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रिटायर्मेंट को बेहतर बनाने के लिए कहां करें निवेश? (Top 5 Investment That will Make Your Retirement More Easy)

रिटायर्मेंट

रिटायर्मेंट

जब तक नौकरी है, ज़िंदगी आसानी से कट जाती है. हर महीने अकाउंट में सैलरी आती है, जिससे आपकी लाइफ बेहतर तरी़के से कटती है. हर महीने का ख़र्च निकल जाता है और तो और आप किसी को उधार पैसे भी दे देते हो. कभी नया फोन, तो कभी नई कार भी ले लेते हैं ईएमआई पर, लेकिन तब का क्या होगा जब आपकी उम्र ढलने लगेगी और आपकी सैलरी नहीं रहेगी. अब तो पेंशन भी नहीं है. ऐसे में कैसे सर्वाइव करेंगे उन दिनों में आप. ये एक ऐसा सवाल है, जो समय रहते हर इंसान को ख़ुद से पूछ लेना चाहिए और उसका हल निकाल लेना चाहिए, ताकि आगे चलकर लाइफ इसी तरह से चलती रहे. रिटायर्मेंट के बाद भी ज़िंदगी इसी तरह से चलती रहे, इसके लिए इन जगहों पर करें निवेश.

पब्लिक प्रॉविडेंट फंड यानी PPF
पब्लिक प्रॉविडेंट फंड आम जीवन के लिए बहुत ज़रूरी है. रिटायर्मेंट के बाद भी लाइफ को अच्छी तरह से जीने के लिए आपको हर साल या यूं कहें कि हर महीने कुछ न कुछ अमाउंट पब्लिक प्रॉविडेंट फंड में डालते रहना चाहिए. इसमें जमा करने से आपकी इनकम टैक्स में रिबेट मिलता है और आगे चलकर आपको फ़ायदा भी होता है.

शेयर
शेयर मार्केट में थोड़ा पैसा लगाना चाहिए, लेकिन लंबी अवधि के लिए. किसी शेयर में पैसा लगा दें और फिर उसे रोटेट करते रहें. आपको अगर शेयर बाज़ार की जानकारी नहीं है, तो किसी एक्सपर्ट की सलाह लें. लंबे समय के लिए किया गया इन्वेस्टमेंट अच्छा रिटर्न देता है.

एंप्लॉइई प्रॉविडेंट फंड (ईपीएफ)
यह सुविधा ख़ासतौर पर नौकरीपेशा लोगों के लिए बेहतरीन है. नौकरी के दौरान हर माह सैलरी का एक छोटा-सा हिस्सा ईपीएफ में डालने से आपको रिटायर्मेंट के समय फ़ायदा होगा. इस पर ब्याज़ भी अच्छा मिलता है.

म्यूचुअल फंड
छोटे निवेशकों के लिए म्यूचुअल फंड निवेश का सबसे अच्छा ज़रिया है. म्यूचुअल फंड से संबंधित जानकारी टीवी में आती रहती है. ऐड ख़त्म होने के बाद लास्ट में ये लिखकर आता है कि अगर आप इसमें निवेश कर रहे हैं, तो अपना रिस्क जान लें. ये बात सिर्प आपको सचेत करने के लिए कही जाती है. म्यूचुअल फंड में निवेश करना फ़ायदेमंद होता है. बस, इस बात का ध्यान रखिए की समझदारी से पैसा लगाइए. अपनी जोखिम उठाने की क्षमता और निवेश लक्ष्य के हिसाब से निवेशक म्यूचुअल फंड स्कीम का चुनाव कर सकते हैं. साथ ही, कम पूंजी में भी निवेश किया जा सकता है.

फिक्स्ड डिपॉज़िट
टैक्स के लिहाज से चाहे निवेश का बेहतरीन विकल्प न हो, लेकिन फिक्स्ड डिपॉजिट में निवेश से ऊंची ब्याज दरों का फायदा उठाया जा सकता है. कम टैक्स स्लैब में आने वाले और जल्द रिटायर होने वाले निवेशक फिक्स्ड डिपॉज़िट में पैसा लगा सकते हैं.

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30 के बाद करें रिटायरमेंट प्लानिंग ( Retirement Planning After 30 )

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ज़िंदगी में क़ामयाब करियर पाने के लिए प्लानिंग करना जितना ज़रूरी है, उतना ही अहम् है रिटायरमेंट के बाद की ज़िंदगी का नक्शा तैयार करना यानी अपना रिटायरमेंट प्लान करना. किन अहम् बातों का ध्यान रखकर रिटायरमेंट के बाद की ज़िंदगी को भी आप ख़ुशगवार बना सकते हैं.

कुछ अहम् सवाल
रिटायरमेंट प्लानिंग की बात आते ही सबसे पहले जो बात ज़ेहन में आती है, वो यही है कि रिटायरमेंट के बाद नियमित आमदनी में कोई बाधा तो नहीं आएगी? इसके साथ ही कुछ और सवाल भी जुड़ जाते हैं, जैसे-

  • क्या मेरे पास इतनी संपत्ति या साधन होंगे, जो रिटायरमेंट के बाद भी पर्याप्त आय दे सकें?
  • उस व़क़्त तक ख़र्चों (लिविंग कॉस्ट) का स्तर कितना बढ़ जाएगा?
  • उस समय तक हेल्थ केयर कितना महंगा हो जाएगा?
  • सोशल सिक्यॉरिटी बेनिफिट्स का लेवल क्या होगा?
  • लॉन्ग टर्म इन्वेस्टमेंट में कितना नफ़ा-नुक़सान होगा? नुक़सान होने पर अगर शुरू में ही ज़्यादा पैसा निकालना पड़ा तो…?

इन सारी चिंताओं का निचोड़ यही है कि रिटायरमेंट तक देश की मुद्रास्फीति में कितनी बढ़ोत्तरी होगी और आपकी बचत, जमाराशि व इन्वेस्टमेंट पर इसका कितना असर पड़ेगा? मुद्रास्फीति का असर ही आपके ख़र्चों यानी लिविंग कॉस्ट व हेल्थ केयर लागत को भी बढ़ा देता है. ज़ाहिर है, रिटायरमेंट प्लानिंग करते व़क़्त आपको मुद्रास्फीति के संभावित स्तर को भी ध्यान में रखना होगा. भविष्य की मुद्रास्फीति के स्तर का अंदाज़ा लगाने के लिए आपको दस या बीस साल पहले के मुद्रास्फीति स्तर से इसके मौजूदा स्तर की तुलना करनी होगी. देखना होगा कि इन सालों में मुद्रास्फीति किस दर से बढ़ी है. इससे दस या बीस साल बाद के संभावित मुद्रास्फीति स्तर का कुछ अनुमान आप लगा सकेंगे.

रिटायरमेंट प्लानिंग के 5 स्टेप्स
मुद्रास्फीति का आकलन कर लेनेे के बाद आप अपने पैसे को इस तरह मैनेज कर पाएंगे कि वह अंत तक आपका साथ दे सके. इसके लिए इन 5 स्टेप्स पर
अमल करें-

1. इन बातों पर ग़ौर करें

  • इन्फ्लेशन (मुद्रास्फीति) आपकी संपत्ति(जमाराशि, निवेश और प्रॉपर्टी) पर कितना असर डालेगी?
  • रिटायरमेंट इनकम टिकाऊ होने के साथ-साथ बढ़ती भी रहेगी या नहीं.
  • लाभदायक सरकारी योजनाओं पर नज़र रखें. सोशल सिक्योरिटी व मेडीकेयर जैसी योजनाएं आपके बजट को संतुलित रखने में मददगार हो सकती हैं.
  • रिटायरमेंट इनकम प्लानिंग में लंबी उम्र, हेल्थ केयर के बढ़ते ख़र्चों और अन्य अतिरिक्त ख़र्चों का ध्यान ज़रूर रखें, ताकि आपको अपना कोई निवेश समय से पहले न निकालना पड़े.

2. बचत व निवेश विकल्पों को परखें
हर व्यक्ति अधिक से अधिक उम्र तक जीना चाहता है. अतः अपनी इनकम प्लान की लॉन्गेविटी (अवधि या उम्र) भी अधिक से अधिक रखें, ताकि आपका पैसा अधिक समय तक आपके साथ रहे. इसके साथ ही, इन्फ्लेशन यानी मुद्रास्फीति को नज़र में रखते हुए अपनी लाइफ़ स्टाइल का एक ख़ाका बनाएं. मुद्रास्फीति न स़िर्फ आपके ख़र्चों की लागत बढ़ा देती है, बल्कि आपकी बचत व निवेश की क़ीमत भी घटा देती है. बचत व निवेश के विकल्पों को अच्छी तरह परखें, जिनमें आप अपना पैसा डालेंगे. इस बात का ध्यान रखें कि यहां भी मुद्रास्फीति आपके मैच्योरिटी अमाउंट पर अपना असर डालेगी. साथ ही ऐसे विकल्पों में बचत या निवेश करें, जिनमें आपको आयकर नहीं देना पड़े या कम देना पड़े. कई निवेश विकल्पों में आयकर से छूट दी जाती है.

3. सेहत से जुड़े जोखिम
उम्र बढ़ने पर सेहत से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ेंगी, अत: उस व़क़्त के लिए हेल्थ केयर का पूरा इंतज़ाम अभी से कर लें. ऐसा हेल्थ केयर व इन्श्योरेंस प्लान लें, जिसमें रिटायरमेंट के बाद के सालों में अधिकतम बेनिफिट मिले. आजीवन हेल्थ केयर व इन्श्योरेंस पॉलिसीज़ इसी उम्र में ख़रीद लें. रिटायरमेंट के बाद जिनमें कोई प्रीमियम न देनी पड़े और जो सेहत से जुड़े अधिकांश जोखिम को कवर करें, ऐसे प्लान एवं पॉलिसीज़ चुनें.

4. एक्सेस विथड्राल से बचें
रिटायरमेंट प्लानिंग में यह भी ध्यान में रखना होगा कि उस व़क़्त आपको कोई अतिरिक्त निकासी (एक्सेस विथड्रॉल) न करना पड़े. जिन पॉलिसीज़ व प्लान्स को आपने रिटायरमेंट को ध्यान में रखकर ख़रीदा है, उन्हें बीच में छोड़ना या निकालना न पड़े, इसका पक्का बंदोबस्त करें. साथ ही यह भी सुनिश्‍चित करें कि रिटायरमेंट के बाद भी आप योजना के अनुरूप केवल नियमित पैसे की ही निकासी करेंगे. उस व़क़्त कोई अतिरिक्त निकासी न करनी पड़े, इसके लिए एक आपातकालीन बैंक सेविंग अकाउंट ज़रूर रखें.

5. तमाम जोख़िमों का आकलन
हर व्यक्ति की लाइफ़ स्टाइल व ज़रूरतें अलग-अलग होती हैं, अत: आप भी अपनी जीवनशैली के अनुरूप ही उसी के हिसाब से संभावित जोखिम यानी ख़तरों का आकलन करें. अपनी लाइफ़ स्टाइल व इनकम के हिसाब से रिटायरमेंट प्लान बनाएं और उसमें तमाम संभावित जोखिमों से निपटने के उपाय भी शामिल करें. साथ ही अपने रिटयारमेंट प्लान में अपने जीवनसाथी और उसकी ज़रूरतों व जोख़िम को भी शामिल करें तथा उनके लिए भी बीमा व मेडिकल प्लान या पॉलिसीज़ ज़रूर ख़रीदें. किसी आकस्मिक ख़तरे, दुर्घटना या आर्थिक ज़रूरत से आप कैसे निपटेंगे, इसके लिए भी अलग से कुछ बचत या निवेश कर लें, जिन्हें आपातकालीन ज़रूरतों के व़क़्त निकाला जा सके. साथ ही जैसा कि पहले भी बताया गया है, मुद्रास्फीति, आयकर कटौती, बढ़ते ख़र्चों आदि जोखिमों का भी आकलन करना ज़रूरी है.
और हां, उम्र के इस पायदान पर रिटायरमेंट प्लानिंग के साथ-साथ आपको तमाम मौजूदा जिम्मेदारियां भी तो निभानी ही हैं, जैसे-अपना घर, बच्चों की पढ़ाई, उनकी शादी आदि. अत: इनकी प्लानिंग करना भी न भूलें, ताकि रिटायरमेंट के बाद आपकी परेशानियों में कोई इजाफ़ा न हो.

थर्टीज़ में क्या-क्या करें?
उम्र के इस पड़ाव पर रिटायरमेंट प्लानिंग के साथ-साथ इन बातों पर भी पूरा ध्यान देना ज़रूरी है-

  • बच्चों की परवरिश, स्वास्थ्य पर ख़र्च.
  • जीवनसाथी की मौजूदा ज़रूरत तथा भविष्य की आर्थिक सुरक्षा का बंदोबस्त.
  • बच्चों की उच्च शिक्षा, शादी तथा करियर में सैटल करने के लिए बचत या निवेश.
  • अगर अपना घर न हो तो घर ख़रीदना.
  • रिटायरमेंट प्लानिंग.
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जब महिलाएं लें रिटायरमेंट

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गाड़ी के दो चक्के जो निरंतर घूमते रहते हैं, जिससे गाड़ी की रफ़्तार बनी रहती है, पर एक समय आता है, जब गाड़ी थक जाती है और चक्के घूमना बंद कर देते हैं. अचानक सब कुछ थम-सा जाता है. ना कहीं जाने की जल्दी और ना ही कहीं से घर लौटने की ख़ुशी. ऐसा ही कुछ होता है, जब आप रिटायर्ड या सेवानिवृत होती हैं. जी हां, यहां हम बात कर रहे हैं, उन स्त्रियों की, जो एक लंबी अवधि की नौकरी के बाद रिटायर हो जाती हैं.

क्या है रिटायरमेंट ब्लूज़?
जब आप काम करती हैं, तो अक्सर ही यह कहती हैं कि मैं तो इस काम से तंग आ गई हूं, पता नहीं कब इससे छुट्टी मिलेगी, पर क्या अब आपको ऐसा लगता है कि आपको यही छुट्टी चाहिए थी? कहीं रिटायरमेंट ने आपको अकेला तो नहीं कर दिया है? ऐसे कई सवाल आपके ज़ेहन में भी आते होंगे. तो आइए जानें, आपके रिटायरमेंट ब्लूज़ को. जब आप रिटायर होती हैं, तो अचानक आपको लगता है कि-

  •  आपकी पहचान खो गई है या आपके अस्तित्व को कोई ख़तरा है.
  •  अचानक आपको अपने ओहदे से जुड़े मान-सम्मान में कमी नज़र आने लगती है.
  •  जिस स्वतंत्रता को आप इतने सालों से पाना चाहती थीं, वह अचानक सज़ा लगने लगती है.
  • अचानक आपको लगता है कि आपसे कोई बात नहीं करना चाहता और आपके साथ कोई खाना नहीं खाना चाहता.
  • आप अपने आपको अकेली और अनुपयोगी पाती हैं.

अगर आप भी ऐसा ही महसूस कर रही हैं, तो चिंता की कोई बात नहीं है. हर रिटायर होती स्त्री ऐसी ही कशमकश में होती है. इसे ट्रांज़िशन पीरियड कहा जाता है, मतलब आप इस समय अपने जीवन के बहुत बड़े बदलाव के दौर से गुज़र रही होती हैं. ऐसा नहीं है कि स़िर्फ स्त्रियां ही इससे गुज़रती हैं, पुरुष भी इस कठिन समय का सामना करते हैं, पर यह समय स्त्रियों के लिए अधिक संवेदनशील इसलिए हो जाता है, क्योंकि उम्र का यह वही पड़ाव है, जिसमें वे मेनोपॉज़ से भी जूझ रही होती हैं. मानसिक और शारीरिक दोनों ही आक्षेपों में यह समय काफ़ी नाज़ुक और कठिन होता है.

मनोवैज्ञानिक डॉ. केहाली बताती हैं कि चाहे कोई स्त्री ऐच्छिक सेवानिवृत्ति ले या फिर अपनी सेवाएं पूरी करने के बाद रिटायर हो, ङ्गएंप्टीनेस सिंड्रोमम दोनों ही जगहों पर देखने को मिलता है. इसका मतलब है, अचानक अकेलेपन का एहसास होना. ऐसा लगता है, जैसे अब किसी को आपकी ज़रूरत नहीं है. मेनोपॉज़ के समय वैसे ही हार्मोंस काफ़ी डिस्टर्ब हो जाते हैं. इस अवस्था को डिप्रेशन तो नहीं कहा जा सकता, पर हां, यह डिप्रेशन के काफ़ी क़रीब है.

श्रीमती जोशी बताती हैं कि मेरे रिटायरमेंट को 5 साल पूरे होनेवाले हैं, फ़िलहाल तो सब ठीक है, पर जब मैं नई-नई रिटायर हुई थी, तब घर बहुत खाली-खाली लगता था. मैं घर के रूटीन को पूरी तरह से भूल गई थी. उम्र के 55वें वसंत में मैंने टीचिंग प्रोफेशन से रिटायरमेंट लिया था. सुबह तड़के उठ जाती थी, पर फिर याद आता था कि उठकर क्या करूं, अब कहीं जाना तो नहीं है. अपने उस रूटीन को तोड़कर नए रूटीन में ढलने के लिए मुझे पूरा एक साल लग गया. पर अब मैंने अपने खालीपन का इलाज ढूंढ़ लिया है, अब मैं घर पर ट्यूशन पढ़ाती हूं.

जिन शुरुआती दिनों की बात श्रीमती जोशी कर रही हैं, वह उनका ङ्गट्रांज़िशन पीरियडफ है. इस समय सबसे ज़रूरी है, समय के बहाव के साथ बहना. अपने साथ किसी तरह की ज़बर्दस्ती ना करें. ख़ुद को समय दें. धीरे-धीरे आप ख़ुद ही नई परिस्थिति में ढल जाएंगी.
श्रीमती लिमये की सरकारी नौकरी थी. वो कहती हैं कि रिटायरमेंट मुझे कभी भी मुश्किल नहीं लगा. मैं बहुत सकारात्मक सोचवाली महिला हूं. मुझे लगता है कि सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आपके सोचने का तरीक़ा कैसा है. मैंने पहले ही अपना रिटायरमेंट प्लान किया हुआ था, इसलिए मेरे लिए यह बदलाव कोई अचानक आया हुआ बदलाव नहीं था. मैंने पहले ही तय कर लिया था कि मुझे रिटायरमेंट के बाद अपने दिन कैसे बिताने हैं. मैंने जो भी अपनी नौकरी से सीखा, उसे रिटायरमेंट के बाद अपने निजी जीवन में उपयोग में लाया. मेरे दोनों ही बच्चों की शादियां हो चुकी हैं. मेरा दिन हमउम्र सहेलियों के साथ घूमने और भजन-कीर्तन में कटता है. मैं बहुत आध्यात्मिक हूं और अध्यात्म ही मुझे जीवन की हर कठनाई से लड़ने की शक्ति देता है.

रिटायरमेंट के लिए क्या है ज़रूरी?

  • श्रीमती लिमये ने अपने रिटायरमेंट को आसान बनाया और अब जीवन को सुकून से जी रही हैं. ऐसे ही जीवन के हर मोड़ पर प्लानिंग बहुत ज़रूरी है.
  •  आज जीवनशैली और सामाजिक संरचना में काफ़ी बदलाव आए हैं, तो उस हिसाब से हमें भी अपनी सोच को
    बदलना होगा.
  •  आज हो सकता है कि आपके रिटायरमेंट के बाद आपके बच्चे या नाती-पोतेे आपको समय ना दे पाएं, या फिर वे आपके साथ भी ना रह पाएं, तो उसमें उनको दोष ना दें, क्योंकि हो सकता है कि वाकई उनके पास समय का अभाव हो.
  •  डॉ. केहाली बताती हैं कि यह हमेशा ध्यान में रखें कि आप अपने जीवन में जो भी क़दम उठाती हैं, वह आप स़िर्फ अपने लिए उठा रही हैं, दूसरों के लिए अपने जीवन के निर्णय ना लें. तात्पर्य यह है कि अगर आप को अपनी नौकरी छोड़नी है, तो अपने लिए छोड़िए, यह मत कहिए कि आपने नौकरी बच्चों के लिए या फिर पति के लिए या फिर घर के लिए छोड़ी है, क्योंकि आपको ऐसा लगता है कि बच्चों को आपकी ज़रूरत है, पर हो सकता है कि ऐसा ना हो.
  •  दूसरी मुख्य बात यह है कि हमेशा ध्यान रखें कि एक आत्मनिर्भर मां अपने बच्चों को भी आत्मनिर्भर ही बनाएगी, तो सेवानिवृत्ति के बाद यह सोचना कि बच्चे हर छोटी बात के लिए आप पर निर्भर होंगे, यह ग़लत है. बदलाव आपके जीवन में आया है,
    दूसरों के नहीं.
  • ख़ुद को समय दीजिए, अपनी सोच को सकारात्मक रखिए.

कैसे लड़ें रिटायरमेंट ब्लूज़ से?

  •  रिटायरमेंट के कुछ समय पहले से ख़ुद को उसके लिए तैयार करें.
  •  रिटायरमेंट को अपने जीवन की दूसरी पारी की शुरुआत बनाएं. यह अंत नहीं है.
  •  कल बिताए हुए समय के लिए अपने आज को दांव पर ना लगाएं अर्थात् अपने अस्तित्व को अपने काम से जोड़कर ना रखें.
    ऑफिस के बाहर भी अपना सामाजिक सर्कल रखें. ऑफिस के अलावा भी अपने मित्र बनाएं.
  • रिटायरमेंट के बाद भी अपने आपको किसी ना किसी काम में व्यस्त रखें, जैसे- बच्चों को पढ़ाना, संगीत या ऐसी ही किसी हॉबी में ख़ुद का समय व्यतीत करना.
  •  अपने अकेलेपन के लिए किसी और को दोषी ना ठहराएं. इसकी जगह दूसरों की व्यस्तताओं को समझने का प्रयत्न करें.
    ख़ुद को किसी एनजीओ या संस्था से जोड़ें. हमउम्र लोगों के साथ समय व्यतीत करें.

अगर इन सबके बावजूद आपकी मानसिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आ रहा है, तो एक बार किसी मनोवैज्ञानिक से मिलने में कोई बुराई नहीं है. आपका जीवन आपका अपना है. आपकी अहमियत, आपकी महत्ता किसी नौकरी से जुड़ी नहीं है, बल्कि आपकी सकारात्मक सोच से जुड़ी है, तो अपने पंखों को पूरा खोलिए, जो आज तक कई बंधनों से जकड़े थे और सकारात्मक सोच की हवा में अपने आसमान पर जी भरकर उड़ान भरिए.

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