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प्रो़फेशनल लाइफ में कैसे बनें इमोशनली स्ट्रॉन्ग? (How to Become a Professional Life Emotionally Strong?)

Professional Life, Emotionally Strong

Professional Life, Emotionally Strongप्रो़फेानल लाइफ में सफल होने के लिए आप जी जान से मेहनत तो करते हैं, लेकिन अपने ग़ुस्से व खीझ पर काबू नहीं रख पाते और यही ग़ुस्सा आपकी सफलता की राह में रोड़ा बन जाता है, प्रो़फेशनल लाइज़ में क़ामयाबी पाने के लिए काम के साथ ही अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना भी ज़रूरी है.

Professional Life, Emotionally Strongआप अपने काम के प्रति बहुत ही संजीदा है और अपना काम पूरी ईमानदारी से करते हैं, बावजूद इसके कई सालों से आपको प्रमोशन नहीं मिला है. ऐसा क्यों हो रहा है. क्या आपने कभी इसकी वजह जानने की कोशिश की है? यदि नहीं, तो ज़रा अपने व्यवहार पर ग़ौर फरमाइश. कहीं आपका व्यवहार इसकी वजह तो नहीं है.

दरअसल, कुछ लोग बहुत संवेदनशील होते हैं और कुछ अपनी भावनाएं छुपा नहीं पाते. दुखी होने पर तुरंत उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं और ख़ुश होने पर वे अति उत्साहित हो जाते हैं. घर पर ऐसा व्यवहार चल जाता है, पर ऑफिस में यह आपकी तऱक्क़ी की राह में रोड़ा बना सकता है. अत: अच्छा प्रोफेशनल बनने के लिए अपनी भावनाओं पर नियत्रंण रखना सीखें. आपकी इस कोशिश में हमारे बताए टिप्स आपके बहुत काम आएंगे.

– अपनी कमियों को पहचानने की कोशिश करें और उन्हें अपनी डायरी पर नोट करें. साथ ही उन स्थितियों को भी याद रखने की कोशिश करें जब आप अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाते.

– जब आपको ज़्यादा ग़ुस्सा आता है या जोश में आप ऊंची आवाज़ मे ंबात करने लगते हैं, तब सजग होकर अपनी भावनाओं पर नियत्रंण रखने की कोशिश करें. शुरू-शुरू में यह काम थोड़ा मुश्किल लगेगा, लेकिन धीरे-धीरे आपको इसकी आदत प़ड़ जाएगी.

– आपके ऑफिस में कुछ ऐसे लोग ज़रूर होंगे, जो आपको पसंद नहीं करते होंगे, लेकिन ऐसे लोगों के साथ भी अच्छे रिश्ते बनाना ज़रूरी है. हां, उनसे काम के संबंध में ही बातचीत करें, अपनी नफ़रत या नापसंद को अपने व्यवहार में हावी न होेने दें.

– अपने बॉस की पर्सनैलिटी और साइकोलॉजी को भी समझने की कोशिश करें और उसी के अनुसार व्यवहार करें. ङ्गबॉस इज़ आलवेज़ राइटफ इस वाक्य को हमेशा याद रखें और किसी भी मुद्दे पर बहस करने से बचें.

– अगर आपकी किसी बात से बॉस या कलीग असहमत हैं, तो भी नाराज़ होने की ज़रूरत नहीं है, तब भी उनसे विनम्र होकर ही बात करें.

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– अगर किसी कलीग के बुरे बर्ताव पर आपको ग़ुस्सा आए, तो तुरंत कोई प्रतिक्रिया न दें. बाद में विनम्रतापूर्वक उसे उसकी ग़लती का एहसास कराएं.

Professional Life, Emotionally Strong– अगर आप वर्किंग वुमन हैं, तो आपके लिए अपनी भावनाओं पर नियत्रंण रखना और भी ज़रूरी है, क्योंकि आपकी घरेलु परेशानियों की वजह से ऑफिस का काम प्रभावित हो सकता है.

– महिलाएं बहुत भावुक होती हैं और छोटी-छोटी बात पर भी तुरंत रोने लगती है. यदि आप भी ऐसा करती हैं, आपकी ये आदत आपके करियर के लिए नुक़सानदेह साबित हो सकती है. अत: ऑफिस में यदि बॉस की फटकार या सहयोगी के दुर्व्यवहार से आपको ठेस पहुंचे, तो अपनी भावनाओं पर नियत्रंण रखें. क्योंकि दुखी होकर यदि आप सबके सामने रोने लगेंगी, तो इससे ऑफिस में आपकी छवि ख़राब होगी.

– हमेशा पॉज़िटिव अप्रोच रखें और प्रोफेशनल बातों को दिल पर न लें. इससे आप टेंशन फ्री रहेंगे.

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काम समेटने में बिखरने न दें ज़िंदगी ( Do not wrap up work in the disintegrating life)

Disintegrating life
न जाने वे दिन कहां खो गए, जब सर्दियों की धूप में अलसाते हुए हम छत पर लेटे रहते थे… या फिर गर्मियों की शाम को बाहर बगीचे में चैन से सब्ज़ी काट रहे होते थे… न कोई टेंशन होती थी और न ही कोई जल्दबाज़ी. एक सुकून था जीवन में और थी एक सहजता. 

Disintegrating life

आज यह नज़ारा देखने तक को नहीं मिलता कि कहीं दो पल भी बैठकर कोई औरत, ख़ासकर कामकाजी, यूं ही सुस्ता ले. ऐसा सोचना तक संभव नहीं लगता, क्योंकि वह तो आज इतनी व्यस्त हो गई है कि केवल उसे काम समेटने की जल्दी रहती है. बस, किसी तरह से यह काम निपट जाए, तो वह दूसरा काम निपटाए. नतीजा, इस समेटने के चक्कर में अक्सर वह उन छोटी-छोटी ख़ुशियों को नज़रअंदाज कर देती है, जो जीवन की सहजता को बनाए रखने के लिए आवश्यक होती हैं. सहजता न हो, तो बिखराव अपनी जड़ें फैलाने लगता है.

क्यों बिखरने लगती है ज़िंदगी?

 

परफेक्शनिस्ट बनने की चाह
बदलती जीवनशैली और कामकाजी होने की ज़रूरत के कारण आज महिलाओं के पास समय की कमी होने लगी है. जो समय उनके पास है, उसमें ही वह बहुत कुछ करना चाहती हैं और वो भी एकदम परफेक्शन के साथ, ताकि कोई यह न कह सके कि वह घर और बाहर दोनों को एक साथ संभालने में अक्षम है. कोई यह आरोप न लगा सके कि उसने जो काम करने की राह चुनी है, वो उसका सबसे ग़लत फैसला है. घर की ज़िम्मेदारियों को सही तरह से निभा सके, इसलिए वह न स़िर्फ ख़ुद को एक अनुशासन के दायरे में बांधती है, बल्कि अपने परिवार को भी उसमें कैद कर लेती है. पति-बच्चे, जो एक सामान्य जीवन जीना चाहते हैं या सहज वातावरण चाहते हैं, उन पर अंकुश लग जाता है. यह अंकुश बोझिलता तो लाता ही है, साथ ही रिश्तों में बिखराव को भी आमंत्रित करता है. काम को समेटने की टेंशन उन्हें परफेक्शनिस्ट बना देती है और परफेक्शनिस्ट कभी संतुष्ट नहीं हो पाते हैं, बल्कि अपनी बात दूसरों पर थोपने की उन्हें आदत पड़ जाती है.

काम को एंजॉय नहीं करतीं
सच्चाई तो यही है कि ऐसी महिलाएं, जिन्हें हमेशा काम ख़त्म करने की जल्दी रहती है, वे अपने काम को कभी एंजॉय ही नहीं कर पाती हैं. उनके दिलो-दिमाग़ पर हमेशा एक बोझ-सा बना रहता है कि काम समेटना है. समय पर वह काम नहीं पूरा हुआ, तो दूसरे काम को वह कैसे पूरा कर पाएंगी. यह डर उन्हें हमेशा सताता रहता है. ज़ाहिर है, घर के सदस्यों पर इसका असर तो पड़ेगा ही. उनके अंदर भी एक झल्लाहट कायम हो जाती है और शुरू हो जाता है मन-मुटाव और दोषारोपण का सिलसिला.

अवास्तविक अपेक्षाएं
परफेक्शन और ऑर्गेनाइज़्ड तरह से काम करने की आदत या इसे एक सनक भी कह सकते हैं, अवास्तविक अपेक्षाओं को जन्म देती है. ऐसे लोगों के साथ व्यवहार करना मुश्किल हो जाता है. इस पर सायकोलॉजिस्ट मनु पारेख कहते हैं, जिन महिलाओं को हमेशा यह टेंशन घेरे रहती है कि जल्दी-जल्दी काम ख़त्म करना है, दरअसल, वे अवास्तविक अपेक्षाओं के साथ जीने लगती हैं. ऐसे में परिवार के सदस्यों का यह कर्तव्य बनता है कि वे भी उसे सहयोग दें. ये अवास्तविक अपेक्षाएं संबंधों में मतभेद का कारण बनती हैं. इतना ही नहीं, ऐसे लोगों की फिज़िकल और इमोशनल हेल्थ पर भी इसका असर पड़ता है. साथ ही वे डिप्रेशन के शिकार भी हो जाते हैं.

भूल जाते हैं खुलकर जीना
चाहे घर का काम हो या ऑफिस का या फिर किसी फंक्शन-पार्टी में जाना हो, काम समेटने का बोझ लेकर चलनेवालों को कुछ भी लुभाता नहीं. वे खुलकर जीना तो जैसे भूल ही जाते हैं और एक मशीन की तरह अपने दायित्वों को निभाते रहते हैं.

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क्या करें?

आपकी ज़िंदगी बिखरने लगे और बाद में केवल पछतावा ही हाथ आए, उससे पहले ही स्वयं को संभाल लें और काम समेटने की जल्दी करने की बजाय उसे ख़ुशी से करें.

अपनाएं कुछ टिप्स

एक समय सीमा निर्धारित करें
सच तो यह है कि घर के काम कभी ख़त्म नहीं होते हैं. चाहे आप कितनी ही सफ़ाई से आज घर के फर्श को साफ़कर लें, पर कल कोई गंदे जूते लेकर अंदर आ ही जाएगा. इस बात से ग़ुस्सा होने या उस पर चिल्लाने की बजाय या फिर घंटों सफ़ाई में जुटे रहने की बजाय सफ़ाई के लिए एक समय तय करें. जब टेंशन फ्री होकर काम करेंगी, तब काम जल्दी हो जाएगा और घर का माहौल भी ख़राब नहीं होगा.

इम्परफेक्ट होने के फ़ायदों पर ग़ौर करें
परफेक्शनिस्ट होना कोई गर्व की बात नहीं है. मनु पारेख मानते हैं कि परफेक्शनिस्ट एक व्यावहारिक इंसान की तुलना में काम पूरा करने या कमिटमेंट निभाने में ज़्यादा समय लेता है. वह अपने दायित्वों को ख़ुशी से नहीं, बल्कि बोझ की तरह पूरा करता है. उनका बिहेवियर कंट्रोल करनेवाला होता है, जिससे सहजता और काम की ख़ूबसूरती उन्हें नज़र नहीं आती और
उनके काम के स्तर के गिरने के साथ-साथ उसमें अधूरापन भी झलकता है. इम्परफेक्ट होकर देखें, आप अपना धैर्य भी नहीं खोएंगी और काम भी हो जाएगा. परिवार के लोग आपसे ख़ुश रहेंगे, तो आप भी रिश्तों को संभाले
रख पाएंगी.

मदद लें
सुपरवुमन बनने की बजाय घर के सदस्यों से मदद लें. काम बांटें. आपको उन्हें यह दिखाने की ज़रूरत नहीं है कि आप सब कर सकती हैं. साथ मिलकर काम करने से प्यार भी बढ़ता है और दूरियां भी नहीं आतीं.

रिलैक्स रहना सीखें
ग़लतियां आप भी कर सकती हैं, काम आप भी अधूरा छोड़ सकती हैं, तो इसमें बुरा क्या है. इसे स्वीकार करना सीखें. यक़ीन मानिए कोई आपको दोष नहीं देगा. रिलैक्स रहें और दूसरों को भी रहने दें. काम नहीं सिमट पाया, तो कोई पहाड़ तो नहीं टूट जाएगा. कल हो जाएगा, पर परिवार का साथ ज़रूरी है. बच्चों को समय दें. खाना नहीं बनाना है, तो बाहर से मंगा लें. इसको लेकर अपराधबोध न महसूस करें.

जीवन को जटिल नहीं, आसान बनाएं
ज़रूरी तो नहीं कि हर व़क्त जैसा आप चाहती हैं, वैसा ही हो. परिवारवालों की ख़ुशी के लिए अक्सर कुछ बातों को नज़रअंदाज़ करना पड़ता है. इसलिए आप भी जो चीज़ें जैसी हैं, उन्हें वैसा ही स्वीकार करें और फिर देखें जीवन कितना सहज और आसान हो जाएगा.

एक दिलचस्प कहानी

पॉटरी क्लास की एक दिलचस्प कहानी है. इसमें लोगों को दो समूहों में बांटा जाता है. पहले समूह को कहा जाता है कि उनके काम को पॉट्स के वज़न या मात्रा के अनुसार आंका जाएगा, जबकि दूसरे समूह को कहा जाता है कि उन्हें दो दिन दिए जाते हैं और उसमें उन्हें एकदम परफेक्ट पॉट तैयार करना है. अब ज़रा सोचिए, कौन-सा समूह ज़्यादा क्रिएटिव रहा होगा. बेशक, पहलेवाला, क्योंकि उन्होंने काम के दौरान ख़ूब मस्ती की, हंसे, कई पॉट भी तोड़े और ख़ूब हंगामा किया यानी अपने काम को पूरी तरह एंजॉय किया. लेकिन दूसरा समूह ऐसा नहीं कर पाया. एकदम परफेक्ट कलाकृति तैयार करने की टेंशन का आप अंदाज़ा लगा सकते हैं. मास्टर पीस बनाने की धुन में हंसना तो दूर की बात है, उन्होंने एक-दूसरे के साथ बात करना भी समय की बर्बादी समझी होगी.

– सुमन बाजपेयी