Tag Archives: Relationship

किस महीने में हुई शादी, जानें कैसी होगी मैरिड लाइफ? (Your Marriage Month Says A Lot About Your Married Life)

रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ नवंबर में शादी करनेवाले कपल्स सबसे ज़्यादा ख़ुशहाल रहते हैं, जबकि वैलेन्टाइन्स डे के दिन शादी करनेवाले 18-36% कपल्स के तलाक़ हो जाते हैं. आपकी शादी किस महीने में हुई है और आपकी शादीशुदा ज़िंदगी कैसी होगी, आइए जानते हैं.

Married Life

जनवरी

इस महीने में जिन लोगों की शादी होती है, उन पर कुंभ राशि का प्रभाव पड़ता है. इनका दांपत्य जीवन ख़ुशहाल रहता है. दोनों पार्टनर्स में आपसी समझ काफ़ी अच्छी रहती है. दोनों एक-दूसरे के प्रति वफ़ादार होते हैं. समय-समय पर इन कपल्स को रोमांटिक सरप्राइज़ेस और गिफ्ट्स मिलते ही रहते हैं.

लव टिप: हर रिश्ता उसे निभानेवाले पर निर्भर करता है, इसलिए अपने रिश्ते को ख़ुशहाल बनाए रखने के लिए अपना सौ प्रतिशत दें.

फरवरी

इस महीने शादी करनेवाले कपल्स की शादीशुदा ज़िंदगी को आप ‘इमोशनल जर्नी’ कह सकते हैं, क्योंकि दोनों ही पार्टनर्स एक-दूसरे के प्रति इमोशनल होते हैं. आप पर मीन राशि का प्रभाव पड़ता है, जिसके कारण आप एक-दूसरे के प्रति सारी ज़िम्मेदारियां निभाते हैं. कुछ मामलों में यह भी देखा गया है कि पति या पत्नी में से एक बहुत वफ़ादार होता है, पर दूसरा उतना वफ़ादार नहीं होता और रिश्ता बिखर जाता है. यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबॉर्न में हुई स्टडी में पता चला है कि जो लव बर्ड्स वैलेंटाइन्स डे के दिन शादी करते हैं, उनके रिश्ते के टूटने के चांसेस 18 से 36% होता है.

लव टिप: जब भी आपको लगे कि रिश्ता कमज़ोर पड़ रहा है, तभी एक रोमांटिक हनीमून प्लान करें. अपने रिश्ते को ट्रैक पर लाने का इससे बेहतर उपाय नहीं हो सकता.

मार्च

अगर आपकी शादी इस महीने में हुई है, तो आपकी शादी पर मेष राशि का प्रभाव पड़ता है. आपका रिश्ता काफ़ी उतार-चढ़ाव के दौर से गुज़रता है, जहां अच्छे समय के साथ-साथ आप दोनों बुरा समय भी देखते हैं. कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि आपको अपने पार्टनर का रवैया ही समझ में न आए. कल जिस बात पर वो आपसे सहमत थे, आज उसी चीज़ के लिए आपकी बहस हो जाए. छोटी-छोटी बातों पर इनकी बहस हो सकती है.

लव टिप: इतना याद रखें कि नोक-झोंक हर रिश्ते में होती है, इसलिए उसे मन में रखकर न बढ़ाएं. एक-दूसरे के व्यक्तित्व व विचारों को समझने का प्रयास ही आपके रिश्ते को मज़बूत बनाएगा.

अप्रैल

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यह महीना विवाह के लिए सबसे अनुकूल समय लेकर आता है. तभी तो आज भी ज़्यादातर शादियां अप्रैल के महीने में होती हैं. इस महीने शादी करनेवालों पर वृषभ राशि का प्रभाव पड़ता है. इनकी सेक्स लाइफ भी काफ़ी रोमांटिक होती है. वृषभ के प्रभाव के कारण कुछ पार्टनर्स में से एक बहुत डॉमिनेटिंग होता है, पर दूसरे के कूल होने के कारण रिश्ता आसानी से निभ जाता है.

लव टिप: अपने प्यार को जताने में ज़रा भी कंजूसी न करें. कभी चॉकलेट्स, कभी फूल, तो कभी प्रेमपत्र के ज़रिए समय-समय पर अपने प्यार को जताते रहें.

मई

इस महीने शादी करनेवालों पर मिथुन राशि का प्रभाव पड़ता है. जैसा कि इस राशि की ख़ूबी है, दो पहलू या दो रूप होने की, इस ख़ूबी का असर आपके रिश्ते पर भी पड़ता है. ऐसा माना जाता है कि इस महीने शादी करनेवालों के रिश्ते के सफल होने की जितनी गुंजाइश होती है, उतनी ही गुंजाइश इसके असफल होने की भी होती है. मतलब या तो आप जन्म-जन्मांतर तक साथ निभानेवाले कपल बनते हैं या फिर जल्द ही अपनी-अपनी नई राह चुन लेते हैं. ऐसा भी हो सकता है कि दो में से एक साथी का स्वभाव बहुत बुरा हो या फिर बहुत ही अच्छा हो.

लव टिप: अपने रिश्ते को सफल या असफल बनाना आप दोनों के हाथ में है. सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ शादी को पूरे दिल से निभाएं. कभी कुछ बुरा लगे, तो भी रिश्ते को बचाने की पूरी कोशिश करें.

यह भी पढ़ें: राशि के अनुसार चुनें लाइफ पार्टनर (Who Is Your Life Partner Based On Your Zodiac Sign?)

Married Life
जून

प्यार-दुलार के साथ-साथ दया भाव इन कपल्स में कूट-कूटकर भरा होता है, तभी तो लोग इनकी सफल शादी और प्यार की मिसालें देते हैं. अगर आपकी शादी इस महीने हुई है, तो आप पर कर्क राशि का प्रभाव पड़ता है. ये कपल्स एक-दूसरे के साथ एक-दूसरे के परिवार को भी बख़ूबी संभालते हैं. इसके अलावा अपनी आनेवाली पीढ़ी को सुरक्षित भविष्य देने की पूरी कोशिश करते हैं. कुल-मिलाकर कहें, तो ये सबसे ज़िम्मेदार और केयरिंग कपल्स होते हैं.

लव टिप: जब भी पार्टनर आपके या परिवार के लिए कुछ ख़ास करता है, तो उसके प्रयासों की सराहना करें. उन्हें जताएं कि वो आपके लिए कितने बहुमूल्य हैं.

जुलाई

इस महीने शादी करनेवालों पर सिंह राशि का प्रभाव पड़ता है. आप दोनों ही अपने रिश्ते को सफल बनाने के लिए अपना सौ प्रतिशत देते हैं और उसमें पूरी तरह सफल भी होते हैं. इस राशि का ऐसा प्रभाव है कि आप एक-दूसरे के प्रति हमेशा आकर्षण महसूस करते हैं. एक-दूसरे को आगे बढ़ाने की पूरी कोशिश करते हैं. आपका शाही अंदाज़ आप अपने पार्टनर कोे भी देते हैं, जिससे आपकी शादीशुदा ज़िंदगी रौनक़ से भरपूर होती है. आप अपने शादीशुदा रिश्ते से हमेशा संतुष्ट रहते हैं.

लव टिप: सेक्स लाइफ को बूस्ट करने के लिए हमेशा बेडरूम में कुछ नया ट्राई करें. आप चाहें, तो दोनों किसी एडवेंचर ट्रिप पर भी जा सकते हैं. यह आपके रिश्ते में नई जान डाल देगा.

अगस्त

एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ इस महीने शादी करनेवाले कपल्स को बच्चे बहुत पसंद होते हैं, इसीलिए वो दो से ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं. इन्हें बड़ा परिवार  अच्छा लगता है. इस महीने शादी करनेवालों पर कन्या राशि का प्रभाव पड़ता है. इनकी ज़िंदगी में कई परेशानियां भी आती हैं, पर दोनों मिलकर उनका समाधान निकाल लेते हैं. अगर ये एक-दूसरे की पसंद-नापसंद का ध्यान रखें, तो इनका रिश्ता बहुत मज़बूत साबित होता है.

लव टिप: पतियों के लिए बहुत ज़रूरी है कि ‘तुम’ या ‘मैं’ की बजाय ‘हम’ शब्द का इस्तेमाल ज़्यादा करें. ‘हमें ऐसा करना चाहिए, हमारे लिए यह सही होगा…’ जैसे वाक्यों का ज़्यादा उपयोग करें. पत्नी को कभी अलग-थलग पड़नेवाली भावना का एहसास न होने दें.

यह भी पढ़ें: न्यूली मैरिड के लिए मॉडर्न ज़माने के सात वचन (7 Modern Wedding Vows For Newly Married)

Married Life
सितंबर

अगर आपकी शादी भी इस महीने में हुई है, तो आप पर तुला राशि का प्रभाव रहता है. तुला की ख़ूबियों के कारण ये कपल काफ़ी बैलेंस्ड रहते हैं और इसीलिए ‘परफेक्ट कपल’ कहलाते हैं. इनके बीच शायद ही कभी बड़ा झगड़ा होता हो. हर तरह के विवाद को ये आपसी सहमति से सुलझाते हैं. दोनों के बीच का तालमेल ही इनकी ख़ुशहाल शादीशुदा ज़िंदगी का राज़ है.

लव टिप: हर रोज़ रोमांस के लिए थोड़ा समय निकालें. एक-दूसरे को यूं ही निहारना, बांहों में भरना, चुपके से किस कर लेना… इन छोटी-छोटी शरारतों से लाइफ में रोमांस बनाए रखें.

अक्टूबर

इस महीने शादी करनेवालों के वैवाहिक जीवन पर वृश्‍चिक राशि का प्रभाव पड़ता है. वृश्‍चिक राशि के गुणों के प्रभाव के कारण इनकी सेक्स लाइफ बेहद रोमांटिक होती है. ये कपल एक-दूसरे के प्रति अपने प्यार और आकर्षण को बिल्कुल छिपाते नहीं. ज़िंदगी को खुलकर जीने के इनके फलस़फे का असर इनकी सक्सेसफुल मैरिड लाइफ में नज़र आता है. इनकी एक और ख़ूबी है कि ये किसी भी विपरीत परिस्थिति में पार्टनर को अकेला नहीं छोड़ते.

लव टिप: ‘तुम कितनी अच्छी हो…’ ‘मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं…’ ‘मैं समझता हूं…’ ‘मुझे माफ़ कर दो…’ ‘थैंक यू जी…’ ये वो वाक्य हैं, जो आपके रिश्ते में मिठास भरते हैं. रोज़ाना इन शब्दों का इस्तेमाल करें और देखें, किस तरह आपकी मैरिड लाइफ में मिठास बनी रहती है.

नवंबर

इस महीने शादी करनेवाले कपल्स सबसे ज़्यादा ख़ुशहाल या यूं कहें ‘हैप्पीएस्ट कपल’ माने जाते हैं. इन पर धनु राशि का प्रभाव होता है, जिसके कारण ये काफ़ी संवेदनशील होते हैं. एक-दूसरे की कमियों और ख़ामियों को समझकर रिश्ता निभा लेना ही इनके रिश्ते की ख़ूबी है. ये कपल अपने प्यार को पहली प्राथमिकता देते हैं.

लव टिप:  रोज़ाना ऑफिस से आने के बाद एक-दूसरे को गले लगाएं. शादी के पहलेवाले रोमांच को बनाए रखने के लिए शादी के बाद भी हर महीने या दो महीने में डेट पर ज़रूर जाएं. प्यार के ख़ूबसूरत एहसास से अपने रिश्ते को सराबोर रखें.

दिसंबर

इस महीने शादी करनेवालों पर मकर राशि का प्रभाव रहता है. ऐसा देखा गया है कि सबसे रोमांटिक कपल्स दिसंबर में शादी करते हैं. सुरक्षित भविष्य की चाह में ये सेविंग्स और इन्वेस्टमेंट को बहुत तवज्जो देते हैं, जिससे कभी-कभी एक-दूसरे के लिए समय नहीं निकाल पाते, पर प्यार हमेशा इनकी पहली प्राथमिकता बना रहता है.

लव टिप: उतार-चढ़ाव हर क्षेत्र में लगा रहता है, इसलिए फाइनेंस संबंधी मामलों में कभी ज़िद न करें.  रोज़ाना 10 मिनट का ‘वी टाइम’ ज़रूर निकालें. एक-दूसरे से दिनभर की बातें और क़िस्से शेयर करें.

– संतारा सिंह

यह भी पढ़ें: शादी के दिन दूल्हा-दुल्हन न करें ये 18 ग़लतियां (18 Common Mistakes Brides And Grooms Must Avoid)

पहला अफेयर: पहले प्यार की आख़िरी तमन्ना (Pahla Affair: Pahle Pyar ki Akhri Tamanna)

Pahla Affair

पहला अफेयर: पहले प्यार की आख़िरी तमन्ना (Pahla Affair: Pahle Pyar ki Akhri Tamanna)

कहते हैं, इंसान कितना भी चाहे, पर वो अपने पहले प्यार को कभी नहीं भुला पाता. पहले प्यार का एहसास, उसकी यादें उम्रभर जेहन में ज़िंदा रहती हैं. उम्र के किस मोड़ पर, कब कोई अपना-सा लगे कोई नहीं जानता. मुझे भी कहां पता था कि आज से बीस बरस पीछे छूट गई उन यादों की गलियों में मुझे फिर से भटकना पड़ेगा, जिन्हें मैं पीछे छोड़ आई थी.

आज उनके अचानक मिले इस संक्षिप्त पत्र ने फिर से मुझे उनके क़रीब पहुंचा दिया है. उनसे मेरी मुलाक़ात कॉलेज फंक्शन में हुई थी. वो मेरे सीनियर थे. मुलाक़ातें धीरे- धीरे दोस्ती में बदलीं और दोस्ती कब प्यार में बदल गयी, पता ही नहीं चला.

एक दिन वो मेरे पास आए और अपने प्यार का इज़हार कर दिया. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या कहूं. दिल के ज़ज़्बात ज़बान तक लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. कैसे कहती उनसे कि उनके सिवा कोई ख़यालों में आता ही नहीं, उनके अलावा किसी और को चाहा ही नहीं. पर बात दिल की दिल में ही रह गयी, मैं उनसे कुछ नहीं कह पायी. मेरे जवाब न देने की स्थिति में उन्होंने अपना फ़ोन नंबर देते हुए कहा कि वो मेरे फ़ोन का इंतज़ार करेंगे.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: तुमसा कोई न मिला (Pahla Affair: Tumsa Koi Na Mila)

घर पहुंच कर आईने के सामने न जाने कितनी बार ख़ुद को उनके जवाब के लिए तैयार किया, पर दिल की बात ज़बान तक नहीं ला सकी. मैं जितना ही उनके बारे में सोचती, उतना ही ख़ुुद को उनके क़रीब महसूस करती.
लेकिन मेरे प्यार के परवान चढ़ने से पहले ही उसे मर्यादाओं की बेड़ी में जकड़ जाना पड़ा. माता- पिता ने रिश्ता पक्का करने के साथ-साथ शादी की तारीख़ भी पक्की कर दी. मुझमें विरोध करने का साहस नहीं था, इसलिए चुपचाप घरवालों की मर्ज़ी से शादी कर ली- जवाब देना तो दूर, आख़िरी बार उन्हें देखना तक नसीब न हुआ.

शादी के बाद ज़िम्मेदारियों के बोझ तले कभी- कभार पहले प्यार की यादें ताज़ा हो भी जातीं तो मैं उन्हें ख़ुुद पर हावी न होने देती. पति-ससुराल वालों से कोई शिकायत नहीं थी, फिर भी हमेशा ये लगता कि कहीं कुछ छूट गया है. पति बहुत प्यार करते, लेकिन फिर भी मेरे मन में किसी और का ख़याल रहता. मगर तक़दीर का लिखा कौन टाल पाया है. आज इतने सालों बाद अचानक उनका पत्र आया है जिसमें लिखा है-
प्रिये,
सदा ख़ुुश रहो. मैंने तुम्हारा बहुत इंतज़ार किया,पर अब और न कर सकूंगा, क्योंकि शरीर ने साथ न देने का ़फैसला कर दिया है. व़क़्त बहुत कम है, आख़िरी बार तुम्हें देखने की तमन्ना है. हो सके तो आ जाओ.
तुम्हारा-आकाश

पत्र पढ़कर मुझे अपने कायर होने का एहसास हो रहा है. मुझमें तो अब भी साहस नहीं कि मैं दुनिया वालों को क्या, उन्हें ही बता सकूं कि मैं उन्हें कितना प्यार करती हूं. आज एक बार फिर मुझे औरत होने का हर्जाना चुकाना है, अपने पहले प्यार की आख़िरी तमन्ना भी पूरी न करके. शायद ङ्गमेरी सहेलीफ के माध्यम से ही उन्हें मेरा जवाब मिल जाए- और उनकी ज़िंदगी से पहले उनका इंतज़ार ख़त्म
हो जाए.

– दीपमाला सिंह

यह भी पढ़ें: तुम्हारी कत्थई आंखें (Pahla Affair: Tumhari Kathai Ankhen)

The Psychology Of Relationships: टीनएज बेटी के व्यवहार से डर लगता है (Afraid Of Teenage Daughters Behavior)

Psychology Of Relationships

रिश्तों का मनोविज्ञान (The Psychology Of Relationships)

मेरी बेटी की उम्र 28 साल है. वो नौकरी करती है. पिछले कुछ समय से उसकी शादी की बात चल रही है. कई रिश्ते भी आए, पर उसे कोई पसंद ही नहीं आता. पता नहीं उसके मन में क्या चल रहा है. उससे पूछती हूं, तो कहती है कि सही समय पर, सही लड़का मिल जाएगा, तब कर लूंगी शादी. जल्दबाज़ी में ग़लत निर्णय नहीं लेना चाहती. लेकिन लोग बातें करते हैं, जिससे मैं बहुत परेशान रहती हूं.

– शिल्पा शुक्ला, उत्तर प्रदेश.

आज की जनरेशन शादी देर से ही करती है. उनकी प्राथमिकताएं अब बदल गई हैं. एक तरह से शादी की उम्र क़रीब 30 साल हो गई है. बच्चे पढ़-लिखकर कुछ बनकर ही शादी करने की सोचते हैं. अपनी बेटी का साथ दीजिए और धीरज रखिए. सही समय पर सब ठीक होगा. लोग क्या कहते हैं, उस पर ज़्यादा ध्यान न दें. यह आपकी बेटी की ज़िंदगी का सवाल है. अपनी बेटी पर भरोसा रखें. वो सही समय आने पर सही निर्णय ले लेगी. उसके कारण ज़्यादा परेशान होकर अपनी सेहत और घर का माहौल ख़राब न करें.

यह भी पढ़े: रिश्तों में बदल रहे हैं कमिटमेंट के मायने… (Changing Essence Of Commitments In Relationships Today)

मेरे पिताजी ने वॉलंटरी रिटायरमेंट ले लिया है. अब वे सारा दिन घर पर रहते हैं, लेकिन वो बहुत चिड़चिड़े से हो गए हैं. बात-बात पर बहस और ग़ुस्सा करते हैं. ज़िद्दी हो गए हैं, जिससे घर का माहौल ख़राब रहने लगा है. समझ में नहीं आता कि उन्हें कैसे हैंडल करें, क्योंकि वो बड़े हैं, तो उन्हें कुछ कह भी नहीं सकते.

– राकेश सिन्हा, पटना.

आप उनके मन की स्थिति समझने की कोशिश करें. हो सकता है, उन्हें भी दिनभर घर पर बैठे रहना अच्छा न लगता हो या यह भी हो सकता है कि उन्हें कोई और परेशानी हो, जो वे आप लोगों से कह न पा रहे हों. थोड़ा धीरज से काम लें. उनका विश्‍वास जीतें. उनसे प्यार से पेश आएं. उन्हें
सुबह-शाम वॉक पर ले जाएं. सोशल एक्टिविटीज़, योगा इत्यादि के लिए प्रोत्साहित करें. उन्हें घर के काम की भी ज़िम्मेदारी दें. घर के महत्वपूर्ण निर्णयों में उन्हें शामिल करें. उनकी राय को महत्व दें. उन्हें महसूस न होने दें कि अब वो काम पर नहीं जाते या कुछ करते नहीं हैं. आप सब का प्यार, सम्मान और सहानुभूति उन्हें शांत रहकर कुछ और करने के लिए प्रोत्साहित करेगी.

मेरी बेटी की उम्र 14 साल है. स्कूल जाती है. आजकल उसका स्वभाव कुछ अलग-सा हो गया है. हर समय मोबाइल पर लगी रहती है. कोई बात सुनती नहीं है. पैरेंट्स तो जैसे उसके दुश्मन हैं. डर लगता है, कहीं कोई ग़लत राह न पकड़ ले.
– कोमल सिंह, पानीपत.

इस उम्र में बच्चों का यह व्यवहार स्वाभाविक है. उन्हें परिजनों से ज़्यादा उनके दोस्त अच्छे लगते हैं. उन्हें लगता है पैरेंट्स की सोच पुरानी व दकियानूसी है. बच्चों की ख़ुशी का उन्हें ख़्याल नहीं है… आदि. बेहतर होगा आप भी उनके साथ दोस्तों की तरह पेश आएं. उनके साथ समय बिताएं, उनकी एक्टिविटीज़ में सकारात्मक तौर पर शामिल हों. हंसी-मज़ाक करें. हर बात पर टोकना या लेक्चर देना उन्हें पसंद नहीं आएगा. उनका विश्‍वास जीतें. लेकिन साथ ही उन पर नज़र भी रखें, उनके फ्रेंड सर्कल की जानकारी रखें, पर उन्हें कंट्रोल करने की कोशिश न करें. घर का हल्का-फुल्का दोस्ताना माहौल उन्हें घर से और आपसे बांधे रखेगा.

Zeenat Jahan

ज़ीनत जहान
एडवांस लाइफ कोच व
सायकोलॉजिकल काउंसलर

[email protected]

यह भी पढ़े: लव गेम: पार्टनर से पूछें ये नॉटी सवाल (Love Game: Some Naughty Questions To Ask Your Partner)

पहला अफेयर: ख़ामोशियां चीखती हैं… (Pahla Affair: Khamoshiyan Cheekhti Hain)

Pyar Ki Kahani
पहला अफेयर: ख़ामोशियां चीखती हैं… (Pahla Affair: Khamoshiyan Cheekhti Hain)

हमारी दोस्ती का आग़ाज़, शतरंज के मोहरों से हुआ था. जब शबीना अपने प्यादे से मेरे वज़ीर को शह देती, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता… और कहीं मेरा ऊंट उसके प्यादे को भगा-भगाकर बेहाल कर देता, तब उसके ग़ुस्सैल चेहरे की मायूसी देखती बनती.

आज उसकी वही बचकाना हरक़तें याद आती हैं, तो मन से एक हूक उठती है. एक साथ घूमना-फिरना, मौज-मस्ती के वो दिन… न जाने कहां गुम हैं? नहीं जानता वो दोस्ताना हाथ क्यों पीछे हट गया. उफ़़्फ्! व़क्त की गर्द ने मुझे अपनी आग़ोश में लपेट लिया है.
जब-जब मैंने गंभीर हो उसके भविष्य के बारे में कुछ कहा, तो उसने हर बात हंसकर हवा में उड़ा दी. जैसे कोई जासूसी किताब पढ़ रही हो. मैं नादान कहां पढ़ पाया उसके भीतरी निबंध!

न जाने कितने ख़त लिख-लिख पानी में बहाए हैं और कितने किताबों में ़कैद हैं. जो उसकी सहेली शमीम के हाथ भेजे, उनका भी कोई जवाब न आया. व़क्त मुट्ठी से रेत-सा कैसे फिसलता रहा… मैं कहां जान पाया! बस, उसकी चुप्पी अंदर-ही-अंदर सालती है.

शमीम की बातों ने मेरा पूरा वजूद हिला दिया. शमीम से जाना कि उसने किसी अमीर साहिबज़ादे से दोस्ती कर ली है. इस ख़बर ने तो जैसे मेरे जीवन में सूनामी-सा बवंडर ला खड़ा किया.

“जब भंवर में आ गई कश्ती मेरी, नाख़ुदा ने क्यों किनारा कर लिया…”

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: मंज़िल (Pahla Affair: Manzil)

हिम्मत जुटाकर एक दिन मैंने फोन घुमाया… उधर से मर्दाना आवाज़ थी, “हैलो, अरे तुम… राशिद! कहो कैसे फोन किया?”

मैं जल्द ही बोला, “अब्बाजान आदाब! ज़रा सबीना से बात कराएंगे?”

उनके अब्बा की आवाज़ अटकी, “उनसे मिलने कोई आया है. वे गुफ़्तगू में मशग़ूल हैं.”

“आप कहें राशिद का फोन था.” मेरी बात काट उन्होंने खट से फोन रख दिया. कुछ समय मुझ पर बेख़ुदी का आलम रहा, फिर एक दिन

मैंने रात को फोन घुमाया. उधर से सबीना की आवाज़ थी,“कौन?”

“हम हैं राशिद! अरे, इतनी जल्दी आवाज़ भी भूल गई.”

उसने तरकश से ज़हर बुझा तीर छोड़ा, “सुनो, मैंने अपनी ज़िंदगी का मक़सद पा लिया है. अच्छा होगा, तुम भी अपनी कश्ती का रुख मोड़ दो…” और खटाक से फोन कट गया.

उसका फेंका हुआ वह एक जुमला मेरा जिगर चाक-चाक कर गया. उफ़़्फ्! हुस्न पर इतना ग़ुरूर? जी चाहा सबीना को पकड़कर पूछूं कि ये सुनहरे सपनों का जाल क्यों बिछाया? इतने रंगीन नज़ारों की सैर क्यों कराई? यूं शतरंज के मोहरे-सा उठाकर पटकना कहां की वफ़ादारी है? वाह! क्या दोस्ती निभाई!

अब तो हर तरफ़ दमघोंटू माहौल है… उसकी बेवफ़ाई का कारण अब तक नहीं जान पाया और अगर उसने तय ही कर रखा था कि साथ नहीं निभाना, तो मन से, भावनाओं से क्यों ऐसा खेलकर चली गई. साफ़-साफ़ कह देती कि बस दोस्ती रखनी है, उसके बाद हमारे रास्ते अलग हैं… क्यों मुझे मुहब्बत की हसीन दुनिया दिखाई और क्यों मैं उसकी आंखों को ठीक से पढ़ नहीं पाया. अब तो बस, मैं हूं और मेरी तन्हाई! ये ख़ामोशियां अब चीखने लगी हैं. मेरे पहले प्यार का यह हश्र होगा… नहीं जानता था. अब तो ये ख़ामोशियां ही मुझसे बतियाती हैं… मेरा मन बहलाती हैं…!

कहीं दूर से एक आवाज़ आ रही है…

“धीरे-धीरे अंदर आना… बिल्कुल शोर न करना तुम…
तन्हाई को थपकी देकर… मैंने अभी सुलाया है…”

– मीरा हिंगोरानी

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: खिला गुलाब की तरह मेरा बदन… (Pahla Affair: Khila Gulab Ki Tarah Mera Badan)

पहला अफेयर: मंज़िल (Pahla Affair: Manzil)

Pahla Affair

Pahla Affair

पहला अफेयर: मंज़िल (Pahla Affair: Manzil)

आज भी दिल का एक कोना सुरक्षित है उसके लिए, जो मेरे लिए केवल एक एहसास है. बात उन दिनों की है, जब मैंने उम्र की दहलीज़ पर सत्रहवां सावन पार किया था और उसे पहली बार अपने नज़दीक से गुज़रते देखा था. एक साधारण-सा लंबा, गोरा शख़्स, गहरी आंखें, घनी पलकें मानो समा जाऊं और वो उन पलकों में मुझे छुपा ले. उसके चेहरे पर ग़ज़ब की मासूमियत थी. उसके चौड़े सीने पर सशक्त बाजू मन में ये अरमान जगा जाते कि वो मुझे अपनी बांहों में कस ले और मेरा रोम- रोम खिल उठे.

वहीं से सिलसिला शुरू हुआ उसके गुज़रने का और मेरा चुपके से उसे निहारने का. वो एक ख़्वाब था मेरे लिए, लेकिन एक लंबे अंतराल के बाद हमने साथ- साथ कुछ घंटों की दूरी तय की थी. फिर क्या था- वो मेरा अच्छा दोस्त बन गया. लगभग रोज़ ही फ़ोन पर बातें होतीं. उसे अपनी ज़िंदगी में यूं शामिल कर लेने के बाद कब मैं उससे प्यार कर बैठी, कुछ ख़बर नहीं. उसके बाद तो जैसे मेरी दुनिया ही बदल गयी.
लेकिन समय के साथ मेरा प्यार एक अनकहा दर्द बनकर मेरी नस- नस में दौड़ने लगा. उसके साथ होकर भी मैं ख़ुद को अकेला महसूस करने लगी. उसने भी कभी कुछ नहीं कहा. आख़िर ऐसा क्यों होता है, जब हम किसी से प्यार करने लगते हैं तो ज़ुबां ख़ामोश हो जाती है और आंखें बोलने लगती हैं. पर आंखों की भाषा भी तो कोई समझे. भीतर-ही-भीतर टूटकर बिखर रही थी. मेरी एक सहेली ने उस तक मेरे दिल की बात पहुंचा दी.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: ख़ूबसूरत फरेब (Pahla Affair: Khoobsurat Fareb)

मैं बहुत ख़ुश थी उस दिन, जब वो मुझसे मिलने आ रहा था.पहली बार मैंने उसे अपने बहुत क़रीब महसूस किया था. रोम-रोम खिल उठा था मेरा, जब उसकी गर्म हथेलियों को मैंने अपने ब़र्फ से ठंडे हाथों पर महसूस किया था. उसने कहा- देखिये, मैं आपसे बस इतना कहना चाहता हूं कि मेरी नज़र में उसी को प्यार करोे, जिसे ताउम्र अपने पास रखो. लेकिन मैं अपने परिवार की मर्यादाओं की मज़बूत जंजीरों को अपने प्यार के लिए नहीं तोड़ सकता. अच्छा होगा कि प्यार की छोटी-सी ज़िंदगी की जगह दोस्ती की लंबी उम्र को स्वीकारा जाए. आपमें बहुत प्रतिभाएं हैं और मैं आपको आसमां की बुलंदियों पर देखना चाहता हूं.

उसके प्यार को भुलाना तो ख़ैर मेरे वश में नहीं, लेकिन उसकी ख़्वाहिश को मैंने ज़िंदगी का मक़सद बना लिया. समय गुज़र रहा था, हम दोनों ही अपने कैरियर को बुलंदियों तक पहुंचाने में मसरूफ़ थे. मगर तब भी हर व़क़्त उसकी यादें दिल के दरवाज़े पर दस्तक दे ही जाती थीं. अब उसके बगैर उस शहर में रहना मुश्किल हो रहा था. फिर ख़ुद से समझौता कर मैंने उसे अपना फैसला सुना दिया- प्रकाश, मैं जोधपुर पढ़ने जा रही हूं. मेरा स्वर इतना भारी था कि वाक्य पूरा होने से पहले ही मेरी आंखें भर आईं- और उसने मेरे आंसुओं को अपनी हथेली में क़ैद कर शुभकामनाओं के साथ मुझे विदा किया.

और मैं चली आई. ईश्‍वर से बस इतनी प्रार्थना है कि इस जनम में ना सही अगले जनम में उसका नाम मेरी हथेली पर लिखना.
आज इस बात को दो साल गुज़र गये- मैं अपनी मंज़िल के बहुत नज़दीक हूं. लेकिन आज भी तन्हाई में अतीत के पन्नों को पलटती हूं तो मेरा प्रकाश मुझे प्रकाशित कर देता है- और थक- हार कर मैं फिर अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ जाती हूं.

– शमिता त्रिपाठी

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: उड़ती हवा का वो झोंका जीना सिखा गया (Pahla Affair: Udti Hawa Ka Wo Jhonka Jeena Sikha Gaya)

कब करें फैमिली प्लानिंग पर बात? (When Is The Best Time To Discuss Family Planning?)

शादी से पहले होनेवाले कपल को तरह-तरह की हिदायतें दी जाती हैं. ट्रेनिंग दी जाती है. नए माहौल में एडजेस्ट होने से लेकर खाना पकाने तक और ससुराल में सबका मन जीत लेने से लेकर पार्टनर को काबू में करने तक के गुरुमंत्र दिए जाते हैं. जिसकी समझ में जो आता है, वो वही स्पेशल टिप देकर चला जाता है. लेकिन इन सबके बीच एक बात जो अक्सर नज़रअंदाज़ कर दी जाती है, वो है फैमिली प्लानिंग की बात.

Family Planning

क्यों नहीं की जाती फैमिली प्लानिंग की बात?

–     दरअसल हमारे समाज में शादी का दूसरा मतलब ही होता है बच्चे. जी हां, शादी होते ही हर कोई गुड न्यूज़ सुनना चाहता है, ऐसे में फैमिली प्लानिंग के बारे में भला कौन सोचे?

–     शादी के बाद यदि एक साल के अंदर गुड न्यूज़ नहीं मिलती, तो लोग बातें बनाने लगते हैं, क्योंकि हम मदरहुड को बहुत ही ग्लोरिफाई करते हैं.

–     मां बनना ही जैसे एक स्त्री की ज़िंदगी का सबसे बड़ा उद्देश्य है, उसके बिना उसके अस्तित्व का कोई महत्व ही नहीं.

–     अक्सर पैरेंट्स अपने बच्चों के मन यह बात डाल देते हैं कि बेहतर होगा कंट्रासेप्शन यूज़ न किया जाए और पहला बच्चा जितना जल्दी हो जाए, उतना अच्छा होगा.

–     अक्सर बच्चे को लोग शादी व रिश्ते की सिक्योरिटी मान लेते हैं, यह भी वजह है कि शादी के बाद गुड न्यूज़ का ही इंतज़ार करते हैं.

क्यों ज़रूरी है फैमिली प्लानिंग?

–     आजकल बिज़ी शेड्यूल के चलते बहुत-सी प्राथमिकताएं बदल रही हैं. इनका असर शादी व फैमिली प्लानिंग पर भी पड़ा है. ऐसे में अनचाहा गर्भ यानी एक्सिडेंटल प्रेग्नेंसी बहुत से ़फैसले बदलने को मजबूर कर सकती है.

–     इन फैसलों में करियर से लेकर फाइनेंशियल प्लानिंग तक शामिल है.

–    पहला बच्चा कब चाहते हैं, दूसरा बच्चा यदि चाहते हैं, तो कितने अंतराल के बाद… बच्चा होने पर किस तरह से ज़िंदगी बदलेगी, ज़िम्मेदारियां बढ़ेंगी, ख़र्चे बढ़ेंगे, काम बढ़ेगा… इन सब पर चर्चा ज़रूरी है.

–     बच्चे की ज़िम्मेदारी व उससे जुड़े काम कपल किस तरह से आपस में बांटेंगे, करियर को किस तरह से मैनेज करेंगे… इन तमाम बातों पर चर्चा बेहद ज़रूरी है.

कब करें फैमिली प्लानिंग की चर्चा?

अब सवाल यह है कि इन बातों पर चर्चा कब करनी चाहिए?

–    ज़ाहिर-सी बात है, ये तमाम बातें कपल को शादी से पहले ही कर लेनी चाहिए.

–     दोनों के क्या विचार हैं, किसकी कितनी सहमति है, यह जानना बेहद ज़रूरी है, ताकि बाद में विवाद न हो.

–     इसी प्लानिंग का एक बड़ा हिस्सा है- कंट्रासेप्शन. किस तरह का कंट्रासेप्शन यूज़ करना है, किसे यूज़ करना है, कब तक यूज़ करना है आदि बातें कपल्स पहले ही डिसाइड कर लें, वरना एक्सिडेंटल प्रेग्नेंसी बहुत से प्लान्स चेंज करवा सकती है.

–     कंट्रासेप्शन यदि फेल हुआ, तो एक्सिडेंटल प्रेग्नेंसी के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा. आपका करियर व फाइनांस बहुत हद तक इससे प्रभावित होगा, तो उस पर भी चर्चा ज़रूरी है.

–     आप चाहें तो काउंसलर के पास जाकर भी सलाह ले सकते हैं.

–     लेकिन ज़रूरी है कि शादी से पहले ही इन सब बातों को लेकर आप क्लीयर हो जाएं, ताकि बाद में एक-दूसरे पर टीका-टिप्पणी या आरोप न लगें.

यह भी पढ़े: शादी से पहले दिमाग़ में आनेवाले 10 क्रेज़ी सवाल (10 Crazy Things Which May Bother You Before Marriage)

Family Planning Tips
बेझिझक बात करना है ज़रूरी

–     अक्सर कपल शादी से पहले इन बातों को जान-बूझकर भी अवॉइड करते हैं, क्योंकि उन्हें झिझक होती है.

–     उन्हें यह भी लगता है कि कहीं इतनी-सी बात को लेकर बनता रिश्ता टूट न जाए.

–     लड़कियों में भी हिचक होती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि पार्टनर यह न समझे कि वो मर्यादा के बाहर जाकर बात कर रही है.

–     लेकिन बेहतर यही होगा कि आप हिचकिचाहट छोड़कर अपनी सारी शंकाएं दूर कर लें, ताकि बाद में यह महसूस न हो कि काश! पहले ही बात कर ली होती.

–     इससे आपको अपने होनेवाले पार्टनर की परिपक्वता, सोच-समझ व मानसिकता का भी अंदाज़ा हो जाएगा.

–     वो कितना सुलझा हुआ है, उसका थॉट प्रोसेस कितना क्लीयर है, यह आपको पता चल जाएगा.

बदलाव के लिए रहें तैयार

–     आप दोनों को इस बात पर भी चर्चा करनी होगी कि आप दोनों की ही ज़िंदगी बच्चा होने के बाद बहुत ज़्यादा बदल जाएगी.

–     एक तरफ़ ख़ुशख़बरी होगी, पर दूसरी तरफ़ ज़िम्मेदारियां भी.

–     उसी के अनुसार ख़र्च बढ़ेंगे, तो किस तरह से पहले से ही कितना अमाउंट इंवेस्ट करना है, ताकि बच्चा होने पर आपकी फाइनेंशियल हालत स्थिर रहे, उसकी प्लानिंग भी ज़रूरी है.

–     बच्चे के लिए कौन-कौन से प्लान्स लेने हैं, इसकी जानकारी ज़रूरी है.

–     स़िर्फ आर्थिक तौर पर ही नहीं, मानसिक व शारीरिक तौर पर भी बदलाव होंगे.

–     हल्का डिप्रेशन, शरीर में बदलाव, लाइफस्टाइल में बदलाव- इन सब पर भी चर्चा ज़रूरी है.

–     आपकी सेक्स लाइफ भी बदलेगी, जिसे लेकर हो सकता है आपसी तनाव हो जाए, तो यहां यदि आप पहले ही चर्चा करके एक-दूसरे के मन को जान लेंगे, परिपक्वता को परख लेंगे, तो भविष्य की चुनौतियों का सामना बेहतर तरी़के से कर पाएंगे.

–     बच्चा होने पर देर रात तक जागना, उसकी पूरी देखभाल करना शरीर व मन को थका सकता है और यह तनाव भी दे सकता है, जिससे आपस में विवाद भी हो सकते हैं.

–     करियर में बदलाव भी होगा. हो सकता है किसी एक को नौकरी छोड़नी भी पड़े या पार्ट टाइम काम करना पड़े, तो वो किस तरह से मैनेज होगा.

–     बच्चा होने के कितने समय बाद फिर से करियर को महत्व देना है, किस तरह से बच्चे की परवरिश करनी है, ये तमाम बातें छोटी लगती हैं, लेकिन आपके रिश्ते के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं.

समय ने मानसिकता भी बदल दी है…

यह सच है कि स्त्री को ही प्रकृति ने गर्भधारण का दायित्व दिया है. ऐसे में कंसीव करने के बाद यह सोचना कि यह कोई बड़ी मुसीबत है या यह बच्चा आपकी ही ज़िम्मेदारी नहीं है आदि ग़लत है. यह सच है कि बच्चा दोनों की ज़िम्मेदारी है, लेकिन स्त्री की शारीरिक संरचना व प्रकृति द्वारा प्रदत्त दायित्व के चलते उसकी ज़िम्मेदारी थोड़ी अलग व अधिक हो ही जाती है. निशांक व रिया ने फैमिली प्लानिंग नहीं की थी और न ही उस पर चर्चा की थी. नतीजा- शादी के एक साल के अंदर ही उनको बच्चा हो गया, लेकिन यह बच्चा रिया को बोझ लगने लगा, क्योंकि वो बात-बात पर निशांक से शिकायत करती कि बच्चा दोनों का है, तो तुम तो मज़े से ऑफिस चले जाते हो और मुझे इतना कुछ सहना पड़ता है. जबकि रिया वर्किंग नहीं थी, बावजूद इसके उसे यह अपेक्षा रहती थी कि यदि वो रात में जागकर बच्चे की नैप्पी बदल रही है, तो निशांक को भी यह करना होगा. प्रेग्नेंसी के बाद रिया में शारीरिक बदलाव भी आ गए थे, जिसको लेकर वो डिप्रेशन में रहने लगी थी. निशांक के अलावा रिया के जाननेवाले व सहेलियां भी उसे समझाती थीं कि यह नेचुरल है और समय के साथ सब नॉर्मल हो जाएगा, इसलिए रिया को बदले हालातों को स्वीकारना होगा, वो भी ख़ुशी-ख़ुशी. लेकिन रिया कुछ समझने को तैयार ही नहीं थी. उसे लगता था उसकी आज़ादी छिन गई, उसकी आउटिंग व पार्टीज़ बंद हो गईं, वो मोटी हो गई… जिसका असर दोनों के रिश्ते के साथ-साथ घर में आए नए मेहमान पर भी पड़ रहा था. एक्सिडेंटल प्रेग्नेंसी पर यदि रिया व निशांक ने पहले चर्चा की होती या फिर पहले से ही उन्होंने फैमिली प्लानिंग की चर्चा की होती, तो परिस्थितियां बेहतर होतीं.

इसके अलावा बेहतर होगा कि आज की जेनरेशन भी यह सच्चाई स्वीकारे कि प्रकृति ने स्त्री-पुरुष को अलग-अलग बनाया है और उसे कोई भी बदल नहीं सकता. बेहतर होगा कि अपने बच्चे का ख़ुशी-ख़ुशी स्वागत करें, ताकि वो सकारात्मक माहौल में पल-बढ़ सके.

ज़रूरत महसूस हो, तो काउंसलर की मदद भी ले सकते हैं या घर के बड़े-बज़ुर्गों का मार्गदर्शन लें.

– ब्रह्मानंद शर्मा

यह भी पढ़े: रिश्तों में बदल रहे हैं कमिटमेंट के मायने… (Changing Essence Of Commitments In Relationships Today)

रिश्तों का मनोविज्ञान (The Psychology Of Relationships)

Psychology Of Relationships

रिश्तों का मनोविज्ञान (The Psychology Of Relationships)

मेरी उम्र 27 साल है. सगाई हुए एक साल हो गया है. घरवाले शादी की जल्दी कर रहे हैं, पर मैं अभी भी शादी को लेकर, होनेवाले पति और उनके व्यवहार को लेकर काफ़ी असमंजस में हूं, इसलिए कोई भी फैसला लेने से हिचक रही हूं. मन में एक
अजीब-सा डर है.

– आशालता, चंडीगढ़.

कोई भी नया निर्णय लेना आसान नहीं होता. ख़ासकर तब, जब वह हमारे जीवन और भविष्य से संबंधित हो. शादी का निर्णय लेने से पहले कुछ बातों का ख़ास ख़्याल रखें, जैसे- शादी को लेकर आपकी अपेक्षाएं, आपकी शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तैयारी, क्या आप पूरी तरह से और यहां तक कि आर्थिक तौर पर भी तैयार हैं नए जीवन, नए रिश्तों व नए परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए? ख़ुद से यह सवाल करें, आत्म विश्‍लेषण करें. घर के बड़ों से, अनुभवी दोस्तों से सलाह लें. परिवार या समाज के दबाव में आकर कोई निर्णय ना लें.

यह भी पढ़े: सेक्स प्रॉब्लम्स- पति छुपकर मास्टरबेशन करते हैं… (Sex Problems- My Husband Do Masturbating Secretly)

मेरी दो बेटियां हैं. एक की उम्र है 16 साल और दूसरी 14 साल की है. उनके आजकल के बर्ताव से बहुत परेशान रहती हूं. उनके कपड़ों का, जूते-चप्पलों का चयन भी बहुत बदल गया है. वो अपनी ही दुनिया में रहती हैं. किसी को कुछ समझती ही नहीं. मेरी किसी बात का उन पर कोई असर नहीं होता. दोस्तों का साथ उन्हें ज़्यादा पंसद है. क्या करूं, बेहद परेशान हूं.

– नौशीन, कोलकाता.

किशोरावस्था में बच्चों को संभालना अपने आप में एक चुनौती है. आजकल का इंटरनेट युग इसे और भी मुश्किल बना रहा है. आपको संयम से काम लेना होगा. उनसे बहुत ज़्यादा कठोरता से पेश न आएं. उनकी उम्र को देखते हुए आपको उनसे दोस्ताना व्यवहार करना होगा. घर-परिवार का माहौल प्यारभरा बनाए रखें और उनका विश्‍वास जीतें. बात-बात पर
रोक-टोक न करें. उनकी दोस्त बनकर रहेंगी, तो वो आपसे दूरी नहीं बानएंगी और मन की बात भी शेयर करने से नहीं हिचकिचाएंगी. हां, उनके दोस्तों के बारे में जानकारी ज़रूर रखें, ताकि वो ग़लत संगत में न पड़ जाएं, लेकिन ध्यान रहे कि आपकी बच्चियों को यह न लगे कि आप उनकी जासूसी करती हैं.

मेरे पति काम के सिलसिले में ज़्यादातर बाहर रहते हैं. मेरा एक छोटा बेटा है. घर-बाहर का सारा काम मुझे ही देखना पड़ता है. लगता है मानो मेरा सारा जीवन बस इन्हीं उलझनों में उलझकर रह गया है. अपने लिए तो समय ही नहीं रहा अब.

– रजनी शर्मा, मुंबई.

अभी आपका बेटा छोटा है और मां होने के नाते उसके प्रति आपकी ज़िम्मेदारी बनती है. पति काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं, तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि उनके पास ना होने से उनकी जगह भी आप लें. बेटे का बचपन और भविष्य सवांरने पर ध्यान दें. कुछ ही सालों में जब वह बड़ा हो जाएगा, आपके पास समय ही समय होगा अपने लिए. तब आप अपने बेटे के साथ को तरसेंगी. बेहतर है, आज जब वह आप पर निर्भर है और आप का समय और अटेंशन चाहता है, तो उसे वह सब दें, जिससे वो कामयाब जीवन की ओर बढ़ सके. जीवन के हर दौर का अपना एक अलग ही मज़ा होता है. हर दौर को भरपूर जीएं और उसका आनंद उठाएं. अगर नकारात्मक सोच रखेंगी, तो कभी ख़ुश नहीं रह पाएंगी. हां, यदि आप पर काम का बोझ अधिक बढ़ गया है, तो बेहतर होगा अपने पति से बात करें. हो सकता है वो कुछ अधिक समय आपके व बच्चे के लिए निकाल पाएं.

Zeenat Jahan

ज़ीनत जहान
एडवांस लाइफ कोच व
सायकोलॉजिकल काउंसलर

[email protected]

यह भी पढ़े: लव गेम: पार्टनर से पूछें ये नॉटी सवाल (Love Game: Some Naughty Questions To Ask Your Partner)

पहला अफेयर: ख़ूबसूरत फरेब (Pahla Affair: Khoobsurat Fareb)

Pyaar Ki Kahani

पहला अफेयर: ख़ूबसूरत फरेब (Pahla Affair: Khoobsurat Fareb)

घर में आर्थिक तंगी से मेरी पढ़ाई छूट गई थी. बस, गुज़र-बसर हो रही थी किसी तरह. तभी मकान का आधा हिस्सा एक सरकारी ऑफिस को किराए पर दिया, तो आमदनी का कुछ ठोस ज़रिया हो गया. फिर एक दिन एक आकर्षक युवक को जीप से उतरते देखा, तो बस देखती ही रह गई. पता चला, ये साहब हैं, आलोक नाम है.

कोई काम तो था नहीं, उधर ताक-झांककर मन बहला लेती, पकड़ी जाती, तो मैं झेंप जाती और वो मुस्कुरा देते. बीस दिन बीते होंगे, मैं अचानक बहुत बीमार हो गई. डॉक्टर ने तुरंत ज़िला अस्पताल ले जाने को कहा.

आस-पड़ोस के तमाम हितैषी जमा थे, पर सर्द आधी रात, सभी तरह-तरह की सलाहें देकर बहाने बनाने लगे. अम्मा हताश-निराश होकर रोने लगीं, तभी उधर से पूछा गया, “मांजी, क्या बात हो गई?” नीम बेहोशी में आगे नहीं जान सकी मैं कि क्या और कैसे हुआ. सुबह आंख खुली, तो ख़ुद को अस्पताल में पाया. साहब थके-थके-से सामने बैठे थे. लगा कि रातभर सोये नहीं थे.

उन्होंने पूछा, “अब कैसी हो?” मैंने कहा, “हां, अब आराम है. मेरे कारण आपको बहुत कष्ट हुआ.” वे बोले, “क्यों? रात अगर मुझे कुछ हो जाता, तो क्या तुम मेरी मदद नहीं करतीं?” यह सुनकर अच्छा लगा था. तीन दिन बाद अपना सहारा देकर उन्होंने जीप से घर उतारा तो उन्हीं पड़ोस के हितैषी जनों में चर्चा का आधार भी बन गई.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: लम्हे तुम्हारी याद के (Pahla Affair: Lamhe Teri Yaad Ke)

पड़ोस में रहते हुए उन्हें मेरे घर में दो वर्ष के भीतर घटित विपदा व दीनदशा की सारी जानकारी हो चुकी थी. अब कभी-कभी आंगन के बीच की दीवार पर कुछ देर बातें भी होने लगीं, जिससे मेरी ताका-झांकी तो बंद हो गई, लेकिन रातों की नींद और चैन गायब हो गया था. और जब एक दिन मुझे बुलाकर मेरा इंटरमीडिएट का फॉर्म भरवा दिया, पढ़ाई शुरू कराई, तो मैं शीशे में बार-बार ख़ुद को निहारती कुंआरे सपनों को संवारती रहती. इंटर पास हो गई, तो उसी ऑफिस में नौकरी भी मिल गई. मेरा बीए का फॉर्म भी भराया गया. अब मकान के किराए व मेरे वेतन से घर को बहुत सहारा हो गया. पुराने घाव भर से गए.

नज़दीकियां प्यार को जन्म देती हैं. ऑफिस में काम बताते, डिक्टेशन देते हुए उनकी आंखों की तरलता में अपने लिए जिज्ञासा देखती और वो अपने पद की मर्यादा व गरिमा से बंधे मेरा मन टटोला करते. मैं हिम्मत करके कुछ कहना चाहती, किंतु कस्बई संकीर्ण संस्कार घर की पुरानी चौखट लांघ ही न पाते.

नानी का निधन हो गया. सुबह छुट्टी मांगने उधर गई, तो मेरे दोनों हाथ पकड़कर पूछा, “कुछ और नहीं कहोगी?” दरिद्रता कृपण भी तो होती है. मैं ठूंठ-सी खड़ी रही, न एतराज़ कर पाई और न उस अनुपम प्यार का प्रतिदान कर अपना व उनका असमंजस ही मिटा पाई. लौटकर आई, तो बड़े बाबू ने एक पत्र देकर बताया, “साहब को दो वर्ष की ट्रेनिंग पर विदेश भेजा गया है.”

पत्र पढ़ा- ‘आरती, इतने दिन साथ रहे. अच्छा लगा. कभी-कभी सफ़र में कुछ ऐसा छूट जाता है, जिसकी भरपाई नहीं हो पाती और वो तुम हो आरती. याद है, अस्पताल से आते ही तुमने कहा था कि अगर रात आप न होते, तो मरी कहानी ख़त्म ही थी. उस कहानी को मैंने आगे बढ़ाना चाहा, पर तुम्हारा अंतर्मन पढ़ न पाया. हो सकता है, तुम्हारे मन में वैसा कुछ न रहा हो, जैसा मैं सोचता रहा. तभी तो जाते समय तुमने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. तुमसे मिल न सका, नौकरी की मजबूरी जानती हो. तुम्हें दुख तो होगा और मुझे तुम्हारी याद आया करेगी. पथराई आंखों से पत्र पकड़े संज्ञा-शून्य-सी बैठी रह गई थी.

कैसा दुख? ग़रीब को तो दुख की आदत होती है. सुख कभी आता भी है, तो अधिक देर ठहरता नहीं. मैं तो स्त्री थी. उपकारों के बोझ से दबी. वे तो पुरुष थे. सबल व समर्थ भी. मेरी दीनदशा से मर्माहत हो मुझसे कौन-सा रिश्ता बनाए रहे, तो जता न सके? तब भी नहीं, जब हमारे प्यार की चर्चा कस्बे में फैली. तब भी इतना ही बोले, “आरती हवन करते हाथ भले ही न जलें, आंच तो आती ही है.” फिर न कोई वादा, न सांत्वना. अपने फर्ज़ से वो तो ़फुर्सत पा गए और मैं ख़ूबसूरत फरेब का ताना-बाना बुनती रह गई.

– आरती सिंह

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: हरसिंगार के फूल (Pahla Affair: Harsingar Ke Phool)

फ्लैशबैक: संजय दत्त की बेटी त्रिशाला ने अपनी मां ऋचा को याद किया… (Flashback: Sanjay Dutt’s Daughter Trishala Remembered Her Mother Richa…)

Sanjay Dutt's Daughter Trishala

संजय दत्त की बेटी (Sanjay Dutt’s Daughter) त्रिशाला (Trishala) ने सोशल मीडिया पर अपनी मां ऋचा शर्मा की प्यारी-सी पुरानी फोटो शेयर करते हुए उन्हें याद किया. यह एक क्लासरूम का फोटो है, जिसमें ऋचा बेइंतहा ख़ूबसूरत लग रही हैं.

Sanjay Dutt's Daughter Trishala

View this post on Instagram

📸 Mom… #1979 #RIP 🧡

A post shared by Trishala Dutt (@trishaladutt) on

त्रिशाला ने मां को याद करते हुए ऋचा का लिखा हुआ बरसों पुराना नोट्स भी शेयर किया. उनके अनुसार, यह नोट्स मॉम ने तब लिखी थीं, जब वे धीरे-धीरे कैंसर के कारण मौत के क़रीब जा रही थीं. यह लगभग 21 साल पुराना नोट्स है. अब मुझे यह एहसास हो रहा है कि मुझमें लिखने की प्रतिभा कहां से आई. ज़िंदगी बहुत छोटी है. आई मिस हर… इस तरह उन्होंने अपनी मां की पुण्यतिथि (दस दिसंबर) के पहले मां को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी.

Sanjay Dutt's Daughter Trishala

ऋचा शर्मा का नोट…

हम सब साथ चलते हैं. हर कोई अपना रास्ता चुनता है. मैंने भी अपना चुना है. लेकिन मैं मौत के अंतिम छोर पर हूं. मैं वापस कैसा जाऊं? क्या मुझे एक और मौक़ा मिलेगा? यह तो व़क्त ही बता पाएगा. मैं फिर भी इसका इंतज़ार करूंगी. वैसे मैं इस बात को गहराई से जानती हूं कि अब कुछ भी नहीं हो सकता. फिर भी मैं उम्मीद कर रही हूं. मेरे मसीहा मझे ऐसी जगह पर ले जाएंगे, जहां पर मेरे सपने पूरे होंगे. वे अपनी बांहों में भरकर न केवल मेरा स्वागत करेंगे, बल्कि मेरा ख़्याल भी रखेंगे…

Sanjay Dutt's Daughter Trishala

मां की तरह लेखनी का हुनर त्रिशाला में भी है, जिसका उदारहण उनके द्वारा मदर्स डे पर मां को याद करते हुए लिखा गया नोट है. त्रिशाला ने मदर्स डे पर मां ऋचा की एक तस्वीर शेयर करते हुए एक इमोशनल नोट लिखा था, जिसमें उन्होंने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया था. 21 साल पहले अंतिम बार जब मैंने आपके लिए कुछ किया था. काश जन्नत का फोन नंबर होता. काश, मैं आपको और देख पाती, आपसे बात कर पाती, सच मैंने हमेशा आपको अपने क़रीब होने की ख़्वाहिश की है. हैप्पी मदर्स डे…

Daughter Trishala Dutt

फ़िलहाल त्रिशाला अपने नाना-नानी के साथ न्यूयॉर्क में रह रही हैं. यह अफ़वाह फैलने पर की वे फिल्मों में आ रही है, उन्होंने खारिज किया कि उनका बॉलीवुड में आने का कोई इरादा नहीं है. अपने पिता संजय दत्त व मान्यता दत्त के संबंधों को लेकर उड़ती अफ़वाहों पर भी उन्होंने विराम लगाया. बकौल त्रिशाला पिता और मान्यता के साथ उनके संबंध अच्छे हैं. यह और बात है कि पहले त्रिशाला मान्यता को आंटी बुलाती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपने संबंधों को सुधारा.

Sanjay Dutt Family Photo

त्रिशाला की मां और संजय दत्त की पहली पत्नी ऋचा शर्मा ने देव आनंद की फिल्म हम नौजवान से अपने करियर की शुरुआत की थी. अनुभव, इंसाफ़ की आवाज़, सड़कछाप फिल्मों से उन्हें अलग पहचान मिली. 1987 में उन्होंने संजय दत्त से शादी कर ली, लेकिन शादी के दो साल के अंदर ही उन्हें ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित होने का पता चला और 32 साल की छोटी उम्र में साल 1996 में न्यूयॉर्क में उनका देहांत हो गया, जहां वे अंतिम समय में अपने माता-पिता के साथ रह रही थीं.

Trishala Dutt

यह भी पढ़े3 फिल्में करने के बाद भी 12 लड़कों के साथ फ्लैट शेयर करते थे कार्तिक आर्यन, जानिए इस चॉकलेटी हीरो के संघर्ष की कहानी (I Stayed In The Same Flat With 12 Boys Till My Third Film: Kartik Aaryan)

रिश्तों में बदल रहे हैं कमिटमेंट के मायने… (Changing Essence Of Commitments In Relationships Today)

कभी वो ख़्वाब हो जाता है, कभी हक़ीक़त… कभी चाहत बन जाता है, कभी इबादत… मुहब्बत नाम है उसका, इश्क़ अंजाम है उसका… पर व़क्त के साथ-साथ वो कुछ-कुछ बदल जाता है… ताउम्र का साथ है यूं तो, पर अब वो क़समें नहीं हैं, चल रहे हैं हाथों में डाले हाथ, पर अब वो रस्में नहीं हैं…

Relationships Tips

व़क्त के साथ-साथ बहुत कुछ बदलता है, जीवन के प्रति नज़रिया, हमारा दृष्टिकोण, चीज़ों और लोगों को परखना हो या फिर रिश्तों को… हर बात के मायने समय के साथ बदल जाते हैं और आज की तारीख़ में, जहां समाज में इतना सब कुछ बदल रहा है, तो इसका सबसे ज़्यादा असर हमारे रिश्तों पर ही पड़ा है.

हम अक्सर कहते हैं कि रिश्तों में वो पहले जैसी बात नहीं. लेकिन सच तो यह है कि बदले हम हैं, रिश्ते नहीं. दरअसल, रिश्ते तो वही हैं, लेकिन हमारा नज़रिया उनके प्रति अब पहले जैसा नहीं रहा. यही वजह है कि रिश्तों में जो सबसे अहम् कड़ी होती थी- कमिटमेंट, उसके भी मायने बदल गए हैं. कैसे? आइए जानें.

जन्म-जन्मांतर का साथ, पुरानी हो गई अब ये बात: पहले सात फेरों को हम इस जन्म का ही नहीं, सात जन्मों का बंधन मान लेते थे. लेकिन अब यह सोच पुरानी हो चुकी है. रिश्तों को भी हम कैज़ुअली लेने लगे हैं. निभ गया तो ठीक, वरना रास्ते अलग. शादी जैसे रिश्ते की गंभीरता को भी हमने खो दिया है.

प्रैक्टिकल अप्रोच

रिश्तों को लेकर हम सभी काफ़ी इमोशनल होते हैं, लेकिन अब लोग इनके प्रति भी प्रैक्टिकल अप्रोच रखने लगे हैं. बात-बात पर न तो अब भावुक होते हैं और न ही हर चीज़ में इमोशनल फैक्टर ढूंढ़ते हैं. पार्टनर का खाने पर इंतज़ार करना, उसके साथ ही मूवी देखने जाना या उसकी पसंद को ध्यान में रखते हुए कपड़े पहनना… ये तमाम बातें आज की तारीख़ में आपको इमोशनल फूल ही साबित करती हैं.

स्पेस देना

अब लोग स्पेस के नाम पर थोड़ी-बहुत चीटिंग भी कर लेते हैं. इसमें उनको कोई बुराई नज़र नहीं आती. न तो एक-दूसरे को हर बात बतानी होती है, न ही एक-दूसरे के पासवर्ड्स पता होने ज़रूरी हैं. एक पार्टनर को लगता है कि अगर मैंने अपने पार्टनर की पर्सनल लाइफ में ज़्यादा दख़लअंदाज़ी की, तो वो भी करेगा. इसलिए सेफ यही है कि न तो एक-दूसरे के मैसेज चेक करें और न ही एक-दूसरे का सोशल मीडिया अकाउंट.

कम्यूनिकेशन का तरीक़ा बदल गया है

अब साथ बैठकर डिनर के टेबल पर रोज़ की दिनचर्या डिसकस नहीं होती, पति एक कमरे में लैपटॉप पर रहता है, पत्नी टीवी के सामने अपने मोबाइल पर व्यस्त रहती है. हैरानी की बात नहीं है कि एक ही घर में एक-दूसरे को सोशल मीडिया पर ही मैसेज भेजकर बातें कर लेते हैं. फेस-टु-फेस कम्यूनिकेशन लगभग ख़त्म होता जा रहा है. फोन और मैसेजेस ही सबसे बड़ा ज़रिया हैं.

शादी अब ज़रूरी नहीं

पहले अगर दो लोग प्यार करते थे, तो ज़ाहिर है उनकी मंज़िल शादी ही होती थी, लेकिन अब शादी के बारे में शायद बहुत बाद में सोचा जाता है, प्यार भी जब तक है, तब तक ठीक है, मनमुटाव हुआ, तो आसानी से लोग रास्ता बदल देते हैं. दूसरी ओर, लड़कियां भी अब शादी का कमिटमेंट रिश्तों में नहीं ढूंढ़तीं. दरअसल, सभी लोग एक्सपेरिमेंट करते हैं, अगर कामयाबी मिली, तो शादी भी हो ही जाएगी और यदि नहीं, तो ग़लत रिश्ते में बंधने से बच जाएंगे, इसी सोच के साथ आगे बढ़ते हैं.

फ्लर्टिंग से अब परहेज़ नहीं

अगर पार्टनर को पता है कि उसका पार्टनर अपनी कलीग या ऑनलाइन दोस्तों से फ्लर्ट करता है, तब भी वो इसे ग़लत नहीं मानती. इसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा समझकर लाइट मोड पर नज़रअंदाज़ कर देती है, क्योंकि इतनी-सी बात के लिए रिश्ते में अनबन को जगह क्यों देना. लोगों की सोच बदल रही है, उन्हें लगता है कि फ्लर्टिंग में कोई बुराई नहीं, यह स्ट्रेस को कम करने का मात्र एक तरीक़ा है, जो आपको रिफ्रेश कर देती है.

यह भी पढ़े: शादी से पहले दिमाग़ में आनेवाले 10 क्रेज़ी सवाल (10 Crazy Things Which May Bother You Before Marriage)

Relationships Goals
परफेक्शन अब ज़रूरी नहीं

शुरू से ही हमारे समाज में पार्टनर को लेकर यही सोच बनी हुई है कि वो हर लिहाज़ से परफेक्ट होना चाहिए, उसमें कोई बुराई या ऐब नहीं होना चाहिए, लेकिन अब ऐसा नहीं है. लोग न तो एक-दूसरे को बदलने की सोचते हैं और न ही उस तरह से जज करते हैं. अगर पार्टनर में कोई कमी भी है, तो उसे अपना लेते हैं, क्योंकि दुनिया में कोई भी परफेक्ट नहीं होता.

हमेशा साथ-साथ नहीं हैं

हर निर्णय पार्टनर से पूछकर ही करना, हर चीज़ और हर बात शेयर ही करना, मूवी, डिनर, पार्टीज़ साथ करना… नहीं, अब ऐसा नहीं है. पहले ये तमाम बातें कमिटमेंट का हिस्सा थीं, पर अब नहीं. अब दोनों वर्किंग होते हैं और वर्किंग न भी हो, तो अपनी सुविधा व समयानुसार ही चीज़ें प्लान करते हैं, जिसमें ज़रूरी नहीं कि वो दोनों हमेशा साथ ही रहें. कभी अपने फ्रेंड्स के साथ, तो कभी कलीग्स के साथ पार्टनर्स अपना वीकेंड, हॉलीडेज़ या बाकी फन एक्टिविटीज़ प्लान कर लेते हैं. इसमें दोनों ही कंफर्टेबल फील करते हैं और बुरा नहीं मानते. उन्हें यह ज़्यादा आसान लगता है, क्योंकि हमेशा एक-दूसरे के सिर पर सवार रहने से बेहतर उन्हें लगता है कि एक-दूसरे को पर्सनल स्पेस दिया जाए.

इस बदलाव के क्या मायने हैं?

क्या ये बदलाव सही है या ग़लत? ये तो बहस का मुद्दा है, क्योंकि एक तरफ़ जहां प्रैक्टिकल होने के चक्कर में भावनाएं ख़त्म हो रही हैं, वहीं रिश्ते टूटने का दर्द भी कम होने लगा है अब लोगों को. फ्लर्टिंग, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स, डिजिटल रिश्ते, बढ़ते तलाक़ आदि इस बदलाव के ही साइड इफेक्ट्स हैं. लेकिन इस बदलाव को रोका नहीं जा सकता, पर हां, निजी तौर पर हर कोई यह प्रयास कर सकता है कि हम अपने रिश्तों में ईमानदार रहें, क्योंकि रिश्तों का दूसरा नाम ही बंधन और अनुशासन होता है. यदि आपको यह अनुशासन और बंधन पसंद नहीं, तो बेहतर होगा कि रिश्तों में बंधें ही नहीं. आज़ाद रहें, अकेले रहें… क्योंकि इस तरह के रिश्ते ही साथी होते हुए भी अकेलेपन को और बढ़ाते हैं. यही वजह है कि आज हर कोई साथी के होते हुए भी कहीं-न-कहीं ख़ुद को अकेला पाता है.

ज़िंदगी के किसी मोड़ पर तो आकर ठहरना होता ही है, लेकिन यह ठहराव अब रिश्तों में नहीं नज़र आता, ऐसे में आप उस मोड़ पर नितांत अकेले रह जाते हैं, जहां सबसे ज़्यादा आपको प्यार, अपनेपन और साथ की ज़रूरत
होती है.

बेहतर होगा कि रिश्तों में समय, कम्यूनिकेशन, कमिटमेंट और प्यार इंवेस्ट करें, ताकि आपका रिलेशनशिप बैंक बैलेंस कभी खाली न हो.

– विजयलक्ष्मी

यह भी पढ़े: घर को मकां बनाते चले गए… रिश्ते छूटते चले गए… (Home And Family- How To Move From Conflict To Harmony)

क्यों बढ़ रहा है सेक्स स्ट्रेस? (Why Sex Stress Is Increasing In Our Society?)

आज कहां नहीं है स्ट्रेस? घर-परिवार, करियर, नौकरी… हर जगह तनाव का मकड़जाल फैला हुआ है. और धीरे-धीरे इसने अंतरंग लम्हों में भी घुसपैठ कर दी है. क्या एक हेल्दी रिलेशन के लिए सेक्स स्ट्रेस को दूर करने की ज़रूरत नहीं है?

Sex Stress

मनोचिकित्सक डॉ. अजीत दांडेकर के अनुसार, “स्ट्रेस लेवल बढ़ने के कारण शरीर के कई ऐसे हार्मोंस प्रभावित होते हैं, जिनकी वजह से सेक्स स्ट्रेस बढ़ जाता है. यदि पति-पत्नी अपनी रोज़ाना की ज़िंदगी का विश्‍लेषण करने के लिए कुछ समय निकाल सकें तो सेक्स स्ट्रेस का कारण ख़ुद ही समझ में आ जाएगा. सेक्स स्ट्रेस का कोई एक कारण नहीं है. मॉडर्न लाइफ़स्टाइल व अनेक चाही-अनचाही परिस्थितियां इसके लिए ज़िम्मेदार हैं.” आइए, उन विभिन्न स्थितियों को समझें.

समय की कमी व अपनों की फ़िक्र

सेक्स क्रिया के लिए समय व तनावरहित वातावरण चाहिए, जो आजकल लोगों को नहीं मिलता है. यदि समय मिल भी गया तो मन तरह-तरह की चिंताओं से घिरा रहता है. बच्चों का प्रेशर, माता-पिता का प्रेशर, ऑफ़िस की चिंताएं अनेक ऐसी बातें हैं, जो व्यक्ति को तनावमुक्त होने ही नहीं देतीं. फिर अपनी-अपनी अलग सोच और थकान के कारण तालमेल की कमी भी सेक्स के प्रति उदासीनता की स्थिति पैदा करती है.

काम का प्रेशर

ऑफ़िस या बिजनेस में ख़ुद को बेहतरीन साबित करने का जुनून, प्रमोशन की चाह, बॉस की नज़रों में योग्य बने रहने के प्रयास में कभी-कभी व्यक्ति अपनी सारी एनर्जी ख़र्च कर डालता है. वैसे भी बड़े-बड़े पैकेज यानी लाखों में मिलने वाली सालाना तनख़्वाह व्यक्ति को निचोड़कर रख देती है. अधिक आमदनी के लिए 8 की जगह 12-15 घंटे काम करना पड़ता है. ऑफ़िस के बाद कभी-कभी घर पर भी काम पूरा करना पड़ता है. इस तरह के हाईप्रेशर जॉब के साथ प्रायः संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाता है. ऑफ़िस व घर दोनों ही ज़िम्मेदारियों को निभाने के चक्कर में व्यक्ति इतना थक जाता है कि बिस्तर पर लेटते ही सो जाता है. इसका सीधा असर उसकी सेक्स लाइफ़ पर
पड़ता है.

करियर की चाह

करियर में आगे बढ़ने की चाह एक ओर सफलता की मंज़िल तक पहुंचने का उत्साह बढ़ाती है, तो दूसरी ओर रिश्तों की गर्माहट में बाधक भी बनती है. करियर के कारण कभी-कभी पति-पत्नी को एक-दूसरे से अलग रहना पड़ता है. वे वीकएंड पर ही साथ रह पाते हैं. ऐसे कपल्स अनेक कुंठाओं के शिकार होते हैं, भले ही यह स्थिति उन्होंने स्वेच्छा से चुनी हो. ऐसे में साथ होते हुए भी तरह-तरह की शंका-आशंका (जैसे- विवाहेतर संबंध) या अपराधबोध उन्हें जकड़ने लगता है, अनेक ऐसी बातें सेक्स लाइफ़ को प्रभावित करती हैं.

यह भी पढ़ें: क्यों घट रहा है पुरुषों में स्पर्म काउंट? (What Are The Reasons For Low Sperm Count In Men?)

Sex Stress
असुरक्षा की भावना

आज की शादीशुदा ज़िंदगी में वर्किंग पति-पत्नी के रिश्तों में आजीवन साथ रह पाने की निश्‍चिंतता नहीं है. डर बना ही रहता है कि कब अलग हो जाना पड़े, क्योंकि दोनों के अहं होते हैं, जो कभी भी टकरा सकते हैं. दोनों में कोई भी समझौते के लिए तैयार नहीं होना चाहता है. लिहाज़ा महिलाओं के मन में अधिक बचत की चिंता रहती है. वे ज़्यादा से ज़्यादा कमाने की कोशिश में रहती हैं. वे सुरक्षित होना चाहती हैं. पुरुषों को स्त्रियों की सोच में स्वार्थ नज़र आता है. इस तरह की स्थिति तनाव व टकराहट को जन्म देती है.

प्लानिंग की कमी

आज का व्यक्ति अपनी चादर देख कर पैर नहीं पसारता, बल्कि पैर पसारने के बाद चादर की खींचातानी शुरू करता है. आधुनिक सुख-साधन जुटाना, रिसॉर्ट या विदेश में छुट्टियां बिताना हर दंपति की इच्छा होती है. संभव हो, न हो, उसकी कोशिश व चाह तो होती ही है. आज विकल्प के रूप में लोन व क्रेडिट कार्ड की उपलब्धता व बाद में उनकी किश्तें चुकाने का प्रेशर शरीर व मन दोनों को थका डालता है, बिना प्लानिंग के जो फ़ायनेंशियल स्ट्रेस झेलना पड़ता है, वो अंततः व्यक्ति की ज़िंदगी को पूरी तरह से प्रभावित करता है. सेक्स लाइफ़ के प्रति उदासीन कर देता है.

पोर्नोग्राफ़ी का असर

पोर्नोग्राफ़ी (यानी कामवासना संबंधी साहित्य, फ़ोटो, फ़िल्म आदि) के प्रभाव के कारण व्यक्ति सेक्स लाइफ़ फैंटेसी की दुनिया से जुड़ जाता है. उस तरह की इच्छा करने लगता है, जबकि वास्तविकता उससे कहीं दूर होती है. ऐसी फैंटेसी के कारण पार्टनर का सेक्स स्ट्रेस बढ़ने लगता है. वे साथ होकर भी काम-सुख या आनंद से वंचित रह जाते हैं. एक-दूसरे की उम्मीदों पर खरा न उतरने व पूर्ण संतुष्ट न कर पाने का तनाव व अनजाना भय रिश्तों में उदासीनता ले आता है.

मीडिया का रोल

आधी-अधूरी जानकारी व ग़लतफ़हमियां भी स्ट्रेस को बढ़ाती हैं. आज हर मैग़जीन में सेक्स कॉलम को ज़रूरी माना जाता है. कॉलम में सेक्सोलॉजिस्ट द्वारा पाठकों के प्रश्‍नों के उत्तर दिए जाते हैं. लेकिन पढ़ने वाला ये भूल जाता है कि संबंधित लेख या कॉलम में दी गई जानकारी एक सामान्य जानकारी होती है जबकि हर व्यक्ति दूसरे से भिन्न होता है. इसके अलावा इंटरनेट सेक्स, होमोसेक्सुअलिटी आदि भी आम व्यक्ति के मन को भ्रमित करने में ख़ास रोल निभा रहे हैं और सेक्स स्ट्रेस को बढ़ा रहे हैं. इसलिए आज यह बेहद ज़रूरी हो गया है कि कपल्स एक-दूसरे के लिए थोड़ा व़क़्त निकालें. साथ ही उपरोक्त सभी मुद्दों पर एकबारगी विचार-विमर्श भी करें, ताकि सेक्स
स्ट्रेस पनपने ही न पाए और ज़िंदगी ख़ुशनुमा बन जाए.

– प्रसून भार्गव

यह भी पढ़ें: सुहागरात में काम आएंगे ये सुपर सेक्स टिप्स (Super Sex Tips For Your First Night)

करिश्मा कपूर- स्टेटस सिंबल के तौर पर संजय कपूर मुझे इस्तेमाल करना चाहते थे… (Karishma Kapoor- Sanjay Kapoor Wanted To Use Me As A States Symbol…)

करिश्मा कपूर ने अपने पूर्व पति संजय कपूर से अलग होने की वजह बताई, जो बेहद चौंकानेवाली है. उनके अनुसार, संजय उन्हें अपने रौब व स्टेटस सिंबल के तौर पर यूज़ करने की चाहत रखते थे, इसी कारण उन्होंने शादी की. साथ ही उनका कामयाब अभिनेत्री होना भी एक बहुत बड़ी वजह रही.

Karisma Kapoor and Sanjay Kapoor

शादी के शुरुआती दिन ठीक रहे, लेकिन धीरे-धीरे संजय कपूर बात-बेबात करिश्मा से झगड़ते रहते थे. कभी-कभी हाथापाई तक की नौबत आ जाती थी. बकौल करिश्मा दिल्लीवालों पर रौब दिखाने के लिए संजय कपूर उन्हें ट्रॉफी की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करते थे. सफल एक्ट्रेस के साथ शादी करके मैं भी मशहूर और कामयाब हो जाऊंगा… कुछ इस तरह की सोच थी संजय की. यही लालच उन्हें रिश्ते में बांधे हुए थी.

Karisma Kapoor and Sanjay Kapoor

संजय छोटे-मोटे वाद-विवाद, लड़ाई-झगड़े के अलावा करिश्मा कपूर को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना भी ख़ूब देते थे. बात यहां तक बढ़ गई कि करिश्मा ने संजय के ख़िलाफ़ एफआईआर तक दर्ज़ कराई, क्योंकि वे रोज़-रोज़ के लड़ाई-झगड़े व मारपीट से तंग आ गई थीं. उस पर समायरा और कियान दो बच्चों के परवरिश की चिंता भी उन्हें सताने लगी. आख़िरकार उनकी परेशानियों का अंत तलाक़ के रूप में हुआ.

करिश्मा सिंगल पैरेंटिंग की भूमिका निभाते हुए आज अपने दोनों बच्चों की बेहतरीन परवरिश कर रही हैं. लेकिन अतीत को याद करते हुए आज भी दुखी व घबरा-सी जाती हैं. जहां डिवोर्स होने के बाद करिश्मा ने अपने बच्चों को ही अपनी दुनिया बना ली, वहीं संजय कपूर ने प्रिया सचदेव से शादी कर ली.

Karisma Kapoor and Sanjay Kapoor

ग़ौर करनेवाली बात है कि आज भी अधिकतर महिलाएं अपने बच्चों में ही ख़ुशियां और ज़िंदगी का सूकून ढूंढ़ती हैं, वहीं पुरुष वर्ग एक जीवनसाथी के अलग होने पर जल्द दूसरा साथी तलाश ही लेता है. ये उनकी कमज़ोरी कहें या फिर अकेले न रह पाने की लाचारगी… फिर भी अपवाद कई हैं.

Karisma Kapoor and Sanjay Kapoor

 

करिश्मा की शादी साल 2003 में संजय कपूर से हुई थी. अनके मतभेद व कलह के चलते अंततः सालों बाद करिश्मा ने संजय से अलग होने का कड़ा ़फैसला ले ही लिया. अब इतने समय बाद उन्होंने खुलकर अपने अलग होेने के कारण व दर्द को बयां किया है. रिश्ते यूं ही नहीं बिखरते पल-पल मरने व टूटने के बाद ही कितने एहसास को दरकिनार कर दो लोग अपने रास्ते बदलते हैं. वैसे भी स्वार्थ की बुनियाद पर रिश्ते कम ही टिकते हैं.

यह भी पढ़ेकास्टिंग काउच पर राखी सावंत ने किया चौंकानेवाला खुलासा, डायरेक्टर्स करते थे उल्टी-सीधी डिमांड (Rakhi Sawant Reveals About Casting Couch)