Satire

ओरिजनल सावन लापता है. पहले बसंत लापता हुआ, अब सावन. क्या पता दस साल बाद हमें पता चले कि अमेरिका ने सावन को पेटेंट करा लिया है. अब आगे से सावन वहीं पाया जाएगा…

मैंने सावन के बारे में बहुत सुना है. कॉन्फिडेंस से कह सकता हूं कि सावन के बारे में कोरोना से ज़्यादा जिज्ञासा थी. पैदा होने से पच्चीस साल की उम्र तक गांव से जुड़ा रहा. उस दौरान सावन, लाला के तगादा की तरह, बार-बार सामने आता रहा. सावन आते ही गांव में झूले पड़ जाते थे. लड़के झुलाते थे और लड़कियां झूलती थीं. लोग इंतज़ार करते थे, ‘सावन तुम कब आओगे… आकाश में बदली, रिमझिम फुहार और नीचे ‘कजरी’ गाती झूले पर युवा महिलाएं. इस झूले के दौरान इश्क़ की कई क्लासिक कहानियां जन्म लेती थी.
वो गाना याद आ रहा है, ‘बचपन के दिन भुला ना देना… ‘ अरे कैसे भूल सकता हूं भइया. वही ख़ूबसूरत और रंगीन यादें, तो कुपोषित हसरतों को आज भी ऑक्सीजन देती हैं. प्यार-मुहब्बत भी याद है और दोस्तों के साथ लड़ाइयां भी. एक बार तो मोहब्बत इतनी घातक हो गई कि मै अपने अजीज़ दोस्त कमाल अहमद से मारपीट कर बैठा था (दरअसल मामला ‘एक म्यान में दो तलवार ‘ वाला था!). ख़ैर, सावन में बादलों के नज़दीक ‘बिजली’ के आने से इतनी गरज-चमक तो स्वाभाविक है.
गांव क्या छूटा, सावन छूट गया. अड़तीस साल से दिल्ली में हूं. कभी सावन को आते-जाते नहीं देखा. जब-जब सावन ढूंढ़ने की कोशिश की, तो कभी बादलों से आसाराम झांकते नज़र आए, तो कभी बाबा राम रहीम. ओरिजनल सावन लापता है. पहले बसंत लापता हुआ, अब सावन. क्या पता दस साल बाद हमें पता चले कि अमेरिका ने सावन को पेटेंट करा लिया है. अब आगे से सावन वहीं पाया जाएगा. हमें पता है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. अभी हमें ‘विश्‍व गुरु’ का सिंहासन पाना है. खोने की लिस्ट लंबी है, इसलिए सावन को जाने दो.
पिछले सावन में मैं गांव गया था. बड़ा जोश में था कि सावन से मुलाक़ात होगी. पंद्रह दिन फेरीवालों की तरह हांडता रहा, मगर सावन नज़र नहीं आया. अब नीम के पेड़ पर झूले भी नहीं पड़ते. झूला झुलाने वाले युवा ज़्यादातर शहर चले गए और जो बचे वो झूले पर पींग मारने की जगह ‘गांजे’ की पींग मारकर आसमान में उड़ते हैं. अब इधर सावन की जगह ‘मनरेगा’ आने लगा है. मनरेगा ने सावन को निगल लिया है. तमाम पनघट में नालों का कब्ज़ा है. बसन्त और सावन का पंचांग अब ग्राम प्रधान और बीडीओ साहब बनाते हैं.
बंसत का और बुरा हाल है. अब इसकी भी मोनोपोली ख़त्म कर दी गई है. फरवरी के जिस महीने में पहले बसंत आता था, अब वैलेंटाइन आता है. युवाओं को अब वैलेंटाइन के मुक़ाबले बसंत में चीनी कम नज़र आ रही है. रोना ये है कि वैलेंटाइन का इंफेक्शन कोरोना की रफ़्तार से गांव तक पहुंच गया है. ऐसे में बसंत हो या सावन, उनकी विलुप्त होने की आशंका ‘बाघ’ जैसी होती जा रही है. जहां बंसत है, वहां वैलेंटाइन ने ठीया लगा लिया और सावन बेचारा मनरेगा से दुखी है. जाएं तो जाएं कहां!..
मैं सावन को लेकर संशय में हूं, और बसंत को लेकर दुखी. युवाओं की चिंता वैलेंटाइन को लेकर है. क्या पता गांव से शहर तक ‘सावन’ को निगल चुका कोरोना फरवरी में वैलेंटाइन के साथ क्या करे. सतयुग में सब कुछ संभव है. कल के सूरज और आज की गहराती शाम के बीच ख़्वाबों के पनपने के लिए एक बंजर रात का फ़ासला सामने है.

Sultan Bharti
सुल्तान भारती

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Satire

आगे कुआं पीछे खाई! मजबूर विक्रम को मौन भंग करना पड़ा, “सियासत में एक पुरानी परंपरा है बेताल. विपक्ष को कभी सत्तापक्ष का ‘विकास’ नहीं नज़र आता. हमारे देश के विपक्ष ने ये रूटीन बना लिया है कि सत्ता से बेदख़ल होते ही वो आंखों पर गांधारी पट्टी बांध लेता है. सत्ता पक्ष की अच्छाई और विकास ना देखने की इस ‘धृतराष्ट्र परंपरा’ को बड़ी निष्ठा और लगन से निभाया जाता है. इस काजल की कोठरी में कोई बेदाग़ नहीं है. मेरा मतलब सास भी कभी बहू थी…

अगस्त 2020. रात के डेढ़ बजते ही महाराजा विक्रम महल से बाहर आए. बाहर घनघोर ख़ामोशी थी, गलियों में कुत्ते तक क्वारंटाइन होकर कोरोना नियमों का पालन कर रहे थे. थोड़ी देर पहले ही बारिश हुई थी और अब बादल सोशल डिस्टेंसिंग के बगैर आसमान में चहलकदमी कर रहे थे. महाराजा विक्रम काफ़ी रफ़्तार के साथ नगर से जंगल को जानेवाले रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे. महारानी के जागने से पहले ही उन्हें वापस महल लौटकर आना था.
थोड़ी देर बाद वो घने जंगल के रास्ते श्मशान की ओर बढ़ रहे थे. विक्रम ने अपने ‘ओप्पो’ चाइनीज़ फोन में टाइम देखा, रात के १.४५ हो चुके थे. आसमान में चांद बादलों के पीछे दुर्भाग्य की तरह मुस्कुरा रहा था. ओस की बूंदें नेताओं के आश्वासन की तरह टपक रही थीं. अंधेरे में जंगली जानवर इस तरह इधर-उधर दौड़ रहे थे, जैसे कॉलेज से स्नातक की डिग्री हासिल कर युवक पकौड़े का “ठीया” तलाश रहे हों. दूर किसी बस्ती में कोई कुत्ता बड़ा इरिटेट होकर भौंक रहा था, जैसे देहात का कोई कुत्ता शहर के कुत्ते से अपने रिश्तेदार का पता पूछ रहा हो.
महाराजा विक्रम तेज़ी से आगे बढ़े. अभी वो श्मशान के सामने पहुंचे ही थे कि ठिठककर रुक गए. बड़ा खौफ़नाक मंज़र था. श्मशान के मेन गेट के सामने चटाई बिछाकर एक शेर बैठा था. दोनों एक-दूसरे को बड़ी देर तक ताकते रहे. आख़िरकार शेर ने मुंह खोला, “काहे नर्भसाए खड़े हो? डरिए मत, ऊ का है कि अब हम भेजिटरियन हो गया हूं- टोटल शाकाहारी. हमने तो अपने गुफ़ा के सामने नोटिस बोर्ड लगा दिया हूं कि ‘कृपया गाय, बैल, भैंस, बकरा-बकरी सब इहां से दूर जाकर चारा खाएं. चारा… मतलब घास.”
महाराजा विक्रम की जान में जान आई, क्योंकि शेर ख़ुद को शाकाहारी बता रहा था. विक्रम ने भोजपुरी बोल रहे शेर से पूछा, “एक्सक्यूज़ मी सर, आप गौवंश का शिकार नहीं करते, वो बात समझ में आती है. भैंस का शिकार नहीं करते, क्योंकि कई बार संख्या बल आप पर भारी पड़ता है. पर… बकरे के शिकार में क्या ख़तरा है. बकरे को काहे अवॉयड किया सर?” शेर ने माथा पीट लिया, “कोरोना में एकदम बुडबक हो गए हो का! सोशल मीडिया नहीं देखते? आप का चाहते हो कि हम बकरा का शिकार करूं और हमारा विरोधी लोग मीडिया से मिलकर ऊ बकरे को गाय साबित कर दें! हमरी तो हो गई “माब लिंचिंग” यही अनुष्ठान करवाना चाहते हो का. हम कोई अजूबा वाली बात नहीं कह रहा हूं. ऐसा चमत्कार कई बार हो चुका है. त्रिफला का चूर्ण है तुम्हारे पास?”
“वो क्या करेंगे सर?”
“का बताएं, परसो डिनरवा में बगैर सत्तू मिलाए चारा खा लिया था, तब से पेट अपसेट है. ख़ैर अब आप जाइए, हम योगा करूंगा. आप जाकर कहानी सुनिए. पूरा देश बेताल से कहानी ही सुन रहा है. रोज़ नई-नई कहानी. इतने दिन से रोज़ कहानी सुन रहे हो, पर लगता है कि अभी तक आत्मनिर्भर नहीं हुए. बहुत ढीले हो! कुछ लेते क्यों नहीं.”
शर्मिन्दा होकर विक्रम श्मशान की ओर बढ़ गए, जहां चिताएं विपक्ष के अरमानों की तरह जल रही थीं. एक बड़े वृक्ष की ऊंची डाल पर बेताल का शव, सुशांत सिंह राजपूत के संदिग्ध हत्यारे के गिरफ़्तारी के उम्मीद की तरह, लटका हुआ था. विक्रम ने पेड़ के नीचे से बेताल को आवाज़ दी, “तू जीडीपी की तरह नीचे आएगा या बेरोज़गारी की तरह मैं ऊपर आऊं?”
बेताल रोज़गार की तरह ख़ामोश था.
अब विक्रम पेड़ पर डॉलर की तरह चढ़ा और बेताल के शव को कंधे पर लादकर चीन के चरित्र की तरह नीचे आया. अभी बिक्रम ने मुश्किल से दो-चार कदम बढ़ाए थे कि शव में स्थित बेताल बोल पड़ा, “राजन, तेरा धैर्य मायावतीजी की तरह प्रशंसनीय है. जिस निष्ठा, धैर्य और उम्मीद से तू मुझे ढो रहा है, उस तरह तो सतयुग में श्रवण कुमार ने अपने मां-बाप को भी नहीं ढोया होगा. ख़ैर, मै तेरी थकावट उतारने के लिए तुझे एक कहानी सुनाता हूं, मगर सावधान राजन, अगर तुमने कुछ बोलकर मौन भंग किया, तो शव लेकर मैं वैसे ही उड़ जाऊंगा, जैसे बैंकों की इज्ज़त लूटकर ‘विजय माल्या’ उड़ गया.
बेताल कह रहा था, “मुझे बहुत मज़ा आता है, जब मैं अपने मन की बात करता हूं और आप ना चाहते हुए भी उसे सुनते हैं- बड़े दिनों में ख़ुशी का दिन आया. आपकी जेब में रखा ‘दिल धक धक’ गुटखे का पाउच मैंने निकाल लिया है. बुरा मत मानना, पिछले जन्म में बिहार पुलिस में हुआ करता था. ख़ैर, आपको कहानी सुनाता हूं, मगर चेतावनी देता हूं कि बीच में कुछ बोल कर मौन भंग किया, तो मैं शव लेकर ऐसे उड़ जाऊंगा, जैसे सतयुग के हाथ से अच्छे दिन के तोते उड़ गए.”
विक्रम मन ही मन गालियां दे रहा था और बेताल एक करेंट कहानी शुरू कर चुका था, “कलियुग को धकेल कर सतयुग आ चुका था. पूरे देश में चारण बधाई गीत गा रहे थे, ‘दुख भरे दिन बीते रे भैया सतयुग आयो रे… लेकिन अभी सतयुग बकैयां बकैयां चलना सीख ही रहा था कि दूध में’ कोरोना’ टपक पड़ा. एक्ट ऑफ गॉड का करिश्मा देखिए, रोगी नज़र आ रहे थे और रोग नदारद! जैसे-जैसे कोरोना मज़बूत हो रहा था, उसी रफ़्तार से अर्थव्यवस्था मज़बूत हो रही थी.
दुनिया दंग थी. सड़क पर भय को हराकर भूख उतर पड़ी थी. देश के महानगरों को जोड़नेवाली सभी सड़कों पर पैदल चलने का मैराथन शुरू हो गया था. प्रशासन चाहता था कि सर्वे भवन्तु सुखिन: और जनता सतयुग की भावना को सम्मान देते हुए बसों को छोड़कर पैदल चलने में आत्मनिर्भर होने में लगी थी. चारों ओर हरियाली ही हरियाली नज़र आ रही थी. कोरोना सिर्फ़ अख़बार, न्यूज़ चैनल, अस्पताल और कब्रिस्तान में नज़र आ रहा था…”
थोड़ा रुककर बेताल फिर शुरू हुआ, “राजन, देश में कोरोना के बावजूद आत्मनिर्भर होने में किसी तरह की कमी नहीं पाई गई. चोर, गिरहकट, दुकानदार, प्राइवेट डॉक्टर, पुलिस सबको छुट्टा छोड़ दिया गया था. अब कारोबार और बेकारी के बीच आत्मनिर्भरता भ्रमित होकर खड़ी थी कि जाएं तो जाएं कहां. और विपक्ष रामराज पर सवाल उठा रहा था, “हमारे अंगने में तुम्हारा क्या काम है…
राजन, मेरा सवाल है कि जब एनडीए के साथ-साथ देश के समस्त ऋषि-मुनि, मीडिया और देवताओं को सतयुग साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है, तो विपक्षी दलों को क्यों नहीं नज़र आता? जवाब जानते हुए भी तुम अगर मौन रहे, तो तुम्हारा सिर जनता दल की तरह टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा.”
आगे कुआं पीछे खाई! मजबूर विक्रम को मौन भंग करना पड़ा, “सियासत में एक पुरानी परंपरा है बेताल. विपक्ष को कभी सत्तापक्ष का ‘विकास’ नहीं नज़र आता. हमारे देश के विपक्ष ने ये रूटीन बना लिया है कि सत्ता से बेदख़ल होते ही वो आंखों पर गांधारी पट्टी बांध लेता है. सत्ता पक्ष की अच्छाई और विकास ना देखने की इस ‘धृतराष्ट्र परंपरा’ को बड़ी निष्ठा और लगन से निभाया जाता है. इस काजल की कोठरी में कोई बेदाग़ नहीं है. मेरा मतलब सास भी कभी बहू थी…
विक्रम के मौन भंग करते ही बेताल शव के साथ उड़ा और फिर उसी पेड़ की डाल से फौजदारी के पुराने मुक़दमे के फ़ैसले की तरह लटक गया.
विक्रम सिर पकड़कर बैठ गए ‘दिल धक धक’ गुटखे की पहली दुकान यहां से तीन किलोमीटर दूर थी…

Sultan Bharti
सुल्तान भारती

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Satire

“जैसे बाढ़, सूखा, भूकंप, कोरोना आदि सब एक्ट ऑफ गॉड की सूची में है. जैसे मेरे ऊपर आठ महीने से दूध की उधारी चढ़ी है और मैं लगातार गिरती जीडीपी के कारण तुम्हें पेमेंट नहीं दे नहीं पा रहा हूं, तो उसके लिए मैं नहीं, एक्ट ऑफ गॉड ज़िम्मेदार है.”

‘अब जा के आया मेरे बेचैन दिल को करार…’ बड़े दिनों बाद ‘एक्ट ऑफ गॉड’ समझ में आया है. अभी तक गॉड ही समझ में नहीं आया था, एक्ट कहां समझ में आता! ग़लती मेरी है, आपदा के कई अवसर पर गॉड ने मेरा दरवाज़ा खटखटाया था, ‘तेरे द्वार खड़ा भगवान भगत भर ले रे झोली…’ मैं ये सोचकर घर से बाहर नहीं निकला कि कहीं चौधरी उधारी वसूलने ना आया हो. एक्ट ऑफ गॉड को एक्ट ऑफ चौधरी समझने के फेर में आत्मनिर्भर होने से रह गया! ग़लती मेरी भी नहीं, आजकल लोग अपने गुनाहों का ‘अंडा’ गॉड के घोंसले में रखने लगे हैं.
अब थोड़ा-थोड़ा एक्ट ऑफ गॉड समझ में आया. पहले जब आबादी और पॉल्यूशन कम था, तो गॉड और एक्ट ऑफ गॉड दोनों पृथ्वी पर नज़र आते थे. अब एक्ट तो रतौंधी के बावजूद नज़र आता है, मगर गॉड कोरोना की तरह अन्तर्ध्यान बना हुआ है. वो ऊपर स्वर्ग में बैठे भू लोक के लोगों को पाताल लोक के कीड़ों की तरह रेंगते देखकर चिंतित होते रहते हैं. पास खड़े सुर, मुनि, किन्नर, निशाच, देव आदि चारण गीत गाते रहते हैं, ‘दुख भरे दिन बीते रे भैया, सतयुग आयो रे…’
सितंबर की दुपहरी में सावन नदारद था, पर एक्ट ऑफ गॉड देखकर जनता गांधारी बनी नाच रही थी! ईमानदार देवता गॉड को वस्तु स्थिति से आगाह कर रहे थे, “सर! पृथ्वी लोक पर हाहाकार मचा है, पेट में आग जल रही है और चूल्हे ठंडे होते जा रहे हैं!”
गॉड के बोलने से पहले ही एक मुंहलगा चारण बोल
पड़ा, “पेट की आग को चूल्हे में डालो. आग को पेट में नहीं, चूल्हे में जलना चाहिए. आग के लिए चूल्हा सही जगह है.”
गॉड ने प्रशंसनीय नज़रों से चारण को देखा.
कल मेरे कॉलोनी में भैंस का तबेला चलानेवाले चौधरी ने मुझसे पूछा, “उरे कू सुन भारती. एक्ट ऑफ गॉड के बारे में तमें कछु पतो सै?”
“बहुत लंबी लिस्ट है, जो भी दुनिया में हो रहा है, सब एक्ट ऑफ गॉड में शामिल है.”
“मन्नें के बेरा. साफ़-साफ़ बता.”
“जैसे बाढ़, सूखा, भूकंप, कोरोना आदि सब एक्ट ऑफ गॉड की सूची में है. जैसे मेरे ऊपर आठ महीने से दूध की उधारी चढ़ी है और मैं लगातार गिरती जीडीपी के कारण तुम्हें पेमेंट नहीं दे नहीं पा रहा हूं, तो उसके लिए मैं नहीं, एक्ट ऑफ गॉड ज़िम्मेदार है.”
“मैं गॉड के धोरे क्यूं जाऊं. मैं थारी बाइक बेच दूं. इब तो मोय एक्ट ऑफ गॉड के मामले में कछु काला लग रहो. दूध कौ मामलो में एक्ट ऑफ गॉड की बजाय मोय एक्ट ऑफ गुरु घंटाल दीखे सै…”
चौधरी भी कैसा पागल आदमी है. एक्ट ऑफ गॉड को एक्ट ऑफ गुरु घंटाल बता रहा है…

Sultan Bharti
सुल्तान भारती
Satire

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बाई चॉइस और बाई डिफाॅल्ट की एनालिसिस से ज़िंदगी बदलने लगती है और एहसास होता है कि वाकई जिसे हम बाई डिफाॅल्ट मान दूसरे पर शिफ्ट कर रहे हैं, वह हमारी अपनी ही चॉइस है, पर माहौल बदला हुआ देख हम उसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं.

कुछ चीज़ें हमें बाई डिफाॅल्ट मिलती हैं और कुछ को हम चुनते हैं. भ्रष्टाचार हमें बाई डिफाॅल्ट मिला है और ईमानदारी हम चुनते हैं. विश्‍वास न हो, तो ज़रा बचपन में पढ़ाए जानेवाले पाठ याद करिए. सदा सच बोलो.. अहिंसा परमो धर्म.. जैसी चीज़ें इसके विपरीत गुणों के लिए क्यों नहीं पढाई जाती. सीधी-सी बात है कि यह मानकर चला जाता है कि बुरे गुण बच्चे के भीतर बाई डिफाॅल्ट हैं और उसे अच्छा बनाने के लिए नैतिक शिक्षा ज़रूरी है. मज़ा देखिए कि बचपन में तमाम नैतिक बातों को रोज़ रटवाने के बाद भी बच्चा जब बड़ा होता है, तो उस नैतिकता का बस एक-दो प्रतिशत ही बचता है उसके भीतर. इससे बुरे गुणों का आदमी के भीतर बाई डिफाॅल्ट छुपे होना सिद्ध होता है.
बाई डिफाॅल्ट का आजकल बहुत बड़ा स्कोप है. आप कोई भी साइट खोलिए, पाप अप विंडो बाई डिफाॅल्ट है और यहां आप चाहकर भी बाई चॉइस नहीं अपना सकते. कुछ आईटी वाले कहेंगे, “भाईसाहब, आप पाप अप विंडो ब्लाॅक का विकल्प चुन सकते हैं, पर उनसे पूछिए आजकल मेन साइट के ऊपर चिपककर जो ऐड खुलते हैं उनका क्या करें. नेटवर्क बाई चॉइस है, पर प्रमोशनल काल बाई डिफाॅल्ट. डीएनडी का तोड़ आजकल सारी है, जिसमें डायरेक्ट काॅल कर कस्टमर को डील किया जाता है और अब्जेक्शन करने पर कहा जाता है, “सर, दिस केस इज डिफरेंट हम एनजीओ से काॅल कर रहे हैं.” या फिर “साॅरी सर, हमें पता नहीं था कि डीएनडी एक्टिवेट है.”
देखिए सर, बाॅस डिफाॅल्ट होता है और उसे ख़ुश रखना आपकी चॉइस है. वैसे ही घर में सास-बहू का रिश्ता सदियों से खटासवाला बाई डिफाॅल्ट है और सुख-शान्ति बनाए रखना बेटे की चॉइस.
वैसे आप देखेंगे, तो पाएंगे ज़िंदगी में जो चीज़ें आपको ज़्यादा परेशान करती हैं, वे बाई चॉइस अधिक है, बाई डिफाॅल्ट कम. यह अलग बात है कि हम अपनी चॉइस को प्राॅब्लम में आने पर बाई डिफाॅल्ट की कैटेगरी में शिफ्ट कर देते हैं. जैसे घर से ऑफिस जाने के लिए शार्टकट वाला रास्ता हम चुनते हैं और जाम लगने पर ट्रैफिकवाले को कोसते हैं, जबकि सबने शार्टकट चुना और ऐसे रास्ते पर जाम लगना बाई डिफाॅल्ट है. कहने का अर्थ यह कि हम अपनी सुविधा अनुसार बाई डिफाॅल्ट को नेचुरल चॉइस बना देते हैं और फिर अपनी ज़िम्मेदारी से दूर हट जाते हैं. वैसे ही कपड़े ख़रीदने और टेलर चुनने तक मामला आपके हाथ में है, लेकिन सिल जाने के बाद पहनने पर लुक क्या आएगा यह अपकी बाॅडी से बाई डिफाॅल्ट जनरेट होता है. यही वजह है कि हर कोई स्टार नहीं बन सकता. राइटर की ज़िंदगी का त्रस्त और अस्त-व्यस्त होना बाई डिफाॅल्ट है, जबकि राइटर बन कर जीते रहना चॉइस है. इस चॉइस का रोना यह है कि तमाम झंझटों के बाद भी लेखक ख़ुद को बाई चॉइस मानने को तैयार नहीं होते और ज़बर्दस्ती अपने आपको बाई डिफाॅल्ट की कैटेगरी में रखते हैं जैसे वे पैदायशी सिरफिरे हैं और हर चीज़ को अलग नज़रिए से देखने के लिए ही पैदा हुए हैं.
वैसे हम गहराई से देखेना शुरु करें, तो बाई चॉइस और बाई डिफाॅल्ट की एनालिसिस से ज़िंदगी बदलने लगती है और एहसास होता है कि वाकई जिसे हम बाई डिफाॅल्ट मान दूसरे पर शिफ्ट कर रहे हैं, वह हमारी अपनी ही चॉइस है, पर माहौल बदला हुआ देख हम उसे स्वीकारने को तैयार नहीं हैं. बाई डिफाॅल्ट ज़्यादातर मामलों में हम अज्ञानी और नासमझ हैं और बाई चॉइस पूरी ज़िन्दगी दूसरों को अज्ञानी और नासमझ सिद्ध करते रहते हैं.

Satire
Murali Manohar Srivastava
मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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इतिहास गवाह है कि किसी भी जेनुईन शायर ने अपनी प्रजाति बदलने की कोशिश नहीं की. न ही उसने अपनी शायरी के अलावा किसी और बात का क्रेडिट लिया. वैसे भी जिस पर शायर का ठप्पा लग गया, वह बस शायर ही रहा और कुछ नहीं बन पाया. उसकी शक्ल ही अलग-सी हो जाती है शायराना टाइप, जिसे देखकर दूर से ही अंदाज़ा लग जाता है कि फलाना शायर चला आ रहा है.

आपसे क्या बताएं, कोई मुझसे पूछे, तो मैं शायरों की बातें न ही करूं पर क्या करें इनके बिना गुज़ारा भी तो नहीं है.
गीत-गाने, सुर-ताल, रस-छंद, दोहे, सोरठा ग्रंथ, महाकाव्य सब इनकी बदौलत ही तो हैं. शायर का कलाम बढ़िया हो, तो एक से एक अदना सिंगर स्टार बन जाए, एक मामूली हीरो भी हिट हो जाए, एक साधारण-सा प्रोड्यूसर भी नाम कमा लें और डायरेक्टर के तो कहने ही क्या! काम किसी और का नाम उसका.
वैसे ही अगर किसी फिल्म में स्टोरी, गीत और डायलाॅग अच्छे न हों, तो बड़े से बड़ा हीरो फ्लाप होते देर नहीं लगती, नामी प्रोड्यूसर और डायरेक्टर भी ऐसी फिल्म की नैया डूबने से नहीं बचा सकते.
ख़ैर यह स्टोरी और डायलाॅग वाला मामला दूसरा है, गीत-ग़ज़ल और शायरीवाला दूसरा. एक अच्छा शायर एक अच्छा गीतकार, बस शायर और गीतकार ही होता है. यह अलग बात है कि बहुत से स्टोरी राइटर, प्रोड्यूसर, डायरेक्टर या फिर एक्टर ख़ुद को मल्टी टैलेंटेड घोषित कर देते हैं. वे फिल्म में गीत-गज़ल लिखने से लेकर उसे डायरेक्ट करने तक का क्रेडिट ख़ुद लूट लेते हैं. मगर इतिहास गवाह है कि किसी भी जेनुईन शायर ने अपनी प्रजाति बदलने की कोशिश नहीं की. न ही उसने अपनी शायरी के अलावा किसी और बात का क्रेडिट लिया. वैसे भी जिस पर शायर का ठप्पा लग गया, वह बस शायर ही रहा और कुछ नहीं बन पाया. उसकी शक्ल ही अलग-सी हो जाती है शायराना टाइप, जिसे देखकर दूर से ही अंदाज़ा लग जाता है कि फलाना शायर चला आ रहा है. बड़ी ही अजीब टाइप की शख्सियत होती है इनकी. इन्हें समझ पाना और उससे बड़ी बात यह कि इनके साथ निभा पाना बड़ा मुश्किल काम होता है.
कुछ पता नहीं इनका कि कब किस बात पर ख़ुश हो जाएं और कब किस बात पर किसी से नाराज़. ये बड़े मूडी क़िस्म के प्राणी होते हैं. मूड है तो ये कुछ भी कर डालेंगे और मूड नहीं है, तो एक लाइन नहीं लिखवा सकते आप इनसे.
अपनी रौ में आ जाएं, तो कहो एक ही दिन में कई फिल्मों का कोटा पूरा कर दें और मूड न बने तो बड़े से बड़े प्रोड्यूसर का एडवांस वापस कर दें. कभी लाखों का ऑफर ठुकरा दें, तो कहीं मुफ़्त में खड़े होकर सुनाने लगें.
कई बार स्टडी हुई कि आख़िर ये ऐसे होते क्यों हैं या कोई शख़्स शायर क्यों और कैसे बनता है, पर कोई सही और ठोस उत्तर इस मामले में मिल नहीं सका. एक आम धारणा घर कर गई कि जो लोग इश्क़ में असफल होते हैं, वे शायर बन जाते हैं, पर यह बात भी सही नहीं मालूम होती. ऐसा होता तो हर फ्लाॅप मजनू शायर होता, लेकिन न जाने कितने प्यार-व्यार में असफल लोग क्रिमिनल बन जाते हैं. कई तो समाज की दूसरी फील्ड चुनकर उसमें हाथ आज़माने लगते हैं, कुछ साधू-सन्यासी बन जाते हैं. कुछ प्रभु प्रेम में लीन हो जाते हैं. कहने का अर्थ यह कि शायर बन जाने का कोई हिट या डिफाइन फार्मूला नहीं है.
जो शायर हैं, उनकी एक ख़ासियत तो होती है, वे भीड़ को इम्प्रेस कर लेते हैं. जहां बड़े-बड़े लोग किसी से अपनी बात कहने में सोचते हुए पूरी उम्र निकाल देते हैं. वहीं ये दो मिनट में अनजान लोगों से भी ऐसे घुलमिल कर बातें करने लगते हैं, जैसे न जाने कितने जन्मों की जान-पहचान हो इनकी. ये लोग लेडीज़ के प्रति एक्स्ट्रा साॅफ्ट कार्नर रखते हैं, जिसका नतीज़ा यह कि कहीं भी इन्हें बड़ी जल्दी शायर होंने के नाते लेडीज़ की सिम्पैथी मिलते देर नहीं लगती.
पता नहीं क्यों मुझे तो लगता है इनमें चाहे जितने ऐब हों, चाहे ये स्मार्ट फिट और जिमनास्टिक बाॅडी न रखते हों, सेंटर ऑफ अट्रेक्शन बन ही जाते हैं. सभा समारोह हो, मुहल्ले का जलसा हो या किसी रिश्ते-नाते में पार्टी… ये सबसे व्यस्त नज़र आते हैं और ढेरों लोगों से घिरे हुए. कभी किसी को कुछ सुनाते हुए, तो कभी किसी पर कुछ सुनाते हुए. हाय इनकी नफासत और नजाकत का क्या कहना. जिसे देखकर अपना बना लें वह बस लुट जाए इनके अंदाज़ पर.
प्लीज़ मुझे रुकना पड़ेगा, वर्ना हारोस्कोप देखकर लोगों का भूत, भविष्य और उनके गुण-नेचर बताने वाले ज्योतिषाचार्य मुझसे नाराज़ हो जाएंगे. इस मामले में मेरे पास एकाधा फोन आ जाए. इन गुणी लोंगों का तो कोई बड़ी बात नहीं है. हो सकता है कोई नामी भविष्यवक्ता महोदय यह कह दें कि तुम मेरी फील्ड में इंटरफीयर क्यों कर रहे हो. इतना ही शौक है किसी के बारे में कुछ बताने का तो यह लिखना-पढ़ना छोड़कर ज्योतिष का अध्ययन करो और टीवी पर आ कर हमें चैलेंज करो, तब देखते हैं कितनी देर टिक पाते हो.
ख़ैर मुझे क्या पड़ी है कि मैं बैठे-बिठाये दुनियाभर के लोगों से पंगा लेता फिरू. इस मामले में मुझे संज्ञान इसलिए लेना पड़ा कि आज सुबह मुझसे मुहल्ले के सम्मानित शायर ‘बेचैन सुराहीवाले’ टकरा गए.
वैसे तो वे हमेशा अपने जिगर का दर्द सीने में दबाए हंसते-मुस्कुराते मिलते थे, पर आज न जाने क्यों मुझे लगा कि उनका दर्द चेहरे से लेकर शरीर तक छलका पड़ रहा है. यह जो फिजिकल दर्द होता है, वह बड़ा पीड़ादायक होता है. दिल-विल में दर्द हो, वह पलता रहे, आदमी शायरी-वायरी करता रहे. उससे फ़र्क नहीं पड़ता. हां, कभी-कभी ऐसे दिल का दर्द शौक से पालनेवालों को जब डाॅक्टर असली दिल के दर्द यानी हार्ट अटैक के ख़तरे के बारे में आगाह करता है, तो उसका नकली दर्द छूमंतर होते देर नहीं लगती. तब वह भूल जाता है कि अपने पाले हुए दिल के दर्द से शायर बना है. उस वक़्त उसे अपना दर्द सच में पीड़ा देने लगता है. वह जल्द से जल्द उससे छुटकारा पाने को बेचैन हो जाता है. वह पूछता है डाॅक्टर साहब यह जो दिल मेरे पास है और वह जो दिल आप बता रहे हैं, जिस पर हार्ट अटैक का ख़तरा मंडरा रहा है, वह एक ही है या अलग-अलग.
और जैसे ही डाॅक्टर कहता है कि सीने में दिल तो एक ही होता है और अटैक भी उसी पर आता है, यह शायर घबरा जाता है.
वह सोचता है यह जो दर्द मैंने पाला हुआ है हो न हो अटैक का कारण वही दर्द है, वह पूछता है, “डाॅक्टर साहब, अगर मैं अपने दिल के दर्द को मिटा लूं, तो क्या बाईपास सर्जरी नहीं करानी पड़ेगी?”

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और उस की ऐसी भोली बातें सुनकर डाॅक्टर सिर पकड़ लेता है, “कहता है, जनाब आप किस दिल और कौन से दर्द की बात कर रहे हैं. यह मेरी समझ से बाहर है. मुझे इतना पता है कि यह जो आपके सींने में दिल है इसे हार्ट अटैक आया है और यह बिना ऑपरेशन के ठीक नहीं होगा. अगर मुझे आपकी जान बचानी है, तो मुझे इसका ऑपरेशन करना ही पड़ेगा.
शायर सोचता है यह दिल तो न जाने कब से घायल है. चलो मरहम-पट्टी और दवा-दारू से कुछ रिपेयर हो जाएगा, कर लेने दो डाॅक्टर को भी अपनी मनमानी कौन-सा ऑपरेशन करने से मेरे दिल की किताब से मेरी ग़ज़लें चुरा लेगा.
ख़ैर, मुझे बेचैन सुराहीवाला के दिल का दर्द आज डाॅक्टरवाले दिल के दर्द सा फील हुआ. वे भी मुझे देखकर बात करने को तड़प उठे.
मैंने दुआ-सलाम की, तो थोड़ा नाॅर्मल हुए. मुझसे रहा न गया, मैंने पूछ ही लिया, “सब खैरियत तो है. आज न जानें क्यों आप अपने नाम की तरह बेचैन लग रहे हैं.
वे तड़पते हुए बोले, “अरे, क्या ख़ाक खैरियत है तुम्हें. क्या पता कि पिछले चार महींने कितनी टेंशन में बीते हैं.”
मैं चौंका, “आख़िर ऐसी क्या बात हो गई, जो आप इतना परेशान हैं सेहत तो ठीक है ?”
वे बोले अब क्या बताऊं सेहत +-वेहत की कोई बात नहीं है बात ऐसी है कि कहते-सुनते भी डर लगता है.
मैं सोच में पड़ गया कि आखिर शायर साहब के साथ लफडा क्या है?
वे और इंतजार न करते हुए बोले, “तुम ने मी टू सुना…“
मैं हंसा, “आप भी कमाल करते हैं. आज बच्चा-बच्चा मी टू के बारे में जानता है. इसमें न सुनने की कौन-सी बात है. बड़े-बड़े नाम इस लपेटे में आ रहे हैं. कहीं आपका नाम भी तो नहीं. वैसे आ जाए, तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा. हां, एक बात है, आप पॉपुलर हो जाएंगे इसके बाद.
वे गु़स्साते हुए बोले, “लाहौल वला कूवत, मेरा तुमसे इसीलिए बात करने का मन नहीं होता. तुम्हें सीरियस मैटर में भी व्यंग्य दिखाई देता है.”
मैंने कान पकड़ा, “नहीं, नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. आप अपनी बात बताइए.” मैंने थोड़ी सिंपैथी दिखाई.
वे बोले पता नहीं क्यों मुझे जब से यह मी टू चला है बड़ा डर लग रहा है.
मैं बोला, “बेचैन साहब, जब आपने कोई ग़लत काम किया ही नहीं है, तो डरते क्यों हैं.”
वे सिटपिटाये बोले, “तुम नहीं समझोगे– ये शायरी-वायरी बड़ी बेकार चीज़ होती है. इसमें कहीं भी और कभी भी फंसने का चांस बन सकता है.
तुम्हें तो पता ही है बिना इंस्पायर हुये तो कोई लिख नहीं सकता – जब काॅलेज में था, तो मैंने कई शेर लिखे थे-
“तुम्हारी निगाह में समंदर ढूढ़ लाया हूं, चेहरे झील का पानी है, जो नूर बन के ठहरा है.“
वैसे ही एक लिखा था-
यह जो काली रात मेरे कमरे में उतर आई है, लगता है तेरी जुल्फ का तब्बसुम उतर आया है .
वहीं एक था कि – बिजली सी कौंधती है तेरी एक हंसी के साथ ए खयालों की मलिका तू यूं हंसा न कर .
मैं चौंक गया – बेचैन साहब यह सब तो आपकी हिट शायरी के शेर हैं जो हर मंच से आप सालों से सुना रहे हैं .
वे बोले यही तो लफड़ा है– हर शेर किसी न किसी से इंस्पायर है और मज़ा यह कि शेर मे जिससे वह इंस्पायर है ख़ुद-ब-ख़ुद उसका नाम आ रहा है %.
इतना ही नहीं मेरी हर गज़ल में इंडायरेक्टली कोई न कोई करेक्टर रिफ्लेक्ट हो जाता है.
मामला इतना सीधा नहीं है आजकल मेरी गज़लों के कैरेक्टर मुझे संदेहास्प्रद नज़रों से देखते हैं. ऐसे एक दो नहीं हैं कई कैरेक्टर हैं कोई सब्जी मार्केट में मिल जाता है तो कोई शापिंग माल में , किसी से पार्क में मुलाकात हो जाती है तो कोई बच्चों को स्कूल कालेज छोडते मिल जाता है .
मुझे रश्क हुआ (मेन विल बी मेन) तो बेचैन साहब आपने जितनी ग़ज़लें और शेर लिखे हैं उतने ही इंस्पायरिंग कैरेक्टर हैं आपकी लाइफ में.
इस बार वे कुछ बोले नहीं, बस मुस्कुरा के रह गए.
मैं सोचने लगा क्या आइटम है. अगला कम से कम सौ-दो सौ ग़ज़ल तो लिखी है इसने और हजार-पांच सौ शेर से कम का खजाना नहीं होगा इसका. मन में ख़्याल आया फंसने दो फिर देखता हूं.
ख़ैर ऊपर से मैं कुछ नहीं बोला, बस इतना ही कहा, “बेचैन साहब, यह आग जो जली है, इसका धुआं दूर तक उठ रहा है. और हां, कम से कम अब इंस्पायर होना बंद कर दीजिए. ऐसा न हो कल को आप कोई नई ग़ज़ल लिखो और फिर जलोटाजी की तरह टीवी पर आकर सफ़ाई देते फिरो कि ऐसा-वैसा कुछ नहीं है, मैं तो उस का कन्यादान कर रहा हूं.”
उन्हें शायद मेरी बात अच्छी नहीं लगी. वे अपने फेवर में कुछ सुनना चाहते थे वे चाहते थे कि मैं कह दूं किसी से इंस्पायर होने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन इस तेज़ चलती आंधी में कोई भी स्टेटमेंट देंना भला कौन-सी समझदारी है. भले ही मुझे पता है कि आज “मेन” कितनी पीड़ा में हैं, पर सब कुछ के बाद भी ग़लत काम की तरफ़दारी तो नहीं की जा सकती है न.
जिसे लोग इंसिपिरेशन समझ इग्नोर कर देते हैं, न जाने वह दूसरे को कितना फिजिकल व मेंटल पीड़ा देता हो?

मुरली मनोहर श्रीवास्तव
Satire

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