Puja

महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

या देवी सर्वभूतेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

मां की श्रद्धापूर्वक पूजा, ध्यान-आराधना करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं.

जिस तरह सप्तमी में मां की पूजा की थी, उसी तरह अष्टमी में भी मां की पूजा करें.
अष्टमी के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए मां को चुनरी भेंट करती हैं.

ध्यान

वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥

पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।
वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥

प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्।
कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥

स्तोत्र

सर्वसंकट हंत्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदा चतुर्वेदमयी महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥

सुख शान्तिदात्री धन धान्य प्रदीयनीम्।
डमरूवाद्य प्रिया अद्या महागौरी प्रणमाभ्यहम्॥

त्रैलोक्यमंगल त्वंहि तापत्रय हारिणीम्।
वददं चैतन्यमयी महागौरी प्रणमाम्यहम्॥

कवच

ओंकारः पातु शीर्षो मां, हीं बीजं मां, हृदयो।
क्लीं बीजं सदापातु नभो गृहो च पादयो॥

ललाटं कर्णो हुं बीजं पातु महागौरी मां नेत्रं घ्राणो।
कपोत चिबुको फट् पातु स्वाहा मा सर्ववदनो॥


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सिद्धियां प्रदान करनेवाली मां सिद्धिदात्री

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

नवरात्रि के नौंवे दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा-आराधना का विधान है.
चार भुजाओंवाली देवी सिद्धिदात्री सिंह पर सवार श्‍वेत वस्त्र धारण कर कमल पुष्प पर विराजमान है.
शास्त्रों के अनुसार, अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, गरिमा व वशित्व ये आठ सिद्धियां हैं.
मां अपने भक्तों को ये सभी सिद्धियां प्रदान करती हैं, इसलिए इन्हें सिद्धिदात्री देवी के रूप में पूजा जाता है.
नवरात्रि में नौ दिन का व्रत रखनेवालों को नौ कन्याओं को नौ देवियों के रूप में पूजना चाहिए.
साथ ही इन सभी को भोग, दान-दक्षिणा आदि देने से दुर्गा मां प्रसन्न होती हैं.
पूजा के बाद आरती व क्षमा प्रार्थना करें.
हवन में चढ़ाया गया प्रसाद सभी को श्रद्धापूर्वक बांटें.
हवन की अग्नि ठंडी हो जाने पर जल में विसर्जित कर दें.
यदि चाहें, तो भक्तों में भी बांट सकते हैं.
मान्यता अनुसार, इस भस्म से बीमारी, चिंता-परेशानी, ग्रह दोष आदि दूर होते हैं.

बीज मंत्र

ऊँ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नम:

ध्यान 

वन्दे वांछित मनोरथार्थ चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
कमलस्थितां चतुर्भुजा सिद्धीदात्री यशस्वनीम्॥

स्वर्णावर्णा निर्वाणचक्रस्थितां नवम् दुर्गा त्रिनेत्राम्।
शख, चक्र, गदा, पदम, धरां सिद्धीदात्री भजेम्॥

पटाम्बर, परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥

प्रफुल्ल वदना पल्लवाधरां कातं कपोला पीनपयोधराम्।
कमनीयां लावण्यां श्रीणकटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

स्तोत्र

कंचनाभा शखचक्रगदापद्मधरा मुकुटोज्वलो।
स्मेरमुखी शिवपत्नी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

पटाम्बर परिधानां नानालंकारं भूषिता।
नलिस्थितां नलनार्क्षी सिद्धीदात्री नमोअस्तुते॥

परमानंदमयी देवी परब्रह्म परमात्मा।
परमशक्ति, परमभक्ति, सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

विश्वकर्ती, विश्वभती, विश्वहर्ती, विश्वप्रीता।
विश्व वार्चिता विश्वातीता सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

भुक्तिमुक्तिकारिणी भक्तकष्टनिवारिणी।
भव सागर तारिणी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

धर्मार्थकाम प्रदायिनी महामोह विनाशिनी।
मोक्षदायिनी सिद्धीदायिनी सिध्दिदात्री नमोअस्तुते॥

कवच

ओंकारपातु शीर्षो मां ऐं बीजं मां हृदयो।
हीं बीजं सदापातु नभो, गुहो च पादयो॥
ललाट कर्णो श्रीं बीजपातु क्लीं बीजं मां नेत्र घ्राणो।
कपोल चिबुको हसौ पातु जगत्प्रसूत्यै मां सर्व वदनो॥

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ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः
या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

नवरात्रि के पांचवें दिन अंबे मां के पांचवें स्वरूप स्कन्दमाता की पूजा-आराधना की जाती है.
मां अपने भक्तों की सभी इच्छाओं को पूर्ण करती हैं.
मां को माहेश्‍वरी व गौरी के नाम से भी जाना जाता है.
महादेव शिव की वामिनी यानी पत्नी होने के कारण माहेश्‍वरी भी कहलाती हैं.
अपने गौर वर्ण के कारण गौरी के रूप में पूजी जाती है.
मां को अपने पुत्र स्कन्द (कार्तिकेय) से अत्यधिक प्रेम होने के कारण पुत्र के नाम से कहलाना पसंद करती हैं, इसलिए इन्हें स्कन्दमाता कहा जाता है.
अपने भक्तों के प्रति इनका वात्सल्य रूप प्रसिद्ध है.
कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण इन्हें पद्यासना भी कहते हैं.
स्कन्दमाता अपने इस स्वरूप में स्कन्द के बालरूप को अपनी गोद में लेकर विराजमान रहती हैं.
इनकी चार भुजाएं हैं. दाईं ओर कमल का फूल व बाईं तरफ़ वरदमुद्रा है.
इनका वाहन सिंह है.

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सिंहासनगता नित्यं पद्याश्रितकरद्वया
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी

संतान की कामना करनेवाले भक्तगण इनकी विशेष रूप से पूजा करते हैं.
वे इस दिन लाल वस्त्र में लाल फूल, सुहाग की वस्तुएं- सिंदूर, लाल चूड़ी, महावर, लाल बिंदी, फल, चावल आदि बांधकर मां की गोद भरनी करते हैं.

ध्यान
वंदे वांछित कामार्थे चंद्रार्धकृतशेखराम्
सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कंदमाता यशस्वनीम्
धवलवर्णा विशुद्ध चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्
अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्
प्रफु्रल्ल वंदना पल्लवांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्
कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्

कवच
ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा। हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥
श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा। सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥
वाणंवपणमृते हुं फ्ट बीज समन्विता। उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠतेअवतु॥
इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी। सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥

यदि आप कफ़, वात, पित्त जैसी बीमारियों से ग्रस्त हैं, तो आपको स्कंदमाता की विशेष रूप से पूजा करनी चाहिए.
मां को अलसी चढ़ाकर प्रसाद में रूप में ग्रहण करना चाहिए.
केले का भोग लगाना चाहिए, क्योंकि केला मां को प्रिय है.


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या देवी सर्वभूतेषु माँ चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा देवी की पूजा की जाती है.
देवी का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है.
इनके मस्तक पर घंटे के आकार का आधा चंद्र है,
इसलिए इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है.
इनके दस हाथ हैं, जो कमल, धनुष-बाण, कमंडल,
त्रिशूल, गदा, खड्ग, अस्त्र-शस्त्र से विभूषित हैं.
चंद्रघंटा देवी की सवारी सिंह है.

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पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता

इस दिन सांवली रंगत की महिला को घर बुलाकर पूजा-अर्चना करें.
भोजन में दही-हलवा आदि खिलाएं.
कलश व मंदिर की घंटी भेंट करें.
इनकी आराधना करने से निर्भयता व सौम्यता दोनों ही प्राप्त होती है.
इनके घंटे की ध्वनि सदा अपने भक्तों की प्रेतबाधा से रक्षा करती है.

                           स्त्रोत मंत्र

ध्यान वन्दे वाच्छित लाभाय चन्द्रर्घकृत शेखराम।
सिंहारूढा दशभुजां चन्द्रघण्टा यशंस्वनीम्घ
कंचनाभां मणिपुर स्थितां तृतीयं दुर्गा त्रिनेत्राम।

खड्ग, गदा, त्रिशूल, चापशंर पद्म कमण्डलु माला वराभीतकराम्घ
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्यां नानालंकार भूषिताम।
मंजीर हार, केयूर, किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम्घ
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुग कुचाम।

कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटिं नितम्बनीम्घ
स्तोत्र आपद्धद्धयी त्वंहि आधा शक्तिरू शुभा पराम।
अणिमादि सिद्धिदात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यीहम्घ्
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्ट मंत्र स्वरूपणीम।

धनदात्री आनंददात्री चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्घ
नानारूपधारिणी इच्छामयी ऐश्वर्यदायनीम।
सौभाग्यारोग्य दायिनी चन्द्रघण्टे प्रणमाम्यहम्घ्
कवच रहस्यं श्रणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।

श्री चन्द्रघण्टास्य कवचं सर्वसिद्धि दायकम्घ
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोद्धरं बिना होमं।
स्नान शौचादिकं नास्ति श्रद्धामात्रेण सिद्धिकमघ
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च।

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Devi Chandraghanta

किसी भी शुभ कार्य का शुभारंभ हम गणेश पूजन से करते हैं. गणेश जी मंगलकारी और विघ्नहर्ता हैं. ऐसा कहा जाता है कि जिस पर गणेश जी की कृपा हो जाए, उसके जीवन में आनेवाली सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं. गणेश चतुर्थी के ख़ास मौके पर गणेश जी की पूजा-आराधना से कैसे पूरी करें मनोकामना? बता रहे हैं पंडित राजेंद्र जी.

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गणेश चतुर्थी के दौरान बचें इन बातों से:
* गणेश जी को कभी भी तुलसी अर्पण न करें यानी तुलसी से गणेश जी की पूजा कभी न करें.
* इसी तरह गणेश जी को स़फेद चंदन भी नहीं चढ़ाना चाहिए.
* भाद्रपद की चतुर्थी के चंद्रमा का दर्शन भी निषेध माना गया है. ऐसा कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने इस दिन चंद्रमा के दर्शन किए थे और उन पर चोरी का कलंक लगा था. इसीलिए भाद्रपद की चतुर्थी के चंद्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए.

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नीचे दिए गए वीडियो में गणेश जी को प्रसन्न करने के विभिन्न उपाय बताए गए हैं. आप भी ये उपाय करके अपनी मनोकामना पूरी कर सकते हैं:
* धनप्राप्ति के उपाय
* दरिद्रता दूर करने के उपाय
* पढ़ाई में अव्वल रहने के उपाय
* बुरी नज़र से बचने के उपाय
* विवाह में आ रही अड़चनें दूर करने के उपाय
* नया घर ख़रीदने के उपाय
* मनचाही नौकरी पाने के उपाय
* साढ़े साती या शनि महादशा से बचने के उपाय

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साथ ही इस वीडियो में गणेश जी को विभिन्न पत्तों द्वारा प्रसन्न करने के उपाय भी बताए गए हैं. ऐसा करके आप हार्ट प्रॉब्लम्स, कार्य में आ रही बाधा, रोग आदि से मुक्ति पा सकते हैं. साथ ही आर्थिक लाभ, मान-सम्मान, व्यावसायिक लाभ, अच्छा स्वास्थ्य आदि पा सकते हैं.

 

 

जब भी हमारे घर में पूजा-पाठ, हवन, उत्सव या शादी-विवाह जैसे शुभ कार्य होते हैं, तो घर में शंख ज़रूर बजाया जाता है. क्या आप जानते हैं ऐसा क्यों किया जाता है? धार्मिक कार्यों में शंख बजाने की परंपरा क्यों है और इसका वैज्ञानिक महत्व क्या है? चलिए, हम आपको बताते हैं.

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धार्मिक मान्यता
सभी धर्मों में शंखनाद को पवित्र माना गया है इसीलिए पूजा-पाठ, उत्सव, हवन, विवाह आदि शुभ कार्यों में शंख बजाना शुभ व अनिवार्य माना जाता है. मंदिरों में भी सुबह-शाम आरती के समय शंख बजाया जाता है.

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वैज्ञानिक महत्व
वैज्ञानिक मानते हैं कि शंख फूंकने से उसकी ध्वनि जहां तक जाती है, वहां तक के अनेक बीमारियों के कीटाणु ध्वनि-स्पंदन से मूर्छित हो जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं. यदि रोज़ शंख बजाया जाए, तो वातावरण कीटाणुओं से मुक्त हो सकता है. बर्लिन विश्‍वविद्यालय ने शंखध्वनि पर अनुसंधान कर यह पाया कि इसकी तरंगें बैक्टीरिया तथा अन्य रोगाणुओं को नष्ट करने के लिए उत्तम व सस्ती औषधि हैं. इसके अलावा शंख बजाने से फेफड़े मज़बूत होते हैं, जिससे श्‍वास संबंधी रोगों से बचाव होता है.

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शंख में जल भरकर पूजा स्थान में रखा जाता है और पूजा-पाठ, अनुष्ठान होने के बाद श्रद्धालुओं पर उस जल को छिड़का जाता है. इस जल को छिड़कने के पीछे मान्यता यह है कि इसमें कीटाणुनाशक शक्ति होती है, क्योंकि शंख में जो गंधक, फास्फोरस और कैल्शियम की मात्रा होती है, उसके अंश भी जल में आ जाते हैं. इसलिए शंख के जल को छिड़कने और पीने से स्वास्थ्य सुधरता है. यही वजह है कि बंगाल में महिलाएं शंख की चूड़ियां पहनती हैं.

कृष्ण जन्माष्टमी : शुभ मुहूर्त पर व्रत-पूजा से पूरी करें मनोकामना

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यदि आप भी दीयों की रौनक से अपने आंगन में सुख-समृद्धि की बरसात चाहते हैं, तो दीपावली के इस पर्व के सही अर्थ को समझकर, पूरी आस्था से विधिवत् पूजा-अर्चना करें.


कैसे करें लक्ष्मी पूजन?

* हमेशा मुख्य पूजावाले दीये में घी और बाकी दीयों में सरसों का तेल इस्तेमाल करें.

* दिवाली की पूजा हमेशा उत्तर-पूर्व (नॉर्थ-ईस्ट) दिशा में करें.

* पूजा करते समय पूजा करनेवाले का चेहरा उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए.

* पूजा के समय मूर्तियों का क्रम बाएं से दाएं इस प्रकार होना चाहिए- गणेशजी, लक्ष्मीजी, विष्णुजी, मां सरस्वती एवं काली माता. उसके बाद  लक्ष्मणजी, श्रीरामजी एवं मां सीता की मूर्तियां रखें.

* दिवाली की पूरी रात दक्षिण-पूर्व (साउथ-ईस्ट) कोने में घी से भरा हुआ दीया अलग से प्रज्ज्वलित करके रखें.

* दीयों को हमेशा चार के समूह में रखें. ये दीये लक्ष्मीजी, गणेशजी, कुबेर देवता और इंद्र देवता के प्रतीक हैं.

* लाल रंग का अधिक इस्तेमाल करें. इस रंग के दीये, मोमबत्तियां, लाइट्स, फूल व बेडशीट्स इस्तेमाल किए जा सकते हैं.

* दिवाली पूजा की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से करें. हिंदू धर्म में इन्हें विघ्नहर्ता के रूप में पूजा जाता है और कोई भी पूजा करने से पहले  गणेशजी की पूजा का विधान भी है.

* यदि आप बहीखाता (अकाउंट बुक्स) लिखते हैं, तो उनकी भी पूजा करें. इनको पश्‍चिम की ओर लक्ष्मीजी की मूर्ति के सामने रखें.

* पूजा में कमल का फूल अवश्य शामिल करें. यह लक्ष्मीजी का पसंदीदा फूल है.

* दिवाली में सुबह जल्दी उठकर अभ्यंग स्नान (शरीर पर तेल और उबटन लगाकर) करें.

* इसके बाद परिवार के बड़े-बुज़ुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लें. ङ्गओम ह्रीं क्लीं श्रीं महालक्ष्मी: नम:फ मंत्र का जाप करें.

क्या ना करें?

* अपने मित्र-रिश्तेदारों को तोह़़फे में कटलरी, पटाखे, फुलझड़ियां या लेदर के आइटम्स ना दें, पर यदि इनमें से कुछ देना ही चाहते हैं, तो साथ में  मिठाई ज़रूर दें.

* दिवाली में जुआ ना खेलें.

* अल्कोहल और नॉन वेज से परहेज़ करें.

* दिवाली की रात पूजा के स्थान का ध्यान रखें यानी दीये में घी डालते रहें, ताकि दीया रातभर प्रज्ज्वलित रहे.

* दाहिनी सूंडवाले गणेशजी पूजा में ना रखें और केवल बैठे गणेशजी की ही मूर्ति रखें.

* लक्ष्मीजी की आरती तेज़ आवाज़ में ज़ोर-ज़ोर से तालियां बजाकर गाने की बजाय, मधुर आवाज़ में घंटी बजाकर गाएं. कहा जाता है कि लक्ष्मीजी  तेज़ आवाज़ और शोरगुल पसंद नहीं करतीं.

* लक्ष्मीजी की अकेली मूर्ति या फोटो की पूजा ना करें, साथ में विष्णुजी की मूर्ति या फोटो अवश्य हो.

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पूजा के लिए आवश्यक सामग्री

गणेशजी व लक्ष्मीजी की मूर्तियां व नए वस्त्र, सोने व चांदी के सिक्के, नए करेंसी नोट्स, चौकियां, कैश रजिस्टर/अकाउंट बुक्स, सिक्कों का बैग, पेन, काली स्याही, 3 थालियां, धूप, अगरबत्ती, शुद्ध घी, दही, शहद, गंगाजल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद व शक्कर का मिश्रण), हल्दी पाउडर, रोली, इत्र, कलश, 2 मीटर स़फेद व लाल कपड़ा, गमछा, कपूर, नारियल (पानीवाला), ड्रायफ्रूट्स, कमल का फूल, अन्य फूल, दुर्वा, तांबुल पान, पुगीफल सुपारी, खील, बताशे, मिठाइयां, खांड के खिलौने, साड़ियां, आम के पत्ते, लौंग, हरी इलायची, कुमकुम, सिंदूर, केसर, मुख्यद्वार के लिए बन्दनवार, शंख, घंटी, सोने-चांदी की ज्वेलरी (यदि उपलब्ध हो), अभिषेक पात्र, अभिषेक किए गए पानी के लिए स्टेनलेस स्टील बाउल, पांच तरह के फल (आम, केला, सेब, संतरा, अंगूर, नाशपाती, पीच वगैरह), जानवी जोड़, अष्टगंध, चंदन, अक्षत (कुमकुम लगाए हुए चावल), फूल मालाएं, रुई, मिट्टी के छोटे-बड़े दीये, थालियां (पूजा का सामान रखने के लिए), तिल/सरसों का तेल और माचिस.

किस राशि वाले क्या दान करें?

दिवाली उमंग-उत्साह के साथ अपने-पराये सभी के साथ ख़ुशियां मनाने का त्योहार है. शास्त्र कहते हैं कि ग़रीब और दीन-दुखियों की मदद करने से ईश्‍वर प्रसन्न होते हैं. यदि उन्हेंं खाने-पीने की चीज़ें बांटी जाएं, तो ईश्‍वर प्रसन्न होने के साथ-साथ आशीर्वाद भी देते हैं. इसलिए यहां पर हम यह बताते हैं कि राशि के अनुसार किस वस्तु का दान किया जाए, ताकि आप पर लक्ष्मीजी की कृपा सदैव बनी रहे.

मेष- चावल व दाल
वृषभ- सरसों का तेल और थोड़े-से तिल
मिथुन- 800 ग्राम गुड़ व पीली चना-दाल
कर्क- घी और थोड़ा-सा बेसन
सिंह- शक्कर व थोड़ा-सा बेसन
कन्या- आटे के साथ चावल
तुला- 11 बेसन के लड्डू
वृश्‍चिक- अलग-अलग तरह के पांच फल
धनु- जलेबी और तिल के लड्डू
मकर- पांच तरह के अनाज
कुंभ- ड्रायफ्रूट्स, दूध और शक्कर
मीन- मिठाई और फल