Satire Story

मैंने अक्सर कई बुद्धिजीवी प्रजाति के लोगों से सुना है कि सोच बड़ी होनी चाहिए. सुन-सुनकर मेरे पतझड़ ग्रस्त दिल में भी सावन जाग उठा है. ज़िंदगी के इंटरवल के बाद वाली लाइफ में पसरे रेगिस्तान के लिए शायद सोच ही ज़िम्मेदार है. सोच को लार्जर देन लाइफ होना चाहिए था, पर हुआ उल्टा. लाइफ बढ़ती गई और सोच सिमटती गई.

मैं अपनी तुच्छ सोच को लेकर दुखी हूं. सीनियर सिटीजन होने की सीमा रेखा पर खड़ा होकर भी सोच के मामले में अभी नाबालिग हूं. बुद्धिलालजी हमेशा कहते रहते हैं कि आदमी को बडा सोचना चाहिए (वैसे अभी तक उन्होंने सोच की साइज़ नही बताई है). वो सबको सलाह देते हैं- जीवन में तरक़्क़ी करना है, तो बड़ा सोचो. हालांकि बड़ा सोचने के मामले में उनकी सोच को लेकर मुझे थोड़ा डाउट है, क्योंकि अपनी शिक्षा को लेकर उन्होंने हाई स्कूल से बड़ा सोचा ही नहीं. तीन दिन पहले भी मुझे सुनाकर कह रहे थे, ” आदमी बेशक गली कूचे का लेखक हो और उसकी रचना मोहल्ले के साप्ताहिक अख़बार के अलावा कहीं न छपती हो, पर उसकी सोच बड़ी होनी चाहिए.”
मैंने अक्सर कई बुद्धिजीवी प्रजाति के लोगों से सुना है कि सोच बड़ी होनी चाहिए. सुन-सुनकर मेरे पतझड़ ग्रस्त दिल में भी सावन जाग उठा है. ज़िंदगी के इंटरवल के बाद वाली लाइफ में पसरे रेगिस्तान के लिए शायद सोच ही ज़िम्मेदार है. सोच को लार्जर देन लाइफ होना चाहिए था, पर हुआ उल्टा. लाइफ बढ़ती गई और सोच सिमटती गई. अब बुद्धिलालजी कहते हैं कि बड़ा आदमी होने के लिए सोच बड़ी होनी चाहिए. ये एक बड़ी समस्या है मेरे लिए, क्योंकि सोच बढ़ाने वाला फाॅर्मूला कहां से लाऊं. बड़ा आदमी तो मैं बचपन से होना चाहता था, पर तब घरवालों ने मिसगाइड कर दिया. अब्बा श्री बोले थे, “पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब (बड़ा आदमी).”
जब पढ़ने लगा, तो साहित्य ने मिसगाइड कर दिया- बड़ा (आदमी) हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर… (रहीम के दोहे भी मेरे बड़े होने के पक्ष में नहीं थे) अब्बा श्री और मास्साब दोनों चाहते थे कि मैं पढ़-लिख कर बड़ा आदमी बनूं. तब किसी ने नहीं बताया था कि बड़ा आदमी होने के लिए शिक्षा नहीं, सोच बड़ी होनी चाहिए. सोच कुपोषण का शिकार हो गई.
हमारे एक विद्वान मित्र हैं, जो बड़ा आदमी होने का वर्कशॉप चलाते हैं. इस काम में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की है. मुझे उनसे गहरी ईर्ष्या है, (क्योंकि पैंसठ साल के बाद भी वो सफ़ेद दाढ़ी में जवान बने हुए हैं) अख़बार में छपी उनकी एक गाइडलाइन के मुताबिक़- बड़ा होने के लिए आदमी को अपनी सोच बड़ी करनी होगी. पिछला पूरा साल मैं सिर्फ़ कोरोना के बारे में ही सोचता रहा, लिहाज़ा सोच बड़ा करने का कोई मौक़ा नहीं मिला. पूरा देश बड़ा सोचने की जगह कोरोना को छोटा करने में लगा था. इस साल मेरे लिए बेकारी एक बड़ी समस्या है, पर इस हालत में भी मैं बड़ा सोचना चाहता हूं. प्रॉब्लम ये है कि कभी किसी ने सिखाया ही नहीं कि बेकारी में बड़ा कैसे सोचा जाता है. मेरे जैसा छोटा आदमी, जिसकी सोच- दाल, चावल और रोटी से ऊपर जाती ही नहीं, वो क्या खाक नीरव मोदी या विजय माल्या जैसी बड़ी सोच ला पाएगा.
पर अब मैं मानूंगा नहीं, मुझे हर हाल में बड़ा बनना है. लिहाज़ा मैं हर उस महापुरुष से दीक्षा लेना चाहता हूं, जो बड़ा सोचने का हुनर जानते हैं. एक बार मैं बड़ा सोच कर देखना चाहता हूं. वैसे मैं अपनी तरफ़ से जब भी बड़ा सोचने की कोशिश करता हूं, तो बेगम जली-कटी सुना देती हैं, “कुछ काम भी करोगे या पड़े-पड़े सोचते ही रहोगे. वसीयत कर जाऊंगी कि लड़की कुंवारी मर जाए, पर किसी लेखक से शादी ना करे.” देख लिया न, बड़ी सोच के रास्ते में किस क़दर स्पीड ब्रेकर खड़े हैं.
मैंने बड़ी सोच के बारे में वर्माजी से जानकारी मांगी, तो वो भड़क उठे, “जीडीपी तेरे कैरेक्टर की तरह नीचे गिर रहा है और तू सोच बड़ी करने में लगा है. मूर्ख! ज़्यादातर लोगों ने अपने काले धंधे का नाम ही बड़ी सोच रख दिया है.” मैं फिर भी चौधरी से पूछ बैठा, “मै बड़ा सोचना चाहता हूं.” चौधरी ने ग़ुस्से में जवाब दिया, “मेरी तरफ़ से रुकावट कोन्या, तू बड़ा सोचे या सल्फास खाए, पर पहले म्हारी उधारी चुकता दे! मोय भैंसन कू हिसाब देना पड़ ज्या. कदी समझा कर.”
बड़ा कैसे सोचूं, बस यही सोच-सोचकर वज़न घटा लिया है. शायद मेरा बैकग्राउंड ही बड़ी सोच में बाधक है. यूपी के छोटे से गांव में पैदा हुआ, छोटा-सा आंगन, ऊपर मेरे हिस्से का आसमान. साझी धूप की विरासत में पलते छोटे-छोटे सपने! मां-बाप की ख़ुशी और नाख़ुशी के एहतराम में झूमती गेहूं की सुनहरी बालियों की मानिंद जवानी आई, तो उन्हीं छोटे सपनों को लिए दिल्ली आ गया. दिल्ली में पैर जमे संगम विहार में, जो प्रदेश की सबसे बड़ी सुविधाविहीन क्लस्टर कॉलोनी है. यहां कुछ और सोचने से पहले प्राणी को पीनेवाले पानी के बारे में सोचना पड़ता है. सारे सपने पानी, राशन और सड़क के हैंगर पर टंगे मिलते हैं. मेरी यही प्राॅब्लम है, जब भी बड़ा सोचने की कोशिश करता हूं, सारी सोच राशन कार्ड लेकर दुकान के सामने खड़ी हो जाती है. पेट से बंधी छोटी सोच!
फिर भी बड़ी सोच के लिए आज भी दिल है कि मानता नहीं…

Sultan Bharti
सुलतान भारती


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तुम समझती क्यूं नहीं, मैं आधुनिक युग के डाॅगी कल्चर की बातें कर रहा हूं. जहां यह डाॅगी भी घर के फैमिली मेंबर की तरह रहते हैं. जो अपने यहां के सर्वहारा कुत्तों की तरह होमलेस नहीं होते हैं. यहां के डाॅगी हमारे यहां के देसी कुत्तों की तरह बदतमीज़ और बददिमाग़ भी नहीं होते कि किसी को नए फैशन के या अलग डिज़ाइन के कपड़ों में भी देख लें, तो भौंक-भौंक कर उसका हाल बेहाल कर दें.

सिंगापुर के सन्टोसा के समुद्रतट पर शर्माजी अपनी पत्नी के साथ पहुंचे, तो वहां छुट्टी का दिन होने के कारण अच्छी-ख़ासी भीड़ थी. सिंगापुर में रहनेवाले यूरोपियन और विदेशी लोग अपने-अपने परिवार, जिसमें कुत्ते भी शामिल थे, सब एक साथ मिलजुल कर स्नान कर रहे थे. शर्माजी वहीं बैठ पानी में स्नान करती बालाओं के साथ, स्नान करते कुत्ते को देखने में ऐसे व्यस्त थे कि होश ही नहीं रहा कि उनकी नज़रों की हरकतें, बगल में बैठी पत्नी के दिमाग़ पर कुछ ऐसा असर डाल रहा था कि वह कभी भी करारी चोट कर सकती थी. पत्नी के मूड का पता चलते ही उनका तनावरहीत दृश्याअवलोकन, तनावपूर्ण हो गया. वह पत्नी की तरफ़ देखकर सूखी हंसी हंसते हुए बोले, ‘‘कैसे ऊन के गोले जैसे मुलायम बालोंवाले डॅागी यहां स्नान कर रहे हैं. जितने ही प्यारे-प्यारे डाॅगी है, उतने ही प्यार और अदा से उनकी मालकिन, उन्हे मुलायम तौलिया से सुखा भी रही है. जानवरों के प्रति अद्भूत प्रेम का ऐसा अनूठा उदाहरण देख मन तृप्त हो गया.’’
“वो तो मैं देख ही रही हूं कि किस कदर ऊन का गोला बनने को बेहाल हो. ऐसा प्यार तो कभी पटना में जानवरों के प्रति दिखा नहीं. घर आए चूहें, बिल्लियों और कुत्ते के पीछे लट्ठ लेकर ऐसे पड़े रहते हो, जैसे आंतकवादियों के पीछे हमारे देश के जवान लगे रहते हैं. अगर ग़लती से भी कोई जानवर तुम्हारे आसपास आ जाए, तो उसकी खैर नहीं. फिर यहां आकर अचानक यह पशु प्रेम कहां से उमड़ा? कही फिरंगी बालाओं का रंग तो नहीं चढ़ गया?’’
‘‘तुम महिलाओं की भी ग़ज़ब फ़ितरत होती है. किसी महिला पात्र के पक्ष में पति के मुंह से दो शब्द निकले नहीं कि उसका चरित्र ही संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर देती हो. तुम समझती क्यूं नहीं, मैं आधुनिक युग के डाॅगी कल्चर की बातें कर रहा हूं. जहां यह डाॅगी भी घर के फैमिली मेंबर की तरह रहते हैं. जो अपने यहां के सर्वहारा कुत्तों की तरह होमलेस नहीं होते हैं. यहां के डाॅगी हमारे यहां के देसी कुत्तों की तरह बदतमीज़ और बददिमाग़ भी नहीं होते कि किसी को नए फैशन के या अलग डिज़ाइन के कपड़ों में भी देख लें, तो भौंक-भौंक कर उसका हाल बेहाल कर दें. जिनका जीवन ही बिल्लियों और गिलहरियों पर भौंकने और एक अदद टाट के टुकड़े पर गुज़र जाती है, उनकी तुलना तुम इन विदेशी नस्ल के डाॅगी से कर रही हो.

Satire Story

इनका जीवन ही एसी में सोने और कार में घूमने से शुरू होता है. देख ही रही हो न, इन्हें कितने प्यारे-प्यारे नामों से बुलाया जा रहा है. कुछ डाॅगी ने तो कपड़े भी पहन रखे हैं और बच्चों की तरह. कई इन सुंदरियों के गोद में चिपके हुए हैं, तो कई कंधों पर लटके हुए हैं.”
‘‘इन चोंचलों से क्या होता है. कुत्ता तो कुता ही रहेगा, चाहे किसी देश का हो. यहां की फिरंगी बालाएं ख़ुद कपड़े पहनने से तो रहीं, कुत्ते को ही पहनाकर ख़ुश हो लेती हैं, यही बहुत है. जहां तक बच्चों का सवाल है, इनकी फ़ितरत ही नहीं होती है अपने बच्चे को गोद में बैठाने की, पर पशु प्रेम के नाम पर कुत्ते को ज़रूर गोद में बैठाएंगी.’’

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‘‘तुम्हे समझाना बेकार है. तुम्हे इन डॅागियों की जानकारी ही नहीं हैं, वरना इतने प्यारे-प्यारे नामों वाले इन डाॅगियों को कम से कम कुत्ता कहकर अपमानित नहीं करती.”
अब उनकी पत्नी का संयम जवाब देने लगा था, “अब लो सुनो इनकी बात… कुत्ता को कुता न कहूं, तो और क्या कहूं जी! जहां तक मेरी जानकारियों का सवाल है, उसे तो तुम चुनौती दो ही मत. क्योंकि तुम्हे शायद पता नहीं, जितना कुत्ता यहां बालाओं की गोद में नज़र आ रहा है, उससे दोगुने कुत्ते तो मेरे नाना आदित्य बाबू के घर के दरवाज़े पर बैठे नज़र आते थे.’’
‘‘भला वो क्यों? क्या तुम्हारे नानाजी, कुत्तों का व्यापार करते थे?’’
‘‘चुप करो, यह उनका पशु प्रेम था. वह आसपास रहने वाले उन सर्वहारा कुत्तों को बचाने के लिए बहुत काम करते थे. यहां तक की उनके लिए लंगर चलवाते थे, ताकि उन्हे घूरे पर अपना भोजन खोजना ना पड़े. उनके घर से पचास-पचास कोस तक लोग उनके कुत्ता प्रेम की चर्चा करते थे.’’
‘‘तब तो लोग अपने बच्चों को यह भी कहते होंगे कि सो जा, नहीं तो आदित्य बाबू के कुत्तें भौंकने लगेंगे.’’
‘‘जी नहीं ऐसा कुछ नहीं कहते थे. वह शुरू से ही बेज़ुबानों की देखभाल करते थे, इसलिए लोग उनका सम्मान करते थे. तुम मेरा मज़ाक उड़ाने की कोशिश मत करो, क्योंकि तुम्हारी अपनी ही सारी जानकारियां आधी-अधूरी है.’’
‘‘और तुम्हारी जानकारियां सिर्फ़ उन लावारिस और सर्वहारा देसी कुत्तों तक सीमित है.”
‘‘ख़बरदार जो मेरे नानाजी के कुत्तों को तुमने लावरिस और सर्वहारा कहा. तुम्हे पता भी है मेरे नानाजी जिस किसी भी कुत्ते को घर में पालते थे, वे सभी काफ़ी बढ़िया नस्ल के कुत्ते होते थे. पूरी तरह उच्चवर्गीय. उनकी धीमी गुर्राहट और सधी चाल में उच्चवर्गीय रोब देख, लोगो के पसीने छूट जाते थे. उनकी एक ख़ासियत और होती थी कि जैसा उनके पालनहार का स्वभाव होता, वही स्वभाव वे कुत्ते भी अपना लेते थे. वहां एक-दो कुत्ते नहीं थे. घर के ज़्यादातर सदस्यों ने अपनी-अपनी पसंद के हिसाब से अपने लिए कुत्ते पाल रखे थे.”
‘‘फिर भी तुम्हे मेरी जानकारियों पर संदेह है, तो तुम्हे बता दूं कि नानाजी ने ख़ास अपने लिए एक कुत्ता पाल रखा था शेरू. उसे उन्होंने नेपाल से मंगवाया था. उसकी शक्ल-सूरत तो नाम के अनुकूल ही था, पर स्वभाव पूरी तरह नानाजी पर था. नानाजी की तरह ही धीर-गंभीर शांत और कम बोलनेवाला. जब घर के बाहर आहाते में, घर के सारे कुत्ते, दुश्मन की आशंका पा, अपनी पूरी ताकत लगा भौंकते रहते, शेरू बरामदे में खड़ा-खड़ा सब का निरीक्षण करते रहता. फिर दो-चार बार भौंक कर उन्हे भौंकते रहने की प्रेरणा दे, वापस आकर नानाजी के आराम कुर्सी के नीचे बैठ जाता.”
‘‘उसका यह रवैया, छोटे नानाजी के कुत्ते बहादुर को पूरी तरह नापसंद होता. मौक़ा मिलते ही वह शेरू पर झपट पड़ता. छोटे नानाजी नानाजी के भाई लगते थे और उनके बिज़नेस में हाथ बंटाते थे. जितने वह ख़ुद ईर्ष्यालु और झगड़ालू थे, उनका बहादूर भी उनसे ज़रा सा भी उन्नीस नहीं था. घर के सभी कुत्तों पर अपना रोब बनाए रखने के लिए बात-बेबात दूसरे कुत्तों पर गुर्राता रहता था. अजनबियों पर भौंकता, तो बहुत तेजी से था, पर जैसे ही कुछ मार कुटाई की आशंका होती सभी कुत्तों को आगे कर ख़ुद पीछे जाकर दुबक जाता. पर वैसे दिनभर घर के दूसरे कुतों से लड़ते-झगड़ते रहता था. ख़ासकर मौसी के कुत्ता पप्पी से खार खाए रहता. मौसी का कुत्ता पप्पी, मौसी का लाडला तो था ही उनकी ही तरह पूरे ठाठ-बाट से रहता भी था.

मौसी उसके लिए तरह-तरह के बिस्किट लातीं और घर पर भी उसके लिए उसकी पसंद का मांसहारी भोजन बनवाती, जो सिर्फ़ उसे ही खाने को मिलता. उसके शैम्पू, साबुन सब दूसरे कुत्तों से अलग होते. उसकी प्यारी-सी सूरत देख, सभी उसे प्यार से सहलाते रहते. जिससे घर के दूसरे कुत्ते उससे खार खाए रहते. जब भी वह अकेला मिलता, उसे काट खाते, ख़ासकर बहादुर हमेशा उसके पीछे लगा रहता. शायद उसे लगता एक ही वर्ग का होकर यह हमें ठसक दिखाता है. हम लोंगो से ज़्यादा सुविधा मिल जाने से यह पाखंडी, तरह-तरह के ढोंग कर घर के सभी लोगों का प्यार पाता है. इसलिए बहादुर हर समय तना रहता और मौक़ा मिलते ही काट खाता. इतना ही नहीं पड़ोस का पप्पू भी मौक़ा मिलते ही पप्पी को मारता-पिटता रहता, क्योकि उसके नाम से मिलता-जुलता नाम होने के कारण सब उसे चिढ़ाते रहते.’’
“नानी ने भी एक कुत्ता पाल रखा था, जिसका नाम उन्होने सुलतान रखा था. लेकिन सुलतानों वाली कोई बात उसमें नहीं थी. वह नानी मां की तरह ही सरल था और हमेशा काम में व्यस्त रहता. कभी वह मासी के बेटा के साथ गेंद खेलता, तो कभी मामा के बेटी के साथ खेलता.कभी बहादुर का ग़ुस्सा शांत करने के लिए अपनी रोटी भी उसे दे देता. पूरी तरह नानी की तरह सब का ख़्याल रखता.’’

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पत्नी से उलझकर शर्माजी ने ख़ुद अपनी शामत बुला ली थी. उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि पत्नी को कैसे चुप करवाएं. वह साष्टांग दंडवत करते हुए बोले, ‘‘बस बस… अब बस भी करो. मैं मान गया, तुम महान हो और महान ही बनी रहो. मुझे अपनी लघुता स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है, इसलिए अब अपनी नानी घर की कहानी बंद करो. आज से और अभी से मैं प्रण करता हूं कि कभी भूल कर भी तुम्हे चुनौती नहीं दूंगा.”
तब कहीं जाकर कुत्तों की कहानी बंद हुई और वह सेन्टोसा के दूसरे समुद्री तटों का अवलोकन कर पाएं.

Rita kumari
रीता कुमारी
Kahaniya

पीने को मयस्सर है मेरे देश में सब कुछ
वो सब्र हो या खून ये क़िस्मत की बात है…
आंदोलन के बगैर आज़ादी भी कहां हासिल होती. आंदोलन इंसान के ज़िंदा और चेतन होने की निशानी है. आंदोलन व्यवस्था को निरंकुश और विषाक्त होने से रोकता है (बशर्ते आंदोलन सकारात्मक और जनहित में हो).

अनवरत खोज हो रही है, सियासत के महारथी अब साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं. इसी परंपरा में बिल्कुल ताज़ा-ताज़ा एक शब्द साहित्य में लॉन्च हुआ है- आंदोलन जीवी! पता नहीं ये शब्द कितने जीबी का है, पर इस शब्द के अवतार लेते ही देवासुर संग्राम जैसी सिचुएशन बन गई है. दोनों तरफ़ से कथित बुद्धिजीवी नए-नए शब्द मिसाइल टेस्ट कर रहे हैं. एक पक्ष ये साबित करने में एडी चोटी का ज़ोर लगा रहा है कि उनके श्रीमुख से जो देववाणी निकल चुकी उसे ही सत्यम शिवम सुंदरम मान लिया जाए, वरना आस्था में तर्क का अर्थ बगावत समझा जाएगा. इस नए शब्द को आज से हिंदी शब्दकोश में शामिल कर उसका कुपोषण दूर किया जाए. आगे और भी क्रांतिकारी खोज के लिए तैयार रहें.
लेकिन विरोधियों ने इस शब्द को लेकर बवाला मचा दिया. सोशल मीडिया पर तमाम वैज्ञानिक उतर आए और नए-नए जीवी की ख़ोज शुरु हो गई. जैविक हथियारों के इस्तेमाल पर हालांकि रोक लगी है, फिर भी रोज़ सोशल मीडिया पर बुद्धिजीवी हैं कि मानते नहीं. रोज़ाना कुछ नई खोज लाॅन्च कर दी जाती हैं. तुम एक जीवी दोगे, वो दस लाख देगा के तर्ज़ पर जीवी भंडार में वृद्धि हो रही है. इस श्रृंखला में अब तक लुकमा जीवी, भाषण जीवी, नफ़रत जीवी, ईवीएम जीवी जैसे शब्द आ चुके हैं और हर दिन फेस बुक उर्वर और साहित्य गौरवांवित होता जा रहा है. वैलेंटाइन डे के अगले दिन हमारे एक विद्वान मित्र ने एक ग़ज़ब की पोस्ट फेस बुक पर डाली. कल वो प्रेम जीवी लगीं और आज ज़ुल्म जीवी… (पता नही उनकी धर्मपत्नी ने ये पोस्ट देखी या नहीं).
मुझे अभी तक सिर्फ़ दो तरह के जीवी की जानकारी थी, एक बुद्धिजीवी दूसरा परजीवी (वैसे ईमानदारी से देखा जाए, तो हर बुद्धिजीवी एक सफल परजीवी होता है) बुज़ुर्गो ने कहा भी है- मूर्खों के मुहल्ले में अक्लमंद भूखा नहीं रहता… (फौरन परजीवी बन जाता है) इस तरह देखा जाए, तो मच्छर जैसे बदनाम परजीवी की औकात बुद्धिजीवी के सामने कुछ भी नहीं है. मच्छर का शिकार बहुत कम मरता है और बुद्धिजीवी का शिकार बहुत कम बचता है. परजीवी के खून पीने की घोर निंदा होती है, जबकि बुद्धिजीवी प्रशंसित होता है. पीने की इस नियति पर मुझे अपना ही एक शेर याद आ जाता है-
पीने को मयस्सर है मेरे देश में सब कुछ
वो सब्र हो या खून ये क़िस्मत की बात है
आंदोलन के बगैर आज़ादी भी कहां हासिल होती. आंदोलन इंसान के ज़िंदा और चेतन होने की निशानी है. आंदोलन व्यवस्था को निरंकुश और विषाक्त होने से रोकता है (बशर्ते आंदोलन सकारात्मक और जनहित में हो). आंदोलन जीवी वो होते हैं, जो किराए पर आते हों. अपना खेत-खलियान छोड़कर परिवार के साथ सड़क पर रात काटनेवाले आंदोलन जीवी नहीं, बल्कि जीवित आंदोलन होते हैं. इस आंदोलन से कौन अल्प जीवी बनेगा और कौन दीर्घ जीवी इसकी भविष्यवाणी कोई नहीं कर सकता. विलुप्तप्राय और मरणासन्न विपक्ष पर आराेप है कि वो किसानों को बरगला रहा है. ‘बरगलानेवाला आरोप उस विपक्ष पर है, जो ख़ुद गरीबी रेखा से नीचे खड़ा मुश्किल से अपना पाजामा संभाल रहा है. उसके पिंजरे के बचे-खुचे तोते कब नज़रें फेर कर उड़ जाएं- कोई भरोसा नहीं.
आंदोलन और जीवी की जंग में पानीपत का मैदान बनी दिल्ली बेहाल है! अंदर कोरोना और केजरीवाल, बाहर कील और कांटो से घिरा किसान. हाहाकार में पता लगाना मुश्किल है कि कौन किससे लड़ रहा है. न्यूज़ देख कर जनता कंफ्यूजन का शिकार है. ऊपर से मीडिया की भूमिका ने नरो वा कुंजरो… का भ्रम बना रखा है. खुले मैदान में परजीवी मच्छर किसानों की नींद का जायज़ा ले रहे हैं. संभावनाओं के घने कुहरेे में देश को विश्व गुरू होने की सलाह दी जा रही है. सोशल मीडिया पर ज्ञान की गंगा उतारी जा रही है.

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Sultan Bharti
सुलतान भारती
Rang Tarang

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एक समर्थक चोर को सूचना दे रहा है, “पिछली रात सुकई चाचा के घर में चोर घुसा और सब कुछ लूट लिया. ग़लती सरासर सुकई की है, उसे आंख खोल कर सोना चाहिए था.”
चोर ने मुंह खोला, “मैं तो गांव हित में सोता ही नहीं! पूरी रात चिंतन, मनन और खनन में बीत जाती है. ख़ैर, पुलिस भी आई होगी?”

मेरे गांव में चोर को चोर नहीं कहा जाता! कैसे कहें- चोर बुरा मान जाएग. फिर गांधीजी ने कहा भी है कि बुरा मत मत कहो, बुरा मत सुनो और बुरा मत देखो! गांव वाले अक्षरशः पालन करते हैं. चोरी करते देख कर लोग आंखों पर गांधारी पट्टी बांध लेते हैं. चोर को बुरा कहने की जगह पीड़ित की ग़लती निकालते हैं. चोर के अतीत और वर्तमान पर कुछ इस तरह अध्यात्म छिड़कते हैं, “वो अगर चोर है, तो इसके लिए वो नहीं उसके हालात कुसूरवार हैं. चोर को नहीं हमें उसके हालात की निन्दा करनी चाहिए. पाप और पापी का ये रहस्यवाद गांववाले निगल रहे हैं. अब आगे से जब भी चोरी होगी चोर की जगह हालात को ढूंढ़ा जाएगा. अपराध की इस नई नियमावली से सबसे ज़्यादा स्थानीय पुलिस ख़ुश है.
गांववाले जानते हैं कि वह चोर है, पर संस्कार से मजबूर हैं. चोर को चोर नहीं कह सकते. चोर को चोर कहने के लिए जो नैतिक साहस चाहिए, वो अब ऑउट ऑफ डेट हो चुका है. उल्टे गांव के लोग चोर से बडे़ सम्मान के साथ पेश आते हैं. चोर भय बिन होय न प्रीत की हकीक़त जानता है. कई लोग उसके फन से भयभीत होकर इसके पक्के समर्थक बन गए हैं. उनमें से कई उसके चौपाल में चिलम पीने भी पहुंच जाते हैं. चोर का जनाधार बढ़ रहा है, मगर गांव बंट रहा है. समर्थक उसके पक्ष में चमत्कारी दलील दे रहे हैं, “वो चोर नहीं दरअसल संत है.’ विरोधियों को चोरी नहीं करने दे रहा है, इसलिए वो लोग एक संत को चोर कह रहे हैं. संत के आने के बाद विरोधियों की आपदा बढ़ गई और चोरी करने का अवसर गायब हो गया.”
चोर का एक और समर्थक आध्यात्म का सहारा ले रहा है, “हमें चोर से नहीं चोरी से घृणा करना चाहिए. क्या पता कब चोर का हृदय परिवर्तन हो जा. अंगुलिमाल पहले डकैत थे बाद में संत हो गए. ये जो चोर और डाकू होते हैं न, उन्हें ‘संत’ होते देर नहीं लगती. हमें तो भइया पूरा यक़ीन है कि सिद्ध प्राप्ति का कठिन मार्ग चोरी और डकैती से ही निकल कर जाता है. अपन तो कभी भी उसे चोर नहीं मानते, क्या पता कब चोर और भगवान दोनों बुरा मान जाएं… (भगवान तो मान भी जाते हैं, पर चोर की नाराज़गी अफोर्ड नहीं कर सकते. क्या पता कल आंख खुले, तो तो घर स्वच्छ भारत अभियान से गुज़र चुका हो)
गांव के दो-चार मुहल्ले अभी भी विरोध में हैं, पर नक्कारखाने में तूती की आवाज़ कौन सुने, जबकि अब खुलकर चोर को संत घोषित किया जा रहा है. सुबह देर से उसके चौपाल में पहुंचा. एक समर्थक चोर को सूचना दे रहा है, “पिछली रात सुकई चाचा के घर में चोर घुसा और सब कुछ लूट लिया. ग़लती सरासर सुकई की है, उसे आंख खोल कर सोना चाहिए था.”
चोर ने मुंह खोला, “मैं तो गांव हित में सोता ही नहीं! पूरी रात चिंतन, मनन और खनन में बीत जाती है. ख़ैर, पुलिस भी आई होगी?”
“हां, आई थी और चोरी के ज़ुर्म में सुकई को पकड़ कर थाने ले गई! दरोगाजी कह रहे थे, “ज़रूर तूने इस गांव के किसी संत को फंसाने के लिए अपने घर में चोरी की होगी! जब तक ज़ुर्म कबूल नहीं करेगा छोडूंगा नहीं…”
“किसी संत पर इल्ज़ाम नहीं लगाना चाहिए.”
“और क्या! पिछले हफ़्ते जगेसर के घर में चोरी हुई और चोर अपनी सीढ़ी छोड़ गया. पूरे गांव में किसी ने सीढ़ी को नहीं पहचाना कि उसका मालिक कौन है. दरोगाजी ने तीसरे दिन जगेसर को पीट कर थाने में बंद कर दिया. शाम होते-होते जगेसर ने कबूल कर लिया कि उसी ने अपने घर में चोरी की थी.”
कुछ प्रशंसक अब बाकायदा चारण हो गए हैं, हर जगह चोर के शौर्य, सदाचार और सत चित आनंद का गुणगान करते रहते हैं, “अगर वो कभी चोर था, तो वो उसका अतीत था. वर्तमान में वो संत है. हमें उस पर गर्व करना चाहिए.” चोर को अपने फन पर गर्व है. कभी-कभी वो चोरी और गर्व साथ-साथ कर लेता है. गांव के कुछ चारण, तो उसके फन में भी रहस्यवाद ढूंढ़ रहे हैं. चाय की गुमटी के पास शाम को एक चारण गांववालों से कह रहा था, “संत और फकीरों की बातें वही जानें. उनके हर काम के पीछे दूरदृष्टि या कोई दिव्य मक़सद होता है. प्रथम दृष्टया, जो हमें चोरी लग रही है, वो आत्मनिर्भरता हो सकती है.” (जैसे सुकई और जगेसर के दिन फिरे) गांववाले बहुमत का रुझान देख कर भी कन्विंस नहीं हो रहे हैं. ये वो लोग हैं, जिन्होंने कई बार रात के अंधेरे में चोर को आत्मनिर्भर होकर लौटते हुए देखा है. (उनके मन मंदिर से वो दिव्य छवि अब तक नहीं उतरी)
आत्मनिर्भर संत अब सरपंच बनने की ओर अग्रसर है, मगर दुर्भाग्य देखिए कि इतने भागीरथ प्रयत्न के बाद भी गांव और गांववाले ग़रीबी रेखा के नीचे जा रहे हैं!..

Sultan Bharti
सुलतान भारती
Kahani

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तोते ने घूर कर देखते हुए कहा, “कोई फ़ायदा नहीं. इसकी फटेहाल जैकेट देखकर मैं इसका भाग्य बता सकता हूं. बेकारी का शिकार है. शनि इसके घर में रजाई ओढ़कर सो गया है. ये किसान आन्दोलन में सपरिवार बैठा है, घर में आटा और नौकरी दोनों ख़त्म है. इसे नक्षत्रों की जलेबी में मत फसाओ उस्ताद.” ज्योतिषी को भी दया आ गई, “जा भाई, तेरी शक्ल से ही लग रहा है कि तेरे पास किडनी के अलावा कुछ बचा नहीं है.

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अचानक आज मुझे तुलसीदासजी की एक अर्धाली याद आ गई, ‘सकल पदारथ है जग माहीं करमहीन नर पावत नाही’ (मुझे लगता है, ये कोरोना काल में नौकरी गंवा चुके उन लोगों के बारे में कहा गया है, जो इस सतयुग में भी आत्मनिर्भर नहीं हो पाए) ये जो ‘सकल पदारथ’ है ना, ये किसी भी युग में शरीफ़ और सर्वहारा वर्ग को नहीं मिला. सकल पदारथ पर हर दौर में नेताओं का कब्ज़ा रहा है. इस पर कोई और चोंच मारे, तो नेता की सहिष्णुता ऑउट ऑफ कंट्रोल हो जाती है. अब देखिए ना, सैंतालीस साल से ऊपर तक कांग्रेसी ‘सकल पदारथ ‘ की पंजीरी खाते रहे, मगर मोदीजी को सात साल भी देने को राजी नहीं. बस, यहीं से भाग्य और दुर्भाग्य की एलओसी शुरु होती है. हालात विपरीत हो, तो दिनदहाड़े प्राणी रतौंधी का शिकार होकर दुर्भाग्य का गेट खोल लेता है- आ बैल मुझे मार!
बुज़ुर्गों ने कहा है- भाग्य बड़ा बलवान हो सकता है.. मैंने तो देखा नहीं. हमने तो हमेशा दुर्भाग्य को ही बलवान पाया है. कमबख्त दादा की जवानी में घर में घुसा और पोते के बुढ़ापे तक वहीं जाम में फंसा रहा. जाने कितनी पंचवर्षीय योजनाएं आईं और गईं, मगर सौभाग्य ग्राम प्रधान के घर से आगे बढ़ा ही नहीं. मैंने चालीस साल पहले अपने गावं के राम ग़रीब का घर बगैर दरवाज़े के देखा था. आज भी छत पर छप्पर है, सिर्फ़ टटिया की जगह लकड़ी का किवाड़ से गया है. इकलौती बेटी रज्जो की शादी हो गई है. राम ग़रीब की विधवा और दुर्भाग्य आज भी साथ-साथ रहते हैं. उनकी ज़िंदगी में ना उज्ज्वला योजना आई, ना आवास योजना. अलबत्ता सरकारें कई आईं! सचमुच दुर्भाग्य ही दबंग है. दलित, दुर्बल और असहाय पीड़ित को देखते ही कहता है, हम बने तुम बने इक दूजे के लिए…
भाग्य कभी-कभी लॉटरी खेलता है. ऐसे मौसम में प्राणी माझी से सीधे मुख्यमंत्री हो जाता है. अब प्रदेश के सकल पदारथ उसी के हैं, बाकी सारे करम हीन छाती पीटें. कभी-कभी ठीक विपरीत घटित होता है. सकल पदारथ की पावर ऑफ अटॉर्नी लेकर विकास की जलेबी तल रहा प्राणी मुख्यमंत्री से लुढ़ककर सीधे कमलनाथ हो जाता है. ये सब सकल पदारथ के लिए किया जाता है.
एक बार सकल पदारथ हाथ आ जाए, फिर विधायक या सांसद के हृदय परिवर्तन का मुहूर्त आसान होता है. सकल पदारथ से युक्त सूटकेस देखते ही काम, क्रोध मद, लोभ में नहाई आत्मा सूटकेस में समा जाती है. अगला चरण विकास का है. जिन्होंने बिकने का कर्म किया उन्हें सकल पदारथ मिला. जो करम हीन पार्टी से चिपके रहे, वो विपक्ष और दुर्भाग्य के हत्थे चढ़े. जाकी रही भावना जैसी…
मुझे कहावतें बहुत कन्फ्यूज़ करती हैं. भाग्य, सौभाग्य और दुर्भाग्य के बारे में कहावत है, ‘भाग्य में जो लिखा है वही मिलेगा ‘.. तो फिर पदारथ और करम की भूलभूलैया काहे क्रिएट करते है. भाग्य में सकल पदारथ का पैकेज होगा, तो डिलीवरी आएगी, फिर भला रूकी हुई कृपा के लिए काहे फावड़ा चलाएं. और… अगर क़िस्मत में सौभाग्य है ही नहीं, तो काहे रजाई से बाहर निकलें (पानी माफ़, बिजली हाफ रोज़गार साफ़).
अब अगर करम हीन कहा, तो तुम्हारे दरवाज़े का बल्ब तोड़ दूंगा… ‘कर्मवान’ और ‘कर्महीन’ के पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहिए. गीता में साफ़-साफ़ लिखा है- जैसा कर्म करोगे वैसा फल देगा भगवान… इलाके का विधायक अगर तुम्हें आठ-आठ आंसू रुला रहा है, तो इसमें विधायक का क्या दोष. वोट देने का कर्म किया है, तो पांच साल तक फल भुगतो. विकास फंड का सकल पदारथ उसी के हाथ में है. तुम अपने आपको इस काम, क्रोध, मद, लोभ से दूर रखो.
वो ज़माना गया जब सकल पदारथ परिश्रम का नतीज़ा हुआ करता था. अब सुविधा, संपदा और सत्ता का सकल पदारथ अभिजात वर्ग को दे दिया गया है, और मेहनत और मजदूरी करनेवालों को रूखी-सूखी खाय के ठंडा पानी पीव… की सात्विक सलाह दी जाती है. धर्माधिकारी की सलाह है कि आम आदमी को तामसी प्रवृत्तिवाले सकल पदारथ के नज़दीक नहीं जाना चाहिए, वरना मरने के बाद स्वर्ग तक जानेवाला हाई वे हाथ नहीं आता. अब आम आदमी धर्म संकट में है. जीते जी सकल पदारथ ले या मरने पर स्वर्ग… (गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय) आख़िरकार संस्कार उसे सत्तू फांक कर स्वर्ग में जाने की सलाह देता है.
देवताओं का कुछ भरोसा नहीं कि कब रूठ जाएं. भाग्य का सौभाग्य में बदलना तो बहुत कठिन है डगर पनघट की, मगर दुर्भाग्य बग़ैर प्रयास बेहद सुगमता से हासिल हो जाता है. जब देखो तब आंगन में महुआ की तरह टपकने लगता है. जिन्होंने साहित्य से गेहूं हासिल करने की ठानी, उसे दुर्भाग्य वन प्लस वन की स्कीम के साथ मिलता है. शादी के सात साल बाद ही मेरी बेगम को साहित्य और साहित्यकार की महानता का ज्ञान हो चुका था. एक दिन उन्होंने मेरे इतिहास पर ही सवाल उठा दिया, “मै वसीयत कर जाऊंगी कि मेरी सात पीढ़ी तक कोई साहित्यकार से शादी ना करे.” लक्ष्मी और सरस्वती के पुश्तैनी विरोध में खामखा लेखक पिसता है. लक्ष्मीजी का वाहक उल्लू उन्हें लेखक की बस्ती से दूर रखता है.
भाग्य और दुर्भाग्य के बीच में सकल पदारथ की चाहत में खड़ा इंसान तोतेवाले ज्योतिषी के पास जाता है. कोरोना की परवाह न करते हुए ज्योतिषि अपने तोते से कहता है, “इस का भाग्यपत्र निकालो वत्स.”
तोते ने घूर कर देखते हुए कहा, “कोई फ़ायदा नहीं. इसकी फटेहाल जैकेट देखकर मैं इसका भाग्य बता सकता हूं. बेकारी का शिकार है. शनि इसके घर में रजाई ओढ़कर सो गया है. ये किसान आन्दोलन में सपरिवार बैठा है, घर में आटा और नौकरी दोनों ख़त्म है. इसे नक्षत्रों की जलेबी में मत फसाओ उस्ताद.” ज्योतिषी को भी दया आ गई, “जा भाई, तेरी शक्ल से ही लग रहा है कि तेरे पास किडनी के अलावा कुछ बचा नहीं है. तोते का पैर छू और फकीरा चल चला चल…”
बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले ना भीख. जाने किस मूर्ख ने ये कहावत गढ़ी थी. मोती को कौन कहे, मिट्टी भी मांगने से नहीं मिलती. रही सकल पदारथ के लिए समुद्र मंथन की बात, तो यहां भाग्य चक्र प्रबल हो जाता है. धर्मभीरू जनता घर का गेहूं बेचकर तीर्थयात्रा पर जा रही है और सेवकनाथजी नौ बैंकों का हरा-हरा सकल पदारथ समेट कर विदेश यात्रा पर. यही विधि का विधान है!
कल मैने अपने मित्र चौधरी से पूछा, “सौभाग्य और दुर्भाग्य को संक्षेप में समझा सकते हो?” चौधरी कहने लगा, “बहुत आसान है. तुम मुझसे उधार दूध ले जाते हो, ये तुम्हारा सौभाग्य है और मेरा दुर्भाग्य…”
जाने क्यों, ये मुझे तुरंत समझ में आ गया.

– सुलतान भारती


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आजकल सब्ज़ीवाले से धनिया-मिर्ची नहीं मांगनी चाहिए. वैसे ही पडोसी से प्यार और नेता से उपहार न मांगने में ही भलाई है. पर इसका यह अर्थ नहीं कि कहीं कुछ मांगना ही नहीं चाहिए. सुनार के पास जाएं, तो पर्स ज़रूर मांगिए, वह आपके लिए बड़ी चीज़ होगी, तो उसके लिए फ्यूचर इनवेंस्टमेंट.

कहते हैं बिन मांगे मोती मिले और मांगे मिले न भीख. अर्थ यह कि जिनके पास मांगने का हुनर होता है वे बिना कुछ बोले बस इशारों-इशारों में बड़ी से बड़ी चीज़ हासिल कर लेते हैं और जो इस कला को नहीं जानते वे छोटी-छोटी चीज़ें भी नहीं प्राप्त कर पाते.
मांगने के मामले को छोटा मत समझिए दुनिया में ऐसा कोई नहीं, जो हाथ फैलाए न खड़ा हो. क्या राजा क्या रंक सभी मंगते हैं. कोई धन-दौलत मांगता है, तो कोई औलाद, कोई सुख-चैन मांगता है, तो कोई तरक्की. किसी का काम थोड़े-बहुत से ही चल जाता है, तो कोई छप्पर फाड़ कर मांगता है. मिलना न मिलना और बात है, पर मांगना तो हक़ है. कभी वोट मांगे जाते हैं, तो कभी नोट. और कहते हैं, जब दवा काम नहीं करती तो दुआ मांगी जाती है.
वैसे रोमांटिक लोग बस साथ मांगते हैं और इज्ज़तदार लोग बडी नफासत से लडकी का हाथ मांगते हैं. समाज का आलम इतना ख़राब है कि आज लड़की का हाथ मांगने से पहले दहेज़ मांगने की फार्मेलटी की जाती है यह कहते हुए कि भाई आप जो दे रहे हैं अपनी बेटी को. अब भला बताइए जब देनेवाले की नीयत पर इतना ही भरोसा है, तो दहेज़ की लिस्ट क्यों नत्थी की जाती है.
मांगनेवालों की भारी-भरकम लिस्ट और सूची देखकर ही भजन बना है- दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया… यदि मांगने का सिलसिला न हो, तो मदिरों की लाइन खाली हो जाए.
वैसे मांगना इतना बुरा भी नहीं है. मांगना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है. हममें से कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि उसने जन्म से ही मांगने की ट्रेनिंग नहीं ली है. कहते हैं बिना रोए, तो मां भी दूध नहीं पिलाती अर्थात बच्चा जब बोलना भी नहीं जानता, तब भी मांगने की कला में पारंगत होता है.
मैं कह रहा था मांगना इतना बुरा भी नहीं होता. शहरों की बात छोड दीजिए गांव और कस्बे में बिना पास-पड़ोस से मांगे गुज़ारा नहीं चल सकता. हमारे नाना के गांव में तो मांगने की पुरानी प्रथा थी, जैसेे- लेमन सेट या टी सेट मांगना. पूरे मुहल्ले में बस एक ही टी सेट था और जब किसी के घर कोई मेहमान (मेहमान से तात्पर्य समधी के लेवल का होता है) आ जाता, तो वह लेमन सेट कहीं भी हो स्वत: उसके घर पहुंच जाता. बस, गांव में ख़बर होनी चाहिए कि फलाने के घर मेहमान आए हैं. इस मांगने का प्रभाव ही था कि किसी का भी मेहमान पूरे मुहल्ले का सम्माननीय होता था और पूरा गांव उसे बड़ी इज़्ज़त देता था. जैसे ही वह पक्की सड़क छोड़ पगडण्डी पर आता कि ख़बर हो जाती फलाने के मेहमान बस से उतर गए हैं, बस पहुंच रहे हैं. हालत यह होती कि कदम-कदम पर उसे रास्ता बतानेवाले मिलते और जगह-जगह रोक कर घडे का ठण्डा पानी पिलानेवाले. उस ज़माने में बिना मीठे के पानी पिलाना अपराध माना जाता था. कुछ नही तो ताज़ा गुड़ ही खिला कर बडे स्नेह से पानी पूछते थे लोग. और देखने वाला गांव के इस संस्कार को देख कर भाप लेता था कि जिस घर में रिश्ता कर रहे हैं वह लोग हैं कैसे. वैसे चाय, चीनी और नमक तेल मांगने का रिवाज़ शहर के पड़़ोस में भी पनपा, पर लानत है मंहगाई की कि इसने पड़ोस पड़ोस न रहने दिया. आज किसी से कुछ मांगने से पहले संकोच होने लगता है कहीं बेचारा रहीम के कहे दोहे के अनुसार शर्मिन्दा न हो जाए. यथा रहिमन वे नर मर चुके जे कछु मांगन जायें उन ते पहले वे मुये जिन मुख निकसत नाय. इस मंहगाई के जमाने में कहीं मांग कर हम पड़ोसी को धर्मसंकट में न डाल दें.
देखिए मांगने में एक बड़ा ही ख़ूबसूरत एहसाह है और विश्‍वास मानिए अपनों से अपनापन बनाए रखने के लिए उनसे कुछ न कुछ मांगते रहना चाहिए.
मैं अपनों से प्यार बनाए रखने के लिए मांगने का ज़़िक्र कर रहा था. देखिए अपनत्व बनाए रखने के लिए कुछ न कुछ ऐसा मांगते रहना चाहिए कि आप के अपनों को एहसास होता रहे कि आप उनके लिए ख़ास हैं और इतना ही नहीं आप उन्हें भी अपना ख़ास समझते हैं. ऐसे में मैं मांगने की कुछ ऐसी टिप्स दे रहा हूं, जो बडी काम आएगी और इसे देने वाला मंहगाई के जमाने में भी प्रफुिल्लत होकर देगा इसे.
सुबह उठ कर अपने बड़़ेे़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद ज़रूर मांग लेंं. वे बेहद ख़ुुश हो जाएंगे और अपने जाननेवालों के बीच आपके गुण गाएंगे. इतना ही नहीं उन्हें इस बात की आत्मिक सन्तुष्टी होगी कि उन्होंने अपने बच्चे को बड़े अच्छे संस्कार दिए हैं.
रही दोस्तों की बात तो उन्हें अपना बनाए रखने के लिए सलाह ज़रूर मांगिए. जितने ही क़रीबी मामले में आप उनसे सलाह मांगेंगे, वे उतने ही आपसे जुड जाएंगे.
जैसा कि मैंने कहा मांगना एक हुनर हैै, सो मांगते समय सही पात्र से उचित चीज़ ही मांगनी चाहिए. ऐसा न हो कि जिसके पास जो नहीं हैै, उस से आप वही मांग बैठे और दोनों को शर्मिन्दा करें.
आजकल सब्ज़ीवाले से धनिया-मिर्ची नहीं मांगनी चाहिए. वैसे ही पडोसी से प्यार और नेता से उपहार न मांगने में ही भलाई है. पर इसका यह अर्थ नहीं कि कहीं कुछ मांगना ही नहीं चाहिए. सुनार के पास जाएं, तो पर्स ज़रूर मांगिए, वह आपके लिए बड़ी चीज़ होगी, तो उसके लिए फ्यूचर इनवेंस्टमेंट. वैसे ही जब किसी बड़े आदमी से कुछ मांगने का अवसर पड़ेे, तो सुदामा भाव में आ जाइए अर्थात छोटी-छोटी भावनात्मक मुद्राएं अपनाइए और उसे कृष्ण भाव का एहसास कराते रहिए. और तब-जब आप वहां से वापस लौटेंगे तो उम्मीद से दुगना पा चुके होंगे.
नई पीढ़ी से मोबाइल और इंटरनेट चलाने की टिप्स मांगना मत भूलिए. ससुराल में साली का प्यार बिन मांगे मिला हुआ मुफ़्त उपहार है, पर ऐसे उपहार को ज़रा सम्हाल कर रखना चाहिए, वर्ना लेने के देने पड़ जाते हैं.
रहा उधार मांगने का सवाल, तो बडे-बुजुर्ग पहले ही कह गए हैं उधार प्रेम की कैंची है, सो आजकल ऐसे मौक़े पर बैंक के ऐजेंट को याद करना चाहिए. मुझे विश्वास है कि अब आप जब अपने विवेक का इस्तेमाल कर सही पात्र से सही चीज़ मांगेंगेे, तो निराश नहीं होंगे और जीवन में मांगने की कला को अपनाकर नज़दीकी बढ़़ाने में सक्षम होंगे.

Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव


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“भइया, मेरी नाक फिर कट गई.”
रावण को बिल्कुल हैरानी नहीं हुई. उसने नॉर्मल लहज़े में पूछा, “तुम नाक लेकर जाती ही क्यों हो ?”
सूर्पनखा ने धमकी दी, “अगर इस केस में आपने कुछ ना किया, तो मैं अपनी कटी हुई नाक का वीडियो विभीषण भइया को पोस्ट कर दूंगी. विभू भइया तुरंत वॉयरल कर देंगे. फिर अपनी नाक कैसे बचाओगे?” इतना कहकर शूर्पी ने फ़ोन काट दिया.

(आप सब कल्पना कीजिए कि आज 2020 में अगर सूर्पनखा की नाक काटी गई होती, तो बाहुबली रावण और उसकी फैमली पर क्या प्रतिक्रिया होती! तो आइए देखते हैं…)

      एक कटी हुई नाक

अपने शानदार फॉर्महाउस अशोक वाटिका में रावण बैठा गृहमंत्री विभीषण के बारे में खुफिया एजेंसी की भेजी गई रिपोर्ट देख रहा था. सुपरसोनिक पुष्पक विमानो के सौदे में ‘विभू’ ने करोडो डॉलर कमीशन खाया था यानी इस जन्म में भी विभीषण अपनी आदत से मजबूर थे. रावण ने फाइल एक तरफ़ रखी, हाथ को सेनेटाइज किया और चेहरे से फेस मास्क उतारते हुए खुलकर सांस ली. उसके बाद वह लैपटॉप पर अपनी फेवरेट फिल्म बजरंगी भाई जान देखने लगा. तभी उसके फोन पर मिस्ड कॉल आई. रावण ने पलटकर फोन किया, उधर से जानी-पहचानी कॉलर ट्यून बजी- मुश्किल कर दे जीना इश्क़ कमीना…
रावण समझ गया कि दूसरी तरफ़ उसकी छोटी बहन सूर्पनखा है. रावण घबरा गया. बहन रोती हुई कह रही थी, “भइया, मेरी नाक फिर कट गई.”
रावण को बिल्कुल हैरानी नहीं हुई. उसने नॉर्मल लहज़े में पूछा, “तुम नाक लेकर जाती ही क्यों हो ?”
सूर्पनखा ने धमकी दी, “अगर इस केस में आपने कुछ ना किया, तो मैं अपनी कटी हुई नाक का वीडियो विभीषण भइया को पोस्ट कर दूंगी. विभू भइया तुरंत वॉयरल कर देंगे. फिर अपनी नाक कैसे बचाओगे?” इतना कहकर शूर्पी ने फ़ोन काट दिया. रावण धर्मसंकट में था. मेघनाथ किडनी बदलवाने इण्डिया गया हुआ था. विभीषण एक और कमीशन का चेक लेने मलेशिया की यात्रा पर था. कुंभकरण था तो लंका में, लेकिन एक कुंटल गांजा पीकर छह महीने के लिए कोमा में जा चुका था. रावण ने डायरी देखकर तीन नाम निकाले और फिर पहला फोन अमेरिका में चुनाव हार चुके डॉनल्ड ट्रंप को मिलाया. रावण ने बहन के नाक कटने की व्यथा बताई, तो उधर से ट्रंप ने रावण का मज़ाक उड़ाते हुए कहा, “भतीजे. तुम समझदार नहीं खोत्ते हो, जो इस ज़माने में भी नाक की परवाह करते हो. हमारे देश में तो महिलाओं का कुछ भी लुट जाए, पर हम उसे नाक पर नहीं लेते.”
“क्यों?”
“इतना भी नहीं समझे कि अब लक्ष्मी बाई का नहीं, जलेबी बाई का ज़माना है. जानम समझा करो.”
रावण ने फोन काट दिया. वाइडन से हारने के बाद ट्रंप अनाप-शनाप बोल रहे थे. रावण ने अपने कुलगुरू का नंबर निकाला, जो शोषण के अपराध में भारत की एक जेल में बंद थे. रावण ने फोन करके कहा, “सत श्री अकाल गुरुजी.”
“ओय रावण पुत्तर! की हालचाल है ट्वाडा.”
“क्या बताऊं गुरुजी. छोटी बहन की नाक कट गई.”
“ओय तो इसमें माइंड करने दी की गल. हुण तुसी ऐवे कर, सूर्पनखा नू साड्डे कोल भेज दे. असी एडजस्ट कर लांगे. साड्डे नाल रहेगी ता ऐश करेगी.”
रावण हैरान था, “मै समझा नहीं गुरुजी.”
“ट्वानू समझने दी की लोढ़! नाक कट गी, तो कट जान दे. त्वाडी बहन विदाउट नाक भी चलेगी. बस तुसी शुर्पी नू साड्डे कोलो भेज दे.”
अब रावण का माथा ठनका, उसने ग़ुस्से से पूछा, “आप कहना क्या चाहते हैं?”
“देख पुत्तर. वाहे गुरु ने किन्नी सोनी जोड़ी बनाई है. कुंडली दा मैच देख- हम दोनों ने ही नाक कटाई है. बल्ले बल्ले, ते याहू याहू…”
रावण ग़ुस्से से चिल्लाया, “सूर्पनखा तुम्हारी बेटी की तरह है. तुम्हें शर्म आनी चाहिए.”
“मै इस दुनियां के रिश्ते मानता ही नहीं. शूरपी ने भेज दे. असी इक नवीं फिल्म बनावांगे और ज़मानत मिली तो अगला वेलेंटाइन लंका आकर मनावांगे.” रावण ने घबराकर फोन रख दिया. थोड़ी देर में नॉर्मल होने के बाद रावण ने आख़िरी फोन अपने फैमिली फ्रैंड प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को लगाया. उधर से हिन्दी में गाने की आवाज़ आई- मोहे ‘पीओके ‘ पे नंदलाल छेड़ गयो रे.. गज़ब भयो रामा जुलम भयो रे…
रावण हैरान था, “ख़ान साहब, क्या हो गया. हिन्दी में रो रहे हो?”
“ओय रावन बिरादर, इस भरी दुनियां में कोई भी हमारा ना हुआ. मै फटेहाल पाकिस्तान को संभालूं या फजलुर रहमान को. पीओके पर हालत ख़राब है निरादर.”
“पीओके पर क्या हुआ?”
“उधर इंडियन आर्मी रोज़ आकर हमारा दरवाज़ा खटखटाकर मेरे बारे में पूछती, “खोचेे बुड्ढा घर पर है?”
“वेरी बैड.”
“खोचे इससे भी बुरा, छप्पन मुस्लिम कंट्री हैं, पर मोदीजी ने क्या शहद चटाई है कि आज की डेट में इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा ना हुआ. ख़ैर तुमने कैसे याद किया बिरादर.”
अब रावण ने अपने दर्दे दिल की वजह बताई, “बहन की नाक कट गई ख़ान भाई.”
इमरान ख़ान चौंककर बोले, “सिस्टर ने बताया कि किसने नाक काटा ?”
रावण ने झूठ बोला, “मैंने नहीं पूछा.”
“खोचे पूछने का ज़रूरत ही नहीं, नाक तो ज़रूर किसी हिन्दुस्तानी ने काटा होगा.”
रावण दंग था. इमरान को कैसे पता, “भाईजान, आप तो जीनियस हो. आप को कैसे पता चला. ओह ख़ान तुसी ग्रेट हो.”
“ओय नहीं रावण बिरादर. ये ग्रेटवाली नहीं, शर्म की
बात है. अल्लाह दुहाई है, दुहाई है. कश्मीर से कारगिल तक हमने नाक ही कटाई है. हमकू पता है.”
रावण की उम्मीद ठंडी हो रही थी.
“रावण बिरादर, बीसवीं सदी में तुमने पहली बार नाक कटाई है, इसलिए बिलबिला रहे हो. हम तो पिछले सत्तर साल से रेगुलर नाक कटा रहे हैं.”
“अदभुत नाक है.”
“ट्रेज्डी देखो. हिन्दुस्तान का मुस्लिम भी हमारा सपोर्ट नहीं करता. उधर का हिन्दू-मुस्लिम आपस में लाठियां चलाता है, पर हमारा नाक काटने के लिए दोनो एक हो जाता है.”
“बहुत दुख हुआ”
“इस सर्जिकल स्ट्राइक ने रही सही मेरे नाक की “टीआरपी” ही ख़त्म कर दी…”
“मेरे लिए क्या सलाह है भ्राता श्री?”
“एक बार कटी सो कटी, कोशिश करो कि आगे नाक ना कटे.” इतनी सलाह देने के बाद इमरान ख़ान ज़ोर-ज़ोर से गाने लगे- दुनिया बनानेवाले, क्या तेरे मन में समाई. तूने काहे को नाक बनाई…
रावण सिर पकड़कर बैठ गया!

Sultan Bharti
सुल्तान भारती

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आज की दुनिया में तो कुछ चतुर सुजान ने वक़्त की डिमांड देखते हुए सच बोलने पर जीएसटी लगा दी है, बोलने का दुस्साहस करोगे, तो भारी क़ीमत चुकाना पड़ेगा, दूसरी तरफ़, झूठ को टैक्स फ्री कर दिया है.

आज मैं वादा करता हूं कि जो भी बोलूंगा, सच बोलूंगा, सच के अलावा काफ़ी सारा झूठ भी बोलूंगा.. और क्यों ना बोलूं.. आफ्टर ऑल अभिव्यक्ति की आज़ादी है. लिहाज़ा अब करूंगा गंदी बात. नहीं, सच और झूठ की बात चल रही है, गंदी बात हमारे संस्कार से बाहर का एजेंडा है. झूठ कितना पॉपुलर और पॉवरफुल है कि अदालत तक को यक़ीन नहीं कि कोई शख़्स बगैर गीता या कुरान को हाथ में लिए सच बोलने का रिस्क उठाएगा (बल्कि किताब पर हाथ रखकर भी लोग झूठ की शरण में चले जाते हैं) झूठ के सामने खड़ा- सत्यमेव जयते कितना दीन, हीन और अविश्वसनीय लगता है.
संस्कृत का एक श्लोक देखिए- सत्यम ब्रूयात – प्रियम ब्रुयात.. (सच बोलना चाहिए, मीठा सच बोलना चाहिए) ये कैसे होगा. सच तो कड़वा बताया गया है. वो ‘परी’ कहां से लाऊं? आगे कलियुग का समर्थन करते हुए सुझाव दिया गया है- प्रिय असत्यम ब्रूयात.. अप्रिय सत्यम मा ब्रू यात.. जो स्वादिष्ट लगता हो, वो झूठ बोला जा सकता है. (चुनाव में तमाम दलों के नेता इसी श्लोक से प्रेरणा पाते हैं!) जो कड़वा लगे या कलेजा छील दे, ऐसा अप्रिय सच कभी मत बोलो. झूठ की मार्केटिंग में इस श्लोक की बड़ी भागीदारी है.
लोग सच का बोर्ड लगाकर खुलेआम झूठ बेचते हैं. सड़क से संसद तक झूठ का दबदबा है.. झूठ च्यवनप्राश है, अमृत कलश है.. वीटो पॉवर है. झूठ बिकता है, चलता है, डिमांड में है. सच कहावतों और कहानियों से ऑक्सीजन लेकर ज़िंदा है. सच हिंदी फिल्मों का आख़री सीन है, जिसमें साधनहीन हीरो महाबली खलनायक पर विजय पाता है. हर सरकार सच को बचाने की शपथ लेती है, पर दिनोंदिन सच ग़रीबी रेखा से नीचे जा रहा है. कोई झूठ के पक्ष में खड़ा नहीं है, फिर भी उसके सामने सच कैसे कुपोषित हुआ पड़ा है.
आज की दुनियां में तो कुछ चतुर सुजान ने वक़्त की डिमांड देखते हुए सच बोलने पर जीएसटी लगा दी है, बोलने का दुस्साहस करोगे, तो भारी क़ीमत चुकाना पड़ेगा, दूसरी तरफ़, झूठ को टैक्स फ्री कर दिया है. सारे बोलो… सच के रास्ते में पड़नेवाले सारे मेन होल के ढक्कन हटा दिए गए हैं, जिससे सच को नीचे गिरने में असुविधा न हो और… झूठ के रास्ते में पड़नेवाले सारे स्पीड ब्रेकर हटा दिए गए हैं- ‘कोई पत्थर से ना मारे मेरे दीवाने को…’ दोनों की सेहत में ज़मीन-आसमान का फ़र्क देखिए, झूठ का स्टेमिना ऐसा मज़बूत है कि कोरोना की पूरी कॉलोनी निगल जाए, तो ज़ुकाम भी ना हो. और… सच अगर मूली की तस्वीर भी देख ले, तो छींकने लगेगा. इसी झूठ ने कई धर्मों के सच को लहूलुहान किया है.
चूंकि अतीत हमेशा सुनहरा और गौरवशाली होता आया है, इसलिए सच का भविष्य सोच कर सिहर जाता हूं. एक हिन्दी फिल्म का गाना है- झूठ बोले कौआ काटे… तो गोया अब झूठ से इन्सानों को कोई परहेज़ नहीं रहा. सिर्फ़ कौओं को घी हज़म नहीं हो रहा है. मगर कौए कब से सत्यवादी हो गए. वो तो ख़ुद झूठ के ब्रांड एंबेसडर बताए जाते हैं. जबसे कलियुग आया है, कौओं ने हंसो से मोती छीन लिया है और तमाम अमराइयों से कोयल को बेदख़ल कर दिया है. अगर ग़लती से कोई कोयल नज़र आ जाए, तो कौए ऑफर देते हैं, आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा.. मालिश कराना है…
झूठ अजर अमर है. झूठ रावण है. हर बार अपना पुतला छोड़कर भीड़ में खड़ा हो जाता है. भीड़ पुतला जलाकर संतुष्ट है. रावण “नाभि” सहलाता हुआ मुस्कुराता है. वो अपने अमरत्व के प्रति आश्वस्त है. असत्य पर सत्य की विजय से जनता गदगद है और हकीक़त से आगाह रावण आश्वस्त. भीड़ में खड़ा ‘सच’ रावण को पहचान रहा है, मगर सत्यमेव जयते के सिंहनाद में खोई जनता पुतले को रावण समझ बैठी है.
‘झूठ’ के सांकेतिक दहन से ‘सच’ की जीत और रामराज की वापसी साफ़-साफ़ नज़र आ रही है. सिर्फ़ रावण को असलियत पता है कि ‘झूठ’ दीर्घायु हो रहा है!..

Sultan Bharti
सुल्तान भारती
Satire Story

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सारे रसों के लिए महाबली निंदा रस कोरोना साबित हुआ है. ये एक ऐसा रस है, जिसका ज्ञान जेनेटिक होता है. किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती. हमारे वर्माजी कद में छोटे हैं, पर घाव करें गंभीर की ख़ासियत रखते हैं. उनके पास निंदा रस का पूरा गोदाम रहता है. पहले आओ-पहले पाओ की सहूलियत भी है. वो बगैर दोस्ती-दुश्मनी के भी बिल्कुल निर्विकार भाव से निंदा करते हैं.

अगर कोई मुझसे पूछे कि रस कितने प्रकार के होते हैं, तो मेरा जवाब होगा, “चाहे जितने तरह का हो, पर निंदा रस के सामने सारे भिन्डी हैं. मीडिल क्लॉस में दाखिले से पहले ही मैं इस रस की महानता से परिचित हो गया था. जब हम लंच में क्लॉस से बाहर जाते, तो गणित और विज्ञान के अध्यापकों की निन्दा करते और फीस टाइम पर ना देने के लिए अध्यापक के सामने अपने मां-पिता की निन्दा करते, “मेरी कोई ग़लती नहीं, फीस मांगने पर अब्बा ने कान ऐंठ दिया था (ये सरासर झूठ था). निंदा रस की लज्जत का क्या कहना. अनार और आम के जूस को मूर्छा आए-जाए, गन्ना बगैर काटे गिर जाए और संतरा सदमे से गश खा जाए.
साहित्यिक रस (वीर रस, श्रृंगार रस, वीभत्स रस, सौन्दर्य रस, करुण रस आदि) मिलकर भी निन्दा रस का मुक़ाबला नहीं कर सकते. निंदा रस ने सदियों से सबका टीआरपी गिरा रखा है. सारे रसों के लिए महाबली निंदा रस कोरोना साबित हुआ है. ये एक ऐसा रस है, जिसका ज्ञान जेनेटिक होता है. किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती. हमारे वर्माजी कद में छोटे हैं, पर घाव करें गंभीर की ख़ासियत रखते हैं. उनके पास निंदा रस का पूरा गोदाम रहता है. पहले आओ-पहले पाओ की सहूलियत भी है. वो बगैर दोस्ती-दुश्मनी के भी बिल्कुल निर्विकार भाव से निंदा करते हैं.
पिछले हफ़्ते की बात है, मोहल्ले के कवि बुद्धिलाल पतंग के लिए चंदा लेने वर्माजी मेरे घर आए. मैंने पूछा, “उनके कविता की पतंग मोहल्ले से बाहर भी उड़ती है या नहीं?”
बस निंदारस का क्रेटर खुल गया. वर्माजी बगैर नफ़ा-नुक़सान के अमृत उगलने लगे, “सारे मंचों से धक्का देकर खदेड़ा हुआ कवि है. पूरे शहर से इसकी पतंग कट गई है, वो तो मैंने हाथ पकड़ लिया. तुम्हें तो पता है कि मैं कितना दयालु और कृपालु हूं. कोई कुछ भी मांग ले, मैं मना नहीं कर पाता.”
“मुझे अर्जेंट पांच हज़ार रुपए की ज़रूरत है.”
वर्माजी के निंदा रस की पाइप लाइन मेरी तरफ़ घूम गई,” बाज़ार लगी नहीं कि गिरहकट हाज़िर… ” इतना कहकर वो बगैर चन्दा लिए झपाक से निकल लिए.
कुछ लोगों ने तो अपनी जीभ को निंदा रस का गोदाम बना लिया है. दिनभर बगैर ऑर्डर के सप्लाई चलती रहती है. उनके रूटीन में निंदा ही नाश्ता है और निंदा ही उपासना. उपासना पर हैरत में मत पड़िए, वो गाना सुना होगा, कैसे कैसों को दिया है, ऐसे वैसों को दिया है… यहां बन्दा ईश्वर की निन्दा कर रहा है कि तूने अपने बंदों को छप्पर फाड़कर देने में बड़ी जल्दबाज़ी की है.. पात्र-कुपात्र भी नहीं देखा.. मेरे जैसे होनहार और सुयोग्य के होते हुए भी सारी पंजीरी ‘ऐसे वैसों’ को बांट दी ( कम-से-कम पूछ तो लेते).
कुछ लोग निंदा रस को अपनी ज़िंदगी का आईना बनाकर जीते हैं. वो अपनी निंदा में अपने चरित्र की परछाईं देखते हैं, ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय!’ @जब निंदा रस का ज़िक्र होता है, तो महिलाओं को कैसे इग्नोर कर दें. इस विधा में भी महिलाओं ने बाज़ी मार रखी है. अपनी आदत से मजबूर कुछ महिलाओं ने इस कला में डिप्लोमा और डिग्री दोनों ले रखी है, ख़ासकर गांवों में कुछ महिलाओं के योगदान स्वरूप अक्सर दो परिवारों में लाठियां चल जाती हैं. गांव हो या शहर निंदा रस लबालब है. लगभग हर आदमी भुक्तभोगी है. अपने फ्रैंड सर्कल में कंघी मार कर देखिए, कोई-ना-कोई बरामद हो जाएगा, जिसने आपको आकार कभी ज़रूर ये कहा होगा, “फलां आदमी से आपके रिश्ते ख़राब चल रहे हैं क्या. परसो ऐसे ही मुलाक़ात हो गई, तो कह रहा था, किसी से बात ही नहीं करते, बड़े सड़े दिमाग़ के आदमी हैं.”
आप कई दिन बेचैन रहते हैं. बार-बार ख़ुद को सूंघते हैं, क्या पता, कहीं सचमुच तो नहीं सड़ गया!..

Sultan Bharti
सुल्तान भारती

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Satire

कितनी अच्छी चीज़ हैं- शांति, सेवा और न्याय, पर लोग लेना ही नहीं चाहते. थाने जाते हुए पैर कांपते हैं, बीपी बढ़ जाता है. लोग अक्सर अकेले जाने से कतराते हैं. कोई पंगा हो जाए, तो शांति के लिए लोग मोहल्ले के लुच्चे नेता को साथ लेकर थाने जाते हैं. अब शांति का रेट थोड़ा और बढ़ जाता है, क्योंकि थोड़ा विकास नेता को भी चाहिए.

अगर आप सौभाग्यवश पुलिस थाने में घुसते हैं, तो बोर्ड पर लिखे तीन शब्दों पर नज़र पड़ती है- शांति, सेवा और न्याय. ये तीनों चीज़ें थाने में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, पर मिलती उसे हैं जिसकी जेब में ‘सौभाग्य’ होता है. अगर आप के पर्स में सौभाग्य नहीं है, तो आप की वापसी शांतिपूर्वक संभव नहीं. आप हफ़्तों अशांत हो सकते है. शांति के लिए कुछ भी करेंगे. लोग शांति की खोज में हिमालय पर चले जाते हैं, लेकिन यहां थाने में आपका टीए-डीए बच जाता है. थाने की यही विशेषता है. यहां शांति के साथ शांति की उम्मीद में आनेवाले अक्सर अशांत और असंतुष्ट होकर बाहर आते हैं.
पुलिस ने थाने के दरवाज़े पर कंटिया डाल रखी है, ‘यहां पर शांति, सेवा और न्याय मिलता है’… कामयाब व्यापारी कभी दाम नहीं लिखता. आप पहले अंदर तो आओ फिर बताऊंगा कि शांति का बाज़ार भाव क्या है.
अंदर आप अपनी मर्ज़ी से आते हैं, मगर जाएंगे शांति की मर्ज़ी से. जब तक बीट कॉन्स्टेबल संतुष्ट नहीं हो जाता कि अब आप शांति को अफोर्ड कर लेंगे, आपकी कोचिंग चलती रहेगी. शांति बड़ी मुश्किल से मिलती है, इस हाथ दे-इस हाथ ले (नहीं तो ले तेरी की…)
कितनी अच्छी चीज़ हैं- शांति, सेवा और न्याय, पर लोग लेना ही नहीं चाहते. थाने जाते हुए पैर कांपते हैं, बीपी बढ़ जाता है. लोग अक्सर अकेले जाने से कतराते हैं. कोई पंगा हो जाए, तो शांति के लिए लोग मोहल्ले के लुच्चे नेता को साथ लेकर थाने जाते हैं. अब शांति का रेट थोड़ा और बढ़ जाता है, क्योंकि थोड़ा विकास नेता को भी चाहिए. थानेवाले नेता को देखते ही ऐसे खिल उठते हैं गोया आम के पेड़ में पहली बार बौर देखा हो. तीनों अच्छी चीज़ें हैं, पर थाने से कोई लाना ही नहीं चाहता. शरीफ़ आदमी थाने में घुसते हुए ऐसे घबराता है गोया किसी का बटुआ चुराते हुए पकड़ा गया हो. नमूने के तौर पर दिन दहाड़े थाने के पास लुटा शरीफ़ आदमी घबराया हुआ थाने में ‘न्याय’ की उम्मीद में जाता है. बीट कॉन्स्टेबल पूछता है, “के हो गयो ताऊ.”
“एक बदमाश मेरा पर्स छीनकर भागा है.”
“तो मैं के करूं. तमै चोर कू दौड़कर पकड़ना था.”
“इस उमर में मैं भाग नहीं सकता.”
“ता फिर इस उमर में नोट लेकर क्यों हांड रहो ताऊ. ख़ैर, कितने रुपए थे?”
“पांच हजार.”
बीट कॉन्स्टेबल खड़ा हो गया, “नू लगे अक कनॉट प्लेस का झपटमार था. इस इलाके के गरीब झपटमार पांच सौ से ऊपर की रकम नहीं छीनते.”
“क्यों?”
“ग़रीब इलाका है, ऊपर से कोरोना का कहर. किसी की जेब में सौ-पचास से ऊपर होता ही नहीं. पिछले महीने एक थैला छीनकर एक भागा था. बाद में ईमानदार झपटमार ने थैला यहां मालखाने में जमा करा दिया था.”
“क्यों?”
“थैले में दो जोड़ी पुराने जूते थे, जो मरम्मत के लिए कोई ले जा रहा था. झपटमार ने समझा प्याज़ है.”
”मैं तो लुट गया, मेरी रिपोर्ट लिखो.”
“कोई फायदा नहीं. दुनिया में किसी को एफआईआर से शांति नहीं मिलती. शांति मिलती है गीता के वचन दोहराने से- तेरा था क्या जिसे खोने का शोक मनाते हो. जो आज तेरा है, कल किसी और का हो जाएगा. अब आत्मा को पर्स में नहीं, बल्कि परमात्मा में लगाओ. ये झपटमारी नहीं, विधि का विधान है ताऊ.”
शांति के बाद नंबर आता है सेवा का. ये चीज़ थाने में बगैर भेदभाव के मिलती है. इसी के खौफ़ से काफी लोग लुटने, पिटने और अपमानित होने के बाद भी थाने नहीं जाते. सेवा के मामले में नर-नारी का भी भेदभाव नहीं है. कुछ समय से नारी की सेवा के लिए नारी पुलिस की व्यवस्था होने लगी है. कभी-कभी सेवा बर्दाश्त न कर पाने की वजह से लोग थाने में ही वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं. इस तरह के सेवा भाव से प्राणी को मरणोपरांत मोक्ष मिले ना मिले, पर सेवादार को प्रमोशन ज़रूर मिलता है.
थाने में उपलब्ध तीसरी दुर्लभ चीज़ है न्याय. ये भी शांति और सेवा की तरह निराकार होती है. थानेदार की पूरी कोशिश होती है कि थाने आनेवाले सारे श्रद्धालुओं को न्याय की पंजीरी प्राप्त हो, पर नसीब अपना अपना. दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम. बीट कॉन्स्टेबल भी यही चाहता है कि वादी और प्रतिवादी दोनों को न्याय की लस्सी मिले. ऐसे में कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. सेवा के इस मैराथन में जो ज़्यादा खोता है, उसे थोड़ा ज़्यादा न्याय मिलता है. थाने से बाहर आकर वादी और प्रतिवादी दोनों महसूस करते हैं कि न्याय के नाम पर जो कुछ मिला, उसमें से शांति गायब है, लेकिन… अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत!..

Sultan Bharti
सुल्तान भारती

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