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मोबाइल फोन की लत कैसे छोड़ें (How To Beat Mobile Phone Addiction)

मोबाइल फोन (Mobile Phone) आज हम सबकी ज़िंदगी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है. आपको अपने आसपास ऐसे कई लोग मिल जाएंगे, जो हम पांच मिनट में अपना फोन चेक करते हैं, कई लोग अपने दिनभर का अधिकतम समय फोन पर ही खर्च कर देते हैं. मोबाइल फोन की लत (Mobile Phone Addiction) के कारण कई लोग मानसिक रोगों के शिकार तक होने लगे हैं. मोबाइल फोन की लत कैसे छोड़ें, बता रही हैं काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट डॉ. माधवी सेठ.

Mobile Phone Addiction

मोबाइल फोन एडिक्शन से बचने के 5 आसान उपाय

1) ऑनलाइन गेम इन दिनों बच्चों और युवाओं के बीच पहुत पॉप्युलर हो रहे हैं. अत: सबसे पहले अपनी ऑनलाइन गेम खेलने की लत पर कंट्रोल करें. माना आपके लिए ये काम आसान नहीं है, लेकिन धीरे-धीरे गेम खेलने का टाइम कम करते जाएं. ऐसा करके आप इस लत से बच सकते हैं.

2) सोशल मीडिया के लाइक्स और कमेंट्स के चक्कर में लोग अपने आसपास के लोगों को भूल जाते हैं इसलिए सोशल मीडिया के लिए भी टाइम फिक्स करें और उससे ज़्यादा समय सोशल मीडिया पर न बिताएं.

3) जब परिवार के सभी सदस्य घर पर हों, तो फोन से जितना हो सके दूर रहें और अपने परिवार के साथ समय बिताएं.

4) रात में सोने से कुछ घंटे पहले ही फोन को खुद से दूर कर लें. ऐसा करने से आप जल्दी सो जाएंगे और आपकी नींद पूरी होगी.

5) जिस तरह आपकी हफ्ते में एक दिन छुट्टी होती है, वैसे ही अपने फोन को भी हफ्ते में एक दिन छुट्टी दें और बहुत ज़रूरी हो तो ही फोन को हाथ लगाएं.

 

मोबाइल फोन की लत कैसे छोड़ें, जानने के लिए देखें वीडियो:

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कहीं आप पुशी पैरेंट्स तो नहीं?

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स्कूल खुले नहीं कि पैरेंट्स कमर कस लेते हैं. पिछले साल जो भी परफ़ॉर्मेंस रहा, जैसा भी परिणाम रहा, इस साल तो बस शुरू से ही ध्यान देना है. फिर तो हर दिन की एक्टिविटी, होमवर्क, स्पोर्ट्स हर क्षेत्र पैरेंट्स की दिनचर्या का अहम् हिस्सा बन जाता है. ऐसे पैरेंट्स बच्चों की सफलता व परफ़ॉर्मेंस को लेकर ख़ुद भी स्ट्रेस झेलते हैं और बच्चों पर भी दबाव डालते हैं. क्या यह सही है?

 

क्या कहते हैं साइकोलॉजिस्ट?

क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. मैडलिन लेविन ने अपनी पुस्तक ‘प्राइस ऑफ़ प्रिवलिन’ में लिखा है कि जो पैरेंट्स अपनी सफलता के लिए बच्चों को पुश करते हैं यानी बच्चों पर बहुत ज़्यादा दबाव डालते हैं, वे अनजाने ही युवा पीढ़ी को स्ट्रेस व डिप्रेशन का शिकार बना रहे हैं. उनकी नज़र में ये पैरेंट्स हमेशा अपने बच्चों को दूसरों से आगे देखना चाहते हैं. चाहे पढ़ाई हो, खेल हो या एक्स्ट्रा करिकुलम एक्टिविटीज़ हों, ये हर क्षेत्र में बच्चों को पुश करते हैं. वास्तविकता से दूर जब ऐसा बच्चा माता-पिता की उम्मीदों पर ख़रा नहीं उतर पाता तो वह दुख, मायूसी व दुविधा की स्थिति का सामना करता है.
डॉक्टर लेविन के अनुसार सम्पन्न व धनी परिवार के बच्चों में साधारण परिवार के बच्चों के मुक़ाबले डिप्रेशन व चिन्ता की स्थिति तीन गुना ज़्यादा देखी जाती है. ऐसे बच्चे ग़लत रास्ते पर जा सकते हैं. ड्रग्स का सहारा लेने लगते हैं. कभी-कभी तो बच्चे स्वयं से ही नफ़रत करने लगते हैं. बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए जिस वातावरण की ज़रूरत होती है, वह उन्हें नहीं मिल पाता. एक के बाद एक क्लासेस उनकी दिनचर्या बन जाती है. स्कूल के बाद कोचिंग, फिर हर क्लास के होमवर्क के बीच उन्हें अपनी क्रिएटिविटी या टैलेन्ट पहचानने व उसे निखारने का समय बिल्कुल नहीं मिल पाता.

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कैसे जानें कि आप पुशी पैरेंट हैं?

सभी माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे स्वस्थ जीवन के प्रति उत्साहित व प्रोत्साहित हों. लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब पैरेंट्स हर क्षेत्र में दूसरों से एक क़दम आगे की अपेक्षा रखने लगते हैं. ऐसे पैरेंट्स ही पुशी पैरेंट्स कहलाते हैं. हर क्षेत्र व हालत में जीतने या सफलता की चाह निश्‍चय ही सुखद उपलब्धि है. लेकिन दबाव इतना नहीं होना चाहिए कि बच्चे टूटने लगें, डिप्रेशन में चले जाएं. मानसिक रोगी बन जाएं. आत्महत्या जैसे अपराध उनकी सोच का हिस्सा बन जाएं अथवा वे बेहद उद्दंड या अनुशासनविहीन बन जाएं. कहीं आप भी अपने पुशी स्वभाव के कारण बच्चे को दूसरों से एक क़दम आगे बढ़ाने की चाह में ऐसा ही तो नहीं कर रहे कि आगे बच्चों के साथ-साथ आप भी परेशानी महसूस करें. सायकोलॉजिस्ट श्रुति भट्टाचार्य के अनुसार, पैरेंट्स को कुछ बातों को ध्यान में रखना चाहिए और हर समय बच्चों पर दबाव डालने की बजाय अपने व्यवहार में कुछ इस तरह नियंत्रण व समझदारी लानी चाहिए, जैसे-
मुस्कुराना व ख़ुश रहना बड़ा पॉज़िटिव दृष्टिकोण है. आप मुस्कुराएंगे, तो बच्चा भी वही सीखेगा. उसमें आत्मविश्‍वास और आप पर भरोसा बढ़ेगा कि वो जैसा भी है, आपको प्रिय है.
स्कूल से लौटने पर आते ही पढ़ाई संबंधी बातें जानने की आतुरता न दिखाएं, उसे थोड़ा फ्रेश होने दें. बाद में होमवर्क के साथ बातें की जा सकती हैं.
बच्चे की तुलना किसी भी फ्रेंड या रिश्तेदार से न करें. इससे बच्चे के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है.
बच्चा जब भी आपके पास आकर बैठता है, तो ध्यान दें कि कहीं आप उसकी पढ़ाई को लेकर चिन्तित तो नहीं हो जाती हैं. अपनी मां-बहन या सहेली से बातचीत के दौरान उसकी पढ़ाई की चिन्ता तो व्यक्त नहीं कर रही हैं. यदि ऐसा है तो ये सही एटीट्यूड नहीं है.
एक के बाद एक क्लास ज्वॉइन कराकर आपने सही किया या ग़लत, इसे बच्चे के दृष्टिकोण से भी देखें कि कहीं ऐसा तो नहीं कि देखा-देखी या तुलना के चक्कर में आपने ऐसा किया है.
बातचीत अनेक समस्याओं का हल है. लेकिन ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि आप बोलती रहें और वो सुनता रहे. यदि ऐसा है, तो निश्‍चित जानिए उसने आपकी बातों पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया है.
मौज-मस्ती भी जीवन का अहम् हिस्सा है. यदि उसकी दिनचर्या में इसकी गुंजाइश नहीं है, तो आपको उसके टाइम टेबल में इसे शामिल करना होगा.
परीक्षा के दिनों में हर समय उसके साथ बने रहने की कोशिश न करें. हर समय का साथ उसके आत्मविश्‍वास को कम कर सकता है. बच्चा रिलैक्स होने की बजाय ज़्यादा प्रेशर में आ सकता है.
अपने बच्चे की क्षमता व सीमा समझे बिना हमेशा आगे और आगे बढ़ने के लिए उसे पुश करने से आप हित की बजाए उसका अहित कर रही हैं. बेहतर होगा कि अपनी सोच में बदलाव लाएं.
उसके भविष्य को लेकर आपके मन में असुरक्षा का भाव स्वाभाविक है. लेकिन आत्मसम्मान की कमी होने से भी पैरेंट्स ख़ुद असुरक्षित महसूस करते हैं और यही भाव वो अपने बच्चों में भी भर देते हैं. ऐसी स्थिति में बच्चा विश्‍वास खोने लगता है. बेहतर होगा कि ख़ुद में व बच्चों में विश्‍वास रखते हुए अपने प्यार व स्नेह की छत्रछाया में उसे सुरक्षा महसूस कराएं.
अनुशासन व आज्ञाकारिता महत्वपूर्ण है, किन्तु समय-समय पर उदारता भी ज़रूरी है. निर्देश देने की बजाय परामर्श दें.
कभी-कभी बच्चों को पूर्ण स्वतन्त्रता देकर उनकी क़ाबिलियत पर भरोसा रखना भी आवश्यक है. संभवतः वे स्वयं ही आगे बढ़ जाएं.
केवल परफ़ॉर्मेंस पर ज़ोर न देकर पढ़ने के सही तरी़के के महत्व को समझें, बच्चों को प्रोत्साहित करें. शिक्षा का सही अर्थ है सीखना व उसे व्यवहार में उतारना.
बच्चे का स्तर दूसरे की योग्यता देखकर निर्धारित न करें, बल्कि उसके अपने स्तर को धीरे-धीरे बढ़ाने के लिए उत्साहित करें, क्योंकि ‘स्लो एंड स्टडी विन्स द रेस’ यानी धीरे-धीरे धैर्य से चलनेवाला ही अंत में जीतता है.

– प्रसून भार्गव