Rang Tarang

सोशल मीडिया पर तमाम कौरव योद्धा ललकार रहे हैं, लेकिन धर्मयोद्धाओं की समझ में नहीं आ रहा है कि पक्ष में पोस्ट डालें या विपक्ष में. अभी तक जिस कृषि क़ानून को लागू करने से गंगा पृथ्वी पर उतरनेवाली थी, अब बताया जा रहा है कि राम तेरी गंगा मैली… अर्द्ध बेहोशी-सी चैतन्यता है. आंखों से गांधारी पट्टी हटाकर भी देख लिया, अंधापन बना हुआ है. लगता है कि आंखों का बुद्धि से संपर्क टूट गया है. अधर्मी कोलाहल मचा रहे हैं- आवाज़ दो कहां हो…


म्हारे समझ में कती न आ रहो अक कृषि क़ानून इब कूण से कलर का है! अभी हफ़्ता पाच्छे सरकार की नज़र में यू क़ानून घणा दुधारू हुआ करता हा! पर किसानन कू समझाने में सब फेल हुए! ता फेर, देश हित में दरबारश्री ने दुधारू से अचानक बांझ नज़र आने लगे तीनों क़ानून कू वापस ले लिया! (बेलाग होकर कहें तो ये फ़ैसला बड़ी हिम्मत और जोख़िम भरा था! जिसने दरबारश्री के समर्थकों और विरोधिओ को सकते में डाल दिया है)
विपक्ष और विरोधिओं को किसी करवट चैन नहीं मिलता. अब विपक्षी सवाल उठा रहे हैं कि सैकड़ों किसानों की बलि लेने के बाद ही सरकार को कृषि क़ानून का नुक़सान क्यों नज़र आया. उसके पहले यही क़ानून किसानों को मालामाल करता हुआ नज़र रहा था. सरकार किसानों को मंहगाई, मंदी और लुटेरों की मंडी से बचाकर आत्मनिर्भर बनाना चाहती थी, लेकिन किसानों को फ़ायदा ही नहीं रास आ रहा था. कमाल है, बौद्धिक चैतन्यता का बड़ा अजीब दौर आ चुका है- लोग अपना फ़ायदा ही नहीं चाहते. जिस नए क़ानून से देश के किसान गुफ़ा युग से निकल कर सीधे विश्व गुरु होनेवाले थे, उसके ही ख़िलाफ़ सड़क पर बैठ गए. विपक्षी दलों ने तीनों क्रान्तिकारी कृषि क़ानूनों के विटामिन, प्रोटीन और कैल्शियम में घुन ढूंढ़ना शुरु कर दिया. ये हस्तिनापुर की सत्ता के ख़िलाफ़ संयुक्त कौरव दलों का सरासर विद्रोह था. फिर भी दरबारश्री के ज्ञानी मंत्री और चारण अज्ञानी किसानों से तमसो मा ज्योतिर्गमय की उम्मीद लगाए बैठे थे.


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सोशल मीडिया के सूरमाओं ने आंख और अक्ल दोनों पर गांधारी पट्टी बांध ली थी. ऐसा करने से बुद्धि और विवेक का सारा लावा  ज्वालामुखी की शक्ल में श्रीमुख से बाहर आ रहा था. इन जीवों की अपनी कोई विचारधारा आत्मचिंतन के अधीन नहीं थी. इन्हें अधीनता और ग़ुलामी से इतनी नफ़रत थी कि उन्होंने आज़ादी की एक नई तारीख़ ही ढूंढ़ कर निकाल ली. इन प्रचण्ड वीर समर्थकों के कलम और कलाम दोनों से फेसबुक पर लावा फैल रहा था. अब उन सभी वीर पुरुषों की अक्षौहिणी सेना औंधे मुंह पड़ी है. कलम कुंद है और गला अवरुद्ध. अंदर से आग की जगह आह निकल रही है- ये क्या हुआ… कैसे हुआ.. क्यों हुआ?.. छोड़ों ये न पूछो…
लेकिन लोग चुटकी लेने से कहां बाज आते हैं. तरह-तरह के तीर सोशल मीडिया पर उड़ रहे हैं.
‘अगला आत्म ज्ञान कब प्राप्त होगा’… मूर्खों को ज्ञान देने का जोख़िम कौन उठाए. बुज़ुर्गों की सलाह तो यह है कि बेवकूफ़ों के मुहल्ले में अक्लमंद होने की मूर्खता नहीं करना चाहिए, वरना अकेले पड़ जाने का ख़तरा है.
दरबारश्री कभी भी कोई कदम ऐसा नहीं उठाते, जो नौ रत्नों के विमर्श और सहमति के बगैर हो. बड़े सियासी योद्धा और ज्योतिषाचार्य इस फ़ैसले के पीछे का लक्ष्य ढूंढ़ रहे हैं. विपक्ष सामूहिक ख़ुशी मनाने की बजाय सामूहिक चिंतन शिविर में बैठ गया है.
मगर भक्त सदमे में हैं. अनुप्राश अलंकार जैसी स्थिति है- नारी बीच साड़ी है या साड़ी बीच नारी है?.. कन्फ्यूजन गहरा गया है. विषम परिस्थिति है. गांडीव भारी हो गया है. सोशल मीडिया पर तमाम कौरव योद्धा ललकार रहे हैं, लेकिन धर्मयोद्धाओं की समझ में नहीं आ रहा है कि पक्ष में पोस्ट डालें या विपक्ष में. अभी तक जिस कृषि क़ानून को लागू करने से गंगा पृथ्वी पर उतरनेवाली थी, अब बताया जा रहा है कि राम तेरी गंगा मैली… अर्द्ध बेहोशी-सी चैतन्यता है. आंखों से गांधारी पट्टी हटाकर भी देख लिया, अंधापन बना हुआ है. लगता है कि आंखों का बुद्धि से संपर्क टूट गया है. अधर्मी कोलाहल मचा रहे हैं- आवाज़ दो कहां हो… क्रोध में गाली देने का जी करता है रे बाबा…
मित्रों में वर्माजी सांड की तरह फुफकार रहे हैं. निरस्त हुए कृषि क़ानून की दुधारू उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कह रहे हैं, “क़ानून को वापस लेने से मुझे तो कुछ ऐसा फील हो रहा है जैसे आलू की फसल को पाला मार गया. देश हित में लाए गए तीनों कृषि क़ानून खेत और किसानों को नई दशा और दिशा देते. अब तो सब कुछ दिशाहीन हो जाएगा…”
मैंने पूछने का दुस्साहस किया, “आपको खेती किसानी का बहुत नॉलेज है. गांव में खेती होती होगी ना?”
वो आगबबूला होकर बोले, “भैंस का दूध सेहत के लिए फ़ायदेमंद होता है या नुक़सानदेह, ये जानने के लिए भैंस ख़रीदने की ज़रूरत नहीं होती मूर्ख.”
चौधरी कन्फ्यूजन में है. वो अभी तक फ़ैसला नहीं कर पाया कि उसे ख़ुश होना चाहिए या नाराज़. कल मुझसे पूछ रहा था, “उरे कू सुण भारती, इब क़ानून कूण से रंग कौ हो गयो?”


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“कौन-सा क़ानून? सभी क़ानून एक जैसे ही हैं.”
“घणा वकीड़ मत नै बण. मैं किसान वाड़े क़ानून कौ बात करूं सूं. पहले तो घणा दुधारू बताया हा, इब के हुआ. किसने दूध में नींबू गेर दई. इब घी न लिकड़ता दीखे कती. इब और कितनी दुधारू योजना ते मक्खी लिकाड़ी ज्यांगी?”
मेरे पास तो नहीं है, किसी बुद्धिजीवी के धौरे जवाब हो तो दे दे…
                                            
– सुलतान भारती

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”सिया उठो, सरगी का टाइम हो गया, मां बुला रही हैं.” मैंने जान-बूझकर करवट ले ली. मन ही मन भगवान से प्रार्थना की- ‘हे भगवान! अमित मुझे सोने दे. अपनी मां से ख़ुद ही कह दे, ‘नहीं रहेगी सिया भूखी, उसे सोने दो.’ पर अजी कहां, बेरहम ने उठाकर ही दम लिया. लम्बी उम्र जो करवानी है.

सोसाइटी में करवा चौथ की तैयारियां ज़ोरों पर है, बिल्डिंग लाल, पीली झालरों से सजी हुई है. लेडीज क्लब करवा चौथ के मूड में था, सब अपनी पुरानी महंगी साड़ियों को हवा, धूप दिखा रहीं है. मैं करण जौहर की मूवी की हीरोइन की तरह अपनी रोमांटिक लाइफ के करवा चौथ की रेटिंग ख़ुद तय करती हूं.
यह क्या बात हुई, सजो-धजो, छलनी पकड़ो, न उसमें अपना चेहरा समाय न उसका, सुबह पति भले ही फूटी आंख न भा रहा हो, पर शाम सात बजे छलनी में ही जैसे सारा प्यार, उसका चेहरा सिमट जाता है, जो सिर्फ़ कुछ ही पलों में गायब भी हो जाता है. वैसे मैंने शादी के पहले दिन ही इन्हें कह दिया था कि मुझसे फिल्मी करवा चौथ की उम्मीद न रखें. मेरे लिए करवा चौथ चिंता का विषय है. पहली करवा चौथ मुझे आज भी याद है. अमित को बहुत उम्मीद थी कि मैं भी यह व्रत धूमधाम से रखूंगी.
नहीं भाई, मैं लाइफ में सब कुछ कर सकती हूं, पर भूखी नहीं रह सकती. और वह कहते हैं न कि बंदा जिस चीज़ से भागता है, वही उसके सामने आ खड़ा होता है. वही हुआ जिसका डर था. अमित से शादी करके मैं बहुत ख़ुश थी (शायद वह भी).
हनीमून भी हो गया, सब कुछ लवी-डवी चल रहा था, पर फिर करवा चौथ ने दस्तक दे दी और मैं अलर्ट हो गई. सासू मां और जेठानी का इस त्योहार के लिए उत्साह देखकर मेरे दिल में उनके लिए जितना भी प्यार और सम्मान था, वह डगमगा गया.


अरे! कौन ख़ुश होता है भूखे रहने के लिए इतना! सासू मां जब कहतीं कि ‘हे भगवान्! हर जनम में यही पति देना.’ मैं मन ही मन कहती, ‘अरे! ऐसा ही क्यों! हर जनम में पति की नई वैरायटी क्यों नहीं हो सकती? एक जनम के लिए एक पति काफ़ी नहीं है क्या? हम तो वैरायटी के लिए किसी को देख भी लें, तो तोहमत लगती है. जेठानी की व्रत की लिस्ट पर नज़र डाली, तो मुझे लिस्ट अच्छी लगी. एक गोल्ड की चेन, नई साड़ी, मेहंदी, मैचिंग एक्सेसरीज़, पार्लर, नई चप्पल. उनसे ज़्यादा उनकी लिस्ट अच्छी लगी. फिर नीचे लिखा था व्रत का सामान. उस पर मैं चाह कर भी नज़र डाल ही न पाई.
और फिर वह दिन आ ही गया जब सुबह अमित ने मुझे झिंझोड़ा, ”सिया उठो, सरगी का टाइम हो गया, मां बुला रही हैं.” मैंने जान-बूझकर करवट ले ली. मन ही मन भगवान से प्रार्थना की- ‘हे भगवान! अमित मुझे सोने दे. अपनी मां से ख़ुद ही कह दे, ‘नहीं रहेगी सिया भूखी, उसे सोने दो.’ पर अजी कहां, बेरहम ने उठाकर ही दम लिया. लम्बी उम्र जो करवानी है. मैं उन्हें घूरते हुए रूम से निकल गई. दुष्ट मुस्कुराता रहा.


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सासू मां और जेठानी के साथ सरगी खाने बैठी, तो सोचा जमकर खा लूं, पता नहीं अब खाना कब नसीब हो. यह मेरे जीवन का पहला व्रत था. मेरे मायके में कभी कोई मुझे भूखा रख ही नहीं पाया. मैं दबाकर खा रही थी. मैंने तब तक खाया, जब तक मैं खा सकती थी. सुबह-सुबह मुझे ऐसे खाते देख वे दोनों मुस्कुराती रहीं. पता नहीं क्यों भूखे रहना मेरे लिए मौत के फ़रमान के बराबर है. भूख मुझे कभी भी ज़रा भी बर्दाश्त नहीं! जब खाना चाहिए तो चाहिए. मैं उन दोनों से बचाकर ड्रायफ्रूट्स छुपाकर ले आई.
भरपेट खाकर मैं सोने चली गई, तो अमित ने मेरे गले में बांहें डाल दी. मुझे करंट लगा. ये बांहें नहीं, मुझे भूख से क़ैद करने की जंजीरें हैं. मैं अमित को घूरती हुई करवट बदलकर सो गई. इस आदमी की वजह से ही सुबह-सुबह इतना भरकर ठूसना पड़ा है कि हालत ख़राब हो गई, पर यह क्या! सुबह साढ़े सात बजे दोबारा उठी, तो लगा पेट खाली है, अंतड़ियां कुलबुला रही हैं, भूख भी जाग रही है. मुझे अपने डाइजेशन पर नाज़ हो आया.
आज घर के पुरुषों ने पति प्रेम के चक्कर में दिखावे के तौर पर छुट्टी ले ली थी. मेरे मायके से मेरी मम्मी व्रत रखने का इंस्ट्रक्शन मैन्युअल फोन पर पढ़कर सुनाती रही. मुझे ठीक से व्रत रखने के निर्देश देती रहीं, जिन्हे मैं एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकालती रही. नौ बजे पुरुष वर्ग नाश्ता करने बैठा, तो गर्मागर्म परांठों की ख़ुशबू से मेरा ईमान डोल गया. मुंह में पानी आ गया. ऐसा लगा ज़िंदगी में जैसे कभी परांठे नहीं खाए. पेट में परांठा क्रांति उठ कर खड़ी हो गई. ‘सिया, आज ही परांठे खाने हैं. परांठे पैक किए और अपने रूम में लाकर छुपा दिए.
बारह बजते-बजते मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. पति पति नहीं, दुश्मन लगने लगा. सारे ससुरालवाले खूंखार जेलर. मौक़ा देखकर परांठों पर टूट पड़ी. परांठे खाकर हौसले वापस बुलंद हो गए. मुझे उस समय पति से ज़्यादा प्रिय परांठे लगे. थोड़ी देर बाद अमित बेडरूम में टीवी देख रहे थे. मैं वहीं लेटी हुई थी. अचानक उनकी नज़र मेरी शकल पर पड़ी. वे चौंके, प्यार से पूछा, ”कुछ चाहिए, सिया?” प्यार से उनके पूछने पर ही मेरी आंखें भर आईं.
अमित घबरा गए, ”क्या हुआ, सिया, कुछ चाहिए?”

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मैं उठकर बैठ गई. मैंने झेंपते हुए कहा, “अमित, मैंने परांठे खा लिए. मैं भूखी नहीं रह सकती. यह व्रत अब करवा चौथ नहीं, कड़वा चौथ लग रहा है मुझे…” कहते कहते मैं रोने लगी.
अमित को जैसे हंसी का दौरा पड़ गया. बेड पर पेट पकड़-पकड़कर हंसे. उनकी प्रतिक्रिया पर मेरा रोना अपने आप रुक गया. हंसते-हसते बोले, ”मेरी भूखी पत्नी…” वह वहीँ बैठे ज़ोर-ज़ोर से हंसते रहे. फिर मैं भी हंस दी और कहा, “सुनो! आगे भी कोई व्रत मुझसे नहीं हो पाएगा…” उन्होंने भी “ठीक है.” कह दिया.
शाम को मैंने भी सज-धजकर चहकते हुए व्रत की कहानी सुनी. मेरी हंसी खाई-पीई थी. वे बात-बात पर भूखी-सी कुछ चिढ़ रही थीं. सब के साथ बैठकर पानी और चाय पिया.
अमित अच्छे पति साबित हुए. उन्होंने किसी को भनक नहीं लगने दी कि मैं भरे पेट से चांद को पूज रही हूं. मैंने अमित को रात में कहा, ”यार! तुमने तो आज दिल जीत लिया मेरा.”
हम दोनों ख़ूब हंसे. उसके बाद हुआ यह कि हमारा ट्रांसफर बैंगलुरू हो गया. हमारी आपस में ख़ूब जमी. हमारा प्यार ख़ूब फलाफूला, जिसके प्रमाण स्वरूप दो बच्चे हो गए.
धीरे-धीरे ससुराल और मायके में डॉक्टर का नाम लेकर यह बम फोड़ दिया कि हाइपर एसिडिटी के कारण डॉक्टर ने किसी भी तरह का व्रत रखने के लिए मना कर दिया है. जान छूटी, लाखों पाए. अब होता यह है कि हर साल करवा चौथ पर (उसके बाद कभी कड़वा चौथ नहीं लगा ) मैं शाम को सज-धज तो जाती हूं, मूवी देख आती हूं, डिनर बाहर कर लेते हैं. यह दिन कुछ अलग तरह से सेलिब्रेट कर लेते हैं. मेरा अनुभव है कि पति से प्यार भूखे पेट रहकर नहीं, भरे पेट से ज़्यादा अच्छी तरह किया जा सकता है. उसकी उम्र इस प्यार से ख़ुश रहकर भी लंबी हो सकती है.

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एक दिन मैंने अमित से अपने दिल की बात कुछ यूं कही, ”मैं 2121 की सिया हूं, मेरा करवा चौथ पर विश्वास बरक़रार है. पति प्रेम में पति को यमराज से मांग कर लाने में भी विश्वास है, पर मैं कर्मठ सिया हूं! पर न मैं आंख पर, न पेट पर पट्टी बांध कर जी सकती हूं. मेरी अपनी आकांक्षाएं और अभिलाषाएं हैं. मैं कमाऊंगी भी, खाऊंगी भी, प्यार भी करुंगी. हे पति परमेश्वर, यह मेरी पर्सनल मूवी है. न मैं करण जौहर की हीरोइन हूं, न टीवी के सोप ओपेरा की तीस बार करवा चौथ रखनेवाली एकता कपूर की सताई बहू. मैं सिया हूं और सिया ही रहना चाहती हूं. माय डियर हस्बैंड! मैं भूखे पेट इश्क़ नहीं कर सकती.”

Karwa Chauth


अमित एक शानदार पति साबित हुए हैं. उन्हें मेरी यह स्पीच सुनकर प्यार कुछ ज़्यादा ही उमड़ आया. उन्होंने भी अपने उदगार कुछ यूं प्रकट किए, “हे सिया! अगर तुम्हारा भाषण ख़त्म हो गया हो, तो क्या मैं तुम्हारा मुखारविंद चूम सकता हूं?” और जुम्मा चुम्मा दे दे… गाने की तर्ज़ पर उनकी मस्ती शुरू हो गई, “यार, यह 2121 है… देख मैं आ गया… अब तू भी जल्दी आ… करवा चौथ से न घबरा… तू दे दे… हां, दे दे… चुम्मा चुम्मा दे दे सिया…”
और यह दिन हमारे लिए परमानेंट पार्टी डे में बदल गया. तो हे पति प्रेयसी सिया! इस 2121 के करवा चौथ में भूखी न रहियो…

Poonam Ahmed
पूनम अहमद


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इस किचन के बाहुपाश से निकलना बड़ा ही मुश्किल है. किसी ने कहा है कि व्यक्ति के दिल का रास्ता पेट से होकर गुज़रता है, पर यह जिस किसी ने कहा है उसने यह बात बड़ी ही ख़ूबसूरती से छुपा ली कि इस पेट से दिल तक के रास्ते में किचन नाम का एक बड़ा स्पीड ब्रेकर भी आता है…और पिछले लगभग दो सालों से यह स्पीड ब्रेकर, हर महिला के जीवन में बहुत अच्छे से रच-बस गया है.

मैं और मेरा किचन… अक्सर यह बातें करते हैं, अगर तुम ना होते तो ऐसा होता… अगर तुम ना होते तो वैसा होता… तुम ना होते तो मैं कुछ कहती… मुझे कुछ खाली समय मिलता और मैं भी पैर फैलाकर टीवी देख लेती, ना कोई मुझसे पूछता कि आज खाने में क्या बना है? और ना ही बर्तनों के अंबार लगते.
इस किचन के बाहुपाश से निकलना बड़ा ही मुश्किल है. किसी ने कहा है कि व्यक्ति के दिल का रास्ता पेट से होकर गुज़रता है, पर यह जिस किसी ने कहा है उसने यह बात बड़ी ही ख़ूबसूरती से छुपा ली कि इस पेट से दिल तक के रास्ते में किचन नाम का एक बड़ा स्पीड ब्रेकर भी आता है…और पिछले लगभग दो सालों से यह स्पीड ब्रेकर, हर महिला के जीवन में बहुत अच्छे से रच-बस गया है.
चाइना से चला कोरोना वायरस जैसे ही भारत पहुंचा, सबसे पहला भूकंप भारतीय रसोईघरों में आया. इस भूकंप के शुरुआती झटके बेहद सुखद थे, जिसमें गृहिणियों ने इंटरनेट से देख-देखकर इतने व्यंजन बनाए कि बाज़ार से मैदा और बेसन खाली हो गए. हर किचन में गृहिणियों में इतना उत्साह और स्फूर्ति देखने को मिली कि देखते ही देखते, घर-घर में रेस्टोरेंट्स-सा खाना बनने लगा.
अरे भाई, इन पंचतारिका रसोइयों और खानसामाओं  के उत्साह और पाक कला कौशल को देखकर एक बार को लगा कि इन होटलों पर लॉकडाउन के चलते लगे ताले अब कभी ना खुल पाएंगे. इन रसोई वीरांगनाओं ने अचानक बरसों से धूल में पड़े अपने हथियार उठा लिए थे. हर घर में अब सिर्फ़ पनीर, दाल आदि के छौंकों की महक नहीं उठी, बल्कि यूरोपियन, कॉन्टिनेंटल, अरबी, फारसी पता नहीं और क्या-क्या पकना शुरू हुआ. भारत में आने के बाद कोरोना वायरस को एक बार तो ऐसा ज़रूर लगा होगा कि उसके आगमन की ख़ुशी में हर घर में प्रतिदिन उत्सव मनाया जा रहा है.
अरे भाई, अब आगे का भी तो हाल सुनिए, धीरे-धीरे ऑफिस… स्कूल वर्क फ्राॅम होम माध्यम से शुरू हुए. झाड़ू-पोछा, कपड़े, बर्तन आदि सब कामों को करने के बाद रसोई में नए-नए प्रयोग करनेवाले हमारे यह वैज्ञानिक थकने लगे थे. साथ ही किचन से निकलते मुगलई परांठे, गोलगप्पे, पिज्जा आदि पेट पर दिखने लगे थे. अब यथार्थ और वस्तुस्थिति यह है कि इस रसोईघर नामक जगह की सीमा में कोई प्रवेश नहीं करना चाहता.

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कभी-कभी मैं दूर से रसोईघर को निहारती हूं… तो वह मुझे मुंह चिढ़ाता-सा नज़र आता है. मानो कह रहा हो, “बहन, मुझसे ना बच पाओगे. जब तक तुम्हारे शरीर में पेट है, मेरी सत्ता कायम रहेगी. ऐसे समय लगता है ईश्वर ने पेट और घर के डिज़ाइन में आर्किटेक्ट ने किचन क्यों डाल दी. कभी-कभी तो साजिश की बू आती है कि कहीं धोखे से शादियां पति की जगह किचन से तो नहीं करवा दी जाती. अगर ऐसा है, तो फिर तो तलाक़ की भी कोई उम्मीद नहीं. कोरोना काल ने तो इस रिश्ते को और भी प्रगाढ़ कर दिया है.


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जो काम सिर्फ़ पकने-पकाने तक सीमित था, अब बाज़ार से आई सब्ज़ियों को नहलाना-धुलाना… सुखाना… हाथों को पहले सैनिटाइज करना, फिर धोना आदि के चक्कर में यह काम कभी ख़त्म ही नहीं होता. बाज़ार से सब्ज़ी ख़रीद के लौटो, तो ऐसा लगता है कि थैले में कोई विस्फोटक बम है. जिसे सबसे पहले निष्क्रिय करना ज़रूरी है… और जब इतनी मेहनत-मशक्कत के बाद सब्ज़ी, रोटी, दाल, चावल बन कर तैयार होता है, तो बाहर से फ़रमाइश आती है कि आज कुछ अच्छा खाने का मन कर रहा है, कुछ अच्छा बना दो. अब इंटरनेट से कहो कि इस कुछ अच्छे की रेसिपी भी डालें ज़रा अपने यूट्यूब चैनल पर.
तो सौ बातों की एक बात यह है कि दुनिया गोल है. मसला जहां शुरू हुआ, फिर वहीं पर आकर ख़त्म होगा अर्थात रसोईघर या किचन. तो जो गृहिणियां या गृहस्थ भी… इस उद्देश्य से यह लेख पढ़ रहे हैं कि अंत में इस समस्या का समाधान ज़रूर लिखा होगा, तो उनकी अपेक्षाएं रेत के महल से ढहनेवाली है. चाहे जितने उपाय आज़मा ले… रसोई का गठबंधन ना तोड़ पाएंगे, क्योंकि यह किचन अवसरवादी नहीं, बल्कि आपके साथ बड़ी वफ़ादार है. तो आपके लिए यह अच्छा है कि किसी भी व्यक्ति के दिल तक पहुंचने का रास्ता पेट से ना गुज़रे और जब तक ऐसा ना हो मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं!

डिस्क्लेमर: यह लेख किसी व्यक्ति विशेष जिसे रसोई और पाक कला में सच्चा प्रेम है उसकी भावनाओं को आहत करने के लिए नहीं है. यह तो केवल मेरे जैसों की व्यथा है आप व्यंग्य समझकर हंस लीजिए.


– माधवी कठाले निबंधे



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अपनी यह महान कविता सुनाकर उसने मुझे यूं देखा जैसे वह टैगोर हो और मैं कोई अनपढ़. बोली, ”अच्छी है न!”
मैंने अपने दिल का दर्द छुपा लिया. मुंह से तो बोल न फूटा, उसका हाथ अपने हाथ में लेकर किस कर दिया. बोल ही नहीं पाया कि क्या बकवास लिखा है. वह अब बहुत अच्छे मूड में थी. बोली, “चलो, तुम्हारी चाय भी हो गई, जब तक बच्चे खेल कर आते हैं, मैं अपनी कविता फाइनल कर लेती हूं.‘’
वो तो गुनगुनाती चली गई और मुझे छोड़ गई अपनी कविता के बोझ तले मेरे दुख के साथ. आपने कभी सोचा है कि इस समय मेरे जैसे पति क्या करते हैं, अच्छी एक्टिंग करते हैं! अपना दर्द छुपा कर मुस्कुराते हैं.

मैं ऑफिस से आया. फ्रेश होकर एक कप चाय के साथ पत्नी रेनू के साथ कुछ देर बैठने का मन था, पर अजी, अब कहां! अब तो कविता लिखने के कीड़े ने मेरी प्रिया को काट खाया है.
मैंने कहा, ‘’आओ, चाय ले आओ.”
लैपटॉप से नज़रें उठाकर उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने कोई भारी ज़ुर्म कर दिया है. निराशा भरे स्वर में बोली, ”अभी-अभी एक ख़्याल आया था. अब चाय बनाने में वह ख़्याल डिस्टर्ब हो जाएगा. आज प्लीज़ तुम ही चाय बना लो न. मैं यह कविता पूरी करना चाहती हूं.‘’
मैंने पता नहीं कैसे हिम्मत कर ली, जिस पर मैं बाद में काफ़ी पछताया.
मैंने पूछ लिया, ”रेनू, दिनभर नहीं आया ये ख़्याल? लिखने के भाव आने की टाइमिंग आजकल कुछ अजीब नहीं हो रही?”
रेनू ने एक झटके से चेयर से उठते हुए कहा, ”मैं चाय ही बना देती हूं, क्यूंकि तुम एक आम आदमी हो, तुम नहीं जानते लिखने की टाइमिंग अपने हाथ में नहीं होती है. हम लोग थोड़ा अलग टाइप के होते हैं. हमारा एक मूड होता है, पर कितने दुख की बात है कि मुझे चाय बनाने उठना पड़ गया. मेरी कविता! इतना प्यारा सोचा था.’’ कहते-कहते वह रुआंसी होकर किचन की तरफ़ बढ़ गई, मैं उसके पीछे जाता हुआ बोला, ”डार्लिंग, मेरे साथ चाय पीकर लिख लेना.”
वह मुझसे चाय लाने तक एक शब्द नहीं बोली. चाय लेकर आई, तो भी चेहरा ऐसा बनाकर बैठी रही कि मुझे अफ़सोस हुआ कि इसे चाय बनाने क्यों उठा दिया. पर मैं भी एक चालाक पति हूं. मुझे पता है कि आजकल उसका मूड ठीक करना कितना आसान हो गया है मेरे लिए.
मैंने पूछा, ”और डार्लिंग, तुमने जो कल अपनी कविता फेसबुक पर पोस्ट की थी, कितने लाइक्स हो गए? कमेंट्स कैसे आए?”

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रेनू ने झट अपना फोन उठाया. अपनी पोस्ट मुझे दिखाई, ”देखो विजय, ५० लाइक्स हो गए. ८० कमेंट्स. ये तो उन लोगों ने जान-बूझकर कोई कमेंट नहीं किए, जो मेरी इस प्रतिभा से जलते हैं. वे बड़ा दिल दिखाते, तो सोचो कितने लाइक्स और मिल जाते, पर ख़ैर, मैंने अब सोच लिया है कि मैं तो बहुत लिखूंगी. सब मेरी कविता पढ़-पढ़ झूम उठते हैं. कहते हैं कि मैं अब तक क्यों नहीं लिख रही थी.‘’
फिर रेनू ने एक ठंडी सांस लेते हुए कहा, ”उन्हें क्या पता, कैसे चूल्हे-चौके में कविताएं दबी पड़ी थीं. और हां, तुम्हें टाइम नहीं मिला था न, ये पढ़ने का! रुको, तुम्हे ख़ुद सुनाती हूं.” यहां मैं डरपोक बन गया. हिम्मत नहीं हुई कि कहूं, प्लीज़ मुझे मत सुनाना अपनी लिखी कविता!
रेनू मुझे अपनी कविता सुना रही थी, ”बन बन डोलूं, कहां कहां डोलूं, कहां हो प्रिय, तुम्हे खोजती डोलूं.. मॉल में डोलूं, मार्किट में डोलूं, कहां खोये प्रिय, दीवानी सी डोलूं…”
अपनी यह महान कविता सुनाकर उसने मुझे यूं देखा जैसे वह टैगोर हो और मैं कोई अनपढ़. बोली, ”अच्छी है न!”
मैंने अपने दिल का दर्द छुपा लिया. मुंह से तो बोल न फूटा, उसका हाथ अपने हाथ में लेकर किस कर दिया. बोल ही नहीं पाया कि क्या बकवास लिखा है. वह अब बहुत अच्छे मूड में थी. बोली, “चलो, तुम्हारी चाय भी हो गई, जब तक बच्चे खेल कर आते हैं, मैं अपनी कविता फाइनल कर लेती हूं.‘’
वो तो गुनगुनाती चली गई और मुझे छोड़ गई अपनी कविता के बोझ तले मेरे दुख के साथ. आपने कभी सोचा है कि इस समय मेरे जैसे पति क्या करते हैं, अच्छी एक्टिंग करते हैं! अपना दर्द छुपा कर मुस्कुराते हैं. पत्नी की प्रतिभा को दबाने का जोख़िम भी नहीं ले सकते. नहीं तो रो-रोकर इस पर ही कुछ बकवास लिख दिया जाएगा.


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मैं अब बैठकर उस मनहूस घड़ी को कोस रहा था जब रेनू ने पता नहीं क्यों पहली बार एक बेकार-सी चार लाइन्स लिखकर फेसबुक पर पोस्ट कर दी थी. फेसबुक, नहीं मैं अब इसे फ़ेकबुक कहता हूं, एक से एक मीठे झूठ दिनभर बोले जाते हैं. रेनू की कई सहेलियां आजकल कविता के नशे में डूबी हैं, ये सब एक-दूसरे की तारीफ़ करती हैं. बड़े-बड़े कमेंट्स लिखती हैं और फिर फोन पर उसी कविता को बकवास कहकर मज़ाक उड़ाती हैं.
भाई, तुम लोग एक-दूसरे की झूठी वाहवाही क्यों करती हो. क्यों एक-दूसरे को चने के झाड़ पर इतना चढ़ा देती हो कि वहां से उन्हें फिर सब दिखना बंद हो जाता है. क्यों साफ़़-साफ़ नहीं बताती कि बहन, ‘तू रहने दे, तू मत लिख. तू बोर करती है. हम तो तेरी कविता कभी पूरी पढ़ते ही नहीं…’ पर नहीं, ऐसा बहनापा दिखाती हैं कि जो लाइक कर दे, वह अच्छा, जो न करे, वह हिटलिस्ट में आ जाता है.
मैं जब कभी आजकल फेसबुक पर जाता हूं, तो घबरा जाता हूं. मुझे टैग करके रेनू जो कविताएं लिखती है, उस पर कमेंट्स पढ़ कर सोच में पढ़ जाता हूं कि कहीं मैं ही तो इतना बद्ज़ौक नहीं कि रेनू की कविताएं समझ न पा रहा होऊं. मेरे घर में एक महादेवी हो और मुझे पता ही न हो. पर नहीं, मैं जब ऑफिस में जाता हूं, मेरे जिगरी दोस्त एक अलग-सी मुस्कान के साथ जब कहते हैं, ‘’और यार, तुमने कभी बताया नहीं कि भाभी इतनी महान कवियित्री हैं.” और कहकर जब वे हंस देते हैं, तो मुझे समझ आ जाता है कि नहीं, मैं ग़लत नहीं. ये मेरे दोस्त हैं, मैं इनकी एक-एक नस जानता हूं, जो मैं सोचता हूं, वही ये भी सोचते हैं.
आज पूछ रहे थे, ”यार, तुम कहीं चले गए थे?”
मैंने पूछा था, ”क्यों?”
”भाभी तुम्हे ढूंढ़ती डोल रही हैं.‘’
मैं समझ गया था कि फिर कोई कविता फूटी है, अब समझ आया यही कविता थी, जो मुझे अभी सुना कर गई थी.
इतने में बच्चे खेल कर आ गए, पूछा, मम्मी कहां हैं?”
”कोई कविता लिख रही हैं.‘’
बच्चों का मुंह उतर गया, ”फिर से?”
मैं चौंका, ”हां, पर क्या हुआ?”
”आज स्कूल में अजय कह रहा था कि तेरी मॉम आजकल खाली हैं क्या? कुछ भी लिखती हैं, मेरी मॉम हंस रही थी.”
बेटी हंसी, ”आपने उनकी कल की कविता देखी, बन बन डोलूं…”
मैं भी हंस दिया. बेटे ने कहा, ”पापा, हम उन्हें बता नहीं सकते कि वे न लिखें, तो अच्छा रहेगा, क्यों अपनी एनर्जी वेस्ट कर रही हैं.”
”नहीं.. नहीं.. बेटा, जिसे फेसबुक पर इतनी झूठी वाहवाही मिल जाए, वह नहीं रुकेगा. वह हमसे सच नहीं सुन सकेगा. अब तुम्हारी मां को रोकना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है.”

Vyangy


बच्चे हंसकर फ्रेश होने चले गए. हम तीनों एक साथ ही बेड पर लेट गए. किसी ने रेनू को डिस्टर्ब नहीं किया था. वह ख़ुद ही थोड़ी देर में एक पेपर लिए विजयी भाव से आई और वह पसीना पोछा, जो हमें दिखा ही नहीं था. बोली, ‘’आख़िर कर ली पूरी. तुम लोग सुन लो, तो फेसबुक पर डाल दूं.‘’
बच्चे सयाने हैं, बोले, ‘’मम्मी, पापा को सुना दो, हम होम वर्क करने जा ही रहे थे.‘’
रेनू ने घुड़की दी, ”सुन कर जाओ.‘’
रेनू ने सुनाना शुरू किया, ”कल मेड नहीं आएगी, काम बहुत होगा.. बर्तन तो धो लूंगी, पर पोंछा न होगा.. कमर भी दुखेगी, सिर भी दुखेगा.. सारा दिन थक जाऊंगी, डिनर में सिर्फ पुलाव होग…‘’
हम तीनों को एक धक्का लगा. इतनी बेकार कविता. ये फेसबुक पर डालेगी. इशारे से रेनू ने पूछा, ”कैसी लगी?”
हमसे भी बोला न गया, इशारे से ही जवाब दिया, ”बहुत बढ़िया.‘’
”तो फिर अभी आई, पोस्ट कर देती हूं.‘’
बच्चे भी मुझे देखकर हंसकर चले गए, वह भी चली गई. मेरा रोम-रोम कह रहा था, ‘प्रिये, मत लिखो कुछ, प्लीज़ लिखना छोड़ दो. तुमसे न होगा प्रिये… तरस खाओ सब पर…’ दिल चीख रहा था, पर कौन सुनता. रेनू तो अपनी कविता पोस्ट करने जा चुकी थी.

Poonam Ahmed
पूनम अहमद


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Vyangy

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“गोया तुम्हें अभी भी मुझसे मोहब्बत है.”
“मुहब्बत और लेखक से. मैं इतना भी मूर्ख नहीं!”
“आख़िर तुम्हें एक लेखक से इतनी नफ़रत क्यों है?”
“तुम्हे पता है कि जिस्म का हर अंग रेस्ट करता है, सिर्फ़ दिल को ऐसी सज़ा दी गई है कि उसे दिन-रात जागते रहना है. मेरी ट्रेजेडी ये है कि मैं लेखक के जिस्म में हूं और लेखक जल्दी मरते ही नहीं.”
“क्या बकवास है.”

अब इसमें मेरा क्या कसूर. शाम को अच्छा भला था, सुबह बारिश होते ही बौरा गया. मैने अपने दिल से बातचीत शुरू की, “हाय! कैसे हो?”
“तुम से मतलब?”
“काहे भैंसे की तरह भड़क रहे हो. मैंने तो सिर्फ़ हालचाल पूछा है. शाम को तुम नॉर्मल थे, सुबह का मॉनसून देखकर भड़के हुए हो, दिले नादान तुझे हुआ क्या है.”
“जहां बेदर्द मालिक हो, वहां फरियाद क्या करना. काश मैं किसी आशिक के जिस्म में होता. मजनू, फरहाद, रोमियो में से किसी के बॉडी में फिट कर देते, पर क़िस्मत की सितमज़री देखो, लेखक के पहलू में डाल दिया. दुनिया बनानेवाले क्या तेरे मन में समाई…”
मुझे हंसी आ गई, “अब बगावत करने से क्या हासिल होगा. आख़री वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमा होंगे. तुम्हें तीस साल पहले सोचना चाहिए था.”
“बस यही तो रोना है. मुझे सोचने की सलाहियत नहीं दी गई. तुम्हारे सिर के अंदर जो सलाद भरा है, वो तय करता है कि मुझे कब रोना है और कब आत्मनिर्भर होना है. तुम्हारे पल्ले बंध कर रोना रूटीन हो गया और आत्मनिर्भरता ख़्वाब.”
“दिल को संतोषी होना चाहिए.”
“दिल पर दही की जगह नींबू मत टपका. अभी जाने कब तक सज़ा काटनी होगी. ज़िंदगी में कोई चार्म नहीं रहा. लेखक का दिल होना किसी अभिशाप से कम नहीं है. हमें काश तुमसे मोहब्बत न होती.”
“गोया तुम्हें अभी भी मुझसे मोहब्बत है.”
“मुहब्बत और लेखक से. मैं इतना भी मूर्ख नहीं!”
“आख़िर तुम्हें एक लेखक से इतनी नफ़रत क्यों है?”
“तुम्हे पता है कि जिस्म का हर अंग रेस्ट करता है, सिर्फ़ दिल को ऐसी सज़ा दी गई है कि उसे दिन-रात जागते रहना है. मेरी ट्रेजेडी ये है कि मैं लेखक के जिस्म में हूं और लेखक जल्दी मरते ही नहीं.”
“क्या बकवास है.”
“बकवास नहीं सच है. तुमने कभी किसी लेखक को सत्तर-अस्सी साल से पहले मरते हुए देखा?”
“मेरे पास इसका कोई रिकॉर्ड नहीं, पर तुम्हें किसी लेखक के बारे में ऐसा नहीं कहना चाहिए.”
“क्यों नहीं कहना चाहिए, जिस आदमी का किसी बैंक में सेविंग अकाउंट तक न हो, वो विजय माल्या और नीरव मोदी के खातों के जांच करवाने के लिए परेशान हो, तो बुरा तो लगेगा ही.”
“लेखक खुदा की बनाई हुई वो रचना है, जो समाज और सत्ता का प्रदूषण दूर करने में उम्र ख़र्च कर देता है. वो अतीत से ऑक्सीजन लेता है और वर्तमान से नाख़ुश रहता है. दुनिया के लिए भविष्य की अपार संभावनाओं की तलाश करनेवाला लेखक अक्सर अपने बच्चों को ख़ूबसूरत भविष्य नहीं दे पाता. हक़ीक़त में वो वर्तमान समाज का पंखहीन फ़रिश्ता है.”
“अपनी तारीफ़ कर रहे हो. बाई द वे, तुम्हें लेखक होने की सलाह किसने दी थी?”


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“यही तो रोना है कि ये सलाह किसी ने नहीं दी. इस दरिया ए आतिश में उतरने का फ़ैसला मेरा ही था.”
दिल बड़बड़ाया, “जैसा करम करोगे, वैसा फल देगा भगवान.”
हर इंसान के दिल की बनावट एक जैसी होती है, लेकिन कुंडली एक जैसी नहीं होती है. करनेवाला दिमाग़ होता है, लेकिन इल्ज़ाम दिल पर लगता है, “शादी शुदा थे, लेकिन अपने से आधी उम्र की लड़की पर दिल आ गया. दिल ही तो है. इसमें खां साहब का क्या कुसूर? दिल के हाथों मजबूर हो गए.” (पता लगा कि दिल के हाथ-पैर भी होते हैं!)
आदमी गुनाह करने के बाद भी बेक़सूर बताया जाता है. सारी ग़लती दिल की होती है. सुपारी काटने से लेकर सज़ा काटने तक सारा कुकर्म दिल करता है, तो फिर शरीर का क्या क़ुसूर! लेकिन इसके बावजूद दिल के बारे में दलील दी जाती है- दिल तो बच्चा है जी! अस्सी साल तक जिसका बचपना न जाए , वो क़ुसूरवार नहीं माना जाएगा. इसका फ़ायदा उठाकर दिल एक से एक खुराफ़ात करता रहता है, ‘टकरा गया तुमसे दिल ही तो है. दिल और दिमाग़ में ज़्यादा खुराफ़ाती कौन है, इसे लेकर साहित्यकारों और साइंसदानों में सदियों से बहस छिड़ी है. वैज्ञानिक कहते हैं, ‘जब पूरा शरीर दिमाग़ के आधीन है, तो दिल की क्या बिसात. ऐसे में दिल बेचारा बिन ‘सजना’ (दिमाग़) के माने न…
इंसान जान-बूझकर दिल को कटघरे में खड़ा करता है, ‘ये दिल ये पागल दिल मेरा… करता फिरे आवारगी…’ मैंने तो दिल के हाथों मजबूर होकर तीसरी शादी कर ली. अच्छा तो गोया दिल ने गला दबा दिया था. दिले नादान तुझे हुआ क्या है. इतनी गुंडागर्दी का सबब क्या है. लोग दिल की आड़ में कितनी पिचकारी चलाते हैं. हमारे एक परिचित के दिमाग में ‘हनुमान ग्रंथि’ उग आई है. वो हमेशा अपने मित्रों की इमेज़ के लंका दहन में ही लगे होते हैं. वो भी सारा किया धरा दिल पर मढ़ देते हैं- दिल है कि मानता नहीं…
बच के रहना रे बाबा- दिल तो छुट्टा (सांड) है जी…

सुलतान भारती


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अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ानेवाले हिंदी के अध्यापक बुद्धिलाल जी क्लॉस में छात्रों को शिक्षा दे रहे हैं- हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, आओ इसे विश्वभाषा बनाएं. रमेश, गेट आउट फ्रॉम द क्लास. नींद आ रही है, सुबह ब्रेकफास्ट नहीं लिया था क्या. यू आर फायर्ड फ्रॉम द क्लॉस.. नॉनसेंस!.. (अंग्रेज़ी बेताल बनकर हिंदी की पीठ पर सवार है)







अपने देश की राष्ट्रभाषा हिंदी है, इसका पता दो दिन पहले मुझे तब लगा, जब मै अपने बैंक गया था. आत्मनिर्भर होने के एक कुपोषित प्रयास में मुझे अकाउंट से तीन सौ रुपया निकालना था. बैंक के गेट पर ही मुझे पता चल गया कि देश की राष्ट्रभाषा हिंदी है. गेट पर एक बैनर लगा था- हिंदी में काम करना बहुत आसान! हिंदी में खाते का संचालन बहुत आसान है! हिंदी अपनाएं ! हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है!

      अंदर सारा काम अंग्रेज़ी में चल रहा था. मैंने मैडम को विदड्रॉल फॉर्म देते हुए कहा, “सो सॉरी, मैंने अंग्रेज़ी में भर दिया है!” उन्होंने घबरा कर विदड्रॉल फॉर्म को उलट-पलट कर देखा, फिर मुस्कुराकर बोली, “थैंक्स गॉड! मैंने समझा हिंदी में हैै. दरअसल वो क्या है कि माई हिंदी इज सो वीक.”

“लेकिन बैंक तो हिंदी पखवाड़ा मना रहा है?”

 “तो क्या हुआ. सिगरेट के पैकेट पर भी लिखा होता है-स्मोकिंग इज़ इंजरस टू हेल्थ.. लेकिन लोग पीते है ना.” 

लॉजिक समझ में आ चुका था. सरकारी बाबू लोग अंग्रेज़ी को सिगरेट समझ कर पी रहे थे, जिगर मा बड़ी आग है… ये आग भी नासपीटी इंसान का पीछा नहीं छोड़ती. शादी से पहले इश्क़ के आग में जिगर जलता है और शादी के बाद ज़िंदगीभर धुंआ देता रहता है. अमीर की आंख हो या गरीब की आंत, हर जगह आग का असर है. सबसे ज़्यादा सुशील, सहृदय और सज्जन समझा जानेवाला साहित्यकार भी आग लिए बैठा है. लेखक को इस हक़ीक़त का पता था, तभी उसने गाना लिखा था- बीड़ी जलइले जिगर से पिया, जिगर मा बड़ी आग है… आजकल जिगर की इस आग को थूकने की बेहतरीन जगह है- सोशल मीडिया (कुछ ने तो बाकायदा सोशल मीडिया को टाॅयलेट ही समझ लिया है, कुछ भी कर देते हैं) साहित्यकार और सरकारी संस्थान न हों, तो कभी न पता चले कि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है. वो बैनर न लगाएं, तो हमें कभी पता न चले कि अंग्रेज़ी द्वारा सज़ा काट रही हिंदी को पैरोल पर बाहर लाने का महीना आ गया है.

         अंग्रेज़ी अजगर की तरह हिंदी को धीरे-धीरे निगल रही है और सरकार राष्ट्रभाषा के लिए साल का एक महीना (सितंबर) देकर आश्वस्त है. देश में शायद ही कोई एक विभाग होगा, जिसका सारा काम अंग्रेज़ी के बगैर हो रहा हो, मगर ऐसे हज़ारों महकमे हैं, जो हिंदी के बगैर डकार मार रहे हैं. सितंबर आते ही ऐसे संस्थान विभाग को आदेश जारी करते हैं- बिल्डिंग के आगे-पीछे ‘हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है’ का बैनर लगवा दो. एक महीने की तो बात है. हंसते-हंसते कट जाए रस्ते, यू नो…

      सितंबर की बयार आते ही मरणासन्न हिंदी साहित्यकार का ऑक्सीजन लेवल नॉर्मल हो जाता है. कवि कोरोना पर लिखी अपनी नई कविता गुनगुनाने लगता है- तुम पास आए, कवि सम्मेलन गंवाए, अब तो मेरा दिल, हंसता न रोता है.. आटे का कनस्तर देख कुछ कुछ होता है…

मुहल्ले का एक और कवि छत पर खड़ा अपनी नई कविता का ताना-बाना बुन ही रहा था कि सामने की छत पर सूख रहे कपड़ों को उतारने के लिए एक युवती नज़र आई. बस उसकी कविता की दिशा और दशा संक्रमित हो गई. अब थीम में कोरोना भी था और कामिनी भी. इस सिचुएशन में निकली कविता में दोनों का छायावाद टपक रहा था- कहां चल दिए इधर तो आओ, पहली डोज का मारा हूं मैं, अगली डोज भी देकर जाओ…

      अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ानेवाले हिंदी के अध्यापक बुद्धिलाल जी क्लॉस में छात्रों को शिक्षा दे रहे हैं- हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, आओ इसे विश्वभाषा बनाएं. रमेश, गेट आउट फ्रॉम द क्लास. नींद आ रही है, सुबह ब्रेकफास्ट नहीं लिया था क्या. यू आर फायर्ड फ्रॉम द क्लॉस.. नॉनसेंस!.. (अंग्रेज़ी बेताल बनकर हिंदी की पीठ पर सवार है)

           राष्ट्रभाषा हिंदी का ज़िक्र चल रहा है. सरकारी प्रतिष्ठान जिस हिंदी के प्रचार प्रसार की मलाई सालों साल चाटते हैं, उन में ज़्यादातर परिवारों के बच्चे अंग्रेज़ी मीडियम स्कूल में पढ़ते हैं. हिंदी को व्यापक पैमाने पर रोटी-रोज़ी का विकल्प बनाने की कंक्रीट योजना का अभाव है. लिहाज़ा हिंदीभाषी ही सबसे ज़्यादा पीड़ित हैं. सरकारी प्रतिष्ठान सितंबर में हिंदी पखवाड़ा मना कर बैनर वापस आलमारी में रख देते हैं. अगले साल सितंबर में वृद्धाश्रम से दुबारा लाएंगे.

     ऐ हिंदी! पंद्रह दिन बहुत हैं, ग्यारह महीने सब्र कर. अगले बरस तेरी चूनर को धानी कर देंगे…





     – सुलतान भारती






Satire Story

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आस्था का फूड चार्ट काफ़ी लंबा है. पहले ये सिर्फ़ जानवर की बलि लेती थी, अब आदमी भी इसकी हिट लिस्ट में है. हर धर्म में आस्था के शिकारी और व्यापारी शिकार मौजूद हैं. इनकी यूनिफॉर्म अलग हो सकती है, पर धंधा एक ही है. आस्था के उस्तरे से जनता का मुंडन करना!

अल्लाह झूठ न बोलाए.. आजकल अजगर से ज़्यादा आस्था से डर लगने लगा है. क्या पता कब निगल जाए. आस्था और अजगर में गज़ब की समानताएं हैं. दोनों ही ज़िंदा प्राणी को जकड़ कर शिकार करते हैं. दोनों का शिकार तिल-तिल कर मरता है. फ़र्क बड़ा मामूली है. बेचारा अजगर नाशवान है. आस्था अजर अमर है!
अजगर छुपकर शिकार करता है, जबकि आस्था खुलेआम मजमा लगा कर शिकार करती है. अजगर के शिकार करने की एक लिमिट है (एक शिकार निगलने के बाद वो महीनों शिकार के क़रीब नहीं जाता!). आस्था का शिकार से कभी पेट नहीं भरता. वह हर वक़्त शिकार को पुकारता रहता है- “खुला है मेरा पिंजरा आ मोरी मैना…”
अंधी आस्था कोरोना से ज़्यादा घातक है. अंध आस्था से संक्रमित जीव को कोई दवा सूट नहीं करती. भरपूर ऑक्सीजन में भी फेफड़े प्रॉपर सांस नहीं लेते! आस्था से पीड़ित मरीजों के तारणहार का एड्रेस पब्लिक शौचालय में मिलता है. ऊपरी हवा, गुप्त रोग, काला जादू, सफ़ेद टोटका, नाकाम इश्क़ और इकतरफ़ा मुहब्बत में कामयाबी के लिए काली भक्त बंगाली बाबा सूफी कोरोना शाह से मिलें… (छिछोरे आशिक तुरंत ताबीज़ लेने निकल पढ़ते है) यहां तर्क बुद्धि, विवेक और आंखवालों का प्रवेश वर्जित है. इसलिए जूते के साथ इन्हें भी बाहर उतार कर आएं. आस्था को देखने के लिए आंखें बन्द करनी पड़ती हैं.
आस्था का फूड चार्ट काफ़ी लंबा है. पहले ये सिर्फ़ जानवर की बलि लेती थी, अब आदमी भी इसकी हिट लिस्ट में है. हर धर्म में आस्था के शिकारी और व्यापारी शिकार मौजूद हैं. इनकी यूनिफॉर्म अलग हो सकती है, पर धंधा एक ही है. आस्था के उस्तरे से जनता का मुंडन करना! फिर चाहे अजमेर हो या अयोध्या, कोई फ़र्क नहीं पड़ता! पब्लिक के लिए जो धर्म है, इनके लिए धंधा! पब्लिक आस्था लेकर जाती है, आह लेकर आती है. आस्था से लैस शिकारी पाप-पुण्य की अनुभूति से मुक्त होकर शिकार को नोचता है. चूंकि वह पृथ्वी पर ईश्वर/अल्लाह का अधिकृत प्रतिनिधि है. अत: उसे नर्क और दोजख का कोई भय नहीं होता. स्वर्ग और नर्क की चिंता जनता का मैटर है.
कई साल पहले ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की ज़ियारत के लिए अजमेर गया था. जब गया, तो अकीदत से लबालब था. लौटा तो ऐसा लग रहा था गोया किसी ने मेरी किडनी निकाल ली हो! वहां जाकर महसूस किया कि जेबकतरों का एक गिरोह दरगाह के बाहर सक्रिय है, दूसरा दरगाह के अंदर. बाहरवाले छुप-छुपाकर जेब काटते हैं. अंदरवाले गाव तकिया लगा कर खुलेआम कार सेवा करते हैं. बाहरवाले से आप बच सकते हैं, अंदरवाले से नहीं! जैसे माॅनसून से लदे बादलों को मोर पहचानकर नाचने लगता है, ठीक वैसे जेब में ‘माॅनसून ‘ लेकर आए भक्तों को मुज़ावर ताड़ लेते हैं. मुण्डन से पहले आवभगत कुछ इस तरह शुरू होती है- “आइए हजरत क्या नाम है आपका?”

Satire Story


“सय्यद मुहम्मद जमील.”
“माशा अल्लाह! सय्यद हैं आप! सय्यद साहब अपना एड्रेस बताइए.” (आप ख़ुशी-ख़ुशी पता लिखाते हैं) अब आस्था पर उस्तरा शुरू हुआ, “कितना नज़राना दे रहे हैं? निकालिए.”
आप एफिल टॉवर से फिसलकर बंगाल की खाड़ी में आकर गिरते हैं.
“कैसा नज़राना. मैं समझा नहीं… “
“इतने बड़े बुज़ुर्ग दीन के दरबार में खड़े होकर बखील होना ठीक नहीं, निकालिए नज़राना!” इस बार उसका लहजा दबंगई का था.
“बुज़ुर्गाने दीन को पैसे की क्या ज़रूरत?”
अब खादिम की त्योरी चढ़ गई, ”दिल्ली से पैदल चल कर आए हो क्या? तुम भी तो यहां कुछ मांगने ही आए हो! कुछ पाना है, तो जेब ढीली कर. इस हाथ दे उस हाथ ले.”
मैंने सोचा बहस बेकार है. ज़्यादा बहस किया, तो अंदर ज़ियारत भी नहीं करने देगा. चुपचाप सौ रुपए का नोट पकड़ा दिया. नोट लेकर उसने मुझे ऐसे देखा गोया कह रहा हो- इतनी छोटी औकात! आइंदा ध्यान रखना, यहां के हम सिकंदर. (मुझे बनारस के पंडों पर बनी दिलीप कुमार की फिल्म संघर्ष याद आ गई).
बाहर की दुकानों पर जायरीनों के लिए बिकनेवाली चादर, फूल,शीरीनी की दुकानों पर खादिम के ही आदमी बैठे हैं. मजार से घूम कर ये चादरें दुबारा बिकने आ जाती हैं. आस्था का कोल्हू बगैर बैल के चालू है. ख़्वाजा साहब की नेमप्लेट लगाकर श्रद्धालुओं का जूस निकाला और बेचा जा रहा है. जानेवाले लोगों की मुरादें पूरी हों या न हों, पर आस्था के अंगुलिमाल का टार्गट तो कोरोना भी नहीं रोक पाता. जेब में रखी सारी आस्था दे दे.. मुरादें ले ले… (वरना बददुआ का भी व्यापक इंतज़ाम है).
अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के अस्तित्व का तो एक सच्चा इतिहास है, पर आस्था के खुदरा कारोबार चलानेवालों ने तो दूर-दराज गांवों में हज़ारों कल्पित सूफी, ख़्वाजा या शहीद बाबा की प्राण प्रतिष्ठा कर दी है. यहां आस्था के लोबान में घर की जीडीपी जलती है. ऐसी हर मजार की तहकीक करने पर लगभग एक जैसी कहानी बताई जाती है.
“एक बार की बात है, गांव के सुकई चच्चा का रात में पेट ख़राब हुआ, तो वो लोटा लेकर उधर झाड़ियों में चले गए. रात के दो बजे थे. अभी वो धोती खोल कर बैठे ही थे कि सफ़ेद कपड़े में तलवार लिए एक बुज़ुर्ग काले घोड़े पर बैठकर झाड़ियों से बाहर निकले और कड़ककर बोले, “मेरी मजार के पास पेट खाली कर रहा है. यहां पर मेरा मजार बनवा, वरना गांव में तबाही आ जाएगी.” बस तब से घोड़े वाले बाबा की कृपा से सुकई के घर में किसी का पेट नहीं ख़राब हुआ. साल में दो बार उर्स होता है.
गांवों में ऐसे शहीद बाबा बहुत हैं, जिनकी कोई शिनाख्त नहीं, पर किवदंतियां अनंत हैं. आस्था के कई कोलंबस, तो सरकारी ज़मीन, विवादित भूखंड, रेलवे प्लेटफॉर्म और हाईवे के बीचोंबीच डिवाइडर के नीचे भी शहीद बाबा को भी ढूंढ़ लेते हैं. गांवों में पाए जानेवाले इन दिव्य शहीद और सूफी बाबाओं की हिंदू वर्जन विभूतियां अनंत हैं. जगह-जगह पीपल पर पहलवान वीर बाबा उपलब्ध हैं, जो भाग्यशाली भक्तों को सिर्फ़ रात में दिखाई देते हैं (शहीद बाबा और पहलवान बाबा दिन में शायद सोशल डिस्टेंसिंग के चलते बाहर नहीं निकलते).
खौफ़- अकीदत का ऑक्सीजन है. भय के बगैर आस्था दूध कहां देती है. खौफ़ बरक़रार रहे, तो तारणहार का वेट लॉस नहीं होगा. आस्था की तहबाजारी वसूलने में लगे महापुरुष जानते हैं कि प्राणी दिव्य और अलौकिक की खोज में ज़्यादा घूमता है. जिन्न, खबीस, चुड़ैल, प्रेत, शहीद बाबा, पिशाच या पहलवान बाबा की सवारी कभी ग़लती से भी पढ़े-लिखे आदमी पर नहीं आती. ये महान विभूतियां हमेशा ग़रीब और अनपढ़ को ही चुनती हैं.
हमारे बचपन की एक कहानी है. उर्स के मौक़े पर एक अनपढ़ और गैर नमाजी आदमी पर शहीद बाबा की सवारी आ गई. वह ढोंगी आदमी तुरंत सम्मानीय और पूज्यनीय हो गया. अनपढ़ और पढ़े-लिखे सभी नर-नारी उसे अपनी-अपनी घरेलू समस्याएं बताने लगे. अब खुदा ने मैदान छोड़ दिया था और सारा चार्ज शहीद बाबा का प्रतिनिधि संभाल चुका था. तभी गांव के प्रधान ने धीरे से पूछा, “शहीद बाबा, आपका नाम क्या है?”
इस आकस्मिक सवाल के लिए शहीद बाबा बिल्कुल तैयार नहीं थे, मगर देर तक चुप्पी आस्था के दूध में नींबू साबित हो सकती थी. उन्होंने जल्दबाज़ी में जवाब दिया, “मेरा नाम अनजनते (कुछ पता नहीं) है. तब से आज तक उस मजार को अनजनते शहीद की मजार के नाम से जाना जाता है. बहुत दिनों से उपेक्षित उस मजार पर पिछले साल से बेकारी के मारे एक नौजवान ने चार्ज संभाल लिया है. देखते हैं कि घोड़ा समेत शहीद बाबा झाड़ियों से किस जुमेरात को बाहर आते हैं!..

– सुलतान भारती

Kahaniya


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”हां, आप उस बात पर ध्यान दो कि पापा लोग कैसे एक घर में ही सेफ चल रहे हैं. पिछले दिनों जब ट्विंकल को, उसके भाई और मम्मी को कोरोना हुआ, तो सिर्फ़ उसके डैडी को नहीं हुआ था. आप ही बताओ, कैसे दूर-दूर रहते होंगे वे सबसे, जो उन्हें नहीं हुआ. हम यही बात कर रहे थे कि ये डैडी लोग क्या मम्मी लोगों से भी एक उम्र के बाद दूर रहने लगते हैं कि मम्मीयों से भी उन्हें कोरोना नहीं हुआ?”
मैंने अपनी हंसी मन ही मन रोकते हुए बीच में ही बात काट दी, ”क्या-क्या बेकार की बातें करने लगे हो तुम लोग आजकल? कोई और काम नहीं है क्या? ये खोजबीन डॉक्टर्स पर छोड़ दो.”

यह कब सोचा था कि कोई ऐसी बीमारी भी कभी आएगी, जो इंसान को बदनाम भी कर सकती है. शारीरिक परेशानियों की बात तो अलग है, ये कोरोना तो बहुत बुरा है, बदनाम कर रहा है लोगों को. तीस साल के ट्विंकल, नीमा, शेखर, कुशल और रोमा जैसे शैतान बच्चों ने कोरोना के रंग-ढंग पर अपनी उम्र के स्टाइल में अलग ही रिसर्च शुरू कर दी है.
पांचों वर्क फ्रॉम होम करते हैं. खाली समय में आसपास के केसेस पर पैनी नज़र रखते हैं. अजीब टाइमपास करते हैं. मज़ेदार बात यह है कि अगर इन लोगों में से भी किसी के घर में किसी को कोरोना हुआ है, उसके ठीक हो जाने तक तो ये शांत रहते हैं, फिर उसके ठीक होते ही ऐसे जोक्स बनाते हैं कि मैं जब भी सुनती हूं, हंसती हूं, हैरान होती हूं कि ये लोग ही कोरोना पर जोक्स बना सकते हैं. बड़े तो आजकल जैसे हंसना ही भूल गए हैं. बड़ों में वैसे ही सेंस ऑफ ह्यूमर कम होता जा रहा था. अब तो कोरोना टाइम में बड़ों को जैसे एक ही टॉपिक पर चिंता करना रह गया है कि बचेंगें या नहीं!
नीमा, मेरी बेटी ने बहुत ही राज़दाराना स्वर में कहा, ”मम्मी, आपको पता है कुशल भी पॉज़िटिव हो गया है. अब देखना उसकी मम्मी को भी कोरोना होगा.’’ और फिर हंस पड़ी, ‘’और देखना, उसके पापा को नहीं होगा.‘’
मैंने पूछा, ”क्यों?”
उसने अपने पापा की तरफ़ घूरकर देखा, अजय कुछ समझ नहीं पाए, बोली, ”ये डैडी लोग कहां बच्चों को हग्गिंग, किसिंग करते हैं, एक दूरी बनाकर रखते हैं न, रौब मारना होता है. इसलिए मेरे दोस्तों और मुझे लगता है कि मम्मी और बच्चे लोगों को ज़रूर कोरोना होता है, पर हर घर में डैडी लोगों को कम हो रहा है. मांएं ही बच्चों को प्यार-दुलार करती रहती हैं न. हमने नोट किया है कि अगर किसी हमारे दोस्त को हो रहा है, तो मांओं को ज़रूर हो रहा है.‘’
अजय इस खुलासे पर ज़ोर से हंसे, ”अच्छा? ये पांच रत्नों की रिसर्च है? तुम बच्चे लोग अपनी मांओं से ही चिपटे रहते हो, तो बेचारे डैडी लोग क्या करें.”
पापा की लाड़ली ने ताना मारा, ”पापा लोग अपने बच्चों को कम प्यार करते हैं, यह अभी कोरोना टाइम में साफ़ होता जा रहा है.”

Rang Tarang


फिर खाली टाइम में मुझे पांच नए बने कोरोना रिसर्चर्स की बातें सुनाई देती रहीं. नीमा किसी से कह रही थी, ”अच्छा? देखा? हम कितने सही थे, ये डैडी लोग एक ही घर में कितना दूर रहते हैं कि साफ़ बच निकलते हैं!”
अजय भी लैपटॉप पर काम कर रहे थे. नीमा ने उन्हें बताया, ”देखा पापा, कुशल की मम्मी को भी कोरोना हो गया है और उसके पापा ठीक हैं.”
अजय ने कहा, ”यह तो अच्छी बात है कि वे ठीक हैं.”
”हां, आप उस बात पर ध्यान दो कि पापा लोग कैसे एक घर में ही सेफ चल रहे हैं. पिछले दिनों जब ट्विंकल को, उसके भाई और मम्मी को कोरोना हुआ, तो सिर्फ़ उसके डैडी को नहीं हुआ था. आप ही बताओ, कैसे दूर-दूर रहते होंगे वे सबसे, जो उन्हें नहीं हुआ. हम यही बात कर रहे थे कि ये डैडी लोग क्या मम्मी लोगों से भी एक उम्र के बाद दूर रहने लगते हैं कि मम्मीयों से भी उन्हें कोरोना नहीं हुआ?”
मैंने अपनी हंसी मन ही मन रोकते हुए बीच में ही बात काट दी, ”क्या-क्या बेकार की बातें करने लगे हो तुम लोग आजकल? कोई और काम नहीं है क्या? ये खोजबीन डॉक्टर्स पर छोड़ दो.”
”ये डैडी लोग!” कहकर अपनी गर्दन को झटका देती हुई नीमा वहां से चली गई. अजय ने एक ठंडी सांस लेते हुए कहा, ”यार, क्या बातें करते हैं ये लोग आजकल! मिल नहीं पाते तो सब के सब हमारे पीछे पड़कर अपना टाइमपास कर रहे हैं. बेचारा एक आदमी बच गया कोरोना से घर में तो यह भी उसकी ग़लती! कोरोना का वायरस तो हमें बदनाम कर रहा है.”
सचमुच आजकल यही देख रही हूं जब भी किसी घर में कोरोना के केस होते हैं, नीमा अपने दोस्तों से फोन पर यही कह रही होती है, “अच्छा? देखा? नहीं हुआ न अंकल को?.. जब सबके साथ किसी अंकल को भी होगा न, तो समझ जाएंगें कि अंकल भी घर में सबको प्यार करते हैं. सबसे मिलजुल कर रहते हैं.‘’
अजय ने यह बात सुनकर अपना सिर पीट लिया. कहा, ”अगर कहीं तुम दोनों को कोरोना हो गया और मुझे नहीं हुआ, तो यह लड़की तो सारी उम्र मुझे सुनाएगी.‘’ मुझे ज़ोर से हंसी आई.


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नीमा ने कहा, ‘’हां, और क्या. इसका क्या मतलब है कि मम्मी और मुझे हो जाए और आपको न हो. यह कैसे मुमकिन है? इसका साफ़-साफ़ मतलब यही है न कि बाहर की आई सारी चीज़ें मम्मी संभालती हैं और आप तो एक किनारे सारे दिन अपना लैपटॉप लेकर बैठे रहते हो.’’
अजय ने हाथ जोड़ लिए, तो वह भी हंस पड़ी.
डैडी लोगों पर तो अभी रिसर्च चल ही रही थी कि पड़ोस में सीमा रहती है. उसकी मां, उसकी बहन के साथ ही दूसरी बिल्डिंग में रहती है. सीमा की मां को कोरोना हुआ, तो सीमा उन्हें देखने, दूर से ही बहन से हालचाल लेने, कभी कुछ खाना देने जाती रही, सीमा के जीजा को भी फिर कोरोना हो गया. थोड़े दिन बाद ही सीमा भी कोरोना पॉज़िटिव हो गई. फिर सीमा के पति भी पॉज़िटिव हो गए.

Rang Tarang


अब कोरोना तो ऐसी बीमारी है न, जो अच्छे-भले इंसान को शक के दायरे में खड़ी कर सकती है. वही हुआ. थोड़े दिन बीतने के बाद जब सब ठीक हो गए, तो अजय ने कुछ शरारती मुस्कान के साथ कहा, ”रेखा, तुम्हे पता है मेरे दोस्त आज हंस रहे थे कि यह बताओ, सीमा की बहन को कोरोना नहीं हुआ, जीजा-साली को हो गया!”
मैंने कहा, ”शर्म करो, तुम लोग!” बाप-बेटी किसी को नहीं छोड़ते. जिसको हो, तो परेशानी, न हो तो भी परेशानी. ये नीमा और तुम लोग कैसी-कैसी बातें करते हो.”
”सोचकर देखो, फनी है न.”
”नहीं, ज़रा भी फनी नहीं होते ये कोरोना के शक के जोक्स.” मैंने आंखें तरेरी, तो पीछे से नीमा की फोन पर आवाज़ आई, ”क्या? आंटी और तू पॉज़िटिव हैं? अंकल को हुआ क्या?”
मैंने पूछा, ”क्या हुआ? अब किसे हो गया?”
”एक कॉलेज फ्रेंड और उसकी मम्मी को. इस घर में भी अंकल बाकी डैडी लोगों की तरह अभी तक ठीक हैं.” उसकी बात ख़त्म ही हुई थी कि मेरी ख़ास फ्रेंड रानी का फोन आ गया. पता नहीं कौन-सी घडी थी कि मैंने सब्जी काटते हुए फोन स्पीकर पर रख लिया. वो तो गनीमत है कि नीमा अपने रूम में जा चुकी थी. रानी बोल रही थी, ‘’एक बात बताओ रेखा, क्या पति-पत्नी एक उम्र के बाद प्यार करना बंद कर देते हैं?”


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वहीं बैठे अजय की आंखें इस गॉसिप को सुनने के उत्साह में चमक उठी थीं. मैं झेंप गई. मैंने कहा, ”क्या हुआ?”
”सामनेवाली भाभी को कोरोना हो गया है, भैया बिल्कुल ठीक हैं, कैसे?”
अजय ने अपनी हंसी बड़ी मुश्किल से रोकी हुई थी. मैंने टालने के लिए कहा, ”अभी कुछ काम कर रही हूं, फिर करती हूं बात.”
”अरे, सुन तो, भैया-भाभी अकेले रहते हैं. दोनों को होना चाहिए था न?”
मैंने जल्दी से, “अभी करती हूं…” कहकर फोन रख दिया. इतने में नीमा अपने रूम से आकर बोली, ”मम्मी, क्या हुआ? आज तो बड़ी जल्दी फोन रख दिया?”
‘हां, बिजी हूं.‘’
अजय कहां बाज आते, बोले, ‘’रानीजी को एक सवाल परेशान कर रहा था.”
मैंने कहा, ”चुप रहो.‘’
अजय ने नाटकीय स्वर में कहा, ”ये क्या बीमारी आई है यार. सब पर शक करवा रही है. और वो भी हम पुरुषों पर! हाय, कोरोना, हमें बदनाम करो न!’’
नीमा उन्हें घूरती रह गई, फिर बोली, ”मैं तो एक बात बताने आई थी कि अभी मेरी फ्रेंड कोमल का फोन आया है. उसे और उसके मम्मी-पापा तीनों को कोरोना हो गया है. यह होता है परिवार का प्यार! ये अंकल इसका मतलब फैमिली से मिलजुल कर रहते हैं, अच्छा है.”
मैं और अजय उसकी फिलॉसोफी पर उसका मुंह देखते रह गए थे.

पूनम अहमद

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सब्जेक्ट और माइंड दोनों सेट हैं. इसके बाद तो बुद्धि या विवेक को पास भी नहीं फटकने देते. अब योद्धा अपना ज्ञान उड़ेलता है, जिसे फौरन पंद्रह सौ लाइक और ९९९ कमेंट से बघार दिया जाता है (इतने योद्धा हर वक़्त कुरुक्षेत्र में मौजूद रहते हैं). इतना बुद्धि वैभव आते ही पैदल योद्धा ख़ुद को ऐरावत पर बैठा महसूस करता है.

अगर आप का मन लड़ने के लिए उतावला है और लॉकडाउन के चलते आप बाहर नहीं निकल पा रहे हैं, तो कोई बात नही. घर में फोन है ना. स्मार्ट फोन है जहां, हल्दी घाटी है वहां… योद्धा ही योद्धा… एक बार (फेसबुक में) घुस तो लें. सोशल मीडिया पर एक से एक महारथी चक्रव्यूह उठाए खडे हैं. बस उनके पोस्ट में एक बार नत्थी हो जाइए, फिर तो आपका शुद्धिकरण करके दम लेंगे. फेसबुक पर अनगिनत अक्षोहिणी सेनाएं (ग्रुप) मौजूद हैं, किसी में भी नत्थी हो जाइए. ऐसी पैदल सेना है, जिसमें ज़्यादातर अक्ल से पैदल हैं. ऐसे धर्म योद्धा हैं, जिनकी अक्ल ऑड-इवन के हिसाब से चलती है.
आजकल अनुकूल बयार पाकर इनके संस्कार का ऑक्सीजन लेवल सौ से ऊपर जा रहा है. संप्रदाय विशेष के बारे में इतनी रिसर्च पूर्ण जानकारी फेस बुक पर उड़लेते हैं कि इतिहासकार गश खाकर गिर जाए. यहां पर अपील, साक्ष्य, तर्क या प्रमाण का कोई विकल्प नहीं है. अब अगर विरोधी खेमें के किसी बुद्धिजीवी के ज्ञान में उबाल आ गया और उसने साक्ष्य मांग लिया तो बस… इस अक्षम्य अपराध के एवज में सैकड़ों ततैया बुद्धि वैभव लेकर टूट पड़ते हैं और आपत्ति दर्ज़ करानेवाले को अंतत: देशद्रोही साबित कर दिया जाता है.
सोशल मीडिया के कुछ विद्वान तो व्हाट्स ऐप और फेसबुक को सार्वजनिक शौचालय समझ बैठे है. बहस करो तो अक्ल का लोटा फेंक कर मारते हैं. घमासान जारी है, कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं. इस देवासुर संग्राम में बहुधा बुद्धिजीवी ही परास्त और अपमानित होता है. अनन्त योद्धा हैं और ब्रह्मांड तक फैला युद्धक्षेत्र. अक्ल के घोड़े दौड़ रहे हैं और घुड़सवार ख़ुद अक्ल से पैदल है. यहां युद्धविराम मना है. पूरी-पूरी रात योद्धा इतिहास खोदते रहते हैं. सुबह को जब दुनिया जाग कर काम में लगी होती है, तो ये योद्धा नींद में चरित्र निर्माण का अगला अध्याय ढूंढ़ रहे होते हैं. जागते ही सोशल मीडिया अकाउंट चेक करते हैं कि कहीं कोई हिरण्यकश्यप नत्थी हुआ या सारा अकाउंट अभी भी सात्विक है.
सब्जेक्ट और माइंड दोनों सेट हैं. इसके बाद तो बुद्धि या विवेक को पास भी नहीं फटकने देते. अब योद्धा अपना ज्ञान उड़ेलता है, जिसे फौरन पंद्रह सौ लाइक और ९९९ कमेंट से बघार दिया जाता है (इतने योद्धा हर वक़्त कुरुक्षेत्र में मौजूद रहते हैं). इतना बुद्धि वैभव आते ही पैदल योद्धा ख़ुद को ऐरावत पर बैठा महसूस करता है. कॉमेंट की सूक्ष्म जांच में विरोधी खेमे का देशद्रोही बरामद होते ही पांडव सेना जय श्री राम के उदगार के साथ दिन का पहला यलगार शुरू कर देती है. यहीं से संस्कार का माॅनसून शूरू हो जाता है.
ये विद्वता का निर्द्वंद मैराथन है, जहां प्रतिद्वंदी की टांग खींचने और गाली देने पर कोई पाबंदी नहीं है. सुविधा ये है कि प्रतिद्वंदी फेसबुक पर है फेस टू फेस नहीं. यह बेलगाम प्रतिभा का ऐसा अभयारण्य है, जहां द्रोण और एकलव्य दोनों का विवेक धर्म से संक्रमित है (एकलव्य की दलित विनम्रता ने उसे क्या दिया सिर्फ़ विकलांगता) महाभारत काल में कौरव खेमें में मीडिया की सुविधा के नाम पर सिर्फ़ संजय उपलब्ध थे. उनके पोस्ट का बेनिफिट सिर्फ़ दृष्टिहीन धृतराष्ट्र को था. संजय के ज्ञान को चुनौती गांधारी भी नहीं दे सकती थी, उसने ख़ुद ही आंख पर पट्टी बांध ली थी.
अब दोबारा सोशल मीडिया पर द्वापर लौट आया है. दिव्य ज्ञान से लैस तमाम संजय ज्ञानोपदेश में लगे हैं. धृतराष्ट्र झुंड के झुंड लाइक और कमेंट कर रहे हैं. ऐसे में अगर किसी ने बीच में पांडव बनने का प्रयास किया, तो उसके लिए लाक्षागृह तैयार है.
पिछले पखवाड़े फेसबुक पर हमारे दो मित्र इसी खाड़ी युद्ध में उलझ गए. पत्रकारिता और समाज सेवा को समर्पित दोनों महामानव सोशल मीडिया पर गुथ गए. कोई ग़लती मानने को राजी नहीं. दोनों अपने-अपने बायोडाटा से एक-दूसरे को दो दिन तक धमकाते रहे, पर शिमला समझैता हो न सका. कुछ बुद्धिजीवियों ने सुलह वाली पोस्ट डाली, तो कुछ ने पेट्रोल उड़ेला. तीसरे दिन दोनों फोन पर भिड़ गए. अब दो बुद्धिजीवी लंबे वक़्त के लिए विरोधी हो चुके हैं और ये सब हुआ दिल्ली में अगले साल होनेवाले नगर निगम चुनाव के ऊपर. इसी को कहते हैं- सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम लट्ठा… योद्धा तैयार हैं…
कोरोना ने हाय राम बडा दुख दीन्हा. काम धाम कुछ है नहीं. समय बिताने के लिए सोशल मीडिया पर जाता हूं, तो वहां फेसबुक वॉल पर ततैया छितराए बैठे हैं. कुछ मित्र सिर्फ़ इसलिए नाराज़ हैं कि मैं उनकी अद्वितीय रचनाओं पर मनभावन कमेंट नहीं करता. कई महामानव ऐसे हैं, जिन्हें सिर्फ़ नारियों की पोस्ट में विद्वता का छायावाद नज़र आता है. कुछ मित्रों ने अकारण ख़ुद को वरिष्ठ साहित्यकार मान लिया है और अपना लोहा मनवाने के लिए रोज़ पोस्ट का अश्वमेध यज्ञवाला घोड़ा छोड़ते हैं. समझदार और सहिष्णु लोग लाइक करके मुख्यधारा में बने रहते हैं. तर्क और विवेकवाले विरोध करते हैं और अगली सुबह मित्र सूची से सस्पेंड कर दिए जाते हैं. चलो रे डोली उठाओ कहांर… सोशल मीडिया तू ना गई मेरे मन से…

सुलतान भारती


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सबसे बड़ा सवाल तो यहां यह है कि महिलाएं पर्स में रखती क्या हैं? कोई डिटेक्टिव एक्टिव होकर इस बारे में पता करे, तो भी शायद पता न कर सके. महिलाओं की तरह ही उनका पर्स भी रहस्यमय होता है. अभी तक जब मनोवैज्ञानिक महिलाओं के बारे में ठीक से नहीं पता कर सके, तो महिलाओं के पर्स के बारे में पता कर लेना एक बड़ी चुनौती हमारे सामने आ खड़ी हुई है.

दोबारा इस लेख का शीर्षक पढ़ने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि आपने जो पढ़ा है, वह सच है. पर्स ही लिखा है, स्पर्श नहीं. बहुत सारे व्यापारियों को दिखाई नहीं देता, पर है ज़बर्दस्त व्यवसाय. पर्स उद्योग भी एक बड़ा उद्योग है. सोचिए देश में कितनी महिलाएं हैं. अगर एक महिला साल में एक भी पर्स ख़रीदती है, तो कितने करोड़ पर्स बिकते होंगे. सालाना कितने रुपए का टर्नओवर होगा. इसका हिसाब अगर आपको अर्थशास्त्र में रुचि है, तो कर लीजिएगा. हमें तो इस समय मात्र महिलाओं में, महिलाओं के पर्स में रुचि है, इसलिए यहां जो किसी को नहीं पता, वह जानकारी देने की कोशिश कर रहा हूं.
सबसे बड़ा सवाल तो यहां यह है कि महिलाएं पर्स में रखती क्या हैं? कोई डिटेक्टिव एक्टिव होकर इस बारे में पता करे, तो भी शायद पता न कर सके. महिलाओं की तरह ही उनका पर्स भी रहस्यमय होता है. अभी तक जब मनोवैज्ञानिक महिलाओं के बारे में ठीक से नहीं पता कर सके, तो महिलाओं के पर्स के बारे में पता कर लेना एक बड़ी चुनौती हमारे सामने आ खड़ी हुई है.
हमारे एक दोस्त का मानना है कि जिस दिन हम महिलाओं को पहचान लेंगे, उस दिन उनके पर्स के बारे में जानने की ज़रूरत नहीं रहेगी अथवा जिस दिन उनके पर्स के बारे में जान लेंगे, उस दिन महिलाओं के बारे में जानने की ज़रूरत नहीं रहेगी.
महिलाओं के पर्स के बारे में अब तक जो जानकारियां लीक हुई हैं, उसके अनुसार महिला का पर्स जितना बड़ा होगा, उसमें रखे रुपए के नोट उतने ही मुड़ेतुड़े होंगें. किसी महिला को नई नोट दीजिए, तब भी पर्स में रखने से पहले जितना हो सकेगा, वह उस नोट को मोड़ देगी.
महिलाओं के पर्स में जितना संभव हो सकता है, उतना बड़ा आईना होता है. अगर उसमें अटैच्ड आईना है, तो इस तरह का पर्स महिलाओं की पहली पसंद है. महिलाओं की अपेक्षा उनका पर्स अधिक रहस्यमय होता है, इसलिए ऐसे भी तमाम लोग हैं, जो महिलाओं की अपेक्षा उनका पर्स पाने की अधिक कोशिश करते हैं, जिन्हें हम चोर के रूप में जानते हैं.
मोबाइल रखने की व्यवस्था लगभग हर पर्स में होती है, पर उसकी ज़रूरत महिलाओं को मुश्किल से ही पड़ती है, क्योंकि मोबाइल तो वह हाथ में ही लिए रहती हैं. कुछ महिलाएं हैं, जो अपना मोबाइल पर्स में रखती हैं. यहां एक बात ध्यान देनेवाली होती है. महिलाओं का पर्स चाहे जितनी दूर रखा हो, चाहे जितना भी शोर हो रहा हो, मोबाइल की घंटी बजी नहीं कि उन्हें तुरंत पता चल जाता है कि उनका मोबाइल बज रहा है. जबकि पुरुषों की जेब में रखा मोबाइल बजता रहता है, पर उन्हें पता ही नहीं चलता. कान में आवाज़ पड़ते ही वे इधर-उधर ताकने लगते है कि घंटी कहां बज रही है.
मेरे एक दोस्त ने बताया कि महिलाएं बच्चे को सुला कर दूसरे कमरे में काम कर रही होती हैं, तो उनका ध्यान बच्चे पर ही लगा रहता है. बच्चा धीरे से भी रोता है, तो वे तुरंत सुन लेती हैं. उनका यही अनुभव मोबाइल की घंटी सुनने में काम आता है.
काफ़ी खोजबीन करने के बाद महिलाओं के पर्स की बस इतनी ही पर्सनल जानकारी मिल पाई है. इससे अधिक जानकारी प्राप्त करना संभव भी नहीं है, क्योंकि माना जाता है कि महिलाएं पुरुषों की सुरक्षा में होती हैं, जबकि पर्स तो ख़ुद महिलाओं की सुरक्षा में होता है.

– वीरेन्द्र बहादुर सिंह

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गांव के कुत्ते और शहर के डॉगी में वही फ़र्क होता है, जो खिचड़ी और पिज़्ज़ा में होता है. कुत्ता ऊपरवाले के भरोसे जीता है, इसलिए किसी कुत्ते को कोरोना नहीं होता. डॉगी को पूरे साल घर में रहने की क़ीमत चुकानी पड़ती है. कुत्ता हर संदिग्ध पर भौंकता है, जबकि डॉगी चोर और मालिक की सास के अलावा हर किसी पर भौंकता है.

माफ़ करना मै किसी का अपमान नहीं कर रहा हूं (मैं कुत्तों का बहुत सम्मान करता हूं). मैं कुत्तों के मामले में दख़ल नहीं देता. कुत्ते इंसान के मुआमलों में बिल्कुल दख़ल नहीं देते. लेकिन दोनों की फिजिक और फ़ितरत में भी बहुत फ़र्क है (आदमी कुत्ते जैसा वफ़ादार नहीं होता). लोग कहते हैं- तुख्म तासीर सोहबते असर! मगर कुत्ता पाल कर भी इंसान के अंदर कुत्तेवाली वफ़ादारी नहीं आती. चचा डार्विन से पूछना था कि जब बंदर अपनी पूंछ खोकर इंसान हो रहे थे, तो कुत्ते कहां सोए हुए थे? या फिर इंसान होना कुत्ते अपना अपमान समझ रहे थे.
कुत्तों से मेरा बहुत पुराना याराना रहा है. दस साल की उम्र में मुझे मेरे ही पालतू कुत्ते ने काट खाया था (मगर तब कुत्ता तो क्या नेता के काटने पर भी रेबीज़ का ख़तरा नहीं था). मुझे आज भी याद है कि कुत्ते ने मुझे क्यों काटा था. झब्बू एक खुद्दार कुत्ता था, जो अपने सिर पर किसी का पैर रखना बर्दाश्त नहीं करता था और उस दिन मैंने यही अपराध किया था. झब्बू ने मेरे दाएं पैर में काट खाया था. तब टेटनस और रेबीज़ दोनों का एक ही इलाज था, आग में तपी हुई हंसिया से घाव को दागना (इस इलाज़ के बाद टिटनस और रेबीज़ उस गांव की तरफ़ झांकते भी नहीं थे). ये दिव्य हंसिया ऑल इन वन हुआ करती थी, फसल और टिटनस के अलावा नवजात शिशुओं की गर्भनाल काटने में काम आती थी.
मुझे आज भी याद है कि जब गर्म दहकती से मेरा इलाज़ हो रहा था, तो मेरे कुत्ते की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था. वो ख़ुशी से अपनी पूंछ दाएं-बाएं हिला रहा था. दूसरी बार कुत्ते ने मझे पच्चीस साल की उम्र में तब काटा, जब मैं दिल्ली में था. उस दिन कुछ आवारा कुत्ते सड़क किनारे भौं-भौं कर आपस में डिस्कस कर रहे थे. ऐसी सिचुएशन में समझदार और संस्कारी लोग कुत्तों के मुंह नहीं लगते. मगर मैं गांव का अक्खड़ खामखाह उनकी पंचायत में सरपंच बनने चला गया. उन्होंने मुझे दौड़ा लिया. छे कुत्ते अकेला मै. एक कुत्ते ने दौड़कर पैंट का पाएंचा फाड़ा और पिंडली में काट खाया, मगर इस बार भी मैंने रेबीज़ का इंजेक्शन नहीं लगवाया (आदमी हूं, मुझे दिल्ली के प्रदूषण और अपने ज़हर पर भरोसा था).

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कुत्तों के काटने की दोनों घटनाएं सच हैं. मैंने कुत्तों पर बड़ी रिसर्च की है. हम इंसान गहन छानबीन के बाद भी किसी इंसान की पूरी फ़ितरत नहीं जान पाते. कुत्ते इंसान को सूंघकर ही उसका बायोडाटा जान लेते हैं. आपने कई बार देखा होगा कि स्मैकिए और पुलिसवालों को देखते ही कुत्ते भौंकने लगते है. वहीं पत्नी पीड़ित पति, रिटायर्ड मास्टर और हिंदी के लेखकों को देखते ही कुत्ते पूंछ हिलाने लगते हैं, गोया दिलासा दे रहे हों- रूक जाना नहीं तुम कहीं हार के बाबाजी- हम होंगे कामयाब एक दिन…
गांव के कुत्ते और शहर के डॉगी में वही फ़र्क होता है, जो खिचड़ी और पिज़्ज़ा में होता है. कुत्ता ऊपरवाले के भरोसे जीता है, इसलिए किसी कुत्ते को कोरोना नहीं होता. डॉगी को पूरे साल घर में रहने की क़ीमत चुकानी पड़ती है. कुत्ता हर संदिग्ध पर भौंकता है, जबकि डॉगी चोर और मालिक की सास के अलावा हर किसी पर भौंकता है. डॉगी को सबसे ज़्यादा एलर्जी इलाके के कुत्तों से होती है, जो उसे खुले में रगड़कर सबक देने की घात में होते हैं. कुत्ते जेब नहीं काटते और भूखे होने पर भी चोरी नहीं करते. कुत्ते और भिखारी में आदमी से ज़्यादा पेशेंस होता है.

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१८ साल दिल्ली के गोल मार्केट में रहा. यहां मुझे एक जीनियस कुत्ता मिला, जिसे कॉलोनी के चौकीदार ने पाला हुआ था. वो जब भी मुझे देखता, दोस्ताना तरीक़े से पूंछ भी हिलाता और हल्के-हल्के गुर्राता भी. उसके दोहरे चरित्र से मैं चार साल कन्फ्यूज़ रहा. चौकीदार अक्सर रात में दारू पीकर कुत्ते को समझाता, “देख, कभी दारू मत पीना. इसे पीनेवाला बहुत दिनों तक बीबी के लायक नहीं रहता.” कुत्ता पूरी गंभीरता से पूंछ हिलाकर चौकीदार का समर्थन कर रहा था. पी लेने के बाद चौकीदार अपने कुत्ते पर रौब भी मारता था. एक दिन डेढ़ बजे रात को जब मैं एक लेख कंप्लीट कर रहा था, तो फ्लैट के नीचे नशे में चूर चौकीदार कुत्ते पर रौब मार रहा था, “पता है, परसों रात में मेरे सामने शेर आ गया. मैंने उसका कान पकड़ कर ऐंठ दिया था. वो पें पें… करता भाग गया. डरपोक कहीं का.” जवाब में कुत्ता ज़ोर से भौंका, गोया कह रहा हो, ‘साले नशेड़ी, वो मेरा कान था. अभी तक ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है!’
कई सालों से मुझे ऐसा लगता है गोया मैं कुत्तों की भाषा समझता हूं. इस दिव्य विशेषता के बारे में मैंने किसी दोस्त को इस डर से नहीं बताया कि लोग मिलना-जुलना बंद कर देंगे. शाहीन बाग में नॉनवेज होटल और ढाबे बहुत हैं. यहां के कुत्ते भी आत्मनिर्भर नज़र आते हैं. एक दिन घर के नीचे बैठे एक दीन-हीन कुत्ते को मैं रोटी देने गया. कुत्ते ने मेरा मन रखने के लिए रोटी को सूंघा और मुझे देखकर गुर्राया. मैं समझ गया, वह कह रहा था, “खुद चिकन गटक कर आया है और मुझे नीट रोटी दे रहा है. मैं आज भी फेंकी हुई रोटी (बोटी के बगैर) नहीं उठाता…”
मैं घबरा कर वापस आ गया.

सुलतान भारती

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चश्मे में कसा वर्माजी का काला चेहरा दरवाज़े के बीच नज़र आया. इन्होंने मुझे ऐसे देखा, गोया मेरा फेस मास्क ही फर्जी हो, “इकत्तीस तारीख़ तक लॉकडाउन है…”
उन्हें धकेल कर अंदर रखी कुर्सी पर बैठते हुए मैंने कहा, “मैं तब तक इंतज़ार नहीं कर सकता.”
”क्यों? क्या जांच में तुम्हारे अंदर ब्लैक फंगस पाया गया है? ऐसी स्थिति में तुम्हें मेरे पास नहीं आना था.”
“ज़्यादा ख़ुश होने की ज़रूरत नहीं है, मैं बिल्कुल ठीक हूं और काफ़ी गुड फील कर रहा हूं.”
वह फ़ौरन बैड फील करने लगे, “यहां किस लिए आए हो?”
“मुझे आज ही पता चला कि मैं मशहूर हो चुका हूं, अब मैं महान होना चाहता हूं…”

आज पानीपत से आए एक फोन ने मुझे बेमौसम सरसों के पेड़ पर बिठा दिया. हुआ यूं कि सुबह नौ बजे एक पाठक ने पानीपत से फोन करके पूछा, “क्या आप मशहूर व्यंग्यकार सुलतान भारती बोल रहे हैं?” मेरे कानों में जैसे मलाई बह रही थी. (अब तक मुझे भी अपने मशहूर होने का पता नहीं था!) तब से मुझे एकदम से ब्लैक फंगस दयनीय और कोरोना बड़ा क्षुद्र जीव लगने लगा है. हो सकता है अप्रैल में उसे पता ना रहा हो कि जिसके नाक में घुस रहा है वो मशहूर हो चुका है और अब महान होने की सोच रहा है.
यूपी वाले तो जेठ की भरी दुपहरी में भी शीतनिद्रा में चले जाते हैं. हमें तो दिल्लीवालों पर क्रोध आता है, इन्हें भी ख़बर नहीं हुई और हरियानावालों को मेरे मशहूर होने की ख़बर मिल गई.
जब से मुझे अपने मशहूर होने का पता चला है, मैंने फ़ैसला किया है कि कैसे भी सही अब मुझे महान
होना है (हालांकि इसके पहले कभी हुआ नही था.) मेरे जान-पहचान के अनंत लेखक हैं, जिसमें जितनी कम प्रतिभा है, वो उतना ज़्यादा ग़लतफ़हमी का
शिकार है. कई लेखक तो ख़ुद को विदेशों में लोकप्रिय बताते हैं. शायद देश मे लोकप्रिय होने में रिस्क ज़्यादा था (रुकावट के लिए खेद है) यहां अपने ही साहित्यिक मित्र मशहूर या महान होने के रास्ते में कोरोना बन कर खड़े हो जाते हैं.
जो जितना विश्वत कुटुम्बकम का राग अलापता है, उतना संकुचित सोच का लेखक है. साहित्यकारों ने अपने-अपने गैंग बना लिए हैं, जो आपस में ही एक-दूसरे को मशहूर और महान बना देते हैं. (अगले मुहल्ले का फेसबुक गैंग स्पेलिंग की ग़लती ढूंढ़ कर उनकी महानता को ख़ारिज कर देता है) अब ऐसे में कोई दूसरे प्रदेश का प्राणी आपको मशहूर घोषित कर दे, तो ऐसा लगता है जैसे किसी ने ऑक्सीजन सिलेंडर ऑफर किया हो.

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मशहूर तो मैं हो ही चुका था अब महान होने की कसर थी. काश अगला फोन यूपी से आ जाए. यूपी में महान होना आसान है. वहां ऐसे-ऐसे लोग महान हो गए, जो ठीक से मानव भी नहीं हो पाए थे. लेकिन जैसे ही महान होने का माॅनसून आया, वो छाता फेंक कर खड़े हो गए (इस दौर में मानव होने के मुक़ाबले महान होना ज़्यादा आसान है). अगली सीढ़ी भगवान होने की है. ऐसे कई महान लोग हैं, जो ठीक से इंसान हुए बगैर सीधे भगवान हो गए. लेकिन मेरी ऐसी कोई योजना नहीं है. मैं महान होकर रुक जाऊंगा, आगे कुछ और नहीं होना (कुछ भगवानों की दुर्दशा देख कर ऐसा निर्णय लिया है) मैं अपने ईर्ष्यालु मित्रों की फ़ितरत से वाकिफ़ हूं. जैसे ही उन्हें मेरे मशहूर होने की ख़बर मिलेगी, उनका ऑक्सीजन लेवल नीचे आ जाएगा.


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मैं जानता हूं कि महान होने के लिए अगर मैंने अपने साहित्यिक मित्रों से सलाह ली, तो मेरा क्या हश्र होगा, इसलिए मैंने मुहल्ले की ही दो हस्तियों से सलाह लेने की ठानी. सबसे पहले मैंने फेस मास्क लगा कर वर्माजी का दरवाज़ा खटखटाया. चश्में में कसा वर्माजी का काला चेहरा दरवाज़े के बीच नज़र आया. इन्होंने मुझे ऐसे देखा, गोया मेरा फेस मास्क ही फर्जी हो, “इकत्तीस तारीख़ तक लॉकडाउन है…”
उन्हें धकेल कर अंदर रखी कुर्सी पर बैठते हुए मैंने कहा, “मैं तब तक इंतज़ार नहीं कर सकता.”
”क्यों? क्या जांच में तुम्हारे अंदर ब्लैक फंगस पाया गया है? ऐसी स्थिति में तुम्हें मेरे पास नहीं आना था.”
“ज़्यादा ख़ुश होने की ज़रूरत नहीं है, मैं बिल्कुल ठीक हूं और काफ़ी गुड फील कर रहा हूं.”
वह फ़ौरन बैड फील करने लगे, “यहां किस लिए आए हो?”
“मुझे आज ही पता चला कि मैं मशहूर हो चुका हूं, अब मैं महान होना चाहता हूं…”
“किसी ने फर्स्ट अप्रैल समझ कर फोन कर दिया होगा, ऐसी अफ़वाह मत सुना करो…”
“अब समझा, तुम्हें मुझसे जलन हो रही है.”
मैं जानता था कि वर्माजी को मुझसे कितना गहरा लगाव है. मैंने तो सिर्फ़ उनका वज़न कम करने के लिए सूचना दी थी. वहां से निकल कर मैंने चौधरी को ख़ुशख़बरी दी, “मुबारक हो!”

चौधरी ने संदिग्ध नज़रों से मुझे देखा, ”सारी उधारी आज दे देगो के?”
“जब तक उधारी है, तब तक आपसदारी है. मैं नहीं चाहता कि आपसदारी ख़त्म हो. ख़ैर तुम्हें ये जान कर बहुत ख़ुशी होगी कि मैं मशहूर हो चुका हूं.”
“कितै गया था चेक कराने?”
”कहीं नहीं, मुझे बताना नहीं पड़ा, लोगों ने ख़ुद ही मुझे फोन करके बताया.”
“इब तू के करेगो?”
”मैं महान होना चाहता हूं.”
चौधरी ने मुझे ऊपर से नीचे तक टटोलते हुए कहा, “घणा अंट संट बोल रहो. नू लगे अक कोई नई बीमारी आ गी काड़ोनी में. तू इब तक घर ते बाहर हांड रहो या बीमारी में मरीज़ कू ब्लैक फंगस जैसे ख़्याल आवें सूं.”
यहां कोई किसी को महान होते नहीं देता और चुपचाप रातोंरात महान होने को लोग मान्यता नहीं देते. जिएं तो जिएं कैसे. चतुर सुजान प्राणी बाढ़, सूखा, स्वाइन फ्लू और कोरोना के मौसम में भी महान हो लेते हैं. जिन्हें महान होने की आदत है, वो विपक्ष में बैठ कर भी महानता को मेनटेन रखते हैं. बहुत से लोग तो कोरोना और ऑक्सीजन सिलेंडर की आड़ में भी महान हो गए हैं. इस कलिकाल में भी नेता और पुलिस आए दिन महान हो रही हैं.
और… एक मैं हूं जिसे महान होने के लिए रास्ता बतानेवाला कोई महापुरुष नहीं मिल रहा है, जाऊं तो जाऊं कहां!

Sultan Bharti
सुलतान भारती
Kahani


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