Satire

Satire Story

इश्क़ का साइड इफेक्ट देखिए. लोग कहते हैं इश्क़ अंधा होता है. मै नहीं मानता. लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट, शिरीन-फरहाद और हीर-रांझा में कोई अंधा नहीं था. सभी आंखवालों ने जान-बूझकर चूल्हे में सिर दिया. हर आदमी इश्क़ नहीं कर सकता. कुछ लोग इश्क़ करते हैं, कुछ लोग इश्क़ के तंदूर पर बैठ जाते हैं. इश्किया साहित्य में और बुरा हाल है. जिसे इश्क़ का सलीक़ा नहीं आता, वही इश्क़ की परिभाषा तय करता है.

अब इस वक़्त जब कि दिन के ग्यारह बज रहे हैं, मैं पूरी निर्भीकता से रजाई ओढ़कर लेटा हूं. बगलवाले घर की बालकनी से अंदर चल रही टीवी की आवाज़ सुनाई पड़ रही है- दे दे प्यार दे.. प्यार दे.. प्यार दे दे.. मुझे प्यार दे… ऐसा लगता है गोया आशिक अपना गिरवी माल छुड़ाने आया हो. पहले इज़हारे इश्क़ का भी एक सलीका हुआ करता था- तेरे प्यार का आसरा चाहता हूं… कोरोना ने कैरेक्टर पर कितना घातक असर डाला है. प्रेमी रिक्वेस्ट करने की जगह राहजनी पर उतारू है- दे दे प्यार दे.. प्यार दे, प्यार दे दे.. मुझे प्यार दे… (जितना है सब निकाल दे) इसे कहते हैं दिनदहाड़े इश्क़ की तहबाजारी. प्यार और व्यापार के बीच की दूरी सिमट रही है.
टीवी बंद हो चुकी है, मगर आवाज़ अभी भी सुनाई पड़ रही है- दे दे प्यार दे… अब उस घर का युवा भविष्य इज़हारे इश्क़ के लिए बालकनी में खड़ा है. मैं हैरान था. दुनिया कोरोना की वैक्सीन मांग रही है और वो प्यार की डिलीवरी का इंतज़ार कर रहा था. लौंडे पर लैला-मजनू का बसंत देख, मैं सोचने लगा, ‘शादी से पहले भला शादी के बाद का संकट क्यों नहीं नज़र आता’ वैसे ये सवाल मैंने वर्माजी से भी पूछा था.
उनका जवाब था, “नज़र भी आ जाए, तो लोग उसे नज़र का धोखा मान लेते हैं. उदाहरण मेरे सामने है. जब तुझे इश्क़ का इन्फेक्शन हुआ था, तो मैंने कितना समझाया था कि इस दरिया-ए-आतिश में मत कूद, पर तू कहां माना था. और फिर… शादी के पांच साल बाद किस तरह के. एल. सहगल की आवाज़ में मेरे सामने रोना रो रहा था, “जल गया जल गया.. मेरे दिल का जहां…”
इश्क़ का साइड इफेक्ट देखिए. लोग कहते हैं इश्क़ अंधा होता है. मै नहीं मानता. लैला-मजनू, रोमियो-जूलियट, शिरीन-फरहाद और हीर-रांझा में कोई अंधा नहीं था. सभी आंखवालों ने जान-बूझकर चूल्हे में सिर दिया. हर आदमी इश्क़ नहीं कर सकता. कुछ लोग इश्क़ करते हैं, कुछ लोग इश्क़ के तंदूर पर बैठ जाते हैं. इश्किया साहित्य में और बुरा हाल है. जिसे इश्क़ का सलीक़ा नहीं आता, वही इश्क़ की परिभाषा तय करता है. वही तय करता है कि लौकिक और पारलौकिक इश्क़ में- किसके अंदर फिटकरी कम है. जो इश्क़ के मामले में बंजर होता है, वही इश्क़ में ‘अद्वैतवाद’ खोजता है. ऐसे लोगों ने साहित्य को बंजर बनाने में बड़ी अहम भूमिका निभाई है. उन्होंने छायावाद, अद्वैतवाद और अलौकिक दिव्यता के लेप में लपेटकर सीधे-सादे इश्क़ को ममी बनाकर आम आदमी से दूर कर दिया.
तो… इश्क़ क्या है? वो ज़माना गया जब इश्क़ इबादत हुआ करता था. अब इश्क कमीना हो चुका है और उससे आजिज आ गए लोगों का आरोप है कि मुश्किल कर दे जीना… (ये उन्हीं महापुरुषों का काम है, जो इश्क़ को इबादत से कमीना तक लाए हैं) इश्क़ में आदमी निकम्मा हो जाता है, ऐसा मै नहीं चचा गालिब कहते हैं- इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के…
बदलता है रंग आसमां कैसे-कैसे. कोरोना ने इश्क़ को भी संक्रमित कर दिया. इस दौर मे आकर इश्क़ नमाज़ी से इश्क़ जेहादी हो गया. ये अब तक का सबसे बड़ा हृदय परिवर्तन था. लव सीधे जेहाद हो चुका है. अब पुलिस बाकायदा इश्क़ का धर्म, राशन कार्ड और आधार कार्ड चेक करेगी. ऐसे मामले में पुलिस ईश्वर का भी दख़ल बर्दाश्त नहीं करेगी. उधर… इश्क़ गहरे सदमे में है. वो जेहादी हो गया और ख़ुद उसे भनक तक ना लगी. ये सब इतनी जल्दी में हुआ कि इश्क़ को संभलने का भी मौक़ा नहीं मिला. अब उसके सामने चेतावनी है कि चलाओ न नज़रों से बान रे, वरना रोज़ थाने का चक्कर काटना पड़ेगा.
लगता है मां का लाडला बिगड़ गया है. बालकनी से फिर लौंडे के गाने की आवाज़ आ रही है, “दे दे प्यार दे… इस बार उसकी आवाज़ में रोब नहीं याचना है. जैसे वो इश्क़ नहीं गेहूं मांग रहा हो. (वैसे इस हालात-ए-हाजरा में इश्क़ के मुक़ाबले गेहूं ज़्यादा महफूज़ है. इश्क़ को तो पुलिस और पब्लिक दोनों पीट रही है).
मैं एक व्यंग्य लिखने की सोच रहा हूं और देश का भविष्य प्यार का कटोरा उठाए याचना कर रहा है. हम यूपी वाले ऐसे छिछोरे इश्क़ का धुआं देख लें, तो खांसने लगते हैं. मैं फ़ौरन उठकर बालकनी में आ गया. छिछोरा आशिक टॉप फ्लोर की ओर देख कर गाने लगा- हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे.. मरने वाला कोई ज़िंदगी चाहता हो जैसे… उस फ्लैट की खिड़की अभी भी बंद है, पर लौंडा डटा है. आशिक और भिखारी दोनों के धंधे में धैर्य ज़रूरी है.
सतयुग को देखते हुए मुझे पूरा यकीन है कि अभी इश्क़ के इम्तेहान और भी हैं… इश्क़ का दिल से बडा गहरा रिश्ता होता है. और दिल हैं कि मानता नहीं… तो नतीज़ा ये निकला कि सारा किया धरा दिल का है, इश्क़ खामख्वाह बदनाम है. दिल तेरा दीवाना है सनम. दिल खुराफाती है और इश्क़ मासूम.. सदियों से कौआ बेचारा कोयल के बच्चे पालता आया है और दुनिया की नज़र में वो कोयल आज भी मासूम है, जो बडे़ शातिराना तरीक़े से अपने अंडे कौए के घोसले में रख देती है. इश्क़ के इस अवसरवादिता पर एक ताज़ा शेर पेश करता हूं-
दिल ने बड़ी लगन से दरीचे बिछाए थे
कमबख्त मौक़ा पाते ही कुत्ते पसर गए…

Sultan Bharti
सुलतान भारती

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तोते ने घूर कर देखते हुए कहा, “कोई फ़ायदा नहीं. इसकी फटेहाल जैकेट देखकर मैं इसका भाग्य बता सकता हूं. बेकारी का शिकार है. शनि इसके घर में रजाई ओढ़कर सो गया है. ये किसान आन्दोलन में सपरिवार बैठा है, घर में आटा और नौकरी दोनों ख़त्म है. इसे नक्षत्रों की जलेबी में मत फसाओ उस्ताद.” ज्योतिषी को भी दया आ गई, “जा भाई, तेरी शक्ल से ही लग रहा है कि तेरे पास किडनी के अलावा कुछ बचा नहीं है.

Satire Story

अचानक आज मुझे तुलसीदासजी की एक अर्धाली याद आ गई, ‘सकल पदारथ है जग माहीं करमहीन नर पावत नाही’ (मुझे लगता है, ये कोरोना काल में नौकरी गंवा चुके उन लोगों के बारे में कहा गया है, जो इस सतयुग में भी आत्मनिर्भर नहीं हो पाए) ये जो ‘सकल पदारथ’ है ना, ये किसी भी युग में शरीफ़ और सर्वहारा वर्ग को नहीं मिला. सकल पदारथ पर हर दौर में नेताओं का कब्ज़ा रहा है. इस पर कोई और चोंच मारे, तो नेता की सहिष्णुता ऑउट ऑफ कंट्रोल हो जाती है. अब देखिए ना, सैंतालीस साल से ऊपर तक कांग्रेसी ‘सकल पदारथ ‘ की पंजीरी खाते रहे, मगर मोदीजी को सात साल भी देने को राजी नहीं. बस, यहीं से भाग्य और दुर्भाग्य की एलओसी शुरु होती है. हालात विपरीत हो, तो दिनदहाड़े प्राणी रतौंधी का शिकार होकर दुर्भाग्य का गेट खोल लेता है- आ बैल मुझे मार!
बुज़ुर्गों ने कहा है- भाग्य बड़ा बलवान हो सकता है.. मैंने तो देखा नहीं. हमने तो हमेशा दुर्भाग्य को ही बलवान पाया है. कमबख्त दादा की जवानी में घर में घुसा और पोते के बुढ़ापे तक वहीं जाम में फंसा रहा. जाने कितनी पंचवर्षीय योजनाएं आईं और गईं, मगर सौभाग्य ग्राम प्रधान के घर से आगे बढ़ा ही नहीं. मैंने चालीस साल पहले अपने गावं के राम ग़रीब का घर बगैर दरवाज़े के देखा था. आज भी छत पर छप्पर है, सिर्फ़ टटिया की जगह लकड़ी का किवाड़ से गया है. इकलौती बेटी रज्जो की शादी हो गई है. राम ग़रीब की विधवा और दुर्भाग्य आज भी साथ-साथ रहते हैं. उनकी ज़िंदगी में ना उज्ज्वला योजना आई, ना आवास योजना. अलबत्ता सरकारें कई आईं! सचमुच दुर्भाग्य ही दबंग है. दलित, दुर्बल और असहाय पीड़ित को देखते ही कहता है, हम बने तुम बने इक दूजे के लिए…
भाग्य कभी-कभी लॉटरी खेलता है. ऐसे मौसम में प्राणी माझी से सीधे मुख्यमंत्री हो जाता है. अब प्रदेश के सकल पदारथ उसी के हैं, बाकी सारे करम हीन छाती पीटें. कभी-कभी ठीक विपरीत घटित होता है. सकल पदारथ की पावर ऑफ अटॉर्नी लेकर विकास की जलेबी तल रहा प्राणी मुख्यमंत्री से लुढ़ककर सीधे कमलनाथ हो जाता है. ये सब सकल पदारथ के लिए किया जाता है.
एक बार सकल पदारथ हाथ आ जाए, फिर विधायक या सांसद के हृदय परिवर्तन का मुहूर्त आसान होता है. सकल पदारथ से युक्त सूटकेस देखते ही काम, क्रोध मद, लोभ में नहाई आत्मा सूटकेस में समा जाती है. अगला चरण विकास का है. जिन्होंने बिकने का कर्म किया उन्हें सकल पदारथ मिला. जो करम हीन पार्टी से चिपके रहे, वो विपक्ष और दुर्भाग्य के हत्थे चढ़े. जाकी रही भावना जैसी…
मुझे कहावतें बहुत कन्फ्यूज़ करती हैं. भाग्य, सौभाग्य और दुर्भाग्य के बारे में कहावत है, ‘भाग्य में जो लिखा है वही मिलेगा ‘.. तो फिर पदारथ और करम की भूलभूलैया काहे क्रिएट करते है. भाग्य में सकल पदारथ का पैकेज होगा, तो डिलीवरी आएगी, फिर भला रूकी हुई कृपा के लिए काहे फावड़ा चलाएं. और… अगर क़िस्मत में सौभाग्य है ही नहीं, तो काहे रजाई से बाहर निकलें (पानी माफ़, बिजली हाफ रोज़गार साफ़).
अब अगर करम हीन कहा, तो तुम्हारे दरवाज़े का बल्ब तोड़ दूंगा… ‘कर्मवान’ और ‘कर्महीन’ के पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहिए. गीता में साफ़-साफ़ लिखा है- जैसा कर्म करोगे वैसा फल देगा भगवान… इलाके का विधायक अगर तुम्हें आठ-आठ आंसू रुला रहा है, तो इसमें विधायक का क्या दोष. वोट देने का कर्म किया है, तो पांच साल तक फल भुगतो. विकास फंड का सकल पदारथ उसी के हाथ में है. तुम अपने आपको इस काम, क्रोध, मद, लोभ से दूर रखो.
वो ज़माना गया जब सकल पदारथ परिश्रम का नतीज़ा हुआ करता था. अब सुविधा, संपदा और सत्ता का सकल पदारथ अभिजात वर्ग को दे दिया गया है, और मेहनत और मजदूरी करनेवालों को रूखी-सूखी खाय के ठंडा पानी पीव… की सात्विक सलाह दी जाती है. धर्माधिकारी की सलाह है कि आम आदमी को तामसी प्रवृत्तिवाले सकल पदारथ के नज़दीक नहीं जाना चाहिए, वरना मरने के बाद स्वर्ग तक जानेवाला हाई वे हाथ नहीं आता. अब आम आदमी धर्म संकट में है. जीते जी सकल पदारथ ले या मरने पर स्वर्ग… (गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय) आख़िरकार संस्कार उसे सत्तू फांक कर स्वर्ग में जाने की सलाह देता है.
देवताओं का कुछ भरोसा नहीं कि कब रूठ जाएं. भाग्य का सौभाग्य में बदलना तो बहुत कठिन है डगर पनघट की, मगर दुर्भाग्य बग़ैर प्रयास बेहद सुगमता से हासिल हो जाता है. जब देखो तब आंगन में महुआ की तरह टपकने लगता है. जिन्होंने साहित्य से गेहूं हासिल करने की ठानी, उसे दुर्भाग्य वन प्लस वन की स्कीम के साथ मिलता है. शादी के सात साल बाद ही मेरी बेगम को साहित्य और साहित्यकार की महानता का ज्ञान हो चुका था. एक दिन उन्होंने मेरे इतिहास पर ही सवाल उठा दिया, “मै वसीयत कर जाऊंगी कि मेरी सात पीढ़ी तक कोई साहित्यकार से शादी ना करे.” लक्ष्मी और सरस्वती के पुश्तैनी विरोध में खामखा लेखक पिसता है. लक्ष्मीजी का वाहक उल्लू उन्हें लेखक की बस्ती से दूर रखता है.
भाग्य और दुर्भाग्य के बीच में सकल पदारथ की चाहत में खड़ा इंसान तोतेवाले ज्योतिषी के पास जाता है. कोरोना की परवाह न करते हुए ज्योतिषि अपने तोते से कहता है, “इस का भाग्यपत्र निकालो वत्स.”
तोते ने घूर कर देखते हुए कहा, “कोई फ़ायदा नहीं. इसकी फटेहाल जैकेट देखकर मैं इसका भाग्य बता सकता हूं. बेकारी का शिकार है. शनि इसके घर में रजाई ओढ़कर सो गया है. ये किसान आन्दोलन में सपरिवार बैठा है, घर में आटा और नौकरी दोनों ख़त्म है. इसे नक्षत्रों की जलेबी में मत फसाओ उस्ताद.” ज्योतिषी को भी दया आ गई, “जा भाई, तेरी शक्ल से ही लग रहा है कि तेरे पास किडनी के अलावा कुछ बचा नहीं है. तोते का पैर छू और फकीरा चल चला चल…”
बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले ना भीख. जाने किस मूर्ख ने ये कहावत गढ़ी थी. मोती को कौन कहे, मिट्टी भी मांगने से नहीं मिलती. रही सकल पदारथ के लिए समुद्र मंथन की बात, तो यहां भाग्य चक्र प्रबल हो जाता है. धर्मभीरू जनता घर का गेहूं बेचकर तीर्थयात्रा पर जा रही है और सेवकनाथजी नौ बैंकों का हरा-हरा सकल पदारथ समेट कर विदेश यात्रा पर. यही विधि का विधान है!
कल मैने अपने मित्र चौधरी से पूछा, “सौभाग्य और दुर्भाग्य को संक्षेप में समझा सकते हो?” चौधरी कहने लगा, “बहुत आसान है. तुम मुझसे उधार दूध ले जाते हो, ये तुम्हारा सौभाग्य है और मेरा दुर्भाग्य…”
जाने क्यों, ये मुझे तुरंत समझ में आ गया.

– सुलतान भारती


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Satire Story
Kahani

इंसान तो सिर्फ़ मुंह से बोलता है, पर पैसा चारों तरफ़ से बोलता है. पैसा चाहे कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे या पिछली सीट पर, लोग पहचान ही लेते हैं. और मेरे जैसा शख़्स सूट-बूट और टाई पहनकर कार की पिछली सीट पर बैठे, तो भी हमारे पड़ोसी वर्माजी पहचान कर बोल ही देंगे, “कौआ चला हंस की चाल…” पैसा जो बोलता है.

मुझे पूरा यकीन है कि ध्यान से सुनेंगे, तो पैसे की आवाज़ साफ़-साफ़ सुनाई देगी. पैसा बोलता ही नहीं, दहाड़ता भी है. उसके सामने आदमी घिघियाता है, रोता है, फरियाद करता है और चारण बनकर पैसे की वंदना करता है. पैसा वो मास्टर की है, जो हर बंद ताला खोल देता है. पैसा न हो तो खून के रिश्तों में भी चीनी कम हो जाती है और पैसा हो, तो बेगानी शादी में भी अब्दुल्ला दीवाना हो कर नाचता है. पैसेवाले मूर्ख की बकवास भी प्रवचन का आनंद देती है और पैसे से बंजर विद्वान की नेक सलाह भी मोहल्ले को बकवास लगती है. पैसेवाले का चरण रज चन्दन होता है और गुरबत का चबैना फांक रहे इन्सान के सलाम का जवाब देने से भी लोग कतराते हैं- क्या पता उधार मांगने के लिए नमस्ते कर रहा हो..!
पहले सिर्फ़ सुनता था, अब देख भी लिया कि लेखक कड़की के तालाब में उगा हुआ वो कमल है, जिसमें कभी पैसे की ख़ुशबू नहीं आती. दूर से बडा़ ख़ूबसूरत लगता है- खिलखिलाता और अपने टैलेंट से सबका ध्यान अपनी ओर खींचता. लोग उसकी ख़ूब तारीफ़ करते हैं, “कमाल है! गज़ब की रचना! कोई मुक़ाबला नहीं जी…” मगर उसकी जड़ों में लिपटे हुए गुरबत के कीचड़ को कोई नहीं देखता.
ट्रेजडी देखिए आह से निकला होगा गान- को पूरी बेशर्मी से लेखक की नियति बताई जाती है. शायद ऐसी रुग्ण मानसिकता ने रचनाकार को नोट से दूर नियति की ओर धकेल दिया है. लिहाज़ा आख़री सांस तक सिर्फ़ उसके हाथ की कलम बोलती है, पैसा नहीं बोलता.
इंसान तो सिर्फ़ मुंह से बोलता है, पर पैसा चारों तरफ़ से बोलता है. पैसा चाहे कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे या पिछली सीट पर, लोग पहचान ही लेते हैं. और मेरे जैसा शख़्स सूट-बूट और टाई पहनकर कार की पिछली सीट पर बैठे, तो भी हमारे पड़ोसी वर्माजी पहचान कर बोल ही देंगे, “कौआ चला हंस की चाल…” पैसा जो बोलता है.
एलआईसी वाले मछली पकड़ने के लिए एक स्लोगन लाए हैं- ज़िंदगी के साथ भी.. ज़िंदगी के बाद भी… ये पैसे के बारे में कहा गया है. पैसा जितना ज़िन्दगी में बोलता है, उससे ज़्यादा मरने के बाद बोलता है. धर्मशाला, प्याऊ, मस्जिद, मंदिर, अनाथालय बनवाकर लोग पुण्य के ब्याज़ में पैसे की झंकार सुनते रहते हैं. पैसे के बगैर स्वर्ग कितना दुरूह और नर्क कितना नज़दीक है. तभी तो किसी दिलजले ने कहा है- पैसे बिना प्यार बेकार है! (सुनते ही फ़ौरन चीनी कम हो जाती है)
हमारे वर्माजी इतने कठोर सत्यवादी हैं कि लोग सामने पड़ने से घबराते हैं. क्या पता बबूल की कांटेदार टहनी जैसी कौन-सी बात बोल दें कि कान तक का कोरोना निकल भागे. खाते-पीते बुद्धिजीवी हैं. पूंजीपतियों से छत्तीस का आंकड़ा है. मोहल्ले के बडे़ व्यापारी सेठ नत्थूमल को भी नथुआ कहकर बुलाते हैं. पैसे को पैर की जूती समझनेवाले वर्माजी अपना अलग दर्शन बताते हैं, “पैसा कमाने के लिए आदमी तोते की तरह बोलता है, पैसा आने के बाद आदमी मुंह में फेवीकोल डालकर ‘नथुआ’ हो जाता है. पैसा आने के बाद आदमी को बोलने की ज़रूरत ही नहीं, लोग बोलते हैं, पैसा सुनता है. पैसे की ख़ामोशी में बड़ी आवाज़ होती है बबुआ…”
बुजुर्गों ने एक कहावत गढ़ी थी- अक्ल का अंधा गांठ का पूरा.. जब पैसा किसी मूर्ख के पास आ जाए और पैसे को तरसते बुद्धिजीवी का उसी मूर्ख से वास्ता पड़ जाए, तो क्या होगा. दुर्भाग्यवश बुद्धिजीवी अगर साहित्यिक प्रजाति का हो, तो सोने पर सुहागा. साहित्यकार की जेब बेशक सूखा पीड़ित हो, पर दिल में खुद्दारी का हिन्द महासागर और क्रोध में दुर्वासा से कम नहीं होता. एक तो करैला, दूजा नीम चढ़ा. पूंजीपति को देखते ही लेखक ऐसे फुंफकारता है, गोया सांड ने लाल रंग देख लिया हो. कुछ करनी कुछ करम गति कुछ लेखक का भाग. लेखक अपनी खुद्दारी नहीं छोड़ता और दुर्भाग्य पीछा. पैसा और कलम- मत छेड़ो सनम.
पैसा बगैर ज़बान के बोलता है. बोलता ही नहीं चिढ़ाता भी है. पैसा जिसके पास जाता है, उसे मुखिया बना देता है. जो बोले वही सत्य वचन, जिधर से जाए वही रास्ता ( महाजनों येन गता: सा पंथा:) पैसा परिभाषा बदल देता है. हर कान पैसे की आवाज़ सुनता है. समाज भी पैसेवाले तराजू की जय जयकार करता है. पैसा ही रस्म और परंपरा तय करता है. गरीब आदमी की पत्नी अगर कम कपड़े पहने, तो ‘मज़दूर ‘ और पैसे वाले की बीबी अगर लंगोट पहन कर निकले तो मॉडल कहलाए!
कि मैं कोई झूठ बोल्या…

सुल्तान भारती


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Kahaniya
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आजकल सब्ज़ीवाले से धनिया-मिर्ची नहीं मांगनी चाहिए. वैसे ही पडोसी से प्यार और नेता से उपहार न मांगने में ही भलाई है. पर इसका यह अर्थ नहीं कि कहीं कुछ मांगना ही नहीं चाहिए. सुनार के पास जाएं, तो पर्स ज़रूर मांगिए, वह आपके लिए बड़ी चीज़ होगी, तो उसके लिए फ्यूचर इनवेंस्टमेंट.

कहते हैं बिन मांगे मोती मिले और मांगे मिले न भीख. अर्थ यह कि जिनके पास मांगने का हुनर होता है वे बिना कुछ बोले बस इशारों-इशारों में बड़ी से बड़ी चीज़ हासिल कर लेते हैं और जो इस कला को नहीं जानते वे छोटी-छोटी चीज़ें भी नहीं प्राप्त कर पाते.
मांगने के मामले को छोटा मत समझिए दुनिया में ऐसा कोई नहीं, जो हाथ फैलाए न खड़ा हो. क्या राजा क्या रंक सभी मंगते हैं. कोई धन-दौलत मांगता है, तो कोई औलाद, कोई सुख-चैन मांगता है, तो कोई तरक्की. किसी का काम थोड़े-बहुत से ही चल जाता है, तो कोई छप्पर फाड़ कर मांगता है. मिलना न मिलना और बात है, पर मांगना तो हक़ है. कभी वोट मांगे जाते हैं, तो कभी नोट. और कहते हैं, जब दवा काम नहीं करती तो दुआ मांगी जाती है.
वैसे रोमांटिक लोग बस साथ मांगते हैं और इज्ज़तदार लोग बडी नफासत से लडकी का हाथ मांगते हैं. समाज का आलम इतना ख़राब है कि आज लड़की का हाथ मांगने से पहले दहेज़ मांगने की फार्मेलटी की जाती है यह कहते हुए कि भाई आप जो दे रहे हैं अपनी बेटी को. अब भला बताइए जब देनेवाले की नीयत पर इतना ही भरोसा है, तो दहेज़ की लिस्ट क्यों नत्थी की जाती है.
मांगनेवालों की भारी-भरकम लिस्ट और सूची देखकर ही भजन बना है- दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया… यदि मांगने का सिलसिला न हो, तो मदिरों की लाइन खाली हो जाए.
वैसे मांगना इतना बुरा भी नहीं है. मांगना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है. हममें से कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि उसने जन्म से ही मांगने की ट्रेनिंग नहीं ली है. कहते हैं बिना रोए, तो मां भी दूध नहीं पिलाती अर्थात बच्चा जब बोलना भी नहीं जानता, तब भी मांगने की कला में पारंगत होता है.
मैं कह रहा था मांगना इतना बुरा भी नहीं होता. शहरों की बात छोड दीजिए गांव और कस्बे में बिना पास-पड़ोस से मांगे गुज़ारा नहीं चल सकता. हमारे नाना के गांव में तो मांगने की पुरानी प्रथा थी, जैसेे- लेमन सेट या टी सेट मांगना. पूरे मुहल्ले में बस एक ही टी सेट था और जब किसी के घर कोई मेहमान (मेहमान से तात्पर्य समधी के लेवल का होता है) आ जाता, तो वह लेमन सेट कहीं भी हो स्वत: उसके घर पहुंच जाता. बस, गांव में ख़बर होनी चाहिए कि फलाने के घर मेहमान आए हैं. इस मांगने का प्रभाव ही था कि किसी का भी मेहमान पूरे मुहल्ले का सम्माननीय होता था और पूरा गांव उसे बड़ी इज़्ज़त देता था. जैसे ही वह पक्की सड़क छोड़ पगडण्डी पर आता कि ख़बर हो जाती फलाने के मेहमान बस से उतर गए हैं, बस पहुंच रहे हैं. हालत यह होती कि कदम-कदम पर उसे रास्ता बतानेवाले मिलते और जगह-जगह रोक कर घडे का ठण्डा पानी पिलानेवाले. उस ज़माने में बिना मीठे के पानी पिलाना अपराध माना जाता था. कुछ नही तो ताज़ा गुड़ ही खिला कर बडे स्नेह से पानी पूछते थे लोग. और देखने वाला गांव के इस संस्कार को देख कर भाप लेता था कि जिस घर में रिश्ता कर रहे हैं वह लोग हैं कैसे. वैसे चाय, चीनी और नमक तेल मांगने का रिवाज़ शहर के पड़़ोस में भी पनपा, पर लानत है मंहगाई की कि इसने पड़ोस पड़ोस न रहने दिया. आज किसी से कुछ मांगने से पहले संकोच होने लगता है कहीं बेचारा रहीम के कहे दोहे के अनुसार शर्मिन्दा न हो जाए. यथा रहिमन वे नर मर चुके जे कछु मांगन जायें उन ते पहले वे मुये जिन मुख निकसत नाय. इस मंहगाई के जमाने में कहीं मांग कर हम पड़ोसी को धर्मसंकट में न डाल दें.
देखिए मांगने में एक बड़ा ही ख़ूबसूरत एहसाह है और विश्‍वास मानिए अपनों से अपनापन बनाए रखने के लिए उनसे कुछ न कुछ मांगते रहना चाहिए.
मैं अपनों से प्यार बनाए रखने के लिए मांगने का ज़़िक्र कर रहा था. देखिए अपनत्व बनाए रखने के लिए कुछ न कुछ ऐसा मांगते रहना चाहिए कि आप के अपनों को एहसास होता रहे कि आप उनके लिए ख़ास हैं और इतना ही नहीं आप उन्हें भी अपना ख़ास समझते हैं. ऐसे में मैं मांगने की कुछ ऐसी टिप्स दे रहा हूं, जो बडी काम आएगी और इसे देने वाला मंहगाई के जमाने में भी प्रफुिल्लत होकर देगा इसे.
सुबह उठ कर अपने बड़़ेे़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद ज़रूर मांग लेंं. वे बेहद ख़ुुश हो जाएंगे और अपने जाननेवालों के बीच आपके गुण गाएंगे. इतना ही नहीं उन्हें इस बात की आत्मिक सन्तुष्टी होगी कि उन्होंने अपने बच्चे को बड़े अच्छे संस्कार दिए हैं.
रही दोस्तों की बात तो उन्हें अपना बनाए रखने के लिए सलाह ज़रूर मांगिए. जितने ही क़रीबी मामले में आप उनसे सलाह मांगेंगे, वे उतने ही आपसे जुड जाएंगे.
जैसा कि मैंने कहा मांगना एक हुनर हैै, सो मांगते समय सही पात्र से उचित चीज़ ही मांगनी चाहिए. ऐसा न हो कि जिसके पास जो नहीं हैै, उस से आप वही मांग बैठे और दोनों को शर्मिन्दा करें.
आजकल सब्ज़ीवाले से धनिया-मिर्ची नहीं मांगनी चाहिए. वैसे ही पडोसी से प्यार और नेता से उपहार न मांगने में ही भलाई है. पर इसका यह अर्थ नहीं कि कहीं कुछ मांगना ही नहीं चाहिए. सुनार के पास जाएं, तो पर्स ज़रूर मांगिए, वह आपके लिए बड़ी चीज़ होगी, तो उसके लिए फ्यूचर इनवेंस्टमेंट. वैसे ही जब किसी बड़े आदमी से कुछ मांगने का अवसर पड़ेे, तो सुदामा भाव में आ जाइए अर्थात छोटी-छोटी भावनात्मक मुद्राएं अपनाइए और उसे कृष्ण भाव का एहसास कराते रहिए. और तब-जब आप वहां से वापस लौटेंगे तो उम्मीद से दुगना पा चुके होंगे.
नई पीढ़ी से मोबाइल और इंटरनेट चलाने की टिप्स मांगना मत भूलिए. ससुराल में साली का प्यार बिन मांगे मिला हुआ मुफ़्त उपहार है, पर ऐसे उपहार को ज़रा सम्हाल कर रखना चाहिए, वर्ना लेने के देने पड़ जाते हैं.
रहा उधार मांगने का सवाल, तो बडे-बुजुर्ग पहले ही कह गए हैं उधार प्रेम की कैंची है, सो आजकल ऐसे मौक़े पर बैंक के ऐजेंट को याद करना चाहिए. मुझे विश्वास है कि अब आप जब अपने विवेक का इस्तेमाल कर सही पात्र से सही चीज़ मांगेंगेे, तो निराश नहीं होंगे और जीवन में मांगने की कला को अपनाकर नज़दीकी बढ़़ाने में सक्षम होंगे.

Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव


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हमारे अपने हालात चाहे जैसे चल रहे हों, हम इस बात की ख़बर ज़रूर रखते हैं कि हमारे पडोसियों के ऊपर क्या बीत रही है. मामले को और न उलझाते हुए मैंने देखा है कि शाम होते ही हम देश दुनिया के मामले निपटाने लगते हैं. टीवी के आगे बैठकर और फिर ख़बर में डूबकर बहस में उलझ जाते हैं. लास्ट में एक्सपर्ट कमेंटेटर बन के काॅलर खड़े करने लगते हैं.

भाईसाहब मुझे आज तक एक बात समझ में नहीं आई शादी में काम तो बस दूल्हे-दुल्हन का होता है, लेकिन ख़ुश पूरी बारात होती है. और इससे भी बढकर जिस-जिस गली से बारात गुज़रती है, उस गली के जाने-अनजाने सभी क्यों नाचने-गाने लगते हैं. वैसे शादी के बाद दुखी रहने के बारे में सभी बढ़-चढ़ के बातें करते हैं. वैसे आप जो भी समझें इसे मैं नेशनल कैरेक्टर समझता हूं, जो मज़ा हमें अपने मुद्दों में नहीं आता, वह मज़ा हमें दूसरों के मुद्दों में दख़ल देकर आता है. हमारे अपने हालात चाहे जैसे चल रहे हों, हम इस बात की ख़बर ज़रूर रखते हैं कि हमारे पडोसियों के ऊपर क्या बीत रही है. मामले को और न उलझाते हुए मैंने देखा है कि शाम होते ही हम देश दुनिया के मामले निपटाने लगते हैं. टीवी के आगे बैठकर और फिर ख़बर में डूबकर बहस में उलझ जाते हैं. लास्ट में एक्सपर्ट कमेंटेटर बन के काॅलर खड़े करने लगते हैं. अभी आईपीएल का क़िस्सा ही ले लीजिए न टीम का पता, न खिलाड़ी का, पर जहां देखिए वहां क्रिकेट के दीवाने जमे पड़े हैं. खेल के नियम-कायदे तक का ज्ञान नहीं है और हम हैं कि रात-बे रात टीवी से चिपके पड़े हैं. किसी से पूछो क्या देख रहे हो, तो बोलेगा कि देख नहीं रहे क्या चल रहा है.. यहां तक कि फ्री हिट और ऑफ साइड पर बहस हो जाती है. ऑफिस में लोग बाग यहां तक बता देते हैं कि रेफरी किसकी तरफ़ मिला था और किस प्लेयर को धक्का किस ने दिया. वह भी किस वजह से. वैसे ही कोई वर्ल्ड कप से पहले रिज़ल्ट की सही भविष्यवाणी कर रहा है, जबकि हमें अपने दिन-रात का पता नहीं.
कहने का अर्थ यह कि बेगानी शादी तो बस सिंबल भर है, असल बात तो हमारे चरित्र और सोच की है. किस तरह हम अपने हालात से बेख़बर दूसरों की खोज-ख़बर में जुटे हैं. सबसे ज़्यादा टीआरपी न्यूज चैनेल्स की है. न्यूज में ख़बर क्या है, यह हम सब जानते हैं. नेशनल अफेयर हो या इंटरनेशनल अफेयर सब सुनने-समझने के बाद दो मिनट की ख़बर अगर सब्ज़ी और मंहगाई की आ जाए, तो हम बेरुखी से चैनेल बदल देते हैं. भले ही सुबह से शाम तक मंहगाई पर बहस करते रहें और बढ़ती क़ीमत को कोसते रहें, क्योंकि अब मंहगाई फैशन हो गई है ख़बर नहीं रही. हम सब जानते हैं यह एक विकासशील कैटेगरी का आइटम है. ठीक फिल्मों में ग्लैमर की तरह जो सन साठ से आज तक बस बढ़ता ही गया है. जो सीन कभी एडल्ट फिल्मों से काट दिए जाते थे, वे आजकल टीवी पर फैमिली के साथ देखे जाते हैं अर्थात मंहगाई किस सीमा तक जाएगी इस पर चर्चा करना बेमानी है.
यहां तक कि हम अपनी समस्या के समाधान की खोज दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर करना चाहते हैं अर्थात मुद्दा हमारा है, पर हमारे बदले लड़ दूसरा ले. ख़ैर इसका उल्टा भी सच है कि कहीं कोई लड़ाई-झगड़ा या बहस हो रही हो, तो हमें तब तक चैन नहीं मिलता, जब तक हम अपनी टांग उसमें अड़ा न दें. वैसे ही जब मामला किसी की कमी बताने या किसी को नीचे गिराने का हो, तो देखिए भला हम किस हद तक बिना उससे लाइफ में एक भी बार मिले कैसे काॅन्फिडेंस के साथ काम करते हैं और यहीं किसी की तारीफ़ करनी हो, तो जैसे हमारे शब्द सूख जाते हैं वह भी अगर अपने किसी क़रीबी की उपलब्धि का मामला हो, तब ऐसा लगता है अच्छे शब्दों पर भी टैक्स लगा हुआ है.
लास्ट में मामला बेगानी शादी का मुझे लोगों से सच में पूछना पड़ा कि भाई आदमी बेगानी शादी में इतना ख़ुश क्यों होता है? और विश्‍वास मानिए, मुझे बिना गुगल के सही जवाब मिला कि पता नहीं उस शादी के ढोल-ताशे और नगाडे में कौन-सा नशा है कि जैसे ही वह बजने लगता है अपना मन अपने आप नाचने लगता है और पैर थिरकने लगते हैं. इसे ही अगर हम अपने ज़िन्दगी का नज़रिया बना लें अर्थात ख़ुश रहने के लिए अपने से ऊपर उठ जाएं, तो बस कहना ही क्या? अगर हमने दूसरों के सुख में सुख और दुख में दुख महसूस करना सीख लिया, तो बहुत कुछ बदल जाएगा, क्योंकि अभी हम अनजाने ही दूसरों के सुख में अपने भीतर दुख और दूसरों के दुख में अपने भीतर सुख ढूढ़ते हैं.

मुरली मनोहर श्रीवास्तव


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Satire

खांसी से पीड़ित लोग अमूमन उतना नहीं घबराते, जितना सुननेवाला घबराता है. क्या पता टीबी ना हो. खांसी की वैरायटी बहुत है. डॉक्टर को भी उतना ज्ञान नहीं होगा, जितना यूपीवालों को होगा. सरसों के खेत में उड़ता हुआ भुनगा गले में घुस जाए, तो यूपीवाले ऐसे खांसते हैं, गोया गले में पेड़ उग आया हो. हुक्का पीनेवाले बुज़ुर्ग खांसने पर उतर आएं, तो पूरे मोहल्ले का रतजगा करा दें. इतने ज़बर्दस्त तरीक़े से खांसते हैं कि आंतों में रूकी हुई गैस भी ख़ारिज हो जाती है.

आदमी की फ़ितरत देखिए, मरना ही नहीं चाहता. बीमार होने पर आसानी से अस्पताल नहीं जाना चाहता और कोरोना को मौसमी वायरल बताकर डॉक्टरों से बचना चाहता है. विकास की तरह बीमारी भी ‘हरि अनन्त हरि कथा अनंता’ है. डॉक्टर और केमिस्ट की जन्नत का दरवाज़ा इसी दोजख से होकर जाता है. कितने ‘ज़मीनी भगवान’ (डॉक्टर) तो अपनी बेटी का रिश्ता तक बीमारी का मुहूर्त देखकर तय करते हैं, “लड़केवाले जल्दी मचा रहे थे, पर मैंने शादी की तारीख़ दिसम्बर से हटाकर जून कर दी! मई-जून खांसी, ऐक्सिडेंट, टीबी और हैजा का सीज़न होता है- यू नो!”
खांसी से पीड़ित लोग अमूमन उतना नहीं घबराते, जितना सुननेवाला घबराता है. क्या पता टीबी ना हो. खांसी की वैरायटी बहुत है. डॉक्टर को भी उतना ज्ञान नहीं होगा, जितना यूपीवालों को होगा. सरसों के खेत में उड़ता हुआ भुनगा गले में घुस जाए, तो यूपीवाले ऐसे खांसते हैं, गोया गले में पेड़ उग आया हो. हुक्का पीनेवाले बुज़ुर्ग खांसने पर उतर आएं, तो पूरे मोहल्ले का रतजगा करा दें. इतने ज़बर्दस्त तरीक़े से खांसते हैं कि आंतों में रूकी हुई गैस भी ख़ारिज हो जाती है. हमारे गांव के गियासू भाई बीड़ी के चेन स्मोकर थे, (खुदा उन्हें जन्नत दे) जब खांसना शुरू करते, तो मुंह के अलावा भी कई जगह से आवाज़ आती थी.
कुछ लोगों ने खांसने में भी काफ़ी नाम कमाया है. इन्हें अगर वरीयता क्रम में रखा जाए, तो ‘केजरीवाल’ जी की खांसी को गोल्ड मेडल मिलेगा. क्या खांसी थी, उड़ी बाबा! लोग निरूपा रॉय की खांसी भूल गए. जब खांसने पर उतारू हो जाते, तो टीवी देख रहा अभिभावक बीबी को डांटता था, “बच्चों को टीवी से थोडा़ दूर बिठाया करो.” उन्होंने खांस-खांस कर पूरे देश को इमोशन में ला दिया था. उनकी खांसी से घबराकर दिल्ली के वोटरों ने डिसाइड किया कि ज जीताने से ही जान छूटेगी और जीतते ही उन्होंने मफ़लर और खांसी को अलविदा कर दिया. अब उनकी खांसी अच्छे दिन की तरह नदारद है और दिल्लीवाले खांस रहे हैं. विरोधियों का दिल पराली की तरह जल रहा है और केजरीवालजी मुस्कुराकर प्रदूषण पर झाड़ू फेर रहे हैं. आंकड़ों में पराली खाद में बदल रही है और खांसी मुस्कुराहट में. ख़ुशहाल दिल्ली फेस मास्क लगाए आज भी खांस रही है.
कुछ खांसी सामयिक होती है, कुछ अल्कोहलिक और कुछ मौसमी. एक ‘कुकुर खांसी’ भी होती है, जिसकी दवा है- कुकर सुधा (नाम से ऐसा लगता है कि इसका आविष्कार किसी कुत्ते ने किया होगा) लेकिन इसके इतर एक रहस्यमय खांसी ऐसी भी है, जो सनातनकाल से चली आ रही है और आज तक उसका कोई इलाज नहीं है. अगर आपके याददाश्त का प्लग स्पार्क नहीं कर रहा, तो याद दिला देता हूं. ये रहस्यमय खांसी हिन्दी फिल्मों के ग़रीब हीरो की विधवा मां को होती थी. याद कीजिए, ग़रीब गांव का बचपन से गरीब और अनाथ हीरो. हीरो की खांसती हुई अम्मा. पास में सनातनकाल से बनता आ रहा एक बांध (पता नहीं उस बांध का ठेकेदार कौन है) हर तीसरी फिल्म में माताजी खांस रही हैं और बांध पर डायनामाइट फट रहा है. हीरो पीपल के नीचेवाले गुरुकुल में पढ़कर सीधे इंस्पेक्टर हो रहा है. दर्शक सोच रहे हैं कि अब हीरो माताजी के बलगम की जांच ज़रूर कराएगा या खांसी की दवा दिलाएगा, पर हीरो इतना हयादार नहीं है, वो माताजी के लिए खांसी की दवा लाने की बजाय हीरोइन से इश्क़ कर रहा है. यार ये कौन-सी खांसी है, जिसे केजरीवालजी की खांसी भी ओवरटेक नहीं कर पाई.
मैं सच कह रहा हूं, पिछले हफ़्ते दबाकर मूली खाया था. पहले ज़ुकाम हुआ,फिर बुखार और फिर गला ख़राब. मित्रों! ये किस बीमारी के लक्षण हैं. ओह तो आप बताना ही नहीं चाहते. तीन दिन से खांसी भी आ रही है. कैरेक्टर में- फिफ्टी फिफ्टी लेकर घूम रहे मित्रों को ज़्यादा ख़ुश होने की ज़रूरत नहीं, ज़ुकाम-बुखार दोनों ठीक हो चुका है. कुछ लोगों की बददुआ में एंटी बायोटिक की तासीर होती है.
खांसते रहिए…

Sultan Bharti
सुल्तान भारती


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Satire Story

सारे रसों के लिए महाबली निंदा रस कोरोना साबित हुआ है. ये एक ऐसा रस है, जिसका ज्ञान जेनेटिक होता है. किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती. हमारे वर्माजी कद में छोटे हैं, पर घाव करें गंभीर की ख़ासियत रखते हैं. उनके पास निंदा रस का पूरा गोदाम रहता है. पहले आओ-पहले पाओ की सहूलियत भी है. वो बगैर दोस्ती-दुश्मनी के भी बिल्कुल निर्विकार भाव से निंदा करते हैं.

अगर कोई मुझसे पूछे कि रस कितने प्रकार के होते हैं, तो मेरा जवाब होगा, “चाहे जितने तरह का हो, पर निंदा रस के सामने सारे भिन्डी हैं. मीडिल क्लॉस में दाखिले से पहले ही मैं इस रस की महानता से परिचित हो गया था. जब हम लंच में क्लॉस से बाहर जाते, तो गणित और विज्ञान के अध्यापकों की निन्दा करते और फीस टाइम पर ना देने के लिए अध्यापक के सामने अपने मां-पिता की निन्दा करते, “मेरी कोई ग़लती नहीं, फीस मांगने पर अब्बा ने कान ऐंठ दिया था (ये सरासर झूठ था). निंदा रस की लज्जत का क्या कहना. अनार और आम के जूस को मूर्छा आए-जाए, गन्ना बगैर काटे गिर जाए और संतरा सदमे से गश खा जाए.
साहित्यिक रस (वीर रस, श्रृंगार रस, वीभत्स रस, सौन्दर्य रस, करुण रस आदि) मिलकर भी निन्दा रस का मुक़ाबला नहीं कर सकते. निंदा रस ने सदियों से सबका टीआरपी गिरा रखा है. सारे रसों के लिए महाबली निंदा रस कोरोना साबित हुआ है. ये एक ऐसा रस है, जिसका ज्ञान जेनेटिक होता है. किसी से पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती. हमारे वर्माजी कद में छोटे हैं, पर घाव करें गंभीर की ख़ासियत रखते हैं. उनके पास निंदा रस का पूरा गोदाम रहता है. पहले आओ-पहले पाओ की सहूलियत भी है. वो बगैर दोस्ती-दुश्मनी के भी बिल्कुल निर्विकार भाव से निंदा करते हैं.
पिछले हफ़्ते की बात है, मोहल्ले के कवि बुद्धिलाल पतंग के लिए चंदा लेने वर्माजी मेरे घर आए. मैंने पूछा, “उनके कविता की पतंग मोहल्ले से बाहर भी उड़ती है या नहीं?”
बस निंदारस का क्रेटर खुल गया. वर्माजी बगैर नफ़ा-नुक़सान के अमृत उगलने लगे, “सारे मंचों से धक्का देकर खदेड़ा हुआ कवि है. पूरे शहर से इसकी पतंग कट गई है, वो तो मैंने हाथ पकड़ लिया. तुम्हें तो पता है कि मैं कितना दयालु और कृपालु हूं. कोई कुछ भी मांग ले, मैं मना नहीं कर पाता.”
“मुझे अर्जेंट पांच हज़ार रुपए की ज़रूरत है.”
वर्माजी के निंदा रस की पाइप लाइन मेरी तरफ़ घूम गई,” बाज़ार लगी नहीं कि गिरहकट हाज़िर… ” इतना कहकर वो बगैर चन्दा लिए झपाक से निकल लिए.
कुछ लोगों ने तो अपनी जीभ को निंदा रस का गोदाम बना लिया है. दिनभर बगैर ऑर्डर के सप्लाई चलती रहती है. उनके रूटीन में निंदा ही नाश्ता है और निंदा ही उपासना. उपासना पर हैरत में मत पड़िए, वो गाना सुना होगा, कैसे कैसों को दिया है, ऐसे वैसों को दिया है… यहां बन्दा ईश्वर की निन्दा कर रहा है कि तूने अपने बंदों को छप्पर फाड़कर देने में बड़ी जल्दबाज़ी की है.. पात्र-कुपात्र भी नहीं देखा.. मेरे जैसे होनहार और सुयोग्य के होते हुए भी सारी पंजीरी ‘ऐसे वैसों’ को बांट दी ( कम-से-कम पूछ तो लेते).
कुछ लोग निंदा रस को अपनी ज़िंदगी का आईना बनाकर जीते हैं. वो अपनी निंदा में अपने चरित्र की परछाईं देखते हैं, ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय!’ @जब निंदा रस का ज़िक्र होता है, तो महिलाओं को कैसे इग्नोर कर दें. इस विधा में भी महिलाओं ने बाज़ी मार रखी है. अपनी आदत से मजबूर कुछ महिलाओं ने इस कला में डिप्लोमा और डिग्री दोनों ले रखी है, ख़ासकर गांवों में कुछ महिलाओं के योगदान स्वरूप अक्सर दो परिवारों में लाठियां चल जाती हैं. गांव हो या शहर निंदा रस लबालब है. लगभग हर आदमी भुक्तभोगी है. अपने फ्रैंड सर्कल में कंघी मार कर देखिए, कोई-ना-कोई बरामद हो जाएगा, जिसने आपको आकार कभी ज़रूर ये कहा होगा, “फलां आदमी से आपके रिश्ते ख़राब चल रहे हैं क्या. परसो ऐसे ही मुलाक़ात हो गई, तो कह रहा था, किसी से बात ही नहीं करते, बड़े सड़े दिमाग़ के आदमी हैं.”
आप कई दिन बेचैन रहते हैं. बार-बार ख़ुद को सूंघते हैं, क्या पता, कहीं सचमुच तो नहीं सड़ गया!..

Sultan Bharti
सुल्तान भारती

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Satire

कान के रास्ते अंदर जाने में कोरोना को क्या प्रॉब्लम है, इस पर रिसर्च की ज़रूरत है. मेरे ख़्याल से, नाक और मुंह के रास्ते में तमाम ख़तरे हैं. आदमी दाल-रोटी के साथ कोरोना को भी खा जाएगा. नाक में और भी ख़तरा है, आदमी ने छिनका, तो मलबा के साथ कोरोना की पूरी कॉलोनी दलदल में गाना गाती नज़र आएगी, “ये कहां आ गए हम, सरे राह चलते-चलते…” फिर भी कोरोना है कि मानता नहीं.

मेट्रो रेल बंद होने के बाद आज पहली बार मेट्रो का सफ़र किया, मज़ा आ गया. डीएमआरसी ने सीटों को कोरोना की सहूलियत के हिसाब से अरेंज किया है. एक सीट छोड़कर बैठने की व्यवस्था की गई है. (ताकि बीच में कोरोना के बैठने की सहूलियत रहे!) कोरोना चलने-फिरने में चूंकि लाचार होता है, इसलिए उसकी संख्या और विकलांगता को देखते हुए हर डिब्बे में उसकी सीटें सुरक्षित की गई हैं. डीएमआरसी हर स्टेशन के इंट्री गेट पर यात्री के हाथ का टेंप्रेचर जांच कर उसे कोरोन फ्री मान लेती है. अब अगर कोरोना यात्री के पीठ पर बैठकर अन्दर आ गया, तो ये कोरोना की ग़लती है, डीएमआरसी की नहीं.
अंदर मेट्रो ट्रेन ख़ाली सी लगी. मेट्रो के नए नियम और कोरोना के खौफ़ ने सूरत ही बदल रखा है. अगर सांसों के आवागमन से परेशान होकर किसी ने फेस मास्क उतार दिया, तो बगल बैठा यात्री घबरा जाता है. ऐसा लगता है गोया सारा कोरोना सिर्फ़ मुंह के रास्ते अंदर जाने का इंतज़ार कर रहा हो. (मुंह के अलावा और कहीं से जाना ही नहीं चाहता) फेस मास्क के बावजूद दोनों कान खुले होते हैं, मगर उधर से जाने के लिए कोरोना है कि मानता नहीं. कान के रास्ते अंदर जाने में कोरोना को क्या प्रॉब्लम है, इस पर रिसर्च की ज़रूरत है. मेरे ख़्याल से, नाक और मुंह के रास्ते में तमाम ख़तरे हैं. आदमी दाल-रोटी के साथ कोरोना को भी खा जाएगा. नाक में और भी ख़तरा है, आदमी ने छिनका, तो मलबा के साथ कोरोना की पूरी कॉलोनी दलदल में गाना गाती नज़र आएगी, “ये कहां आ गए हम, सरे राह चलते-चलते…” फिर भी कोरोना है कि मानता नहीं.
फेस मास्क की आड़ में पुलिसवाले आत्मनिर्भर होने में लगे हैं. जैसे-जैसे कोरोना का ग्राफ गिर रहा है, प्राइवेट अस्पताल और पुलिस की बैचैनी बढ़ रही है. ट्रैफिक पुलिस आपके स्वास्थ्य को लेकर कितनी चिंतित है, इसका पता मुझे कल चला, जब चलती कार के ठीक सामने आकर पुलिसवाले ने मेरे दोस्त की गाड़ी रोककर फेस मास्क चेक किया. सबके चेहरे पर मास्क पाकर उसके चेहरे पर जो निराशा मैंने देखी, तो ऐसा लगा गोया अभी-अभी उसका टाइटेनिक जहाज़ डूबा हो. जनता के स्वास्थ्य को लेकर पुलिस की इतनी चिंता और बेचैनी कभी देखी नहीं. फेस मास्क के बगैर चेहरा तुम्हारा.. वसूली हमारा.. मिले सुर मेरा तुम्हारा…
मुझे कोरोना के कैरेक्टर पर शुरू से ही डाउट रहा है, चीन से आए माल का क्या भरोसा. लगता है साले चीन ने कोरोना को सिखा-पढ़ाकर भेजा है कि फेस मास्क के बगैर मानना मत, कम्पनियों से हमारी डील हो चुकी है. फेस मास्क देखते ही पतली गली से निकल लेना, पापी पेट का सवाल है.. आजकल वैसे भी इंडियावाले हमारे पेट पर लात मार रहे हैं. दो लोगों के बीच की खाली सीट पर मरणासन्न अवस्था में लेटा कोरोना दो लोगों की बात सुनकर अपना बीपी बढ़ा रहा है, “ये साला मनहूस कब दफ़ा होगा इंडिया से?”
“बिहार का चुनाव हो जाने दो, फिर इसी का लिट्टी-चोखा खाएंगे. वैसे भी चाइनीज़ माल की होली तो जलानी तय है.”
“इस वायरस का फेस मास्क से क्या लेना-देना है?”
“वो कहावत तो सुनी होगी, मुंह लगना. गंदे लोग हमेशा मुंह लगने के फ़िराक़ में रहते हैं, इसलिए हमने मुंह पर फेस मास्क लगा लिया है. वैसे, मैं तो चाहता हूं कि ये मरदूद एक बार घुसे तो सही मुंह के अंदर.”
“फिर तो बहुत बुरा हाेगा.”
“वही तो! रोटी-रोज़ी की तलाश में भटक रहे इन्सान के लिए दस रुपए का फेस मास्क भी भारी पड़ रहा है. भूख और ग़ुस्से की आग में उसकी आंतें नाग की तरह फनफना रही हैं. एक बार कोरोना अंदर गया कि भूखे इन्सान ने डकार मारी. कोरोना की पूरी कॉलोनी एक बार में ‘स्वाहा ‘.. देख रहे हो कि पिछले दस दिन में कोरोना की आबादी कितनी घटी है?”
“हां, सर्दियों में भूख बहुत लगती है.”
कोरोना अगले स्टेशन पर उतरकर अपनी फैमिली की गिनती करने लगा.

Sultan Bharti
सुल्तान भारती


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Mask Hai To Mumkin Hai

ओरिजनल सावन लापता है. पहले बसंत लापता हुआ, अब सावन. क्या पता दस साल बाद हमें पता चले कि अमेरिका ने सावन को पेटेंट करा लिया है. अब आगे से सावन वहीं पाया जाएगा…

मैंने सावन के बारे में बहुत सुना है. कॉन्फिडेंस से कह सकता हूं कि सावन के बारे में कोरोना से ज़्यादा जिज्ञासा थी. पैदा होने से पच्चीस साल की उम्र तक गांव से जुड़ा रहा. उस दौरान सावन, लाला के तगादा की तरह, बार-बार सामने आता रहा. सावन आते ही गांव में झूले पड़ जाते थे. लड़के झुलाते थे और लड़कियां झूलती थीं. लोग इंतज़ार करते थे, ‘सावन तुम कब आओगे… आकाश में बदली, रिमझिम फुहार और नीचे ‘कजरी’ गाती झूले पर युवा महिलाएं. इस झूले के दौरान इश्क़ की कई क्लासिक कहानियां जन्म लेती थी.
वो गाना याद आ रहा है, ‘बचपन के दिन भुला ना देना… ‘ अरे कैसे भूल सकता हूं भइया. वही ख़ूबसूरत और रंगीन यादें, तो कुपोषित हसरतों को आज भी ऑक्सीजन देती हैं. प्यार-मुहब्बत भी याद है और दोस्तों के साथ लड़ाइयां भी. एक बार तो मोहब्बत इतनी घातक हो गई कि मै अपने अजीज़ दोस्त कमाल अहमद से मारपीट कर बैठा था (दरअसल मामला ‘एक म्यान में दो तलवार ‘ वाला था!). ख़ैर, सावन में बादलों के नज़दीक ‘बिजली’ के आने से इतनी गरज-चमक तो स्वाभाविक है.
गांव क्या छूटा, सावन छूट गया. अड़तीस साल से दिल्ली में हूं. कभी सावन को आते-जाते नहीं देखा. जब-जब सावन ढूंढ़ने की कोशिश की, तो कभी बादलों से आसाराम झांकते नज़र आए, तो कभी बाबा राम रहीम. ओरिजनल सावन लापता है. पहले बसंत लापता हुआ, अब सावन. क्या पता दस साल बाद हमें पता चले कि अमेरिका ने सावन को पेटेंट करा लिया है. अब आगे से सावन वहीं पाया जाएगा. हमें पता है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. अभी हमें ‘विश्‍व गुरु’ का सिंहासन पाना है. खोने की लिस्ट लंबी है, इसलिए सावन को जाने दो.
पिछले सावन में मैं गांव गया था. बड़ा जोश में था कि सावन से मुलाक़ात होगी. पंद्रह दिन फेरीवालों की तरह हांडता रहा, मगर सावन नज़र नहीं आया. अब नीम के पेड़ पर झूले भी नहीं पड़ते. झूला झुलाने वाले युवा ज़्यादातर शहर चले गए और जो बचे वो झूले पर पींग मारने की जगह ‘गांजे’ की पींग मारकर आसमान में उड़ते हैं. अब इधर सावन की जगह ‘मनरेगा’ आने लगा है. मनरेगा ने सावन को निगल लिया है. तमाम पनघट में नालों का कब्ज़ा है. बसन्त और सावन का पंचांग अब ग्राम प्रधान और बीडीओ साहब बनाते हैं.
बंसत का और बुरा हाल है. अब इसकी भी मोनोपोली ख़त्म कर दी गई है. फरवरी के जिस महीने में पहले बसंत आता था, अब वैलेंटाइन आता है. युवाओं को अब वैलेंटाइन के मुक़ाबले बसंत में चीनी कम नज़र आ रही है. रोना ये है कि वैलेंटाइन का इंफेक्शन कोरोना की रफ़्तार से गांव तक पहुंच गया है. ऐसे में बसंत हो या सावन, उनकी विलुप्त होने की आशंका ‘बाघ’ जैसी होती जा रही है. जहां बंसत है, वहां वैलेंटाइन ने ठीया लगा लिया और सावन बेचारा मनरेगा से दुखी है. जाएं तो जाएं कहां!..
मैं सावन को लेकर संशय में हूं, और बसंत को लेकर दुखी. युवाओं की चिंता वैलेंटाइन को लेकर है. क्या पता गांव से शहर तक ‘सावन’ को निगल चुका कोरोना फरवरी में वैलेंटाइन के साथ क्या करे. सतयुग में सब कुछ संभव है. कल के सूरज और आज की गहराती शाम के बीच ख़्वाबों के पनपने के लिए एक बंजर रात का फ़ासला सामने है.

Sultan Bharti
सुल्तान भारती

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Satire

आगे कुआं पीछे खाई! मजबूर विक्रम को मौन भंग करना पड़ा, “सियासत में एक पुरानी परंपरा है बेताल. विपक्ष को कभी सत्तापक्ष का ‘विकास’ नहीं नज़र आता. हमारे देश के विपक्ष ने ये रूटीन बना लिया है कि सत्ता से बेदख़ल होते ही वो आंखों पर गांधारी पट्टी बांध लेता है. सत्ता पक्ष की अच्छाई और विकास ना देखने की इस ‘धृतराष्ट्र परंपरा’ को बड़ी निष्ठा और लगन से निभाया जाता है. इस काजल की कोठरी में कोई बेदाग़ नहीं है. मेरा मतलब सास भी कभी बहू थी…

अगस्त 2020. रात के डेढ़ बजते ही महाराजा विक्रम महल से बाहर आए. बाहर घनघोर ख़ामोशी थी, गलियों में कुत्ते तक क्वारंटाइन होकर कोरोना नियमों का पालन कर रहे थे. थोड़ी देर पहले ही बारिश हुई थी और अब बादल सोशल डिस्टेंसिंग के बगैर आसमान में चहलकदमी कर रहे थे. महाराजा विक्रम काफ़ी रफ़्तार के साथ नगर से जंगल को जानेवाले रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे. महारानी के जागने से पहले ही उन्हें वापस महल लौटकर आना था.
थोड़ी देर बाद वो घने जंगल के रास्ते श्मशान की ओर बढ़ रहे थे. विक्रम ने अपने ‘ओप्पो’ चाइनीज़ फोन में टाइम देखा, रात के १.४५ हो चुके थे. आसमान में चांद बादलों के पीछे दुर्भाग्य की तरह मुस्कुरा रहा था. ओस की बूंदें नेताओं के आश्वासन की तरह टपक रही थीं. अंधेरे में जंगली जानवर इस तरह इधर-उधर दौड़ रहे थे, जैसे कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल कर युवक पकौड़े का “ठीया” तलाश रहे हों. दूर किसी बस्ती में कोई कुत्ता बड़ा इरिटेट होकर भौंक रहा था, जैसे देहात का कोई कुत्ता शहर के कुत्ते से अपने रिश्तेदार का पता पूछ रहा हो.
महाराजा विक्रम तेज़ी से आगे बढ़े. अभी वो श्मशान के सामने पहुंचे ही थे कि ठिठककर रुक गए. बड़ा खौफ़नाक मंज़र था. श्मशान के मेन गेट के सामने चटाई बिछाकर एक शेर बैठा था. दोनों एक-दूसरे को बड़ी देर तक ताकते रहे. आख़िरकार शेर ने मुंह खोला, “काहे नर्भसाए खड़े हो? डरिए मत, ऊ का है कि अब हम भेजिटरियन हो गया हूं- टोटल शाकाहारी. हमने तो अपने गुफ़ा के सामने नोटिस बोर्ड लगा दिया हूं कि ‘कृपया गाय, बैल, भैंस, बकरा-बकरी सब इहां से दूर जाकर चारा खाएं. चारा… मतलब घास.”
महाराजा विक्रम की जान में जान आई, क्योंकि शेर ख़ुद को शाकाहारी बता रहा था. विक्रम ने भोजपुरी बोल रहे शेर से पूछा, “एक्सक्यूज़ मी सर, आप गौवंश का शिकार नहीं करते, वो बात समझ में आती है. भैंस का शिकार नहीं करते, क्योंकि कई बार संख्या बल आप पर भारी पड़ता है. पर… बकरे के शिकार में क्या ख़तरा है. बकरे को काहे अवॉयड किया सर?” शेर ने माथा पीट लिया, “कोरोना में एकदम बुडबक हो गए हो का! सोशल मीडिया नहीं देखते? आप का चाहते हो कि हम बकरा का शिकार करूं और हमारा विरोधी लोग मीडिया से मिलकर ऊ बकरे को गाय साबित कर दें! हमरी तो हो गई “माब लिंचिंग” यही अनुष्ठान करवाना चाहते हो का. हम कोई अजूबा वाली बात नहीं कह रहा हूं. ऐसा चमत्कार कई बार हो चुका है. त्रिफला का चूर्ण है तुम्हारे पास?”
“वो क्या करेंगे सर?”
“का बताएं, परसो डिनरवा में बगैर सत्तू मिलाए चारा खा लिया था, तब से पेट अपसेट है. ख़ैर अब आप जाइए, हम योगा करूंगा. आप जाकर कहानी सुनिए. पूरा देश बेताल से कहानी ही सुन रहा है. रोज़ नई-नई कहानी. इतने दिन से रोज़ कहानी सुन रहे हो, पर लगता है कि अभी तक आत्मनिर्भर नहीं हुए. बहुत ढीले हो! कुछ लेते क्यों नहीं.”
शर्मिन्दा होकर विक्रम श्मशान की ओर बढ़ गए, जहां चिताएं विपक्ष के अरमानों की तरह जल रही थीं. एक बड़े वृक्ष की ऊंची डाल पर बेताल का शव, सुशांत सिंह राजपूत के संदिग्ध हत्यारे के गिरफ़्तारी के उम्मीद की तरह, लटका हुआ था. विक्रम ने पेड़ के नीचे से बेताल को आवाज़ दी, “तू जीडीपी की तरह नीचे आएगा या बेरोज़गारी की तरह मैं ऊपर आऊं?”
बेताल रोज़गार की तरह ख़ामोश था.
अब विक्रम पेड़ पर डॉलर की तरह चढ़ा और बेताल के शव को कंधे पर लादकर चीन के चरित्र की तरह नीचे आया. अभी बिक्रम ने मुश्किल से दो-चार कदम बढ़ाए थे कि शव में स्थित बेताल बोल पड़ा, “राजन, तेरा धैर्य मायावतीजी की तरह प्रशंसनीय है. जिस निष्ठा, धैर्य और उम्मीद से तू मुझे ढो रहा है, उस तरह तो सतयुग में श्रवण कुमार ने अपने मां-बाप को भी नहीं ढोया होगा. ख़ैर, मै तेरी थकावट उतारने के लिए तुझे एक कहानी सुनाता हूं, मगर सावधान राजन, अगर तुमने कुछ बोलकर मौन भंग किया, तो शव लेकर मैं वैसे ही उड़ जाऊंगा, जैसे बैंकों की इज्ज़त लूटकर ‘विजय माल्या’ उड़ गया.
बेताल कह रहा था, “मुझे बहुत मज़ा आता है, जब मैं अपने मन की बात करता हूं और आप ना चाहते हुए भी उसे सुनते हैं- बड़े दिनों में ख़ुशी का दिन आया. आपकी जेब में रखा ‘दिल धक धक’ गुटखे का पाउच मैंने निकाल लिया है. बुरा मत मानना, पिछले जन्म में बिहार पुलिस में हुआ करता था. ख़ैर, आपको कहानी सुनाता हूं, मगर चेतावनी देता हूं कि बीच में कुछ बोल कर मौन भंग किया, तो मैं शव लेकर ऐसे उड़ जाऊंगा, जैसे सतयुग के हाथ से अच्छे दिन के तोते उड़ गए.”
विक्रम मन ही मन गालियां दे रहा था और बेताल एक करेंट कहानी शुरू कर चुका था, “कलियुग को धकेल कर सतयुग आ चुका था. पूरे देश में चारण बधाई गीत गा रहे थे, ‘दुख भरे दिन बीते रे भैया सतयुग आयो रे… लेकिन अभी सतयुग बकैयां बकैयां चलना सीख ही रहा था कि दूध में’ कोरोना’ टपक पड़ा. एक्ट ऑफ गॉड का करिश्मा देखिए, रोगी नज़र आ रहे थे और रोग नदारद! जैसे-जैसे कोरोना मज़बूत हो रहा था, उसी रफ़्तार से अर्थव्यवस्था मज़बूत हो रही थी.
दुनिया दंग थी. सड़क पर भय को हराकर भूख उतर पड़ी थी. देश के महानगरों को जोड़नेवाली सभी सड़कों पर पैदल चलने का मैराथन शुरू हो गया था. प्रशासन चाहता था कि सर्वे भवन्तु सुखिन: और जनता सतयुग की भावना को सम्मान देते हुए बसों को छोड़कर पैदल चलने में आत्मनिर्भर होने में लगी थी. चारों ओर हरियाली ही हरियाली नज़र आ रही थी. कोरोना सिर्फ़ अख़बार, न्यूज़ चैनल, अस्पताल और कब्रिस्तान में नज़र आ रहा था…”
थोड़ा रुककर बेताल फिर शुरू हुआ, “राजन, देश में कोरोना के बावजूद आत्मनिर्भर होने में किसी तरह की कमी नहीं पाई गई. चोर, गिरहकट, दुकानदार, प्राइवेट डॉक्टर, पुलिस सबको छुट्टा छोड़ दिया गया था. अब कारोबार और बेकारी के बीच आत्मनिर्भरता भ्रमित होकर खड़ी थी कि जाएं तो जाएं कहां. और विपक्ष रामराज पर सवाल उठा रहा था, “हमारे अंगने में तुम्हारा क्या काम है…
राजन, मेरा सवाल है कि जब एनडीए के साथ-साथ देश के समस्त ऋषि-मुनि, मीडिया और देवताओं को सतयुग साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है, तो विपक्षी दलों को क्यों नहीं नज़र आता? जवाब जानते हुए भी तुम अगर मौन रहे, तो तुम्हारा सिर जनता दल की तरह टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा.”
आगे कुआं पीछे खाई! मजबूर विक्रम को मौन भंग करना पड़ा, “सियासत में एक पुरानी परंपरा है बेताल. विपक्ष को कभी सत्तापक्ष का ‘विकास’ नहीं नज़र आता. हमारे देश के विपक्ष ने ये रूटीन बना लिया है कि सत्ता से बेदख़ल होते ही वो आंखों पर गांधारी पट्टी बांध लेता है. सत्ता पक्ष की अच्छाई और विकास ना देखने की इस ‘धृतराष्ट्र परंपरा’ को बड़ी निष्ठा और लगन से निभाया जाता है. इस काजल की कोठरी में कोई बेदाग़ नहीं है. मेरा मतलब सास भी कभी बहू थी…
विक्रम के मौन भंग करते ही बेताल शव के साथ उड़ा और फिर उसी पेड़ की डाल से फौजदारी के पुराने मुक़दमे के फ़ैसले की तरह लटक गया.
विक्रम सिर पकड़कर बैठ गए ‘दिल धक धक’ गुटखे की पहली दुकान यहां से तीन किलोमीटर दूर थी…

Sultan Bharti
सुल्तान भारती

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Satire

“जैसे बाढ़, सूखा, भूकंप, कोरोना आदि सब एक्ट ऑफ गॉड की सूची में है. जैसे मेरे ऊपर आठ महीने से दूध की उधारी चढ़ी है और मैं लगातार गिरती जीडीपी के कारण तुम्हें पेमेंट नहीं दे नहीं पा रहा हूं, तो उसके लिए मैं नहीं, एक्ट ऑफ गॉड ज़िम्मेदार है.”

‘अब जा के आया मेरे बेचैन दिल को करार…’ बड़े दिनों बाद ‘एक्ट ऑफ गॉड’ समझ में आया है. अभी तक गॉड ही समझ में नहीं आया था, एक्ट कहां समझ में आता! ग़लती मेरी है, आपदा के कई अवसर पर गॉड ने मेरा दरवाज़ा खटखटाया था, ‘तेरे द्वार खड़ा भगवान भगत भर ले रे झोली…’ मैं ये सोचकर घर से बाहर नहीं निकला कि कहीं चौधरी उधारी वसूलने ना आया हो. एक्ट ऑफ गॉड को एक्ट ऑफ चौधरी समझने के फेर में आत्मनिर्भर होने से रह गया! ग़लती मेरी भी नहीं, आजकल लोग अपने गुनाहों का ‘अंडा’ गॉड के घोंसले में रखने लगे हैं.
अब थोड़ा-थोड़ा एक्ट ऑफ गॉड समझ में आया. पहले जब आबादी और पॉल्यूशन कम था, तो गॉड और एक्ट ऑफ गॉड दोनों पृथ्वी पर नज़र आते थे. अब एक्ट तो रतौंधी के बावजूद नज़र आता है, मगर गॉड कोरोना की तरह अन्तर्ध्यान बना हुआ है. वो ऊपर स्वर्ग में बैठे भू लोक के लोगों को पाताल लोक के कीड़ों की तरह रेंगते देखकर चिंतित होते रहते हैं. पास खड़े सुर, मुनि, किन्नर, निशाच, देव आदि चारण गीत गाते रहते हैं, ‘दुख भरे दिन बीते रे भैया, सतयुग आयो रे…’
सितंबर की दुपहरी में सावन नदारद था, पर एक्ट ऑफ गॉड देखकर जनता गांधारी बनी नाच रही थी! ईमानदार देवता गॉड को वस्तु स्थिति से आगाह कर रहे थे, “सर! पृथ्वी लोक पर हाहाकार मचा है, पेट में आग जल रही है और चूल्हे ठंडे होते जा रहे हैं!”
गॉड के बोलने से पहले ही एक मुंहलगा चारण बोल
पड़ा, “पेट की आग को चूल्हे में डालो. आग को पेट में नहीं, चूल्हे में जलना चाहिए. आग के लिए चूल्हा सही जगह है.”
गॉड ने प्रशंसनीय नज़रों से चारण को देखा.
कल मेरे कॉलोनी में भैंस का तबेला चलानेवाले चौधरी ने मुझसे पूछा, “उरे कू सुन भारती. एक्ट ऑफ गॉड के बारे में तमें कछु पतो सै?”
“बहुत लंबी लिस्ट है, जो भी दुनिया में हो रहा है, सब एक्ट ऑफ गॉड में शामिल है.”
“मन्नें के बेरा. साफ़-साफ़ बता.”
“जैसे बाढ़, सूखा, भूकंप, कोरोना आदि सब एक्ट ऑफ गॉड की सूची में है. जैसे मेरे ऊपर आठ महीने से दूध की उधारी चढ़ी है और मैं लगातार गिरती जीडीपी के कारण तुम्हें पेमेंट नहीं दे नहीं पा रहा हूं, तो उसके लिए मैं नहीं, एक्ट ऑफ गॉड ज़िम्मेदार है.”
“मैं गॉड के धोरे क्यूं जाऊं. मैं थारी बाइक बेच दूं. इब तो मोय एक्ट ऑफ गॉड के मामले में कछु काला लग रहो. दूध कौ मामलो में एक्ट ऑफ गॉड की बजाय मोय एक्ट ऑफ गुरु घंटाल दीखे सै…”
चौधरी भी कैसा पागल आदमी है. एक्ट ऑफ गॉड को एक्ट ऑफ गुरु घंटाल बता रहा है…

Sultan Bharti
सुल्तान भारती
Satire

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बाई चॉइस और बाई डिफाॅल्ट की एनालिसिस से ज़िंदगी बदलने लगती है और एहसास होता है कि वाकई जिसे हम बाई डिफाॅल्ट मान दूसरे पर शिफ्ट कर रहे हैं, वह हमारी अपनी ही चॉइस है, पर माहौल बदला हुआ देख हम उसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं.

कुछ चीज़ें हमें बाई डिफाॅल्ट मिलती हैं और कुछ को हम चुनते हैं. भ्रष्टाचार हमें बाई डिफाॅल्ट मिला है और ईमानदारी हम चुनते हैं. विश्‍वास न हो, तो ज़रा बचपन में पढ़ाए जानेवाले पाठ याद करिए. सदा सच बोलो.. अहिंसा परमो धर्म.. जैसी चीज़ें इसके विपरीत गुणों के लिए क्यों नहीं पढाई जाती. सीधी-सी बात है कि यह मानकर चला जाता है कि बुरे गुण बच्चे के भीतर बाई डिफाॅल्ट हैं और उसे अच्छा बनाने के लिए नैतिक शिक्षा ज़रूरी है. मज़ा देखिए कि बचपन में तमाम नैतिक बातों को रोज़ रटवाने के बाद भी बच्चा जब बड़ा होता है, तो उस नैतिकता का बस एक-दो प्रतिशत ही बचता है उसके भीतर. इससे बुरे गुणों का आदमी के भीतर बाई डिफाॅल्ट छुपे होना सिद्ध होता है.
बाई डिफाॅल्ट का आजकल बहुत बड़ा स्कोप है. आप कोई भी साइट खोलिए, पाप अप विंडो बाई डिफाॅल्ट है और यहां आप चाहकर भी बाई चॉइस नहीं अपना सकते. कुछ आईटी वाले कहेंगे, “भाईसाहब, आप पाप अप विंडो ब्लाॅक का विकल्प चुन सकते हैं, पर उनसे पूछिए आजकल मेन साइट के ऊपर चिपककर जो ऐड खुलते हैं उनका क्या करें. नेटवर्क बाई चॉइस है, पर प्रमोशनल काल बाई डिफाॅल्ट. डीएनडी का तोड़ आजकल सारी है, जिसमें डायरेक्ट काॅल कर कस्टमर को डील किया जाता है और अब्जेक्शन करने पर कहा जाता है, “सर, दिस केस इज डिफरेंट हम एनजीओ से काॅल कर रहे हैं.” या फिर “साॅरी सर, हमें पता नहीं था कि डीएनडी एक्टिवेट है.”
देखिए सर, बाॅस डिफाॅल्ट होता है और उसे ख़ुश रखना आपकी चॉइस है. वैसे ही घर में सास-बहू का रिश्ता सदियों से खटासवाला बाई डिफाॅल्ट है और सुख-शान्ति बनाए रखना बेटे की चॉइस.
वैसे आप देखेंगे, तो पाएंगे ज़िंदगी में जो चीज़ें आपको ज़्यादा परेशान करती हैं, वे बाई चॉइस अधिक है, बाई डिफाॅल्ट कम. यह अलग बात है कि हम अपनी चॉइस को प्राॅब्लम में आने पर बाई डिफाॅल्ट की कैटेगरी में शिफ्ट कर देते हैं. जैसे घर से ऑफिस जाने के लिए शार्टकट वाला रास्ता हम चुनते हैं और जाम लगने पर ट्रैफिकवाले को कोसते हैं, जबकि सबने शार्टकट चुना और ऐसे रास्ते पर जाम लगना बाई डिफाॅल्ट है. कहने का अर्थ यह कि हम अपनी सुविधा अनुसार बाई डिफाॅल्ट को नेचुरल चॉइस बना देते हैं और फिर अपनी ज़िम्मेदारी से दूर हट जाते हैं. वैसे ही कपड़े ख़रीदने और टेलर चुनने तक मामला आपके हाथ में है, लेकिन सिल जाने के बाद पहनने पर लुक क्या आएगा यह अपकी बाॅडी से बाई डिफाॅल्ट जनरेट होता है. यही वजह है कि हर कोई स्टार नहीं बन सकता. राइटर की ज़िंदगी का त्रस्त और अस्त-व्यस्त होना बाई डिफाॅल्ट है, जबकि राइटर बन कर जीते रहना चॉइस है. इस चॉइस का रोना यह है कि तमाम झंझटों के बाद भी लेखक ख़ुद को बाई चॉइस मानने को तैयार नहीं होते और ज़बर्दस्ती अपने आपको बाई डिफाॅल्ट की कैटेगरी में रखते हैं जैसे वे पैदायशी सिरफिरे हैं और हर चीज़ को अलग नज़रिए से देखने के लिए ही पैदा हुए हैं.
वैसे हम गहराई से देखेना शुरु करें, तो बाई चॉइस और बाई डिफाॅल्ट की एनालिसिस से ज़िंदगी बदलने लगती है और एहसास होता है कि वाकई जिसे हम बाई डिफाॅल्ट मान दूसरे पर शिफ्ट कर रहे हैं, वह हमारी अपनी ही चॉइस है, पर माहौल बदला हुआ देख हम उसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं. बाई डिफाॅल्ट ज़्यादातर मामलों में हम अज्ञानी और नासमझ हैं और बाई चॉइस पूरी ज़िन्दगी दूसरों को अज्ञानी और नासमझ सिद्ध करते रहते हैं.

Satire
Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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