Relationship Management

बीते कल की कड़वी यादों व बातों को दिल से लगाए रखने से न स़िर्फ आपका वर्तमान, बल्कि भविष्य भी प्रभावित हो सकता है. बेहतर होगा कि इन भावनाओं के बोझ को ढोने की बजाय बुरी यादों को भूल जाएं. इमोशन बैगेज यानी भावनाओं के भार से आप ख़ुद को ऐसे बचा सकते हैं.

Emotional Baggage

नीरा का पति उसे छोडक़र चला गया और साथ मेंं उसके बेटे को भी ले गया. नीरा की क़ामयाबी और क़ाबिलियत ने उसके पति को हीनभावना से इस कदर भर दिया था कि उसे अपने सामने झुकाने के लिए उसने बेटे को भी नीरा के खिलाफ़ कर दिया और फिर उसे लेकर घर छोड़कर भाग गया. इस वाकये ने नीरा को इतना तोड़ दिया कि वो धीरे-धीरे डिप्रेशन का शिकार हो गई. पति ने उसे जो आघात दिया था, उसे भुलाना और नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करना उसके लिए संभव नहीं था. वो पूरी ज़िंदगी एक डर के साए में जीने को विवश हो गई. एक ईमोशनल बैगेज वह पूरी ज़िंदगी ढोती रही. आप भी भावनाओं के भार तले दबकर अपना आज बर्बाद न करें, इसलिए हम बता रहे हैं इससे निपटने के कुछ आसान उपाय.

Emotional Baggage

क्या होता है ईमोशनल बैगेज?
मशहूर चित्रकार विंसेंट वैन गो ने लिखा है कि ईमोशन हमारे जीवन के कप्तान होते हैं और अनजाने में ही हम उनकी बात मानते रहते हैं. माना जाता है कि ईमोशनल रिएक्शन पॉप-अप विंडो की तरह होते हैं, जब आप बटन दबाते हैं तो वे स्वत: ही उभर आते हैं, लेकिन गलत बटन दब जाए तो वे निगेटिव रिएक्शन देते हैं. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हम में से अधिकांश लोग अपने साथ कोई न कोई ईमोशनल बैगेज लेकर चल रहे होते हैं. ईमोशनल बैगेज को सरल शब्दों में अविश्‍वास, धोखा, किसी का चला जाना या ठुकराया जाने की तरह परिभाषित किया जा सकता है और यह सब अतीत में हुआ होता है. अतीत की घटनाओं का आपके वर्तमान रिश्ते पर गहरा असर पड़ता है. यदि पिछली बातों के बोझ को हम साथ लेकर चलते रहेंगे, तो न सिर्फ हमारी तरक्क़ी बाधित होगी, बल्कि उस बोझ को खींचते-खींचते हम थक भी जाएंगे.

बीते समय का आज पर असर
गुज़रे वक़्त के कुछ बुरे अनुभव व दुखद यादें कई तरह से हमें प्रभावित करते हैं. ये अनुभव व यादें तलाक़, शारीरिक यातना, मानसिक आघात, प्रेमी से मिला धोखा, उपेक्षा, गलतफ़हमी, ख़ुद से हुई कोई भूल या बचपन के कटु अनुभव से जुड़े हो सकते हैं. ऐसी यादों का बोझ आपको किसी पर विश्‍वास करने और बेहतरीन प्रोफेशनल व पर्सनल रिश्ता बनाने से रोक सकता है. जो पहले हुआ फिर वैसा ही कुछ न हो जाए इस डर के कारण आप कोई भी क़दम उठाने से हिचकिचाते हैं. आपका ख़ुद पर से भी विश्‍वास डगमगाने लगता है. जिससे आप में चुनौतियों का सामना करने का साहस नहीं रह जाता. आपको हमेशा यही लगता कि दूसरे आपकी हंसी उड़ाएंगे या फिर आपके दुखते दिल पर वार करेंगे. ऐसी सोच आपको ग़ुस्सैल, दूसरों की आलोचना करने वाला, दूसरों पर नियंत्रण रखने और उन पर अपनी इच्छाएं थोपने वाला बना सकती है.

यह भी पढ़ें: क्या बीवी की कामयाबी से जलते हैं पुरुष? (Is Your Partner Jealous Of Your Success?)

समझें इशारों को
जब ये बोझ थकाने लगते हैं तो अलग-अलग तरह से बाहर निकलते हैं, जैसे- कभी बहुत ज़ोर से रोना आ जाता है, किसी से बात करने का मन नहीं करता, आप अवसाद का शिकार और चिड़चिड़े हो जाते हैं. बार-बार सेहत ख़राब हो जाती है और या तो भूख बहुत लगती है या खाने की थोड़ी भी इच्छा नहीं होती. हमेशा अतीत की बातें करने का मन करता है या फिर अतीत की परछाइयां आंखों के सामने तैरती रहती है. लगता है कि फिर वही सब जीवन में घटने वाला है. इन सबसे कुछ लोग इतने आहत होते हैं कि उनके मन के इस बोझ का असर शरीर पर भी होने लगता है और वो फूलने लगता है.

Emotional Baggage

जीते हैं डर के साए में
इन इशारों को समझें और पुरानी यादों के बोझ को उतार फेंके, नहीं तो ये आपकी पर्सनैलिटी और जीवन दोनों को खोखला कर देगा. कई बार हम पूरे आत्मविश्‍वास के साथ बिखरी कडियों को फिर से जोड़कर नए सिरे से जीने लगते हैं, पर अचानक कोई बात दिमाग़ में कौंध जाती है और चुपके से अतीत हम पर हावी हो जाता है और हमारे सारे प्रयासों पर पानी फेर देता है. साइकोलॉजिस्ट सीमा वोहरा कहती हैं, “कई बार तो हमें पता ही नहीं चलता कि हम किसी ईमोशनल बैगेज को ढो रहे हैं जब तक कि वह वर्तमान रिश्तों को आहत नहीं करने लगता या बीती घटनाएं साकार नहीं होने लगतीं. एक डर हमेशा बना रहता है कि कहीं दुबारा वैसा न हो जाए और फोबिया के शिकार होने के कारण हम वर्तमान रिश्ते को जी नहीं पाते. उस बोझ को हम अपने वर्तमान का ज़रूरी हिस्सा मानने की भूल कर बैठते हैं. नतीजतन हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों ही उस बोझ तले दबकर रह जाता है. किसी पुराने कपड़े की तरह इस बोझ को मन और शरीर दोनों से उतारकर ही आप जीवन में आगे बढ़ सकते हैं.”

ईमोशनल बैगेज से छुटकारा पाने के 10 कारगर उपाय
इमोशन बैगेज यानी भावनाओं के भार से आप ख़ुद को आसानी से बचा सकते हैं. इसके लिए आपको ये 10 उपाय करने होंगे.

Emotional Baggage

1) ख़ुश/संतुष्ट रहें
आपके पास आज जो नहीं है उसके लिए दुखी होने की बजाय जो है उसपर फोकस करें, इससे गुज़रे वक़्त के बुरे अनुभवों का बोझ दिल से उतर जाएगा. बीती दुखद यादों को बुरा सपना समझकर भूल जाएं और ये सोचें कि आपका आज कितना सुखद है. क्योंकि आपको वो सब मिला जिसकी आपको चाह थी या जिसने आपकी ज़िंदगी में फिर से ख़ुशियों के रंग बिखेर दिए. ये खुशियां अब सदा आपके साथ रहेंगी. जैसे ही आपके मन में कृतज्ञता का भाव आएगा निगेटिव ईमोशंस और डर अपने आप दूर हो जाएंगे.

2) खुद को कोसें नहीं
कई बार ऐसा होता है कि बीती बातों के लिए स्वयं को ज़िमम्ेदार मानते हुए आप ख़ुद को ही धिक्कारने लगते हैं या घृणा करने लगते हैं. ऐसा होना स्वाभाविक है. जब भी ऐसी भावना मन में उपजे तो अपनी कुछ अच्छी चीज़ों को याद करके ख़ुद से प्यार करने की कोशिश करें.

3) रिश्तों को चुनें
एक बार रिश्ता टूट गया या ग़लत साथी ज़िंदगी में आ गया तो इसका ये मतलब नहीं है कि दोबारा भी वही होगा. ग़लती हर किसी से हो जाती है, ये बात मानकर चलें और अगली बार बहुत सावधानी से किसी साथी को चुनेेंं. बिना किसी पूर्व धारणा के नए रिश्तों को अपनाना चाहिए. जो हुआ, वह दोबारा क्यों होगा? स्वयं को आश्‍वस्त करें. ऐसे लोगों जिनमें दोस्त, रिश्तेदार या परिवार के लोग शामिल हैं, के संपर्क में रहें जो आपके ईमोशनल बैगेज को हल्का करने में आपकी मदद करें.

4) अपनी बुराई न करें
यदि आप ख़ुद ही हमेशा अपनी आलोचना करते रहेंगे और अतीत में जो कुछ बुरा हुआ उसके लिए ख़ुद को कसूरवार मानते रहेंगे, तो कभी उस बोझ से बाहर नहीं निकल पाएंगे और अन्य लोग भी आपको उससे बाहर निकलने नहीं देंगे. आख़िर दूसरे क्यों आपकी आलोचना करने में पीछे रहेंगे? स्वयं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहें, क्योंकि दूसरों से प्रोत्साहन पाने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है आपके अंदर प्रेरणा का भाव पैदा होना. ऐसा होने पर आप आसानी से ईमोशनल बैगेज को उतार फेकेंगी.

5) माफ़ कर दें और भूल जाएं
किसी ने आपके दिल को ठेस पहुंचाई, इस बात को च्यूईंगम की तरह खींचने की बजाय उस शख़्स को और ख़ुद को भी माफ़ कर दें. उन लोगों के लिए ये काम कठिन होता है जिन्हें लगता है कि वे कभी ग़लती कर ही नहीं सकतें. जब तक आप आपके दिल को चोट पहुंचाने वाले शख़्स को माफ़ नहीं करेंगे तब तक बीती बातों को भूल नहीं पाएंगे. अपनी ग़लतियों से सीखें और कोशिश करें के आप दोबारा इसे न दोहराएं. जीवन के सबक अमूल्य होते हैं- यह याद रखें.

यह भी पढ़ें: कैसे जानें कि आपके पति को किसी और से प्यार हो गया है? (9 Warning Signs That Your Partner Is Cheating on You)

Emotional Problems

6) शर्मिंदगी छोड़ दें
अधिकांश भावनात्मक बोझ हम शर्मिंदगी की वजह से ही ढोते हैं और ये बात हम जानते भी हैं. लोग क्या सोचेंगे या कहेंगे? इसकी परवाह न करें क्योंकि जो लोग आपसे प्यार करते हैं वे आपके अतीत के अधार पर आपका मूल्यांकन नहीं करेंगे, और जो ऐसा करते हैं उन्हें अपनी ज़िंदगी से निकाल दें. आपको घुट-घुटकर नहीं, सिर उठाकर जीना होगा.

7) डरें या घबराएं नहीं
मन पर जब अनगिनत बोझ होते हैं तो कई तरह की आशंकाओं के साथ जीना स्वाभाविक ही है. हर पल डर लगा रहता है कि फिर कोई चूक न हो जाए, कहीं फिर कोई धोखा न दे दे. कई बार तो ख़ुश होने से भी डर लगता है, खुलकर सांस लेते हुए भी डर लगता है. हंसना तो तब हम भूल ही जाते हैं. यह भय हमें हमेशा आगे बढ़ने से रोकता है, हमें एहसास कराता है कि हमें अब जीने का हक़ नहीं है. इस डर के कारण स्वयं को सीमित न करें, क्योंकि एक घटना आपके पूरे जीवन को बिखेर नहीं सकती. आपसे अतीत में कोई ग़लती हुई थी, तो अब उसे सुधार लें, उससे डरें नहीं और न ही गिल्टी फील करें.

8) दूसरों को ख़ुश करने की कोशिश न करें
हम इसलिए ज़्यादा दुखी रहते हैं, क्योंकि अपराधबोध से ग्रसित होने के कारण अक्सर हम दूसरों को ख़ुश करने में लगे रहते हैं. कोई हमारे बारे में बुरा न सोचे, कोई हमें दोष न दे, इसलिए उन्हें किसी न किसी तरह से ख़ुश करने की कोशिश करतेे रहते हैं. ख़ुद की बजाय हमारा फोकस दूसरों पर रहता है. अतः ख़ुद को बदलें, स्वयं को ख़ुश रखें और अपना जीवन सुधारने के बारे में सोचें.

9) अपना व्यवहार सुधारें
अगर आप मानती हैं कि अतीत में जो हुआ उसकी ज़िम्मेदार आप थीं तो बेझिझक उसकी ज़िम्मेदारी लें और अपने व्यवहार में सुधार लाएं. दया का पात्र न बनें कि लोग आपसे सहानूभूति रखें या आपके आंसू पोंछते रहें. याद रखें कि अगर नाव में बैठने से पहले आप अतिरिक्त सामान को नहीं छोड़ेंगी तो आप डूब जाएंगी. अपने व्यवहार में सुधार करना कठिन काम ज़रूर हो सकता है, मगर नामुमक़िन नहीं, और ये सुधार आपकी ज़िंदगी बदल सकता है.

10) प्रोफेशनल की मदद लें
अगर आपको लगता है कि आप अपने ईमोशनल बैगेज को उतार फेंकने में असमर्थ हैं तो किसी प्रोफेशनल की मदद ले सकती हैं. वह आपके पॉज़िटिव ईमोशंस को बाहर लाने में मदद करेगा. आप मेडीटेशन करके भी अपने भय और ग्लानि से बाहर निकलकर भावनात्मक बोझ से मुक्त हो सकती हैं.

web101

बच्चों की अच्छी परवरिश में पैरेंट्स की भूमिका अहम् होती है. कहते हैं बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं, उन्हें जिस तरह से ढाला जाए, वे उसी तरह से ढल जाते हैं. इसलिए उन्हें बचपन से ही ऐसी छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण बातों के बारे में बताना बेहद ज़रूरी है, जो उनके स्वस्थ व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक हो.

 

हाइजीन की बातें: बच्चों को बचपन से ही बेसिक हाइजीन की बातें बताना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि अच्छी पर्सनल हाइजीन की आदतें न केवल बच्चों को स्वस्थ रखती हैं, बल्कि उन्हें संक्रामक बीमारियों (जैसे- हैजा, डायरिया, टायफॉइड आदि) से भी बचाती हैं और बच्चों में स्वस्थ शरीर और स्वस्थ व्यक्तित्व का निर्माण करने में मदद करती हैं. बच्चों को यह समझाना बहुत ज़रूरी है कि गंदगी से होनेवाली बीमारियों से उनकी ज़िंदगी को ख़तरा हो सकता है, इसलिए उन्हें ओरल हाइजीन, फुट एंड हैंड हाइजीन, स्किन एंड हेयर केयर, टॉयलेट हाइजीन और होम हाइजीन के बारे में बताएं.

टाइम मैनेजमेंट: इस टेकनीक को सिखाकर पैरेंट्स अपने बच्चे को स्मार्ट बना सकते हैं. पढ़ाई के बढ़ते प्रेशर को देखते हुए अब तो अनेक स्कूलों में भी बच्चों को टाइम मैनेजमेंट टेकनीक सिखाई जाने लगी है. टाइम मैनेजमेंट को सीखने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह टेकनीक उनके स्कूल लाइफ में ही नहीं, बल्कि भविष्य के लिए भी बहुत फ़ायदेमंद है. इसलिए पैरेंट्स को चाहिए कि उन्हें बचपन से ही टाइम मैनेज करना सिखाएं, जैसे-
* सबसे पहले महत्वपूर्ण काम/होमवर्क की लिस्ट बनाएं.
* किस तरह से काम/होमवर्क को कम समय में निपटाएं?
* अन्य क्लासेस/गतिविधियों के लिए समय निकालें.
* किस तरह से सेल्फ डिसिप्लिन में रहें?
* सोने, खाने-पीने और खेलने का समय तय करें.

मनी मैनेजमेंट: बच्चों को मनी मैनेजमेंट के बारे में समझाना बेहद ज़रूरी है, जिससे उन्हें बचपन से ही सेविंग व फ़िज़ूलख़र्ची का अंतर समझ में आ सके और वे भविष्य में फ़िज़ूलख़र्च करने से बचें. बचपन से ही उन्हें सिखाएं कि कहां और कैसे बचत और ख़र्च करना है?, उन्हें शॉर्ट टर्म इंवेस्टमेंट करना सिखाएं. इसी तरह से उनमें धीरे-धीरे कंप्यूटर, लैपटॉप आदि ख़रीदने के लिए लॉन्ग टर्म इंवेस्टमेंट करने की आदत भी डालें.

पीयर प्रेशर हैंडल करना: मनोचिकित्सकों का मानना है कि बच्चों में बचपन से ही पीयर प्रेशर का असर दिखना शुरू हो जाता है. आमतौर पर 11-15 साल तक के बच्चों पर दोस्तों का दबाव अधिक होता है, पर पैरेंट्स इस प्रेशर को समझ नहीं पाते. आज के बदलते माहौल में पीयर प्रेशर का बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, इसलिए पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि इस स्थिति में-
* बच्चों का मार्गदर्शन करें, जिससे उन्हें मानसिक सपोर्ट मिलेगा.
* उनमें सकारात्मक सोच विकसित करें.
* बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करें, ताकि अपनी हर बात वे आपके साथ शेयर करें.
* ग़लती होने पर प्यार से समझाएं.
* यदि बच्चा प्रेशर हैंडल नहीं कर पा रहा है या बच्चे के व्यवहार में किसी तरह का बदलाव महसूस हो, तो पैरेंट्स तुरंत उसके टीचर्स व दोस्तों से मिलें और विस्तार से जानकारी हासिल करें.

रिलेशनशिप मैनेजमेंट: बच्चों के भावनात्मक व सामाजिक विकास में रिलेशनशिप मैनेजमेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए पैरेंट्स होने के नाते आपकी ज़िम्मेदारी बनती है कि बच्चे में पॉज़िटिव रिलेशनशिप (रिलेशनशिप मैनेजमेंट) का विकास करने की शुरुआत
करें, जैसे-
* उन्हें अपने फ्रेंड्स और फैमिली मेंबर्स से परिचित कराएं.
* समय-समय पर बच्चों को उनसे मिलवाएं या फोन पर बातचीत कराएं.
* उनके साथ ज़्यादा टाइम बिताने से बच्चों की उनके साथ बॉन्डिंग मज़बूत होगी और रिलेशनशिप भी स्ट्रॉन्ग होगी.
* बच्चों में कम्यूनिकेशन स्किल डेवलप करें, ताकि वे पूरे आत्मविश्‍वास के साथ लोगों से बातचीत कर सकें.
* बच्चों को सोशल एक्टिविटीज़ में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करें, जिससे वे अधिक से अधिक लोगों के संपर्क में आएं.
* बच्चों को चाइल्ड फ्रेंडली माहौल प्रदान करें, जिससे वे बेहिचक ‘हां’ या ‘ना’ बोल सकें.

सेल्फ कंट्रोल: यह ऐसा टास्क है, जिसकी ट्रेनिंग बचपन से ही ज़रूरी है. सेल्फ कंट्रोल के ज़रिए बच्चे वर्तमान में ही नहीं, भविष्य में भी अनेक पर्सनल व प्रोफेशनल समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं. सेल्फ कंट्रोल सिखाने के लिए-
* बच्चों को प्रोत्साहित करनेवाली गतिविधियों में डालें, जिससे उनमें सेल्फ कंट्रोल का निर्माण हो, जैसे- स्पोर्ट्स, म्यूज़िक सुनना आदि.
* उन्हें घर की छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियां सौंपें, जैसे- अपने कमरे की सफ़ाई करना, किड्स पार्टी का होस्ट बनाना, पेट्स की देखभाल की ज़िम्मेदारी आदि.
* उनकी सीमाएं तय करें. यदि बच्चा पैरेंट्स या अपने भाई-बहन के साथ बदतमीज़ी से बात करता है, तो तुरंत टोकें.
* उन्हें अनुशासन में रहना सिखाएं.

सिविक सेंस: बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने की ज़िम्मेदारी पैरेंट्स की होती है. अच्छा
नागरिक बनने के लिए उन्हें बचपन से ही सिविक सेंस सिखाना बेहद ज़रूरी है. सिविक सेंस यानी समाज के प्रति अपने दायित्वों व कर्तव्य के बारे में उन्हें बताएं,
जैसे- घर में नहीं, बाहर भी स्वच्छता का ध्यान रखें, रोड सेफ्टी नियमों का पालन करना, सार्वजनिक जगहों पर धैर्य रखना, लोगों को
आदर-सम्मान देना, महिलाओं की इज़्ज़त करना, देशभक्ति की भावना आदि. पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि वे बच्चों को अलग-अलग तरीक़ों से सिविक सेंस सिखाएं.

सोशल मीडिया अलर्ट: टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव से बच्चे भी अछूते नहीं हैं, इसलिए पैरेंटस की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों की सोशल मीडिया से जुड़ी एक्टिविटीज़ पर पैनी नज़र रखें. वे क्या ‘पोस्ट’ कर रहे हैं और किससे बातें कर रहे हैं? सोशल साइट्स पर कोई उन्हें परेशान तो नहीं कर रहा? हाल ही में हुए एक अध्ययन से यह साबित हुआ है कि जो बच्चे सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताते हैं, वे न केवल अपने समय का नुक़सान करते हैं, बल्कि इसका उनके मूड पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इसके अलावा स्कूल के टीचर्स का मानना है कि सोशल मीडिया पर वर्तनी और व्याकरण के कोई नियम नहीं होते. सोशल मीडिया पर चैट करते हुए ग़लत वर्तनी और व्याकरण के ग़लत नियमों का असर उनके स्कूली लेखन पर भी पड़ रहा है. इसलिए पैरेंट्स को चाहिए कि-
* लैपटॉप, स्मार्टफोन और टैबलेट का इस्तेमाल निर्धारित समय सीमा तक ही करने दें.
* स्मार्टफोन, टैबलेट और लैपटॉप को पासवर्ड प्रोटेक्टेड रखें.
* थोड़े-थोड़े समय बाद पासवर्ड बदलते रहें.
* नया पासवर्ड़ बच्चों को न बताएं. आपकी अनुमति के बिना वे इन्हें नहीं खोल पाएंगे.
* फिज़िकल एक्टिविटी के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें.

– पूनम नागेंद्र शर्मा

 

अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करेंः Parenting Guide 

 

 shutterstock_163058570
बच्चों की अच्छी परवरिश में पैरेंट्स की भूमिका अहम् होती है. कहते हैं बच्चे कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं, उन्हें जिस तरह से ढाला जाए, वे उसी तरह से ढल जाते हैं. इसलिए उन्हें बचपन से ही ऐसी छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण बातों के बारे में बताना बेहद ज़रूरी है, जो उनके स्वस्थ व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक हो.

 

हाइजीन की बातें: बच्चों को बचपन से ही बेसिक हाइजीन की बातें बताना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि अच्छी पर्सनल हाइजीन की आदतें न केवल बच्चों को स्वस्थ रखती हैं, बल्कि उन्हें संक्रामक बीमारियों (जैसे- हैजा, डायरिया, टायफॉइड आदि) से भी बचाती हैं और बच्चों में स्वस्थ शरीर और स्वस्थ व्यक्तित्व का निर्माण करने में मदद करती हैं. बच्चों को यह समझाना बहुत ज़रूरी है कि गंदगी से होनेवाली बीमारियों से उनकी ज़िंदगी को ख़तरा हो सकता है, इसलिए उन्हें ओरल हाइजीन, फुट एंड हैंड हाइजीन, स्किन एंड हेयर केयर, टॉयलेट हाइजीन और होम हाइजीन के बारे में बताएं.

टाइम मैनेजमेंट: इस टेकनीक को सिखाकर पैरेंट्स अपने बच्चे को स्मार्ट बना सकते हैं. पढ़ाई के बढ़ते प्रेशर को देखते हुए अब तो अनेक स्कूलों में भी बच्चों को टाइम मैनेजमेंट टेकनीक सिखाई जाने लगी है. टाइम मैनेजमेंट को सीखने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह टेकनीक उनके स्कूल लाइफ में ही नहीं, बल्कि भविष्य के लिए भी बहुत फ़ायदेमंद है. इसलिए पैरेंट्स को चाहिए कि उन्हें बचपन से ही टाइम मैनेज करना सिखाएं, जैसे-
* सबसे पहले महत्वपूर्ण काम/होमवर्क की लिस्ट बनाएं.
* किस तरह से काम/होमवर्क को कम समय में निपटाएं?
* अन्य क्लासेस/गतिविधियों के लिए समय निकालें.
* किस तरह से सेल्फ डिसिप्लिन में रहें?
* सोने, खाने-पीने और खेलने का समय तय करें.

मनी मैनेजमेंट: बच्चों को मनी मैनेजमेंट के बारे में समझाना बेहद ज़रूरी है, जिससे उन्हें बचपन से ही सेविंग व फ़िज़ूलख़र्ची का अंतर समझ में आ सके और वे भविष्य में फ़िज़ूलख़र्च करने से बचें. बचपन से ही उन्हें सिखाएं कि कहां और कैसे बचत और ख़र्च करना है?, उन्हें शॉर्ट टर्म इंवेस्टमेंट करना सिखाएं. इसी तरह से उनमें धीरे-धीरे कंप्यूटर, लैपटॉप आदि ख़रीदने के लिए लॉन्ग टर्म इंवेस्टमेंट करने की आदत भी डालें.

पीयर प्रेशर हैंडल करना: मनोचिकित्सकों का मानना है कि बच्चों में बचपन से ही पीयर प्रेशर का असर दिखना शुरू हो जाता है. आमतौर पर 11-15 साल तक के बच्चों पर दोस्तों का दबाव अधिक होता है, पर पैरेंट्स इस प्रेशर को समझ नहीं पाते. आज के बदलते माहौल में पीयर प्रेशर का बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, इसलिए पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि इस स्थिति में-
* बच्चों का मार्गदर्शन करें, जिससे उन्हें मानसिक सपोर्ट मिलेगा.
* उनमें सकारात्मक सोच विकसित करें.
* बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करें, ताकि अपनी हर बात वे आपके साथ शेयर करें.
* ग़लती होने पर प्यार से समझाएं.
* यदि बच्चा प्रेशर हैंडल नहीं कर पा रहा है या बच्चे के व्यवहार में किसी तरह का बदलाव महसूस हो, तो पैरेंट्स तुरंत उसके टीचर्स व दोस्तों से मिलें और विस्तार से जानकारी हासिल करें.

रिलेशनशिप मैनेजमेंट: बच्चों के भावनात्मक व सामाजिक विकास में रिलेशनशिप मैनेजमेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, इसलिए पैरेंट्स होने के नाते आपकी ज़िम्मेदारी बनती है कि बच्चे में पॉज़िटिव रिलेशनशिप (रिलेशनशिप मैनेजमेंट) का विकास करने की शुरुआत करें, जैसे-
* उन्हें अपने फ्रेंड्स और फैमिली मेंबर्स से परिचित कराएं.
* समय-समय पर बच्चों को उनसे मिलवाएं या फोन पर बातचीत कराएं.
* उनके साथ ज़्यादा टाइम बिताने से बच्चों की उनके साथ बॉन्डिंग मज़बूत होगी और रिलेशनशिप भी स्ट्रॉन्ग होगी.
* बच्चों में कम्यूनिकेशन स्किल डेवलप करें, ताकि वे पूरे आत्मविश्‍वास के साथ लोगों से बातचीत कर सकें.
* बच्चों को सोशल एक्टिविटीज़ में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करें, जिससे वे अधिक से अधिक लोगों के संपर्क में आएं.
* बच्चों को चाइल्ड फ्रेंडली माहौल प्रदान करें, जिससे वे बेहिचक ‘हां’ या ‘ना’ बोल सकें.

सेल्फ कंट्रोल: यह ऐसा टास्क है, जिसकी ट्रेनिंग बचपन से ही ज़रूरी है. सेल्फ कंट्रोल के ज़रिए बच्चे वर्तमान में ही नहीं, भविष्य में भी अनेक पर्सनल व प्रोफेशनल समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं. सेल्फ कंट्रोल सिखाने के लिए-
* बच्चों को प्रोत्साहित करनेवाली गतिविधियों में डालें, जिससे उनमें सेल्फ कंट्रोल का निर्माण हो, जैसे- स्पोर्ट्स, म्यूज़िक सुनना आदि.
* उन्हें घर की छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियां सौंपें, जैसे- अपने कमरे की सफ़ाई करना, किड्स पार्टी का होस्ट बनाना, पेट्स की देखभाल की ज़िम्मेदारी आदि.
* उनकी सीमाएं तय करें. यदि बच्चा पैरेंट्स या अपने भाई-बहन के साथ बदतमीज़ी से बात करता है, तो तुरंत टोकें.
* उन्हें अनुशासन में रहना सिखाएं.

सिविक सेंस: बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने की ज़िम्मेदारी पैरेंट्स की होती है. अच्छा नागरिक बनने के लिए उन्हें बचपन से ही सिविक सेंस सिखाना बेहद ज़रूरी है. सिविक सेंस यानी समाज के प्रति अपने दायित्वों व कर्तव्य के बारे में उन्हें बताएं, जैसे-
* घर में नहीं, बाहर भी स्वच्छता का ध्यान रखें.
* रोड सेफ्टी नियमों का पालन करना.
* सार्वजनिक जगहों पर धैर्य रखना.
* लोगों को आदर-सम्मान देना.
* महिलाओं की इज़्ज़त करना.
* देशभक्ति की भावना आदि.
पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि वे बच्चों को अलग-अलग तरीक़ों से सिविक सेंस सिखाएं.

सोशल मीडिया अलर्ट: टेक्नोलॉजी के बढ़ते प्रभाव से बच्चे भी अछूते नहीं हैं, इसलिए पैरेंटस की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों की सोशल मीडिया से जुड़ी एक्टिविटीज़ पर पैनी नज़र रखें. वे क्या ‘पोस्ट’ कर रहे हैं और किससे बातें कर रहे हैं? सोशल साइट्स पर कोई उन्हें परेशान तो नहीं कर रहा? हाल ही में हुए एक अध्ययन से यह साबित हुआ है कि जो बच्चे सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताते हैं, वे न केवल अपने समय का नुक़सान करते हैं, बल्कि इसका उनके मूड पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इसके अलावा स्कूल के टीचर्स का मानना है कि सोशल मीडिया पर वर्तनी और व्याकरण के कोई नियम नहीं होते. सोशल मीडिया पर चैट करते हुए ग़लत वर्तनी और व्याकरण के ग़लत नियमों का असर उनके स्कूली लेखन पर भी पड़ रहा है. इसलिए पैरेंट्स को चाहिए कि-
* लैपटॉप, स्मार्टफोन और टैबलेट का इस्तेमाल निर्धारित समय सीमा तक ही करने दें.
* स्मार्टफोन, टैबलेट और लैपटॉप को पासवर्ड प्रोटेक्टेड रखें.
* थोड़े-थोड़े समय बाद पासवर्ड बदलते रहें.
* नया पासवर्ड़ बच्चों को न बताएं. आपकी अनुमति के बिना वे इन्हें नहीं खोल पाएंगे.
* फिज़िकल एक्टिविटी के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें.

– पूनम नागेंद्र शर्मा