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कितना ज़रूरी है आत्मसम्मान… जानें ख़ुद का सम्मान करने के तरी़के (Why Self-Respect Is Important… How To Respect Yourself?)

How To Respect Yourself

आत्मसम्मान यानी सेल्फ रिस्पेक्ट (Self-respect) का सीधा-सरल अर्थ है ख़ुद का सम्मान करना और ये ख़ुद से प्यार करने का ही दूसरा नाम है. कुछ लोग इसे ईगो समझ बैठते हैं, लेकिन ईगो का मतलब होता है अपना महत्व जताना. ख़ासतौर से दूसरों के सामने ख़ुद को अधिक महत्वपूर्ण व उनसे बड़ा समझना.

क्यों ज़रूरी है आत्मसम्मान?

आत्मसम्मान जहां सकारात्मक भावना है, वहीं ईगो यानी अहम् नकारात्मक भाव है. ऐसे में आत्मसम्मान बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि आप अपना ही सम्मान नहीं करेंगे, तो दूसरे भी आपका सम्मान नहीं करेंगे.

  • जब आप ख़ुद का सम्मान करते हैं, तो आपको पता होता है कि कब और कहां ‘ना’ कहना ज़रूरी है.
  • आपको अपनी क़द्र करनी आती है, तो आप हर बात को भावनात्मक तरी़के से नहीं सोचते.
  • कोई आपका फ़ायदा उठा रहा है, यह आप जानते-समझते हैं, लेकिन फिर भी आप चुपचाप सहते हैं, तो इसका अर्थ है आप अपना सम्मान नहीं करते.
  • आत्मसम्मान इसलिए भी ज़रूरी है कि वो आपको परिपक्वता से वो निर्णय लेने की क्षमता देता है, जिसका असर आपके व आपसे जुड़े लोगों पर पड़ता है.
  • आत्मसम्मान आपके रिश्ते को बेहतर बनाता है. ख़ुश रहने के लिए भी यह बहुत ज़रूरी है.
  • जब आप ख़ुद से प्यार करते हो, तो आप तुलना करना बंद कर देते हो. आपको अपने हुनर और अपने काम करने के तरी़के पर विश्‍वास होता है.
  • जब आप अपने निर्णय, अपने संस्कारों पर भरोसा करते हो, तो आप और ज़िम्मेदार बनते हो.

क्या होता है, जब आत्मसम्मान की कमी होती है?

  • जब आप में आत्मसम्मान की कमी होती है, तो आप महज़ डोरमैट बनकर रह जाते हैं यानी लोग आपका इस्तेमाल करके छोड़ देते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि आप बिना शिकायत के उनकी सुविधानुसार उनके लिए उपलब्ध रहोगे.
  • आप रिश्तों में ख़ुद को पूरी तरह भूल जाते हैं. आप रिश्ते में तो बंधते हो, लेकिन उसके बाद आप भूल जाते हो कि आप कौन हो और रिश्ते में आपकी अहमियत क्या है?
  • आप अटेंशन यानी दूसरों के ध्यानाकर्षण के लिए अजीब-सी चीज़ें व हरक़तें करने लगते हैं, चाहे ऑफिस हो या घर, ख़ुद को बेव़कूफ़ बनाते चले जाते हैं.
  • बुरी आदतों व लतों के शिकार होने लगते हो, क्योंकि आप अपने शरीर, अपने स्वास्थ्य व अपनी ज़रूरतों का सम्मान नहीं करते.
  • आप उन लोगों की फ़िक्र करते हो, जिन्हें आपकी परवाह तक नहीं और आप हर बार ख़ुद को समझाते हो कि आप जो कर रहे हो,  वो सही है. जबकि सामनेवाले व्यक्ति को इस बात से कोई लेना-देना तक नहीं होता कि आप उनके लिए क्या और कितना करते हो.
  • आप भावनात्मक, शारीरिक, मानसिक और मौखिक शोषण को बर्दाश्त व स्वीकार करते हो. आप एब्यूसिव पार्टनर को बर्दाश्त करते हो और जो आपको बार-बार बेइज़्ज़त करते हैं, आपका मज़ाक बनाते हैं, उन्हें आप दोस्त बनाए रखते हो.
  • आप कैज़ुअल सेक्स से परहेज़ नहीं करते और इसके पीछे कारण यह होता है कि आप सेक्स को एंजॉय करने के लिए नहीं, बल्कि ख़ुद को यह समझाने व महसूस कराने के लिए करते हो कि आपको भी कोई चाहता है.
  • आप दूसरों के हाथों की कठपुतली बन जाते हो. अपनी ज़िंदगी, अपने निर्णय भी दूसरों के मुताबिक़ लेते हो.
  • ख़ुद पर ध्यान देना छोड़ देते हो. ग्रूमिंग का ख़्याल नहीं रखते. सजना-संवरना बंद कर देते हो.

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Love Yourself

कैसे करें ख़ुद का सम्मान?

  • अपनी सोच, अपने संस्कारों पर विश्‍वास रखें और दूसरों की सुविधा के लिए उन्हें कभी न बदलें.
  • अपने शरीर का सम्मान करें. हेल्दी रहें, हेल्दी खाएं और ख़ुद के सजने-संवरने में भी दिलचस्पी लें.
  • अपनी हॉबीज़ को भी महत्व दें. अपने पैशन को लोगों से शेयर करें.
  • साफ़ कहना सीखें. कम्यूनिकेट करें. अगर आपको किसी का व्यवहार या बात असहज कर रहा है, तो उससे कहें. झिझकें नहीं, क्योंकि यदि लोगों को यह पता होता है कि आपको मैन्युपुलेट किया जा सकता है, तो वो आपका सम्मान न करके आपको यूज़ करने लगते हैं.
  • अपनी ख़ूबियों पर ध्यान दें, वहीं अपनी कमज़ोरियों को भी सहजता व ईमानदारी से स्वीकारें.
  • ख़ुद की कद्र करने के लिए बेहद ज़रूरी है कि आप अपने समय की भी कद्र करें. टाइम मैनेजमेंट सीखें और अपने समय को बेहतर कामों के लिए इस्तेमाल करें.
  • सकारात्मक लोगों के साथ रहें. उनसे कुछ अच्छा सीखने को मिले, तो ज़रूर उन्हें फॉलो करें.
  • इसी तरह बुज़ुर्गों का सम्मान करें और उनकी राय को महत्व दें. उनके अनुभव आपको बहुत कुछ सिखा सकते हैं.
  • नकारात्मक न बनें. हर बात के लिए, हर असफलता के लिए ख़ुद को ही दोषी या ज़िम्मेदार न ठहराएं. यह सोचें कि ग़लती किसी से भी हो सकती है. दोबारा कोशिश करना ही आपको हारने से बचाता है.
  • हां, अपनी ज़िम्मेदारियों से कभी पीछे न हटें.
  • अपने प्रति अपनी सोच को बदलें. उसे सकारात्मक बनाएं.
  • मेडिटेशन का सहारा लें, यह आपको रिफ्रेश और पॉज़िटिव बनाता है.
  • अपना ध्यान क्रिएटिव कार्यों में लगाएं और निगेटिव लोगों से दूर रहें.
  • आत्मविश्‍वासी बनें. निर्णय लेने से पीछे न हटें और अपने निर्णय पर भरोसा करें. यदि काम न भी बने, तो भी निराशा से बचें. यह सोचें कि कोशिश करना बेहतर होता है, बजाय कोशिश न करने के.

– कमलेश शर्मा

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ख़ुद अपना ही सम्मान क्यों नहीं करतीं महिलाएं (A Woman Should Respect Herself)

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हर किसी से प्यार बेहिसाब… हर समय अपनों का इंतज़ार करने को बेक़रार… आंखों में चिंता, लबों पर दुआ, आंचल में ममता और रिश्तों में वफ़ा… क्या ख़ुद को औरत होने की देती है सज़ा…?

 

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यह सच है कि प्यार, वफ़ादारी, अपनापन रिश्तों में बेहद ज़रूरी हैं, लेकिन ये तमाम चीज़ें महिलाएं स़िर्फ अपनी ही ज़िम्मेदारियां व अपना धर्म समझकर निभाएं, यह सही नहीं. ख़ुद जीना छोड़कर दूसरों के लिए ही जीएं, यह सही नहीं… ख़ुद के बारे में सोचना छोड़कर बस अपने रिश्तों को ही जीएं, यह भी सही नहीं… दरअसल, उनकी इस सोच व व्यवहार के पीछे वो मानसिकता है, जो बचपन से उन्हें अपना सम्मान करने की दिशा में कोई सहायता नहीं करती, उन्हें बस दूसरों का सम्मान, दूसरों के लिए त्याग, दूसरों के लिए समर्पण का पाठ पढ़ाया जाता है, जिसके चलते वे अपने बारे में सोचना तक ज़रूरी नहीं समझतीं और यहां तक कि इसे स्वार्थ की परिधि के अंतर्गत मानने लगती हैं.

आत्मसम्मान और स्वार्थ में अंतर है: समस्या यह है कि हमारे समाज में महिलाओं को आत्मसम्मान के महत्व के बारे में समझाना ही ज़रूरी नहीं समझा जाता है.
– उन्हें हमेशा दूसरों की परवाह की सीख बचपन से दी जाती है.
– यदि उन्होंने ग़लती से भी अपने लिए या अपनी पसंद को तवज्जो देते हुए कोई काम किया, तो इसे स्वार्थ बताया जाता है.
– यही वजह है कि उन्हें आत्मसम्मान भी स्वार्थ नज़र आता है और वो चाहकर भी बहुत-से क़दम नहीं उठा पातीं अपने लिए.
रोल को ग़लत ढंग से समझाया जाता है: किसी भी रिश्ते में एकतरफ़ा प्यार या एकतरफ़ा ज़िम्मेदारी संभव नहीं है, लेकिन बचपन से लड़कियों को यही सिखाया जाता है कि उन्हें ही सबका ख़्याल रखना है, रिश्ते बनाए और बचाए रखने का ज़िम्मा भी उन्हीं का है. इस भूमिका में उन्हें क्या-क्या सिखाया और समझाया जाता है, यह भी जानना ज़रूरी है-
– किसी से ऊंची आवाज़ में बात नहीं करना.
– किसी को उलटा जवाब नहीं देना, फिर भले ही सामनेवाला ग़लत ही क्यों न हो.
– सबके लिए त्याग-समर्पण का भाव रखना.
– सबके खाना खाने के बाद ही ख़ुद खाना… आदि इत्यादि…
अपने लिए सोचने पर अपराधबोध महसूस कराना: अगर कोई लड़की अपने हिसाब से कुछ अच्छा भी करना चाहती है, लेकिन उसके पिता, भाई या पति को यह पसंद नहीं, तो उसे यही समझाया जाता है कि रिश्ते की ख़ातिर अपनी ख़ुशी छोड़ देना ही उसका फ़र्ज़ है.
– अगर सबको नाराज़ करके वो कुछ करती है, तो उसे अपराधी महसूस कराया जाता है.
ख़ुद से पहले दूसरों के लिए सोचो: इसे हम एक उदाहरण के ज़रिए बेहतर तरी़के से शायद समझ पाएं- जब किसी लड़की का विवाह होनेवाला होता है, तो उसे अपनी सेहत से लेकर अपनी ख़ूबसूरती का ख़ास ख़्याल रखने की हिदायतें दी जाती हैं, उसके बाद जब वो गर्भवती होती है, तब उसे यह सीख दी जाती है कि उसे अपने बच्चे के लिए ही सब कुछ करना है, फिर चाहे वो अपना खानपान हो या सेफ ट्रैवल करना, कोई तनाव न लेने की बात हो या अन्य कोई काम.
– यहां सवाल यह उठता है कि यदि लड़की शादी नहीं करती या वो गर्भवती नहीं होती, तो क्या उसे अपनी सेहत और सुरक्षा का ख़्याल नहीं रखना चाहिए? क्या उसे हेल्दी डायट नहीं लेना चाहिए? क्या उसे तनावरहित जीने का प्रयास नहीं करना चाहिए?
– ख़ुश और हेल्दी रहने के लिए क्यों उन्हें किसी न किसी बहाने की ज़रूरत होती है?
– यह सच है कि गर्भवती महिला को एक्स्ट्रा केयर की ज़रूरत होती है, लेकिन इसका यह अर्थ क़तई नहीं है कि सामान्य तौर पर उन्हें अपना ध्यान रखने की ख़ास ज़रूरत ही नहीं.
स्वयं भी हैं ज़िम्मेदार: इन तमाम परिस्थितियों के लिए महिलाएं ख़ुद भी ज़िम्मेदार हैं. उन्हें ख़ुद को नज़रअंदाज़ करने में महानता का एहसास होता है.
– जब तक पति के लिए भूखी-प्यासी नहीं रहेंगी, उनका पत्नी धर्म पूरा नहीं होता.
– जब तक अपने शरीर को नज़रअंदाज़ करते-करते पूरी तरह से बीमार होकर बिस्तर नहीं पकड़ लेंगी, तब तक अपने दर्द व तकलीफ़ को बयां न करके अपने तक ही रखना उन्हें त्याग और समर्पण का एहसास दिलाता है.
– यही नहीं, उन्हें बीमार पड़ना भी अपराधबोध का एहसास कराता है, उन्हें इस बात की फ़िक़्र कम रहती है कि उनकी हेल्थ ख़राब है, बल्कि वो यह सोचती हैं कि उनकी फैमिली को कितना कुछ सहन करना पड़ रहा है, बच्चों और पति को परेशानी हो रही है, घर का रूटीन बिगड़ गया उनकी बीमारी के कारण.
सामाजिक ढांचा: हमारा सामाजिक ढांचा महिलाओं को स्वतंत्र रूप में स्वीकार करने की हिम्मत नहीं रखता. उनकी स्वतंत्रता, उनका अपने तरी़के से जीने का ढंग किसी को भी मंज़ूर नहीं. उन्हें हमेशा परिवार की इज़्ज़त, घर की लक्ष्मी, खानदान की इज़्ज़त जैसे भारी-भरकम शब्दों के बोझ तले अपने शौक़, अपने जीने का सलीक़ा, अपनी पूरी ज़िंदगी ही दफन करनी पड़ती है.

एक्सपर्ट ओपिनियन

विषय के संदर्भ में हमने बात की काउंसलिंग सायकोलॉजिस्ट डॉ. माधवी सेठ से-
आसपास का वातावरण व माहौल: दरअसल, बचपन से ही लड़कियां अपनी मां, मौसी या चाची को अपने आसपास जिस भूमिका में देखती हैं, वो जाने-अनजाने प्रेरित होकर ख़ुद को भी उसी तरह ढाल लेती हैं. ऐसे में उन्हें यही लगता है कि घर-परिवार व समाज में उनकी यही भूमिका है.
सोशल प्रेशर: ख़ुद महिलाएं ही दूसरी महिलाओं से यह उम्मीद रखती हैं कि वो भले ही बाहर कमाने जाती हों, लेकिन घर पर उन्हें सो कॉल्ड पारंपरिक बहू, पत्नी व मां की भूमिका में ही होना चाहिए. अगर किसी पत्नी ने पति से पहले खाना खा लिया, तो वो अच्छी पत्नी नहीं, अगर वो अपने बच्चों व पति को छोड़कर दोस्तों के साथ मूवी देखने चली गई, तो वो अच्छी मां व गृहिणी नहीं. इसके विपरीत पति भले ही दोस्तों के साथ पार्टी करे, लेकिन उस पर कोई सवालिया निशान नहीं होगा.
– दूसरी ओर बच्चे भी यही उम्मीद करते हैं कि अगर मम्मी ने पूछ लिया कि ङ्गकहां जा रहे होफ, तो वो हस्तक्षेप और ओल्ड फैशन्ड है, लेकिन अगर मम्मी ने खाने के बारे में थोड़ा देर से पूछा, तो उन्हें बच्चों की परवाह ही नहीं.
सोशल कल्चर उतनी तेज़ी से नहीं बदल रहा: एक समय था, जब हम यह सोच भी नहीं सकते थे कि हमारे समाज में महिलाएं पुरुषों की तरह कमाने लगेंगी, लेकिन अब व़क्त बदल गया है. महिलाएं कमाने लगी हैं, लेकिन इसके बावजूद हम उनसे उसी पारंपरिक व्यवहार की उम्मीद करते हैं, जो हमारी परिभाषा में फिट बैठे और हमें अपनी सुविधानुसार सूट करे. इसकी मुख्य वजह यही है कि हम तो तेज़ी से बदल रहे हैं, महिलाओं की भूमिका पूरी 360 डिग्री बदल गई है, लेकिन हमारा सोशल कल्चर उतनी तेज़ी से नहीं बदल रहा.
– आज भी बड़ी से बड़ी पोस्ट पर काम करनेवाली महिलाएं भी घर की अतिरिक्त ज़िम्मेदारियों का बंटवारा नहीं कर पाई हैं, बच्चों से लेकर ग्रॉसरी तक का ख़्याल स़िर्फ और स़िर्फ उनको ही रखना होता है. पति इसमें कोई मदद नहीं करते. जबकि विदेशों में ऐसा नहीं है, क्योंकि वहां अधिकतर महिलाएं वर्किंग हैं और उनका सोशल कल्चर भी हमसे अलग है.

कैसे संभव है बदलाव?

– बदलाव की शुरुआत हो गई है, हालांकि समय ज़रूर लगेगा, क्योंकि इस तरह से लोगों की सोच एक दिन में नहीं बदलती, लेकिन
धीरे-धीरे परिवर्तन ज़रूर होता है.
– सबसे पहले महिलाओं को ख़ुद अपनी सोच में बदलाव लाना होगा.
– ख़ुद को कमतर समझना बंद करना होगा.
– एक गृहिणी ख़ुद को किसी भी हाल में वर्किर्ंग वुमन से कम न समझे.
– न ही वर्किंग वुमन को हाउसवाइफ के मुक़ाबले ख़ुद को सुपीरियर समझना चाहिए, क्योंकि घर के कामों में भी उतनी ही ज़िम्मेदारी और मेहनत लगती है, इन कामों को हीन समझना महज़ बेव़कूफ़ी होगी.
– डॉ.माधवी सेठ का कहना है कि आज की जेनरेशन काफ़ी बोल्ड और कॉन्फिडेंट है. आज की लड़कियां जानती हैं और वो पूरी तरह से क्लीयर हैं अपने रोल को लेकर. वो जानती हैं उन्हें क्या करना है और वो कैसी लाइफ चाहती हैं. लड़कियों का इस तरह से आत्मविश्‍वासी होना हमारे भारतीय परिवारों को भी पसंद नहीं आ रहा, यही वजह है कि तलाक़ के मामले भी बढ़ रहे हैं, क्योंकि सास-ससुर सोचते हैं कि ऐसी बहू तो हमें नहीं चाहिए थी, हमें तो छुईमुई-सी पारंपरिक सोचवाली लड़की ही चाहिए बहू के रूप में… तो इस सोच को बदलने में अभी
व़क्त लगेगा.

– गीता शर्मा