shayari

प्रकृति प्रेम…

Kavita

अभी तलाश रही हूं कुछ पीले शब्द
कि एक कविता लिखूं
पीली सी
ठीक उस पीली सोच वाली लड़की के जैसी
भीगती हुई
पीली धूप में तर-बतर
बटोरती हुई सपनों में
गिरे पीले कनेर
जो नहीं जानती फूल तोड़ना
घंटों बतियाती है जो चुपचाप
पीले अमलतास से
निहारा करती है रोज़
रिश्तों के पीले सूरजमुखी…

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’
Kavita

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Poetry

संघर्ष चल रहा है
युद्धीय स्तर पर
मन और बुद्धि के बीच
निरंतर संघर्ष..

विचार शक्ति का तर्क है कि
‘तुम्हें यूं याद करना
व्यर्थ है- पीड़ा दायक है
पागलपन भी
वह एक सपना था
मीठा ही सही
पर
बहुत पुराना
नामुमकिन है अब
उसको पाना
सपने टूटे तो
आहत करते हैं..

यह मन भी तो
पर कहां मौन है?
उत्तर है उसका
‘जीवन जिया जाता होगा
दिमाग़ी क़ानूनों से
मैं तो जानू बस
प्रीत की भाषा’

अजब टेढ़ी हैं इसकी राहें
है दलदल भी बहुत
ऊबड़-खाबड़ इस पथ पर
आंख मूंद चलोगे तो
घायल तुम ही हो जाओगे
रे मन..

पर यह मन
सुनकर भी अनसुनी कर देता है
मुस्कुराकर मन ही मन
अपने मन की ही करता है…

Usha Wadhwa
उषा वधवा

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Poetry

देखा था पहली बार
वसंत को
तुम्हारी आंखों से
छलकते प्यार में
महसूस किया था
टेसू की तरह
रक्तिम अपने होंठों पर
हवा में लहराते पत्तों की तरह
सरगोशी करते कुछ शब्दों में
सुनी थी उसकी आवाज़
कानों के बेहद क़रीब
फिर रोम-रोम में
उतर गया था
एक स्पर्श सा वसंत
अमलतास के पीले उजालों सा
कचनार की कलियां
चटक कर खिल गई थी
गालों पर
आज भी
उस वसंत की छुवन
महुए के नशे सी
तारी है दिल पर…

Vinita Rahurikar
विनीता राहुरीकर

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Poetry

कोयलिया
तू हर दिन किसे बुलाती है?

भोर होते ही सुनती हूं तेरी आवाज़
विरह का आर्तनाद
प्रणयी की पुकार
मनुहार
सभी कुछ है उसमें
गूंज उठता है उपवन
हर दिन
दिन भर

ढूंढ़ती है उसे तू डाल-डाल
भोर से सांझ तक
तेरा खुला निमंत्रण पाकर भी
नहीं आता क्यों मीत तेरा?
विरक्त है तुझसे?
या वह
विवश?

प्रात: होते ही गूंज उठती है
फिर वही पुकार
कुहू-कुहू की अनुगूंज
खिड़की की राह भर जाती है
मेरे कमरे में
द्विगुणित हो गूंजती है
मेरे आहत मन में
पुकारता है मेरा भी मन
मनमीत को
विरह का आर्त्त
प्रणयी की पुकार
मनुहार
सभी कुछ उसमें
पर सखी
कैसे पहुंचे उस तक
मेरी आवाज़?
पंख विहीन मैं
मेरे तो लब भी सिले हुए हैं!..

Usha Wadhwa
उषा वधवा

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Kavita

पूर्णता की चाहत लिए
प्रतीक्षारत कविताएं..

कुछ अधमिटे शब्दों की
प्रस्तावित व्याख्याएं..

कब से, पल-पल संजोई हुई
आशान्वित कल्पनाएं..

संभावनाओं की देहरी पर
राह तकती आकांक्षाएं..

और

मन्नतों के धागों में पिरोई हुई
अनगिनत गांठें..

सुनो,
..ऐसा है मेरा ये आंचल!..

नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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मुझे तन्हाई से अक्सर मिला है
ख़्यालों में वहीं दिलबर मिला है

यूं मिलने के ठिकाने और भी थे
कभी छज्जे कभी छत पर मिला है

वो मेरे संग था बेफ़िक्र कितना
कि ग़म में भी सदा हंस कर मिला है

कोई वजह तो होगी कुछ तो होगा
किसी से आज वो छुपकर मिला है

दिखाया ख़ुद को जब से आईना है
मिला जो भी मुझे बेहतर मिला है

archana jauhari
अर्चना जौहरी
Gazal

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कभी-कभी
मैं कुछ नहीं भी कहती हूं
तुम
तब भी सुन लेते हो..
कैसे!

कभी-कभी
मैं कुछ कहती हूं
तुम समझते कुछ और ही हो
पता नहीं, क्यों!

कभी-कभी
तुम कहते तो हो
पर, मैं समझना ही नहीं चाहती!

कभी-कभी
बहुत कुछ कहते-सुनते हैं
हम-दोनों
एक-दूसरे के मौन में
और
करते रहते हैं
मन की बात…

Namita Gupta 'Mansi
नमिता गुप्ता ‘मनसी

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Kavya

*
गुज़र जानी थी ये उम्र
किसी बेनाम कहानी की तरह
कि बियाबान में फैली
ख़ुशबू और उसकी रवानी की तरह
गर ये दिल की धड़कन
तेरी आंखों के
समंदर में न उतरी होती..

*
न अफ़साने न फ़साने होते
न ही तक़दीर का मसला होता
गर फ़रिश्तों ने तेरी रूह को
धरती पे न छोड़ा होता..

*
क्यूं
गुज़रती है ज़िंदगी
बार-बार
तेरी चौखट से
उम्मीद के दामन में
तेरी तमन्ना
अभी बाकी तो नहीं है…

– शिखर प्रयाग

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Kavita

सुनो कवि..
पहाड़ी के उस पार
वो स्त्री.. रोप रही है नई-नई पौध
सभ्यताओं की
और उधर.. गंगा के किनारे
विवश खड़ी है.. वो स्त्री
एक और ‘कर्ण’ लिए
तर-बतर हैं दोनों की ही आंखें
बताओ तो
क्या गीले नहीं हुए अब भी तुम्हारे शब्द!

सुनो लेखक..
पीठ पर बच्चा बांधे
वह स्त्री कर रही है मजदूरी
और उधर, व्यस्त है वो स्त्री कब से
सरकारें बनाने-गिराने में
कहो न
क्यों तुम्हारी बहस में शामिल नहीं होते वो नाम
जो संभाले रहते हैं गृहस्थी को अंत तक!

सुनो ईश्वर..
तुमने तुलसी को गढ़ा, लक्ष्मी को भेजा..
दुर्गा, सीता, राधा, मीरा..
जब भी दफ़नाया होगा उसने अपने सपनों को
थोड़ा-बहुत तुम भी मृत ज़रूर हुए होंगे
बता सकते हो
क्यों हर बार रखा तुमने उसको पराश्रित ही!

नहीं है कोई जवाब.. किसी के पास भी!

Namita Gupta 'Mansi'
नमिता गुप्ता ‘मनसी’

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अब न कोई शक़-ओ-शुबा है, हर ढंग से तस्तीक़ हो गई

निराशाओं से लड़ने की, मेरी बीमारी ठीक हो गई

लहू नसों में कुछ करने का, धीरे-धीरे ठंड पा गया

ज़ख़्म अभी बाकी है पर, भरने का सा निशां आ गया

उठती-गिरती धड़कन भी, इक सीधी-सी लीक हो गई

निराशाओं से लड़ने की, मेरी बीमारी ठीक हो गई

अब न जुनूं कुछ करने का, बेचैन रूह को करता है

अब न दिल में ख़्वाबों का, दरिया बेदर्द बहता है

ख़्वाब फ़ासला पा गए और हक़ीक़तें नज़दीक़ हो गई

निराशाओं से लड़ने की, मेरी बीमारी ठीक हो गई…

bhavana prakaash
भावना प्रकाश

शक-ओ-शुबा- संदेह
तस्तीक़- सत्यता प्रमाणित होना
लीक- लकीर

(इस ग़ज़ल का मतलब है कि अब ख़्वाबों को पूरा करने के लिए पागलपन की हद तक संघर्ष करते रहने की आदत ख़त्म हो रही है…)

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Gazal

आज के हालातों में
हर कोई ‘बचा’ रहा है कुछ न कुछ
पर, नहीं सोचा जा रहा है
‘प्रेम’ के लिए
कहीं भी..

हां, शायद
‘उस प्रलय’ में भी
नाव में ही बचा रह गया था ‘कुछ’
कुछ संस्कृति..
कुछ सभ्यताएं..
और
.. थोड़ा सा आदमी!

प्रेम तब भी नहीं था
आज भी नहीं है
.. वही ‘छूटता’ है हर बार
हर प्रलय में
पता नहीं क्यों…

Hindi Kavita
Namita Gupta
नमिता गुप्ता

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सांस, ख़ुशबू गुलाब की हो

धड़कन ख़्वाब हो जाए

उम्र तो ठहरी रहे

हसरत जवान हो जाए

बहार उतरे तो कैमरा लेकर

तेरी सूरत से प्यार ले जाए

जो नाचता है मोर सावन में

तेरी सीरत उधार ले जाए

लहर गुज़रे तेरे दर से तमन्ना बनकर

तेरे यौवन का भार ले जाए

आज मौसम में कुछ नमी उतरे

तेरी परछाईं बहार ले जाए

रात ख़ामोश हो गई क्यूं कर

अपना सन्नाटा चीर दे बोलो

तेरी आंखों से प्यार ले जाए

ऐ दोस्त ‘तेरी हस्ती’ लिखूं कैसे

फ़क्र हो अगर ‘तुझ पे’

मेरी हस्ती निसार हो जाए…

– शिखर प्रयाग

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Kavya