Psychology

मज़ाक में ही सही, पर अक्सर राज अपनी पत्नी अनीता के उसके मोटे शरीर को लेकर कोई-न-कोई टिप्पणी पास कर ही देता था. जैसे- “जो भी हो पर लगती तुम खाते-पीते घर की हो…” अपने दोस्त और रिश्तेदारों के सामने भी वह अनीता के मोटे शरीर को लेकर कुछ-न-कुछ बोल देता, जिससे वह आहत हो उठती थी. उसके सारे गुणों को अनदेखा कर राज बस उसके मोटे शरीर को ही लेकर ही उठता-बैठता रहता और जतलाता कि उसे तो पतली-छरहरी लड़की चाहिए थी, मगर उसकी क़िस्मत में मोटी लड़की ही लिखी थी, तो क्या किया जाए. मगर उसकी ऐसी बातों से अनीता के दिल पर क्या बीतती थी इससे वह अंजान था.
पति-पत्नी के रिश्ते में एक-दूसरे का सम्मान करना सबसे ज़्यादा अहमियत रखता है. लेकिन कई बार पुराने से पुराने रिश्ते में भी खटास तब पड़ने लगती है, जब किसी गैर के सामने पार्टनर एक-दूसरे का मज़ाक बनाने लगते हैं. पत्नी का बढ़ता मोटापा, उसे ओल्ड फैशन बोलकर उसका मज़ाक बनाना कहां तक उचित है? लोग नहीं समझते कि उनका बोला गया इस तरह के शब्द कैसे सामनेवाले पर गहरा प्रभाव डालता है.
जब भी आप लंबे समय बाद अपने किसी रिश्तेदार से मिलते हैं, तो वे कुछ-न-कुछ कमेंट्स पास ज़रूर करते हैं, जैसे- “अरे, कितनी मोटी हो गई तू! कुछ एक्सरसाइज़ किया कर…”
“तुम्हारा चेहरा कितना डल लग रहा है. क्या हुआ सब ठीक तो है? बहुत दुबले हो गए हो भाई. ज़रा घी-मक्खन खाया करो…” उनकी ऐसी बातों से मिलने का जो उत्साह होता है, ख़त्म हो जाता है. लगता है इनसे मिले ही क्यों? ना मिलते तो अच्छा होता.
किसी के कम-ज़्यादा वज़न पर जजमेंट पास करना दुनिया का सबसे आसान काम है. मज़ा आता है लोगों को दूसरों पर हंस कर. कोई रिश्तेदार या पड़ोसी जब हमें बिना मांगे सलाह देने लगते हैं कि हमें अपना वज़न थोड़ा कम करना चाहिए और इसके लिए हमें सुबह उठकर दौड़ लगानी चाहिए, खाने में तली-भूनी चीज़ों से परहेज़ करनी चाहिए. तो बड़ा ग़ुस्सा आता है. दोस्त जब ‘ये मोटी’ कहकर बुलाते हैं या हम जब अपने लिए ड्रेस का चुनाव करने लगते है और दुकानदार यह बोल देता हैं कि आपके नाप का कपड़ा यहां नहीं मिलेगा, तो हम अपने आप में ही लज्जित हो जाते हैं जैसे हमने कितना बड़ा गुनाह किया हो. बॉडी शेमिंग हर रोज़ की बातचीत में मस्ती-मज़ाक, चुटुकुला, निंदा का हिस्सा बन गया है.
सोशल मीडिया पर भी बॉडी शेमिंग के ऐसे कई मामले देखने को मिलते हैं. आलम यह है कि सिर्फ़ आम आदमी ही नहीं, बल्कि सेलिब्रिटी भी इससे बच नहीं पाए हैं. विद्या बालन, दीपिका पादुकोण, ऐश्वर्या राय, भूमि पेडनेकर, हुमा कुरैशी, शिल्पा शिंदे तक बॉडी शेमिंग का शिकार हुई हैं और सोशल मीडिया पर ट्रोल भी हो चुकी हैं. हालांकि इन लोगों ने इसका सामना किया और बोलनेवालों को करारा जवाब भी दिया, लेकिन फिर भी बोलनेवाले बाज नहीं आते हैं. जाने क्या मजा मिलता है इन्हें बॉडी शेमिंग करने में.
हर लड़की को अपनी ज़िंदगी में एक बार बॉडी शेमिंग का शिकार ज़रूर होना पड़ता है. और अगर बात सेलिब्रिटी की हो, तो चीज़ें और बिगड़ जाती है.

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एक इंटरव्यू के दौरान प्रियंका चोपड़ा ने क्रिटिसाइज़ किए जानेवाले सवाल पर अपने अनुभव शेयर किए. उन्होंने बताया कि बॉडी शेमिंग का शिकार हर कोई होता है. ख़ासकर फिल्म और मनोरंजन जगत में जहां हमेशा सभी पर बेहतर दिखने और शानदार लगने का दबाव बना रहता है. लोग ये कहकर प्रेशर डालते हैं कि पिछले महीने तो तुम्हें ये ड्रेस फिट हुआ था और अब नहीं हो रही ? सिर्फ़ एक्ट्रेस ही नहीं, बल्कि हर लड़की को एक ख़ास तरह से दिखना होता है, इसलिए वो भी इसका शिकार हुई हैं. लड़कियों को मैसेज देते हुए प्रियंका कहती हैं कि लड़कियों को अपनी ताकत पहचाननी चाहिए. लड़कियों को उन चीज़ों पर फोकस करनी चाहिए, जो उनके लिए अच्छी है. लोगों की बातों पर ध्यान न दें. उनका काम सिर्फ़ कहना है.

टीवी एक्ट्रेस वाहजिब का कहना है कि जब आप मोटे होते हैं तो लोग आपको कई तरह के नाम दे देते हैं. ऐसे निगेटिव नामों से आपका आत्मविश्वास कम होता है. कई बार ऐसा हुआ जब मैं ऐसे कमेंट्स सुनकर परेशान हो जाती थी और अपना आत्मविश्वास खो देती थी. लेकिन अब मैं अपने आप से ख़ुश हूं. रोज़ाना जिम जाती हूं.

अपनी छोटी सी उम्र से ही लंबी यात्रा तय करनेवाली एकता कपूर को भी बॉडी शेमिंग का शिकार होना पड़ा था. उनके वज़न और पहनावे को लेकर टीका-टिप्पणी हुई. लेकिन वे उन बातों की परवाह न कर अपने पथ पर आगे बढ़ती रही और समय आने पर अपनी प्रतिभा से सबको जवाब भी दे दिया. उनका कहना है कि एक स्त्री कैसी दिखती है या उसका पहनावा क्या है. इस पर ध्यान देने की बजाय आपको उसकी प्रतिभा पर ध्यान देना चाहिए.

परफेक्ट बॉडी किसी के पास नहीं होती, यह बात आपको स्वीकार करनी ही पड़ेगी और सबसे बड़ी बात कि सुंदरता कुछ दिनों की मेहमान होती है. तो ये किसी के जीवन को कैसे प्रभावित कर सकती है? यदि इसे गहराई से समझना है तो हमें चेन्नई की रूबी ब्यूटी से शिक्षा लेनी चाहिए. आज भले ही रूबी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं, मगर उनके जीवन में जो घटा और जिस तरह से उन्होंने लड़कर पूरी दुनिया में ख़ुद को साबित किया वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ तो है ही, लोगों के लिए एक प्रेरणा भी है.

कौन है रूबी ब्यूटी?
किसी ज़माने में अपने मोटापे के कारण अपने पति के आंखों की किरकिरी बनी, रूबी ब्यूटी आज देश की जानी-मानी बॉडी बिल्डर है. रूबी देश के लिए लगातार गोल्ड जीतनेवाली वह महिला है, जिसे उसके पति ने सिर्फ़ उसके मोटापे के चलते उसे छोड़ दिया था. अपना दुख बयां करते हुए उन्होंने बताया कि शादी के बाद उनका वज़न लगातार बढ़ता रहा और एक दिन उसके पति ने उसे साफ़ कह दिया कि उसके वज़न के कारण अब उसे रूबी में कोई रुचि नहीं रही. लेकिन 6 साल के बेटे की मां रूबी के लिए इस समस्या से निकलना आसान नहीं था. लेकिन रूबी ने हार नहीं मानी और अपना वज़न कम करने के लिए बॉडी बिल्डिंग का रास्ता चुना. आज हालत ये है कि समाज में बहुत-सी ऐसी लड़कियां हैं, जो रूबी की तरह ही बनना चाहती है.
आम तर्क है कि वज़न, लुक्स, स्ट्रेच मार्क्स आदि को लेकर टिप्पणी की जाए, तो लोग उस ओर ध्यान देने लगते हैं, लेकिन यह सरासर ग़लत है. एक स्टडी में भी साबित हो चुका है कि वज़न के इस पूर्वाग्रह से जुड़े तर्क वास्तव में ख़राब स्वास्थ्य की ओर ले जाता है. रिसर्च के मुताबिक़, वज़न आपके बायोलोजिकल, जेनिटिक, एंवायरलमेंटल और अन्य कारकों के एक कॉम्प्लेक्स सेट से निर्धारित होता है और यह केवल इस पर नहीं टिका होता है कि आपने कितना खाया और पीया है. केवल दुबले होने का मतलब होना ही हेल्दी रहने की गारंटी नहीं है और न ही फैट का मतलब ख़राब स्वास्थ्य से है.

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लोग अपने वज़न को लेकर शर्मिंदगी महसूस करते हैं, उनमें आत्मसम्मान की कमी आ जाती है. कोई-कोई तो अवसाद से घिर जाते हैं. इसके कारण उनमें कई तरह की बीमारियां पनपने लगती है. किसी के शरीर को लेकर मज़ाक बनना उसे अंदर तक आहत कर देता है. लेकिन मज़ाक उड़ानेवाले उस इंसान के बारे में नहीं सोचते कि उस के दिल पर क्या बीत रही है.
यह एक कड़वा सच है कि जिस तरह के समाज में हम रहते हैं वहां अगर आपकी बॉडी टाइप यानी शरीर की बनावट थोड़ी भिन्न है, तो लोग आपको अलग नज़र से देखने लगते हैं. हमें आकर्षक मैगजीन कवर, बॉलीवुड या टीवी सेलिब्रिटी के माध्यम से यह मानने के लिए बाध्य किया जाता है कि यही आदर्श शरीर यानी फिट और आइडियल बॉडी होती है. इतना ही नहीं सब इस बात को धीरे-धीरे स्वीकार भी कर लेते हैं और वैसी ही बिल्कुल फिट बॉडी पाने की ख़्वाहिश करने लगते हैं.

40 साल की रेणु का कहना है कि वह बचपन से ही मोटी रही हैं. अक्सर अपने मोटापे को लेकर वह शर्मिंदा होती रही. याद है, जब भी उसके घर कोई मेहमान आते थे वह अपने कमरे में बंद हो जाती थी. क्योंकि कहीं उसके मोटे शरीर को लेकर कोई कुछ बोल न दे. स्कूल में भी लगता उसके दोस्त उसके मोटे शरीर को लेकर ही बातें कर रहे होंगे. बहुत रोती वह, सोचती बस किसी तरह दुबली हो जाऊं. इसके लिए उसने खाना कम कर दिया. लेकिन एक दिन उसके पापा ने समझाया कि क्या फर्क़ पड़ता है जो तुम मोटी हो? मायने यह रखता है कि तुम स्वस्थ हो और अपने जीवन में आगे बढ़ रही हो. लोगों का क्या है वो तो कुछ भी बोलेंगे. और फिर जब तुम्हें कोई समस्या नहीं है अपने शरीर से, तो फिर लोगों की बातें मत सुनो. और फिर धीरे-धीरे रेणु में पाॅज़िटिविटी आने लगी. फिर क्या था, बोलनेवालों को वह ऐसा करारा जवाब देती कि फिर उनकी हिम्मत नहीं पड़ती कुछ बोलने की.
सालों पहले महिलाओं को 36-28-36 साइज़ को ही परफेक्ट बताया गया है. यही नहीं महिलाओं के मन में इस बात को गहरे से बिठा दिया गया है कि अगर ये साइज़ आपका नहीं है, तो आप कुरूप या कोई फूहड़ की श्रेणी में आती हैं. समय के साथ-साथ ख़ूबसूरती के इस लिस्ट में कई नए सिरे आ गए हैं, जैसे- बिकनी बॉडी, जांघों के बीच का अंतर और पतले होने के कई ऐसे ट्रेंड को हमारे आसपास ऐसे डाल दिया गया है जैसे कि यही लड़की की ज़िंदगी हों. लेकिन अब लोगों की सोच बदल रही है.
सोशल मीडिया पर अब महिलाएं अपने निकले हुए पेट को दिखाने में हिचक महसूस नहीं कर रही हैं. ऐसा तब करता है इंसान जब उसमें आत्मविश्वास भर जाता है. पॉज़िटिव सोच होने लगती है.

क्या है बॉडी पाॅज़िटिविटी?
बॉडी पाॅज़िटिविटी यानी की सकारात्मक, जैसे कि नाम से ही ज़ाहिर है. अपने शरीर को पूरी पाॅज़िटिविटी के साथ स्वीकार करना ही बॉडी पाॅज़िटिविटी है. फिर चाहे वो हमारा शरीर हो या फिर किसी और का. सभी बेहद ख़ूबसूरत हैं. इस सोच से कोसों दूर कि सिर्फ़ सेलिब्रिटी का बॉडी शेप ही परफेक्ट होता है, बल्कि हर तरह का बॉडी टाइप तारीफ़ें क़ाबिल है. मायने यह रखता है कि आप आत्मविश्वासी और स्वस्थ हैं, न की आपकी बॉडी टाइप या फिर बॉडी शेप कैसा है. हमारे लिए यह समझना बहुत ज़रूरी है कि हम अपने आप से और अपने बॉडी से कितना प्यार करते हैं. फिर चाहे वह कैसा भी क्यों न हो. लोगों की बातों, उनके कमेंट्स, उनकी टोका-टाकी का हमारे ऊपर कोई निगेटिव असर नहीं होना चाहिए.
शरीर की बनावट को लेकर कमेंट्स सिर्फ़ लड़कियों को नहीं सुननी पड़ती है, बल्कि लड़के भी इसमें शामिल हैं. उन्हें भी अपने बॉडी शेप को लेकर लोगों के कमेट्स सुनने पड़ते हैं. जैसे कि मटके जैसा पेट निकला होना, मोटा होना आदि. हर जेंडर के लोगों को बॉडी पाॅज़िटिव होना बेहद ज़रूरी है, इसीलिए बॉडी पाॅज़िटिव किसी एक जेंडर तक सीमित नहीं है.
इंदौर की काउंसलिंग साइकोलाॅजिस्ट नेहा मूलचंदानी बताती हैं कि कई बार आपको नहीं पता होता है कि आप ख़ुद बॉडी शेमिंग का शिकार हो गई हैं.

कैसे पहचानें की आप बॉडी शेमिंग का शिकार हो रही हैं?
• अगर आप लोंगो के सामने जाने से कतराती हैं. आपको लगता है लोग आपके वज़न को लेकर कुछ-न-कुछ बोल देंगे, इसलिए आप लोगों का सामना नहीं करना चाहती है, तो यह है बॉडी शेमिंग.
• जब अपनी तुलना दूसरों के शरीर से करने लगती हैं यानी की दूसरों के कमर और कंधों को देखकर यह सोचने लगती हैं कि आपके इतने मोटे क्यों हैं? उनके जैसा क्यों नहीं है? तो ये हैं बॉडी शेमिंग.
• आपको अपनी सहेली के बॉयफ्रेंड को देखकर जलन की भावना पैदा होती है. आपको लगता है कि आपके बेडौल शरीर के कारण ही आज तक आप सिंगल हैं और भविष्य में भी आपको कोई बॉयफ्रेंड नहीं मिलने वाला तो ये है बॉडी शेमिंग.
• दूसरी लड़कियों के ड्रेस फिटिंग और आकर्षित कर देनेवाली ड्रेस को देखकर अगर आपको लगता है कि आप ऐसी ड्रेस नहीं पहन सकती, क्योंकि आप मोटी हैं तो ये है बॉडी शेमिंग.

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बॉडी शेमिंग से कैसे बचें?
• अपनी तारीफ़ ख़ुद करने की आदत डालिए. आपकी तारीफ़ आपके घरवाले, दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी भले ही न करें, पर आप ख़ुद अपने गुणों की बखान ज़रूर करें. ख़ुद से प्यार करना सीखिए.
• लोग कह रहे हैं, इसलिए मुझे अपना वज़न कम करना चाहिए, ग़लत है. आप ख़ुद क्या चाहती हैं इस पर गौर करिए.
• वो कहते हैं न हाथी चले बाज़ार कुत्ता भूंके हज़ार… इसलिए आपकी फिटनेस को लेकर लोगों की कमेंट्स पर बिल्कुल भी ध्यान मत दीजिए, क्योंकि आपके गुण एक दिन लोगों के मुंह अवश्य ही बंद कर देंगे.
• कभी भी अपनी तुलना किसी और से मत करिए, क्योंकि गुण-अवगुण दुनिया के हर एक इंसान में मौजूद होती है और आपके अंदर जो कमी है उसे आप बहुत जल्द ही दूर कर लेगी यह विश्‍वास रखें.
• एक लक्ष्य बनाइए कि आप इतने दिनों में अपना वज़न कम कर लेंगी, लेकिन जो भी लक्ष्य बनाएं उस पर गंभीरता से अमल करें.
• दूसरों से प्यार करना सीखें. जब हम चारों ओर नफ़रत और निगेटिविटी फैलाते हैं, तो इसे अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं. लेकिन जब हम ख़ुद में सुंदरता देखना शुरू कर देते हैं, तो हम ऐसे अपने आसपास भी देखना शुरू कर सकते हैं. इसलिए बॉडी पाॅज़िटिविटी के साथ ख़ुद से प्यार करना सीखिए. दुनिया अपने आप ख़ूबसूरत लगने लगेगी. याद रखिए, जब तक आप अपने आपसे प्यार करना नहीं सीखेंगे, दूसरे भी आपको प्यार की नज़र से नहीं देखेंगे.
• हमारे समाज में लड़कियों को कैसा दिखना चाहिए, उसके शरीर का बनावट कैसा होना चाहिए, उसे किस तरह से बात करनी चाहिए संबंधित कई ग़लत धारणाएं हैं. ख़ासतौर पर जब आप फिल्म लाइन में होते हैं, तो लोग आपको ज़्यादा ही जज करने लगते हैं. आपके एक-एक चीज़ पर लोगों की नज़र टिकी होती है और आप बॉडी शेमिंग का शिकार हो जाते हैं. वक़्त के साथ हरेक इंसान के शरीर में कई उतार-चढ़ाव आते ही हैं और लोगों को इस बात से कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए.

– मिनी सिंह

Body Shaming

Benefits Of Cooking

कुकिंग थेरेपी: हेल्दी रहने का बेस्ट फॉर्मूला (Cooking Therapy: Benefits Of Cooking)

खाना बनाना और उसे दूसरों को खिलाना कई लोगों के शौक में शुमार होता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि खाना बनाने का यह शौक आपको हेल्दी भी रखता है, इसीलिए इसे कुकिंग थेरेपी का नाम दिया गया है. साइंटिस्ट्स अब यह दावे के साथ कहते हैं कि कुकिंग दरअसल एक थेरेपी है, जो आपको हेल्दी रखती है और आपके रिश्तों को भी बेहतर बनाती है.

साइंस के अनुसार कुकिंग दरअसल मेडिटेशन सेशन की तरह है: क्या कभी आपने इस ओर ध्यान दिया है कि स्ट्रेस से भरा दिन और आपकी थकान घर पर आने के बाद कुछ अच्छा पकाने की सोच मात्र से ही कम हो जाती है. बहुत बार ऐसा होता है कि आप कुछ स्वादिष्ट या अपना मनपसंद खाना बनाने की तैयारी करने की सोचते हैं और उसे बनाने के बाद जो संतुष्टि आपको मिलती है, उससे आपके दिनभर की थकान व तनाव दूर होता है. आप भले ही नियमित रूप से खाना न भी बनाते हों, लेकिन यदि आप ऐसा करते हैं, तो पाएंगे कि कुकिंग सेशन एक तरह से आपके लिए मेडिटेशन का काम करता है.

थेरेपिस्ट कुकिंग को मानसिक समस्याओं के इलाज के लिए प्रयोग में लाते हैं: डिप्रेशन, घबराहट, तनाव आदि के इलाज में अब बहुत-से सायकोलॉजिस्ट व थेरेपिस्ट कुकिंग कोर्सेस को थेरेपी की तरह यूज़ करने लगे हैं, क्योंकि जो व़क्त आप कुकिंग में लगाते हो, उससे आपका ध्यान नकारात्मक स्थितियों व बातों से हट जाता है और आप रिलैक्स महसूस करते हैं.

क्रिएटिव बनाती है आपको कुकिंग: एक्सपर्ट्स ने अपने शोधों में यह भी पाया है कि कुकिंग आपको क्रिएटिव बनाती है, क्योंकि आप अपने अनुसार रेसिपी को बनाने के नए-नए तरी़के सोचते हो, नया स्वाद क्रिएट करने की कोशिश करते हो, जिससे आपकी भी क्रिएटिविटी बढ़ती है. दूसरे, कुकिंग आपको पूरे माहौल में कंट्रोल का अनुभव महसूस कराती है. आपको लगता है कि अब आप अपने अनुसार स्वाद में बदलाव ला सकते हो और जब आपको तारी़फें मिलती हैं, तो आप पॉज़िटिव महसूस करते हो.

कुकिंग और मेंटल हेल्थ का सबसे बड़ा कनेक्शन है न्यूट्रिशन: जब आप कुकिंग करते हो, तो आप अपने पोषण, डायट व हेल्थ के प्रति अपने आप ही सचेत हो जाते हो. आपके हाथ में होता है कि कितना ऑयल डालना है, कितना नमक, कितने मसाले और आपका ब्रेन यही सोचने लगता है कि किस तरह से अपनी डिश को आप और हेल्दी बना सकते हो. इससे आपको संतुष्टि महसूस होती है कि आपका खाना हेल्दी है, क्योंकि आप अपने खाने की क्वालिटी को कंट्रोल करते हो.

कुकिंग जो ख़ुशी देती है, वो घर के अन्य काम नहीं देते: एक्सपर्ट्स कहते हैं कि भले ही आप कुकिंग का शौक न रखते हों, लेकिन आप जब कुकिंग करते हैं, तो यह फ़र्क़ ज़रूर महसूस करते हैं कि खाना बनाने से जो ख़ुशी व संतुष्टि का अनुभव होता है, वह बिस्तर ठीक करने, कपड़े धोने या अन्य कामों से नहीं होता. इसके पीछे की वजह यह है कि कुकिंग अपने आप में रिवॉर्डिंग एक्सपीरियंस होता है, क्योंकि कहीं-न-कहीं सबकॉन्शियस माइंड में भी यह बात रहती है कि खाना बनाने के बाद आपको इसका स्वाद भी मिलेगा. खाना बनाने के दौरान जो ख़ुशबू आती है, उसे बनता देखने का जो अनुभव होता है और यहां तक कि फल व सब्ज़ियों को काटने-छीलने के दौरान उनके रंग व आकार हमें आकर्षित करते हैं, वो मस्तिष्क में पॉज़िटिव वाइब्रेशन्स पैदा करते हैं.

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पार्टनर के साथ कुकिंग आपके रिश्ते को भी बेहतर बनाती है: जब आप साथ में खाना बनाते हो या फिर घर के कोई भी सदस्य मिल-जुलकर खाना बनाने में हाथ बंटाते हैं, तो अपने आप उनके मतभेद कम होने लगते हैं. वो नकारात्मक बातों को एक तरफ़ रखकर खाना बेहतर बनाने व उसे परोसने की तरफ़ ध्यान देने लगते हैं. ऐसे में यदि आप अपने पार्टनर के साथ किचन में काम करेंगे, तो आपके रिश्ते भी बेहतर बनेंगे. आप एक-दूसरे के साथ अधिक समय बिता पाओगे, जिससे कम्यूनिकेशन बेहतर होगा. यदि खाने में आप दोनों की पसंद-नापसंद एक नहीं है, तब भी आपके विवाद को कम करने में कुकिंग एक थेरेपी की तरह काम करेगी, क्योंकि वहां आप एक-दूसरे के बारे में सोचोगे कि चलो आज तुम्हारी पसंद का खाना बनाते हैं या फिर आज तुम्हारी फेवरेट डिश तैयार करते हैं, पर कल तुम मेरी फेवरेट डिश बनाने में मेरी मदद करोगे… आदि.

कुकिंग से बढ़ते व बेहतर होते हैं आपके कनेक्शन्स: आपके जन्मदिन पर आपके पड़ोस में रहनेवाली दोस्त आपके लिए गिफ्ट लाती है और दूसरी ओर आपकी सास आपके लिए अपने हाथों से आपका मनपसंद खाना बनाती है, तो ज़ाहिर है आपके मन को सास का खाना बनाना ज़्यादा छुएगा, क्योंकि उन्होंने आपके बारे में सोचा और ख़ुद मेहनत करके आपके लिए खाना तैयार किया. इसी तरह आप देखेंगी कि अपनी बेस्ट फ्रेंड को यदि आप अपने हाथों से कुछ बनाकर देती हैं, तो उसकी ख़ुशी दोगुनी हो जाती है. इस तरह से कुकिंग आपके कनेक्शन्स को बेहतर बनाती है. इसलिए कुक करें और कनेक्टेड रहें.

मस्तिष्क को शांत करती है कुकिंग: साइंटिस्ट्स कहते हैं कि कुकिंग के समय आपको कभी भी अकेलापन महसूस नहीं होगा. उस व़क्त आपकी चिंताएं दूर हो जाती हैं और आपका मस्तिष्क शांति का अनुभव करता है, क्योंकि आपका पूरा ध्यान अपने टास्क पर लग जाता है, जिससे कई तरह की चिंताएं व दबाव की तरफ़ ध्यान नहीं जाता और आप बेहतर महसूस करते हैं. यही नहीं कुकिंग की प्रैक्टिस आपके शरीर को भी रिलैक्स करती है. कुकिंग के समय आप फ्लो में आ जाते हो, जिससे व्यर्थ के डर, चिंताओं व तनाव से उपजा दर्द, शरीर की ऐंठन व थकान भी दूर हो जाती है.

दूसरों के लिए कुछ करने का अनुभव बेहतर महसूस कराता है: ज़ाहिर-सी बात है कि आप खाना अपने लिए नहीं बनाते, बल्कि पूरे परिवार के लिए बनाते हैं. ऐसे में उनकी पसंद-नापसंद को ध्यान में रखकर उनके लिए कुछ अच्छा करने का अनुभव आपको कुकिंग से मिलता है. कुकिंग के ज़रिए आप अपनी भावनाएं व केयर भी सामनेवाले को ज़ाहिर कर सकते हैं. यह एक तरह से मूक प्रदर्शन है प्यार व देखभाल का.

भावनाओं का प्रभाव भी होता है कुकिंग में: आप जिस भाव से खाना बनाते हैं, उसका असर आपके खाने में नज़र आता है. लेकिन खाना बनाते समय हर कोई यही चाहता है कि उसके खाने को तारीफ़ ज़रूर मिले, इसलिए जब आप बच्चों के लिए कुछ ख़ास बनाते हो, तो उनके स्वाद व पोषण का ध्यान रखते हो, लेकिन जब आप बुज़ुर्गों के लिए कुछ बनाते हो, तो स्वाद के अलावा उनकी उम्र व सेहत का भी ख़्याल रखते हो. उन्हें क्या नहीं खाना चाहिए, इस तरफ़ भी आपका पूरा ध्यान रहता है.

कुकिंग से आप पैसे भी बचाते हो: होटल या बाहर से कुछ अनहेल्दी मंगाकर खाना आपको वो संतुष्टि नहीं देगा, जो अपने हाथों से कुछ हेल्दी बनाकर खाना देता है और इसके साथ ही आप अपने पैसे भी बचाते हो. हेल्थ और वेल्थ साथ-साथ सेव होने का एहसास आपके रिश्तों को भी बेहतर बनाता है और आपकी सेहत को भी.

– गीता शर्मा

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Psychology Of Relationships

रिश्तों का मनोविज्ञान (The Psychology Of Relationships)

मेरी बेटी की उम्र 28 साल है. वो नौकरी करती है. पिछले कुछ समय से उसकी शादी की बात चल रही है. कई रिश्ते भी आए, पर उसे कोई पसंद ही नहीं आता. पता नहीं उसके मन में क्या चल रहा है. उससे पूछती हूं, तो कहती है कि सही समय पर, सही लड़का मिल जाएगा, तब कर लूंगी शादी. जल्दबाज़ी में ग़लत निर्णय नहीं लेना चाहती. लेकिन लोग बातें करते हैं, जिससे मैं बहुत परेशान रहती हूं.

– शिल्पा शुक्ला, उत्तर प्रदेश.

आज की जनरेशन शादी देर से ही करती है. उनकी प्राथमिकताएं अब बदल गई हैं. एक तरह से शादी की उम्र क़रीब 30 साल हो गई है. बच्चे पढ़-लिखकर कुछ बनकर ही शादी करने की सोचते हैं. अपनी बेटी का साथ दीजिए और धीरज रखिए. सही समय पर सब ठीक होगा. लोग क्या कहते हैं, उस पर ज़्यादा ध्यान न दें. यह आपकी बेटी की ज़िंदगी का सवाल है. अपनी बेटी पर भरोसा रखें. वो सही समय आने पर सही निर्णय ले लेगी. उसके कारण ज़्यादा परेशान होकर अपनी सेहत और घर का माहौल ख़राब न करें.

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मेरे पिताजी ने वॉलंटरी रिटायरमेंट ले लिया है. अब वे सारा दिन घर पर रहते हैं, लेकिन वो बहुत चिड़चिड़े से हो गए हैं. बात-बात पर बहस और ग़ुस्सा करते हैं. ज़िद्दी हो गए हैं, जिससे घर का माहौल ख़राब रहने लगा है. समझ में नहीं आता कि उन्हें कैसे हैंडल करें, क्योंकि वो बड़े हैं, तो उन्हें कुछ कह भी नहीं सकते.

– राकेश सिन्हा, पटना.

आप उनके मन की स्थिति समझने की कोशिश करें. हो सकता है, उन्हें भी दिनभर घर पर बैठे रहना अच्छा न लगता हो या यह भी हो सकता है कि उन्हें कोई और परेशानी हो, जो वे आप लोगों से कह न पा रहे हों. थोड़ा धीरज से काम लें. उनका विश्‍वास जीतें. उनसे प्यार से पेश आएं. उन्हें
सुबह-शाम वॉक पर ले जाएं. सोशल एक्टिविटीज़, योगा इत्यादि के लिए प्रोत्साहित करें. उन्हें घर के काम की भी ज़िम्मेदारी दें. घर के महत्वपूर्ण निर्णयों में उन्हें शामिल करें. उनकी राय को महत्व दें. उन्हें महसूस न होने दें कि अब वो काम पर नहीं जाते या कुछ करते नहीं हैं. आप सब का प्यार, सम्मान और सहानुभूति उन्हें शांत रहकर कुछ और करने के लिए प्रोत्साहित करेगी.

मेरी बेटी की उम्र 14 साल है. स्कूल जाती है. आजकल उसका स्वभाव कुछ अलग-सा हो गया है. हर समय मोबाइल पर लगी रहती है. कोई बात सुनती नहीं है. पैरेंट्स तो जैसे उसके दुश्मन हैं. डर लगता है, कहीं कोई ग़लत राह न पकड़ ले.
– कोमल सिंह, पानीपत.

इस उम्र में बच्चों का यह व्यवहार स्वाभाविक है. उन्हें परिजनों से ज़्यादा उनके दोस्त अच्छे लगते हैं. उन्हें लगता है पैरेंट्स की सोच पुरानी व दकियानूसी है. बच्चों की ख़ुशी का उन्हें ख़्याल नहीं है… आदि. बेहतर होगा आप भी उनके साथ दोस्तों की तरह पेश आएं. उनके साथ समय बिताएं, उनकी एक्टिविटीज़ में सकारात्मक तौर पर शामिल हों. हंसी-मज़ाक करें. हर बात पर टोकना या लेक्चर देना उन्हें पसंद नहीं आएगा. उनका विश्‍वास जीतें. लेकिन साथ ही उन पर नज़र भी रखें, उनके फ्रेंड सर्कल की जानकारी रखें, पर उन्हें कंट्रोल करने की कोशिश न करें. घर का हल्का-फुल्का दोस्ताना माहौल उन्हें घर से और आपसे बांधे रखेगा.

Zeenat Jahan

ज़ीनत जहान
एडवांस लाइफ कोच व
सायकोलॉजिकल काउंसलर

[email protected]

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Tips For Managing Depression
डिप्रेशन को ऐसे करें मैनेज (Self Help: Tips For Managing Depression)

डिप्रेशन ऐसी नकारात्मक भावना, जहां आपकी सारी ऊर्जा लगभग ख़त्म हो जाती है, उम्मीदें, आशाएं, ख़ुशियां… सब कुछ धूमिल-सी नज़र आती हैं. ज़िंदगी बेकार लगने लगती है… ऐसा महसूस होता है जैसे इन परिस्थितियों से निकलना अब नामुमकिन है, ज़िंदा रहना मुश्किल लगने लगता है. ऐसे में बहुत ज़रूरी हो जाता है कि आप ख़ुद कुछ प्रयास करें, ताकि अपने इस डिप्रेशन को मैनेज कर सकें और पॉज़िटिव सोच अपना सकें.

बाहर जाएं, कनेक्टेड रहें: यह सच है कि डिप्रेशन के दौरान बाहर जाना और लोगों से मिलना-जुलना बेहद मुश्किल काम है, क्योंकि आपमें वो ऊर्जा नहीं रहती, लेकिन थोड़ा-सा प्रयास आपकी मदद कर सकता है. सोशल गैदरिंग्स में जाएं, दोस्तों से मिलें, रिश्तेदारों से कनेक्टेड रहें. अकेलापन आपकी तकलीफ़ और बढ़ाएगा. बेहतर होगा, नए दोस्त बनाएं और पुरानों से मिलना-जुलना शुरू करें. आपके क़रीबी हमेशा आपकी मदद करने को तत्पर रहेंगे, इसलिए अपनी तकलीफ़ उनसे शेयर करें, इससे आपका मूड बदलेगा और मन हल्का होगा.

किस तरह से कनेक्ट करें?

  • जिनके साथ आप सुरक्षित महसूस करते हों और जिन पर विश्‍वास करते हों, उनसे मिलें.
  • मिलने का अर्थ है आमने-सामने मिलना. यह सही है कि सोशल नेटवर्किंग और फोन कॉल्स से भी कनेक्ट किया जा सकता है, लेकिन फ़ायदा अधिक तभी होगा, जब फेस टु फेस मिलेंगे.
  • दूसरों की सहायता करने का मन बनाएं. दूसरों के लिए कुछ करेंगे, तो आपको कहीं न कहीं संतुष्टि महसूस होगी. मदद चाहे छोटी ही क्यों न हो, किसी के काम आने की भावना आपको पॉज़िटिव बनाएगी.
  • पेट्स रखें और उसके साथ समय बिताएं. यह काफ़ी कारगर तरीक़ा है डिप्रेशन से निपटने का. जानवरों से प्यार करते हैं, तो उनकी केयर करें, इससे आप बेहतर महसूस करेंगे.
  • एक्सरसाइज़, वर्कआउट, योग व मेडिटेशन करें. यह काफ़ी अच्छा उपाय है. इससे आप ऊर्जा व नई शक्ति महसूस करेंगे. मेडिटेशन व योग से मन शांत होगा और नकारात्मक भाव बाहर निकलेंगे.
  • एक्सपर्ट की मदद लें. हिचकिचाएं नहीं. आप सच में अच्छा महसूस करेंगे. ज़िंदगी को देखने का नज़रिया बदलेगा और डिप्रेशन से बाहर आने में मदद मिलेगी.

कनेक्शन के बेस्ट टिप्स

  • किसी क़रीबी या भरोसेमंद से अपनी तकलीफ़ व दुख का कारण शेयर करें.
  • किसी दोस्त के साथ कॉफी या टी डेट पर जाएं.
  • मूवी या डिनर प्लान करें.
  • किसी पुराने दोस्त को कॉल करें.
  • कोई हॉबी क्लास जॉइन कर लें.

अच्छा महसूस करानेवाली गतिविधियां करें: जिन बातों से, जिन गतिविधियों से आप रिलैक्स्ड और ऊर्जावान महसूस करते हों, उन पर ध्यान दें. हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं. शेड्यूल बनाएं और दिनभर में फन एक्टिविटीज़ के लिए टाइम फिक्स करें.

कैसे करें?

  • जो चीज़ें आपको पहले मज़ेदार लगती थीं, उन्हें फिर करना शुरू करें.
  • यह सच है कि आपका मन नहीं करेगा, ये तमाम चीज़ें करने का, लेकिन ख़ुद को फोर्स करें, क्योंकि एक बार आप इस तरह की फन एक्टिविटीज़ में ख़ुद को व्यस्त कर लेंगे, तो आपको विश्‍वास ही नहीं होगा कि कितना बेहतर महसूस करेंगे.
  • हो सकता है कि एक बार में आप डिप्रेशन से बहुत ज़्यादा बाहर न आ पाएं, लेकिन धीरे-धीरे आप ख़ुद को अधिक सकारात्मक व ऊर्जावान महसूस करने लगेंगे.
  • आप कोई स्पोर्ट्स एक्टिविटी या स्विमिंग, डांस व साइकिलिंग जैसे शौक अपना सकते हैं.

अपनी हेल्थ को ज़रूर सपोर्ट करें

  • डिप्रेशन सबसे पहले आपकी नींद पर असर डालता है. या तो आप बहुत कम या बहुत अधिक सोने लगते हैं. अच्छी नींद लेने की कोशिश करें. हेल्दी स्लीप टेक्नीक्स के बारे में जानें और नींद पूरी लें. इससे आपको रेस्ट मिलेगा और आप फ्रेश फील करेंगे.
  • स्ट्रेस को बढ़ने न दें, क्योंकि स्ट्रेस से डिप्रेशन और बढ़ सकता है. उन तमाम तत्वों पर ध्यान दें, जो स्ट्रेस बढ़ाते हैं, जैसे- काम का प्रेशर, आर्थिक समस्या, ख़राब रिलेशनशिप… बेहतर होगा इन सबसे निपटने के तरीक़ों पर ध्यान दें. एक्सपर्ट की सहायता भी ले सकते हैं.
  • रिलैक्सेशन तकनीकों को अपनाएं. ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ करें, ध्यान करें, म्यूज़िक सुनें, मसल रिलैक्सेशन तकनीक सीखें.

वेलनेस टूलबॉक्स

  • अपने बारे में सकारात्मक बातें लिखें.
  • लिस्ट बना लें कि आपको अपनी कौन-सी बातें और आदतें सबसे ज़्यादा पसंद हैं.
  • कोई फनी मूवी या टीवी सीरीज़ देखें.
  • म्यूज़िक सुनें.
  • नेचर में समय बिताएं. समंदर के किनारे या किसी पार्क में सुबह-शाम जाएं.
  • हॉट बाथ लें. जल्दबाज़ी न करके आराम से गर्म पानी से नहाएं, इससे शरीर हल्का लगेगा.
  • ख़ुद को किसी न किसी काम में बिज़ी रखें. हेल्दी डायट लें. मनपसंद डिश बनाएं.

एक्टिव रहने की कोशिश करें: एक्सरसाइज़ डिप्रेशन से लड़ने का सबसे बेहतर तरीक़ा है. शोध कहते हैं कि एक्सरसाइज़ डिप्रेशन से लड़ने में उतनी ही कारगर है, जितनी दवा. इसके अलावा एक्सरसाइज़ से डिप्रेशन के दोबारा होने की संभावना भी कम हो जाती है.

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एक्सरसाइज़ से मूड को बूस्ट कैसे करें?

  • यह सच है कि डिप्रेशन के चलते एक्सरसाइज़ का मन बनाना बेहद मुश्किल है, लेकिन एक बार आप इच्छाशक्ति दिखा देंगे, तो यह बेहद फ़ायदा पहुंचाएगी.
  • रिसर्च बताते हैं कि डिप्रेशन से जूझ रहे व्यक्ति को एक्सरसाइज़ से ऊर्जा मिलती है और हताशा कम होती है.
  • रिदमवाली एक्सरसाइज़ अधिक फ़ायदेमंद होती है, जैसे- वॉकिंग, वेट ट्रेनिंग, स्विमिंग या डान्सिंग.
  • किसी क्लब के मेंबर बनकर अन्य लोगों के साथ एक्सरसाइज़ करना और बेहतर परिणाम देगा.
  • घर में अगर पेट्स हैं, तो उनके साथ ईवनिंग वॉक पर जाएं.

हेल्दी खाएं, डिप्रेशन से लड़नेवाली डायट फॉलो करें: जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन… ये कहावत यूं ही नहीं बनी है. हम जो खाते हैं, उसका सीधा असर हमारे शरीर व मन पर पड़ता है. फैटी, ऑयली, कैफीन या अल्कोहल जैसी चीज़ों का सेवन कम करें, क्योंकि ये आपके हार्मोंस पर असर करते हैं और मूड पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं.

कैसी हो आपकी डायट?

  • शुगर और रिफाइंड कार्ब्स का सेवन कम कर दें. फ्रेंच फ्राइज़, पास्ता, एरिएटेड ड्रिंक्स कुछ समय के लिए ही बेहतर महसूस करवाते हैं. आगे चलकर ये आपके मूड को प्रभावित कर सकते हैं.
  • दिन में 3-4 बार थोड़ा-थोड़ा खाएं. खाने में बहुत ज़्यादा अंतर रखेंगे, तो चिड़चिड़ापन बढ़ेगा.
  • विटामिन बी ज़रूर लें, क्योंकि फॉलिक एसिड और विटामिन बी 12 की कमी से डिप्रेशन बढ़ता है. हरी पत्तेदार सब्ज़ियां, अंडा, बींस, सिट्रस फ्रूट्स अधिक लें.
  • ओमेगा 3 फैटी एसिडयुक्त भोजन लें. मूड को संतुलित रखने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. फैटी फिश और ठंडे पानी की मछलियों के तेल का सेवन करें.

ज़रूरी है सनलाइट का डेली डोज़: सनलाइट सेरोटोनिन हार्मोंस के स्तर को बढ़ाकर मूड बेहतर करने में मददगार है. जब भी मौक़ा मिले, रोज़ाना 15 मिनट की धूप ज़रूर लें.

कब और कैसे लें यह डेली डोज़?

  • आप लंच टाइम में बाहर जा सकते हैं, कुछ देर टहलें.
  • आसपास कोई गार्डन वगैरह हो, तो वहां जा सकते हैं.
  • अपने घर पर और वर्कप्लेस में जितना संभव हो, नेचुरल लाइट में रहने की कोशिश करें.
  • छुट्टी के दिन सुबह-सुबह की धूप लेने के लिए छत का इस्तेमाल कर सकते हैं या फिर रोज़ाना वॉक के लिए भी जा सकते हैं.

विंटर ब्लूज़ से कैसे निपटें?

  • सर्दियों के मौसम में सनलाइट वैसे भी कम होती है और इस मौसम में डिप्रेशन अधिक महसूस होता है, जिसे सीज़नल इफेक्टिव डिसऑर्डर कहते हैं. लेकिन यदि आप प्रयास करें, तो सालभर आपका मूड बेहतर बना रह सकता है.

नकारात्मक सोच को चुनौती दें: ज़िंदगी से ऊब महसूस होना, कमज़ोरी-थकान लगना, निराशा महसूस होना… इस तरह के नकारात्मक भाव डिप्रेशन के चलते आते हैं. आपको यह बात मन में बैठा लेनी होगी कि ये तमाम नकारात्मक विचार असल में हैं ही नहीं. आपको अपने माइंड को पॉज़िटिव सोचने के लिए प्रशिक्षित करना होगा. हालांकि यह मुश्किल है, लेकिन लगातार प्रयास से यह संभव हो सकता है.

इस तरह के विचारों से रहें दूर

बहुत कुछ या कुछ भी नहीं सोचना: ब्लैक एंड व्हाइट में चीज़ों को न देखें. ये सही है और ये ग़लत… ऐसा नहीं होता. बीच का रास्ता भी होता है.

बुरे अनुभव को मन में बैठा लेना: एक जगह अगर असफलता हाथ लगी हो, तो इसका यह मतलब नहीं कि हर बार और हर जगह ही असफलता मिलेगी. अपने बुरे अनुभवों को मन में बैठा न लें.

पॉज़िटिव बातों को भूलकर स़िर्फ निगेटिव ही याद रखना: आपके साथ बहुत कुछ अच्छा होता है, लेकिन आप उसे अधिक समय तक याद नहीं रखते, लेकिन कोई एक बात ग़लत हो, तो उसे बार-बार याद करते हैं. इस सोच से बाहर निकलें. अच्छा-बुरा सभी के साथ होता है और दोनों को ही समान रूप से लें और जब मन निराश हो, तो पॉज़िटिव बातों को याद करें.

पॉज़िटिव बातों को कम आंकना: कुछ अच्छा हो, तो उसके बारे में भी यह सोचना कि ये तो सामान्य-सी बात है, इसमें कुछ ख़ास क्या है… इस तरह के विचारों से दूर रहें और हर छोटी-छोटी बात में ख़ुशियां ढूंढ़ें.

फ़ौरन निष्कर्ष पर पहुंच जाना: प्रयास करने से पहले ही यह सोच लेना कि परिणाम ग़लत ही होगा या हमें असफलता ही मिलेगी… ग़लत व नकारात्मक पहलू है. इससे दूर रहें.

अपने बारे में इमोशनली निगेटिव सोचना: ‘मैं ज़िंदगी में कुछ नहीं कर सकता’ या ‘मेरे साथ कभी भी कुछ अच्छा नहीं हो सकता’… इस तरह की बातों से अपने बारे में निगेटिविटी न बढ़ाएं. हम जो सोचते हैं हम वही बन जाते हैं, इसलिए अपनी सोच को पॉज़िटिव बनाएं.

बहुत अधिक नियमों में ख़ुद को बांध लेना: अपने लिए बहुत स्ट्रिक्ट रूल्स बना लेना, जिससे आप ज़िंदगी जीना ही भूल जाएं, आपको नकारात्मकता की ओर ले जाएंगे. फ्लेक्सिबल बनें.

कब लें एक्सपर्ट एडवाइस?

जब तमाम सेल्फ हेल्प टेक्नीक्स के बाद भी आपको लग रहा हो कि आपका डिप्रेशन ठीक नहीं हो रहा, तब आपको एक्सपर्ट के पास जाने से हिचकिचाना नहीं चाहिए. आपको अपनी मदद ख़ुद ही करनी होगी. ये न सोचें कि एक्सपर्ट के पास जाना किसी कमज़ोरी की निशानी है. अगर शरीर में तकलीफ़ हो, तो आप डॉक्टर के पास जाते ही हैं, तो मन की तकलीफ़ के लिए क्यों नहीं जाना चाहते?

हां, एक बात का ध्यान रहे कि प्रोफेशनल हेल्प के बाद भी ये सेल्फ हेल्प टेक्नीक्स फॉलो करते रहें और यह बात भी मन में बैठा लें कि डिप्रेशन ठीक हो सकता है और आप इससे निकलकर बेहतर व हैप्पी लाइफ जी सकते हैं.

– गीता शर्मा

यह भी पढ़ें: निर्णय लेने से क्यों डरते हैं आप? क्या हैं डिसाइडोफोबिया के शिकार? (Do You Suffer From Decidophobia)

Decidophobia

निर्णय लेने से क्यों डरते हैं आप? क्या हैं डिसाइडोफोबिया के शिकार? (Do You Suffer From Decidophobia)

जैसा कि नाम से थोड़ा-बहुत स्पष्ट होता है कि यह फोबिया यानी एक प्रकार का डर है. डिसाइडोफोबिया (Decidophobia) का मतलब है डिसीज़न यानी निर्णय लेने का भय. हम अपने आसपास भी देखते हैं कि बहुत-से लोग निर्णय लेने से घबराते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है. यह डर बहुत-सी बातों को लेकर हो सकता है कि उनका निर्णय कहीं ग़लत न निकल जाए, इस निर्णय से कहीं उन्हें कुछ नुक़सान न हो जाए, कहीं अपने ही लोग उनके बारे में कोई धारणा न बना लें… आदि.जैसा कि नाम से थोड़ा-बहुत स्पष्ट होता है कि यह फोबिया यानी एक प्रकार का डर है. डिसाइडोफोबिया का मतलब है डिसीज़न यानी निर्णय लेने का भय. हम अपने आसपास भी देखते हैं कि बहुत-से लोग निर्णय लेने से घबराते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है. यह डर बहुत-सी बातों को लेकर हो सकता है कि उनका निर्णय कहीं ग़लत न निकल जाए, इस निर्णय से कहीं उन्हें कुछ नुक़सान न हो जाए, कहीं अपने ही लोग उनके बारे में कोई धारणा न बना लें… आदि.

कारण

इस तरह के भय के कई कारण होते हैं, जैसे बाहरी अनुभव, जैसे- पहले कभी कोई दर्दनाक हादसा हुआ है, तो व्यक्ति हर बात को उससे ही जोड़कर देखने लगता है और कहीं न कहीं इसमें उसके जींस का भी हाथ होता है. उसे कुछ गुण, कुछ तत्व अपने पूर्वजों से मिलते हैं, जो उसे ऐसा बनाते हैं. शोध यह बताते हैं कि अनुवांशिकता यानी जेनेटिक्स और ब्रेन केमिस्ट्री के साथ लाइफ एक्सपीरियंस मिलकर इस तरह की स्थिति का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं. इसके अलावा अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि जो लोग तनावग्रस्त होते हैं यानी जब आप डिप्रेशन में होते हैं, तब निर्णय लेने से अधिक डरते हैं, तो डिप्रेशन और डिसाइडोफोबिया का भी कहीं न कहीं एक अलग तरह का संबंध हो सकता है.

लक्षण

इसके लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप किस हद तक इस तरह के फोबिया का शिकार हैं. सामान्य लक्षणों में घबराहट, बेचैनी, सांस लेने में द़िक्क़त, पसीना आना, हृदय गति का तेज़ होना, मितली, मुंह का सूखना, ठीक से न बोल पाना आदि हो सकते हैं. हालांकि कुछ मामलों में यह डर बहुत नुक़सान नहीं पहुंचाता, लेकिन अगर ये आपकी सामान्य ज़िंदगी पर असर डालने लगे, तो समझ जाइए कि एक्सपर्ट की राय ज़रूरी है.

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कब जाएं एक्सपर्ट के पास?

जब आपके लक्षण बहुत ज़्यादा गंभीर हो जाएं, तो समझ जाएं कि अब देर नहीं करनी चाहिए.

आप निर्णय लेने से बचने के लिए हद से आगे बढ़ जाते हैं: आप कोई काम करना तो चाहते हो, लेकिन निर्णय लेने के डर से उसे नहीं करते. यह डर इतना हावी हो जाता है कि आप निर्णय लेने की स्थिति से बचने के लिए कई तरी़के अपनाने लगते हो. हालांकि यह जानलेवा नहीं है, लेकिन डिसाइडोफोबिया आपके रिश्तों को और प्रोफेशनल लाइफ को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है.

निर्णय लेने के लिए आप दूसरों पर निर्भर रहते हो: काउंसलर्स का कहना है कि आप हर निर्णय के लिए दूसरों पर ही निर्भर रहते हो और धीरे-धीरे आपकी दूसरों पर निर्भरता इतनी अधिक बढ़ जाती है कि आप ख़ुद कुछ कर ही नहीं पाते.

ग़लत लोगों और ग़लत तरीक़ों से गाइडेंस लेने लगते हो: ख़ुद निर्णय लेने की क्षमता को इस कदर खो देते हो कि आप ज्योतिषियों, बाबाओं या अन्य लोगों से सलाह लेने लगते हो. यहां तक कि अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए भी इन्हीं पर निर्भरता बढ़ जाती है, जो पूरी तरह अस्वस्थ है.

निर्णय लेने की स्थिति में पैनिक अटैक की आशंका: जैसे ही ऐसी परिस्थिति आती है कि आपको निर्णय लेना है, आपको पैनिक अटैक होने लगता है. आप बेचैन होने लगते हो, पसीना, हार्टबीट, मुंह का सूखना, चक्कर आना आदि लक्षण उभरने लगते हैं.

आपका निजी जीवन प्रभावित होने लगता है: निर्णय न ले पाने का यह डर जब आपके रिश्तों, करियर व अन्य बातों को प्रभावित करने लगता है, तब समझ जाइए कि आपको प्रोफेशनल की मदद लेनी होगी.

Decidophobia

ख़ुद करें अपनी मदद

  • सेल्फ हेल्प टेक्नीक्स के ज़रिए आप अपने इस डर पर काबू पा सकते हैं.
  • जब भी निर्णय लेने की स्थिति आए, लंबी व गहरी सांसें लें और इस परिस्थिति को तनावपूर्ण बनाने से बचें.
  • ख़ुद पर विश्‍वास जताएं कि हां, मैं यह कर सकता/सकती हूं. श्र जल्दबाज़ी न करें.
  • अपने मन की बात बोलने से हिचकिचाएं नहीं.
  • अगर आपको लगता है कि आपको सेकंड ओपिनियन की ज़रूरत है, तो जो आपके क़रीबी हैं और जिन पर आप भरोसा करते हो, उनसे शेयर करो और उनसे सलाह लो.
  • अपने इंस्टिंक्ट्स की आवाज़ सुनें यानी आपका दिल अगर किसी बात की गवाही दे रहा है, तो उसे नज़रअंदाज़ न करें.
  • अगर आपका निर्णय ग़लत भी साबित हुआ, तो उसे स्वीकारने से पीछे न हटें. इस बात से डरें नहीं कि आपने ग़लत निर्णय ले लिया.
  • अगर आपको नशे की लत है, तो उसे कम करने का प्रयास करें.
  • हारने के डर को मन से निकाल दें.
  • कुछ ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ेस करें, योग व ध्यान करें. इससे आपका मन शांत होगा, डर दूर होगा और निर्णय लेने की क्षमता बेहतर होगी.
  • अपनी सोच व अप्रोच बदलें. यह सोचें कि आप भी बाकी लोगों की तरह ही हैं और आप से भी ग़लती हो सकती है, क्योंकि ऐसा कोई नहीं, जिससे गलती न हो.
  • ग़लतियों से ही सीखा जाता है, इस नज़रिए के साथ आगे बढ़ें.
  • यदि बचपन में या कभी अतीत में आपके साथ कुछ ऐसा हादसा हुआ हो, जिससे आप अभी निर्णय लेने से डर रहे हों, तो उस हादसे से वर्तमान को न जोड़ें. हर परिस्थिति अलग होती है और ज़रूरी नहीं कि हर बार ग़लती ही हो.
  • बुरी यादों को याद करने से बेहतर है सकारात्मक बातों के साथ वर्तमान को जोड़ा जाए.
  • हादसे सभी के साथ होते हैं, इसका यह मतलब नहीं कि उसे ज़िंदगीभर हावी रखें. उन्हें भुलाकर आगे बढ़ना सीखें.
  • यदि सेल्फ हेल्प से भी आप अपने डर को दूर नहीं कर पा रहे, तो एक्सपर्ट के पास ज़रूर जाएं और अपने जीवन को बेहतर बनाएं.

 – ब्रह्मानंद शर्मा 

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