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कहानी- नई दिशा (Short Story- Nai Disha)

“आज यदि मैं इस मुक़ाम तक पहुंच पाई हूं, तो उसके पीछे एक बहुत बड़ा योगदान मेरी उस सहेली का है, जिससे मेरा दर्द, मेरी मायूसी, मेरे जीवन की निराशा बर्दाश्त नहीं हुई और एक सच्चे मित्र की तरह उसने मुझे नई दिशा दिखाई… ”

Kahaniya

इस गणतंत्र दिवस पर सुमति को राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित किया जा रहा था. उसके द्वारा पोलियो निवारण के लिए किए गए कार्यों के लिए उसे समाजसेवा के क्षेत्र में अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका था. लेकिन आज उसे देश के सबसे बड़े पदाधिकारी द्वारा इस महान दिवस पर सम्मानित किया जा रहा था. मेरी ख़ुशी का तो जैसे ठिकाना ही न था. इतने बरस बीत गए, पर अब भी लगता है जैसे कल की ही बात है.

उस समय मैं कक्षा ग्यारहवीं में पढ़ती थी. पापा के ट्रांसफर के कारण अजमेर ज़िले के एक छोटे से कस्बे केकड़ी के नए स्कूल में पहला दिन था मेरा. बहुत छोटा-सा कस्बा था यह. स्कूल के नाम पर सरकारी स्कूल ही थे और किसी प्रकार के कोई प्राइवेट स्कूल नहीं थे. यूं तो मेरी रुचि साइंस में थी, लेकिन इस कस्बे में सभी लड़कियां आर्ट के ही विषय पढ़ती थीं. कॉमर्स और साइंस पर जैसे लड़कों का एकाधिकार था. मेरा स्कूल में नया-नया दाख़िला हुआ था, इसलिए मेरी कम ही सहेलियां थीं, लेकिन एक अच्छी सहेली थी- सुमति. अपने नाम की ही तरह अनमोल गुणों का ख़ज़ाना थी वह. ऐसा कोई काम नहीं था, जो उसे नहीं आता था. पढ़ाई, संगीत, गायन, कढ़ाई-बुनाई, गृहकार्य इत्यादि में अव्वल थी वो. उसके बनाए चित्र तो जैसे जीवंत हो उठते थे. वो न स़िर्फ मेरी सहेली थी, बल्कि एक प्रेरणास्रोत भी थी.

ईश्‍वर ने उसे सर्वगुण संपन्न तो बनाया था, पर उन सबके साथ उसके एक पैर को पोलियो का शिकार भी बना दिया था. हमारी दोस्ती में यह कोई अड़चन नहीं थी, लेकिन लोगों के ताने जब-तब उसे मायूस कर देते थे. वह हमेशा सोचती कि वह पोलियो की शिकार हुई, इसमें उसका क्या दोष? लेकिन उन दिनों यह माना जाता था कि पिछले जन्म के दुष्कर्मों के कारण इस जन्म में पोलियो होता है. यही कारण था कि उसके अपने रिश्तेदारों के मुंह से जब-तब खरी-खोटी निकल जाती थी और उसे मायूस कर देती थी.

वह जितनी अच्छी थी, उतनी ही भावुक भी थी. लोगों के ताने उसे अंदर तक झकझोर कर रख देते थे और वह मायूसी के अथाह सागर में डूब जाती. मैं अपनी सहेली को यूं दुखी देखकर भी कुछ नहीं कर सकती थी. मैंने कई बार उसे समझाने की कोशिश की, “लोग तो कहते रहेंगे, दूसरों की बातों को दिल से नहीं लगाना चाहिए. जब तक तुम स्वयं को विकलांग न समझो, तुम विकलांग नहीं हो. तुम जितने गुणों से भरपूर हो, उतने गुण तुम्हारे अच्छे कर्मों का ही नतीजा हैं. पोलियो तुम्हें कमज़ोर नहीं बना सकता.” लेकिन मेरी बातों का उस पर कुछ असर नहीं होता. वो चुपचाप स्वयं को दोष देती रहती कि उसके पोलियोग्रस्त होने के कारण उसे और उसके माता-पिता को दूसरों की बातें सुननी पड़ती हैं.

यूं तो हर माता-पिता संतान का हित ही चाहते हैं, लेकिन यदि समाज भारतीय हो, तो एक विकलांग बेटी के माता-पिता को कितनी चिंताएं सताती होंगी, सुमति अच्छी तरह से जानती थी. उसकी मां को हर समय उसकी शादी की चिंता रहती थी. डर वाजिब भी था. कौन करेगा शादी एक विकलांग लड़की से! उनकी रूपवान व गुणवान लड़की की शादी किसी विकलांग, नेत्रहीन और विधुर से ही होनी थी, जो उन्हें अंदर ही अंदर कचोटता रहता था. उन्हें उसे पढ़ाना भी तो एक बोझ के समान लगता था, क्योंकि यदि वह ज़्यादा पढ़-लिख गई, तो शायद उसके माता-पिता के लिए उसके लायक लड़का ढ़ूंढ़ना बेहद मुश्किल हो जाएगा. माता-पिता की यह बेचैनी और ये आशंकाएं सुमति से छिपे नहीं थे, इसीलिए उम्र से कहीं ज़्यादा समझदार और दूरदर्शी बन गई थी वो. चाहकर भी हमउम्र लड़कियों की तरह सहेलियों के साथ बैठकर गप्पे लड़ाना, इधर-उधर की फ़िज़ूल की बातें करना उसके स्वभाव में नहीं था. वह अपनी सोच का साथी अपने चित्रों को ही बनाती और उसी में ख़ुश रहती. कक्षा में नई होने के कारण मैंने भी इस एकाकी, शांत और समझदार लड़की को अपनी सहेली बनाना मुनासिब समझा और कम बातें होते हुए भी हम दोनों के बीच अपनेपन का रिश्ता बहुत गहरा हो गया था. इसी वजह से जब भी उसे उदास पाती, तो मैं भी गुमसुम हो जाती.

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एक दिन पापा ने भांप लिया और मुझसे जानना चाहा कि आख़िर क्या कारण है मेरे यूं बार-बार उदास होने का. जब मैंने उन्हें सुमति के बारे में बताया, तो उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया और वादा किया कि वो ऐसा कोई उपाय ज़रूर ढूंढ़ निकालेंगे, जिससे सुमति की मायूसी दूर हो सके.

इस बीच हमारा सत्र बीत गया. एक बार फिर सुमति ने कक्षा में टॉप किया था. मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा, पर यह ख़ुशी भी कुछ पलों के लिए ही थी. जैसे ही वो रिपोर्ट कार्ड लेकर बाहर निकली, वाणिज्य संकाय के कुछ छात्रों ने उसकी विकलांगता पर ताने कसने शुरू कर दिए. उसके चेहरे से मुस्कान यूं गायब हुई मानो मुस्कुराना कभी भी उसका हक़ नहीं था. मेरे लिए यह असह्य था. मैंने उन लड़कों को ख़ूब खरी-खोटी सुनाई, पर उनकी सेहत पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. जब तक सुमति और मैं घर तक नहीं पहुंचे, वो लड़के सायकिल पर हमारा पीछा करते रहे और तरह-तरह के ताने कसते रहे. मुझे लगा कि मैंने सुमति व अपनी परेशानी और बढ़ा दी है. आख़िर कर भी क्या सकते थे हम दोनों उन बदतमीज़ व बदमिज़ाज लड़कों का, जिन्हें उनके अपने परिवार और उससे भी बढ़कर इस सामाजिक व्यवस्था ने निरंकुश और नपुंसक बना दिया था.

मैंने घर पर आकर सारा क़िस्सा पापा को बताया. उन्हें उनके वायदे की याद दिलाई. कुछ ही दिनों बाद पापा ने देहरादून घूमने का प्लान बनाया. उन्होंने कहा कि मैं सुमति और उसके माता-पिता को भी देहरादून चलने के लिए कहूं. यूं भी सुमति को अकेले मेरे साथ भेजने के लिए उसके माता-पिता तैयार नहीं होते, इसलिए वो हमारे साथ चलने को तैयार हो गए, पर बहुत सारी मिन्नतों के बाद. लेकिन मैं ख़ुश थी, आख़िर मेरी इच्छा जो पूरी होने जा रही थी.

पापा के मित्र देहरादून के कलेक्टर थे. उन्होंने ही हमारे वहां ठहरने का इंतज़ाम किया था और वहां की कुछ संस्थाओं में हमारे भ्रमण की भी व्यवस्था करवाई थी. सबसे पहले हम एन.आई.वी.एच. (नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ विज़ुअली हैंडीकैप्ड) गए, जहां पर अनेक जन्मांध लोग अलग-अलग क्षेत्रों में शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं. आंखों में अंधेरे के बावजूद वहां हरेक की ज़िंदगी में उम्मीद का उजाला था. काले घने अंधेरे के बावजूद अपने लिए एक नई राह तलाशना उन्हें आता था. उनकी कठिनाइयां सुमति से कहीं बड़ी थीं, पर मायूसी की चादर ओढ़कर बैठने की बजाय वो अपनी कठिनाइयों का मुक़ाबला करने के लिए हर पल मुस्कुराते हुए तैयार रहते थे. हर चेहरे पर ज़िंदगी को मुस्कुराकर जीने का जज़्बा खिलखिलाता था.

उसके बाद हम राफेल संस्थान गए, जहां पर मंदबुद्धि बच्चों को पढ़ाया जाता था. इनमें कई वयस्क भी थे, जो बाल्यकाल से ही इस संस्था में प्रशिक्षण प्राप्त कर आत्मनिर्भर बनने में क़ामयाब हुए थे. इस संस्था में लाइब्रेरियन के तौर पर काम करनेवाली महिला एक दिन इसमें पढ़नेवाली मानसिक रूप से अक्षम बच्ची थी, जिसे उसके माता-पिता ने छोड़ दिया था. उन भोले-मासूम बच्चों में सीखने की इतनी ललक और जिज्ञासा थी कि कोई भी अपने बचपन की मधुर स्मृतियों में खो जाए.

बाद में हम विकलांग बच्चों की ऐसी संस्था में गए, जहां पोलियो या किसी हादसे के कारण विकलांग हुए कई बच्चे एक साथ रहते थे और किसी कौशल में प्रशिक्षण प्राप्त करते थे. वहां जो हमने देखा, उसे देखकर हमारी आंखें भीगे बिना नहीं रह सकीं. एक कमरे में संजू नाम का एक लड़का पेंटिंग बना रहा था. उसके दोनों हाथ और पैर एक सड़क हादसे में कट गए थे, लेकिन मुंह में पेंसिल रखकर भी वो बहुत ख़ूूबसूरत पेंटिंग बना रहा था. वहां खड़ी एक टीचर ने बताया कि संजू को बचपन से ही पेंटिंग का बहुत शौक़ था, इसलिए जब इसके हाथ-पैर दोनों कट गए, तब भी इसने अपने शौक़ को नहीं छोड़ा और मुंह में पेंसिल रखकर भी वो ऐसी पेंटिंग बनाता है कि लोग दांतों तले उंगली दबाने को विवश हो जाएं. आज संजू की देशभर में कई पेंटिंग एक्ज़ीबिशन लग चुकी हैं.

सुमति और उसके माता-पिता इन बच्चों की ऐसी जीजिविषा देखकर अचम्भित थे. उन्हें भी यह प्रेरणा मिली कि अपनी बेटी को एक बोझ मानने की बजाय उसकी क्षमताओं और सामर्थ्य को बढ़ाने की ओर ध्यान देना चाहिए. उस एक दिन ने सुमति और उसके परिवार की सोच पूरी तरह बदल दी. पापा ने अपना वादा भली-भांति निभाया था, उन्होंने मेरी सहेली की निराशा को जिस तरह आशा में बदल दिया, वह सोचकर ही मेरा मन आह्लादित हो उठता है.

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अब यदि कोई सुमति को उसकी विकलांगता की याद दिलाता, तो वह उन जन्मांध, मंदबुद्धि, विकलांग बच्चों, विशेषकर संजू के जीवन के सकारात्मक पहलुओं को याद कर और आत्मविश्‍वासी हो जाती. ज़िंदगी जीने का उसका हौसला और बढ़ जाता. उसने ठान लिया कि वह अपना सारा जीवन असहाय माने जानेवाले विकलांग बच्चों को सशक्त बनाने में लगाएगी. अब सुमति के माता-पिता भी इस कोशिश में उसके साथ थे. आज जब उसे उसके प्रयासों के लिए सम्मानित किया जा रहा है, तो मेरी ख़ुशी की कोई सीमा नहीं है.

समारोह में दिए भाषण में उसने कहा, “आज यदि मैं इस मुक़ाम तक पहुंच पाई हूं, तो उसके पीछे एक बहुत बड़ा योगदान मेरी उस सहेली का है, जिससे मेरा दर्द, मेरी मायूसी, मेरे जीवन की निराशा बर्दाश्त नहीं हुई और एक सच्चे मित्र की तरह उसने मुझे नई दिशा दिखाई… उस दिन से मैंने ठान लिया कि मैं भी हरसंभव कोशिश करूंगी कि मेरे जैसे हताश, मायूस विकलांग लोगों को मज़बूत और समर्थ बनाने का बीड़ा उठा सकूं. मेरी सहेली ने एक सुमति को नई दिशा दिखाई, ताकि मैं कई सुमतियों के जीवन की बैसाखी को फिर से चलायमान कर सकूं…”

मैं उसे बोलते देख भावविभोर थी. आज मेरी मित्रता गर्व की किसी भी सीमा को नहीं पहचानती थी. मैं जानती हूं कि उसकी इस सफलता के पीछे अकेले मेरा योगदान नहीं था, बल्कि मैंने जो किया स्वयं के लिए किया. आख़िर उसे दुखी देखकर मैं ख़ुश कैसे रह सकती थी. फिर जीवन के लिए एक नई सोच, नया रास्ता, तो स्वयं सुमति ने तलाशा और अकेले अपने दम पर तय किया था.

Nidhi Choudhary

     निधि चौधरी

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Kids Story: अमरूद किसका? (Amrood Kiska?)

Kids Stories

Kids Story: अमरूद किसका? (Amrood Kiska?)

कुछ बच्चे पार्क में खेल रहे थे. उनमें से दो दोस्त भी थे. खेलते-खेलते उन्हें दूर एक अमरूद का पेड़ नज़र आया. दोनों उस पेड़ के पास गए, तो देखा एक अमरूद लगा हुआ है. दोनों ने सोचा क्यों न इसको तोड़कर खाया जाए. पर दोनों के मन में एक सवाल था कि ये अमरूद कौन खाएगा. ख़ैर दोनों ने मिलकर अमरूद तोड़ लिया.

अब उनमें झगड़ा होने लगा, एक ने कहा कि मैंने यह पेड़ पहले देखा, तो यह अमरूद मेरा, दूसरे का कहना था कि इस अमरूद को मैंने पहले देखा, तो यह मेरा.

Kahani

दोनों का झगड़ा इतना बढ़ गया कि बाकी के बच्चे भी वहां आ गए. सबने पूछा कि क्यों लड़ रहे हो, तो उन्होंने बताया. उन बच्चों में से एक लड़के ने कह कि मैं तुम्हारे झगड़े का निपटारा कर सकता हूं. यह अमरूद मुझे दिखाओ.

 

उन दोनों ने उसे अमरूद दे दिया. वो लड़के मज़े से अमरूद खाने लगा और देखते ही देखते पूरा अमरूद खा गया. बाद में बोला, वाह अमरूद सच में बहुत ही मीठा था और हंसते हुए वहां से चला गया.

Bacho Ki Kahaniya

दोनों दोस्त देखते रह गए और फिर सोचने लगे कि काश, झगड़ा करने की बजाय यह अमरूद दोनों ने आधा-आधा बांट लिया होता, तो आज कोई और इसे नहीं हथिया सकता था.

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि कभी भी छोटी-छोटी बात पर आपस में झगड़ा नहीं करना चाहिए, वरना दूसरे इसका फ़ायदा उठा लेते हैं. जो भी हो आपस में मिल-बांटकर ही फैसला करना चाहिए.

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कहानी- गोल्डन जुबली (Short Story- Golden Jubilee)

“हम सभी अभिभावक बच्चों की बात से सहमत थे. सच तो यह है कि हम सभी चाहते हैं कि हमारे परिवार के बुज़ुर्ग सदस्य ख़ुश रहें, व्यस्त रहें, पर कैसे? इसका समाधान खोजने के लिए न समय जुटा पा रहे थे और न ही आपसी संवाद कायम कर पा रहे थे. बच्चों ने इस दिशा में एक प्रेरक क़दम उठाना चाहा, तो सैकड़ों क़दम उनके साथ जुड़कर क़दमताल करने लगे. हमारे मना करने के बावजूद बच्चों ने अपनी पूरी पॉकेटमनी इस फंड में डाल दी. उसके अलावा हर परिवार से इतनी सहयोग राशि मिली है कि हम और दो-तीन बेंच और शेड पार्क में लगवा सकते हैं. लेकिन आज के शुभ दिन को ध्यान में रखते हुए जल्दी-जल्दी में दो बेंच और शेड ही लगवा पाए हैं. हम चाह रहे थे कि उनका भी अब उद्घाटन कर दिया जाए.”

Hindi Kahani

टीना जब से मम्मी-पापा के पास रहने आई है, उन्हें एक ही टॉपिक पर बातों में मशगूल पा रही है और वह है उसके नाना-नानी यानी मिस्टर एंड मिसेज़ खन्ना की गोल्डन जुबली मैरिज एनीवर्सरी.

“कोई मुझे बताएगा ये सेलीब्रेशन है कब?”

“अगले साल नवंबर में.” मम्मी ने बताया तो टीना की हैरानी और भी बढ़ गई.

“उसके लिए अभी से तैयारियां?”

“तो और क्या? करनेवाला है कौन? कोई भाई-बहन तो हैं नहीं मेरे. जो करना है सब मुझे और तेरे पापा को ही करना है. तो प्लानिंग भी हमें ही करनी पड़ेगी ना? किन-किन को बुलाना है, कहां ठहराना है, क्या बनवाना है, क्या रिटर्न गिफ्ट देना है…?”

“ओके! ओके! समझ गई.” कहने के साथ ही टीना कुछ सोचने में मगन हो गई थी. पिछले दो सालों से वह नाना-नानी के पास रहकर पढ़ रही है. पापा का वकालत का पेशा है और मम्मी का मेडिसिन का. दोनों का ही आए दिन तबादला होता रहता है, लेकिन इस रेलमपेल में सबसे ज़्यादा नुक़सान हो रहा था टीना की पढ़ाई का. तब नाना-नानी ने उसे अपने पास छोड़ देने की पेशकश की थी, जिसे काफ़ी सोच-विचार के पश्‍चात् दोनों ने स्वीकार कर लिया था और इस तरह ननिहाल के सबसे प्रतिष्ठित कॉन्वेंट स्कूल में टीना का दाख़िला करवा दिया गया था. जहां टीना के मम्मी-पापा यानी सीमा और अमित टीना के भविष्य को लेकर निश्‍चिंत हो गए थे, वहीं टीना के नाना-नानी को तो मानो जीने का सहारा मिल गया था. दोनों ब्लडप्रेशर और डायबिटीज़ के मरीज़ थे, पर किशोरावस्था की सीढ़ियां चढ़ती टीना के खानपान और स्वास्थ्य के साथ कोई समझौता उन्हें मंज़ूर न था. उसके लिए घर में खीर भी बनती और आलू का परांठा भी. टीना भी इतना लाड़-दुलार और साज-संभाल पाकर बेहद ख़ुश थी.

मम्मी-पापा तो चाहकर भी अपनी व्यस्त दिनचर्या में से उसके लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाते थे. अपने इस अपराधबोध की भरपाई वे तरह-तरह के उपहारों से करते थे. जब भी आते टीना को नए-नए कपड़ों, खिलौनों और चॉकलेट्स से लाद जाते. टीना के तो दोनों हाथों में लड्डू थे और कोई बच्चा होता, तो इतना लाड़-दुलार पाकर निश्‍चित रूप से सिर चढ़ गया होता, लेकिन यह नाना-नानी के दिए संस्कार थे, जिन्होंने टीना को हमेशा मर्यादित आचरण में बांधे रखा. उसे पता था कि प्यार देकर ही प्यार पाया जा सकता है और कि वह कितनी ही शिक्षा अर्जित कर ले, कितने ही ऊंचे पद पर पहुंच जाए, लेकिन सम्मान उसे तभी मिलेगा, जब अनुभव के आगे उसका सिर झुकेगा. किशोरावस्था से गुज़र रही उस बालिका को घर के सदस्य भले ही बच्ची समझते हों, पर वह अपने आपको घर की एक ज़िम्मेदार और समझदार सदस्या मानती थी. और इसलिए यह ख़ूबसूरत पारिवारिक उत्सव उसे कुछ विशिष्ट, पर महत्वपूर्ण करने के लिए उकसा रहा था. मम्मी-पापा की बातचीत वह अब और भी गौर से सुनने लगी थी.

“मेरे ख़्याल से हमें उनके बेडरूम में एक बड़ा-सा एलईडी लगवा देना चाहिए. दोनों का ही काफ़ी समय टीवी देखते हुए गुज़रता है, विशेषकर पापाजी का. मम्मीजी तो फिर भी घर के कामों में लगी रहती हैं.” पापा के सुझाव से टीना मन ही मन सहमत थी.

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“एक फुली ऑटोमैटिक वॉशिंग मशीन भी लगवा देते हैं. अब कुछ भी कहो सेमी में थोड़ी मेहनत तो होती ही है. मम्मी में अब कहां इतना दम है? जितना कर लेती हैं, वही काफ़ी है.” टीना को मम्मी का सुझाव भी पसंद आया. हालांकि कोई उसकी राय नहीं पूछ रहा था.

…पर उसे भी तो नाना-नानी को कुछ देना चाहिए. आख़िर वे उसका इतना ख़्याल रखते हैं. नाना जब-तब होमवर्क और प्रोजेक्ट में उसका हाथ बंटाते रहते हैं. और नानी तो बेचारी पूरा दिन ही उसके पीछे लगी रहती है. सुबह टिफिन से लेकर यूनिफॉर्म, च्यवनप्राश, रात का दूध तक.

मजाल है, जो एक भी चीज़ छूट जाए या ज़रा भी वक़्त से आगे-पीछे हो जाए. सोचते हुए टीना ने अपना पिग्गी बैंक फोड़ डाला और रुपए गिनने लगी. इतने रुपयों में वह नाना-नानी के लिए क्या गिफ्ट ला सकती है? मम्मी-पापा के महंगे-महंगे तोहफ़ों के सामने उसका गिफ्ट तो वैसे भी कहीं नहीं टिकेगा. टीना रुआंसी हो उठी थी.

“अरे, टीना बेटी, यह पिग्गी बैंक क्यों फोड़ा? और ये रुपए क्यों फैला रखे हैं?” पापा अचानक कब कमरे में आ खड़े हुए थे, टीना को ख़्याल ही नहीं आया. मम्मी अस्पताल जा चुकी थीं.

“मैं भी नाना-नानी को गिफ्ट देना चाहती हूं, इसलिए…”

“अरे, तो मुझसे बोल देती. बोलो, कितने पैसे चाहिए तुम्हें? क्या लेना है?”

“वो तो मैंने अभी तक सोचा ही नहीं.” टीना का भोला-सा प्रत्युत्तर सुन पापा को बरबस ही उस पर प्यार उमड़ आया.

“तो पहले सोच लो. फिर मुझे बता देना. मैं ला दूंगा. अब दरवाज़ा बंद कर लो और अपनी पढ़ाई करो.”

पापा तो निश्‍चिंत हो चले गए थे, पर टीना आश्‍वस्त नहीं हो सकी थी. यदि पापा ही ला देंगे, तो फिर उसकी तरफ़ से क्या गिफ्ट हुआ? लेकिन गिफ्ट का मतलब स़िर्फ पैसों से ख़रीदी वस्तु ही तो नहीं होती. ख़ुद नाना ने और उसकी टीचर ने समझाया था कि यदि आप किसी को प्रसन्न करनेवाला कोई काम करो, तो वह भी उसके लिए गिफ्ट ही होता है, तो फिर मैं क्या करूं?

टीना का मन अब सोते-जागते इसी सवाल में उलझा रहता. यहां तक कि उसकी छुट्टियां समाप्त हो गईं और नाना-नानी के पास लौटने के दिन भी आ गए. पापा उसे छोड़ने चल रहे थे. रास्ते में उन्होंने टीना से पूछा, “अच्छा तो फिर तुमने क्या उपहार निश्‍चित किया बेटा?”

“मैं सोचकर बता दूंगी पापा.” टीना उन्हें नहीं बताना चाहती थी कि उसने अपना इरादा बदल दिया है. वह अब जो भी करेगी, अपने बलबूते पर करेगी.

नानी ने सबकी पसंद का खाना दाल-बाटी और चूरमा बनाया था. सब खाने पर टूट पड़े थे.

“मैं और सीमा आपके हाथ का खाना बहुत मिस करते हैं. कभी छुट्टीवाले दिन सीमा का कुछ ख़ास बनाने का मूड बन भी जाता है, तो कहती है अभी मां से फोन पर रेसिपी पूछती हूं. पर इतने में कोई पेशेंट आ जाता है या इमर्ज़ेंसी कॉल आ जाती है और सब धरा ही रह जाता है.”

“मैंने ख़ूब सारा साथ ले जाने के लिए पैक कर दिया है. आराम से खाना.” नानी ने हंसते हुए कहा, तो सभी हंस पड़े.

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“सीमा को आपसे पूछ लेने का आसरा तो है. मुझे तो बेचारी टीना और उसके होनेवाले बच्चों की फ़िक्र है. उनका कभी ऐसा कुछ बनाने-खाने का मन किया, तो वे किससे पूछेंगे? आपकी पाक कला तो मम्मीजी आप ही तक सीमित रह गई.”

“अरे, तू फ़िक़्र मत कर. मेरी टीना बहुत होशियार है. मैं उसे सब सिखाकर मरूंगी.”

पूरे खाने के दौरान ऐसे ही हंसी-मज़ाक चलता रहा, पर टीना अलग ही सोच में डूबी रही. वह आजकल हर बात में से कोई न कोई सूत्र खोजने लगी थी.

अब तो नानी कुछ भी बनाती, पहला चम्मच खाते ही टीना के सवाल-जवाब आरंभ हो जाते. यह कैसे बनाया नानी आपने? कौन-सी चीज़ कितनी-कितनी डाली?

“अरे, मैंने तो उस दिन मज़ाक में तेरे पापा से कह दिया था कि तुझे सब कुछ सिखा दूंगी. तू तो सीरियस हो गई. पहले अपनी पढ़ाई ख़त्म कर ले. फिर सब सीख लेना.”

नाना गौर कर रहे थे कि आजकल टीना नीचे बच्चों के साथ भी ज़्यादा वक़्त बिताने लगी है. कभी किसी के घर में घुसी रहती है, तो कभी किसी के. पूछने पर टीना कभी क्राफ्ट का बहाना बना देती, कभी कुछ इनडोर गेम्स खेलने का.

आख़िर वह चिर-प्रतीक्षित दिन भी आ ही गया. घर में दूर-पास के रिश्तेदारों का जमावड़ा होने लगा था. टीना के मम्मी-पापा तो सप्ताह भर पहले से ही आए गए थे और ज़ोर शोर से तैयारियों में जुटे हुए थे. घरभर में शादी जैसी चहल-पहल और रौनक़ हो गई थी. सीमा और अमित ने मम्मी-पापा के पुराने दोस्तों और सहेलियों को भी आमंत्रित कर लिया था. खाने-पीने और बातों में ही पूरा वक़्त कैसे गुज़र रहा था, मुख्य मेज़बान मिस्टर एंड मिसेज़ खन्ना तो क्या, किसी को पता नहीं लग रहा था.

शाम को दोनों को दूल्हा-दुल्हन की तरह सजाकर नीचे ले जाया गया, जहां शानदार स्टेज और सुसज्जित पंडाल उनका इंतज़ार कर रहा था. एक के बाद एक अतिथि स्टेज पर चढ़ते जा रहे थे और मिस्टर एंड मिसेज खन्ना के सफल व सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हुए नीचे उतरते जा रहे थे. अंत में टीना अपने सोसायटी के दोस्तों के साथ मंच पर चढ़ी. सबकी उत्सुक निगाहें उस पर टिक गईं. उसके हाथ में एक गुलाबी रंग का गिफ्ट पैक था.

“यह क्या है टीना?” नाना ने उत्सुकता से पूछा.

“खोलकर देख लीजिए.”

नाना ने धीरे-धीरे गुलाबी पन्नी हटाई. सभी की उत्सुक नज़रें उन्हीं पर टिकी थीं. उनके हाथ में एक सुंदर-सी जिल्द में बंधी पांडुलिपि चमक उठी, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था, ‘नानी की रसोई.’

टीना ने आगे बढ़कर पुस्तक नानी के हाथ में थमा दी. “आपको आपकी पुस्तक के विमोचन की बहुत-बहुत बधाई नानी. आप द्वारा बनाए जानेवाले सारे परंपरागत व्यंजन इसमें लिपिबद्ध हो चुके हैं और यह देखिए बतौर लेखिका आपकी फोटो और नाम- मिसेज़ सरला खन्ना.”

नानी के कंपकंपाते हाथों में पुस्तक हिलने लगी थी. आंखों से अनवरत बहते आंसुओं के बीच भी अपनी तस्वीर और नाम देख लेने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई. वे और नाना उत्सुकता से पुस्तक के पन्ने उलट-पुलट रहे थे. वाक़ई सब कुछ तो था उसमें- नानी के हाथ की कढ़ी, चूरमा, लड्डू, रबड़ी, ढोकला, लापसी आदि वो भी चित्रों के साथ.

“ये सब तूने कब किया बन्नो?” नानी जब बहुत ख़ुश होती थीं, तो लाड़ में टीना को इसी नाम से पुकारती थीं.

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“आप जब-जब मेरे लिए कुछ ख़ास बनातीं, तब मैं मोबाइल से उसकी तस्वीर उतार लेती और फिर आपसे पूछ-पूछकर रेसिपी भी लिख लेती. फिर हम सब दोस्तों ने अपनी क्राफ्ट टीचर की मदद से यह ख़ूबसूरत जिल्द कवर तैयार किया.”

“इस बहुमूल्य पांडुलिपी को पुस्तक रूप में प्रकाशित करवाने की ज़िम्मेदारी अब मेरी. और आप सभी को इसकी एक-एक प्रति सस्नेह भेंट की जाएगी.” अमित ने बेटी टीना को गले लगाते हुए मंच से यह घोषणा की, तो पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. सीमा ने भी भावुक होकर बेटी को सीने से लगा लिया, तो सामने के फ्लैट में रहनेवाली मिसेज़ कपूर आगे बढ़ आईं.

“अरे सीमाजी, आप तो इतने में ही भावुक हो गईं? अपनी बेटी के दूसरे बड़े कारनामे सुनेंगी, तो ख़ुशी से पागल ही हो उठेंगी.”

“वाक़ई टीना और उसके सब दोस्तों ने मिलकर बहुत ही सराहनीय क़दम उठाया है. सभी के घरों के बुज़ुर्ग शाम को एक जगह एकत्रित होकर मिल सकें, बतिया सकें, इसके लिए सभी ने अपनी पॉकेटमनी एकत्रित कर पार्क में दो बेंच और शेड लगवाया है.”

मि. कपूर ने मंच पर चढ़कर यह उद्घोषणा की, तो एक बार फिर करतल ध्वनि से माहौल गूंज उठा. सभी बुज़ुर्गों ने अपने-अपने नाती-पोतों को सीने से लगा लिया.

“मैं नाना-नानी को अक्सर बोर होते देखती थी. नानी तो फिर भी घर-गृहस्थी के कामों में लगी रहती थीं, पर नाना तो शाम को सात बजते ही टीवी खोलकर बैठ जाते और फिर देर रात तक चैनल उलटते-पलटते रहते. जिस दिन शाम बारिश हो जाती थी और उनकी सैर स्थगित हो जाती थीं उस दिन यह बोरियत और भी बढ़ जाती थी. मुझे लगा यदि पार्क में शेड और बेंच हो, तो सभी बुज़ुर्ग शाम की सैर के बाद दो घंटे आराम से वहां बैठकर गपशप कर सकते हैं. इससे उनका मन बहल जाएगा. अपने हमउम्र संगी-साथियों का साथ किसे नहीं लुभाता? मैंने पहले अपने दोस्तों से सलाह-मशविरा किया. फिर हम एक-एक के घर जाकर सब अभिभावकों से मिले…”

“एक मिनट टीना बेटी, अब मुझे बोलने दो.” सोसायटी के सचिव गुप्ता ने मोर्चा संभाल लिया.

“हम सभी अभिभावक बच्चों की बात से सहमत थे. सच तो यह है कि हम सभी चाहते हैं कि हमारे परिवार के बुज़ुर्ग सदस्य ख़ुश रहें, व्यस्त रहें, पर कैसे? इसका

समाधान खोजने के लिए न समय जुटा पा रहे थे और न ही आपसी संवाद कायम कर पा रहे थे. बच्चों ने इस दिशा में एक प्रेरक क़दम उठाना चाहा, तो सैकड़ों क़दम उनके साथ जुड़कर क़दमताल करने लगे. हमारे मना करने के बावजूद बच्चों ने अपनी पूरी पॉकेटमनी इस फंड में डाल दी. उसके अलावा हर परिवार से इतनी सहयोग राशि मिली है कि हम और दो-तीन बेंच और शेड पार्क में लगवा सकते हैं. लेकिन आज के शुभ दिन को ध्यान में रखते हुए जल्दी-जल्दी में दो बेंच और शेड ही लगवा पाए हैं. हम चाह रहे थे कि उनका भी अब उद्घाटन कर दिया जाए.”

“ज़रूर-ज़रूर! और यह शुभ कार्य हम सभी बुज़ुर्गजन अपने-अपने नाती-पोतों के साथ मिलकर संपन्न करना चाहेंगे.” नाना-नानी सहित सोसायटी के सभी बुज़ुर्गजन, बच्चे और उनके पीछे-पीछे उपस्थित जन समुदाय पार्क के उस हिस्से की ओर उत्साह से बढ़ गए.

मिस्टर एंड मिसेज़ खन्ना ने सोचा भी न था कि उनकी स्वर्णजयंती न केवल उनके, बल्कि सोसायटी के हर परिवार की ज़िंदगी में ख़ुशियों के इतने स्वर्णिम पल लेकर आएगी.

– अर्णिम माथुर

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कहानी- सच्चे मोती (Short Story- Sachche Moti)

 

सुमिता जानती थी कि अमित उन मर्दों में से है, जो पत्नी की गैरमौजूदगी में अपना और घर का ख़याल बख़ूबी रख सके. सो आख़िरकार हार मानकर उसी ने घर लौटने का निश्‍चय किया और वो अमित को बिना कोई पूर्व सूचना दिए वापस लौट आई. घर आकर सुमिता हैरान रह गई.

Kahani

शाम हो चली थी, घर के काम-धाम निपटाकर, रात के खाने की तैयारी करके सुमिता हाथ-मुंह धोने चली गई. इस व़क़्त तैयार होकर घर के आगे चहलक़दमी करना और अपने पति अमित की ऑफ़िस से आने की राह देखना, यही उसका रूटीन था. इसी समय अक्सर उसे सामने के घर में रहनेवाली पारुल मिल जाती थी. दोनों गपशप करतीं और अपने पतियों की राह तकतीं.

आज सुमिता का ध्यान पारुल के कपड़ों पर विशेष रूप से गया. वो तो कह रही थी कि उसे हल्के शेडवाले सूट ही पसंद आते हैं, तो फिर ये चटक ऑरेंज सूट. “क्या बताऊं सुमिता, पतिदेव ने फ़ोन पर निर्देश दिया है कि आज यही सूट पहनूं. मुझे क्या पहनना है, कैसे तैयार होना है, इन बातों का बड़ा ध्यान रहता है इन्हें.” कहते हुए पारुल की आंखों में सहज ही तैर आई शर्म की लाली जैसे कह रही थी, बहुत प्यार जो करते हैं मुझसे.

पारुल की यह बात सुमिता के दिल में कुछ हलचल-सी मचा गई. दो साल हो गए थे उसकी शादी को. उसका पति अमित बेहद अच्छा इंसान था. उसके और घर के प्रति अपनी तमाम ज़िम्मेदारियां बख़ूबी निभाता. लेकिन उनके बीच कहीं कुछ कमी-सी महसूस होती थी उसे. वो क्या थी, ये तो वह ख़ुद भी नहीं समझ पाई थी.

कई बार ऐसा हुआ जब ख़ास मौक़ों पर सुमिता सजती-संवरती और परिचितों से कॉम्प्लीमेंट पाती. मगर एक स्त्री को तो असली संतुष्टि तभी मिलती है, जब उसका पति उसकी सुंदरता की तारीफ़ करे. पर ऐसा कभी नहीं हुआ. अमित सुमिता को नज़रभर देखते, मुस्कुराते और सामान्य बने रहते. क्या हो जाता अगर इतना ही कह देते कि अच्छी लग रही हो, वो सोचती, लेकिन मन मसोसकर रह जाती.

अमित के साथ रहते हुए सुमिता इतना तो जान ही गई थी कि अमित एक अनरोमांटिक, उदासीन प्रकृति के व्यक्ति हैं, जो उससे प्रेम तो करते हैं, मगर उस प्रेम का प्रदर्शन उनके बस की बात नहीं. सुमिता के हसीन रोमांटिक कल्पनाओं के पंख टूटकर यथार्थ के धरातल पर बिखर चुके थे और उसने इस स्थिति से समझौता भी कर लिया था. लेकिन जब कभी वह अपनी सहेलियों के साथ बैठ उन्हें उनके पतियों द्वारा मिलनेवाले सरप्राइज़ ग़िफ़्ट, फूलों के गुलदस्ते और रोमांटिक बातों के क़िस्से सुनती, तो उसके दिल में एक टीस उभर आती.

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आज सुमिता को उसकी एक पुरानी सहेली रीमा का फ़ोन आया था. एक छोटे-से गेट-टुगेदर का न्यौता देने के लिए. न्यौता पाकर वो असमंजस में पड़ गई, “शाम को कैसे आऊं? अमित उसी समय ऑफ़िस से आते हैं, फिर उनकी चाय-डिनर…”

“कभी अपने पतिदेव को भी कुछ करने का मौक़ा दिया कर. क्या एक दिन वो ख़ुद मैनेज नहीं कर सकते?”

“वो तो ठीक है, मगर…”

“अगर-मगर कुछ नहीं. तेरे जैसी औरतों ने ही पतियों के दिमाग़ ख़राब किए हुए हैं, तभी वे हम बीवियों की वैल्यू नहीं समझते. ख़ुद ऑफ़िस से कितना भी लेट आएं, मगर बीवी ज़रा-सी इधर-उधर हुई नहीं कि त्यौरियां चढ़ जाती हैं. पतियों को कभी-कभी उनके कामों के साथ अकेला छोड़ देना चाहिए, तभी उन्हें हम बीवियों की क़द्र समझ में आएगी.”

“ओ़फ़्फ़ो… लेक्चर मत दे. अच्छा आऊंगी…” रीमा का अंतिम वाक्य सुमिता को जंच गया, उसने हामी भर ली और अमित को सूचित करने के लिए फ़ोन मिलाया.

“आज शाम को रीमा ने एक गेट-टुगेदर में बुलाया है, सोचती हूं चली जाऊं.”

“हां… हां… बिल्कुल, तुम चली जाना, जब आना हो मुझे फ़ोन कर देना, मैं तुम्हें पिकअप कर लूंगा.” अमित की सहर्ष स्वीकृति पा सुमिता को कुछ निराशा हुई, उसने सोचा था अमित ना-नुकर करेंगे और वो अपनी बात पर अड़ जाएगी. आख़िर

लड़कर जीती गई चीज़ का तो मज़ा ही कुछ और होता है, चाहे वो एक मामूली-सी स्वीकृति ही क्यों न हो. ख़ैर, वो बेमन से तैयार होकर चली गई.

गेट-टुगेदर में अपनी सभी पुरानी सहेलियों से मिलकर उसे बहुत अच्छा लगा. कितनों से तो वो सालों बाद मिल रही थी. गपशप हो रही थी, हंसी-ठट्ठे चल रहे थे. एक रीमा ही है, जो सभी पुरानी सहेलियों को किसी न किसी बहाने इकट्ठा कर लेती है. काश! मैं भी ऐसा गेट-टुगेदर कर पाती. मगर अमित को ये सब ज़रा भी पसंद नहीं. सुमिता सोच रही थी, तभी उसे ध्यान आया कि वहां उपस्थित नीलू का जन्मदिन अभी पिछले ह़़फ़्ते ही था. “बिलेटिड हैप्पी बर्थडे नीलू, कहो कैसी रही सालगिरह?” सुमिता ने बधाई देते हुए पूछा.

“बहुत अच्छी. इन्होंने रात को बारह बजते ही पहले एक रोज़ बुके दिया, फिर केक कटवाया. मुझसे चोरी-छुपे लाए थे. फ्रिज में ही कहीं छुपाया था और मुझे पता भी ना चला.” नीलू चहकते हुए बता रही थी, “फिर सुबह एक सुंदर-सी साड़ी ग़िफ़्ट की और हम दोनों सारा दिन घूमे-फिरे.”

नीलू अति उत्साहित थी, मगर उसका उत्साह सुमिता के मन में ईर्ष्या उत्पन्न कर रहा था. मेरे जन्मदिन पर तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. बस, अमित ने सुबह मुबारक़बाद दी. फिर दोनों मंदिर गए और फिर वो रोज़ की तरह ऑफ़िस और मैं घर में व्यस्त हो गई. तुलना करने पर सुमिता का दिल बुझ गया.

10 बजने को आए थे, चार घंटे हो गए थे सुमिता को घर से आए, मगर अमित का एक बार भी फ़ोन नहीं आया. वो बार-बार अपना मोबाइल चेक कर रही थी. डिनर का समय निकला जा रहा था. क्या अमित को अभी भी मेरी याद नहीं आई? सबके फ़ोन आ रहे हैं सिवाय मेरे. ज़्यादा देरी होती देख उसने ख़ुद ही अमित को आने के लिए कह दिया. वो 15 मिनट में ही उसे लेने आ पहुंचा और दोनों घर की ओर चल दिए.

“कैसी रही तुम्हारी पार्टी?” अमित ने औपचारिक लहज़े में पूछा.

“अच्छी रही… घर कब आए? तुमने फ़ोन भी नहीं किया.”

“मैं तुम्हारी सहेलियों के बीच तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था.”

“तुम्हें भूख लग रही होगी?”

“नहीं… मैंने ब्रेड-बटर खा लिया था.” अमित का नॉर्मल व्यवहार सुमिता को अखर रहा था. न ही उसके लौटने में देरी होने पर झल्लाहट, न ही डिनर न मिलने पर ग़ुस्सा… मेरी कमी ज़रा भी नहीं अखरी… सुमिता ख़ुद को उपेक्षित महसूस कर रही थी.

धीरे-धीरे अमित की उदासीनता सुमिता के लिए असहनीय होती जा रही थी. उसे अपने दांपत्य जीवन में शांत झील का ठहराव नहीं, बल्कि समुंदर की तेज़ तूफ़ानी लहरों का उफान चाहिए था. प्यार नहीं तो तक़रार ही सही… कुछ तो खट्टा-मीठा स्वाद हो जीवन का… देखती हूं कब तक ऐसे ही बने रहते हैं. मन में कुछ निश्‍चय कर सुमिता शांत झील में कंकड़ फेंक हलचल उत्पन्न करने की कोशिशें करने लगी.

“आज खाना बनाने का मूड नहीं है.”

“कोई बात नहीं, बाहर से मंगा लेंगे.”

“आज मैं ज़ल्दी सो जाऊंगी, तुम दूध ख़ुद गर्म करके पी लेना.”

“अच्छा.”

“शाम को मैं अपनी एक सहेली के यहां जाऊंगी, तुम बाहर से ही डिनर करके

घर आना.”

“ठीक है.”

सुमिता अपनी भरसक कोशिशों पर संक्षिप्त-सा उत्तर पा सिमटकर रह जाती. आज उसने दाल में जान-बूझकर तेज़ नमक डाल दिया था, मगर अमित चुपचाप खाता जा रहा था. उसे यूं चुपचाप खाता देख सुमिता से रहा नहीं गया, “दाल में नमक कुछ ज़्यादा नहीं है?”

“कोई बात नहीं, हो जाता है कभी-कभी, तुमने जान-बूझकर तो नहीं डाला न.”

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सुमिता स्वयं को रोक न सकी, “इंसान है या पत्थर…” बुदबुदाती हुई वो भीतर चली गई और उसकी रुलाई फूट पड़ी. अमित उसे ऐसे देख घबरा गया.

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं, मम्मी-पापा की बहुत याद आ रही है, मुझे उनसे मिलने जाना है.”

“ठीक है, कब जाना चाहती हो?”

“जितनी जल्दी हो सके, कल ही…”

“मैं कल की टिकट देखता हूं और वापसी की भी.”

“वापसी की टिकट मैं वहीं से करा लूंगी. तुम बस जाने की करा दो.”

अमित के लिए सुमिता का ये विचित्र व्यवहार एक पहेली था. शायद मम्मी-पापा की बहुत याद आ रही है, ऐसा अनुमान लगा उसने कुछ पूछताछ करना उचित नहीं समझा और उसकी इस बात से सुमिता और अधिक चिढ़ गई. एक बार भी नहीं पूछा कि क्या हुआ? क्यों जा रही हो? बस, मुझे समझ आ गया कि मैं कहीं आऊं या जाऊं, जीऊं या मरूं, इन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. तो ठीक है, मैं भी भला क्यों परवाह करूं? तब तक वापस नहीं आऊंगी, जब तक ख़ुद आकर सौ-सौ मिन्नतें नहीं करेंगे. रीमा सच ही कह रही थी. आगे-पीछे घूम-घूमकर, जी-हुज़ूरी कर मैंने ही इनकी आदत बिगाड़ दी है. मेरे पीछे अकेले रहकर दो दिन में ही मेरी अहमियत पता चल जाएगी… और मन में अनकहा गुबार समेटे वो मायके चली गई.

तीन सप्ताह बीत गए थे सुमिता को मायके आए. धीरे-धीरे उसे अपने घर-आंगन की याद सताने लगी, साथ ही मन ही मन एक ग्लानि भी घर करने लगी थी. अपने पति को और अपने घर को अनदेखा करने की ग्लानि… क्या खा-पहन रहे होंगे? कैसे रह रहे होंगे? फ़ोन करते हैं, हालचाल पूछते हैं, मगर कभी भूलकर भी यह नहीं कहते कि कब आ रही हो? तुम्हारे बिना घर सूना हो गया है, जल्दी वापस आ जाओ. क्या इतना कहने भर से पुरुष की नाक नीची हो जाती है? क्या उसका अहं स्त्री के सामने छोटा हो जाता है.

सुमिता जानती थी कि अमित उन मर्दों में से है, जो पत्नी की गैरमौजूदगी में अपना और घर का ख़याल बख़ूबी रख सके. सो आख़िरकार हार मानकर उसी ने घर लौटने का निश्‍चय किया और वो अमित को बिना कोई पूर्व सूचना दिए वापस लौट आई. घर आकर सुमिता हैरान रह गई.

अमित बेहद कमज़ोर और बीमार दिखाई दे रहा था. उसे वायरल इंफेक्शन ने जकड़ा हुआ था. अमित की ये हालत सुमिता से देखी नहीं गई. उसका दिल भर आया और वो रो पड़ी, “क्या हाल बना लिया है आपने? एक बार बता नहीं सकते थे कि इतनी तबीयत ख़राब है? क्या मैं लौट नहीं आती?”

“मुझे मालूम है कि बताता तो तुम भागी चली आती, इसीलिए तो नहीं बताया था…”

“मगर क्यों?”

“इतने महीनों बाद तुम कुछ दिनों के लिए अपने मायके मम्मी-पापा के पास ख़ुशी-ख़ुशी रहने गई थी. अपना हाल बताकर मैं तुम्हारी ख़ुशियों में खलल नहीं डालना चाहता था. आख़िर तुम उनकी बेटी हो, उनका भी तो हक़ बनता है तुम पर…”

“अच्छा, अब ज़्यादा बातें मत करो. क्या हालत कर दी है तुम्हारी इस बुखार ने?” अमित को यूं बेहाल देख पत्थर बनी सुमिता मोम की तरह पिघल उठी.

“हालत ख़राब बुखार ने नहीं, बल्कि तुम्हारी जुदाई ने की है सुमि. अब तुम आ गई हो, तो मैं जल्द ही अच्छा हो जाऊंगा.” कहते हुए अमित ने सुमिता को बांहों में भर लिया. उसकी नम हुई आंखों से छलक आए दो आंसुओं को सुमिता ने अपनी हथेली में थाम लिया. कुछ और कहने-सुनने की लालसा शेष न रह गई थी मन में. सारी इच्छाएं, सारी अपेक्षाएं न जाने कहां हवा हो गई थीं. उसकी मुट्ठी में बंधे ये दो सच्चे मोती ही अमित के प्रेम की सर्वोच्च प्रस्तुति थे, जो उसके सात जन्मों के लिए काफ़ी थे.

Deepti Mittal

दीप्ति मित्तल

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कहानी- फॉल्स पैराडाइज़ (Short Story- False Paradise)

“वैभव, तुम इतने बड़े ओहदे पर हो, इस तरह का हंसी-मज़ाक क्या तुम्हें सूट करता है? डीसेंट रहना चाहिए तुम्हें. क्या बच्चों की तरह संडे को कैरमबोर्ड खेलने बैठ जाते हो. खेलना ही है, तो चेस खेलो या फिर ताश.”

“यह घर है पायल. यहां अगर खुलकर नहीं रहूंगा, तो अपनेपन की फीलिंग कैसे आएगी? मैं तो कहता हूं कि तुम भी हमारे साथ खेला करो. कान में ईयरफोन लगाकर म्यूज़िक सुनने से कहीं ज़्यादा रिलैक्सेशन मिलता है अपनों के साथ छोटी-छोटी ख़ुशियां बांटने में.”

Kahani

हर ओर गहमा-गहमी थी… उस गहमा-गहमी का असर पड़ोस तक भी पहुंच गया था. शोर इतना ज़्यादा था कि दो बार बोलने पर ही, वह भी चिल्लाकर, बात कानों तक पहुंचती थी, लेकिन ये आवाज़ें, यह कोलाहल, हर तरफ़ फैला यह अस्त-व्यस्त माहौल खल नहीं रहा था. सब आनंदमग्न थे. घर पर आनेवालों की संख्या भी लगातार बढ़ती ही जा रही थी.

शांतिदेवी तो चक्करघिन्नी-सी हर ओर घूम रही थीं. हर एक चीज़ कितने चाव से ख़रीदकर लाई हैं. आख़िर उनके इकलौते बेटे का ब्याह जो है आज. उसका घर बस जाए, बस यही तो उनकी चाहत थी. इसीलिए जब वैभव ने मां से कहा कि वह पायल से शादी करना चाहता है, तो बेटे के निर्णय पर आपत्ति जताए बगैर तुरंत उन्होंने सहमति दे दी थी. उनके पति को हालांकि थोड़ी आपत्ति थी कि पायल कुछ ज़्यादा ही हाई-फाई क़िस्म की लगती है, पर तब शांतिदेवी ने यह कहकर उन्हें तैयार कर लिया था कि उसे हमारे घर आना है, अपने रंग-ढंग में उसे ढाल लेंगे. प्यार मिलेगा, तो वह ख़ुद ही हमारे तौर-तरी़के अपना लेगी.

वैभव को भी पूरा यक़ीन था कि उसकी मां, जो किसी को भी अपना बनाने की क्षमता रखती  हैं, उनके लिए पायल को सहज मन से अपना लेना कठिन नहीं होगा. “वैसे भी सास-बहू के बीच झगड़ा न हो, तो घर में रौनक़ नहीं रहती,” वह अक्सर हंसकर मां को कहता. शांतिदेवी ख़ुद एक प्रोफेसर थीं और वैभव के पिता एक बड़ी कंपनी के डायरेक्टर. बड़ी बहन का विवाह हो चुका था, जो स्वयं डॉक्टर थी और वैभव तो मल्टीनेशनल कंपनी में इंजीनियर था. एक तरह से वैभव की फैमिली को न्युक्लीयर फैमिली कहा जा सकता था, पर कोठी के ऊपर के एक-एक फ्लोर पर उसके बड़े व छोटे चाचा रहते थे और दो कोठी छोड़ उसकी बुआ रहती थीं. आपसी जुड़ाव इतना था कि संयुक्त परिवार ही लगता था वह, इसीलिए तो उत्सवों पर उनके घरों में मेला-सा लग जाता था.

इतनी एजुकेटेड फैमिली की बहू बनना किसी भी लड़की का सपना हो सकता है और पायल तो चाहती ही थी ऐसा ही परिवार, क्योंकि वह ख़ुद एक बड़ी कंपनी में सीईओ थी. कार, मोटा वेतन और समाज में रिस्पेक्ट… सब कुछ था उसके पास.

“वैभव, मुझे तुम्हारी फैमिली बहुत अच्छी लगती है, एकदम मॉडर्न विचार हैं तुम्हारे मम्मी-पापा के. मुझे नहीं लगता कि उनके साथ एडजस्ट करने में कोई प्रॉब्लम आएगी. तुम तो जानते ही हो कि मुझे दख़लअंदाज़ी पसंद नहीं है.” अक्सर पायल वैभव से कहती, तो वह हंस पड़ता. “डोंट वरी पायल, जब तुम मेरे साथ-साथ मेरे मम्मी-पापा को अपना लोगी, तो दिक़्क़त नहीं आएगी.”

शादी के दौरान वैभव और पायल की ख़ुशी देखते ही बनती थी. पायल अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी और पिता का चूंकि बहुत बड़ा बिज़नेस था, तो पैसों की कभी कोई कमी नहीं रही. फाइव स्टार होटल में उन्होंने शादी की. वैभव के सारे रिश्तेदारों को महंगे गिफ्ट्स दिए और पायल को एक से बढ़कर एक चीज़ उन्होंने दी.

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वैभव ने पायल से शादी उसके पैसों के कारण नहीं, उसकी योग्यता की वजह से की थी, इसलिए वह दहेज के ख़िलाफ़ था. शांतिदेवी को भी पायल के घरवालों का दिखावा खटका था, पर उन्होंने इस बात को यह सोचकर नज़रअंदाज़ कर दिया था कि पायल इकलौती संतान है, तो उसके माता-पिता के भी अरमान होंगे.

शादी के बाद बहुत धूमधाम से पायल का स्वागत किया गया. बहन ने द्वार रोकने का नेग भी लिया और रिश्ते की भाभियों ने देवर से छेड़छाड़ भी की. सारी रस्में भी हुईं और फिर सुबह चार बजे वैभव और पायल को अपने कमरे में जाने का मौक़ा मिला.

“उफ़्, मैंने नहीं सोचा था कि एक प्रोफेसर होने के बावजूद तुम्हारी मां इतने पुराने विचारों की होंगी. आजकल कौन इतनी रस्में करता है. वैभव, ताज्जुब हो रहा था कि तुम भी उन सब रस्मों को एंजॉय कर रहे थे. कितनी थक गई हूं मैं. पूरी रात बर्बाद हो गई. कितनी भीड़ है तुम्हारे घर में. इतने रिश्तेदार, बाप रे, मैं यह सब बर्दाश्त नहीं कर सकती. हर किसी के पांव छुओ… तुम्हारा परिवार अभी भी इन परंपराओं में जकड़ा हुआ है.

एक हमारा परिवार है, छोटी फैमिली. मम्मी-पापा इन सब चक्करों में नहीं पड़ते. देखा था न शादी में स़िर्फ बिज़नेस के लोग ही थे. परिवार के लोग कम ही थे. अब मुझे सोने दो.”  पायल ने नाइटी पहनते हुए कहा और गुडनाइट कह एक ओर करवट लेकर सो गई. वैभव उसकी बात सुन परेशान हो उठा. फिर उसने सोचा कि वह थक गई है, इसलिए ऐसा रिएक्ट कर रही है.

अगले दिन रात की फ्लाइट से वे सिंगापुर के लिए निकल गए. हफ़्ते बाद जब वे लौटे, तो पायल की ख़ुशी देखते ही बनती थी. वैभव के मम्मी-पापा और बहन के लिए वह गिफ्ट लाई थी. “बेटा, अगली बार अगर गिफ्ट लाओ, तो दोनों चाचा के परिवारों के लिए भी लाना.” शांतिदेवी ने टोका, तो पायल हैरानी से बोली, “पर मम्मी, दे आर नॉट आवर फैमिली.”

“पायल, बेशक हम लोग अलग-अलग फ्लोर पर रहते हैं, पर हैं एक ही परिवार. इसलिए अगली बार ध्यान रखना.” ऐसी कोई न कोई घटना रोज़ ही हो जाती. पायल ने तो यह सोचकर वैभव से शादी की थी कि उसके घर में एक खुला वातावरण होगा, वह अपने तरी़के से जी सकेगी. हालांकि उसके आने-जाने या मनचाहे कपड़े पहनने पर किसी ने रोक नहीं लगाई थी, न ही रात की पार्टियां  अटेंड करने पर किसी को आपत्ति थी, फिर भी उसे लगता था कि वह आज़ादी से सांस भी नहीं ले पा रही है. वह घर आती, तो कभी कोई चाची बैठी होती, कभी कोई ननद या देवर. वैभव को उनसे हंसी-मज़ाक करते देख वह चिढ़ जाती.

“वैभव, तुम इतने बड़े ओहदे पर हो, इस तरह का हंसी-मज़ाक क्या तुम्हें सूट करता है? डीसेंट रहना चाहिए तुम्हें. क्या बच्चों की तरह संडे को कैरमबोर्ड खेलने बैठ जाते हो. खेलना ही है, तो चेस खेलो या फिर ताश.”

“यह घर है पायल. यहां अगर खुलकर नहीं रहूंगा, तो अपनेपन की फीलिंग कैसे आएगी? मैं तो कहता हूं कि तुम भी हमारे साथ खेला करो. कान में ईयरफोन लगाकर म्यूज़िक सुनने से कहीं ज़्यादा रिलैक्सेशन मिलता है अपनों के साथ छोटी-छोटी ख़ुशियां बांटने में.”

“वैभव, बिहेव लाइक ऐन एजुकेटेड पर्सन. मैं देख रही हूं कि तुम्हारी फैमिली में सभी ऐसे हैं. बड़े चाचा आईएएस अफ़सर हैं, पर व्यवहार एक लोअर मिडिल क्लास की तरह करते हैं. और तो और, तुम्हारी छोटी चाची इंटीरियर डिज़ाइनर हैं, पर घर में ख़ुद कितनी सादगी से रहती हैं. क्लास नाम की भी कोई चीज़ होती है, वी नीड टू मेंटेन इट. इलीट क्लास के लोग कम बोलते हैं, सोफिस्टीकेटेड ढंग से रहते हैं, लाइक माई पैरेंट्स.”

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“हां, जो मुस्कुराते भी नाप-तौल के हैं. मुझे समझ नहीं आता कि तुम हर बार एजुकेटेड लोगों का ताना क्यों देने लगती हो? हम अगर शिक्षित हैं, तो क्या अपने संस्कारों को न मानें, संबंधों की कद्र न करें और सहजता से न जीएं, ऐसा किस क़िताब में लिखा है?”

धीरे-धीरे पायल और वैभव की बहस उनके संबंधों में कड़वाहट लाने लगी थी. पायल की महत्वाकांक्षा और ख़ुद को सबसे परफेक्ट और स्मार्ट मानने का सुपीरियॉरिटी कॉम्प्लैक्स उसे वैभव के साथ-साथ सबसे दूर कर रहा था. पूरा परिवार जब एक साथ बैठा होता, तो वह अपने कमरे में बैठी लैपटॉप पर काम कर रही होती. रिश्तों की सोंधी सुगंध को नकारती वह एक ऐसे फॉल्स पैराडाइज़ में जी रही थी, जिसमें ऊपरी चमक-दमक और अपने को बेहतर साबित करने की होड़-सी लगी रहती है, जिसमें बच्चों से भी एक दूरी बनाकर रखना तहज़ीब माना जाता है. पायल ने भी शायद कभी नज़दीक़ से अपने पैरेंट्स के प्यार को महसूस नहीं किया था, इसलिए वह समझ नहीं पा रही थी कि रिश्तों की महक ज़िंदगी को सुवासित करने की कितनी क्षमता रखती है.

शांतिदेवी पायल के साथ एडजस्ट करने की कोशिश करतीं, पर पायल बदलने को तैयार ही नहीं थी. एक-दो बार उन्होंने वैभव से बातों-बातों में कहा भी कि अगर वह चाहे, तो अलग रह सकता है, पर वैभव के लिए ऐसा सोचना भी असंभव था. उसे मां की गोद में सिर रखकर लेटना अभी भी अच्छा लगता था, उसे पापा के साथ सैर करने में मज़ा आता था और बहन की चुटिया खींचने में वह शर्म महसूस नहीं करता था. पायल ये सब देख चिढ़ जाती.

“तुम लोग पढ़े-लिखे गंवार हो.” वह कहती तो वैभव खून का घूंट पीकर रह जाता. वह अजीब-सी मनोस्थिति से जूझ रहा था. उनकी शादी हुए छह महीने बीत चुके थे, लेकिन पायल अभी भी एडजस्ट नहीं हुई थी. सच तो यह था कि वह एडजस्ट होना चाहती ही नहीं थी, इसलिए वैभव पर ज़ोर डालती रहती कि उन्हें अपने फ्लैट में जाकर रहना चाहिए, जो उसके पापा ने उसके नाम से ख़रीदा था.

“तुम्हें यहां क्या दिक़्क़त है? तुम देर रात घर लौटती हो, टाइट जींस पहनती हो और स़िर्फ अपने करियर के बारे में सोचती हो. कभी सोचा है कि तुमने आज तक किचन में पैर तक नहीं रखा है. मम्मी ने कभी तुम्हें इस बात का ताना दिया क्या? तुम अपने मन की करती हो, दूसरों की भावनाओं के बारे में कभी सोचती तक नहीं हो. फिर क्यों अलग होना चाहती हो? आख़िर किस चीज़ की कमी है तुम्हें यहां?” एक दिन वैभव का आक्रोश फट गया था.

“मैं किचन में क्यों जाऊं? असल में क़ामयाब हो जाने के बावजूद तुम लोगों की सोच मिडिल क्लास ही है, आगे बढ़ने के बारे में सोचना ही नहीं चाहते.” उस दिन पायल ने सारी मर्यादाएं पार कर दी थीं और सूटकेस लेकर मायके चली गई थी. वैभव ने जब फोन किया था, तब पायल ने यही कहा था कि जिस दिन अलग होने की सोचो, तभी मैं वापस आऊंगी, वह भी अपने फ्लैट में.

पायल को गए एक महीना बीत गया था. वैभव की चुप्पी के साथ घर में भी सन्नाटा पसरा रहता. एक दिन शाम के समय पायल का फोन आया. वह रो रही थी. “वैभव, पापा के बिज़नेस में भारी नुक़सान हो गया है. बैंक से जो लोन लिया था, वह चुका नहीं सके, तो बैंक हमारे घर पर कब्ज़ा कर रहा है. हमारी मदद करने के लिए कोई नहीं है. कोई भी रिश्तेदार और मित्र मदद नहीं कर रहे. आएगा भी क्यों, पापा ने उनसे कभी संबंध बनाकर ही नहीं रखे थे. प्लीज़ हेल्प मी, मेरी कंपनी भी ज़्यादा लोन नहीं दे रही है. जो मेरी सेविंग्स हैं, वह काफ़ी नहीं हैं. हमारा सब कुछ बिक चुका है.”

पायल के घर पहुंचने में वैभव के सारे परिवार ने एक पल की भी देर नहीं की. किसी ने एक बार भी उसके कटु व्यवहार का उलाहना नहीं दिया. वैभव ने मां को देखा, तो वह बोलीं, “बेटा है तो वह अपनी ही न. भूल जा पिछली बातें. अभी उसे हमारी आवश्यकता है.” बड़े चाचा ने अपने रसूख़ से मकान पर कब्ज़ा होने से रोका और सबने मिलकर कर्ज़ की थोड़ी रक़म की अदायगी कर उसे चुकाने की मोहलत भी बढ़वा ली.

पायल की आंखों से निरंतर आंसू बह रहे थे. हालांकि अभी भी वह शब्दों से माफ़ी मांगने में हिचक रही थी, पर उसके झर-झर बहते आंसू कह रहे थे कि वह अपने फॉल्स पैराडाइज़ से बाहर निकल आई है. शांतिदेवी के गले से लगते ही उसे महसूस हुआ कि रिश्तों की सोंधी महक कैसी होती है. पहली बार उसे महसूस हुआ था कि ममता का आंचल कितना सुकूनदायक और सुरक्षित होता है.

suman bajapaye

सुमन बाजपेयी

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कहानी- संस्कारी (Hindi Short Story- Sanskari)

“आरतीजी, आप बुरा न मानें. आपने रिया को कुछ ज़्यादा ही आज़ादी दे रखी है. लड़की है… कल को शादी होगी. क्या इस तरह पूरे दिन ससुराल में मैच देखती रहेगी और हर चौके-छक्के पर उसकी सास उसे चाय-पकौड़े खिलाती रहेगी.”

short stories

“यह क्या ममा, आज फिर आपने लंच बॉक्स में आलू का परांठा रख दिया?” रिया ने अंदर आते ही बैग सोफे पर पटक दिया और भुनभुनाते हुए अपने कमरे में चली गई.

“सॉरी बेटा.” कहते हुए आरतीजी भी उसके पीछे चली गईं. यह देखकर ड्रॉइंगरूम में बैठी दोनों पड़ोसन मीनाक्षी और सुजाता आपस में बोल पड़ीं.

“बड़ी अजीब है आरती की बेटी. यह भी नहीं देखा कि कोई बैठा है, कम से कम उनका तो लिहाज़ कर लेती.”

“ऐसी ज़िद्दी और नकचढ़ी लड़कियां ही ससुराल में एडजस्ट नहीं कर पातीं. यहां तो आरती इसके नखरे सह रही है, सास थोड़े ही सहेगी.”

तभी आरतीजी आ गई, तो वे दोनों चुप हो गईं. वे चलने लगीं, तो आरतीजी बोली, “प्लीज़, आप लोग थोड़ी देर और बैठिए न. मैं गैस पर चाय का पानी चढ़ाकर आई हूं. बस, रिया कपड़े बदल ले, फिर उसकी पसंद की अदरकवाली चाय और प्याज़ के गरम-गरम पकौड़े बनाऊंगी. उसका मूड भी ठीक हो जाएगा और हम सब एक साथ चाय और पकौड़ों का आनंद भी उठा लेगें.”

“नहीं नहीं… आरतीजी हम तो चलते हैं. आप रिया का मूड ठीक करो. हम फिर कभी चाय पीने आ जाएंगे.” थोड़े व्यंग्यात्मक स्वर में कहते हुए वे दोनों वहां से निकल पड़ीं.

आरतीजी, रिया के साथ अभी महीनाभर पहले ही इस कॉलोनी में शिफ्ट हुई हैं. दोनों अकेले रहती थीं. आसपास किसी से मेलजोल भी नहीं कर पाती थीं. रिया सुबह नौ बजे ऑफिस निकल जाती थी. उसके बाद आरतीजी घर का काम निबटाकर अपना लेखन कार्य करती थीं. वह लेखिका थीं. उन्हें पढ़ने का भी शौक था.

पास-पड़ोस की महिलाओं ने सोचा कि यह नई पड़ोसन कामवालीबाई के बारे में पूछने के लिए तो आएगी ही, लेकिन आरतीजी को बाई की ज़रूरत ही नहीं थी. एक तो उनका फ्लैट छोटा था. फिर दो लोगों के बीच ज़्यादा काम भी नहीं था. दोनों मिल-जुलकर काम निबटा लेती थीं. 15 दिन बीत गए, तो उन महिलाओं के सब्र का बांध टूट ही गया. सो मीनाक्षी, सुजाता और नीलिमा पहुंच ही गईं उनके यहां उनके निजी जीवन की जानकारी लेने और मेलमिलाप बढ़ाने. नाम आदि पूछने की औपचारिकता पूर्ण हो चुकी थी. उनके बीच थोड़ा-बहुत आना-जाना भी शुरू हो गया था, लेकिन आरतीजी किसी के यहां नहीं जा पाती थीं, क्योंकि उनके पास एक तो व़क्त नहीं था. दूसरे सास-बहू, जेठानी-देवरानी की बुराई-भलाई करने में उन्हें बिल्कुल भी रुचि नहीं थी और उन महिलाओं की बातचीत का मुख्य विषय यही होता था.

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रिया देखने में बहुत ख़ूबसूरत और आकर्षक थी. जब वह तैयार होकर ऑफिस के लिए निकलती, तो सभी उसे घूर-घूरकर देखतीं. सबकी नज़र में रिया ज़िद्दी, नकचढ़ी और संस्कारहीन लड़की थी, इसलिए वे सब अक्सर आरतीजी से कहतीं, “आरतीजी, प्लीज़ बुरा मत मानिएगा, रिया को अच्छे संस्कार दीजिए. कुछ मैनर्स सिखाइए. आप तो इसकी हर बात मानती हैं. सिर पर चढ़ा रखा है आपने. कल को दूसरे घर जाएगी, तो सास थोड़े-ही इसके नखरे उठाएगी. सारा दोष आप पर ही आएगा कि आपने इसे अच्छे संस्कार नहीं दिए हैं.”

आरतीजी मुस्कुराकर कहतीं, “नहीं नहीं… ऐसा नहीं है. बहुत संस्कारी है मेरी रिया. सुबह ऑफिस जाती है. शाम को थकी-हारी लौटती है, तो मैं उसे गरमागरम चाय बनाकर देती हूं. चाय पीते ही उसकी थकान उड़न छू हो जाती है और गुलाब-सी खिल जाती है वह. एक चाय के बदले वह मुझ पर ढेर सारा प्यार लुटाती है. यह क्या कम है. फिर हम दोनों मिलकर अपना मनपसंद खाना बनाते हैं, साथ में खाते हैं. वह अपने ऑफिस की सारी बातें शेयर करती है. मैं भी अपनी रचनाओं के बारे में उससे डिसकस करती हूं. कभी-कभी वह मुझे लिखने के लिए नई और रोचक जानकारियां देती है.”

यह बात सुनकर वे सब महिलाएं बोर होने लगीं. आरतीजी की बात बीच में काटकर सुजाता बोल पड़ी, “और रिया के पापा?”

“वह एक साल के लिए कंपनी के काम से अमेरिका गए हैं.”

इधर मीनाक्षी के बेटे अंश का दिल ख़ूबसूरत रिया पर आ गया. उसे अपने लिए रिया जैसी स्मार्ट और जॉबवाली लड़की चाहिए थी. वह स्वयं भी आकर्षक होने के साथ-साथ एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत था. उसने रिया का ज़िक्र अपनी मां मीनाक्षी से किया था. मीनाक्षी को रिया पसंद तो थी, लेकिन उसकी आदतें पसंद नहीं थीं. उसे नौकरीवाली ख़ूबसूरत बहू तो चाहिए थी, लेकिन घर के कामकाज करने के साथ-साथ सास की ग़ुलामी करनेवाली बहू की भी तलाश थी और रिया उनके इन मापदंडों पर खरी नहीं उतर रही थी.

वह नहीं चाहती थी कि रिया उसकी बहू बने, लेकिन अंश ने ज़िद पकड़ ली थी. आख़िर एक दिन बेटे की ज़िद और उसके दबाव में आकर वह इस बारे में बात करने अपनी सहेलियों के साथ आरतीजी के घर पहुंच ही गई.

“आरतीजी क्षमा चाहती हूं, आज रविवार के दिन अचानक आना हुआ. आप बहुत व्यस्त होंगी और रिया भी घर पर होगी?”

“नहीं नहीं… आज हम बिल्कुल फ्री हैं. मौज-मस्ती के मूड में हैं, क्योंकि रिया आज अपना फेवरेट क्रिकेट मैच देख रही है. एक बॉल तक नहीं छोड़ती है. मैच देखने की बेहद शौकीन है. जिस दिन मैच होता है, उस दिन तो वह ऑफिस से छुट्टी तक ले लेती है.” तभी अंदर से रिया की ताली बजाते हुए ख़ुशी से भरपूर आवाज़ आई, “कोहली का छक्का! इसी बात पर ममा प्लीज़ एक कप अदरकवाली चाय हो जाए.”

“ओके बेटा. अभी बनाती हूं. अगर दूसरी साइड से धोनी भी छक्का लगा दे, तो फिर साथ में प्याज़ के पकौड़े भी बना दूंगी.” आरतीजी ने हंसते हुए ज़ोर से कहा, तो मीनाक्षी से न रहा गया.

“आरतीजी, आप बुरा न मानें. आपने रिया को कुछ ज़्यादा ही आज़ादी दे रखी है. लड़की है, कल को शादी होगी, क्या इस तरह पूरे दिन ससुराल में मैच देखती रहेगी और हर चौके-छक्के पर उसकी सास चाय-पकौड़े खिलाती रहेगी.”

“मीनाक्षीजी, रिश्तों में आज़ादी और बंधन कहां से आ गए? अगर मैं रिया की भावनाओं का ख़्याल रखती हूं, तो वह भी मेरे ज़ज़्बात का पूरा सम्मान करती है. मेरी परवाह करती है, मेरे स्वास्थ्य की, मेरे मन, इच्छाओं और शौक की… मैं कभी-कभी पढ़ते-लिखते व़क्त इतना खो जाती हूं कि वह चाय वगैरह मेरे पास मेरे बिना मांगे ही रख जाती है. हमेशा मुझे लिखने के लिए उत्साहित करती रहती है. ऑफिस से छुट्टी लेकर मुझे विश्‍व पुस्तक मेले में ले जाती है. घरेलू कामकाज में भी बराबर मेरी मदद करती है.”

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“यह तो उसका कर्त्तव्य है.” मीनाक्षी तपाक से बोली.

“अगर यह उसका कर्त्तव्य है, तो उसको यह हक़ नहीं है कि वह मुझसे साधिकार चाय मांग सके… मुझसे ग़ुस्सा कर सके… मुझसे रूठे…”

“आरतीजी, देखो आप जो कह रही हैं ना वह सब ठीक है, लेकिन ये चोंचले और नखरे स़िर्फ मां ही उठाती है, सास नहीं.” मीनाक्षी हाथ नचाते हुए व्यंग्यात्मक स्वर

में बोली.

“अरे, उस दिन कैसे आप पर ग़ुस्सा कर रही थी कि आज फिर आलू का परांठा

रख दिया.”

“तो क्या हो गया? ग़लती मेरी ही थी ना. मैंने एक दिन पहले भी आलू का परांठा रख दिया था और याद नहीं रहा. दूसरे दिन भी रख दिया. मीनाक्षीजी, सच तो यह है जब बच्चियां ग़ुस्सा होती हैं, तो बहुत क्यूट लगती हैं. ढेर सारा प्यार आता है उन पर. जब रिया ग़ुस्सा होती है, तो मैं उसे छेड़ती हूं, ‘रिया, तुम तो ग़ुस्से में पहले से और भी ज़्यादा ख़ूबसूरत लग रही हो’ यह सुनकर वह हंस देती है और लाड़ से गले लगकर कहती है कि थैंक्स ममा, लव यू सो मच. सच, उस समय ऐसा लगता है जैसे ममता के मामले में मुझसे धनी और कोई नहीं है.”

“फिर भी, आज तो आप पूरा दिन बंध ही गईं न? न कुछ लिख पाएंगी और न कुछ पढ़ पाएंगी.”

“अरे, ऐसा कुछ नहीं है. आज सुबह जल्दी ही हम दोनों ने मिलकर सारे ज़रूरी काम कर लिए हैं. ब्रेकफास्ट भी कर लिया है. दोपहर में स़िर्फ खिचड़ी खाएंगे और रात को डिनर के लिए बाहर जाएंगे. आज का दिन पहले ही प्लान कर रखा है.”

“चलो, फिर हम तो चले. आप तो अब खिचड़ी बनाएंगी.” नीलिमा थो़ड़ा मुस्कुराकर, लेकिन व्यंग्यात्मक स्वर में बोली.

“अरे, उसमें कितना व़क्त लगेगा? दाल-चावल बिन रखे हैं. बस, धोकर कुकर में चढ़ानी है खिचड़ी.”

लेकिन वह तीनों रुकी नहीं. रिया मैच का आनंद ले रही थी, तो आरतीजी पत्रिका लेकर पढ़ने बैठ गईं और एक ब्रेक में रिया ने खिचड़ी भी बनने के लिए रख दी.

मीनाक्षी ग़ुस्से में तमतमा रही थी. “ऐसी नकचढ़ी और ज़िद्दी लड़की को मैं अपने घर की बहू हरगिज़ नहीं बना सकती, जो बिस्तर से ही चाय ऑर्डर करे. मैं आज ही अंश को साफ़-साफ़ बोल दूंगी. अगर तुझे इस लड़की से शादी करनी है, तो पहले मुझसे रिश्ता तोड़ना होगा.”

“बिल्कुल सही कह रही है तू.” सुजाता ने चिंगारी लगाते हुए कहा, “ऐसी लड़की को बहू बनाना ख़ुद अपनी ज़िंदगी में आग लगाना है.”

“तू बच गई मीनाक्षी, क्योंकि रिया के व्यवहार और तेवर के तूने पहले ही साक्षात् दर्शन कर लिए.” नीलिमा ने भी फुलझड़ी छोड़ दी.

“आरतीजी अपनी बेटी की इतनी तारीफ़ करती हैं उसे सिर-आंखों पर बिठाने के साथ-साथ उसके नाज़-नखरे सहती हैं. क्या अपनी बहू को ऐसे रख पाएंगी?”

“कभी नहीं.” कहते हुए सुजाता ने बुरा-सा मुंह बनाया.

“अरे, ये सब छोड़ो. मुझे यह बताओ कि अंश के ऊपर से रिया का भूत कैसे उतारा जाए? वह तो पूरी तरह से रिया पर लट्टू हो गया है.” मीनाक्षी चिंतित स्वर में बोली.

“अंश तो गया तेरे हाथ से मीनाक्षी, अब तू रिया की चाकरी के लिए तैयार हो जा.” नीलिमा ने चुटकी ली.

“चाकरी! वह भी बहू की? माई फुट.” मीनाक्षी पैर पटकते हुए बोली.

अंश के सिर से रिया का भूत उतारने के लिए वे तीनों योजनाएं बनाने लगीं.

अगले दिन वैलेंटाइन डे था. उसका विरोध करने उन्हें जाना था. वे सब खाली थीं. सो एक संस्था बना रखी थी. वैलेंटाइन डे वाले दिन वे दोपहर को निकल पड़ीं. सबसे पहले वे एक रेस्टॉरेंट में घुस गईं. वहां का एक दृश्य देखकर तो वे सभी हक्की-बक्की रह गईं, लेकिन मीनाक्षी की आंखों में एक विजयी चमक उभर आई. सामने की टेबल पर एक हैंडसम युवक और रिया दीन-दुनिया से बेख़बर आलिंगनबद्ध थे.

मीनाक्षी व्यंग्य से बोली, “यह देखो, आरती की संस्कारी लड़की रिया! कितनी बेशर्मी से लड़के के गले लगकर खड़ी है. मेरे लिए तो बहुत बढ़िया है यह प्रणय दृश्य. अभी फोटो खींचकर अंश को भेजती हूं, ताकि उसके सिर से रिया का भूत उतर जाए और शाम को आरती के घर जाकर उनकी संस्कारी बेटी के सुंदर संस्कारों के दर्शन करवाऊंगी.” कहते हुए मीनाक्षी ने मोबाइल से धड़ाधड़ कई फोटो खींच लिए और वहां से निकल गई दूसरी जगह अपने मिशन के लिए. इस बीच उसने वे सारे फोटो अंश को फॉरवर्ड कर दिए और शाम को पहुंच गई आरतीजी के घर. संस्कारी रिया की छवि दिखाने और उसके क़िस्से सुनाने.

“आरतीजी, रिया नहीं दिखाई दे रही है? कहां है वह? आज तो रविवार है और ऑफिस भी बंद है.”

“मीनाक्षीजी, मै ख़ुद भी परेशान हूं रिया को लेकर. वह अचानक ही घर से निकल गई थी यह कहते हुए कि ममा मैं अभी आती हूं, अब तो बहुत देर हो गई है उसे. उसका मोबाइल भी स्विच ऑफ है.” आरतीजी चिंतित स्वर में बोलीं. वे सब मन ही मन आरतीजी की हालत देखकर ख़ुश हो रही थीं. तभी अचानक दरवाज़ा खुला, जो बंद नहीं था.

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सामने रिया और वह रेस्टॉरेंटवाला युवक साथ थे. रिया दौड़ती हुई आई और आरती के गले लगकर उलाहना, मगर प्यारभरे स्वर में बोली, “ममा आपका बेटा बहुत नॉटी है. पता है, आज इसने जो काम किया है, मेरी तो जान ही निकल गई थी. किसी दूसरे नंबर से मुझे व्हाट्सऐप मैसेज किया- तुम्हारा पति ‘लवबर्ड्स’ रेस्टॉरेंट में किसी लड़की के साथ वैलेंटाइन डे मना रहा है. विश्‍वास न हो, तो वहां जाकर देखो. मेरे तो होश ही उड़ गए और उल्टे पांव दौड़ पड़ी रेस्टॉरेंट. वहां जाकर देखा, तो ये महाशय ख़ूब ज़ोर से हंस रहे थे मेरी हालत देखकर.”

“लेकिन रोमी तू तो 16 को आ रहा था. आज कैसे?” आरती ने आश्‍चर्य से पूछा.

“मम्मी, मुझे आना तो 14 तारीख़ को ही था, लेकिन इस वैलेंटाइन डे पर आपकी बहू को सरप्राइज़ देने के लिए मैंने झूठ बोला था कि मुझे 16 को आना है.” रोमी शरारत से मुस्कुराया.

“यू चीटर! मेरी तो जान ही निकल गई थी. तुझे छोड़ूंगी नहीं.” कहते हुए रिया उसकी छाती पर हौले-हौले प्यारभरे मुक्के बरसाने लगी.

फिर आरतीजी से बोली, “प्लीज़ ममा, आप जल्दी से तैयार हो जाइए. पहले ढेर सारी शॉपिंग, मूवी, फिर डिनर और हां प्लीज़ अपने बर्थडे पर मेरी दी हुई जींस और टॉप ही पहनिएगा. उसमें आप एकदम ब्यूटीफुल नज़र आती हैं और फिर पापा से आपकी वीडियो कॉल भी तो होनी है.” शरारती अंदाज़ में रिया बोली.

“नहीं नहीं… आज नहीं… फिर कभी चलूंगी. आज के दिन कबाब में हड्डी नहीं बनना है मुझे.” आरती ने इंकार कर दिया.

“तो ठीक है हम भी नहीं जाएंगे और घर में भी कुछ नहीं खाएंगे. आज भूख हड़ताल है.” रिया और रोमी एक स्वर में बोले.

“ओके. ठीक है बाबा चल रही हूं. तुम दोनों यूं मुंह न फुलाओ. रिया बेटा, मैं तैयार होकर आती हूं, तब तक इन आंटियों को गरमागरम अदरकवाली चाय पिलाओ.”

“ओके ममा.”

“नहीं नहीं बेटा… फिर कभी चाय पीने आएंगे.” यह कहकर वे सब वहां से निकल गईं.

डॉ. अनिता राठौर ‘मंजरी’

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कहानी- कैनवास (Short Story- Canvas)

वह अपनी छोटी सोच के चलते आज तक ज़िंदगी को एक छोटे से फे्रम में कैदकर एक निश्‍चित एंगल से उसका मूल्यांकन करती आई थी, जबकि ज़िंदगी का कैनवास तो बहुत बड़ा होता है. न जाने कितने एंगल और फे्रम इसमें छिपे होते हैं. कहीं ख़ुशियों के शोख़-चटक रंग, तो कहीं ग़मों के उड़ते बादल इस कैनवास पर दिखाई देते हैं.

Kahani

जीवन में न जाने ऐसे कितने ही प्रश्‍न हैं, जो समझ से परे होते हैं. जिनके उत्तर चाहकर भी इंसान खोज नहीं पाता है. ऐसा ही एक प्रश्‍न उसके मन को अक्सर उद्वेलित करता है कि एक ही घर में पले-बढ़े, एक ही माता-पिता की दो संतानों की तक़दीर में इतना अंतर क्यों होता है. यह टीस उस समय और बढ़ जाती है, जब कर्त्तव्य और फ़र्ज़ जैसे भारी-भरकम शब्दों के बोझ तले उसकी छोटी-छोटी इच्छाएं भी दम तोड़ देती हैं और उससे उपजी पीड़ा का समीर को एहसास तक नहीं होता. उस समय न चाहते हुए भी वह अपनी ज़िंदगी की तुलना दीपा दी से करने लगती है और समीर से उसका झगड़ा हो जाता है.

तनिक-सी भी परवाह नहीं है समीर को उसकी ख़ुशियों की, उसकी भावनाओं की. कौन-सा पहाड़ टूट पड़ता, अगर उस दिन समीर उसे एक्स स्टूडेंट मीट में जाने देते. लेकिन समीर ने उसकी इच्छा को अनदेखा करते हुए कहा था, “तुम्हें पता है न कि मम्मी की तबीयत ख़राब है.”

“मैंने मम्मी को नाश्ता करवाकर दवा दे दी है. महाराजिन लंच बनाएगी. तीन बजे तक मैं लौट भी आऊंगी.”

“स़िर्फ दवा देने से फ़र्ज़ पूरा नहीं होता है. बड़ों को अपनेपन की भी ज़रूरत होती है. उनके पास बैठोगी, माथा सहलाओगी, तो आधी तबीयत तो यूं ही ठीक हो जाएगी. एक बेटे की मां बन चुकी हो, फिर भी ज़िम्मेदारी का एहसास नहीं.”

नीतू को भी ग़ुस्सा आ गया था, “कौन-सी ज़िम्मेदारी है, जो पूरी नहीं करती. सारा दिन तुम लोगों के इशारों पर नाचती हूं. ज़रा-सा अपने मन की कर लो, तो तुम्हें बुरा लग जाता है. आख़िर दीपा दी भी तो हैं.”

दीपा का नाम सुनते ही समीर भड़क उठा, उसकी बात उसने बीच में काट दी, “नीतू, दीपा दी से अपनी तुलना मत किया करो. निखिलजी शिप पर रहते हैं और वह यहां अकेली. उन पर किसी की जवाबदेही नहीं है, किंतु तुम तो परिवार के बीच में हो. क्या यह फ़र्क़ तुम्हें दिखाई नहीं देता.”

“उफ़़्फ्!” पैर पटकते हुए वह कमरे से बाहर निकल गई थी. यह कोई एक दिन की बात नहीं थी.

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ऐसे कितने ही मौ़के आते जब वह अपना मनचाहा करना चाहती. छोटी-छोटी ख़ुशियों को अपनी दोनों हथेलियों में समेटकर अपने जीवन में इंद्रधनुषी रंग बिखेरना चाहती, किंतु अक्सर ही उसकी मासूम भावनाओं को छिन्न-भिन्न करने के लिए कोई न कोई बाधा रास्ते का रोड़ा बन जाती. वसंत पंचमी पर भी तो ऐसा ही हुआ था. निखिल जीजू आए हुए थे. उसने और दीपा दी ने मसूरी घूमने का प्लान बनाया था. समीर भी तैयार हो गए थे, किंतु ऐन व़क्त पर उसकी ननद लतिका दी का फोन आ गया कि वह दो दिनों के लिए दिल्ली आ रही हैं और समीर ने प्रोग्राम कैंसल कर दिया. दी और जीजू तो आराम से चले गए थे और वह मन मसोसकर रह गई थी. ऐसे समय अक्सर ही उसकी रातों की नींद उड़ जाती है और वह सोचती रहती है कि ज़िंदगी की तस्वीर को बदल देनेवाले इतने महत्वपूर्ण फैसले में उससे चूक हो गई. समीर का लाखों का बिज़नेस, इतनी बड़ी कोठी, घर में नौकर-चाकर, इन्हीं को वह ख़ुशियों का मापदंड समझ बैठी थी, लेकिन अब समझ आया कि ख़ुशियां स्वच्छंदता में है. मौजमस्ती में है. क्या उसकी नियति यही है कि वह ख़ामोशी से अपने मन को मरता देखती रहे.

दो दिन बाद उसकी किटी पार्टी थी. ध्रुव को खाना खिलाकर वह अपनी सहेली सारिका के घर पहुंच गई. उनका छह सहेलियों का गु्रप हर माह किसी एक के घर एकत्रित होता था, जहां वे लंच के साथ तम्बोला का मज़ा लेते थे, लेकिन उस दिन रिया ने सुझाव दिया था, “क्यों न आज कुछ चेंज किया जाए. लंच के बाद मूवी देखने चलें?”

“वाउ, गुड आइडिया.” सभी ख़ुशी से चिल्लाईं. नीतू ने मम्मी को फोन करके बता दिया. उन्होंने भी प्रसन्नता से उसे जाने की इजाज़त दे दी थी. अभी वह मल्टीप्लेक्स पहुंची ही थी कि उसका फोन बज उठा. मम्मी का कॉल था, किंतु उनसे बात करती, तो मूवी शुरू हो जाती. हॉल में भी उसे एक-दो बार लगा कि उसका फोन बज रहा है, लेकिन उसने अनदेखा कर दिया. बाहर निकलने पर देखा, उसके मोबाइल पर पांच मिस्ड कॉल थीं. घर पहुंची, तो पता चला धु्रव झूले से गिर गया था. उसके सिर में चोट लगी देख उसका कलेजा मुंह को आ गया. मम्मी ने तो कुछ नहीं कहा, लेकिन कमरे में आते ही समीर ने आड़े हाथों लिया, “सहेलियों के साथ इतना खो गईं कि घर का होश ही नहीं रहा. फोन उठाने की भी फुर्सत नहीं मिली. किटी के बाद मूवी जाना ज़रूरी था क्या?”

“समीर, तुम बेकार ही बात को बढ़ा रहे हो. मुझे क्या पता था कि धु्रव को चोट लग जाएगी.” “जानती हो, तुम्हारे फोन न उठाने से मुझे मीटिंग छोड़कर घर आना पड़ा.”

“मैं भी तो घर के सारे दायित्व अकेले उठा रही हूं. एक दिन तुम्हें आना पड़ा, तो क्या हो गया?”

“कौन से दायित्व? सुनूं तो. ऐश करने के सिवा तुम करती क्या हो?”

वह कहना चाहती थी, बंधन में रहकर भी भला कोई ऐश कर सकता है क्या, किंतु कुछ तो धु्रव के चोटिल हो जाने का दर्द और कुछ अपनी लापरवाही का मन ही मन मलाल, वह ख़ामोश रही.

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अगले शनिवार को वह पैरेंट्स टीचर्स मीटिंग से लौटी, तो दीपा दी भी उसके साथ थीं. धु्रव और दीपा की लड़की पीहू दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे. नीतू और दीपा को मम्मी ने अपने कमरे में बुलाकर कहा, “नैनीताल से तुम्हारे चाचा का फोन आया था. दो दिन बाद उनकी शादी की 50वीं सालगिरह है, जिसे वे लोग धूमधाम से सेलिबे्रट कर रहे हैं. तुम दोनों को उन्होंने ख़ासतौर पर बुलाया है.”

नीतू बोली, “हम कैसे जा सकते हैं मम्मी. बच्चों की परीक्षाएं सिर पर हैं. उनकी स्कूल से छुट्टी करवाना ठीक नहीं है.”

“धु्रव और पीहू की तुम दोनों चिंता मत करो. ये दोनों यहीं रहेंगे हमारे साथ और स्कूल भी जाएंगे. क्यों बच्चों रहोगे न दादा-दादी के साथ?”

“हां, हम रहेंगे दादा-दादी के साथ. लूडो खेलेंगे, आइस्क्रीम खाएंगे, ख़ूब मज़े करेंगे.” धु्रव और पीहू ख़ुश थे.

“लेकिन आंटी, आप परेशान हो जाएंगी.” दीपा संकोच से बोली.

“क्यों दीपा, क्या पीहू मेरी पोती नहीं? अब दोनों जाने की तैयारी करो और हां, गिफ्ट बढ़िया-सा लेकर जाना.”

दो दिन बाद वे दोनों कार से नैनीताल जा रहे थे. नीतू बेहद ख़ुश थी. एक उन्मुक्तता का एहसास उसके मन को उड़ाए लिए जा रहा था. मार्ग के विहंगम दृश्यों को अपलक निहारते हुए वे लोग जल्दी ही नैनीताल पहुंच गए.

चाचा-चाची और उनके परिवार के संबंध हमेशा से ही घनिष्ठ और आत्मीय रहे हैं. उन्होंने अपनी बेटी अल्पना और नीतू-दीपा में कभी फ़र्क़ नहीं किया और अब तो जब से मम्मी-पापा का स्वर्गवास हुआ, चाचा-चाची ही उनके सब कुछ थे. रात में पूरा परिवार रजाई में बैठा गपशप में तल्लीन था. चाचा बोले, “नीतू, तुम्हारे सास-ससुर की सज्जनता का मैं क़ायल हो गया. मेरे एक फोन पर ही उन्होंने न स़िर्फ तुम दोनों को भेजा, बल्कि दोनों बच्चों को भी रख लिया. इतना बड़प्पन बहुत कम लोगों में होता है.”

“हां चाचा, इसमें संदेह नहीं कि हम उन्हीं की वजह से आ पाए, लेकिन…”

“लेकिन क्या बेटा?” चाचा-चाची की सवालिया नज़रें उसकी ओर उठ गईं, नीतू दुविधा में पड़ गई. क्या करे वह, ज़ाहिर कर दे सबसे अपनी नाराज़गी? तभी उसने सुना, दीपा दी कह रही थीं? “अरे! मैं बताती हूं. नीतू सास-ससुर के साथ रहना नहीं चाहती.”

“आप तो चुप ही रहो दी. जिस तन लागे सो तन जाने. आप स्वच्छंद हो. आपको क्या पता बंधन में रहना किसे कहते हैं?”

“अरे, आख़िर पता तो चले बात क्या है?” चाची असमंजस में थीं. नीतू के मन का गुबार आख़िर छलक ही पड़ा, “मम्मी-पापा और आप लोगों ने मेरी शादी में बहुत जल्दबाज़ी की. यह भी नहीं सोचा कि संयुक्त परिवार में लड़की की ज़िंदगी कैसे कटेगी?”

“इसका सीधा-सा अर्थ है कि तुम वहां ख़ुश नहीं हो. तुम्हारी सास तुम्हें तंग करती हैं. यह सब पहले क्यों नहीं बताया?”

“ओहो चाची, सास की प्रताड़ना ही एक अकेला दुख नहीं होता. कुछ दुख ऐसे होते हैं, जो दिखाई नहीं देते, किंतु मन को टीसते रहते हैं. बंधन, कर्त्तव्य और ज़िम्मेदारियों के बीच क्या इंसान स्वच्छंदतापूर्वक घूम-फिर सकता है? मौजमस्ती कर सकता है? आप ही बताइए, मन मारकर जीना भी कोई जीना है.” नीतू की बातें सुनकर चाचा गंभीर हो उठे. कुछ पल वह सोचते रहे, फिर बोले, “जानती हो नीतू, भइया-भाभी यानी तुम्हारे मम्मी-पापा के विवाह को तीन वर्ष ही बीते थे, जब अम्मा का स्वर्गवास हो गया. मैं उस समय कॉलेज में पढ़ता था. भाभी पर परिवार का पूरा दायित्व आ गया. सोचो बेटा, उस समय उनकी क्या उम्र रही होगी. क्या उनके मन में उमंगें नहीं रही होंगी, किंतु उन्होंने अपनी ख़ुशियों से अधिक अपने कर्त्तव्यों को अहमियत दी. अपनी ज़िम्मेदारियों को कभी बोझ नहीं समझा. एक बड़ी बहन की तरह मेरे और तुम्हारी चाची के सिर पर सदैव उनका हाथ रहा. नीतू, भाभी के कर्त्तव्यों में आस्था थी. उनकी इस आस्था ने पूरे परिवार को स्नेह के एक अटूट बंधन में बांध दिया. बेटा, घूमने-फिरने और मौज-मस्ती का ही नाम ज़िंदगी नहीं है. त्याग, समर्पण, पे्रम और रिश्तों को सहेजने का नाम भी ज़िंदगी है. अपनों को प्यार देने और प्यार पाने का नाम भी ज़िंदगी है.”

चाचा की बातों पर नीतू नि:शब्द थी. अपने ही शब्दों के कारण उसे अपना अस्तित्व बौना महसूस हो रहा था. सचमुच मम्मी ने अपने परिवार के लिए इतने त्याग और समझौते न किए होते, तो उनके जाने के बाद भी क्या उसे और दीपा दी को चाचा-चाची के घर मायके-सा सुख मिलता. आज भी वे दोनों गर्मी की छुट्टियों में पूरे हक़ से यहां आती हैं और चाचा-चाची पूरी शिद्दत से रिश्ता निभाते हैं, जैसे कभी मम्मी-पापा ने उनके साथ निभाया था. अब जीवन का एक दूसरा पहलू उसके समक्ष था. तो क्या उसे मम्मी की इस परंपरा को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए? अपने परिवार को पूर्ण आस्था के साथ अपनाकर प्रेम के सूत्र में नहीं बांधना चाहिए, ताकि रिश्तों की गरमाहट को वह अपने दूसरे परिवार में भी महसूस करे, जो यहां करती आई है.

उसकी आंखों के समक्ष ऐसे कितने ही दृश्य तैर गए, जब उसकी सास और ननद लतिका ने अपने स्नेह की खाद से रिश्तों को पल्लवित करने का प्रयास किया था. धु्रव पैदा हुआ, तो मम्मी ने जी-जान से उसकी देखभाल की थी, किंतु वह उनसे सदैव औपचारिकता ही निभाती रही. रिश्तों को बोझ समझकर कर्त्तव्य निभाए. न तो ससुराल में किसी को अपना प्रेम दिया और न ही अपनापन. वह अपनी छोटी सोच के चलते आज तक ज़िंदगी को एक छोटे से फे्रम में ़कैदकर एक निश्‍चित एंगल से उसका मूल्यांकन करती आई थी, जबकि ज़िंदगी का कैनवास तो बहुत बड़ा होता है. न जाने कितने एंगल और फे्रम इसमें छिपे होते हैं. कहीं ख़ुशियों के शोख़-चटक रंग, तो कहीं ग़मों के उड़ते बादल इस कैनवास पर दिखाई देते हैं. इसका मूल्यांकन करने के लिए विस्तृत दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है.

दो दिन नैनीताल रहकर नीतू और दीपा दिल्ली लौट आए. कार से उतरकर ज्यों ही वे अंदर की ओर बढ़े, अंदर से आती आवाज़ों ने उनके पांव रोक दिए. लतिका कह रही थी, “मम्मी, नीतू का साहस देखकर मैं अचम्भित हूं. ख़ुद तो मैडम मज़े से घूम रही हैं और अपने बेटे के साथ-साथ अपनी बहन की बेटी को भी आपके पास छोड़ गई. समीर ने भी उसे मना नहीं किया. इस घर को क्या डे केयर समझा हुआ है. नहीं मम्मी, आपने और पापा ने उसे बहुत छूट दे रखी है. पछताएंगे आप लोग किसी दिन.”

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“बस लतिका, अब चुप हो जाओ. बहुत सुन चुकी मैं तुम्हारी बेकार की बातें. याद रखो, मैं उन मांओं में से नहीं हूं, जो बेटी के कहने में आकर बहू से दुर्व्यवहार करने लगती हैं और अपना घर ख़राब कर लेती हैं और न ही मेरी ममता अंधी है. अरे, ध्रुव मेरा पोता है, मेरा अपना ख़ून. उसके लिए कुछ करना मुझे आत्मसंतोष देता है. उसके लिए तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो? क्या वह तुम्हारा भतीजा नहीं? जानती हो, नीतू मेरा कितना ख़्याल रखती है. न जाने कितनी बार हमारी ख़ातिर अपना मन मार लेती है, लेकिन उसके चेहरे पर कभी शिकन नहीं आती. उसके स्नेह को मैं हृदय की गहराइयों से महसूस करती हूं. लतिका, कभी तुम्हारे बच्चे भी छोटे थे. उन्हें मेरे पास छोड़कर तुम कितना घूमती-फिरती थी और आज जब मैं धु्रव को संभाल रही हूं, तब तुम्हें बुरा लग रहा है. मेरी तबीयत का ख़्याल आ रहा है.”

“मम्मी, आप बेकार ही नाराज़ हो रही हैं. मेरा मतलब धु्रव से नहीं पीहू से था.” लतिका की खिसियाई हुई-सी आवाज़ आई.

“पीहू के लिए भी तुमने इतनी छोटी बात कैसे कह दी? नीतू की बहन के साथ क्या हमारा कोई संबंध नहीं?” मम्मी की बातों से नीतू की आंखों में आंसू आ गए. उसकी भावनाओं से अनभिज्ञ वे उसे इतना अच्छा समझती हैं. उनके मन में उसके लिए इतना प्यार छिपा हुआ है और वह… दो दिन पूर्व उसने लतिका दीदी की ऐसी बातें सुन ली होतीं, तो उनसे बात तक नहीं करती, लेकिन आज… आज वह बदल चुकी थी. अपने परिवार को अपने पे्रम और समर्पण की डोर में बांधने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ थी. भावविह्वल हो वह तेज़ी से अंदर की ओर बढ़ी.

“अरे दीदी, आप कब आईं?” उसने चौंकने का अभिनय किया. मम्मी और लतिका की बातें उन दोनों ने सुन ली हैं, यह दर्शाकर वह उन्हें शर्मिंदा करना नहीं चाहती थी.

“अभी थोड़ी देर पहले आई हूं.” लतिका बोली. “कैसा रहा वहां का प्रोग्राम? घर में सब कैसे हैं?” मम्मी ने पांव छूने को झुकी नीतू को गले से लगाते हुए पूछा.

“सब अच्छे हैं मम्मी. प्रोग्राम भी अच्छा रहा.” मम्मी के गले से लगी नीतू के मन में चाचा की कही बातें गूंज रही थीं, ‘हमारी भावनाएं और सोच का नज़रिया रिश्तों को स्वरूप प्रदान करता है.’ कितना सच कहा था उन्होंने. आज उसकी बदली हुई भावनाओं के कारण मम्मी में उसे अपनी सास नहीं, वरन् ममतामयी मां नज़र आ रही थीं.

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       रेनू मंडल

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कहानी- डस्टबिन (Short Story- Dustbin)

“नहीं, भला कचरा भी कोई संभालकर रखता है क्या?” नीरा को आश्‍चर्य हुआ उनके इस प्रश्‍न पर. “तो जया जैसे लोगों की नकारात्मक बातों के कचरे को क्यों संभालकर रखती हो? ये मन, ये शरीर हमारा घर है. इसे स्वच्छ और स्वस्थ रखना हमारा सबसे पहला कर्त्तव्य है, लेकिन देख रही हूं कि तुम पूरी तरह से इस कर्त्तव्य की अनदेखी कर रही हो और कचरे की दुर्गंध से अपने तन-मन को रोगग्रस्त करती जा रही हो.” मौसी ने टेबल पर रखी दवाइयों को देखते हुए कहा.

 Kahani

नीरा ने बाबूजी और मांजी को नाश्ता दिया और टेबल पर बैठकर नवीन की प्रतीक्षा करने लगी. ऑफिस का समय होता जा रहा है और नवीन न जाने किससे बातें करने में लगे हुए हैं. नीरा ने दो-तीन बार आवाज़ भी दी, लेकिन नवीन तो बाहरवाले कमरे में फोन पर ही बातें करने में लगे थे. आख़िर 10 मिनट बाद नवीन नाश्ते के लिए डायनिंग टेबल पर आए. उनका चेहरा ख़ुशी से चमक रहा था.

“किसका फोन था. बड़े ख़ुश लग रहे हो?” प्लेट में नाश्ता लगाते हुए नीरा ने पूछा.

“विजया मौसी का. यहां अंदर नेटवर्क की प्रॉब्लम होने की वजह से आवाज़ कट रही थी, इसलिए बाहर जाकर बात कर रहा था.” नवीन ने जवाब दिया.

“क्या कह रही थीं विजया दीदी? मुझसे बात नहीं की उन्होंने?” जया ने पूछा.

“8 तारीख़ को आ रही हैं यहां?” नवीन ने उत्साह से बताया.

“क्या सचमुच? अरे वाह, कितना मज़ा आएगा.” नीरा भी दुगुने उत्साह से भरकर बोली.

बाबूजी भी ख़ुश लग रहे थे. विजया दीदी को वे मांजी जयाजी की नहीं, बल्कि अपनी ही बहन मानते थे. नीरा का उत्साह देखकर मांजी को ज़रा भी अच्छा नहीं लगा. वे मुंह बनाकर बोलीं, “अपनी सास तो सुहाती नहीं और सास की बहन के आने की ख़बर सुनकर देखो चेहरा कैसा खिल गया. अपनों की भावनाओं का सम्मान नहीं और दूसरों की आवभगत करके अच्छा बनने का प्रपंच.”

मांजी का कटु स्वर सुनकर नीरा अंदर तक आहत हो गई. नवीन और बाबूजी के सामने वह सासू मां का अपमान करना नहीं चाहती थी, इसलिए हमेशा की तरह प्रकट रूप में स़िर्फ इतना ही बोली, “दूसरा कौन मांजी, विजया मौसी भी तो अपनी ही हैं.”

नवीन नाश्ता करके लंच लेकर ऑफिस चले गए और नीरा मांजी-बाबूजी को चाय देकर अपना कप लेकर कमरे में आ गई. उसकी सास ज़बान की बहुत कड़वी थीं. हमेशा सीधी बात का भी उल्टा मतलब निकालकर चुभती हुई बात कहना उनका स्वभाव ही था. नीरा को नाश्ते के समय कही उनकी बात रह-रहकर दुखी कर रही थी. जब से ब्याहकर इस घर में आई थी, तब से वह सास-ससुर की माता-पिता समान सेवा कर रही है. लेकिन उस पर भी यह तोहमत कि घरवालों की भावनाओं की कद्र नहीं है और बाहरवालों के सामने अच्छा बनने के लिए…

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13 बरसों की कर्त्तव्यपरायणता और निष्ठा का ऐसा प्रतिफल… उसकी आंखों में आंसू आ गए. मन में 13 वर्षों से जमा दर्द अब नासूर बनता जा रहा है. सास के ऐसे स्वभाव के कारण वह मन ही मन घुटती रहती है. वैसे गृहस्थी, दोनों बच्चों की पढ़ाई,

नाते-रिश्तेदार कहां-किस जगह थोड़ा-बहुत तनाव नहीं होता. कभी मायके के रिश्तेदारों के बीच खटपट से, तो कभी ससुराल में हुई बातों से. इन सबके बीच सास के ताने नीरा को अवसाद की स्थिति तक पहुंचा देते. नवीन ऑफिस के काम में ही इतना व्यस्त रहते कि उन्हें रोज़-रोज़ ये बातें बताकर वह परेशान नहीं करना चाहती. बाहरवालों से या मायकेवालों से सास की बातें करके वह अपने ही घर की इज़्ज़त ख़राब नहीं करना चाहती. लेकिन इन सबका विपरीत असर उसके स्वास्थ्य पर पड़ रहा था. कोई दिन ऐसा नहीं जाता, जब वह कुंठित होकर अकेले में रोती न हो, पर न सास को पलटकर जवाब देने जैसी धृष्टता कर पाती, न उनकी बातों को ही भूल पाती.

दोपहर के खाने के समय भी मांजी का मुंह फूला ही था. बाबूजी बेचारे भी चुपचाप खाना खा रहे थे, उन्हें भी अब आदत हो गई थी, सो वे अधिकतर चुप ही रहते. उस पर भी मांजी चिढ़ जातीं कि उन्हें तो कोई परवाह ही नहीं है उनकी.

तीन बजे जब दोनों बच्चे शानू और मीठी स्कूल से लौटे, तब उनकी धमाचौकड़ी से घर का माहौल बदला. अपने पोते-पोती से तो मांजी को भी बहुत प्यार था. दोनों उनकी आंखों के तारे थे. नीरा को बस यही एक सुकून था कि कम से कम सास उसके बच्चों पर तो जान छिड़कती हैं.

रात में वह मौसी के बारे में सोचने लगी. कितना फ़र्क़ है दो सगी बहनों में. विजया मौसी कितनी शौकीन, खाने-कपड़े से लेकर पकाने-खिलाने और हर बात में सुरुचिपूर्ण व सकारात्मक सोच का अविरल झरना हो जैसे… और उसकी सास, नीरा का मन कड़वा हो गया फिर से. वह मन को दूसरी तरफ़ लगाकर सोने की कोशिश करने लगी. बहुत कम ही साथ रह पाई है वह मौसी के, लेकिन जितना भी रही है, घर-परिवार के उत्सवों में, उनके व्यक्तित्व की ख़ूबियों से बहुत प्रभावित हुई है. मन में हर बार ही एक टीस उठती- काश! मौसी ही उसकी सास होतीं, तो जीवन और गृहस्थी दोनों ही कितने सुंदर होते. गृहस्थी में दिनभर सबसे अधिक पाला तो सास से ही पड़ता है न. उसी रिश्ते में यदि समन्वय न हो, तो जीवन बोझिल हो जाता है.

नीरा मौसी के स्वागत में कुछ ख़ास करना चाहती थी, लेकिन मांजी की तरफ़ देखकर उसकी हिम्मत नहीं हुई. सोचा मौसी के आ जाने के बाद ही विशेष व्यंजन बनाएगी. उनके सामने तो मांजी भी कुछ बोल नहीं पाएंगी. और वो दिन भी आ पहुंचा, जब मौसी आनेवाली थीं. आज नीरा ने दुगुनी गति से काम किया, ताकि उनके आने के बाद चैन से बैठकर बातें कर सके. नवीन जब उनको लेकर आए, तो घरभर में उमंग की लहर दौड़ गई. यहां तक कि मांजी भी ख़ुश लग रही थीं. चाय की चुस्कियों के बीच सफ़र और एक-दूसरे के हालचाल लिए गए. कुछ इधर-उधर की बातें हो रही थीं, तब तक नीरा ने फटाफट बाकी काम निपटाकर मौसी का मनपसंद सूजी का हलवा बना दिया.

जब सब खाना खाने बैठे, तो हलवा देखते ही मौसी ख़ुश हो गईं. झट एक चम्मच मुंह में डालकर बोलीं, “वाह! मज़ा आ गया. कितना स्वादिष्ट. तुम्हें याद था कि मुझे हलवा पसंद है.”

नीरा प्रसन्न होकर कुछ कहने जा ही रही थी कि मांजी मुंह बनाकर बोलीं, “हां, आपकी पसंद याद है इसे, लेकिन मेरी नहीं. हलवा मुझे भी बहुत पसंद है, पर मजाल है कि मेरे लिए कभी बनाया हो इसने.”

नीरा का चेहरा उतर गया. जाने कितनी बार हलवा बनाया होगा उसने, लेकिन आज तक तो कभी मांजी ने कहा नहीं कि उन्हें पसंद है. तभी मौसी बोल पड़ीं, “ जो चीज़ मन से पसंद होती है न जया, तो देखते ही चेहरे पर ख़ुशी छा जाती है. मुंह से अपने आप तारीफ़ों के पुल बंध जाते हैं. अब तुमने कभी कहा ही नहीं होगा बहू को कि ‘वाह हलवा कितना स्वादिष्ट बना है, मुझे बहुत पसंद है…’ तो उसे कैसे पता चले. चलो अब आज ख़ूब तारीफ़ करो हलवे की, तब देखना वह हर हफ़्ते बनाया करेगी.” मौसी ने जया की चुटकी ली, तो बाबूजी खांसने के बहाने मुंह दूसरी तरफ़ करके खुलकर मुस्कुराए और नीरा ने बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोकी, जबकि मांजी बुरी तरह खिसिया गईं.

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दोपहर में जब बच्चे घर आए, तो मौसी के लाए उपहार पाकर और कहानियां सुनकर बहुत ख़ुश हुए. शाम सब घूमने गए और खाना भी बाहर खाकर आए. सुबह नीरा चाय-नाश्ते की तैयारी करने रसोई में गई, तो मौसी भी साथ आकर मदद करवाने लगीं.

“अरे मौसी, आप रहने दीजिए, मैं कर लूंगी. आप मांजी के साथ बैठिए.” नीरा संकोच से बोली.

“तुम यह क्या कह रही हो दीदी. नीरा कर लेगी. घर पर तो रोज़ ही खटती रहती हो, यहां तो ज़रा आराम से बैठो.” तभी मांजी भी आ गईं.

“वह रसोई ही तो है, जहां खाने के साथ मधुर रिश्ते भी पकते हैं हम महिलाओं के बीच. अब देखो मिलकर काम फटाफट आसानी से हो जाता है, साथ ही बातचीत होने से आत्मीयता भी बढ़ती है. प्रेम भी मज़बूत होता है. आओ, तुम भी यहां आ जाओ- एक पंथ और कई काज. तीनों साथ में बातें करते हैं और काम भी. लो यह आलू छीलकर काट दो, फिर सलाद बना देना.” मौसी ने मांजी की तरफ़ आलू और सलाद की सब्ज़ियां बढ़ा दीं.

वे हक्की-बक्की रह गईं, लेकिन कोई बहाना न सूझने से चुपचाप काम करने लगीं और बातचीत में शामिल हो गईं, जबकि मौसी ने पूरे समय माहौल को ख़ुशगवार बनाए रखा.

“मुझे आपसे कढ़ाई सीखनी है. बड़ा मन है एक चादर और तकिए के लिहाफ़ बनाने का.” नीरा ने कहा.

“तो आज ही दोपहर को चलो चादर और धागे ले आते हैं.” मौसी उत्साह से बोलीं. और बच्चों को खाना खिलाकर नीरा मौसी के साथ बाज़ार गई. दोनों ने ख़ूब देख-परखकर एक सुंदर-सी चादर ली. कढ़ाई के धागे लिए. मुट्ठीभर धागों में भी कितने सुंदर रंग समाहित होते हैं अगर मन प्रसन्न हो तो.

दो दिन बाद दोपहर में नीरा मौसी के पास बैठकर चादर पर कढ़ाई सीख रही थी कि मौसी ने अचानक ही स्नेह से पूछा, “क्या बात है नीरा, पिछली बार से तेरी सेहत भी गिर गई है और बहुत परेशान, घुटी-घुटी भी लग रही है. सब ठीक है ना?”

“बाकी सब तो ठीक है मौसी, पर मांजी के स्वभाव से ही बहुत दुखी हो गई हूं. देखिए न रोज़ ही कुछ न कुछ ऐसी बात बोलती हैं कि…” नीरा की आंखें भर आईं.

“हां, मुझे लगा ही था कि तुम जया की बातों को दिल से लगा लेती हो और उन्हीं को सोचकर अंदर ही अंदर घुटती रहती हो.” मौसी गंभीरता से बोलीं. फिर अचानक ही पूछा, “अच्छा ये बताओ जब घर में कचरा फैल जाए, तो तुम क्या करती हो?”

नीरा उनके इस प्रश्‍न से अचकचा गई, फिर बोली, “झाड़ू से साफ़ कर देती हूं.”

“और साफ़ करके फेंकती कहां हो?”

“डस्टबिन में.”

“अच्छा संभालकर तो नहीं रखती न?” मौसी ने एक और अटपटा प्रश्‍न पूछा.

“नहीं, भला कचरा भी कोई संभालकर रखता है क्या?” नीरा को आश्‍चर्य हुआ उनके इस प्रश्‍न पर.

“तो जया जैसे लोगों की नकारात्मक बातों के कचरे को क्यों संभालकर रखती हो? ये मन, ये शरीर हमारा घर है. इसे स्वच्छ और स्वस्थ रखना हमारा सबसे पहला कर्त्तव्य है, लेकिन देख रही हूं कि तुम पूरी तरह से इस कर्त्तव्य की अनदेखी कर रही हो और कचरे की दुर्गंध से अपने तन-मन को रोगग्रस्त करती जा रही हो.” मौसी ने टेबल पर रखी दवाइयों को देखते हुए कहा.

नीरा के कढ़ाई करते हाथ रुक गए, “तो क्या करूं मौसी. वे बड़ी हैं, उल्टा जवाब देने का मन नहीं करता और भूल भी नहीं पाती.”

“तो क्या सारा जीवन उस कचरे की दुर्गंध में विषाक्त कर लोगी. याद रखो, तुम्हारा मन और जीवन जैसे-जैसे विषाक्त होता जाएगा, उसका असर नवीन और बच्चों पर भी पड़ेगा. बेहतर है रोज़ का कचरा उसी समय साफ़ कर लिया जाए.” मौसी सुई में धागा डालते हुए बोलीं.

“तो इस समस्या का हल क्या है?” नीरा उदास स्वर में बोली.

“डस्टबिन.” मौसी बोलीं.

“डस्टबिन? मैं समझी नहीं.” नीरा असमंजस में थी.

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“हां, जैसे घर के कचरे को फेंकने के लिए हम डस्टबिन रखते हैं, वैसे ही मन को साफ़ रखने के लिए मन के एक कोने में एक डस्टबिन रखना चाहिए. लोगों के अपशब्दों, तानों, नकारात्मक टिप्पणियों के कचरे को मन में जमा करते जाने का कोई अर्थ नहीं है. जीवन अत्यंत बोझिल हो जाएगा. अच्छा है उसे तुरंत उठाकर उस डस्टबिन में डाल दिया जाए.” मौसी ने समझाया.

नीरा रुककर सोचने लगी, ‘क्या सचमुच इससे तनाव कम हो जाएगा.’ उसके चेहरे पर उम्मीद की एक किरण झिलमिलाने लगी.

“बस यही, यह जो तेरे प्यारे से चेहरे पर अभी-अभी एक आशापूर्ण उजाला, एक मुस्कुराहट आई थी न, इसी झाड़ू से साफ़ करना. देखना, वो कचरा साफ़ होते ही तनाव, अवसाद, घुटन की दुर्गंध तुरंत गायब हो जाएगी.” मौसी मुस्कुराते हुई बोलीं.

“जीवन में हर परिस्थिति और हर मनुष्य का स्वभाव हमारी इच्छानुसार नहीं होता, तो कहां तक हम झगड़ते रहें या फिर अपना जीवन ख़राब करते रहें. तो हर एक व्यक्ति को अपने मन के एक कोने में डस्टबिन ज़रूर रखना चाहिए, ताकि अवांछित बातों से छुटकारा पाया जा सके, ताकि रिश्ते भी सुगमता से चलते रहें और जीवन भी.”

“अरे वाह मौसी, आपने तो क्या अद्भुत उपाय सुझाया है जीवन में शांति बनाए रखने का.” नीरा खुलकर मुस्कुराई.

“तो बस फिर आज ही अपने मन के एक कोने में डस्टबिन रखो, कचरा उसमें फेंको और अच्छा साथ लेकर आगे बढ़ो.” मौसी भी खुलकर हंस दीं.

“और अगली बार जब मैं यहां आऊं, तो ये दवाइयों का ढेर नहीं मिलना चाहिए और मुझे वही पुरानी हंसमुख प्यारी नीरा वापस मिलनी चाहिए.”

“ज़रूर मौसी.” नीरा ने स्नेहभरे आदर से कहा.

चार दिनों में ही नीरा का चेहरा खिल गया था. जब भी मांजी कोई कड़वी बात करतीं, मौसी अर्थपूर्ण ढंग से नीरा की तरफ़ देखती और नीरा झट मुस्कुरा देती. नवीन भी नीरा को पहले की तरह ख़ुश देखकर प्रसन्न थे. जब विजया मौसी वापस घर जाने लगीं, तो नीरा ने उनके पैर छुए. आशीर्वाद देते हुए बोलीं, “अब मेरी इस हंसमुख, तनावरहित नीरा को कभी खोने मत देना और कचरा डस्टबिन में फेंकना मत भूलना.”

“नहीं मौसी, कभी नहीं भूलूंगी. अब वो डस्टबिन हमेशा के लिए रख लिया है.” नीरा मुस्कुराते हुए बोली.

“कैसा कचरा? कैसा डस्टबिन? दोनों क्या बोल रही हो?” मांजी ने आश्‍चर्य से पूछा.

“कुछ नहीं वो हम दोनों का आपस का सीक्रेट है.” कहते हुए नीरा और मौसी खिलखिलाकर हंस दीं.

Dr. Vineeta Rahurikar

डॉ. विनीता राहुरीकर

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कहानी- राहुल का ख़त (Short Story- Rahul Ka Khat)

राहुल मेरे बनाये भोजन की खुले दिल से प्रशंसा करता और प्रशंसा की भूखी मैं उसकी पसन्द का विशेष ख़याल रखने लगी थी. डाइनिंग टेबल पर भी मेरा अधिक ध्यान उसी के ऊपर केन्द्रित रहता था.

कभी-कभी मैं विचारती कि कहीं मैं विकास की उपेक्षा तो नहीं कर रही हूं, पर इसे अपना भ्रम समझ इस विचार को परे झटक देती थी.

लॉन में कोई पौधा रोपित करना हो या घर के किसी कोने में कोई शो पीस रखना हो… कहीं घूमने जाना हो या घर में कुछ नया लाना हो… हर बात में राहुल का सहयोग या कहें दखलअंदाज़ी होने लगी थी. वह भी अपने अधिकतर कार्यों की सलाह मुझसे ही लिया करता था. उसकी अधिकतर शॉपिंग भी मेरे साथ ही होती थी.

 Hindi Kahani

राहुल का ख़त मेरे हाथ में फड़फड़ा रहा था, पढ़ने के बाद से ही विचित्र झंझावात मेरे मन-मस्तिष्क में द्वंद्व मचाये हुए था. पत्र में लिखे शब्दों पर मैं यक़ीन नहीं कर पा रही थी.

मेरे अपनत्व और देखभाल का ये परिणाम भी हो सकता है, ये मेरी कल्पना से बाहर था. ख़त को हाथ में दबाये मैं किंकर्तव्यविमूढ़-सी सोफे में धंस गयी थी और साल भर पहले की घटनाएं चलचित्र की तरह मेरी आंखों में तैरने लगी थीं.

दरवाज़े पर लगी कॉलबेल अपनी मधुर आवाज़ में गुनगुना उठी और हाथ की पत्रिका रख मुझे उठना पड़ा था.

दरवाज़ा खोला तो सामने एक नौजवान खड़ा था. “नमस्कार दीदी.” दोनों हाथ जोड़ वह बोला. मैं उसके अभिवादन का उत्तर देती, इससे पूर्व ही उसने मेरे चरण स्पर्श भी कर लिये थे. एक अनजान व्यक्ति से मिले इस सम्मान से मैं थोड़ी अचकचा गयी थी. प्रश्‍नवाचक निगाहों से देखते हुए मैंने कहा, “मैं तुम्हें पहचान नहीं पा रही हूं.”

“हां दीदी, आप मुझे बहुत दिनों बाद देख रही हैं न इसलिये. मैं राहुल हूं- आपकी मीना मौसी का बेटा.”

अचानक ख़ुशी से मेरा चेहरा खिल उठा, “ओह! तुम राहुल हो, कितना बदल गये हो, आओ अन्दर आओ… आज इतने दिनों बाद तुम्हें अपनी दीदी की याद आयी.” शिकायती लहज़े में मैं बोली थी. “यहां पर एक प्राइवेट फर्म में मुझे असिस्टेन्ट मैनेजर के पद पर नियुक्ति मिली है. आने से पहले मम्मी ने आपका पता दे दिया था, कहा था ज़रूर मिलकर आना.”

“अच्छा, तो जनाब मम्मी के कहने पर आये हैं.” आत्मीयता भरे स्वर में मैंने कहा था.

“नहीं दीदी, ऐसी बात नहीं है, आप तो मुझे बराबर याद रहती हैं, बस मिलना ही नहीं हो पाया.” हंसते हुए उसने मेरी शिकायत दूर करनी चाही थी.

“मैं चाय बनाकर लाती हूं, फिर बैठकर आराम से बातें करेंगे.”

राहुल मेरी मम्मी की चचेरी बहन मीना मौसी का बेटा था. बचपन से ही मैं मौसी के काफ़ी क़रीब थी और जब भी राहुल को लेकर मौसी हमारे घर आती थीं, मैं पूरे दिन उसे गोदी में लिए घूमती रहती थी.

व़क़्त धीरे-धीरे इसी तरह बीतता गया. मेरे विवाह के अवसर पर राहुल क़रीब 12-13 वर्ष का था, मेरी विदाई के समय भी वह फूट-फूट कर रोया था.

मैं अपनी गृहस्थी में रच-बस गयी. दो साल बाद ही मेरी गोद में प्रियांशु आ गया था. जब वह स्कूल जाने के लायक हुआ तो मेरा मायके जाना बस उसकी छुट्टियों तक ही सीमित हो गया था.

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इस बीच मौसी और राहुल से एक-दो बार ही मिलना हो पाया था. बाद में तो मम्मी से फ़ोन पर ही सभी रिश्तेदारों के हालचाल पूछे जाने लगे थे. आज इतने दिनों बाद राहुल को देखा तो पहचान नहीं पायी थी, बहुत सुन्दर और आकर्षक व्यक्तित्व पाया है उसने.

चाय कपों में डालकर मैं ड्रॉइंगरूम में आकर बैठ गयी. “तुम यहां आये कब और कहां रुके हो?” चाय का कप पकड़ाते हुए मैंने प्रश्‍न किया.

“कल ही आया हूं, यहां वैशाली होटल में रुका हूं, कल वापस जाकर अपना सामान भी लाना है और उससे पहले रहने के लिये कोई कमरा भी खोजना है.” चाय की चुस्की लेते हुए वह बोला.

“रहने के लिये कमरा? अरे, खोजने की ज़रूरत क्या है, हमारा ऊपरवाला वन रूम सेट खाली पड़ा है, तुम आराम से यहां रह सकते हो.” मैंने उसे सुझाव दिया था.

“पर दीदी, मेरा यहां रहना ठीक होगा?” असमंजस की स्थिति में उसने पूछा.

“इसमें सही और ग़लत की क्या बात है? तुम किरायेदार की तरह ही रह लेना.” मैंने उसकी दुविधा दूर करने का प्रयास किया था.

मेरे काफ़ी ज़ोर देने के बाद अंतत: वह हमारे यहां रहने को तैयार हो गया और ह़फ़्ते भर बाद अपने सामान के साथ आने को कहकर चला गया.

शाम को विकास के ऑफ़िस से लौटने पर सबसे पहले मैंने उन्हें दिनभर का वाक्या ज्यों का त्यों सुना दिया था. मेरे यह बताने पर कि मैंने उसे ऊपर के कमरे में रहने के लिए कह दिया है, विकास मेरी ओर व्यंग्यात्मक नज़रों से देखने लगे थे.

मैं उन नज़रों का आशय तुरन्त ही समझ गयी थी, क्योंकि कुछ महीने पहले जब विकास की बुआजी के लड़के को कमरा देने की बात उठी थी तो मैंने अपने इस तर्क से कि रिश्तेदारों से दूर ही रहना चाहिए, उसे खारिज़ कर दिया था.

अक्सर मैं अपने तर्कों से विकास को निरुत्तर कर दिया करती थी. विकास बहुत ही शांत स्वभाव के थे, इसलिए वह कभी मुझसे बहस जैसे पचड़ों में नहीं पड़ते थे और उनके चुप रहने या मेरी बात मान लेने की आदत को मैं अपनी जीत समझ कर ख़ुश होती रहती थी. हालांकि मैं सच्चाई से वाक़िफ थी, पर स्वयं को भुलावे में रखना शायद मेरी नियति बन गयी थी. और इस बार भी ऐसा ही हुआ, “जैसा तुम ठीक समझो.” कहकर विकास अपनी फाइल में उलझ गये थे. उनका काम में उलझे रहना कभी-कभी मुझे बहुत खलता था, जबकि मैं जानती थी कि वह जो कुछ कर रहे हैं मेरे लिए ही कर रहे हैं. पर फिर भी दिल चाहता था कि कभी-कभी वे इत्मीनान से मेरे पास बैठें, कुछ प्यार भरी बातें करें… मेरी तारीफ़ में कुछ शब्द कहें- पर ये सब तो शायद अब गुज़रे ज़माने की बातें हो गयी थीं.

मैं अपनी घर-गृहस्थी में लगी रहती और वह अपने बिज़नेस में… दिन यूं ही कट जाता था. संक्षेप में कहें तो ज़िन्दगी कुछ-कुछ नीरसता के मार्ग पर बढ़ती जा रही थी, पर इस रूटीन में राहुल के आगमन से कुछ परिवर्तन हुआ था.

ह़फ़्ते भर बाद राहुल अपने छोटे-मोटे सामान के साथ आकर ऊपरवाले कमरे में व्यवस्थित हो गया था. उसके आने से अब घर भरा-भरा लगने लगा था.

ऑफ़िस से लौटने के बाद वह अपना अधिकतर समय हम लोगों के साथ ही व्यतीत करता था. प्रियांशु को उससे ख़ासा लगाव हो गया था. बात-बात पर जोक्स सुनाने की उसकी कला हमें हंसाती ही रहती थी.

पहले कुछ दिन उसने खाना बाहर होटल में ही खाया, फिर मैं ही उसका खाना भी बनाने लगी थी. वह कहता, “दीदी, आप क्यों परेशान होती हैं? मैं बाहर ही खा लूंगा.”

“अच्छा, घर होते हुए तुम बाहर खाना खाओगे, जाने कैसा होता है, कहीं बीमार पड़ गए तो मौसी कहेंगी कि मेरे बेटे का ख़्याल भी नहीं रखा.” कहते हुए मैं उसकी प्लेट में और सब्ज़ी रख देती थी.

राहुल मेरे बनाये भोजन की खुले दिल से प्रशंसा करता और प्रशंसा की भूखी मैं उसकी पसन्द का विशेष ख़याल रखने लगी थी. डाइनिंग टेबल पर भी मेरा अधिक ध्यान उसी के ऊपर केन्द्रित रहता था.

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कभी-कभी मैं विचारती कि कहीं मैं विकास की उपेक्षा तो नहीं कर रही हूं, पर इसे अपना भ्रम समझ इस विचार को परे झटक देती थी.

लॉन में कोई पौधा रोपित करना हो या घर के किसी कोने में कोई शो पीस रखना हो… कहीं घूमने जाना हो या घर में कुछ नया लाना हो… हर बात में राहुल का सहयोग या कहें दखलअंदाज़ी होने लगी थी. वह भी अपने अधिकतर कार्यों की सलाह मुझसे ही लिया करता था. उसकी अधिकतर शॉपिंग भी मेरे साथ ही होती थी.

एक दिन सुबह का नाश्ता मैं टेबल पर लगा चुकी थी, पर राहुल अभी तक अपने कमरे से निकलकर नहीं आया था. मैंने एक-दो बार उसे पुकारा भी, परन्तु उसकी तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया न पाकर मैं और विकास दोनों ही ऊपर पहुंचे थे.

कमरे का दरवाज़ा खोलकर देखा, वह पलंग पर लेटा कराह रहा था. मैंने उसका माथा छूकर देखा- वह तेज़ बुखार से तप रहा था.

“अरे, तुम्हें तो तेज़ बुख़ार है, तुमने बताया भी नहीं.” चिंतित होते हुए मैं बोली. मैंने तुरन्त ही विकास को डॉक्टर ले आने को भेज दिया था.

डॉक्टर के आने तक मैं उसके सिरहाने बैठकर उसका माथा सहलाती रही और वह मेरा एक हाथ पकड़ आंखें बन्द किए चुपचाप लेटा रहा. डॉक्टर ने बताया कोई ख़ास चिन्ता की बात नहीं है, मलेरिया है, जल्द ही ठीक हो जायेगा.

अब उसकी देखभाल पूरी तरह मुझे ही करनी थी. बार-बार ऊपर-नीचे की भागदौड़ से बचने के लिए मैंने नीचे ही उसे गेस्ट रूम में बुला लिया था.

सुबह से शाम दो-तीन दिन मैं काफ़ी व्यस्त रही. कभी चाय, कभी दूध-ब्रेड तो कभी दवाई आदि में ही पूरा दिन व्यतीत हो जाता था. इस बीच विकास और प्रियांशु की ओर भी मैं अधिक ध्यान नहीं दे पा रही थी.

चौथे दिन राहुल स्वयं को थोड़ा बेहतर महसूस कर रहा था, हालांकि चार दिन के बुखार से उसका चेहरा कुम्हला गया था.

“दीदी, अब मैं ऊपर कमरे में ही चला जाता हूं, इतने दिन से आपको परेशान कर रहा हूं.” कहते हुए वह जैसे ही उठा कि अचानक लड़खड़ा गया. मैं पास ही खड़ी थी, आगे बढ़ मैंने उसे जल्दी से थाम लिया था. फिर आगे सहारा देते हुए वापस पलंग पर बैठाया.

“अभी तुम यहीं आराम करो, जब पूरी तरह ठीक हो जाओ तब चले जाना.” मैंने प्यार से समझाते हुए कहा.

अजीब-सी नज़रों से देखते हुए राहुल ने मेरे हाथों को अपने से अलग करते हुए मद्धिम स्वर में कहा, “नहीं, मैं ठीक हूं.” फिर मेरी ओर देखे बिना वह सीधे ऊपर अपने कमरे में चला गया.

उसका व्यवहार मुझे कुछ अचंभित कर रहा था, पर मैंने सोचा शायद बीमारी की वजह से वह थोड़ा डिस्टर्ब होगा, तबीयत सुधरेगी तो ठीक हो जायेगा. अत: मैं अपने काम में लग गयी थी.

शाम को राहुल का खाना मैं ऊपर कमरे में ही ले गयी. खिड़की के पास बैठा राहुल चुपचाप बाहर ताक रहा था. चेहरे पर उलझन के भाव स्पष्ट दृष्टिगोचर थे. मैं कुछ देर चुपचाप खड़ी रही, ये सोचकर कि उसे मेरी उपस्थिति का एहसास हो, पर वह ऐसे ही निर्विघ्न बैठा रहा.

खाना टेबल पर रखकर मैं उसके पीछे खड़ी हो गयी. “राहुल, अब कैसे हो?” अचानक मेरी आवाज़ सुन वह हड़बड़ा गया था, जैसे नींद से जागा हो.

“मैं खाना लाई हूं.”

“आप रख दीजिए, मैं खा लूंगा.” बोलकर वह फिर खिड़की से बाहर देखने लगा.

अपनी उपेक्षा मेरी समझ में नहीं आ रही थी, मैं चुपचाप वापस आ गयी थी. उस रात मैं ठीक से सो भी न सकी. बार-बार करवट बदलने से विकास को लगा शायद मैं कुछ उलझन में हूं.

“क्या बात है? नींद नहीं आ रही? कुछ परेशानी है?” विकास के पूछने पर मैं बोली, “नहीं, बस ऐसे ही, शायद थकान के कारण है.” इस पर विकास मेरा सर सहलाने लगे. उनके प्यार भरे स्पर्श से मैं जल्द ही नींद के आगोश में समा गयी थी.

इसके बाद राहुल का व्यवहार दिन पर दिन रूखा होता जा रहा था. सुबह वह जल्दी निकल जाता और देर रात  लौट कर सीधे अपने कमरे में चला जाता. हम लोगों के साथ उसका उठना-बैठना, खाना, हंसना, बोलना लगभग बन्द हो गया था.

मैं जब भी इस विषय में उससे बात करना चाहती, वह तुरन्त बात को टाल कर सामने से हट जाता था. उसके ऐसे व्यवहार से मैं दिनभर तनाव में रहने लगी थी.

एक दिन मैंने विकास से कहा, “विकास, ये राहुल को क्या हो गया है, हम लोगों से इतना दूर-दूर क्यों रहने लगा है?”

“होगी कोई बात, हो सकता है उसकी कोई पर्सनल प्रॉब्लम हो, तुम इतना परेशान क्यों होती हो.”

“आप राहुल से बात करके देखिये, मुझसे तो वह अब ठीक से बात ही नहीं करता, कहां दीदी-दीदी कहते थकता नहीं था.” मैंने अनुनय करते हुए विकास से कहा.

“तुम नाहक ही परेशान हो रही हो.” विकास ने इस बात को हल्के तौर पर लिया था, परन्तु मैं अपने अन्तर्द्वंद्व से विक्षिप्त-सी स्थिति में थी. कारण को जानने की जिज्ञासा से मैं आत्मावलोकन में व्यस्त हो गयी थी कि आख़िर कब और कहां ऐसा कुछ हुआ है, जिसने राहुल की दिनचर्या और व्यक्तित्व दोनों को अव्यवस्थित कर दिया है.

मैं व्यतीत हुई घटनाओं का मंथन कर कोई निष्कर्ष निकाल पाती, इससे पहले ही मुझे विस्मित करनेवाली घटना मेरे सामने थी.

राहुल अपना सामान बांधकर नीचे ले आया था, ऊपर के कमरे को उसने खाली कर दिया था. बाहर खड़े ऑटो में सामान लगाकर वह वापस अन्दर आया, मैं जड़वत् खड़ी देख रही थी कि यह हो क्या रहा है.

“मैं जा रहा हूं, आपको अब और परेशान नहीं करूंगा.” उसके शब्दों से मेरी आंखें छलक आयी थीं. मैंने उसके चेहरे को पढ़ना चाहा था, न जाने क्यूं उसकी आंखों में मुझे आत्मपीड़ा के भाव दिखे थे.

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“पर क्यूं राहुल, तुम हम सबको छोड़कर क्यों जा रहे हो? हमसे ऐसी क्या ग़लती हो गयी है, जिससे तुम इतने नाराज़ हो?” भरे गले से मैंने उससे पूछा था.

“ग़लती आपसे नहीं, मुझसे हुई है.”

“तुमसे?”

“हां मुझसे.” कहते हुए उसने एक लिफ़ाफ़ा मेरे हाथ में पकड़ा दिया.

“शायद आपके सामने मैं अपनी ग़लती को स्वर नहीं दे पाऊंगा, इसलिए मैंने इसे शब्दों का रूप दे लिख दिया है. आप इसे मेरे जाने के बाद खोलिएगा और हो सके तो इस नादान राहुल को माफ़ कर दीजिए.”

उसके मुख से निकला एक-एक शब्द मेरी उलझन को बढ़ाता जा रहा था. इससे पहले कि मैं कुछ और प्रश्‍न करती, वह जा चुका था. उत्सुकता की चरम सीमा के साथ मैंने ख़त को खोलकर पढ़ना आरम्भ किया था-

पिछले कुछ दिनों से आप मेरे व्यवहार को लेकर बेहद चिंतित और परेशान हैं, पर उससे अधिक मैं अपने अन्दर आये परिवर्तन से व्यथित हूं. मालूम नहीं, ये मेरी उम्र के पुरुषों की प्रवृत्ति है या मेरे मन की विकृति, मैं समझ नहीं पा रहा हूं.

आपके पवित्र प्यार और अपनत्व जैसी भावनाओं के ऊपर मेरे विरूप मनोभाव हावी होने लगे हैं. आपकी अधिक नज़दीकी तथा अपनेपन के कारण मेरी नज़रें अब आपको दूसरी तरह देखने लगी हैं.

मैं स्वयं को जितना समझाता हूं उतना ही उलझता जाता हूं. ये मन भी कितना अजीब है, चींटे की मानिंद बारम्बार उसी दिशा में दौड़ता है, जिस ओर से इसे हटाया जाता है.

शायद आपने कभी ये महसूस नहीं किया होगा, क्योंकि आपने मुझे अपने बेटे और भाई के समान स्नेह दिया है, परन्तु मेरे पुरुष शरीर ने जाने-अनजाने आपके हाथों के स्पर्श भर से स्वयं को रोमांचित पाया है.

मेरा मन सारी वर्जनाओं को तोड़ समय-बेसमय आपके सामीप्य के लिए आतुर हो उठता है. उस पल स्वयं को रोकना मेरे लिए कितना दुष्कर होता है, इसका एहसास आपको लेशमात्र भी नहीं हो सकता.

एक स्त्री के सामीप्य ने मेरे अन्दर के पुरुष को सिहरा दिया है, जो उम्र और रिश्ते के बन्धन और मर्यादा की सीमारेखा से पार जाना चाहता है.

किन्तु मेरी परवरिश के साथ मुझे जो संस्कार मिले हैं, संभवत: उन्हीं के कारण अब तक इतने दिनों मैं कुछ अप्रिय घटित होने के पाप से बचा रहा. परन्तु इसकी सीमा रेखायें टूट जायें, उससे पहले इसे रोकना होगा, इसकी उच्छृंखल होती भावनाओं पर विराम लगाना ही होगा. मुझे यहां से जाना ही होगा. इसीलिए मैं जा रहा हूं. हो सके तो मुझे माफ़ कर दीजियेगा. यदि मैं स्वयं को माफ़ कर सका तो जीवन में एक बार फिर आपसे अवश्य मिलूंगा.

राहुल

तेज़ हवा के झोंके से ख़त एक बार फिर फड़फड़ा उठा था और मैं बीते कल की स्मृतियों से निकल वर्तमान के कठोर धरातल पर खड़ी थी. दिल में घुमड़ते तेज़ तूफ़ान के बीच मैंने एक बार फिर से पूरा ख़त पढ़ डाला.

राहुल के ख़त ने मेरे पूरे अस्तित्व को झकझोर दिया. न जाने कितने अनुत्तरित प्रश्‍न मेरे सामने मुंह फैलाए खड़े थे जो पल-पल मेरी बेचैनी को बढ़ा रहे थे. मुझे महसूस हो रहा था मानो सारा ब्रह्मांड घूम रहा हो.

सर्वाधिक व्यथित तो मैं इस बात से थी कि किस तरह विकास को राहुल के जाने का कारण बताऊंगी. निस्तब्ध हो मैं सर थाम कर बैठ गयी.

देरे तक मंथन के बाद अंतत: मैंने निर्णय किया कि विकास को यह ख़त दिखाकर मैं उन्हें एक रिश्ते के प्रति अविश्‍वास के लिए प्रेरित नहीं करूंगी.

अपने संवेगों पर नियन्त्रण रख ये घटना मुझे अकेले ही झेलकर अपने अन्दर ही दफ़न करनी होगी.

और फिर मेरी उंगलियां राहुल के ख़त के वजूद को मिटा देने में व्यस्त हो गयीं.

– गीता जैन

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कहानी- वक़्त (Short Story- Waqt)

प्रिया, पति की मुश्किलों को समझकर उनके साथ सहयोग करोगी, तो तुम देखोगी कि वो एक बार तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर पाए, तो अगली बार पूरी करने की पुरज़ोर कोशिश ज़रूर करेंगे. इन छोटी-छोटी बातों से ही रिश्ते में गहराई आती है. व्यक्तित्व में ठहराव आता है. मैं यह नहीं कहती कि तुम्हें नाराज़ होने का हक़ नहीं है, लेकिन ज़्यादा समय तक रूठे रहना पति-पत्नी के रिश्ते में खालीपन पैदा करता है. संवादहीनता उनमें दूरी बढ़ाती है.

Kahani

रात के दो बज रहे थे. विमान की तेज़ आवाज़ सुनकर बेसाख़्ता मैं टैरेस पर चली आई. घर के नज़दीक एयरपोर्ट होने के कारण विमानों की आवाज़ें यहां आती रहती हैं. निगाहें उठाकर मैंने आसमान की ओर देखा. एक विमान काफ़ी नीचे उड़ रहा था. शायद उसने अभी-अभी उड़ान भरी थी. हो सकता है, इसमें रोहित हों. उनकी फ्लाइट का भी तो यही समय था.

जब से रोहित बीजिंग जाने के लिए घर से निकले हैं, मेरा मन कमज़ोर पड़ रहा है. आंखों में नींद नहीं है. एक अजीब-सी बेचैनी, अजीब-सी असुरक्षा का एहसास मन को घेर रहा है. वह बीजिंग न जाएं, एयरपोर्ट से ही घर वापस लौट आएं. हालांकि पहले भी दो बार ऑफिस के काम से वे अमेरिका गए थे, पर उस व़क्त ऐसी बेचैनी का एहसास नहीं हुआ था, फिर आज ऐसा क्यों हो रहा है? शायद इसकी वजह वह झगड़ा है, जो मेरे और रोहित के बीच हुआ था और जिसकी वजह से मैं उनसे बात नहीं कर रही थी.

विवाह के बाद मेरा पहला जन्मदिन था. सोचा था, उस दिन रोहित कुछ स्पेशल करेंगे. मुझे बढ़िया-सा उपहार देंगे, कहीं घुमाने ले जाएंगे, लेकिन यह सब तो दूर, सारा दिन बीत गया और उन्होंने मुझे बधाई तक नहीं दी. शाम को उनका मैसेज आया- ‘बॉस की प्रमोशन पार्टी है. डिनर पर जा रहा हूं. तुम खाना खा लेना. मेरा इंतज़ार मत करना.’ पढ़कर क्रोध और वेदना की मिली-जुली प्रतिक्रिया आंखों से आंसू बनकर बह निकली. ठीक है, उन्हें मेरी परवाह नहीं, तो मुझे क्यों हो? वो मेरी उपेक्षा कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं कर सकती? कितनी मुश्किल से हुई थी हमारी शादी. पापा मेरी शादी अपने दोस्त के बेटे डॉ. आलोक से करना चाहते थे, लेकिन मैं रोहित को चाहती थी. रोहित विजातीय थे, इस कारण मम्मी-पापा इस शादी के लिए सहमत न थे. बाद में मेरे काफ़ी ज़िद करने पर वे राज़ी हुए, लेकिन मुझे क्या पता था, इतनी मुश्किल से हासिल हुआ प्यार भी इतनी जल्दी अपनी ऊष्णता खो देगा. छह महीने बीतते-बीतते हम दोनों के बीच छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा होने लगा. आज सोच रही हूं, तो लग रहा है, क्या वे बातें उतनी

महत्वपूर्ण थीं, जिनकी वजह से मैं नाराज़ हो जाती थी. रोहित का पिक्चर के लिए प्रॉमिस करना और फिर काम की व्यस्तता के कारण प्रोग्राम कैंसिल कर देना, क्या बहुत बड़ी बात थी? दो दिन तक मुंह फुलाए घूमती रही थी मैं. अगले संडे पिक्चर दिखाने ले गए, तभी मूड ठीक हुआ था मेरा. ऐसी छोटी-छोटी बातें अक्सर हो जातीं. कभी वीकएंड पर भी उन्हें ऑफिस जाना पड़ता, उस समय उखड़ी-उखड़ी रहती मैं उनसे. रोहित कहते, “प्रिया, मैं अपने काम के साथ समझौता नहीं कर सकता. मेरे लिए मेरा काम, मेरी पूजा है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता या मुझे तुम्हारी फ़िक्र नहीं है. मैं जानता हूं कि मैं तुम्हें अधिक समय नहीं दे पाता हूं. तुम बस कुछ दिन सब्र रखो. मैंने अपने मैनेजर से बात की है. जल्द ही वो मुझे कोई दूसरा प्रोजेक्ट दे देंगे. तब मैं तुम्हारी सारी शिकायतें दूर कर दूंगा.” पर मुझमें सब्र नहीं था. मुझे रोहित की बातें आधारहीन लगतीं. पुरुष की ज़िंदगी में उसकी पत्नी की अहमियत इससे पता चलती है कि वो अपनी पत्नी को कितना समय देता है.

उस समय भी यही तर्क दिया था मैंने, जब चाचा के बेटे सौरभ की शादी में जाना था. शादी से एक दिन पहले बरेली पहुंचना चाहती थी मैं. रोहित भी राज़ी हो गए थे, पर घर से निकलने के बिल्कुल पहले रोहित के ऑफिस से फोन आ गया. खेदपूर्वक वो बोले, “सॉरी प्रिया, आज मैं किसी हालत में नहीं जा सकूंगा. प्रोजेक्ट में कुछ इश्यूज़ आ गए हैं, जिन्हें सॉल्व करना मेरी ज़िम्मेदारी है.” सुनते ही मुझे ग़ुस्सा आ गया था, “रोहित, आप इस बात को भी समझिए कि रिश्ते निभाना भी उतना ही ज़रूरी है. मेरा एक ही भाई है. मैं शादी में अगर जल्दी नहीं पहुंचूंगी, तो उसे कितना बुरा लगेगा. हो सकता है, ग़ुस्से में वो मुझसे बात भी न करे. चाचा-चाची ज़िंदगीभर इस बात का उलाहना देंगे.” रोहित शांत ही रहे. सारा दिन मेरा मूड ऑफ रहा था. अगले दिन रास्तेभर मैं रोहित से उखड़ी-उखड़ी रही थी. चाचा का घर आते ही मैं अंदर की ओर लपकी. हल्दी की रस्म तभी ख़त्म हुई थी.

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चाचा-चाची ने मुझे गले लगाया. सौरभ अपनी बहन की सहेलियों के साथ हंसी-मज़ाक में उलझा हुआ था. उसने दूर से ही हाथ हिला दिया. पास आकर रोहित से बात करने की औपचारिकता भी नहीं दिखाई. मैं जान-बूझकर वहां सबके नज़दीक जाकर खड़ी रही कि कोई तो मुझे देरी से आने का उलाहना देगा, लेकिन किसी को हमारे आने की फ़िक्र ही नहीं थी, फिर देर या जल्दी का सवाल ही कहां उठता था. मन ही मन मैं खिसिया रही थी. अपने इन्हीं संबंधों के लिए मैंने रोहित से झगड़ा किया था. रोहित मुख से कुछ नहीं बोले. बस, मुझे देखकर मुस्कुराते रहे थे.

रात में फेरों के व़क्त मम्मी मुझे एकांत में ले जाकर बोलीं, “प्रिया, तेरे और रोहित के बीच सब कुछ ठीक है न. सुबह से देख रही हूं, तू रोहित से बात नहीं कर रही है.” मम्मी की सहानुभूति पाकर मेरा दिल भर आया. व्यथित होकर मैं बोली, “मम्मी, मेरे और रोहित के बीच अब बहुत झगड़े होते हैं. कई-कई दिन तक हम एक-दूसरे से बात तक नहीं करते. रोहित अब बहुत बदल गए हैं. पहले उन्हें मेरा कितना ख़्याल था, लेकिन अब उन्हें मेरी बिल्कुल परवाह नहीं है. उनके लिए उनका काम ही सर्वोपरि है.” मम्मी शांत मन से मेरी बातें सुनती रहीं, फिर बोलीं, “प्रिया, कॉलेज में मैं तुम्हारी ही उम्र की कितनी लड़कियों के संपर्क में रहती हूं. उनमें से कई मुझे अपनी समस्याएं भी बताती हैं. प्रिया, मुझे लगता है, आजकल की पढ़ी-लिखी लड़कियों में एडजस्ट करने की भावना कम हो रही है और उनका अहं बढ़ रहा है. आजकल पति और पत्नी को जो बराबरी का दर्जा मिल रहा है, उसके चलते पति से उनकी अपेक्षाएं कुछ ज़्यादा ही रहती हैं और इनके पूरा न होने पर उनका अहं टकराने लगता है. शिकायतों का दौर शुरू हो जाता है.”

“मम्मी, तो क्या ग़लत बातों पर रिएक्ट नहीं करना चाहिए, उन्हें सहते रहना चाहिए.”

“नहीं प्रिया, तुम इस बात को समझो. ग़लत बातें सहने में और एडजस्टमेंट में अंतर है. पति की परिस्थितियों को समझना और उनसे तालमेल बिठाकर चलना एडजस्टमेंट होता है. छोटी-छोटी बातों पर रूठना, बोलचाल बंद कर देना, हर समय शिकायतें करना, ये सब बचपना है. प्रिया, पति की मुश्किलों को समझकर उनके साथ सहयोग करोगी, तो तुम देखोगी कि वो एक बार तुम्हारी इच्छा पूरी नहीं कर पाए, तो अगली बार पूरी करने की पुरज़ोर कोशिश करेंगे. इन छोटी-छोटी बातों से ही रिश्ते में गहराई आती है. व्यक्तित्व में ठहराव आता है. मैं यह नहीं कहती कि तुम्हें नाराज़ होने का हक़ नहीं है, लेकिन ज़्यादा समय तक रूठे रहना पति-पत्नी के रिश्ते में खालीपन पैदा करता है. संवादहीनता उनमें दूरी बढ़ाती है.”

“मम्मी, मैं समझ रही हूं, कम से कम आप मेरी भावनाओं को समझेंगी, यही सोचकर अपने मन की बात कह दी. विश्‍लेषण करना ही है, तो निष्पक्ष भाव से करिए न, पक्षपातपूर्ण रवैया क्यों अपना रही हैं? कहां तो आप रोहित के साथ मेरी शादी के ख़िलाफ़ थीं और कहां आपको उनकी हर बात ठीक लगती है.” मम्मी का सदैव की भांति उपदेश देना मुझे खिन्न कर गया था.

ऐसा कम ही होता है कि किसी के समझाने से इंसान पर असर पड़े. मुझ पर भी मम्मी के समझाने का कोई असर नहीं हुआ था. अगर हुआ होता, तो अपना जन्मदिन भूल जाने पर मैं रोहित से इतना नाराज़ न होती. रात में बॉस की पार्टी से वो देर से घर लौटे थे. सुबह मेरे क़रीब आकर बोले, “प्लीज़ प्रिया, मुझसे नाराज़ मत हो. बॉस प्रमोशन पर जा रहा है. कल सारा दिन इतना व्यस्त रहा कि तुम्हारा जन्मदिन भूल गया. आज सुबह मम्मी ने फोन करके याद दिलाया. मुझे बहुत अफ़सोस है प्रिया, लेकिन मैं भी क्या करूं, तीन दिन बाद बीजिंग जाना है. तब तक रत्तीभर भी फुर्सत नहीं है, मगर वादा करता हूं कि वापस आकर हम आउटडोर वीकएंड सेलीब्रेट करेंगे.”

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मैंने रोहित की बात का जवाब नहीं दिया और किचन में चली आई. मुझे लगा शायद यह बात सच है कि ज्यों-ज्यों शादी का समय बीतता जाता है, पत्नी अपने पति से जुड़ती जाती है और पति विमुख होने लगता है, तभी रोहित को मुझसे अधिक अपना काम प्यारा है. मुझे उम्मीद थी, रात में रोहित मुझे फिर से मनाएंगे. देर से ही सही, मेरे लिए जन्मदिन का उपहार ज़रूर लाएंगे, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. जाने के लिए घर से निकले, तब भी मैंने उनसे बात नहीं की. चुपचाप उनकी पैकिंग की और एक ओर खड़ी हो गई, इस प्रतीक्षा में कि शायद चलते हुए, वो मेरे क़रीब आएं. मुझे अपने आगोश में समेटकर, मेरा माथा चूम लें, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. मेरी हसरत दिल में ही रह गई. रोहित बदल गए हैं. मेरे बोलने न बोलने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. यही एहसास जागा था मन में, लेकिन अब लग रहा है कि यह सच नहीं है. अगर ऐसा होता, तो जाते समय पलटकर बार-बार मुझे न देखते. उनका चेहरा यूं उतर न जाता. मैं भी कितनी मूर्ख हूं,

ज़रा-ज़रा-सी बात पर ओवर रिएक्ट करती हूं. आख़िर क्यों नहीं बोली मैं रोहित से? ऐसा भी क्या कर दिया था उन्होंने, जो उन्हें बाहर तक छोड़ने नहीं गई? जाते समय उनसे यह भी नहीं कहा कि जल्दी आना. उनका व्यथित चेहरा यादकर मेरा मन द्रवित हो रहा था. काश, मम्मी की बातों को मैं गंभीरता से लेती और उनसे यूं नाराज़ न होती. ख़ैर, ईश्‍वर करे कि ये चार दिन जल्दी बीत जाएं और रोहित लौट आएं, फिर अपने अहं को दरकिनार कर उनके साथ एक नई शुरुआत करूंगी. इस विचार के साथ ही निगाहें घड़ी पर जा टिकीं. सुबह के छह बज चुके थे. रोहित की फ्लाइट को चार घंटे से अधिक बीत चुके थे. अब तक उन्होंने बीजिंग की आधी से अधिक दूरी भी तय कर ली होगी.

रातभर जागने के कारण सिर बहुत भारी हो रहा था, लेकिन मन की बेचैनी कुछ भी करने नहीं दे रही थी. अनमने भाव से मैंने टीवी ऑन किया. न्यूज़ चैनल लगाते ही नज़र ब्रेकिंग न्यूज़ पर जा टिकी- ‘बीजिंग जा रहे विमान का एयर ट्रैफिक कंट्रोल से संपर्क टूट गया है. विमान का कुछ पता नहीं है. तलाश जारी है, मेरा दिल धक्क से रह गया. ‘हे भगवान! इसी विमान में तो रोहित थे. तो क्या… नहीं, नहीं. मेरा हृदय चित्कार कर उठा. आंखों से आंसू बहने लगे. ऐसा लगा, शरीर की मानो सारी शक्ति ख़त्म हो गई हो. कांपते हाथों से मैंने एयरपोर्ट का नंबर मिलाया, लेकिन नंबर बिज़ी था.

तभी कॉलबेल बजी. लगता है, रोहित आ गए. शरीर में एक नई स्फूर्ति-सी जागी. आंसू पोंछ बदहवास-सी मैं दरवाज़े की ओर भागी. बाहर कुरियरवाले को देख मन बुझ गया. रोहित ने एयरपोर्ट से एक पैकेट भेजा था. मैंने जल्दी उसे खोला. अंदर एक ख़ूबसूरत-सी रिस्टवॉच थी, साथ में एक स्लिप जिस पर लिखा था- ‘मेरी प्रिया को जन्मदिन का तोहफ़ा’, मन पर बोझ लेकर जा रहा हूं कि जाने से पहले तुम्हारी नाराज़गी दूर न कर पाया. तुमसे बहुत जल्द मिलूंगा, तो सारे गिले-शिकवे दूर कर दूंगा- स़िर्फ तुम्हारा रोहित.

मैं फूट-फूटकर रो पड़ी. रोहित, मुझे उपहार नहीं चाहिए. मुझे स़िर्फ तुम्हारा साथ चाहिए. प्लीज़ लौट आओ रोहित, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगी. काश! मैं रोहित से नाराज़ न हुई होती. काश! मैंने उन्हें रोक लिया होता. मेरी नज़रें दोबारा टीवी पर जा टिकीं. विमान को ढूंढ़ने के प्रयास और तेज़ हो गए थे, लेकिन उसका कुछ पता नहीं चल पा रहा था. थोड़ी देर में मम्मी आ गईं. उनके सीने से लग मैं बिलख उठी.

रोते-रोते मेरी हिचकियां बंध गईं. मम्मी मेरा सिर सहलाते हुए बोलीं, “प्रिया, हिम्मत रखो. तुम्हारे पापा एयरपोर्ट पता करने गए हैं. मेरा मन कह रहा है, रोहित ज़रूर आएंगे.” मम्मी की आवाज़ मुझे कहीं दूर से आती लगी. दिन का उजाला बढ़ रहा था और मेरा भविष्य अंधकार की गहरी खाई में डूबता जा रहा था. अगले दिन से दोस्तों और रिश्तेदारों का आना शुरू हो गया था. हर कोई अपने तरी़के से सांत्वना दे रहा था. धीरे-धीरे एक माह बीत गया. विमान का अब तक कुछ पता नहीं चला है. रोहित के लौट आने की आस आज भी मेरी सांसों में बसी हुई है. आज अपनी बालकनी में बैठी मैं अश्रुपूरित नेत्रों से बीते दिनों की स्मृतियों में खोई हुई हूं. कुछ दिन पहले तक मैं और रोहित इसी बालकनी में बैठकर शाम की चाय पीते थे. रोहित मुझसे ढेर सारी बातें करना चाहते और मैं अपनी शिकायतों के ताने-बाने में उलझी अक्सर ख़ामोशी अख़्तियार कर लेती थी. आज मैं रोहित से बात करना चाहती हूं, उन्हें बताना चाहती हूं कि मैं उन्हें बहुत प्यार करती हूं, लेकिन मेरी बात सुनने के लिए रोहित मेरे पास नहीं हैं. चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ है. व़क्त यह कैसा खेल खेल गया मेरे साथ. काश! मैं व़क्त रहते प्यार की अहमियत को समझ पाती. काश! मैं गु़ज़रे व़क्त को लौटा पाती.

       रेनू मंडल

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तेनालीराम की कहानी: मटके में मुंह (Tenalirama And Pot Mask)

Tenalirama Stories

तेनालीराम की कहानी: मटके में मुंह (Tenalirama And Pot Mask)

यूं तो महाराज कृष्णदेव राय तेनालीरामा को बेहद पसंद करते थे, पर एक बार महाराज कृष्णदेव किसी बात पर तेनालीराम से नाराज़ हो गए. गुस्से में आकर उन्होंने तेनालीराम से भरी राजसभा में कह दिया कि कल से मुझे दरबार में अपना में अपना मुंह मत दिखाना. उसी समय तेनालीराम दरबार से चला गया. तेनालीरामा से जलनेवाले लोग बेहद ख़ुश हुए.

अगले दिन जब महाराज राजसभा की ओर जा रहे थे, तभी एक चुगलखोर ने उन्हें यह कहकर भड़का दिया कि आपने तेनालीरामा को दरबार में न आने का आदेश दिया था, लेकिन तेनालीराम आपके आदेश के खिलाफ दरबार में उपस्थित है.
यह सुनते ही महाराज आग-बबूला हो गए. चुगलखोर दरबारी आगे बोला- आपने साफ कहा था कि दरबार में आने पर कोड़े पड़ेंगे, इसकी भी उसने कोई परवाह नहीं की. अब तो तेनालीराम आपके हुक्म की भी अवहेलना करने में जुटा है.

राजा दरबार में पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि सिर पर मिट्टी का एक घड़ा ओढ़े तेनालीराम विचित्र प्रकार की हरकतें कर रहा है. घड़े पर चारों ओर जानवरों के मुंह बने थे.

महाराज ने गुस्से में कहा- तेनालीराम! ये क्या बेहुदगी है. तुमने हमारी आज्ञा का उल्लंघन किया हैं. तुमको इसकी सज़ा मिलेगी. दंडस्वरूप कोड़े खाने के तैयार हो जाओ.

तेनालीरामा ने कहा- मैंने कौन-सी आपकी आज्ञा नहीं मानी महाराज? घड़े में मुंह छिपाए हुए तेनालीराम आगे बोला- आपने कहा था कि कल मैं दरबार में अपना मुंह न दिखाऊं तो क्या आपको मेरा मुंह दिख रहा है? हे भगवान! कहीं कुम्हार ने फूटा घड़ा तो नहीं दे दिया?

यह सुनते ही महाराज की हंसी छूट गई. वे बोले- तुम जैसे बुद्धिमान और हाज़िरजवाब से कोई नाराज़ हो ही नहीं सकता. अब इस घड़े को हटाओ और सीधी तरह अपना आसन ग्रहण करो.

तेनालीरामा से महाराज के विशेष प्रेम के चलते बहुत लोग उससे जलते थे, लेकिन तेनालीरामा हर बार अपनी बुद्धिमता से उनको मात दे देता है. इस बार भी यही हुआ.

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कहानी- एक नया अंत (Short Story- Ek Naya Ant)

ऐसा होता है न कि अगर किसी ने हमें जीवन में बहुत कष्ट पहुंचाया हो, तो मौक़ा मिलने पर हम भी दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं, जबकि होना तो यह चाहिए कि जिन कष्टों से हम गुज़र चुके हैं, वे दूसरों को न दें.

Kahani

अभी मैंने किचन में पैर रखा ही था कि डोरबेल बजी. मैं चौंकी, कमलाबाई तो आज छुट्टी पर है, नवीन को भी ऑफिस गए काफ़ी देर हो चुकी है, फिर सुबह-सुबह कौन होगा? दिल ही दिल में यह सब सोचते हुए दरवाज़ा खोला, तो संपदा थी, साथ में विजय भी था. विजय ने जल्दी से कहा, “मम्मी, मैं ऑफिस जा रहा हूं. शाम को संपदा को लेने आऊंगा, पापा से भी मिल लूंगा.” मैंने कहा, “ठीक है बेटा, डिनर यहीं करके जाना.” तो वह, “हां, ठीक है” कहता हुआ जल्दी से चला गया. उसके जाने के बाद संपदा और मैं ड्रॉइंगरूम में आए. संपदा काफ़ी कमज़ोर लग रही थी और काफ़ी दिनों बाद आई थी. मैंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तुम बैठो, मैं आती हूं. अच्छा ऐसा करो, तुम अंदर थोड़ा लेट जाओ, मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने को लेकर आती हूं.”

“नहीं मम्मी, मैं नाश्ता कर चुकी हूं. बस, आप आ जाओ, मेरे साथ बैठकर बातें करो. खाना हम मिलकर बना लेंगे.” उसने कुछ उदासी से कहा.

“हां, मुझे पता है तुम्हारा नाश्ता, एक स्लाइस के साथ एक कप चाय पी ली होगी. कितनी बार कहा है इस हालत में अपने खाने-पीने का ख़ास ध्यान रखा करो. दूध पिया करो, फल खाओ, लेकिन आजकल की लड़कियों की समझ में हम पुराने लोगों की बातें आतीं ही नहीं. रुको, मैं कुछ लेकर आती हूं.”

मैं किचन में जाकर उसके लिए मिल्कशेक बनाने लगी, तो मुझे अपना वह समय याद आ गया, जब मैं संपदा जितनी थी और इसी तरह मैं भी जब मायके आती थी, तो मेरा दिल भी यही चाहता था कि मां मेरे पास ही बैठी रहे. मैं मिल्कशेक लेकर संपदा के पास आई. उसका मुरझाया चेहरा देखकर मैं चौंक गई, पूछा, “तबीयत तो ठीक है न?”

“मम्मी, क्या होना है तबीयत को, बिल्कुल ठीक है.” उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था, जो मुझे बुरी तरह चुभा.

“फिर ऐसी गुमसुम-सी क्यों हो?” मैंने कुरेदा, जो आमतौर पर मेरा स्वभाव नहीं था, लेकिन उसका चेहरा देखकर मैं ख़ुद को रोक नहीं पा रही थी, इसलिए  पूछ ही लिया.

“मम्मी, मैं परेशान हो गई हूं, एक तो मेरी तबीयत ख़राब है, मुझे समझ नहीं आता कि क्या करूं.”

मैंने उस पर चिंतित दृष्टि डालते हुए कहा, “तुम अपना ध्यान रखो, खाओ-पीओ, आराम का समय निश्‍चित करो, मैं तुम्हें कितने दिनों से समझा रही हूं.”

“मम्मी, यह बात नहीं है, मैं पहले इस बात पर हंसा करती थी कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है, लेकिन अब इसका मतलब मैं समझ गई हूं.”

“क्यों, ऐसा क्या हुआ?” मैंने हैरानी से पूछा.

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मेरी बेटी संपदा का विवाह सालभर पहले ही हुआ था. विजय हमें सभ्य और समझदार लगा था, उसके पिता भी अच्छे पद पर थे, उससे बड़ी दो विवाहित बहनें थीं. घर में आर्थिक स्थिति अच्छी थी और विजय की मां सुभद्रा देवी मुझे ठीक-ठाक ही लगी थीं. देखने में तो कुछ ऐसा नहीं था, फिर ऐसी क्या बात हुई, जो संपदा इतनी दुखी लग रही थी. “मम्मी, आपको बताया था न कि आजकल मुझसे सुबह उठा नहीं जाता, उल्टियों की वजह से बुरा हाल है, लेकिन मांजी को लगता है कि मैं एक्टिंग कर रही हूं और घर के कामों से जान छुड़ा रही हूं. वहां सबका मूड ख़राब हो जाता है. मम्मी, मुझसे सहन नहीं होता.” कहते-कहते संपदा रोने लगी, तो मेरा दिल जैसे मुट्ठी में आ गया. मैंने पूछा, “और विजय? वह तो तुम्हारा ध्यान रखता है न?”

“हां मम्मी, शुरू-शुरू में तो वह बहुत ख़ुश थे, लेकिन आजकल मांजी का ख़राब मूड देखकर कुछ बोलते ही नहीं. इस पर मेरा दिल और कुढ़ जाता है. मम्मी, एक लड़की के लिए उसकी ससुराल में उसका सबसे मज़बूत सहारा उसका पति ही होता है. अगर वह भी उसका साथ नहीं देगा, तो वह कहां जाएगी?”

“देखो बेटा, इन दिनों तबीयत ऐसे ही ऊपर-नीचे होती रहती है, लेकिन तुम हिम्मत रखो, अगर तुम भी अपनी बड़ी बहन सुखदा की तरह अकेली रहती, तो भी तुम्हें सब कुछ करना पड़ता.”

“तब घरवालों के रोज़ नए मूड तो नहीं देखने पड़ते, रवि जीजाजी ने ऐसी हालत में दीदी का कितना ध्यान रखा था.”

“बेटा, ये तो छोटी-छोटी समस्याएं हैं. समय के साथ ये ख़ुद ही हल हो जाएंगी. अब तुम टेंशन छोड़ो, सुखदा को भी फोन कर दो कि शाम को वह भी यहीं आ जाए. सब मिलकर खाना खाएंगे. बताओ क्या बनाऊं?”

“मम्मी, मेरा दिल कर रहा है आज पापा के लिए छोले बनाऊं. आपको याद है न, पापा को आपके हाथ से ज़्यादा मेरे हाथ के बने छोले अच्छे लगते हैं.” संपदा के हाथ में बहुत स्वाद है, यह मैं जानती हूं, इसलिए मुझे उसकी गर्वीली आवाज़ पर हंसी आ गई.

“मम्मी, आज कमलाबाई नहीं आई?”

“नहीं, उसकी बेटी बीमार है, कल आएगी.” संपदा मेरे पीछे-पीछे किचन में आ गई. “लाओ मम्मी, मिलकर काम निपटाते हैं.” मैंने कहा, “तुम यह सब छोड़ो, तुम जाकर मेरे रूम में टेबल पर देखो, नई पत्रिका आई है. उसमें मेरी वह कहानी छपी है, जो तुम्हें बहुत पसंद आई थी.” मैं उसे किचन से हटाना चाहती थी.

“अरे! सच मम्मी, वह तो बड़ी अच्छी कहानी थी, मैं अभी देखती हूं. वैसे भी मसालों की ख़ुशबू से मुझे अजीब-सी फीलिंग होती है. मम्मी, हमारे आने से आपका काम बढ़ जाता है न?” संपदा की आवाज़ में शर्मिंदगी-सी थी.

“यह काम बढ़ने से मुझे और तुम्हारे पापा को जो ख़ुशी होती है, उसका अंदाज़ा तुम लोग नहीं लगा सकतीं.”

“मम्मी, मुझ पर भी कोई कहानी लिखो न.”

“अच्छा ठीक है, लिखूंगी. अब तुम आराम करो, और हां, सुखदा को फोन कर लो.”

संपदा मेरे रूम की ओर बढ़ी, तो मैंने बिजली की तेज़ी से अपना काम शुरू कर दिया. हाथ अपना काम कर रहे थे और मन अपना. दो ही बेटियां हैं हमारी, यह तो ईश्‍वर की कृपा है, जो दोनों इसी शहर में हैं. दोनों आती-जाती रहती हैं. हम दोनों का काम ही कितना था. इसलिए समय मिलने के कारण मेरा लिखने का शौक़ भी ज़ोरों पर था. कई पत्रिकाओं में मेरी कहानियां छपती थीं,  जिसकी सबसे बड़ी प्रशंसक और आलोचक मेरी बेटियां ही थीं. नवीन तो शाम को ही आते थे. सच तो यह है कि मेरे इस शौक़ ने मेरे अकेलेपन को बड़ा सहारा दिया था, क्योंकि बेटियोंवाली मांओं को तो आदत होती है न कि हर समय घर में गपशप और रौनक़ का माहौल हो, इसलिए संपदा के विवाह के फ़ौरन बाद मैं बहुत घबराई, लेकिन फिर धीरे-धीरे ख़ुद को संभालकर अपने आप को व्यस्त कर ही लिया था.

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रात में मेरी बेटियां-दामाद इकट्ठा हुए, सुखदा के बेटे शौर्य ने ख़ूब रौनक़ लगा रखी थी. नवीन दोनों दामादों के साथ बातों में व्यस्त थे. हम तीनों बेडरूम में आ गए. शौर्य ने नवीन की गोद में डेरा जमा रखा था. सुखदा अपने पापा की तरह हर बात साफ़-साफ़ करती थी. अब तो वह और भी बोल्ड हो गई थी, लेकिन संपदा मेरी तरह बहुत ही सोच-समझकर बोलनेवाली थी. इस बात का ध्यान रखती थी कि सामनेवाले को कोई बात बुरी न लगे. अपनी परेशानी जल्दी शेयर नहीं करती थी, इसलिए मुझे उसकी चिंता रहती थी.

सुखदा ने संपदा से उसकी ससुराल के हाल पूछे, तो वह बताने लगी कि कैसे पिछली बार जब उसकी ननदें आईं, तो सुभद्रा देवी उसे खाने का लंबा-चौड़ा मेनू बताकर अपनी बेटियों के साथ शॉपिंग पर निकल गईं. विजय उसकी तबीयत देखकर कहता ही रह गया कि वह खाना बाहर से ले आएगा, लेकिन सुभद्रा देवी ने उसे बुरी तरह डांटा कि बेकार के नखरे उठाने की ज़रूरत नहीं है. मैं और सुखदा उसकी बात सुनकर दुखी होते रहे और साथ ही उसे समझाते भी रहे. डिनर हो ही चुका था, दोनों बेटियां चली गईं.

एक दिन हमने डिनर शुरू ही किया था कि विजय का फोन आया. संपदा की तबीयत ठीक नहीं है, उसे हॉस्पिटल ले जा रहे हैं. हम तुरंत वहां पहुंचे, संपदा के सास-ससुर भी वहीं थे. मैंने बेचैनी से पूछा, “क्या हुआ? अभी तो काफ़ी टाइम है डिलीवरी में.”

सुभद्रा देवी जैसे भरी बैठी थीं, “होना क्या है. आजकल की लड़कियां हैं ही नाज़ुक, ज़रा-सी गर्मी और ज़रा-सा काम सहन नहीं होता इनसे. हम लोग कितना काम करते थे, न ए.सी. था, न कूलर. इस पीढ़ी में तो जैसे जान ही नहीं है.”

मैंने नवीन का उड़ा हुआ चेहरा देखा, उनकी तो जैसे अपनी बेटियों में जान थी. सुखदा अक्सर कहती थी, कितने मजबूर होते हैं लड़कियों के माता-पिता भी. उनकी बेटी के बारे में ससुरालवाले न जाने क्या-क्या कह जाते हैं और वे पलटकर जवाब भी नहीं दे सकते.

इतने में संपदा की डॉक्टर बाहर आई, विजय से कहने लगी, “हालत देखी है आपने अपनी पत्नी की. इतना ब्लड प्रेशर, उसके खाने-पीने का बहुत ध्यान रखिएगा. अब उसे टोटल बेडरेस्ट की ज़रूरत है. शाम तक आप उसे घर ले जा सकते हैं.” सुभद्रा देवी से रहा नहीं गया, “लो, अब यह नया ड्रामा. एक तो डॉक्टरों ने इन लड़कियों का दिमाग़ ख़राब कर रखा है. बड़ी फीसें दो, लंबी-लंबी बातें सुनो. बस, नए ज़माने के नए-नए रंग.” अपनी मां की बातें सुनकर विजय शर्मिंदा-सा दिखा. मैंने दबी आवाज़ में कहा, “बहनजी, आप आज्ञा दें, तो मैं कुछ दिनों के लिए संपदा को अपने घर ले जाऊं?”

जैसे बिल्ली के भाग से छीका टूटा, फ़ौरन बोलीं, “हां, यह ठीक है. मां के घर जैसा आराम उसे कहां मिलेगा? कुछ ऊंच-नीच हो गई, तो सब कहेंगे, सास ने ध्यान नहीं रखा.”

“लेकिन मां, हम फुलटाइम मेड रख लेंगे, तो संपदा को आराम मिल जाएगा.” विजय ने कहा तो सुभद्रा देवी ने उसे घूरा.

हम संपदा को घर ले आए. मैं व्यस्त हो गई. विजय रोज़ शाम को चक्कर लगा लेता था. कभी-कभी सुभद्रा देवी भी आ जाती थीं. संपदा के चेहरे का पीलापन कुछ कम हो रहा था. अब वह आराम से थी. नवीन के तो जैसे पुराने दिन लौट आए थे. पिता-पुत्री ख़ूब बातें करते.

कठिन से कठिन समय में भी यह ख़ूबी होती है कि वह बीत ही जाता है और संपदा का कठिन समय भी बीत ही गया. आख़िर वह ख़ुशी का दिन आ ही गया, जब संपदा एक प्यारे से बेटे की मां बन गई. सारा परिवार ख़ुशी से खिला जा रहा था. सुभद्रा देवी का मूड भी अच्छा था. बेटे का नाम पार्थ रखा गया.

समय बीतता रहा, स्थितियां बहुत तेज़ी से बदल गई थीं. सुभद्रा देवी अपनी बीमारी के कारण घर के मामलों से दूर-सी हो गई थीं. मैंने कई बार संपदा में आनेवाले परिवर्तनों को नोट किया था. वह अब चुपचाप-सी रहने लगी थी. धीरे-धीरे वह सुभद्रा देवी की बहू बनती जा रही थी.

समय का पंछी अपनी गति से उड़ता जा रहा था. संपदा के सास-ससुर नहीं रहे थे. सुखदा-संपदा के बच्चे बड़े हो गए थे. नवीन रिटायर हो चुके थे. हम दोनों जीवन की सांध्य बेला अपनी बेटियों को फलते-फूलते देखकर संतोष से बिता रहे थे. शौर्य अपनी पत्नी के साथ अमेरिका में था. पार्थ अपनी पत्नी मानसी के साथ संपदा और विजय के साथ रहता था. संपदा कुकिंग में और माहिर हो गई थी. अब तो वह बड़े से बड़े शेफ को मात देती थी. घर में किसी न किसी बहाने पार्टी करती ही रहती थी. हम दोनों को भी आकर ज़बरदस्ती ले जाती थी.

एक दिन संपदा सुबह-सुबह आई, मैंने पूछा, “मानसी कैसी है?”

“अरे मम्मी, क्या हुआ है उसकी तबीयत को? वह तो नॉर्मल है. बस, कुछ लड़कियों की आदत होती है, हर बात को बढ़ा-चढ़ाकर बताने की.” संपदा का स्वर ही नहीं, ढंग भी बदला हुआ था.

“लेकिन संपदा, यह बीमारी तो नहीं है. हर लड़की इन दिनों शारीरिक और मानसिक परिवर्तनों का सामना करती है. इसलिए पहली बार मां बननेवाली लड़की अक्सर घबरा जाती है. तुम उसका ख़्याल रखा करो.” मैंने उसे समझाया.

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“मैं क्या ध्यान रखूं, वह है न उसका ध्यान रखनेवाला मुफ़्त का ग़ुलाम पार्थ. आज सुबह मानसी नाश्ते के लिए नहीं उठी, तो मैंने पार्थ से पूछा तो बोला कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है. कमज़ोरी के कारण उठा नहीं जा रहा है. मम्मी, मेरा मूड इतना ख़राब हुआ क्या बताऊं. वह पार्थ को बेवकूफ़ बना सकती है, मुझे नहीं. उसके रोज़-रोज़ के नाटक मैं ख़ूब समझती हूं. आज पूरा दिन लंच और डिनर बनाएगी, तो दिमाग़ ठीक हो जाएगा. इसलिए मैं तो सुबह-सुबह ही यहां आ गई.” ग़ुस्से में तेज़-तेज़ बोलती संपदा मुझे कठोर-सी लगी.

ऐसा होता है न कि अगर किसी ने हमें जीवन में बहुत कष्ट पहुंचाया हो, तो मौक़ा मिलने पर हम भी दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं, जबकि होना तो यह चाहिए कि जिन कष्टों से हम गुज़र चुके हैं, वे दूसरों को न दें. मैं सोचती रही और संपदा उठकर सुखदा को फोन करने लगी. थोड़ी देर में सुखदा आ गई. सुखदा तो अकेली रहती थी. उसे आना अच्छा ही लगा, शाम होते-होते दोनों चली गईं. मैं मन ही मन अपनी बेटी के कठोर होते हृदय पर दुखी होती रही. नवीन सब ठीक हो जाएगा, कहकर मुझे तसल्ली देते रहते. मैं जानती थी कि मन ही मन अपनी बेटी की बदलती सोच पर वे भी दुखी थे. फिर एक दिन संपदा अचानक आई. कहने लगी, “मम्मी, संडे को एक पार्टी रख रही हूं. आप और पापा डिनर वहीं करना, मैं पार्थ को आप दोनों को लेने भेज दूंगी.”

“मगर बेटा, किस ख़ुशी में?” मैंने हैरानी से पूछा.

“बहुत दिन हो गए, सब मिलकर बैठे नहीं, सुखदा और रवि जीजाजी भी आ जाएंगे. विजय के कुछ दोस्त भी होंगे.”

मैंने पूछा,“खाना बाहर से आएगा?”

“बाहर से क्यों? हर चीज़ घर पर बनेगी.”

“लेकिन मानसी की तबीयत कितनी ख़राब चल रही है. तुम कुछ महीनों के लिए ये पार्टियां छोड़ दो तो अच्छा ही होगा. घर पर पार्टी हो, तो काम पर काम निकलता ही रहता है. मानसी का ध्यान रखो, उसे आराम करने दो.” मैंने कहा तो वह कुछ बुरा मान गई. बोली, “आपको उसकी बड़ी चिंता रहती है. मैं भी तो इस हालत में कितना काम करती थी. याद है न आपको और यहां तो खाना मैं ख़ुद ही बना रही हूं. उसे कहां आता है इतना कुछ बनाना.” उसके स्वर में मज़ाक था. मुझे अच्छा नहीं लगा. मैंने चुपचाप उसकी तरफ़ देखा, उस समय वह मेरी बेटी नहीं, बल्कि स़िर्फ सुभद्रा देवी की बहू लग रही थी. बिल्कुल उन्हीं की जैसी, बस अपनी परवाह करनेवाली, अपने लिए सोचनेवाली.

मेरे जीवन में तो सास-बहू के रिश्ते की कटुता कहीं थी ही नहीं. नवीन के माता-पिता जब तक रहे, मैंने हमेशा उन्हें आदर दिया था और बदले में मुझे पुरस्कार के रूप में मिलता रहा उनका ढेर सारा स्नेह और आशीर्वाद.

“अच्छा मम्मी, मैं जा रही हूं. आप दोनों आ जाना.” संपदा ने कहा तो मैंने एकदम एक निर्णय ले लिया. मैंने दृढ़ स्वर में कहा, “रुको बेटा, तुम हमेशा से कहती थी न कि मेरे ऊपर कहानी लिखो मम्मी.”

“हां मम्मी, मगर वह तो बहुत पुरानी बात हो गई.”

“तुम्हारी कहानी मैंने लिखी तो थी, उस कहानी में तो मेरे अनुभवों, स्नेह और आंसुओं का रंग भी शामिल हो गया था, लेकिन मैंने उसका अंत नहीं किया था. कई दिन यही सोचने में बीत गए हैं कि कहानी का अंत कैसे करूं कि यह ख़ूबसूरत भी हो जाए और पूरी भी.” मैं संपदा का हाथ पकड़ककर उसे अपने कमरे में ले गई और अपनी फाइल निकालकर उसे दे दी. लो, इसे पढ़ो और बताओ कि मैं इस कहानी का अंत कैसे करूं.” मैं फाइल उसे देकर कमरे से बाहर आ गई. बहुत देर बाद जब रोई-रोई आंखोंवाली संपदा आकर मुझसे लिपटी, तो मुझे विश्‍वास हो गया कि इस कहानी को एक नया अंत मिल गया है और मानसी संपदा जैसा जीवन बिताकर एक और संपदा नहीं बनेगी, जो सुभद्रा देवी जैसी है. क्योंकि स्त्री हमेशा ही स्त्री की दुश्मन नहीं होती, बल्कि उसकी हमदर्द और दोस्त भी हो सकती है. मैंने भावुक होकर अपनी बेटी को गले से लगा लिया. बहुत दिनों बाद ऐसा लगा, जैसे मेरे सामने सुभद्रा देवी की बहू नहीं, मेरी बेटी है.

Poonam Ahmed

     पूनम अहमद

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