भरने के लिए बच्चों को अतिरिक्त स्नेह देती है. उनकी अवांछित मांगों को भी पूरा करती है. इससे बच्चे बिगड़ सकते हैं. पिता का जो कंट्रोल बच्चों पर होता है, वह भी न होने से बच्चे ज़िम्मेदारी का पाठ नहीं पढ़ पाते हैं.

–  सुमन बाजपेयी

अपने सपनों को पूरा कैसे करें? (How To Fulfill Your Dreams)