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हिंदी कहानी- असमंजस (Hindi Short Stories- Asmanjas)

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मेरे मस्तिष्क में विचारों का बवंडर चल रहा था. कभी आंखों के आगे तन्वी का चेहरा आता, तो कभी मीता का. हर विषय के चार तर्क पक्ष में और चार विपक्ष में प्रस्तुत कर इंसान को क्यों असमंजस में डाल दिया जाता है?

मैं सोच रही थी कि इतने दिनों बाद अपनी प्रिय सहेली मीता के घर अचानक पहुंचकर उसे सुखद सरप्राइज़ दूंगी, पर उसके घर के वातावरण में घुली बोझिलता ने मेरे उत्साह पर पानी फेर दिया था. शिथिल क़दमों से मैं भी उसके पीछे-पीछे चाय बनवाने रसोई में पहुंच गई थी. थोड़ा-सा कुरेदते ही लावा उबलकर बाहर फूट आया था.
“मैं और सनत काफ़ी समय से ‘बच्चा पैदा करें या ना करें’ इस बात को लेकर असमंजस में थे, क्योंकि दोनों ही अपने-अपने करियर में अभी तक व्यवस्थित नहीं हो पाए हैं. अब जब मेरी कंपनी ने महिलाकर्मियों को एग फ्रीज़िंग की सुविधा दे दी है, तो हमने राहत महसूस की कि चलो इस काम को फ़िलहाल टाला जा सकता है. लेकिन मम्मीजी को पता चला, तो नाराज़ हो गईं. उनके अनुसार, हर काम उचित व़क्त पर किया जाना ही बेहतर होता है. वे घर में कब से बच्चे की किलकारी सुनने को तरस रही हैं. उनके अनुसार, मेरी डिलीवरी से लेकर बच्चे के पालन-पोषण तक की सारी ज़िम्मेदारी जब वे ओढ़ने को तैयार हैं, तो हम उन्हें इस सुख से क्यों वंचित रख रहे हैं?
वे कहती हैं कि जब वे नहीं रहेंगी, हम दोनों की भी बच्चे पैदा करने व पालने की उम्र नहीं रहेगी, तब फ्रीज़्ड एग से बच्चा पैदा करने का क्या औचित्य? और वह भी तब, जब इसमें सफलता का प्रतिशत 20 या 25% ही है.”
“बात तो उनकी सही है.” सारी बात जानकर मैं भी सोच में पड़ गई थी.
“लेकिन हम तो फिर से असमंजस में आ गए न?”
मीता की समस्या का मेरे पास कोई समाधान न था. घर लौटते-लौटते तन्वी के होमवर्क की चिंता में मीता की समस्या मेरे दिमाग़ से पूरी तरह निकल गई थी. घर में घुसते ही मैंने पुकार लगाई, “तन्वी, आज का होमवर्क?”
“इंग्लिश टीचर ने इंटरनेट पर आर्टिकल दिया था.”
“अरे, वह तो बहुत आसान है. पहले नेट के सब फ़ायदे लिख दो, जैसे- इससे एक क्लिक पर ही किसी भी विषय से जुड़ी समस्त जानकारी एक सेकंड में मिल जाती है, समय की बचत, पचासों क़िताबें जुटाने, खंगालने की माथापच्ची नहीं… फिर इंटरनेट से होनेवाली हानियां… बच्चों की क्रिएटिविटी ख़त्म, नेट पर अति निर्भरता… आदि-आदि.”
“वो सब मैडम ने बता दिया था ममा, मैंने लिख भी लिया है.” मेरे धाराप्रवाह भाषण को बीच में ही रोकने का प्रयास करती तन्वी बोल उठी.
“तो फिर क्या समस्या है?” मैं हैरान थी.

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“मैंने कब कहा कोई समस्या है? पर मेरे दिमाग़ में एक उलझन है. मैडम जब भी लिखने को कोई विषय देती हैं, तो पहले पक्ष में तर्क देती हैं, फिर विपक्ष में और अंत में उपसंहार लिखवाकर मंझधार में छोड़ देती हैं. कोई यह तो बताए इंटरनेट प्रयोग करना चाहिए या नहीं? डेमोक्रेटिक सिस्टम सही है या नहीं? विज्ञान अभिशाप है या वरदान?”
एक टीचर होने के नाते मैं तन्वी के सारे सवालों के जवाब दे सकती थी, लेकिन वह सब तो ‘उपसंहार’ के तहत उसकी टीचर उसे पहले ही बता चुकी थी. मुझे एक मां की तरह उसकी समस्या का सटीक समाधान प्रस्तुत करना था और उसके लिए मैं स्वयं को पूरी तरह प्रस्तुत नहीं कर पा रही थी. तन्वी अपने कमरे में जा चुकी थी. मैं शिथिल तन-मन से रसोई के काम निपटाने लगी. सवेरे स्कूल जाने की जल्दी में मैं अक्सर खाने की आधी तैयारी रात में ही कर लेती हूं.
प्रिंसिपल मैडम ने हमेशा की तरह आज की मीटिंग में भी मुझे सम्मिलित कर एक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी सौंपी थी. विषय था- स्कूल में सेक्स एजुकेशन आरंभ करना. कुछ टीचर्स ने दबी ज़ुबान में विपक्ष में तर्क रखे. पर चूंकि ऊपर से निर्देश थे, इसलिए पक्ष में तर्क रखते हुए इसे तुरंत प्रभाव से लागू करने का आदेश जारी कर दिया गया और प्रिंसिपल मैडम की प्रिय सहेली और विश्‍वासपात्र होने के नाते यह ज़िम्मेदारी भी मुझे सौंप दी गई. मेरे मस्तिष्क में विचारों का बवंडर चल रहा था. कभी आंखों के आगे तन्वी का चेहरा आता, तो कभी मीता का. हर विषय के चार तर्क पक्ष में और चार विपक्ष में प्रस्तुत कर इंसान को क्यों असमंजस में डाल दिया जाता है? यहां तो ठीक है ऊपर से निर्देश हैं, इसलिए मानना ही है, अन्यथा निर्णय लेना वाकई में कितना मुश्किल हो जाता है? अपनी सोच में लीन मुझे ध्यान ही नहीं रहा प्रिंसिपल का रूम कभी का खाली हो चुका था.
“तमन्ना, कुछ परेशानी है?” प्रिंसिपल मैडम ने पुकारा, तो मेरी चेतना लौटी.
“देखो, प्रिंसिपल होने के अलावा मैं तुम्हारी दोस्त भी हूं. स्कूल की परेशानी हो या व्यक्तिगत परेशानी तुम मुझसे शेयर कर सकती हो.”
“मैं सोच रही थी कि यह सेक्स एजुकेशन वाकई में बच्चों के लिए सही साबित होगी या नहीं? दरअसल, बच्चों को समझाने से पहले मैं स्वयं आश्‍वस्त हो जाना चाहती हूं. उन्हें दुविधा में रखना मुझे उचित नहीं लगता.”
“बिल्कुल-बिल्कुल. तो मैं तुम्हें बताती हूं कि लगभग 30 प्रतिशत बच्चे ऐसे होंगे, जिन्हें इस शिक्षा से कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि वे पहले ही इंटरनेट आदि संसाधनों से इस बारे में पर्याप्त जानकारी जुटा चुके हैं. 2 से 5 प्रतिशत बच्चे इस जानकारी का दुरुपयोग कर सकते हैं. गर्भनिरोधक तरीक़ों आदि की जानकारी से वे ग़लत राह पर जा सकते हैं…”
मैं हैरानी से प्रिंसिपल मैडम की बात सुने जा रही थी. जब वे जानती हैं कि बच्चे इस जानकारी का नाजायज़ फ़ायदा उठा सकते हैं, तो फिर भी इसे लागू करने को क्यों तत्पर हैं? मेरी मानसिक ऊहापोह से सर्वथा अनजान वे अपना पक्ष रखे जा रही थीं.
“लेकिन हमें इसे लागू करना है उन शेष 65 प्रतिशत बच्चों के लिए, जो किसी न किसी कारण से इस तरह के ज्ञान से सर्वथा अनजान हैं. उन्हें गुमराह होने से बचाने के लिए उन्हें यह जानकारी देना बेहद ज़रूरी है. एक बात और समझ लो, हमारा काम मात्र यह शिक्षा देना व इसके गुण-दोष गिनाना है. कौन या कितने इसका सदुपयोग या दुरुपयोग कर रहे हैं, इसके लिए हम ज़िम्मेदार नहीं हैं.”
“लेकिन मैडम उन्हें कौन-सी राह अपनानी चाहिए, कौन-सी नहीं, यह मार्गदर्शन करना हमारा कर्त्तव्य है.”
“तमन्ना, हम एक निर्णय या निष्कर्ष सब पर कैसे थोप सकते हैं? हर इंसान की रुचि, स्वभाव, परिस्थितियां भिन्न-भिन्न होती हैं. कोई एक निर्णय सब पर थोपकर एक जैसे परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती. यह विज्ञान नहीं, मनोविज्ञान है. जिसकी प्रयोगशाला अतिविस्तृत है. पूरा संसार ही इसकी प्रयोगशाला है. यहां एक ही परीक्षण अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग समय में भिन्न-भिन्न परिणाम देता है. इसलिए सबको एक ही लाठी से हांकना नादानी है. हर इंसान को अपने स्वभाव, परिस्थिति और समय के अनुसार अपनी राह स्वयं चुननी होगी.”

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प्रिंसिपल की बातों को सुन मेरी उलझन भी कम होने लगी थी. मेरी सोच का दायरा व्यापक होने लगा था. हां, शायद अब मैं तन्वी के सवालों के जवाब दे सकती हूं. उसकी समस्त शंकाओं का निवारण कर सकती हूं. मैं जान गई हूं कि उसे इंटरनेट का प्रयोग रोकने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह उसका प्रयोग सीमित समय के लिए और सही कार्य के लिए करती है. मैं उस पर पूरी निगरानी रखती हूं. मैं जान गई हूं कि मीता को एग फ्रीज़िंग सुविधा का लाभ उठाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसकी सास उसके बच्चे को ख़ुशी-ख़ुशी पाल लेगी और मीता के करियर पर कोई आंच भी नहीं आने देगी. प्रिंसिपल मैडम को तहेदिल से धन्यवाद देकर मैं बाहर निकल आई.
शाम को होमवर्क के समय जब मैंने तन्वी की सारी शंकाओं का निवारण किया, तो वह उत्साह से मेरे गले लग गई.
“आप मेरी ममा ही नहीं, सच्ची मार्गदर्शिका भी हैं. लेकिन ममा डर लगता है कि अपने लिए सही राह चुनने जितना विवेक है मुझमें?”
“क्यों नहीं, बिल्कुल है. अच्छा बताओ, अभी दीवाली पर तुम फ्लोरलेंथ अनारकली लेने की ज़िद कर रही थी. तुमने साक्षी को पहने देखा था और तुम्हें बहुत पसंद आया था. लेकिन जब मैं दिलवाने ले गई, तो तुमने लेने से इंकार कर दिया था. क्यों?”
“क्योंकि ट्रायलरूम में जब मैंने वह सूट पहनकर देखा, तो वह मुझ पर ज़्यादा नहीं जम रहा था. मैं साक्षी जितनी लंबी नहीं हूं न इसलिए… बस, तुरंत मैंने अपना इरादा बदल लिया और दूसरी ड्रेस ले ली.”
“बस, यही तो स्वविवेक है. अभी तुम्हारी उम्र ऐसे ही
छोटे-छोटे निर्णय स्वविवेक से लेने की है. जैसे-जैसे ब़ड़ी होगी, तुम्हारी सोच का दायरा विस्तृत होगा, विचारों में परिपक्वता आएगी और तुम अपने लिए बड़े और महत्वपूर्ण निर्णय भी आसानी से ले सकोगी. अपने लिए सही राह चुनते व़क्त यह अवश्य ध्यान रखना कि अधिकांश बातों के सकारात्मक के साथ-साथ नकारात्मक पहलू भी होते हैं. यह आपकी क़ाबिलीयत है कि आप कितना सकारात्मक पक्ष ग्रहण करते हैं. तुमने वह दोहा तो सुना ही होगा ‘सार सार को गहि रहे थोथा देइ उड़ाय’ अर्थात् किसी भी चीज़ की अच्छी बात रख लो और थोथी यानी खोखली बातें उड़ा दो.” तन्वी को सोच में डूबा देख मैं रुक गई.
“क्या हुआ? फिर कोई समस्या है?”
“नहीं, समस्या नहीं, बल्कि मुझे समाधान सूझ रहा है. अगली कक्षा में हम सभी को भी कोई न कोई विषय चुनना है. आज टीचर सभी विषय और उनसे जुड़े करियर के बारे में बता रही थी और हमेशा की तरह अंत में हमें असमंजस में छोड़कर निकल गई कि अब आप निश्‍चित करें कि आपको कौन-सा विषय चुनना हैं. मैं तो खीज ही उठी थी, लेकिन अब सोच रही हूं कि वे सही थीं. अपनी पसंद और क़ाबिलीयत के अनुसार निर्णय तो हमें ही लेना होगा. चूंकि मुझे मैथ्स पसंद है, पर साइंस नहीं, तो क्यों न फिर मैं कॉर्मस ले लूं. इसमें करियर के अच्छे विकल्प भी हैं. नेट पर और सर्च करती हूं.” तन्वी इंटरनेट पर व्यस्त हो गई थी.
बेटी के भविष्य के प्रति आश्‍वस्त मैं उसकी आत्मनिर्णय की बढ़ती क्षमता को मुग्ध भाव से निहारे जा रही थी.

    संगीता माथुर

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हिंदी कहानी- … और मौन बोल पड़ा (Hindi Short Story- Aur Maun Bol Pada)

कहानी- ... और मौन बोल पड़ा

 

कहानी- ... और मौन बोल पड़ा

प्रेम तो कृष्ण ने किया था राधा से. उन्हें प्रेम दिया, उनसे कुछ लिया नहीं. जाते-जाते अपनी प्राणप्रिया बांसुरी भी दे दी, किसी से कुछ लिया नहीं. किसी से बिना कुछ लिए उसे केवल अपना देने की भावना ही प्रेम है, इसलिए तुम्हें ये बताकर मैंने कभी तुम्हारा प्रेम पाने की कोशिश नहीं की. बस, यही माना कि तुम जहां भी रहो, जिसके भी साथ रहो, उसको ख़ुश रखो और ख़ुद भी ख़ुश रहो. तुम्हारे प्रति मेरा यही भाव प्रेम है, शाश्‍वत प्रेम.

शाम हो चुकी है. सब लोग घरों को लौट रहे हैं, अपने काम से बोझिल होकर थक-हारकर ठीक इसी सूरज की तरह. देखो तो, कितना बोझिल लग रहा है. शाम होने तक इसका तेज भी ख़त्म हो जाता है और इसका चेहरा भी आम लोगों की तरह बुझा-बुझा-सा लगता है. ग़ौर करो तो प्रकृति हर एक इशारे से अपने होने का एहसास कराती है. इन्हीं इशारों को इंसानी भाषा में समय और कालचक्र की गति के ताने-बानों से बुनकर हम ‘परिस्थितियों’ का नाम देते हैं. इन्हीं परिस्थितियों के योग से जो निचोड़ हमें मिलता है, उसे ‘अनुभव’ कहा जाता है. कहते हैं कि ढलते सूरज को नहीं देखना चाहिए, इससे मन-मस्तिष्क तथा याद्दाश्त पर बुरा प्रभाव पड़ता है. पर मैं कैसे मान लूं? मुझे तो इसे देखकर वो सब याद आ जाता है, जो मुझे याद ही नहीं…
आज अपनी बहुत पुरानी दोस्त की याद आ गई. ‘अनुभूति’ यही नाम था उसका, पर शायद ही कोई ऐसा पल रहा होगा, जब मैंने उसे उसके पूरे नाम से पुकारा हो. मैं हमेशा उसे ‘अनु’ ही बुलाया करता था. मेरी इस आदत से प्रभावित होकर वह भी मेरा पूरा नाम ‘सारथी’ न कहकर मुझे ‘सार’ ही बुलाती थी. हम दोनों इस बात पर एकमत थे कि जो हमें सबसे प्यारा और हमारे लिए सबसे अलग हो, उसका नामकरण हमें ख़ुद करना चाहिए.
हिंदी मीडियम के स्कूल से निकलकर पहली बार इंग्लिश मीडियम के बच्चों के बीच बड़ा अजीब महसूस कर रहा था. कक्षा में पहले दिन तीन लड़के अपनी-अपनी अमीरी का बखान कर रहे थे और मैं कोने में दबा-कुचला-सा बैठा था, तब वह पहली लड़की थी, जिसने मुझसे दोस्ती की पहल की थी. फिर धीरे-धीरे और भी बच्चे आने लगे और मेरी दोस्ती स्कूल में लगभग सभी से हो गई. चाहे वो मुझसे बड़ी क्लास के हों या छोटी क्लास के, सभी मेरे दोस्त बन गए, लेकिन स्कूल में लड़कियों से अधिक बात करनेवाले लड़कों की हमेशा खिंचाई होती थी, इसलिए मैं अनु से ज़्यादा बातचीत नहीं करता था. थोड़ा अंतर्मुखी भी था. फिर भी मैं उसकी बड़ी फ़िक्र करता, उस पर ध्यान देता. उसकी हर चीज़ मुझे अच्छी लगती.
मां के सामने तो मैं खुली क़िताब था. उनसे आज तक मैंने कुछ नहीं छिपाया ‘कुछ भी नहीं’, जो शायद एक उम्र के बाद बच्चे मां-बाप से छुपाते हैं, पर मैं नहीं छुपाता था. इसी वजह से मेरा मार्गदर्शन बड़े ही सुरक्षित हाथों में हुआ. उन्होंने बताया कि इस उम्र में हर लड़की को लड़के और लड़के को लड़कियां बहुत अच्छी लगती हैं. अब मेरा व्यवहार अनु के प्रति और भी सावधानीभरा हो चुका था. अब मैंने अपने मन पर नियंत्रण रखना शुरू कर दिया. अब उसकी हर हरकत, जिससे मैं प्रभावित होता, तुरंत मन-मस्तिष्क के तराजू पर तौलकर परखा करता कि यह वास्तविक प्रेम के कारण हो रहा है या केवल आकर्षण है. इस तरह की आध्यात्मिक और चिंतनवाली गूढ़ बातें दोस्तों के बीच करने के कारण वो मुझे ‘साधू’ या ‘बाबा’ कहकर मेरा मज़ाक उड़ाते थे, क्योंकि वो इन बातों को समझ ही नहीं पाते थे या शायद मैं ही उनसे पहले परिपक्व हो गया था.
ख़ैर, कुछ समय बाद मैंने स्कूल छोड़ दिया और फिर दोबारा पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा या फिर यूं कहना ज़्यादा बेहतर होगा कि सब कुछ इतना जल्दी और एकाएक छूटा कि पीछे मुड़कर देखने का समय ही नहीं मिला. 13 साल बाद पापा के एक मित्र के घर पार्टी के दौरान क़िस्मत ने मेरा और अनुभूति का सामना करा दिया. हम दोनों के बीच कई सालों की दूरी आ चुकी थी. अनुभूति मेरे सामने थी, पर क़दम थे कि उठ ही नहीं रहे थे. दो क़दम के फासलों की दूरी को चलकर मिटाना कितना मुश्किल होता है, इसे आज मैंने जाना. औपचारिकता का निर्वाह करने के लिए शुरू से ही मैं मशहूर रहा हूं. आख़िरकार हमारे औपचारिकताविहीन संबंधों को औपचारिकता की बैसाखी का सहारा लेना ही पड़ा.
“कैसी हो अनुभूति?” मैंने पूछा. उसकी वाचालता आज भी वैसी ही थी, बस छेड़ने भर की देरी थी, “मैं तो ठीक हूं मि. गायब! जी हां, गायब, स्कूल क्या छोड़ा, शहर ही छोड़ दिया. न कोई फोन, न कोई बातचीत, न मिलना-जुलना, न कोई खोज-ख़बर. ज़िंदा भी हो या नहीं, कुछ नहीं पता. ऐसे गायब हुए, जैसे कभी मिले ही नहीं और ये अनुभूति-अनुभूति क्या लगा रखा है. मेरा नाम भूल गए क्या, जो तुमने मुझे दिया था.”

कहानी- ... और मौन बोल पड़ा
मेरी स्थिति इतनी अजीब थी कि क्या बताऊं, सालों बाद वही अंदाज़. ख़ुशी तो बहुत हुई, पर तुरंत दिल से एक गंभीर आवाज़ आई. ‘सावधान सारथी! ये वही आवाज़ है, जिसे तूने इतने सालों तक दबाए रखा है. यह आवाज़ वो चाबी है, जिसे अपने दिल के ताले से दूर रखना, नहीं तो सारे राज़ खुल जाने का ख़तरा हो सकता है.’ इससे पहले कि मैं कुछ कहता मेरी पत्नी भूमिजा आ गई. मैंने मिलवाने के लिए कहा, “अनु, ये मेरी पत्नी भूमिजा है. एक पुराने दोस्त के साथ एक नया साथी फ्री.” अनु ने हाज़िरजवाब दिया, “हां, वैसे भी अब तुम पुराने हो चुके हो और दुनिया हमेशा उगते सूरज को ही सलाम करती है.” इस पर हम सब खिलखिलाकर हंस पड़े.
“ओह! तो आप हैं अनुभूति. इन्होंने कई बार आपके बारे में बताया है. यक़ीन मानिए, आपको देखकर कितनी ख़ुशी हो रही है, ये स़िर्फ मैं और सारथी ही जान सकते हैं.”
तब मैंने पहली बार महसूस किया कि मेरी चंचल अनु अब परिपक्व हो चुकी है, तभी तो उसने शरमाकर मुस्कुरा भर दिया, कुछ कहा नहीं, लेकिन उस मुस्कुराहट के पीछे छिपी खिलखिलाहट वाली हंसी मैंने सुन ही ली.
तभी पीछे से उसकी आंखें अपने हाथों से ढंकते हुए एक शख़्स ने लड़की की आवाज़ में कहा, “पहचान कौन?” अनु ने झट से कहा, “आवाज़ से भले ही धोखा खा जाऊं, पर तुम्हारे स्पर्श की अनुभूति मुझे धोखा नहीं दे पाएगी मि. स्पर्श खन्ना.” यह उसके पति थे, मुझे समझने में देर नहीं लगी. अनु ने स्पर्श से मेरा परिचय कराया. “तो आप हैं मि. सारथी, आपके बारे में बहुत कुछ सुना है अनुभूति से.” मुझे स्पर्श के इन शब्दों और उसके स्पर्श में एक पुरुष के चोटिल अहं का अनुभव हुआ. शायद मेरी तारीफ़ में अनु ने स्पर्श को मेरे सामने एक अनजाने प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़ा कर दिया था. कुछ कह नहीं सकता था, क्योंकि यह मेरी उनसे पहली मुलाक़ात ही तो थी.
फिर भी मैंने उन्हें छेड़कर कहा, “वाह! क्या बात है स्पर्श+अनुभूति=स्पर्शानुभूति.” स्पर्श स़िर्फ मुस्कुराए, पर अनु तो शुरू ही हो गई, “पता है स्कूल के दिनों में सार हम दोस्तों में मशहूर था. किसी का भी नाम संधि-विच्छेद करके ख़ूबसूरत करने और उसका कूड़ा करने में व उसकी टांग खींचने में भी अव्वल. मुझे इसकी ये आदत बहुत अच्छी लगती थी, तुम आज भी नहीं बदले सार.” हमारी बातों को स्पर्श और भूमिजा दोनों ही सुन रहे थे, लेकिन भूमिजा उस वार्तालाप में रस ले रही थी, जबकि स्पर्श की आंखों में मैंने कुछ उलझन महसूस की.
वह एक इंजीनियर था और मैं एक सायकियाट्रिस्ट, इसलिए कुछ देर अपने-अपने क्षेत्र के बारे में बातचीत होती रही, पर मैंने देखा वो मुझसे खुल नहीं पा रहा था. अब मुझे उसका मनोविज्ञान थोड़ा-थोड़ा समझ में आने लगा था.
कुछ दिन तक हम मिलते-जुलते रहे. हमारी दोस्ती में फिर से वही रंग भर गए, जो पहले थे. एक दिन अनु ने शिकायत की, “तुम तो जैसे मुझसे सारे रिश्ते ही तोड़कर चले गए. मैंने सोचा कि अब हम कभी नहीं मिलेंगे. बस, एक आस थी.”
मैंने कहा, “तुम्हें तो आस थी कि हम फिर मिलेंगे, पर मैं तो निश्‍चिंत था कि अब हम ज़िंदगी में दोबारा कभी नहीं मिलेंगे.” अनु की प्रश्‍नवाचक दृष्टि को पढ़ने में मुझे अधिक समय नहीं लगा. मैंने कहा, “सच तो ये है कि अब तक अप्रत्यक्ष रूप से मैं तुमसे भाग रहा था, क्योंकि एक सच जो आज मैं तुम्हें बताने की स्थिति में आ गया हूं, कल तक नहीं था. पहले तुम्हारे सवाल का जवाब- मैं छोड़कर चला गया था, तुमसे रिश्ता तोड़कर नहीं.”
अनु ने कहा, “तोड़ा या छोड़ा, बात तो एक ही है.” मैंने प्रतिवाद किया, “नहीं, तोड़ने और छोड़ने में बहुत फ़र्क़ है. टूटे रिश्ते जुड़ते नहीं और अगर जुड़ भी गए, तो उनमें गांठें पड़ जाती हैं, पर छोड़े हुए रिश्ते उस टीवी सीरियल की तरह होते हैं, जिन्हें ज़िंदगी के किसी भी पड़ाव पर हम जहां से छोड़ देते हैं, कुछ समय बाद ज़िंदगी के किसी दूसरे पड़ाव से मिलने पर उन्हें वहीं से दोबारा शुरू कर देते हैं, जहां से हमने उन्हें छोड़ा था. इसलिए तुमसे मुलाक़ात होने पर मैंने वहीं से अपने रिश्ते की शुरुआत कर दी.” अनु आज गंभीरता से मेरी आंखों को देख रही थी, मानो वो मुझे पूरी तरह पढ़ लेना चाहती हो.
“वो कौन-सा सच है, जो आज तक तुमने मुझे नहीं बताया.” अनु ने तुरंत जानना चाहा. पर आज मुझे किसी भी तरह का डर, घबराहट या किसी भी प्रकार की हिचकिचाहट महसूस नहीं हो रही थी. लग रहा था, जैसे आज मैं इन सबसे ऊपर उठ चुका हूं. स्वच्छंद और स्वतंत्र निष्कलुष हृदय का स्वामी हो चुका हूं. मैंने सहज लहज़े में इतनी बड़ी अभिव्यक्ति कर डाली, “अनु, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं.”
अनु को काटो तो ख़ून नहीं. उसे पता नहीं चला कि क्या हो गया. निस्तब्धता एवं संवेदनशून्यता की सीमा को पार कर जाने वो किस लोक में पहुंच चुकी थी, जहां उसके कान तो सुन रहे थे, परंतु संदेश अपने गंतव्य के बीच ही कहीं खोए-से लग रहे थे. उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे, क्या करे? मैंने उसकी मन:स्थिति को भांप लिया कि जिस शख़्स को वो अपना सबसे अच्छा दोस्त मानती है, वो एक आदर्श पति भी है, उसमें चारित्रिक दोष भी नहीं है, फिर ये क्या…?
मैंने आगे कहना शुरू किया, “वो भी आज से नहीं, जब तुमसे पहली बार मिला था, तब से. लेकिन कभी कहा नहीं, क्योंकि मैं प्रेम और आकर्षण के बीच की बारीक रेखा के अंतर में ही उलझा रह गया था और जब उलझन से निकला, तब तक तुम अनूप से प्यार कर बैठी थी. लेकिन मैंने प्रेम का गूढ़ स्वरूप तब तक समझ लिया था, इसलिए तुम्हें उसके साथ देखकर भी ख़ुश था. तुम्हारा वो प्रेम स्थायी नहीं था, मैंने सुना तीन महीने बाद उसने तुम्हें छोड़ दिया, लेकिन मैं तुमसे इतना दूर था कि चाहकर भी तुम्हें सांत्वना देने नहीं आ सका.”
थोड़ी देर रुककर मैंने फिर बोलना शुरू किया, “लेकिन तुम्हारी बदहवासी बता रही है कि तुमने प्रेम का मूल अर्थ आज तक जाना ही नहीं है, नहीं तो तुम इस तरह बदहवास नहीं होती, बल्कि सहज होती. तुम प्रेम के शाब्दिक अर्थ में न जाओ, बल्कि उसके मूल अर्थ अथवा भावार्थ में जाकर उसे देखो, जो उसका वास्तविक तथा शाश्‍वत अर्थ है, तो तुम्हें भी उस प्रेम का ज्ञान
हो जाएगा.” मैंने समझाना शुरू किया, “मनोविज्ञान कहता है कि प्रेम के मूल में स्वार्थ होता है, किंतु सच तो ये है कि जहां सच्चा प्रेम हो, वहां स्वार्थ का क्या काम? संसार में कामना को भी प्रेम ही कहते हैं, वह कामना उपयोगिता के कारण हो सकती है या फिर आधिपत्य के कारण भी हो सकती है.
तुम केवल उस प्रेम से परिचित हो, जो सांसारिक और सात्विक है. प्रत्यक्ष शरीर के बंधनों से बंधा है. कामी पुरुष वेश्या के प्रति अपने काम-भाव को ही प्रेम मानता है. बेटे से उसकी उपयोगिता और अपेक्षा के कारण ही पिता उससे प्रेम करता है और पति का पत्नी-प्रेम मात्र अपनी पत्नी के प्रति आधिपत्य भाव ही होता है, वस्तुतः इनमें से प्रेम कोई भी नहीं है. प्रेम स्वार्थ, अपेक्षा तथा आधिपत्य से परे है, यही प्रेम का यथार्थ स्वरूप है, बल्कि मैं तो कहता हूं कि प्रेम केवल प्रेम है, शाश्‍वत प्रेम. उसे सांसारिकता या सात्विकता का जामा पहनाना भी उचित नहीं है.
प्रेम तो कृष्ण ने किया था राधा से. उन्हें प्रेम दिया, उनसे कुछ लिया नहीं. जाते-जाते अपनी प्राणप्रिया बांसुरी भी दे दी, किसी से कुछ लिया नहीं. किसी से बिना कुछ लिये उसे केवल अपना देने की भावना ही प्रेम है, इसलिए तुम्हें ये बताकर मैंने कभी तुम्हारा प्रेम पाने की कोशिश नहीं की. बस, यही माना कि तुम जहां भी रहो, जिसके भी साथ रहो, उसको ख़ुश रखो और ख़ुद भी ख़ुश रहो. तुम्हारे प्रति मेरा यही भाव प्रेम है, शाश्‍वत प्रेम.” अनु की आंखें छलछला उठीं. प्रेम के गूढ़ स्वरूप को जानकर या शायद आत्मग्लानि से. मैं हर किसी की आंखों को पढ़ लेता था, लेकिन नमी की वजह से उसकी आंखों के अक्षर धुंधले पड़ गए थे, जिन्हें मैं पढ़ नहीं पा रहा था और कुछ देर बाद मैंने भी महसूस किया कि ओस की कुछ ठंडी बूंदें मेरी भी आंखों में कैद थीं, जिन्हें बहाते ही नज़ारा साफ़ दिखने लगा.
अनु ने ख़ुद को संभालते हुए पूछा, “क… क… क्या भूमिजा, ये सब…?” मैंने मुस्कुराकर कहा, “हमारी जब शादी हुई, तब वो स़िर्फ मेरी पत्नी थी, पर अब वो मेरी अर्धांगिनी है, इसलिए कभी छुपाने की नौबत ही नहीं आई, तभी तो उस दिन पार्टी में तुम्हें देखकर वो मुझसे भी ज़्यादा ख़ुश हुई, बल्कि उसी के कहने पर मैं तुमसे यह सब कह पा रहा हूं.”
अनु अब न हंस पा रही थी, न ही रो पा रही थी. उसे समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करे. अंततः मुझसे लिपटकर रो पड़ी, जैसे बांध से पानी छूटने पर जलधारा अपना संयम तोड़कर अपने साथ सब कुछ बहाकर ले जाती है और अंततः समुद्र में विलय होकर ही शांत होती है. मेरी भी हिम्मत अब उसे चुप कराने की नहीं हो पा रही थी कि तभी नम आंखों से भूमिजा ने कमरे में प्रवेश किया और कहा, “तुम जब नहीं थी, तब तुम्हारे नाम की जगह खाली थी, मैं वहां नहीं बैठ सकती थी, तो मैंने सार के दिल में अपने लिए एक नई जगह बना ली और मैं ये भी जानती हूं कि मेरी जगह सार कभी किसी को नहीं बैठने देंगे, चाहे मैं रहूं या न रहूं.”
अनु ने बड़ी हिम्मत जुटाकर एक प्रश्‍न और कर दिया, “इतने सालों तक कैसे छुपाकर रखा तुमने?” मैंने कहा, “अनु, समुद्र में कई सीप होते हैं, मगर मोती स़िर्फ वही सीप बना पाता है, जो बारिश की बूंदों को अपने अंदर मोती बनने तक संभाल सके…” तभी मेरी नज़र पीछे खड़े एक हाथ में अटैची और दूसरे में कोट लिए स्पर्श पर पड़ी. आश्‍चर्य से मेरी आंखें स्पर्श पर टिकी रह गईं, उसकी आंखें लाल थीं… लेकिन क्रोध से नहीं, उनमें सम्मान था, आग्रह था, संवेदना थी, पश्‍चाताप था और थे… दो आंसू, जो बहुत बोझिल थे.
माहौल में उस समय कोई हलचल नहीं थी, स़िर्फ शांति और सबका मौन. वो मौन इतना गहरा था कि आज मैं उस मौन की गूंज को साफ़-साफ़ सुन पा रहा था और हम चारों ही लगभग आज उसी भाषा के माध्यम से बातें कर रहे थे. कभी-कभी मौन भी बहुत कुछ कह जाता है. बस, उसे सुनने के लिए उस मौन भाषा के ज्ञान की आवश्यकता होती है. मैंने महसूस किया कि इस मौन में भी सबके प्रति प्रेम ही था, क्योंकि कुछ लोग कहते हैं कि रिश्तों में मौन आ जाए, तो रिश्तों को खोखला कर देता है. शायद, इसीलिए इतने सालों से मैं मौन रहा, पर सालों से शांत बैठा मेरा मौन आज बोल ही पड़ा… फिर भी वह सुखद ही था.

      कुशाग्र मिश्रा

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“मैंने बहुत कोशिश की कि मैं वहां से भाग जाऊं, पर मैं तो जैसे किसी अंधे कुएं में गिर चुकी थी. यह एक सोफिस्टीकेटेड लोगों की दुनिया थी, जहां पांच सितारा होटलों, फार्म हाउसों और आलीशान बंगलों में स्मार्ट, चार्मिंग, एज्युकेटेड लड़कियां भेजी जाती थीं, कुछ घंटों, दिन या फिर किसी बिज़नेस ट्रिप पर साथ जाने के लिए. धीरे-धीरे उन बड़े-बड़े बिज़नेसमैन, ब्यूरोक्रेट्स और एलीट वर्ग के मर्दों को अपनी उंगलियों पर नचाने में मुझे मज़ा आने लगा.”

कनाट प्लेस जाऊं और जनपथ का चक्कर न लगाऊं, ऐसा तो हो ही नहीं सकता. बेशक कई बार बिना कुछ ख़रीदे खाली हाथ ही लौट आती हूं, पर फिर भी एक कतार में करीने से बनी जनपथ की दुकानों के अंदर झांकने का मोह संवरण नहीं कर पाती. अन्नपूर्णा के पास एक गली में राजस्थान व गुजराती चीज़ों को ज़मीन पर बिछाए औरतें बैठी होती हैं. मिरर वर्क के कुशन कवर, पेंटिंग्स, कुर्ती, घाघरा, चादरें, नेकलेस, कड़े, डेकोर की चीज़ें और न जाने क्या-क्या होता है… जिसके कारण विदेशी पर्यटकों की तो वहां भीड़ जुटी ही रहती है, साथ ही एथनिक चीज़ों की क्रेज़ी हम जैसी कुछ महिलाएं भी वहां से ख़ूब ख़रीदारी करती हैं.
जनपथ में हर चीज़ मौजूद है- हर किसी की जेब और पसंद के अनुसार. मुझे एक कुर्ता चाहिए था- बांधनी का. बस, उसे ही छांट रही थी कि तभी कोई मुझे छूकर निकला. भीड़ में ऐसा होना स्वाभाविक है, पर उस छुअन में परिचय की गंध आई. मैं म़ुड़ी- पेस्टल ग्रीन कलर की शिफ़ॉन की साड़ी में स्टाइलिश ढंग से कटे बालों में एक आकर्षक काया की कसावदार पीठ मुझे दिखी. चाल तो उसी के जैसी है, पर बाल… उसके बाल तो कमर के नीचे तक जाते थे. मगर… मन को झटका. इतनी अगर-मगर और दुविधा से तो अच्छा है कि उसे सामने से देख लूं.
मैं हाथ में पकड़े कुर्ते को वापस रख तेज़ी से आगे लपकी, बिल्कुल ऐसे उसके बगल से गुज़री, ताकि वह जान-बूझकर किया गया प्रयास न लगे.
“हाय, तू यहां कैसे? कैसी है? मैं बता नहीं सकती तुझे देख कितनी ख़ुशी हो रही है?” एक साथ इतने सारे सवाल और ढेर सारा आश्‍चर्य, संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं है अब. प्रश्‍नों की ऐसी झड़ी लगाना केवल उसी की आदत थी.
“कभी सोचा न था कि इतने दिनों बाद फिर यूं अचानक मुलाक़ात हो जाएगी.” मैं अपनी ख़ुशी को संभाल नहीं पा रही थी, शायद इसीलिए उससे लिपटते हुए मेरी आंखें नम हो गई थीं.
“इतने दिनों बाद… हां, पूरे तीन साल, आठ महीने, दो दिन और शायद कुछेक घंटे बाद हम मिल रहे हैं.” केतकी के ऐसा कहते ही हम दोनों ज़ोर-ज़ोर से खिलखिलाकर हंस पड़ीं. आसपास से गुज़रते लोगों की नज़र हम पर पड़ी और बिना उनकी परवाह किए हम बहुत देर तक हंसते रहे. मुझे तो लग रहा था जैसे मैं बरसों बाद इतना खुलकर हंस रही हूं. हंसते-हंसते पेट और गालों में दर्द होने लगा था.
“बिल्कुल नहीं बदली है तू, सिवाय इसके कि तेरा शरीर थोड़ा भर गया है और मांग में सिंदूर चमक रहा है. आज भी तूने बाटिक की ही साड़ी पहनी हुई है. अब भी दीवानी है तू कॉटन और हैंडलूम साड़ियों की?” केतकी ने चुटकी ली.
“यह आदत तो अब जाने से रही. मैं अपना स्टाइल बदलनेवाली नहीं.” मैं शायद अपनी ही रौ में बहने लगी थी. कॉटन, हैंडलूम और बाटिक प्रिंट की साड़ी, सूट या कुर्ते ही मेरी कमज़ोरी थे. लेकिन मेरे ब्यूरोक्रेट पति को मेरी सादगी डाउन मार्केट लगती थी, इसलिए उनके साथ जाते समय मैं हमेशा सिल्क, जॉर्जेट या शिफ़ॉन की साड़ियां ही पहनती थी. इस पर वे कहते, “तुम्हारा जो लुक है न, एकदम टिपिकल है. कुछ भी पहन लो, सिंपल ही लगती हो. वो क्या कहते हैं न? हां, बहनजी टाइप. नॉट फ़िट फॉर मॉडर्न कल्चर.” पति चाहे लाख व्यंग्य कसें, पर मैं भी कहां माननेवाली थी, मुझे जिस तरह से सजना-संवरना पसंद था, वैसे ही रहती थी. केतकी के हाथ का स्पर्श कंधे पर महसूस हुआ तो मैं अपनी सोच से बाहर आई. “तू बता, कहां रही तू इतने दिन? तुझमें तो बहुत बदलाव आ गया है सिवाय तेरी शिफ़ॉन की साड़ियों के. बाल क्यों इतने छोटे करा लिए?” मैंने भी उसे छेड़ा. मैं उसे अक्सर कॉटन की साड़ियां और ड्रेसेस के एक्सक्लूसिव पीसेस छांटने के लिए न जाने कहां-कहां चक्कर काटने को मजबूर करती थी, वहीं केतकी एक-दो सिलेक्टिव स्टोर्स से शिफ़ॉन की साड़ियां ख़रीद मेरा समय बचाती थी.
“बदलाव तो आया है…” अचानक कुछ कहते-कहते चुप हो गई केतकी.
“अब यहीं रहकर बात करेगी कि कहीं बैठकर कुछ खिलाएगी भी?” उसने मुझे आगे की ओर घसीटते हुए कहा.
“चल वहीं बैठते हैं, अपनी फेवरेट जगह कॉफी होम में.” मैंने कहा.
“अरे यार, बड़ी बोर हो गई है वह जगह. उसी के पास एक अच्छा रेस्टॉरेंट खुला है. शानदार और फ्यूज़न लुक के साथ. चल आज मैं तुझे वहीं ट्रीट देती हूं. जेब भी फुल है.”
केतकी की बेबाक़ी, खुलापन और मस्त रहने का फलसफ़ा सब कुछ पहले जैसा ही था, पर वह क्या चीज़ थी, जो मुझे बार-बार एहसास करा रही थी कि केतकी बहुत बदल गई है. उसके चेहरे पर हमेशा छाई रहनेवाली मासूमियत नहीं है या फिर वह मासूम कशिश, जो उसे गरिमामय बनाती थी, उसके चेहरे से गायब है. कॉलेज के दिनों में अगर मैं अपनी सादगी के लिए मशहूर थी तो वह अपनी उस कशिश के कारण जो लोगों को अपनी ओर खींचती थी. ग्लैमरस न होते हुए भी वह अपने शिफ़ॉन के सूटों में बहुत ग़ज़ब की लगती थी. साड़ियां तो उसने बहुत बाद में पहनना शुरू किया था. सांवली रंगत, लंबे-काले बाल, आंखों में लगा काजल और कोल्हापुरी चप्पल- बस, यही शृंगार होता था उसका. फिर भी लड़के हों या लड़कियां उसे देख पाने की ललक से भरे रहते थे. “शी हैज़ ए चार्मिंग पर्सनैलिटी.” सबकी यही टिप्पणी होती थी.
मेरी और उसकी ख़ूब पटती थी. कॉलेज के बाद भी हमारी दोस्ती बनी रही. फिर उसे अपने पापा की मृत्यु के बाद मां और छोटे भाई के साथ अपने चाचा के घर रहने कानपुर जाना पड़ा फ़ाइनेंशियल प्रॉब्लम्स की वजह से और कानपुर में ही उनका पुश्तैनी मकान व बिज़नेस भी था. उसके भाई को पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए उसे यही सबसे अच्छा विकल्प लगा था.
उसके कानपुर जाने के बाद कुछ समय तक तो हमारा पत्र-व्यवहार चला, फ़ोन पर भी बात हो जाती थी, पर धीरे-धीरे अपनी शादी के बाद मैं अपनी घर-गृहस्थी और नौकरी में इतनी व्यस्त हो गई कि केतकी से फिर कोई बातचीत नहीं हो पाई. वैसे भी आईएएस की बीवी होने के कारण सोशल ज़िम्मेदारियां ही निभाने के लिए बहुत थीं, फिर उसकी तरफ़ से भी कोई संपर्क स्थापित नहीं हुआ.
“क्या लेगी? यहां के स्प्रिंग रोल्स और मंचूरियन कमाल के हैं.”
मैं अपनी सोच में इतनी उलझी हुई थी कि खाने पर भी मेरा ध्यान नहीं था.
“तू दिल्ली कब आई केतकी?” मंचूरियन खाते-खाते मैंने पूछा.
“ढाई साल हो गए हैं.” उसके चेहरे पर उदासी की एक मोटी परत बिछ गई थी. तो क्या यही है वह बदलाव, जो मुझे बार-बार उलझन में डाल रहा है?
“कानपुर जाकर पता चला कि चाचा हमारे हिस्से का मकान व दुकानें पहले ही पापा से प्रॉपर्टी के पेपर्स पर धोखे से साइन करवाकर अपने नाम करवा चुके थे. उनके धोखे से परेशान भाई ने पहले तो मां के गहने बेचे और फिर कुछ न कर पाने के अपराधबोध में पिसते हुए ग़लत काम करने लगा. इधर का माल उधर करते हुए वह लड़कियां भी सप्लाई करने लगा. फिर मां की बेबसी और मुझे डरा-धमकाकर मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उसने मेरी शादी करवा दी. जब यहां दिल्ली आई तो पता चला कि शादी तो मात्र ढोंग था, असल में उसने मेरी भी सप्लाई की थी.”
केतकी का चेहरा एकदम सपाट था. उसकी बातें सुन मैं सकते में आ गई थी. इतना घिनौनापन! कोई भाई ऐसे कैसे कर सकता है? ऐसे में उसकी मासूमियत नहीं खोती तो और क्या होता?
“याद है, मेरी पर्सनैलिटी चार्मिंग है, कॉलेज में इस बात को लेकर कितनी चर्चा होती थी. ‘मिस चार्मिंग’ का तो कितनी बार मुझे ख़िताब भी मिला था. लेकिन यही चार्म मेरा हार्म कर देगा, किसने सोचा था.” बेबाक़ी का एक झोंका उसके पास से निकला, पर वह फिर गंभीर हो गई.
“चल घर चलते हैं.” मैंने बिल देते हुए कहा. “पतिदेव शहर से बाहर हैं, आराम से बैठकर बातें करेंगे.”
“बहुत शानदार है तेरा फ्लैट लतिका. मॉडर्न टच देते हुए एथनिक लुक देना नहीं भूली.” अपने गुच्ची के बैग को सेंटर टेबल पर रख सोफे पर वह ऐसे लेटी, मानो बहुत थक गई हो.
“बहुत सुंदर है तेरा बैग.” अनायास ही मेरे मुंह से निकल गया. “मेरे पास भी ऐसा ही बैग है, बस, उसका कलर ब्राउन है और तेरा ब्लैक, वॉट ए को-इंसीडेंस.”
“हां, एक क्लाइंट ने ही ग़िफ़्ट दिया था. लेकिन तू कब से ऐसे स्टाइलिश बैग ख़रीदने लगी? ये न तो टिपिकल राजस्थानी है, न गुजराती और न ही एथनिक?” उसकी बात सुन मुझे हंसी आ गई.
“सुधर जा मिस चार्मिंग. मैंने इसे ख़रीदा नहीं है, पतिदेव ने ही ग़िफ़्ट दिया है.” जूस का ग्लास उसे थमाते हुए मैंने कहा. वातावरण की बोझिलता थोड़ी-सी कम होती महसूस हुई. बैग से टिशू पेपर निकाल वह मुंह पोंछ फिर से सोफे पर लेट गई.
उदासी की परत उसके चेहरे पर और घनी हो गई थी. “मैंने बहुत कोशिश की कि मैं वहां से भाग जाऊं, पर मैं तो जैसे किसी अंधे कुएं में गिर चुकी थी. यह एक सोफिस्टीकेटेड लोगों की दुनिया थी, जहां पांच सितारा होटलों, फार्म हाउसों और आलीशान बंगलों में स्मार्ट, चार्मिंग, एज्युकेटेड लड़कियां भेजी जाती थीं, कुछ घंटों, दिन या फिर किसी बिज़नेस ट्रिप पर साथ जाने के लिए. धीरे-धीरे उन बड़े-बड़े बिज़नेसमैन, ब्यूरोक्रेट्स और एलीट वर्ग के मर्दों को अपनी उंगलियों पर नचाने में मुझे मज़ा आने लगा. बेचारे एक तरफ़ तो सोसायटी में अपने को सम्मानित सिद्घ करने के लिए फैमिली को सबसे अहम् मानते हैं और पति-पत्नी इस तरह पार्टियों व सोशल सर्कल में नज़र आते हैं मानो मेड फॉर इच अदर हैं, पर लतिका ये लोग सबसे बड़े हिप्पोक्रेट हैं.” पल भर के लिए चुप हो गई केतकी. इस समय न तो मेरे पास उसे सांत्वना देने के लिए शब्द थे, न ही उसकी आंखों से छलकती नमी को पोंछने का साहस.
“जानती हो, ‘पार्टनर’ के नाम पर इन्हें कोई ऐसी शह चाहिए होती है, जो इनकी ईगो को हवा देती रहे और मैं अब वही करती हूं. पचास हज़ार, एक लाख, कुछ भी मांग लो, बिना किसी परेशानी के ये लोग दे देते हैं. अच्छा, चलती हूं. शाम की फ्लाइट से बैंगलौर जाना है. एक नामी ब्यूरोक्रेट है, वहां कॉन्फ्रेंस अटेंड करने गया है.”
केतकी ने टेबल पर रखे अपने बैग को उठाया तो उसमें से बहुत सारे विज़िटिंग कार्ड्स निकलकर नीचे ज़मीन पर बिखर गए. शायद टिशू पेपर निकालते समय बैग खुला रह गया था.
“इतने सारे कार्ड्स किसके हैं?” मैं कार्ड उठाने में उसकी मदद करने लगी.
“अरे, उन्हीं सोफिस्टीकेटेड क्लाइंट्स के.” पलभर को केतकी की आंखों में शरारत तैरी. अपनी पुरानीवाली केतकी के उस रूप को देखकर मेरे होंठों पर हंसी आने ही लगी थी, पर… ब्राउन कलर के बहुत ही आर्टिस्टिक ढंग से डिज़ाइन किए हुए कार्ड पर गोल्डन कलर से उभरे नाम को देख जड़ हो गई. इटालिक्स में शेखर शर्मा नाम चमक रहा था. यह कार्ड मैंने ही डिज़ाइन किया था शेखर के लिए. मेरा डिज़ाइन उसे बहुत पसंद आया था, इसीलिए एक साथ हज़ार कार्ड छपवा लिए थे. “तुम जैसी बहनजी टाइप की औरत का टेस्ट इतना अच्छा हो सकता है, यक़ीन ही नहीं होता.” शेखर तब भी उसे ताना देने से चूका नहीं था.
मेरे हाथ से कार्ड लेते हुए केतकी बोली, “अरे, आज बैंगलौर इसी के पास तो जा रही हूं. बहुत स्मार्ट और इंटेलीजेंट है. जब भी कॉन्फ्रेंस या ट्रिप्स पर जाता है, मैं ही तो इसकी ‘पार्टनर’ बनती हूं. बाई द वे, वह गुच्ची का बैग इसी ने तो मुझे ग़िफ़्ट दिया था. चल बाय, फिर मिलते हैं.”
केतकी जा चुकी थी और अपनी सादगी को समेटती मैं न जाने कितनी देर तक शून्य में ताकती खड़ी रही.
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Suman-Bajpai

     सुमन बाजपेयी

 

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हिंदी कहानी- यथार्थ (Hindi Short Story- Yatharth)

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क्या लड़का है! कितने अधिकार से अपनी पसंद बताकर लौट गया. सीटी तो ऐसे बजा रहा है, जैसे उसका अपना घर हो और क्या कहकर बोला था- यार… यह वह मुझसे बोला था या पराग से? क्या भाषा हो गई है आजकल के लड़कों की? लगता है, घर में कोई रोकने-टोकनेवाला ही नहीं है.

कहानी समाप्त हुई, तो नीरा का मन दुख, नैराश्य, आक्रोश जैसे मिले-जुले भावों से भर उठा. यह जानते हुए भी कि यह मात्र एक कहानी है, मन तर्क-वितर्क पर उतर आया था. उम्र के इतने अंतराल पर भी कोई कैसे एक-दूसरे की ओर इतना आकर्षित हो सकता है और ऐसी छिछोरी हरकतें कर सकता है. ऐसे ही उदाहरणों से तो समाज विघटित होता है. लड़की तो चलो अल्हड़ और नादान थी, पर उस अनुभवी, प्रौ़ढ़, सद्गृहस्थ को तो सोचना चाहिए था कि ऐसे संबंधों का हश्र पारिवारिक विघटन के अतिरिक्त कुछ नहीं होता.
विचारों की दौड़ थी कि बेलगाम घोड़े की भांति सरपट भागी जा रही थी. नीरा को ही उस पर लगाम कसनी पड़ी. पराग अपने किसी दोस्त के साथ स्टडी रूम में ज़रूरी प्रोजेक्ट तैयार कर रहा था. उनके लिए कुछ बनाने के उद्देश्य से नीरा रसोई की ओर बढ़ गई. मिनटों में ही भेलपूरी तैयार कर वह बच्चों के सम्मुख उपस्थित थी. पराग की उंगलियां कीबोर्ड पर व्यस्त थीं, लेकिन उसके दोस्त साहिल ने तुरंत अपनी प्लेट उठा ली और खाना भी शुरू कर दिया. नीरा पराग की प्लेट रखने के लिए जगह बनाने लगी, तभी साहिल की प्रतिक्रिया ने उसे उत्साह से भर दिया, “वाह, क्या भेलपूरी बनाई है! मज़ा आ गया.”
“और ले लेना, बहुत सारी बनाई है.”
“श्योर, थैंक्स!”
नीरा दूसरे कामों में व्यस्त हो गई. बाहर से कपड़े लाकर तहकर रख रही थी कि पीछे से साहिल की पुकार सुन चौंक उठी, “पानी चाहिए था.”
“अं… हां, अभी देती हूं.”
साहिल पानी पीने लगा, तो नीरा गौर से उसे निहारने लगी. सोलह-सत्रह की वय को छूता बच्चा. नहीं, बच्चा नहीं… हल्की-हल्की उभर रही दाढ़ी-मूंछों और पिंपल्स भरे चेहरे के संग उसे बच्चा तो कतई नहीं कहा जा सकता था. चेहरे की मासूमीयत कहीं खो-सी गई थी और उसका स्थान परिपक्वता ने ले लिया था. आवाज़ भारी और गंभीर थी. शरीर
भरा-भरा…
“छी! यह मैं क्या देखने लगी? ये सारे परिवर्तन तो पराग में भी हो रहे हैं, फिर भी वह तो मुझे बच्चा ही नज़र आता है.”
“और पानी चाहिए बेटा?” अपने विचारों को झटकते हुए नीरा ने पूछा. नीरा ने ग़ौर किया, पानी पीते हुए साहिल की नज़रें उसी पर टिकी हुई थीं. वह घबराकर अपना दुपट्टा संभालने लगी.
“एक ग्लास और, बहुत प्यास लगी है.” साहिल अब भी एकटक उसे ही घूर रहा था.
“हां, लो न.” उसका ग्लास फटाफट भरकर नीरा तह किए हुए कपड़े रखने कमरे में घुस गई. उसके माथे पर पसीने की बूंदें झलक आईं. पसीना पोंछकर उसने चुपके से बाहर झांका. साहिल को स्टडी रूम की ओर लौटते देख उसने राहत की सांस ली.
कुछ देर पूर्व पढ़ी कहानी दृश्य के रूप में रूपांतरित होकर उसकी आंखों के सामने डूबने-उतराने लगी. घबराकर उसने आंखें मूंद लीं और कुछ देर के लिए बिस्तर पर लेट गई, लेकिन बेक़ाबू दिल की धड़कनें उसे बेचैन किए जा रही थीं. नीरा उठ खड़ी हुई और रसोई में जाकर खाना बनाने लगी. पीछे सरसराहट
हुई, तो वह बेतरह चौंककर पीछे की ओर मुड़ी.
“क्या हुआ ममा, इतना घबरा क्यों रही हो? मैं ही हूं.” पराग को देखकर नीरा की जान में जान आई.
“क्या बना रही हो? साहिल भी खाना यहीं खाएगा.”
“क्यों?” नीरा के चेहरे पर फिर से परेशानी के भाव उभर आए थे.
“कुछ दिक़्क़त हो, तो रहने दो.”
“नहीं, खाने की कोई परेशानी नहीं है. मेरा मतलब था, वो घर नहीं जाएगा?”
“जाएगा. प्रोजेक्ट पूरा हो जाए, फिर जाएगा. दरअसल यह हम दोनों का ज्वाइंट प्रोजेक्ट है और सोमवार तक जमा करना है, इसलिए हम दोनों सोच रहे थे कि आज ही पूरा कर लें, ताकि कल उसे फिर से न आना पड़े.”
“हां, यह भी ठीक है. अच्छा, राजमा-चावल बना रही हूं. तुम्हारे उस दोस्त को चलेगा? या और भी कुछ बनाऊं?”
“एक मिनट, पूछकर बताता हूं.” पराग लौट गया. नीरा असमंजस की स्थिति में चावल का डिब्बा हाथ में लिए खड़ी रह गई, तभी छलांग लगाता साहिल ख़ुद आ टपका. “ग्रेट यार! आपको कैसे पता चला कि राजमा-चावल मेरा फेवरेट है? बस, मेरा तो इसी से हो जाएगा. मेरे लिए और कुछ मत बनाना.” वह ख़ुशी से सीटी बजाता लौट गया, तो नीरा हैरानी से उसे ताकती रह गई.
क्या लड़का है! कितने अधिकार से अपनी पसंद बताकर लौट गया. सीटी तो ऐसे बजा रहा है, जैसे उसका अपना घर हो और क्या कहकर बोला था- यार… यह वह मुझसे बोला था या पराग से? क्या भाषा हो गई है आजकल के लड़कों की? लगता है, घर में कोई रोकने-टोकनेवाला ही नहीं है. जाने दो आज इसे, फिर पराग की ख़बर लेती हूं. जाने कैसे-कैसे दोस्त बना रखे हैं? पर पराग बेचारे का भी क्या दोष? सर ने जिसके संग काम करने को दिया है, उसके संग ही करना पड़ेगा न? दोष तो सारा अभिभावकों का है, जो शुरू से ही बच्चे को नियंत्रण में नहीं रखते. फिर बड़े होकर वे आवारा सांड की तरह इधर-उधर मुंह मारते-फिरते हैं और पिता से भी ज़्यादा दोष मैं मां को दूंगी, क्योंकि पिता यदि बच्चे का भौतिक संबल है, तो मां आत्मिक संबल. कद्दावर से कद्दावर शरीर भी तब तक उठकर खड़ा नहीं हो सकता, जब तक कि उसमें अंदर से उठने की प्रेरणा न जागे और यह प्रेरणा जगाती है मां. नीरा का मां के आत्ममंथन का पुराण जाने कब तक जारी रहता, यदि बीच में ही कुकर की सीटी न बजी होती. नीरा कुकर खोलकर राजमा मथने लगी.
“हूं… क्या ख़ुशबू है? पराग यार, कंप्यूटर बंद कर, जल्दी से आ जा. अब और सब्र नहीं हो रहा.” ख़ुुशबू सूंघता साहिल डायनिंग टेबल पर आकर जम गया था. मनपसंद चीज़ बनने पर अक्सर पराग भी ऐसा ही करता था. उसकी ऐसी हरकतों पर नीरा की ममता उमड़ पड़ती थी, लेकिन साहिल की ऐसी हरकत पर प्यार दर्शाने की बजाय वह मन ही मन खीझ उठी थी. ‘कैसा बेशर्म लड़का है. ज़रा भी सब्र नहीं है. जैसे पहली बार राजमा-चावल देख रहा हो.’
तब तक पराग रसोई में आकर खाना ले जा चुका था. “आप भी साथ ही आ जाइए न ममा. फिर अकेले खाना पड़ेगा.” पराग ने इसरार किया, तो नीरा की ममता उमड़ पड़ी. “कोई बात नहीं बेटा, तुम लोग आराम से गपशप करते हुए खाओ. मैं बाद में खाऊंगी.”
“तेरे पापा लंच पर नहीं आते क्या?” पहला चम्मच मुंह में ठूंसने के साथ ही साहिल ने प्रश्‍न उछाल दिया. इसके साथ ही कौर उसके गले में अटक गया और वह बुरी तरह खांसने लगा. तुरंत पानी का ग्लास भरकर उसे पकड़ाते हुए नीरा ग़ुस्से से बोल ही पड़ी, “मुंह में कौर हो, तो बोलना नहीं चाहिए, इतना भी नहीं सिखाया मां ने तुम्हें?”
साहिल ने तुरंत पानी का ग्लास होंठों से लगा लिया और एक ही सांस में खाली भी कर दिया. ग्लास रखने तक आंखों से आंसू निकलकर गालों तक आ गए थे. नीरा सब कुछ भूल दुपट्टे से उसके आंसू पोंछने लगी. “देखो, खांस-खांसकर कितना पानी आ गया है आंखों में? अब तुरंत यह एक चम्मच शक्कर फांक लो.” कहते हुए नीरा ने ज़बरदस्ती उसके मुंह में एक चम्मच शक्कर डाल दी. पराग हतप्रभ-सा कभी ममा को, तो कभी अपने दोस्त को ताक रहा था.
“अब वो ठीक है ममा.”
“हंह… हां.” नीरा भी स्वयं को संयत करती हुई कमरे की ओर बढ़ गई. मैं भी कुछ ़ज़्यादा ही ओवररिएक्ट कर जाती हूं. एक मिनट पहले इसी लड़के पर इतना ग़ुस्सा कर रही थी और दूसरे ही पल ज़रा-सी खांसी आ जाने पर उसी के लिए इतना फ़िक्रमंद हो गई.
नीरा कान लगाकर सुनने का प्रयास करती रही, पर डायनिंग टेबल से फिर किसी उत्साही सीटी का स्वर सुनाई नहीं पड़ा. बस, पराग की ही दबी-सी आवाज़ सुनाई देती रही. शायद बता रहा था कि पापा तो सवेरे ही खाने का डिब्बा लेकर निकल जाते हैं और देर रात घर लौटते हैं. स्कूल से लौटने के बाद उसका सारा समय मां के संग ही गुज़रता है. वे साथ खाना खाते हैं, साथ टीवी देखते हैं, शाम को बगीचे में साथ बैडमिंटन खेलते हैं. यहां तक कि जब वह होमवर्क और पढ़ाई कर रहा होता है, तब भी ममा पास ही बैठी कोई पुस्तक पढ़ रही होती हैं या बुनाई कर रही होती हैं.
“बड़ा लकी है यार तू! तेरे परीक्षा में इतने अच्छे नंबर कैसे आते हैं, अब समझ में आया.” वार्तालाप इसके बाद शायद थम-सा गया था, क्योंकि नीरा को स़िर्फ प्लेट-चम्मच की ही आवाज़ें आती रहीं. दोनों को ही शायद जल्दी खाना ख़त्म कर प्रोजेक्ट पूरा करने की चिंता लग गई थी. उनके स्टडी रूम में चले जाने के बाद नीरा ने उठकर खाना खाया और रसोई समेटकर लेट गई. कुछ ही पलों में वह नींद के आगोश में थी. आंख खुली, तो घड़ी देखकर चौंक उठी. ओह! चार बज गए. पराग को दूध देेने का समय हो गया. देखूं, उसका वह दोस्त गया या अभी यहीं जमा है. नीरा ने चुपके से स्टडी रूम में झांका, तो पाया कंप्यूटर बंद हो गया था यानी काम समाप्त हो गया था. पराग सब पेपर्स समेट रहा था और साहिल दीवार पर लगे उसके और विपुल के फोटो को बड़े ग़ौर से देख रहा था.
“यार पराग, तेरे मम्मी-पापा की लव मैरिज है या अरेंज्ड?”
“तुझे क्या लगता है?” पराग ने मज़ाक के मूड में पूछा.
“यार, तेरी मम्मी जितनी सुंदर और यंग लगती हैं न, लगता है तेरे पापा ने उनसे लव मैरिज ही की होगी.”
साहिल के जवाब से ख़ुुश होने की बजाय न जाने क्यों नीरा चिढ़-सी गई. “नहीं, अरेंज्ड मैरिज है हमारी. कोई प्रॉब्लम?” तीर की तरह नीरा एकदम सामने आई, तो दोनों दोस्त भौंचक्के-से रह गए.
“म… मैं निकलता हूं.” साहिल ने जल्दी से अपने पेपर्स उठाए और बाहर निकल गया. पराग उसे रोकता ही रह गया. नीरा फिर से अपने कमरे में जाकर लेट गई. उसका सिर यह सोचकर भारी होने लगा था कि अभी पराग अंदर आएगा और उस पर ग़ुस्सा होगा कि उसने उसके दोस्त का अपमान क्यों किया? पराग आया.
लेकिन यह क्या? नीरा हैरान रह गई, वह ग़ुस्सा होने की बजाय शर्मिंदगी महसूस कर रहा था. “आपको साहिल पसंद नहीं आया न ममा…? दरअसल, ग़लती उसकी भी नहीं है. शुरू से ही हॉस्टल में रहा है. उसे पता ही नहीं घर पर कैसे रहना चाहिए. उसके मम्मी-पापा की लव मैरिज थी. साहिल के पैदा होने के कुछ वर्ष बाद ही उनमें तलाक़ हो गया. दोनों दूसरी शादी करना चाहते थे, इसलिए कोई उसका संरक्षण लेने को भी तैयार न था. उसके पापा को जबरन उसे रखना पड़ा, तो उन्होंने उसे हॉस्टल में डाल दिया. वह तो छुट्टियों में भी घर जाने से कतराता है. अभी भी प्रोजेक्ट के बहाने रुक गया था, तो मैं उसे घर ले आया. अब आगे से…”
“आगे से जब भी छुट्टी हो, उसे तुरंत घर ले आना. मुझसे पूछने की भी ज़रूरत नहीं है. दरअसल… मुझसे ही उसे समझने में भूल हो गई.” नीरा ने कहा, तो पराग ख़ुशी से मां से लिपट गया.
नीरा सोच रही थी कि हर कहानी को हूबहूू यथार्थ के सांचे में फिट करने का प्रयास करना नादानी है. हां, कहानी से सबक लेकर यथार्थ को सुंदर बनाने का प्रयास करना बुद्धिमानी है. एक कहानी की सार्थकता भी वस्तुतः इसी में है.
anil mathur
       अनिल माथुर

 

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