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पहला अफेयर: यादों के रंग… (Pahla Affair: Yaadon Ke Rang)

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पहला अफेयर: यादों के रंग… (Pahla Affair: Yaadon Ke Rang)

वो उम्र ही लड़कपन की थी, जिनमें कुछ मधुर यादें, सुखद एहसास के क्षण समाये हुए थे, जिसकी याद आज भी मेरे होंठों पर मुस्कुराहट ले आती है. बात उन दिनों की है, जब मेरा कॉलेज ख़त्म हुआ था. छुट्टियां चल रही थीं. पापा ने घर में पेंट करवाने का विचार किया. मेरी होम डेकोरेशन में अच्छी नॉलेज होने के कारण घर को रेनोवेट कराने की ज़िम्मेदारी मुझे दी गई. कलर, पेंट के डिब्बों व ब्रश के साथ मज़दूरों ने घर में काम करना शुरू किया.

सहसा एक आवाज़ सुनाई दी, “एक ग्लास पानी मिलेगा.” एक मधुर-सी आवाज़ कानों में घुल गई. मैं उसे एकटक देखती रह गई. वह शख़्स मेरी ही उम्र का था. बड़ा ही आकर्षक व्यक्तित्व, नीली आंखें. उसका चलना, बैठना, उसकी हर बात मुझे लुभाती. उसकी बड़ी पलकें विशेषकर उसकी नीली आंखें मुझे उसकी ओर खींच ले गईं. फिर तो न जाने चाय-पानी के बहाने मैं उस कमरे में कितनी बार ही चक्कर लगा आती, जहां वह अपना काम कर रहा था. जब वह ब्रश चला रहा होता, मैं ख़ामोश-सी उसे देखती रहती.

धीरे-धीरे मेरी दीवानगी एक तरफ़ा प्यार में कब बदली, मैं जान भी न सकी. कई बार मैंने अपने आपको मन ही मन डांटा भी था कि एक पेंट करनेवाले मज़दूर के प्रति इतना आकर्षण क्यों? पर न जाने क्या था, मैं चाहकर भी रुक नहीं पाती. उसकी उन नीली आंखों में न जाने कैसी कशिश थी कि मैं डूबती ही चली गई. पहले-पहले तो वो सकुचाया-सा रहता, फिर धीरे-धीरे बात करने लगा था. उसकी बोलती आंखें दिल में नए ख़्वाब जगातीं. जब भी वह दिखाई नहीं देता, मैं बेचैन हो उठती. उस दिन वो काम पर नहीं आया था. वह प्रतियोगी परीक्षा देने गया है, इसकी जानकारी पेंट करनेवाले मज़दूरों के हेड ने दी.

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तो जनाब पढ़ते भी हैं. “क्या लाल-पीले रंगों के बीच काले अक्षर समझ में आते हैं?” अगले दिन जब मैंने पूछा, तो तुरंत जवाब मिला, “क्यों नहीं.’ काले अक्षर ही नहीं, मैं बहुत-सी बातें भी समझता हूं.” तो क्या वह मेरे अंदर उमड़ती भावनाओं को भी समझता है? घर की पेंटिंग का काम लगभग पूरा हो चुका था. मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा कि अब मैं तो उसे नहीं देख पाऊंगी. जाते व़क्त उसने मुझे एक काग़ज़ की पर्ची दी, जिस पर लिखा था…‘ प्यार अपने आप में एक अनोखा एहसास है. ये वो अफ़साना है जो ख़ुद-ब-ख़ुद बयां होता है. यह जीवन का सबसे प्यारा समय है.

आप बहुत अच्छी हैं. कोई व्यक्ति आप से प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकता, पर आज की हक़ीक़त यही है कि हमारे बीच बहुत-से फासले हैं… परिवार के, जाति के, अमीरी-ग़रीबी के, जिनसे पार पाना नामुमकिन है. ज़िम्मेदारियों से लदा मेरा व्यक्तित्व है. मैं चाहकर भी तुम्हारी मंज़िल नहीं बन सकता.’ मेरा पहला प्यार, जिसकी क़िस्मत में अधूरा रहना लिखा था, अधूरा ही रह गया.

वो चला गया हमेशा के लिए. मैं उसे भीगी आंखों से देखती रह गई थी. न रोक सकती थी, न ही किसी से कुछ कह सकती थी. जिस सच्चाई से वह रू-ब-रू कराकर गया था, उसे तो मैं भी नहीं बदल सकती थी. मैं जिस आसमान में उड़ रही थी, वहां से उतरकर ज़मीन पर आ गई. व़क्त रुकता नहीं, ज़िंदगी थमती नहीं. ये वो मुक़ाम नहीं था, जहां मैं ठहर जाती. पर उसकी नीली आंखें जब-जब मेरे ज़ेहन में याद बनकर उमड़तीं, तो मेरी आंखें सजल हो जातीं. बड़ी बेनूर थी ये रूह मेरी, तुम्हारे आने से पहले, तुम्हारी यादों की कशिश ने रंग भर दिए इसमें ज़िंदगी के. अब तक ख़ामोश पड़ा था दिल का आंगन, तुम्हारी आहटों की ख़ुशबू ने इसमें मुहब्बत के फूल खिला दिए. लफ़्ज़ों को जैसे वजह मिल गई बोलने की. यही मेरा जहां है, यही मेरी कहानी.

– शोभा रानी गोयल

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क्या आपका बॉयफ्रेंड मैरिज मटेरियल है? (Is Your Boyfriend Marriage Material?)

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नवीन व सीमा एक ही कॉलेज में थे. नवीन का आकर्षक व्यक्तित्व, सहायक स्वभाव, एक ही मुलाक़ात में दूसरों को अपना बना लेने का अंदाज़ क़ाबिले-तारीफ़ था, इसीलिए हर लड़की उसका साथ पसंद करती थी. दोस्तों के बीच भी वह काफ़ी लोकप्रिय था. जब नवीन की रुचि सीमा के प्रति बढ़ी तो उनकी दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई और झटपट शादी तय हो गई, किन्तु विवाह के बाद यही क़ाबिले तारीफ़ अंदाज़ और समाज सेवा का रवैया दोनों की तक़रार का कारण बना. सीमा नवीन से घरेलू ज़िम्मेदारियों की अपेक्षा करती थी, लेकिन नवीन से जग भलाई छूटती नहीं थी.

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राखी और निरंजन अच्छे दोस्त थे. ऑफ़िस के बाद दोनों रोज़ ही कभी कॉफ़ी हाउस, तो कभी रेस्टॉरेन्ट में बैठते. निरंजन अकेला रहता था. राखी भी माता-पिता की स्वतन्त्र विचारों वाली इकलौती बेटी थी. उनके लिए घर से ज़्यादा कैरियर महत्वपूर्ण था. दोस्ती गहरी होती गई. एक-दूसरे का साथ बहुत प्रिय था, इतना कि लगा एक-दूसरे के बिना रह ही नहीं सकेंगे. परिवारों को भी कोई ऐतराज नहीं हुआ तो सहर्ष शादी के बंधन में बंध गए. कहा-सुनी तब शुरू हुई जब निरंजन रेस्टॉरेन्ट के बजाए घर के खाने को ज़्यादा पसंद करने लगा. वह चाहता था कि राखी गृहस्थी में भी थोड़ी रुचि ले, किन्तु राखी ने तो अपने घर में पहले कभी घरेलू कामों में रुचि ली ही नहीं थी. फिर तो छोटी-छोटी बातों पर भी तू-तू मैं-मैं होने लगी और इस रिश्ते का अंत हुआ तलाक़ के साथ.

जब इस तरह की बातें सामने आती हैं तब पछतावा होता है अपने चुनाव पर. तब लगता है जल्दबाज़ी तो नहीं कर दी निर्णय लेने में. दरअसल, प्यार का नशा ऐसा होता है कि साथी में कुछ ग़लत या कमी दिखाई नहीं देती है और यदि कुछ महसूस भी होता है तो साथी का साथ पाने की प्रबल चाह के आगे सब कुछ बौना हो जाता है. पहले विवाह हमेशा माता-पिता द्वारा तय किए जाते थे. लड़के से अधिक घर-परिवार को महत्व दिया जाता था. मुश्किलें तब भी आती थीं, लेकिन उस समय समझौता करना और आजीवन इस बंधन को निभाने की भावना सर्वोपरि होती थी. बेमेल विवाह भी निभाए जाते थे और समझौतों के साथ निभाते-निभाते समय के साथ अनुकूलता और परिपक्वता भी आ जाती थी. निभाना स्त्री का प्रथम गुण था भले ही वह उसकी मजबूरी थी, क्योंकि उस समय वह आर्थिक रूप से स्वतन्त्र नहीं थी. उनके पास इतना कोई विकल्प नहीं होता था. किन्तु अब ऐसा नहीं है, बल्कि लड़कियां ख़ुद अपने लिए जीवनसाथी का चुनाव कर रही हैं. वे शारीरिक रूप-रंग से ़ज़्यादा मानसिक स्तर पर मेल चाहती हैं. प्रेम-विवाह न भी हो तो आज शादी से पहले मिलना-जुलना, एक-दूसरे के विचारों को जानना, साथ समय गुज़ारना दोनों परिवारों को भी मान्य होने लगा है. इसके बावजूद कई बार विवाह के बाद बहुत कुछ ऐसी बातें सामने आती हैं, जिनके बारे में पहले ज़रा भी ख़याल नहीं आया होता. विचार, व्यवहार और दृष्टिकोण विवाहित जीवन का अहम हिस्सा हैं, क्योंकि आप अकेली नहीं हैं. परस्पर अनुकूलता, परिपक्वता और विश्‍वास ज़रूरी है इस बंधन में, अतः ज़रूरी हो जाता है यह आंकना कि जिस व्यक्ति के साथ आप ज़िंदगी गुज़ारने का फैसला ले रही हैं, वह शादी जैसे पवित्र बंधन के योग्य है या नहीं?

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– लेकिन यह भी ज़रूरी है कि प्रेमी के बारे में अपनी राय बनाने से पहले आप अपना आत्मावलोकन भी करें, जैसे- अपने आपको जानना, अपने स्वभाव, अपनी क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं को पहचानना, अपनी अपेक्षाओं को समझना, शादी की मैच्योरिटी को गम्भीरता से समझना और उससे जुड़ी ज़िम्मेदारियों को स्वीकारना.

– शादी एक पवित्र बंधन ही नहीं है, बल्कि यहां अनेक समझौते और कभी-कभी त्याग व समर्पण भी करने पड़ते हैं. कई बार ऐसा लगता है कि विचारों में समानता या अनुकूलता के साथ ही निभाना बेहतर होता है, किन्तु ऐसा नहीं है. अनुकूल स्वभाव के बावजूद टकराव हो ही जाता है. अहम का टकराव हो ही जाता है और कभी-कभी प्रतिकूल विचारधाराएं भी परिपूरक बन ज़िंदगी आसान बना देती हैं. जैसे यदि आप किन्हीं स्थितियों में कमज़ोर हैं तो साथी वहां पूरक बन जाए. उसे आपसे प्रेम है, आप पर भरोसा है और आपको समझता है, तो शादी का यह रिश्ता ख़ूबसूरत बन जाता है.

– विवाह की पहली शर्त है प्यार व विश्‍वास के साथ उसके गुण-अवगुण सहित स्वीकारना, साथ ही उसके परिजन व प्रियजनों को भी स्वीकारना. जिसके साथ जीवन बिताना है, उसे शर्तों में न बांधें, न ही उसकी शर्तें स्वीकार करें. प्रेमी या बॉयफ्रेंड अकेला होता है, किन्तु विवाह के बाद घर-परिवार होता है, हर रिश्ते से जुड़ना होता है, हर किसी के प्रति ज़िम्मेदारियां निभानी होती हैं.

– किसी भी रिश्ते या संबंध के निर्वाह में कम्यूनिकेशन यानी बातचीत अहम भूमिका रखती है, अतः बॉयफ्रेंड के साथ हर एक विषय पर स्पष्ट बात करें. उसके विचारों को जानें, अपनी भावनाओं को व्यक्त करें, उसकी प्रतिक्रिया महसूस करें. यदि स्वयं निर्णय ले पाने में दुविधा है तो किसी मैच्योर व्यक्ति या काउंसलर की सलाह भी ली जा सकती है. यदि व्यक्ति प्यार का वास्ता देकर अपनी बात मनवाने की कोशिश करता है या आपके प्यार में पागल हो अपने परिवार को छोड़ देने की बात करता है तो याद रहे, ये स्थिति न तो सामान्य है, न व्यावहारिक. आगे निश्‍चय ही परेशानियां आ सकती हैं. जो अब आपके लिए माता-पिता को छोड़ने की बात करता है, वह कल आपको भी छोड़ सकता है. कोई पति-पत्नी परिवार-समाज से दूर दुनिया बसा कर ख़ुश नहीं रह सकते हैं, बल्कि इससे तनाव व कुंठा महसूस होने लगती है, फिर शुरू होने लगता है एक-दूसरे पर आरोपों व प्रत्यारोपों का सिलसिला.

– विवाह का सच्चा सुख है केयरिंग व शेयरिंग में. साथी के साथ हर व्यवहार में सहजता महसूस होनी चाहिए. चाहे अपनी समस्या शेयर करनी हो या अपनों को केयरिंग की ज़रूरत हो. एक-दूसरे के अलावा आपकी ज़िंदगी में अपनों के लिए भी जगह होनी चाहिए. मेरा-तुम्हारा न होकर हर स्थिति मे ङ्गहमाराफ भाव होना चाहिए. एक-दूसरे को बदलने के बजाय एक-दूसरे का पूरक होना चाहिए.

– विचारों में समानता, ज़िंदगी के प्रति नज़रिया, घर-परिवार या भविष्य के प्रति दृष्टिकोण के साथ-साथ आर्थिक दृष्टिकोण के प्रति भी अपने बॉयफ्रेंड की प्लानिंग को जानने की कोशिश करें. प्यार में आसमान से तारे तोड़े जा सकते हैं, किन्तु शादीशुदा ज़िंदगी के लिए ठोस धरातल चाहिए. पैसों के बिना ज़िंदगी नहीं चलती. पैसों से ख़ुशियां नहीं पाई जा सकतीं, लेकिन पैसों से ही सुख के साधन जुटाए जा सकते हैं और सुख के माध्यम से आनंद की अनुभूति होती है.

– साथी का चरित्र जानना भी बहुत ज़रूरी है. चरित्र उसकी संगत, उसके व्यवहार, उसके अंदाज़ आदि से आसानी से पता लग सकता है, बस आपको अपनी सोच पर, प्यार के एहसास पर भरोसा होना चाहिए. शादी का ़फैसला लेना है, जीवनभर किसी का प्यार पाना है, उसे बनाए रखना है, फिर जल्दबाज़ी क्यों? सोच-समझकर निर्णय लें कि क्या वाकई आपका बॉयफ्रेंड ऐसा है कि उसके साथ आप ज़िंदगीभर निभा पाएंगी.

– वैसे भी विवाह नामक संस्था से आज की पीढ़ी का विश्‍वास उठता-सा जा रहा है. काफ़ी लोगों के लिए शादी ज़िंदगीभर का सामाजिक बंधन नहीं रह जाता है, बल्कि अब विवाह व्यक्तिगत परिपूर्णता के साधन के रूप में देखा जाता है. साथी यदि अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाता है, तो बंधन को निभाते जाना मूर्खता समझी जाती है, अतः ज़रूरी है कि इस बात को पहले ही समझ लिया जाए कि गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड परस्पर एक-दूसरे की कसौटी पर खरे उतर पाएंगे या नहीं.

– प्रसून भार्गव

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पहला अफेयर: ख़ूबसूरत बहाना..(Pahla Affair: Khoobsurat Bahana)

Pahla Affair

पहला अफेयर: ख़ूबसूरत बहाना… (Pahla Affair: Khoobsurat Bahana)

बैंक में मेरी छवि एक शर्मीले स्वभाव वाले अफसर की थी. अपने केबिन में एकांत में अकाउंट के आंकड़ों में उलझे रहना ही मुझे भाता था. घर पर भी मैं कम ही बोलता था. मेरी अंतर्मुखी प्रवृत्ति देख भाभी अक्सर कहतीं, “देवरजी ऐसे अकेले-अकेले मौनी बाबा बनकर रहोगे, तो कौन तुम्हें अपनी लड़की देगा? संन्यासी बनने का इरादा है क्या?”

मैं भी हर बार की तरह हंसकर यही कहता, “क्या करूं भाभी लड़कियों के सामने बड़ा ही संकोच होता है.”

कुछ दिनों बाद दिवाली थी. भइया-भाभी ने मुझे दीदी को लाने उनकी ससुराल भेज दिया. दीदी की ससुराल में काफ़ी आवभगत हुई. खाना खाने के दौरान ही एक मधुर आवाज़ कानों में पड़ी, “आप तो कुछ खा ही नहीं रहे, एक रोटी और लीजिए ना.” मैंने देखा तो दीदी की ननद मानिंदी हौले-हौले मुस्कुरा रही थी. उसकी सौम्य मुस्कुराहट में न जाने क्या बात थी, मैं उसे देखता ही रह गया. आंखें मिलीं और मेरे दिल में पहली बार अजीब-सी हलचल हुई. अब मैं मानिंदी की एक झलक पाने को ही बेताब रहता. उसकी खिलखिलाती हंसी और उसकी मासूमियत में अजीब-सी कशिश थी.

मैं कुछ-कुछ समझने लगा था कि शायद इसी को प्यार कहते हैं और अब मैं भी इसकी गिरफ़्त में आ चुका हूं. एक दिन मैं पानी पीने के बहाने डायनिंग रूम में आया. मानिंदी फिल्मी पत्रिका पढ़ते-पढ़ते कुछ गुनगुना रही थी, “होशवालों को ख़बर क्या, बेख़ुदी क्या चीज़ है…” दीदी ने उसे छेड़ा, “मेरा भाई है ही इतना प्यारा कि उसे देखकर लड़कियां अपने होश खो बढ़ती हैं… बस थोड़ा शर्माता है, उसे इश्क़ करना सिखाना पड़ेगा.”

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“धत् भाभी…” कहते हुए शर्माकर वह भागी और सीधे आकर मुझसे ही टकरा गई. फिर आंखें चार हुईं और उसके गालों पर हया की सुर्ख़ी उतर आई. वो फिर भागी, मैं हिरणी-सी भागती मानिंदी को देखता ही रह गया. उसकी चंचलता, चपलता और अल्हड़पन पर मैं मर मिटा.

इतने में ही दीदी ने बताया कि कल मुंबई की टिकट कंफर्म हो गई. यह सुनकर तो मैं जिसे आसमान से सीधे ज़मीन पर गिर पड़ा. मेरे होश ठिकाने आ गए थे. मानिंदी ने उदास होकर दीदी से पूछा, “भाभी आप कल चली जाएंगी?” पर न जाने क्यों मुझे ऐसा लगा जैसे उसे मेरा विरह सता रहा है. मुझे रातभर नींद नहीं आई. करवट बदलते-बदलते न जाने कब सुबह हो गई. जीजाजी और उनके परिवारवाले हमें विदा कर रहे थे. मानिंदी दूर खड़ी जुदाई की पीड़ा झेल रही थी. उसकी आंखों में साफ़ नज़र आ रहा था.

रास्ते में दीदी ने न जाने क्यों अचानक पूछा, “मानिंदी के बारे में क्या ख़्याल है?” मैं चुप ही रहा, शायद दीदी को हमारे मौन प्रेम की भनक लग चुकी थी. घर पहुंचकर भइया ने दीदी से पूछा, “सफ़र कैसा रहा?” दीदी ने मुस्कुराकर कहा, “प्रदीप से ही पूछ लो.” भाभी भी किचन से आकर बोलीं, “क्या बात है देवरजी, बदले-बदले से सरकार नज़र आ रहे हैं.” मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह सब क्या चल रहा है. कुछ समझ पाता इससे पहले ही दीदी ने तपाक से जवाब दिया, “बात ही कुछ ऐसी है. प्रोजेक्ट मानिंदी सफल रहा, “भइया भी फ़ौरन बोले, “तो बात चलाई जाए?”

अब मैं सब समझ चुका था कि ये सब भइया-भाभी की ही मिलीभगत थी. दीदी के ससुराल भेजना तो स़िर्फ एक बहाना था. लेकिन मुझे कोई गिला नहीं, यह बहाना इतना हसीं थी कि मुझे मेरी ज़िंदगी का सबसे ख़ूबसूरत मक़सद मिल गया था. मेरा पहला प्यार, मेरी प्यारी मानिंदी, जो कुछ ही दिनों में मेरी जीवन संगिनी भी बननेवाली थी!

– प्रदीप मेहता

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१० रोमांटिक तरीक़ों से पार्टनर को कहें आई लव यू (10 Romantic Ways To Say I Love You)

प्यार (Love)… किसी के लिए महबूब के साथ ज़िंदगी बिताने का ख़याल है, तो किसी के लिए उसके ख़याल में सारी ज़िंदगी गुज़ार देना. कोई प्यार में जीना चाहता है तो कोई जान तक निसार कर देता है. जनाब प्यार का एहसास ही कुछ ऐसा होता है. एक पल में दुनिया बदल जाती है… बदली हुई फ़िज़ां..बदली हुई रुत… बदला हुआ समा…और तो और चेहरे की रंगत भी… एक गुलाबी निखार… जो बता देता है कि आख़िर आपको प्यार हो ही गया है. लेकिन स़िर्फ प्यार होने से कुछ नहीं होता, माना कि उनसे नज़रें मिलते ही आपका दिल तेज़ी से ध़़ड़कने लगता है, पलकें झुक जाती हैं और चेहरे पर गुलाबी सुर्खी छा जाती है, लेकनि जिससे प्यार हुआ है उससे इसका इज़हार करना भी तो ज़रूरी है, क्योंकि आई लव यू (I Love You) कहना कोई आसान काम नहीं. चलिए, हम आपको बता देते हैं कि प्यार का इज़हार कैसे किया जाए.

Ways To Say I Love You

‘मैं तुम्हें प्यार करता हूं’ मात्र एक वाक्य भी बनकर रह सकता है, अगर उसे सही ढंग से कहना न आए तो! प्यार का इज़हार करने के अनगिनत तरी़के हो सकते हैं. अपने प्रिय से अपनी भावनाओं का इज़हार करते समय कभी भी शब्दों को लेकर न तो कोई कंजूसी करें, न ही स्वयं को सीमित रखें. आपके लिए आपका साथी, आपकी प्रेमिका कितनी ख़ास है, यह जतलाना न स़िर्फ रिश्तों में एक जुड़ाव पैदा करेगा, वरन् इससे जीवन में रोमांस भी बढ़ेगा और त्वचा की रंगत भी… जी हां क्योंकि ये प्यार ही तो है जो चेहरे को सुर्ख गुलाबी निखार देता है.

कुछ यूं कहें दिल की बात-

1. अपने साथी के लिए एक रोमांटिक कविता लिखें. इस बात की चिंता न करें कि उसमें शब्दों और रिद्म का मेल है या नहीं. उसमें ख़ास बात यह है कि उसे आपने लिखा है और वह आपके प्यार की सच्ची अभिव्यक्ति है.

2. आजकल मोबाइल पर एसएमएस के चलन ने प्यार के इज़हार को और भी आसान बना दिया है. अपने साथी को रोमांटिक मैसेज भेजें. हो सकता है यह आपको प्रैक्टिकल न लगे, लेकिन रिश्तों में ख़ुशबू तभी बिखरती है जब फूल खिलाएं जाएं.

3. ये ज़रूरी नहीं कि एक बार प्यार का इज़हार होने के बाद जब रिश्ता जुड़ जाए, पति-पत्नी बन जाएं तो तो फिर आई लव यू कहने की ज़रूरत ही नहीं होती. माना कि आप दोनों के बीच प्यार है, लेकिन समय-समय पर इसे जतलाना भी ज़रूरी है. माना कि हम मुहब्बत का इज़हार नहीं करते. इसका मतलब ये तो नहीं कि हम प्यार नहीं करते. यह बात प्रैक्टिकली लागू नहीं होती.

4. बेशक आप दिन-रात एक ही छत के नीचे गुज़ारते हों, लेकिन कुछ शामें घर से बाहर यह जानने के लिए गुज़ारें कि आपके प्यार की पसंद और आदतें क्या हैं. हर तरह की उलझनों और ज़िम्मेदारियों को कुछ समय के लिए झटक कर उनके साथ एक गुलाबी शाम गुज़ारें यानी उन्हें किसी रेस्तरां या क्लब में जाएं. उसकी आंखों में झांकें और उसके मनपसंद खाने का ऑर्डर देते हुए उसके नखरे उठाएं.

5. आते-जाते यों ही उसे छू लें, बालों पर हाथ फेर दें, आंखों से इशारे करें. शर्म के मारे उनका चेहरा गुलाबी न हो जाए तो कहना.

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Romantic Ways To Say I Love You

6. आप एक दिन के लिए किसी होटल में भी अपने साथी के लिए कमरा बुक करा उसे स्पा या मसाज का मज़ा लूटने का मौक़ा दे सकते हैं. कुछ घंटे टब में स्नान करते हुए बिताएं.

7. रोमांटिक फ़िल्म देखने जाएं. उन लम्हों को साथ जीएं. साथ में घर में बैठकर रोमांटिक गाने सुनें. अगर आप दोनों पढ़ने के शौक़ीन हैं, तो एक दोपहर कोई कविता की क़िताब पढ़ते हुए गुज़ारें. ह़फ़्ते में एक दिन तो कम-से-कम उनकी पसंद के फूलों जैसे- रजनीगंधा या गुलाब का बुके अवश्य लाएं, फिर देखिए उनके चेहरे पर कैसे गुलाबों-सा निखार आ जाता है.

8. अक्सर सुनने में आता है कि शादी के कुछ सालों बाद प्यार ख़त्म हो जाता है, पर सच तो यह है कि पति-पत्नी टेक इट फॉर द ग्रांटेड की तर्ज़ पर जीने के आदी हो जाते हैं. बस थोड़ा-सा नयापन, थोड़ा-सा चुलबुलापन उनकी ज़िंदगी में फिर शुरुआती दिनों का प्यार वापस ला सकता है. जगह-जगह जैसे तकिए के नीचे, ऑफ़िस बैग में, लंच बॉक्स, शर्ट की पॉकेट में ‘आई लव यू’ की स्लिप रख दें. यह बचकानापन नहीं है. इन्हें पढ़ तो नाराज़ साथी भी खिल उठेगा.

9. उसे कहें कि ‘तुम जैसे हो मैं तुम्हें उसी रूप में चाहता हूं.’,  ‘तुम्हारा साथ मुझे ख़ुशी देता है.’,  ‘तुम्हारा मेरी ज़िंदगी में आना, मेरी ख़ुशक़िस्मती है.’

ये शब्द प्यार की डोर को और मज़बूत करते हैं. कॉम्पिलमेंट देना प्यार के बंधन को मज़बूत करता है. वह चाहे रोज़ अच्छा दिखता हो, लेकिन फिर भी रोज़ उसकी प्रशंसा करना न भूलें. अगर आलोचना भी करनी हो, तो यह जताएं कि आप ऐसा इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि आपको और संवारना-निखारना चाहते हैं. क्या इससे बेहतर कोई और तरीक़ा हो सकता है प्यार करने का?

10. प्यार का इज़हार करने में स्पर्श भी एक अहम् भूमिका निभाता है. अपने साथी के साथ बैठकर उसका हाथ पकड़ें, उसे अपने सीने से लगाएं या साथ चलते हुए हाथ थाम लेना प्यार को व्यक्त करने का सबसे सहज तरीक़ा है. स्पर्श बिना कहे भी बहुत कुछ कहने की ताक़त रखता है. आपकी छुअन प्यार ही तो है और अपने प्यार का एहसास आपको उनकी हसीं गुाबी रंगत से साफ़ झलकता नज़र आएगा. – आप जिसे प्यार करते हैं, उसके साथ अधिक-से-अधिक समय बिताने की कोशिश करें. जैसे- उसके साथ कभी-कभार डेटिंग पर जाएं, लॉन्ग ड्राइव पर निकल जाएं या फिर शॉपिंग करें. अपने साथी को कुछ ऐसी चीज़ें दें, जो उसे अपने ख़ास होने का एहसास कराए और आपके रोमांटिक होने का भी. प्यार स़िर्फ ख़ूबसूरत एहसास ही नहीं, बल्कि जीने की ज़रूरत भी है. यह मन को स्वस्थ रखता है तभी तो चेहरे पर गुलाबी निखार आता है और आप रहती हैं हमेशा
जवां-जवां…

– संजीव

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पहला अफेयर: कैसा तेरा प्यार…? (Pahla Affair: Kaisa Tera Pyar)

Pyar Ki Kahani

पहला अफेयर: कैसा तेरा प्यार…? (Pahla Affair: Kaisa Tera Pyar)

वो नज़रों से प्यार करना तेरा, पर प्यार के साथ-साथ हर बात पर तक़रार करना तेरा… तेरी शरारतों से ही नहीं, तेरी बदतमीज़ियों से भी इश्क़-सा हो गया था मुझे. हसीन था मुहब्बत का वो मंज़र. चाहत से लबरेज़ वो दिन-रात… सब बेहद ख़ुशगवार था. लेकिन कहीं न कहीं कुछ तो कमी थी… मैं भी जानती थी, तुम भी जानते थे कि हम चाहते हुए भी अभी दो से एक नहीं हो सकते… हमें इंतज़ार करना होगा. वजह! न तुम्हारे पास कोई जॉब था, न ऐसा बैकग्राउंड कि हमारे परिवारवाले तैयार हो सकें. तुमने अपनी एजुकेशन भी तो पूरी नहीं की थी… उस पर तुम्हारा ज़िंदगी को जीने का अलग ही अंदाज़. बेपरवाह-सा रवैया…

“मैं न बीते कल में विश्‍वास करता हूं, न आनेवाले कल की कल्पना… मैं आज में, यथार्थ में जीता हूं और आज का सच यही है कि हम साथ हैं. फ्यूचर किसने देखा है… क्या पता कल क्या हो? उसके लिए हम आज को नहीं खो सकते…”

रौशन ये तुम्हारा नज़रिया हो सकता है, पर मेरा नहीं. मुझे फिक्र होती है आनेवाले कल की. हमारे रिश्ते के भविष्य की…

“स्मिता, तुम प्यार करती हो न मुझसे, तो कुछ न कुछ हो ही जाएगा. बस तुम साथ मत छोड़ना, वरना टूट जाऊंगा मैं… ”

पर कहीं न कहीं तो मैं टूटती जा रही थी… तुम स़िर्फ बातें ही करते हो… न कुछ करने की कोशिश है, न किसी बात को गंभीरता से लेते हो. अपने तरी़के से हर चीज़ करनी है, अपनी मर्ज़ी से ही बात करनी है… अजीब रवैया था यह.

शायद जो बदतमीज़ियां पहले मुझे तुम्हारी ओर आकर्षित करती थीं, वही अब मुझे तुमसे दूर करती जा रही थीं… हर रोज़, हर पल मन में सवाल, दुविधाएं बढ़ रही थीं… क्या तुम्हारी ज़िंदगी में और भी है कोई? क्या तुम मुझे लेकर गंभीर ही नहीं… क्या तुम स़िर्फ अपना व़क्त गुज़ार रहे हो… पता नहीं क्या-क्या और किस-किस तरह के ख़्याल!

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उस पर गौरव ने इस दुविधा को और बढ़ा दिया… “स्मिता मैं तुम्हारा अच्छा दोस्त हूं, तुम्हारा बुरा तो नहीं चाहूंगा, तुमने आख़िर उस रौशन में क्या देखा? वो किसी भी तरह से तुम्हारे लायक नहीं, वो स़िर्फ टाइमपास कर रहा है. क्यों अपना व़क्त, अपनी ज़िंदगी उसके पीछे बर्बाद कर रही हो. तुम जैसी न जाने कितनी होंगी उसकी लाइफ में. वैसे भी तुम कहती हो न कि दिनभर ऑनलाइन रहता है… क्या कभी तुमने पूछा है कि किससे बात करता है? क्या बात करता है? क्यों बात करता है? होश में आओ… ”

गौरव की बातों पर गंभीरता से ग़ौर किया, तो लगा सच तो कह रहा है. रौशन की तरफ़ से मुझे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि उसे बहुत ज़्यादा मेरी ज़रूरत है अपनी ज़िंदगी में, शायद मैं अकेले ही, अपनी तरफ़ से इस रिश्ते को निभाए जा रही थी.

ज़रूरी नहीं कि हर समय भावनाओं में बहकर ही निर्णय लिए जाएं, कभी-कभी बहुत ज़रूरी होता है अपने स्वाभिमान के लिए कठोर निर्णय लेकर आगे बढ़ा जाए. वरना ज़िंदगी वहीं उलझकर रह जाएगी.

मैंने रौशन से बात की… “हम कब शादी करेंगे?”

“अरे स्मिता, बस थोड़ा इंतज़ार करो. जिस दिन तुम्हारे लायक हो जाऊंगा, बारात लेकर सीधे तुम्हारे घर आऊंगा…”

“…लेकिन तुम कोशिश करोगे, तभी तो किसी लायक बनोगे. तुम तो इसी ज़िंदगी में ख़ुश हो. तुमको लग रहा है, जो जैसा चल रहा है, चलने दिया जाए.”

“हां, तो इस ज़िंदगी में भी क्या बुरा है…”

तुम जिस तरह से हल्के अंदाज़ में जवाब दे रहे थे, मैं समझ गई थी कि गौरव कहीं न कहीं सही था अपनी जगह… ज़रूरी नहीं कि असल ज़िंदगी में आपको फिल्मी हीरो की तरह परफेक्ट पार्टनर ही मिले, हम अक्सर धोखा खा जाते हैं. लोगों को पहचानने में. अगर ग़लती हो गई, तो बेहतर है समय रहते उसे सुधार लिया जाए. शायद मुझसे भी ग़लती हुई थी रौशन को पहचानने में. इस ग़लती को सुधारना ज़रूरी थी.

मैंने उसे मैसेज किया- तुम मेरी ज़िंदगी का अहम् हिस्सा हो, पर मुझे कभी यह महसूस क्यों नहीं हुआ कि मैं भी तुम्हारी ज़िंदगी में उतनी ही अहमियत रखती हूं?

मेरे दोस्त, यहां तक कि मेरे घरवाले भी जानते हैं हमारे रिश्ते के बारे में, लेकिन मुझे आजतक न तुम्हारे दोस्तों के बारे में पता है, न घरवालों के बारे में… और तुम बड़ी-बड़ी बातें करते हो… मुझे नहीं लगता हमारा रिश्ता आगे बढ़ सकता है…
मुझे लगा, शायद इस बात से तो तुम्हें फ़र्क पड़ेगा… लेकिन नहीं, तुमने इसे भी बेहद हल्के अंदाज़ में लिया और तुम्हारी तरफ़ से कभी कोई कोशिश नहीं हुई मुझे रोकनी की…

जानती हूं, तुम आगे बढ़ चुके हो, पर मैंने तो सच्चे दिल से तुमसे प्यार किया था, मैं कैसे आगे बढ़ सकती थी… वहीं खड़ी हूं, उसी मोड़ पर… संभाल रही हूं ख़ुद को… पता नहीं किस उम्मीद में जी रही हूं… हम भले ही बड़ी-बड़ी बातें करते हैं कि प्रैक्टिकल होकर सोचना चाहिए, पर मैं नहीं हूं प्रैक्टिकल… प्यार और रिश्तों में कैसे कोई प्रैक्टिकल हो सकता है… पता है, लोग खेल जाते हैं दिलों से, लेकिन अपना बस नहीं इन भावनाओं पर… हां, अब इतना समझ चुकी कि तुम्हारे इंतज़ार से कुछे हासिल नहीं होगा, बस आगे बढ़ना ही एकमात्र रास्ता है… उसी रास्ते पर चलने की कोशिश में हूं, भले ही अभी लड़खड़ा रही हूं, पर धीरे-धीरे सीख जाऊंगी… संभल जाऊंगी… तुम्हारे बिना जीना सीख जाऊंगी…!

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: धुंध के पार (Pahla Affair: Dhundh Ke Paar)

Pyar Ki Kahani

पहला अफेयर: धुंध के पार (Pahla Affair: Dhundh Ke Paar)

किशोरवय की सुनहरी धूप से भरे वे प्रिय दिन कितने सुहाने थे. मेरे चारों ओर बुद्धि प्रदीप्त सौंदर्य का एहसास पसरा हुआ था. इसी आत्मविश्‍वास के कारण मैं तनिक एकाकी हो गई थी. घर से दूर हॉस्टल में रहते हुए भी मैंने कभी भी स्वछंदता का लाभ नहीं उठाया था.
गीत-संगीत का शौक ही मेरे अकेलेपन का साथी था. मेरा शुरू से ही यह मानना था कि संगीत में जो कशिश है, वो न स़िर्फ तन्हाई को, बल्कि हर मुश्किल को दूर कर सकती है. संगीत से यह गहरा लगाव ही मुझे बेहद ख़ुश रखता था.

उन्हीं दिनों हमारी कक्षा पिकनिक पर गई. हरी-भरी पहाड़ियां, कल-कल बहता स्वच्छ झरना व पास ही दरी बिछा हम छात्र-छात्राएं संकोच से बतिया रहे थे. साथ में लाए टेप-रिकॉर्डर पर मधुर, पुराने फिल्मी गीत बज रहे थे. तभी किसी ने प्लेयर बंद कर दिया. एक सहपाठी के विषय में कहा गया कि वह बहुत अच्छा गाता है एवं क्यों न उससे ही कुछ सुना जाए.

“तेरी आंख के आंसू पी जाऊं…” यह गीत गाते हुए वह गौरवर्ण, सुदर्शन सहपाठी मेरी ओर ही क्यों देखे जा रहा था, यह मैं तब समझ नहीं पाई.

उस दिन के बाद हमारी मित्रता हुई, जो धीरे-धीरे असीम सुकोमल भावनाओं की डोर से हमें बांध गई. पहले प्यार ने हम दोनों को कुछ ऐसा छुआ कि कब साथ जीने-मरने का इरादा कर लिया, पता ही नहीं चला.

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मुहब्बत की इन भावनाओं के बीच हमारी पढ़ाई भी चल रही थी. एमबीबीएस के बाद मेरे उस सुख-दुख के सखा को सुदूर नगर स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए जाना पड़ा.

वियोग के पल कितने निर्मम थे और कितने कठिन भी. तीन वर्ष पत्रों का आदान-प्रदान रहा. फिर समय की धुंध हमारे रिश्ते के बीच छा गई. धीरे-धीरे पत्रों का सिलसिला कम हुआ और फिर बंद ही हो गया. शायद माता-पिता की आज्ञानुसार वह विदेश चला गया.

बचपन से ही शरतचंद, टैगोर पढ़-पढ़कर पली-बढ़ी मैं उस प्रसंग को विस्मृत न कर सकी. सुगंधित पत्रों व जीवंत स्मृतियों का पिटारा अब भी पास था. शायद एक आस थी कि मेरे पहले प्यार की उन सुखद अनुभूतियों का एहसास उसे भी होगा और कहीं न कहीं उसके मन में भी वो तड़प, वो कशिश तो ज़िंदा होगी ही. नहीं जानती थी कि ये मेरा भ्रम था या हक़ीक़त… पर मैं बस उसकी यादों से बाहर नहीं निकलना चाह रही थी.

और आज… उस धुंध के आर-पार, समय की निष्ठुरता को ठुकराती, एक स्नेहिल आवाज़, टेलीफोन के माध्यम से फिर खनक उठी है,
“मैं सदैव के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूं. मेरे मार्ग को अपने ख़ुशी के आंसुओं से सींचे रखना. मुझे पता है कि तुम ख़ुशी में भी ज़ार-ज़ार रोती हो.”

मुझसे पूछे बिना ही उसने जान लिया था कि मेरे नैनों में आज भी उसकी प्रतीक्षा के दीये जल रहे हैं. मेरा इंतज़ार, मेरा प्यार जीत गया था.
मेरी आस ग़लत नहीं थी… मेरी आंखों से सच में आंसू बहे जा रहे थे… पर ये ख़ुशी के आंसू थे, जिनमें ग़मों के सारे पल, जुदाई की सारी रातें और हिज्र के दिनों की सारी शिकायतें धुल गई थीं. अब हमारे दरमियान स़िर्फ प्यार था… बस प्यार ही प्यार…
ख़त्म हो गया था वो इंतज़ार!

– डॉ. महिमा श्रीवास्तव

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20 बातें जो पुरुष स्त्रियों से चाहते हैं (20 Things Men Really Want In A Women)

हर लड़की यह जानने के लिए उत्सुक रहती है कि आख़िर लड़के लड़कियों में कौन-सी ख़ूबी पसंद करते हैं. तो पेश हैं ऐसी ही कुछ ख़ास बातें, जिन्हें पुरुष (Men) स्त्रियों (Women) में देखना चाहते हैं.

Things Men Want In A Women

1. समझदार

पुरुष हमेशा उसी से प्यार करता है, जो उसे और उसकी बातों को समझती और महसूस करती हो. उनकी बातों और ज़रूरतों को समझकर उनके ही तरी़के से उन्हें हैंडल करने की कोशिश करे. जितनी समझदार आप होंगी, उतना ही प्यार पाएंगी.

2. ख़ुशमिजाज़

बातों को हमेशा हंसकर ख़ुशी से स्वीकारें. यदि वे जोेक करते हैं, मज़ाक करते हैं तो आप भी वैसा ही करें. उनकी हर बात का जवाब आपके पास तैयार होना चाहिए. आप हाज़िरजवाब हों, ताकि अपने दोस्तों के बीच वे गर्व महसूस कर सकें.

3. सीधी बात

घुमा-फिराकर, लंबी-चौड़ी बातें करनेवाली महिलाएं पुरुषों को नहीं भातीं, इसलिए जो भी कहें ङ्गशॉर्ट एंड स्वीटफ होना चाहिए. यानी सीधी बात, मगर सौम्यता से.

4. आत्मविश्‍वास

ऐसी महिलाएं, जो घबराती नहीं और हर बात आत्मविश्‍वास से कहती व करती हैं, पुरुषों को बहुत पसंद आती हैं. अतः बातें सहज, पर आत्मविश्‍वास से भरी हों.

5. समर्पण

पुरुष समर्पण चाहता है. घर, बाहर, नाते-रिश्तेदारियां निभाने में और बिस्तर पर भी.

6. लचीलापन

किसी भी परिस्थिति में चाहे वह सुख की हो या दुःख की, बिना किसी शिकायत के ढल जाना पुरुषों को आकर्षित करता है.

7. देखभाल

उनकी, उनके आसपास के लोगों की और बच्चों की देखभाल करना, वो भी अपनी ज़रूरतों को नकारकर उन्हें आपके प्रति भावुक बना देती है.

8. ईमानदारी

अपने रिश्ते में ईमानदारी की उम्मीद हर पुरुष रखता है. ङ्गआप स़िर्फ उनकी हैंफ यह भावना उन्हें बेहद सुकून पहुंचाती है.

9. गर्मजोशी

भले ही आप थकी हों या परेशान हों, वजह जो भी हो, आपसे हमेशा ही गर्मजोशी की उम्मीद की जाती है. ख़ासकर दोस्तों, रिश्तेदारों व मेहमानों के सामने.

10. बुद्धिमानी

यही वह प्रमुख गुण है, जिसके बारे में ़ज़्यादा बात नहीं की जाती. परंतु ध्यान रहे, होशियार व बुद्धिमान महिलाओं से वे जीवनभर प्रभावित रहते हैं.

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Things Men Want In A Women

11. सकारात्मक सोच

जीवन के प्रति सकारात्मक रुख, जो आपके आसपास के व्यक्ति को प्रभावित करता है और ऊर्जा से भर देता है, उन्हें पसंद आता है.

12. प्रेज़ेंटेबल

घर में भी हर समय प्ऱेजेंटेबल रहें. साफ़-सुथरे सली़केदार कपड़े पहनें, जो आंखों को अच्छे लगें. हल्का-सा पऱफ़्यूम लगाएं. इसके साथ हरदम मुस्कुराता हुआ चेहरा उनकी सारी थकान मिटा देगा, यानी अपने आपको संवारकर रखें.

13. सादगी

पुरुष अक्सर महिलाओं की सादगी की ओर आकर्षित होते हैं. उन्हें दिखावा पसंद नहीं. इसलिए अपने व्यवहार में सादगी रखें.

14. मीठे बोल

क़ड़वा कभी न बोलें, न ही ताने मारें. मधुर आवाज़ में मीठी बातें बोलें, ख़ासकर आनेवाले मेहमानों और ससुरालवालों से. इसे अपनी आदत में शुमार कर लें. ऐसी महिलाएं पुरुषों को आकर्षित करती हैं.

15. फ़िटनेस

शरीर का सुडौल होना बहुत ज़रूरी है. कुछ हल्के व्यायाम, योगासन, जिम व डाइट से आप अपने आप को फ़िट रख सकती हैं. सुडौल काया ख़ूबसूरती के साथ तंदुरुस्ती देगी और उनकी तारीफ़ भी.

16. साफ़-सुथरा घर

थके-हारे व्यक्ति को घर में ही सुकून मिलता है, परंतु यदि घर बिखरा हुआ, गंदा हो तो परेशानी व चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है. साफ़-सुथरा सली़केदार घर सभी को आकर्षित करता है, फिर आपके पति को भी आपकी इस ख़ूबी पर नाज़ होगा.

17. स्वादिष्ट खाना

‘प्यार का रास्ता पेट से होकर जाता है’ यह कोरी कहावत नहीं, बल्कि हक़ीक़त है. खाने में प्यार उड़ेलें, स्वाद अपने आप आ जाएगा.

18. स्पेस बनाए रखें

हर बात में पूछताछ, टोकाटाकी या शक ठीक नहीं, स्पेस दें. ऐसी महिलाएं पुरुषों को अच्छी लगती हैं. अगर आप भी ऐसा करेंगी तो ज़िंदगी मज़े से गुज़रेगी.

19. आदर दें

आपकी बातों व व्यवहार में उनके प्रति सम्मान झलके. यही आदर अपनी सास और अन्य बड़ों के प्रति भी होना चाहिए.

20. उनमें रुचि लें

उनकी बातों व कामों में रुचि दिखाएं, भले ही उसमें आपकी दिलचस्पी न हो. ऐसी महिलाओं से पुरुष बहुत प्रभावित रहते हैं.

– डॉ. नेहा

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Tv News: एक और टीवी कपल की शादी टूटने के कगार पर, जानिए डीटेल (Siddhant Karnick Marriage is in Trouble?)

ग्लैमर वर्ल्ड में जिस तेज़ी से शादियां हो रही हैं, उसी तेज़ी से शादियों के टूटने का सिलसिला भी जारी है. जी हां, खबर है कि जी टीवी के शो एक था राजा और एक थी रानी के अभिनेता सिद्धांत कार्निक (Siddhant Karnick) और उनकी एक्ट्रेस वाइफ मेघा गुप्ता (Megha Gupta) की शादी (Marriage) में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है और वे अलग रह रहे हैं. आपको बता दें कि सिद्धांत कार्निक और  मेघा गुप्ता की मुलाक़ात साल 2015 में विवियन डिसेना की पार्टी में हुई थी, जल्द ही दोनों को एक-दूसरे से प्यार हो गया था. 1 साल तक एक-दूसरे को डेट करने के बाद साल 2016 में यह दोनों शादी के बंधन में बंध गए. इन्होंने कोर्ट मैरिज की और बाद में नासिक में प्राइवेट सेरेमनी की.

Siddharth Karnick And Megha Gupta

Siddharth Karnick And Megha Gupta

Siddharth Karnick And Megha Gupta

Siddharth Karnick And Megha Gupta

लेकिन हाल ही में आई खबरों की मानें तो सिद्धांत अपनी पत्नी मेघा से अलग हो गए हैं. यह खबर तब से आई जबसे इन-दोनों ने सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को अनफ़ॉलो कर दिया है. मेघा और सिद्धांत कभी सोशल मीडिया पर अपनी प्यार भरी तस्वीरों को पोस्ट करते नही थकते थे. लेकिन दिसंबर 2018 के बाद से इन-दोनों ने सोशल मीडिया पर साथ वाली एक भी तस्वीर शेयर नही की जिसके बाद से ही यह खबर आने लगी कि इनके रिश्ते में सब कुछ ठीक नहीं है.

एक वेबसाइट ने जब मेघा से इस बारे में जानने की कोशिश की तो उन्होंने इशारों ही इशारों में साफ बता दिया, “मेरे पास कुछ कहने के लिए नहीं है. लेकिन मुझे समझने के लिए आपका शुक्रिया.” मेघा के यह कहने से यह साफ-तौर पर पता लगता है कि मेघा और सिद्धांत की शादी-शुदा जिंदगी में सबकुछ सही नही चल रहा है. खबरों के अनुसार, सिद्धांत कार्निक और मेघा गुप्ता अब साथ में नहीं रहते हैं. एक अखबार ने जब सिद्धांत से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बात को टालते हुए कहा कि ऐसा कुछ नहीं है. कपल के करीबी मित्रों की मानें तो इनके बीच मे कोई भी समानता नहीं है इसलिए ये अलग हो गए.

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5 ग़लतियां जो महिलाएं सेक्स के दौरान करती हैं (5 Mistakes Women Make In Bed)

हर महिला (Woman) चाहती है कि उसका दांपत्य जीवन रोमांच से भरपूर रहे, लेकिन इसके लिए सारी मेहनत पति (Husband) करें, उन्हें अपनी तरफ से एफर्ट लेना न पड़े. इस चक्कर में उनकी सेक्स लाइफ (Sex Life) भी प्रभावित होती हैं और उनकी अपनी भावनाएं पूरी नहीं हो पातीं. जानें वो कौन-सी ऐसी ग़लतियां (Mistakes) हैं, जो महिलाएं सेक्स के दौरान करती हैं और जिसके कारण उनकी सेक्स लाइफ बुरी तरह प्रभावित हो सकती है. अगर आप भी ये ग़लतियां करती हैं, तो आज ही इन्हें सुधार लें.

Mistakes Women Make In Bed

1. पति को ख़ुद ही पहल करना चाहिए

अक्सर महिलाएं ये सोचकर पहल नहीं करतीं कि ये तो उनके पार्टनर का काम है. वे सोचती हैं कि सेक्स में वे क्या चाहती हैं, उनके पार्टनर को ख़ुद ही समझ जाना चाहिए और वे अपने दिल की बात कहती नहीं, लेकिन ये सोच बिल्कुल ही ग़लत है. आप क्या चाहती हैं, ये आप जब तक बताएंगी नहीं तब तक वे कैसे समझ पाएंगे? इसलिए बेहतर होगा कि आप खुलकर उन्हें अपनी चाहत के बारे में बताएं. अगर इसमें शर्म महसूस हो तो व्यवहार व इशारों में उन्हें समझाएं.

2. वे आपके दिल की बात नहीं समझते

अक्सर पुरुष सेक्स में जल्दबाज़ी करते हैं और स्त्रियों की चाहत ङ्गकुछ औरफ की होती है. पुरुष फोरप्ले में ़ज़्यादा व़क़्त नहीं लगाते, जबकि स्त्रियों के लिए फोरप्ले ज़रूरी होता है. अगर आपके पार्टनर को ये बात नहीं पता तो उन्हें बताएं कि सेक्स के पहले फोरप्ले आपके लिए कितना आनंददायक होता है. फोरप्ले के दौरान कुछ नया करें और उन्हें बताएं कि उन्हें भी कुछ ऐसा ही करना चाहिए. एक बार उन्होंने आपकी ज़रूरत समझ ली तो यक़ीनन वे आपकी हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करेंगे और आपका सेक्स जीवन और भी आनंददायक बन जाएगा.

3. अपने शरीर को लेकर हीनभावना

महिलाएं ये बात नहीं मानतीं, लेकिन ये सच है कि वे अपने शरीर   को लेकर हीनभावना से ग्रस्त रहती हैं और सेक्स के दौरान भरसक कोशिश करती हैं कि उनका पार्टनर उनके इन अंगों को देखने न पाए और इस बात से वो कई बार चिढ़ जाता है. अगर आप भी ऐसा ही सोचती हैं और ये आश्‍वासन चाहती हैं कि आपकी बॉडी पऱफेक्ट है तो उनसे खुलकर पूछें कि मैं अपने अंगों को लेकर इनसिक्योर महसूस करती हूं. क्या आपको ये आकर्षक लगते हैं?

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Mistakes Women Make

4. सेक्स के लिए हमेशा नाना कहना

सेक्स के मामले में ये हमारे यहां पहले से ही होता आया है. पुरुष ङ्गहां-हांफ करते जाएंगे और महिलाएं ङ्गना-नाफ. लेकिन सेक्स के लिए हमेशा ऐसा करना ठीक नहीं है, बल्कि कभी-कभी उल्टा भी होना चाहिए. सेक्स की पहल आपकी तरफ़ से भी होनी चाहिए और उस शाम के लिए आपकी तरफ़ से ख़ास तैयारी होनी चाहिए, ताकि वो शाम ख़ास बन जाए.

5. सेक्स के बाद पार्टनर से व्यवहार

अक्सर महिलाएं सेक्स के बाद ङ्गतुम तो बड़े बेशर्म हो….बच्चे इतने बड़े हो गए, लेकिन तुम्हारी आदतें नहीं बदलीं…फ जैसी बातें कहकर अपने पार्टनर का मूड ऑफ़ कर देती हैं, लेकिन ऐसा करना ठीक नहीं. ध्यान रखें कि सेक्स जीवन का ज़रूरी हिस्सा है और स्वस्थ और आनंददायक जीवन के लिए महत्वपूर्ण भी.

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पहला अफेयर: हां, यही प्यार है! (Pahla Affair: Haan Yehi Pyar Hai)

Pyar Ki Kahani
पहला अफेयर: हां, यही प्यार है! (Pahla Affair: Haan Yehi Pyar Hai)

प्यार, इश्क़, मुहब्बत, लव, अफेयर… एक ही एहसास के न जाने कितने नाम हैं ये, लेकिन मुझे इस एहसास में डूबने की इजाज़त नहीं थी और न ही चाहत थी, क्योंकि मेरी शादी हो चुकी थी. यह बात अलग है कि मैं उस व़क्त शादी के लिए कतई तैयार नहीं थी. दरअसल, शादी की बातचीत के बीच ही जब मुझे यह पता चला कि लड़केवाले दहेज की मांग करने लगे हैं, तो एक नफरत-सी पाल ली थी मैंने उनके प्रति.

जब अपने होनेवाले पति को देखा, तो मन और भी खिन्न हो गया. सांवला-सा रंग, दुबला-पतला शरीर और उस पर दहेज की मांग. ख़ैर, जैसे-तैसे शादी हो गई. मैं इंकार भी नहीं कर पाई, क्योंकि जिस परिवार में पली-बढ़ी थी, वहां लड़कियों की इच्छा-अनिच्छा को महत्व नहीं दिया जाता था. उस पर पिताजी की आर्थिक स्थिति भी बहुत ज़्यादा अच्छी नहीं थी. पिताजी की इच्छा की ख़ातिर शादी तो मैंने कर ली थी, पर पहले ही दिन अपने पति को सब कुछ साफ़-साफ़ बता दिया कि मुझसे किसी भी तरह के प्यार या अपनेपन की उम्मीद न रखें. उन्होंने हंसकर जवाब दिया कि उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है और अपना बिस्तर अलग लगाकर वो सो गए.

मैं बहुत हैरान हुई, लेकिन मेरे मन में इतनी शिकायतें थीं कि मुझे उनकी हर बात पर चिढ़ होती थी और एक ये थे कि मेरी हर चिढ़ और गुस्से पर बेहिसाब प्यार उमड़ आता था इन्हें. हर बात को प्यार से समझाते, हर व़क्त इनके होंठों पर मुस्कान बिखरी रहती. बहुत संयमित और संतुलित व्यक्ति थे ये. मुझे अक्सर कहते कि कभी न कभी तो तुम मेरे प्यार को समझोगी और तुम भी मुझसे प्यार करने लगोगी.

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एक दिन इनकी मम्मी से मेरी थोड़ी कहा-सुनी हो गई थी और इन्हें भी मैंने दहेज मांगने का ताना दे दिया था. उस पर इन्होंने बताया कि जो भी पैसे दहेज के रूप में मिले, वो मेरे ही अकाउंट में जमा करवा दिए हैं. अपने मम्मी-पापा को वो उस व़क्त नहीं समझा सके थे कि दहेज लेना अपराध है, पर शादी के बाद उन्हें मना लिया.

मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि क्या कहूं और क्या न कहूं? इन्होंने मुझे इतना प्यार दिया, इस तरह संभाला कि न कभी ज़ोर-ज़बर्दस्ती की, न कभी पति होने का हक जताया. इनके प्यार में पवित्रता की महक थी, कभी वासना की की गंध नहीं आई. मैं भूखी रहती, तो बच्चों की तरह खाना खिलाते. घर में कोई टीका-टिप्पणी करता, तो उन्हें भी समझाते कि नए परिवेश में घुलने-मिलने में व़क्त लगता है.

इनकी इसी सादगी, समझदारी और सबसे बढ़कर पवित्र प्यार ने मुझे जैसे अपनी और खींच लिया था. मैं हर व़क्त सोचती कि दुनिया में कोई इतना अच्छा और सच्चा कैसे हो सकता है? मैं वाकई ख़ुशनसीब हूं, जो ऐसा जीवनसाथी मुझे मिला, एक अजीब-सा आकर्षण महसूस करने लगी थी मैं इनकी ओर. सोचा था कभी इश्क़ नामक रोग नहीं लगेगा मुझे, मगर इनके प्यार के एहसास ने मुझे भीतर तक भिगो दिया था.

मेरा जन्मदिन था, इनके आने का इंतज़ार कर रही थी और अपने तोह़फे का भी. ये आए और मैं बस इननकी बांहों में सिमट गई. आंखों ही आंखों में बातें हुईं और मुझे मेरी पहली मुहब्बत का एहसास हुआ. मैं समझ गई कि हां, यही प्यार है! उस रात मैं संपूर्ण स्त्री बन गई थी.

आज सात साल हो गए, हमारे दो प्यारे-प्यारे बच्चे हैं. मैं परिवार में पूरी तरह से घुल-मिल चुकी हूं, लेकिन हमारे प्यार में अब भी वही पहले प्यार की महक और कशिश बरकरार है. सचमुच यही मेरा पहला प्यार था. मैं इनसे यानी अपने पति राजेश से बेहद प्यार करती हूं और मुझे अपने प्यार पर नाज़ है.

– देवप्रिया सिंह

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पुरुषों की चाहत- वर्किंग वुमन या हाउसवाइफ? (What Indian Men Prefer Working Women Or Housewife?)

चूल्हा-चौका देखनेवाली… ऑफ़िस की फ़ाइलें पकड़े घर में बच्चों को संभालनेवाली या फिर कंपनी की मीटिंग में व्यस्त रहनेवाली… आख़िर किस तरह की पत्नी (Wife) चाहते हैं आज के पुरुष (Men)? यह प्रश्‍न आज निश्‍चित तौर पर महत्वपूर्ण है और चर्चा का विषय भी.

Working Women Or Housewife

समाज बदला… परिवार बदले… साथ ही परिस्थितियां भी बदली हैं. इन बदलावों ने समाज में स्त्री की भूमिका ही बदल दी है. आज की स्त्री एजुकेटेड है, स्मार्ट है, करियर वूमन है… अब वो घर की ज़िम्मेदारियों के साथ ही बाहर की ज़िम्मेदारियां भी बख़ूबी निभा रही है, क़ामयाबी की नई बुलंदियों को छू रही है, लेकिन पुरुष को उनका ये नया रूप कितना पसंद आ रहा है? वे वर्किंग पत्नी चाहते हैं या घरेलू पत्नी, ये जानने के लिए हमने कुछ पुरुषों से बातचीत की.

दोनों का काम करना ज़रूरी है

प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहे सुरेश जोशी कहते हैं, “मेरी पत्नी स्कूल में पढ़ाती है. हालांकि यह काम बहुत मुश्किल तो नहीं है, फिर भी समय तो देना ही पड़ता है. वो समय, जो घर-परिवार व बच्चों का है. पर क्या करें, आजकल आर्थिक बोझ इतना बढ़ गया है कि दोनों का काम करना ज़रूरी है. पुरुषों को पसंद हो या न हो, महिलाओं का काम करना आज की ज़रूरत है. फिर भी मेरी व्यक्तिगत राय पूछें, तो मुझे लगता है कि घर-परिवार को बांधकर रखने के लिए स्त्री की ज़रूरत घर में ज़्यादा होती है.”

चाय भी ख़ुद बनानी पड़ती है

ऐसा सोचनेवाले जोशी अकेले नहीं हैं. बैंक में जॉब करनेवाले आदित्य की भी कुछ ऐसी ही सोच है. वे बताते हैं, “आप जब ऑफ़िस से थके-हारे घर आएं और आपको घर का दरवाज़ा ख़ुद ना खोलना पड़े, तो कितना अच्छा लगता है. दिनभर ऑफ़िस की समस्याओं को झेलने के बाद शाम को घर पर पत्नी का मुस्कुराता हुआ चेहरा नज़र आए तो सारी परेशानियां और थकान अपने आप भाग जाती हैं, लेकिन दुख की बात यह है कि आजकल ऑफ़िस से घर आने के बाद चाय भी ख़ुद ही बनानी पड़ती है. ऑफ़िस की चिंताएं, ऑफ़िस की थकान घर आकर भी दूर नहीं होती. दूसरे दिन फिर उन्हीं सारी चिंताओं के साथ ऑफ़िस जाना पड़ता है. पत्नी के लिए भी घर और ऑफ़िस को एक साथ संभालना मुश्किल होता है.”

ज़रूरत न हो, तो बेहतर है स्त्री घर पर ही रहे

इन्हीं विचारों का समर्थन करते हुए मंगेश कहते हैं, “सबसे ज़रूरी बात है स्त्री और पुरुष के बीच संतुलन बने रहना. इसके लिए स्त्री का समझदार होना आवश्यक है. अगर किसी प्रकार की ज़रूरत ना हो, तो बेहतर है कि स्त्री घर पर ही रहे. हाउसवाइफ़ होना कोई शर्म की बात नहीं है. स्त्री को इस मानसिकता से बाहर निकलना  पड़ेगा. वे जो घरेलू काम करती हैं, उस पर उन्हें गर्व होना चाहिए. रही बात उनकी क़ाबिलियत की, तो वे अपनी रचनात्मकता और ज्ञान का उपयोग घर-परिवार और समाज की बेहतरी के लिए कर सकती हैं. अगर पत्नी-पति में से किसी एक का बाहर जाना ज़रूरी है, तो किसी एक का घर में रहना भी उतना ही ज़रूरी है. स्त्री के बाहर जाने से पुरुषों को घर में कई सारी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है, जिसे कभी-कभी वे हैंडल नहीं कर पाते.”

घर की सारी व्यवस्था चरमरा जाती है

अहमद शेख बताते हैं कि अगर स्त्री घर से बाहर जाती है, तो घर की सारी व्यवस्था ही चरमरा जाती है. घर की देखभाल स़िर्फ और स़िर्फ एक स्त्री ही अच्छी तरह कर सकती है. यह काम किसी पुरुष के बस की बात नहीं है. समाज और घर में स्त्री की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. तो यह था सिक्के का एक पहलू, अगर दूसरी ओर गौर करें, तो चीज़ें काफ़ी अलग दिखाई देंगी. दूसरे पहलू में आप पाएंगे कि पुरुषों ने इस बदलाव में अपने आपको बहुत अच्छी तरह से ढाल लिया है.

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Housewife
महिलाओं की भी अपनी ज़िंदगी है

एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले ए. मुरली कहते हैं, “हमें इस बदलाव को नकारात्मक रूप में नहीं लेना चाहिए. यह एक अच्छी शुरुआत है. हमारी सामाजिक व्यवस्था हमेशा से पुरुष प्रधान रही है. उसे बदलने की ज़रूरत है. बदलते समय के साथ हमें अपनी सोच बदलनी पड़ेगी, क्योंकि आज महिलाओं की अपनी ज़िंदगी है, उनका अपना करियर है और उनके अपने सपने भी हैं. केवल अपने आराम के लिए उनके सपनों को दांव पर लगाना तो ठीक नहीं. मैं अपनी पत्नी के बाहर काम करने से बहुत ख़ुश हूं. वह अपने टैलेंट का, अपनी क़ाबिलियत का सही उपयोग कर रही है.”

बदलाव का स्वागत करें

कुछ ऐसी ही सोच रखने वाले पूनेंद्र शाह बताते हैं, “आप दिनभर के लिए घर से बाहर रहते हैं. ऐसे में अगर आपकी पत्नी को बैंक, नेट आदि बाहर के काम आते हों, तो आपका भार काफ़ी हद तक कम हो जाएगा. इस तरह का व्यावहारिक ज्ञान अगर स्त्रियां बाहर जाएं, तो ही उन्हें मिल सकता है. आजकल स्त्रियां भी पुरुषों की तरह शिक्षा प्राप्त करती हैं. फिर घर में रहकर उस शिक्षा को व्यर्थ जाने देना मूर्खता है. समाज में आ रहे इस बदलाव का स्वागत करना चाहिए.”

स्त्रियां कोई रचनात्मक कार्य करें

पवन कुमार के अनुसार, “घर में रहकर सास-बहू सीरियल्स देखकर अपनी मानसिकता ख़राब करने से अच्छा है कि घर से बाहर निकलकर स्त्रियां कोई रचनात्मक काम करें. अपनी बुद्धि की धार को तेज़ करें. हां, इसके लिए हम पुरुषों को घर के कामकाज में उनका हाथ बंटाना पड़ेगा.”

समाज स्त्री और पुरुष दोनों के कंधों पर टिका है

समाजशास्त्री कमल शर्मा के अनुसार, समाज की प्रगति में स्त्री की भूमिका अहम् है, इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. स्त्री और समाज एक-दूसरे के पूरक हैं . स्त्री के जीवन में आए बदलाव समाज में बदलाव लाते हैं. पिछले कुछ सालों में स्त्री की भूमिका में काफ़ी बदलाव आया है. साथ ही सामाजिक व्यवस्था में भी कई तरह के बदलाव आए हैं. हमारे परिवार संयुक्त से एकल हो गए हैं. ऐसे में परिवार में सदस्य भी कम हो गए हैं. जहां पुरुषों पर आर्थिक भार बढ़ा है, वहीं स्त्रियों पर बाल-बच्चों, पति और घर की ज़िम्मेदारी का बोझ बढ़ा है. ना चाहते हुए भी कभी-कभी स्त्री को बाहर काम करने जाना पड़ता है, पर इसके साथ घर की ज़िम्मेदारियां, तो कम नहीं होतीं. इस भार से स्त्रियों में अवसाद या चिड़चिड़ापन आ सकता है, जो घर और समाज के संतुलन को बिगाड़ सकता है. अगर ऐसे में पुरुष स्त्री का हाथ थाम लें, तो बातें सुलझ सकती हैं. दूसरी बात स़िर्फ अपनी ज़िद या फिर ़फैशन या फिर किसी झूठी स्पर्धा या मान-सम्मान  के लिए बाहर काम पर जाना ख़ुद स्त्री के व्यक्तित्व के लिए भी हानिकारक हो सकता है. समाज स्त्री और पुरुष दोनों के कंधों पर टिका है, इसलिए समाज के इन दोनों ही घटकों को समझदारी से इस साझेदारी को निभाना चाहिए.

 

– विजया कठाले

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कहीं आप कंप्लेन बॉक्स तो नहीं? (Don’t Be A Complain Box)

दुखी आत्मा या फिर रोने की मशीन… अक्सर हमारा सामना ऐसे लोगों से होता है, जो हर व़क्त स़िर्फ शिकायत (Complain) करते रहते हैं. घर-परिवार, दोस्त, रिश्तेदार, ऑफिस कलीग्स से लेकर क़िस्मत और भगवान से भी उन्हें बहुत-सी शिकायतें होती हैं. क्यों करते हैं लोग इतनी शिकायत और क्या होता है इसका परिणाम, आइए जानते हैं..

Complain Box

किसी ने कहा है कि कंप्लेन करना एक संक्रामक बीमारी की तरह है, जो हमारी ख़ुशियों के साथ-साथ  हमारे रिश्ते, सेहत और सफलता को बर्बाद कर देती है. और सबसे बड़ी बात यह कि अक्सर कंप्लेन करनेवाले को यह एहसास ही नहीं होता कि वह एक कंप्लेन बॉक्स बन चुका है.

क्यों करते हैं लोग शिकायत?

शिकायत तो हर कोई करता है, पर जब आपकी हर बात शिकायत और शिकायती लहज़े से शुरू हो, तो आप दूसरों से अलग हो जाते हैं. एक्सपर्ट्स की मानें, तो यह बहुतों की आदत में शुमार होता है. ज़रूरी नहीं कि वो हर व़क्त दुखी हो, पर ख़ुशी के पलों में भी वो किसी अनहोनी की आशंका में ही शिकायत करते रहते हैं.

अटेंशन पाने के लिए

कुछ लोगों को हमेशा सेंटर ऑफ अट्रैक्शन बने रहना अच्छा लगता है. उन्हें लगता है कि हर कोई स़िर्फ उन पर ध्यान दे, उनके बारे में ही सोचे और बात करे और जब ऐसा नहीं होता, तब वो अपना रोना शुरू कर देते हैं. मेरे पास इसके लिए समय नहीं है, मेरे पास उसके लिए समय नहीं है, मैं क्या करूं? जैसे कि दुनिया के बाकी लोगों के पास रोज़ाना 48 घंटे हैं और इन्हें स़िर्फ 24 घंटे मिले हैं.

ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए

कुछ लोगों को किसी भी चीज़ की ज़िम्मेदारी लेनी ही नहीं होती है. हर काम के लिए इस तरह कंप्लेन करते हैं कि जैसे दुनिया का सबसे कठिन काम उन्हें दे दिया गया हो. काम कर तो देंगे, पर उसकी ज़िम्मेदारी ख़ुद नहीं लेंगे.

अपनी कमियों को छुपाने के लिए

ज़्यादातर लोग अपनी कमियों को छुपाने के लिए कंप्लेन करते हैं. काम समय पर न पूरा होने के लिए पूरे ब्रह्मांड को ज़िम्मेदार ठहरा देंगे कि इसकी वजह से ही ऐसा हुआ, उसकी वजह से वैसा हुआ.

नकारात्मक सोच

ज़्यादा शिकायतें वही लोग करते हैं, जिन्हें सब में कमियां ही दिखाई देती हैं. दरअसल, उनकी सोच ही नकारात्मक होती है, इसलिए उन्हें हर जगह कमी ही नज़र आती है.

आत्मतुष्टि के लिए

शिकायत करनेवाले इसे आत्मतुष्टि का एक ज़रिया बना लेते हैं. ख़ुद को समझाने के लिए कि मेरी कोई ग़लती नहीं, बल्कि सारी ग़लती सामनेवाले की ही है, क्योंकि सारी कमियां उसी में हैं.

वो उससे कहीं ज़्यादा के हक़दार हैं

इन्हें हमेशा इस बात की शिकायत रहती है कि इन्हें बाकी लोगों से बहुत कम मिला है, जबकि वे इससे कहीं ज़्यादा अच्छी सैलरी, ज़्यादा अच्छी जॉब, ज़्यादा ख़ुशियों और सब कुछ ज़्यादा पाने के हक़दार हैं. आप इनके लिए कुछ भी कर दें, फिर भी इन्हें अपना सब कुछ दूसरों से कम ही लगेगा.

मैं ही सबसे अच्छा काम कर सकता हूं

अपने आइडियाज़ को ही सबसे आगे रखना और अपनी बात को सही साबित करने के लिए दूसरों को नीचा दिखाना, दूसरों के आइडियाज़ में कमी निकालना, अपने आगे दूसरों को न गिनना इनकी आदत में शुमार होता है.

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Complain Box

कहीं आप में तो नहीं ये लक्षण?

–     कंप्लेन बॉक्स को ग्लास हमेशा आधा खाली नज़र आता है. क्या आपको भी दूसरों में स़िर्फ कमियां नज़र आती हैं?

–     मज़ाक-मज़ाक में लोग आपको जताने की कोशिश करने लगे हैं कि आप हमेशा शिकायत ही करते रहते हैं.

–     अगर आपके दोस्त आपके साथ समय बिताने से कतराने लगे हैं, तो समझ जाइए कि आपकी कंप्लेन करने की आदत से वो ऊब चुके हैं.

–     आपको अपने चारों तरफ़ स्ट्रगल ही दिखाई देता है.

–     हर तरफ़ रुकावटें आपको आगे बढ़ने से रोकती हैं. अगर आपको लगता है कि आप में भी ये लक्षण हैं, तो अभी इस ओर ध्यान देना शुरू करें.

टॉक्सिक है हर व़क्त का रोना 

–    कंप्लेन करने से चीज़ें बद से बदतर लगने लगती हैं.

–     यह आपकी सेहत के लिए नुक़सानदायक है, क्योंकि आपको मानसिक शांति और सुकून नहीं मिलता.

–     हर व़क्त शिकायत करते रहने से आपकी एनर्जी ख़त्म होती रहती है, जिससे आप थका हुआ महसूस करते हैं.

–     यह आपकी आदत में शुमार हो जाता है.

–     आपका सब कॉन्शियस माइंड आपको हर नई चीज़ में निगेटिविटी दिखाने लगता है.

–     हमेशा शिकायत करते रहने से आप नाउम्मीद हो जाते हैं. हर तरफ़ निराशा नज़र आती है.

–     यह क्रिएटिविटी को बुरी तरह प्रभावित करती है, जिससे आप क्रिएटिव काम करने की बजाय कामचलाऊ काम शुरू कर देते हैं.

–     आप कोई भी नया काम करने से कतराने लगते हैं, इसलिए नए और क्रिएटिव आइडियाज़ को सिरे से ख़ारिज कर देते हैं.

–     यह आपके चेहरे की ख़ुशी और उत्साह-उमंग छीन लेता है.

कैसे कम करें शिकायत करना?

–     अपनी सोच बदलें. हालांकि यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल. भले ही हम एक पल के लिए निश्‍चय करें, पर कुछ देर बाद ही शिकायत करने लगेंगे. इसमें थोड़ा व़क्त लगेगा, इसलिए धैर्य रखें और रोज़ाना प्रैक्टिस करें.

–     शुरू-शुरू में नकारात्मक सोच को कंट्रोल करने में व़क्त लगेगा. लगातार निगेटिव फीलिंग्स को न दबाएं, बल्कि किसी से शेयर कर लें.

–     अपने माइंड और बॉडी को कंट्रोल करने के लिए योग व मेडिटेशन का सहारा लें.

–     कोशिश करें कि लोगों के बारे में बहुत जल्दी राय कायम न करें. दूसरों को जानने-समझने के बाद ही उनके बारे में राय बनाएं.

–     एक लिस्ट बनाएं, जिसमें उन सभी का ज़िक्र करें, जिसके लिए आप ईश्‍वर के शुक्रगुज़ार हैं. इससे आप अच्छा महसूस करेंगे.

–     जिस बदलाव की उम्मीद आप दूसरों से कर रहे हैं, उसकी शुरुआत ख़ुद से करें.

–     अगर कोई बात आपको परेशान कर रही है, तो या तो उसे सुलझा लें या फिर मान लें कि इस समय इसका हल नहीं निकल पा रहा है. अपने काम की ज़िम्मेदारी लेना सीखें.

–    ख़ुश रहने की कोशिश करें. अगर आपको सबसे अधिक शिकायत अपनी जॉब से है, तो आपको जॉब बदलकर देखना चाहिए, शायद इससे आपको

ख़ुशी मिले.

–     वो सब करें, जिससे आप रिलैक्स होते हैं और आपको अच्छा फील होता है.

–     ख़ुद से यह वादा करें कि आप जब भी बोलेंगे, सकारात्मक ही बोलेंगे. कोशिश करेंगे कि नकारात्मक बातों को ख़ुद पर हावी न होने दें.

–    अगर आप ख़ुद को इससे लड़ने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं, तो किसी एक्सपर्ट की मदद लेने में संकोच न करें.

  – सुनीता सिंह

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