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कहानी- मैंने तो पहले ही कहा था… (Short Story- Main To Pahle Hi Kaha Tha…)

मंगला को समझ में नहीं आया कि ये अचानक शांता को क्या हो गया? मंगला ने रमेशजी से शांता के पत्र की चर्चा की. रमेशजी ने वही पुराना वाक्य दुहरा दिया, “मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि इस झमेले में मत पड़ो. अब भुगतो अपनी भलाई का परिणाम.”

रमेशजी के पास समस्या का हल न पाकर मंगला भागी-भागी हर्ष के घर पहुंची. उसने हर्ष की मां से इस बारे में चर्चा की.

Short Story- Main To Pahle Hi Kaha Tha

“चलो, अंत भला तो सब भला! अब तो तुम्हारी जान में जान आई होगी.” रमेशजी ने मंगला से कहा.

‘हूं!’ मंगला के मुंह से इससे अधिक और कुछ नहीं निकला. उसे बस रुलाई फूट रही थी. उसे लगा कि आज ये कितने आराम से कह रहे हैं कि अब तो तुम्हारी जान में जान आई होगी, कल तक तो ये भी मुझे ही ताना दे रहे थे.

“अरे-अरे, तुम रोने क्यों लगी? अब तो सब कुछ ठीक हो गया. अब रोने का क्या कारण?” रमेशजी ने चकित होते हुए मंगला से पूछा.

“कल तक तो आप भी मुझे ही दोष दे रहे थे.” मंगला के मन का क्षोभ आख़िर शब्दों के रूप में सामने आ ही गया.

“ओह, तो ये बात है. ठीक है-ठीक है, कल तक मैं ग़लत था और तुम सही थीं. लो, मान ली मैंने अपनी ग़लती. चलो, अब आंसू पोंछो.” रमेशजी ने मुस्कुराते हुए कहा. फिर वे मंगला के पास बैठते हुए बोले, “सचमुच, तुमने बहुत समझदारी से सब कुछ संभाल लिया, वरना मैं तो समझता था कि इस मामले में अब कुछ नहीं हो सकता.”

ये प्रशंसा थी या सांत्वना, मंगला तय नहीं कर पाई, लेकिन उसने भी बात को आगे खींचना उचित नहीं समझा. दूसरों के कारण पिछले एक माह से घर में जो तनाव चल रहा था, आज उसके समाप्त हो जाने पर उसकी चर्चा दोहराने से क्या लाभ.

“आप बैठिए, मैं आपके लिए चाय बना कर लाती हूं.” मंगला रसोई की ओर जाने के लिए उठ खड़ी हुई.

“नहीं, तुम बैठो. चाय बनाकर मैं लाता हूं.” रमेशजी ने मंगला का हाथ पकड़ कर उसे वापस सो़फे पर बिठाते हुए कहा और वे स्वयं उठ खड़े हुए. मंगला ने प्रतिवाद नहीं किया. वह चुपचाप सो़फे पर बैठ गई.

रमेशजी के जाते ही मंगला के मानस पर विगत एक माह का घटनाक्रम चलचित्र की भांति घूमने लगा. उफ़! कितनी निर्लज्जता के साथ शांता ने दोषारोपण किया था मंगला पर.

“अपनी बेटियों को तो अच्छे-अच्छे घरों में ब्याह दिया और हमारी बेटी के लिए ऐसा नरक चुना. शरम नहीं आई तुम्हें ऐसा करते हुए.” फिर कोसने की मुद्रा में उंगलियां चटकाती हुई बोली थी, “तुम्हारी बेटियां भी सुख से नहीं रह सकेंगी, मंगला! ये मेरा श्राप है, श्राप!”

शांता की बात सुन कर मंगला फूट-फूटकर रो पड़ी थी. उसके लिए कोई कुछ भी बुरा-भला कहे, वह हंसकर सुन सकती है, लेकिन बेटियों के लिए वह बुराई का एक भी शब्द सहन नहीं कर सकती. रो-रोकर उसके सीने में दर्द होने लगा था. मगर शांता को न चुप होना था और न वह चुप हुई. जी भर कर अनाप-शनाप बकती रही. शाम को जब रमेशजी द़फ़्तर से घर आए, तो वे भी शांता का रौद्र रूप देखकर सकते में आ गए. मंगला ने अलग ले जाकर उन्हें सारी बात बताई. मंगला की बात सुनते ही वे बोले, “और करो भलाई के काम. इसी को कहते हैं होम करते हाथ जलना. मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि तुम इस झमेले में मत पड़ो, लेकिन तुम्हें तो उस समय शांता की बेटी का घर बसाने की धुन थी. अब तुम्हीं सुनो उसकी सत्रह बातें.”

कहां तो मंगला को आशा थी कि रमेशजी उसकी मदद करेंगे. उसे कोई रास्ता सुझाएंगे, लेकिन रमेशजी ने तो पल्ला ही झाड़ दिया. ऊपर से उसी को दोषी ठहराया. जबकि देखा जाए तो मंगला का इसमें कोई दोष था ही नहीं. किसी का घर बसाना क्या कोई अपराध है?

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मंगला इस झमेले में पड़ती भी नहीं अगर शांता ने उसे रो-रोकर अपना दुखड़ा न सुनाया होता. शांता रिश्ते में मंगला की फुफेरी बहन लगती थी. यह रिश्ता बहुत निकट का तो नहीं था, लेकिन सहृदया मंगला की आदत है कि वह दूसरों के दुख से जल्दी द्रवित हो उठती है. शांता ने उसे बताया कि उसकी बेटी कुशा के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा है. वह एमए कर चुकी है. अपना स्वयं का ब्यूटीपार्लर चला रही है. फिर भी दहेज की लम्बी-चौड़ी मांगें कुशा के ब्याह के रास्ते में रोड़ा बनी हुई हैं.

“तुम अपने आसपास का कोई लड़का देखो ना. तुम लोगों का तो अच्छा रुतबा है, शायद यहां बात बन जाए. हम तो अपने शहर में क्या, अपने प्रदेश में भी लड़का ढूंढ़ चुके, लेकिन बात नहीं बन रही है. लड़की की बढ़ती उम्र देख-देख कर रात को नींद नहीं आती.” शांता ने चिरौरी करते हुए कहा था.

“ठीक है, मैं देखूंगी, मगर एक बात है….”

“क्या बात?” शांता ने चिंतित होकर पूछा था.

“कुशा बड़े शहर में पली-बढ़ी है और ये शहर कस्बाई है. यहां और वहां के रहन-सहन में बहुत अंतर है. कुशा को कहीं परेशानी न हो यहां रहने में.” मंगला ने कहा था.

“अरे नहीं, तुम इस बारे में ज़रा भी चिंता मत करो. हमारी कुशा बड़ी व्यवहारकुशल है. वह हर माहौल में तालमेल बिठा लेती है. तुम तो बस, उसकी नैय्या पार लगा दो.” शांता ने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा था.

उस दिन के बाद से मंगला ने कुशा के विवाह कराने का मानो बीड़ा उठा लिया. रमेशजी ने उसे टोका भी था, “मेरे विचार से तो तुम इस झमेले में मत पड़ो. शांता का स्वभाव यूं भी तीखा है, अगर कल को कुछ ऊंच-नीच हो गई तो तुम्हें दोष देगी.”

रमेशजी ने मानो भविष्यवाणी कर दी थी, किन्तु उस समय मंगला को क्या पता था कि उसे क्या-क्या भुगतना पड़ेगा. मंगला ने रमेशजी के साढू के एक दूर के रिश्तेदार के लड़के को कुशा के लिए ढूंढ़ ही निकाला. लड़के का नाम था हर्ष. उसने व्यावसायिक शिक्षा में उपाधि ले रखी थी, किन्तु फ़िलहाल उसके पास कोई अच्छी नौकरी नहीं थी. वह एक निजी मिल में फिटर का काम करता था. हर्ष के भाई-बहनों का विवाह हो चुका था. उस पर अपने माता-पिता के अतिरिक्त और कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी. वे लोग लालची भी नहीं थे. उन्होंने दहेज लेने से साफ़ मना कर दिया था. मंगला को लगा कि हर्ष की पत्नी बनकर कुशा बहुत ख़ुश रहेगी. मंगला ने जब इस रिश्ते की बात रमेशजी को बताई, तो उन्होंने एक बार फिर मंगला को समझाया.

“ठीक है कि तुमने कुशा के लिए लड़का ढूंढ़ लिया है, लेकिन अंतिम निर्णय शांता को ही लेने दो. तुम तो बस, बिना कुछ छिपाए सब कुछ साफ़-साफ़ बता दो. आगे उनकी मर्ज़ी.”

“हां-हां, मैं सब कुछ बता दूंगी, भला मुझे किसी से कुछ छिपाकर क्या करना है? लेकिन देख लेना, शांता को यह रिश्ता पहली नज़र में ही पसंद आ जाएगा.” उत्साह से भरी हुई मंगला बोल उठी थी.

हुआ भी वही. शांता को रिश्ता पसंद आ गया. कुशा और हर्ष ने भी एक-दूसरे को पसंद कर लिया. शीघ्र ही मुहूर्त निकल आया और कुशा और हर्ष विवाह बंधन में बंध गए. रमेशजी ने भी अपने सारे संदेहों को किनारे करके विवाह के अवसर पर बढ़-चढ़ कर हाथ बंटाया.

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था. पिछले माह मंगला को पता चला था कि कुशा के पांव भारी हैं और वह अपने मायके गई है. कुशा के सुखी जीवन के बारे में जान कर मंगला को अजीब-सा सुकून मिलता. उसे लगता कि उसने अपनी बेटियों की भांति एक और लड़की का जीवन संवारा है. किन्तु एक दिन शांता का पत्र पाकर मंगला अवाक रह गई. शांता ने मंगला पर आरोप लगाते हुए लिखा था कि उसने हर्ष के साथ ब्याह कराकर कुशा का जीवन बर्बाद कर दिया. वह अगर कुशा को सुखी नहीं देखना चाहती थी तो उसने कुशा को ज़हर क्यों नहीं दे दिया, ऐसे जीवनभर का नरक क्यों गले मढ़ दिया? इत्यादि-इत्यादि.

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मंगला को समझ में नहीं आया कि ये अचानक शांता को क्या हो गया? मंगला ने रमेशजी से शांता के पत्र की चर्चा की. रमेशजी ने वही पुराना वाक्य दुहरा दिया, “मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि इस झमेले में मत पड़ो. अब भुगतो अपनी भलाई का परिणाम.”

रमेशजी के पास समस्या का हल न पाकर मंगला भागी-भागी हर्ष के घर पहुंची. उसने हर्ष की मां से इस बारे में चर्चा की.

“अब हम तुम्हें क्या दोष दें मंगला बहन! तुमने तो भले का ही विचार किया होगा, लेकिन इतना तो कहना ही पड़ेगा कि तुमने लड़की के बारे में हमें ठीक-ठीक नहीं बताया.” हर्ष की मां ने कोमल शब्दों में ही सही, लेकिन दोषी मंगला को ही ठहराया.

“लेकिन हुआ क्या?” मंगला ने चिंतित होते हुए पूछा.

“वह लड़की यहां तालमेल नहीं बिठा पा रही है. हम ठहरे मध्यमवर्गीय, उसके जैसी फारवर्ड लड़की को हम भी कहां तक सहन करें.” हर्ष की मां ने अपनी बेचारगी प्रकट करते हुए कहा.

“यह तो मैंने पहले ही बताया था कि कुशा बड़े शहर में पली-बढ़ी है. हो सकता है कि उसे यहां के तौर-तरी़के अपनाने में थोड़ा समय लगे.” मंगला ने याद दिलाया.

“हां, कहा तो था, लेकिन अब तो वह यहां आना ही नहीं चाहती है. हर्ष गया था उसे और अपनी बेटी को लेने, मगर उसने आने से मना कर दिया.” हर्ष की मां ने बताया.

“क्या? कुशा को बेटी हुई है! अरे वाह!” मंगला ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की.

“इसमें अच्छा क्या है? उसे तो अब यहां आना ही नहीं है.” हर्ष की मां ने ठंडे स्वर में कहा.

मंगला को हर्ष की मां का यह भाव रुचिकर नहीं लगा.

सप्ताह भर बाद शांता का एक और पत्र आ गया. उसमें भी उसने मंगला को उल्टा-सीधा लिखा था और कुशा का जीवन बर्बाद करने का दोषारोपण किया था. इस प्रकार दोनों पक्षों की ओर से बार-बार दोषारोपण किए जाने से मंगला का हृदय आहत होने लगा. उसने तो ऐसा स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि कुशा अथवा हर्ष को अपने जीवन में कोई दुख झेलना पड़े.

अभी तीन दिन पहले शांता और कुशा अपनी नन्हीं बेटी सहित आ धमकी थी.

“तुमने ही ये आग लगाई है, अब तुम्हीं इसे बुझाओ. मेरी कुशा एक पल के लिए भी उस घर में नहीं रहेगी. ये हैं तलाक़ के काग़ज़ात, इन पर तुम हर्ष के हस्ताक्षर करा कर लाओ.” शांता ने मंगला पर मानसिक दबाव डालते हुए कहा.

शांता की बात सुनकर मंगला घबरा गई. उसने एक बार फिर रमेशजी से इस बारे में चर्चा की.

“मामला तो सचमुच गंभीर हो चला है. ठीक है, देखता हूं मैं.” रमेशजी ने मंगला को धीरज बंधाते हुए कहा. किन्तु उसी दिन उन्हें दौरे पर तीन दिन के लिए बाहर जाना पड़ गया.

“जैसे भी हो, ये तीन दिन टाल-मटोल करती रहना. फिर मैं लौटकर देखूंगा कि क्या हो सकता है… वैसे मैंने तो पहले ही कहा था…” रमेशजी ने जाते-जाते मंगला को समझाया भी था और उलाहना भी दे डाला था.

रमेशजी के उलाहने सुनकर मंगला को ताव आ गया कि अब चाहे जो भी हो, इस मामले को वह ख़ुद ही हल करेगी. यह निश्चय करने के बाद उसने पूरे मामले पर एक बार फिर दृष्टिपात किया. उसे लगा कि उसने अभी तक कुशा की मां और हर्ष की मां की बातें सुनी हैं, उसने कुशा या हर्ष से तो बात ही नहीं की. आख़िर वे लोग क्या चाहते हैं?

मंगला ने शाम के समय शांता, उसके पति और कुशा से बात करने का निश्चय किया. उसी समय उसने हर्ष और उसके माता-पिता को भी बुला लिया. सभी लोगों के इकट्ठा होने पर पहले तो विवाद की स्थिति निर्मित होने लगी, लेकिन तब मंगला ने कठोरता से काम लिया.

“आप लोग बहुत बोल चुके हैं, कृपया, अब आप लोग बीच में न बोलें.” मंगला ने कठोर स्वर में शांता और हर्ष की मां को डांटते हुए कहा.

“कुशा, क्या तुम अपनी ससुराल में दुखी हो?” मंगला ने कुशा से पूछा.

“नहीं तो.” कुशा ने उत्तर दिया.

“लेकिन तुम्हारी मां का तो कहना है कि तुम ससुराल में ख़ुश नहीं हो.” मंगला ने फिर कहा.

“नहीं, ऐसा कुछ नहीं है….बात दरअसल ये है कि मां मुझसे पूछती रहती हैं कि हर्ष मुझे घुमाने ले जाते हैं कि नहीं या हर्ष कितने बजे घर लौटते हैं… मैंने मां को बताया कि इनकी ड्यूटी का समय बदलता रहता है, इसलिए रोज़ घूमने नहीं जा पाते हैं. कई बार ये देर से घर लौटते हैं और तब हम साथ में खाना खाते हैं. शायद इसी से मां को लगा होगा कि मैं ख़ुश नहीं हूं.” कुशा ने कहा.

“तो फिर तुम तलाक़ क्यों लेना चाहती हो?” मंगला ने पूछा.

“मैं कहां लेना चाहती हूं…ये तो हर्ष चाहते हैं, मुझसे अलग होना.” कुशा के स्वर में पीड़ा का भाव उभर आया.

“क्या बात है हर्ष? क्या तुम्हें कुशा अच्छी नहीं लगती? या तुम्हें इसके व्यवहार से कष्ट पहुंचता है?” मंगला ने अब हर्ष से पूछा.

“नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है. मुझे कुशा से कोई शिकायत नहीं है.” हर्ष ने दृढ़तापूर्वक कहा. वह आगे बोला, “मैंने तो कुशा से तलाक़ लेने के बारे में कभी सोचा भी नहीं, बल्कि मैं तो ये सोचकर चकित था कि कुशा मेरे साथ क्यों नहीं रहना चाहती? लेकिन अब तो मुझे कुछ और ही मामला समझ में आ रहा है.”

“हां, मुझे भी. तो कुशा और हर्ष तुम दोनों तलाक़ लेना चाहते हो या साथ-साथ रहना चाहते हो?” मंगला ने पूछा.

“हम साथ-साथ रहना चाहते हैं.” दोनों एक स्वर में बोल उठे.

कुशा के मुंह से यह स्वीकारोक्ति सुनकर शांता का चेहरा उतर गया. उधर हर्ष की मां भी नज़रें चुराने लगी.

“देखा, कभी-कभी घर के बड़ों के अहम् के कारण किस तरह बच्चों का जीवन बर्बाद होने लगता है.” मंगला ने कहा. फिर उसने शांता से पूछा, “तुमने ऐसा क्यों किया शांता?”

“मैंने सोचा कि कुशा ख़ुश नहीं है, लेकिन अगर कुशा ख़ुश है तो… तो मैं अपने व्यवहार के लिए माफ़ी मांगती हूं.”

“हां, मैं भी! मैंने भी नाहक तुम्हें दोष दिया, मंगला बहन!” हर्ष की मां बोल उठी.

“चलो इसी बात पर दोनों समधिनें एक-दूसरे को गले लगा लो!” मंगला ने कहा. फिर उसने आगे कहा, “कई बार हम समझ लेते हैं कि हमारे बच्चे नई परिस्थिति में तालमेल नहीं बैठा पाएंगे और इसी भ्रम में पड़कर हम ग़लत निर्णय कर डालते हैं. और नई बहू के साथ-साथ सास को भी तो तालमेल बैठाना चाहिए. क्यों हर्ष की मां, मैंने ग़लत कहा क्या?”

“नहीं मंगला बहन, तुम ठीक कहती हो.” हर्ष की मां ने झेंपते हुए कहा.

इस प्रकार पटाक्षेप हुआ मंगला के जीवन के इस अप्रिय प्रसंग का. रमेशजी जब दौरे से वापस आए तो मंगला ने उन्हें पूरी घटना कह सुनाई.

“चलो अच्छा हुआ कि सब कुछ ठीक हो गया और एक घर उजड़ने से बच गया.” रमेशजी बोल उठे. आज सुबह शांता अपने पति के साथ वापस घर चली गई. हर्ष, कुशा और अपनी बेटी को अपने साथ ले गया.

“चाय तैयार है, मैडम!… और साथ में गरमा-गरम पकौड़े भी.” रमेशजी ने प्रफुल्लित होते हुए कहा.

“अरे, पकौड़े मैं बना देती आपने क्यों कष्ट किया?” मंगला हड़बड़ाकर बोली. वह अब बीते घटनाक्रम से बाहर निकल आई थी.

“तो क्या हुआ जो मैंने बना लिए. मैंने तो पहले ही कहा था…”

“क्या…?” मंगला ने चौंककर पूछा.

“यही कि मैं पकौड़े बहुत अच्छे बनाता हूं!” कहते हुए रमेशजी ठहाका मारकर हंस दिए, मंगला भी अपनी हंसी रोक नहीं पाई. आख़िर महीना भर बाद वह खुलकर हंसी थी.

– डॉ. सुश्री शरद सिंह

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कहानी- उसकी राह (Short Story- Uski Rah)

“क्या यह वरदान मेरे लिए अभिशाप नहीं बन जाएगा? क्या यह सहारा मेरे लिए बोझ नहीं साबित होगा? इसके साथ क्या मैं सदा के लिए अपूर्ण नहीं रह जाऊंगी? अपने करियर के लिए अपूर्व ने मेरे बच्चे को अजन्मा होने का अभिशाप दिया था. बताइए क्या दोष था उसका? बस इतना कि वह एक महत्वाकांक्षी बाप की औलाद था?” कंगना ने अपनी आंखों से ढलक आये आंसुओं को पोंछा, फिर लक्ष्मीदेवी की आंखों में झांकती हुई बोली, “अपूर्व का क्या होगा, यह अब कोई रहस्य नहीं रह गया है, लेकिन उसके बाद मेरा क्या होगा? यह आपने तो नहीं सोचा, पर क्या मुझे भी अपने करियर के बारे में नहीं सोचना चाहिए? डूबना अवश्यंभावी है, यह जानकर क्या मुझे आंख मूंद कर अपनी कश्ती को लहरों के सहारे छोड़ देना चाहिए?”

Short Story Uski Rah

आईटी कानपुर से बी.टेक., केलीफोर्निया यूनिवर्सिटी से एम. टेक, लंदन स्कूल ऑफ़ इकेनॉमिक्स से एमबीए, तीन साल में 3 कंपनियों का सफ़र, चौथे साल एक मल्टीनेशनल कंपनी के डिप्टी सीईओ के पद का दावेदार…. लक्ष्मीदेवी के 29 वर्षीय इकलौते बेटे अपूर्व की ऊंची उड़ान के आगे सफलता की सीढ़ियां भी छोटी पड़ती जा रही थीं. ऐसा हो भी क्यूं न, सोते-जागते, उठते-बैठते-बस काम ही काम. काम के अलावा अपूर्व को और कुछ सूझता ही नहीं था.

कई धन-कुबेर अपनी कन्याओं के लिए लक्ष्मीदेवी के घर लाइन लगाए रहते, पर अपूर्व कोई लड़की देखने को राज़ी ही नहीं होता. एक दिन उन्होंने उसके सामने कई फ़ोटो रखते हुए कहा, “मैंने ये लड़कियां पसंद की हैं, बता इनमें से सबसे अच्छी कौन है?”

अपूर्व ने तस्वीरों पर एक उचटती हुई दृष्टि डाली, फिर बोला, “ये सभी अच्छी हैं, पर मैं इनमें से किसी से शादी कर उसकी ज़िंदगी बर्बाद नहीं कर सकता.”

“क्या मतलब?”

“मां, मेरा प्यार कहीं और है. अगर मैं इनमें से किसी से शादी करूंगा तो बेचारी की ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी या नहीं?” अपूर्व मुस्कुराया.

“तो बता, तू किससे प्यार करता है, मैं उसी से तेरी शादी कर देती हूं.” लक्ष्मीदेवी हुलस उठीं.

“मेरा पहला प्यार मेरा करियर है. मुझे जल्द-से-जल्द कंपनी का सीईओ बनना है. हां, जिस दिन कोई ऐसी लड़की मिलेगी, जिसे देख दिल कहे कि यह करियर से भी ज़्यादा क़ीमती है, उस दिन फ़ौरन शादी कर लूंगा.” अपूर्व हल्का-सा मुस्कुराया, फिर ऑफ़िस चला गया. लक्ष्मीदेवी काफ़ी देर तक बड़बड़ाती रहीं.

अपूर्व ऑफ़िस पहुंचा ही था कि ब्लू-स्काई एडवर्टाइज़िंग कंपनी के एम.डी. रमन मेहता आ गए.

“मि. मेहता, हमारा काम हुआ कि नहीं.” अपूर्व ने उन्हें बैठने का इशारा करते हुए पूछा.

“सर, आप जैसे इंपोेर्टेन्ट क्लाईंट का काम न होने का प्रश्‍न ही नहीं उठता.” रमन मेहता धीरे से मुस्कुराए, फिर अपने ब्रीफकेस से दो एलबम निकाल अपूर्व की ओर बढ़ाते हुए बोले, “ख़ास आपके लिए दो नयी और बेइंतहा ख़ूबसूरत मॉडल्स का पोर्टफोलियो लाया हूं.”

अपूर्व ने एक एलबम को लेकर पन्ने पलटने शुरू किए.

“ये मिस रेणुका रमानी हैं, मिस इंडिया यूनिवर्स के फ़ाइनल राउंड तक पहुंच चुकी हैं. आख़िरी राउंड में तबियत ख़राब हो जाने के कारण पिछड़ गई थीं, वरना इस बार की मिस इंडिया यही होतीं.”

अपूर्व ने बिना कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किए एलबम के पन्ने पलटे, फिर दूसरा एलबम उठा लिया.

“ये हैं मिस नेहा गोविरकर, इस बार अमेरिका में बेस्ट एशियन ब्यूटी का पुरस्कार इन्हें ही मिला है. आपकी ख़ातिर बहुत मुश्किल से ये इंडिया में अपना पहला असाइनमेंट करने के लिए तैयार हुईं.” रमन मेहता ने प्रशंसात्मक स्वर में बताया.

अपूर्व ने इस एलबम के भी पन्ने पलटे, फिर उसे भी मेज़ पर रखते हुए बोला, “हमारी कंपनी एक्सक्लूसिव प्रोडक्ट लॉन्च करने जा रही है, इसके लिए हमें मॉडल चाहिए, बिल्कुल अनछुआ सौंदर्य. ओस की बूंद जैसा पवित्र चेहरा. ऐसी ख़ूबसूरती, जिसमें उन्मुक्त पवन जैसी चंचलता और अनंत आकाश जैसी असीम शांति एक साथ हो.”

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“ऐसा एक चेहरा है मेरे पास.” रमन मेहता ने ब्रीफकेस से एक और एलबम निकाला, “ये हैं मिस कंगना राय, बीएससी फ़ाइनल ईयर की स्टूडेंट. पिछले महीने अपने कॉलेज की नृत्य प्रतियोगिता में पुरस्कार जीता तो उत्साहित हो मेरे स्टूडियो में फ़ोटो खिंचवाने चली आई थीं.”

“मि. मेहता, आप मेरा समय बर्बाद कर रहे हैं. मैंने इस मॉडलिंग असाइनमेंट के लिए आपको मुंहमांगी क़ीमत देने का वादा किया है और आप किसी को भी लाकर मेरे मत्थे मढ़ देना चाहते हैं.” अपूर्व का स्वर तल्ख़ हो गया.

“सर, अनछुआ सौंदर्य बाज़ार में नहीं मिलता. ऐसा सौंदर्य तो बस सीप में बंद मोती के पास ही हो सकता है. अगर किसी पारखी की नज़र पड़ जाए तो उसे अनमोल रत्न बनते देर नहीं लगती.” रमन मेहता भरपूर आत्मविश्‍वास के साथ मुस्कुराए, फिर अपने शब्दों को वज़न देते हुए बोले, “आप एक बार इस एलबम के पन्ने तो पलट कर देखिए, आपकी आंखें चौंधिया न जाएं तो मेरा नाम बदल दीजिएगा.”

अपूर्व ने बहुत बेदिली से एलबम का पहला पन्ना खोला, लेकिन पहली ही तस्वीर सीधे दिल में उतरती चली गयी. ख़ूबसूरत चेहरे से झांक रही झील-सी गहरी आंखें किसी को भी अपने मोहपाश में बांध लेने में सक्षम थीं.

“मैं आज ही इनसे मिलना चाहूंगा.” अपूर्व ने एलबम रखते हुए फैसला सुनाया.

उसी दिन शाम रमन मेहता ने अपूर्व की कंगना राय से मुलाक़ात करवा दी. अपूर्व ने उसे देखा तो देखता ही रह गया. थोड़ी देर की औपचारिक बातचीत के पश्‍चात अपूर्व ने कहा, “मि. मेहता, अगर आप बुरा न मानें तो मैं मिस कंगना से अकेले में कुछ  बात करना चाहता हूं.”

“श्योर सर.” रमन मेहता के चेहरे पर एक व्यवसायिक मुस्कान उभरी और कंगना राय को बोलने का कोई मौक़ा दिए बिना वे वहां से हट गए.

कंगना के चेहरे पर परेशानी के चिह्न उभर आए, जिन्हें पढ़ते हुए अपूर्व ने धीमे स्वर में कहा, “आप अपना मॉडलिंग असाइनमेंट तो पक्का ही समझिए, लेकिन उससे पहले मैं एक शर्त रखना चाहता हूं.”

“आप मुझे काम दें या न दें, पर मैं आपकी कोई शर्त नहीं मानूंगी.” कंगना का  चेहरा अपमान से लाल हो उठा और वह झटके से उठ खड़ी हुई.

“देखिए, शर्त सुने बिना इनकार करना अक्लमंदी न होगी.” अपूर्व ने हड़बड़ाकर वहां से जा रही कंगना की कलाई थाम ली.

“छोड़िए मेरा हाथ, आप ग़लत समझ रहे हैं. मैं वैसी लड़की नहीं हूं.” हाथ छुड़ाते-छुड़ाते कंगना की आंखों से आंसू टपक पड़े.

“आप भी मुझे ग़लत समझ रही हैं. मैं भी वैसा लड़का नहीं हूं, मैं तो आपसे शादी करना चाहता हूं.” कंगना के आंसू देख अपूर्व हड़बड़ा उठा.

“क्या?” कंगना की आंखें आश्‍चर्य से फैल गईं.

“हां मिस कंगना, क्षणभर पहले मेरे मन में हल्की-सी आशंका थी, पर अब मुझे विश्‍वास हो गया है कि मेरा ़फैसला सही है.” अपूर्व क्षणभर के लिए रुका, फिर कंगना की आंखों में देखते हुए बोला, “मेरी शर्त स़िर्फ इतनी है कि या तो आप हमारी कंपनी के लिए मॉडलिंग के प्रस्ताव को स्वीकार कर लें या मेरी शादी के प्रस्ताव को, क्योंकि मॉडलिंग के बाद शादी और शादी के बाद मॉडलिंग मुझे स्वीकार न होगी.”

“मुझे थोड़ा व़क़्त चाहिए.” कंगना ने सहज होने की कोशिश की.

किंतु फैसला लेना आसान न था. एक तरफ़ कैरियर के आरंभ में ही इतना बड़ा ब्रेक था- ग्लैमर, शोहरत, पैसा और तड़क-भड़क भरी ज़िंदगी थी, तो दूसरी तरफ़ अपूर्व जैसा पति था, जिसके पास वह सब कुछ था जिसकी कामना हर लड़की करती है. कंगना की पूरी रात उहापोह में बीती.

अगले दिन जब उसने फैसला सुनाया तो अपूर्व ख़ुशी से उछल पड़ा. लक्ष्मीदेवी ने भी देरी नहीं की. चट मंगनी-पट ब्याह हो गया और अगले ही सप्ताह अपूर्व और कंगना हनीमून पर निकल गए. स्विटज़रलैंड, पेरिस, रोम, सिंगापुर और हांगकांग होते हुए जब वे एक माह बाद लौटे तो बहुत ख़ुश थे.

इस बीच अपूर्व का काम काफ़ी पिछड़ गया था, अतः वापस आते ही वह बुरी तरह व्यस्त हो गया. कंगना बहुत समझदार थी. पति की व्यस्तताओं और मजबूरियों को समझती थी. शिकायतें करने के बजाय वह अपूर्व के काम में हाथ बंटाने लगी.

“बहू, तुम एक अच्छी पत्नी के साथ-साथ एक अच्छी सेक्रेट्री भी बन गई हो. अब जल्दी से अच्छी मां बन कर भी दिखा दो.” एक दिन लक्ष्मीदेवी ने कंगना के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

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“यह ख़ुशी भी आपको जल्दी ही मिल जाएगी.” कंगना के चेहरे पर रक्तिम आभा उभर आयी.

यह सुन लक्ष्मीदेवी का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा और उन्होंने कंगना के चेहरे को अपने हाथों में थामते हुए उलाहना दिया,  “तुमने इतनी बड़ी ख़ुशी मुझसे अब तक छुपा कर क्यूं रखी?”

“मांजी, मुझे भी आज ही इस बात का एहसास हुआ है. अभी तो इनको भी कुछ मालूम नहीं है.” कंगना की पलकें लाज से बोझिल हो उठीं.

“मैं अभी उसे ख़बर करती हूं.” लक्ष्मीदेवी ने मोबाइल उठाया.

“मांजी, प्लीज़ उन्हें सबसे पहले यह ख़बर मुझे देने दीजिए. मैं देखना चाहती हूं कि उनकी आंखों में कैसी ख़ुशी उभरती है.” उस शाम कंगना ने पूरे घर को नये सिरे से सजाया. अपूर्व काफ़ी देर से लौटा था. खाने के बाद दोनों जल्दी ही अपने कमरे में चले गए. थोड़ी देर बाद उनके कमरे से तेज़ बहस की आवाज़ें आने लगीं. फिर अपूर्व का स्वर तो शांत हो गया, पर कंगना की सिसकियां काफ़ी देर  तक सन्नाटे को भंग करती रहीं.

सुबह दोनों काफ़ी देरी से कमरे से बाहर निकले. अपूर्व के चेहरे पर शांति थी, किंतु कंगना के चेहरे पर वीरानी छायी हुई थी.

“तुम लोग कहां जा रहे हो?” उन्हें तैयार देख लक्ष्मीदेवी ने पूछा.

“डॉक्टर के पास.” अपूर्व ने सपाट स्वर में बताया.

अचानक जैसे छठीं इंद्रिय जागृत हो गयी. लक्ष्मीदेवी की अनुभवी आंखों ने पलभर में कंगना के दिल का हाल पढ़ लिया था, किंतु संशय मिटाने के लिए पूछा, “क्यों?”

“जी…. वो… वो…” अपूर्व चाहकर भी अभिव्यक्ति के लिए शब्द नहीं जुटा पाया, किंतु कंगना के आंखों से टपके आंसुओं ने प्रश्‍न का उत्तर दे दिया था.

“देखिए, शादी तो मैंने कर ली, पर अभी बच्चे-वच्चे के झंझट में फंसने का समय मेेरे पास नहीं है.” अपूर्व ने समस्या सामने रखी.

“इसमें तू परेशान क्यूं होता है? बच्चा तुझे नहीं कंगना को पालना है.” समस्या का मूल जान लक्ष्मीदेवी हंस पड़ीं.

“ये क्या पिछड़े ज़माने की बातें कर रही हैं.” अपूर्व पहले तो झल्लाया, फिर समझाते हुए बोला, “अभी तो मेरे कैरियर की शुरुआत है, बहुत लंबा सफ़र तय करना है मुझे. इसके लिए आए दिन पार्टियां देनी होंगी, लोगों से मिलना-जुलना होगा. कॉन्टेक्ट बढ़ाने होंगे. हाई सोसायटी की पार्टियों में लोग पत्नियों के साथ आते हैं. अब मेरे साथ यह नैपकीन में बच्चा लेकर चलेगी तो कैसा लगेगा?”

“तो इतनी-सी बात के लिए तू अपने बच्चे की हत्या कर देगा?” लक्ष्मीदेवी का मुंह खुला रह गया.

अपूर्व ने उनकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया, किंतु कंगना की ओर मुड़ते हुए बोला, “मां पुराने ज़माने की हैं, हमारी बात नहीं समझ सकेंगी, लेकिन तुम मेरी शर्त सुन लो. अगर मेरे साथ ज़िंदगी गुज़ारनी है तो मैं गाड़ी निकाल रहा हूं, चुपचाप आकर बैठ जाओ वरना….”

अपना वाक्य अधूरा छोड़ अपूर्व तेज़ी से बाहर चला गया. यह अधूरा वाक्य ज़िंदगी में अधूरापन भर सकता था, अतः न चाहते हुए भी कंगना को पति की अनुगामिनी बनना पड़ा.

ज़िंदगी मिटाकर भी ज़िंदगी चलती रहती है. चंद दिनों बाद कंगना एक बार फिर पति के क़दमों से क़दम मिलाकर चलने लगी, किंतु कहीं कुछ ऐसा था जो दरक गया था. उसके चेहरे को देखकर ऐसा लगता था जैसे किसी पुष्प से उसकी सुगंध छीन ली गयी हो.

समय बीतता रहा, अपूर्व की मेहनत रंग लायी और शादी की दूसरी वर्षगांठ पर कंपनी ने उसे सीईओ  के पद का तोहफ़ा दिया. इस ख़ुशी में उसने बहुत बड़ी पार्टी दी. अपूर्व और कंगना रातभर झूमते-गाते रहे. उनके सारे सपने सच हो गए थे.

अगले दिन ऑफ़िस में अपूर्व के पेट में भयंकर दर्द उठा. पहले भी दो-तीन बार ऐसा हो चुका था, किंतु व्यस्तताओं के चलते अपूर्व ने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया था, लेकिन इस बार दर्द असहनीय था. सहकर्मियों ने उसे हॉस्पिटल में भर्ती कर दिया.

जांच के बाद जब रिपोर्ट सामने आयी तो सबके पैरों तले ज़मीन खिसक गयी. अपूर्व की आंत में कैंसर था, वह भी अंतिम चरण में. कंगना ने सुना तो जड़ हो गयी.

अपूर्व को एक नामी कैंसर इंस्टिट्यूट में भर्ती करा दिया गया. कंगना ने देश के बड़े-बड़े डॉक्टरों को बुलाया. अपूर्व की सेवा में दिन-रात एक कर दिया, पर उसकी स्थिति में सुधार नहीं हो रहा था. डॉक्टरों की सलाह पर अपूर्व का अमेरिका में ऑपरेशन करवाने का निश्‍चय किया गया. चार दिन बाद की हवाई जहाज की टिकटें भी मिल गईं.

अगले दिन कंगना कुछ ज़रूरी काग़ज़ात    लेने घर गयी. अचानक उसे उल्टी होने लगी. लक्ष्मीदेवी की अनुभवी आंखों ने कारण समझ लिया. कंगना को बिस्तर पर लिटाते हुये उन्होंने सांस भरी, “लगता है, ऊपर वाले ने हमारी सुन ली है.”

“कुछ नहीं सुनी है ऊपर वाले ने. अगर उसे सुनना ही होता तो… तो….” कंगना के शब्द हिचकियों में बदल गए.

“रो मत बेटा.” लक्ष्मीदेवी ने कंगना के सिर पर हाथ फेरा, फिर मोबाइल उसकी ओर बढ़ाते हुए बोलीं, “अब तो तुम्हें जीने का सहारा मिल गया है, चलो यह ख़ुश-ख़बरी अपूर्व को सुना दो.”

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“नहीं मांजी, अपूर्व को यह ख़बर न तो मैं दूंगी और न ही आप.” कंगना का स्वर कड़ा हो गया और वह झटके से उठ खड़ी हुई.

“क्यों?”

“क्योंकि यह बच्चा दुनिया में नहीं आएगा और इसके वजूद की ख़बर देकर मैं अपूर्व के कष्ट को और नहीं बढ़ाना चाहती.” कंगना ने दो टूक फैसला सुनाया.

“यह क्या पागलपन है. जो ग़लती अपूर्व ने की थी, वही ग़लती तू करने जा रही है?” लक्ष्मीदेवी तड़प उठीं.

“मांजी, ग़लती न तो अपूर्व ने की थी और न मैं कर रही हूं. मैं बहुत सोच-समझकर फैसला कर रही हूं.” कंगना ने एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा.

लक्ष्मीदेवी ने कंगना को अविश्‍वसनीय नज़रों से देखा, फिर बोलीं, “बेटा, बच्चा तो स्त्री को प्रकृति का दिया सबसे बड़ा वरदान है, उसके जीने का सहारा है. बच्चे के बिना स्त्री सदैव अपूर्ण होती है और तू….”

कंगना ने लक्ष्मीदेवी की बात बीच में ही काट दी, “क्या यह वरदान मेरे लिए अभिशाप नहीं बन जाएगा? क्या यह सहारा मेरे लिए बोझ नहीं साबित होगा? इसके साथ क्या मैं सदा के लिए अपूर्ण नहीं रह जाऊंगी? अपने करियर के लिए अपूर्व ने मेरे बच्चे को अजन्मा होने का अभिशाप दिया था. बताइए क्या दोष था उसका? बस इतना कि वह एक महत्वाकांक्षी बाप की औलाद था?” कंगना ने अपनी आंखों से ढलक आये आंसुओं को पोंछा, फिर लक्ष्मीदेवी की आंखों में झांकती हुई बोली, “अपूर्व का क्या होगा, यह अब कोई रहस्य नहीं रह गया है, लेकिन उसके बाद मेरा क्या होगा? यह आपने तो नहीं सोचा, पर क्या मुझे भी अपने करियर के बारे में नहीं सोचना चाहिए? डूबना अवश्यंभावी है, यह जानकर क्या मुझे आंख मूंद कर अपनी कश्ती को लहरों के सहारे छोड़ देना चाहिए?”

कंगना के मुंह से निकला प्रत्येक वाक्य लक्ष्मीदेवी का जीवन के यथार्थ से कटु साक्षात्कार करवा रहा था, फिर भी उन्होंने तिनके का सहारा लेने की कोशिश की, “बेटा, बच्चे के सहारे तेरा जीवन कट जाएगा और जाते-जाते अपूर्व को भी थोड़ी-सी ख़ुशी मिल जाएगी.”

“जीवन कट जाएगा? लेकिन कैसे कटेगा यह आप भी जानती हैं और मैं भी.” कंगना के चेहरे पर दर्द की रेखाएं तैर आईं और वह लक्ष्मीदेवी का हाथ थामते हुए बोली, “यक़ीन मानिए मांजी, अगर इस बात की ज़रा-सी भी संभावना होती कि अपूर्व नौ माह बाद बच्चे का मुंह देखने के लिए मौजूद रहेंगे तो मैं यह धर्म अवश्य निभाती.”

“तूने उसके साथ सात फेरे लिए हैं. पति के वंश को आगे बढ़ाना भी पत्नी का धर्म होता है.” लक्ष्मीदेवी ने अंतिम शस्त्र चलाया.

“मैं पत्नी के धर्म को निभाऊंगी, दिन-रात उनकी सेवा करूंगी. जितने भी पल उनके पास बचे हैं, उन्हें अधिक-से-अधिक सुख देने की कोशिश करूंगी.” कंगना ने सांत्वना दी.

“पर…”

“अब कोई ‘पर’ नहीं मांजी. हमेशा आपके बेटे ने शर्त सामने रखी है. आज आपकी बहू शर्त रखती है.” कंगना ने अपने अंदर उमड़ रहे आंसुओं को नियंत्रित किया और एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए बोली, “मैं अस्पताल जा रही हूं, आप चाहें तो साथ चल कर मुझे इस लायक बना सकती हैं कि मैं अंतिम समय तक आपके बेटे की सेवा कर सकूं. लेकिन यदि आप चाहें तो मुझे रोक कर इस लायक भी बना सकती हैं कि मैं अपने बढ़े हुए पेट को लेकर ख़ुद अपनी सेवा करवाऊं और मेरा पति अंतिम समय में जीवनसाथी के साथ को तरसता रहे.”

इतना कहकर कंगना सधे क़दमों से दरवाज़े की ओर चल दी. लक्ष्मीदेवी के अंदर इतना साहस शेष नहीं बचा था कि उठकर दरवाज़े को बंद कर सकें. वह फटी आंखों से उसे बाहर जाते देखती रहीं. वह तय नहीं कर पा रही थीं कि उसकी राह सही है या ग़लत….?

Sanjeev Jaiswal

संजीव जायसवाल ‘संजय’  

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कहानी- यही सच है (Short Story- Yahi Sach Hai)

मन का वर्चस्व तो हर काल में रहा है. सही है, हमने हाथों में हाथ डाल कभी डांस नहीं किया, होटल के एकान्त कोने में बैठ कभी कॉफ़ी नहीं पी… पर क्या प्यार इन सबके बिना नहीं हो सकता? और यदि ये सब करके ही एक-दूसरे को समझा जा सकता तो फिर आज के प्रेमविवाह टूटते ही क्यों?

Short Story- Yahi Sach Hai

जनरेशन गैप…? पीढ़ियों का अन्तराल…? और वह भी मेरे घर में…? मैंने तो सदा इसी बात पर फ़ख्र किया है कि मैंने अपने बच्चों के साथ सदैव मित्रवत् व्यवहार ही किया है. वह दोनों कॉलेज से लौटते तो नाश्ते के साथ-साथ वहां के ढेरों क़िस्से सुनाते. मैं उन्हें सलाह-मशविरा देती तो अनेक बातों में उनसे सलाह-मशविरा लेती भी.

पर आज मेरी ही बेटी ने यानी बात-बात पर हंसने वाली अनिता ने ऐलान कर दिया, “ममा, तुम मेरी बात नहीं समझोगी. तुम्हारे समय में तो मां-बाप ने जहां शादी तय कर दी, चुपचाप कर ली. किसी ने पूछी भी न होगी तुम्हारी पसंद. तुम प्यार-मोहब्बत की बात कैसे समझोगी? पर मैं विवाह करूंगी तो स़िर्फ सुमित से. मैं उसे तुमसे मिलवा भी चुकी हूं. तुम्हें वह ठीक नहीं लगता, पर वह मुझे बहुत चाहता है, समझता है. ममा, तुम्हारे और

आज के समय में बहुत अंतर है. पूरी एक जनरेशन का गैप…”

वह आगे भी शायद बहुत कुछ बोली होगी. पर मेरे कानों में वही शब्द अटक गए. रिकॉर्ड की मानिंद बजते रहे जनरेशन गैप… जनरेशन गैप…

वह क्या सोचती है कि हमारी पीढ़ी में प्यार का ज़ज़्बा ही नहीं था. मां-बाप की पसन्द शिरोधार्य कर ली, पर क्या सचमुच निष्प्राण था हमारा मन. प्रीत-प्यार पर किसी एक जनरेशन, किसी एक पीढ़ी का एकाधिकार होता तो राधा-कृष्ण के प्रेम की दास्तान आज भी हमारी संस्कृति का एक हिस्सा नहीं होती. मन का वर्चस्व तो हर काल में रहा है. सही है, हमने हाथों में हाथ डाल कभी डांस नहीं किया, होटल के एकान्त कोने में बैठ कभी कॉफ़ी नहीं पी… पर क्या प्यार इन सब के बिना नहीं हो सकता? और यदि यह सब करके ही एक-दूसरे को समझा जा सकता तो फिर आज के प्रेमविवाह टूटते ही क्यों?

एक तो सुबह से ही मूड ख़राब था, उस पर मेरी छोटी बहन सरोज भी आ गई. मन तो यूं ही जला बैठा था, फिर भी मैंने उसके आगे अनिता की बात रख दी. सोचा, वही मलहम लगाएगी, पर उसने तो ताज़े ज़ख़्म पर चिकोटी काट दी.

“ठीक ही तो कह रही है, मैं नहीं जानती क्या? कॉलेज के दिनों में तुम और श्रीपत एक-दूसरे को कितना चाहते थे. लेकिन हुआ क्या? तुम्हारा विवाह तय हो गया तो उसने रोका क्या? हिम्मत ही नहीं जुटा पाया. मां-बाप की आज्ञा मान कहीं और शादी कर ली होगी. बस, कहानी ख़त्म. चलो यह भी छोड़ो, इतने वर्षों में कभी उसने तुम्हारी सुध ली? कभी आकर पूछा कि कैसी हो सुधा? ख़ुश तो हो ना…?”

पर श्रीपत के नाम पर मेरी डबडबा आई आंखों को देखकर वह रुक गई. पर अब जब चोरी पकड़ी ही गई थी तो मैं भी स्वयं को संयत न कर पाई. फफक कर रो पड़ी. बरसों का बांध टूट गया.

वह कुछ और कहती, इससे पहले ही मैंने उसे रोक दिया.

“कहानी का एक ही दृश्य देखकर अपना फैसला मत दो सरोज. न ही श्रीपत बुज़दिल था और न ही हमारे प्यार में कुछ कमी थी. क़िस्मत ने ही हमारे साथ एक क्रूर मज़ाक किया था, जिसे हमने सिर नवाकर स्वीकार कर लिया.

बाल विवाह के आंकड़े आज भी समाचार-पत्र में पढ़ती हो न? यह भी जानती हो कि राजस्थान में यह सबसे अधिक है, बस, इसी प्रथा का शिकार था श्रीपत. यह बात उसके एक-दो अभिन्न मित्र ही जानते थे या फिर मैं. तुम्हें तो पता है कि हमारे कॉलेज में कुछ न कुछ चलता ही रहता था. कभी वाद-विवाद का रिहर्सल तो कभी नाटक, कभी खेल प्रतियोगिता तो कभी समाज-सेवा का कोई अभियान… और तुम तो जानती ही हो कि उसे इन सब चीज़ों में हिस्सा लेने का कितना शौक़ था. हो सकता है शुरू में मैंने ही उसे एक-दो बार कहा हो कि मुझे घर तक छोड़ दे. पैदल का ही रास्ता था, पर अंधेरे में अकेले जाना भी ख़तरे से खाली नहीं था. हो सकता है, उसका विवाहित होना ही मुझे उसके साथ जाने में सुरक्षा का एहसास देता हो.

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फिर तो यह नियम ही बन गया. मुझे उसको बताने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती कि आज मुझे देर तक रुकना है. जाने कहां बैठा वह मेरा इंतज़ार कर रहा होता और मेरे बाहर निकलते ही मेरे साथ हो लेता. हमारे माता-पिता ने तो हमें उचित मूल्य दिए ही थे, पर वह तो मुझ से भी अधिक आदर्शों का पक्का था. दो वर्ष की इस मैत्री में हाथ छूना तो दूर, कभी ऐसा भी न हुआ होगा कि मेरे दुपट्टे का कोई कोना भी उसके कपड़ों को छू गया हो. उसकी साइकिल हमेशा हम दोनों के बीच रहती. मेरी ख़ातिर वह हमारे घर तक पैदल ही चलता और फिर साइकिल पर सवार होकर अपने घर चला जाता था, उसका और हमारा घर एकदम विपरीत दिशा में थे. उसने मेरे लिए बहुत कुछ किया. उसके बहुत से एहसान हैं मुझ पर. किस-किस चीज़ का शुक्रिया अदा करूं?

हमारे बीच कभी किसी सीमा का उल्लंघन नहीं हुआ. पर इस मन का क्या करे कोई? न यह कोई तर्क समझता है, न धौंस. हठीले शिशु की तरह अपनी राह ही चलता है. बहुत कम बोलता था वह, पर प्यार का कोमल एहसास तो महसूस हो ही जाता है ना एक भीनी सुगन्ध की तरह, शीतल बयार की तरह, एक मुग्ध दृष्टि द्वारा, छोटी-छोटी बातों द्वारा.

तुम उसे निर्मोही कह लो, बुज़दिल समझ लो, पर मैं उसका बहुत सम्मान करती हूं. उसने कभी हमारे साथ होने का फ़ायदा उठाने की कोशिश नहीं की, शब्दों द्वारा भी नहीं. कभी अपने प्यार का इज़हार भी नहीं किया. बस, एक बार चलते-चलते बीच राह रुक कर बोला था, “तुम्हारी और मेरी राह बहुत अलग-अलग है सुधा.” उसके स्वर में निराशा थी, हताशा थी और यही उसके प्यार का इज़हार भी था और यही हमारी विवशता भी. कभी पल भर को भी उसने स्वयं को कमज़ोर नहीं होने दिया. क्या आज के युवा, प्यार का दम भरनेवाली यह पीढ़ी निभा पाएगी इतना पवित्र रिश्ता, अपनी भावनाओं पर इतना संयम?

हमने तो बस परिवारवालों का ़फैसला शिरोधार्य कर लिया था. मन के ऊपर बुद्धि की, जन्मगत संस्कारों की विजय हुई थी. यहां तक कि सम्पर्क बनाए रखने का भी प्रयत्न नहीं किया. बोलो, कुछ ग़लत किया था क्या?

याद होगा तुम्हें विवाह की तैयारियां चल रही थीं. कार्ड बंट चुके थे. बड़ी बुआजी तो आ भी गई थीं रसोई संभालने. उसी रोज़ राजलक्ष्मी आई थी. यह ख़बर लेकर कि श्री की पत्नी की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई है. एक बार फिर विधि का क्रूर मज़ाक ठठा कर हंस रहा था मेरी वेदना पर. जब मैं स्वतंत्र?थी तो वह बंधन में था और अब जब मुझे सामाजिक तौर पर आजीवन कारावास का दण्ड सुना दिया गया था तो वह आज़ाद था. पर इतने कम समय में कुछ नहीं हो सकता था. उसके घर में मातम का माहौल था और मैं उस व़क़्त मुंह खोलती भी तो बखेड़ा होता, जग हंसाई होती. हासिल कुछ होता कि नहीं, पता नहीं. मुंह तो मैं सी गई, पर आंसू न पी सकी. बहुत रोई थी मैं उस रात. तुम हैरान-परेशान थी कि अकस्मात् इसे हो क्या गया है. पर घर में अन्य सभी ने यही मान लिया कि विवाह का तनाव है, घर छोड़ने का दर्द है. असली दर्द तो मैं दफ़ना गई सीने में. सदैव के लिए.”

“पर अब तो इतने वर्ष हो गए सुधि. कहती हो सम्पर्क भी नहीं रखा. अभी भी उसे याद करती हो क्या?”

“भूली तो मैं उसे कभी भी नहीं. जब भी मुझे किसी भावनात्मक सहारे की ज़रूरत पड़ी, मैंने उसे क़रीब ही पाया. जब कभी मन निराश हुआ मैंने उसे याद करके अपना मनोबल बढ़ाया. अपने जीजू को तो जानती हो ना. खैर, अपना-अपना स्वभाव है, पर दु:ख-तकलीफ़ में कोई सम्बल बन जाए तो अच्छा लगता है. फिर भी चलो जाने दो, ठीक से ज़िंदगी जी ली. आज समाज में इ़ज़्ज़त है, सुख-सुविधा है. वैसे भी मुक़म्मल जहां किसे मिला है आज तक? गिला भी तो किसी से नहीं है. न एक-दूसरे से, न मां-बाप से. सहरा में ही चलने की आदी हो गई थी मैं कि श्री से मुलाक़ात हो गई अचानक. याद है, पिछले महीने राजलक्ष्मी के बेटे के विवाह में गई थी. बस, वहीं मिल गया वह. यूं इतना अचानक भी नहीं था. एक ही शहर में रहते हैं और जानती थी कि राजलक्ष्मी से उसकी मुलाक़ात होती रहती है. हां, अभी तुमने पूछा था ना कि उसने कभी मेरी सुधि क्यों नहीं ली? बात यह है कि राजलक्ष्मी द्वारा हमें एक-दूसरे का हाल-चाल मिल जाता था. बस, इसके आगे बढ़ने की कोशिश कभी नहीं की. वह चाहता तो राजलक्ष्मी से मेरा पता पूछ मुझ तक पहुंच सकता था. मैं भी अनेक बार गई हूं उस शहर में. चाहती तो टेलीफ़ोन डायरेक्टरी उठाकर उसका फ़ोन नम्बर भी पा लेती और घर का पता भी. पर हमारे बीच एक अलिखित समझौता था, जिसका हमने मान रखा था. अभी भी विवाह में जाने से डर रही थी, पर एक तो राजलक्ष्मी के घर जाना आवश्यक ही था और शायद आख़िरी बार उसे देख लेने की इच्छा भी बलवती हो आई थी.

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राजलक्ष्मी  के घर के क़रीब ही था उसका घर. विवाह के दूसरे दिन उसने आठ-दस पुराने परिचितों को अपने घर आमन्त्रित किया हुआ था. हम सभी अपने सहपाठी-सहपाठिनों ने मिलकर ख़ूब जम कर पुरानी यादें ताज़ा कीं. मैंने तो ख़ैर इन्हीं यादों के सहारे ज़िंदगी काटी थी. उसकी बातों से भी लगा कि वह अपनी अनेक उपलब्धियों के बावजूद पुराना कुछ भूला नहीं था. हर छोटी-सी बात याद थी उसे. कुछ अलग ही होता है इस उम्र का आकर्षण. बाह्य कुछ नहीं दिखता. एकदम हृदय के भीतर से जुड़ता है- अंतर्मन से.

मज़ेदार बात यह थी कि वह अब भी मेरा ख़्याल उसी तरह रख रहा था जैसा कि वर्षों पूर्व रखा करता था. तुम्हें तो पता है कि छह महीने पूर्व गिरने से मेरे सिर में चोट लगी थी और फलस्वरूप अभी तक मेरा संतुलन कुछ डगमगाया-सा है. सीढ़ी उतरते हुए, ऊंची-नीची जगह पर चलते हुए कोई सहारा खोजती हूं और इसी कारण उसके बरामदे की सीढ़ियां उतरते समय मैंने उसकी पत्नी की ओर हाथ बढ़ा दिया था. मैं उसी से बात करती हुई चल रही थी और श्रीपत अन्य मित्रों के संग था. पर उसकी छठी इन्द्रीय मानों मेरी ही सुख-सुविधा देखती रहती है. छोटे शहरों में लम्बे-चौड़े घर होते हैं और उसके घर से बाहरी गेट तक का रास्ता. वह भी नीम रोशनी में. मैं बहुत संभल कर चल रही थी. यह कहीं उसने देख लिया था शायद, तभी तो जाने कब वह आकर ठीक मेरे पीछे हो लिया. नीचे देख-देख कर क़दम रखते हुए यह मैंने जाना ही नहीं. पर गेट पर पहुंचते ही ज्यों ही मैंने गेट को थामने के लिए हाथ बढ़ाया तो उसका भी हाथ मुझसे थोड़ी ही दूरी पर गेट पर आन रुका. यही ख़ासियत है उसकी. मुझे उसके अपने एकदम पीछे होने का आभास तक नहीं मिला, पर यदि मुझे ज़रूरत पड़े तो मुझे सहारा देने को वहीं मौजूद था वह. जीवन बीमा का चित्र देखती हो न! दीपशिखा को दोनों हाथों से ओट किए हुए, ताकि तेज़ हवा उसे बुझा न पाये. बस, कुछ वैसा ही एहसास. कैसी विडम्बना है ना. जीवन में मुझे ठीक उसका विपरीत ही मिला. मुझे तो उसी जीवन की आदत हो गई थी. तपते रेगिस्तान में चलने की, बिना किसी साए की उम्मीद किए. कभी-कभी लगता है कि मेरा मन भी एक विशाल रेगिस्तान बन गया है. उस पर अब शीतल जल की नन्हीं-सी, अस्थाई-सी फुहार फिर से प्यास जगा गई है. पिछला महीना मैंने कैसे बिताया यह मैं ही जानती हूं. बौरा नहीं गई बस. यही समझ नहीं आता कि रोऊं या हंसूं. खुलकर रो भी तो नहीं सकती. कई बार तो चुपके से रोई हूं और ना जाने कितनी ही बार उसे याद कर मुस्कुराने लगती हूं.

और इस बार तो मैंने स्वयं ही ख़ुद को परीक्षा में झोंका था.”

“तुम्हें यह सोचकर अच्छा नहीं लगता कि इस उम्र में भी कोई तुम्हें इस शिद्दत से अपना समझता है? उसकी मधुर यादें हैं तुम्हारे पास?”

“हां सरोज, जो आत्मविश्‍वास डगमगाने लगा था, वह फिर से पा गई हूं. अपनी भी कुछ अहमियत है किसी की नज़र में, यह सोच कर ही अच्छा लगता है. अपेक्षा तो कुछ भी नहीं थी इस मैत्री में, शुरू से ही मेरी उम्मीदों से कहीं बढ़कर मिला. कुछ अधिक ही मांग लिया था ज़िन्दगी से- और वह मिल गया, झोली भर मिल गया. बहुत रुलाया है उसकी यादों ने, पर विडम्बना तो यह है कि मुझे उसकी उपेक्षा नहीं उसका अपनापन ही रुला देता है बार-बार.

दो प्रश्‍नों के उत्तर ख़ासतौर से खोजती हूं, एक तो यह कि तमाम उम्र एक सही और उसूल भरी ज़िंदगी जीने का प्रयत्न किया. मन को कभी हावी नहीं होने दिया. फिर वह ऐसा विद्रोही, ऐसा बेकाबू कैसे हो गया अचानक? कुछ दबी-बुझी इच्छाएं थीं, वो बेकाबू हो गईं क्या? दूसरा यह कि जानती हूं मैं ग़लत सोच रही हूं. उसे यूं याद करना, हर समय उसी के बारे में सोचना ग़लत है, हर हिसाब से ग़लत. तो फिर मन को इतना सुकून क्यों है? अब मुझे किसी की कड़वी से कड़वी बात भी बुरी नहीं लगती. सब कुछ माफ़ कर सकती हूं. कहां से आया यह तृप्ति का एहसास?

अब मैंने यही फैसला किया है कि उससे फिर कभी नहीं मिलूंगी. दो महीने लग गए मुझे सामान्य होने में. यह मन लगता है अब उतना मज़बूत नहीं रहा. अनेक बार प्रश्‍न कर उठता है ‘तमाम उम्र तो औरों के लिए जी ली, अब इस उम्र में भी क्या अपने लिए नहीं जीओगी?’

पर सवाल केवल अपनी ही ख़ुशी का नहीं है, सच तो यह है कि बरगद के पेड़ों की तरह हो गए हैं हम दोनों. अनेक जड़ों से अपनी-अपनी भूमि से जुड़े.

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आज के माहौल में पली, आज की पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती अनिता क्या समझ पायेगी कि पा लेना ही सदैव प्यार की नियति नहीं होती. वर्षों एक-दूसरे की सुधि न पाकर, फिर मिलने की एक छोटी-सी उम्मीद  न रखकर भी याद की लौ जलाए रखना- इसे प्यार नहीं तो और क्या कहोगी अनिता? मेरी दिली तमन्ना है कि तुम्हें इस आग में न जलना पड़े, पर सच तो यह है कि प्यार देह आकर्षण से बहुत परे, बहुत ऊंचा, कुछ आलौकिक तत्व लिए होता है, एक जीवन काल से अधिक विस्तृत, अधिक विशाल.

तुम्हें सुनकर कुछ अजीब लगे शायद, पर यह सच है सरोज कि मैं आज भी उसे उतनी ही शिद्दत से चाहती हूं. पर जिसे हम प्यार करते हैं, उसे तो हम ख़ुश ही देखना चाहते हैं ना! और मैं जानती हूं कि उसकी ख़ुशी वहीं अपने परिवार के संग है. मैं स्वार्थी नहीं हूं. वह अपने परिवार के संग हर मुमकिन ख़ुशी पाये यही मेरी कामना है, मेरे लिए सर्वोच्च है. मैं भी तो अपने परिवार में रमी हूं न!

बड़ी भली लगी श्रीपत की पत्नी. बहुत ख़याल रखती है उसका. मैं ग़ौर कर रही थी वह जब भी श्री की तरफ़ देखती, उसकी नज़रें प्यार से सराबोर होतीं. चेहरे पर मुस्कुराहट होती. संपूर्ण श्रीपत की अधिकारिणी है वह. बंटे हुए की नहीं. उसके एक भी आंसू का मैं कारण नहीं बनना चाहती.

न ही श्रीपत ने उसे नाम से पुकारा और न ही मैंने उसका नाम पूछा, पर आते समय जब मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर विदा ली तो मन ने कहा- कान्हा का असली सच तो यही उसकी रुक्मिणी है. मैं तो उसके अतीत की, एक नासमझ उम्र की राधा मात्र ही हूं. यादों के सहारे जीना ही जिसके हिस्से आया है.

अलग-अलग राह पर ही चले थे कन्हैया और उसकी राधा, पर इस कारण उनके प्यार में कुछ कमी रह गई क्या?

Usha Vadhava

        उषा वधवा

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कहानी- शिखर पर (Short Story- Shikhar Par)

उस पल मुझे लगा कि गुत्थियों के जंगल से निकल मैं एक शिखर पर खड़ी हुई हूं, जहां सम्मान के साथ मुझे एक अच्छी पत्नी आदर्श मां होने का दर्जा दिया जा रहा है.

Short Story- Shikhar Par

“आप ज़हर खाकर मर क्यों नहीं जातीं.” नीरव की बात सुन मैंने हंसते हुए उससे पूछा, “तुम लोग रह लोगे मेरे बिना?”
“हां रह लूंगा.” वह तमतमाते हुए बोला.
अब तक मैं समझ रही थी कि वह किसी कार्टून के पात्र को अपने में उतारकर उसकी भूमिका अदा कर रहा है, पर उसके चेहरे पर छाई तटस्थता और एक मौन स्वीकृति के भाव ने मुझे एहसास कराया कि वह गंभीर है.
अपने 14 वर्षीय बेटे के मुंह से यह बात सुन मैं हैरान रह गई. मुझे अपनी मां होने की क्षमताओं पर संदेह होने लगा.
“आप और बच्चों की मम्मी जैसी क्यों नहीं हैं? आप घर पर भी नहीं रहतीं. बस, पापा अच्छे हैं. हर समय मेरा ख़याल रखते हैं. स्कूल से आता हूं तो पापा ही घर पर मिलते हैं, आप नहीं.”
“बेटा, मेरा जॉब ही ऐेसा है, जिसमें मुझे ज़्यादा व़क़्त घर से बाहर रहना पड़ता है. तुम्हारे पापा का काम ऐसा है कि वे लंच के लिए घर आ सकते हैं. फिर घर के पास ही है उनका ऑफ़िस. पापा ख़ुद ही बॉस हैं, इसलिए जब चाहे घर आ-जा सकते हैं.” मैंने उसे समझाने की कोशिश की.
हालांकि इस उम्र में उसे समझाना बेमानी लगता था. वह काफ़ी समझदार हो चुका था. यह भी समझता था कि मम्मी की नौकरी की वजह से ही सुख-सुविधाओं के अंबार जुटते थे… फिर भी मन को समझाया, आख़िर है तो बच्चा ही.
“आप अच्छी मम्मी नहीं हैं. आप मम्मी जैसी मम्मी नहीं हैं.” मुझे लगा कि जैसे नीरव ने मेरे मुंह पर करारा तमाचा जड़ दिया है. ‘मम्मी जैसी मम्मी नहीं.’ आख़िर उसकी नज़र में मम्मी की क्या परिभाषा है? शायद वही ठीक है. मैं एक आदर्श मां की श्रेणी में नहीं आती हूं. आती तो मैं एक आदर्श पत्नी की श्रेणी में भी नहीं हूं… अपेक्षाओं को ठीक से समझकर पूरा करना दूसरों को ख़ुश रखने के लिए आवश्यक होता है. तभी दूसरे चाहे वह पति हो या बच्चा या कोई और. आपसे ख़ुश रह सकते हैं और अपनी ख़ुशी… अपनी अपेक्षाएं… क्या उनके बारे में सोचना स्वार्थी होने की निशानी होती है?
सिलसिला उस दिन ही रुका नहीं, क्योंकि नीरव की वह प्रतिक्रिया मात्र क्षणिक नहीं थी, दबे हुए ज्वालामुखी के फूटते लावे जैसी थी. वह भूला नहीं कि उसने क्या कहा था, वरना ग़ुस्से में तो वह न जाने क्या-क्या कह जाता था. उस दिन ऑफ़िस से आकर बैठी ही थी कि बोला, “ज़रा मार्केट जाना है, एक क़िताब ख़रीदनी है. आप चलो.”
“बेटा, अभी तो आई हूं, थोड़ी देर में पापा आ जाएंगे, तब उनके साथ चले जाना.”
बस तुनक गया वह. “आप मेरी मम्मी नहीं हैं.” अपने कमरे में जाकर उसने चीज़ों को इधर-उधर फेेंकना शुरू कर दिया. मन तो हुआ उसे झिंझोड़ डालूं, पर ठहर गई. थकावट और दर्द के सैलाब को स़िर्फ आंखों में समेट लिया. उम्र के कारण शरीर में हो रहे बदलावों की वजह से वह इस तरह रिएक्ट करने लगा था या सचमुच में वही उसकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही थी.
नौकरी को मजबूरी कहकर नौकरी करना स्वयं को जस्टिफाई करने जैसा होता है. उसकी मजबूरी तो नहीं थी, हां शा़ैक था. वह घर बैठ ही नहीं सकती थी और फिर अच्छा जॉब मिलना भी क्या आसान होता है. क्षितिज का बिज़नेस ठीक-ठाक चल रहा था. ऊपर-नीचे तो बिज़नेस में होता ही रहता है, लेकिन अगर वह नौकरी न भी करे तो भी अच्छी ज़िंदगी जी जा सकती थी. अच्छी ज़िंदगी यानी अच्छा खाना, अच्छे कपड़े. ज़रूरतें पूरी हो सकती थीं, पर लिविंग स्टैंडर्ड मेंटेन उसकी नौकरी के चलते ही हो पाता था.
“ज़रूरत क्या है तुम्हें धक्के खाने की, घर में रहो और नीरव पर ध्यान दो.” क्षितिज कई बार उससे कह चुका था. आज भी उसके आते ही वही बहस शुरू हो गई थी. “एक दिन उसकी बात मान उसके साथ चली जातीं तो क्या हो जाता? कितनी बार कहा है कि नौकरी छोड़ दो, पर तुम तो बस अपने बारे में सोचती हो.”
“सही समझे, आख़िर नौकरी तो मैं अपने लिए कर रही हूं. बढ़ती महंगाई और रिसेशन के इस समय में तुम्हें क्यों नहीं यह बात समझ आती कि नौकरी आजकल कोई मौज-मस्ती करने की चीज़ नहीं है, एक ज़रूरत है. उन लोगों से जाकर पूछो, जिनके यहां कमानेवाला एक ही है. कितनी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं उन्हें और तुम चाहते हो कि मैं सारे दिन किचन में घुसी रहकर अपने टैलेंट और हर महीने मिलने वाले वेतन को नज़रअंदाज़ कर दूं.”
“मैं ये सब नहीं जानता बस…” क्षितिज को मानो कहने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे.

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“मैं भी नीरव के साथ क्वालिटी टाइम गुज़ारती हूं, पर उसने अपने मन में मुझे लेकर न जाने कैसी धारणाएं बना ली हैं. उसे समझाने से पहले तुम्हें मुझे समझना होगा. मैं इस तरह की ज़िंदगी नहीं जी सकती. मुझे लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता है. इतने बरसों से नौकरी करते-करते इसकी आदत हो गई है. अब छोड़ दी तो फिर नहीं मिलेगी. बी प्रैक्टिकल क्षितिज. फिर आगे नीरव की पढ़ाई का ख़र्च दिन-ब-दिन बढ़ेगा ही.”
“तुम तो अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए घर से बाहर रहना चाहती हो. न जाने कौन-सी उपलब्धि की चाह तुम्हें घर के बाहर रहने के लिए उकसाती है. और फिर मैं कौन-सा तुम्हें घर में ़कैद होने के लिए कह रहा हूं. तुम्हें घूमने-फिरने की मनाही तो नहीं है. नीरव जिस दौर से गुज़र रहा है, ऐसे में बिगड़ने की संभावना ज़्यादा रहती है. तुम घर पर रहोगी तो कम से कम यह तो देख सकोगी कि वह टीवी पर क्या देख रहा है, नेट स़िर्फंग के कितने भयानक परिणाम देख-सुन चुके हैं हम.”
“पर तुम तो घर पर काफ़ी व़क़्त बिताते हो. तुम उस पर नज़र रख सकते हो. नीरव हम दोनों की ही ज़िम्मेदारी है. जैसी जिसकी सुविधा हो क्या, मैनेज नहीं करना चाहिए? ” इस बार उसकी आवाज़ में न तो तल्खी थी, न ही रोष. क्षितिज की ओर से कोई जवाब न पाकर मैंने फिर कहा, “क्या कोई और रास्ता नहीं निकल सकता?” मैं अपनी तरफ़ से किसी भी तरह की कोशिश करने में कोताही नहीं करना चाहती थी.
“जब रास्ता साफ़ दिख रहा है तो बेवजह दिमाग़ ख़राब करने से क्या फ़ायदा?” क्षितिज ने चिढ़कर कहा.
“यानी हर स्तर पर समझौता मुझे ही करना होगा?”
“तुम औरत हो और एक औरत को ही समझौता करना होता है. वैसे भी एक मां होने का दायित्व तो तुम्हें ही निभाना होगा. अपनी हद में रहना सीखो.” क्षितिज की बात सुन मेरा मन जल उठा.
मैं घायल शेरनी की तरह वार करने को तैयार हो गई, “अच्छा आज यह भी बता दो कि मेरी हद क्या है?”
“हद से मेरा मतलब है कि घर संभालो, नीरव को संभालो. खाओ-पीओ, मौज करो.” क्षितिज के स्वर में बेशक पहले जैसी कठोरता नहीं थी. आवाज़ में कंपन था, लेकिन उसकी सामंतवादी मानसिकता के बीज प्रस्फुटित होते अवश्य महसूस हुए. एक सभ्य समाज का प्रतिनिधित्व करनेवाला पुरुष लाख शिक्षित हो, पर बचपन में उसके अंदर औरत को दबाकर रखने के रोपे गए बीजों को झाड़-झंखाड़ बनने से कोई नहीं रोक सकता.
क्षितिज की बात सुन मैं हैरान रह गई. क्षितिज जैसे पढ़े-लिखे इंसान की मानसिकता ऐसी हो सकती है? क्या पत्नी से उसकी अपेक्षाएं बस इतनी ही हैं? मेरी इच्छाओं का मान रखना, मेरे व्यक्तित्व को तराशने तक का ख़याल नहीं आता उसे? मैं कब अपने मां होने की ज़िम्मेदारियों से पीछे हटना चाहती हूं, पर क्षितिज का साथ भी तो नीरव को सही सोच देने के लिए
ज़रूरी है.

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अपने आंसुओं को पीते हुए इस बार बिना कोई जवाब दिए मैं अंदर कमरे में चली गई. समझाया तो उसे जाता है, जो समझने को तैयार हो, जिसके मन की खिड़कियां खुली हों. क्या नीरव की चिंता उसे नहीं है? वह तो बस उससे थोड़ा-सा सहयोग चाहती है.
नीरव उन दोनों को लड़ते देख अपने कमरे में चला गया था. उसे अपने ख़ुद पर भी ग्लानि हो रही थी. वह इतना छोटा तो नहीं कि ख़ुद मार्केट न जा सके. अब वह नौवीं में है और हर काम ख़ुद कर सकता है… वैसे भी पढ़ने और ट्यूशन में काफ़ी समय निकल जाता है. फिर क्यों वह हर समय… पर पल भर के लिए मन में आए ये विचार उसके अंदर जड़ जमाई सोच के आगे पानी के बुलबुले की मानिंद ही साबित हुए.
‘नो, मम्मी इज़ रॉन्ग’, वह बुदबुदाया.
इधर क्षितिज को समझ नहीं आ रहा था कि वह किस तरह से इस ‘हद’ को परिभाषित करे. उसने तो वही कहा था, जो आज तक वह देखता आया था. उसकी दादी, मां, बुआ, चाची, यहां तक कि बहनें और भाभी भी इसी परंपरा का निर्वाह कर संतुष्ट जीवन जी रही थीं.
‘क्या वाकई में वे संतुष्ट हैं?’ उसकी अंतरात्मा ने उसे झकझोरा. अपनी मां को पिता की तानाशाही के आगे कितनी ही बार उसने बिखरते देखा था. पिताजी के लिए तो मां की राय का न कोई महत्व था, न ही उनका वजूद था. मां जब भी कुछ कहतीं, पिताजी चिल्लाकर उन्हें चुप करा देते थे. सारी ज़िंदगी मां चूल्हे-चौके में खपती रहीं. केवल जीना है, इसीलिए जीती रहीं. अंत तक उनके चेहरे पर सुकून और संतुष्टि का कोई भाव नहीं था. मां का दुख हमेशा ही उसे दर्द देता था, फिर आज क्यों वह…
उसकी बहनों को भी पिताजी ने कभी सिर उठाकर जीने का मौक़ा नहीं दिया. न मन का पहना, न खुलकर वे हंसीं. जहां क्षितिज की हर इच्छा को वह सिर माथे लेते थे, वहीं उसकी बहनों की हर छोटी से छोटी बात में कांट-छांट कर देते थे. वे हमेशा ही डर-डर कर जीं और आज ब्याह के बाद भी उनकी दुनिया घर की देहरी के अंदर तक ही सिमट कर रह गई है. उससे छोटी हैं, पर समय से पहले ही कुम्हला गई हैं. एक वीरानी-सी छाई रहती है उनके चेहरे पर. ख़ुशी की कोई किरण तक उन तक पहुंचती होगी, ऐसा लगता नहीं.
“पापा, बुक लेने चलेंगे? इस पास वाली मार्केट में नहीं, आगे वाली में मिलेगी, वरना मैं ख़ुद ले आता.” नीरव ने उसकी तंद्रा भंग की तो वह सोच के ताने-बाने से बाहर आया.
“हां, क्यों नहीं.” क्षितिज ने उसका कंधा थपथपाया.
“यू आर ग्रेट पापा, लेकिन मम्मी तो बस… उनके पास मेरे लिए समय ही नहीं है. मैं उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं करता…” नीरव की बातें मेरे कान में पिघले हुए सीसे की भांति घुल रही थीं. एक बच्चा अपनी मां के बारे में ऐसा सोचे, इससे ज़्यादा आहत करने वाली बात और क्या हो सकती है? मेरा बेटा मुझसे दूर हो जाए, इससे तो बेहतर है कि मैं नौकरी छोड़ दूं. तभी शायद मैं उसकी उम्मीदों की मां बन सकूं.
नीरव शायद अपनी रौ में बहता ही जाता मानो मन की सारी भड़ास वह आज ही निकाल लेना चाहता हो. क्षितिज ने उसे कभी रोका भी तो नहीं, बल्कि उसके सामने मुझमें ही ग़लतियां निकालते रहते हैं. पर आशा के विपरीत क्षितिज की आवाज़ गूंजी.
“चुप रहो! अपनी मां के बारे में इस तरह बात करते तुम्हें शर्म नहीं आती? उनकी रिस्पेक्ट करना सीखो. वे तुम्हारी ख़ुशियों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करती हैं. उनको जितना भी समय मिलता है, वह तुम्हारे साथ बिताती हैं और तुम हो कि…
वह दुनिया की सबसे अच्छी मां ही नहीं, पत्नी भी हैं.”
मेरी आंखों में नमी तैर गई. मैंने क्षितिज की ओर देखा. उसकी आंखों में आज पहली बार वह भाव दिखा जो जता रहा था कि वह मेरी भावनाओं की कद्र करता है. उसने मेरे हाथ को अपने हाथ में लिया तो मुझे आशवस्ति का एहसास हुआ. अपनों का विश्‍वास ही तो कठिन से कठिन परिस्थितियों से उबारने में मदद करता है.
नीरव को सिर नीचा किए खड़े देख मैंने उसके बालों को सहलाया तो वह मुझसे लिपट गया, “आई एम सॉरी मम्मी, अब मैं कभी आपसे ग़लत ढंग से बात नहीं करूंगा. आई लव
यू मम्मी.”
उस पल मुझे लगा कि गुत्थियों के जंगल से निकल मैं एक शिखर पर आ खड़ी हुई हूं , जहां सम्मान के साथ मुझे एक अच्छी पत्नी व आदर्श मां होने का दर्जा दिया जा रहा है.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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कहानी- फाउल (Short Story- Foul)

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बाप रे! एक भी उत्तर इस तरह नहीं दे रही है कि कोई सुराग मिले. तो क्या व़क़्त आ गया है स्पष्ट पूछने का कि तुमने किसी से प्रेम किया है? किसी की हरे रंग की शालूवाली बनी हो? क्या तुम्हारे परिवार की मर्यादाएं भी प्रेम पर आकर भंग होती हैं? पर ऐसा कोई एपीसोड इसके जीवन में न हुआ, तो यह कितना बुरा मानेगी कि मुझे अपने जैसा धूर्त समझा है? अभिज्ञान यह पूछने का साहस न दिखा सका.

अभिज्ञान को लगता है वह अलग-अलग तरह से स़िर्फ सोचता आ रहा है. उसने जो काम सबसे अधिक किया है, वह है सोचने का. अब तक कुछ नहीं किया है सिवाय सोचने के. जब नई-नई जवानी के दिन थे तब सोचता था कि ‘गुलेरी’ की कहानी ‘उसने कहा था’ की हरे रंग की शालूवाली एक उसकी ज़िंदगी में भी आये, तो वह आई, जब वह इस विकासशील नगर के सुस्थापित अधिवक्ता अयोध्या प्रसाद के अण्डर में वकालत सीख रहा था. अयोध्या प्रसादजी के चैम्बर में उस व़क़्त पांच जूनियर थे. चार लड़के और पांचवीं वही… जो अंततः हरे रंग की शालूवाली निकली. चारों लड़के उस पर समान भाव से फिदा थे, पर वह अभिज्ञान पर फिदा हुई. अभिज्ञान इसे एक उपलब्धि की तरह देखता था.
पर शायद सभी हरे रंग की शालू वालियां एक-सी क़िस्मत लिखाकर लाती हैं. इस प्रकरण में इतनी भर विविधता हुई कि कुड़माई शालूवाली की नहीं, अभिज्ञान की हो गई. जैसा कि आरंभ में ही स्पष्ट किया गया है, अभिज्ञान अलग-अलग तरह से सोचता आ रहा है तो उसने सोचा कुड़माई का कड़ा विरोध करेगा, पर नहीं कर पाया. उसे लगता है वह तीन भाइयों और एक बहन में सबसे बड़ा है, पर उसकी हमेशा कम सुनी गई है. कारण बहुत साफ़ है, मझला भाई ध्वज एम.डी. कर रहा है, छोटा भाई धरम एम.बी.ए. कर अभी-अभी एक मल्टीनेशनल कंपनी में आकर्षक वेतन पर लगा था, जबकि अभिज्ञान कुछ ख़ास नहीं कर पाया था, जिसका परिणाम पूरा परिवार भुगत रहा था. दोनों छोटे भाइयों के लिये शानदार वैवाहिक प्रस्ताव निरंतर आ रहे थे, जबकि अभिज्ञान के लिये प्रस्ताव आ नहीं रहे थे और जो आ रहे थे, वे उस गौरव को कम कर देते थे जो इस परिवार को दोनों छोटे लड़कों के कारण प्राप्त हो रहा था. ऐसी संवेदनशील स्थिति में भाग्य से आये मनीषी के प्रस्ताव पर बाबूजी ने अभिव्यक्ति दे दी.
“अभिज्ञान, बेवकूफ़ी छोड़ो और हमें कुछ जीने दो… क्या यह शोभा देता है कि एक तुम्हारी वजह से मैं उन बड़े-बड़े लोगों को कोई उत्तर न दूं, जो ध्वज और धरम के लिये आ रहे हैं?”
“तो ध्वज और धरम की शादी कर दीजिए.”
“बड़ा बैठा रहे और छोटों की शादी हो जाये तो इस खानदान की प्रतिष्ठा बची रहेगी?”
“तो पहले मेरी कर दीजिए, सुहानी से.”
“यह नहीं होगा. निम्न वर्ग की लड़की विप्र कुल में नहीं आयेगी. और तुम इश्क़ में निकम्मे न बनो. बड़े इंतज़ार के बाद यह जो प्रस्ताव आया है, इसकी कद्र करो. मैं न जानता था अयोध्या प्रसाद के चैम्बर में वकालत नहीं इश्क़ सिखाया जाता है… तुम्हारा कैरेक्टर ख़राब हो गया.”
अभिज्ञान क्या-क्या तो सोच रहा था. वह और सुहानी जल्दी ही अयोध्या प्रसाद से अलग होकर पार्टनरशिप में स्वतंत्र वकालत शुरू करेंगे, विवाह करेंगे और दुनिया को मुट्ठी में कर लेंगे और यहां पता नहीं क्या हुआ जा रहा था उसे.

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वह पता नहीं कितना कुछ सोचता रहा और एक रात जब पता नहीं कितना बजा था तब बहन ने उसे उसके कमरे में ठेल दिया इस उम्मीद के साथ कि घर में जबरन बस जानेवाली फाख़्ता से भी मोह हो जाता है, मनीषी तो कमनीय कन्या है. वह ठिठका रहा, क्या करे अब इस मनीषी नाम की परिणीता का? कैसे स्वीकारे? पर मनीषी ज़हीन निकली. वह सो चुकी थी. अभिज्ञान अपने ही कमरे में अपने ही बिस्तर की छोटी-सी जगह में इस तरह सिकुड़ कर बैठा रहा मानो अब वह बिस्तर उसका नहीं था. देर तक व्यर्थताबोध में बैठा रहा, फिर सोचने लगा मनीषी को जगाये और वकील से सधे अंदाज़ में प्रश्‍न पूछे, “यह विवाह तुमने क्यों किया? मर्ज़ी से किया या…? तुमने कभी प्रेम किया है? बनी हो किसी की हरे रंग की शालूवाली? नहीं? तो फिर मेरे प्रश्‍नों का सही उत्तर नहीं दे सकोगी. बहुत अंतर होता है प्रेम करनेवालों और न करने वालों के अनुमान और मानसिकता में.”
विचित्र था मनीषी का अंदाज़े-बयां. वह चुप रहती थी. अभिज्ञान उसकी इस चुप्पी पर हैरान था. अम्मा बात-बात में बड़बड़ाती हैं, बहन बात-बात में पैर पटकती है, सुनने में आया है ससुराल में भी उसकी आदत गई नहीं है. सुहानी बात-बात में हंसती है. मौन रहनेवाली लड़की शायद यह पहली ही है, जबकि मनीषी का मौन घरवालों को कृतज्ञ किये था. इस तरह के बहुत से प्रश्‍नों से बचे हुए थे. वे मनीषी के प्रति संवेदनशील होते जा रहे थे. बाबूजी ने एक बार फिर समझाया, “अभिज्ञान, अब तुम पर एक ज़िम्मेदारी है. स्वतंत्र रूप से वकालत क्यों नहीं शुरू करते?”
“सोच रहा हूं, सुहानी के साथ पार्टनरशिप में शुरू कर दूं.”
“एक स्त्री और एक पुरुष की पार्टनरशिप जैसा कुकाण्ड इस शहर में अब तक नहीं हुआ है. लोग तुम्हें केस तो क्या देंगे, मु़फ़्त तमाशा ज़रूर देखेंगे.”
“हम दोनों वकील हैं, पुरुष-स्त्री जैसी बात बीच में क्यों लाते हैं?”
वस्तुतः यह एक विचित्र स्थिति थी. मनीषी से विवाह कर अम्मा-बाबूजी की हसरत पूरी कर देने के साथ ही अभिज्ञान मानो दबाव से मुक्त हो गया था और अपनी मर्ज़ी चला कर अम्मा-बाबूजी दबाव में आ गये थे. दोनों पक्ष इतनी सावधानी व सतर्कता ज़रूर बरत रहे थे कि उनके आपसी अवरोध-प्रतिरोध मनीषी तक न पहुंचें और हालात एक दिन सुधर जाएंगे.
इधर मनीषी अम्मा-बाबूजी की जद्दोज़ेहद और अभिज्ञान के फितूर से ख़ुद को पूरी तरह अलग रखे हुए थी. यहां तक कि वह जब मायके जाने लगी तब भी उसने अभिज्ञान से बात न की. अभिज्ञान ने सोचा था, वह इतना तो ज़रूर पूछेगी और पूछना ही चाहिए कि आख़िर आप इस तरह छिटके हुए क्यों हैं? नहीं पूछा. यह नहीं, पर कुछ तो पूछती. तब अभिज्ञान ने पूछा, “मायके जा रही हो? पैसे हैं न?”
“अम्मा ने दे दिये हैं. वैसे वहां पैसे की क्या ज़रूरत होगी?” मनीषी ने आंखें झुकाए हुए कहा. तो अम्मा ने पैसे दिये. बीच में ध्वज आया था, तो इसके लिये साड़ी और चूड़ियां लाया था. तो हर कोई इस पर चाहतें लुटा रहा है कि फिर यह एक दिन प्रसन्न करेगी. ख़ैर, मैं प्रसन्न होने से रहा. यह मायके जा रही है फ़िलहाल यह प्रसन्नता ज़रूरी है. बड़े दिन हुए अपने ही कमरे में अजनबी की तरह सोते हुए. ख़ूब पसर कर सोऊंगा… पर रात तो आई, नींद नहीं आई. वही सोचने की बीमारी. क्या कोई लड़की इतनी शांत हो सकती है? लगभग अनुपस्थित, अदृश्य. मनीषी इतने दिनों यहां रही, क्या सोचती रही होगी? मौन रहकर क्या इस रिश्ते को अमान्य कर रही है? या एहतियात बरत रही है कि सब ठीक हो जायेगा? या चुनौती दे रही है कि ऐसे आदमी का तिरस्कार ही करना चाहिए? पर मनीषी से मुझे क्या प्रयोजन? मैं इतना क्यों सोच रहा हूं? यह सोचना थमता क्यों नहीं?

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घर में ये सब चल रहा था तो घर से बाहर भी वारदातें हो रही थीं. जैसे कि सुहानी ने बताया, “अभिज्ञान, मेरी शादी हो रही है. तुम पुरुष होकर ज़माने से न लड़ सके, फिर मैं कब तक लड़ती? वकालत में भी काम नहीं जम पा रहा है. वकालत ने काले कोट के अलावा कुछ न दिया, तुमने दी निराशा. ज़माने ने बनाया तमाशा… तो तुम्हीं कहो क्या करती?” अभिज्ञान के सामने मानो बिजली गिरी. इसी सुहानी ने तो कहा था, “अभि, तुम्हारा विवाह भले ही हो गया, हमारा इश्क़ ठंडा नहीं पड़ना चाहिए.” इसी दम पर तो मनीषी से मतलब न रखा. अभिज्ञान अपमान, अवमानना, अवमूल्यन जैसी अकबकाहट से भर गया. सचमुच जगत मिथ्या है. सिद्धांत या आदर्श जैसा तो कुछ रहा ही नहीं.
सुहानी के विवाह को अभिज्ञान के घर में चमत्कार के तौर पर देखा गया- अम्मा ने भगवान को बूंदी के लड्डुओं का भोग चढ़ाया.
मनीषी ने पूछा, “यह किस ख़ुशी में अम्मा?”
“उस मुसुटिया (चुहिया) के बियाह की ख़ुशी में.” अम्मा विहंस कर बोलीं.
मुसुटिया के बियाह की प्रतिक्रिया क्या रही, जानने के लिए अभिज्ञान ने हठात मनीषी को देखा. वहां ईर्ष्या या द्वेष जैसा कोई भाव नज़र नहीं आया. अभिज्ञान का सोचना तेज़ हो गया. तो मनीषी को इस प्रेम-प्रसंग की जानकारी है? क्या अम्मा ने संज्ञान दिया कि जैसे भी हो, तुम अभिज्ञान को मुसुटिया के जाल से निकालो? तो क्या मनीषी की दृष्टि में मेरी छवि ध्वस्त हो चुकी है? और यही है इसके मौन का कारण…?
उधर सुहानी फिर कचहरी में नज़र न आई. इधर मनीषी का तटस्थ भाव. अभिज्ञान की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? न घर में लगे दिल न बाहर. बाबूजी ने उसकी उलझन भांपी और बड़े दिनों बाद दुलार से उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “अभिज्ञान, तुम्हारी परेशानी यह है कि तुम सकारात्मक नहीं सोचते.”
सकारात्मक सोचने का क्रम कुछ यूं जमा. आख़िर मनीषी इतनी चुप क्यों रहती है? कुछ सोचती नहीं मेरे बारे में? अम्मा द्वारा ध्वस्त की गई मेरी छवि के बारे में? क्या कभी भी मुझमें रुचि नहीं लेगी? सोचा था रोने-धोने, मनावन-रिझावन, उठा-पटक, ध्वंस- जैसा कुछ होगा, पर यहां तो ऐसी शांति बहाल है कि अब अड़चन होने लगी है. रात में यह जल्दी सो जाती है. दिनभर काम में लगी रहती है. अब पूजा कर रही है… अब खाना बना रही है… अम्मा-बाबूजी को खिला रही है- कपड़े धो रही है- यह थकती-खीजती, ऊबती नहीं? इसकी कोई अपेक्षा, उम्मीद, साध नहीं? नहीं, सुहानी अभिज्ञान के जेहन से गई नहीं थी. वह मनीषी को लेकर धड़कन, संवेदन, स्पंदन भी अपने भीतर नहीं पा रहा था, पर पता नहीं क्यों चाहने लगा था कि मनीषी इस तरह तुच्छ बनकर न रहे, बल्कि कायदे से रहे, तो अम्मा से बोला, “अम्मा, ऐसे तो यह बीमार हो जायेगी. थोड़ा भी आराम नहीं करती.”
अम्मा मोद मगन हो गई, “तुम्हें फ़िक़्र होने लगी?”
“फ़िक़्र की क्या बात…” कहकर अभिज्ञान ने लापरवाही दिखानी चाही, पर उसे सचमुच फ़िक्र होने लगी थी. यही कि कुछ गड़बड़ है. इसके मौन के कुछ मायने हैं. यह कि मैं ही दूर नहीं भाग रहा हूं, मनीषी भी मुझसे दूर भाग रही है. यह भी मुझे स्वीकार नहीं कर रही है. यह भी मुझे एक हस्तक्षेप की तरह देख रही है. और बिल्कुल करिश्माई ढंग से उसने यह भी सोचा कि यह भी किसी से प्रेम करती है जैसे कि मैं… उफ्, यह क्या करती है इससे मुझे क्या? मैं यह सब क्यों जानना चाहता हूं? क्योंकि मुझे जानना चाहिए. मैं इसके बारे में जानू यह मेरा नैतिक, मौलिक, संवैधानिक अधिकार है. और कुछ न बताकर यह मेरे अधिकारों का हनन कर रही है. तब अभिज्ञान ने पूछ ही लिया, “तुम्हें यहां अच्छा लगता है?”
“हां.”
“उस दिन अम्मा जो मुसुटियावाली बात कर रही थीं, ऐसा कुछ सुनकर भी?”
“उसमें आपका दोष नहीं है, क्योंकि बहुत से लोग प्रेम करते हैं.”
“तो तुम्हें आपत्ति नहीं है?”
“मेरी आपत्ति पर ध्यान कौन देता है?”
“क्या तुम्हें लगता है कि ये बातें तुम्हें न बताई जातीं तो बेहतर होता?”
“बातें छिपाना भी ठीक नहीं.”

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बाप रे! एक भी उत्तर इस तरह नहीं दे रही है कि कोई सुराग मिले. तो क्या व़क़्त आ गया है स्पष्ट पूछने का कि तुमने किसी से प्रेम किया है? किसी की हरे रंग की शालूवाली बनी हो? क्या तुम्हारे परिवार की मर्यादाएं भी प्रेम पर आकर भंग होती हैं? पर ऐसा कोई एपीसोड इसके जीवन में न हुआ, तो यह कितना बुरा मानेगी कि मुझे अपने जैसा धूर्त समझा है? अभिज्ञान यह पूछने का साहस न दिखा सका. इतना ज़रूर हुआ कि उसने मनीषी को बहुत गौर से देखा. मूर्त आकृति की तरह बैठी मनीषी के नैन-नक्श बहुत धारदार तो नहीं हैं, पर दूधिया स्निग्ध त्वचा चेहरे को स्वस्थ-सुंदर लुक देती है.
मनीषी का मौन अभिज्ञान को गैरक़ानूनी-सा लगने लगा. एक वह दिन था जब सोचा था इसकी सूरत नहीं देखेगा. एक यह दिन है जब लग रहा है यह कुछ बोले. अपने ग़ुस्से-चिढ़ का प्रदर्शन करे, प्रतिसाद करे, अभियोग ही लगाये. यह क्या है कि कमरे में मैं अवांछित-सा पड़ा हूं यह विरक्त-सी पड़ी है. वह बेचैन होकर कहने लगा,
“मनीषी, तुम अपनी दशा पर ख़ुश हो?” वह पत्नी को पहली बार नाम से
पुकार रहा था.
“हां.”
“यह जानने के बाद भी कि मैं ऐसा क्यों हूं?”
“आप कैसे हैं?”
“तुम्हें निराश किया.”
“नहीं तो.”
“तुम कुछ और चाहती थी?”
“मैं समझी नहीं.”
प्रेम-प्रसंग की सीधे जासूसी न कर उसने सभ्यता से काम लिया, “तुम स्टेट लेवल की बैडमिन्टन प्लेयर रही हो न… तो मेरा मतलब शादी के बाद करियर में रुकावट तो नहीं पाती हो? तुम अपने जिले की बेस्ट महिला खिलाड़ी मानी जाती थी न?”
“हां.”
“तो ग्राफ़ में जीत अधिक दर्ज है कि हार?”
“सिंगल्स, डबल्स में कुछ बार हारी हूं, पर मिक्स्ड में हमेशा जीती हूं.”
मिक्स्ड डबल्स… कौन था, इसका साथी? खेलने के अलावा और क्या काम करता होगा? क्या उम्र होगी? दोनों के बीच अनुराग जैसे तत्व…
“जब मायके जाती हो तब खेलती हो?”
“नहीं. खेल किसी के लिये नहीं रुका रहता. वहां दूसरे खिलाड़ी आ जाते हैं.”
“मिक्स्ड डबल्स में…” मनीषी ने उत्तर देने में तत्परता दिखाई, “मेरी जगह मिहार आ गई है. अच्छा तालमेल बना लिया है.”
“मिहार को अपनी जगह देखकर तुम्हें बुरा लगा?”
मनीषी ने इतना भर कहा, “खेल और ज़िंदगी के नियम अक्सर एक से होते हैं. जगहें भर जाती हैं.”
मनीषी का मौन और अभिज्ञान की बढ़ती मुश्किलें. दरअसल सब कुछ उल्टा हो गया था. सोचा था, वह भाग रहा होगा और यह रिझा रही होगी. लेकिन हुआ यह कि वह भाग रहा था, यह सिमट रही थी. उसका भागना थम गया, इसका सिमटना जारी रहा. अभिज्ञान प्रेम में वहशी होकर कपड़े फाड़कर न तो सड़क पर घूम रहा था, न वैरागी बन भगवा धारण कर सका था. तो अब आवश्यकता और उपयोगिता के मद्देनज़र वह समन्वय पर आना चाहता था.
सकारात्मक सोचना चाहता था. तो सकारात्मक सोचते हुए उसने पाया कि वैसे तो उसने मनीषी पर ज़ुल्म नहीं किया है, पर फिर भी किया है. वह ख़ुद को गुनहगार पाने लगा, लज्जित हो गया, फिर क्षमाप्रार्थी की तरह मनीषी के सामने प्रस्तुत हुआ,
“मनीषी, तुम्हें मेरे बुरे व्यवहार से दुख तो ज़रूर पहुंचा होगा.”
“नहीं.”
“मैं क्या करता? मेरी मनःस्थिति तब क्या रही होगी. वह समय मैंने कैसे बिताया, तुम अनुमान नहीं लगा सकती.”
“लगा सकती हूं.”
“जो हुआ, मुझे उसका अफ़सोस है.”
“अफ़सोस न करें. आपके व्यवहार से मुझे सुविधा हो गई. मुझे ख़ुद को संभालने का समय मिल गया.” मनीषी ने अब भी आंखें झुका रखी थीं और आंखों पर ये जो पलकें तनी हुई थीं, वे भापने न देती थीं, आंखों में क्या ठहरा हुआ है? कोई कसक, कोई चुभन, अफ़सोस, पीछे छूट गई कोई स्मृति… अभिज्ञान को अनायास मिक्स्ड डबल्सवाले का ख़याल आ गया. तो घटा है कुछ मनीषी के साथ भी? नहीं कर पाई होगी मां-बाप का विरोध, रहे हैं कुछ अनिश्‍चय? भूलने में लगा होगा व़क़्त… और अब संभल रही है… ठीक मेरी तरह…
अभिज्ञान ने मानो बेसुध में पूछा, “तो क्या तुमने भी कुछ फाउल किये हैं?”
“हां, खेल की तरह ज़िंदगी में भी फाउल होते हैं, पर सच यह भी है कि फाउल के बाद हम सम्भलते भी हैं.”
और यह पहली बार हुआ जब मनीषी ने आंखें उठाकर अभिज्ञान को भरपूर देखा.
अभिज्ञान के चेहरे पर ज़बर्दस्त बदलाव का दौर था. पहले बिजली गिरी, फिर अकबकाहट हुई, फिर सकारात्मक भाव उदित हुआ. यही कि घर में जबरन बस जानेवाली फाख़्ता से भी मोह हो जाता है, यह तो कमनीय कन्या है.

 

   सुषमा मुनीन्द्र

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कहानी- हैप्पी हार्मोंस (Short Story- Happy Harmons)

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रात को अचानक हॉट फ्लैशेज़ की वजह से मैं बहुत बेचैन हुई. शरीर पसीने से पूरी तरह भीग गया. समीर को जगाया, समीर ने तुरंत एसी ऑन किया. ठंडा पानी लाकर पिलाया, मेरे साथ जागते रहे. कुछ ठीक लगा, तो मुझे आराम से लिटाकर मेरा सिर सहलाते रहे. फिर कुछ मिनटों बाद अपनी प्यारी मुस्कुराहट के साथ बोले, “हैप्पी हार्मोंस डार्लिंग.” 

एक दिन एक पत्रिका पढ़ते हुए मेरी नज़र उसमें छपे एक लेख पर गई, मेनोपॉज़ के समय एक स्त्री किन-किन शारीरिक व मानसिक परिवर्तनों से गुज़रती है और कैसे उसके परिवार के सदस्यों को उसका ध्यान रखना चाहिए. यूं तो मेरा वो समय अभी दूर है, लेकिन मैंने यूं ही अपनी सत्रह वर्षीया बेटी सिद्धि को भी वह लेख पढ़वा दिया. वह पढ़कर हंस दी, “ओह मम्मी, आप अभी से इतनी टेंशन क्यों ले रही हैं. जब समय आएगा, तब देखा जाएगा.”

बात आई-गई हो गई थी. उसके बाद भी मैं कई पत्रिकाओं में इस विषय पर लेख पढ़ती रही. पढ़-पढ़कर मैं सोचती कि जब मैं उस दौर से गुज़रूंगी, तो कैसे कटेगा वो समय? मैं तो इतनी ख़ुशमिज़ाज हूं, इतना हंसती-बोलती हूं सबसे. क्या मैं चिड़चिड़ी हो जाऊंगी? क्या मुझे भी ग़ुस्सा आने लगेगा? मैं हमेशा से फिटनेस पर ध्यान देती आई हूं. सैर पर जाती हूं, योगा करती हूं, खाने-पीने का भी ध्यान रखती हूं. क्या ये सब बातें काम नहीं आएंगी? पता नहीं क्या होगा उस समय? क्या हमारे शांत-सुखी घर में मेरे मूड स्विंग्स से कलह हुआ करेगा? ऐसी मनोदशा से गुज़रते हुए कुछ साल और बीत गए.

इस विषय पर जब भी कोई लेख आता, मैं ध्यान से पढ़ती. मैं कोशिश कर रही थी कि मेरा अपने स्वभाव व व्यवहार पर नियंत्रण रहे. मैंने अपने पति समीर से इस बात का ज़िक्र किया. वे हंस दिए, कहने लगे, “सरिता, तुम भी ख़ूब हो. इस बात का इंतज़ार कर रही हो, जैसे कोई तुम्हारा इंटरव्यू लेने आनेवाला हो कि सरिताजी, आपने मेनोपॉज़ के लिए क्या-क्या तैयारी कर ली है. इतना क्यों सोचती हो इस बारे में? जो होगा, देखा जाएगा.”

फिर धीरे-धीरे ऐसा होने लगा कि जिन बातों पर मुझे हंसी आती थी, उन्हीं पर अचानक ग़ुस्सा आ जाता. सिद्धि और उससे तीन साल छोटी समृद्धि हैरान रह जाती. अभी तो मम्मी हंस रही थीं, अभी ग़ुस्सा हो गईं. मैं चिल्ला पड़ती, फिर अकेले में ख़ुद को समझाती कि ग़ुस्सा नहीं करना है, बच्चे ही तो हैं. मुझे अपने हर ग़ुस्से, हर चिढ़ पर याद आता- क्या यही मेनोपॉज़ की शुरुआत है? क्या हार्मोंस का असंतुलन शुरू हो गया है? लेकिन क्या करती, सच में ऐसा ही होने लगा था. कभी-कभी इतना ख़ुश रहती, चहकती रहती और कभी छोटी-सी बात पर आंखों में आंसू आ जाते और बाद में मुझे ख़ुद ही हैरानी होती. हालांकि मैंने यह तय कर रखा था कि मैं इस समय हर बात को शांत मन से सोच-विचारकर करूंगी, लेकिन देखते ही देखते मेरा अपने मूड पर नियंत्रण खो जाता और मैं सिद्धि-समृद्धि और कभी-कभी समीर पर भी बुरी तरह झुंझला उठती, जिसका मुझे बाद में बहुत दुख होता.

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एक बार ऐसा ही हुआ, मुझे तीनों पर इतना ग़ुस्सा आया कि मैं बहुत देर तक ग़ुस्से में बोलती रही. ये तीनों थोड़ी देर तो मुझे समझाते रहे, फिर चुपचाप बैठ गए. मेरा ग़ुबार जब निकल गया और मन शांत हुआ, तो मुझे ख़ुद पर ही शर्म आने लगी. मैंने तीनों को ‘सॉरी’ बोला. सिद्धि मेरे पास आकर बैठी, क्योंकि उसे पता था कि मुझे आत्मग्लानि महसूस हो रही है. मैं सिसकते हुए कहने लगी, “पता नहीं, मुझे क्या हो जाता है. ग़ुस्सा आ ही जाता है और अपने आप ख़त्म भी हो जाता है.”

सिद्धि ने कहा, “मम्मी, कहीं ये मेनोपॉज़ के मूड स्विंग्स तो नहीं हैं?” मुझे उसके कहने के ढंग पर ज़ोर से हंसी आ गई. वह बोली, “हां मम्मी, उस लेख में यही तो लिखा था. हां, यही कारण होगा. नहीं तो हमें इतना प्यार करनेवाली मम्मी हम लोगों पर ऐसे तो नहीं ग़ुस्सा कर सकती. है न मम्मी.” मैं हंस पड़ी. सिद्धि भी खिलखिला पड़ी, बोली, “देखना, अब मैं क्या करती हूं.” मैंने उसकी तरफ़ प्रश्‍नवाचक नज़रों से देखा, तो वह बोली, “बस, आप देखती जाओ.”

सिद्धि अब मेरी बेटी कम दोस्त ज़्यादा हो गई है. वो मेरी हर समस्या चुटकियों में हल करने लगी है. अगली बार जब मैं समीर पर झुंझलाने लगी, वे कुछ बोलते, उससे पहले ही सिद्धि बोल उठी, “पापा, आप थोड़ी देर चुप रहिए, प्लीज़.” समीर कुछ समझे नहीं. सिद्धि ने कहा, “देखो पापा, मम्मी को मूड स्विंग्स हो रहे हैं. अभी ठीक हो जाएंगी.” समीर सिद्धि के बात करने के इस ढंग को देखते रह गए और चुपचाप मुस्कुराते हुए बैठ गए. मैं शांत हो गई, तो सब मुस्कुरा दिए.

इसके थोड़े दिन बाद की बात है, समृद्धि खेलकर बहुत देर से घर लौटी. मैं बहुत देर से उसका इंतज़ार कर रही थी. जब वो आई, तो मैं उस पर चढ़ बैठी. समृद्धि कहने लगी, “मम्मी, आपको बताकर तो गई थी कि आज देर हो जाएगी. बहुत बच्चे खेलने आए, बहुत मज़ा आया मम्मी.” मैंने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और गरजना शुरू कर दिया. सिद्धि समृद्धि को अंदर कमरे में ले गई. मुझे उसकी आवाज़ सुनाई दे रही थी. वह उसे कह रही थी, “समृद्धि, बिल्कुल जवाब मत देना. मम्मी के हार्मोंस उन्हें परेशान कर रहे हैं. हमें उनका ध्यान रखना है. मैंने एक मैगज़ीन में पढ़ा है.”

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समृद्धि हैरानी से बोली, “ऐसा है?”

सिद्धि दादी अम्मा की तरह उसे समझा रही थी, “हां, मम्मी अभी यंग और ओल्ड एज के बीच में हैं न. कुछ हार्मोंस उनका मूड ख़राब करनेवाले हैं, इसलिए जब भी मम्मी को ग़ुस्सा आएगा, हमें बस इतना ही कहना है- हैप्पी हार्मोंस मम्मी.”

बहुत दिनों बाद मैं खुले मन से इतनी ज़ोर से हंसी और सिद्धि के इस आइडिया को याद करके देर तक मुझे हंसी आती रही. मेरे साथ-साथ ये तीनों भी खूब हंसे. बस, उस दिन से ग़ुस्सा बढ़ने से पहले ही मुझे याद आ जाता है कि अभी क्या होगा, अभी मैं चिल्लाऊंगी, तो दोनों बोलेंगे, ‘हैप्पी हार्मोंस मम्मी’ और फिर मैं हंस पड़ूंगी और समीर मुस्कुराते रहेंगे.

फिर कुछ महीने और बीते. रात को अचानक हॉट फ्लैशेज़ की वजह से मैं बहुत बेचैन हुई. शरीर पसीने से पूरी तरह भीग  गया. समीर को जगाया, समीर ने तुरंत एसी ऑन किया. ठंडा पानी लाकर पिलाया, मेरे साथ जागते रहे. कुछ ठीक लगा, तो मुझे आराम से लिटाकर मेरा सिर सहलाते रहे. फिर कुछ मिनटों बाद अपनी प्यारी मुस्कुराहट के साथ बोले, “हैप्पी हार्मोंस डार्लिंग.” सुबह के चार बज रहे थे और मैं ज़ोर से खिलखिला पड़ी. समीर थोड़ी देर हंसी-मज़ाक करते रहे. हम दोनों ने फिर फ्रेश होकर चाय पी. अब पांच बज रहे थे, हम रोज़ की तरह मॉर्निंग वॉक के लिए निकल गए. रास्ते में मैं सोच रही थी कि इतने सालों से मैं जिस मेनोपॉज़ के समय और दौर के आने की कल्पना मात्र से मन ही मन इतना घबरा रही थी, वह समय जब आया, तब यह एहसास हुआ कि जीवन का यह पड़ाव इतना प्यार करनेवाले अपने परिवार के साथ मैं आसानी से पार कर लूंगी.

     पूनम अहमद

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कहानी- बंधन टूटे ना (Short Story- Bandhan Toote Na)

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प्रिय अनुराग,

शुभाशीष!

कल तुमने फ़ोन पर जो कुछ भी कहा, सुनकर क्षणभर को तो स्तब्ध रह गया मैं, फिर भयभीत हो उठा. कहीं बेटा भी आजीवन पिता की तरह दुखों के सलीब पर…? हे ईश्‍वर! ऐसा कभी न हो, यही प्रार्थना कर रहा हूं. आज तक किसी से कुछ नहीं कहा. मन की पीड़ा मन में ही समेट ली, क्योंकि दुनिया की नज़र में एक पुरुष किसी भी परिस्थिति में दुखी, पीड़ित और लाचार कहां होता है? स्त्री की वेदना सब को सहज ही दिख जाती है, पर पुरुष की पीड़ा की ये विडंबना है कि वो नितांत सच्ची होते हुए भी झूठ के आवरण से ढंक दी जाती है.

बेटा, आज तुमसे बहुत कुछ बांटना चाहता हूं. जब से पता चला है कि बहू तुमसे नाराज़ होकर मायके चली गई है, तब से बेचैन हूं. किसी तरह नीति को मनाकर ले आओ बेटा. पति-पत्नी में से एक का भी दिल टूटता है, तो परिवार विखंडित हो जाता है. नन्हें अमृत के बारे में सोचो… क्या वो तुम दोनों में से एक के बिना भी अच्छा जीवन जी पाएगा? आख़िर बहू चाहती क्या है? इस प्रश्‍न का उत्तर ढूंढ़ो बेटा. ताली एक हाथ से नहीं बजती.

नहीं, मैं तुम्हें दोष नहीं दे रहा. जानता हूं, तुम साफ़ दिल के सच्चे व संवेदनशील इंसान हो, पर बेटा, बुरा मत मानना. तुमने उसी तरह अपनी पत्नी पर हावी होने की कोशिश की है, जैसे तुम्हारी मां मुझ पर हावी हुआ करती थी. मैं जानता हूं तुम्हारी मां का मेरे प्रति व्यवहार ही तुम्हारी सोच को एकांगी बनाता रहा है. बच्चा जो देखेगा, वही तो सीखेगा न. आज बहू में मैं अपना अक्स देख रहा हूं. तुम्हारी कटु से कटु बातों को भी वो सहजता से सह लेती है. शायद अब उसकी वेदना का बांध टूट गया हो.

कुछ लोग अपनी ही संवेदनाओं के मारे होते हैं, जैसा मैं था. बचपन से ही दब्बू ग़लती चाहे किसी की भी हो, मैं ही आगे कर दिया जाता था और डांट खाकर अकेला चुपचाप सुबकता रहता था. पिता का भय मेरे मन पर इतना ज़्यादा था कि उनकी एक तेज़ आवाज सुनकर मैं कांपने लगता था. मां मेरी मनोस्थिति से नितांत अनजान थीं. उनके लिए तो मैं उनके सात बच्चों में से एक था. बस, मेरा बचपन दबा-सहमा था, मैं हमेशा सोचता था, जब मैं पिता बनूंगा, तो अपने बेटे को जितना प्यार दूंगा, उतनी आज़ादी भी दूंगा. वो मुझसे डरेगा नहीं, मेरा दोस्त बनेगा. मैंने अपनी ओर से पूरा प्रयत्न किया है, कितना सफल हुआ, ये तो तुम ही बता सकते हो न? मैंने अपना दर्द तुमसे कभी नहीं बांटा, मैं तुम्हें दुख जो देना नहीं चाहता था, पर आज जब तुम उसी मोड़ पर तन्हा, उदास और किंकर्त्तव्यविमूढ़ से खड़े हो, जहां कभी मैं खड़ा था, तो एक पिता होने के नाते अपना मन तुम्हारे सामने खोलकर रख रहा हूं. जो ग़लतियां मैंने की थीं, उन्हें तुम कभी मत दोहराना.

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हर चीज़ की एक सीमा होती है बेटा. प्रेम, दया, क्षमा, क्रोध, सहनशीलता और मौन- सभी का. आज तुम्हारे पिता के मौन की सीमा भी टूट रही है. बहुत सहा है मैंने, बचपन से लेकर उम्र के बासठवें पड़ाव तक. पिता के कठोर अनुशासन से जो दब्बूपन मेरे भीतर जन्मा, वो युवावस्था में भी कायम रहा. मैं पढ़ाई में अव्वल था, देखने में सुंदर था, पर मेरी प्रतिकार करने की शक्ति न जाने कहां विलुप्त हो गई थी. जब भी किसी से ‘नहीं’ कहने की इच्छा होती, दिल तेज़ी से धड़कने लगता, पसीने-पसीने हो उठता मैं और अंत में परिस्थितियों को दूसरों की इच्छानुसार स्वीकार करता चला जाता.

विवाह हुआ तो सोचा जीवनसंगिनी के सान्निध्य में जीवन का हर सुख जीऊंगा, पर यहां भी नियति ने धोखा दिया. कहां तुम्हारी मां, आइएएस पिता की इकलौती लाडली और कहां मैं, एक मध्यमवर्गीय परिवार का तीसरा बेटा. तुम्हारे नाना बहुत बुद्धिमान व्यक्ति थे. अपनी अति सामान्य गर्म मिज़ाज घमंडी बेटी के लिए उन्हें मुझ जैसा शांत, सहनशील, गुडलुकिंग, मध्यम परिवार का, उच्च पदस्थ दामाद ही तो चाहिए था न?

आज एक राज़ की बात बताता हूं, पहली नज़र में तुम्हारी मां मुझे बिल्कुल नहीं भायी थी, पर यहां भी मेरा दब्बूपना, मेरा मौन मेरे जीवन पर भारी पड़ गया. पिता ने दो टूक स्वर में कह दिया था, “अनूप को ऊषा से ही विवाह करना होगा. बेवकूफ, इतना भी नहीं समझता कि बड़े परिवार का दामाद बनेगा, वो भी इकलौता. यहां लक्ष्मी क़दम चूमने को बेचैन है और ये मूर्ख पांव झटकना चाहता है?”

जीवन के इतने बड़े निर्णय, जिससे संपूर्ण जीवन प्रभावित होता है, में भी मैं मौन रह गया. अंततः लक्ष्मी ने मेरे पांव चूम ही लिए. मैंने जैसी जीवनसंगिनी की कामना की थी, तुम्हारी मां उसके बिल्कुल विपरीत थी. उसे पूरी दुनिया सुहानी लगती थी, पर अपने पति में हज़ारों दोष नज़र आते थे. प्रेम की उष्मा, स्नेह की गरिमा, दांपत्य की मादकता, जीवनसाथी का मनुहार, सहयोग जैसे शब्द मेरे लिए बने ही नहीं थे. “आपकी ड्रेसिंग सेंस बेकार है, आपको बोलना नहीं आता… बोरिंग… डल… पता नहीं पापा ने आपमें क्या देखा? सुंदरता लेकर

अचार डालूं क्या? शादी को लेकर कितने सपने देखे थे, एक भी पूरे नहीं हुए.”

ऐसे वाक्य मेरे लिए प्रयुक्त होते रहे और मैं अंदर से आहत, पर ऊपर से सामान्य दिखने के प्रयत्न में जुटा रहा. उसने जो कहा, मैंने कभी प्रतिकार नहीं किया. उसे मेरा संयुक्त परिवार कभी नहीं भाता था. कभी मां-बहनों से उलझ पड़ती थी, तो कभी किसी और से. प्यार की भाषा नहीं, उसे तो केवल अपनी भाषा आती थी, ज़िद की भाषा. बार-बार तुनककर मायके चली जाया करती. एक-दो बार मैंने समझाना चाहा, पर उसका स्पष्ट जवाब था, वो इतने बड़े परिवार के साथ नहीं रह सकती. आख़िरकार फिर उसके पिता का रसूक काम आया. मेरा ट्रांसफर नागपुर हो गया. मैं घर-परिवार से दूर हो गया, पर वो बेहद ख़ुश थी.

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मैं कई बार हिम्मत जुटाता कि उसे समझाऊं कि मैं केवल उसका पति नहीं और भी बहुत से रिश्तों से जुड़ा हूं, पर मौन मुझ पर हावी हो जाता. शॉपिंग, किटी पार्टियां, रेस्टोरेन्ट में बढ़िया लज़ीज़ खाना खाना, फ़िल्म देखना, बस यही उसके शौक़ थे. मैं अनिच्छा से यदा-कदा उसका साथ निभाता रहा. मेरी इच्छाएं मन के कोने में दबी-कुचली सहमी-सी दम तोड़ती रहीं.

तुम्हारी मां ने मुझसे एक बार भी नहीं पूछा कि मेरी कोई इच्छा है भी या नहीं? मेरे परिवारवाले मुझे जोरू का ग़ुलाम, बेवकूफ, कठपुतली वगैरह नामों से पुकारते थे. मैं यथासंभव उन सब की इच्छाओं और मांगों को भी पूरा करता था,पर अकेले.

तुम्हारी मां ने कभी मेरा साथ नहीं दिया. तुम्हारे दादा-दादी को जब तीर्थयात्रा पर ले गया था न, तब भी चक्की के दो पाटों में पिसा था. तुम्हारी मां फिज़ूलख़र्ची का रोना रो रही थी और मेरे मां-पिताजी लाख कोशिशों के बाद भी ख़ुश नहीं थे. कारण था मैं. उनकी नज़र में मैं जोरू का गुलाम जो था. पिताजी कहते, “अरे, एक डांट में पत्नी सीधी हो जाएगी. इसके मुंह से बोल तो फूटे, पर नहीं, उसे ख़ुश रखने के लिए ये मुंह पर ताला लगाकर बैठेगा, बेवकूफ.”

पिताजी को क्या पता था, मैं अगर ऊषा को समझाने का प्रयत्न करता, परिवार के मायने समझाने का प्रयास करता, तो उस चिकने घड़े पर कौन-सा असर होना था,  उल्टे वो मुझ पर बरस पड़ती. मेरा दम घुटता था. पारिवारिक कलह से डरकर मैंने मौन समझौता कर लिया था. तर्क-वितर्क या कुतर्क करने की शक्ति मुझमें थी ही कहां?

पर आज सोचता हूं काश, एक बार कुछ कहकर देखा होता, तो शायद परिस्थितियां भिन्न होतीं. एक और सच जान ही लो. जब तुम आनेवाले थे न, तब ऊषा ने गर्भपात कराने की ठान ली थी.

“इतनी जल्दी मैं बच्चा नहीं चाहती, मेरे फिगर का तो सत्यानाश हो जाएगा.”

“ऊषा, ईश्‍वर की इस नेमत को ठुकराना पाप है.” मैंने प्रतिवाद करने का प्रयास किया, तो वो क्रोध से भरी ख़ूब चीखी-चिल्लाई और बिना मुझे बताए अपनी एक सहेली के साथ क्लीनिक चली गई, पर यहां क़िस्मत ने मेरा साथ दिया. डॉक्टर ने साफ़ कह दिया कि गर्भपात के लिए देर हो चुकी है. वो बेहद कठिन दिन थे अनुराग. तुम्हारी मां का क्रोध सातवें आसमान पर रहता था. हर बात पर चिढ़ती-बिगड़ती रहती थी. सुख और आराम के सारे साधन घर में मौजूद थे, पर वो ख़ुश नहीं थी.

मेरा धैर्य, मेरा त्याग, मेरी सहनशीलता किसी का प्रभाव उस पर नहीं पड़ता था. मेरी हर बात का वो उल्टा अर्थ लगा लेती थी और मैं मौन रह जाता था. फिर तुम आए, मुझे जीवन की पहली ख़ुशी मिली. सच कहता हूं, उस क्षण मेरे आनंद का पारावार न था. तुम्हें कंधे पर झुलाकर, प्रेम से दुलारकर मुझे जो आत्मिक आनंद की प्राप्ति होती थी न, उसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता.

तुम्हारे जन्म के बाद भी तुम्हारी मां नहीं बदली. पालन-पोषण का दायित्व एक आया को सौंपकर वो कर्त्तव्यमुक्त हो गई, पर मैं तुममें अपना बचपन जीता रहा. चार वर्ष की नन्हीं-सी उम्र में दार्जिलिंग के बोर्डिंग स्कूल जाते समय बिलखकर रोते तुम्हारा मासूम चेहरा आज तक भूला नहीं हूं, पर वो भी तुम्हारी मां का निर्णय था. मैं हमेशा की तरह पीड़ा मन में समेटे मौन था.

जब भी तुम छुट्टी में घर आते, हम बाप-बेटे के लिए वो बढ़िया समय होता था, याद है न? फिर दिन सरकते गए. मैं दिन-रात क़िताबों में डूबा रहता और तुम्हारी मां के तो कई शौक़ थे. मुझे याद नहीं आता, कभी भी कुछ समय के लिए हम दोनों ने किसी मुद्दे पर चर्चा की हो. उसे सीधे निर्णय देना पसंद था और मुझे चुपचाप रहकर कलह को दूर झटकना, पर कहते हैं न ‘किसी भी चीज़ की अति बुरी होती है.’ मेरा तटस्थ निर्लिप्त हो जाना ही मेरे लिए कष्टप्रद हो गया. पति-पत्नी का रिश्ता जो सबसे निकट होता है, हमारे लिए औपचारिकता मात्र रह गया.

बेटा, जब तुमने मुझे नीति से मिलवाया था, तो मैं बेहद ख़ुश हो गया था. वो मुझे ज़िम्मेदार और सुलझी हुई लड़की लगी थी. शांत, संवेदनशील, भावुक-सी वो लड़की पहली नज़र में ही मुझे अपनी-सी लगी थी, पर एक चीज़ उस क्षण भी मुझे खटक गई थी, तुम्हारा नीति के प्रति अजीब दबाव से भरा व्यवहार.

पहले तो मैंने इसे सामान्य समझा, फिर धीरे-धीरे बात समझ में आती गई कि अपनी मां के मेरे प्रति व्यवहार से तुम भीतर से आहत हो और भयभीत भी. नीति की छोटी-सी बात का मान रख लेने से भी जैसे तुम्हारे पुरुषत्व की तौहीन होती थी. नीति क्या पहनेगी, क्या खाएगी, कैसे रहेगी? सारे निर्णय तुम्हारे होते थे. एक दिन बिना तुम्हें बताए वो मायके क्या चली गई, तुमने घर में कोहराम मचा दिया था, याद है न? उस शाम बहू फूट-फूटकर रोई थी. हां, उसके आंसुओं का साक्षी मैं था. भीगे कंठ से उसने मुझसे कहा था, “बाबूजी, मैं जितना जुड़ना चाहती हूं, अनुराग उतनी ही बेरुखी से अपने व्यवहार से इस रिश्ते की जड़ें खोखली कर देते हैं. पत्नी क्या दासी होती है? जीवनसंगिनी अगर जीवनभर रोती ही रहे, तो ऐसे साथ की क्या अहमियत है?” मैं सन्न रह गया था. बहू के शब्द आत्मा को तेज़ आरी की तरह काट रहे थे. मैंने इस संबंध में भी तुम्हारी मां से बात की थी. उसने लापरवाही से जवाब दे दिया, “आपका ही लाडला बेटा है, आप ही उससे बात कीजिए. पति-पत्नी के बीच पड़ना मूर्खता है.”

मैं हतप्रभ रह गया था. यहां पति-पत्नी के बीच पड़ने जैसी क्या बात थी? हमारे बच्चों की ज़िंदगी का प्रश्‍न था. मैं आदत से लाचार, फिर चुप हो गया. मूकदर्शक-सा सब कुछ देखता रहा. अमृत का जन्म हुआ, तो मैंने चैन की सांस ली, शायद ये बच्चा तुम दोनों के बीच पुल का काम करे, पर तुम भी अपनी आदत से लाचार थे. फिर तुम्हारा तबादला दूसरे शहर में हो गया. मैं फिर आशान्वित हो उठा था, शायद अकेले में तुम दोनों का दांपत्य फल-फूल जाए? पर तुम्हारे फ़ोन ने मेरी इस आशा पर भी तुषाराघात कर दिया.

“पापा, आपकी बहू मुझसे लड़कर मायके चली गई है. अमृत को भी साथ ले गई है. जानते हैं क्या कहती है? नौकरी करके अकेले अमृत को पाल लेगी, पर मेरे साथ नहीं रहेगी. मैं भी चुप नहीं बैठनेवाला, डाइवोर्स के पेपर मुंह पर मारूंगा, तब होश आएगा.”

“बेटा, जल्दबाज़ी में कोई निर्णय मत लो. मैं बहू से बात करूंगा.”

तुम्हें समझाकर मैंने फ़ोन तो रख दिया, पर मन अनजानी आशंका से थरथरा उठा था. बहू से बात की तो मुझे कहीं भी उसका दोष नज़र नहीं आया. अनुराग, क्या अपने पति से प्रेम और सम्मान की इच्छा रखना दोष है? यदि हां, तो बहू दोषी है. बेटा, पत्नी की इच्छाओं का मान रखना तुम्हारा धर्म है. पहले सोचा तुम्हें बुलाकर तुमसे बात करूं, फिर अपने स्वभाव से डर भी लगा. कहीं तुम्हें सामने पाकर सब कुछ कह न पाया तो! इसलिए पत्र में अपना दिल खोलकर रख रहा हूं.

बेटा, तुम अनजाने में ही नीति के धैर्य की परीक्षा लेते रहे हो. पिछले तीन वर्षों में उसने साबित किया है कि वो एक अच्छी पत्नी है. वैसे मैं जानता हूं कि मैं हमेशा चुप रहकर अपना दांपत्य खोता चला गया और तुममें बहुत ़ज़्यादा बोलने-टोकने की आदत है और तुम्हारा दांपत्य भी टूटने के कगार पर खड़ा है. पति-पत्नी का रिश्ता जो सबसे क़रीबी और महत्वपूर्ण होता है, लोग अपनी नादानी से इसे ही सबसे छोटा और बेकार समझ लेते हैं. जब होश आता है, तो एक मधुर स्वप्निल मादक संसार हाथ से रेत की तरह फिसल गया होता है.

बेटा, पुरुषत्व के अहं में आकर ग़लत निर्णय मत लो और न ही नीति के सामने हथियार डालकर उसे मनाकर घर ले आओ. आपस में बात करो बेटा. अपने व्यवहार से थोड़ा तुम झुको और थोड़ा-सा उसे भी झुकने पर विवश कर दो. आपसी समस्या को सुलझाने का प्रयास करो.

पति-पत्नी के रिश्ते के बीच किसी भी तरह की दीवार नहीं होनी चाहिए, फिर चाहे वो मौन और सहनशीलता की दीवार ही क्यों न हो? मैंने हमेशा तुम्हारी मां और अपने बीच चुप्पी की दीवार कायम की. परिणाम, हम दोनों इस दीवार के दो अलग-अलग छोरों पर जीवन जीने को विवश हो गए. पति-पत्नी का संबंध जो सात जन्मों का होता है, एक ही जन्म में बेमानी लगने लगा.

हम दोनों ने इस अटूट बंधन को सदा तार-तार किया. तुम्हारी मां सरेआम मेरा अपमान करती रही है, पर मैंने कभी उससे अपने मान-सम्मान की अहमियत के बारे में बात नहीं की. आज लगता है, अगर हमने दिल खोलकर एक-दूसरे से बात की होती, तो शायद स्थिति कुछ और ही होती. पर जो बीत गई, वो बात गई. तुम और बहू हमारी ग़लतियां मत दोहराना.

मैंने नीति को भी समझा दिया है कि वो मेरी तरह तटस्थ बनने का प्रयास न करे और तुमसे कहता हूं, अपनी जीवनसंगिनी के साथ सुखी दांपत्य जीवन जीओ बेटा. उसके मन को समझने का प्रयास करो और अपना मन भी खोलकर उसकी हथेली पर धर दो. बहू की कौन-सी उम्मीदों पर तुम खरे नहीं उतर रहे, पूछो. साथ ही उसे यह एहसास भी दिलाओ कि तुम्हारी भी कुछ उम्मीदें हैं. समझौता नहीं, सामंजस्य का निर्माण करो. दांपत्य का बिरवा सामंजस्य के मीठे जल से ही तो सींचा जाता है.

इस सत्य को आज आत्मसात कर लो, मेरी तरह उम्र के अंतिम पड़ाव में पछतावे का एहसास नहीं होगा. मेरे जैसे लोगों की तो ये स्थिति है कि चाहे लाख कहो, फिर भी बहुत कुछ मन के भीतर लावे-सा दहकता ही रहता है. अब सुनो, पत्र के साथ कश्मीर के दो हवाई टिकट भी हैं. मेरी तरफ़ से तुम दोनों के लिए उपहार. बहू तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है. जाओ, जन्म-जन्म के इस बंधन को एक नई गांठ से बांध दो. इसी क्षण से प्रयास करो बेटा कि ये बंधन टूटे ना.

असंख्य शुभकामनाओं के साथ

तुम्हारा,

पापा

 

       डॉ. निरुपमा राय

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कहानी- आख़िरकार (Short Story- Aakhirkar)

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”शायद तुम ठीक कहती हो. अब ज़िंदगी आराम की रहेगी. आख़िर तुम्हारी तो पूरी ज़िंदगी ही एक रिटायर्ड लाइफ़ रही है. एक हाउसवाइफ़ की ज़िंदगी तो होती ही रिटायर्ड लाइफ़ है, आराम की ज़िंदगी…” प्रभात पता नहीं और क्या-क्या कहते जा रहे थे, पर दया के कान अब आगे कुछ सुन नहीं पा रहे थे. कॉफी का प्याला वैसे ही हाथ में रह गया था. मुंह का स्वाद भी कसैला हो गया था. एक ही शब्द कानों में गूंज रहा था, ‘रिटायर्ड लाइफ़’. क्या पूरी ज़िंदगी में उसकी बस एक यही उपलब्धि रही है?

सामने के फ़्लैट में रहनेवाली श्यामली से दया का मिलना तो कम हो पाता था, लेकिन दया का उसकी हर गतिविधि पर ध्यान जाने-अनजाने चला ही जाता था. दोनों के घर की रसोई की खिड़कियां आमने-सामने ही पड़ती थीं, तभी तो श्यामली कई बार मज़ाक में कह भी चुकी थी, “लगता है आपका सारा दिन रसोईघर में ही बीतता है.” सुनकर दया चुप रह जाती.
यूं देखा जाए, तो दोनों की दिनचर्या में भी काफ़ी अंतर था. श्यामली बैंक में काम करती थी. पति अक्सर दौरे पर रहते थे और बच्चे बाहर हॉस्टल में थे. श्यामली का क्या, थोड़ा-बहुत कच्चा-पक्का बना लिया और कभी मूड नहीं हुआ, तो बाहर से कुछ मंगा लिया, पर दया… वह तो जब से ब्याहकर इस घर में आई थी, तभी से अधिकांश समय रसोईघर में ही बीता. तब तो भरा-पूरा ससुराल था. सब साथ रहते थे और वह थी घर की बड़ी बहू.
आज भी जब कभी वे दिन याद आते हैं, तो वह सोचती है कि कितना कुछ बदलाव आया था उसके व्यक्तित्व में इस घर में आकर.
बेटी रीना उस दिन पूछ रही थी, “मम्मी, आप क्या बचपन से ही इतनी अच्छी कुकिंग करती थीं? मुझसे तो अब तक गोल रोटी भी नहीं बन पाती है.”
“हूं… बचपन… तब कहां कुछ आता था? छोटा-सा परिवार था. मां-बाबूजी और बस दो भाई-बहन.”
बी.ए. करने के बाद उसकी बहुत इच्छा थी आगे और पढ़ने की, पर परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि जल्दी शादी हो गई. ससुराल आकर देखा, सास तो घर के हर कामकाज में पारंगत थीं, पर ससुराल के इस पारंपरिक वातावरण में सामंजस्य बैठाना उसे काफ़ी मुश्किल लगा था. चूल्हा छुआई की रस्म तो ख़ैर जैसे-तैसे हो गई, पर जब कुछ दिनों बाद ननद प्रभा ने आदेश दिया कि अब सुबह की चाय भाभी बनाएंगी तो वह चौंक ही गई थी. कम से कम पच्चीस-तीस लोग तो होंगे ही उस समय घर में. और तब तक तो उस घर में गैस भी नहीं आई थी. उसने तो अब तक अपने घर में ज़्यादा से ज़्यादा चार-पांच लोगों की चाय बनाई होगी. चूल्हे पर काम करने की भी आदत नहीं थी. ख़ैर, चूल्हा तो प्रभा ने जला दिया था, पर जब वह भगौने में पानी कप से नापकर डालने लगी तो प्रभा हंसी थी.
“भाभी, कहां तक नापोगी? पूरा भगौना भरकर चढ़ा दो.”
फिर जब शक्कर के नाप के लिए चम्मच टटोलने लगी, तो प्रभा फिर हंसी थी.

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“अरे भाभी, ये जो शक्कर के डिब्बे में बड़ा-सा कटोरा है न, भरकर डाल देना और हां, चाय के डिब्बे में भी एक छोटी कटोरी है, वही नाप है.”
प्रभा ही थी, जो उस समय हर काम में उसकी मदद कर देती थी, सब्ज़ी के तेल- मसाले से लेकर रोटी और परांठे के आटे तक का नाप-तौल वही बताती रहती. फिर तो काम करते-करते उसकी भी आदत हो गई थी.
सास ने तो सिलाई, बुनाई, अचार, पापड़ तक घर के सारे काम सिखाए थे और कब वह एक अल्हड़ लड़की से एक कुशल गृहिणी बन गई, वह स्वयं भी नहीं समझ पाई थी.
धीरे-धीरे संयुक्त परिवार से वे लोग एकल परिवार हो गए. बच्चे भी अब बड़े होने लगे थे, पर घर को सुव्यवस्थित रखने, सुचारु रूप से चलाने में ही उसका पूरा दिन खप जाता था. मेहमानों की आवाजाही भी बनी ही रहती थी.
पति प्रभात तो शुरू से ही कम बोलते थे और अधिक टोका-टोकी भी नहीं करते थे. फिर भी कई बार वह महसूस करती कि अन्य कामकाजी महिलाओं को देखकर शायद वे भी कामकाजी पत्नी की ही कामना करते होंगे. घर के बढ़ते ख़र्च से बजट भी डगमगाने लगा था. बेटे की कॉलेज की पढ़ाई थी. फिर बेटी रीना की शादी आ गई तो कर्ज़ बढ़ गया था.
तब तो उसने एक बार रीना से कहा भी था, “मैं भी शादी के बाद बी.एड. करके नौकरी कर लेती, तो अच्छा रहता. पैसों की इतनी कमी तो महसूस नहीं होती. अब देख तेरी शादी के बाद अगर छोटा-सा भी फ्लैट लेने की सोचेंगे तो उसके लिए भी भारी कर्ज़ का इंतज़ाम करना होगा.”
“मम्मी…” रीना ने तो तुरंत टोक दिया था. “आप नौकरी करतीं, तो हम भाई-बहन की इतनी अच्छी परवरिश कैसे हो पाती? पापा तो नौकरी के सिलसिले में अक्सर बाहर ही रहते थे. फिर हमें साफ़-सुथरा, सजा-संवरा घर, स्वादिष्ट खाना कैसे मिलता? मुझे तो अब तक याद है कि हम भले ही कितनी देर में घर पहुंचते, आप हमेशा ही हमें गरम-गरम खाना खिलाती थीं. अब मुझे देखो न, दीपू का कहां इतना ध्यान रख पाती हूं. कभी-कभी तो उसे बुखार में भी घर छोड़कर ऑफ़िस जाना पड़ता है.”
“पर रीना, तेरे पापा ने तो शायद ही कभी महसूस किया हो कि घर में रहकर मैंने कभी कोई योगदान दिया है इस गृहस्थी को चलाने में.”
“मम्मी…” रीना ने फिर बात काट दी.
“आप भी कैसी बातें कर रही हो? पापा कब मुंह पर किसी की तारीफ़ करते हैं, पर इसका यह मतलब तो नहीं है कि वे समझते ही नहीं हों कि आपने कितना कुछ किया है? हमारे लिए ही नहीं, पूरे परिवार के लिए भी. यहां तक कि चाचा-बुआ सबके लिए और अभी भी तो करती ही रहती हो. अब जब पापा रिटायर हो जाएंगे, तब ख़ूब समय होगा आप दोनों के पास, ज़िम्मेदारियां भी तब कम हो जाएंगी. तब पापा आपको बता पाएंगे कि कितना योगदान है आपका इस परिवार को बनाने में. आप लोग फिर ख़ूब घूमने जाना, अपना दूसरा हनीमून मनाने.”
दया तब हंसकर रह गई थी.
“बातें बनाना तो कोई तुमसे सीखे.” रीना को हल्की-सी झिड़की भी दी थी उसने.

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पर अब तो प्रभात वास्तव में रिटायर होने जा रहे हैं. आज ऑफ़िस का आख़िरी दिन है. पार्टी वगैरह भी है, फिर अगले ह़फ़्ते बच्चे भी आ जाएंगे. पापा का रिटायरमेंट और साठ वर्ष पूरे होने की ख़ुशी दोनों ही साथ मनाने का कार्यक्रम है. सोचती हुई दया बाहर लॉन में आकर बैठ गई थी.
श्यामली भी शायद अभी बैंक से लौटी थी. स्कूटर खड़ा करके अंदर जा रही थी. उसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी. जाने-अनजाने पता नहीं क्यों वह अपनी और श्यामली की तुलना करने लगती है. चुस्त, स्मार्ट श्यामली बैंक की नौकरी के बाद भी कितना व़क़्त निकाल लेती है. उस दिन पता नहीं कितने टीवी सीरियल्स की बातें कर रही थी?
“दयाजी, आजकल टीवी पर बहुत अच्छे प्रोग्राम्स आ रहे रहे हैं, आप ज़रूर देखना. कई बार तो बहुत अच्छी फ़िल्में भी आती हैं.”
वह सोचती कि वह तो कभी भी पूरी फ़िल्म देख ही नहीं पाती है. घर-परिवार, मेहमान, घर के कामकाज से मुश्किल से कुछ समय निकालकर अख़बार देख लिया या न्यूज़ सुन ली तो बहुत हो गया.
उसकी ननद, देवर-देवरानी सब यही कहते हैं, “बस भाभी, आप हो तो मायका-ससुराल सब यहीं है हमारा.”
चलो, सबकी अलग-अलग ज़िंदगी और ज़िम्मेदारियां होती हैं, वह क्यों तुलना करे किसी से अपनी. सोचकर उसने फिर आज ख़ुद को समझा लिया था.
प्रभात को भी लौटने में काफ़ी देर हो गई. वह सोच रही थी कि एक कप कॉफी बनाकर पी ले. तभी स्कूटर की आवाज़ सुनाई दी.
‘चलो, ये भी आ गए, अब साथ ही बैठकर कॉफी पी लेंगे.’ सोचते हुए वह रसोईघर में आ गई थी.
प्रभात कपड़े बदलकर सोफे पर आराम से पसर गए थे. वह कॉफी के साथ कुछ बिस्किट्स भी ले आई थी.
“अरे, खाना-पीना तो बहुत हो गया, बस कॉफी ही लूंगा.”
“बहुत थक गए लगते हो?” वह पास आकर बैठ गई थी.
“थका तो नहीं हूं, पर सोच रहा हूं कि कल से करूंगा क्या? बरसों से रोज़ सुबह तैयार होकर ऑफ़िस जाने की आदत रही है, अब घर पर अकेले…”
“क्यों? अकेले क्यों… हम दो तो हैं न. अब बरसों बाद समय मिला है, तो घूमेंगे, कहीं बाहर जाएंगे, अब तो आपकी ज़िम्मेदारियां भी पूरी हो गई हैं.”
दया ने कॉफी का कप आगे बढ़ाया और फिर अपना कप उठाया.
“शायद तुम ठीक कहती हो. अब ज़िंदगी आराम की रहेगी. आख़िर तुम्हारी तो पूरी ज़िंदगी ही एक रिटायर्ड लाइफ़ रही है. एक हाउसवाइफ़ की ज़िंदगी तो होती ही रिटायर्ड लाइफ़ है, आराम की ज़िंदगी…”
प्रभात पता नहीं और क्या-क्या कहते जा रहे थे, पर दया के कान अब आगे कुछ सुन नहीं पा रहे थे. कॉफी का प्याला वैसे ही हाथ में रह गया था. मुंह का स्वाद भी कसैला हो गया था. एक ही शब्द कानों में गूंज रहा था, ‘रिटायर्ड लाइफ़’. क्या पूरी ज़िंदगी में उसकी बस एक यही उपलब्धि रही है? अपने ही ख़यालों में डूबी दया यह सोचती रही…

– डॉ. क्षमा चतुर्वेदी

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कहानी- बेचारी कुंवारी है (Short Story- Bechari Kunwari Hai)

Short Story, Bechari Kunwari Hai

 

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“क्या बात कर रही हो स्वाती! लोग अपने समाज का सड़ा-गला भी खाने को तैयार हैं, पर दूसरे समाज का अच्छा खाना भी उन्हें गवारा नहीं हो सकता! लोग क्या कहेंगे? समाज क्या कहेगा? ये कुछ ऐसी बातें हैं, जिनसे ऊपर उठने की हिम्मत आज भी इंसान नहीं जुटा पाता, भले ही कोई घुट-घुट कर मर क्यों न जाए.” प्रभा की बातों ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था कि समाज के कैसे नियम, कैसी मान्यताएं हैं, जो इंसान को सिवाय दुख के कुछ नहीं देते? सामाजिक नियम तो इंसान की सहूलियत के लिए बनाए गए थे, न कि इसलिए कि इन नियमों के जाल में उलझ कर इंसान मर ही जाए.

”प्रभा… ओ प्रभा…!” मैंने चलते रिक्शे में से प्रभा को आवाज़ दी. घर से बाहर निकलती प्रभा चौंक पड़ी, पर मुझे देख कर वह ख़ुशी से चीख पड़ी, “स्वाती, तू …यहां? कब आई? कैसी है?”

स्वाती ने उसे गले से लगाते हुए कहा, “सब यहीं सड़क पर खड़े-खड़े पूछ लेगी क्या?”

उसने अपना माथा ठोकते हुए कहा, “सॉरी यार, चल घर चल, वहीं बैठ कर ढेर सारी बातें करेंगे. बस एक मिनट रुक, माधो चाचा की दुकान से कुछ सामान ले लूं.” स्वाती उसका हाथ थामे चल दी. यही वह मोहल्ला था जहां कॉलेज के दिनों में मेरा लगभग सारा दिन बीतता था. यही माधो चाचा की दुकान, हमारी न जाने कितनी लड़ाइयों की साक्षी बनी थी. सब कुछ तो वैसा ही है. कुछ नहीं बदला यहां, सिवाय मेरे. कॉलेज के दिनों में बिना नागा किए मैं प्रभा के घर आती थी, पर शादी के बाद ऐसी व्यस्त हुई कि पांच साल में दुबारा आना हो पाया है. घर की सबसे बड़ी बहू होने की ज़िम्मेदारी आने पर, वह अल्हड़ और चंचल-सी स्वाती कहीं खो-सी गई थी. यहां आते ही वही सारी यादें फिर से ताज़ा हो उठी थीं.

“माधो चाचा प्रणाम.” मैंने हंस कर कहा.

मुझे देख कर वे ख़ुश हो गए, “अरे… स्वाती बिटिया कितने दिनों के बाद आई हो! चॉकलेट खाओगी?” मैं खिलखिला पड़ी, “हां माधो चाचा खाऊंगी, पर अब एक चॉकलेट और देनी होगी, मेरी बिटिया के लिए.”

“काहे नहीं बिटिया, तुम्हारी बिटिया हमारी पोती हुई न, उसके लिए तो दो चॉकलेट देंगे. सच बिटिया, कलेजा ठंडा हो गया तुम्हें देख कर, तुम लोग हंसते-खेलते रहो और हमें क्या चाहिए! अब इस प्रभा का भी ब्याह हो गया होता, तो आज यह भी बाल-बच्चे वाली हो गई होती. पर नहीं, इसने तो जैसे शादी न करने की क़सम खा ली है! हर बात की एक उमर होती है, उमर बीत जाने पर, फिर बड़ी परेशानी होती है, पर यह कुछ समझती ही नहीं है. अब तुम्हीं कुछ समझाओ न इसे…” माधो चाचा की बात को बीच में काटते हुए प्रभा बोली, “आप अपना काम करो माधो चाचा, आपको मेरी ज़िंदगी में दख़ल देने की कोई ज़रूरत नहीं है!”

माधो चाचा ने मुंह टेढ़ा करते हुए कहा, “अरे लो इसमें नाराज़ होने वाली क्या बात है? बिन ब्याही लड़की देख कर चिंता तो होती ही है.”

प्रभा क्रोध से बोली, “मेरे मां-बाप अभी ज़िंदा हैं मेरी चिंता करने के लिए, आपको परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है.” इतना कहकर प्रभा लगभग मेरा हाथ खींचते हुए वहां से ले आई. मैं प्रभा के इस व्यवहार पर हतप्रभ थी. मेरी प्रभा ऐसी तो न थी. वह बड़ों के प्रति सम्मान रखनेवाली, उनकी इ़ज़्ज़त करनेवालों में से थी. पर यहां तो मैं प्रभा का कोई और ही रूप देख रही थी! प्रभा की मां मुझे देखकर सुखद आश्‍चर्य से भर उठी, “स्वाती …तुम! कितने दिनों के बाद आई हो बेटी! कैसी हो?” “अच्छी हूं आंटी, आप सुनाइये क्या चल रहा है आजकल.”

मेरे यह पूछने की ही देर थी कि वह कहने लगी, “क्या बताऊं स्वाती, प्रभा की शादी की चिंता तो सुरसा के मुंह की तरह बस बढ़ती ही जा रही है.”

वह तनिक मेरे पास सरक कर धीमे स्वर में बोली, “स्वाती तुम्हारे लखनऊ में ही कोई लड़का देखो न! हम तो हार गए, इसकी शादी के प्रयास करते-करते…!”

तभी प्रभा वहां आ गई और ग़ुस्सा होते हुए बोली, “बस भी करो मां, मेरी शादी का रोना! कोई आया नहीं कि तुम मेरी शादी का महापुराण लेकर बैठ जाती हो.”

मैंने चौंककर प्रभा को देखा, मैं उसके असामान्य व्यवहार से परेशान हो उठी थी. अपनी हंसमुख-सी सहेली को इस तरह देखने की तो मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. आंटी का चेहरा रुआंसा हो गया था. मैंने बात को संभालते हुए उनसे कहा, “आंटी मैं आज आपके हाथ का वो स्पेशल वाला पोहा खाकर और चाय पीकर ही जाऊंगी.”

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आंटी मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली, “हां, तुम लोग बैठो, मैं पोहा बना कर लाती हूं.”

आंटी के जाते ही मैंने प्रभा को अपने पास बैठाते हुए कहा “क्या हो गया है तुझे प्रभा? किस तरह व्यवहार करने लगी है तू? वहां माधो चाचा से और यहां आंटी से भी… किस तरह बात कर रही थी तुम? इतनी चिड़चिड़ी  कैसे हो गई तुम? कहां गई वो मेरी हंसती-खिलखिलाती, हर बात का मज़ा लेती प्रभा?”

मेरी बात सुनकर प्रभा की आंखों में आंसू छलक आये. मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, “क्या बात है, बता न प्रभा, मुझसे बात करेगी तो तेरा मन भी हल्का हो जाएगा. कुछ तो बोल.”

प्रभा ने आंसू पोंछते हुए कहा, “क्या बताऊं स्वाती, बात ऐसी है कि कहने में भी अजीब लगती है. मैं क्या बताऊं किसी को कि मैं इसलिए परेशान हूं, क्योंकि मेरी शादी नहीं हो रही है.”

पहले तो मैं चौंक पड़ी, फिर हंस कर बोली “बस इतनी-सी बात के लिए इतना बवाल मचा रखा है तुमने?”

वह थोड़ा नाराज़ होते हुए बोली, “देखा, तुमने भी मेरी बात को नहीं समझा न. पर शायद तुम समझ भी नहीं सकती कि 26 साल की होने के बाद भी किसी लड़की का कुंवारी होना, कितना बड़ा अभिशाप हो सकता है.”

मैंने परेशान होकर कहा, “साफ़-साफ़ कह न प्रभा कि परेशानी क्या है?”

वह बोली, “स्वाती हर लड़की की तरह मैं भी चाहती थी कि सही समय पर मेरी शादी हो जाए. मेरे भी अपनी शादी को लेकर कुछ सपने थे, कुछ आशाएं थीं. पर अब वे सारे सपने कांटे बनकर पलकों में चुभते हैं. तुम्हीं बताओ, क्या कमी है मुझमें, अच्छी-ख़ासी दिखती हूं, अंग्रेज़ी से पोस्ट ग्रेजुएट हूं, आजकल वकालत पढ़ रही हूं. ऐसा नहीं था कि कोई मुझे देखने नहीं आया, पर कोई यह कह कर नापसंद कर गया कि लड़की दुबली है, कोई कहता, ज़्यादा पढ़ी-लिखी है. कोई कहता नौकरी नहीं करती. कभी किसी को मैं पसंद आई भी, तो बात इसलिए टूट गई, क्योंकि या तो बात आगे नहीं बढ़ पाई, क्योंकि उनकी दहेज की भूख अधिक होती थी. मैं जानती हूं मेरे मां-बाप अपनी हैसियत से भी बढ़ कर मेरी शादी में ख़र्च करेंगे, पर वह अपना घर-बार तो नहीं बेच सकते न मेरी शादी के लिए. तुम जानती हो स्वाती, अब मैं लेखिका भी हो गई हूं, कई पत्र-पत्रिकाओं में मेरी कहानियां, लेख और कविताएं छपती रहती हैं. जब लोग मुझसे पूछते हैं, क्या कर रही हो आजकल, तो मेरे यह बताने पर कि मैं लिखती हूं, तो पता है क्या जवाब मिलता है मुझे? वे कहते हैं ये सब तो बकवास है, यह बताओ कि शादी कब कर रही हो? मोहल्ले का एक-एक प्राणी मुझे शादी करने के लिए समझाता रहता है. जब आस-पास के लोग मुझे बेचारगी भरी नज़रों से देखते हैं तो मेरी आत्मा तक छलनी हो जाती है, पड़ोस की चाची, काकी और भाभियों की नज़रें मेरे कपड़ों के अंदर तक जाती हैं, मानो वे जानना चाहती हों कि शादी न हो पाने का कीटाणु कहीं शरीर के अंदर तो नहीं बैठा, जो कपड़ों के बाहर से दिखाई न देता हो. लोग मां-पापा से मिलने आते हैं तो उन्हें इस तरह से सांत्वना देते हैं मानो मैं इस दुनिया से ही विदा हो गई हूं. ‘अरे भाभीजी, धीरज रखिए, होनी को कौन टाल सकता है. जब-जब जो जो होना है, तब-तब सो सो होता है. या फिर ‘अरे भाईसाहब, आप परेशान मत होइए, भगवान सब ठीक कर देगा’ ये सारी बातें सुन-सुन कर मैं थक गई हूं. जानती हो, जो भी मेरे घर आता है, उन सबके पास मेरे लिए कोई-न-कोई रिश्ता होता है. हर कोई मेरे लिए रिश्ता ढूंढ़ता रहता है, मानो इस दुनिया में मेरी शादी से बड़ी कोई समस्या ही   न बची हो. तुम ही बताओ स्वाती, मेरी शादी न होना, क्या इतना अक्षम्य अपराध है? मैं लोगों की नज़रों में ‘बेचारी’ बन गई हूं, जो भी मिलता है अपनी सांत्वना के दो फूल चढ़ा ही जाता है मुझ पर. पर कोई मुझे यह नहीं बताता कि इस सब में मैं कहां ग़लत हूं! मैं त्रस्त हो गई हूं लोगों की बातें सुन-सुन कर. कभी-कभी लगता है कि आज के युग में लड़की होकर पैदा होना ही मेरा सबसे बड़ा अपराध है. और तो और अब तो लोग यह भी कहने लगे हैं कि ज़रूर उसका चाल-चलन ख़राब होगा, तभी तो अब तक कुंवारी बैठी है! इतनी बातें सुन कर, इतने झूठे इल्ज़ाम पाकर भी, अगर च़िड़चिड़ी न होऊं तो क्या करूं? मां-पापा के माथे पर चिंता की लकीरें दिन-ब-दिन गहरी होती जा रही हैं. उन्हें परेशान देखती हूं तो ख़ुद की क़िस्मत को कोसने का मन करता है. मां-पापा का मुंह देख कर चुप रह जाती हूं, वरना मुझे तो अब तक मर जाना चाहिए था! जिस लड़की की शादी न हो, मेरी राय में उन सबको मर ही जाना चाहिए, वरना यह समाज, उसके साथ-साथ उसके परिवारवालों का भी जीना दूभर कर देगा.”

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अपने मन की सारी भड़ास निकालने के बाद, प्रभा हांफने लगी थी, मैंने उठ कर उसे पानी का ग्लास थमाया. पानी पीकर वह कुछ संयत हुई. मैंने प्रभा की बातें सुनकर उससे कहा, “प्रभा, अगर तुम्हारी बिरादरी में कोई अच्छा लड़का नहीं मिलता, तो कभी बिरादरी के बाहर जाकर कोशिश क्यों नहीं की अच्छे लड़कों को ढूंढ़ने की?”

प्रभा व्यंग्य भरे स्वर में बोली, “क्या बात कर रही हो स्वाती! लोग अपने समाज का सड़ा-गला भी खाने को तैयार हैं, पर दूसरे समाज का अच्छा खाना भी उन्हें गवारा नहीं हो सकता! लोग क्या कहेंगे? समाज क्या कहेगा? ये कुछ ऐसी बातें हैं, जिनसे ऊपर उठने की हिम्मत आज भी इंसान नहीं जुटा पाता, भले ही कोई घुट-घुट कर मर क्यों न जाए.”

प्रभा की बातों ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था कि समाज के कैसे नियम, कैसी मान्यताएं हैं, जो इंसान को सिवाय दुख के कुछ नहीं देते? सामाजिक नियम तो इंसान की सहूलियत के लिए बनाए गए थे, न कि इसलिए कि इन नियमों के जाल में उलझ कर इंसान मर ही जाए. भले ही अपने समाज, अपनी बिरादरी में अच्छा, क़ाबिल लड़का न मिले, पर वे दूसरे समाज के, दूसरी बिरादरी के क़ाबिल लड़कों की ओर देखेगा तक नहीं! यह समस्या स़िर्फ प्रभा की नहीं थी, आज हर दूसरे घर में, कोई-न-कोई प्रभा मिल ही जाती है. मंगल ग्रह पर जाने की तैयारी करता मनुष्य, आज भी कुछ बातों में बरसों पुरानी सड़ी-गली रीतियों को थामे बैठा है. कुछ तो करना होगा, किसी को तो पहल करनी ही होगी, कोई तो क़दम उठाना ही होगा, तभी कुछ बदलाव संभव हो पायेगा. एक दिन में तो दुनिया नहीं बदलेगी, पर फिर भी थोड़ी-थोड़ी कोशिश तो सबको करनी ही होगी. कुछ सोचते हुए मैंने प्रभा से पूछा, “अच्छा प्रभा, क्या ऐसा कोई नहीं जो तुम्हें पसंद करता हो, या जिसे तुम पसंद करती हो?”

प्रभा ने थोड़ा सकुचाते हुए कहा, “है एक- समीर उपाध्याय. वैसे तो किसी बड़ी कंपनी का मैनेजर है, पर मेरे साथ वकालत पढ़ता है. शाम को लगनेवाली क्लास में आता है. आकर्षक है, स्मार्ट है, अच्छा कमाता है. मुझसे ख़ूब पटती है उसकी. इतना हंसमुख है कि पूछो मत. हर समय हंसता-हंसाता रहता है. उसके साथ समय कैसे बीत जाता है, पता ही नहीं चलता. जानती हो स्वाती, जब मैं उसके साथ होती हूं तो अपनी सारी परेशानियां, तक़ली़फें भूल-सी जाती हूं. समीर जब भी मुझे देखने आने वालों के बारे में सुनता है तो मुझसे कहता है कि ‘क्यों किसी और का जीवन बरबाद करना चाहती हो, मैं तो बरबाद हो ही गया हूं, तुम मुझसे ही शादी कर लो.”

मैंने हंस कर कहा, “जब वह इतना खुल कर पूछ रहा है शादी के लिए, तो तुम हां क्यों नहीं कर देती?”

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प्रभा ने थोड़ा बुझे स्वर में कहा, “उसमें दो समस्याएं हैं, एक तो वह हमारी जाति का नहीं है. हम ठाकुर, तो वह ब्राह्मण है. दूसरी बात, मैं उसका यक़ीन नहीं कर पाती, वह हर बात को मज़ाक में कहता है, हर बात का मज़ाक बना देता है, क्या पता यह बात भी उसने मज़ाक में ही कही हो! उसने कभी सीरियसली मुझसे कुछ कहा ही नहीं, तो मैं कैसे मानूं!”

उदास-सी प्रभा का चेहरा मन में लिए, उससे फिर मिलने का वादा कर, मैं वहां से चली आई. प्रभा की बातों से मुझे एक कहानी याद आ गई, शायद बचपन में कहीं पढ़ी थी, जिसका सही अर्थ आज मेरी समझ में आ रहा है. एक उच्च कुल का, बहुत संपन्न ब्राह्मण था, उसकी एक बहुत ही सुंदर और सुशील बेटी थी. जब वह विवाह योग्य हुई तो उसके पिता ने उसके लिए वर खोजना शुरू किया. पर उनके कुल जितना उच्च कुल उन्हें नहीं मिला. बहुत खोजने पर एक परिवार मिला भी, पर वह अधिक सम्पन्न नहीं था. फिर भी ब्राह्मण ने उच्च कुल देख कर अपनी बेटी का विवाह वहां कर दिया. कुछ समय बाद ब्राह्मण ने उससे पूछा, “क्या कर रही हो बेटी?’’

तो उसकी बेटी ने जवाब दिया, “उच्च कुल का रिश्ता भूज कर खा रही हूं.”

दो-तीन दिन बाद, अपने घर में युद्ध स्तर की तैयारियां होते देख प्रभा समझ गई कि आज फिर उसकी नुमाइश लगनेवाली है. उसका मन खिन्न हो उठा. उसका दिल कर रहा था कि वह चीख-चीख कर सबसे कहे कि बंद करो ये सब, बंद करो मुझे सामान की तरह सजाना, दिखाना, और फिर मोल-भाव करना! मैं ज़िंदा हूं, मुझमें भी आत्मा है, मेरी सांसें चलती हैं, क्यों नहीं समझ पाता कोई मेरी तक़लीफ़ को? पर वह ये सब कहती भी तो किससे? अपने मां-पापा का दिल वह तोड़ना नहीं चाहती थी. उनके उत्साह में वह कोई विघ्न नहीं डालना चाहती थी. अत: वह बेमन से तैयार होने चली गई. कुछ समय बाद मेहमान भी आ गए. प्रभा सजी-धजी गुड़िया की तरह, नज़रें झुकाए, उनके सामने आकर बैठ गई.

लड़के की मां ने लड़के से कहा, “हमें तो लड़की पसंद है, अब तुम बताओ, तुम्हारी क्या राय है?”

लड़के ने कहा, “किसी और का जीवन बरबाद करने से क्या फ़ायदा? इनसे शादी करके मैं अपनी ही कुर्बानी देने के लिए तैयार हूं.”

जानी-पहचानी बात और जानी-पहचानी आवाज़ सुन कर प्रभा चौंक पड़ी. उसने नज़रें उठाकर देखा तो सामने समीर बैठा मुस्कुरा रहा था.

वह चौंककर बोली, “समीर…तुम…?”

उसने अचरज से अपने मां-पापा की ओर देखा, वे दोनों मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे. उनकी आंखो में स्वीकृति का भाव था. प्रभा ठीक से कुछ समझ पाती, इसके पहले ही वहां हंसती-खिलखिलाती स्वाती आ गई.

प्रभा को आश्‍चर्य में पड़ा देखकर स्वाति ने कहा, “हां भाई, ये सब मेरा ही किया हुआ है. दरअसल, समीर मेरे बड़े भाई अक्षत के दोस्त हैं. बातों-ही-बातों में जब इन्होंने तुम्हारा ज़िक्र किया, तो मैं चौंक पड़ी. समीर तुम्हें बहुत पसंद करते थे और मज़ाक-ही-मज़ाक में कई बार तुमसे अपने दिल की बात कह भी चुके थे, पर तुमने कभी कुछ समझा ही नहीं. मैं उस दिन तुम्हारा मन जानने के लिए ही आई थी. फिर तुम्हारी रज़ामंदी मिलने के बाद, तुम्हारी परेशानी जानने के बाद, मैंने अंकल-आंटी को सारी बातें बताईं, तो अपनी बेटी की ख़ुशी के लिए वे भी तैयार हो गए. बस यही कहानी है, जिसका परिणाम तुम्हारे सामने, समीर के रूप में बैठा है.”

प्रभा ने बहुत कृतज्ञ नज़रों से स्वाती की ओर देखते हुए, मन-ही-मन उसे धन्यवाद कहा.

स्वाती ने धीरे से प्रभा से कहा, “प्रभा अब कोई नहीं कहेगा कि ‘बेचारी कुंवारी है’ अब तो लोग कहेंगे, बेचारी प्रभा, शादीशुदा हो गई है.”

उसकी बात सुन कर प्रभा खिलखिलाकर हंस पड़ी.

– कृतिका केशरी

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कहानी- असमंजस (Short Stories- Asmanjas)

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मेरे मस्तिष्क में विचारों का बवंडर चल रहा था. कभी आंखों के आगे तन्वी का चेहरा आता, तो कभी मीता का. हर विषय के चार तर्क पक्ष में और चार विपक्ष में प्रस्तुत कर इंसान को क्यों असमंजस में डाल दिया जाता है?

मैं सोच रही थी कि इतने दिनों बाद अपनी प्रिय सहेली मीता के घर अचानक पहुंचकर उसे सुखद सरप्राइज़ दूंगी, पर उसके घर के वातावरण में घुली बोझिलता ने मेरे उत्साह पर पानी फेर दिया था. शिथिल क़दमों से मैं भी उसके पीछे-पीछे चाय बनवाने रसोई में पहुंच गई थी. थोड़ा-सा कुरेदते ही लावा उबलकर बाहर फूट आया था.
“मैं और सनत काफ़ी समय से ‘बच्चा पैदा करें या ना करें’ इस बात को लेकर असमंजस में थे, क्योंकि दोनों ही अपने-अपने करियर में अभी तक व्यवस्थित नहीं हो पाए हैं. अब जब मेरी कंपनी ने महिलाकर्मियों को एग फ्रीज़िंग की सुविधा दे दी है, तो हमने राहत महसूस की कि चलो इस काम को फ़िलहाल टाला जा सकता है. लेकिन मम्मीजी को पता चला, तो नाराज़ हो गईं. उनके अनुसार, हर काम उचित व़क्त पर किया जाना ही बेहतर होता है. वे घर में कब से बच्चे की किलकारी सुनने को तरस रही हैं. उनके अनुसार, मेरी डिलीवरी से लेकर बच्चे के पालन-पोषण तक की सारी ज़िम्मेदारी जब वे ओढ़ने को तैयार हैं, तो हम उन्हें इस सुख से क्यों वंचित रख रहे हैं?
वे कहती हैं कि जब वे नहीं रहेंगी, हम दोनों की भी बच्चे पैदा करने व पालने की उम्र नहीं रहेगी, तब फ्रीज़्ड एग से बच्चा पैदा करने का क्या औचित्य? और वह भी तब, जब इसमें सफलता का प्रतिशत 20 या 25% ही है.”
“बात तो उनकी सही है.” सारी बात जानकर मैं भी सोच में पड़ गई थी.
“लेकिन हम तो फिर से असमंजस में आ गए न?”
मीता की समस्या का मेरे पास कोई समाधान न था. घर लौटते-लौटते तन्वी के होमवर्क की चिंता में मीता की समस्या मेरे दिमाग़ से पूरी तरह निकल गई थी. घर में घुसते ही मैंने पुकार लगाई, “तन्वी, आज का होमवर्क?”
“इंग्लिश टीचर ने इंटरनेट पर आर्टिकल दिया था.”
“अरे, वह तो बहुत आसान है. पहले नेट के सब फ़ायदे लिख दो, जैसे- इससे एक क्लिक पर ही किसी भी विषय से जुड़ी समस्त जानकारी एक सेकंड में मिल जाती है, समय की बचत, पचासों क़िताबें जुटाने, खंगालने की माथापच्ची नहीं… फिर इंटरनेट से होनेवाली हानियां… बच्चों की क्रिएटिविटी ख़त्म, नेट पर अति निर्भरता… आदि-आदि.”
“वो सब मैडम ने बता दिया था ममा, मैंने लिख भी लिया है.” मेरे धाराप्रवाह भाषण को बीच में ही रोकने का प्रयास करती तन्वी बोल उठी.
“तो फिर क्या समस्या है?” मैं हैरान थी.

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“मैंने कब कहा कोई समस्या है? पर मेरे दिमाग़ में एक उलझन है. मैडम जब भी लिखने को कोई विषय देती हैं, तो पहले पक्ष में तर्क देती हैं, फिर विपक्ष में और अंत में उपसंहार लिखवाकर मंझधार में छोड़ देती हैं. कोई यह तो बताए इंटरनेट प्रयोग करना चाहिए या नहीं? डेमोक्रेटिक सिस्टम सही है या नहीं? विज्ञान अभिशाप है या वरदान?”
एक टीचर होने के नाते मैं तन्वी के सारे सवालों के जवाब दे सकती थी, लेकिन वह सब तो ‘उपसंहार’ के तहत उसकी टीचर उसे पहले ही बता चुकी थी. मुझे एक मां की तरह उसकी समस्या का सटीक समाधान प्रस्तुत करना था और उसके लिए मैं स्वयं को पूरी तरह प्रस्तुत नहीं कर पा रही थी. तन्वी अपने कमरे में जा चुकी थी. मैं शिथिल तन-मन से रसोई के काम निपटाने लगी. सवेरे स्कूल जाने की जल्दी में मैं अक्सर खाने की आधी तैयारी रात में ही कर लेती हूं.
प्रिंसिपल मैडम ने हमेशा की तरह आज की मीटिंग में भी मुझे सम्मिलित कर एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी सौंपी थी. विषय था- स्कूल में सेक्स एजुकेशन आरंभ करना. कुछ टीचर्स ने दबी ज़ुबान में विपक्ष में तर्क रखे. पर चूंकि ऊपर से निर्देश थे, इसलिए पक्ष में तर्क रखते हुए इसे तुरंत प्रभाव से लागू करने का आदेश जारी कर दिया गया और प्रिंसिपल मैडम की प्रिय सहेली और विश्‍वासपात्र होने के नाते यह ज़िम्मेदारी भी मुझे सौंप दी गई. मेरे मस्तिष्क में विचारों का बवंडर चल रहा था. कभी आंखों के आगे तन्वी का चेहरा आता, तो कभी मीता का. हर विषय के चार तर्क पक्ष में और चार विपक्ष में प्रस्तुत कर इंसान को क्यों असमंजस में डाल दिया जाता है? यहां तो ठीक है ऊपर से निर्देश हैं, इसलिए मानना ही है, अन्यथा निर्णय लेना वाकई में कितना मुश्किल हो जाता है? अपनी सोच में लीन मुझे ध्यान ही नहीं रहा प्रिंसिपल का रूम कभी का खाली हो चुका था.
“तमन्ना, कुछ परेशानी है?” प्रिंसिपल मैडम ने पुकारा, तो मेरी चेतना लौटी.
“देखो, प्रिंसिपल होने के अलावा मैं तुम्हारी दोस्त भी हूं. स्कूल की परेशानी हो या व्यक्तिगत परेशानी तुम मुझसे शेयर कर सकती हो.”
“मैं सोच रही थी कि यह सेक्स एजुकेशन वाकई में बच्चों के लिए सही साबित होगी या नहीं? दरअसल, बच्चों को समझाने से पहले मैं स्वयं आश्‍वस्त हो जाना चाहती हूं. उन्हें दुविधा में रखना मुझे उचित नहीं लगता.”
“बिल्कुल-बिल्कुल. तो मैं तुम्हें बताती हूं कि लगभग 30 प्रतिशत बच्चे ऐसे होंगे, जिन्हें इस शिक्षा से कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि वे पहले ही इंटरनेट आदि संसाधनों से इस बारे में पर्याप्त जानकारी जुटा चुके हैं. 2 से 5 प्रतिशत बच्चे इस जानकारी का दुरुपयोग कर सकते हैं. गर्भनिरोधक तरीक़ों आदि की जानकारी से वे ग़लत राह पर जा सकते हैं…”
मैं हैरानी से प्रिंसिपल मैडम की बात सुने जा रही थी. जब वे जानती हैं कि बच्चे इस जानकारी का नाजायज़ फ़ायदा उठा सकते हैं, तो फिर भी इसे लागू करने को क्यों तत्पर हैं? मेरी मानसिक ऊहापोह से सर्वथा अनजान वे अपना पक्ष रखे जा रही थीं.
“लेकिन हमें इसे लागू करना है उन शेष 65 प्रतिशत बच्चों के लिए, जो किसी न किसी कारण से इस तरह के ज्ञान से सर्वथा अनजान हैं. उन्हें गुमराह होने से बचाने के लिए उन्हें यह जानकारी देना बेहद ज़रूरी है. एक बात और समझ लो, हमारा काम मात्र यह शिक्षा देना व इसके गुण-दोष गिनाना है. कौन या कितने इसका सदुपयोग या दुरुपयोग कर रहे हैं, इसके लिए हम ज़िम्मेदार नहीं हैं.”
“लेकिन मैडम उन्हें कौन-सी राह अपनानी चाहिए, कौन-सी नहीं, यह मार्गदर्शन करना हमारा कर्त्तव्य है.”
“तमन्ना, हम एक निर्णय या निष्कर्ष सब पर कैसे थोप सकते हैं? हर इंसान की रुचि, स्वभाव, परिस्थितियां भिन्न-भिन्न होती हैं. कोई एक निर्णय सब पर थोपकर एक जैसे परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती. यह विज्ञान नहीं, मनोविज्ञान है. जिसकी प्रयोगशाला अतिविस्तृत है. पूरा संसार ही इसकी प्रयोगशाला है. यहां एक ही परीक्षण अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग समय में भिन्न-भिन्न परिणाम देता है. इसलिए सबको एक ही लाठी से हांकना नादानी है. हर इंसान को अपने स्वभाव, परिस्थिति और समय के अनुसार अपनी राह स्वयं चुननी होगी.”

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प्रिंसिपल की बातों को सुन मेरी उलझन भी कम होने लगी थी. मेरी सोच का दायरा व्यापक होने लगा था. हां, शायद अब मैं तन्वी के सवालों के जवाब दे सकती हूं. उसकी समस्त शंकाओं का निवारण कर सकती हूं. मैं जान गई हूं कि उसे इंटरनेट का प्रयोग रोकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह उसका प्रयोग सीमित समय के लिए और सही कार्य के लिए करती है. मैं उस पर पूरी निगरानी रखती हूं. मैं जान गई हूं कि मीता को एग फ्रीज़िंग सुविधा का लाभ उठाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसकी सास उसके बच्चे को ख़ुशी-ख़ुशी पाल लेगी और मीता के करियर पर कोई आंच भी नहीं आने देगी. प्रिंसिपल मैडम को तहेदिल से धन्यवाद देकर मैं बाहर निकल आई.
शाम को होमवर्क के समय जब मैंने तन्वी की सारी शंकाओं का निवारण किया, तो वह उत्साह से मेरे गले लग गई.
“आप मेरी ममा ही नहीं, सच्ची मार्गदर्शिका भी हैं. लेकिन ममा डर लगता है कि अपने लिए सही राह चुनने जितना विवेक है मुझमें?”
“क्यों नहीं, बिल्कुल है. अच्छा बताओ, अभी दीवाली पर तुम फ्लोरलेंथ अनारकली लेने की ज़िद कर रही थी. तुमने साक्षी को पहने देखा था और तुम्हें बहुत पसंद आया था. लेकिन जब मैं दिलवाने ले गई, तो तुमने लेने से इंकार कर दिया था. क्यों?”
“क्योंकि ट्रायलरूम में जब मैंने वह सूट पहनकर देखा, तो वह मुझ पर ज़्यादा नहीं जम रहा था. मैं साक्षी जितनी लंबी नहीं हूं न इसलिए… बस, तुरंत मैंने अपना इरादा बदल लिया और दूसरी ड्रेस ले ली.”
“बस, यही तो स्वविवेक है. अभी तुम्हारी उम्र ऐसे ही
छोटे-छोटे निर्णय स्वविवेक से लेने की है. जैसे-जैसे ब़ड़ी होगी, तुम्हारी सोच का दायरा विस्तृत होगा, विचारों में परिपक्वता आएगी और तुम अपने लिए बड़े और महत्वपूर्ण निर्णय भी आसानी से ले सकोगी. अपने लिए सही राह चुनते व़क्त यह अवश्य ध्यान रखना कि अधिकांश बातों के सकारात्मक के साथ-साथ नकारात्मक पहलू भी होते हैं. यह आपकी क़ाबिलीयत है कि आप कितना सकारात्मक पक्ष ग्रहण करते हैं. तुमने वह दोहा तो सुना ही होगा ‘सार सार को गहि रहे थोथा देइ उड़ाय’ अर्थात् किसी भी चीज़ की अच्छी बात रख लो और थोथी यानी खोखली बातें उड़ा दो.” तन्वी को सोच में डूबा देख मैं रुक गई.
“क्या हुआ? फिर कोई समस्या है?”
“नहीं, समस्या नहीं, बल्कि मुझे समाधान सूझ रहा है. अगली कक्षा में हम सभी को भी कोई न कोई विषय चुनना है. आज टीचर सभी विषय और उनसे जुड़े करियर के बारे में बता रही थी और हमेशा की तरह अंत में हमें असमंजस में छोड़कर निकल गई कि अब आप निश्‍चित करें कि आपको कौन-सा विषय चुनना हैं. मैं तो खीज ही उठी थी, लेकिन अब सोच रही हूं कि वे सही थीं. अपनी पसंद और क़ाबिलीयत के अनुसार निर्णय तो हमें ही लेना होगा. चूंकि मुझे मैथ्स पसंद है, पर साइंस नहीं, तो क्यों न फिर मैं कॉर्मस ले लूं. इसमें करियर के अच्छे विकल्प भी हैं. नेट पर और सर्च करती हूं.” तन्वी इंटरनेट पर व्यस्त हो गई थी.
बेटी के भविष्य के प्रति आश्‍वस्त मैं उसकी आत्मनिर्णय की बढ़ती क्षमता को मुग्ध भाव से निहारे जा रही थी.

    संगीता माथुर

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कहानी- … और मौन बोल पड़ा (Short Story- Aur Maun Bol Pada)

कहानी- ... और मौन बोल पड़ा

 

कहानी- ... और मौन बोल पड़ा

प्रेम तो कृष्ण ने किया था राधा से. उन्हें प्रेम दिया, उनसे कुछ लिया नहीं. जाते-जाते अपनी प्राणप्रिया बांसुरी भी दे दी, किसी से कुछ लिया नहीं. किसी से बिना कुछ लिए उसे केवल अपना देने की भावना ही प्रेम है, इसलिए तुम्हें ये बताकर मैंने कभी तुम्हारा प्रेम पाने की कोशिश नहीं की. बस, यही माना कि तुम जहां भी रहो, जिसके भी साथ रहो, उसको ख़ुश रखो और ख़ुद भी ख़ुश रहो. तुम्हारे प्रति मेरा यही भाव प्रेम है, शाश्‍वत प्रेम.

शाम हो चुकी है. सब लोग घरों को लौट रहे हैं, अपने काम से बोझिल होकर थक-हारकर ठीक इसी सूरज की तरह. देखो तो, कितना बोझिल लग रहा है. शाम होने तक इसका तेज भी ख़त्म हो जाता है और इसका चेहरा भी आम लोगों की तरह बुझा-बुझा-सा लगता है. ग़ौर करो तो प्रकृति हर एक इशारे से अपने होने का एहसास कराती है. इन्हीं इशारों को इंसानी भाषा में समय और कालचक्र की गति के ताने-बानों से बुनकर हम ‘परिस्थितियों’ का नाम देते हैं. इन्हीं परिस्थितियों के योग से जो निचोड़ हमें मिलता है, उसे ‘अनुभव’ कहा जाता है. कहते हैं कि ढलते सूरज को नहीं देखना चाहिए, इससे मन-मस्तिष्क तथा याद्दाश्त पर बुरा प्रभाव पड़ता है. पर मैं कैसे मान लूं? मुझे तो इसे देखकर वो सब याद आ जाता है, जो मुझे याद ही नहीं…
आज अपनी बहुत पुरानी दोस्त की याद आ गई. ‘अनुभूति’ यही नाम था उसका, पर शायद ही कोई ऐसा पल रहा होगा, जब मैंने उसे उसके पूरे नाम से पुकारा हो. मैं हमेशा उसे ‘अनु’ ही बुलाया करता था. मेरी इस आदत से प्रभावित होकर वह भी मेरा पूरा नाम ‘सारथी’ न कहकर मुझे ‘सार’ ही बुलाती थी. हम दोनों इस बात पर एकमत थे कि जो हमें सबसे प्यारा और हमारे लिए सबसे अलग हो, उसका नामकरण हमें ख़ुद करना चाहिए.
हिंदी मीडियम के स्कूल से निकलकर पहली बार इंग्लिश मीडियम के बच्चों के बीच बड़ा अजीब महसूस कर रहा था. कक्षा में पहले दिन तीन लड़के अपनी-अपनी अमीरी का बखान कर रहे थे और मैं कोने में दबा-कुचला-सा बैठा था, तब वह पहली लड़की थी, जिसने मुझसे दोस्ती की पहल की थी. फिर धीरे-धीरे और भी बच्चे आने लगे और मेरी दोस्ती स्कूल में लगभग सभी से हो गई. चाहे वो मुझसे बड़ी क्लास के हों या छोटी क्लास के, सभी मेरे दोस्त बन गए, लेकिन स्कूल में लड़कियों से अधिक बात करनेवाले लड़कों की हमेशा खिंचाई होती थी, इसलिए मैं अनु से ज़्यादा बातचीत नहीं करता था. थोड़ा अंतर्मुखी भी था. फिर भी मैं उसकी बड़ी फ़िक्र करता, उस पर ध्यान देता. उसकी हर चीज़ मुझे अच्छी लगती.
मां के सामने तो मैं खुली क़िताब था. उनसे आज तक मैंने कुछ नहीं छिपाया ‘कुछ भी नहीं’, जो शायद एक उम्र के बाद बच्चे मां-बाप से छुपाते हैं, पर मैं नहीं छुपाता था. इसी वजह से मेरा मार्गदर्शन बड़े ही सुरक्षित हाथों में हुआ. उन्होंने बताया कि इस उम्र में हर लड़की को लड़के और लड़के को लड़कियां बहुत अच्छी लगती हैं. अब मेरा व्यवहार अनु के प्रति और भी सावधानीभरा हो चुका था. अब मैंने अपने मन पर नियंत्रण रखना शुरू कर दिया. अब उसकी हर हरकत, जिससे मैं प्रभावित होता, तुरंत मन-मस्तिष्क के तराजू पर तौलकर परखा करता कि यह वास्तविक प्रेम के कारण हो रहा है या केवल आकर्षण है. इस तरह की आध्यात्मिक और चिंतनवाली गूढ़ बातें दोस्तों के बीच करने के कारण वो मुझे ‘साधू’ या ‘बाबा’ कहकर मेरा मज़ाक उड़ाते थे, क्योंकि वो इन बातों को समझ ही नहीं पाते थे या शायद मैं ही उनसे पहले परिपक्व हो गया था.
ख़ैर, कुछ समय बाद मैंने स्कूल छोड़ दिया और फिर दोबारा पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा या फिर यूं कहना ज़्यादा बेहतर होगा कि सब कुछ इतना जल्दी और एकाएक छूटा कि पीछे मुड़कर देखने का समय ही नहीं मिला. 13 साल बाद पापा के एक मित्र के घर पार्टी के दौरान क़िस्मत ने मेरा और अनुभूति का सामना करा दिया. हम दोनों के बीच कई सालों की दूरी आ चुकी थी. अनुभूति मेरे सामने थी, पर क़दम थे कि उठ ही नहीं रहे थे. दो क़दम के फासलों की दूरी को चलकर मिटाना कितना मुश्किल होता है, इसे आज मैंने जाना. औपचारिकता का निर्वाह करने के लिए शुरू से ही मैं मशहूर रहा हूं. आख़िरकार हमारे औपचारिकताविहीन संबंधों को औपचारिकता की बैसाखी का सहारा लेना ही पड़ा.
“कैसी हो अनुभूति?” मैंने पूछा. उसकी वाचालता आज भी वैसी ही थी, बस छेड़ने भर की देरी थी, “मैं तो ठीक हूं मि. गायब! जी हां, गायब, स्कूल क्या छोड़ा, शहर ही छोड़ दिया. न कोई फोन, न कोई बातचीत, न मिलना-जुलना, न कोई खोज-ख़बर. ज़िंदा भी हो या नहीं, कुछ नहीं पता. ऐसे गायब हुए, जैसे कभी मिले ही नहीं और ये अनुभूति-अनुभूति क्या लगा रखा है. मेरा नाम भूल गए क्या, जो तुमने मुझे दिया था.”

कहानी- ... और मौन बोल पड़ा
मेरी स्थिति इतनी अजीब थी कि क्या बताऊं, सालों बाद वही अंदाज़. ख़ुशी तो बहुत हुई, पर तुरंत दिल से एक गंभीर आवाज़ आई. ‘सावधान सारथी! ये वही आवाज़ है, जिसे तूने इतने सालों तक दबाए रखा है. यह आवाज़ वो चाबी है, जिसे अपने दिल के ताले से दूर रखना, नहीं तो सारे राज़ खुल जाने का ख़तरा हो सकता है.’ इससे पहले कि मैं कुछ कहता मेरी पत्नी भूमिजा आ गई. मैंने मिलवाने के लिए कहा, “अनु, ये मेरी पत्नी भूमिजा है. एक पुराने दोस्त के साथ एक नया साथी फ्री.” अनु ने हाज़िरजवाब दिया, “हां, वैसे भी अब तुम पुराने हो चुके हो और दुनिया हमेशा उगते सूरज को ही सलाम करती है.” इस पर हम सब खिलखिलाकर हंस पड़े.
“ओह! तो आप हैं अनुभूति. इन्होंने कई बार आपके बारे में बताया है. यक़ीन मानिए, आपको देखकर कितनी ख़ुशी हो रही है, ये स़िर्फ मैं और सारथी ही जान सकते हैं.”
तब मैंने पहली बार महसूस किया कि मेरी चंचल अनु अब परिपक्व हो चुकी है, तभी तो उसने शरमाकर मुस्कुरा भर दिया, कुछ कहा नहीं, लेकिन उस मुस्कुराहट के पीछे छिपी खिलखिलाहट वाली हंसी मैंने सुन ही ली.
तभी पीछे से उसकी आंखें अपने हाथों से ढंकते हुए एक शख़्स ने लड़की की आवाज़ में कहा, “पहचान कौन?” अनु ने झट से कहा, “आवाज़ से भले ही धोखा खा जाऊं, पर तुम्हारे स्पर्श की अनुभूति मुझे धोखा नहीं दे पाएगी मि. स्पर्श खन्ना.” यह उसके पति थे, मुझे समझने में देर नहीं लगी. अनु ने स्पर्श से मेरा परिचय कराया. “तो आप हैं मि. सारथी, आपके बारे में बहुत कुछ सुना है अनुभूति से.” मुझे स्पर्श के इन शब्दों और उसके स्पर्श में एक पुरुष के चोटिल अहं का अनुभव हुआ. शायद मेरी तारीफ़ में अनु ने स्पर्श को मेरे सामने एक अनजाने प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़ा कर दिया था. कुछ कह नहीं सकता था, क्योंकि यह मेरी उनसे पहली मुलाक़ात ही तो थी.
फिर भी मैंने उन्हें छेड़कर कहा, “वाह! क्या बात है स्पर्श+अनुभूति=स्पर्शानुभूति.” स्पर्श स़िर्फ मुस्कुराए, पर अनु तो शुरू ही हो गई, “पता है स्कूल के दिनों में सार हम दोस्तों में मशहूर था. किसी का भी नाम संधि-विच्छेद करके ख़ूबसूरत करने और उसका कूड़ा करने में व उसकी टांग खींचने में भी अव्वल. मुझे इसकी ये आदत बहुत अच्छी लगती थी, तुम आज भी नहीं बदले सार.” हमारी बातों को स्पर्श और भूमिजा दोनों ही सुन रहे थे, लेकिन भूमिजा उस वार्तालाप में रस ले रही थी, जबकि स्पर्श की आंखों में मैंने कुछ उलझन महसूस की.
वह एक इंजीनियर था और मैं एक सायकियाट्रिस्ट, इसलिए कुछ देर अपने-अपने क्षेत्र के बारे में बातचीत होती रही, पर मैंने देखा वो मुझसे खुल नहीं पा रहा था. अब मुझे उसका मनोविज्ञान थोड़ा-थोड़ा समझ में आने लगा था.
कुछ दिन तक हम मिलते-जुलते रहे. हमारी दोस्ती में फिर से वही रंग भर गए, जो पहले थे. एक दिन अनु ने शिकायत की, “तुम तो जैसे मुझसे सारे रिश्ते ही तोड़कर चले गए. मैंने सोचा कि अब हम कभी नहीं मिलेंगे. बस, एक आस थी.”
मैंने कहा, “तुम्हें तो आस थी कि हम फिर मिलेंगे, पर मैं तो निश्‍चिंत था कि अब हम ज़िंदगी में दोबारा कभी नहीं मिलेंगे.” अनु की प्रश्‍नवाचक दृष्टि को पढ़ने में मुझे अधिक समय नहीं लगा. मैंने कहा, “सच तो ये है कि अब तक अप्रत्यक्ष रूप से मैं तुमसे भाग रहा था, क्योंकि एक सच जो आज मैं तुम्हें बताने की स्थिति में आ गया हूं, कल तक नहीं था. पहले तुम्हारे सवाल का जवाब- मैं छोड़कर चला गया था, तुमसे रिश्ता तोड़कर नहीं.”
अनु ने कहा, “तोड़ा या छोड़ा, बात तो एक ही है.” मैंने प्रतिवाद किया, “नहीं, तोड़ने और छोड़ने में बहुत फ़र्क़ है. टूटे रिश्ते जुड़ते नहीं और अगर जुड़ भी गए, तो उनमें गांठें पड़ जाती हैं, पर छोड़े हुए रिश्ते उस टीवी सीरियल की तरह होते हैं, जिन्हें ज़िंदगी के किसी भी पड़ाव पर हम जहां से छोड़ देते हैं, कुछ समय बाद ज़िंदगी के किसी दूसरे पड़ाव से मिलने पर उन्हें वहीं से दोबारा शुरू कर देते हैं, जहां से हमने उन्हें छोड़ा था. इसलिए तुमसे मुलाक़ात होने पर मैंने वहीं से अपने रिश्ते की शुरुआत कर दी.” अनु आज गंभीरता से मेरी आंखों को देख रही थी, मानो वो मुझे पूरी तरह पढ़ लेना चाहती हो.
“वो कौन-सा सच है, जो आज तक तुमने मुझे नहीं बताया.” अनु ने तुरंत जानना चाहा. पर आज मुझे किसी भी तरह का डर, घबराहट या किसी भी प्रकार की हिचकिचाहट महसूस नहीं हो रही थी. लग रहा था, जैसे आज मैं इन सबसे ऊपर उठ चुका हूं. स्वच्छंद और स्वतंत्र निष्कलुष हृदय का स्वामी हो चुका हूं. मैंने सहज लहज़े में इतनी बड़ी अभिव्यक्ति कर डाली, “अनु, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं.”
अनु को काटो तो ख़ून नहीं. उसे पता नहीं चला कि क्या हो गया. निस्तब्धता एवं संवेदनशून्यता की सीमा को पार कर जाने वो किस लोक में पहुंच चुकी थी, जहां उसके कान तो सुन रहे थे, परंतु संदेश अपने गंतव्य के बीच ही कहीं खोए-से लग रहे थे. उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे, क्या करे? मैंने उसकी मन:स्थिति को भांप लिया कि जिस शख़्स को वो अपना सबसे अच्छा दोस्त मानती है, वो एक आदर्श पति भी है, उसमें चारित्रिक दोष भी नहीं है, फिर ये क्या…?
मैंने आगे कहना शुरू किया, “वो भी आज से नहीं, जब तुमसे पहली बार मिला था, तब से. लेकिन कभी कहा नहीं, क्योंकि मैं प्रेम और आकर्षण के बीच की बारीक रेखा के अंतर में ही उलझा रह गया था और जब उलझन से निकला, तब तक तुम अनूप से प्यार कर बैठी थी. लेकिन मैंने प्रेम का गूढ़ स्वरूप तब तक समझ लिया था, इसलिए तुम्हें उसके साथ देखकर भी ख़ुश था. तुम्हारा वो प्रेम स्थायी नहीं था, मैंने सुना तीन महीने बाद उसने तुम्हें छोड़ दिया, लेकिन मैं तुमसे इतना दूर था कि चाहकर भी तुम्हें सांत्वना देने नहीं आ सका.”
थोड़ी देर रुककर मैंने फिर बोलना शुरू किया, “लेकिन तुम्हारी बदहवासी बता रही है कि तुमने प्रेम का मूल अर्थ आज तक जाना ही नहीं है, नहीं तो तुम इस तरह बदहवास नहीं होती, बल्कि सहज होती. तुम प्रेम के शाब्दिक अर्थ में न जाओ, बल्कि उसके मूल अर्थ अथवा भावार्थ में जाकर उसे देखो, जो उसका वास्तविक तथा शाश्‍वत अर्थ है, तो तुम्हें भी उस प्रेम का ज्ञान
हो जाएगा.” मैंने समझाना शुरू किया, “मनोविज्ञान कहता है कि प्रेम के मूल में स्वार्थ होता है, किंतु सच तो ये है कि जहां सच्चा प्रेम हो, वहां स्वार्थ का क्या काम? संसार में कामना को भी प्रेम ही कहते हैं, वह कामना उपयोगिता के कारण हो सकती है या फिर आधिपत्य के कारण भी हो सकती है.
तुम केवल उस प्रेम से परिचित हो, जो सांसारिक और सात्विक है. प्रत्यक्ष शरीर के बंधनों से बंधा है. कामी पुरुष वेश्या के प्रति अपने काम-भाव को ही प्रेम मानता है. बेटे से उसकी उपयोगिता और अपेक्षा के कारण ही पिता उससे प्रेम करता है और पति का पत्नी-प्रेम मात्र अपनी पत्नी के प्रति आधिपत्य भाव ही होता है, वस्तुतः इनमें से प्रेम कोई भी नहीं है. प्रेम स्वार्थ, अपेक्षा तथा आधिपत्य से परे है, यही प्रेम का यथार्थ स्वरूप है, बल्कि मैं तो कहता हूं कि प्रेम केवल प्रेम है, शाश्‍वत प्रेम. उसे सांसारिकता या सात्विकता का जामा पहनाना भी उचित नहीं है.
प्रेम तो कृष्ण ने किया था राधा से. उन्हें प्रेम दिया, उनसे कुछ लिया नहीं. जाते-जाते अपनी प्राणप्रिया बांसुरी भी दे दी, किसी से कुछ लिया नहीं. किसी से बिना कुछ लिये उसे केवल अपना देने की भावना ही प्रेम है, इसलिए तुम्हें ये बताकर मैंने कभी तुम्हारा प्रेम पाने की कोशिश नहीं की. बस, यही माना कि तुम जहां भी रहो, जिसके भी साथ रहो, उसको ख़ुश रखो और ख़ुद भी ख़ुश रहो. तुम्हारे प्रति मेरा यही भाव प्रेम है, शाश्‍वत प्रेम.” अनु की आंखें छलछला उठीं. प्रेम के गूढ़ स्वरूप को जानकर या शायद आत्मग्लानि से. मैं हर किसी की आंखों को पढ़ लेता था, लेकिन नमी की वजह से उसकी आंखों के अक्षर धुंधले पड़ गए थे, जिन्हें मैं पढ़ नहीं पा रहा था और कुछ देर बाद मैंने भी महसूस किया कि ओस की कुछ ठंडी बूंदें मेरी भी आंखों में कैद थीं, जिन्हें बहाते ही नज़ारा साफ़ दिखने लगा.
अनु ने ख़ुद को संभालते हुए पूछा, “क… क… क्या भूमिजा, ये सब…?” मैंने मुस्कुराकर कहा, “हमारी जब शादी हुई, तब वो स़िर्फ मेरी पत्नी थी, पर अब वो मेरी अर्धांगिनी है, इसलिए कभी छुपाने की नौबत ही नहीं आई, तभी तो उस दिन पार्टी में तुम्हें देखकर वो मुझसे भी ज़्यादा ख़ुश हुई, बल्कि उसी के कहने पर मैं तुमसे यह सब कह पा रहा हूं.”
अनु अब न हंस पा रही थी, न ही रो पा रही थी. उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करे. अंततः मुझसे लिपटकर रो पड़ी, जैसे बांध से पानी छूटने पर जलधारा अपना संयम तोड़कर अपने साथ सब कुछ बहाकर ले जाती है और अंततः समुद्र में विलय होकर ही शांत होती है. मेरी भी हिम्मत अब उसे चुप कराने की नहीं हो पा रही थी कि तभी नम आंखों से भूमिजा ने कमरे में प्रवेश किया और कहा, “तुम जब नहीं थी, तब तुम्हारे नाम की जगह खाली थी, मैं वहां नहीं बैठ सकती थी, तो मैंने सार के दिल में अपने लिए एक नई जगह बना ली और मैं ये भी जानती हूं कि मेरी जगह सार कभी किसी को नहीं बैठने देंगे, चाहे मैं रहूं या न रहूं.”
अनु ने बड़ी हिम्मत जुटाकर एक प्रश्‍न और कर दिया, “इतने सालों तक कैसे छुपाकर रखा तुमने?” मैंने कहा, “अनु, समुद्र में कई सीप होते हैं, मगर मोती स़िर्फ वही सीप बना पाता है, जो बारिश की बूंदों को अपने अंदर मोती बनने तक संभाल सके…” तभी मेरी नज़र पीछे खड़े एक हाथ में अटैची और दूसरे में कोट लिए स्पर्श पर पड़ी. आश्‍चर्य से मेरी आंखें स्पर्श पर टिकी रह गईं, उसकी आंखें लाल थीं… लेकिन क्रोध से नहीं, उनमें सम्मान था, आग्रह था, संवेदना थी, पश्‍चाताप था और थे… दो आंसू, जो बहुत बोझिल थे.
माहौल में उस समय कोई हलचल नहीं थी, स़िर्फ शांति और सबका मौन. वो मौन इतना गहरा था कि आज मैं उस मौन की गूंज को साफ़-साफ़ सुन पा रहा था और हम चारों ही लगभग आज उसी भाषा के माध्यम से बातें कर रहे थे. कभी-कभी मौन भी बहुत कुछ कह जाता है. बस, उसे सुनने के लिए उस मौन भाषा के ज्ञान की आवश्यकता होती है. मैंने महसूस किया कि इस मौन में भी सबके प्रति प्रेम ही था, क्योंकि कुछ लोग कहते हैं कि रिश्तों में मौन आ जाए, तो रिश्तों को खोखला कर देता है. शायद, इसीलिए इतने सालों से मैं मौन रहा, पर सालों से शांत बैठा मेरा मौन आज बोल ही पड़ा… फिर भी वह सुखद ही था.

      कुशाग्र मिश्रा

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कहानी- पासवाले घर की बहू ( Paswale Ghar Ki Bahu )

कहानी- मिस चार्मिंग (Short Story- Miss Charming)

कहानी

 

Ms Charmin 3
“मैंने बहुत कोशिश की कि मैं वहां से भाग जाऊं, पर मैं तो जैसे किसी अंधे कुएं में गिर चुकी थी. यह एक सोफिस्टीकेटेड लोगों की दुनिया थी, जहां पांच सितारा होटलों, फार्म हाउसों और आलीशान बंगलों में स्मार्ट, चार्मिंग, एज्युकेटेड लड़कियां भेजी जाती थीं, कुछ घंटों, दिन या फिर किसी बिज़नेस ट्रिप पर साथ जाने के लिए. धीरे-धीरे उन बड़े-बड़े बिज़नेसमैन, ब्यूरोक्रेट्स और एलीट वर्ग के मर्दों को अपनी उंगलियों पर नचाने में मुझे मज़ा आने लगा.”

कनाट प्लेस जाऊं और जनपथ का चक्कर न लगाऊं, ऐसा तो हो ही नहीं सकता. बेशक कई बार बिना कुछ ख़रीदे खाली हाथ ही लौट आती हूं, पर फिर भी एक कतार में करीने से बनी जनपथ की दुकानों के अंदर झांकने का मोह संवरण नहीं कर पाती. अन्नपूर्णा के पास एक गली में राजस्थान व गुजराती चीज़ों को ज़मीन पर बिछाए औरतें बैठी होती हैं. मिरर वर्क के कुशन कवर, पेंटिंग्स, कुर्ती, घाघरा, चादरें, नेकलेस, कड़े, डेकोर की चीज़ें और न जाने क्या-क्या होता है… जिसके कारण विदेशी पर्यटकों की तो वहां भीड़ जुटी ही रहती है, साथ ही एथनिक चीज़ों की क्रेज़ी हम जैसी कुछ महिलाएं भी वहां से ख़ूब ख़रीदारी करती हैं.
जनपथ में हर चीज़ मौजूद है- हर किसी की जेब और पसंद के अनुसार. मुझे एक कुर्ता चाहिए था- बांधनी का. बस, उसे ही छांट रही थी कि तभी कोई मुझे छूकर निकला. भीड़ में ऐसा होना स्वाभाविक है, पर उस छुअन में परिचय की गंध आई. मैं म़ुड़ी- पेस्टल ग्रीन कलर की शिफ़ॉन की साड़ी में स्टाइलिश ढंग से कटे बालों में एक आकर्षक काया की कसावदार पीठ मुझे दिखी. चाल तो उसी के जैसी है, पर बाल… उसके बाल तो कमर के नीचे तक जाते थे. मगर… मन को झटका. इतनी अगर-मगर और दुविधा से तो अच्छा है कि उसे सामने से देख लूं.
मैं हाथ में पकड़े कुर्ते को वापस रख तेज़ी से आगे लपकी, बिल्कुल ऐसे उसके बगल से गुज़री, ताकि वह जान-बूझकर किया गया प्रयास न लगे.
“हाय, तू यहां कैसे? कैसी है? मैं बता नहीं सकती तुझे देख कितनी ख़ुशी हो रही है?” एक साथ इतने सारे सवाल और ढेर सारा आश्‍चर्य, संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं है अब. प्रश्‍नों की ऐसी झड़ी लगाना केवल उसी की आदत थी.
“कभी सोचा न था कि इतने दिनों बाद फिर यूं अचानक मुलाक़ात हो जाएगी.” मैं अपनी ख़ुशी को संभाल नहीं पा रही थी, शायद इसीलिए उससे लिपटते हुए मेरी आंखें नम हो गई थीं.
“इतने दिनों बाद… हां, पूरे तीन साल, आठ महीने, दो दिन और शायद कुछेक घंटे बाद हम मिल रहे हैं.” केतकी के ऐसा कहते ही हम दोनों ज़ोर-ज़ोर से खिलखिलाकर हंस पड़ीं. आसपास से गुज़रते लोगों की नज़र हम पर पड़ी और बिना उनकी परवाह किए हम बहुत देर तक हंसते रहे. मुझे तो लग रहा था जैसे मैं बरसों बाद इतना खुलकर हंस रही हूं. हंसते-हंसते पेट और गालों में दर्द होने लगा था.
“बिल्कुल नहीं बदली है तू, सिवाय इसके कि तेरा शरीर थोड़ा भर गया है और मांग में सिंदूर चमक रहा है. आज भी तूने बाटिक की ही साड़ी पहनी हुई है. अब भी दीवानी है तू कॉटन और हैंडलूम साड़ियों की?” केतकी ने चुटकी ली.
“यह आदत तो अब जाने से रही. मैं अपना स्टाइल बदलनेवाली नहीं.” मैं शायद अपनी ही रौ में बहने लगी थी. कॉटन, हैंडलूम और बाटिक प्रिंट की साड़ी, सूट या कुर्ते ही मेरी कमज़ोरी थे. लेकिन मेरे ब्यूरोक्रेट पति को मेरी सादगी डाउन मार्केट लगती थी, इसलिए उनके साथ जाते समय मैं हमेशा सिल्क, जॉर्जेट या शिफ़ॉन की साड़ियां ही पहनती थी. इस पर वे कहते, “तुम्हारा जो लुक है न, एकदम टिपिकल है. कुछ भी पहन लो, सिंपल ही लगती हो. वो क्या कहते हैं न? हां, बहनजी टाइप. नॉट फ़िट फॉर मॉडर्न कल्चर.” पति चाहे लाख व्यंग्य कसें, पर मैं भी कहां माननेवाली थी, मुझे जिस तरह से सजना-संवरना पसंद था, वैसे ही रहती थी. केतकी के हाथ का स्पर्श कंधे पर महसूस हुआ तो मैं अपनी सोच से बाहर आई. “तू बता, कहां रही तू इतने दिन? तुझमें तो बहुत बदलाव आ गया है सिवाय तेरी शिफ़ॉन की साड़ियों के. बाल क्यों इतने छोटे करा लिए?” मैंने भी उसे छेड़ा. मैं उसे अक्सर कॉटन की साड़ियां और ड्रेसेस के एक्सक्लूसिव पीसेस छांटने के लिए न जाने कहां-कहां चक्कर काटने को मजबूर करती थी, वहीं केतकी एक-दो सिलेक्टिव स्टोर्स से शिफ़ॉन की साड़ियां ख़रीद मेरा समय बचाती थी.
“बदलाव तो आया है…” अचानक कुछ कहते-कहते चुप हो गई केतकी.
“अब यहीं रहकर बात करेगी कि कहीं बैठकर कुछ खिलाएगी भी?” उसने मुझे आगे की ओर घसीटते हुए कहा.
“चल वहीं बैठते हैं, अपनी फेवरेट जगह कॉफी होम में.” मैंने कहा.
“अरे यार, बड़ी बोर हो गई है वह जगह. उसी के पास एक अच्छा रेस्टॉरेंट खुला है. शानदार और फ्यूज़न लुक के साथ. चल आज मैं तुझे वहीं ट्रीट देती हूं. जेब भी फुल है.”
केतकी की बेबाक़ी, खुलापन और मस्त रहने का फलसफ़ा सब कुछ पहले जैसा ही था, पर वह क्या चीज़ थी, जो मुझे बार-बार एहसास करा रही थी कि केतकी बहुत बदल गई है. उसके चेहरे पर हमेशा छाई रहनेवाली मासूमियत नहीं है या फिर वह मासूम कशिश, जो उसे गरिमामय बनाती थी, उसके चेहरे से गायब है. कॉलेज के दिनों में अगर मैं अपनी सादगी के लिए मशहूर थी तो वह अपनी उस कशिश के कारण जो लोगों को अपनी ओर खींचती थी. ग्लैमरस न होते हुए भी वह अपने शिफ़ॉन के सूटों में बहुत ग़ज़ब की लगती थी. साड़ियां तो उसने बहुत बाद में पहनना शुरू किया था. सांवली रंगत, लंबे-काले बाल, आंखों में लगा काजल और कोल्हापुरी चप्पल- बस, यही शृंगार होता था उसका. फिर भी लड़के हों या लड़कियां उसे देख पाने की ललक से भरे रहते थे. “शी हैज़ ए चार्मिंग पर्सनैलिटी.” सबकी यही टिप्पणी होती थी.
मेरी और उसकी ख़ूब पटती थी. कॉलेज के बाद भी हमारी दोस्ती बनी रही. फिर उसे अपने पापा की मृत्यु के बाद मां और छोटे भाई के साथ अपने चाचा के घर रहने कानपुर जाना पड़ा फ़ाइनेंशियल प्रॉब्लम्स की वजह से और कानपुर में ही उनका पुश्तैनी मकान व बिज़नेस भी था. उसके भाई को पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए उसे यही सबसे अच्छा विकल्प लगा था.
उसके कानपुर जाने के बाद कुछ समय तक तो हमारा पत्र-व्यवहार चला, फ़ोन पर भी बात हो जाती थी, पर धीरे-धीरे अपनी शादी के बाद मैं अपनी घर-गृहस्थी और नौकरी में इतनी व्यस्त हो गई कि केतकी से फिर कोई बातचीत नहीं हो पाई. वैसे भी आईएएस की बीवी होने के कारण सोशल ज़िम्मेदारियां ही निभाने के लिए बहुत थीं, फिर उसकी तरफ़ से भी कोई संपर्क स्थापित नहीं हुआ.
“क्या लेगी? यहां के स्प्रिंग रोल्स और मंचूरियन कमाल के हैं.”
मैं अपनी सोच में इतनी उलझी हुई थी कि खाने पर भी मेरा ध्यान नहीं था.
“तू दिल्ली कब आई केतकी?” मंचूरियन खाते-खाते मैंने पूछा.
“ढाई साल हो गए हैं.” उसके चेहरे पर उदासी की एक मोटी परत बिछ गई थी. तो क्या यही है वह बदलाव, जो मुझे बार-बार उलझन में डाल रहा है?
“कानपुर जाकर पता चला कि चाचा हमारे हिस्से का मकान व दुकानें पहले ही पापा से प्रॉपर्टी के पेपर्स पर धोखे से साइन करवाकर अपने नाम करवा चुके थे. उनके धोखे से परेशान भाई ने पहले तो मां के गहने बेचे और फिर कुछ न कर पाने के अपराधबोध में पिसते हुए ग़लत काम करने लगा. इधर का माल उधर करते हुए वह लड़कियां भी सप्लाई करने लगा. फिर मां की बेबसी और मुझे डरा-धमकाकर मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उसने मेरी शादी करवा दी. जब यहां दिल्ली आई तो पता चला कि शादी तो मात्र ढोंग था, असल में उसने मेरी भी सप्लाई की थी.”
केतकी का चेहरा एकदम सपाट था. उसकी बातें सुन मैं सकते में आ गई थी. इतना घिनौनापन! कोई भाई ऐसे कैसे कर सकता है? ऐसे में उसकी मासूमियत नहीं खोती तो और क्या होता?
“याद है, मेरी पर्सनैलिटी चार्मिंग है, कॉलेज में इस बात को लेकर कितनी चर्चा होती थी. ‘मिस चार्मिंग’ का तो कितनी बार मुझे ख़िताब भी मिला था. लेकिन यही चार्म मेरा हार्म कर देगा, किसने सोचा था.” बेबाक़ी का एक झोंका उसके पास से निकला, पर वह फिर गंभीर हो गई.
“चल घर चलते हैं.” मैंने बिल देते हुए कहा. “पतिदेव शहर से बाहर हैं, आराम से बैठकर बातें करेंगे.”
“बहुत शानदार है तेरा फ्लैट लतिका. मॉडर्न टच देते हुए एथनिक लुक देना नहीं भूली.” अपने गुच्ची के बैग को सेंटर टेबल पर रख सोफे पर वह ऐसे लेटी, मानो बहुत थक गई हो.
“बहुत सुंदर है तेरा बैग.” अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया. “मेरे पास भी ऐसा ही बैग है, बस, उसका कलर ब्राउन है और तेरा ब्लैक, वॉट ए को-इंसीडेंस.”
“हां, एक क्लाइंट ने ही ग़िफ़्ट दिया था. लेकिन तू कब से ऐसे स्टाइलिश बैग ख़रीदने लगी? ये न तो टिपिकल राजस्थानी है, न गुजराती और न ही एथनिक?” उसकी बात सुन मुझे हंसी आ गई.
“सुधर जा मिस चार्मिंग. मैंने इसे ख़रीदा नहीं है, पतिदेव ने ही ग़िफ़्ट दिया है.” जूस का ग्लास उसे थमाते हुए मैंने कहा. वातावरण की बोझिलता थोड़ी-सी कम होती महसूस हुई. बैग से टिशू पेपर निकाल वह मुंह पोंछ फिर से सोफे पर लेट गई.
उदासी की परत उसके चेहरे पर और घनी हो गई थी. “मैंने बहुत कोशिश की कि मैं वहां से भाग जाऊं, पर मैं तो जैसे किसी अंधे कुएं में गिर चुकी थी. यह एक सोफिस्टीकेटेड लोगों की दुनिया थी, जहां पांच सितारा होटलों, फार्म हाउसों और आलीशान बंगलों में स्मार्ट, चार्मिंग, एज्युकेटेड लड़कियां भेजी जाती थीं, कुछ घंटों, दिन या फिर किसी बिज़नेस ट्रिप पर साथ जाने के लिए. धीरे-धीरे उन बड़े-बड़े बिज़नेसमैन, ब्यूरोक्रेट्स और एलीट वर्ग के मर्दों को अपनी उंगलियों पर नचाने में मुझे मज़ा आने लगा. बेचारे एक तरफ़ तो सोसायटी में अपने को सम्मानित सिद्घ करने के लिए फैमिली को सबसे अहम् मानते हैं और पति-पत्नी इस तरह पार्टियों व सोशल सर्कल में नज़र आते हैं मानो मेड फॉर इच अदर हैं, पर लतिका ये लोग सबसे बड़े हिप्पोक्रेट हैं.” पल भर के लिए चुप हो गई केतकी. इस समय न तो मेरे पास उसे सांत्वना देने के लिए शब्द थे, न ही उसकी आंखों से छलकती नमी को पोंछने का साहस.
“जानती हो, ‘पार्टनर’ के नाम पर इन्हें कोई ऐसी शह चाहिए होती है, जो इनकी ईगो को हवा देती रहे और मैं अब वही करती हूं. पचास हज़ार, एक लाख, कुछ भी मांग लो, बिना किसी परेशानी के ये लोग दे देते हैं. अच्छा, चलती हूं. शाम की फ्लाइट से बैंगलौर जाना है. एक नामी ब्यूरोक्रेट है, वहां कॉन्फ्रेंस अटेंड करने गया है.”
केतकी ने टेबल पर रखे अपने बैग को उठाया तो उसमें से बहुत सारे विज़िटिंग कार्ड्स निकलकर नीचे ज़मीन पर बिखर गए. शायद टिशू पेपर निकालते समय बैग खुला रह गया था.
“इतने सारे कार्ड्स किसके हैं?” मैं कार्ड उठाने में उसकी मदद करने लगी.
“अरे, उन्हीं सोफिस्टीकेटेड क्लाइंट्स के.” पलभर को केतकी की आंखों में शरारत तैरी. अपनी पुरानीवाली केतकी के उस रूप को देखकर मेरे होंठों पर हंसी आने ही लगी थी, पर… ब्राउन कलर के बहुत ही आर्टिस्टिक ढंग से डिज़ाइन किए हुए कार्ड पर गोल्डन कलर से उभरे नाम को देख जड़ हो गई. इटालिक्स में शेखर शर्मा नाम चमक रहा था. यह कार्ड मैंने ही डिज़ाइन किया था शेखर के लिए. मेरा डिज़ाइन उसे बहुत पसंद आया था, इसीलिए एक साथ हज़ार कार्ड छपवा लिए थे. “तुम जैसी बहनजी टाइप की औरत का टेस्ट इतना अच्छा हो सकता है, यक़ीन ही नहीं होता.” शेखर तब भी उसे ताना देने से चूका नहीं था.
मेरे हाथ से कार्ड लेते हुए केतकी बोली, “अरे, आज बैंगलौर इसी के पास तो जा रही हूं. बहुत स्मार्ट और इंटेलीजेंट है. जब भी कॉन्फ्रेंस या ट्रिप्स पर जाता है, मैं ही तो इसकी ‘पार्टनर’ बनती हूं. बाई द वे, वह गुच्ची का बैग इसी ने तो मुझे ग़िफ़्ट दिया था. चल बाय, फिर मिलते हैं.”
केतकी जा चुकी थी और अपनी सादगी को समेटती मैं न जाने कितनी देर तक शून्य में ताकती खड़ी रही.
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Suman-Bajpai

              सुमन बाजपेयी

 

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