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रिश्तों में ज़रूरत से ज़्यादा स्पेस कहीं कर न दे अपनों को दूर…(Too much space in relationships can be dangerous)

Space in relationships

कभी हाथों में थामे हाथ, तो कभी लबों पर बस तेरी ही बात… धीरे-धीरे ख़्वाब छूटे… लबों पर बसे जज़्बात छूटे… दिल की हसरतें बाकी तो हैं अभी, पर न जाने किस मोड़ पर कुछ एहसास छूटे… न तुमको ख़बर हुई, न हमें पता चला… कब साथ चलते-चलते हमारे हाथ छूटे…

Space in relationships

अक्सर ऐसा होता है कि हम अपने रिश्ते में समझ ही नहीं पाते कि कब और कैसे इतनी दूरियां (Space in relationships) आ गईं, जबकि पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यही लगता है कि सब कुछ तो ठीक ही था… जी हां, ऐसा इसलिए होता है कि हम सो कॉल्ड स्पेस के नाम पर कुछ ज़्यादा ही दूरियां बना लेते हैं और कब ये दूरियां रिश्तों को ख़त्म करने लगती हैं, हमें एहसास ही नहीं होता.

अति किसी भी चीज़ की सही नहीं: चाहे कोई अच्छी ही चीज़ क्यों न हो, पर ओवरडोज़ किसी भी चीज़ का सही नहीं है.

– यह ठीक है कि आपको बार-बार पार्टनर को टोकना या उसके किसी भी काम में दख़ल देना पसंद नहीं, लेकिन इसका यह भी अर्थ नहीं कि बिल्कुल ही न टोकें.

– हो सकता है आपके न टोकने का कोई ग़लत मतलब निकाल ले. इससे न स़िर्फ रिश्ते में दूरियां बढ़ेंगी, बल्कि नीरसता भी आएगी.

– पार्टनर को लगेगा कि आपको तो उनकी किसी भी बात से कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता और दूसरी तरफ़ यह भी हो सकता है कि वो ग़लत राह पर भी चले जाएं.

विश्‍वास और अंधविश्‍वास के बीच का फ़र्क़ समझें: आप एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, यह अच्छी बात है. लेकिन चेक कर लें कि कहीं यह विश्‍वास अंधविश्‍वास में तो तब्दील नहीं हो गया?

– जी हां, अक्सर ऐसा ही होता है, जब हम आंख मूंदकर भरोसा करते हैं, तो भरोसा टूट भी सकता है. और तब बहुत अधिक तकलीफ़ होती है और इस बात का मलाल भी कि क्यों नहीं थोड़ी-सी सतर्कता व सावधानी बरती.

स्पेस का मतलब लापरवाह होना नहीं: हर बात पर आजकल यह जुमला चिपका दिया जाता है कि हर रिश्ते में स्पेस ज़रूरी है, लेकिन स्पेस कितना और किस हद तक, इसका दायरा भी तो हमें ही तय करना होगा.

– स्पेस के नाम पर आप अपने रिश्ते के प्रति इतने लापरवाह न हो जाएं कि एक-दूसरे की तरफ़ ध्यान ही न दें और धीरे-धीरे रिश्ते में से रोमांस ही गायब हो जाए.

कम्यूनिकेशन न के बराबर ही तो नहीं रह गया: यह सही है कि दिनभर जासूसों की तरह पार्टनर की ख़बर या उस पर नज़र रखना ठीक नहीं, लेकिन ख़बर ही न रखना ख़तरे की निशानी है.

– ऐसे में कम्यूनिकेशन गैप इस हद तक बढ़ जाता है कि यदि आप कुछ सवाल करते भी हैं, तो पार्टनर को वो दख़लअंदाज़ी लगने लगता है, क्योंकि उसको आदत ही नहीं इसकी.

स्पेस का सही अर्थ समझें: स्पेस का मतलब रिश्ते के प्रति बेपरवाह हो जाना नहीं होता.

– स्पेस(Space in relationships) उतना ही होना चाहिए, जितना रिश्ते को सांस लेने के लिए ज़रूरी हो. उसे खुली हवा में छोड़ देंगे, तो वो बेलगाम पतंग की तरह छूटता ही जाएगा.

– आजकल अक्सर कपल्स अपने-अपने फोन्स पर, विभिन्न सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बिज़ी रहते हैं और दोनों ही पार्टनर्स को इसमें दिलचस्पी कम ही रहती है कि उसका पार्टनर कहां किसके साथ बिज़ी है.

– फोन नहीं, तो लैपटॉप्स या टीवी देखने में लोग अधिक समय बिताना पसंद करते हैं, बजाय एक-दूसरे के साथ के.

– डिजिटल वर्ल्ड ने भी हमें स्पेस के नाम पर बहुत ज़्यादा ओपन स्पेस दे दिया है, जहां हम अपने रिश्तों से दूर होते जाते हैं और नए-नए रिश्तों के जाल में फंसते चले जाते हैं.

– बेहतर होगा इससे बचें या कम से कम इस पर नज़र रखें.

छूट के नाम पर असंतुलित तो नहीं हो गया रिश्ता: आपको अंदाज़ा भी नहीं हो पाता कि कब आपका वो रिश्ता असंतुलित हो गया, जिसे आप अब तक परफेक्ट समझ रहे थे.

– इतना स्पेस दिया कि आप दोनों के बीच अब स़िर्फ स्पेस ही रह गया. बैलेंस या संतुलन बेहद ज़रूरी है हर रिश्ते के लिए.

– पार्टनर का डेली रूटीन, उसके फ्रेंड्स, वो किससे बात करता है, किसके मेल्स उसे आते हैं आदि बातों की कम से कम हल्की-सी जानकारी ज़रूर रखें.

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क्या करें, क्या न करें?

– एक-दूसरे पर भरोसा करें, लेकिन आंखें न मूंद लें.

– इतने भी बेपरवाह न हो जाएं कि रिश्ते से रोमांस गायब होने लगे.

– रिश्ते में गर्माहट बनाए रखने के लिए रोमांटिक बातें करें, डेट्स प्लान करें.

– निजी पलों को जीने के लिए व़क्त ज़रूर निकालें. एक-दूसरे की कंपनी एंजॉय करें और कभी-कभी सरप्राइज़ भी दें.

– ऐसा न हो कि आप दोनों ही अपने-अपने फ्रेंड्स सर्कल के साथ ही पार्टी करते रह जाएं और यह भी याद न रहे कि आख़िरी बार आप दोनों ने साथ में व़क्त कब गुज़ारा था.

– अगर आपको लग रहा है कि आपका रिश्ता पहले जैसा नहीं रहा, तो उसके कारणों पर आपस में बैठकर चर्चा करें और समाधान भी निकालें.

– थोड़ी रोक-टोक और दख़लअंदाज़ी रिश्तों में जीवंतता बनाए रखती है. इसे रिश्तों से गायब न होने दें.

Space in relationships

हर रिश्ते पर यही नियम लागू होता है

– चाहे पैरेंट्स हों, भाई-बहन, दोस्ती या अन्य कोई भी रिश्ता, ज़रूरत से ज़्यादा स्पेस आपके बीच दूरियां ही बढ़ाएगी.

– अगर पैरेंट्स बच्चों को ज़रूरत से ज़्यादा स्पेस देते हैं, तो हो सकता है वो भटक जाएं.

– बच्चों को अनुशासन में रखना उनकी ज़िम्मेदारी है, कुछ नियम और निर्देशों का पालन हर रिश्ते में ज़रूरी होता ही है, वरना प्रतिबद्धता और रिश्ते में भरोसा रह ही नहीं जाता.

– लेकिन आज की जनरेशन इसी अनुशासन को निजी जीवन में दख़लअंदाज़ी मानती है, जिससे सीमा रेखा तय करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है.

– एक व़क्त था, जब भाई-बहन या सिबलिंग्स आपस में बहुत-से सीक्रेट्स शेयर करते थे, लेकिन अब ‘स्पेस’ के नाम पर सब कुछ सीक्रेट ही रह जाता है और अगर किसी से कुछ पूछो, तो जवाब यही मिलता है कि ये हमारी पर्सनल लाइफ है, आख़िर हमें भी तो स्पेस चाहिए. 

– इसी चक्कर में एक व़क्त ऐसा आता है, जब स़िर्फ स्पेस ही रह जाता है. बेहतर होगा, व़क्त रहते इस स्थिति को समझें और अपने रिश्ते को सेफ करें.

– गीता शर्मा

रिश्तों में ग़लतफ़हमियों को कैसे करें हैंडल? (How to handle misunderstandings in relationship)

misunderstandings in relationship

छोटी-सी भी ग़लतफ़हमी रिश्ते में कड़वाहट ला सकती है, इसलिए बेहतर होगा कि रिश्ते में ग़लतफहमियां (misunderstandings in relationship) न आने दें और अगर आ ही गई हैं तो उसे फौरन दूर कर लें. आमतौर पर ग़लतफ़हमी का अर्थ होता है- ऐसी स्थिति जब कोई व्यक्ति दूसरे की बात या भावनाओं को समझने में असमर्थ होता है और जब ग़लतफ़हमियां बढ़ने लगती हैं, तो वे झगड़े का रूप ले लेती हैं, जिसका अंत कभी-कभी बहुत भयावह होता है.

पार्टनर की भावनाओं को न समझ पाना

ग़लतफ़हमी(misunderstandings in relationship) किसी कांटे की तरह होती है और जब वह आपके रिश्ते में चुभन पैदा करने लगती है, तो कभी फूल लगनेवाला रिश्ता आपको खरोंचे देने लगता है. जो जोड़ा कभी एक-दूसरे पर जान छिड़कता था, एक-दूसरे की बांहों में जिसे सुकून मिलता था और जो साथी की ख़ुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था, वो जब ग़लतफ़हमी का शिकार होने लगता है, तो रिश्ते की मधुरता व प्यार को नफ़रत में बदलते देर नहीं लगती. फिर राहें अलग-अलग चुनने के सिवाय उनके पास कोई विकल्प ही नहीं बचता.
रिलेशनशिप एक्सपर्ट निवेदिता माथुर के अनुसार, “जीवनसाथी को मेरी परवाह नहीं है या वह स़िर्फ अपने बारे में सोचता है, इस तरह की ग़लतफ़हमी होना कपल्स के बीच एक आम बात है. अपने पार्टनर की प्राथमिकताओं और सोच को ग़लत समझना बहुत आसान है, विशेषकर जब बहुत जल्दी वह नाराज़ या उदास हो जाते हों और कम्यूनिकेट करने के बारे में केवल सोचते ही रह जाते हों. असली द़िक्क़त यह है कि अपनी तरह से साथी की बात का मतलब निकालना या अपनी बात कहने में ईगो का आड़े आना, धीरे-धीरे फलता-फूलता रहता है और फिर इतना बड़ा हो जाता है कि ग़लतफ़हमी झगड़े का रूप ले लेती है. एक बार जब हम कम्यूनिकेशन न करने के निगेटिव चक्र में फंस जाते हैं, तो उसमें से निकलने या उसे सुधारने में बहुत व़क्त लग जाता है.”

क्यों होती है ग़लतफ़हमी?

धोखा- यह सबसे आम वजह है. यह तब पैदा होती है, जब एक साथी यह मानने लगता है कि उसके साथी का किसी और से संबंध है. ऐसा वह बिना किसी ठोस आधार के भी मान लेता है. हो सकता है कि यह सच भी हो, लेकिन अगर इसे ठीक से संभाला न जाए, तो निश्‍चित तौर पर यह विवाह के टूटने का कारण बन सकता है. जब भी आपको महसूस हो कि आपका साथी किसी उलझन में है और आपको शक भरी नज़रों से देख रहा है, तो तुरंत सतर्क हो जाएं. हो सकता है आपका किसी से हंसकर बोलना या अपने कलीग की तारीफ़ करना ग़लतफ़हमी पैदा कर रहा हो. ऐसा संकेत मिलते ही पार्टनर से बात करें और बताएं कि किसी को दोस्त कहना या उसके साथ ज़्यादा व़क्त गुज़ारने का मतलब विवाहेतर संबंध नहीं होता. याद रखें, चाहे पति हो या पत्नी- दोनों ही अपनी-अपनी तरह से पार्टनर को लेकर पज़ेसिव होते हैं और इस बात का सम्मान करें.

स्वार्थी होना- पति-पत्नी के रिश्ते को मज़बूत बनाने और एक-दूसरे पर विश्‍वास करने के लिए ज़रूरी होता है कि वे एक-दूसरे से कुछ न छिपाएं और हर तरह से एक-दूसरे की मदद करें. जब आपके पार्टनर को आपकी ज़रूरत हो, तो आप वहां मौजूद हों. ग़लतफ़हमियां(misunderstandings in relationship) तब बीच में आ खड़ी होती हैं, जब आप सेल्फ सेंटर्ड होते हैं. केवल अपने बारे में सोचते हैं. ज़ाहिर है, तब आपका पार्टनर कैसे आप पर विश्‍वास करेगा कि ज़रूरत के समय आप उनका साथ देंगे या उनकी भावनाओं का मान रखेंगे.

ज़िम्मेदारियों को निभाने से कतराना- जब कभी पार्टनर अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने या उठाने से कतराता है, तो ग़लतफ़हमी(misunderstandings in relationship) पैदा होने लगती है. ऐसे सवाल मन में उठना तब स्वाभाविक होता है- क्या वह मुझे प्यार नहीं करता? क्या उसे मेरा ख़्याल नहीं है? क्या वह मजबूरन मेरे साथ रह रहा है? ग़लतफ़हमियां आपके बीच न आएं इसके साथ पति-पत्नी दोनों को अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियां ख़ुशी से उठानी चाहिए. मैरिज काउंसलर्स मानते हैं कि रिश्ता ज़िंदगीभर कायम रहे, इसके लिए तीन मुख्य ज़िम्मेदारियां अवश्य निभाएं- जीवनसाथी से प्यार करना, उस पर गर्व करना और अपने रिश्ते को बचाना.

वर्क और कमिटमेंट- आजकल जब महिलाओं का कार्यक्षेत्र घर तक न रहकर विस्तृत हो गया है और वह हाउसवाइफ की परिधि से बाहर निकल आई हैं, ऐसे में पति के लिए आवश्यक है कि वह उसके काम और कमिटमेंट को समझे और कद्र करे. बदली हुई परिस्थितियों में उन्हें पूरा सहयोग दे. रिश्ते में आए इस बदलाव को हैंडल करना पति के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है, क्योंकि यह बात आज के समय में ग़लतफ़हमी(misunderstandings in relationship) की सबसे बड़ी वजह बनती जा रही है. इसके लिए दोनों को ही एक-दूसरे के काम के कमिटमेंट्स के बारें में डिस्कस कर उसके अनुसार ख़ुद को ढालना होगा.

misunderstandings in relationship

मेरी परवाह नहीं है- पति या पत्नी किसी को भी ऐसा महसूस हो सकता है कि उसके पार्टनर को न तो उसकी परवाह है और न ही वह उसे प्यार करता है. सच्चाई तो यह है कि विवाह ‘लविंग और केयरिंग’ के आधार पर टिका होता है. जब जीवनसाथी के अंदर ‘इग्नोर’ किए जाने या ग़ैरज़रूरी होने की फीलिंग आने लगती है, तब ग़लतफ़हमियों की दीवारें खड़ी होने लगती हैं.

दूसरों का हस्तक्षेप- जब दूसरे लोग, चाहे वे आपके ही परिवार के सदस्य हों या मित्र या रिश्तेदार हों, आपकी ज़िंदगी में हस्तक्षेप करने लगते हैं, तो ग़लतफ़हमियां खड़ी हो जाती हैं. ऐसे लोगों को कपल्स के बीच झगड़ा कराकर संतोष मिलता है और उनका मतलब पूरा होता है. यह तो सर्वविदित है कि आपसी फूट का फ़ायदा तीसरा व्यक्ति उठाता है. पति-पत्नी का रिश्ता चाहे कितना मधुर क्यों न हो, उसमें कितना ही प्यार क्यों न हो, पर असहमति या झगड़े तो फिर भी होते हैं और यह अस्वाभाविक भी नहीं है. जब ऐसा हो, तो किसी तीसरे के हस्तक्षेप करने की बजाय स्वयं उन मुद्दों को सुलझा लें, जो आपको परेशान कर रहे हों. याद रखें, अपनी समस्याएं केवल आप ही सुलझा सकते हैं, कोई तीसरा नहीं.

सेक्स को नज़रअंदाज़ न करें- सेक्सुअल रिलेशन वैवाहिक जीवन में ग़लतफ़हमी की सबसे अहम् वजह है. पति-पत्नी दोनों ही चाहते हैं कि उनका पार्टनर उन्हें प्यार करे और उसका साथ उन्हें ख़ुशी देता है. पार्टनर को पास आने दें. सेक्स लाइफ को एंजॉय करें. जब आप दूरियां बनाने लगते हैं, तो शक और ग़लतफ़हमी दोनों ही रिश्ते को खोखला करने लगती हैं. आपका साथी आपसे ख़ुश नहीं है या आपसे दूर रहना पसंद करता है, यह रिश्ते में आई सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी बन सकती है.

ग़लतफ़हमियों को दूर करने के उपयोगी ट्रिक्स

* अपने पार्टनर से नाराज़ होकर बोलचाल बंद करने की बजाय उससे बात करें. लेकिन उस समय जब वह सुनने के मूड में हो व परेशान या दुखी न हो. यदि वह क्रोधित हो, तो बात न छेड़ें और उनके तनावमुक्त होने का इंतज़ार करें.

* दोष न दें. जो हुआ उसके लिए साथी को दोषी न ठहराएं. ऐसा करने से वह आपकी बात सुनेंगे ही नहीं. जो हुआ, उससे कैसे निबटा जाए, इस पर बात करें.

* ग़लतफ़हमी को कुछ समय की नाराज़गी समझ नज़रअंदाज़ न करें. उसे तुरंत सुलझा लें.

* यदि ख़ुद सही ढंग से साथी से कम्यूनिकेट न कर पा रहे हों, तो मैरिज काउंसलर की मदद लें.

* अपने पार्टनर की बात को बहुत ध्यान व धैर्य से सुनें. बेशक आपको बुरा लग रहा हो, पर बात पूरी होने के बाद ही कुछ कहें या निर्णय लें. संवादहीनता रिश्तों को सबसे ज़्यादा खोखला करती है. जीवनसाथी के मन की बात जाने बिना आप उसे दोषी कैसे कह सकते हैं.

* अगर ग़लती हुई है, तो ‘सॉरी’ कहने में हिचकें नहीं. इस तरह से आप यह बताते हैं कि अपनी ग़लतियों की ज़िम्मेदारी उठाने में आप पीछे नहीं रहते हैं.

* माफ़ करने की आदत डालें. पार्टनर ने आपको ग़लत समझा, कोई बात नहीं. उसे माफ़ कर दें, क्योंकि आप दोनों ने बहुत अच्छा समय एक-दूसरे के साथ बिताया है.

* समझौतावादी बनें. शादी की सफलता व ख़ुशी दोनों की ही यह चाबी है. एक-दूसरे की भावनाओं व इच्छाओं का अगर सम्मान करते हैं, तो ग़लतफ़हमी होने का सवाल ही नहीं उठता. लेकिन उसके लिए आपको ख़ुद की भावनाओं और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना और समझौता भी करना होगा.

* जो हुआ उसे भूल जाएं. ग़लतफ़हमियां होती हैं, पर दूर भी हो जाती हैं, उन्हें याद दिलाकर जीवनसाथी को कोसे नहीं.

– सुमन बाजपेयी

पहचानें रिश्तों की लक्ष्मण रेखा (Earn to respect relationship and commitment)

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इंसानी ज़िंदगी में रिश्तों (Earn to respect relationship and commitment) की अहमियत से हम सभी वाक़िफ़ हैं, लेकिन शायद हम इस बात को कम ही समझते हैं कि हर रिश्ते की एक मर्यादा, एक लक्ष्मण रेखा होती है. इस लक्ष्मण रेखा को पार करते ही रिश्तों में दरारें आने का ख़तरा बनने लगता है, लेकिन दूसरी तरफ़ यदि इस रेखा को हम दीवार बनाने की भूल करते हैं, तो भी रिश्तों का बचना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि कैसे पहचानें अपने रिश्तों की लक्ष्मण रेखा को?

Earn to respect relationship and commitment

सम्मान: किसी भी रिश्ते के गहरे होने की पहली शर्त होती है सम्मान. स़िर्फ पति-पत्नी ही नहीं, तमाम रिश्तों से लेकर यारी-दोस्ती तक में एक-दूसरे के प्रति सम्मान बेहद अहम् है. हंसी-मज़ाक के दौरान भी यदि हम हद से आगे बढ़ जाते हैं, तो सामनेवाले को ठेस पहुंचती है. ऐसे में यह बात समझना ज़रूरी है कि हर चीज़ की हद होती है. अपने दायरों को लांघते ही जैसे ही हम हदों को पार कर जाते हैं, तो वहां सम्मान ख़त्म हो जाता है और रिश्तों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

अपनी सीमा ख़ुद निर्धारित करें: हम स्वयं इस बात को बेहतर समझते और जानते हैं कि किस रिश्ते की सीमा क्या है और कहां आकर हमें रुकना है. जिस वक़्त हम ये जानकर भी अपनी सीमा रेखा लांघते हैं, तब समस्या शुरू हो जाती है. अगर पति-पत्नी भी एक-दूसरे को हर बात पर टोकें और मज़ाक उड़ाएं, तो एक स्टेज पर आकर उन्हें एक-दूसरे से खीझ होने लगेगी और वो शिकायत करने लगेंगे कि अब उनके बीच वो सम्मान नहीं रहा.

मज़ाक करने और मज़ाक उड़ाने के बीच के अंतर को समझें: बहुत-से लोगों की आदत होती है कि वो बात-बात पर ताने मारते हैं और फिर कहते हैं कि हम मज़ाक कर रहे थे, पर जब यही मज़ाक कोई दूसरा उनके साथ करे, तो उन्हें बुरा लग जाता है. मज़ाक करने का अर्थ होता है कि दूसरों के चेहरे पर हंसी-मुस्कुराहट आए, न कि उन्हें आहत किया जाए. अक्सर यार-दोस्तों की महफ़िल में लोग एक-दूसरे से शरारत करते हैं, पर इस शरारत में यह ध्यान ज़रूर रखें कि कहीं किसी का दिल न दुखा दें आप.

मर्यादा बनाए रखने का यह मतलब नहीं कि कम्यूनिकेट ही न करें: अगर हमें बार-बार अपनी टोकने की आदत के बारे में कोई एहसास करवाए, तो हम अक्सर उस आदत को बदलने की बजाय यह तर्क देते हैं कि अगर तुम्हें मेरी बातें पसंद नहीं, तो बेहतर है हम बात ही न करें. यह अप्रोच बेहद ग़लत व नकारात्मक है. इससे रिश्तों में दीवारें पैदा होती हैं. अच्छा होगा कि आप बातचीत बंद न करें, बल्कि आपसी बातचीत को हेल्दी और पॉज़ीटिव बनाएं.

शब्दों का चयन सही करें: अपनों से बात करते वक़्त हम अक्सर अपने शब्दों के चयन पर ध्यान नहीं देते. हम यह सोचते हैं कि अपनों के साथ क्या औपचारिकता करना और इसी सोच के चलते हम अक्सर लक्ष्मण रेखा भूल जाते हैं. चाहे अपने हों या अन्य लोग, तमीज़ से, प्यार से बात करेंगे, तो सभी को अच्छा ही लगेगा. अपनों के साथ तो और भी सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि हमारे द्वारा कहा गया कोई भी कटु शब्द उन्हें ज़्यादा हर्ट कर सकता है, जिससे मन-मुटाव हो सकता है.

अपने निर्णय सब पर न थोपें: अगर आपने कोई निर्णय लिया है, तो सबकी राय और सहमति भी ले लें. अपना निर्णय सुना देना या अपनी ही मर्ज़ी सब पर थोपना भी रिश्तों की मर्यादा का उल्लंघन करना ही है. जिस बात से सब लोग सहमत न हों, उस पर दोबारा विचार करें या फिर सबको अपनी निर्णय की वजह बताकर कोशिश करें कि उन्हें आपके निर्णय से कोई आपत्ति न हो.

हर बात, हर चीज़ पर हक़ न जमाएं: बच्चे हैं, तो माता-पिता की हर चीज़ पर हक़ समझते हैं, भाई-बहन भी यही सोचते हैं कि हम एक-दूसरे की सारी चीज़ पर हक़ जमा सकते हैं और पति-पत्नी तो यह मानकर ही चलते हैं कि हमारी कोई चीज़ पर्सनल नहीं हो सकती. ऐसे में पर्सनल स्पेस खो जाती है और एक समय ऐसा आता ही है, जब हमें लगता है कि सामनेवाला अपनी सीमा रेखा लांघ रहा है. हर रिश्ते में स्पेस की ज़रूरत होती ही है और जब वो नहीं मिलती, तो घुटन होने लगती है और रिश्तों में दरार आने का डर बन जाता है.

किसी के निजी जीवन में बेवजह दख़लअंदाज़ी न करें: हम जब एक साथ रहते हैं, तो किसी का भी लेटर हो, ईमेल हो या फोन पर मैसेज हो, तो उसकी ग़ैरहाज़िरी में भी फौरन पढ़ने लगते हैं. यह व्यवहार ग़लत है. शिष्टता के चलते हमें ऐसा नहीं करना चाहिए, बल्कि सामनेवाले के आने का इंतज़ार करना चाहिए. उसके बाद वो ख़ुद-ब-ख़ुद बता ही देगा कि किसका पत्र या मेल है. अगर न भी बताए, तो इसका यह अर्थ नहीं कि आप उसे शक़ की निगाह से देखें. सबका निजी जीवन होता है, कुछ बातें ऐसी होती ही हैं, जो वो शायद इस वक़्त किसी से शेयर नहीं करना चाहता और आगे चलकर सही वक़्त आने पर करे. हर बात आपको जाननी ही है और सामनेवाला आपको बताए ही, यह कोई ज़रूरी नहीं.

अपने मन मुताबिक़ किसी को बदलने या व्यवहार करने को न कहें: आप अगर घर के मुखिया भी हैं, तो भी अपनी इच्छानुसार सबको व्यवहार करने की ज़िद न करें. हां, अगर कोई ग़लती कर रहा है, तो आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप उसे सही रास्ता दिखाएं, लेकिन तानाशाही रवैया अपनाकर सब पर एक ही नियम लागू करने का अर्थ है कि आप अपनी उम्र, अपने ओहदे और अपने रिश्ते का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहे हैं.

हमेशा आप ही सही होते हैं, यह सोच न बना लें: आप जो सोचते हैं, आप जो चाहते हैं और आप जो उम्मीदें रखते हैं, वो ही सही हैं और यदि कोई आपसे अलग सोच रखे, तो वो इंसान ही ग़लत है, ऐसी बात मन में न पालें. हर शख़्स का अपना अलग व्यक्तित्व होता है, उसे स्वीकार करें, उसका सम्मान करें. जिस तरह आप औरों से उम्मीद रखते हैं, दूसरे भी आपसे ठीक वैसे ही व्यवहार की आशा रखते हैं. आप जिस तरह हर्ट होते हैं, दूसरे भी हो सकते हैं. हर किसी की अपनी सोच व राय हो सकती है, जिसका हमें सम्मान करना ही चाहिए, वरना रिश्ते टूटते देर नहीं लगती.

स्वार्थी न बनें: रिश्तों में लक्ष्मण रेखा तभी पार होती है, जब हम स्वार्थी बन जाते हैं. स़िर्फ हम ही हम हैं, दूसरों को अपना जीवन अपनी तरह से जीने का कोई हक़ नहीं, यह अप्रोच नकारात्मक होती है. सबकी मर्ज़ी का ख़्याल करें और सकारात्मक सोच बनाएं, तभी आप अपने रिश्तों को शिद्दत से निभा सकते हैं.

अपनी ग़लती मानें: जब भी आप ग़लत हों, तो फ़ौरन उसे मान लें. ईगो पालकर रिश्तों को ताक पर न रखें. अपनी ग़लती के लिए किसी और को ज़िम्मेदार न ठहराएं. अक्सर हम अपनी ग़लतियां दूसरों पर थोप देते हैं और उन्हें ही इसका कारण बताकर ख़ुद को बचाने की सोचते हैं. जब सामनेवाला अपनी सफ़ाई देता है, तो हम नाराज़ हो जाते हैं कि तुम हमारा साथ नहीं दे रहे या ग़लती क्या स़िर्फ मेरी थी, जैसी बातें करने लगते हैं. यह ग़लत उम्मीद लगाना अपनी लक्ष्मण रेखा न पहचानने जैसा ही है.

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रिश्तों में सम्मान का अर्थ क्या है?
हम रिश्तों को सम्मान दे रहे हैं या नहीं, इसे इन कसौटी पर परखें-

  •  अगर हम किसी बात पर असहमत हैं, पर हम अपनी ही बात और राय को महत्व देकर सामनेवाले को सुनना ही न चाहें और उससे भी यह उम्मीद रखें कि वो हमारी ही सुने, तो यह उसके सम्मान को आहत करेगा.
  •  अपने रिश्तेदारों या पार्टनर को सामाजिक समारोहों में या अन्य लोगों के सामने डांटते हैं या उनका मज़ाक उड़ाते हैं.
  •  हर बात पर टोकना या बात-बात पर नाराज़ हो जाना.
  •  सामनेवाले की भावनाओं के प्रति असंवेदनशील होकर उन्हें महत्व न देना.
  •  हर वक़्त स़िर्फ अपनी ज़रूरतों के बारे में ही सोचना.
  •  किसी की भी राय को महत्व न देकर मनमानी करना.
  •  अपनी सुविधानुसार नियम बदलना और दूसरों से भी अपनी सुविधानुसार ही व्यवहार करने की उम्मीद करना.
  •  सबसे मज़ाक करना, लेकिन जब कोई आपसे मज़ाक करे, तो बुरा मान जाना.
  •  हर छोटी-छोटी बात पर सफ़ाई मांगना.
  •  सामनेवाले की स्थिति को समझे बग़ैर या समझने की कोशिश किए बिना ही बात-बात पर नाराज़ हो जाना.
  •  सबसे यह उम्मीद रखना कि वो स़िर्फ आपका ही ख़्याल रखे और आपकी हर बात पर हां में हां मिलाए.
  •  विचार अलग होने पर दूसरों के विचारों को ग़लत व महत्वहीन समझना.

– कमलेश शर्मा