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रिश्तों को आजकल हुआ क्या है? (What Is Wrong With Relationship These Days?)

जिस्मों के रिश्ते हैं, आज की रूहों की यही हक़ीक़तें हैं… जज़्बात ग़ायब हैं, एहसास गुमसुम-से… हसरतें बेहिसाब हैं… वासनाओं पर मर्यादाओं का पहरा अब नहीं है, साथ जीने-मरने की क़समों का इरादा अब नहीं है… ख़ालिस मुहब्बत अब बंधन-सी लगती है, बेपनाह चाहत अब बेड़ियां बन गई हैं… अपने तरी़के से जीने का शग़ल, है हर कोई अपनी ही धुन में मगन… एक-दूसरे के साथ रहता तो है तन, पर न जाने कहां भटका हुआ है यह मन…

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–     इसे मॉडर्न होने की परिभाषा कहें या प्रैक्टिकल सोच, लेकिन सच है कि रिश्तों में अब वो पहले वाली गहराई नहीं रही.

–     ऐसा नहीं है कि लोग जुड़ते नहीं हैं, लेकिन ये जुड़ाव अब क्षणिक होता है.

–     रिश्तों में अब एडजेस्टमेंट करने की जगह न के बराबर बची है, क्योंकि दोनों पार्टनर्स में से किसी को भी कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करना है.

–     शादी के रिश्ते में एक साथ होते हुए भी अलग-अलग हैं.

–     आज दोनों पार्टनर्स वर्किंग होते हैं, ज़ाहिर है लाइफस्टाइल इतनी बदल गई है कि रिश्तों में भी बदलाव आ गया है. लेकिन ये बदलाव इस कदर हावी हो रहा है कि हम ख़ुद भी सोचते हैं कि रिश्तों को आजकल हुआ क्या है?

–     डबल इन्कम नो किड्स से लेकर अब नौबत डबल इन्कम नो सेक्स तक पहुंच चुकी है. सेक्स के लिए न टाइम है, न एनर्जी.

–     जो बची-खुची एनर्जी है, वो सोशल मीडिया पर ज़ाया हो रही है.

–     डिनर के टेबल पर सब अपने मोबाइल फोन्स के साथ बैठते हैं. कहने को साथ खाना खा रहे हैं, पर कनेक्टेड कहीं और ही रहते हैं… बच्चे पिक्चर्स क्लिक करके फ्रेंड्स के साथ शेयर करते हैं और बड़े अपने-अपने क्रश या दोस्तों के साथ.

–     पति-पत्नी बेड पर अपने-अपने फोन्स के साथ ही होते हैं… दोनों को परवाह नहीं कि कौन, किससे बात कर रहा है, न ही इस बात की फ़िक्र है कि आपस में इतनी देर से कोई बातचीत उनके बीच नहीं हो रही.

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Relationship Problems

ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि रिश्तों को आजकल हुआ क्या है?

नो कमिटमेंट: लोग आकर्षित तो होते हैं, प्यार भी करते हैं, पर कमिटमेंट से डरते हैं. आजकल इतनी जल्दी रिश्ते बनते-बिगड़ते हैं कि लोग ख़ुद भी यह तय नहीं कर पाते हैं कि इस रिश्ते में उन्हें कब तक रहना है. उन्हें लगता है, जब तक चल रहा है, चलने देते हैं, कोई और मिल गया, तो वहां चले जाएंगे, क्योंकि कौन-सा हमको शादी करनी है. यही वजह है कि रिश्ते नॉन सीरियस होते जा रहे हैं.

कैल्कुलेटिव हो रहे हैं: आजकल रिश्ते ज़रूरी नहीं, बल्कि ज़रूरत के रिश्ते रह गए हैं, जिनसे हमारा स्वार्थ सिद्ध हो, वो उस समय के लिए हमारे लिए महत्वपूर्ण होते हैं. मतलब निकलने के बाद एक-दूसरे को पहचानते भी नहीं.

प्रैक्टिकल अप्रोच: हम अब प्रैक्टिकल हो गए हैं. हमारे अनुभव भी हमें यही सीख देते हैं कि इमोशनल होना स़िर्फ बेव़कूफ़ी है. बेहतर है, जितना प्रैक्टिकल रहें, उतना फ़ायदा होगा. शहरों में वर्क लाइफ के बाद स़िर्फ वीकेंड में अपने लिए समय मिलता है. उसमें हम अपनों के साथ समय बिताने की बजाय उन लोगों के साथ समय बिताना पसंद करते हैं, जिनसे हमें कोई न कोई फ़ायदा हो.

स्पेस के नाम पर बढ़ती दूरियां: ‘स्पेस…’ आजकल यह शब्द काफ़ी घर कर गया है हमारे रिश्तों में भी. हर किसी को स्पेस चाहिए यानी रिश्ते में बंधने के बाद भी कोई बंधन न हो. यह अजीब सोच है, क्योंकि प्यार के रिश्ते में एक-दूसरे से कुछ छिपाने की ज़रूरत ही नहीं होनी चाहिए. जब सब कुछ साझा है, तो छिपाना क्या है और क्यों है? पर अक्सर कपल्स को कहते सुना है कि हमें स्पेस चाहिए, वरना रिश्ते में दम घुटने लगता है. हां, यह सही है कि कोई सिर पर सवार न रहे हमेशा, न ही हर बात पर टोके, पर स्पेस के नाम पर हर बात को जायज़ नहीं ठहराया जा सकता.

सेक्स, आज नहीं: काम का दबाव इतना ज़्यादा होता है कि सेक्स के लिए एनर्जी ही नहीं बचती. यहां तक कि अब तो सेक्स की इच्छा भी नहीं होती. ऑफिस में अधिकतर समय गुज़ारने के चलते कलीग्स से इतनी नज़दीकियां बढ़ जाती हैं कि पार्टनर से ज़्यादा आकर्षण उनमें नज़र आने लगता है. ऐसे में पति-पत्नी एक-दूसरे से दूरी बनाने लगते हैं. सेक्स के लिए कोई एक क़रीब आना भी चाहे, तो दूसरा बहाना बना देता है कि आज नहीं, बहुत थकान है या सुबह जल्दी उठना है… आदि.

डिजिटल रिश्ते रियल रिश्तों पर हावी: सोशल साइट्स के रिश्ते अब ज़्यादा भाने लगे हैं. उनमें अजीब-सा आकर्षण होता है. टेक्स्ट मैसेजेस, चैटिंग की लत ऐसी लग जाती है कि रियल रिश्ते बोझ लगने लगते हैं और डिजिटल वर्ल्ड की रंगीन दुनिया हसीन लगने लगती है. लेकिन यह कुछ समय का ही नशा होता है, क्योंकि ये रिश्ते हमें ठगते ज़्यादा हैं और संबल कम देते हैं.

कम्यूनिकेशन की कमी: आसपास होते हुए भी आपस में बातचीत का न तो समय है, न ही इच्छा. अपनी-अपनी दुनिया में सभी व्यस्त हैं. एक-दूसरे के सुख-दुख को जानने-समझने की फुर्सत ही नहीं रह गई. धीरे-धीरे रिश्तों में ख़ामोशी पसर जाती है और न जाने कब

एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं. हर रिश्ते की मज़बूती के लिए बेहद ज़रूरी है आपसी बातचीत यानी कम्यूनिकेशन, पर उसकी कमी के चलते रिश्ते दम तोड़ने लगते हैं और जब तक एहसास होता है, तब तक देर हो चुकी होती है.

– योगिनी भारद्वाज

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आख़िर क्यों बनते हैं अमर्यादित रिश्ते? (Why Do We Have Immoral Relationships In Our Society?)

extramarital affairs

हर रिश्ते की अपनी एक मर्यादा होती है, पर जब कोई रिश्ते की मर्यादा को लांघ देता है और उस रिश्ते को तार-तार कर देता है, तो ऐसे रिश्ते अपनी गरिमा को ही नहीं, विश्‍वास को भी खो बैठते हैैं. आख़िर क्यों बन जाते हैं ऐसे अमर्यादित रिश्ते (Extramarital Affairs)? आइए जानते हैं.में आए दिन अख़बार-टीवी पर पढ़ने-देखने को मिलते हैं कि भाभी-देवर के अनैतिक रिश्ते… अपनी ही भतीजी के साथ चाचा के संबंध… दामाद ने सास के साथ भागकर शादी कर ली… ससुर बहू के साथ बरसों से रिलेशन में है… भतीजे-बुआ समाज को दरकिनार कर लीव इन में रह रहे हैं… ऐसे में दिल में यही ख़्याल आता है कि कहां जा रहा है समाज…? क्या भाई-बहन, माता-पिता के पवित्र रिश्ते भी बेमानी होते जा रहे हैं? ऐसे कई सवाल मन में उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं. इस सिलसिले में हमने सायकोलॉजिस्ट परमिंदर निज्जर से बात की. आइए, इस पर एक नज़र डालते हैं. उनके अनुसार, रिश्तों के कलंकित होने का कोई एक कारण नहीं होता, बल्कि बहुत-सी छोटी-छोटी बातें होती हैं, जो सोसायटी में ऐसे रिश्ते को जन्म देती हैं.

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– फास्ट लाइफ इसका सबसे बड़ा कारण है. जहां हर कोई सब कुछ जल्दी और शॉर्टकट में चाह रहा है. ऐसे में सही-ग़लत के बारे में सोचने का वक़्त ही नहीं मिलता.

– इट्स माई लाइफ का फंडा भी लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है. हर कोई अपनी ज़िंदगी को अपने हिसाब से ही जीना चाहता है, जिसमें उसे किसी भी तरह की दख़लअंदाज़ी पसंद नहीं.

– कई केसेस में देखा गया है कि वे क़रीबी रिश्ते, जो अमर्यादित क़दम उठाते हैं, उनकी वजह उस शख़्स से गहरे तौर पर प्रभावित होना भी है.

– जैसे चाचा को अपनी भतीजी में वे सभी ख़ूबियां दिखाई देती हैं, जो जीवनसाथी में चाहिए होती हैं. और जब वो ख़ासियत कहीं नहीं मिलतीं, तो वे इस रिश्ते में ही बंधकर आगे बढ़ने से नहीं हिचकिचाते.

– बचपन से लड़की ही नहीं, लड़कों के भी अपने रोल मॉडल होते हैं. जब वो उन्हें अपनी सास, चाची, बुआ आदि में दिखते हैं. तब वे सब ऊंच-नीच की परवाह किए बगैर इस रिश्ते को थाम लेते हैं.

– संयुक्त परिवार का टूटना भी इन रिश्तों के पनपने का बड़ा कारण है, क्योंकि जब सब साथ रहते थे, तब हर रिश्ते में अपनापन, संस्कार, उसकी मर्यादा का निर्वाह बचपन से ही होता था. तब ऐसी ग़लती कम ही होती थी.

– पैरेंट्स की बिज़ी लाइफ भी ऐसे रिश्ते के लिए माहौल प्रदान करती है. उस पर पति-पत्नी दोनों ही अति व्यस्त व कामकाजी हैं, तो वे बच्चों को बहुत कम समय ही दे पाते हैं, जिससे उनके भटकने और बिगड़ने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं.

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रिश्तों की अहमियत को समझें…

– हम चाहे कितने भी मॉडर्न हो जाएं, पर हर रिश्ते की मर्यादा और मापदंड ज्यों का त्यों बना रहेगा. इस बात को समझें और हर रिश्ते को सम्मान दें.

– अरेंज मैरिज हो या लव मैरिज उसकी अपनी ख़ूबसूरती व सामाजिक स्वीकृति होती है. इससे अलग रिश्ते ग़लत ही होते हैं.ू

– अमर्यादित रिश्ते न जाने कितने डर, शंका-आशंका, अस्थिरता को पैदा करते हैं.

– सामाजिक बहिष्कार और अपनों से दूरियां जीवन को हाशिए पर ले आती हैं.

– ऐसे रिश्तों का अंत अक्सर आत्महत्या, हत्या या फिर मानसिक विक्षिप्तता के रूप में होता है.

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दूर रहना ही समाधान…

– तमाम केसेस को देखते हुए मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे रिश्ते से दूर रहना ही इसका समाधान है.  ू

– यूं तो जीवन में हर किसी के क़दम कभी न कभी डगमगाते ही हैं, पर ऐसे समय में अपनों का साथ, सही काउंसलिंग, धैर्य आदि द्वारा इससे उबरा जा सकता है.

– जब कभी आपको लगे कि आप किसी अमर्यादित रिश्ते की तरफ़ झुक रहे हैं, तब आत्मविश्‍लेषण करें.

– अपने रिश्ते को रिवाइव करें. पार्टनर के साथ कुछ दिन के लिए कहीं घूमने निकल जाएं.

– शादी के दिनों को, जीवनसाथी के साथ बिताए ख़ूबसूरत लम्हों को तरोताज़ा करें.

– पार्टनर से दूर होने के कारणों को ढूंढ़ें और उन्हें सुलझाने की कोशिश करें.

– अपने किसी ख़ास दोस्त/सहेली से सलाह लें. अपनी दुविधा को बताएं.

– रिश्ते जीने का संबल होने चाहिए, न कि हर पल डर व हीनभावना का कारण.

– ख़ुद को अपने किसी शौक़ में इन्वॉल्व करें.

– आपके रिश्ते आपके बच्चों और बड़ों के लिए रोल मॉडल की तरह होते हैं. ये बात हमेशा याद रखें.

– घर-परिवार, बच्चे से जुड़ी अपनी ज़िम्मेदारियों को नए सिरे से उठाएं और ख़ुद को उनसे जुड़े रहने के लिए प्रोत्साहित करें.

– आंकड़ों के अनुसार, अमर्यादित रिश्तों का आकर्षण बस जुनून या फिर एक निश्‍चित सीमा तक रहता है. जब वो हैंगओवर उतरता है, तब सिवाय दुख, क्षोभ, पछतावे के कुछ नहीं रहता.

– ऊषा गुप्ता

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समझदारी की सेल्फी से सुधारें बिगड़े रिश्तों की तस्वीर (Smart Ways To Get Your Relationship On Track)

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चल बेटा सेल्फी ले ले रे… जी हां, ज़माना सेल्फी का है. हम ख़ुद को कैमरे में कैद करने का एक मौक़ा भी नहीं चूकते. हमारी पूरी कोशिश होती है कि हर तस्वीर में हम अच्छे दिखें. तो चलिए, हम भी आपसे सेल्फी लेने के लिए कहते हैं, पर यह सेल्फी होगी आपके व्यवहार की. कितना अच्छा होता अगर कोई ऐसा कैमरा भी होता, जो हमारी सेल्फी में हमारी अंदरूनी ख़ूबसूरती दिखाता या हमारी गलतियां भी दिखाता. आप शायद समझ ही गए होंगे कि यहां बात हो रही है आत्मविश्‍लेषण की.

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क्यों ज़रूरी है समझदारी की सेल्फी?

अमूमन हमारे जितने मन-मुटाव होते हैं, अधिकतर में हम दूसरों पर सारा दोष मढ़ कर बड़ी आसानी से आगे बढ़ जाते हैं. लेकिन आगे बढ़ते समय हम यह भूल जाते हैं कि कई सारे रिश्ते पीछे ही छूट गए. हमें ऐसा लगता है कि हमें इन रिश्तों की, सगे-संबंधियों की कोई ज़रूरत ही नहीं, पर क्या आप जानते हैं कि आपकी यही सोच आपकी सबसे बड़ी ग़लती है. और ना स़िर्फ ग़लती है, बल्कि समाज के लिए यह सोच बहुत बड़ा ख़तरा भी है, क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है.

रिश्तों से अपने आपको अलग कर लेना या उनसे दूर जाना हमारे सामाजिक, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है. तो यह तो तय है कि रिश्तों को सहेजना बहुत ही आवश्यक है, तो क्यों ना रिश्तों की इस तस्वीर को सुंदर बनाएं.

आजकल किताबी ज्ञान की हम में कोई कमी नहीं, पर याद रखिए किताबें समझदारी नहीं बांटतीं, इसके लिए हमारे अंतर्मन का जागृत होना ज़रूरी है. लेकिन इसे जागृत किया कैसे जाए, यह बहुत आसान नहीं, पर हां मुश्किल भी नहीं. इसके लिए आपको किसी और को नहीं, बल्कि ख़ुद को पहचानने की ज़रूरत है. साथ ही यह कोई एक दिवसीय कार्यक्रम ना होकर निरंतर प्रक्रिया है. आपको बस, करना इतना है कि रोज़ अपनी एक सेल्फी
खींचनी है और यह सेल्फी आप कैसे और कौन-से कैमरे से खीचेंगे, यह हम आपको बताएंगे.

कैसे खींचें समझदारी से सेल्फी?

सच्चाई की फ्लैश लाइट चमकाएं

सच्चाई बहुत ज़रूरी है, क्योंकि झूठ आपको कमज़ोर बनाता है. झूठा अहंकार आपको बार-बार झूठ बोलने पर मजबूर करेगा. इसलिए जब भी किसी से बात करें, तो अपना सच के फ्लैशवाला कैमरा साथ ले जाना ना भूलें. सच बोलना आपको ताक़त देगा. जब कभी आप झूठ का सहारा लेने की कोशिश करें, तो अपने आपको रोक लें. यह स़िर्फ आप कर सकते हैं, क्योंकि केवल आप ही जानते हैं कि आप कब झूठ का सहारा ले रहे हैं. इसके लिए आप ख़ुद को एक छोटी-सी चुनौती भी दे सकते हैं. सोने से पहले किसी काग़ज़ पर दिनभर में आपके द्वारा बोले छोटे से छोटे झूठ की ़फेहरिस्त बनाएं और अगले दिन पिछले दिन से कम झूठ बोलने की कोशिश करें.

अपनी तस्वीर में लाएं अच्छाई की ब्राइटनेस

बेवजह की जलन, दूसरों की नाकामयाबी में ख़ुश होना… ये सभी चीज़ें आपकी अच्छाई को ख़त्म करती है. इस तरह की भावनाएं आपके समझदारी के आईने को धूमिल कर सकती हैं. ये सभी भावनाएं ना स़िर्फ आपके रिश्ते को प्रभावित करती हैं, बल्कि आपके
सोचने-समझने की क्षमता को कमज़ोर करती हैं. जब आपकी अच्छाई चमकेगी, तो आपके अंतर्मन की तस्वीर भी उजली-उजली होगी.
इसके लिए भी एक काम किया जा सकता है. रोज़ कम से कम एक अच्छा काम करें, जैसे- बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद.

दूर करें शिकायतों की उदासी

अपनी सेल्फी में यह ज़रूर ध्यान से देखें कि कहीं आप हमेशा जीवन से शिकायतें तो नहीं करते रहते. जिसे अपने जीवन से हमेशा स़िर्फ शिकायतें ही होती हैं, उसका ख़ुश रहना असंभव है. शिकायतों पर ध्यान केंद्रित करने से अच्छा है कि आप उन उपायों पर ध्यान दें, जिनसे शिकायतों को दूर किया जा सकता है. इसके अलावा यह ध्यान में रखें कि कुछ भी परफेक्ट नहीं होता. अपने जीवन को कुछ कमियों के साथ स्वीकार करें.

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खींचें हाई डेफिनेशन तस्वीर

जब समझदारी के कैमरे से सेल्फी लेनी है, तो कोशिश करें कि आपकी तस्वीर हाई डेफिनेशन हो यानी छोटी-छोटी बातों में ना फंसें. यही छोटी बातें हमें छोटा बना देती हैं. अपने जीने के स्तर को ऊंचा उठाएं. झगड़े या छोटी-मोटी नोंक-झोंक, मान-अपमान इन चीज़ों से ऊपर उठकर सोचें. अगर यह छोटी बातें तस्वीर से चली जाएं, तो ख़ुशियों के रंग निखरकर आएंगे.

कहीं तस्वीर में शिकन ना आ जाए

अगर आप जल्दी किसी को माफ़ नहीं कर सकते हैं या किसी बुरी घटना को जल्दी भूल नहीं सकते, तो संभल जाएं, आपकी सेल्फी की ख़ूबसूरती ख़तरे में है. तो करना बस इतना है कि जल्दी से अपनी समझदारी के कैमरे को चार्ज करिए और अपने चेहरे पर आई इस शिकन को मिटा दीजिए. दरअसल, दूसरों को माफ़ करना और कुछ क़िस्से-कहानियों को भूल जाना किसी और के लिए नहीं, बल्कि आपके अपने मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत ज़रूरी है. अंग्रेज़ी में कहते हैं ना ‘फॉरगेट एंड फॉरगिव’ ये चीज़ें ना स़िर्फ आपको ऊपर उठाती हैं, बल्कि कई सारे रिश्तों को फिर से संवारने का एक और मौक़ा भी देती हैं.

माफ़ी मांग लें

जिस तरह माफ़ करके आगे बढ़ना महत्वपूर्ण है, उसी तरह अपनी ग़लती होने पर या कभी-कभी स़िर्फ परिस्थितियों को संभालने के लिए माफ़ी मांगना ज़रूरी है. माफी मांगने को अपने अहम् के साथ ना जोड़ें यानी माफ़ी मांगने से आप छोटे नहीं होते.

संवार लें बिगड़ी हुई तस्वीर

अगर इतनी जद्दोज़ेहद के बाद भी सेल्फी बिगड़ ही जाए, तो उसे वैसा ही मत छोड़ें, बल्कि अपनी समझदारी से उसे ठीक कर लें. कई बार ऐसा होता है कि लाख संभालने के बावजूद कुछ रिश्ते हाथ से फिसलने लगते हैं. ना चाहते हुए भी हममें वह चीज़ें आ जाती हैं, जो हमारे व्यक्तित्व को ख़राब करती हैं. अगर ऐसा होता भी है, तो वहीं पर रुककर पहले आत्मविश्‍लेषण करें. अपने स्वभाव की बुरी आदतों को दूर करने की कोशिश करें और फिर आगे बढ़ें. इस सेल्फी में आपको ख़ूबसूरत तो दिखना है, पर बाहरी मेकअप से नहीं, बल्कि प्राकृतिक निखार से. याद रखिए कि आपको तस्वीर में सुंदर कैमरा या तस्वीर खींचनेवाला नहीं बनाता, बल्कि आप ख़ुुद बनाते हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि जब आप अपने जीवन में ख़ुश ना हों, तो किसी और पर दोष मढ़ने से पहले एक बार ख़ुद को परख लें.

– विजया कठाले निबंधे

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