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यौन शोषण: लड़के भी हैं उतने ही अनसेफ… (Child Abuse: Myths And Facts About Sexual Abuse Of Boys)

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यौन शोषण: लड़के भी हैं उतने ही अनसेफ… (Child Abuse: Myths And Facts About Sexual Abuse Of Boys)

एक सर्वे के मुताबिक़ लगभग 71% पुरुषों ने यह स्वीकारा है कि बचपन में वे यौन शोषण के शिकार हो चुके हैं.

71%, जी हां, आप सही पढ़ रहे हैं… यह आंकड़ा ज़ेहन को हिला देनेवाला है. अविश्‍वसनीय लग रहा है न, लेकिन यह सच है.

लड़कों (Boys) का बलात्कार (Rape) नहीं हो सकता… हमारे देश में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में कुछ ऐसी ही सोच थी कुछ समय पहले तक… दरअसल, यह एक माइंडसेट है, जो समय के साथ भी अब तक बदला नहीं है. हमें लगता है यौन शोषण (Sexual Abuse) स़िर्फ लड़कियों (Girls) का ही होता है, क्योंकि हम यह मानने को तैयार ही नहीं कि लड़के भी होते हैं शोषण के शिकार.

भारत में अब भी है चुप्पी!

–  हमारे देश में वैसे भी सेक्स, बलात्कार, शोषण आदि विषयों पर बात नहीं होती, तो लड़कों के यौन शोषण पर विचार करने तक की बात यहां कोई कैसे सोच सकता है?

–   लेकिन चूंकि अब इस विषय पर भी बात होने लगी है, तो भारत में भी कुछ वर्ग इस पर बात करने से हिचकिचाते नहीं हैं और यह ज़रूरी भी है.

–   भारत सरकार द्वारा जो रिसर्च किया गया था, उसमें भी चौंकानेवाला आंकड़ा ही सामने आया था कि 53.2% बच्चों ने सेक्सुअल एब्यूज़ की बात बताई थी, जिनमें से 52.9% लड़के थे.

–   चाइल्ड एब्यूज़ दरसअल जेंडर न्यूट्रल है. यह बात मेनका गांधी (महिला-बाल कल्याण मंत्री) ने कही थी और यह सच भी है.

–   दरअसल, चाइल्ड एब्यूज़ के शिकार लड़कों पर कभी कोई स्टडी हुई ही नहीं, क्योंकि न तो इस तरफ़ किसी का ध्यान गया और न ही किसी ने इसकी ज़रूरत समझी.

–   जो 71% पुरुष यौन शोषण के शिकार हुए थे, उनमें से 84.9% ने इस बारे में कभी भी किसी को कुछ नहीं बताया. क्योंकि इसकी मुख्य वजह थी- शर्म. इसके अलावा डर, कंफ्यूज़न और अपराधबोध की भावना भी उनके मन में थी.

–   दरअसल, हमारे समाज में यह मान्यता है कि लड़कों का रेप नहीं हो सकता. यही वजह है कि लड़के अपने यौन शोषण के बारे में कभी बात ही नहीं करते, क्योंकि उनका भरोसा कौन करेगा?

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व्यक्तित्व पर असर डालता है यह शोषण!

–   बचपन में इस तरह के शारीरिक शोषण का असर पूरे मन-मस्तिष्क पर पड़ता है.

–   सबसे पहले तो बच्चा यही सोचता है कि इससे उसे अकेले ही जूझना है.

–  चूंकि वो पुरुष है, तो उसे स्ट्रॉन्ग बनना है, इसलिए उसे अपने शोषण को स्वीकारना होगा.

–   इसका असर उनके इमोशनल व्यवहार पर भी पड़ता है.

–   वो जल्दी से किसी पर भरोसा नहीं करते. एक डर की भावना मन में बैठ जाती है. कॉन्फिडेंस पर असर पड़ता है.

–   उनमें एक तरह का अपराधबोध भी घर कर जाता है कि उन्होंने कुछ ग़लत किया है, ख़ासतौर से तब जब वो शोषण के दौरान इजैक्यूलेट करते हैं.

–   उन्हें यह भी लगता है कि लोग उनकी बातों पर भरोसा नहीं करेंगे यदि उन्होंने किसी से शेयर किया भी तो.

–   वो दोस्तों से कतराने लगते हैं. अकेलापन उन्हें बेहतर लगता है.

–   उन जगहों पर जाने से डरते हैं, जहां शोषण की यादें जुड़ी हों.

पैरेंट्स को रहना होगा अलर्ट

–   बच्चे के व्यवहार में कुछ अलग-सा नज़र आने लगे, तो उससे बात करें.

–   यदि बच्चा न बताए, तो दूसरे तरीक़ों से जानने की कोशिश करें, क्योंकि हो सकता है आपका बच्चा उन तकलीफ़ों से जूझ रहा हो, जिसकी आप कल्पना तक नहीं कर सकते.

–   कई स्कूलों में लड़कों के यौन शोषण की घटनाएं बीते सालों में प्रकाश में आ चुकी हैं. ऐसे में पैरेंट्स को सतर्क रहना चाहिए.

–   बेटी के साथ-साथ बेटे की पूरी सुरक्षा की ओर भी ध्यान देना होगा.

–   उन्हें सेक्स एजुकेशन दें और उनमें यह कॉन्फिडेंस जगाएं कि वो खुलकर आपसे हर बात शेयर कर सकें.

–   उन्हें सही-ग़लत, सेफ-अनसेफ टच के बारे में बताएं.

–   लड़का है, इसलिए उसकी कुछ बातों को इग्नोर न करें.

–  उनके छोटे-छोटे इशारों को समझने का प्रयास करें. हो सकता है उनके पीछे कोई बड़ी बात हो.

कैसे हैंडल करें शोषण के शिकार बच्चों को?

–   बेहतर होगा उनसे बहुत ज़्यादा डिटेल्स न पूछें कि कब, कहां, कैसे हुआ…

–   उन्हें डांटें नहीं कि तुमने पहले क्यों नहीं बताया, बता देते तो तुम्हें बचा लेते… ऐसी बातों से उनके मन में गिल्ट आएगा.

–   उन्हें सपोर्ट करें, लेकिन ओवर पॉज़िटिव वाक्य न बोलें, जैसे- समय के साथ-साथ बेहतर हो जाएगा सब कुछ और ऐसा होता है ज़िंदगी में… या फिर इसके बारे में तुम्हें बुरा महसूस करने या अपराधी महसूस करने की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि इस तरह के वाक्य उन्हें यह महसूस करवाएंगे कि उनके साथ बहुत ज़्यादा बुरा हुआ है.

–  बेहतर होगा आप सिंपल तरी़के से कहें कि हमें तुम पर पूरा भरोसा है और हम हैं तुम्हारे साथ हमेशा… यह उन्हें कॉन्फिडेंस देगा.

–   काउंसलर की मदद भी ज़रूर लें और उन्हें एक सामान्य माहौल देने की कोशिश करें.

– कोशिश हमारी यही होनी चाहिए कि शुरुआत में ही हमें पता चल जाए या फिर बच्चों को यह सब झेलना ही न पड़े, इसके लिए बच्चों को ही ट्रेनिंग देनी होगी, जो हर स्कूल में अनिवार्य होनी चाहिए.

– साथ ही बच्चों पर भरोसा करना होगा कि वो अगर कुछ कह रहे हैं, तो उसके पीछे कोई वजह ज़रूर होगी. बेहतर होगा उनकी बातों को भी गंभीरता से लिया जाए और लड़कों को यौन शोषण का डर नहीं, यह सोचकर उनकी अनदेखी या उनकी ओर से लापरवाह रहना छोड़ना होगा.

– गीता शर्मा

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शादी से पहले हर बात की हिदायत, तो सेक्स एजुकेशन से परहेज़ क्यों? (Sex Education: Why We Should Talk About Sex Before Marriage)

Sex Education Sex Before Marriage

Sex Education Sex Before Marriage

शादी से पहले हर बात की हिदायत, तो सेक्स एजुकेशन से परहेज़ क्यों? (Sex Education: Why We Should Talk About Sex Before Marriage)

ससुराल में जाकर सबका मन जीत लेना… धीरे-धीरे मीठी आवाज़ में सबसे बात करना… ज़ोर से मत हंसना और न ही ऊंची आवाज़ में बात करना… घर के कामकाज में हाथ बंटाना… इस तरह की तमाम हिदायतें उस लड़की को ज़रूर दी जाती हैं, जिसकी शादी होनेवाली होती है… यह हर घर में आम है, लेकिन क्या कभी इस बात पर हम ग़ौर करते हैं कि इतनी हिदायतों के बीच सेक्स को लेकर हम बेटी को या बेटे को कितना एजुकेट करते हैं? नहीं न? क्योंकि इस स्तर पर बात करना तो दूर, हम सोचते भी नहीं. हमें यह ज़रूरी ही नहीं लगता. वैसे भी सेक्स (Sex) को लेकर आज भी हम उतना खुलकर बात नहीं करते. हमारे समाज में आज भी सेक्स को गंदा या ग़लत ही माना जाता है, लेकिन बात जब शादी-ब्याह की हो, तब भी हम इसे ज़रूरी क्यों नहीं मानते? 

ये किस तरह का समाज है?
  • क्या यह समाज का दोगलापन नहीं है कि हमारे यहां शादी को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है और शादी का जो सबसे महत्वपूर्ण आधार है, उस पर ही बात करने से परहेज़ भी किया जाता है.
  • शादी के बाद गुड न्यूज़ की सबको जल्दी रहती है, लेकिन उससे पहले सेक्स से जुड़ी ज़रूरी बातें बताना किसी को ज़रूरी नहीं लगता.
  • जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है यानी सेक्स करने से किसी को परहेज़ नहीं, लेकिन इस पर एजुकेट करना बेहद शर्मनाक माना जाता है.
  • टीवी कमर्शियल्स में कंडोम, कॉन्ट्रासेप्शन या फिर इससे जुड़ी चीज़ें दिखाए जाने पर परिवार के लोग इस कदर शर्मिंदगी महसूस करते हैं, जैसे यह कोई आपराधिक या शर्मनाक बात हो.
क्या होते हैं दुष्परिणाम?
  • सेक्स एजुकेशन की कमी के चलते सेक्स को लेकर कोई जागरूकता हमारे समाज में नहीं है.
  • नए शादीशुदा जोड़े भी उतना ही जान पाते हैं, जितना उनके यार-दोस्त उन्हें बताते-समझाते हैं.
  • किस तरह से सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ से बचाव करना चाहिए, किस तरह से फैमिली प्लानिंग और कॉन्ट्रासेप्शन का इस्तेमाल करना चाहिए, पर्सनल हाइजीन का क्या महत्व है… इस तरह की तमाम बातों पर किसी का ध्यान नहीं जाता है.
  • यही वजह है कि अधिकांश लड़कियां सेक्स को लेकर एक फैंटसी में जीती हैं और सुहागरात को किसी फिल्मी सीन की तरह देखती हैं. लेकिन जब उनका सामना हक़ीक़त से होता है, तो उनके सपने बिखर जाते हैं.
  • बात स़िर्फ लड़कियों की ही नहीं, लड़कों को भी यह सीख नहीं दी जाती कि पहली रात को सेक्स करना ज़रूरी नहीं. सबसे ज़रूरी होता है एक-दूसरे को कंफर्टेबल महसूस कराना, क्योंकि सेक्स एक क्रिया नहीं, भावना है और आपके रिश्ते की नींव का महत्वपूर्ण आधार भी.
  • हमारे यहां दोस्तों की बातें या फिर पोर्नोग्राफी ही सेक्स एजुकेशन का सबसे बड़ा आधार व ज़रिया होती है, जिससे बहुत ही ग़लत जानकारियां हासिल कर कपल्स अपनी-अपनी सोच के साथ एक-दूसरे के क़रीब आते हैं.
  • इसके अलावा अधिकांश लड़कियों को बचपन से यही सिखाया जाता है कि सेक्स बेहद शर्मनाक और गंदी चीज़ होती है, जिससे वो शादी के बाद भी स़िर्फ पति की इच्छा मानकर इस क्रिया को अंजाम देती हैं. वो न तो अपनी चाहतें बयां कर पाती हैं और न ही अपनी सोच. यहां तक कि वो पति को सहयोग भी नहीं दे पातीं, क्योंकि यहां उनके चरित्र से जोड़कर इसे देखा-परखा जाता है.

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नो सेक्स एजुकेशन का मतलब नो सेक्स नहीं है…
  • यह तो हम सभी जानते हैं कि सेक्स एजुकेशन नहीं मिलने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति सेक्स नहीं करेगा, लेकिन इसका यह मतलब ज़रूर है कि वो सेक्स को लेकर कम संवेदनशील होगा, कम जानकार होगा और सेक्स के प्रति उसमें भ्रांतियां अधिक होंगी.
  • सेक्स एजुकेशन न होने का मतलब यह भी है कि यौन शोषण के मामले अधिक होंगे.
  • यह मान लेते हैं और शोध भी इसी ओर इशारा करते हैं कि लगभग 70-80% पैरेंट्स सेक्स एजुकेशन के लिहाज़ से भी बच्चों से सेक्स पर बात ही नहीं करते, लेकिन एडल्ट होने के बाद, शादी से पहले तो कम से कम उन्हें इस विषय पर ज़रूर बात करनी चाहिए, ताकि उनकी शादी की नींव मज़बूत हो.
  • बच्ची को यह तो सिखाया जाता है कि पति को ख़ुश रखना ही तेरा फ़र्ज़ है, लेकिन उसे यह नहीं बताया जाता कि अपनी सेक्सुअल हेल्थ के प्रति सतर्कता बरतना भी ज़रूरी है.
  • कॉन्ट्रासेप्शन क्यों और कितना ज़रूरी है, मेडिकल टेस्ट्स कितने ज़रूरी हैं, इस विषय पर पति से बात करना कितना ज़रूरी है… ये तमाम बातें कभी किसी नई-नवेली दुल्हन को नहीं सिखाई जातीं और न ही दूल्हे को भी इस संदर्भ में एजुकेट किया जाता है.
  • उन्हें इस विषय पर बात करने से भी डर लगता है कि कहीं उन्हें चरित्रहीन न समझ लिया जाए या उनके बारे में कोई राय न कायम कर ली जाए.
  • यही वजह है कि सेक्सुअल हाइजीन को लेकर देश की शहरी महिलाएं तक बहुत पिछड़ी हुई हैं.
  • नई-नवेली दुल्हन के वर्जिनिटी टेस्ट को लेकर जितनी जागरूकता हमारा समाज दिखाता है, क्या उतनी ही जागरूकता लड़के की सेक्सुअल एक्टिविटीज़, सेक्सुअल हेल्थ और सेक्सुअल जानकारी के प्रति दर्शाई जाती है?

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प्रोफेशनल की लें मदद
  • यदि पैरेंट्स से सेक्स एजुकेशन नहीं मिली, तो कपल्स को चाहिए प्रोफेशनल की मदद लें.
  • काउंसलर के पास जाएं. प मन में छिपे डर, भ्रांतियों और आशंकाओं पर खुलकर आपस में बात करें.
  • पैरेंट्स की मानें, तो उनका यही तर्क होता है कि हमें तो किसी ने नहीं दी सेक्स एजुकेशन, फिर भी हमारी ज़िंदगी बेहतर है, लेकिन समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदला है, आज एक्सपोज़र ज़्यादा है, सेक्स को लेकर सवाल ज़्यादा हैं, डर ज़्यादा हैं, भ्रांतियां ज़्यादा हैं.
  • समय के साथ बदलाव होना ज़रूरी है, हमारी सोच में भी और हमारे तरीक़ों में भी.
  • कपल्स शादी से पहले ख़ुद भी बात कर सकते हैं और उन्हें जो सही लगे, वो ऐक्शन ले सकते हैं, ताकि उनकी शादीशुदा ज़िंदगी बेहतर हो और उनका जीवन ख़ुशहाल. प पैरेंट्स भी यह ख़्याल रखें कि संस्कारों के साथ-साथ सेक्स एजुकेशन भी उतनी ही ज़रूरी है, ताकि आपकी बेटी का जीवन बेहतर हो.
  • दूसरी ओर ससुरालपक्ष को भी जानना ज़रूरी है कि नई दुल्हन से उम्मीदें, अपेक्षाएं करना, उसे ज़िम्मेदरियां देना, उसके कर्त्तव्यों की जानकारी देना तो ठीक है, साथ ही अपने बेटे को बेडरूम एटीकेट्स और सेक्स एटीकेट्स की जानकारी देनी भी उतनी ही ज़रूरी है, क्योंकि यह आख़िर उसकी बेहतरी के लिए ही है.

 

– गीता शर्मा

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सेक्स एज्युकेशन: ख़त्म नहीं हुई है पैरेंट्स की झिझक (sex education is necessary for child)

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आज के पढ़े-लिखे मॉडर्न पैरेंट्स भले ही अपने बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखने का दावा करें, लेकिन सेक्स जैसे मुद्दे पर बच्चों के साथ बात करते हुए उनकी ज़ुबान लड़खड़ाने लगती है. बच्चे के सेक्स से जुड़े किसी भी सवाल का जवाब देने में वो आज भी हिचकिचाते हैं. सेक्स जैसे ज़रूरी मुद्दे पर अपने बच्चों से बात करते हुए क्यों झिझकते हैं पैरेंट्स? 

टैबू है सेक्स

मॉडर्न होने का दंभ भरने वाले आज के शिक्षित अभिभावक भी बच्चों के मुंह से सेक्स शब्द सुनकर झेप जाते हैं. एक जानी मानी मीडिया ग्रुप से जुड़ी कविता कहती हैं, “मेरे 10 साल के बेटे ने जब अखबार में छपे सेक्स शब्द को देखकर पूछा ‘मम्मा, SEX का क्या मतलब है?’ तो मैं सन्न रह गई. मुझे समझ नहीं आया कि उसके सवाल का मैं क्या जवाब दूं.” हमारे देश में ज़्यादातर पैरेंट्स का हाल कविता जैसा ही है, वो अपने बच्चे के साथ दोस्ताना व्यवहार तो रखते हैं, लेकिन जब बात सेक्स की आती है, तो बच्चे को समझाने की बजाय उसके सवाल को टाल जाते हैं. ऐसे में वो इंटरनेट व दोस्तों के ज़रिए अपनी जिज्ञासा शांत करने की कोशिश करता है, जिसका ज़्यादातर नकारात्मक असर ही देखने को मिलता है, क्योंकि इन स्रोतों से सही व पूरी नहीं, बल्कि अधकचरी जानकारी ही मिलती है.
अपनी सेक्स जिज्ञासा को शांत करने के लिए टीनएजर्स बेझिझक यौन संबंध बना रहे हैं, जिससे न स़िर्फ उनका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य, बल्कि करियर भी प्रभावित होता है. साइकोलॉजिस्ट कीर्ति बक्षी के मुताबिक, “सेक्स को टैबू की बजाय नैचुरल चीज़ की तरह पेश करके, सहजता से बात करके, रियल-अनरियल सेक्स यानी नैचुरल सेक्स और पोर्नोग्राफ़ी का फ़र्क समझाकर बच्चों को अपराध की राह पर चलने से रोका जा सकता है.”

क्यों झेंपते हैं पैरेंट्स?
साइकोलॉजिस्ट प्रमिला श्रीमंगलम् पैरेंट्स की झिझक की वजह उनकी सोच को मानती हैं. उनके मुताबिक, “सोच के अलावा डर, शर्मिंदगी का एहसास, नैतिक मूल्य और संस्कार भी खुले तौर पर पैरेंट्स को बच्चों से सेक्स संबंधी मुद्दे पर बात करने से रोकते हैं.फफ दरअसल, हमारा समाज और परवरिश का माहौल ही ऐसा है जहां सेक्स जैसे शब्द को हमेशा परदे के पीछे रखा गया है. यही वजह है कि पैरेंट्स चाहते हुए भी इस मुद्दे पर बच्चे से खुलकर बात नहीं कर पाते.”
सेक्सोलॉजिस्ट डॉ. राजीव आनंद की भी कुछ ऐसी ही राय है. उनके अनुसार, “पैरेंट्स जिस माहौल में पले-बढ़े और शिक्षित हुए हैं, वहां सेक्स को हमेशा एक बुरी चीज़ के रूप में पेश किया गया है. सेक्स का मतलब स्त्री और पुरुष के बीच का अंतरंग संबंध… इसी सोच के चलते अभिभावक बच्चों के साथ इस बारे में बात करने में असहज महसूस करते हैं.”

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समय की मांग है सही सेक्स एज्युकेशन
दिनोंदिन सेक्स संबंधी अपराधों में बच्चों, ख़ासकर टीनएजर्स की बढ़ती भागीदारी न स़िर्फ पैरेंट्स, बल्कि पूरे समाज के लिए ख़तरे की घंटी है. ऐसे में सेक्स एज्युकेशन के ज़रिए ही बच्चों को सही-ग़लत का फ़र्क समझाया जा सकता है. डॉ. आनंद कहते हैं, “आज के दौर में जहां एक्सपोज़र और ऑपोज़िट सेक्स के साथ इंटरेक्शन बहुत ज़्यादा बढ़ गया है, ऐसे में टीनएजर्स को सेक्स के बारे में सही जानकारी होनी ज़रूरी है. बढ़ती उम्र के साथ टीनएजर्स की उत्तेजना और फैंटेसी भी बढ़ने लगती है, लेकिन उन्हें इस पर क़ाबू रखना नहीं आता, जो सेक्स एज्युकेशन से ही संभव है. सेक्स एज्युकेशन को स़िर्फ अंतरंग संबंधों से जोड़कर ही नहीं देखा जाना चाहिए.”

बदलाव की ज़रूरत
आमतौर पर पैरेंट्स ये तो चाहते हैं कि उनके बच्चे को सेक्स के बारे में सही जानकारी मिले, लेकिन ख़ुद इस मुद्दे पर वे बात नहीं करते. ज़्यादातर पैरेंट्स सेक्स को शादी के बाद वाली चीज़ के रूप में देखते हैं, लेकिन उन्हें अपनी इस सोच में बदलाव लाना होगा और कपड़ों के साथ ही अपने विचारों को भी मॉडर्न बनाकर एक दोस्त की तरह बच्चे को उसके शारीरिक अंगों और उनके विकास के बारे में जानकारी देनी होगी. इतना ही नहीं, उन्हेें ये भी बताएं कि कोई यदि उन्हें ग़लत तरी़के से छूता है, तो उसका विरोध करें या तुरंत स्कूल/घर में उसकी शिकायत करें. आजकल न स़िर्फ बाहर, बल्कि घर की चहारदीवारी में भी रिश्तेदारों द्वारा बच्चों के शोषण के कई मामले सामने आए हैं. बहुत- से मामलों में तो बच्चे समझ ही नहीं पाते कि उनके साथ कुछ ग़लत हो रहा है.

मीडिया एक्सपोज़र से बहकते क़दम
डॉ. आनंद के मुताबिक, “टीवी सीरियल, फ़िल्में, मैगज़ीन, फैशन शो आदि में जिस तरह खुलेआम अश्‍लीलता परोसी जा रही है, बच्चों का उनसे प्रभावित होना लाज़मी है. इन सब माध्यमों की वजह से वे उम्र से पहले ही बहुत कुछ जान लेते हैं और परदे पर दिखाई गई चीज़ों को असल ज़िंदगी में करने की कोशिश में ग़लत राह पर चल पड़ते हैं. इसके लिए बहुत हद तक पैरेंट्स भी ज़िम्मेदार हैं, उनके द्वारा इस मुद्दे पर बात न किए जाने के कारण बच्चे उत्सुकतावश या उतावलेपन में सेक्स अपराधों में लिप्त हो जाते हैं.”

सेक्सुअली एक्टिव होते बच्चे
कई अध्ययनों से ये बात साबित हो चुकी है कि आजकल 10-11 साल की उम्र में ही बच्चों में प्युबर्टी पीरियड शुरू हो जाता है. साइकोलॉजिस्ट प्रमिला श्रीमंगलम् कहती हैं, “बदलती लाइफ़स्टाइल के कारण बच्चे वक़्त से पहले बड़े हो रहे हैं और इस दौरान होने वाले हार्मोनल बदलाव उन्हें सेक्स के प्रति उत्तेजित कर देते हैं. ऐसे में सही जानकारी के अभाव में और पैरेंट्स द्वारा नज़रअंदाज़ किए जाने पर बच्चे अपनी उत्सुकता शांत करने के लिए इंटरनेट, सोशल साइट्स, पब, फ़िल्म व दोस्तों का सहारा लेते हैं, जिसका नतीजा सेक्सुअल एक्सपेरिमेंट्स के रूप में सामने आता है.”

कैसे करें बात?
ये सच है कि भारतीय पैरेंट्स के लिए बच्चों से सेक्स संबंधी मुद्दे पर बात करना आसान नहीं, लेकिन आप अगर अपने बच्चे की भलाई चाहते हैं, तो झिझक व संकोच छोड़कर आपको इस मामले पर बात करनी ही होगी. साइकोलॉजिस्ट प्रमिला श्रीमंगलम् कहती हैं, “पैरेंट्स को अपने और बच्चों के बीच के संवाद के पुल को मज़बूत बनाए रखना चाहिए और जब बच्चा सेक्स से जुड़े सवाल करने लगे, तो टालकर उसकी उत्सुकता बढ़ाने की बजाय सहजता से उसके सवालों का जवाब दें. बच्चे से नज़रें मिलाकर बात करें और ज़रूरत पड़े तो उसे सेक्स से जुड़ी कुछ अच्छी किताबें लाकर दें, ताकि उसे सही जानकारी मिले. सेक्स एज्युकेशन से बच्चों को न स़िर्फ अपने शारीरिक विकास के बारे में पता चलेगा, बल्कि सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ और अनवांटेड प्रेग्नेंसी (अनचाहा गर्भ) के बारे में भी पता चलेगा, जो उन्हें ग़लत रास्ते पर जाने से रोकेगी. वैसे कई स्कूलों में सेक्स एज्युकेशन का टॉपिक कवर किया गया है, लेकिन प्युबर्टी और सेक्सुअल डेवलपमेंट के बारे में बच्चों को बताने की प्राथमिक ज़िम्मेदारी पैरेंट्स की ही है.”

डॉ. राजीव आनंद कहते हैं, “पैरेंट्स को बच्चों के सामने स्त्री/परुष के शारीरिक अंगों के बारे में गंदे और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और न ही उसे मज़ाक या उत्सुकता का विषय बनाना चाहिए. बच्चे को उसकी उम्र और समझ के मुताबिक बॉडी पार्ट्स और उनकी अहमियत समझानी चाहिए. साथ ही अभिभावकों को ये भी ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे को कब, क्या और कितना बताना है.”
बहरहाल, ये साफ़ है कि आज के दौर में अपने बच्चे की बेहतरी के लिए पैरेंट्स को झिझक छोड़कर सेक्स एज्युकेशन के लिए पहल करनी ही होगी.

 

– कंचन सिंह