Short Story

एक गांव में मन्थरक नाम का जुलाहा यानी बुनकर रहता था. वो मेहनत से अपना काम करता था पर वो बेहद गरीब था. एक बार जुलाहे के उपकरण, जो कपड़ा बुनने के काम आते थे, टूट गए. जुलाहा चाहता था जल्द से जल्द उपकरण बनजाएं ताकि उसका परिवार भूखा ना रहे, लेकिन उपकरणों को फिर बनाने के लिये लकड़ी की जरुरत थी. जुलाहा लकड़ीकाटने की कुल्हाड़ी लेकर समुद्र के पास वाले जंगल की ओर चल पड़ा. बहुत ढूंढ़ने पर भी उसे अच्छी लकड़ी नहीं मिली तबउसने समुद्र के किनारे पहुंचकर एक वृक्ष देखा, उसकी लकड़ी उत्तम थी तो उसने सोचा कि इसकी लकड़ी से उसके सबउपकरण बन जाएंगे. लेकिन जैसे ही उसने वृक्ष के तने में कुल्हाडी़ मारने के लिए हाथ उठाया, उसमें से एक देव प्रकट हएऔर उसे कहा, मैं इस वृक्ष में वास करता हूं और यहां बड़े ही आनन्द से रहता हूं और यह पेड़ भी काफ़ी हराभरा है तो तुम्हेंइस वृक्ष को नहीं काटना चाहिए. 

जुलाहे ने कहा, मैं बेहद गरीब हूं और इसलिए लाचार हूं, क्योंकि इसकी लकड़ी के बिना मेरे उपकरण नहीं बनेंगे, जिससे मैंकपड़ा नहीं बुन पाऊंगा और मेरा परिवार भूखा मर जाएगा. आप किसी और वृक्ष का आश्रय ले लो. 

देव ने कहा, मन्थरक, मैं तुम्हारे जवाब से प्रसन्न हूं, इसलिए अगर तुम इस पेड़ को ना काटो तो मैं तुम्हें एक वरदान दूंगा, तुममांगो जो भी तुमको चाहिए. 

मन्थरक सोच में पड़ गया और बोला, मैं अभी घर जाकर अपनी पत्‍नी और मित्र से सलाह करता हूं कि मुझे क्या वर मांगना चाहिए. 

देव ने कहा, तुम जाओ मैं तब तक तुम्हारी प्रतीक्षा करता हूं. 

गांव में पहुंचने पर मन्थरक की भेंट अपने एक मित्र नाई से हो गई. उसने दोस्त को सारा क़िस्सा सुनाया और पूछा, मित्र, मैं तुमसे सलाह लेने ही आया हूं कि मुझे क्या वरदान मांगना चाहिए.

नाई ने कहा, क्यों ना तुम देव से एक पूरा राज्य मांग को, तुम वहां के राजा बन जाना और मैं तुम्हारा मन्त्री बन जाऊंगा. जीवन में सुख ही सुख होगा.

Panchatantra Story
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मन्थरक को मित्र की सलाह अच्छी लगी लेकिन उसने नाई से कहा कि मैं अपनी पत्‍नी से सलाह लेने के बाद ही वरदान का निश्चय करुंगा. मंथरक को नाई ने कहा कि मित्र तुम्हारी पत्नी लोभी और स्वार्थी है, वो सिर्फ़ अपना भला और फायदा ही सोचेगी. 

मन्थरक ने कहा, मित्र जो भी है आख़िर मेरी पत्नी है वो तो उसकी सलाह भी ज़रूरी है. घर पहुंचकर वह पत्‍नी से बोला, जंगल में आज मुझे एक देव मिले है और वो मुझसे खुश होकर एक वरदान देना चाहते हैं, बदले में मुझे उस पेड़ को नहीं काटना है. नाई की सलाह है कि मैं राज्य मांग लूं और राजा बनकर सुखी जीवन व्यतीत करूं, तुम्हारी क्या सलाह है?

पत्‍नी ने उत्तर दिया, राज्य-शासन का काम इतना आसान नहीं है, राजा की अनेकों जिम्मेदारियाँ होती हैं, पूरे राज्य और जनता की सोचनी पड़ती है. इसमें सुख कम और कष्ट ज़्यादा हैं. 

मन्थरक को पत्नी की बात जम गई और वो बोला, बात तो बिलकुल सही है. राजा राम को भी राज्य-प्राप्ति के बाद कोई सुख नहीं मिला था, हमें भी कैसे मिल सकता है ? किन्तु राज्य की जगह वरदान में क्या मांगा जाए?

मन्थरक की पत्‍नी ने कहा, तुम सोचो कि तुम अकेले दो हाथों से जितना कपड़ा बुनते हो, उससे गुज़र बसर हो जाता है, पर यदि तुम्हारे एक सिर की जगह दो सिर हों और दो हाथ की जगह चार हाथ हों, तो तुम दुगना कपड़ा बुन पाओगे वो भी तेज़ीसे, इससे ज़्यादा काम कर पाओगे और ज़्यादा कमा भी पाओगे, जिससे पैसे ज़्यादा आएंगे और हमारी ग़रीबी दूर होजाएगी. 

मन्थरक को पत्‍नी की बात इतनी सही लगी कि वो वृक्ष के पास वह देव से बोला, मैंने सोच लिया है, आप मुझे यह वर दो कि मेरे दो सिर और चार हाथ हो जाएं. 

मन्थरक की बात सुन देव ने उसे उसका मनचाहा वरदान दे दिया और उसके अब दो सिर और चार हाथ हो गए. वो खुशहोकर गांव की तरफ़ चल पड़ा, लेकिन इस बदली हुई हालत में जब वह गांव  में आया, तो लोग उसे देखकर डर गए और लोगों ने उसे राक्षस समझ लिया. सभी लोग राक्षस-राक्षस कहकर सब उसे मारने दौड़ पड़े और लोगों ने उसको पत्थरों सेइतना मारा कि वह वहीं मर गया

सीख: यदि मित्र समझदार हो और उसकी सलाह सही लगे, तो उसे मानो. अपनी बुद्धि से काम लो और सोच-समझकर ही कोई निर्णय लो. बेवक़ूफ़ की सलाह और उसपे अमल आपको हानि ही पहुंचाएगी. 

एक गांव में युधिष्ठिर नाम का कुम्हार रहता था. एक दिन वह शराब के नशे में घर आया तो अपने घर पर एक टूटे हुए घड़े से टकराकर गिर पड़ा और उस घड़े के जो टुकड़े जमीन पर बिखरे हुए थे, उनमें से एक नुकीला टुकड़ा कुम्हार के माथे में घुस गया, जिससे उस स्थान पर गहरा घाव हो गया. वो घाव इतना गहरा था कि उसको भरने में काफ़ी लंबा समय लगा. घाव भर तो गया था लेकिन कुम्हार के माथे पर हमेशा के लिए निशान बन गया था.

कुछ दिनों बाद कुम्हार के गांव में अकाल पड़ गया था, जिसके चलते कुम्हार गांव छोड़ दूसरे राज्य में चला गया. वहां जाकर वह राजा के दरबार में काम मांगने गया तो राजा की नज़र उसके माथे के निशान पर पड़ी. इतना बड़ा निशान देख राजा ने सोचा कि अवश्य की यह कोई शूरवीर योद्धा है. किसी युद्ध के दौरान ही इसके माथे पर यह चोट लगी है.

राजा ने कुम्हार को अपनी सेना में उच्च पद दे दिया. यह देख राजा के मंत्री और सिपाही कुम्हार से ईर्ष्या करने लगे. लेकिन वो राजा का विरोध नहीं कर सकते थे, इसलिए चुप रहे. कुम्हार ने भी भी बड़े पद के लालच में राजा को सच नहीं बताया और उसने सोचा अभी तो चुप रहने में ही भलाई है!

समय बीतता गया और एक दिन अचानक पड़ोसी राज्य ने आक्रमण कर दिया. राजा ने भी युद्ध की तैयारियां शुरू कर दी. राजा ने युधिष्ठिर से भी कहा युद्ध में भाग लेने को कहा और युद्ध में जाने से पहले उससे पूछना चाहा कि उसके माथे पर निशान किस युद्ध के दौरान बना, राजा ने कहा- हे वीर योद्धा! तुम्हारे माथे पर तुम्हारी बहादुरी का जो प्रतीक है, वह किस युद्ध में किस शत्रु ने दिया था?

Panchatantra Ki Kahani
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तब तक कुम्हार राजा का विश्वास जीत चुका था तो उसने सोचा कि अब राजा को सच बता भी दिया तो वो उसका पद उससे नहीं छीनेंगे क्योंकि वो और राजा काफ़ी क़रीब आ चुके थे. उसने राजा को सच्चाई बता दी कि महाराज, यह निशान मुझे युद्ध में नहीं मिला है, मैं तो एक मामूली गरीब कुम्हार हूं. एक दिन शराब पीकर जब मैं घर आया, तो टूटे हुए घड़े से टकराकर गिर पड़ा. उसी घड़े का एक नुकीले टुकड़ा मेरे माथे में गहराई तक घुस गया था जिससे घाव गहरा हो गया था और यह निशान बन गया.

राजा सच जानकर आग-बबूला हो गया. उसने कुम्हार को पद से हटा दिया और उसे राज्य से भी निकल जाने का आदेश दिया. कुम्हार मिन्नतें करता रहा कि वह युद्ध लड़ेगा और पूरी वीरता दिखाएगा, अपनी जान तक वो राज्य की रक्षा के लिए न्योछावर कर देगा, लेकिन राजा ने उसकी बात नहीं सुनी और कहा कि तुमने छल किया और कपट से यह पद पाया. तुम भले ही कितने की पराक्रमी और बहादुर हो, लेकिन तुम क्षत्रियों के कुल के नहीं हो. तुम एक कुम्हार हो . तुम्हारी हालत उस गीदड़ की तरह है जो शेरों के बीच रहकर खुद को शेर समझने लगता है लेकिन वो हाथियों से लड़ नहीं सकता! इसलिए जान की परवाह करो और शांति से चले जाओ वर्ना लोगों को तुम्हारा सच पता चलेगा तो जान से मारे जाओगे. मैंने तुम्हारी जान बख्श दी इतना ही काफ़ी है!

कुम्हार चुपचाप निराश होकर वहां से चला गया.

सीख: सच्चाई ज़्यादा दिनों तक छिप नहीं सकती इसलिए हमेशा सच बोलकर सत्य की राह पर ही चलना चाहिए. झूठ से कुछ समय के लिए फ़ायदा भले ही हो लेकिन आगे चलकर नुक़सान ही होता है. इतना ही नहीं कभी भी घमंड में और अपने फ़ायदे के लिए सुविधा देखकर सच बोलना भारी पड़ता है!

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अकबर जानते थे कि बीरबल के पास हर सवाल का जवाब है और वो बीरबल की बुद्धिमत्ता से भी काफ़ी प्रभावित थे. फिर भी वो समय-समय पर उसे परखते रहते थे और अपने मन में आए सवालों के जवाब मांगते रहते थे. इन दोनों का ऐसा ही एक रोचक किस्सा है,  जिसमें अकबर ने बीरबल से ईश्वर से जुड़े तीन प्रश्न पूछे थे.
वो तीन प्रश्न थे-
1. ईश्वर कहां रहता है ?
2. ईश्वर कैसे मिलता है ?
3. ईश्वर करता क्या है?
जब अकबर ने ये प्रश्न पूछे तो बीरबल बहुत हैरान हुए और उन्होंने कहा कि इन प्रश्नों के उत्तर वह कल बताएंगे. इतना कहकर बीरबल घर लौट आए. बीरबल इन प्रश्नों को लेकर काफ़ी सोच-विचार कर रहे थे, जिसे देख बीरबर के पुत्र ने चिंता का कारण पूछा. बीरबल ने अकबर के तीन प्रश्नों का क़िस्सा बता दिया.

बीरबल के पुत्र ने कहा कि परेशान ना हों वह खुद कल दरबार में बादशाह को इन तीनों प्रश्नों के जवाब देगा और अगले दिन बीरबल अपने पुत्र के साथ दरबार में पहुंचे. बीरबल ने बादशाह से कहा कि आपके तीनों प्रश्नों के जवाब तो मेरा पुत्र भी दे सकता है.

अकबर ने कहा, ठीक है, तो सबसे पहले बताओ कि ईश्वर कहां रहता है?

प्रश्न सुनकर बीरबल के पुत्र ने चीनी मिला हुआ दूध मंगाया और उसने वह दूध अकबर को दिया और कहा कि चखकर बताइए दूध कैसा है?

अकबर ने दूध चखकर बताया कि यह मीठा है.

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इस पर बीरबल के पुत्र ने कहा कि क्या आपको इसमें चीनी दिख रही है?

अकबर ने कहा, नहीं, चीनी तो नहीं दिख रही है, वह तो दूध में घुली हुई है.

बीरबल के पुत्र ने कहा, जहांपनाह, ठीक इसी तरह ईश्वर भी संसार की हर चीज़ में घुला हुआ है, लेकिन दूध में घुली हुई चीनी की तरह दिखाई नहीं देता है.

बादशाह अकबर जवाब से संतुष्ट हो गए.

अकबर ने दूसरा प्रश्न पूछा, ठीक है तो अब ये बताओ कि ईश्वर कैसे मिलता है?

इस प्रश्न का जवाब देने के लिए बीरबल के पुत्र ने इस बार दही मंगवाया और अकबर को दही देते हुए कहा, जहांपनाह, क्या आपको इसमें मक्खन दिखाई दे रहा है?

अकबर ने कहा, दही में मक्खन तो है, लेकिन दही मथने पर ही मक्खन दिखाई देगा.

बीरबल के पुत्र ने कहा, जी हां, ठीक इसी प्रकार ईश्वर भी मन का मंथन करने पर ही मिल सकते हैं.

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बादशाह अकबर इस जवाब से भी संतुष्ट हो गए.

अकबर ने तीसरा प्रश्न पूछा, ईश्वर करता क्या है?

बीरबर के पुत्र ने कहा, इस प्रश्न के जवाब के लिए आपको मुझे गुरु मानना होगा.

बादशाह अकबर ने कहा, ठीक है, अब से तुम मेरे गुरु और मैं तुम्हारा शिष्य.

बीरबल के पुत्र ने आगे कहा, गुरु हमेशा ऊंचे स्थान पर बैठता है और शिष्य हमेशा नीचे बैठता है.

बादशाह अकबर तुरंत ही अपने सिंहासन से उठ गए और बीरबल के पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर खुद नीचे बैठ गए.

सिंहासन पर बैठते ही बीरबल के पुत्र ने कहा, जहांपनाह, यही आपके तीसरे प्रश्न का जवाब है. ईश्वर राजा को रंक बनाता है और रंक को राजा बना देता है.

बादशाह अकबर इस जवाब से भी संतुष्ट हो गए और बीरबल के पुत्र की बुद्धिमत्ता से प्रभावित हो उसको ईनाम दिया!

सीख: धैर्य और सूझबूझ से हर प्रश्न का जवाब और हर समस्या का हल पाया जा सकता है!

एक जंगल में महाचतुरक नामक सियार रहता था. वो बहुत तेज़ बुद्धि का था और बेहद चतुर था. एक दिन जंगल में उसने एक मरा हुआ हाथी देखा, अपने सामने भोजन को देख उसकी बांछे खिल गईं, लेकिन जैसे ही उसने हाथी के मृत शरीर पर दांत गड़ाया, चमड़ी मोटी होने की वजह से, वह हाथी को चीरने में नाकाम रहा.
वह कुछ उपाय सोच ही रहा था कि उसे सामने से सिंह आता दिखाई दिया, सियार ने बिना घबराए आगे बढ़कर सिंह का स्वागत किया और हाथ जोड़कर कहा- स्वामी आपके लिए ही मैंने इस हाथी को मारकर रखा है, आप इसका मांस खाकर मुझ पर उपकार करें! सिंह ने कहा- मैं किसी और के हाथों मारे गए जीव को खाता नहीं हूं, इसे तुम ही खाओ.
सियार मन ही मन खुश तो हुआ, पर उसकी हाथी की चमड़ी को चीरने की समस्या अब भी हल न हुई थी. थोड़ी देर में उस तरफ से एक बाघ भी आता नज़र आया. बाघ ने मरे हाथी को देखकर अपने होंठ पर जीभ फिराई, तों सियार ने उसकी मंशा भांपते हुए कहा- मामा, आप इस मृत्यु के मुंह में कैसे आ गए? सिंह ने इसे मारा है और मुझे इसकी रखवाली करने को कह गया है. एक बार किसी बाघ ने उनके शिकार को जूठा कर दिया था, तब से आज तक वे बाघ जाति से नफरत करने लगे हैं. आज तो हाथी को खाने वाले बाघ को वह मार ही गिराएंगे.
यह सुनते ही बाघ डर गया और फ़ौरन वहां से भाग खड़ा हुआ. थोड़ी ही देर में एक चीता आता हुआ दिखाई दिया, तो सियार ने सोचा कुछ तो ऐसा करूं कि यह हाथी की चमड़ी भी फाड़ दे और मांस भी न खा पाए!

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उसने चीते से कहा- मेरे प्रिय भांजे, इधर कैसे? क्या बात है कुछ भूखे भी दिखाई पड़ रहे हो? सिंह ने इस मरे हुए हाथी की रखवाली मुझे सौंपी है, पर तुम इसमें से कुछ मांस खा सकते हो. मैं तुम्हें सावधान कर दूंगा, जैसे ही सिंह को आता हुआ देखूंगा, तुम्हें सूचना दे दूंगा, तुम फ़ौरन भाग जाना. ऐसे तुम्हारा पेट भी भर जाएगा और जान भी बच जाएगी!
चीते को सियार की बात और योजना अच्छी तो लगी लेकिन डर के कारण उसने पहले तो मांस खाने से मना कर दिया, पर सियार के विश्वास दिलाने पर वो तैयार हो गया. सियार मन ही मन प्रसन्न था कि चीते के तेज़ दांत उसका काम कर देंगे! चीते ने पलभर में हाथी की चमड़ी फाड़ दी पर जैसे ही उसने मांस खाना शुरू किया, दूसरी तरफ देखते हुए सियार ने घबराकर कहा- जल्दी भागो सिंह आ रहा है.
इतना सुनते ही चीता बिना देर किए सरपट भाग खड़ा हुआ. सियार बहुत खुश हुआ और उसने कई दिनों तक उस विशाल हाथी का मांस खाकर दावत उड़ाई!

उस सियार ने अपनी चतुराई और सूझ-बूझ से बड़ी ही आसानी से अपने से बलवान जानवरों का सामना करते हुए उन्हीं के ज़रिए अपनी समस्या का हल निकाल लिया!

सीख: बुद्धि का बल शरीर के बल से कहीं बड़ा होता है और अगर सूझबूझ से काम किया जाए तो कठिन से कठिन समस्या आसानी से हल हो सकती है! इसलिए समस्या देखकर या ख़तरा देखकर घबराने की बजाए चतुराई से काम लें!

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रोज़ की तरह बादशाह अकबर के दरबार की कार्यवाही चल रही थी, सभी अपनी-अपनी समस्याएं लेकर आ रहे थे, जिनका समाधान बादशाह कर रहे थे. इसी बीच एक दरबारी हाथ में शीशे का एक मर्तबान लिए वहां आया, तो बादशाह ने हैरानी से पूछा कि क्या है इस मर्तबान में ?

वह बोला, महाराज इसमें रेत और चीनी का मिश्रण है.
बादशाह ने पूछा कि वह किसलिए ?

दरबारी ने कहा महाराज मैं माफी चाहता हूं, लेकिन दरबारी हमने बीरबल की बुद्धिमत्ता की इतनी बातें सुनी हैं तो हम बीरबल की क़ाबिलियत को परखना चाहते हैं. हम चाहते हैं कि वह रेत से चीनी का दाना-दाना अलग कर दे लेकिन बिना पानी के प्रयोग के.
बादशाह बीरबल से मुखातिब हुए और मुस्कुराते हुए बोले- बीरबल, रोज ही तुम्हारे सामने एक नई समस्या रख दी जाती, तुम्हें बिना पानी में घोले इस रेत में से चीनी को अलग करना है.
बीरबल ने बड़े आराम से कहा- कोई समस्या नहीं जहांपना, यह तो मेरे बाएं हाथ का काम है.
यह कहकर बीरबल ने वह मर्तबान उठाया और दरबार से बाहर का रुख़ किया. बाकी दरबारी भी पीछे थे.

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बीरबल बाहर बाग में पहुंचकर रुके और मर्तबान से भरा सारा मिश्रण आम के एक बड़े पेड़ के चारों ओर बिखेर दिया.
इस व्यक्ति ने पूछा कि यह तुम क्या कर रहे हो ?
बीरबल ने कहा- यह तुम्हें कल पता चलेगा. इसके बाद सभी दरबार में लौट आए.
अगले दिन सुबह फिर वे सभी उस आम के पेड़ के निकट जा पहुंचे और सब हैरान थे कि वहां अब केवल रेत पड़ी थी, चीनी के सारे दाने चींटियां बटोरकर अपने बिलों में पहुंचा चुकी थीं. कुछ चींटियां अभी भी चीनी के दाने घसीटकर ले जाती दिखाई दे रही थीं.
उस व्यक्ति ने पूछा कि लेकिन सारी चीनी कहां चली गई ?
बीरबल ने धीरे से उसके कान फुसफुसाकर कहा- रेत से अलग हो गई.

यह सुनकर सभी जोरों से हंस पड़े और वह व्यक्ति छोटा सा मुंह लेकर वहां से खिसक लिया.
बादशाह अकबर समेत सभी दरबारी बीरबल की चतुराई का गुणगानकरने लगे.

सीख: अगर कोई गुणी और चतुर है तो उससे सीख लो, ना कि ईर्ष्या करो, क्योंकि किसी को नीचा दिखाने का प्रयास आपके लिए हानिकारक हो सकता है.

मित्र की सलाह
बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में एक धोबी रहता था लेकिन वो बहुत कंजूस था. उसका एक गधा था, धोबी दिनभर उससे काम कराता और वो गधा दिनभर कपडों के गट्ठर इधर से उधर ढोने में लगा रहता. धोबी ना सिर्फ़ कंजूस था बल्कि निर्दयी भी था. अपने गधे को वो भूखा ही रखता था और उसके लिए चारे का प्रबंध नहीं करता था. बस रात को उसे चरने के लिए खुला छोड देता था. लेकिन पास में कोई चरागाह भी नहीं था इसलिए गधा बहुत कमज़ोर और दुर्बल हो गया था.
एक रात वो गधा चारे की तलाश में घूम रहा था तो उसकी मुलाकात एक गीदड़ से हुई. गीदड़ ने उससे पूछा कि वो इतना कमज़ोर क्यों है?
गधे ने अपना दुख उसे बताया कि कैसे उसे दिन भर काम करना पडता है और उसका मालिक उसे खाने को कुछ नहीं देता, इसलिए वो रात को अंधेरे में खाने की तलाश करता रहता है.
गीदड़ बोला, मित्र अब तुम्हें घबराने की बात नहीं, समझो अब तुम्हारे दुःख और भुखमरी के दिन ख़त्म. यहां पास में ही एक बड़ा सब्जियों और फलों का बाग़ है. वहां तरह-तरह की सब्जियां और मीठे फल उगे रहते हैं. हर तरह की सब्ज़ी और फल की बहार है. मैंने बाग़ में घुसने का गुप्त मार्ग भी बना रखा है. मैं तो हर रात अंदर घुसकर छककर खाता हूं. तुम भी मेरे साथ आया करो.
बस फिर क्या था गधा भी गीदड़ के साथ हो लिया और बाग़ में घुसकर महीनों के बाद पहली बार गधे ने भरपेट खाना खाया. अब यह हर रात का सिलसिला हो गया था. दोनों रात भर बाग़ में ही रहये और दिन निकलने से पहले गीदड़ जंगल की ओर चला जाता और गधा अपने धोबी के पास आ जाता.
धीरे-धीरे गधे की कमज़ोरी दूर होने लगी, उसका शरीर भरने लगा, बालों में चमक आने लगी और वो खुश रहने लगा, क्योंकि वो अपनी भुखमरी के दिन बिल्कुल भूल गया था.

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एक रात खूब खाने के बाद गधे का मूड काफ़ी अच्छा हो गया और वो झूमने लगा. वो अपना मुंह ऊपर उठाकर कान फडफडाने लगा और लोटने लगा. गीदड़ को शंका हुई तो उसने चिंतित होकर पूछा कि आख़िर तुम यह क्या कर रहे हो? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है ना?
गधा बोला आज मैं बहुत खुश हूं और फिर आंखें बंद करके मस्त स्वर में बोला कि मेरा दिल गाना गाने का कर रहा हैं. अच्छा भोजन करने के बाद मैं प्रसन्न हूं. एक गाना तो बनता है. सोच रहा हूं ढेंचू राग गाऊँ!
गीदड़ उसकी बात सुन घबरा गया और उसने तुरंत चेतावनी दी मेरे भाई ऐसा न करना, क्योंकि हम दोनों यहां चोरी कर रहे हैं ऐसे में तुम्हारा गाना सुन माली जाग जाएगा और हम मुश्किल में पड़ जाएँगे. मुसीबत को न्यौता मत दो.
गधे ने गीदड़ को देखा और बोला, तुम जंगली के जंगली ही रहोगे. हम ख़ानदानी गायक हैं, तुम संगीत के बारे में क्या जानो?
गीदड़ ने फिर समझाया कि भले ही मैं संगीत के बारे में कुछ नहीं जानता, लेकिन मैं जान बचाना जानता हूं. तुम ज़िद छोडो, उसी में हम दोनों की भलाई है, वर्ना तुम्हारी ढेंचू सुन के माली जाग जाएगा.

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गधे ने गीदड़ की बात का बुरा मानकर कहा, तुम मेरा अपमान कर रहे हो, तुमको मेरा राग बेसुरा लगता है जबकि हम गधे एक लय में रेंकते हैं, जो तुम जैसे मूर्खों की समझ में नहीं आ सकता.
गीदड़ बोला चलो माना कि मैं मूर्ख जंगली हूं लेकिन एक मित्र के नाते मेरी सलाह मानो और अपना मुंह मत खोलो, वर्ना मालिक भी जाग जाएगा.
गधा हंसकर बोला- अरे मूर्ख गीदड़! मेरा राग सुनकर बाग़ के चौकीदार तो क्या, बाग़ का मालिक भी फूलों का हार लेकर आएगा और मेरे गले में डालकर मेरा सम्मान करेगा.

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गीदड़ ने को लगा इस मूर्ख को समझाने से कोई फायदा नहीं, उसने चतुराई से काम लिया और हाथ जोडकर बोला, मेरे प्यारे गधे भाई, मुझे अपनी ग़लती का एहसास हो गया है, तुम महान गायक हो और मैं तुम्हारे गले में डालने के लिए फूलों की माला लाना चाहता हूं, तुम मेरे जाने के दस मिनट बाद ही गाना शुरू करना, ताकि मैं गाना समाप्त होने तक फूल मालाएं लेकर लौट सकूं.
गधे ने गर्व से सहमति में सिर हिलाया और गीदड़ वहां से जंगल की ओर भाग गया. गधे ने उसके जाने के कुछ समय बाद मस्त होकर रेंकना शुरू किया. उसकी आवाज़ सुनते ही बाग़ के चौकीदार जाग गए और लाठी लेकर दौडे. वहां पहुंचते ही गधे को देखकर चौकीदार बोला, अच्छा तो तू है, तू ही वो दुष्ट गधा है जो हमारा बाग़ में चोरी से फल सब्ज़ी खाता था.
बस उसके बाद गधे पर डंडों की बरसात होने लगी और कुछ ही देर में गधा अधमरा होकर गिरकर बेहोश हो गया!

सीख: इस कहानी से यही सीख मिलती है कि अगर कोई हमारा मित्र हमारी भलाई के लिए कुछ समझाता है, तो उसे मान लेना चाहिए. अपने हितैषियों की सलाह पर गौर करना चाहिए ना कि अपने घमंड में ग़लत रास्ता अपनाकर खुद को मुसीबत में डालना चाहिए! अपनी कमज़ोरियों को पहचानने की क्षमता रखनी चाहिए वर्ना नतीजा बुरा हो सकता है.

काफ़ी समय पहले एक गांव में एक किसान अपनी पत्नी के साथ रहता था. किसान बूढ़ा था, लेकिन उसकी पत्नी जवान थी और इसी वजह से किसान की पत्नी अपने पति से खुश नहीं थी. वो हमेशा दुखी रहती थी, क्योंकि उसके मन में एक युवा साथी का सपना पल रहा था. यही वजह थी कि वो हमेशा बाहर घूमती रहती थी.

उसकी मन की दशा एक ठग भांप गया और वो उस महिला का पीछा करने लगा और एक दिन उस ठग को मौक़ा मिल ही गया. उसने किसान की पत्नी को ठगने के इरादे से एक झूठी कहानी सुनाई. ठग ने कहा- मेरी पत्नी का देहांत हो चुका है और अब मैं अकेला हूं. मैं तुम्हारी सुंदरता पर मोहित हो गया हूं. मैं तुम्हारे साथ ही जीवन यापन करना चाहता हूं और तुम्हें अपने साथ शहर ले जाना चाहता हूं.

Panchatantra Ki Kahani
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किसान की पत्नी यह सुनते ही खुश हो गई. वो तैयार हो गई और झट से बोली- मैं तुम्हारे साथ चलूंगी, लेकिन मेरे पति के पास बहुत धन है. पहले मैं उसे ले आती हूं. उन पैसों से हमारा भविष्य सुरक्षित होगा और हम जीवनभर आराम से रहेंगे. यह सुनकर चोर ने कहा कि ठीक है तुम जाओ और कल सुबह इसी जगह आना मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.

किसान की पत्नी ने सारी तैयारी कर ली. जब उसने देखा कि पति गहरी नींद में है तो उसने सारे गहने और पैसों को पोटली में बांधा और ठग के पास चली गई. दोनों दूसरे शहर की ओर निकल गए. इसी बीच ठग के मन में बार बार यही विचार आता रहा कि इस महिला को साथ ले जाने में ख़तरा है, कहीं इसका पति इसे खोजते हुए पीछे ना आ जाए और मुझ तक पहुंच गया तो ये सारा धन भी हाथ से जाएगा.

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ठग अब उस महिला से पीछा छुड़ाने का उपाय सोचने लगा. तभी रास्ते में एक नदी मिली. नदी को देखते ही ठग को एक तरकीब सूझी और वह महिला से बोला- यह नदी काफ़ी गहरी है, इसलिए इसे मैं तुम्हें पार करवाऊंगा, लेकिन पहले मैं यह पोटली नदी के उस पार रखूंगा फिर तुम्हें साथ ले जाऊंगा, क्योंकि दोनों को साथ ले जाना संभव नहीं. महिला ने ठग पर ज़रा भी शक नहीं किया और वो फ़ौरन मान गई, उसने कहा- हां, ऐसा करना ठीक रहेगा. इसके अलावा ठग ने महिला के पहने हुए गहने भी उतरवा के पोटली में रख लिए, उसने कहा भारी ज़ेवरों के साथ नदी पार करने में बाधा हो सकती है.

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बस फिर क्या था, ठग मन ही मन खुश हुआ और पोटली में बंधा धन लेकर नदी के पार चला गया. किसान की पत्नी उसके लौटने का इंतजार करती रही, लेकिन वो फिर कभी लौटकर नहीं आया. किसान की पत्नी को अपनी बेवक़ूफ़ी पर रोना आने लगा, लेकिन बहुत देर हो चुकी थी. पैसे भी गए, इज़्ज़त भी गई और वो कहीं की ना रही.

सीख : ग़लत कर्मों और धोखेबाज़ी का फल हमेशा बुरा ही होता है. रिश्तों में ईमानदारी ही सबसे बड़ी पूंजी और ख़ुशी होती है. जो जैसा बोता है, वैसा ही काटता है, जैसी करनी वैसी भरनी!

“वहां कौन है?” उसकी आवाज़ सुन खिड़की पर खड़े साये में थोड़ी हरकत हुई, पर कोई जवाब नहीं मिला. वह खिड़की की तरफ़ लपकी. एक साया तेज़ी से उसकी खिड़की से हटकर मंदिर की तरफ़ जानेवाले रास्ते की तरफ़ मुड़ गया. एक पल के लिए लैंप पोस्ट की रोशनी पड़ी, तो उसमें स्पष्ट दिखा, वह मानवी की ही आकृति थी. वही पर रुककर वह आकृति पलटी और उसे बाहर आने का इशारा किया. वह सन्न खड़ी रह गई, तो क्या मानवी की आत्मा भटक रही है या मानवी अभी भी ज़िंदा है.

रात के लगभग सात बज रहे थे. पटना एयरपोर्ट पर लैंड करने के लिए प्लेन आकाश में चक्कर लगा रहा था. विंडो सीट पर बैठी सुनंदा की नज़रें पल-पल क़रीब आते एयरपोर्ट की झिलमिल करते सितारों-सी रोशनी पर टिकी हुई थी. पूरे चार बरस बाद उसके पांव भारत की धरती पर पड़नेवाले थे. अपनों से मिलने और अतीत के एहसास से जुड़ने का विचार ही मन को उद्वेलित कर रहा था. अपनों से मिलना और अपनी धरती से जुड़ना कितना सुखद होता है, यह वही बता सकता है, जो बरसों अपनी धरती से दूर रहा हो.
हमेशा की तरह, प्लेन के लैंड करने के बाद भी, वह सीट पर बैठी थोड़ा भीड़ के कम होने का इंतज़ार कर रही थी कि तभी उसके सामनेवाले सीट को थामनेवाली हाथ पर उसकी नज़र गई. वह एक बेहद ख़ूबसूरत किसी लड़की का लंबी, पतली, उंगलियों वाला हाथ था, जिसमें हीरा जड़ा अंगुठी दमक रहा था. न जाने क्यों वह हाथ उसे बहुत ही जाना-पहचाना, अपना सा लगा. अचानक उसे एक झटका सा लगा. ऐसा हाथ तो सिर्फ और सिर्फ़ मानवी का ही हो सकता था. हीरे के अंगुठी का भी उसे कितना शौक था. उसने मुड़कर उस औरत की तरफ़ नज़रें घुमाई. उसने अपना पूरा चेहरा ओढ़नी से ढ़क रखा था, फिर भी कद-काठी मानवी से ही मिलता-जुलता था. वह झट से अपना बैग उठाए, उस भीड़ का हिस्सा बन गई. जाने क्यों उसे लग रहा था, वह औरत दूर होते हुए भी तिरक्षी निगाहों से उसे ही देख रही थी.
तभी उसके पैरों में जैसे ब्रेक लग गया. अपने बचपन की सहेली मानवी से मिलता-जुलत, कद-काठी देखकर जिस लड़की के पीछे, सुनंदा भाग रही थी, वह मानवी कैसे हो सकती थी? आज से पूरे छह साल पहले उसकी आंखों के सामने जिस मानवी के अस्तित्व का विसर्जन गंगा में कर दिया गया था, उसके दिख जाने का प्रश्न ही नहीं उठता था. पर मन का कोई क्या करे. जहां भी थोड़ी गुंजाइश नज़र आती है, असंभव को भी संभव मान लेता है. सामान लेकर एयरपोर्ट से बाहर निकली, तो इधर-उधर उसकी निगाहें अपने ममेरे भाई सुबोध को खोजने लगी. इतने बरसों बाद यहां आना भी तभी संभव हो पाया था, जब मामाजी ने सुबोध की शादी हाजीपुर के अपने पुश्तैनी मकान से ही करने का फ़ैसला किया था.
सुबोध को ढूढ़ती उसकी निगाहें सामने एक काले रंग के कार पर पड़ी, जिसमें वह औरत बैठ रही थी. बैठने के दौरान अचानक उसके चेहरे से ओढ़नी सरक गई, जिससे उसका चेहरा अनावृत हो सुनंदा की आंखों के सामने आ गया. मानवी की ही सूरत थी, जिसे देख वह स्तब्ध रह गई थी. उसके नसों में दौड़ता खून जैसे जम गया था. वह जड़वत उसे निहारती रह गई. बस, पल-दो पल में ही कार का दरवाज़ा बंद हुआ और कार आगे बढ़ गई. कार के आगे बढ़ते ही सुनंदा को जैसे होश आया, वह मानवी का नाम पुकारते हुए, उसके पीछे भागी, पर कार तेज़ी से आगे बढ़ गई और सामने से सुबोध आ गया.
उसे संभलते हुए बोला, ‘दीदी, आपको हो क्या गया है? कहां भागी जा रहीं हैं?’’
सुबोध की आवाज़ से जैसे उसकी चेतना वापस आ गई.
‘‘कुछ नहीं.. यूं ही… कोई परिचित दिखा गया था.’’
उसके पांव स्पर्श कर सुबोध सामान गाड़ी में व्यवस्थित करने लगा. जब दोनो एयरपोर्ट से बाहर निकले, सुबोध ख़ुश होते हुए बोला, “दी, मुझे तो अपनी आंखों पर विश्‍वास नहीं हो रहा है कि सचमुच आप मेरी शादी में आ गई हैं.’’
‘‘अपने सबसे प्यारे भाई की शादी में भला मैं कैसे नहीं आती?’’
फिर दोनों बातों में मशगूल हो गए. कुछ देर तक इधर-उधर की बातें करने के बाद अचानक मन में मानवी को लेकर उमड़ते-घुमड़ते प्रश्‍न होंठों पर आ ही गए थे, “सुबोध, तुम भी तो उस दिन सबके साथ थे, जब मानवी को लोग श्मशान घाट ले गए थे. क्या तुम लोगों ने वास्तव में मानवी को ही जलाया था या वह कोई और थी.’’

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“अचानक ये आप कैसे प्रश्‍न कर रही हैं दी? मानवी को मरे हुए लगभग छह साल गुज़र गए. ख़ुद उसके चाचा ने उसकी शिनाख्त की थी. उसके अस्थि विसर्जन के समय आप भी वहां उपस्थित थी. फिर भी…’’ वह वाक्य अधूरा छोड़कर उसे ऐसे देखने लगा जैसे उसका दिमाग़ बौरा गया हो.
वह सुबोध की शादी में आई थी, दूसरी कोई बात पूछने के बदले मानवी के विषय में पूछना उसे ख़ुद ही अटपटा-सा लगा. वह थोड़ी लज्जित होते हुए बोली, ‘‘सुब्बु, तू तो मेरा बचपन से राज़दार रहा है, फिर मैं आज कैसे तुमसे ये ना कहती कि अभी थोड़ी देर पहले, मैंने एयरपोर्ट पर मानवी को देखा था. तुमने भी तो मुझे उसके पीछे भागते देखा था.’’
“इतने दिनो बाद आप आईं हैं, तो अपनी बेस्ट फ्रेंड की याद आ जाना स्वाभाविक है. हो सकता है उसकी यादों में उलझा आपका दिमाग़ किसी दूसरी लड़की में उसे ढूंढ़ लिया हो. आप हैं भी तो बहुत भावुक न.”
उसे हल्के से चपत जमाते हुए हंसकर सुनंदा बोली, ‘‘चुप कर… ज़्यादा अपनी साइकोलाॅजी मत बघार. इतनी अक्ल है मुझमें.’’
बातें करते-करते पटना से हाजीपुर का रास्ता, जो क़रीब आधे घंटे का था कब समाप्त हो गया पता ही नहीं चला. जब कार उसके चिर-परिचित ननिहाल के दरवाज़े पर आ रुकी, उसकी ख़ुशी का पारावार न रहा. सामने ही मामी खड़ी उसी का इंतज़ार कर रही थीं. वह कार से उतर कर सीधे उनके गले से जा लगी. मामी उसे अपनी बांहों के घेरे में लिए अंदर आ गईं. बरसों बाद, एक बार फिर उनकी आत्मियता और प्यार ने उसे अंदर तक भीगो दिया.
वैसे भी मामी उसकी मां से कम नहीं थीं. मां के इस दुनिया से जाने के बाद वह मामी के ममता के आगोश में ही पली-बढ़ी थी. मामा -मामी की इकलौती संतान सुबोध उसके लिए अपने भाई से भी बढ़कर था. यही उसे मानवी जैसी दोस्त मिली थी, जो उसकी बहन जैसी थी. फिर भी जब मानवी मुसीबत में पड़ी, तो वह उसकी सहायता नहीं कर पाई थी, जिसका मलाल आज तक उसे सालता है. तभी मामी की आवाज़ ने उसे चौंका दिया था.
‘‘कहां खो गई बिटिया… परदेश क्या बसी हम सब तो तेरे लिए बेगाने ही हो गए.”
‘‘नहीं मामीजी, ऐसा कैसे हो सकता है? इस दुनिया में आप से ज़्यादा मेरा अपना कोई नहीं है. आप ही मेरी मां हो.’’
शादी-ब्याह के माहौल में मामी को कैसे समझाती कि जब से आई है, उसका मन मानवी में ही उलझा हुआ था. न जाने क्यूं, धीरे-धीरे उसका विश्‍वास पक्का होने लगा था कि मानवी ज़िंदा है. वह पूरे दो महीने की छुट्टी में आई थी. कितने ही लोगों से मिलना था. अब जाने कब आना संभव हो. वह सोचकर ही आई थी कि इस बार निश्चित रूप से मानवी के मौत की मिस्ट्री सुलझा कर ही जाएगी. पर शादी के माहौल में वह इसकी चर्चा किससे करे? कैसे करे, कुछ समझ नहीं पा रही थी. घर आए लोगों और रिश्तेदारों से ही बातें करने में व्यस्त थी.
रात में मामी ने उसका बिस्तर उसके उसी पुराने चिर-परिचित कमरे में लगवा दिया था, जिसके ईंट-ईंट पर अतीत की यादें बिखरी पड़ी थीं. बेहद थके होने के बावजूद सुनंदा की आंखों से नींद कोसो दूर था. वह टहलते हुए खिड़की के पास तक आ गई थी. खिड़की से सामने ही मानवी के घर का पिछला हिस्सा नज़र आ रहा था.
चांदनी रात में भी वह विशाल हवेलीनुमा मकान, अजीब तरह का मनहूसियत समेटे, किसी भूत बंगले से कम नहीं लग रहा था. उसने एक लंबी सांस ली. इस हवेली में न जाने कितने राज़ दफ़न थे. कभी हवेली के इस पिछले हिस्से में फल-फूलों से लदा एक सुंदर बगीचा हुआ करता था. वह जगह अब लंबे-लंबे घासों और जंगली पेड़-पौधों से भरा पड़ा था. काई से भरे दीवारों पर उग आए बरगद और पीपल के पेड़ों ने उस मकान को और भी मनहूस बना रखा था. वह कुछ देर तक उस मकान को यूं ही देखती अतीत के गलियारों में भटकती मानवी को याद करती रही, फिर बिछावन पर आ लेटी.
तभी उसे लगा उस कमरे की खिड़की पर एक साया सा खड़ा है. वह हड़बडाकर उठ बैठी.
“वहां कौन है?” उसकी आवाज़ सुन खिड़की पर खड़े साये में थोड़ी हरकत हुई, पर कोई जवाब नहीं मिला. वह खिड़की की तरफ़ लपकी. एक साया तेज़ी से उसकी खिड़की से हटकर मंदिर की तरफ़ जानेवाले रास्ते की तरफ़ मुड़ गया. एक पल के लिए लैंप पोस्ट की रोशनी पड़ी, तो उसमें स्पष्ट दिखा, वह मानवी की ही आकृति थी. वही पर रुककर वह आकृति पलटी और उसे बाहर आने का इशारा किया. वह सन्न खड़ी रह गई, तो क्या मानवी की आत्मा भटक रही है या मानवी अभी भी ज़िंदा है.
न चाहते हुए भी उसके मुंह से एक हल्की-सी चीख निकल गई. उसकी आवाज़ सुनकर सुबोध उसके कमरे में आ गया, जो शायद अब तक जगा हुआा था.‘‘ “क्या बात है दी? कोई था क्या? आपको मानवी फिर से दिख गई क्या?’’

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वह अवाक.. निशब्द खड़ी उसकें प्रश्नों को सुन रही थी. उसका उ़ड़ा हुआ पसीने से तर चेहरा देखकर ही वह सब समझ गया था कि उसकी दी को फिर से मानवी के कहीं आसपास होने का भ्रम हो गया है. फिर तो उसी कमरे में वह अपना खाट खींच ले लाया और वही सो गया. सुनंदा ने भी राहत की सांस ली थी और आंख बंदकर सोने का प्रयास करने लगी, पर वह सो नहीं सकी थी. रातभर मन अतीत के गलियारों में भटकता रहा था.
जब सुनंदा की मां मरी थीं, वह मात्र 10 वर्ष की थी. उसके पापा ऑफिस के काम से अक्सर टूर पर रहते थे, इसलिए सुनंदा को मामा-मामी का सौप दिया था. उसके मामा-मामी सुबोध के साथ हाजीपुर के अपने पुश्तैनी मकान में ही रहते थे. उसके मामा वहां के एक प्रतिष्ठित काॅलेज में बाॅटनी पढ़ाते थे. सुबोध उस समय लगभग 5 वर्ष का था. सुनंदा का उसके साथ बहुत ही सौहार्दपूर्ण रिश्ता था, दोस्तों जैसा. मामी भी सगी बेटी की तरह उसे प्यार करती थी. मानवी मामा के घर के बगल में बने कोठीनुमा मकान में रहती थी. वह और मानवी, दोनो एक ही स्कूल के एक ही क्लास में पढ़ती थीं. स्कूल में तो दोनो का साथ रहता ही था, पास-पड़ोस में रहने के कारण दोनो की शामें भी साथ गुज़रती थी. धीरे-धीरे दोनों अंतरंग सहेलियां बन गई थी. मन से नज़दीक होते हुए भी दोनों के स्वभाव में काफ़ी अंतर था. मानवी एक मुखर स्वभाव की निर्भीक और साहसी लड़की थी. ज़रूरत पड़ने पर वह अपना फ़ैसला ख़ुद लेती थी और उस पर कायम भी रहती थी. छोटी थी, तभी वह अपनी उम्र से ज़्यादा समझदारी की बातें करती.
वही सुनंदा सरल स्वभव की दुर्बल लड़की थी, जो हमेशा शांत और चुप रहतीे थी. वह अपना छोटा से छोटा फ़ैसला भी मामी से पूछकर लेती थी. उसके इस स्वभाव के कारण अक्सर उसे किसी न किसीे सहपाठी के कुटिलता का शिकार होना पड़ता. जिसे वह तो बर्दाश्त कर लेती, लेकिन जब मानवी को मालूम हो जाता, तो वह जिसने भी सुनंदा को सताया हो या उसे उल्टा-सीधा कुछ भी बोला हो, उसे कभी नहीं छोड़ती. उसके साथ होनेवाले हर एक अन्याय का विरोध करती. घर हो या बाहर, सब से सुनंदा के लिए झगड़ती रहती थी. अपने बेबाक स्वभाव के कारण वह अपने ही घर के लोगाें की भी निष्पक्ष आलोचना करने से नहीं घबराती थी. उसकी मां भी अपनी इस बिना किसी बाधा के बोलनेवाली स्पष्टवादी बेटी से कभी-कभी परेशान हो जाती थी. अक्सर सुनंदा से कहती, ‘‘अरे सुनंदा, कुछ तो समझा इसे तेरी ही बातें तो सुनती है. कुछ दूसरों की बातें भी सहना-समझना सिखे. कल को दूसरे घर जाएगी और ऐसी ही उद्दंड बनी रही, तो कैसे निभाएगी?’’
धीरे-धीरे समय गुज़रता गया और दोनों स्कूल छोड़ काॅलेज में आ गईं. यह उन्हीं दिनों की बात है, जब वे दोनो ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरा करने में लगी थी. एक दिन सुनंदा को मानवी और जगवीर के लव स्टोरी के विषय में कुछ उड़ती-उड़ती बातें काॅलेज में पता चली. मौक़ा पाते ही वह मानवी से उलझ पड़ी थी, ‘‘मानवी, तुम्हारे और जगवीर के विषय में ये सब क्या सुन रही हूं? तुम्हे कुछ होश है कि तुम्हारा एक ग़लत कदम तुम्हे और तुम्हारे परिवार को कहां ला खड़ा करेगा? यह मत भूलो कि तुम अपने पापा को खोकर, अपने चाचा पर निर्भर हो. तुम अच्छी तरह जानती हो अपने चाचा को भी, जो कभी किसी को छोटी से छोटी ग़लती के लिए भी माफ़ नहीं करते, इसलिए देख सब सच-सच बता मुझे, मैं पूरा सच जानना चाहती हूं.’’
मानवी कुछ देर तक चुपचाप उसकी परेशानी का लुत्फ़ उठाती रही, फिर बोली, ‘‘तुम जैसा सोच रही हो वैसा कुछ भी नहीं है. हां, यह सच है कि जगवीर मेरे ऊपर जान छिड़कता है. मेरा पीछा करता रहता है, पर मैं हमेशा उसे नज़रअंदाज़ करती रहती हूं. तुम तो जानती हो मधुकर भी मेरे इर्दगिर्द कम नहीं मंडराया था, पर क्या हुआ? अंत में थक-हारकर मेरा पीछा छोड़ दिया. इस प्रेमालाप का भी वही अंजाम होना है.’’
पर सुनंदा क्या जानती थी कि इस प्रेम का कितना भयंकर परिणाम होनेवाला था. उस समय मानवी की बातों सुनकर उसने राहत की सांस ली थी, “तू उसके विषय में सोचेगी भी नहीं और उससे दूर रहेगी. तुम्हारा एक ग़लत कदम कई ज़िंदगियां तबाह कर देगी.”
मानवी ने वही पर बात समाप्त कर दी थी, ‘‘सारी समझदारी का ठेका तुमने ही नहीं ले रखा है. मैं भी अपनी मर्यादा और अपनी ज़िम्मेदारियां समझती हूं.’’
बात आई गई हो गई थी. सुनंदा हमेशा मानवी के लिए परेशान रहती थी, क्योंकि उसे पता था, जितनी संपत्ति उन लोगों को विरासत में मिली थी, उतनी ही दकियानूसी और रूढ़िवादी सोच भी विरासत में मिली थी. मानवी का संयुक्त परिवार था, जिसमें उसकी मां और उसके अलावा उसके चाचा-चाची, दादी और तीन चचेरे भाई भी रहते थे. उसकी एक बड़ी बहन थी, जिसकी शादी हो चुकी थी.
घर के लोग कहते, जन्मते ही उसने पिता को डस लिया था, इसलिए सबने उसे बचपन से ही मनहूस का ख़िताब दे रखा था. उसके चाचा दिवाकर सिंह, गु़स्सैल स्वभाव के काफ़ी दबंग आदमी थे, जिनका घर में ही नहीं, आस-पड़ोस में भी लोग विरोध करने का साहस नहीं करते थे. कभी-कभी मानवी ही अपने अधिकारों को लेकर अपने चाचाजी से भी भिड़ जाने का साहस रखती थी. वैसे घर के हर मामले में मानवी के चाचा-चाची की बातें ही चलती थी.
उस वर्ष गर्मी की छुट्टियों में सुनंदा पापा से मिलने नहीं जा सकी. वह काम के सिलसिले में देश से बाहर चले गए थे. एक दिन दोनों सहेलियां सड़क पर टहल रही थी कि उनकी नज़र मंदिर के आंगन में पड़ी, जहां बेंच पर जगवीर बैठा था. सुनंदा को लगा काटो तो ख़ून नहीं, पर मानवी ने उसे समझाया कि डरने की क्या बात है? मैंने तो उसे बुलाया नहीं है. थोड़ी देर बाद किसी तरह हिम्मत जुटाकर सुनंदा उससे मिली और वहां आने के लिए मना किया. मना करने पर भी जगवीर वहां आता रहा. जब भी उस पर नज़र पड़ती मानवी उसे सख़्ती से मना करती.
छोटे शहरों में ये सब बातें, तो हवा के संग फैलती हैं. यह बात भी आस-पड़ोस में दावानल की तरह फैलने लगी कि मानवी से कोई मिलने आता है. गांव के लोगों की नज़र उसकी गतिविधियों पर थी. एक दिन ये सब बातें उसके चाचाजी के कानों में भी पड़ी. इसे मानवी का दुःसाहस समझ, वह ग़ुस्से से आगबबूला हो उठे थे. वह जगवीर के ख़ून के प्यासे हो गए थे. एक दिन जगवीर फिर आ गया था. उसे बचाने के लिए मानवी भागी-भागी मंदिर गई, तो फिर वह भी वापस नहीं लौटी.
मानवी के चाचा ने पता लगाने की बहुत कोशिश की पर उसका कहीं पता नहीं चला. अपमान की आग में जलते दिवाकरजी दोनों से अपने परिवार के अपमान का प्रतिशोध लेना चाहते थे. पर दोनो को ज़मीन निगल गई या आसमान कुछ पता ही नहीं चला. वह सुनंदा पर भी नज़र रखते, पर उसके पास भी मानवी का कोई फोन नहीं आया. पूरे तीन महीने बाद जब सुनंदा एक दिन काॅलेज में थी, मानवी का फोन आया. फोन उठाते ही बोली, “तू कुछ मत बोल बस मेरी सुन. उस दिन परिस्थिति ऐसी हो गई कि जगवीर की जान बचाने के चक्कर में मुझे उसके साथ भागने का फ़ैसला लेना पडा़, वरना वह चाचाजी के आदमियों द्वारा मारा जाता. मैं जहां भी हूं ठीक हूं. दीदी को मेरी क्या फ़िक्र होगी, वह तो अपने ससुरल में मस्त होगी, बस मेरी मां को किसी तरह मेरा संदेशा, पहुंचा देना कि मैंने जगवीर से शादी कर ली है.’’
इतना बोलकर उसने फोन काट दिया. सुनंदा किसी तरह 2-3 दिनों के प्रयास के बाद उसका संदेशा उसकी मां के पास तक पहुंचा दी थी.
इस घटना के पूरे छह महीने बाद एक दिन अचानक मानवी की मुलाकात दिल्ली के कनाटप्लेस पर अपने चाचा से हो गई. उन्हे देखकर मानवी काफ़ी भयभीत हो गई थी, पर उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उसके चाचाजी, उसकी उम्मीद के विपरीत अपनी सारी नाराज़गी को भूलाकर मानवी को घर चलने के लिए कहा. चाचा का प्यार देख उसका मन भी भावुक हो उठा. चाचा के गले लगते हीे उसकी आंखों से जैसे आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा. अपने घरवालों से मिलने के लिए उसका मन विकल हो उठा. उसी दिन शाम की ट्रेन से उसके चाचा वापस हाजीपुर लौटने वाले थे. उनके कहने पर वह भी उनके साथ जाने के लिए तैयार हो गई. जगवीर के बहुत मना करने पर भी मानवी नहीं मानी और जल्द ही वापस आने का वादा कर हाजीपुर चली आई.
उसके आने की ख़बर सुनते ही सुनंदा, अपने सारे काम छोड़ भागी-भागी मानवी से मिलने चली गई थी, पर मानवी की चाची ने उसे यह बोलकर की अभी बहुत थकी हुई है कल बात करना उसे वहां से वापस भेज दिया था. सुनंदा की समझ में नहीं आ रहा था कि उसके और मानवी के बीच ऐसी कैसी औपचारिकता आ गई थी कि बात करने के लिए भी उसे अनुमति की ज़रूरत आन पड़ी थी. पर परिस्थितियां तेज़ी से बदल रही थीं, जिससे कोई भी रिश्ता अछूता नहीं रह गया था, इसलिए कुछ भी कहना-सुनना बेकार था.
उसके बाद भी वह दो दिनों तक मानवी से मिलने की कोशिश करती रही, पर कोई न कोई बहाना बनाकर उसे टाल दिया गया. एक दिन वह हिम्मत कर मकान के पिछले हिस्से से मानवी के कमरे की खिड़की तक जा पहुंची. बाहर काफ़ी अंधेरा था. कमरे में भी एक छोटा सा बल्ब जल रहा था. भय से उसके दिल की धड़कनें काफ़ी तेज हो गई थी, पर हिम्मत कर उसने धीरे से मानवी को पुकारा. उसकी आवाज़ सुन झट से वह खिड़की के पास आ गई थी. सुनंदा को इतने क़रीब देखकर उसके सब्र का बांध टूट गया था. खिड़की पर अपना सिर रखकर फूट-फूटकर रो पड़ी थी. उसे रोते देख सुनंदा की आंखों से भी आंसू बह निकले. दोनों का मन रोकर थोड़ा हल्का हुआ, तो मानवी बोली, ‘‘सुनंदा, मैं चाचाजी के साथ यहां आकर बुरी तरह फंस गई हूं. मेरे यहां आने के बाद से चाचाजी के तेवर पूरी तरह से बदल गए हैं. अपनी ज़िद में आकर अब वह मेरी और जगवीर की शादी को किसी भी तरह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. वह किसी भी शर्त पर मुझे वापस नहीं जाने देना चाहते. मां भी अभी तक चुप है. मुझे कमरे में बंद कर दिया गया है. मैं कैसे क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा? मैंने इस परिवार को शायद बहुत कठोर आघात दिए हैं, पर मेरे साथ तो चाचाजी और भी बुरा कर रहे हैं. तुम मेरे लिए कुछ करो. मुझे यहां से किसी तरह निकालो.’’

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वह थोड़ी देर तक चुप रही फिर बोली, ‘‘इस घर से तो मुझे हमेशा तिरस्कार ही मिला, केवल लांछन और अपमान, पर जगवीर से मुझे जीवन में पहली बार मिला निश्छल और अनंत प्रेम, जिसे मैं खोना नहीं चाहती. तुम कुछ भी करके मेरी मदद करो.’’
‘‘तुम चिंता मत करो मैं हूं न, कुछ न कुछ करती हूं.”
बिना किसी हिचक के उसे तसल्ली तो दे दी थी, पर कैसे वह उसकी मदद करेगी यह उसके समझ में नहीं आ रहा था. दोनो अभी और भी कुछ बातें करतीं कि उस कमरे का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ से दोनों चौंककर चुप हो गईं. बाहर का अस्वभाविक अंधकार भी सुनंदा की हिम्मत तोड़ रहा था. मानवी से जल्द ही मिलने का वादा कर सही समय के इंतज़ार में वह लौट आई थी. उस दिन रातभर वह सो नहीे सकी. दूसरे दिन सुबह उठकर वह मानवी को वहां से निकालने का कोई उपाय सोचती उसके पहले ही आस-पड़ोस में चर्चा होने लगी थी कि मानवी अचानक ही रात के जाने किसी बेला में घर छोड़कर चली गई. उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इतने कड़े पहरे के बावजूद कैसे मानवी वहां से भागने में सफल हुई?
देखते-देखते एक हफ़्ता गुज़र गया. एक दिन अचानक जगवीर उसे ढूंढ़ता हुआ हाजीपुर पहुंचा. तब एक नई बात सामने आई कि मानवी तो दिल्ली पहुंची ही नहीं. जब से वह दिल्ली से आई थी, उसका फोन भी नहीं लग रहा था, इसलिए जगवीर घबराकर चला आया था. जब उसने दिवाकरजी से बातें कि तो वे बोले, ‘‘यह बात तो सब को पता है कि उसे तो इसी तरह घर छोड़कर भागने की आदत थी. न जाने किस समय बिना घर में किसी को बताए दिल्ली के लिए रवाना हो गई. अब तो मुझसे ज़्यादा उसे खोजने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है. तुम्ही पता करो वह कहां गई? उसका पता लगाने में मैं भी तुम्हारी मदद करूंगा.’’
जगवीर द्वारा पुलिस में भी कंप्लेन किया गया, पर मानवी का कही पता नहीं चल सका था. मानवी न जाने कहां थी? अपने हृदयहीन चाचा के कठोर सज़ा का दंड भुगत रही थी या फिर कही दूसरी मुसीबत में फंस गई थी. सभी सिर्फ़ उसे खोजने की बातें कर रहे थे, पर उसका पता कोई नहीं लगा पा रहा था.
इस घटना के पूरे तीन महीने बाद अचानक एक बड़ी ट्रेन दुर्घटना दानापुर के आसपास हुई. इस एक्सिडेंट के दूसरे दिन दिवाकरजी के पास फोन आया कि एक मरी हुई लड़की के पास से उनका फोन नंबर और पता मिला है. आकर उसकी पहचान करें. जब वह वहां गए, तो उस लड़की का चेहरा बुरी तरह से कुचल गया था कि पहचानना मुश्किल था. उसकी पहचान कुछ उसके कद-काठी, हाथ की बनावट और उसमें अटकी अंगूठी से की गई थी. वह अंगूठी सुनंदा की थी, जिसने कभी खेल-खेल में पक्की दोस्ती की ख़ातिर मानवी की अंगूठी से बदल ली थी. वह अंगूठी मानवी हमेशा पहने रहती थी. उसके बांह में अटके बैग में हाजीपुर का पता और फोन नंबर भी मिला, तो शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई. जब मानवी को हाजीपुर लाया गया, ख़ुद सुनंदा भी क़रीब जाकर देखी थी.
शत-प्रतिशत वही अंगूठी थी. मानवी को क्षत-विक्षत अवस्था में देखते ही दुख और संताप से थर-थर कांपती सुनंदा वही गिरकर बेहोश हो गई थी. उसी बीच उसके चाचा आनन-फानन में उसे अंतिम संस्कार के लिए ले गए.
जब उसे होश आया, तब तक मानवी के अंतिम विदाई हो चुकी थी. कहने-सुनने को बचा ही क्या था? कड़वा सच आंखों के सामने था. सवाल तो कई थे, पर जवाब देनेवाला कोई नहीं था. हां, उस रात जब वह कमरे में क़ैद मानवी से मिलने गई थी, अगर उस समय अपनी कायरता दिखाकर भागने के बदले, थोड़ी हिम्मत दिखाई होती, तो आज शायद मानवी ज़िंदा होती. तीन महीने तक वह कहां थी? किसी को कुछ पता नहीं था. न जाने मानवी को क्या-क्या झेलना पड़ा होगा. कितना अपमान, कितनी कटुता सह मानवी इस दुनिया से विदा हुई होगी.
अब भी जब कभी वह अकेली होती, तो उसकी आत्मा उसे कचोटती रहती. मानवी उसके लिए न जाने कितने लोगों से लडती-झगड़ती रहती थी. जब उसकी बारी आई, वह कायरों की तरह सोचती ही रह गई. मानवी के अकाल मृत्यु से उसे गहरा सदमा लगा था. परिस्थिति को देखते हुए उसके पापा ने उसकी शादी अमेरिका में कार्यरत दीपक से तय कर आए थे. दीपक से उसकी शादी क्या हुई भारत ही छूट गया. अतीत में भटकते हुए जाने कब उसकी आंख लग गई. सपने में भी उसे मानवी ही नज़र आई, जो उसके बगल में बिस्तर पर बैठी उसे उदास नज़रों से देख रही थी. जैसे कह रही हो सबके साथ तुमने भी मुझे भूला दिया. उसका दिल जोरों से धड़कने लगा और उसकी नींद खुल गई.
जब से वह आई थी, सपनों का एक सिलसिला-सा बन गया था. कभी आधी रात को, तो कभी सुबह-सबेरे के सपने में मानवी उसे नज़र आने लगी थी. वह जब कभी भी इन सपनों की चर्चा सुबोध से करती, तो वह उसे समझाता, ‘‘दी, वह आपकी बेस्ट फ्रेंड थी. उसकी यादें अक्सर आपके दिलोंदिमाग़ पर छाई रहती है, इसलिए वह आपको सपने में भी दिखती है.’’
वह चुप रह जाती. कुछ दिनों बाद उसे पता चला कि आस-पड़ोस में भी लोगों के बीच चर्चा थी कि मानवी की आत्मा शिव मंदिर के आसपास भटकती रहती थी. लोगों ने शाम के बाद उधर जाना छोड़ दिया था. बस एक मानवी की मां सावित्री देवी थी, जो अब भी शाम के समय बदस्तूर वहां दीया जलाने जाती थीं.
लोगों से तरह-तरह की बातें सुनकर मानवी के मौत का सत्य जानने के लिए सुनंदा और भी परेशान हो गई थी. पर घर में शादी के माहौल होने के कारण कुछ भी खुलकर बाते नहीं कर पा रही थी. एक दिन मामी ने उसे विवाह संबंधित कुछ सामान लाने के लिए पटना भेजा. वह उनके ही बताए एक दुकान पर सामान छांटने में व्यस्त थी कि एक जानी-पहचानी सी आवाज़ सुनाई दी, ‘‘अरे, दूसरे पैकेट में देखो न मैं जानती हूं, उसे सब पसंद आ जाएगा.’’
हूबहू मानवी की आवाज़ थी, वह चौंककर आवाज़ की तरफ़ मुड़कर बोलनेवाले को देखने की कोशिश की, पर कोई दिखाई नहीं दिया. उसने सेल्सगर्ल से जानना चाहा कि कौन बोल रहा था. उसने किसी सपना मैडम का नाम बताया और मिलवाया भी, पर उसकी आवाज़ कहीं से भी मानवी जैसी नहीे थी, पर थोड़ी देर बाद दुकान में लगे आईने में उसे मानवी की एक झलक ज़रूर दिखाई दी. पर उसके मुड़ते ही वहां कुछ भी नज़र नहीं आया.
एक दिन उसके एक क्लासमेट मधुकर ने उसे फोन कर खाने पर बुलाया. साथ ही उसने कुछ और भी लोगों को जो उस समय उसके साथ पढ़ते थे और आसपास ही रहते थे, उन्हें भी फोन कर एक होटल में एकत्रित किया. मानवी को आश्चर्य लगा. इतने कम समय में ही सब लोग कितने बदले-बदले से लग रहे थे. फिर भी आपस में स्नेह वही था. सब लोग मिलकर देर तक बातें करते रहे. एक-दूसरे की जानकारियां लेते रहे. जब सब लोग चले गए, एकांत पाकर वह मधुकर से मानवी के विषय में अपने मन में उठते सारे संशय और अपने अनुभव को शेयर किया. कभी मधुकर के मन में जो मानवी क लिए प्यार था, उस प्यार का वास्ता देकर उसके विषय में सही जानकारियां प्राप्त करने के लिए बोली, तो वह थोड़ा कनफ्यूज-सा दिखा. फिर भी उसके साथ सहयोग करने और जल्द ही मानवी के विषय में जानकारियां हासिल करने का वादा किया.
सुबोध की शादी क़रीब होने पर वह ख़ुद भी काफ़ी व्यस्त हो गई. शादी के बाद वह सोच ही रही थी कि वह मानवी के विषय में सही जानकारी प्राप्त करने के लिए अपना काम कहां से शुरू करे, तभी एक दिन मधुकर का फोन आ गया था. वह उसे अपने घर पर बुला रहा था. वहां उसने सुनंदा के लिए एक सरप्राइज़ प्लान कर रखा था. वहां जाने का उसका मन तो नहीं कर रहा था, पर जाना ही पड़ा. वहां मधुकर और उसकी मां ने बहुत प्रेम और आत्मियता से उसका स्वागत किया. कुछ औपचारिक बातों के बाद मधुकर बोला, ‘‘आज मैं तुम्हे एक बहुत बड़ा सरप्राइज़ देनेवाला हूं. मानवी के विषय में तुुम जानना चाहती थी न कि उसका क्या हुआ?’’
‘‘हां… हां… ज़रूर, तो फिर देर किस बात की है. जल्दी बताओ.’’

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‘‘तो सुनो मानवी मरी नहीं, ज़िंदा है. आज मैंने उससे मिलवाने के लिए ही तुम्हे यहां बुलवाया है.’’
‘‘क्या…’’ वह जड़वत शब्दहीन बैठी रह गई थी, जैसे उसे सांप सूंघ गया हो. वह सपने में भी नहीं सोची थी कि मानवी से यूं मुलाक़ात होगी. वह अभी अपने को संभाल भी नहीं पाई थी कि बगलवाले कमरे से निकलकर मानवी वहां आकर खड़ी हो गई. हल्के नीले रंग के सूट में बेहद ख़ूबसूरत लग रही थी. पहले से काफ़ी दुबली हो गई थी, पर उसके हंसमुख चेहरे पर वही आकर्षण था. आते ही सुनंदा के गले से लग गई. फिर तो देर तक दोनों एक-दूसरे को अपने-अपने आंसुओं से भिगेाती रहीं. जैसे आंसुओं से ही दोनों बरसों की अनकही बातें कह डालेंगी. जब दोनों का मन थोड़ा शांत हुआ, तो मधुकर बोला, ‘‘मेरा यह सरप्राइज़ तुम्हे कैसा लगा सुनंदा?’’ मधुकर की आवाज़ ने जैसे दोनों को वापस इस दुनिया से जोड़ दिया.
एक लंबी सांस भर सुनंदा बोली, ‘‘मौत और मातम के बाद ज़िंदगी से मुलाक़ात कितनी अलौकिक लगती है यह कोई मुझसे पूछे मधुकर! मेरे पास तो शब्द ही नहीं है अपने मन की भावनाओं को प्रगट करने के लिए. ऐसी सुंदर सौगात जीवन में पहली बार मिली है. जहां प्रकाश की एक किरण नसीब नहीं थी, तुमने तो प्रकाश पुंज ही पकड़ा दिया. अब तुम दोनों मुझे इस नाटक का रूपक भी समझा दो, ताकि मुझे पुरी तसल्ली हो जाए.’’

तब मानवी ने बिना किसी भूमिका के बोलना शुरू कर दिया था, ‘‘तुम्हे याद होगा, जब हम दोनों की मुलाकात उस रात खिड़की पर हुई थी. मैंने तुम्हे बताया था कि मैं किस तरह चाचाजी के चंगुल में फंस गई थी. उनके प्रवंचन से जर्जर हो गए मेरे हृदय पर आघत पर आघात हो रहे थे कि मैं जगवीर को छोड़ दूं. मैं उन्हें समझाने की कोशिश कर रही थी कि अब उसे छोड़ देने से यहां किसी का कोई फ़ायदा नहीं होनेवाला था. जगवीर से अलग होकर उसकी ज़िंदगी ज़रूर तबाह हो जाएगी. जो हो गया, सो हो गया, उसे वापस सुधारा नहीं जा सकता था. अपनी चुप्पी तोड़कर मां भी मेरे साथ खड़ी हो गई. उन्होने मेरी शादी को मान लिया था और मुझे वापस जगवीर के पास भेजना चाहती थी. मां का चाचाजी के विरुद्ध जाना, उन्हें और भी क्रोधित कर दिया. उसी दिन मुझे चाचाजी ने घर से दूर एक सुनसान स्थान पर क़ैद करवाकर रख दिया और इसकी भनक मां को भी नहीं लगने दी.’’
‘‘देखते-देखते उस क़ैद में तीन महीने गुज़र गए. मैं वहां से किसी तरह भागना चाहती थी, मुझे भागने का कोई मौक़ा नहीं मिल रहा था, अलबत्ता धमकियां ज़रूर मिल रही थी कि मैंने भागने की कोशिश की, तो जगवीर को मार दिया जाएगा. फिर भी एक दिन मुझे मौक़ा मिल ही गया, जब मेरी देखभाल करनेवाला ताला खुला छोड़ किसी से बात करने में व्यस्त हो गया. मैं धीरे से बाहर निकलकर दरवाज़ा सटा दी. वह थोड़ी देर में आकर ताला लगाकर चला गया. उसके जाते ही मैं भी वहां से चल दी. क़रीब आधा किलोमीटर चलने के बाद मुझे सड़क दिखा. जिसके साथ-साथ चलते हुए मैं शहर में आ गई. चलते-चलते सुबह हो गई थी. तुरंत मुझे याद आया कि यहां पर मधुकर का घर था. मैंने बिना सोचे-समझे मधुकर के घर के बेल का बटन दबा दिया. मुझे फटेहाल अवस्था में पाकर पहले तो मधुकर बहुत घबराया, पर मेरी सारी बातें सुनने के बाद मधुकर और उसकी मां मनीषा आंटी दोनों ने मुझे बड़े प्यार और सम्मान से अपने घर में शरण दिया और तत्काल किसी से भी संपर्क करने के लिए मना कर दिया. तभी बिहार से दिल्ली जानेवाली ट्रेन के पटरी से उतर जाने के कारण भयंकर रेल दुर्घटना हो गई. चुकी मधुकर रेलवे में ही काम करता है, इसलिए वह काफ़ी व्यस्त हो गया. तभी उसके दिमाग़ में एक योजना आई, क्यों न चाचाजी का मुझ पर से ध्यान हटाने के लिए इस दुर्घटना का फ़ायदा उठाया जाए. उसने मुझसे सलाह कर एक लावारिस लाश को मेरा नाम दे दिया और मुझे मृत घोषित करवा दिया.’’
थोड़ी देर चुप रहने के बाद उसने आगे बताना शुरू किया, ‘‘मेरी मृत्यु का चाचाजी को आसानी से विश्‍वास हो गया, क्योंकि यहां से दिल्ली जानेवाली हर ट्रेन में वह मुझे तलाश रहे थे, जिससे मेरे मरने का उन्हें पूरा विश्वास हो गया और चाचाजी ने मेरी तलाश बंद करवा दी. यहां का मामला शांत होते ही मैं मधुकर के साथ दिल्ली पहुंची, तो वहा एक दूसरा दुर्भाग्य मेरा पहले से ही इंतज़ार कर रहा था. घर के बाहर ही पता चल गया कि जगवीर की मां ने पहले मुझे गायब, फिर मरा हुआ जानकर अपनी पसंद की लड़की से उसकी शादी करवा दीं. उन्हें वैसे भी मैं पसंद नहीं थी. जब फोन कर मधुकर ने उसे बाहर बुलाया, तो मुझे देखकर वह जितना ख़ुश हुआ, उससे ज़्यादा परेशान हो गया. अजीब से धर्मसंकट में वह फंस गया था. तब मुझे बोलना ही पड़ा कि वह किसी को मेरे जीवित होने के विषय में कुछ ना कहे और मुझे मरा हुआ ही मान ले. तलाक़ का पेपर तैयार करवाए मैं समय पर आकर साइन कर दूंगी. मैं उल्टे पांव वापस आ गई. मधुकर ने ही मुझे अपने एक दोस्त के कंपनी में नौकरी दिलवा दिया. उसका एक्सपोर्ट-इंपोर्ट का बिज़नेस है. मैं इस कंपनी के लखनऊ वाले ब्रांच में काम कर रही हूं.
काम के सिलसिले में अक्सर पटना आती-जाती हूं. कभी-कभी अपना चेहरा ढंककर हाजीपुर के शिव मंदिर तक मां को देखने चली जाती हूं. वही किसी की नज़र मुझ पर गई और लोगों ने मुझे भटकती हुई आत्मा का ख़िताब दे दिया. एक दिन मां को मंदिर में अकेला पाकर मैंने अपने ज़िंदा होने की बात उन्हें बता दी. उन्होने चाचाजी के ख़तरनाक इरादे को समझते हुए किसी से कुछ नहीं कहा. उस दिन तुमसे मिलने भी मैं गई थी, क्योंकि प्लेन में ही तुम मुझे दिख गई थी. तुम्हे मंदिर तक आने का मैंने इशारा भी किया था, पर तुम मुझे भूत समझकर, शायद डर गई थी.’’
‘‘फिर क्या तुम्हारी मुलाक़ात जगवीर से कभी नहीं हुई?’’ पहली बार सुनंदा के मुंह से आवाज़ निकली थी.
‘‘हां, मुलाक़ात हुई थी, पर कोर्ट में तलाक़ लेने के लिए. वह एक लंबी-चौड़ी रकम भी मुझे देना चाह रहा था, पर मैंने इंकार कर दिया.’’
‘‘तब आगे तुमने क्या सोचा है?’’
जवाब मधुकर ने दिया, ‘‘मैंने इसे शादी के लिए प्रपोज किया है, पर यह कुछ फ़ैसला नहीं कर पा रही है. मैं और मेरी मां दोनों इस शादी के लिए तैयार हैं. मैं तो अपना ट्रांसफ़र भी लखनऊ करवा रहा हूं.’’
‘‘ठीक है. अगर यह तैयार नहीं हो रही है, तो अब तैयार होगी. इसकी तरफ़ से मैं हां करती हूं. मेरी दोस्ती की ख़ातिर मानवी को तुमसे शादी करनी ही होगी. क्यों मानवी चुप क्यों हो? कुछ तो बोलो.’’
सब की नज़रें मानवी पर टिकी थी. उसने मुस्कुराते हुए जैसे ही हामी भरी, वहां हंसी-खुशी का माहौल बन गया.
चार दिन बाद ही पटना के एक मंदिर में मधुकर और मानवी की शादी का समारोह साधारण ढ़ंग से संपन्न हो गया.
सुनंदा जब दोनों से विदा लेने गई, मधुकर से बोली, “तुम मानवी का ख़्याल रखना. इतनी सी उम्र में ही इसने बहुत दुख झेले है.”
मधुकर उसे आश्वस्त करते हुए बोला, ‘‘इससे पहले मानवी के साथ उसके चाचा ने चाहे जो किया, पर अब मानवी उन लोगों से नहीं डरेगी. सच सबके सामने आएगा. उन्हे भी तो पता चले कि उनके शक्तियों का दायरा चाहे कितना बड़ा भी क्यूं न हो, पर वह अंजाम के दायरे से बड़ा नहीं हो सकता, क्योंकि अंजाम हमेशा नियति ही निर्घारित करती है, इसलिए तुम निश्चिंत रहो अब मानवी के साथ कुछ भी ग़लत नहीं होगा.’’
अमेरिका लौटते समय सब से विदा लेकर जब सुनंदा फ्लाइट में बैठी, तो उसका मन बिल्कुल शांत था. अतीत का जो पन्ना उससे अलग होकर उसे दर्द दे रहा था, फिर से जीवन के किताब में जुड़ गया था.

Rita kumari
रीता कुमारी

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ढलती शाम के आसमान में छाया केसरिया रंग मुझे बेहद प्रिय है. किस उम्र में मन उस केसरिया रंग में रंगना शुरू हुआ वह तो याद नहीं, लेकिन जिस उम्र में मन स्मृतियों को संजोने लगा तभी से मैंने हर ढलती सांझ में ख़ुद को छत पर खड़े होकर आसमान को निहारते पाया. जाने क्या कशिश है इस संधि काल में कि मैं कहीं भी होती, कुछ भी काम कर रही होती, पैर अपने आप सीढ़ियां चढ़कर मुझे छत पर ले आते और मैं उस जादूगर की करिश्माई चित्रकारी में अचंभित मोहित-सी घंटों उस रंग में डूबी छत पर खड़ी रहती, जब तक कि वह केसरिया रंग गहरा लाल, फिर नीला, फिर बैंगनी होते हुए रात के काले आंचल में ना समा जाता.
उस दिन भी मैं छत पर खड़ी सांझ के आसमान को पल-पल रंग बदलते देख रही थी. सामने सड़क के उस पार लगे अमलतास और कचनार के घने पेड़ों पर पंछी कलरव कर रहे थे. नीलगिरी पर बने घोसलों में पंछियों की आवाजाही चल रही थी. गुलमोहर की शाखाओं में पंछियों का झुंड आ बैठता और एक साथ उड़ जाता. आसमान में भी झुंड के झुंड पंछी उड़कर अपने-अपने घरों को लौट रहे थे. मैं मुग्ध-सी इस दृश्य में खोई हुई थी कि अचानक ऐसा लगा कि मैं छत पर अकेली नहीं हूं कोई और भी है जो इस सांझ के जादू में खोया हुआ है. मैंने चौंककर इधर-उधर देखा, पड़ोसवाली छत पर कोने में मुंडेर पर हाथ रखे 20-22 साल का एक लड़का खड़ा था. पड़ोस में एक वृद्ध चाचा-चाची रहते थे, जिनके दोनों बेटे बाहर थे. यह शायद कोई मेहमान आया होगा. मैंने सरसरी निगाह से उसे देखा, ऊंचा-पूरा, साफ रंग, करीने से संवरे बाल. आसमान में उड़ते पंछियों को देखती उसकी नज़र अचानक मुझसे टकरा गई और मुझे अपनी और देखता पाकर वह मुस्कुरा दिया और मैं झेंपकर फिर आकाश को देखने लगी. लेकिन बरबस रोकने पर भी नज़र उसकी तरफ़ उठ जाती और उसे भी अपनी तरफ़ देखते पाकर दिल धड़क जाता. घिरती रात में जब मैं नीचे जाने लगी, तब मन आसमान के केसरिया रंग के साथ ही उसके चेहरे पर छिटके गुलाल में भीग चुका था. उस रोज़ अनायास ही कमरे में कदम रखते ही पांव आईने के सामने ठिठक गए और रातभर पूर्णिमा के चांद की चांदनी केसरिया रंग में लिपटी रही.
दूसरे दिन शाम बड़ी देर बाद आई और दोपहर बड़ी लंबी लगी. थोड़ा जल्दी ही छत पर पहुंच गई. आंखें सीधे सामनेवाली छत पर टिक गई, वह भी वही खड़ा इधर ही देख रहा था. मेरे पैर क्षणभर को कांप गए, धड़कने अनियंत्रित हो गई. मैंने दृष्टि सामनेवाले पेड़ों पर गड़ा दी, लेकिन मन उसकी ओर ही लगा रहा और तन उसकी नज़रों को अपने पर टिकी महसूस कर रोमांचित होता रहा. मैं जानने को व्याकुल हो रही थी कि वह कौन है.
दूसरे ही दिन मां से पता चला वह चाची के भाई का बेटा है और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए यहां आया है. उस दिन रसोईघर का बल्ब फ्यूज हो गया, तो मां ने खिड़की से आवाज़ देकर उसे ही बुलाया. शेखर, हां यही नाम था उसका और उस दिन वह छत से सीधे मेरे घर ही नहीं चुपके से मेरे दिल में भी भीतर चला आया. मैं टेबल पर बैठी पढ़ने का ढोंग किए किताब पर आंखें गड़ाए बैठी थी, लेकिन ध्यान सारा उस पर ही था. बल्ब बदलने के बाद वह कमरे के दरवाज़े पर क्षणभर को ठिठक गया, “क्या पढ़ती हो, किस ईयर में हो?”
मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ गए, दिल इतनी तेज़ी से धड़कने लगा कि मुंह से बोल ही नहीं निकल पाए. मां ने ही जवाब दिया, “फर्स्ट ईयर में है तुम भी तो साइंस पढ़े हो, इसे केमिस्ट्री पढ़ा दिया करना अगर समय हो एक घंटा.”
मेरे मन की तो बिना मांगे मुराद पूरी हो गई और दूसरे ही दिन से वह रोज़ शाम को मुझे पढ़ाने आने लगा. दिनभर अपनी पढ़ाई करता, शाम के सिंदूरी एहसास को हम दोनों साथ में जीते और धुंधलका छाते ही नीचे आकर पढ़ाई में लग जाते. कभी ज़िद करके मां उसे खाना खिलाकर ही मानती. यूं भी जब दोनों घरों के बीच पारिवारिक आत्मीयता थी, तो वह घर के सदस्य जैसे ही था. वह पढ़ाता तो मुझे आधा समझ आता आधा ध्यान उसमें रहता. कितना सौम्य, शांत, सुंदर था वह. आवाज़ विनम्र होकर भी गहरी थी. आंखें नीचे झुकी रहती मेरी, लेकिन उनके भाव कैसे कहां छुपाती. समझ तो शेखर को भी सब आ रहा होगा, लेकिन उसने कभी मर्यादा की सीमा का उल्लंघन नहीं किया.

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अठारहवें वर्ष में प्रवेश कर चुके मेरे मन के कुंवारे अनछुए भाव शेखर की आंखों में तैरते सिंदूरी डोरों से बंध गए थे. मन अजब-सी रूमानियत की ख़ुमारी में भीगा रहता. एकांत में मन करता कि उसके चौड़े सीने में अपना चेहरा छुपा लूं और वह मेरे बाल सहलाता रहे, लेकिन आंखों से सब कुछ स्पष्ट कर देने के बाद भी शेखर की ज़ुबान हमेशा ख़ामोश रही और व्यवहार सदा मर्यादित. चार महीने कब गुज़र गए पता नहीं चला. प्रतियोगी परीक्षा ख़त्म होने के दो ही दिन बाद उदास आंखों में तैरती नमी के बीच मुझे नज़र भर देख कर वह चला गया. फिर कभी नहीं लौटा. बहुत दिनों बाद पता चला उनकी शादी उनके पिता ने बचपन में ही अपने दोस्त की बेटी से पक्की कर दी थी. छत पर नितांत एकांत पलों में भी वह क्यों स्वयं पर इतना कठोर संयम रखते थे, तब समझ आया. मेरा कोमल मन टूट गया. अक्सर छत पर उनका मुस्कुराता चेहरा और बोलती आंखें याद कर रो देती. कैसे कहूं कि उन्हें भी मुझसे प्यार नहीं था, लेकिन पिता के वचन के विरुद्ध जाने के संस्कार नहीं थे उनके.
बरसों बीत गए, लेकिन आज भी मेरा पहला प्यार छत पर उसी कोने में मुस्कुराता खड़ा महसूस होता है. ढलती सांझ के आसमान के साथ ही मन का भी एक कोना शेखर के प्यार के केसरिया रंग में रंगा हुआ है. नीड़ों को लौटते पंछियों को देखकर एक कसक-सी उठती है मन में, काश! इन पंछियों की तरह मेरा शेखर भी कभी लौट पाता…

Dr. Vinita Rahurikar
डॉ. विनीता राहुरीकर
Love Story

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सोशल डिस्टेंसिंग करानेवाले कोरोना वायरस के जाने के बाद क्या सबके दिल मिल पाएंगे? क्या बच्चों में बाहर निकलने की, एक-दूसरे से मिलने-जुलने की नैसर्गिक उत्कंठा जागेगी?
दिनभर स्क्रीन में सिर दिए लोगों को आसपास सूखती रिश्तों की बेलों में अपने समय की खाद देकर हरियाने की इच्छा जागेगी. आज की चिंता क्या पर्यावरण के प्रति चिंतन में तब्दील होगी…

“हे भगवान्… कमरे का क्या हाल किया है तुम दोनों ने…”
शारदा ने कमरे छोटे-से कमरे को हैरानी से देखा. लैपटॉप से डाटा केबल द्वारा टीवी कनेक्ट करके एकलव्य और काव्या बिस्तर में बैठे कार्टून देख रहे थे… कुछ देर उनके पास बैठकर शारदा भी अजीब-सी आवाज़ निकालते कार्टून करेक्टर को देखने लगी. फिर कुछ ऊब से भरकर वह उठकर चली आई और बालकनी में बैठ गई. उन्हें अकेले बालकनी में बैठे देख बहू कविता ने उन्हें टोका, “क्या हुआ मां, आप यहां बालकनी में अकेले क्यों बैठी है…”
“क्या करूं, सुबह से कभी टीवी, तो कभी नेट पर कार्टून ही चल रहा है.“
“कार्टून नहीं एनीमेटेड मूवी है मां…”
“जो भी हो… सिरदर्द होने लगा है. दिनभर ये लैपटॉप नहीं, तो टीवी खोले बैठे रहते है… उनसे फुर्सत मिलती नहीं और जो मिल जाए, तो हाथों में मोबाइल आ जाता है… कुछ किताबे वगैरह दो बहू…”
“हां मम्मीजी, बेचारे अब करे भी तो क्या… इस कोरोना ने तो अच्छी-खासी मुसीबत कर दी. ईश्वर जाने कब स्कूल खुलेंगे…”
“मम्मी कोरोना को मुसीबत तो मत बोलो…”
काव्या की आवाज़ पर शारदा और कविता दोनों ने चौंककर काव्या को देखा, जो एकलव्य के साथ वॉशबेसिन में हाथ धोने आई थी…
काव्या की बात सुनकर कविता कुछ ग़ुस्से से बोली, “क्यों! कोरोना को मुसीबत क्यों न बोले?”
“अरे मम्मी, कोरोना की वजह से लग रहा है गर्मी की छुट्टियां हो गईं..” काव्या ने हंसते हुए कहा, तो कविता गंभीर हो गई.
“अरे! ऐसे नहीं बोलते काव्या… कोरोना की वजह से देखो कैसे हमारी आर्थिक व्यवस्था डांवाडोल हो रही है. इस वायरस का अब तक कोई इलाज नहीं निकला है. कितने लोग डरे हुए हैं. कितने लोग इसकी चपेट में आ गए है… और कितनों ने तो अपनी जान…”
“ओहो मम्मा, मज़ाक किया था और आप सीरियस हो गई… चलो सॉरी..” कविता के गले में गलबहियां डालते हुए काव्या उनकी मनुहार करती बोली, “छुट्टियां हो गई. पढ़ाई से फुर्सत मिल गई, इसलिए कह दिया.”
“ये मज़ाक का समय नहीं है समझी.” कविता ने डांटा, तो शारदा भी बड़बड़ा उठी…
“और क्या, आग लगे ऐसी छुट्टियों को. इस मुए कोरोना की वजह से पूरी दुनिया की जान सांसत में है और तू उसी को भला हुआ कह रही है. ऐसी छुट्टियों का क्या फ़ायदा, जिसमें न बाहर निकल पाए और न किसी को घर पर बुला पाए. न किसी से मेलजोल, न बातचीत… घूमना-फिरना सब बंद. सब अपने-अपने घरों में कैद कितने परेशान हैं…”
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“परेशानी कैसी दादी… टीवी, नेट सब तो खुला है न…” एकलव्य ने सहसा मोर्चा संभाल लिया…
“हम दोस्तों से जुड़े हैं. वाट्सअप और फोन से हमारी गप्पबाजी हो जाती है. मम्मी आजकल बढ़िया-बढ़िया खाना बना रही है… चिल दादी…” कहते हुए एकलव्य काव्या के साथ चला गया तो कविता शारदाजी से बोली, “मांजी रहने दीजिए, इनकी बात को इतना सीरियसली न लीजिए. वैसे देखा जाए, तो आज की जनरेशन का कूल रवैया हमारे लिए ठीक ही है… आज पूरे विश्‍व में इतनी भीषण विभीषिका आन पड़ी है, देश में घर में ही रहने का आह्वान किया जा रहा है. लोगों से दूर रहने को कहा जा रहा है. ऐसे में ये बिना शिकायत घर पर मज़े से बैठे है… ये कम है क्या…”
शारदाजी चुपचाप बहू की बातें सुनती रहीं…
“जानती हो मां, आज अख़बार में निकला है कि आपदा प्रबंधन में कोरोना वायरस को भी शामिल किया जा रहा है… और हां अब से विज्ञान के छात्र विभिन्न तरह के फ़्लू और बीमारियों के साथ कोरोना वायरस के बारे में भी पढ़ेंगे…”
“हां भई, परिवर्तन के इस युग में नई-नई चीज़ें पाठयक्रम में शामिल होंगी… जानती हो, जब मैंने उस जमाने में पर्यावरण का विषय लिया, तो लोग हंसते थे कि इसका क्या स्कोप है. आज देखो, पर्यावरण हमारी आवश्यकता बन गई… इसी तरह आज इस वायरस को लेकर जो बेचैनी की स्थिति बनी है, उसमे जागरूकता ज़रूरी है…”
अपनी शिक्षित सास की समझदारी भरी बातों से प्रभावित कविता देर तक उनसे वार्तालाप करती रही… फिर रसोई में चली गई. कविता के जाने के बाद शारदा ने अपनी नज़रे बालकनी से नीचे दिखनेवाले पार्क में गड़ा ली… पार्क में फैले सन्नाटे को देख मन अनमना-सा हो गया.
कोरोना के चक्कर में बाज़ार-मॉल सब बंद है… घर पर ऑनलाइन सामान आ जाता है. आगे की स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राशन इकट्ठा कर लिया गया है, सो सब निश्चिन्त है. स्कूल बंद है, पर बच्चे ख़ुश है… लोगो से मिलने-जुलने पर लगी रोक का भी किसी को ख़ास मलाल नहीं, क्योंकि बहुत पहले से ही सबने ख़ुद को वाट्सअप-फेसबुक के ज़रिए ख़ुद को बाहरी दुनिया से जोड़ लिया है… वैसे ही रिश्तों में दूरियों का एहसास होता था, अब तो दूरियां जीवनरक्षक है.
उन्हें एकलव्य की भी चिंता हो रही है. पहले ही उसका वज़न इतना बढ़ा हुआ है… अब तो दिनभर लैपटॉप या टीवी स्क्रीन के सामने बैठे खाना खाते रहना मजबूरी ही बन गई है… ये अलग बात है कि इस मजबूरी पर वो ख़ुश है, पर उन्हें बेचैनी है. सामान्य स्थिति में डांट-फटकार कर उसे घर से बाहर खेलने साइकिल चलाने भेजा जाता था. आज वो भी बंद है… हैरानी होती है कि आज के बच्चों को बाहर खेलने भेजना भी टास्क है.
यक़ीनन इसकी वजह वो ‘यंत्र’ है जिस पर दिनभर बिना थके लोगो की उंगलियां थिरकती है. वो ऊब रही है, क्योंकि लाख चाहने के बाद भी वो स्मार्टफोन से दोस्ती नहीं कर पाई. यश ने कितनी बार उनसे कहा, “मां, स्मार्टफोन की आदत डाल लो. समय का पता ही नहीं चलेगा.” स्मार्टफोन लाकर भी दिया, पर उन्हें कभी भी स्मार्टफोन पर मुंह गाड़े लोग अच्छे नहीं लगे शायद इसी वजह से उन्होंने इस आदत को नहीं अपनाया… इसीलिए आज वो उकताहट महसूस कर रही है… घर में क़ैद ऊब रही है, पर ये क़ैद इन बच्चों को महसूस नहीं होती. पार्क में न जाने का उन्हें कोई मलाल नहीं… फ्रेंड्स से आमने-सामने न मिलने की कोई शिकायत नहीं… ऐसे में उसे बच्चों के व्यवहार से कविता की तरह संतुष्ट होना चाहिए, पर मन बेचैन है.
रात का खाना बच्चों ने अपने-अपने कमरे में स्क्रीन ताकते हुए खाया.. वो भी खाना खाकर अपने कमरे में आकर लेट गईं… घर की दिनचर्या बिगड़ गई थी, ऐसा लग रहा था मानो काव्या और एकलव्य की गर्मियों की छुट्टियां चल रही हो. सहसा उन्हें बीते ज़माने की गर्मियों की छुट्टियां याद आई… यश काव्या की उम्र का ही था… गर्मियों की दोपहर को चोरी-छिपे खेलने भाग जाता था… गर्मी-सर्दी सब खेल पर भारी थी… सातवीं कक्षा में उसका वार्षिक परीक्षा का हिन्दी का पर्चा याद आया… चार बजे शाम का निकला यश सात बजे खेलकर आया, तो वह कितना ग़ुस्सा हुई थी.. “ऐसा करो, अब तुम खेलते ही रहो… कोई ज़रूरत नहीं है इम्तहान देने की, मूंगफली का ठेला लगाना बड़े होकर.” उसकी फटकार वह सिर झुकाए सुनता रहा.
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शारदाजी ये सोचकर मुस्कुरा उठीं कि यश को खेलने की एवज में उससे कितनी बार दूध-फल-सब्जी बिकवाई… कभी-कभी तो रिक्शा भी चलवाया. उसके मन-मस्तिष्क में कूटकूटकर भर दिया था, जो ढंग से पढ़ाई नहीं करते, ज़्यादा खेलते है, वो यही काम करते है. कितनी ग़लत थी वह… आज पछतावा होता है कि नाहक ही उसे खेलने के लिए डांटा. आउटडोर खेल के महत्व को उस वक़्त नकारा, जबकि आज चाहती है कि बच्चे खेले… खेलते भी है, पर मैदान में नहीं स्क्रीन पर… घर बैठे ही. वैसे ही आजकल खुले में खेलने को ठेलना पड़ता था. अब कोरोना के चलते वो भी नहीं हो सकता. अब बच्चों की मौज है… उन्हें कोई शिकायत नहीं, काश! वो शिकायत करते. यश की तरह… यश की खिलंदड़ी प्रवृत्ति को लेकर वह हमेशा चिंतित रही. आज उसके बच्चे खेलने नहीं जाते तो चिंतित है.
विचारों में घिरे-घिरे झपकी आई कि तभी काव्या और एकलव्य के चीखने से ही हड़बड़ाकर उठ बैठी… उनके कमरे में जाकर देखा, तो काव्या ख़ुशी से नाच रही थी… एकलव्य भी बहुत ख़ुश था. यश और कविता के मुख पर मंद-मंद मुस्कान थी… यश बोला, “मां, इनके इम्तहान कैंसिल हो गए…”
“मतलब…”
“मतलब अब बिना इम्तहान के ही ये दूसरी कक्षा में चले जाएंगे.”
“अरे ऐसे कैसे…”
“सब कोरोना की वजह से दादी, अभी-अभी स्कूल से मेल आया है, क्लास आठ तक सब बच्चे बिना इम्तहान के ही पहले के ग्रेड के आधार पर प्रमोट हो जाएंगे… हुर्रे मैं क्लास नाइंथ में आ गई…” वो उत्साहित थी.
“और मैं क्लास सेवन्थ में…”
“हां वो भी बिना मैथ्स का एग्ज़ाम दिए हुए…” काव्य ने एकलव्य को छेड़ा.
एकलव्य का हाथ मैथ्स में तंग है. सब जानते थे, इसलिए सब हंस पड़े.
इम्तहान नहीं होंगे, उसे सेलीब्रेट करने के लिए रात देर तक अंग्रेज़ी पिक्चर देखी गई…
शारदा अपने कमरे में आकर सो गई… सुबह आंख खुली, तो देखा सूरज की धूप पर्दों से भीतर आने लगी थी. आज कविता ने चाय के लिए आवाज़ नहीं लगाई, यह देखने के लिए वह उठी, तो देखा बेटे-बहू का कमरा बंद था.
आज न शनिवार था, न इतवार, न ही कोई तीज-त्यौहार फिर छुट्टी..? वो सोच ही रही थी कि तभी दरवाज़ा खुला… कविता कमरे से निकली, शारदा को देख बोली, “आज इन्हें ऑफिस नहीं जाना है, इसलिए देर से उठे. आप बालकनी में बैठो चाय वहीं लाते है.” सुबह और शाम की चाय अक्सर तीनों साथ ही पीते है. शारदा बालकनी में आकर बैठ गई… यश भी अख़बार लेकर बालकनी में पास ही आकर बैठ गया, तो शारदा ने पूछा “आज काहे की छुट्टी..”
“मां, कोरोना के चलते हमारी भी छुट्टी हो गई… आज सुबह मेल देखा, तो पता चला. हमें आदेश मिला है कि घर से काम करने के लिए…”
“ओह!..” कहकर वह मौन हुई, तो यश बोला, “पता नहीं ये कब तक चलेगा… घर से कैसे काम होगा.” यश के चेहरे पर कुछ उलझन देखकर शारदा ने परिहास किया, “क्यों तुम्हारे बच्चे बिना इम्तहान दिए दूसरी कक्षा में प्रवेश कर सकते है, तो क्या तुम घर से काम नहीं कर सकते…” यश हंसते हुए कहने लगा, “सच कहती हो मां… मुझे तो जलन हो रही है इनसे, बताओ, बिना इम्तहान के दूसरी क्लास में चले जाएंगे… “
शारदा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, तो यश बोला, “याद है मां, एक बार जब मुझे चिकनपाक्स हुआ था, तो भी मुझे इम्तहान देने पड़े थे वो भी अकेले…”
“अरे बाप रे! कैसे भूल सकती हूं. पहला पर्चा देकर घर आया और बस… ऐसे दाने निकले कि निकलते ही चले गए. सब बच्चों की छुट्टियां हुई, तब तूने इम्तहान दिए…”
“वही तो…” यश सिर हिलाते हुए कुछ अफ़सोस से बोला.
“बिना पढ़े मुझे तो नहीं मिली दूसरी क्लास… बीमारी में भी तुम मुझे कितना पढ़ाती थी. तुम पढ़कर सुनाती और मैं लेटा-लेटा सुनता रहता… जब तबीयत ठीक हुई, तब टीचर ने सारे एग्ज़ाम लिए. आज इन्हें देखो, मस्त सो रहे है दोनों.”
यश ने मां का हाथ थामकर कहा, “वक़्त कितना बदल गया है. मुझे याद है जब मुझे चिकनपाक्स हुआ था, तब मैं भी इनकी तरह क़ैद था घर में… छुआछूत वाली बीमारी के चलते न किसी से मिलना-जुलना, न किसी के साथ खेलना… बड़ा बुरा लगता था.”
“हां, बड़ा परेशान किया तूने उन पंद्रह दिन…”
“हैं अम्मा… ये परेशान करते थे क्या…” सहसा चाय की ट्रे लिए कविता आई और वह भी बातचीत में शामिल हो गई. शारदा यश के बचपन का प्रसंग साझा करने लगी.
“और क्या… एक दिन चोरी से निकल गया था बगीचे में… आम का पेड़ लगा था उस पर चढा बैठा था…” यश को वो प्रसंग याद आया और ख़ूब हंसा… “पता है कविता, मैं आम के पेड़ में चढा हुआ था अम्मा ने कहा एक बार तेरा चिकनपाक्स ठीक हो जाए, फिर बताती हूं.. मैं कितना डर गया था. लगा कि ठीक होऊं ही न….”
यह सुनते ही शारदा ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बड़ी ज्यादतियां की है तुझ पर…”
“कैसी बात कर रही हो मां… मैं था भी तो कितना शैतान कि मौक़ा मिलते ही बाहर भागने की सोचता… कभी क्रिकेट खेलता.. तो कभी फुटबॉल… कभी यूं ही पेड़ों में चढ़कर मस्ती करते…”
“जो आज जैसी सुविधाएं होती तो शायद तू बाहर निकलने को न छटपटाता…”
“अच्छा है जो आज जैसी सुविधाएं नहीं है. कम-से-कम हमने अपना बचपन तो जिया… सुविधाएं होती, तो शायद बचपन के क़िस्से नहीं होते… मां ये बच्चे अपने बचपन के कौन-से क़िस्से याद करेंगे.”
यश के मुंह से निकला, तो शारदा का मन भीग-सा गया. सहसा चुप्पी छा गई… तो कविता बोली, “कोरोना वायरस की वजह से हुई छुट्टियां और बिना इम्तहान दिए नई क्लास में प्रमोट होने जैसे क़िस्से याद करेंगे…”
हंसते हुए शारदा ने कविता से पूछा, “वो दोनों अभी उठे नहीं है क्या…”
“रात ढाई बजे तक चली है पिक्चर. इतनी जल्दी थोड़ी न उठनेवाले…”
“ठीक है सोने दे… उठकर करेंगे भी क्या, वही टीवी, नेट-गेम्स और स्मार्टफोन…” शारदा के कहने पर यश ने कहा, “अभी ये लोग सो रहे है… आओ, न्यूज सुन लेते है… देखे कोरोना वायरस का क्या स्टेटस है…”
“सच में बड़ा डर लग रहा है…” कविता ने कहा, तो यश बोला, “डरना नहीं है, वायरस से लड़ना है… अपने देश ने काबिलेतारीफ इंतज़ाम किए है. डब्ल्यूएचओ ने भी तारीफ़ की है, ये बड़ी बात है. आगे हमें ही सावधानियां रखनी है.” यश और कविता समाचार देखने चले गए..
शारदा सोचने लगी- कोरोना वायरस को भगाने के लिए जागरूक होना अतिआवश्यक है… सभी लोंगो के प्रयास से कोरोना देश-दुनिया से चला ही जाएगा… सैल्यूट है डॉक्टर को… सुरक्षाकर्मियों को और मीडियावालों को, जिनके काम घर से नहीं हैं.
इस वायरस से तो कभी-न-कभी छूटेंगे, पर उस वायरस का क्या… जिसने सबको दबोचा है और किसी को उसकी पकड़ में होने का अंदाज़ा भी नहीं है…
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मुआ इंटरनेट नाम का वायरस ज़रूरत के नाम पर घर-घर में प्रवेश कर चुका है. उसको दूर करने के इंतज़ाम कब होंगे. काश! समय रहते इसके प्रति भी जागरूकता आए, तो क्या बात हो… शायद बच्चों का बचपन बचपन जैसा बीते…
शारदा का मन बेचैन हो उठा. कुछ यक्ष प्रश्न उसके मन उद्वेलित करने लगे.
सोशल डिस्टेंसिंग करानेवाले कोरोना वायरस के जाने के बाद क्या सबके दिल मिल पाएंगे? क्या बच्चों में बाहर निकलने की, एक-दूसरे से मिलने-जुलने की नैसर्गिक उत्कंठा जागेगी?
दिनभर स्क्रीन में सिर दिए लोगों को आसपास सूखती रिश्तों की बेलों में अपने समय की खाद देकर हरियाने की इच्छा जागेगी. आज की चिंता क्या पर्यावरण के प्रति चिंतन में तब्दील होगी…
एक प्रश्न जो सबसे ज़्यादा उसे कचोट रहा था कि सब घर पर संतुष्ट है. वर्तमान की मांग होने पर भी आज ये संतुष्टि उसके मन को क्यों चुभ रही है?
“अरे मां, आप किस सोच में डूबी हैं…” कविता का स्वर उन्हें सोच-विचार घेरे से बाहर ले आया. भविष्य के गर्भ में छिपे उत्तर तो वर्तमान के प्रयासों और नीयत के द्वारा निर्धारित किए जाने हैं, ये सोचकर शारदा ने गहरी सांस भरी और उठ खड़ी हुईं…

मीनू त्रिपाठी
इतने समझदार कि जानकी चाहती रही मोबाइल पर रोज़ बात करें, पर संभव ने शादी की तारीख़ तक चार-छह बार ही बात की. बारात में गिनती के लोग आए. जानकी बड़ी हसरत से जयमाला के लिए मंच पर आई.
मतिभ्रम हुआ है कि यही यथार्थ है? जिसे चाचा समझा था वह डॉ. संभव हैं और जिसे डॉ. संभव समझ पहली नज़र में दिल दे दिया, वह उनके ठीक बगल में खड़ा उनका अनुज संयम है. जानकी सदमे में. संयम पूरी तरह चंचल हो रहा था, “भौजाईजी, भइया को माला पहनाइए.”
मैथिली भी यथार्थ पर अचंभित थी. उसने भी वही समझा था, जो जानकी ने, लेकिन अब स्थिति का सामना करना है. बोली, “पहना रही हैं भौजाईजी के देवरजी. थोड़ा धीर धरें.”…

विकास की ओर अग्रसर कस्बा-करारी. करारी का चार पुत्रियोंवाला साधारण-सा परिवार. निजी संस्थान के मामूली पद पर कार्यरत बाबूजी का स्तर साधारण है, पर लक्ष्य बड़ा है- पुत्रियों को कुछ दे सकें, न दे सकें, पर पढ़ने का पूरा अवसर देंगे.
बड़ी पुत्री जानकी हिंदी विषय में एमए उत्तीर्ण कर करारी की निजी स्कूल में प्राथमिक कक्षा में अध्यापन करते हुए इसी साल 25 की हुई है. उसके परिणय के लिए बाबूजी जहां भी गए, एक ही प्रश्‍न- कितना देंगे? बाबूजी पिटे हुए प्यादे की तरह घर लौट आते. कोई ख़बर नहीं थी बात बनेगी और आसानी से बनेगी. तय तिथि पर लड़केवाले जानकी को देखने आ रहे हैं. माता-पिता जीवित नहीं हैं. दो भाई हैं, जो चाचाजी के साथ आएंगे, लेकिन तीन नहीं, दो प्राणी ही तशरीफ लाए. जानकी से छोटी, मेहमानों की आवभगत में तल्लीन मैथिली, बुलावे के लिए सजकर तैयार बैठी जानकी से बोली, “चाचाजी और लड़का ही आए हैं. लड़का इतना सजीला है कि जानकी तुम्हारा जी मचल-मचल जाएगा.”
जानकी घबरा गई, “मैथिली, मैं तुम्हारी तरह बेशर्म नहीं हूं.”
“सजीले को देखकर मदहोश हो जाओगी. चलो, बैठक में तुम्हारी पुकार हो रही है.”
बैठक में सलज्ज जानकी की दृष्टि नहीं उठती थी. बड़ा ज़ोर लगाकर उसने अगल-बगल बैठे दोनों प्राणियों को देखा. सचमुच सजीला है. यदि कुछ पूछा जाएगा, तो बताते समय अच्छी तरह देख लेगी. वे दोनों इतने सज्जन निकले कि कुछ नहीं पूछा.
सज्जनों के जाने के उपरांत तीसरी बहन वैदेही ने पूछा, “जानकी, हरण करनेवाले कैसे लगे?”
“मैं बेशर्म नहीं हूं.”
बाबूजी योजना बनाने लगे, “लड़केवाले शादी जल्दी चाहते हैं. अगले माह अच्छा मुहूर्त है.”
अम्मा संशय में है, “सब कुछ बहुत अच्छा है, लेकिन संभव जानकी से 10 साल बड़े हैं.”
बाबूजी बेफ़िक्र हैं, “संभव डॉक्टर हैं. सुपर स्पेशिलाइज़ेशन, फिर प्रैक्टिस जमाने तक डॉक्टरों की इतनी उम्र हो जाती है. मुझे तो संभव बहुत सीधे-सादे और समझदार लगते हैं.”
इतने समझदार कि जानकी चाहती रही मोबाइल पर रोज़ बात करें, पर संभव ने शादी की तारीख़ तक चार-छह बार ही बात की. बारात में गिनती के लोग आए. जानकी बड़ी हसरत से जयमाला के लिए मंच पर आई.
मतिभ्रम हुआ है कि यही यथार्थ है? जिसे चाचा समझा था वह डॉ. संभव हैं और जिसे डॉ. संभव समझ पहली नज़र में दिल दे दिया, वह उनके ठीक बगल में खड़ा उनका अनुज संयम है. जानकी सदमे में. संयम पूरी तरह चंचल हो रहा था, “भौजाईजी, भइया को माला पहनाइए.”
मैथिली भी यथार्थ पर अचंभित थी. उसने भी वही समझा था, जो जानकी ने, लेकिन अब स्थिति का सामना करना है. बोली, “पहना रही हैं भौजाईजी के देवरजी. थोड़ा धीर धरें.”
जानकी के हाथों को सहारा देकर मैथिली और वैदेही ने माला डलवा दी. फोटो शूट के बाद जानकी अंदर कमरे में लाई गई. उसे ससुराल से आए वस्त्र पहनकर चढ़ावा के लिए तैयार होना है. तैयार होने का उमंग गायब था. बिछावन पर बैठकर हिचककर रोने लगी. अम्मा जानती थीं कि उस दिन चाचा नहीं आ पाए थे. जानकी ने सामान्य कद-सूरत व रंगतवाले संभव को चाचा और सजीले संयम को संभव समझ लिया है. उन्होंने बाबूजी से कहा था संभव अपनी उम्र से बड़े लगते हैं. दुबली जानकी अपनी उम्र से कम लगती है, पर बाबूजी ने निर्णय सुना दिया था, “लड़के का रूप-रंग नहीं, पद-प्रतिष्ठा देखी जाती है.” अम्मा विवश हुई. जानकी को इस तरह रोते देख, रिश्ते-नातेदार, महिलाएं पता नहीं क्या अर्थ लगाएंगी. वे उनसे बोलीं, “जानकी आज पराई हुई. ऐसे मौ़के पर रोना आ ही जाता है. आप लोग भोजन करें. मैं इसे आगे की रस्म के लिए तैयार कर दूं.”
उनके जाते ही अम्मा ने जानकी को गले से लगा लिया, मत रो जानकी.”
“अम्मा, तुमने मुझे धोखे में रखा.”

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“मैं नहीं जानती जानकी तुमने क्या देखा और क्या समझा. संभव की डॉक्टरी अच्छी चलती है. घर में पैसा भरा है.”
“तुम्हें पैसा दिखता है. अधेड़ नहीं दिखता?”
“35 का लड़का अधेड़ नहीं हो जाता. बाबूजी की हैसियत जानती हो. जो कर सकते हैं, कर रहे हैं. न रोओ. बात फैलेगी, तो बारात लौट सकती है. हम तो जीते जी मर जाएंगे.”
जानकी ने मान लिया विरोध का कोई मतलब नहीं. यदि बारात लौट गई, तो बहनों के विवाह में अड़चन आएगी. जिस संयम को पहली नज़र में दिल दे दिया, वह नफ़रत से भर जाएगा. छोटी हैसियतवालों को बड़े सपने नहीं देखने चाहिए. सजीले राजकुमार अमीरजादियों को मिलते हैं. वह तैयार होने लगी. संयम फोटोग्राफर को ले आया, “भौजाईजी, तैयार नहीं हुईं? फोटो शूट होना है.”
मैथिली ने माहौल को हल्का करने की कोशिश की, “ठहरिए, भौजाई के देवरजी. लड़कियों को तैयार होने में व़क्त लगता है. वह तो आप लड़के हैं कि कोट-पैंट पहना और हो गए तैयार.”
संयम, मैथिली को देखता रह गया, “आप लड़की हैं कि क्या हैं?”
“आना-जाना बना रहेगा. जान लीजिएगा हम मैथिली हैं.”
संयम पूरी रात संभव और जानकी के आसपास मंडराता रहा. किसी मित्र ने नियंत्रित किया, “बहुत ऊपर-ऊपर हो रहे हो. शादी तुम्हारी नहीं, भइया की हो रही है.”
“इस समय मैं भौजाई की ननद का रोल कर रहा हूं. मेरी बहन आज होती, तो इन्हें इसी तरह घेरे रहती.”
जानकी विदा होकर संगतपुर आ गई. बड़ा और व्यवस्थित मकान. पहली रात का आरंभ संभव ने अपनी पारिवारिक रूपरेखा बताकर किया.
“जैसा कि तुम जानती होगी पापा और मां डॉक्टर थे. यह मकान व संपत्ति उनकी बनाई हुई है. दोनों का अच्छा नाम था. उनके नाम का पूरा फ़ायदा मुझे मिल रहा है. वे हम तीनों भाई-बहन को डॉक्टर बनाना चाहते थे, पर संयम को आर्ट्स सब्जेक्ट अच्छा लगता था. बीकॉम के बाद लॉ किया. अब कचहरी में प्रैक्टिस करता है.”
“आपकी बहन भी है?”
“थी. मुझसे छोटी, संयम से बड़ी थी. मेडिकल कर रही थी. पापा-मां उसे छोड़ने हॉस्टल जा रहे थे. कार का एक्सीडेंट हो गया. तीनों नहीं रहे. मैं और संयम अचानक बेसहारा हो गए. पैसे की कमी नहीं थी, पर मानसिक संबल की ज़रूरत थी. चाचाजी ने बड़ा सहारा दिया. वे तुम्हें देखने आते, पर उन्हें छुट्टी नहीं मिली. मैंने संयम को बच्चे की तरह संभाला है. नादानी करे, तो अपना बच्चा समझकर माफ़ कर देना.”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है, जिसे पहली नज़र में दिल दे बैठी, जो आयु में उससे बड़ा है, उसे अपना बच्चा कैसे समझ सकती है? जिसे चाचाजी समझा, उसे पति कैसे समझ ले?
“जब मैं तुम्हें देखने आया तुम नाज़ुक लग रही थी. घर आकर मैंने साफ़ कह दिया था कि मिस मैच हो जाएगा. शादी नहीं करना चाहता था, पर संयम अड़ गया कि वह तुम्हें पसंद कर चुका है. चाचाजी अड़ गए कि उन्होंने तुम्हारे बाबूजी को उम्मीद दी है.”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. मैं संयम की पसंद और बाबूजी को दी गई उम्मीद की भेंट चढ़ गई.
“मां के बाद यह घर कभी घर नहीं लगा. वे पता नहीं कैसे इतना संभाल लेती थीं. मैं तो चाबियां देखते ही घबरा जाता हूं. संयम की स्थिति तो मुझसे भी दयनीय है. तुम हंसोगी, पर मुंह दिखाई में मैं तुम्हें चाबियां दूंगा. संभालो अपना घर.”
“चाबियां नहीं ले सकती. अभी आप मुझे ठीक तरह से नहीं जानते हैं, उस पर…”
“सात फेरों का बंधन मज़बूत होता है. घर तुम्हारा, ज़िम्मेदारी तुम्हारी. मैं मुक्त हुआ.”
जानकी संगतपुर में 10 दिन रही. संभव उसकी सहूलियत का ख़्याल रखते. संयम उसे प्रसन्न रखने का प्रयास करता, “अरे भाभी, तुम अच्छा आ गई. घर में मर्दाने चेहरे देखकर मैं संन्यासी बनता जा रहा था. यहां कामवाली बाई भी नहीं है कि उसका मुख देख लूं. खाना बनाने से लेकर बगीचे मेें पानी देने तक सारा काम बुढ़ऊ काका करते हैं.”
संभव मुस्कुरा दिए, “अब घर कैसा लगता है?”
“जन्नत. कचहरी जाने की इच्छा नहीं होती. लगता है भाभी के पास डटा रहूं.”
“शादी के बाद मेरे पैरों में बेड़ियां पड़नी चाहिए, पड़ गई तुम्हारे पैरों में.”
“सही फ़रमाते हो भइया. मां होतीं, तो भाभी को रसोई के राज-रहस्य बतातीं. आजकल मैं सास के रोल में हूं.”
संभव कृतज्ञ थे. “जानकी, दिनों बाद घर में रौनक़ लौटी है. इसी तरह मुझे सहयोग और संयम को स्नेह देती रहना.”
संयम ने अभूतपूर्व बयान दिया, “भइया के मुख से अब जाकर सहयोग, स्नेह, सहभागिता जैसे शब्द सुन रहा हूं, वरना वही एक्स रे, एमआरआई, ईसीजी, सिरिंज, ड्रिप. बाप रे! इसीलिए मैं डॉक्टर नहीं बना. डॉक्टर लोग बहुत कम हंसते हैं.” संभव हंसते हुए बोले, “मैं हंस रहा हूं.”
“अब थोड़ा हंसने लगे हो भइया. भाभी, भइया तुम पर लट्टू हैं. मैं हौसला न बढ़ाता, तो कुंआरे रह जाते.”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. यह हो जाता, तो विधाता शायद मेरा संयोग तुमसे जोड़ देते संयम…
जानकी करारी लौटी. अम्मा गदगद.
“दोनों भाइयों में बहुत प्रेम है. जानकी तुम संयम को संभव से कम न मानना.”
“संयम को कम नहीं बढ़कर मानती हूं.”
मैथिली बोली, “न सास-ससुर की रोक-टोक, न ननद की दादागिरी. जानकी मुझे जो ऐसा घर मिल जाए, तो ख़ूब मौज उड़ाऊं.”
“मेरा विवाह संयम से होता, तो मैं भी उड़ाती.”
अम्मा ने मैथिली को डपट दिया, “कुछ भी बोलती है. जानकी, बाबूजी से कहूंगी डॉक्टर साहब को फोन करके कहें कि तुम्हें लेने दोनों भाई आएं.”
मेरी नज़र तो संयम पर टिक गई है. चाहती हूं कि डॉक्टर साहब नहीं, संयम आएं.

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लेकिन संभव आए. जानकी निरुत्साहित.
कार ड्राइव कर रहे संभव ने उसके निरुत्साह को लक्ष्य किया, “उदास हो?”
“संयम को भी लाते.”
“उसे बुख़ार है.”
“कब से?”
“उदास थी, अब घबरा गई?”
घर पहुंचकर संभव ने संयम का टेंपरेचर चेक किया.
“मैं इसकी हाय-तौबा से परेशान हो गया हूं. जानकी अब तुम करो इसकी सेवा.”
संयम ने मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी, तुमने मेरी केयर भइया से कम की, तो मैं तहलका मचा दूंगा. देवर का अर्थ जानती हो?  दूसरा वर. मैं तुम्हारा दूसरा वर हूं.”
जानकी उसे अपलक देखती रही. संकेत तो नहीं दे रहा है? इस तरह घेरे रहता है जैसे समीपता चाहता है. इसी को मन में बसाकर तो यहां रहने की कोशिश कर रही हूं, पर जानकी की क़िस्मत में सदमे ही लिखे हैं.
बाबूजी अचानक आए, “डॉक्टर साहब, मैथिली ने बीएससी कर लिया है. एमएससी बायो टेक में करना चाहती है. करारी में यह विषय नहीं है. कहें तो यहां रहकर पढ़े. जानकी को अकेलापन नहीं लगेगा.”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. बाबूजी ने मेरा इस्तेमाल करने के लिए ही मुझे अधेड़ से ब्याह दिया है. सास-ससुर का झमेला नहीं है, इसलिए इन लोगों को चाहे जब टपक पड़ने की पात्रता मिल गई है. अभी अम्मा बीमार पड़ीं, बाबूजी यहां पटक गए कि करारी के डॉक्टर बेव़कूफ़ हैं. संभव अच्छा इलाज करेंगे. क्षीण बुद्धि संभव ने उपचार किया और माता जैसा आदर दिया. अब मैथिली पढ़ना चाहती है. फिर वैदेही फिर छोटी सिया. मैं अपने घर में, ख़ासकर संयम को लेकर दख़ल नहीं चाहती. बोली, “बाबूजी, सुनो तो…”
लेकिन क्या करे इस क्षीण बुद्धि प्राणनाथ का. अविलंब कहा, “बाबूजी, सुनना क्या है? आपका घर है. मैथिली रहेगी, तो चहल-पहल बनी रहेगी.”
बाबूजी उद्देश्य पूरा कर चलते बने. जानकी सदमे में. संभव ने हाल पूछा, “जानकी परेशान लगती हो.”
“बाबूजी आप पर भार डाल रहे हैं. मुझे संकोच होता है.”
“संकोच क्यों? इस घर में तुम्हारा अधिकार है.”
संयम ख़ुश हो गया, “बुला लो भाभी. मैथिली ने शादी में बहुत सताया था. गिन-गिनकर बदला लूंगा.”
मैथिली आकर माहौल में रंग भरने लगी. जानकी को संदेह नहीं पुख्ता विश्‍वास है कि मैथिली, संयम को लपेटे में लेने के लिए यहां स्थापित हुई है. उसमें रुचि लेकर संयम चालबाज़ी दिखा रहा है. फोर्थ सेमिस्टर पूरा होते-होते समझ में आ गया रचना रची जा चुकी है. राज़ खोलने का भार संयम पर डाल फोर्थ सेम की परीक्षा होते ही मैथिली करारी खिसक ली कि उसकी अनुपस्थिति में संयम प्रस्ताव पारित करा ले.
संयम प्रस्ताव लेकर जानकी के सम्मुख आया, “भाभी, कुछ कहना है.”
“कहो.”
“भइया से कहने की हिम्मत नहीं हो रही है. तुम मेरी अर्जी उनके दरबार में लगा देना.”
जानकी सब समझ रही है, पर फिर भी कहा, “अर्जी का मजमून तो सुनूं.”
“मैं मैथिली से शादी करना चाहता हूं.”
अब तक का सबसे भीषण सदमा. इस तरह चीखकर अभद्रता दिखाते हुए जानकी पहली बार बोल रही है, “पागल हुए हो?”
“उसी दिन पागल हो गया था, जब मैथिली को पहली बार देखा था.”
“मैथिली प्रेम-वेम पसंद नहीं करती.”
“उसका समर्थन है. कह रही थी तुम्हारा सामना नहीं कर सकेगी, इसलिए जब वह करारी चली जाए, तब मैं तुमसे बात करूं.”
जानकी रो देगी.
“देखती हूं संयम तुम्हारे भइया क्या कहते हैं?”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. जिसे पहली नज़र में दिल दे दिया, वह मैथिली के नाम की लौ जलाए बैठा है. मैथिली कितनी घाघ है. मेरी स्थिति जानती है, फिर भी… ज़रूर अम्मा ने भेजा होगा कि संयम पर मोहिनी डाले. एक और लड़की के हाथ सस्ते में पीले हो जाएं. मैथिली ने ऐसी मोहिनी डाली… नहीं, मुझे मनचाहा नहीं मिला, मैं मैथिली को मनचाहा नहीं पाने दूंगी.
जानकी को रातभर नींद नहीं आई. ख़ुद को असहाय, उपेक्षित पा रही है. संभव की संगत नहीं चाहती, पर वे अपनी भलमनसाहत में उसके समीप आना चाहते हैं. संयम की संगत चाहती है, पर वह पकड़ से छूटता जा रहा है. अब उसके व्यवहार में रोमांच नहीं कपट का आभास होता है. पहले दिन से ही मैथिली को पाने की योजना बना रहा था. योजना सफल हो, इसलिए भाभी… भाभी… कहकर उसकी ख़ुशामद करता रहा.
जानकी निराशा, ईर्ष्या, क्रोध, बौखलाहट से गुज़र रही थी. अम्मा का फोन बौखलाहट को पराकाष्ठा पर ले आया.
“जानकी, मैथिली ने सब समाचार बताया. तुमको लेकर वह बड़े संकोच में है, पर संयम उससे शादी करना चाहता है. हमारे तो भाग्य जाग गए. दोनों बहनें मिल-जुल कर रहोगी. बाबूजी इतवार को डॉक्टर साहब से बात करने आएंगे.”
जानकी बौखलाहट में ललकारने लगी, “अम्मा, तुमने मैथिली को जान-बूझकर पढ़ने के बहाने मेरे घर भेजा कि संयम पर मोहिनी डाले. संयम, मोहिनी की चाल में फंस गया. क्षीण बुद्धि डॉक्टर साहब को क्या कहूं? संयम उनके दिमाग़ में इतना घुस गया है कि उसकी ख़ुशी के अलावा इन्हें कुछ नहीं सूझता.”
“नहीं…”
“मैं बोलूंगी अम्मा. तुम्हें मैथिली का बड़ा ख़्याल है. मुझे धोखे में रखकर अधेड़, बदसूरत के साथ बांधा, तब मेरा ख़्याल नहीं आया था? जब ये दोनों भाई मुझे देखने आए थे, मैंने डॉक्टर साहब को चाचा, संयम को डॉक्टर साहब समझ लिया था. तुम जानती थी असलियत क्या है, लेकिन मुझे नहीं बताया. मेरे साथ कपट किया.”
“नहीं बेटी…”

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“मैं बोलूंगी अम्मा. मैं अब भी सदमे से उबर नहीं पाई हूं. अच्छी चाल चली तुम लोगों ने. मेरा दिमाग़ ख़राब है. इस विषय में मुझसे बात न करना.”
जानकी ने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया. ठीक इसी क्षण स्वर उभरा, “भाभी…”
जानकी के कान बज रहे हैं या संयम कचहरी से लौट आया है?
बैठक में बैठी, तेज़ आवाज़ में अम्मा को ललकार रही जानकी को आभास नहीं था कि ज़रूरी फाइल लेने के लिए अचानक आ पहुंचा संयम उसकी कटुता सुनकर बैठक से लगे बाहरी खुले बरामदे में ठिठका खड़ा है. इसके आने की आहट नहीं मिली या दबी चाप से बैठक में दाख़िल हुआ है.
“संयम तुम? जल्दी आ गए.”
“फाइल भूल गया था.”
“पानी पियोगे?”
“हां.”
जानकी को राहत मिली कि संयम ने फोन पर की गई उसकी बातचीत नहीं सुनी. सुनता तो प्रतिक्रिया ज़रूर देता.
लेकिन जानकी महसूस करने लगी है कि संयम बहुत बदल गया है. कुटनी मैथिली करारी क्या गई, संयम की हंसी ले गई.”
“संयम, मैथिली की याद आ रही है?”
“उससे मेरा कोई वास्ता नहीं.”
“शादी नहीं करोगे?”
“नहीं.”
“क्यों?”

अम्मा से तुम जो बातें कर रही थीं, सुनकर शादी से मेरा विश्‍वास उठ गया. शादी के समय तुम्हारे मन में जो भी था, पर भइया के इतने अपनेपन को देखकर तुम्हारी धारणा में बदलाव नहीं आना चाहिए था? अधेड़, बदसूरत… भइया में इतने गुण हैं, पर तुम इस मामूली बात पर अटकी हो कि वे ख़ूबसूरत नहीं हैं? तुम तो बहुत ख़ूबसूरत हो, पर दिल साफ़ नहीं है, तो ख़ूबसूरती किस काम की? कपट तो हम लोगों के साथ हुआ है. सोचता था तुमने भइया का जीवन परिपूर्ण कर दिया है. उनकी भावनाओं को समझती हो. सब ढोंग. भैया हमेशा मुझसे कहते हैं कि मुझे फुर्सत नहीं मिलती, संयम तुम अपनी भाभी का ख़्याल रखा करो. मैंने तुम्हें इतना मान-सम्मान दिया, ख़्याल रखा… छी… छी…”

“संयम सुनो तो…”
“तुम सुनो. मिस मैच होगा सोचकर भइया शादी का मन नहीं बना रहे थे. मैं अड़ गया, मुझे तुम बहुत अच्छी लगी हो. अफ़सोस, मैं ग़लत था.”
“सुनो तो…”
“तुम सुनो. मैं मानता हूं कि भइया जैसे इंसान के लिए जो अच्छे विचार नहीं रखता, वह अच्छा नहीं हो सकता. भइया मेरे लिए क्या हैं, तुम नहीं समझोगी… मेरे लिए उनसे बढ़कर कुछ नहीं है. न तुम, न मैथिली.”
“संयम…”
“मैंने तुम्हारे भीतर का कालापन देख लिया, पर भइया को मत दिखाना. वे तुम पर विश्‍वास करते हैं. उन्हें तकलीफ़ होगी. उनके सामने मेरे साथ सहज व्यवहार करती रहना. मैं भी नाटक करता रहूंगा. नहीं करूंगा, तो भइया को कारण क्या बताऊंगा.”
संयम वहां से चला गया.
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. संयम की आंखें सुलग रही थीं. शब्द लड़खड़ा रहे थे. कितना अपमानजनक है भाभी… भौजाई… रटनेवाले जिस देवर ने एक दिन दूसरा वर होने जैसी बात की थी. आज उसे भाभी कहने से भरपूर बच रहा था.

सुषमा मुनीन्द्र
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सुषमा मुनीन्द्र

परिमल शिवानी के प्रति एक अजब-सा खिंचाव महसूस करने लगा. उसने स्वयं पर पूरा नियंत्रण रखा. न कभी कुछ कहा, न कुछ इंगित ही किया, पर रात को बिस्तर पर लेटते ही वह जागी-मुंदी आंखों के समक्ष साकार हो उठती और बहुत चाहकर भी वह उस छवि को अपने मस्तिष्क से दूर न कर पाता…

कुछ अजब-सी उलझन में थे परिमल उन दिनों. उच्च जीवन मूल्योंवाले संस्कारयुक्त परिवार में पले-बढ़े परिमल को अपने आस-पास की दुनिया अति विचित्र लगती. अपने सहपाठियों की बातें, उनका व्यवहार अचम्भित करता था उन्हें. उस समय की पीढ़ी, जो आज पुरातनपंथी कहलाती है, वही तब उन्हें बहुत आधुनिक लगा करती थी.
मां-बाऊजी देहात छोड़ शहर आ बसे थे, ताकि बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सकें. बच्चे सब होनहार निकले, माता-पिता की आकांक्षाओं पर खरे उतरे, फिर भी घर का वातावरण सीधा-सरल ही बना रहा. काम के प्रति निष्ठा, सत्य बोलना, ईमानदारी आदि संस्कारों की ही विरासत मिली थी परिमल और उसके भाई-बहन को.
ऐसे संस्कारी व्यक्ति को एक बेहद आम बीमारी हो गई. प्यार हो गया था उसे. वह भी अपनी ही छात्रा से. वह अपने मन की बात कहे भी तो किससे! यही उलझन थी.
परिमल का प्यार उस सैलाब की तरह भी तो नहीं उमड़ा था, जो सीमाएं तोड़, वर्जनाओं को नकारता हुआ, दीवानावर आगे बढ़ता है. ऐसा प्यार तो अपना ढिंढोरा स्वयं ही पीट आता है, किसी से कहने-सुनने की ज़रूरत ही कहां पड़ती है. लेकिन परिमल का प्यार तो एक सुगन्धित पुष्प की तरह था. उस फूल की ख़ुशबू स़िर्फ उसी को सम्मोहित कर रही थी. और कोई नहीं जानता था, स्वयं शिवानी भी नहीं. जान भी कैसे सकती थी, परिमल उसे बताए तब न!
हुआ यूं कि परिमल ने एमए कर लिया, तो आगे पीएचडी करने की चाह भी हुई, ताकि किसी कॉलेज में व्याख्याता का पद पा सके. परंतु वह अपने माता-पिता पर बोझ नहीं बनना चाहता था. घर में एक छोटा भाई व बहन और थे. उनके प्रति माता-पिता की ज़िम्मेदारियां अभी बाकी थीं. सो, परिमल ने तय किया कि वह नौकरी करके घर की सहायता न भी करे, पर अपना ख़र्च तो निकाल ही सकता है. अतः उसने अपनी डॉक्टरेट की पढ़ाई करने के साथ-साथ सायंकाल ट्यूशन पढ़ाने की ठानी.
उसने अंग्रेज़ी साहित्य में एमए किया था और मध्य प्रदेश के उस छोटे से शहर में अंग्रेज़ी पढ़ानेवालों की ख़ूब मांग थी. परिमल के ही प्रो़फेसर ने उसे अपने एक परिचित की बेटी को पढ़ाने का काम दिलवा दिया.
शिवानी के महलनुमा घर में घुसते, पहली बार तो परिमल को कुछ हिचक-सी हुई. पर थोड़े ही दिनों में वह उस माहौल का आदी हो गया. घर के सभी सदस्यों का व्यवहार बहुत शालीन और स्नेहयुक्त था. किसी में भी अपने वैभव का दर्प नहीं. कारण था गृहस्वामिनी का स्वस्थ दृष्टिकोण. शिवानी से दस वर्ष ज्येष्ठ शशांक की अधिकांश शिक्षा मुंबई में हुई थी. उसका विवाह भी हो चुका था और अब वह पारिवारिक व्यवसाय संभाल रहा था.
शिवानी की शिक्षा चूंकि उसी शहर में आस-पास के स्कूलों में ही हो पाई थी, इसलिए उसे अब कॉलेज में अंग्रेज़ी को लेकर द़िक़्क़त आ रही थी. इसके अलावा माता-पिता को लगा कि अंग्रेज़ी का अच्छा ज्ञान न होने पर उसका रिश्ता किसी बड़े शहर के आधुनिक परिवार में संभव न हो पाएगा.
अतः परिमल को उसे पढ़ाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई.
अब तक जिन लड़कियों से भी परिमल का परिचय हुआ था, उन सब से शिवानी एकदम भिन्न थी. मासूम और निश्छल. उसका यही सरल स्वभाव उसके चेहरे को अनोखी मुग्धता प्रदान करता था, जो बरबस मन को आकर्षित करती थी.
कुछ माह पढ़ाने के पश्‍चात् ही परिमल शिवानी के प्रति एक अजब-सा खिंचाव महसूस करने लगा. उसने स्वयं पर पूरा नियंत्रण रखा. न कभी कुछ कहा, न कुछ इंगित ही किया, पर रात को बिस्तर पर लेटते ही वह जागी-मुंदी आंखों के समक्ष साकार हो उठती और बहुत चाहकर भी वह उस छवि को अपने मस्तिष्क से दूर न कर पाता…
कभी-कभी शशांक से भी मुलाक़ात हो जाती. वह परिमल से तीन-चार वर्ष ही बड़ा था और दोनों में अच्छी पटने लगी थी. तीव्र बुद्धि शशांक उसके मनोभावों को थोड़ा-बहुत समझने लगा था. परिमल की विद्वता व उसके संयमित व्यवहार से प्रभावित भी था वह. शायद इसीलिए जब उसने परिमल को बताया कि मां-पिताजी शिवानी के विवाह की सोच रहे हैं और एक चार्टर्ड अकाउंटेंट से रिश्ते की बात भी चल रही है, तो यह कहते हुए उसने परिमल के चेहरे की ओर एक आशाभरी नज़र से देखा भी. शायद वह परिमल की प्रतिक्रिया जानना चाह रहा था, पर मन में घुमड़ते अवसाद को परिमल चुपचाप पी गया. उसके लिए शिवानी की ख़ुशी ही सर्वोपरि थी, उसकी अपनी चाहत से भी बढ़कर.
वह जानता था कि अभी उसे अपने पैरों पर खड़ा होने और विवाह लायक धन जुटाने के लिए पांच-सात वर्ष और संघर्ष करना होगा. तब भी वह शिवानी को वह सब सुविधाएं नहीं दे पाएगा, जिनकी वह आदी है या जो एक सीए पति से उसे मिल सकती हैं. इसके अलावा वह दोनों परिवारों के आर्थिक और सामाजिक अंतर को भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था.
परिमल की स्मृति में ताउम्र अंकित रही वह आख़िरी सांझ. सात बजने को थे कि शशांक आकर चुपचाप बैठ गया. उसने जैसे ही पढ़ाना समाप्त किया, तो शशांक ने बताया कि शिवानी का रिश्ता तय हो चुका है और अगले रविवार को सगाई की रस्म है, जिसके लिए उसे कुछ ख़रीददारी इत्यादि करनी होगी. अतः अब वह आगे और नहीं पढ़ पाएगी.
दरक गया था परिमल का मन. पर उसने मुबारक़बाद देते हुए भी शिवानी की तरफ़ नहीं देखा. अतः जान नहीं पाया कि वह किस कठिनाई से स्वयं को रोके खड़ी थी.
एक पूरा कालखंड ही बीत गया इस बात को. वर्षों की गिनती करें, तो चालीस वर्ष से कुछ ही कम. शिवानी की बेटी का विवाह हो चुका और वह नानी भी बन चुकी. पर कुछ चित्र स्मृति में आज भी यूं अंकित हैं, मानो पत्थर पर खुदे ऐतिहासिक शिलालेख हों. लेख नहीं, चित्र- अमिट-से शिलाचित्र.

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वयःसंधि पर खड़ी थी तब वह. पहली बार मन में प्यार की कोपल फूटी थी. परिचित नहीं थी वह इस विचित्र-से एहसास से. लगा था, जैसे एक सुवासित बयार सहलाने लगी हो तन-मन को. शिवानी जब भी उदास होती है, हताश होती है, ऊर्जा पाने उसी बीते कल में पहुंच जाती है. बेटी के ब्याह के बाद से तो और भी अकेली पड़ गई है वह. प्रायः स्वयं से बातें करती रहती है.
‘ज़माना कितना बदल गया है. कितनी समझदार है आज की पीढ़ी. अपने फैसले लेने में सक्षम, अपने हक़ों के बारे में सचेत. और एक मैं थी, कितनी नादान. सच कहूं तो मैं बेवकूफ़ ही थी. उस समय के मापदंड से भी. विवाह होने तक भी यही समझती रही कि विवाहित स्त्रियां बहुत से जेवर पहन लेती हैं, तभी उनके बच्चे हो जाते हैं. सरल हृदया मां ने कुछ बताया नहीं था. तब ऐसा प्रचलन भी नहीं था. इसी सादगी में एकदम आदशर्र् जीवन जीने का ही प्रयत्न किया.
‘वह मुझे पढ़ाने आते थे. झा अंकल के परिचित थे, सो पिताजी ने बिना झिझक उन्हें मुझे पढ़ाने के लिए हामी भर दी. बहुत उसूलों वाले थे परिमल सर. अन्य युवकों से एकदम भिन्न. नैतिकता की साक्षात् प्रतिमूर्ति. दो वर्षों में बहुत क़रीब से जाना उन्हें और वह मन को भाने लगे. उनके कारण पढ़ने में रुचि आने लगी. जाने क्यों मन को विश्‍वास था कि मैं भी उन्हें अच्छी लगती हूं. नहीं! कहा किसी ने भी कुछ नहीं. एक बार भी नहीं. पर बिना शब्दों में बांधे भी तो बहुत कुछ सुन-समझ और कह लिया जाता है न?
‘मां-पिताजी ने यहां विवाह तय कर दिया. कुछ नहीं कह पाई. हिम्मत ही नहीं जुटा पाई. कहती भी तो मानते क्या? पिताजी को अपने वैभव पर गर्व भले ही कभी नहीं रहा, पर मेरे सुखद भविष्य की उन्हें चिंता थी, सीए दामाद को छोड़कर मात्र एमए पढ़े एक बेरोज़गार युवक से अपनी बेटी का विवाह करने की बात पर राज़ी हो जाते क्या?
‘विवाह के उपरांत जीवनसाथी स़िर्फ अपने ही हित की सोचे, केवल अपनी ही इच्छाओं, ज़रूरतों व सुविधाओं का ख़याल हो उसे, तो कैसा होगा जीवन? पुरुष रूप में पैदा होने के कारण शक्ति और अधिकार, सब तो जन्म से ही मिले हैं उन्हें. मन की उलझन और परेशानी को वे क्या बांट सकेंगे? बुख़ार से तप रही होऊं तो पलभर पास खड़े होकर हालचाल ही पूछ लें, इतनी भी उम्मीद नहीं.
दुख-तकलीफ़ में नितान्त अकेली पड़ जाती हूं. ख़ासकर बिटिया के ब्याह के बाद से. ख़ैर, ज़िंदगी तो गुज़र ही रही है, गुज़र ही गई समझ लो, अगर ज़िंदा रहना भर काफ़ी मान लिया जाए तो. कभी मन उदास होता है, तो सोचती हूं कि क्या स़िर्फ पैसा ही ख़ुशियों की गारंटी हो सकता है? हीरे-मोती पहनने की चाह नहीं की थी, एक संवेदनशील साथी मिल गया होता, बस.’
भूल नहीं पाई परिमल को शिवानी. पति जब भी कोई कड़वी बात कह देते, जब कभी वह स्वयं को अवांछित-सा महसूस करती, तो परिमल को याद कर अपना मनोबल बढ़ा लेती. कल्पनाओं में जाने कितनी बार परिमल के कंधों पर सिर रखकर ढेर-से आंसू बहाए हैं उसने, अपनी हर तकलीफ़ उससे बांटकर अपना जी हल्का किया है.
समय तो स्वचलित क्रिया है, सो चलता ही रहता है. शिवानी के भैया-भाभी के विवाह की पचासवीं वर्षगांठ आने को है- गोल्डन एनिवर्सरी, जिसे उनके बेटे ने धूमधाम से मनाने की योजना बनाई है.
पिता तो बेव़क़्त चल बसे थे और मां का भी देहांत हो चुका, पर भाई-भाभी ने कभी शिवानी को मां-बाप की कमी महसूस नहीं होने दी. भैया के लिए आज भी वह प्यारी-सी छोटी बहना है. उसे भी इंतज़ार है आगामी उत्सव में सम्मिलित होने का. पति काम के बहाने जाना टाल गए और बिटिया-दामाद भी दूर की पोस्टिंग पर हैं, अतः वह अकेली ही पहुंची भाई के घर.
पार्टी अपने पूरे ज़ोरों पर है. वह सारे नाते-रिश्तेदारों से मिल चुकी. भाई के मित्र भी बारी-बारी से अभिवादन कर गए. उनमें ज़्यादातर नए थे, जिनसे वह नाममात्र को ही परिचित है. बहुत बोलनेवाली तो वह वैसे भी कभी नहीं रही, अतः सब से मिल-मिलाकर वह एक कोनेवाली मेज़ पर आ बैठी.
भैया से उसे पता चला है कि आज के उत्सव में सम्मिलित होने परिमल भी आनेवाले हैं और वह उनसे मिलने की अनुभूति को पूर्णतः महसूस करने के लिए पूरा एकांत चाहती है.
उसकी दृष्टि मुख्य द्वार पर टिकी है, ताकि वह परिमल के भीतर आते ही उन्हें देख सके और एक पल भी व्यर्थ न जाए. वह जानती है कि वह बहुत बदल चुके होंगे, पर कुछ भी हो, वह उन्हें पहचान लेगी. यादों में सदैव ही तो उसके साथ रहे हैं वह…
स्टेज पर कुछ कलाकार पुरानी फ़िल्मों के गीत हल्के स्वरों में गा रहे हैं, जो माहौल को उसी 40-50 वर्ष पूर्व के काल में ले गए हैं और शिवानी भी अपनी तमाम बीमारियां और दर्द भूलकर अपने ख़यालों में उसी यौवन के द्वार पर आकर जैसे ठिठक गई है.
आज वह अपनी यादों के साथ अकेली ही रहना चाह रही है. उस विगत काल में पहुंच चुकी है वह, जब यौवन ने नई-नई दस्तक दी थी. दुनिया एकाएक ख़ूबसूरत लगने लगी थी. पूरे परिवार का स्नेह पाती थी वह, पर उसे शाम का वह एक घंटा ही अज़ीज़ लगने लगा था, जब ‘सर’ उसे पढ़ाने आते थे.
धीरे-धीरे उस के मुख से ‘सर’ कहना भी छूटता जा रहा था. उनसे बात करते व़क़्त बिना सम्बोधन के ही काम चलाती. मन ही मन वह उन्हें चाहने लगी थी, पर शर्मीली और मितभाषी शिवानी किसी को नहीं बता पाई थी अपने मन की बात.
मुख्य द्वार से भीतर आनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को वह बड़े ध्यान से देख रही है. अधिकांश पुरुष गंजे अथवा सफ़ेद बालों वाले हैं. हां, स्त्रियां अनेकरूपा हैं. कुछ अपनी उम्र छिपाने के लोभ में सौन्दर्य प्रसाधनों से रंगी-पुती व गहनों से लदी-फंदी होने पर भी फूहड़ ही लगती हैं और कुछ बिना साज-शृंगार व सामान्य कपड़ों में भी शालीन.
कुल मिलाकर माहौल कुछ ऐसा है, जैसा विवाह के अवसरों पर होता है, सिवाय इसके कि अधिकतर अतिथि बड़ी उम्र के हैं. विवाह के अवसर पर चढ़ती उम्र की रौनक होती है. वर-वधू के संगी-साथी, चचेरे-ममेरे भाई-बहन धमाचौकड़ी मचाए रखते हैं, पर आज तो दूल्हा-दुल्हन स्वयं ही सत्तर पार कर चुके हैं और उनके मित्र-परिचित भी. रिश्तेदारों में जो बहुत नजदीकी हैं और परिवार समेत आए हैं, उन्हीं में से कुछ उभरती पीढ़ी के भी हैं.
भैया-भाभी अपने शुभचिंतकों से घिरे खड़े हैं. कुछ लोग हटते हैं तो दूसरे घेर लेते हैं. सबसे मिलना है उन्हें, सब की मुबारक़बाद स्वीकार करनी है. ऐसा क्यों न हो, दोनों ने कितना अच्छा समय एक संग गुज़ारा है. सहपाठी थे दोनों और विवाह भी जल्दी ही कर लिया था. भाभी स्नेहमयी और सहृदया. भैया भी सदैव ख़ुद से पहले दूसरों की प्रसन्नता की सोचनेवाले, भाभी की हर ख़ुशी पूरी करने की कोशिश करनेवाले. जीवन ऐसा बीते, तभी इस जश्‍न का औचित्य है.
शिवानी अपने ही ख़यालों में खोई है. दृष्टि उसकी द्वार पर ही है. उसने देखा ही नहीं कि भैया किसी को साथ लिए उसी की तरफ़ आ रहे हैं. जब उन्होंने पास पहुंच कर शिवानी को पुकारा, तभी जाना उसने. पर जब तक वह अपने साथी का परिचय करा पाते, उन्हें कोई अन्य अतिथि दिख गया और वह उसका स्वागत करने आगे बढ़ गए.
शिवानी ने एक सरसरी निगाह आगंतुक पर डाली और फिर से अपनी दृष्टि द्वार पर टिका दी. एक पल भी नहीं खोना चाहती वह परिमल को देखने के लिए. पर उसका ध्यान फिर भंग हुआ, जब आगंतुक ने उसे नाम लेकर पुकारा. शिवानी ने निगाहें उस ओर उठाईं, तो उस व्यक्ति के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कुराहट तैर गई और उसका चेहरा स्वतः ही ज़रा-सा बायीं ओर झुक गया. पहचान गई शिवानी और हड़बड़ाकर उठ खड़ी हुई.
सब कुछ वैसा ही तो हो रहा है, जैसा शिवानी ने चाहा था, जैसी उसने कल्पना की थी. वह परिमल के सान्निध्य में बैठी है और कोई भी नहीं है उनके आस-पास.

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नहीं, परिमल उसे भूला नहीं है. पिछली अनेक बातें याद हैं उसे. अरसे बाद मिले किसी पुराने स्नेही मित्र की ही तरह वह उससे बातें कर रहा है, उसका और उसके घर-परिवार का हालचाल जानना चाह रहा है. वह ही क्यों उसके हर प्रश्‍न का उत्तर बहुत औपचारिक और संक्षिप्त रूप में दे रही है? क्यों खुलकर बात नहीं कर पा रही वह?
मन ही मन ख़ुद से बातें करने लगी है शिवानी, ‘कल्पना में तुम मेरे संग ही रहे इन तमाम वर्षों में. तुम्हारी उपस्थिति मैं सदैव अपने आस-पास महसूस करती रही. अपने मन की हर बात, हर उलझन और परेशानी तुमसे बांटती रही, पर सच तो यह है कि कुछ भी नहीं जानते तुम मेरे बारे में, सिवाय भैया से सुनी कुछ मुख्य बातों के… और मैं ही क्या जानती हूं तुम्हारे बारे में, सिवा इसके कि गत वर्ष तुम्हारी पत्नी की मृत्यु हो गई और दोनों बेटे विदेश जा बसे हैं. अलग-अलग राहों पर चलते हुए इतिहास अलग हो चुके हैं हमारे. विवाह के समय भूल ही गई थी तुम्हें अपने जीवन से अलग करना.
भीतर से सदैव ही जुड़ी रही तुम्हारे संग. आज जाना, कितना बेमानी था वह सब.’
कंधे पर सिर रख कर रोने की बात तो उठी ही नहीं शिवानी के मन में. सामने बैठा व्यक्ति तो नितांत अजनबी था.

उषा वधवा 

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उषा वधवा