relationships

रिश्तों में ईमानदारी और सच्चाई बेहद ज़रूरी होती है लेकिन कभी कभी कुछ झूठ भी आपके रिश्ते की गर्मी को बनाए रखतेहैं. यह ज़रूरी है कि ये झूठ बेहद समझदारी व सूझबूझ से कहे जायें. तो क्या हैं ये प्यारे झूठ आइए जानें-

  • आज बेहद ख़ूबसूरत लग रही हो. हर पति को अपनी पत्नी से यह ज़रूर कहते रहना चाहिए. बीच बीच में इस तरहकी बातें मन को गुदगुदा देती हैं.
  • आपकी आवाज़ फोन पर बेहद सेक्सी लगती है. पत्नी इस तरह की बातों से पति को अच्छा महसूस करवा सकती हैं.
  • यह रंग बहुत खिलता है तुम पर. आप दोनों ही यह कह सकते हैं फिर भले ही वो रंग आपको नपसंद हो पर आपकायह कहना उन्हें बेहतर महसूस कराएगा और आपके और क़रीब लाएगा.
  • तुम्हारा हाथों में ग़ज़ब का स्वाद है और आज तो खाना और भी लाजवाब है. भले ही खाना सामान्य ही बना हो परआपकी तारीफ़ उन्हें यह महसूस कराएगी कि वो आपके लिए ख़ास हैं और आप उनके काम की कद्र करते हैं.
  • आप कितनी ज़िम्मेदारी से सब कुछ संभाल लेते हैं. भले ही ऐसा ना हो पर अगर वो आपकी मदद करने की कोशिशकरते हैं और जिम्मेदारियाँ बाँटते हैं तो उनकी तारीफ़ ज़रूर करें.
  • कितनी मेहनत करती हो तुम. भले ही पत्नी ने कुछ अलग से ना किया हो लेकिन इस तरह की बातें उनका हौसलाबढ़ाती हैं. तो कहने में क्या हर्ज है.
  • आप कितना प्यार करते हैं मुझसे और उतना ही सम्मान भी. मेरी नज़रों में आपकी इज़्ज़त दिन ब दिन बढ़ती ही जारही है. ऐसा कहने से वो सच में आपसे और ज़्यादा प्यार करेंगे और रिश्ते में कोशिश भी अधिक करेंगे.
  • ये सफ़ेद बाल भी आप पर खूब फबते हैं. वक़्त के साथ भले ही बालों का रंग उड़ जाए लेकिन आपके इस तरह केप्यारे झूठ रिश्तों के रंगों को उड़ने नहीं देंगे. 
  • तुम घर कितने अच्छे से संभालती हो और रिश्तों को भी. इस घर को तुमने वाक़ई खूबसूरत बना दिया. ऐसा कहने सेवो ज़रूर आपके बाक़ी रिश्तों की और भी परवाह करने लगेंगी, चाहे आपके माता-पिता हों या भाई-बहन.
  • मेरे पेरेंट्स को इतना प्यार और सम्मान देने के लिए शुक्रिया. भले ही आप इस संदर्भ में उनसे इत्तेफ़ाक ना रखतीं होंलेकिन ऐसा कहने से उनका व्यवहार और बेहतर होगा और वो अधिक कोशिश करेंगे कि आपकी बातों पर खरेउतरें. 
  • बच्चे कह रहे थे पापा इतना अच्छा पढ़ाते हैं कि ट्यूशन की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी. ऐसा कहने से वो बच्चों की पढ़ाईके प्रति और ज़िम्मेदार होंगे aur पर्सनल इनटरेस्ट लेने लगेंगे. आपकी एक ज़िम्मेदारी थोड़ी हल्की हो जाएगी. 
  • आप जब भी सब्ज़ियाँ लाते हो वो ताज़ा भी होती हैं और पैसे भी कम लगते हैं, लगता है आपको मार्केटिंग की समझमुझसे अच्छी है. इस तरह से वो हर शाम सब्ज़ियाँ भी ख़रीदेंगे और उन्हें यह करने में मज़ा भी आएगा.

तो इस तरह आप दोनों ही अपने अपने तरीक़े से रिश्ते में  सामंजस्य बेहतर बना सकते हैं और अपने रिश्तों की डोर को aur मज़बूत कर सकते हैं.

Affair Stories

पहला अफेयर: इतना-सा झूठ (Pahla Affair: Itna Sa Jhooth)

प्यार करने की भी भला कोई उम्र होती है क्या? पंद्रह से पच्चीस वर्ष, बस इसी बीच आप प्यार कर सकते हैं, इसके आगे-पीछे नहीं. फिल्मों और कहानियों से तो ऐसा ही लगता है. नायक-नायिका न केवल जवां होने चाहिए, बल्कि उनका हसीन होना भी ज़रुरी है. सच पूछो तो इस उम्र के बाद का प्यार अधिक परिपक्व होता है, उसमें वासना का स्थान गौण हो जाता है और इस उम्र के पहले का प्यार तो और भी पवित्र होता है. निश्छल- हां बस यही एक शब्द है उसका बखान करने के लिए. और जब भी उस निश्छल प्यार के बारे में सोचती हूं तो मेरे सामने किशोर आ खड़ा होता है. सातवीं कक्षा में पढ़ता अल्हड़ किशोर.

हमारे ग्रुप में बिल्डिंग के बहुत से बच्चे थे. उन्हीं में से एक था- किशोर. बारह वर्षीय किशोर स्वयं को बहुत समझदार समझता था. उसके बड़े भाई का उन्हीं दिनों विवाह हुआ था एवं उसने अपने किशोर मन में कहीं यह ठान लिया था कि वह शादी करेगा तो स़िर्फ मुझसे. मैं तो खैर इन बातों से अनभिज्ञ तब तीसरी कक्षा में पढ़ती थी. बहुत नादान थी.

उन दिनों टी.वी., फ़िल्में उतनी प्रचलित नहीं थीं. हम कभी घर-घर खेलते, शादी-ब्याह करवाते-बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया थी. इसके अलावा प्रायः हम छोटे-छोटे नाटक भी अभिनीत करते. किसी की मां की साड़ी का पर्दा बन जाता और बड़ी बहनों के दुपट्टों से पगड़ी और धोती. किशोर की हमेशा यह ज़िद रहती कि वह मेरे साथ ही काम करेगा. यदि मैं नायिका का रोल कर रही हूं तो वह नायक का करेगा और यदि मैं मां का पार्ट कर रही हूं तो वह पिता का करेगा.

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बचपन किशोरावस्था का समय कब पंख लगाकर उड़ जाता है, पता ही नहीं चलता. समय के साथ-साथ हमारी मित्र मंडली भी तितर-बितर हो गई अपने अभिभावकों के संग. पिताजी के तबादलों के कारण हर वर्ष नया शहर, नया स्कूल होता. शेष रह गईं बचपन की यादें. पर किशोर ने उन यादों को कुछ अधिक ही संजो रखा था. अपने उस इरादे पर वह सचमुच संजीदा था.

विधि का विधान देखो, मेरा विवाह तय हुआ भी तो किशोर के ममेरे भाई से और राज़ खुला कार्ड छपने के बाद, जब उसके हाथ वह कार्ड लगा. कार्ड हाथ में लिए ही वह हमारे घर आया. पास ही के शहर में हम रहते थे. पर क्या हो सकता था तब? उसने अपने प्यार की बहुत दुहाई दी. एक अपरिचित व्यक्ति से बंधने के स्थान पर उससे विवाह करना जिसने मुझे ताउम्र चाहा- मेरे लिए बहुत बड़ा प्रलोभन था.

अरसा बीत गया. यूं कहो कि जीवन ही बीत गया. पर मैंने भरसक उससे दूरी बनाए रखी. किसी उत्सव में उसकी उपस्थिति की संभावना मात्र से ही मैं वहां जाना टाल जाती. शादी-ब्याह में शामिल होना ज़रूरी हो जाता तो शादी की भीड़ में गुम हो जाने की कोशिश करती, पर क़रीबी रिश्ता होने से अनायास सामना हो ही जाता. और मुझसे नज़रें मिलते ही उसकी आंखों के चिराग़ दहक उठते. मैं भी उस ताप से कहां बच पाती हूं. मन का चोर हमें सामान्य बातचीत करने से भी रोक देता है. वह आज भी मुझे उसी शिद्दत से चाहता है . यह मात्र मेरी कल्पना नहीं- उसकी पत्नी मालिनी ने स्वयं मुझसे कहा था. कभी क्रोध के ज्वार में उसने अपने जीवन की पूरी निराशा, पूरी कुण्ठा, पत्नी पर उड़ेल दी और वह मेेरे पास आई थी सफ़ाई मांगने.

“मेरे लिए वह मात्र ससुराल पक्ष का रिश्तेदार है. इससे अधिक मैंने उसे कुछ नहीं माना.” मैंने मालिनी को पूरा विश्‍वास दिलाते हुए कहा था. मैं जानती हूं यह सच नहीं. पर सच बोलकर भला दो घरों की शांति भंग क्यों करूं? बच्चों की भावनाओं, उनके सुरक्षित भविष्य पर ठेस पहुंचाऊं? अपने निर्दोष पति और निर्दोष मालिनी का सुख-चैन छीनूं?

इन सबके लिए मेरा इतना-सा झूठ क्षम्य नहीं है क्या?

– उषा

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Pyar Ki Kahani

पहला अफेयर: तुमसा कोई न मिला (Pahla Affair: Tumsa Koi Na Mila)

वो ख़्वाब था बिखर गया, ख़्याल था मिला नहीं, मगर ये दिल को क्या हुआ… ये क्यों बुझा, पता नहीं… हरेक दिन उदास दिन, तमाम शब उदासियां… किसी से क्या बिछड़ गए कि जैसे कुछ बचा नहीं… जीवन से पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद भी यादों की रहगुज़र पर जलता एक दीया है पहला प्यार, जिसकी झिलमिलाती यादों में कसक होती है, जो तन्हाई में दिल को उदास कर देती है, तो महफिल में भी नज़रें किसी को तलाशने लगती हैं. सब होने के बाद भी कुछ खोने का एहसास होता है. वो जज़्बात, जिन्हें इज़हार की मोहलत न मिली, जहां नज़रों ने नज़रों की ज़ुबां से दिल की बात सुन ली, लेकिन जब दिलों के फैसले दिमाग से किए जाते हैं, तो जुदाई ही मिलती है.

वो बीएससी करके कोचिंग में टीचर थे और मैं बारहवीं की स्टूडेंट, जो फिज़िक्स की प्रॉब्लम सॉल्व करना तो सीख गई, लेकिन दर्दे दिल में उलझकर रह गई. फिर तो जो समझ में आता था, उन्हें देखकर वो भी भूल जाया करती थी. कोचिंग के फेयरवेल पार्टी में उनका सुनाया वो शेर शायद उनके दिल की सदा थी. कुछ ऐसा था उन आंखों में कि मैंने कोचिंग जाना छोड़ दिया और घर पर ही परीक्षा की तैयारी करने लगी. सब ने बहुत समझाया कि परीक्षा तो हो जाने दो, लेकिन मैंने ना कर दिया. आखिरी पेपर के बाद कुछ इरादा करके मैं कोचिंग गई. वहां जाने पर पता चला कि वो तो शाखे-दिल पर गुलों की बहार की आस दिखाकर मुझे तन्हा छोड़कर जा चुके हैं. क्यों? कोई जवाब नहीं.

व़क्त अपनी रफ्तार से चलता रहा. विवाह, परिवार, सर्विस… इन सबके बीच कुछ खो देने का गम उतना ज़्यादा नहीं था, क्योंकि उसे पाया ही कब था. लेकिन फिर भी एक बार मिलने की ख़्वाहिश थी. लगता था महफिल में, मेले में कभी वो मेरे सामने आ जाएंगे. स्कूल में जब भी विदाई पार्टी होती, मुझे वो आखिरी मुलाकात याद आती.

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लेकिन गुज़रा व़क्त इस तरह सामने आ जाएगा, मैंने कभी सोचा न था. स्कूल में नए लेक्चरार से परिचय कराने के लिए प्रिंसिपल ने पूरे स्टाफ को बुलाया. पूरे 12 साल बाद उन्हें देखा था. आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था. वही ग्रेसफुल चेहरा, आंखों में चमक, ठहरा हुआ प्रभावी अंदाज़… नज़रें हटाना मुशिकल था, कहीं फिर खो न जाएं. गुस्सा था या डर, मैं उनके सामने आने से कतराने लगी. लेकिन एक स्कूल में होते हुए ऐसा नामुमकिन था. एक दिन पता चला कि अभी तक उन्होंने शादी नहीं की. क्यों? किसकी खातिर? जानना चाहती थी, लेकिन हम सब एक मर्यादा में बंधे थे.

शिक्षक दिवस पर छात्रों की फरमाइश पर उन्होंने कुछ शेर और गजल सुनाई- कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता… वे कभी दिल के करीब थे. इसलिए उनके दर्द को मैं महसूस कर सकती थी. लेकिन कुछ सवालों के जवाब अभी पाने बाकी थे. अब हम दोस्त बन चुके थे.

“आपने शादी क्यों नहीं की?” एक बार फिर मैं पूछ बैठी.

“तुमसा कोई न मिला.” दिल की बात बताने में बिल्कुल भी नहीं झिझके थे.

“तो चोरों की तरह क्यों चले गए थे?”

“सब कुछ हमारे चाहने से नहीं होता. तक़दीर का फैसला हमें मानना पड़ता है.”

“कायरता को मजबूरी ना कहिए.” मैं गुस्से में बोली.

“तुम जानना चाहती हो, तो सुनो, तुम्हारे भैया मेरे दोस्त थे, फिर भी उनको सच्चाई बताकर तुम्हारा हाथ मांगा था, लेकिन उन्होंने जवाब दिय- ये तुम्हारी मर्ज़ी तक ही ठीक है, यदि मेरी बहन ने हां की, तो उसे गोली मार दूंगा, क्योंकि टीचर का दर्जा हर हाल में सम्मानीय होता है. अगर इस तरह शादियां होने लगीं, तो माहौल ही बिगड़ जाएगा. मैं उनको समझाने में नाकाम रहा, इसलिए खामोशी से चला गया. लेकिन फिर कोई और इस दिल में जगह न बना पाया.”

उनके शब्दों में उनकी बेबसी झलक रही थी, लेकिन अब मैंने उनका जहां मुकम्मल कराने का इरादा कर लिया था. अपनी मर्ज़ी उन्हें बता दी है. ज़िंदगी की ख़ुशियों पर उनका भी हक है. मुझे उम्मीद है कि इस दोस्ती के रिश्ते की वो लाज रखेंगे और इस शादी के लिए ना नहीं कहेंगे. बस, आप सभी की दुआओं की ज़रूरत है.

– शहाना सिद्दीकी

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Pahla Affair: Wo South Indian Ladka

पहला अफेयर: वो साउथ इंडियन लड़का (Pahla Affair: Wo South Indian Ladka)

कभी-कभी ज़िंदगी में कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं, जिन्हें ताउम्र हम भूल नहीं पाते हैं. कहने को तो वे अजनबी होते हैं, फिर भी हमारी ज़िंदगी का अहम् हिस्सा बन जाते हैं.

बात काफ़ी पुरानी है, जब हमारी गर्मी की छुट्टियां चल रही थीं कि एक दिन पापा ने बताया कि हम सबको चेन्नई जाना है किसी रिश्तेदार की शादी में. हम सब काफ़ी उत्साहित थे कि दिल्ली से बाहर कहीं घूमने जा रहे हैं.

रेल के लंबे सफ़र के बाद चेन्नई पहुंच गए. स्टेशन पर वो लोग हमें लेने आए थे. मिलने-मिलाने के बाद जब घर पहुंचे, तो देखा घर बेहद ख़ूबसूरत था. घर के बाहर बड़ी ही सुंदर-सी रंगोली बनी हुई थी. चूंकि हम पहली बार चेन्नई आए थे, तो हमारे घूमने का इंतज़ाम भी उन्होंने कर दिया था. उनका बेटा व उसका दोस्त दिनभर हमें शहर घुमाते. काफ़ी सुंदर शहर था और हम इस ट्रिप को एंजॉय कर रहे थे.
अगले दिन उनके यहां उनके मित्र का परिवार भी आ गया था, जो चेन्नई में ही रहता था. काफ़ी अच्छे व मिलनसार लोग थे वो भी. उनकी बेटी से मेरी काफ़ी अच्छी दोस्ती हो गई थी और मुझे एक सहेली मिल गई थी. उसी ने बताया कि उसका एक भाई दिल्ली में ही जॉब करता है, शादी के दिन तक वो भी आ जाएगा.

आख़िर शादी का दिन आ गया और हम सब तैयार होने में बिज़ी थी. तभी एक साउथ इंडियन हीरो जैसा लड़का सभी की तस्वीरें खींचने लगा. इससे पहले कि कोई कुछ बोलता, मेरी सहेली ने कहा कि यही मेरा भाई है, जो दिल्ली से आया है.

वो लड़का काफ़ी आकर्षक था, सभी उससे प्रभावित थे. मेरा स्वभाव शुरू से ही काफ़ी रिज़र्व रहा था, सो मैंने उसमें ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखाई. हालांकि वो बार-बार तस्वीर खींचने के बहाने मेरे आसपास ही मंडरा रहा था.

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ख़ैर, शादी ख़त्म हुई और हम सब दिल्ली आ गए. कुछ दिनों के बाद चेन्नई से आंटीजी का ख़त आया. उसमें उसी लड़के की तस्वीर थी. दरसअल, उन्होंने मेरे रिश्ते की बात के लिए उसकी तस्वीर और पत्र भेजा था. लड़केवालों ने शादी में मुझे देखा था और मेरा हाथ उस लड़के के लिए मांग रहे थे.

अब तक मेरा जो मन शांत था, उसमें हलचल होने लगी थी. आंखों में सपने तैरने लगे थे और दिल में कुछ होने लगा था.
मेरे घरवालों ने मिलकर विचार-विमर्श किया और फिर एकमत से यह ़फैसला लिया कि चेन्नई बहुत दूर है, लड़की का रिश्ता वहां नहीं कर सकते, इसलिए ना कह देंगे. कुछ समय तक तो मेरा मन बेचैन रहा, लेकिन फिर सामान्य हो गया.

आज मेरी शादी को पच्चीस साल हो गए हैं और सब कुछ बहुत ही अच्छा चल रहा है, बेहद प्यार करनेवाला जीवनसाथी और प्यारे बच्चे हैं. लेकिन फिर भी कभी-कभी उस लड़के की तस्वीर मन में तैरने लगती है. मन अकेले में अक्सर उसकी तस्वीर के आसपास चला जाता है और धड़कनें तेज़ हो जाती हैं.

हालांकि उससे मैंने कभी बात नहीं की और न ही मन में मुहब्बत जैसी कोई बात ही आई. मेरा कुछ खो गया है ऐसा कोई ख़्याल तक मेरे मन में नहीं आया, क्योंकि मैंने कभी उससे प्यार नहीं किया था. फिर भी न जाने क्यों इतने सालों बाद भी मैं उसकी उस तस्वीर को फेंक या फाड़ नहीं पाई… आख़िर क्यों?
भले ही दिमाग़ से मैं सोच लूं कि मैंने उससे प्यार नहीं किया, लेकिन क्या अपने ही दिल को मैं ठग सकती हूं…? दिल में जो पहली हलचल

हुई थी, वो उसी की तस्वीर को देखने के बाद हुई थी. जो आंखों में सपने पलने लगे थे, वो उससे रिश्ते की बात के बाद ही तो पनपे थे… ज़ुबां से लाख कहूं कि उससे मैंने प्यार नहीं किया था, पर दिल इतनी हिम्मत क्यों न कर सका कि उसकी उस तस्वीर को फेंक दूं… क्यों उसे इस तरह से संजोकर रखा है मैंने, क्यों बरबस उसका ख़्याल आज भी गुदगुदा जाता है मुझे… क्यों? यही सवाल शायद जवाब भी है मेरा… मेरे पहले प्यार का…!

– सुखविंदर

 

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बेहिसाब ख़ामोशियां… चंद तन्हाइयां… कुछ दबी सिसकियां, तो कुछ थकी-हारी परछाइयां… बहुत कुछ कहने को था, पर लबों में ताक़त नहीं थी… मगर अब व़क्त ने लफ़्ज़ों को अपने दायरे तोड़ने की इजाज़त जो दी, तो कुछ वर्जनाएं टूटने लगीं… दबी सिसकियों को बोल मिले, तो ख़ामोशियां बोल उठीं, तन्हाइयां काफ़ूर हुईं, तो परछाइयां खुले आसमान में उड़ने का शौक़ भी रखने लगीं… बराबरी का हक़ अब कुछ-कुछ मिलने लगा है… बराबरी का एहसास अब दिल में भी पलने लगा है…

ज़िम्मेदारियां

हम भले ही लिंग के आधार पर भेदभाव को नकारने की बातें करते हैं, लेकिन हमारे व्यवहार में, घरों में और रिश्तों में वो भेदभाव अब भी बना हुआ है. यही वजह है कि रिश्तों में हम बेटियों की ज़िम्मेदारियां तो तय कर देते हैं, लेकिन बेटों को उनकी हदें और ज़िम्मेदारियां कभी बताते ही नहीं. चूंकि अब समाज बदल रहा है, तो बेहतर होगा कि हम भी अपनी सोच का दायरा बढ़ा लें और रिश्तों में बेटों को भी ज़िम्मेदारी का एहसास कराएं.

घर के काम की ज़िम्मेदारियां
– अक्सर भारतीय परिवारों में घरेलू काम की ज़िम्मेदारियां स़िर्फ बेटियों पर ही डाली जाती हैं. बचपन से ङ्गपराये घर जाना हैफ की सोच के दायरे में ही बेटियों की परवरिश की जाती है.
– यही वजह है कि घर के काम बेटों को सिखाए ही नहीं जाते और उनका यह ज़ेहन ही नहीं बन पाता कि उन्हें भी घरेलू काम आने चाहिए.
– चाहे बेटी हो या बेटा- दोनों को ही हर काम की ज़िम्मेदारी दें.
– बच्चों के मन में लिंग के आधार पर काम के भेद की भावना कभी न जगाएं, वरना अक्सर हम देखते हैं कि घर में भले ही भाई अपनी बहन से छोटा हो या बड़ा- वो बहन से अपने भी काम उसी रुआब से करवाता है, जैसा आप अपनी बेटी से करवाते हैं.
– पानी लेना, चाय बनाना, अपने खाने की प्लेट ख़ुद उठाकर रखना, अपना सामान समेटकर सली़के से रखना आदि काम बेटों को भी ज़रूर सिखाएं.

बड़ों का आदर-सम्मान करना
– कोई रिश्तेदार या दोस्त घर पर आ जाए, तो बेटी के साथ-साथ बेटे को भी यह ज़रूर बताएं कि बड़ों के सामने सलीक़ा कितना
ज़रूरी है.
– चाहे बात करने का तरीक़ा हो या हंसने-बोलने का, दूसरों के सामने बच्चे ही पैरेंट्स की परवरिश का प्रतिबिंब होते हैं. ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि बेटों को भी वही संस्कार दें, जो बेटियों को हर बात पर दिए जाते हैं.
– लड़कियों से कैसे बात करनी चाहिए, किस तरह से उनकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए, उन्हें किस तरह से सम्मान देना चाहिए… आदि बातों की भी शिक्षा ज़रूरी है.
– घर व बाहर भी बुज़ुर्गों से कैसे पेश आना चाहिए, अगर उनके पास कोई भारी सामान वगैरह है, तो आगे बढ़कर उठा लेना चाहिए, उनके साथ व़क्त बिताना, उनसे बातें शेयर करना, उनका हाथ थामकर सहारा देना आदि व्यवहार बेटों को संवेदनशील बनाने में सहायता करेगा और वो अपनी ज़िम्मेदारियां बेहतर तरी़के से समझ व निभा पाएंगे.

ज़िम्मेदारियां

अनुशासन ज़रूरी है
– तुम सुबह जल्दी उठने की आदत डालो, तुम्हें शादी के बाद देर तक सोने को नहीं मिलेगा… टीवी देखना कम करो और खाना बनाने में मदद करो, कुछ अच्छा सीखोगी, तो ससुराल में काम ही आएगा… शाम को देर तक घर से बाहर रहना लड़कियों के लिए ठीक नहीं… आदि… इस तरह की बातें अक्सर मांएं अपनी बेटियों को सिखाती रहती हैं, लेकिन क्या कभी बेटों को अनुशासन सिखाने पर इतना ज़ोर दिया जाता है?
– घर से बाहर रात को कितने बजे तक रहना है या सुबह सोकर कितनी जल्दी उठना है, ये तमाम बातें अनुशासन के दायरे में आती हैं और अनुशासन सबके लिए समान ही होना चाहिए.
– खाना बनाना हो या घर की साफ़-सफ़ाई, बेटों को कभी भी इन कामों के दायरे में लाया ही नहीं जाता, लेकिन यदि कभी ऐसी नौबत आ जाए कि उन्हें अकेले रहना पड़े या अपना काम ख़ुद करना पड़े, तो बेहतर होगा कि उन्हें इस मामले में भी बेटियों की तरह ही आत्मनिर्भर बनाया जाए. बेसिक घरेलू काम घर में सभी को आने चाहिए, इसमें बेटा या बेटी को आधार बनाकर एक को सारे काम सिखा देना और दूसरे को पूरी छूट दे देना ग़लत है.

ज़िम्मेदारियां

शादी से पहले की सीख
– शादी से पहले बेटियों को बहुत-सी हिदायतों के साथ विदा किया जाता है, लेकिन क्या कभी बेटों को भी हिदायतें दी जाती हैं कि शादी के बाद उसे कैसा व्यवहार करना चाहिए? यक़ीनन नहीं.
– बेहतर होगा कि बेटों को भी एडजेस्टमेंट करना सिखाया जाए.
– नए रिश्तों से जुड़ने के बाद की ज़िम्मेदारियां समझाई जाएं.
– किस तरह से नई-नवेली दुल्हन को सपोर्ट करना है, उसके परिवार से किस तरह से जुड़ना है आदि बातें बेटों को भी ज़रूर बताई जानी चाहिए.
– हालांकि भारतीय पैरेंट्स से इस तरह की उम्मीद न के बराबर ही होती है कि वो इस तरह से अपने बेटे को समझाएं, लेकिन आज समय बदल रहा है, तो लोगों की सोच में भी कुछ बदलाव आया है.
– आज की जनरेशन काफ़ी बदल गई है. फिर भी यदि पैरेंट्स नहीं समझा सकते, तो प्री मैरिज काउंसलिंग के लिए ज़रूर काउंसलर के पास जाना चाहिए.

शादी के बाद
– अक्सर शादी के बाद बहुओं को हर कोई नई-नई सीख व सलाहेें देता पाया गया है, लेकिन बेटों को शायद ही कभी कोई ज़िम्मेदारियों की बातें समझाता होगा.
– शादी स़िर्फ लड़की ने लड़के से नहीं की होती, बल्कि यह दोनों तरफ़ का रिश्ता होता है, तो ज़िम्मेदारियां भी समान होनी चाहिए.
– बेटों को यह महसूस कराना ज़रूरी है कि स़िर्फ बहू ही नए माहौल में एडजेस्ट नहीं करेगी, बल्कि उन्हें भी पत्नी के अनुसार ख़ुद को ढालने का प्रयत्न करना होगा, पत्नी को हर काम में सहयोग करना होगा और पत्नी की हर संभव सहायता करनी होगी, ताकि वो बेहतर महसूस कर सके.
– इसके अलावा जितने भी रीति-रिवाज़ व परंपराएं हैं, उन्हें निभाने की ज़िम्मेदारी भी दोनों की होनी चाहिए.
– अक्सर शादी के बाद ससुरालपक्ष और मायके, दोनों को निभाने की ज़िम्मेदारी लड़की पर ही छोड़ दी जाती है. जबकि कोई भी मौक़ा या अवसर हो, तो ज़रूरी है लड़के भी उसमें उतनी ही ज़िम्मेदारी के साथ शामिल हों, जितना लड़कियों से उम्मीद की जाती है.
– इसके लिए बेहतर होगा कि जब भी घर में या किसी रिश्तेदार के यहां भी कोई अवसर पड़े, जैसे- किसी का बर्थडे या शादी, तो बेटों को उनके काम व ज़िम्मेदारी की लिस्ट थमा दी जानी चाहिए कि ये काम तुम्हारे ही ज़िम्मे हैं. इसी तरह घर के हर सदस्य को उसका काम बांट देना चाहिए. इससे वो ज़िम्मेदारी से न तो पीछा छुड़ा पाएंगे और न ही भाग पाएंगे.

ज़िम्मेदारियां

बच्चों की ज़िम्मेदारियां
– बच्चा दोनों की ही ज़िम्मेदारी होता है, लेकिन इसे निभाने का ज़िम्मा अनकहे ही मांओं पर आ जाता है.
– बच्चे से जुड़ी हर छोटी-बड़ी चीज़ के लिए घर के सदस्यों से लेकर ख़ुद पति भी अपनी पत्नी से ही जवाब मांगते हैं.
– लेकिन अब बेटों को यह एहसास कराना ज़रूरी है कि बच्चों के प्रति वो भी उतने ही जवाबदेह हैं, जितना वो अपनी पत्नी को समझते हैं.
– पैरेंट्स मीटिंग हो या बच्चों को होमवर्क करवाना हो, माता-पिता को ज़िम्मेदारी बांटनी होगी. लेकिन अक्सर हमारे परिवारों में बेटे शुरू से अपने घरों में अपनी मम्मी को ये तमाम काम करते देखते आए हैं, लेकिन आज के जो पैरेंट्स हैं, वो अपने परिवार से इसकी शुरुआत कर सकते हैं, ताकि उनके बेटों को आगे चलकर रिश्तों में ज़िम्मेदारियों का एहसास हो सके.

करियर की ज़िम्मेदारी
– आजकल वर्किंग कपल्स का कल्चर बढ़ता जा रहा है, लेकिन जब भी कॉम्प्रोमाइज़ करने की बारी आती है, तो यह समझ लिया जाता है कि पत्नी ही करेगी, क्योंकि बेटों को तो कॉम्प्रोमाइज़ करना कभी सिखाया ही नहीं जाता.
– आप ऐसा न करें. बेहतर होगा कि मिल-बांटकर ज़िम्मेदारी निभाना सिखाएं. बांटने, शेयर करने व सपोर्ट करने का जज़्बा बेटों में भी पैदा करें. बचपन में अपनी बहन के लिए वे ये सब करेंगे, तो आगे चलकर महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव बढ़ेगा और वो बेहतर पति साबित होंगे.
– घर में बहन न भी हो, तो भी महिलाओं के प्रति सम्मान व समान भाव रखने की भावना उनमें ज़रूर होनी चाहिए और ऐसा तभी होगा, जब उनकी परवरिश इस तरह से की जाएगी.
– अगर दोनों ही थके-हारे घर आते हैं, तो काम भी मिलकर करना होगा, वरना पत्नी आते ही घर के काम में जुट जाती है और पति महाशय फ्रेश होकर टीवी के सामने चाय की चुस्कियां लेते हुए पसर जाते हैं.

– गीता शर्मा

रिश्ते के लिए शरीर की कमज़ोरी को दूर करने के लिए डॉक्टर हमें टॉनिक देते हैं, ताकि हमारा शरीर स्वस्थ व मज़बूत रहे, लेकिन अगर वैवाहिक रिश्ता कमज़ोर होने लगे, तो क्या करें? हैप्पी कपल्स की तरह आप भी अपने रिश्ते को पिलाएं प्यार की घुट्टी. जी हां, अपने रिश्ते को दें लव टॉनिक और अपने दांपत्य जीवन को स्वस्थ व मज़बूत बनाएं.

Relationship Tips
आज की भागदौड़ में अक्सर पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए व़क्त ही नहीं निकाल पाते, जिससे उनके रिश्ते में ठंडापन आने लगता है. अगर आपके साथ भी ऐसा कुछ हो रहा है, तो एक-दूसरे के साथ क्वालिटी समय बिताने के लिए और रिश्ते में गर्माहट लाने के लिए करें कुछ ख़ास.
1. एक साथ खाना बनाएं
आजकल ज़्यादातर कपल्स वर्किंग होते हैं, ऐसे में एक-दूसरे के साथ ज़्यादा से ज़्यादा व़क्त बिताने का यह एक अच्छा तरीक़ा है. भले ही आपको खाना बनाना न आता हो, पर किचन में अपने पार्टनर का हाथ बंटाकर आप अपने रिश्ते को लव डोज़ ज़रूर दें. कुकिंग टाइम को और इंट्रेस्टिंग बनाने के लिए खाना बनाते-बनाते कभी-कभार अंताक्षरी भी खेल सकते हैं.

2. एक क़िताब पढ़े, दूसरा सुने
अगर आपकी ही तरह आपके पार्टनर को भी क़िताबों का शौक़ है, तो बुक रीडिंग से भी आप अपने रिश्ते को लव टॉनिक दे सकते हैं. बेड टाइम के लिए यह एक बढ़िया नुस्ख़ा है. अपने-अपने मोबाइल पर सोशल मीडिया फॉलो करने की बजाय अपने रिश्ते को फॉलो करें.

3. सुबह या शाम टहलने जाएं
यह अगर आपके डेली रूटीन का हिस्सा बन सके, तो बहुत ही अच्छा होगा, पर अगर नहीं, तो कम से कम हफ़्ते में 2 दिन सुबह या शाम को एक साथ टहलने जाएं. अगर सुबह व़क्त नहीं, तो डिनर के बाद वॉक पर जाएं. सेहत के साथ-साथ रिश्ता भी मज़बूत होगा.

4. एक साथ शावर लें
छुट्टी का दिन वर्किंग लोगों के लिए काफ़ी आलसभरा होता है. इस दिन को आप अपने रिश्ते को मज़बूत करने के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इसके लिए सबसे आसान तरीक़ा है एक साथ शावर लेना. एक साथ शावर लेने से आप दोनों ही दिनभर रोमांस महसूस करेंगे. आपके रिश्ते के लिए यह एक बेहतरीन लव टॉनिक का काम करेगा.

5. डिनर या मूवी के लिए जाएं
हर कपल के लिए यह रूल होना चाहिए कि महीने में एक बार डिनर वो बाहर करें या फिर मूवी देखें. पति-पत्नी के लिए एक साथ समय बिताने के बहाने जितने भी मिलें, उन्हें ज़रूर इस्तेमाल करें.

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6. रोमांटिक गाने गाएं
कपल्स को रोमांटिक गाने हमेशा लुभाते हैं और अगर उसे आपके लिए आपका पार्टनर गाए, तो बात ही क्या है. गाना तो वैसे आप कभी भी गा सकते हैं. जब भी आपको लगे पार्टनर का मूड अच्छा नहीं, बस एक रोमांटिक गाना उनके लिए गाइए फिर देखिए, कैसे उनका मूड अच्छा हो जाता है. रात को सोेते समय गुड नाइट किस के साथ चंद ख़ूबसूरत लाइनें आप दोनों की मैरिड लाइफ को हमेशा ख़ुशहाल रखेंगी.

7. छोटे-छोटे सरप्राइज़ेस दें
प्यार जताने के लिए किसी गिफ्ट या सरप्राइज़ से बेहतर भला क्या होगा. ज़रूरी नहीं कि आप महंगे-महंगे गिफ्ट ही ख़रीदें, काग़ज़ के एक छोटे-से टुकड़े पर हार्ट में लिखा ङ्गआई लव यूफ भी उनके चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए काफ़ी है. कभी-कभार एक गुलाब का फूल या चॉकलेट भी आपके रिश्ते के लिए लव टॉनिक का काम करेगा.

8. शरारतों से उन्हें लुभाएं
अटेंशन हर किसी को पसंद आता है और अगर आपका पार्टनर इस बात का ख़ास ख़्याल रखता है, तो आपकी लव लाइफ में कभी बोरियत नहीं आएगी. आपकी हल्की-फुल्की शरारतें और छेड़खानी, आपका उन्हें रिझाना न सिर्फ़ पार्टनर को हमेशा ख़ुश व रोमांचित रखता है, बल्कि आपकी मैरिड लाइफ को और भी ख़ुशगवार बनाता है.

9. वीकली मसाज थेरेपी अपनाएं
दिनभर ऑफिस में बैठकर काम करने से अक्सर कपल्स पीठदर्द, कंधे के दर्द और सिरदर्द से परेशान रहते हैं, जिसका चिड़चिड़ापन उनके रिश्ते को भी प्रभावित करता है. हर वीकेंड आप मसाज थेरेपी के लिए रख सकते हैं. एक-दूसरे को फुल बॉडी मसाज दें. यह न स़िर्फ तन की तंदुरुस्ती बढ़ाएगा, बल्कि एक-दूसरे के मन को भी मज़बूत बनाएगा.

10. आई लव यू कहने में कंजूसी न करें
इन गोल्डन वर्ड्स में ग़ज़ब की जादुई ताक़त है, यह न सिर्फ़ आपके पार्टनर के मूड को हमेशा अच्छा रखता है, बल्कि आपके वैवाहिक जीवन को भी ख़ुशगवार बनाए रखता है, तो फिर कंजूसी किस बात की. जब भी मौक़ा मिले, दिल खोलकर ई लव यू कहें.

11. कॉम्प्लीमेंट देकर ख़ुश करें
कभी भी न अपने रिश्ते को और न ही अपने पार्टनर को फॉर ग्रांटेड लें. अगर पार्टनर अच्छा दिख रहा है, तो उसके लुक्स की तारीफ़ ज़रूर करें. अगर उन्होंने कुछ अचीव किया है, तो कॉम्प्लीमेंट के साथ चॉकलेट या गुलाब का फूल भी दें. ये छोटी-छोटी चीज़ें आपके रिश्ते के लिए बेशक लव टॉनिक का काम करेंगी.

12. गुड मॉर्निंग और गुड नाइट किस जारी रखें
ऐसा होता है कि नई-नई शादी में कपल्स को गुड मॉर्निंग-गुड नाइट किस याद रहती है, पर धीरे-धीरे बढ़ती व्यस्तता में वे इसे भूलने लगते हैं और धीरे-धीरे यह सिलसिला बंद हो जाता है. यही आप अपने रिश्ते में न होने दें. अगर आपके रिश्ते में भी यह नहीं है, तो आज से ही शुरू करें.

13. मोबाइल को लव मैसेंजर बनाएं
ऑफिस की व्यस्तता के बीच आपके पार्टनर द्वारा भेजा गया लव स्माइली या फोटो या सेल्फी आपके मूड को फ्रेश कर देता है.

– अनीता सिंह

यह भी पढ़ें: 7 तरह के सेक्सुअल पार्टनरः जानें आप कैसे पार्टनर हैं

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क्यों उसके जन्म की ख़ुशी ग़म में बदल दी जाती है, क्यों बधाइयों की जगह लोग अफ़सोस ज़ाहिर कर चले जाते हैं, क्यों उसकी मासूम-सी मुस्कान किसी और के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच देती हैं? आख़िर वो भी तो एक संतान ही है, फिर क्यों उसे लड़का न होने की सज़ा मिली? बेटे-बेटी के बीच का यह भेदभाव आख़िर कब तक चलेगा? आज भी ऐसे कई अनगिनत सवाल वो बेटियां करती हैं, जिन्हें परिवार में एक बेटी का सम्मान नहीं मिला. क्या परिवार का वारिस स़िर्फ एक बेटा ही बन सकता है? क्यों आज भी बेटियां वारिस नहीं? समाज की इसी सोच को समझने की हमने यहां कोशिश की है.

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वारिस शब्द का अर्थ
शब्दकोष के अनुसार- वारिस शब्द का अर्थ उत्तराधिकारी या मृत जन की संपत्ति का अधिकारी होता है. सामाजिक अर्थ- वारिस वह है, जो परिवार का वंश बढ़ाए और परिवार के नाम को आगे ले जाए, जो सामाजिक मान्यता के अनुसार लड़के ही कर सकते हैं, क्योंकि लड़कियां पराया धन होती हैं और शादी करके दूसरों की वंशवृद्धि करती हैं, इसलिए वो वारिस नहीं मानी जातीं. सार्थक शब्दार्थ- वारिस शब्द का मतलब है- ‘वहन करनेवाला’. बच्चों को माता-पिता का वारिस इसलिए कहते हैं, क्योंकि वो उनके संस्कारों का, अधिकारों का, कर्त्तव्यों का वहन करते हैं और ये सब काम लड़कियां भी कर सकती हैं. सही मायने में इस शब्द की यही व्याख्या होनी चाहिए और आज हमें इस सोच को अपनाने की ज़रूरत है.

वारिस के रूप में बेटा ही क्यों?
इसके पीछे कई आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और भावनात्मक कारण हैं-
*    बुढ़ापे में बेटा आर्थिक सहारे के साथ-साथ भावनात्मक सहारा भी देता है, जबकि बेटियां शादी करके दूसरे के घर चली जाती हैं.
*    बेटे परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने में सहयोग देते हैं और प्रॉपर्टी में इज़ाफ़ा करते हैं, जबकि बेटियों को दहेज देना पड़ता है, जिससे घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ जाती है.
*    बेटे वंश को आगे बढ़ाते हैं, जबकि बेटियां किसी और का परिवार बढ़ाती हैं.
*    हमारे समाज में माता-पिता के जीते जी और मरने के बाद भी बेटे कई धार्मिक संस्कार निभाते हैं, जिसकी इजाज़त धर्म ने बेटियों को नहीं दी है.
*    बेटे परिवार के मान-सम्मान को बढ़ाते हैं और परिवार की ताक़त बढ़ाते हैं, जबकि बेटियों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी घरवालों पर होती है.
*    प्रॉपर्टी और फाइनेंस जैसी बातें स़िर्फ पुरुषोें से जोड़कर देखी जाती हैं, लड़कियों को इसके लिए समर्थ नहीं समझा जाता.
*    कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बेटा ही माता-पिता को स्वर्ग के द्वार पार कराता है, इसीलिए ज़्यादातर लोग बेटों की ही चाह रखते हैं.
*    बेटे के बिना परिवार अधूरा माना जाता है.

क्या कहते हैं आंकड़े?
*    इस साल हुए एक सर्वे में पता चला है कि चाइल्ड सेक्स रेशियो पिछले 70 सालों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है, जहां 1000 लड़कों पर महज़ 918 लड़कियां रह गई हैं.
*    एक्सपर्ट्स के मुताबिक़, अगर स्थिति को संभाला न गया, तो 2040 तक भारत में लगभग 23 मिलियन महिलाओं की कमी हो जाएगी.
*    कन्या भ्रूण हत्या का सबसे बड़ा कारण वारिसवाली सोच ही है.
*    इंडिया ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे, यूनिवर्सिटी ऑफ मैरिलैंड और नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा किए गए सर्वे में यह बात सामने आई है कि 77% भारतीय आज भी बुढ़ापे में बेटी की बजाय बेटे के घर रहना पसंद करते हैं. शायद इसके पीछे का कारण हमारी परंपरागत सोच है, जो कहती है कि बेटियों के घर का पानी भी नहीं पीना चाहिए.
*    ऐसा बिल्कुल नहीं है कि यह भेदभाव अनपढ़ और ग़रीब तबके के लोगों के बीच है, बल्कि सुशिक्षित व अमीर घरों में भी यह उतना ही देखा जाता है.

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 सोच बदलने की ज़रूरत है
*    जब ज़माने के साथ हमारी लाइफस्टाइल बदल रही है, हमारा खानपान बदल रहा है, हमारी सोच बदल रही, तो भला शब्दों के अर्थ वही क्यों रहें? क्या यह सही समय नहीं है, सही मायने में लड़कियों को समानता का अधिकार देने का?
*    वैसे भी हमारे देश का क़ानून भी समानता का पक्षधर है, तभी तो लड़कियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार प्राप्त है. पर क्या यह काफ़ी है, शायद नहीं. क्योेंकि भले ही इस अधिकार को क़ानूनी जामा पहना दिया गया है, पर क्या इस पर अमल करना इतना आसान है? ऐसे कई मामले देखने को मिलते हैं, जब अपना हक़ लेनेवाली बेटियों से परिवार के लोग ही नाते-रिश्ते तोड़ लेते हैं.
*    समाज में ऐसे कई उदाहरण प्रस्तुत हैं, जहां लड़कियां अपने माता-पिता की सेवा व देखभाल की ख़ातिर अपनी ख़ुशियों को तवज्जो नहीं देतीं, तो क्या ऐसे में उनका वारिस कहा जाना ग़लत है?
*    हम हमेशा समाज की दुहाई देते हैं, पर जब बदलाव होते हैं, तो सहजता से हर कोई उसे स्वीकार्य कर ले, यह ज़रूरी तो नहीं. पर क्या ऐसे में परिवर्तन नहीं होते? बदलाव तो होते ही रहे हैं और होते रहेंगे. हम क्यों भूल जाते हैं कि समाज हमीं से बनता है, अगर हम इस ओर पहल करेंगे, तो दूसरे भी इस बात को समझेंगे.
*    बेटियों को लेकर हमेशा से ही हमारे समाज में दोहरा मापदंड अपनाया जाता रहा है. जहां एक ओर लोग मंच पर महिला मुक्ति और सशक्तिकरण के नारे लगाते हैं, वहीं घर में बेटियों को मान-सम्मान नहीं दिया जाता.
*  कई जगहों पर अभी भी बच्चों की परवरिश इस तरह की जाती है कि उनमें बचपन से लड़का-लड़कीवाली बात घर कर जाती है.
*    हमारे समाज की यह भी एक विडंबना है कि सभी को मां चाहिए, पत्नी चाहिए, बहन चाहिए, पर बेटी नहीं चाहिए. अब भला आप ही सोचें, अगर बेटी ही न होगी, तो ये सब रिश्ते कहां से आएंगे.
*    बेटों को बुढ़ापे का सहारा बनाने की बजाय सभी को अपना रिटायरमेंट सही समय पर प्लान करना चाहिए, ताकि किसी पर आश्रित न रहना पड़े.

रंग लाती सरकारी मुहिम
*    प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस ओर एक सकारात्मक पहल की है. ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के साथ वो देश में लड़कियों की स्थिति मज़बूत करना चाहते हैं, जो हमारे भविष्य के लिए बहुत ज़रूरी है.
*    कुछ महीने पहले मोदीजी ने ट्विटर पर ‘सेल्फी विद डॉटर’ मुहिम भी शुरू की, ताकि लोग बेटियों की महत्ता को समझें.
*    पिछले साल ‘सुकन्या समृद्धि’ नामक लघु बचत योजना की शुरुआत की गई, ताकि बेटियों की उच्च शिक्षा और शादी-ब्याह में किसी तरह की परेशानी न आए.
*    कन्या भ्रूण हत्या के विरोध और बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने 2008 में ‘धनलक्ष्मी योजना’ शुरू की थी, जिसमें 18 की उम्र के बाद शादी किए जाने पर सरकार की ओर से  1 लाख की बीमा राशि देने का प्रावधान है.
*    महाराष्ट्र सरकार की ‘माझी कन्या भाग्यश्री योजना’ ख़ासतौर से ग़रीबी रेखा के नीचे रहनेवाले परिवारों के लिए है, जिसमें बच्ची के 18 साल की होने पर सरकार की ओर से  1 लाख मिलते हैं.
*    राजस्थान सरकार ने बेटियों के जन्म को प्रोत्साहित करने के लिए ‘मुख्यमंत्री शुभलक्ष्मी योजना’ की शुरुआत की थी. इसके तहत बालिका के जन्म पर, टीकाकरण के लिए, स्कूल में दाख़िले के लिए मां को कुल  7300 मिलते हैं.
* जम्मू-कश्मीर सरकार की ‘लाडली बेटी योजना’ भी गरीब परिवार की बेटियों के लिए है, जो हर महीने बेटी के खाते में
1000 जमा करते हैं और 21 साल पूरे होने पर साढ़े छह लाख रुपए एकमुश्त देते हैं.
* हिमाचल सरकार की ‘बेटी है अनमोल योजना’ के तहत बेटी के जन्म पर उसके खाते में  1 लाख की रक़म जमा की जाती है और बेटियों की 12वीं तक की शिक्षा के लिए सरकार  300 से 1200 की स्कॉलरशिप भी देती है.
*    मध्य प्रदेश सरकार की ‘लाडली लक्ष्मी योजना’ भी इसी कड़ी में शामिल है. बेटियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उसकी शिक्षा के दौरान समय-समय पर स्कॉलरशिप दी जाती है.

कुछ ऐसे भी मामले देखने को मिलते हैं
–  तीसरी बेटी के जन्म की ख़बर सुनकर एक पिता ने अपना सिर मुंडवा लिया था और कई दिनों तक घर में उदासी का माहौल रहा.
–   लोअर मिडल क्लास के 40 वर्षीया कपल ने सातवीं बेटी के जन्म के बाद भी बेटे की उम्मीद में आठवीं बेटी को जन्म दिया.
–    दूसरी बेटी के जन्म की ख़बर सुनकर पति बिना पत्नी और बच्ची को देखे घर चला गया.
ये मामले हमारे इसी समाज से हैं और आज भी बदस्तूर जारी हैं. ऐसे लोगों को समझना होगा कि बेटियों को बेटों से कमतर न आंकें, क्योंकि बेटियां भी अपने माता-पिता के वो सारे कर्त्तव्य पूरे कर रही हैं, जिनकी उम्मीद बेटों से की जाती है और जिसके लिए लोग बेटों की चाह रखते हैं.

– अनीता सिंह              

किसने कितना दिया… किससे कितना मिला… किसको क्या देना है… किससे क्या लेना है… आजकल इन्हीं तानोबानों में घिरकर हम हर रिश्ते को तोल रहे हैं. मतलब की दुनिया में मतलबी हो रहे रिश्ते हमें भी कैल्कुलेटिव बनाते जा रहे हैं, जिससे रिश्तों में छिपा अपनापन और प्रेम खो रहा है.

Practical With Relationships

रिश्तों का हिसाब-क़िताब या रिश्तों में हिसाब-क़िताब?
हम जब उनके घर गए थे, तो उन्होंने हमें क्या दिया? बच्चे के हाथ में बस 100 का नोट थमा दिया. तो अब जब वो आ रहे हैं, तो इतना सोचने की क्या ज़रूरत. हम भी वैसा ही करेंगे, जैसा उन्होंने किया… हर रिश्ते को हम पैसों के पैमाने पर ही तोलते हैं. प्यार, स्नेह, अपनापन तो जैसे बीते ज़माने की बात हो गई.

ज़रूरी नहीं, ज़रूरत के रिश्ते
भला इनसे रिश्ता रखकर हमें क्या फ़ायदा होगा? न तो ये इतने पैसेवाले हैं और न ही इनकी इतनी पहुंच है कि हमारे कभी काम आ सकें… चाहे दोस्ती हो या रिश्तेदारी अब हम स़िर्फ ज़रूरत और फ़ायदा ही देखते हैं. उन्हीं लोगों से मिलने-जुलने का व़क्त निकालते हैं, जिनसे हमें फ़ायदा हो सकता है. ज़रूरत के व़क्त कौन कितना काम आ सकता है, जैसे- कौन रेलवे में रिज़र्वेशन करवा सकता है, कौन हॉस्पिटल का बिल कम करवा सकता है, कौन हम पर मुसीबत आने पर हमें उससे बाहर निकलवा सकता है… किसका कितना रसूख है, किसकी कितने बड़े अधिकारियों से पहचान व ऊपर तक पहुंच है… यही बातें अब अधिक महत्वपूर्ण हो गई हैं.

सोच-समझकर बनाते हैं दूरियां
एक समय था हमें घर पर ही यह सीख मिलती थी कि ये हमारे दूर के रिश्ते के मामाजी लगते हैं और इनसे भी हमें उसी शिद्दत से रिश्ता निभाना है, जैसे अपने मामाजी से. लेकिन अब हम सोचते हैं, जितना ज़्यादा संबंध रखेंगे, उतने झंझट बढ़ेंगे. हम अपने बच्चों की शादी में उन्हें बुलाएंगे, तो उनके बच्चों की शादी में भी जाना पड़ेगा… कौन इतना लेन-देन व समय निकाले. बेहतर है धीरे-धीरे दूरियां बना लें. यानी बहुत ही कैल्कुलेटिव तरी़के से हम दूरियां बनाते हैं, ताकि हमें भी उस रिश्ते से जुड़ी ज़िम्मेदारियां न निभानी पड़े.

ख़त्म हो रही है बेलौस मुहब्बत
बिना मतलब के, नि:स्वार्थ भाव से किसी से प्यार-मुहब्बत भरे रिश्ते रखना तो अब बेव़कूफ़ी ही समझी जाती है. यहां तक कि आपको समझाने वाले भी यही समझाएंगे कि ऐसे लोगों पर अपना क़ीमती व़क्त और पैसा क्यों ज़ाया करते हो, जो किसी काम के नहीं.

पैसा और कामयाबी सोच बदल रही है
हम अपने दोस्तों या रिश्तेदारों से अधिक कामयाब हो जाते हैं और उनसे अधिक कमाने लगते हैं, तो हमारे भीतर का अभिमान भी हावी होने लगता है. ऐसे में हम हर रिश्ते को शक की निगाह से देखते हैं. हमें लगता है कि हमारी कामयाबी व पैसों के कारण ही ये तमाम लोग हमसे जुड़े रहना चाहते हैं. इस नकारात्मक सोच को हवा देनेवालों की भी कमी नहीं, इसलिए हम धीरे-धीरे ख़ुद ही अपनों से दूरी बनाने लगते हैं.

प्राथमिकताएं बदल जाती हैं
समय के साथ हमारी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं. हमारे गहरे दोस्तों से अधिक महत्वपूर्ण वो लोग हो जाते हैं, जिनसे हमें हमारे करियर या बिज़नेस में फ़ायदा हो. हमें ऐसे ही लोगों के साथ समय गुज़ारने में अधिक दिलचस्पी होती है.

क्यों हो रहे हैं हम इतने कैल्कुलेटिव?
– व़क्त व समय बदल रहा है. समय की कमी के चलते हमें भी लगता है कि जिनसे सीधा काम पड़े, उन्हें से बातचीत का क्रम जारी रहे.
– लोग प्रैक्टिकल बन रहे हैं और जब हमारा सामने ऐसे ही लोगों से होता है, तो हमारी सोच भी बदलने लगती है.
– कड़वे अनुभव भी यही सीख देते हैं कि जब समय पड़ने पर किसी ने हमारा साथ नहीं दिया, तो भला हम भी क्यों किसी से इतना अपनापन रखें.
– भले ही सामनेवाला मदद करने की स्थिति में हो या न हो, लेकिन हमारा पैमाना यही हो गया है कि हमें इनसे संबंध रखकर क्या फ़ायदा हो सकता है.
– बड़े शहरों में वर्क लाइफ के बाद स़िर्फ वीकेंड में अपने लिए समय मिलता है, उसमें हम अपने कलीग्स या सो कॉल्ड फ्रेंड्स के साथ वीकेंड एंजॉय करना पसंद करते हैं. यानी कल्चर ही ऐसा हो गया है कि न जाने-अनजाने हम कैल्कुलेटिव हो रहे हैं.
– रिश्ते निभाने का समय और एनर्जी दोनों ही नहीं. हमको लगता है कि जिनसे कोई काम ही नहीं पड़ेगा, तो उन पर अपना समय व एनर्जी ख़र्च करने से बेहतर है, ऐसे लोगों के साथ टच में रहें, जो हमारे काम आ सकें. समय की यह कमी हमारी सोच को संकीर्ण बना रही है.
– यहां तक कि हम अपने उस पुराने दोस्त से मिलने को भी इतने आतुर नहीं रहते अब, जो किसी ज़माने में हमारे लिए सब कुछ होते थे.

क्या करें, क्या न करें?
– ज़रूरत और रिश्तों को अलग-अलग रखें.
– रिश्तों में प्यार व अपनेपन को अधिक महत्व दें.
– भले ही सामनेवाला इस स्थिति में न हो कि आपके काम आ सके, लेकिन अगर वो आपसे सच्चे दिल से जुड़ा है, तो उसकी भावनाओं का सम्मान करें.
– भले ही मुसीबत के समय वो अन्य तरीक़ों से आपकी मदद न कर सके, लेकिन उसका भावनात्मक सहारा ही आपको बहुत संबल देगा.
– कई बार ऐसा होता है कि हमारे पास सब कुछ होते हुए भी हम अकेले होते हैं, ऐसे में यही रिश्ते आपका सहारा बनते हैं.
– मतलब के रिश्ते तो थोड़े समय के लिए ही होते हैं, दिल के रिश्ते ताउम्र साथ रहते हैं.
– अपने दोस्तों को, क़रीबी लोगों को समय दें.
– उनके प्रति भी वही सम्मान मन में बनाकर रखें, जो अन्य लोगों के लिए है.
– आप उन्हें व़क्त देंगे, तो वो भी व़क्त पड़ने पर आपके साथ खड़े नज़र आएंगे.
– हर रिश्ते को मात्र फ़ायदे-नुक़सान की नज़र से न देखें. रिश्तों में मतलब ढूंढ़ना कम कर दें.
– हर बात को आर्थिक स्तर पर तोलना बंद कर दें. हमने 2000 का गिफ्ट दिया, उन्होंने 1000 का, यही छोटी-छोटी बातें दिलों में दूरियां पैदा करती हैं. अपना दिल बड़ा और दिमाग़ खुला रखें.
– रिश्तों का अर्थ स़िर्फ लेन-देन ही नहीं होता. अपने रिश्तों को इससे कहीं बड़े दायरे में देखें वरना व्यापार व रिश्तों में अंतर नहीं कर पाएंगे.
– आप अपनी सोच बदल देंगे, तो आपको व़क्त भी मिलेगा और मन में संतोष भी होगा कि
कैल्कुलेटिव होते इन रिश्तों के बीच आपने अपने रिश्तों को सहेजने की कला सीख ली है.

– गीता शर्मा

दूसरों की ज़िंदगी में झांकना कहीं आपका शौक़ तो नहीं? (Why Do We Love To Gossip?)

कुछ दायरे हमने ख़ुद बुने होते हैं, कुछ दूसरे हमारे लिए तय कर देते हैं… कुछ परिवार, तो कुछ समाज… (Truth About Relationship Expectations)कुछ यार-दोस्त, तो कुछ सलाहकार… सब अपनी-अपनी सुविधानुसार हमारे लिए और हमारे रिश्तों के लिए बहुत कुछ तय करते हैं. इन्हीं के आधार पर हम भी अपने रिश्तों की हदें और अपेक्षाएं निर्धारित कर लेते हैं. समस्या तब आती है, जब हम अपने रिश्तों की और उन्हें जी रहे लोगों की समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर मात्र अपनी सोच-समझ से अपनी अपेक्षाएं तय कर लेते हैं और जब वो पूरी नहीं होतीं, तो दुख का कारण बनती हैं. रिश्तों में इन्हीं घटते-बढ़ते दायरों की हम यहां चर्चा करेंगे, ताकि हमारे रिश्ते बेहतर और टिकाऊ बने रहें.

Truth About Relationship Expectations

अपेक्षाएं होना लाज़मी है: यह सच है कि रिश्ता है, तो उम्मीदें व अपेक्षाएं भी होगी ही. हम भले ही बड़ी-बड़ी बातें कर लें कि अगर सुखी रहना है, तो किसी से कोई अपेक्षा न रखो, लेकिन प्रैक्टिकली क्या यह संभव है? रिश्तों में अपेक्षाएं होती ही हैं, चाहे कम या ज़्यादा. तो अगर आप भी अपनों से कुछ अपेक्षा रखते हैं, तो उसमें ग़लत कुछ भी नहीं है.

अपेक्षाओं का दायरा कितना हो: आपकी अपेक्षाएं कितनी हैं और कितनी रियालिस्टिक हैं, इस पर ध्यान ज़रूर दें. अपनी परिस्थितियों, आर्थिक स्थिति व अपने रिश्तों की सीमाएं पहचानें और उन्हीं के आधार पर अपनी अपेक्षाएं रखें. यथार्थवादी सोच रखें.

दूसरों को देखकर अपनी हदें तय न करें: आपके पड़ोसी के पास बड़ी कार है, आपकी सहेली महंगी चीज़ों का शौक़ रखती है, आपके कलीग की लाइफस्टाइल आपको अपनी लाइफस्टाइल से बेहतर लगती है… यही सोच-सोचकर अगर दुखी रहेंगे, तो आपके जीवन में दुख बना ही रहेगा. कभी भी दूसरों की ज़िंदगी के आधार पर अपनी अपेक्षाओं का पहाड़ खड़ा न करें. भले ही हमें उनकी ज़िंदगी आकर्षक लगती है, लेकिन सबकी ज़िंदगी में अपनी-अपनी परेशानियां व सबके अपने दायरे होते हैं. इस बात को जितना जल्दी समझेंगे, रिश्ते उतने ही बेहतर होंगे.

अपने रिश्तों को समझें: आपका पार्टनर आपको समझता नहीं या आपके पैरेंट्स या सास-ससुर आपको सहयोग नहीं करते… इस सोच से उबरकर उन्हें समझें और समझाएं कि आप उनसे किस तरह के सहयोग की अपेक्षा करते हैं. बिना बोले अगर आप सोचेंगे कि सामनेवाले को ख़ुद ही समझ जाना चाहिए, तो यह सोच ही ग़लत है. कुछ बातें आपको समझानी ही पड़ती हैं, तभी सामनेवाला आपकी समस्या समझ सकता है. इसलिए कम्यूनिकेट ज़रूर करें. अपने रिश्तों में ख़ामोशी को न आनेे दें.

दूसरों की भी अपेक्षाओं का ख़्याल रखें: यह इंसानी फ़ितरत होती है कि हम अक्सर अपने बारे में ही पहले सोचते हैं. हमें क्या चाहिए, हमसे लोग कैसा व्यवहार करते हैं, हमें लोग क्या देते हैं… ऐसी बहुत-सी बातें हैं, जिन पर हमारा ध्यान अधिक रहता है बजाय इसके कि हमने क्या दिया, हमने कैसा व्यवहार किया या हम दूसरों की अपेक्षाओं पर कितने खरे उतरते हैं. जिस तरह के व्यवहार की अपेक्षा हम दूसरों से करते हैं, हमें ख़ुद भी उनके साथ उसी तरह का व्यवहार करना चाहिए. क्योंकि जिस तरह हम उनसे अपेक्षाएं रखते हैं, उसी तरह वो भी हमसे अपेक्षाएं रखते हैं. क्या हम उनकी अपेक्षाओं पर खरे उतरने का अतिरिक्त प्रयास करते हैं? क्या हम उनकी ज़रूरतों के प्रति उतने संवेदनशील हैं? क्या हम अपने कंफर्ट ज़ोन से निकलकर अपनों के लिए कुछ एक्स्ट्रा करते हैं? अगर नहीं, तो इस पर हमें सोचना होगा.

कुछ एक्स्ट्रा करें: रिश्तों में गर्माहट बनी रहे, आपस में प्यार-मुहब्बत बना रहे, इसके लिए ज़रूरी है थोड़ा एक्स्ट्रा एफर्ट. आप अपनों के लिए कभी-कभार उनकी अपेक्षाओं से कुछ अधिक भी कर दिया करें. इससे उन्हें ख़ुशी मिलेगी. अनपेक्षित रूप से जब कुछ मिल जाता है, तो उसकी ख़ुशी भी अलग ही होती है. अपनों की ख़ातिर इतना तो किया ही जा सकता है.

अपेक्षाओं के ओवरडोज़ से बचें: कुछ एक्स्ट्रा करके अपनों की अपेक्षाएं अक्सर बढ़ने लगती हैं, लेकिन यह ध्यान रखें कि आप इसकी आदत न डालें, वरना उस एक्स्ट्रा एफर्ट को लोग आपकी ड्यूटी समझने लगेंगे और जब कभी आप इसे पूरा करने में चूकेंगे, तो उन्हें लगेगा कि आप अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निबाह रहे. इसी तरह से आप भी अपनी अपेक्षाओं का दायरा थोड़ा-सा सीमित ही रखें, यदि कोई आपके लिए एक्स्ट्रा एफर्ट लेकर कुछ कर रहा है, तो हमेशा उससे यही उम्मीद न लगाकर बैठें. अगर किन्हीं कारणों से कोई आपकी अपेक्षाओं पर उतना खरा नहीं उतर पा रहा, तो उसकी परेशानियों व परिस्थितियों को समझने का प्रयास करें. ख़ुद को उसकी जगह पर रखकर सोचें. इस तरह रिश्ते हमेशा सकारात्मक बने रहेंगे और उनमें तक़रार की संभावनाएं भी कम होंगी.

– विजयलक्ष्मी

पति-पत्नी का ख़ूबसूरत रिश्ता. जुड़ जाता है ज़िंदगीभर का साथ और हर सुख-दुख में साथ निभाने के वादे, लेकिन हर संभव व मुमकिन कोशिश के बावजूद इनके बीच छोटी-छोटी तक़रारें और तू-तू-मैं-मैं हो ही जाती है. तो चलिए, जानते हैं, पति-पत्नी की खट्टी-मीठी शिकायतें. 

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पत्नियों की आम शिकायतें
  • मूड तो सुबह इनके आलस्य से ही उखड़ जाता है. चाय गरम कीजिए, उठने में इतना आलस्य कि ठंडी हो जाती है. चाय के साथ पेपर भी चाहिए. फिर चाय ठंडी हो जाती है और फिर एक कप गरम प्याली के लिए आप अपने सब काम छोड़कर चाय बनाते रहिए. सुनते रहिए, जल्दी करो लेट हो रहा हूं.
  • ऑफ़िस जानेवाले पतियों को मोजे, घड़ी, रुमाल जैसी चीज़ों के लिए भी पत्नी की मदद चाहिए.
  • बहुत बुरा लगता है, जब शाम को आकर पूछते हैं, क्या करती रही दिनभर? मैं तो सुबह ही निकल गया था. पलंग पर पड़ा गीला तौलिया सुखाना, आलमारी लगाना, खाना बनाना, कपड़े धोना, घर के अनेक काम क्या कोई और कर जाता है.
  • ऑफ़िस में काम ये करें. जी हुज़ूरी हम बजाएं. ज़रा मेरी डायरी से एक नंबर देना, ज़रा अमुक फाइल से फलां एड्रेस देना और अगर फ़ोन उठाने में देर हो गई, तो कहां गई थी? किसके साथ बिज़ी थी? जैसे हज़ार सवाल.
  • अपने माता-पिता के आदर्श बेटे ये कहलाते हैं. पर शादी के बाद इनका फ़र्ज़ इतना रह जाता है कि पत्नी से पूछते रहें- अम्मा-बाबूजी ने खाना खा लिया? उन्हें दवा दे दी, डॉक्टर से बात कर ली, उनका चश्मा ठीक करवा दिया आदि-आदि.
  • घर आते ही पति महोदय टीवी का रिमोट हाथ में ले लेते हैं और पत्नी को भी बड़े प्यार से पास बैठा लेते हैं. अब ये चैनल बदलते रहेंगे और आप इनका चेहरा देखती रहिए. जिस मिनट आपने कुछ देखना शुरू किया कि प्रोग्राम को बकवास कहकर चैनल बदल दिया जाएगा.
  • ये बीवी में अपनी मां की परछाईं क्यों ढूंढ़ते हैं. खाना आप बनाइए, लेकिन तारीफ़ में मां पुराण व मां के भोजन की गाथा. यहीं से शुरू होती है हमारी व्यथा कथा. कोई इन्हें समझाए, बच्चे नहीं हो, जो बात-बात पर मां… मां… पुकारते रहते हो.
  • बड़ी हंसी आती है, जब ख़ुद को सुपरमैन व महान समझते हैं और पत्नी को महामूर्ख.
  • इनके द्वारा किया गया हर पर्सनल ख़र्च ज़रूरी भी है और सही भी और पत्नी का हर पर्सनल ख़र्च फ़िज़ूलख़र्च. गाड़ी का सीट कवर ज़रूरी है, लेकिन पत्नी का मैचिंग सैंडल व्यर्थ का ख़र्च. इनका जवाब होता है कि कौन देखता है पैरों की सैंडल? तो क्या गाड़ी का कवर आता-जाता व्यक्ति झांक-झांककर देखता है.
  • स्टीयरिंग व्हील पर बैठकर ख़ुद को किसी महाराजा से कम नहीं समझते (जबकि ड्राइवर सीट पर बैठे हैं). जगह ढूंढ़ने में चार चक्कर भी लग जाएं, तो कोई बात नहीं, लेकिन पत्नी के कारण एक भी चक्कर ज़्यादा लग गया, तो तुरंत पेट्रोल के बढ़ते दाम याद दिलाने लगते हैं.
  • अपनी स्मार्टनेस को लेकर ग़लतफ़हमी का शिकार रहते हैं. सोचते हैं कि पड़ोसी की बीवी इन पर फ़िदा है. भले ही तोंद बड़ी हो और सिर के बाल नदारद हों.
  • बाप रे बाप! यदि किसी टूटी चीज़ को रिपेयर करने के मूड में आ जाएं, तो बस आप बार-बार खाना गरम कीजिए और इंतज़ार कीजिए. रिपेयर हो गई, तो कॉलर ऊंचा, वरना हर नाक़ामी की जड़ बीवी तो है ही.
  • शादी से पहले सभ्य, सुसंस्कृत या शेयरिंग-केयरिंग वाले होते हैं, लेकिन शादी के बाद तो बस, पति के अधिकार ही याद रह जाते हैं. मैं ज़रा ज़्यादा ही बड़ा हो जाता है.
  • बर्थडे या ख़ास दिन भूल जाना इनकी आदत में शुमार है. यदि पत्नी ने नाराज़गी ज़ाहिर कर दी, तो मनाना तो दूर, काम का ऐसा बहाना बनाते हैं कि बेचारी पत्नी अपराधबोध से घिर जाती है.
  • बीवी का मायका तभी तक अच्छा लगता है, जब तक साली हंसी-मज़ाक करे, ख़ातिर होती रहे. यदि पत्नी मायके में अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों या भाई-बहनों के बीच ज़्यादा एंजॉय करने लगे, तो मूड ऑफ होते देर नहीं लगती.
  • बीवी से उम्मीद करते हैं कि वो अपना ईमेल आईडी, पासवर्ड, बैंक स्टेटमेंट इन्हें बताए, लेकिन इनके मोबाइल के मैसेज पत्नी पढ़ ले, तो रास नहीं आता.
  • पत्नी से आशा रखते हैं कि वो शादी से पहले का अपना हर सीक्रेट शेयर करे, लेकिन अपने वर्तमान सीक्रेट्स की भी हवा नहीं लगने देते हैं.
  • तर्क में यदि पत्नी सही नज़र आती है, तो भी हार मानना गवारा नहीं. सुनने को मिलता है, चार पैसे क्या कमाने लगीं, बात-बात पर बहस करने लगी हो.
  • अपनी गर्लफ्रेंड्स के क़िस्से बड़ी शान से सुनाते हैं, लेकिन बीवी पड़ोसी या दोस्त की भी बात करे, तो शक की निगाह से देखते हैं.
  • यदि बच्चे कुछ अच्छा करते हैं, तो बड़ी शान से कहते हैं कि ङ्गमेरा बेटा/बेटी हैफ और यदि कुछ ग़लत कर बैठें तो तुम्हारी ट्रेनिंग है.

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Managing Relationship
सुनते हैं, पतियोंकी शिकायतें
  • बहाना बनाना और बेवकूफ़ बनाना कोई इनसे सीखे. हमारे रिश्तेदारों के आने की ख़बर से कब और कहां दर्द हो जाएगा अथवा कौन-सा बाहरी काम निकल आएगा, ब्रह्मा भी नहीं समझ सकते हैं.
  • इनकी नैगिंग और नकारात्मक सोच या बात काटने की आदत अच्छे-भले पति को भी नकारा साबित कर सकती है.
  • अपनी ख़ूबसूरती और मोटे-पतले की चिंता में दिनभर व्यस्त रहेंगी और पति को भी बोर करेंगी. घर में हमेशा डायटिंग चलती है, जबकि किसी पार्टी में मज़े से चाट-पकौड़ियां उड़ाई जाती हैं.
  • इंतज़ार कराना इनकी ख़ास ख़ूबी है. पार्टी में जाने के लिए पति तैयार बैठा इंतज़ार करता है, मैडम तय ही नहीं कर पाती हैं कि किस ड्रेस में ज़्यादा ख़ूबसूरत और पतली दिखेंगी. फ़िलहाल सामने आकर पूछें कि कैसी लग रही हूं? तो ङ्गबहुत सुंदरफ ही कहना पड़ता है, वरना इंतज़ार की घड़ियां और बढ़ जाएंगी.
  • दिनभर दुनियाभर की चकल्लस होती रहेगी, लेकिन पति के पास बैठते ही बात घूम-फिरकर पैसों पर क्यों आ जाती है, समझना मुश्किल है.
  • दूसरों की देखा-देखी नकल करना, इनका प्रिय शौक़ होता है. दूसरों का फ़र्नीचर, ज्वेलरी व कपड़े सब पसंद आते हैं. यहां तक कि सास-ननद और पति भी दूसरे के ज़्यादा अच्छे लगते हैं.
  • ख़ुद को सर्वगुणसंपन्न समझने की ग़लतफ़हमी सात फेरों के साथ ही पाल लेती हैं, तभी तो पति को सुधारने का बीड़ा उठा लेती हैं.
  • पड़ोसी या अपनी कलीग से पति की तुलना करना इनकी दिनचर्या में शामिल है. कुछ कहो, तो बाल की खाल निकालकर रख देती हैं.
  • इनका मूड बदलते देर नहीं लगती है. कल तक मिसेज़ चतुर्वेदी बहुत अच्छी पड़ोसन थी, लेकिन यदि पति ने भी उनकी प्रशंसा में दो शब्द जोड़ दिए, तो पड़ोसन से मेल-मिलाप औपचारिक हो जाता है. साथ ही पति को भी सख़्त हिदायत कि उनकी बात न करें.
  • महिलाओं की छठी इंद्रिय की खोज जिस किसी ने भी की, उसे दाद देनी पड़ेगी. यदि पति से कोई भूल या ग़लती हो जाए और वो पत्नी को बताए, तो रिएक्शन होगा, मुझे पहले ही पता था कि तुम कुछ ऐसा ही करोगे.
  • इनका मायका पुराण या पापा चाहते हैं, भैया कहते हैं सुन-सुनकर कान पक जाते हैं. यह ज़िंदगी का सबसे बोरिंग अध्याय है.
  • ऑफ़िस जाते समय बड़े प्यार से पूछेंगी, डिनर में क्या खाओगे? यदि आपने उत्साहपूर्वक पिज़्ज़ा या आलू परांठे की इच्छा ज़ाहिर कर दी, तो आपका वज़न और उनकी कैलोरीज़ गिना-गिनाकर पेट भर देंगी. बनेगा वही, जो इनकी सुविधा के अनुसार होगा. तो फिर पूछती ही क्यों हैं?
  • इनकी जासूसी और तर्क के आगे तो बड़े-बड़े जासूस भी गच्चा खा जाएं. कहां, किसके साथ, क्यों, कब का जवाब देते समय सावधान रहना पड़ता है या फिर बगलवाले शर्माजी तो समय से घर आ गए थे, आपको क्यों देर हुई? रास्ता तो एक ही है… जैसे प्रश्‍नों के लिए तैयार रहना पड़ता है.
  • इनकी शॉपिंग और विंडो शॉपिंग मेनिया से भगवान ही बचाए. ना कहना भी ख़तरे से खाली नहीं और हां कहना भर मुसीबत है. 10-15 रुपए के लिए दुकानदार से झिक-झिक करेंगी, ना माने तो दुकान से निकल लेंगी. शरमा-शरमी में हमें भी दुकानदारों से नज़रें चुराते हुए पीछे-पीछे निकलना पड़ता है.
  • कपड़े कितने भी हों, लेकिन जब कहीं जाना हो, तो क्या पहनूं? और बहुत समय से आपने कुछ दिलाया नहीं का रोना पतियों को सुनना ही पड़ता है.
  • जाने कहां-कहां से रेसिपीज़ बटोरकर पति पर आज़माना इनका बड़ा प्यारा-सा ख़तरनाक शौक़ है और फिर उम्मीद यह कि पति तारीफ़ भी करे.
  • बात मनवाने का इनका बड़ा ही प्रभावशाली अस्त्र है आंसू, जो हमेशा गंगा-जमुना की तरह आंखों में भरे ही रहते हैं.
  • चीज़ों को यथास्थान रखने और सफ़ाई करने का भूत चौबीसों घंटे इनके सिर पर सवार रहता है. पति द्वारा सामान बिखेरने पर ताने-उलाहनों का दौर चल पड़ता है, लेकिन यदि भाई कमरे में सामान फैलाकर छोड़ दे, तो बड़े दुलार से कहेंगी, भैया का बचपना अभी भी गया नहीं.
  • जन्मदिन या सालगिरह भूल जाने पर इतनी इमोशनल क्यों हो जाती हैं? हर साल तो आती है, यदि भूल गए, तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ा?
  • इनकी कमाई पॉकेटमनी और हमारी कमाई घर ख़र्च के लिए है. यदि कम पड़ती है, तो हमारे हर शौक़ पर टीका-टिप्पणी शुरू हो जाती है.

– प्रसून भार्गव

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दर्द की गहराइयां, इश्क़ की रुसवाइयां… तल्ख़ हो चले हैं रिश्ते अब… ओढ़ ली हैं सबने तन्हाइयां… अपने ही दायरों में कैद हो गए हम, गढ़ ली हैं अपनी ही वीरानियां… आज़ादपरस्त ख़्यालों में ख़ुद को बुलंदी पर समझने का ये कुसूर, जैसे कर रहे हों हम अपने ही वजूद से बेईमानियां..

Taboos and Relationships.
आगे बढ़ना, क़ामयाबी की नई मंज़िलें तय करना न स़िर्फ ज़रूरी है, बल्कि मजबूरी भी है. इस मजबूरी के साथ जीना ही बदलती लाइफ़स्टाइल का संकेत है. समाज बदला, सोच में फ़र्क़ आया और हमने भी अपने दायरे बदल दिए. परंपरा के नाम पर रूढ़िवादी सोच को अपने ज़ेहन से निकाल फेंकने का साहस भी जुटाया और बहुत हद तक इसमें क़ामयाबी भी हासिल कर ली है और यहीं से शुरू हुआ वर्जनाओं के टूटने का सिलसिला.
हालांकि यह इस बदलाव का एक सकारात्मक पहलू है, लेकिन इन टूटती वर्जनाओं में कहीं न कहीं हमारा कुछ छूट रहा है, जिसका प्रभाव हमारे सिसकते, दम तोड़ रहे रिश्तों में अब नज़र आने लगा है. एक नज़र डालते हैं इन्हीं टूटती वर्जनाओं और उनका हमारे रिश्तों पर. पड़नेवाले प्रभाव पर-

कौन-सी वर्जनाएं टूटीं?
*    सबसे बड़ा बदलाव यही आया कि महिलाएं अब शिक्षित होने लगीं. किसी भी समाज की तरक़्क़ी के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि उस समाज की महिलाओं का स्तर ऊपर उठे.
*    महिलाएं न स़िर्फ शिक्षित हुईं, बल्कि घर की दहलीज़ लांघकर अपनी क़ाबिलियत हर क्षेत्र में साबित की.
*    घर और बाहर की दोहरी भूमिकाएं भी बख़ूबी निभाने लगीं.
*    स्त्री-पुरुष मित्रता अब आम हो गई.
*    शादी जैसी सामजिक प्रथा अब व्यक्तिगत निर्णय में तब्दील हो गई.
*    लिव-इन रिलेशनशिप्स अब कोई नई बात नहीं रही.
*    सेक्स पर लोगों के विचार ज़्यादा खुले हो गए. अब इस पर चर्चा भी वर्जित नहींमानी जाती.
*    उम्र का बंधन अब किसी भी चीज़ के लिए नहीं रहा, चाहे शादी ही क्यों न हो.
*    शादी न करने के ़फैसले को भी अब स्वीकृति मिलने लगी है.
*    सिंगल पैरेंट्स, तलाक़शुदा को भीसमाज में उचित सम्मान और महत्वमिलने लगा है.
*    विवाहेतर संबंधों को अब लोग खुलेआम स्वीकारने लगे हैं.
*    क़ामयाबी, परंपरा, संस्कारों के मायने बदल गए हैं.

रिश्तों पर प्रभाव
*    संकोच के पर्दे जब उठे, तो रिश्तों की मर्यादाएं भी तार-तार होने लगीं.
*    रिश्ते अब तेज़ी से टूटने लगे हैं.
*    कॉम्प्रोमाइज़ जैसे शब्द रिश्तों की डिक्शनरी से ग़ायब होते जा रहे हैं.
*    आर्थिक आत्मनिर्भरता ने हर किसी की सहनशक्ति को कम कर दिया है.
*    बात स़िर्फ पति-पत्नी के रिश्ते की ही नहीं है, बल्कि भाई-बहन, बच्चे-पैरेंट्स के बीच भी मान-मर्यादा के मायने बदल गए हैं.
*    यह सकारात्मक बात है कि अब बच्चे-पैरेंट्स, भाई-बहन या पति-पत्नी के बीच औपचारिकताएं न होकर दोस्ताना रिश्ते रहते हैं, लेकिन कहीं न कहीं इन ख़त्म होती औपचारिकताओं ने ही इन रिश्तों के बीच का सम्मान भी ख़त्म कर दिया है.
*    बच्चे पैरेंट्स की सुनते नहीं, पति-पत्नी की बनती नहीं और भाई-बहन के रिश्तों में अब वो लगाव नहीं रहा.
*    प्रैक्टिकल सोच के चलते भावनाएं महत्वहीन होती जा रही हैं.
*    यही वजह है कि आज भीड़ में होते हुए भी हम सब शायद कहीं न कहीं तन्हा हैं.
*   पार्टनर है, मगर अपनी ज़िंदगी में व्यस्त. वे अपनी सहूलियत और आवश्यकतानुसार ही एक-दूसरे को वक़्त देते हैं.
*    हम सभी को रिश्तों में अब स्पेस चाहिए.
*    टीनएज प्रेग्नेंसी बढ़ती जा रही है.
*    युवाओं में सिगरेट-शराब स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है.
*    किशोरों में भी सेक्सुअल बीमारियां आम होती जा रही हैं.
*    फ्री सेक्स अब मॉडर्न होने का पैमाना बनता जा रहा है.
*    आपराधिक प्रवृत्ति पनपने व बढ़ने लगी है. यही वजह है कि ऐसी घटनाएं आम होती जा रही हैं कि कहीं पति ने अपनी पत्नी की, तो कहीं किसी बेटे ने अपनी मां की ही हत्या कर दी.

विशेषज्ञों की राय में
*    सबसे अहम् बात कि आज लोग यह सोचते हैं कि स़िर्फ सेक्स की ज़रूरत को  पूरा करने के लिए शादी जैसी बड़ी ज़िम्मेदारी को क्यों ओढ़ा जाए?
*    हम अपने रिश्तों को अब कम अहमियत देने लगे हैं. हमारे रिश्तों की उम्र छोटी होती जा रही है, उनके मायने बदल रहे हैं. वो अब अधिकतर स़िर्फ शारीरिक आकर्षण पर ही आधारित होते हैं और विशेषज्ञों का तो यहां तक मानना है कि वो दिन भी दूर नहीं जब रिश्ते भी यूज़ एंड थ्रो की तर्ज़ पर बनने लगेंगे.
*    हम अपने रिश्तों पर काम करना ही नहीं चाहते. अगर वो थोड़े भी बिगड़ते हैं, तो हम फौरन भाग खड़े होते हैं. न वक़्त देते हैं, न कोशिश करते हैं कि रिश्ते ठीक हो जाएं.

कैसे जानें कि रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं?
*    अगर आपका पार्टनर आपको कम समय देने लगे.
*    दूसरों के साथ ज़्यादा एंजॉय करने लगे. यानी आपका वक़्त और आपकी जगह जब दूसरे लेने लगें, तो समझ जाएं कि सब कुछ ठीक नहीं.
*    बात करते वक़्त आई कॉन्टैक्ट कम रखे या न रखे.
*    बात-बात पर या किसी भी विषय पर बात करते वक़्त चर्चा न होकर बहस होने लगे.
*    हर चीज़ में कमी निकालने लगे.
*    सेक्स लाइफ़ पर भी प्रभाव पड़ने लगे.

अन्य रिश्तों पर प्रभाव
*    कम्युनिकेशन गैप बढ़ता जा रहा है.
*    पैरेंट्स और बच्चों के बीच की दूरियां और टकराव भी बढ़ रहा है.
*    अपने तरी़के से जीने की ज़िद में किसी की सीख, मार्गदर्शन अपनी ज़िंदगी में अब दख़लअंदाज़ी लगने लगा है.
*    बच्चों को पैरेंट्स अगर मनमानी नहीं करने देते, तो उनकी नज़र में वो आउटडेटेड हो गए हैं.
*    पैसे और भौतिक सुविधाएं ही महत्वपूर्ण हो गई हैं.
*    भावुक होना कमज़ोरी की निशानी मानी जाने लगी और स्वार्थी होने में अब किसी को बुराई नहीं नज़र आती.

रिश्तों को कैसे बचाया जाए?
दरअसल हम ही यह तय करते हैं कि हम और हमारे रिश्ते हर पल, हर घड़ी कैसे रहेंगे? अगर हम अपने रिश्तों को बदलना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमें बदलना होगा. वक़्त के साथ हम बदले, तो हमारे रिश्ते भी बदल गए और अब अगर इन रिश्तों को संभालना है, तो भी हमें ही बदलना होगा.
*    रिश्तों को वक़्त दें.
*    साथ में समय गुज़ारें.
*    स्पेस दें, भरोसा करना सीखें.
*    कॉम्प्रोमाइज़ करना सीखें.
*    सहनशीलता न खोएं.
*    सामने वाले की कुछ ग़लतियों व आदतों को नज़रअंदाज़ करना भी सीखें.
*    प्यार और सम्मान की भावना बनाए रखें.
ऐसा नहीं है कि टूटती वर्जनाओं का नकारात्मक प्रभाव ही हुआ है, बल्कि बहुत-से सकारात्मक बदलाव सामाजिक तौर पर भी और व्यक्तिगत तौर भी हमने महसूस किए, लेकिन शायद हमने अपनी आज़ादी को अलग दिशा दे दी, यही वजह है कि इसका ख़ामियाज़ा हमारे रिश्ते भुगत रहे हैं. अगर रिश्तों को संभाल लिया जाए, तो वर्जनाएं टूटने पर भी रिश्ते नहीं छूटेंगे.

– गीता शर्मा

लोग क्या कहेंगे का डर क्यों नहीं निकलता जीवन से? (Stop Caring What Others Think)

एक व़क़्त था, जब तेज़ बाइक चलाते, सिगरेट का धुंआ उड़ाते, धमाल मचाते  लड़कों की ओर ही लड़कियां आकर्षित हुआ करती थीं. लेकिन अब लड़कियों की पसंद बदल गई है. ऐसे लड़कों से वे दोस्ती करना तो चाहती हैं, लेकिन जब बात आती है प्यार और शादी  की, तब उन्हें अपने से बड़ी उम्र के मैच्योर  व्यक्ति ही पसंद आते हैं.

Reasons for extra marital affairs

 लड़कियां विवाहित लड़कों की ओर क्यों आकर्षित हुआ करती हैं?

लड़कियों का विवाहित पुरुषों के प्रति पहला आकर्षण अक्सर जीजा, भाई के दोस्त या सहेली के पति से ही होता है. चूंकि लड़की अपने परिवार में इन्हें बहुत क़रीब से देखती है, इसलिए उनके प्रति आकर्षण बढ़ जाता है. यही कारण है कि कई बार लड़की को अपने ही कॉलेज के किसी शादीशुदा प्रो़फेसर से प्यार हो जाता है या ऑफ़िस में बॉस से.

–  शादीशुदा लड़कों में गंभीरता होती है, जो नवयुवकों में नहीं होती.

–  विवाहित पुरुष अनुभवी होते हैं, जिससे उनमें परिपक्वता और विचारों की स्थिरता आ जाती है, जो लड़कियों को उनकी ओर आकर्षित करती है.

– पिता, भाई और जीजा को अपना आदर्श मानने वाली लड़कियों में कहीं न कहीं यह ख़्वाहिश होती है कि उसे प्यार में सुरक्षा मिले, जो बड़ी उम्र के व्यक्ति के साथ  ज़्यादा संभव है.

– कॉलेज के ये जोशीले लड़के सेक्स को लेकर बहुत उतावले होते हैं. वे लड़कियों पर सेक्स करने के लिए दबाव डालते रहते हैं, जो लड़कियों को उचित नहीं लगता.

– आजकल के लड़कों में अहं की भावना बहुत ज़्यादा है. अपने अहं के अंधेपन में दूसरों का मान-सम्मान न करना, किसी की भी कोमल भावनाओं को ठेस पहुंचाना जैसे उनकी आदत-सी है. इसलिए भी लड़कियां उनसे कतराती हैं.

– शादीशुदा लड़के मैच्योर होने के कारण विपरीत परिस्थितियों में भी सहज रहते हैं. इसके विपरीत आजकल के लड़कों में सहनशीलता की कमी होती है. उनके मूड का पता ही नहीं चलता. वे कब और कहां उलझ पड़ें, इसका ठिकाना नहीं होता.

– जी हां, यह वाक्य अक्सर युवाओं के मुंह से सुनाई दे जाता है कि ये मेरी लाइफ़ है और मैं जैसे चाहूं इसे जिऊं. इसमें हस्तक्षेप करनेवाला कोई होता कौन है? लड़कियों को लड़कों का ये मनमाना रवैया अच्छा नहीं लगता.

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रिश्ते में बनाएं मर्यादा

– प्यार पर किसी का बस नहीं. यह तो किसी से भी हो सकता है. यदि विवाहित पुरुष से आपका रिश्ता बन गया है तो कई बातों का ध्यान रखें.

– यदि आप किसी विवाहित  पुरुष की ओर आकर्षित हैं और रिश्ता स़िर्फ दोस्ती तक सीमित है तो इस बात को भी ध्यान में रखें कि विवाहित पुरुष का अपना एक परिवार है, इसलिए रिश्ते की मर्यादा बनाए रखें.

– यदि आपका रिश्ता एक प्रेमी-प्रेमिका का है तो सबसे पहले यह सोचें कि आप अपने रिश्ते को क्या मुकाम देना चाहते हैं.

– यह अच्छी तरह जांच-परख लें कि क्या आपका विवाहित प्रेमी वाकई अपनी पत्नी से परेशान है? क्या आपकी ख़ातिर उसका पत्नी को तलाक़ देना उचित है?

– यदि वह तलाक़ नहीं देना चाहता, तो ज़बरदस्ती न करें. क्योंकि वह ऐसा करके आपके साथ भी ख़ुश नहीं रह पाएगा. अब यह आप पर निर्भर करता है कि बिना शादी किए उसके साथ संबंध बनाए रखना चाहती हैं या फिर कुंआरे के साथ जुड़ना चाहती हैं. रिश्ता जो भी बनाएं, उसे संजीदगी से निभाएं.

– विजन कुमार पांडेय

 

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