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Hindi Shayari

बशीर बद्र की उम्दा ग़ज़ल 

कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ,
वो ग़ज़ल का लहजा नया-नया, न कहा हुआ न सुना हुआ
जिसे ले गई अभी हवा, वे वरक़ था दिल की किताब का,
कहीँ आँसुओं से मिटा हुआ, कहीं, आँसुओं से लिखा हुआ
कई मील रेत को काटकर, कोई मौज फूल खिला गई,
कोई पेड़ प्यास से मर रहा है, नदी के पास खड़ा हुआ
मुझे हादिसों ने सजा-सजा के बहुत हसीन बना दिया,
मिरा दिल भी जैसे दुल्हन का हाथ हो मेंहदियों से रचा हुआ
वही शहर है वही रास्ते, वही घर है और वही लान भी,
मगर इस दरीचे से पूछना, वो दरख़्त अनार का क्या हुआ
वही ख़त के जिसपे जगह-जगह, दो महकते होंठों के चाँद थे,
किसी भूले बिसरे से ताक़ पर तहे-गर्द होगा दबा हुआ

Hindi Shayari

निदा फ़ाज़ली की उम्दा ग़ज़ल 
बेसन की सोंधी रोटी पर 
खट्टी चटनी जैसी मां 
याद आती है चौका-बासन 
चिमटा फुकनी जैसी मां 
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर 
हर आहट पर कान धरे 
आधी सोई आधी जागी 
थकी दोपहरी जैसी मां 
चिड़ियों के चहकार में गूंजे
राधा-मोहन अली-अली 
मुर्गे की आवाज़ से खुलती 
घर की कुंडी जैसी मां 
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन 
थोड़ी-थोड़ी-सी सब में 
दिन भर इक रस्सी के ऊपर 
चलती नटनी जैसी मां 
बाँट के अपना चेहरा, माथा, 
आँखें जाने कहाँ गई 
फटे पुराने इक अलबम में 
चंचल लड़की जैसी मां…

Hindi Shayari

मैं शायर तो नहीं… (Hindi Shayari: Main Shayer to nahi…)

 

मिर्ज़ा ग़ालिब की उम्दा शायरी 

चांदनी रात के ख़ामोश सितारों की क़सम,
दिल में अब तेरे सिवा कोई भी आबाद नहीं.

जी ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात दिन,
बैठे रहे तसव्वुर-ए-जहान किये हुए.

आया है बे-कसी-ए-इश्क पे रोना ग़ालिब,
किसके घर जायेगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद.

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया

ग़ैर ले महफ़िल में बोसे जाम के
हम रहें यूं तश्ना-ऐ-लब पैगाम के
ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के

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महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब (mirza ghalib) की बर्थ एनिवर्सरी पर पढ़ें उनकी लाजवाब शायरी…

mirza ghalib
27 दिसंबर 1796 को आगरा में जन्मे मिर्ज़ा ग़ालिब महान शायर के रूप में आज भी हम सबके बीच अपना एक अलग मुक़ाम बनाए हुए हैं. 19वीं शताब्दी के वो सबसे बड़े शायर माने जाते थे. उन्हें न स़िर्फ उर्दू का एक महान शायर माना जाता है, बल्कि फारसी कविता को भारत में लोकप्रिय करवाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है. 15 फरवरी 1869 को उनका निधन हो गया था. उनके जन्मदिवस पर पढ़ते हैं उनकी कुछ लाजवाब शायरी…

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम ही कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना आदमी तो हम भी बड़े काम के थे

इस सादगी पे कौन न मर जाए ए ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

आया है बे-कसी-ए-इश्क पे रोना ग़ालिब, किसके घर जायेगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

इश्क़ पर ज़ोर नहीं ये वो आतिश है ग़ालिब
जो लगाए न लगे और बुझाए न बुझे

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ’ग़ालिब’ ये ख़्याल अच्छा है

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले