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कम पैसे में ज्यादा शॉपिंग करनी है, तो आपको शॉपिंग की सही ट्रिक्स सीखनी होंगी. हम आपको बता रहे हैं कम पैसे में ज्यादा शॉपिंग करने के 20+ स्मार्ट आइडियाज़. कम पैसे में ज्यादा शॉपिंग करके आप भी बन सकते हैं स्मार्ट शॉपर.

Budget Friendly Fashion Ideas

वेडिंग और फेस्टिवल के लिए ऐसे करें शॉपिंग
1) फेस्टिवल या वेडिंग के लिए आप यदि साड़ी पहननना चाहती हैं, तो अपने किसी हैवी ब्लाउज़ के साथ पहनने के लिए कोई प्लेन साड़ी ख़रीद लें. इसके साथ हैवी या ट्रेंडी एक्सेसरीज़ पहनकर आप अपनी प्लेन साड़ी को हैवी लुक दे सकती हैं.
2) स्मार्ट शॉपिंग के लिए मिक्स एंड मैच फॉर्मूला बेस्ट है, जैसे- आप यदि फेस्टिवल या वेडिंग के लिए महंगा आउटफिट नहीं ख़रीदना चाहतीं, लेकिन ट्रेंडी भी दिखना चाहती हैं, तो स़िर्फ एक लॉन्ग जैकेट ख़रीदें और उसे अपने पुराने लहंगे के साथ पहनें.
3) फेस्टिवल या वेडिंग के लिए आप अपनी पुरानी हैवी चोली को प्लेन स्कर्ट, साड़ी आदि के साथ पहन सकती हैं.
4) अपनी रेग्युलर जीन्स के साथ एथनिक कुर्ती, ट्यूनिक, कॉर्सेट, लॉन्ग जैकेट आदि पहनकर आप ट्रेंडी और न्यू लुक पा सकती हैं.
5) अपनी मां की पुरानी ट्रेडिशनल साड़ी के साथ मॉडर्न डिज़ाइनर ब्लाउज़ पहनकर आप फेस्टिवल या वेडिंग में सबसे अलग और स्पेशल नज़र आ सकती हैं.

Fashion Ideas

ये हैं कम पैसे में ज्यादा शॉपिंग करने के स्मार्ट आइडियाज़.
6) बजट फ्रेंडली शॉपिंग का सबसे ज़रूरी टिप यही है कि फिज़ूलख़र्च से बचें और वही चीज़ ख़रीदें जिसकी आपको वाकई ज़रूरत हो.
7) शॉपिंग के लिए घर से निकलने से पहले एक लिस्ट बनाएं, जिसमें उन सभी स्टाइलिश ड्रेसेस और ट्रेंडी एक्सेसरीज़ को नोट करें, जो आपके
वॉर्डरोब और ऑफिस के लिए ज़रूरी हैं.
8) अच्छे ब्रांड की सेल लगी है, तो वहां से अच्छी फिटिंग वाली जीन्स, जैकेट, बेसिक शर्ट, ट्राउज़र, स्कर्ट आदि ज़रूर ख़रीदें.
9) वेडिंग या फेस्टिव सीज़न के लिए ज़रूरत से ज़्यादा महंगा आउटफिट ख़रीदना पैसे की बर्बादी है, थोड़ी-सी समझदारी से आप कम बजट में भी ट्रेंडी और गॉर्ज़ियस नज़र आ सकती हैं.
10) ऑनलाइट शॉपिंग करते समय उस चीज़ की कीमत अलग-अलग साइट्स पर चेक कर लें. हो सकता है, दूसरी साइट पर सेल, डिस्काउंट, कूपन आदि के चलते वही चीज़ आपको कम दाम में मिल जाए.
11) विंडो शॉपिंग के बहाने आप अलग-अलग स्टोर्स में जाकर डिस्काउंट या स्पेशल ऑफर के बारे में जानकारी हासिल कर सकती हैं.
12) शॉपिंग करते समय क्रेडिट कार्ड का उपयोग करने की बजाय कैश पेमेंट करें, इससे आप बजट के बाहर शॉपिंग नहीं कर सकेंगी और फिज़ूलख़र्च से बच जाएंगी.
13) ऐसे आउटफिट्स ख़रीदने से बचें, जिन्हें बार-बार ड्राईक्लीन करवाना पड़े.
14) सेल में शॉपिंग करते समय मटेरियल, फैब्रिक और क्वालिटी से समझौता न करें. हर चीज़ अच्छी तरह देख-परखकर ही ख़रीदें.
15) ऐसे लोकल स्टोर्स जहां स्टाइलिश आउटफिट व एक्सेसरीज़ कम दाम में मिल जाते हैं, वहां से शॉपिंग करके आप अपने पैसे बचा सकती हैं.

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Fashion Ideas

कम पैसे में ऐसे खरीदें कैजुअल वेयर
16) जब भी आपके पसंदीदा ब्रांड की सेल लगे, तो कैजुअल वेयर के लिए हॉट पैंट, कार्गो, केप्री, स्कर्ट आदि बॉटम वेयर जरूर खरीद लें. इनके साथ आप कोई भी स्टाइलिश टॉप पहनकर न्यू लुक पा सकती हैं.
17) सेल में कम पैसे में डेनिम की शर्ट, जैकेट, शॉर्ट कुर्ती आदि खरीदकर आप उन्हें कई आउटफिट्स के साथ मिक्स एंड मैच करके पहन सकती हैं.
18) प्लेन टीशर्ट, स्पेगेटी, शर्ट आदि खरीदकर उन्हें जैकेट, स्टोल या फिर ट्रेंडी नेकपीस के साथ पहनकर आप न्यू लुक पा सकती हैं.
19) सेल में बेल्ट, हेयर एक्सेसरीज़, नेकपीस, ईयररिंग, ट्रेंडी शूज़ आदि ज़रूर रखें. ये भी आपके मिक्स एंड मैच फॉर्मूले में बहुत काम आएंगे.

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Fashion Ideas

कम पैसे में ऐसे खरीदें ऑफिस वेयर
20) यदि आप सेल में शॉपिंग कर रही हैं और आपको फॉर्मल आउटफिट ख़रीदने हैं, तो व्हाइट, ब्लैक, बेज, पीच, पिंक आदि कलर की प्लेन शर्ट, ट्राउज़र और स्कर्ट ख़रीद सकती हैं. इन्हें आप मिक्स एंड मैच करके कई बार रिपीट कर सकती हैं.
21) इसी तरह आप ब्लैक, बेज, व्हाइट जैसे बेसिक कलर के ट्रेंडी कलर के बैग और शूज़ ख़रीदकर अपने फॉर्मल कलेक्शन को फैशनेबल बना सकती हैं.
22) ऑफिस में यदि इंडियन वेयर पहनती हैं, तो अलग-अलग कलर की प्लेन लेगिंग्स और कुर्ती को स्टोल, नेकपीस आदि के साथ मिक्स एंड मैच करके रोज़ाना न्यू लुक पाया जा सकता है.
23) इसी तरह ब्लैक, व्हाइट, रेड, ब्लू जैसे रेग्युलर कलर के कुछ ब्लाउज़ सिलवाकर उन्हें कई साड़ियों के साथ पहन सकती हैं.

अभी कुछ दशकों पहले तक हाल यह था कि त्योहारों की आहट सुनाई देते ही घर-परिवार, समाज- हर जगह रौनक़ की झालरें लहराने लगती थीं, ख़ुशी, उमंग और ऊर्जा से भरे चेहरों की चमक व उत्साह यहां-वहां बिखर जाता था. क्या करना है, कहां जाना है, किसे क्या उपहार देने हैं और रसोई में से कितने पकवानों की ख़ुुशबू आनी चाहिए- सबकी सूची बनने लगती थी. महीनों पहले से बाज़ार के चक्कर लगने लगते थे और ख़रीददारी का लंबा सिलसिला  चलता था.

Technology and Relationships

समय बदला, हमारी परंपराओं, संस्कृति और सबसे ज़्यादा हमारी सोच पर तकनीक ने घुसपैठ कर ली. हर समय किसी-न-किसी रूप में तकनीक हमारे साथ रहने लगी और फिर वह हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत बन गई. अब आलम यह है कि त्योहारों का आगमन होता है, तो माहौल में चहल-पहल बेशक दिखाई देती है, पर उसमें से उमंगवाला अंश गायब हो गया है और तनावभरा एक शोर यहां-वहां बिखरा सुनाई देता है. दूसरों से बढ़-चढ़कर दिखावा करने की होड़ ने त्योहारों के महत्व को जैसे कम कर दिया है. त्योहार अब या तो अपना स्टेटस दिखाने के लिए, दूसरों पर रौब जमाने के लिए कि देखो हमने कितना ख़र्च किया है, मनाया जाता है या फिर एक परंपरा निभाने के लिए कि बरसों से ऐसा होता आया है, इसलिए मनाना तो पड़ेगा.

फॉरवर्डेड मैसेजेस का दौर

पहले लोग त्योहारों की शुभकामनाएं अपने मित्र-संबंधियों के घर पर स्वयं जाकर देते थे. बाज़ारवाद के कारण पहले तो इसका स्थान बड़े और महंगे ग्रीटिंग कार्ड्स ने लिया, फिर ई-ग्रीटिंग्स ने उनकी जगह ली. ग्रीटिंग कार्ड या पत्र के माध्यम से अपने हाथ से लिखकर जो बधाई संदेश भेजे जाते थे, उसमें एहसास की ख़ुशबू शामिल होती थी, लेकिन उसकी जगह अब फेसबुक और व्हाट्सऐप पर मैसेज भेजे जाने लगे हैं. ये मैसेज भी किसी के द्वारा फॉरवर्ड किए हुए होते हैं, जो आगे फॉरवर्ड कर दिए जाते हैं. कई बार तो बिना पढ़े ही ये मैसेजेस फॉरवर्ड कर दिए जाते हैं. उनमें न तो कोई भावनाएं होती हैं, न ही भेजनेवाले की असली अभिव्यक्ति. ये तो इंटरनेट से लिए मैसेज ही होते हैं. इसी से पता लगाया जा सकता है कि तकनीक कितनी हावी हो गई है हम पर, जिसने संवेदनाओं को ख़त्म कर दिया है.

रिश्तों की गढ़ती नई परिभाषाएं

परस्पर प्रेम और सद्भाव, सामाजिक समरसता, सहभागिता, मिल-जुलकर उत्सव मनाने की ख़ुुशी, भेदभावरहित सामाजिक शिष्टाचार आदि अनेक ख़ूबियों के साथ पहले त्योहार हमारे जीवन को जीवंत बनाते थे और नीरसता या एकरसता को दूर कर स्फूर्ति और उत्साह का संचार करते थे, पर आजकल परिवार के टूटते एकलवाद तथा बाज़ारवाद ने त्योहारों के स्वरूप को केवल बदला नहीं, बल्कि विकृत कर दिया है. सचमुच त्योहारों ने संवेदनशील लोगों के दिलों को भारी टीस पहुंचाना शुरू कर दिया है.

सोशल मीडिया के ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल ने जहां हमारी एकाग्रता को भंग किया है, वहीं सामाजिकता की धज्जियां उड़ा दी हैं. फोन कर बधाई देना भी अब जैसे आउटडेटेड हो गया है. बेवजह क्यों किसी को फोन कर डिस्टर्ब किया जाए, इस सोच ने मैसेज करने की प्रवृत्ति को बढ़ाकर सामाजिकता की अवधारणा पर ही प्रहार कर दिया है. लोगों का मिलना-जुलना जो त्योहारों के माध्यम से बढ़ जाता था, उस पर विराम लग गया है. ज़ाहिर है जब सोशल मीडिया बात कहने का ज़रिया बन गया है, तो रिश्तों की संस्कृति भी नए सिरे से परिभाषित हो रही है.

हो गई है सामाजिकता ख़त्म

‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’, यह वाक्य हमें बचपन से रटाया गया, परंतु तकनीक ने शायद अब हमें असामाजिक बना दिया है. सोशल मीडिया के बढ़ते वर्चस्व ने मनुष्य की सामाजिकता को ख़त्म कर दिया है. देखा जाए, तो सोशल मीडिया आज की ज़िंदगी की सबसे बड़ी ज़रूरत बन गया है. व्हाट्सऐप, ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम और न जाने क्या-क्या? स़िर्फ एक टच पर दुनिया के इस हिस्से से उस हिस्से में पहुंचा जा सकता है. देश-दुनिया की दूरियां सिमट गई हैं, लेकिन रिश्तों में दूरियां आ गई हैं.

संवादहीनता और अपनी बात शेयर न करने से आपसी जुड़ाव कम हो गया है और इसका असर त्योहारों पर पड़ा है. माना जाता था कि त्योहारों पर सारे गिले-शिकवे दूर हो जाते थे. एक-दूसरे से गले मिलकर, मिठाई खिलाकर मन की सारी कड़वाहट ख़त्म हो जाती थी. पर अब किसी के घर जाना समय की बर्बादी लगने लगा है, इसलिए बहुत ज़रूरी है तो ऑनलाइन गिफ़्ट ख़रीद कर भेज दिया जाता है.

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Technology and Relationships
रसोई से नहीं उठती ख़ुशबू

आजकल प्रत्येक क्षेत्र में बाज़ारवाद हावी हो रहा है. इस बनावटी माहौल में भावनाएं गौण हो गई हैं. ऑनलाइन संस्कृति ने अपने हाथों से उपहार को सजाकर, उसे स्नेह के धागे से बांधकर और अपनी प्यार की सौग़ात के रूप में अपने हाथों से देने की परंपरा को पीछे धकेल दिया है. बाज़ार में इतने विकल्प मौजूद हैं कि ख़ुद कुछ करने की क्या ज़रूरत है.

एक समय था कि त्योहारों पर घर में न जाने कितने तरह के पकवान बनाए जाते थे. न जाने कितने नाते-रिश्तेदारों के लिए लड्डू, मठरी, नमकपारे, नमकीन, बर्फी, गुलाब जामुन और न जाने कितने डिब्बे पैक होते थे और यह भी तय किया जाता था कि कौन किसके घर जाएगा.

पर एकल परिवारों ने त्योहारों की रौनक़ को अलग ही दिशा दे दी. महंगाई की वजह से त्योहार फ़िज़ूलख़र्ची के दायरे में आ गए हैं. ऐसे में मिठाइयां या अन्य चीज़ें बनाने का कोई औचित्य दिखाई नहीं पड़ता. पहले के दौर में संयुक्त परिवार हुआ करते थे और घर की सारी महिलाएं मिलकर पकवान घर पर ही बना लिया करती थीं. लेकिन अब न लोगों के पास इन सबके लिए व़क्त है और न ही आज की हेल्थ कॉन्शियस पीढ़ी को वह पारंपरिक मिठाइयां पसंद ही आती हैं.

कोई घर पर आ जाता है, तो झट से ऑनलाइन खाना ऑर्डर कर उनकी आवभगत करने की औपचारिकता को पूरा कर लिया जाता है. कौन झंझट करे खाना बनाने का. यह सोच हम पर इसीलिए हावी हो पाई है, क्योंकि तकनीक ने जीवन को आसान बना दिया है. बस फ़ोन पर एक ऐप डाउनलोड करने की ही तो बात है. फिर खाना क्या, गिफ़्ट क्या, घर को सजाने का सामान भी मिल जाएगा और घर आकर लोग आपका हर काम भी कर देंगे. यहां तक कि पूजा भी ऑनलाइन कर सकते हैं. डाक से प्रसाद भी आपके घर पहुंच जाएगा. हो गया फेस्टिवल सेलिब्रेशन- कोई थकान नहीं हुई, कोई तैयारी नहीं करनी पड़ी- तकनीक के एहसास ने मन को झंकृत कर दिया. बाज़ार से आई मिठाइयों ने मुंह का स्वाद बदल दिया और बाज़ारवाद ने उपहारों की व्यवस्था कर रिश्तों को एक साल तक और सहेजकर रख दिया- नहीं हैं इनमें जुड़ाव का कोई अंश तो क्या हुआ, एक मैसेज जगमगाते दीयों का और भेज देंगे और त्योहार मना लेंगे.

– सुमन बाजपेयी

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शॉपिंग (Shopping) करने के तरीके से आप अपनी और दूसरों की पर्सनैलिटी का राज़ जान सकते हैं. शॉपिंग करना किसे अच्छा नहीं लगता, लेकिन सबका शॉपिंग करने का तरीका अलग होता है. शॉपिंग करने के अंदाज़ से ये आसानी से जाना जा सकता है कि उस व्याक्ति की पर्सनैलिटी कैसी है. आप भी जानें अपनी शॉपिंग पर्सनैलिटी (Shopping Personality).

Shopping Tips

क्या है आपकी शॉपिंग पर्सनैलिटी?

1) नॉर्मल शॉपर्स
नॉर्मल शॉपर्स ख़रीददारी के लिए ख़र्च तो करते हैं, साथ ही फ्यूचर के लिए सेंविंग भी करते हैं. आमतौर पर ये बहुत सारी चीज़ें एक साथ नहीं ख़दीदते, बल्कि बचत करके एक-एक चीज़ ख़रीदते हैं. अगर आप भी नॉर्मल शॉपर हैं, तो ये अच्छी बात है. बिना सोचे-समझे शॉपिंग करना समझदारी नहीं है.

2) न्यूरोटिक शॉपर्स
ये अमूमन विडों शॉपर्स होते हैं.ये ख़रीददारी पर कम और चीज़ें देखने में ़ज़्यादा समय बर्बाद करते हैं. इस तरह के शॉपर्स आपको मॉल्स या मार्केट में अक्सर दिख जाएंगे. ये हर चीज़ की कीमत पूछते हैं, उसे उलट-पलटकर देखते हैं, कई बार दुकानदार से उसके बारे में जानकारी भी हासिल करते हैं और चीज़ ख़रीदे बिना ही आगे बढ़ जाते हैं. ऐसे लोगों के साथ शॉपिंग करने जाना आसान काम नहीं है. अगर आपके पास बहुत सारा फ्री टाइम है, तो ही आप इनके साथ शॉपिंग के लिए जाएं.

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Shopping Tips

3) प्रिमिटिव शॉपर्स
इन्हें शॉपिंग करना बहुत ज़्यादा पसंद होता है. अगर इन्हें कोई चीज़ पसंद है तो ये उसे ख़रीद कर ही दम लेते हैं. ऐसे लोगों को हर चीज़ अच्छी लगती है और ये उसे ख़रीद लेना चाहते हैं. ऐसे लोग अपना तनाव दूर करने के लिए भी शॉपिंग का ही सहारा लेते हैं. ऐसे लोग अक्सर गैरजरूरी शॉपिंग भी कर लेते हैं.

4) साइकॉटिक शॉपर्स
ये बिना सोचे-समझे शॉपिंग करने वाले लोग होते हैं. ऐसे लोग शॉपिंग पर हद से ़ज़्यादा खर्च कर देते हैं. शॉपिंग के दीवाने ऐसे लोग कई बार गंभीर फायनेंशियल प्रॉब्लम में भी फंस जाते हैं. यदि आप भी साइकॉटिक शॉपर हैं, तो अपनी शॉपिंग की लत पर लगाम लगाएं. शॉपिंग से ध्यान हटाने के लिए अपने किसी शौक पर समय खर्च करें, ताकि आपका ध्यान शॉपिंग की तरफ न जाए. जो लोग ज्यादा शॉपिंग करते हैं, उनकी संगत से दूर रहें और जितनी ज़रूरत हो उतनी ही शॉपिंग करें.

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Shopping Tips

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ज़्यादातर पैरेंट्स मानते हैं कि जब तक बच्चे उछलकूद करने लायक नहीं हो जाते, उन्हें साथ लेकर घूमना-फिरना आसान होता है, लेकिन एक्सपर्ट्स इस धारणा से सहमत नहीं. वे मानते हैं कि नवजात शिशु के साथ बाहर जाने पर अपेक्षाकृत ज़्यादा सावधानी बरतनी चाहिए. छोटे बच्चों को किन जगहों पर ले जाना ठीक नहीं और उन्हें ले जाते समय क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

 

पिक्चर हॉलः अपने छोटे बच्चे के साथ पहली बार फ़िल्म देखने जाते समय अक्सर मांओं को लगता है कि पिक्चर हॉल में अंधेरा होता है, इसलिए बच्चे को आराम से नींद आ जाएगी और वे इत्मिनान से फ़िल्म देख सकेंगी.
एक्सपर्ट्स कहते हैं- यह धारणा बिल्कुल ग़लत है. घर में वैक्यूम क्लीनर, मिक्सर आदि की आवाज़ ही जब छोटे बच्चे को परेशान कर देती है, तो अंदाज़ा लगाइए कि थियेटर का तेज़ साउंड बच्चे को कितना बेचैन करेगा. एक्सपर्ट्स के अनुसार, 90 डेसीबल या उससे तेज़ आवाज़ बच्चे की सुनने की शक्ति पर बुरा प्रभाव डालती है. आजकल तो बच्चों की फ़िल्मों में भी 130 डेसीबल तक का साउंड होता है. ऐसे में बच्चे का रोना लाज़मी है, जिससे आपके साथ-साथ आपके आसपास बैठे दर्शकों को भी परेशानी होती है.

क्या करें?

* छोटे बच्चे के साथ थियेटर जाने से परहेज़ करें. फ़िल्म की डीवीडी आने का इंतज़ार करें.

* अगर फ़िल्म देखने की बहुत इच्छा हो रही हो तो बच्चे की सेहत को ध्यान में रखते हुए ऐक्शन और स्पेशल इ़फेक्ट वाली फ़िल्मों के बजाय डायलॉग बेस्ड फ़िल्म देखें.

* इससे बच्चे को कम परेशानी होगी. हो सके तो थियेटर में पीछे व कोने की सीट की टिकट ख़रीदें, ताकि ज़रूरत पड़ने पर बच्चे को लेकर आसानी से बाहर निकला जा सके.

शॉपिंग: बच्चे व अपने लिए नए कपड़े या अन्य सामान ख़रीदने के लिए अक्सर महिलाएं नवजात शिशु को स्ट्रॉलर में लिटाकर शॉपिंग के लिए निकल पड़ती हैं.
एक्सपर्ट्स कहते हैं- छोटे बच्चे के साथ शॉपिंग करने में कोई बुराई नहीं है. हां, इसके लिए थोड़ी प्लानिंग ज़रूर करनी चाहिए.

क्या करें?
* ऐसे मॉल का चुनाव करें जहां भरपूर खुली जगह हो और ड्रेसिंग रूम भी बड़ा हो, ताकि ज़रूरत पड़ने पर बच्चेे के कपड़े, डायपर आदि आसानी से बदले जा सकें.

* बच्चे के साथ पहली बार शॉपिंग थोड़ी मुश्किल हो सकती है, लेकिन इससे घबराएं नहीं.

* दो-तीन बार साथ जाने के बाद आपको अंदाज़ा हो जाएगा कि बच्चा कितनी देर तक उस माहौल को एंजॉय करता है और कितनी देर बाद रोना शुरू कर देता है.

* शॉपिंग के दौरान ही अगर बच्चा रोना शुरू कर दे और उसके चुप होने के आसार नज़र न आएं तो मां के लिए घर लौटने में ही भलाई है.

शादी का फंक्शनः पैरेंट्स सोचते हैं कि बच्चे को परिवार के सभी सदस्यों और दोस्तों को दिखाने का इससे अच्छा मौक़ा हो ही नहीं सकता.
एक्सपर्ट्स कहते हैं- शादी-ब्याह के घर में चहल-पहल और हंसी-मज़ाक होना आम बात है. ऐसा माहौल बच्चे को रास नहीं आता और वो परेशान होने लगता है. साथ ही क़रीबी रिश्तेदार बच्चे को गोद में लेकर किस (चुंबन) करते रहते हैं. इससे न स़िर्फ बच्चे को इंफेक्शन का ख़तरा रहता है, बल्कि इतने सारे अनजान चेहरे देखकर वह डर भी सकता है.

क्या करें?

* बच्चे के साथ बहुत ज़रूरी फंक्शन में ही जाएं.

* साथ ही खुले मैदान में होने वाले फंक्शन में जाने से परहेज़ करें.

* घर में होने वाले फंक्शन में जाएं, ताकि ज़रूरत पड़ने पर बच्चे को लेकर अलग रूम में जाया जा सके.

* अगर समय या मौसम बच्चे के अनुकूल नहीं है तो अकेले जाने के बजाय साथ में किसी और को भी ले जाएं, जो बच्चे की देखभाल में मदद कर सके.

रेस्टॉरेंटः अधिकतर पैरेंट्स को लगता है कि बच्चे के मुंह में दूध की बोतल डालकर परिवार या दोस्तों के साथ आराम से बातें करते हुए खाने का लुत्फ़ उठाया जा सकता है.
एक्सपर्ट्स कहते हैं- रेस्टॉरेंट के शोरगुल भरे माहौल और खाने की महक के कारण अक्सर बच्चा बेचैन होकर रोने लगता है.

क्या करें?
* रेस्टॉरेंट जाने का मन है तो कम भीड़भाड़ वाले समय में जाएं.

* बच्चे का खिलौना साथ रखना न भूलें. नॉर्मल चेयर के बजाय थोड़ी गद्देदार कुर्सी पर बैठें.

* ऐसा खाना ऑर्डर करें जिसे एक हाथ से आसानी से खाया जा सके, ताकि दूसरे हाथ से बच्चे को पकड़ कर रखा जा सके.

* हो सके तो रेस्टॉरेंट जाने से पहले फ़ोन पर मैनेजर से पूछ लें कि छोटे बच्चों के लिए वह जगह उपयुक्तहै या नहीं.

– अमज़द हुसैन अंसारी

अन्य पेरेंटिंग संबंधित जानकारी अथवा टिप्स के लिए यहाँ क्लिक करे – Parenting Tips

स्वस्थ रहने की शुरुआत होती है, हेल्दी शॉपिंग के साथ. बड़ा आसान-सा फिटनेस मंत्र है कि हेल्दी खरीदेंगे, तो हेल्दी खाएंगे. सुपरमार्केट जाने से पहले तैयार कीजिए सेहतभरी एक लिस्ट और अपनी शॉपिंग को बनाइए आसान और स्वस्थ.healthy grocery shopping

 

शॉपिंग की योजना बनाएं

– शॉपिंग पर जाने से पहले क्या ख़रीदना है, कितना ख़रीदना है, यह तय करना ज़रूरी है. इसलिए आराम से बैठकर एक लिस्ट तैयार कर लें.
– शॉपिंग की सूची में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन्स, मिनरल्स, लो फैट डेयरी प्रोडक्ट्स, फल, हरी सब्ज़ियों आदि को जगह दें.
– जो लिस्ट बनाई है, उस पर कायम रहें, ताकि शॉपिंग के दौरान आपका समय बचे और आप कंफ्यूज़ न हों.

शॉपिंग पर जाने से पहले

– हेल्दी शॉपिंग का पहला रूल है कि कभी भी भूखे पेट शॉपिंग करने न जाएं.
– एक रिसर्च के मुताबिक़, जो भूखे पेट शॉपिंग करते हैं, वो ज़रूरत से ज़्यादा सामान ख़रीद लेते हैं, जिनमें ज़्यादातर जंक फूड्स होते हैं.
– सवाल उठता है, क्या खाकर शॉपिंग करें? इसका जवाब ये है कि जब कुछ खाना ही है, तो क्यों न कुछ लाइट और पौष्टिक खाएं, जैसे- फल.
– विदेश में हुई एक स्टडी की मानें, तो जो पौष्टिक चीज़ें खाकर शॉपिंग करते हैं, उनकी ट्रॉली में सेहदमंद आहार ज़्यादा नज़र आता है.
– बच्चों को साथ न ले जाएं. बच्चे आपको जंक फूड की ओर खींचेंगे और मजबूरन आपको कुछ न कुछ ख़रीदना पड़ेगा.
– अपने साथ किसी ऐसी सहेली को ले जा सकती हैं, जो फिटनेस फ्रीक हो. वह आपको सही और पौष्टिक खाद्य पदार्थ चुनने में मदद कर सकती है.

शॉपिंग मॉल में

– शॉपिंग मॉल में अपनी ट्रॉली के साथ पहले एक चक्कर लगाएं, ताकि आपको पता हो कौन-सी चीज़ कहां मिल रही है? और किस पर क्या ऑफर चल रहा है?
– इसी बहाने आपकी अच्छी-ख़ासी वॉक भी हो जाएगी.
– एक पर एक फ्री के चक्कर में न पड़ें. ऐसे ऑफर्स अक्सर जंक फूड्स पर होते हैं. फ्री के चक्कर में आप जंक फूड घर ले आएंगी.
– सस्ता ख़रीदने के चक्कर में गुणवत्ता से समझौता न करें.
– रंग-बिरंगी ताज़ी सब्ज़ियां और हर तरह के फल ख़रीदें. रंगीन होने की वजह से ये फाइटोन्यूट्रिशियन से भरपूर होते हैं, जो कैंसर और दिल की बीमारी से बचाता है.
– हरी सब्ज़ियों को भी ट्रॉली में ख़ास जगह दें, क्योंकि इनमें मिनरल, विटामिन्स और एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो दिल की बीमारी से बचाने में सहायक होते हैं.
– प्रोटीन के लिए अंडा, ताज़ी मछली और बिना स्किनवाला चिकन अच्छा ऑप्शन है.
– होल ग्रेन से बने ब्रेड, पिज़्ज़ा, पास्ता, सीरियल्स ख़रीदें.
– गेहूं, चावल के साथ अलग-अलग तरह की दालें ख़रीदें. वैसे नॉर्मल चावल की जगह बजट के अनुसार ब्राउन राइस भी ख़रीदा जा सकता है.
– कैल्शियम, विटामिन डी के लिए डेयरी प्रोडक्ट्स ख़रीदना आवश्यक है. मार्केट में आजकल लो फैट डेयरी प्रोडक्ट्स भी उपलब्ध हैं, जैसे- 1% या 2% फैट स्कीम मिल्क, लो फैट चीज़, बटर, पनीर आदि.
– वेजीटेबल ऑयल, जैसे- कैनोला, जैतून या सरसों का तेल ख़रीदें, इसमें मोनोअनसैचुरेडेट फैट्स भरपूर मात्रा में होता है.
– अगर कोई पैक्ड फूड ख़रीद रही हों, तो एक्सपायरी डेट चेक कर लें.
– खाद्य पदार्थ पर लिखे न्यूट्रिशनल लेवल को ज़रूर पढ़ लें.
– पैकेट पर उसमें मौजूद कार्बोहाइड्रेट, कैलोरी, फैट्स, शुगर, सोडियम से संबंधित जानकारियां लिखी होती हैं.
– कई प्रोडक्ट्स पर फैट फ्री लिखा होता है, लेकिन इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि वह कैलोरी फ्री भी होगा. कई बार ऐसे प्रोडक्ट्स में कैलोरी और शुगर की मात्रा ज़्यादा हो सकती है.
– प्रीज़र्व्ड, फ्रोज़न, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ से दूरी बनाएं, क्योंकि इनमें शक्कर और नमक ज़रूरत से ज़्यादा मात्रा में होते हैं.
– हाई कैलोरीवाले सॉफ्ट ड्रिंक्स, पेस्ट्रीज़, केक्स, फ्राइड फूड, फ्रूट फ्लेवर्ड ड्रिंक्स न ही ख़रीदें, तो बेहतर होगा.
– कैश काउंटर के पास जाकर भी ख़ुद पर संयम रखें और वहां रखी हुई चॉकलेट्स, चिप्स न ख़रीदें.
– आकर्षक पैकिंग से कतई प्रभावित न हों.

रोचक जानकारियां

  • यूरोप में हुए एक रिसर्च में ये बात सामने आई है कि सालभर में महिलाएं शॉपिंग करके लगभग 48000 तक कैलोरी कम कर लेती हैं.
  • हेल्दी शॉपिंग के लिए प्लास्टिक की थैलियों के बजाय कपड़े की थैली का इस्तेमाल करें. रिसाइकल न हो पाने की वजह से प्लास्टिक की थैलियां बढ़ती जा रही हैं. इन थैलियों को जब कचरे के साथ जलाया जाता है, तो इसमें से एक्रेलिमाइट जैसे तत्व निकलते हैं, जो कैंसर का कारण बन सकते हैं. वैसे भी 1 जनवरी 2015 से 40 माइक्रोन से कम की पॉलिथीन बैन कर दी गई है.