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control cholesterol levels

अनेक अध्ययनों से यह बात साबित हो चुका है कि व्यस्त जीवनशैली, वर्कआउट न करना, बढ़ता तनाव, मोटापा, उच्च रक्तचाप आदि अनेक ऐसे कारण हैं, जो बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल (Cholesterol) की ओर संकेत करते हैं. यदि आप भी उपरोक्त बताए गए किसी एक कारण से परेशान हैं, तो सावधान हो जाएं, क्योंकि आपको ज़रूरत है अपने कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने की…

क्या है कोलेस्ट्रॉल?

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कोलेस्ट्रॉल तैलीय पदार्थ जैसा होता है, जो शरीर की कोशिकाओं में मौजूद होता है. कोलेस्ट्रॉल तैलीय होने के कारण पानी में घुलता नहीं, लेकिन लिपोप्रोटीन (एचडीएल) के कणों के रूप में रक्तप्रवाह के द्वारा शरीर के अन्य अंगों तक पहुंचता है. यह शरीर के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि-

– यह शरीर के कई हार्मोंन्स को नियंत्रित करता है.

– शरीर में विटामिन डी के निर्माण में मदद करता है.

कोेलेस्ट्रॉल के प्रकार

Cholesterol levels

कोलेस्ट्रॉल दो तरह का होता है- गुड कोलेस्ट्रॉल और बैड कोलेस्ट्रॉल. गुड कोलेस्ट्रॉल दिल के दौरे से बचाता है. यह धमनियों से कोलेस्ट्रॉल को निकालकर लिवर में लाने का काम करता है, जबकि बैड कोलेस्ट्रॉल हृदय और दिमाग़ की ओर जानेवाली रक्तनलिकाओं में वसा का निर्माण करता है. वसा के जमा होने से वहां की धमनियां संकुचित होकर अवरुद्ध हो जाती हैं, जिसके कारण हृदय और दिमाग़ जैसे महत्वपूर्ण अंगों में रक्त का संचार धीमा हो जाता है या रुक जाता है और हार्ट संबंधी बीमारियां होने का ख़तरा बढ़ जाता है.

किन कारणों से बढ़ता है कोलेस्ट्रॉल?

– किडनी, थायरॉइड और लिवर संबंधी बीमारियां होने पर.

– अधिक दवाएं खाने से.प खाने में सैचुरेटेड फैट और ट्रांस फैट लेने से.

– वज़न बढ़ने के कारण शरीर में ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ने पर.-

– शारीरिक गतिविधियां कम होने के कारण.

– खानपान में लापरवाही बरतने पर.

– आनुवांशिक कारण.

– बहुत अधिक धूम्रपान करने से.

कोलेस्ट्रॉल के बढ़ने से हो सकते हैं ये ख़तरे

1. धमनियों में कोलेस्ट्रॉल के जमा होने पर वे संकरी हो जाती हैं, जिसके कारण रक्त का संचार सही तरह से नहीं हो पाता और दिल का दौरा पड़ने की आशंका बढ़ जाती है.

2. कोलेस्ट्रॉल के बढ़ने पर रक्त का प्रवाह आंखों तक सही तरह से नहीं हो पाता, जिससे आंखों को नुक़सान पहुंचता है.

3. कुछ स्थितियों में कोलेस्ट्रॉल के बढ़ने पर आंखों के स़फेद भाग पर ग्रे कलर का धब्बा दिखाई देने लगता है.

4. बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल का असर किडनी पर भी पड़ता है.

इनके अलावा कोलेस्ट्रॉल के बढ़ने पर

– सीने में दर्द

– कंधे और गर्दन में सूजन व दर्द

– हाथ-पैर में अचानक दर्द व सिहरन होना

– सांस फूलनाप दिल की धड़कन तेज़ होना

– वज़न बढ़नाप बहुत पसीना आना आदि की शिकायत भी हो सकती है.

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कैसे करें कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित?

– अमेरिकन हार्ट ऑफ एसोसिएशन के अनुसार, सूखे मेवों में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन ई और फैटी एसिड अधिक मात्रा में होते हैं, जो कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करते हैं, इसलिए रोज़ाना आधा मुट्ठी सूखे मेवे ज़रूर खाएं.

– हाल ही में हुए शोधों से यह साबित हुआ है कि  लहसुन खाने से ख़ून में थक्का बनने की आशंका कम हो जाती है. यह धमनियों में प्लाक को जमने से रोकता है, इसलिए नियमित रूप से तीन-चार लहसुन खाएं.

– लहसुन की तरह पालक भी धमनियों में प्लाक को जमने से रोकता है. पालक केवल कोलेस्ट्रॉल के लिए ही नहीं, बल्कि आंखों के लिए भी फ़ायदेमंद होता है.

– ओटमील, राजमा, संतरा, स्प्राउट्स, सेब और नाशपाती में सोल्युबल फाइबर प्रचुर मात्रा में होता है, जो कोलेस्ट्रॉल को कम करता है.

– विटामिन सी से भरपूर आंवला कोलेस्ट्रॉल को रक्त नलिकाओं में जमा नहीं होने देता है.

– हल्दी, मेथीदाना, बैंगन, शकरकंद, भिंडी खाने से कोेलेस्ट्रॉल नियंत्रित रहता है.

– फिश में अमिनो एसिड और फैटी एसिड प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को कम करता है.

– ऐवोकैडो में बीटा सिटोस्टेरॉल नामक कंटेंट होता है, जो कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करता है. इसमें मोनोसैचुरेटेड फैट भी प्रचुर मात्रा में होता है, जिसके कारण शरीर में गुड कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ता है.

– एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी पॉलिटेक्नीक कैंपस में हुए शोध से यह सिद्ध हुआ है कि बीन्स कोलेस्ट्रॉल को कम करता है. नियमित रूप से बीन्स खाने से बैड कोलेस्ट्रॉल में लगभग 8% की कमी आती है, इसलिए काला-स़फेद लोबिया और राजमा डायट में ज़रूर लें.

– ग्रीन टी पीएं. इसमें ऐसे एंटी-ऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करते हैं.

– अंडे की जर्दी, रेड मीट, तला हुआ खाना, क्रीम बेस्ड स्वीट्स- ये चीज़ें कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाती हैं. अत: इन्हें खाने से बचें.

– ऑयली चीज़ें न खाएं. ऑयली चीज़ें खाने से कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है, लेकिन ऑलिव ऑयल का सेवन करने से अन्य तेलों की तुलना में कोलेस्ट्रॉल के ख़तरे को 8% तक कम किया जा सकता है.

– डायट में अधिक-से-अधिक फाइबरयुक्त चीज़ें खाएं.प फैट फ्री डेयरी प्रोडक्ट्स का सेवन करें.

– अपनी मर्ज़ी से अधिक दवाएं न खाएं.

– कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल करने के लिए सप्ताह में कम-से-कम 5 दिन एक्सरसाइज़ ज़रूर करें.

– स्विमिंग, जॉगिंग, साइकिलिंग और एरोबिक्स से भी से कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित किया जा सकता है.

– धूम्रपान से बचें, क्योंकि धूम्रपान करने से धमनियों को नुक़सान पहुंचता है.

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 – पूनम नागेंद्र शर्मा

शरीर के स्वस्थ और संतुलित विकास के लिए हर उम्र में कैल्शियम (Calcium) की आवश्यकता होती है. बढ़ते बच्चों के शरीर, दांतों के आकार और हड्डियों को मज़बूत बनाने के लिए भी कैल्शियम ज़रूरी है. जहां तक महिलाओं का प्रश्‍न है, हमारे देश की अधिकांश महिलाओं में कैल्शियम की कमी पाई जाती है. उनमें इसकी कमी टीनएज से ही रहने लगती है, जो ताउम्र बनी रहती है.

Calcium Deficiency Symptoms

क्यों ज़रूरी है कैल्शियम? 
शरीर की प्रत्येक कोशिका को कैल्शियम की ज़रूरत इसलिए होती है, क्योंकि हमारे शरीर में त्वचा, नाख़ून, बाल और मल के ज़रिए रोज़ ही कैल्शियम की कुछ मात्रा नष्ट होती रहती है, इसलिए कैल्शियम का संतुलन बनाए रखने के लिए इसकी रोज़ ही पूर्ति कर ली जाए, तो अच्छा रहता है. यदि ऐसा नहीं होगा, तो हमारा शरीर हड्डियों से कैल्शियम लेने लगेगा. नतीजा बाहर से भले ही हम कमज़ोर न लगें, लेकिन अंदर ही अंदर हड्डियां खोखली हो जाएंगी और शरीर कमज़ोर. कमज़ोर हड्डियां कई तरह की परेशानियां पैदा करती हैं, जैसे- ज़रा-सी चोट लगने पर ही फ्रैक्चर हो सकता है. यही नहीं, कैल्शियम हृदय, मांसपेशियों, ब्लड क्लॉटिंग के लिए भी बेहद ज़रूरी होता है.
इसके अलावा कैल्शियम मांसपेशियों के कई काम में मदद करता है, जैसे- लिखना, टहलना, बैठना और किसी गेंद कोफेंकना आदि.

  1. कैल्शियम नर्वस सिस्टम के संदेश मस्तिष्क तक पहुंचाने में सहायक है, जैसे- यदि आपने किसी गरम वस्तु को छू लिया है, तो मस्तिष्क तुरंत एक संदेश भेजेगा, जिससे आपके मुंह से आह! आउच! की आवाज़ आएगी और आप अपने हाथ को जल्दी से दूर हटा लेंगे.
    2.  इसके अलावा ये चोट, घाव, खरोंच आदि को भी जल्दी ठीक करने में मदद करता है.
    3. लेकिन यदि शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाए, तो इसके दुष्प्रभाव होते हैं, जो हमें बीमार कर सकते हैं. इन बीमारियों के लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं.कैल्शियम की कमी के लक्षण
    . ब्लड प्रेशर का बढ़नाश्र दांतों का समय से पहले गिरनाश्र शरीर का विकास रुकना
    . हड्डियों में टेढ़ापनश्र शरीर के विभिन्न अंगों में ऐंठन या कंपन
    . जोड़ों का दर्द
    . मांसपेशियों में निष्क्रियता
    . ज़रा-सा टकराने पर हड्डियों का टूटना
    . मस्तिष्क का सही ढंग से काम न करना
    . भू्रण के विकास पर प्रभाव पड़ना
    . हड्डियों का खोखला होना, उनका कमज़ोर होकर टूटना, बार-बार फ्रैक्चर होना
    . कमर का झुकना व दर्द होना
    . हाथ-पैरों में झुनझुनाहट व कमज़ोरी
    . बुज़ुर्गों को ऑस्टियोपोरोसिस हो सकता है यानी फ्रैक्चर व हड्डियों में दर्दये भी पढ़ेंः  कौन सा तेल सबसे सेहतमंद 
    कितना कैल्शियम है ज़रूरी?
    1. सामान्य महिलाओं के लिए प्रतिदिन 1000 मिलीग्राम कैल्शियम की आवश्यकता होती है.
    2. गर्भवती महिलाओं व स्तनपान करानेवाली महिलाओं के लिए प्रतिदिन 1500 मिलीग्राम.
    3. 6 माह के छोटे बच्चों के लिए 400 मिलीग्राम.
    4. 1 साल से 10 साल तक के बच्चों के लिए 800 मिलीग्राम.
    Calcium Foods

कैल्शियम की कमी की पूर्ति कैसे करें?
इस बारे में डॉक्टरों का कहना है कि बीमारी कोई भी हो, शरीर के लिए दुखदायी होती है, इसलिए उसका तुरंत उपचार करना भी ज़रूरी होता है, वरना उसके साथ-साथ शरीर में और भी कई बीमारियां घर कर लेती हैं. यदि हम अपने खानपान का ध्यान रखें, तो बीमारियों को दूर भगा सकते हैं. आइए, जानें कि कैल्शियम हमें किन चीज़ों से मिल सकता है, जिन्हें अपने डायट में शामिल कर हम स्वस्थ रह सकते हैं-
अनाज- गेहूं, बाजरा, मूंग, मोठ, चना, राजमा और सोयाबीन.
सब्ज़ियां- गाजर, भिंडी, टमाटर, ककड़ी, अरबी, मूली, मेथी, करेला और चुकंदर.
फल- नारियल, आम, संतरा और अनन्नास.
डेयरी उत्पाद- दूध व दूध से बनी चीज़ों को कैल्शियम का प्रमुख स्रोत माना जाता है. हर रोज़ दूध का सेवन शरीर में कैल्शियम की मात्रा बनाए रखने में मददगार
होता है.
. मां का दूध नवजात शिशु के लिए कैल्शियम का सर्वोत्तम स्रोत है, जो उनमें कैल्शियम की पूर्ति करता है और स्वस्थ रखता है.
. ये सभी प्राकृतिक रूप से कैल्शियम प्रदान करनेवाले तत्व हैं. ये पदार्थ तुरंत शरीर के द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं. इन्हें अपनी रोज़मर्रा की डायट में शामिल कर हम कैल्शियम की कमी से होनेवाले नुक़सानों से बच सकते हैं.

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हृदय रोगियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए तक़रीबन हर डॉक्टर मरीज़ों को कोलेस्ट्रॉल से बचने की सलाह देते हैं. दिल के मरीज़ों के लिए कोलेस्ट्रॉल अभिशाप के समान है. आइए, शरीर में पर्याप्त मात्रा में कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखने के तरीक़ों और इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं के बारे में जानें.

Risk factors of Cholesterol

कोलेस्ट्रॉल रक्त में पाया जानेवाला वसा (फैट) है. स्वस्थ जीवन के लिए यह बहुत ज़रूरी हैे, परंतु जब रक्त में इसकी मात्रा सामान्य से अधिक हो जाती है, तो रक्त में थक्के जम जाते हैं, जो हृदय के लिए घातक होता है. डॉक्टर्स के अनुसार, किसी भी उम्र के स्त्री-पुरुष में कोलेस्ट्रॉल का स्तर 200 एमजी/डीएल से कम ही रहना चाहिए. हाई कोलेस्ट्रॉल व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवन दोनों को ही ख़तरा व नुक़सान पहुंचा सकता है, क्योंकि रक्त में बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल कोरोनरी धमनियों में अवरोध पैदा करके हार्ट प्रॉब्लम व हार्ट अटैक जैसी घातक स्थिति को जन्म देता है.

 

कोलेस्ट्रॉल क्यों ज़रूरी है?

कोलेस्ट्रॉल शरीर के क्रियाकलाप में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है. यह कोशिकाओं की दीवारों का निर्माण करने और विभिन्न हार्मोंस को बैलेंस करने के लिए भी ज़रूरी होता है. इनमें एचडीएल को अच्छा कोलेस्ट्रॉल तथा एलडीएल को बुरा कोलेस्ट्रॉल कहते हैं.
एलडीएल को बुरा इसलिए कहते हैं, क्योंकि यह कोरोनरी धमनियों में अवरोध उत्पन्न करता है, जिससे रक्त संचार में बाधा होती है और हार्ट अटैक की स्थिति पैदा होती है. एचडीएल कोलेस्ट्रॉल इसलिए अच्छा है, क्योंकि यह धमनियों में अवरोध बनने से रोकता है.

 

कोलेस्ट्रॉल के रिस्क फैक्टर्स

– हाई कोलेस्ट्रॉल से ग्रस्त लोगों में कोई लक्षण तब तक दिखाई नहीं देते, जब तक कोलेस्ट्रॉल दिल व दिमाग़ की तरफ़ जानेवाली धमनियों को काफ़ी संकरा नहीं कर देता है. इसके परिणामस्वरूप सीने में दर्द होता है.
– रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ जाने से पथरी रोग, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और गुर्दे की बीमारी हो सकती है.
– हाई कोलेस्ट्रॉल होने पर ये बढ़ते-बढ़ते नसों में उतर आता है, जिससे चलना-फिरना कठिन हो जाता है.
– हार्ट अटैक, किडनी डिसऑर्डर, थायरॉयड, लकवा जैसे रोग कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने से हो सकते हैं. इनसे बचने के लिए दवा के साथ-साथ अपने खानपान पर ध्यान देना भी ज़रूरी है. कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करके हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक जैसी बीमारियों की वजह से होनेवाली अकाल मृत्यु को रोका जा सकता है.

कोलेस्ट्रॉल के कारण और लक्षण

रक्त में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के कारणों को तीन भागों में बांटा गया है.
– कोलेस्ट्रॉल बढ़ानेवाले आहार यानी वसायुक्त खाद्य पदार्थ का अधिक मात्रा में लगातार
सेवन करना.
– मेटाबॉलिक सिस्टम जब एलडीएल की मात्रा को पर्याप्त रूप में रक्त से बाहर नहीं कर पाता, तो रक्त में एलडीएल का स्तर बढ़ जाता है.
– तीसरी स्थिति वह होती है, जब लिवर कोलेस्ट्रॉल को अधिक मात्रा में बनाने लगता है.
उपरोक्त कारणों को यदि नियंत्रण में रखा जाए, तो हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या उत्पन्न ही नहीं होगी.जहां तक लक्षणों की बात है, तो थकान, कमज़ोरी, सांस लेने में तकलीफ़, अधिक पसीना आना, सीने में दर्द, बेचैनी-सी महसूस होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं.

कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखने के लिए क्या खाएं?

– अपने खानपान में अधिकाधिक मौसमी फल व सब्ज़ियों को शामिल करें.
– इनमें संतरे का जूस प्रमुख है, जिसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है.
– ज़ीरो कोलेस्ट्रॉल वाले पदार्थ, जैसे- ताज़ा फल, सब्ज़ियां और फ़ाइबरयुक्त पदार्थ अपने भोजन में शामिल करें.
– सुबह नाश्ते में कॉर्नफ्लैक्स जैसे आहार फ़ायदेमंद रहते हैं.

ये न खाएं

– रेड मीट का सेवन न करें.
– दूध, बटर, घी, क्रीम यहां तक कि आइस्क्रीम जैसे पदार्थ, जिनमें भारी मात्रा मेें कोलेस्ट्रॉल होता है, खाने से बचें.
– मावा से बनी मिठाइयां स्लो पॉइज़न का काम करती हैं, इनसे दूर ही रहें.
प सिगरेट-शराब का सेवन कम करें.

सावधानियां

– दवा के अलावा कुछ सावधानियों और खानपान में सुधार लाकर भी कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल किया जा सकता है, क्योंकि खानपान व रहन-सहन के तौर-तरीक़ों में बिगड़ते संतुलन की वजह से ही शहरी लोग विशेष रूप से हाई कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) के शिकार हो रहे हैं.
– डॉक्टर की सलाह के अनुसार अपने खानपान और जीवनशैली में परिवर्तन करें.
– शरीर का वज़न बढ़ने न दें. शरीर की एक्स्ट्रा कैलोरीज़ बर्न करें यानी ज़्यादा से ज़्यादा पैदल चलें.
– नियमित एक्सरसाइज़ इसमें मददगार है. जॉगिंग, स्विमिंग, डांसिंग और एरोबिक्स नियमित रूप से करें.
– बिल्डिंग मेें चढ़ने के लिए लिफ़्ट की बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करें.
– यदि आपको हार्ट से जुड़ी बीमारी होने का ज़रा भी शक है, तो तुरंत हार्ट स्पेशलिस्ट की सलाह लें.
– जो लोग चिकनाई वाले आहार कम खाते हैं, उनके शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का अनुपात कम होता है.
– खाद्य पदार्थ ख़रीदते समय उनके लेबल गौर से पढ़ लें. ऐसे ही पदार्थ ख़रीदें, जिनमें वसा और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम हो.

कोलेस्ट्रॉल की जांच

– 20 साल की उम्र से अधिक आयुवालों को हर 5 साल में कोलेस्ट्रॉल का टेस्ट ज़रूर करवाना चाहिए.
– टेस्ट में लिपोप्रोटीन टेस्ट करवाना ज़रूरी होता है, जिससे आपका कोलेस्ट्रॉल लेवल पता चलता है.
– यह भी देखा गया है कि मेनोपॉज़ से पहले एक ही उम्र के स्त्री-पुरुषों में कोलेस्ट्रॉल का स्तर अलग-अलग होता है. स्त्रियों में पुरुषों के मुक़ाबले कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– लेकिन मेनोपॉज़ के बाद स्त्रियों में पुरुषों की अपेक्षा कोलेस्ट्रॉल का स्तर काफ़ी ज़्यादा पाया जाता है.
– ऐसे में मेनोपॉज़ के बाद महिलाओं को अपने कोलेस्ट्रॉल स्तर पर ख़ास ध्यान देना चाहिए.

हाई कोलेस्ट्रॉल को कम करने की होम रेमेडीज़

– 1 कप गर्म पानी में 1-1 टीस्पून शहद और नींबू का रस मिलाकर रोज़ सुबह पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर प्राकृतिक रूप से कम होता जाता है.
– 1 ग्लास पानी में 2 टेबलस्पून साबूत धनिया उबाल लें. ठंडा होने पर छान लें. इसे दिन में दो बार पीएं.
– प्याज़ का रस न स़िर्फ कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है, बल्कि खून साफ़ करके हृदय को भी मज़बूत करता है.
– विटामिन ई से भरपूर डायट लें, जैसे- सूरजमुखी के बीज, सोयाबीन ऑयल, अंकुरित अनाज आदि.
– विटामिन बी 6 भी लें.
– इसके अलावा रोज़ाना लहसुन खाएं. गुग्गुल भी बहुत फ़ायदेमंद है.
– गिलोय और कालीमिर्च पाउडर के मिश्रण को रोज़ाना दिन में दो बार 3 ग्राम की मात्रा में खाएं.
– 1 ग्लास पानी में 1 टीस्पून मेथी पाउडर मिलाकर 1 महीने तक रोज़ खाली पेट पीने से कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है.
– मेथीदाने का नियमित सेवन भी काफ़ी फ़ायदेमंद होता है.
– रोज़ाना 1 टेबलस्पून शहद के सेवन से भी कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण में रहता है.
– कुकिंग के लिए सनफ्लावर ऑयल का ही इस्तेमाल करें.

– ऊषा गुप्ता

 

सावधानः रोज़ाना की ये आदतें आपको कर सकती हैं बीमार (Everyday Habits That Can Make You Sick)

ज़्यादातर लोग लो ब्लड प्रेशर को उतनी गंभीरता से नहीं लेते, जितना हाई ब्लड प्रेशर को. उन्हें अंदाज़ा ही नहीं कि लो बीपी भी ख़तरनाक हो सकता है. इसलिए ज़रूरी है कि समय रहते इसका सही ट्रीटमेंट करवाया जाए.

Risk factors of Low Blood Pressure
क्या है लो ब्लड प्रेशर?

लो ब्लड प्रेशर को हाइपोटेंशन भी कहा जाता है. सामान्य तौर पर किसी भी व्यक्ति का नॉर्मल ब्लड प्रेशर 120/80 होता है. इससे थोड़ा-बहुत ऊपर-नीचे चलता है, पर अगर आपका बीपी 90/60 या उससे भी कम है, तो आपको लो ब्लड प्रेशर की समस्या है. इससे संबंधित अधिक जानकारी के लिए हमने बात की डॉ. जगदीश केनी से.

कारण

प्रेग्नेंसी: प्रेग्नेंसी के दौरान किसी भी महिला का सर्कुलेटरी सिस्टम बहुत तेज़ी से बढ़ जाता है, जिसके कारण ब्लड प्रेशर लो हो जाता है. पर प्रेग्नेंसी के दौरान यह नॉर्मल होता है. बच्चे के जन्म के साथ ही बीपी सामान्य लेवल पर आ जाता है. अगर किसी महिला का बीपी बहुत ज़्यादा लो है, तो उसे रेग्युलर चेकअप की ज़रूरत पड़ती है.
हार्ट प्रॉब्लम्स: हार्ट वाल्व प्रॉब्लम्स, हार्ट अटैक व हार्ट फेलियर के कारण भी बीपी लो हो जाता है.
इंडोक्राइन प्रॉब्लम्स: थायरॉइड, एडिसन्स डिसीज़, लो ब्लड शुगर और कभी-कभी डायबिटीज़ के कुछ मामलों में भी बीपी लो हो जाता है.
डीहाइड्रेशन: शरीर में पानी की कमी के कारण बीपी लो हो जाता है. बुख़ार, उल्टी, डायरिया आदि के कारण डीहाइड्रेशन होता है. ऐसे में लिक्विड डायट पर ख़ास ध्यान दें.
ब्लड लॉस: किसी बड़ी इंजरी या अंदरूनी रक्तस्राव के कारण शरीर में अचानक ख़ून की कमी हो जाती है, जिससे रक्तचाप निम्न हो जाता है.
पोषण की कमी: शरीर में विटामिन बी12 और आयरन की कमी के कारण एनीमिया हो जाता है, जिससे आपका शरीर पर्याप्त मात्रा में रेड ब्लड सेल्स नहीं बना पाता और ब्लड प्रेशर लो हो जाता है.
दवाइयां: हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट प्रॉब्लम्स, पार्किंसन्स डिसीज़, डिप्रेशन की गोलियां या पेनकिलर दवाइयां ज़्यादा लेने से बीपी लो हो सकता है. यौन शक्ति बढ़ानेवाली दवाइयां, जैसे- वियाग्रा लेनेवाले लोग अगर नाइट्रेट बेस्ड सॉरबिट्रेट जैसी दवाएं भी साथ लेते हैं, तो उससे ख़तरनाक तरी़के से बीपी लो हो सकता है.

इसके अलावा चक्कर आने से, डेंगू, मलेरिया, बहुत ज़्यादा इंफेक्शन होने से, अचानक सदमा लगने से, कोई डरावना दृश्य देखने या ख़बर सुनने से भी बीपी लो हो सकता है.

लक्षण:

थकान, कमज़ोरी, चक्कर आना, धुंधला दिखाई देना, त्वचा में पीलापन, शरीर ठंडा पड़ जाना, डिप्रेशन, जी मचलाना, प्यास लगना, तेज़ रफ़्तार से आधी-अधूरी सांसें आना आदि.

क्यों ख़तरनाक है लो बीपी?

अगर आपका बीपी लो है और आप समय पर इसका सही इलाज नहीं करवा रहे, तो आप नीचे दिए गए किसी भी ख़तरे का शिकार हो सकते हैं.

– एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ अगर आपको लो बीपी है और आपमें कुछ दिनों से चक्कर, थकान, उबकाई जैसे लक्षण नज़र आ रहे हैं, तो यह काफ़ी गंभीर हो सकता है. इसके कारण आप हार्ट प्रॉब्लम्स और किडनी फेलियर के शिकार भी हो
सकते हैं.

– इसके अलावा यह आपके नर्वस सिस्टम व ब्रेन को भी डैमेज कर सकता है.

– प्रेग्नेंसी में अगर लो बीपी का ध्यान न रखा गया, तो स्टिल बर्थ (कोख में बच्चे की मृत्यु) जैसे कॉम्प्लीकेशन्स हो सकते हैं.

– स्ट्रोक, डेमेन्शिया (मनोभ्रम), ब्रेन डिसऑर्डर, किडनी डिसीज़ आदि से पीड़ित हो सकते हैं.

– चक्कर आने से कई बार लोग गिर सकते हैं और उन्हें गंभीर चोट भी आ सकती है.

– इसके कारण शॉक (सदमा पहुंचना) भी लग सकता है, जिससे शरीर के कई ऑर्गन्स बुरी तरह डैमेज हो सकते हैं और यह प्राणघातक भी हो सकता है.

– अंदरूनी रक्तस्राव के कारण ब्लड इंफेक्शन की आशंका बढ़ जाती है.

क्या करें?

– डॉक्टर हमेशा खाने में नमक की मात्रा कम करने की सलाह देते हैं, पर लो बीपी से पीड़ित लोगों को सोडियम की मात्रा थोड़ी ज़्यादा ही रखने की सलाह दी जाती है. अगर आपको ज़्यादा नमक पसंद नहीं, तो आप सोया सॉस आदि ले सकते हैं, पर नमक की मात्रा बढ़ाने से पहले अपने डॉक्टर से कंसल्ट ज़रूर कर लें.

– भरपूर पानी पीएं. हालांकि यह सलाह तो सभी के लिए है, क्योंकि पर्याप्त पानी हर किसी के लिए उतना ही ज़रूरी है, पर अगर आपको लो बीपी है, तो यह बहुत ज़्यादा फ़ायदेमंद हो सकता है.

– पैरों में ब्लड प्रेशर बढ़ाने के लिए कंप्रेशन स्टॉकिंग्स का इस्तेमाल करें.

– जब बीपी अचानक लो हो जाए, तो पेशेंट को तुरंत फर्स्ट एड दें. पेशेंट को तुरंत पीठ के बल लिटाकर पैरों के नीचे 2 तकिए रखें, इससे ब्रेन की तरफ़ ब्लड सप्लाई बढ़ जाती है और उसे राहत मिलती है.

– अल्कोहल से दूर रहें.

– बहुत ज़्यादा देर तक खड़े न रहें.

– बहुत ज़्यादा देर तक बैठे या लेटे रहने के बाद अचानक खड़े न हो जाएं. धीरे-धीरे उठें, इससे बीपी अचानक से बढ़ता-
घटता नहीं.

– चलते व़क्त ध्यान रखें, ताकि चक्कर खाकर गिरने से बच सकें.

– एक्सरसाइज़, योगा, स्विमिंग, वॉकिंग और साइकलिंग से रोज़ाना ब्लड प्रेशर को रेग्युलेट कर सकते हैं.

– अपने खाने में कार्बोहाइड्रेट युक्त पदार्थों, जैसे- आलू, चावल, बे्रड, पास्ता आदि की मात्रा कम कर दें.
श्र लो बीपी वालों के लिए हंसना बहुत फ़ायदेमंद होता है. सुबह-सुबह ज़ोर-ज़ोर से हंसने से आपके ब्लड प्रेशर को नॉर्मल होने में मदद मिलती है.

बचाव

– ज़्यादा से ज़्यादा तरल पदार्थों का सेवन करें. इससे आप डीहाइड्रेशन के शिकार नहीं होंगे.

– बहुत ज़्यादा गर्म पानी से नहाने से बचें. इसके कारण शरीर का तापमान बढ़ सकता है.

– 6-8 घंटे की पर्याप्त नींद लें, क्योंकि थकान भी लो बीपी का कारण बनता है.

– नियमित अंतराल पर थोड़ा-थोड़ा खाना खाएं.

– अगर आपने अभी-अभी एंटी डिप्रेशन की टैबलेट्स शुरू की हैं और खड़े होने पर सिर चकराता है या बहुत हल्का महसूस करते हैं, तो तुरंत अपने डॉक्टर को बताएं.

– हेल्दी डायट अपनाएं. अपने खाने में साबूत अनाज, फ्रूट्स, वेजीटेबल्स और फिश शामिल करें.

– जो लोग आउटडोर एक्टीविटीज़ ज़्यादा करते हैं या जिन्हें बहुत ज़्यादा पसीना आता है, उन्हें नींबू पानी पीना चाहिए.

– स्ट्रेस से दूर रहें और पॉज़ीटिव सोचें.

होम रेमेडीज़

– 10-15 किशमिश को सिरामिक बाउल में रातभर के लिए भिगोकर रख दें. सुबह सबसे पहले एक-एक कर किशमिश चबा-चबाकर खाएं और पानी पी जाएं.

– 7 बादाम को रातभर भिगोकर रखें. छीलकर, पीस लें और गुनगुने दूध में मिलाकर लें.

– 10-15 तुलसी के पत्तों को पीसकर छान लें. 1 टीस्पून शहद मिलाकर सुबह खाली पेट लें.

– दिन में दो बार बीटरूट और कैरेट का जूस पीएं.

– रोज़ाना एक कप ब्लैक टी लें. कैफीन ब्लड प्रेशर बढ़ाने में मदद करता है.

– लो ब्लड प्रेशर में अनार बहुत फ़ायदेमंद होता है. चाहे फ्रूट खाएं या जूस पीएं, दोनों ही लाभदायक हैं.

– पनीर हर फॉर्म में फ़ायदेमंद है, पर अगर कच्चा ही खाएं, तो और भी अच्छा है.

– प्याज़, मटर, ब्रोकोली, गाजर आदि को डायट में शामिल करें.

– हींग को तवे पर हल्का-सा भूनकर पानी के साथ लें.

– नमक-शक्कर का घोल लो बीपी वालों के लिए फायदेमंद होता है.

– रात को 2-3 अंजीर भिगोकर सुबह खाएं. डायबिटीज़ के मरीज़ स़िर्फ एक ही अंजीर खाएं.

– सुनीता सिंह