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कहानी- परिवर्तन (Short Story- Parivartan)

“बच्चों को हमेशा बड़ों की तरह टोकोगी, तो वो तुमसे दूर होते जाएंगे. ये उम्र तो उन्हें अपना दोस्त बनाने की है, तभी वे अपनी बातें और समस्याएं तुमसे शेयर करेंगे, वरना बात-बात पर टोके जाने के डर से वे तुम्हें कुछ नहीं बताएंगे. बच्चों का उचित मार्गदर्शन करो, पर इतनी दख़लअंदाज़ी भी मत करो कि वे तुम्हें अपना सबसे बड़ा आलोचक मानकर दूर हो जाएं. परिपक्व होते बच्चों की सोच और तौर-तरीक़ों में परिवर्तन तो आएगा ही और ये अनवरत् चलता भी रहेगा.”

Hindi Short Story

“मम्मी, आख़िर आपको हो क्या गया है? ज़रा-ज़रा-सी बात का बतंगड़ बना देती हो.” अविका भुनभुनाती हुई अपने कमरे में चली गई और ज्ञान गहरी सांस लेकर अख़बार बगल में रखकर टहलने चले गए. विशाल अपनी गर्दन यूं हिलाते चला गया, मानो कह रहा हो कि मम्मी आपसे तो बात करना ही बेकार है. तृप्ति अकेली बैठी सोचती रही कि आख़िर छोटी-सी बात को इतना तूल उसने दिया ही क्यों? अच्छे-ख़ासे बैठे सब हंस-बोल रहे थे.

अविका और विशाल अपने कॉलेज के दोस्तों के अजीबो-ग़रीब क़िस्से सुनाने लगे कि कैसे अविका की सहेली ने अपने बॉयफ्रेंड को बेवकूफ़ बनाकर उससे सभी को पार्टी दिलवाई और ख़र्चा करवाया. तृप्ति अच्छी-ख़ासी बैठी क़िस्सा सुन रही थी कि अचानक आज की पीढ़ी पर कटाक्ष और उनके तौर-तरीक़ों पर अपनी आपत्ति ज़ाहिर करने लगी. मज़ाक-मज़ाक में बात बढ़ गई और तृप्ति अपनी नैतिकता भरी बातों का बोझ उन पर डालने लगी.

तृप्ति देर तक बैठी सोचती रही कि आख़िर क्यों वो रोज़ अपने बच्चों से यूं उलझ पड़ती है? पर क्या करे वह भी, बड़े होते बच्चों की ग़लत बातों का समर्थन तो नहीं कर सकती? पहले बच्चे अपनी हर बात उसे बताते थे और वो भी कितने प्यार से उन्हें समझा देती थी, पर अब पता नहीं उसका धैर्य कहां चला गया है? हर समय अविका और विशाल की चिंता होती है. उम्र भी ऐसी है, कहीं कोई ऊंच-नीच हो गई तो कौन ज़िम्मेदार होगा?

शाम को डिनर टेबल पर भी सब चुपचाप खाना खा रहे थे. सबकी चुप्पी उसे अखर रही थी. तभी फ़ोन की घनघनाहट ने शांति भंग कर दी. अविका फ़ोन पर चहक रही थी. “अरे, वाह नानी! बड़ा मज़ा आएगा, मेरे जन्मदिन पर आप आ रही हैं. अभी सबको बताती हूं. मम्मी-पापा नानी आ रही हैं परसों.” तृप्ति ने अविका से रिसीवर ले लिया और अपनी मां से बतियाने लगी.

माहौल बदल चुका था. अविका तथा विशाल नानी के आने की तैयारी में लग चुके थे. “नानी मेरे कमरे में सोएगी.”

“नहीं-नहीं मेरे.”

“अच्छा! चल तू अपना बिस्तर नीचे लगा लेना.” अविका विशाल से कह रही थी. तृप्ति की आंखों में नींद नहीं थी. कितना अच्छा लगेगा! मां के आने की ख़बर से वह एक अजीब से सुकून से घिर गई. दूसरे दिन भोर में ही आंखें स्वतः खुल गईं. शरीर में स्फूर्ति थी, वरना और दिन होता, तो शारीरिक शिथिलता उसके चेहरे पर बनी रहती. विश्‍वास नहीं होता कि जब बच्चे छोटे थे, तो वो कैसे उनकी अलग-अलग फ़रमाइश पर थिरकती रहती थी. दोनों की अलग-अलग पसंद के टिफिन, ज्ञान का हमेशा सादा नाश्ता, तीन फ़रमाइशों पर रसोई में काम होता था. बड़े होते बच्चों के साथ, धीरे-धीरे थकान कब सिर उठाने लगी, उसे पता ही न चला.

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अविका कभी-कभी मदद करने की कोशिश भी करती, तो उसके काम करने का रवैया तृप्ति को पसंद नहीं आता. उसकी टोका-टोकी से आहत अविका रसोई से बाहर आ जाती और तृप्ति झुंझलाती हुई किसी तरह काम निपटाती, लेकिन आज मां के आने की ख़बर ने मानो शरीर में ऊर्जा का संचार कर दिया हो. घर की नए सिरे से चाक-चौबंद व्यवस्था हो चुकी थी. मां को क्या-क्या पसंद है, इसकी सूची मन-ही-मन बन चुकी थी. मम्मी का मूड अच्छा देख अविका पूछ बैठी, “मम्मी, इस बार मैं अपना बर्थडे बाहर सेलिब्रेट कर लूं.”

“नहीं अविका, हम घर में ही करेंगे. प्लीज़, अपनी ज़रा ढंग की सहेलियों को बुलाना. इस बार नानी भी होंगी, तो थोड़ा ध्यान रखना.”

“मम्मी, मेरी सभी सहेलियां ढंग की ही हैं. आपको ही पता नहीं क्यों उनसे प्रॉब्लम होती है?” कहती हुई अविका वहां से चली गई. दूसरे दिन का नज़ारा रोज़ से अलग था. नानी के घर आने से घर में रौनक थी. दोनों बच्चे उन्हें घेरे बैठे थे.

“नानी, ये देखो हम लोग पिकनिक पर गए थे. ये मेरी सहेली नताशा कितनी स्मार्ट है न!”

“अरे, मुझे तो सबसे ज़ोरदार मेरी पोती लग रही है, पर ये बता तू यह पहन के क्या गई है पिकनिक पर, सलवार-सूट? तुझ पर तो जींस जंचती है.” सुनकर अविका ने कटाक्ष भरे नज़रों से अपनी मम्मी को देखा. उसे याद आया उस दिन उसने जींस के ऊपर कसा हुआ टॉप पहना, तो तृप्ति ने उसके ड्रेस सेंस को लेकर कितना भाषण दिया था. आहत अविका ने ग़ुस्से में सलवार-कुर्ता पहना और पिकनिक पर चली गई.

तभी तृप्ति ने पूछा, “मां, आज डिनर में क्या बनाऊं?” अविका और विशाल तुरंत बोल पड़े, “नूडल्स.” तो तृप्ति ने आंखें तरेर दीं.

“ठीक तो है तृप्ति, आज दोपहर का खाना इतनी देर से खाया है. ज़्यादा भूख भी नहीं. ऐसा कर नूडल्स बना ले. थोड़ी-थोड़ी सब खा लेंगे और गप्पे मारेंगे.”

“नानी, नूडल्स?” बच्चे आश्‍चर्य से बोल उठे, तो शारदाजी हंस पड़ीं. “तुम्हारे नाना को बहुत पसंद है. ह़फ़्ते में एक दिन तो ज़रूर बनाती हूं मैं.”

“क्या मां, आप भी…!”

“और क्या, नूडल्स के विज्ञापन में पता नहीं क्यों स़िर्फ बच्चे दिखाते हैं.” अविका व विशाल हंस पड़े. उन्हें ख़ूब मज़ा आया शारदाजी की बातों में.

“अविका, किसे-किसे बुला रही है अपने जन्मदिन पर?” अविका कुछ कहती इससे पहले तृप्ति मां से पूछ बैठी,“क्या-क्या बनाऊं उस दिन?”

“तृप्ति घर में इतना झंझट क्यों कर रही हो. होटल वगैरह में कर लो. व्यर्थ की भागदौड़ से बच जाओगी.” सुनते ही अविका उछल पड़ी. शारदाजी ने जन्मदिन की ज़िम्मेदारी विशाल और अविका को एक निश्‍चित बजट के साथ सौंप दी, जिसे दोनों ने बख़ूबी निभाया.

शाम को तृप्ति ने मां की दी हुई नीली साड़ी बड़े मनोयोग से पहनी, तो सभी ने दिल खोलकर तारीफ़ की. सभी ख़ुश थे. अविका का जन्मदिन ख़ुशी-ख़ुशी निपट गया. शारदाजी उसके सभी दोस्तों से गर्मजोशी से मिलीं. आज तृप्ति को भी कहीं कोई कमी नज़र नहीं आई. कितनी प्यारी तो हैं इसकी सहेलियां. वो सोचने लगी. इसी तरह हंसी-ख़ुशी एक ह़फ़्ता कैसे बीत गया कुछ पता ही नहीं चला. शारदाजी के वापस जाने को दो दिन ही शेष रह गए थे. मां के जाने की कसक तृप्ति के चेहरे पर झलकने लगी थी. इन दिनों बेटी के भीतर पलती कशमकश को शारदाजी की अनुभवी आंखों ने पढ़ लिया था. ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबी बेटी की शंका-आशंकाओं को वह भांप गई थीं.

आख़िर इन बेचैनी भरे दिनों से वो भी तो दो-चार हुई थीं. जब तृप्ति तेज़ी से बढ़ रही थी और बेटा तरुण अपने करियर के जद्दोज़ेहद में लगा था, उस समय शारदाजी भी तो शारीरिक व मानसिक परिवर्तन की प्रक्रिया से गुज़र रही थीं. उम्र का यह दौर कितना मुश्किल होता है. आज तृप्ति उसी उम्र के दौर में है. उसकी शारीरिक थकान और मानसिक उद्वेलन का आकलन वो मां होने के नाते भली-भांति कर सकती हैं.

दूसरे दिन शारदाजी ने अविका के हाथों का बना खाना खाने की इच्छा ज़ाहिर की. अविका उत्साहित थी, लेकिन तृप्ति परेशान-सी नज़र आने लगी, तो मां ने प्यार से उसका हाथ पकड़कर अपने पास बिठा लिया. “क्यों चिंता करती है? वो कर लेगी सब.” “मम्मी, सच में मैं सब अच्छे से करूंगी और आपकी रसोई भी साफ़ रखूंगी. आप बस मेरा काम होने तक आना मत.”

“तृप्ति, उस पर भरोसा करो. आज ये जो भी और जैसा भी बनाएगी, हम सब खाएंगे और तारीफ़ भी करेंगे. क्यों अविका?” दुविधा में पड़ी तृप्ति मां के पास बैठ गई. तभी शारदाजी के स्नेहभरे स्पर्श ने उसे अंदर तक भिगो दिया. “मेरी बिटिया, कुछ परेशान और थकी-थकी-सी लगती है.” मां की बात पर तृप्ति हंसते हुए बोली, “तुम्हारी बेटी अब बड़ी हो गई है.” धीरे-धीरे तृप्ति अंतर्मन की गहराइयों में दबी अपनी आशंकाओं को मां के साथ साझा करने लगी. बातों बातों में तृप्ति ने अपने मन की बात बताई. “मां, अविका और विशाल की चिंता लगी रहती है. ज़माना कितना बदल गया है. उनकी सोच हमेशा सकारात्मक दिशा में बढ़े, बस, इतना ही चाहती हूं.”

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“देख तृप्ति, हर पुरानी पीढ़ी आनेवाले नए युग के तेज़ ऱफ़्तार से आशंकित रहती है और नई पीढ़ी के क़दम उस ऱफ़्तार के साथ तालमेल बिठा ही लेते हैं. इसमें कुछ नया नहीं है. उम्र के इस दौर से सब गुज़रते हैं. तेरा बात-बात पर बेवजह चिंता करना, झुंझलाना अपनी समझ पर बच्चों का यूं अतिक्रमण करना, तुझे कितना परेशान कर देता होगा, ये समझती हूं मैं, पर देख अब बच्चे छोटे नहीं रह गए. बड़े हो रहे हैं. उनका अपना अनुभव और समझ उनमें पनपने दे.

जहां तक मैंने देखा है, दोनों समझदार हैं. अब उन पर ज़बरदस्ती अपनी मर्ज़ी थोपना ठीक नहीं है. बच्चों को हमेशा बड़ों की तरह टोकोगी, तो वो तुमसे दूर होते जाएंगे. ये उम्र तो उन्हें अपना दोस्त बनाने की है, तभी वे अपनी बातें और समस्याएं तुमसे शेयर करेंगे, वरना बात-बात पर टोके जाने के डर से वे तुम्हें कुछ नहीं बताएंगे. बच्चों का उचित मार्गदर्शन करो, पर इतनी दख़लअंदाज़ी भी मत करो कि वे तुम्हें अपना सबसे बड़ा आलोचक मानकर दूर हो जाएं. परिपक्व होते बच्चों की सोच और तौर-तरीक़ों में परिवर्तन तो आएगा ही और ये अनवरत् चलता भी रहेगा.

तुम्हीं सोचो उम्र के साथ-साथ तुम्हारी सोच में भी कितना परिवर्तन आ चुका है. अपने और बच्चों के बीच अविश्‍वास की दीवार तोड़ो. उनकी बात शांतिपूर्वक सुनो और अपना फैसला तुरंत मत सुनाओ. तुम्हारे बच्चे उम्र की उस दहलीज़ पर हैं, जिसमें वे अपने लिए कुछ आज़ादी चाहते हैं. उन्हें अभिव्यक्ति का अवसर दो. अपने ऊपर चढ़ा बड़प्पन का लबादा उतारकर उनके साथ कभी-कभी ठहाके भी लगाओ. तुम्हारा बचपना जब बाहर आएगा, तो वे दोस्तों की तरह तुम्हारे क़रीब आएंगे.” वातावरण गंभीर हो गया था कि तभी मां विषय को बदलने के अंदाज़ में पूछ बैठीं, “अब ज़रा ये बताओ कि अपने शरीर का क्या हाल कर डाला है. कितना वज़न बढ़ गया है मालूम भी है तुम्हें.” झेंपती हुई तृप्ति बोली, “मां, उम्र के साथ थोड़ा परिवर्तन तो आएगा ही.”

“देखो बिटिया, स्त्री का शरीर तो बना ही परिवर्तन के लिए है, पर जितना अपने मन और तन को नियमों से बांधोगी, उतनी ही आसानी से इस बदलाव को स्वीकार कर पाओगी. मैं और तुम्हारे पापा अभी भी कुछ दूर तक सैर को ज़रूर जाते हैं, तो तुम भी प्राणायाम और कुछ नियमित व्यायाम ज़रूर करो. अगर दिनभर का कुछ समय अपने लिए नहीं निकाला, तो क्या फ़ायदा. रचनात्मक कार्यों में स्वयं को व्यस्त रखो. बच्चों को सिखाने की चिंता के साथ ख़ुद भी कुछ नया करने का ज़ज़्बा पैदा करो, तब देखो तुम्हारा नज़रिया कैसे बदलता है. परिस्थितियों को विषम हम बना देते हैं, जबकि वो इतनी जटिल नहीं होती हैं. जिस दिन तुम्हारे सोचने-विचारने का नज़रिया बदला, समझो आधी कठिनाइयां टल गईं. इस समय ज्ञान को भी उसके हिस्से का समय दो.” मां की बातें उसके मन की गांठों को एक-एक कर सुलझाती गईं. अपनी ओर कृतज्ञता से देखती तृप्ति को मां ने गले लगा लिया. तभी अविका ने ऐलान कर दिया कि खाना तैयार है.

तृप्ति तेज़ क़दमों से रसोई की ओर चल दी, वहां पहुंचकर आश्‍चर्यचकित रह गई. कितना कुछ बनाया था अविका ने. ज्ञान और विशाल पहले से ही वहां मौजूद थे. साफ़-सुथरी रसोई देखकर लगा ही नहीं कि यहां अविका ने खाना बनाया है. संशय में पड़ी तृप्ति ने ज्यों ही कौर मुंह में डाला, तो उसकी नज़र अविका पर पड़ी, जो उत्सुक निगाहों से मां के चेहरे के हाव-भाव पढ़ रही थी. तृप्ति ने इशारे से उसे बुलाया, फिर प्यार से अपनी बांहों में भरकर ढेर सारी अनकही प्रशंसा उसे पारितोषिक के रूप में दे दी.

शारदाजी तो पहले ही अपनी नातिन के प्रति आश्‍वस्त थीं. इधर ज्ञान और विशाल तारीफ़ों के पुल बांध रहे थे. तृप्ति के चेहरे की ख़ुशी प्रशंसा, भरोसा और विस्मय के मिले-जुले भाव अविका को उल्लास से भर गए. तृप्ति आह्लादित थी. आज उसे अविका का एक अलग रूप दिखा या शायद उसके स्वयं के बदले नज़रिए से बहुत कुछ परिवर्तित हो गया था.

Minu tripathi

      मीनू त्रिपाठी

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कहानी- अनकही (Short Story- Ankahi)

नलिन की मृत्यु के दौरान जो हर रोज़ उसके घर जाने का क्रम चला, तो मैंने उसे आगे भी बरक़रार रखा. उस घर में नलिन की उपस्थिति महसूस करती थी मैं. कभी वासवी की बातों में, तो कभी उसकी बेटी कनुप्रिया की आंखों में. कनु ने बहुत कुछ पाया था अपने पापा से.

Hindi Short Story

नए शहर के कॉलेज में जाकर पढ़ने और हॉस्टल में रहने की सोचकर ही घबराहट हो रही थी. मेरे पास कोई विकल्प भी तो नहीं था. पापा की तबादलेवाली नौकरी थी और जिस छोटे-से शहर में तब हम रहते थे, वहां आधुनिक जीवनशैली के सभी संभव साधन, मसलन- क्लब, सिनेमाघर, अस्पताल आदि होते हुए भी ढंग का कोई कॉलेज नहीं था. एक था भी तो गुजराती मीडियम का. अत: मुझे जयपुर के कॉलेज में प्रवेश दिला दिया गया. “चिंता किस बात की, अपना नलिन भी तो वहीं पढ़ रहा है.” पापा ने समझाया.

नलिन के और मेरे पापा कॉलेज के दिनों के मित्र थे. बाद में भी हम दोनों परिवार मिलते रहे. हम शिमला गए, तो उन्हीं के घर रुके. वो मुंबई घूमने आए, तो हमारे घर. नलिन की बहन मुझसे वर्षभर छोटी थी. यूं ही पारिवारिक मित्रता हो गई थी. मम्मी-पापा को तो तसल्ली हो गई कि मेरा सहारा भी निश्‍चय ही तिनके से कहीं अधिक था.

शांत स्वभाव और कर्त्तव्यनिष्ठ, मेरे अनुसार तो यही नलिन का परिचय होना चाहिए. हर रविवार को वह मेरी खोज-ख़बर लेने आता. हमारे घर में सदैव उसके गुणों के चर्चे होते रहते थे, परंतु अब जो भाव मेरे मन में जन्म ले रहे थे, वह पूर्णत: भिन्न थे. दिल कुछ और भी चाहने लगा था. मन करता वह स़िर्फ काम की ही बात न करे और भी कुछ कहे. मन करता कि वह जाने की जल्दी न करे, कुछ देर और रुका रहे. मतलब यह कि अच्छा तो वह मुझे पहले भी लगता था, लेकिन यौवन की दहलीज़ पर पहुंचकर उसके प्रति जो आकर्षण जगा था, वह पहले से बहुत अलग था. पहल करने की हिम्मत नहीं पड़ी. विश्‍वास था कि एक दिन वह भी तो पहचानेगा मेरे अनुराग को.

हॉस्टल लाइफ ने मुझे एक और अनमोल तोहफ़ा दिया था- मेरे कमरे की साथिन वासवी के रूप में. हमारे विषय अलग थे, परंतु कॉलेज के बाद का पूरा समय हम साथ ही बिताते. पढ़ाई पूरी करके मौज-मस्ती करते, घूमने और पिक्चर जाते. प्राय: नलिन को भी बुला लेती थी मैं. वासवी बहुत अच्छा गाती थी और जब कभी कॉलेज के फंक्शन में उसका गायन होता, तब तो नलिन को आमंत्रित करने का बहाना मिल जाता.

तीन वर्ष कैसे निकल गए, पता ही नहीं चला. नए शहर में अकेले रहने की घबराहटवाली बात अब पुरानी हो चुकी थी. यह जीवन छूटनेवाला है. अब तो यही मलाल था. नलिन का कोर्स तो हमसे भी दो महीने पहले ख़त्म हो गया था और उसके लौटने का दिन भी नज़दीक आ गया था.

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कैसे भूल सकती हूं वह शाम. हमेशा की तरह उसने हमारे हॉस्टल पहुंचकर मुझे रिसेप्शन पर बुलवा भेजा. इधर-उधर की बातें करने के बाद उसने एक बड़े से लिफ़ा़फे में से हल्के गुलाबी रंग का एक ग्रीटिंग कार्ड निकाला, गुलाब के रंग-बिरंगे फूलों से चित्रित. मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा. जिस पल का मुझे इंतज़ार था, वह पल आ गया था. कानों के साथ-साथ पूरा तन उसकी बात सुनने को प्रतीक्षारत था. जब उसने कहा, “तुम इतनी अच्छी शेर-ओ-शायरी जानती हो, कविताएं पढ़ती हो, इस कार्ड पर कुछ ऐसी पंक्तियां लिख दो न कि वासवी पढ़ते ही मुग्ध हो जाए. तुम्हें हमारी इतनी पुरानी दोस्ती का वास्ता…” वह बोले ही चला जा रहा था. मनुहार कर रहा था शायद. किंतु उसके शब्द मेरे भीतर नहीं घुस पा रहे थे, पर मन के सोचने का तरीक़ा अलग होता है और बुद्धि का अलग. मेरे मस्तिष्क ने फौरन मेरे मन को वश में किया और मैंने उससे ग्रीटिंग कार्ड लेते हुए कहा, “ठीक है, मैं अच्छी तरह सोचकर कल तक लिख दूंगी.” और लौट आई अपने कमरे में. मोहब्बत मांगी या छीनी नहीं जा सकती, उस पर हक़ नहीं जताया जा सकता, यह जानती थी मैं.

मैंने उस कार्ड पर जो लिखकर दिया, वह मेरे ही दिल से निकली आवाज़ थी. जब भी नलिन का ख़्याल आता, यही पंक्तियां आतीं मन में. जब वह ही मेरा नहीं रहा, तो उन पंक्तियों का क्या करती मैं. अत: वही उस कार्ड पर लिख दीं, बस नाम बदल गए थे ‘नलिन की ओर से- वासवी को.’

कार्ड पाकर बहुत ख़ुश हुई थी वासवी. कितनी बार तो वह कार्ड उसने मुझे दिखाया, कितनी ही बार वह पंक्तियां पढ़कर सुनाई. मैं उसकी ख़ुशी में ख़ुश दिखने को मजबूर थी. अच्छी बात यह थी कि अपने उत्साह में उसे मेरी उदासी दिखी ही नहीं.

पढ़ाई पूरी हुई. हॉस्टल छूटा और संगी-साथी भी. मां तो मेरे विवाह के लिए उतावली थीं, “पढ़ाई तो पूरी हो गई है. पापा की अवकाश प्राप्ति से पहले विवाह हो जाए, तो अच्छा है.”  मैं चुप रही. मना क्यों करती? किसका इंतज़ार करना था मुझे? न कोई उमंग थी, न कोई सपने. लड़कियों के लिए नौकरी का प्रचलन तब नहीं था. भारत में तो वैसे भी लड़की के जीवन की राह उसके बड़े ही चुनते हैं, जिस पर आंख मूंदकर बस चलना होता है उसे. फ़र्क़ यह था कि मैंने भी नादानी में कुछ सपने बुन लिए थे.

परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि नलिन और वासवी के विवाह से पहले ही मेरा विवाह हो गया. ख़ैर, मैं उनके विवाह में गई थी. अधिक समय वासवी के संग ही बिताया और नलिन के लिए ख़ुशियों की ढेर सारी दुआएं मांगीं सच्चे मन से, पर उससे मिलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. समय आगे बढ़ता रहा. मेरा बेटा हुआ और उसे पालने में पूरी तरह से व्यस्त हो गई मैं. पारिवारिक मित्रता होने के कारण शादी-ब्याह में या फिर अन्य अवसरों पर नलिन-वासवी से भेंट हो जाती, पर भीड़भाड़ में नलिन से दूरी बनाए रखना आसान नहीं होता. एक ही शहर में रहने के कारण एकदम कटकर रहना तो संभव नहीं था, परंतु उनके घर कम ही जाती मैं. इस बीच उनकी एक बेटी हुई, नाम रखा- कनुप्रिया.

हम सब अपनी-अपनी तरह से व्यस्त रहे और बच्चे बड़े होते रहे. मेरा बेटा इंद्रनील 20 का हो गया और कनु 18 की. एक दिन दोपहर को ख़बर मिली कि ‘नलिन का देहांत हो गया है’ विश्‍वास करनेवाली बात नहीं थी और मन विश्‍वास करने को तैयार भी नहीं था, पर बम-विस्फोट पूर्व सूचना देकर होते हैं क्या? नलिन के विवाह से उतना नहीं टूटी थी मैं, जितना कि इस बात से. अभी 45 का भी नहीं हुआ था नलिन. व्यस्तता के बीच नलिन को पता ही नहीं चला कि उसके भीतर कोई रोग पनप रहा है. प्रात: उठा तो उसे ज़ोर का चक्कर आया. वह फिर से बिस्तर पर बैठ गया. वासवी ने पानी लाकर पिलाया, तो थोड़ा बेहतर महसूस किया उसने. वासवी चाय बनाने चली गई, तभी नलिन को लगा कि उसका दम घुट रहा है और वह बाहर लॉन में निकल आया, ताज़ी हवा की तलाश में. पर शायद उसे एक बार फिर चक्कर आ गया और वह वहीं गिर गया. पड़ोसी ने देखा और भागा आया. चेहरे पर पानी के छींटें मारा, वासवी को बाहर बुलाया. फ़ौरन अस्पताल ले गए. डॉक्टरों ने सब प्रकार से प्रयत्न करके देख लिया, परंतु वह नलिन को बचा नहीं सके. उसका दिल ही उसे धोखा दे गया था.

नलिन से चाहे मैंने दूरी बनाए रखी थी, पर वासवी से मैंने दोस्ती कायम रखी. घर नहीं भी जाती, तो टेलीफोन पर बात कर लेती थी. नलिन की मृत्यु के दौरान जो हर रोज़ उसके घर जाने का क्रम चला, तो मैंने उसे आगे भी बरक़रार रखा. उस घर में नलिन की उपस्थिति महसूस करती थी मैं. कभी वासवी की बातों में, तो कभी उसकी बेटी कनुप्रिया की आंखों में. कनु ने बहुत कुछ पाया था अपने पापा से. हंसती तो बिल्कुल वैसे ही थी, चलने का ढंग भी बिल्कुल वैसा था. धीरे-धीरे मेरा उस पर मोह बढ़ रहा था.

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पति से मुझे कोई शिकायत नहीं थी. दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर थे वह. अति गंभीर और ख़ामोश. पीएचडी कर रखी थी और अपने विषय में पूर्ण पारंगत थे. उनके चिंतन का क्षेत्र ब्रह्मांड की उत्पत्ति और ऐसे ही अन्य गूढ़ रहस्य थे, जो मेरी समझ के बाहर थे. उन्हें देखकर लगता था, जैसे विश्‍वभर की समस्याओं का हल उन्हें ही तलाशना है. अत: रोज़मर्रा की घर-गृहस्थी की बातों में न उनकी रुचि थी, न ही इतना समय. घर की व्यवस्था से एकदम निर्लिप्त रहते वह. कुछ भी पूछने पर यही कहते, “तुम्हें जो ठीक लगे, वही कर लो.”

बेटा इंद्रनील दूर शहर में पढ़ रहा था और कोर्स के अंतिम वर्ष में कैंपस सिलेक्शन में अपनी मनपसंद नौकरी भी पा चुका था.

नलिन को गए छह वर्ष बीत गए. इस बीच मैं और वासवी एक बार फिर से बहुत क़रीब आ चुके थे. नलिन के पिता का देहांत पहले ही हो चुका था और मां नलिन के जाने से पूरी तरह से टूट गई थीं. मानसिक और शारीरिक दोनों ही रूप से. वासवी उनकी अच्छी देखभाल कर रही थी. नलिन की पेंशन आती थी. अत: उस तरफ़ से चिंता की कोई बात नहीं थी. देखने में तो सब ठीक ही था. पर जो बात नहीं पता थी वह यह कि एक नन्हीं-सी चिंगारी वासवी के भीतर सुलग रही थी. उसका शरीर खोखला कर रही थी. वासवी कुछ और काम से डॉक्टर के पास गई और चेकअप करने पर पता चला कि लिवर के कैंसर ने उसे पूरी तरह अपनी गिरफ़्त में ले लिया है. ऑपरेशन हुआ और इलाज भी शुरू किया गया, पर डॉक्टरों ने अधिक उम्मीद नहीं दिलाई. विदेश में रहती नलिन की बहन आकर मां को अपने साथ ले गई. वासवी की देखभाल की ज़िम्मेदारी मैंने संभाल ली. कनु तो थी ही. मृत्यु को सामने देख वासवी को अपनी बेटी की बहुत चिंता सता रही थी. कौन देखेगा उसे? बुआ के पास भेजने से पढ़ाई का नुक़सान होगा. कनु मुझे शुरू से ही पसंद थी. मैंने अपने बेटे के मन की बात जानने के लिए उसे टेलीफोन किया. कनु को वह बचपन से ही जानता था. इन दोनों की आपस में बनती भी ख़ूब थी. उसकी रज़ामंदी जान मैंने वासवी से इन दोनों के रिश्ते की बात की. यह भी तय हुआ कि बाकी पढ़ाई वह हमारे ही घर में रहकर पूरी कर सकती है. वासवी को इस बात से बहुत तसल्ली मिली, पर जब उसने बेटी से बात की, तो वह रोने लगी. मां की मृत्यु अवश्यंभावी जान दुख तो होना ही था.

और एक दिन वासवी भी हमें छोड़कर चली गई. सब संस्कार पूरे होने के बाद मैं कनुप्रिया को अपने घर ले आई.

मुझे छोटे बच्चों का साथ प्रारंभ से ही अच्छा लगता रहा है. बेटे इंद्रनील के बड़े होने पर मैने घर में क्रैश खोल लिया था. कामकाजी स्त्रियों के बच्चे दिनभर मेरे पास रहते और ऐसे ख़ुश रहते कि शाम को घर लौटना ही नहीं चाहते थे. कनु भी कॉलेज से आने के बाद बच्चों के साथ लगी रहती. उसका भी मन लग जाता और वह भी मेरी नज़रों के सामने रहती.

मैं कनु को प्रसन्न रखने का बहुत प्रयत्न करती, पर देखती कि वह हमेशा उदास रहती थी. उन दिनों मोबाइल नया-नया ही चलन में आया था और कनु ने अपनी मां की बीमारी के दौरान ही ख़रीदा था, ताकि ज़रूरत पड़ने पर उसे फ़ौरन बुलाया जा सके. अब मैं देखती कि कनु अपने मोबाइल पर हर रोज़ एक नियत समय पर किसी से बहुत धीमे स्वर में लंबी-लंबी बात करती. और जाने क्यों मुझे लगता कि मोबाइल की इस लंबी बातचीत के बाद वह अधिक उदास हो जाती थी, किसी खोल में सिमट जाती जैसे. पिता की कमी और मां को खोने का ग़म तो मैं भी समझती थी, पर कुछ और भी था जो मेरी पकड़ में नहीं आ रहा था.

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उस दिन कनुप्रिया का जन्मदिन था और मैंने पूरा भोजन उसी की पसंद का बनाया था. कनु की छुट्टी थी. अत: शाम को उसे लेकर कहीं घूमने जाने या मूवी देखने की भी योजना थी मेरी. पर शाम होने से पहले ही एक युवक लाल गुलाबों का गुलदस्ता लिए आन खड़ा हुआ. दरवाज़ा मैंने ही खोला था. झिझकते हुए उसने पूछा, “कनु है, कनुप्रिया?” मैं उसे अंदर ले आई. मुझे उसका चेहरा कुछ

जाना-पहचाना-सा लगा. बाद में याद आया कि वासवी के दाह-संस्कारवाले दिन देखा था उसे. उसने कनु को फूल देते हुए जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं और मुझसे कहा, “आंटी, क्या मैं कनु को डिनर पर बाहर ले जा सकता हूं?” कनु के चेहरे पर लालिमा थी, चेहरे पर ख़ुशी. ऐसी ख़ुशी, जो मैंने एक लंबे अरसे के बाद उसके चेहरे पर देखी थी. मैंने उस युवक- अनुराग को कॉफी पीकर जाने का निमंत्रण दिया. जानती थी कि उसका रुकने का मन नहीं है, किंतु मैं बिना तसल्ली किए कनु को उसके साथ कैसे भेज देती? उसकी मां होने की ज़िम्मेदारी भी मुझे निभानी थी. कनु को कॉफी बनाने का इशारा कर मैं अनुराग से बातें करने लगी.

अनुराग सीए पूरा करके नौकरी कर रहा था. इन दोनों का दो वर्ष पुराना परिचय था. निश्‍चय ही परिचय से बढ़कर था. कनु का जन्मदिन याद रखना और साथ में सेलिब्रेट करने की इच्छा रखना कुछ और ही संदेशा दे रहा था. ‘समय पर लौट आना’ कहकर मैंने उन्हें जाने की अनुमति दे दी. यद्यपि कनु ने जाते हुए कहा कि मौसी, यदि थोड़ी देर हो जाए, तो चिंता मत करना. जब तक वह लौटकर नहीं आए, मेरा ध्यान उधर ही लगा रहा. 10 बजे के बाद से तो मैं खिड़की से बाहर झांकती खड़ी रही.

11 से थोड़ा पहले आए वे. कार के रुकने के बाद भी वे देर तक उसके अंदर बैठे रहे. बाहर निकलकर उसने कनु का हल्का-सा आलिंगन लिया और जब तक वह बाहर के गेट से घर के दरवाज़े तक नहीं पहुंच गई, वहीं खड़ा उसे निहारता रहा. रास्ते में पड़ी किसी चीज़ से टकराकर वह थोड़ा डगमगाई, तो भागकर वह कनु के पास पहुंचा.

एक-दो दिन बाद मैंने अनुराग की बात छेड़ी, तो कनु के आंसू टपकने लगे. अपने प्यार को स्वीकार किया उसने. मां को अभी बताया नहीं था. अनुराग की नौकरी लग जाने का इंतज़ार कर रही थी. अब समझ आया कि जब मैंने वासवी के समक्ष कनु को अपनी बहू बनाने का प्रस्ताव रखा, तो वह क्यों रोई थी? स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह इंकार करती, मन की बात कहती. पर मैं उसकी मजबूरी का फ़ायदा नहीं उठाऊंगी, मैंने तय किया. मुझसे बेहतर कौन समझेगा प्यार को खोने का दर्द? प्यार को खोकर ज़िंदगी तो निकल ही जाती है, पर हज़ार नेमतें पा लेने के पश्‍चात् भी एक बेनाम-सा दर्द, कुछ अनकही-सी कमी रह ही जाती है जीवनभर के लिए.

मैंने अनुराग के बारे में जांच-पड़ताल की और पूरी तसल्ली करके उन दोनों का विवाह कर दिया.

मैं कनुप्रिया में तुम्हारा अक्स देखती थी नलिन, इसलिए उसे ही अपने घर लाना चाहती थी शायद. आज लग रहा है, जैसे एक बार फिर से तुम्हें खो दिया है मैंने.

पर फिर भी आज संतुष्ट हूं मैं, बहुत संतुष्ट.

usha vadhava

        उषा वधवा

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अकबर-बीरबल की कहानी: तेली और कसाई (Akbar-Birbal Tale: The Oil Man And The Butcher)

Akbar Birbal Ki Kahani

अकबर-बीरबल की कहानी: तेली और कसाई (Akbar-Birbal Tale: The Oil Man And The Butcher)

बादशाह अकबर (Akbar) का दरबार लगा हुआ था. तभी दरबान ने सूचना दी कि दो व्यक्ति अपने झगड़े का निपटारा करवाने के लिए आना चाहते हैं. बादशाह ने दोनों को बुलवा लिया. दोनों दरबार में आ गए और बादशाह के सामने सिर झुकाकर खड़े हो गए.

बादशाह ने पूछा कि कहो क्या समस्या है?

मेरा नाम काशी है, मैं तेल बेचने का काम करता हूं और हुजूर यह कसाई है. इसने मेरी से तेल खरीदा और साथ में मेरी पैसों की भरी थैली भी ले गया. जब मैंने इसे पकड़ा और अपनी थैली मांगी तो यह उसे अपनी बताने लगा, अब आप ही न्याय करें.

बादशाह ने दूसरे व्यक्ति से पूछा कि अब तुम कहो तुम्हें क्या कहना है?

कसाई से कहा- मेरा नाम रमजान है. जब मैंने अपनी दुकान पर आज मांस की बिक्री के पैसे गिनकर थैली जैसे ही उठाई, यह तेली आ गया और मुझसे यह थैली छीन ली. अब उस पर अपना हक जमा रहा है. आप ही न्याय करें.

राजा को समझ में नहीं आ रहा था कि दोनों में से कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ. दोनों की बातें सुनकर बादशाह सोच में पड़ गए और उन्होंने बीरबल से फैसला करने को कहा.

बीरबल ने वो पैसों की थैली ले ली और दोनों को कुछ देर के लिए बाहर भेज दिया. बीरबल ने सेवक से एक कटोरे में पानी मंगवाया और उस थैली में से कुछ सिक्के निकालकर पानी में डाले और पानी को गौर से देखा. फिर बादशाह से कहा- ये सिक्के रमजान कसाई के हैं.

बादशाह ने हैरान होकर पूछा कि भला बीरबल को कैसे पता चला?

बीरबल ने बादशाह को समझाया कि काशी एक तेली है, लेकिन इस पानी में सिक्के डालने से तेल का ज़रा-सा भी अंश पानी में नहीं उभर रहा है. अगर यह सिक्के तेली के होते तो उन पर तेल लगा होता और वह तेल पानी में भी दिखाई देता.

बादशाह ने भी पानी को गौर से देखा और फिर बीरबल की बात से सहमत हो गए.

बीरबल ने उन दोनों को दरबार में बुलाया और कहा- मुझे पता चल गया है कि यह थैली किसकी है. यह थैली रमजान कसाई की है. काशी, तुम झूठ बोल रहे हो.

बीरबल ने सिक्के डले पानी वाला कटोरा उसे दिखाते हुए कहा- यदि यह थैली तुम्हारी है तो इन सिक्कों पर कुछ-न-कुछ तेल अवश्य होना चाहिए, पर तुम भी देख लो तेल तो अंश मात्र भी नज़र नहीं आ रहा है.

काशी चुप हो गया और अपनी ग़लती उसने मान ली.

बीरबल ने रमजान कसाई को उसकी थैली दे दी और काशी को कारागार में डलवा दिया.

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कहानी- छलावा (Short Story- Chhalava)

सौम्या के मन में बार-बार यह विचार आ रहा था कि हम भारतीय विदेश के प्रति इतने आकर्षित क्यों हैं? विदेश में यदि आय अच्छी है तो ख़र्चे भी उसी हिसाब से होते हैं. ये किस छलावे में जी रहे हैं हम? जब उसकी सहेलियां उसके भाग्य को सराह रही थीं, तो वह उन्हें समझाना चाहती थी कि मुझ से ज़्यादा ख़ुशनसीब तुम लोग हो, जो अपने देश में, अपनों के बीच रहकर ज़िंदगी जीने का मज़ा लूट रही हो. लेकिन इस भ्रम को तोड़ना आसान नहीं था.

Short Story in Hindi

सौम्या दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरी, तो मौसम बहुत ही ख़ुशगवार था. हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी. उसने एक गहरी सांस लेकर मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू को आत्मसात् किया और व्याकुलता से दर्शक दीर्घा में दृष्टि दौड़ाई.

आज पूरे सात महीने बाद सौम्या भारत लौटी है. विवाह के 15 दिन बाद ही सौम्या और दीपक अमेरिका चले गए थे. सौम्या ने देखा सामने से मां, पिताजी, बहन नेहा और भाई सौरभ आ रहे हैं और वह चहककर उनके गले लग गई. सौरभ और नेहा तो ख़ुशी के मारे पागल हुए जा रहे थे. मां उसे प्यार से ऊपर से नीचे तक निहार रही थी. पिताजी ने अपना हाथ उसके सिर पर रखा, तो उसे उनके चेहरे पर गर्व के भाव स्पष्ट दिखाई दिए कि आज मेरी बेटी विदेश से आई है. आख़िर मैंने अपनी बेटी के लिए एनआरआई दूल्हा ढूंढ़ ही लिया.

रास्तेभर नेहा और सौरभ सौम्या से अमेरिका और अपने जीजाजी के विषय में पूछते रहे. सौम्या भी यादों में खो गई. जब उसने पहली बार अमेरिका की धरती पर क़दम रखा, तब वहां की चमकती सड़कें और गगनचुंबी इमारतें देखकर उसे लगा, उसका जीवन सफल हो गया. उसका बरसों का सपना कितनी आसानी से पूरा हो गया. दीपक भी आकर्षक व्यक्तित्व के मालिक और सीधे-सादे इंसान हैं. विदेश में रहकर भी बिल्कुल भारतीय.

गाड़ी रुकते ही सौम्या वर्तमान में लौट आई. घर आ गया था. उसका अपना घर, जहां उसने अपना बचपन जिया. वह घूम-घूमकर पूरा घर देख रही थी. सब कुछ वैसा ही था, कुछ भी नहीं बदला था. नेहा और सौरभ उसके लाए उपहार देखकर ख़ुश हो रहे थे, तभी नेहा ने चहककर पूछा, “दीदी, ये सब तुम्हारी पसंद है या जीजू की.” उसने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया, “दोनों की.” अब नेहा को वह कैसे बताती कि इन उपहारों को ख़रीदने के लिए उसने कैसे महीने के बजट में कमी करके पैसे बचाए और कितने ही सेल काउंटर्स पर घूमी है.

फ्रेश होकर जब सौम्या नाश्ते के लिए बैठी तो डायनिंग टेबल पर अपनी पसंद की ढेर सारी डिशेज़ देख, हंसकर मां से बोली, “ये क्या मम्मी, मैं एक दिन के लिए नहीं, एक महीने के लिए आयी हूं. आपने तो आज ही सब कुछ बना दिया.” मां ने लाड़ जताते हुए कहा, “खा ले बेटा, अमेरिका में तुझे ये सब कहां मिलता होगा.” तभी नेहा बोली, “दीदी, मेरी सहेली बता रही थी कि अमेरिका में रोटियां भी पैक्ड मिलती हैं. बस, घर लाओ, गर्म करो और खा लो. वाह! क्या ऐश है.” नेहा के बोलने के अंदाज़ पर सब हंस पड़े.

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सौम्या को अपनी अमेरिका की डायनिंग टेबल याद आ गई. दीपक ने उसे बताया था कि साधारण-सा खाना भी अमेरिका में काफ़ी महंगा पड़ता है. वे कहीं भी जाते या ख़र्च करते, तो दीपक भारतीय मुद्रा (रुपए) में उसका मूल्य निकालकर सौम्या को ज़रूर बताते. शुरू-शुरू में उसे ये सब जानकारी बढ़ानेवाला लगा, पर बाद में उसे को़फ़्त-सी होने लगी. वह कुछ भी अपनी पसंद का ले आती, तो दीपक उसे फिज़ूलख़र्ची पर अच्छा-ख़ासा भाषण दे डालते. वह दीपक को भी ग़लत नहीं कह सकती. अपने पूरे परिवार में दीपक ही एकमात्र विदेश में हैं. उनकी आय का एक बड़ा हिस्सा, तो मुंबई में लिए बंगले का लोन चुकाने में चला जाता है. छोटे भाई की पढ़ाई का ख़र्च, चचेरी-ममेरी बहनों की फ़रमाइशें, सभी को पूरा करना दीपक अपना फ़र्ज़ समझते हैं.

रोज़ किसी न किसी बहाने से सौम्या को सुनने को मिल जाता था कि वह विदेश में घूमने-फिरने, मौज-मस्ती करने नहीं आए हैं. उनके माता-पिता ने उन्हें पढ़ा-लिखाकर विदेश भेजने के लिए बहुत मेहनत की है. अतः अब उनका फ़र्ज़ बनता है कि वे सभी का ख़याल रखें. सौम्या मन ही मन सोचती कि वह और उसके माता-पिता कुछ नहीं? क्या उनके कोई ख़्वाब नहीं हैं?

नाश्ते के बाद सौम्या अपने कमरे में आ गई और पुरानी यादों में खो गई. उसे वह दिन याद आ गया, जब उसने बारहवीं में 92% नंबर प्राप्त किए थे और वह मेडिकल में दाख़िला लेना चाहती थी. पापा ने उसे प्यार से अपने पास बैठाकर समझाया था कि मेडिकल में दाख़िला लेने की ज़िद्द वह छोड़ दे, क्योंकि अपनी ईमानदारी की नौकरी में वह उसके नाम आठ-दस लाख रुपया ही जमा कर पाए हैं. यदि वह उन रुपयों को उसकी पढ़ाई में लगा देंगे, तो उसका विवाह किसी अच्छे घर में धूमधाम से कैसे कर पाएंगे और फिर नेहा और सौरभ भी तो हैं.

पापा बड़े प्यार से बोले थे, “तेरे रूप और गुण पर ही अच्छा परिवार फ़िदा हो जाएगा, इसलिए तू बी.एससी. में दाख़िला ले ले.” सौम्या ने ख़ुशी-ख़ुशी बी.एससी. में दाख़िला ले लिया और अच्छे परिवार की बहू बनने का सपना देखने लगी. फ़ाइनल इयर में आते ही उसका रिश्ता दीपक से तय हो गया. लड़के की विदेश में नौकरी, मुंबई में अपना बड़ा आलीशान बंगला, छोटा परिवार और क्या चाहिए था. सहेलियां उसके भाग्य को सराह रही थीं और वह स्वयं आकाश में उड़ रही थी. पर आज वह सोच रही थी कि क्या उसका निर्णय सही था?

सौम्या के भारत आने से क़रीब एक महीने पहले की बात है. उसने दीपक के आर्थिक बोझ और अपनी दिनभर की बोरियत से बचने के लिए दीपक से कहा कि वह उसके लिए भी कोई नौकरी की तलाश करे तो दीपक पहले तो चौंके फिर हंस पड़े, “बी.एससी. पास को भला कौन नौकरी देगा?”

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फिर दीपक गंभीर होकर बोले, “तुम्हें नौकरी की क्या ज़रूरत है? मैं इतना तो कमा ही लेता हूं कि हमारा गुज़ारा हो जाए. फिर 1-2 साल में बच्चा हो जाएगा, उसकी और घर की देखभाल कौन करेगा?” दीपक ने लगभग ऐलान करते हुए कहा, “मैं अपने बच्चे की परवरिश में कोई कमी नहीं करना चाहता. इसीलिए तो मैंने एक साधारण, घरेलू लड़की से शादी की है. मेरे लिए तो एक से बढ़कर एक प्रो़फेशनल लड़कियों के रिश्ते आए थे. मैंने सोचा था कि न होगा बांस और न बजेगी बांसुरी.” दीपक के शब्द उसके कानों में गर्म सीसे की तरह उतरते चले गए. इसका मतलब दीपक उसके रूप और गुण पर फ़िदा नहीं हुए थे. उन्हें चाहिए थी, बस एक घरेलू लड़की, जो उनके घर और बच्चे की देखभाल कर सके. उस दिन से सौम्या मन ही मन छटपटाती रहती. उसे लगता कि वह ऐसे पिंजरे में कैद हो गई है, जहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है.

अपनी सहेलियों की खिलखिलाहट से सौम्या वर्तमान में लौट आयी. सौम्या की सारी सहेलियां उससे मिलने आयी थीं और सौम्या भी उनसे अपने मन की बातें करने को आतुर थी. लेकिन थोड़ी देर बाद ही सौम्या को महसूस हुआ कि उसकी सहेलियां उसके बारे में कम, अमेरिका के बारे में, वहां के रहन-सहन के विषय में जानने को ज़्यादा उत्सुक हैं. सौम्या के मन में बार-बार यह विचार आ रहा था कि हम भारतीय विदेश के प्रति इतने आकर्षित क्यों हैं? विदेश में यदि आय अच्छी है, तो ख़र्चे भी उसी हिसाब से होते हैं. ये किस छलावे में जी रहे हैं हम? जब उसकी सहेलियां उसके भाग्य को सराह रही थीं तो वह उन्हें समझाना चाहती थी कि मुझ से ज़्यादा ख़ुशनसीब तुम लोग हो, जो अपने देश में अपनों के बीच रहकर ज़िंदगी जीने का मज़ा लूट रही हो. लेकिन इस भ्रम को तोड़ना आसान नहीं था, इसलिए वह चुपचाप मुस्कुराती रही.

सहेलियों को विदा करने के बाद जब सौम्या कमरे में आयी, तो देखा मां, पिताजी और नेहा किसी गंभीर विषय पर बातचीत में मग्न हैं. उसे देखते ही पिताजी बोल पड़े, “आ गई मेरी बिटिया, अब तू ही नेहा को समझा. मेरी बात तो इसे समझ ही नहीं आ रही. इंजीनियरिंग में दाख़िला लेने की ज़िद्द कर रही है. यदि इतने पैसे इसकी पढ़ाई में लगा दिए तो इसकी शादी के लिए पैसे कहां से लाऊंगा?” सौम्या कुछ क्षण चुप रही. फिर हिम्मत जुटाकर बोली, “नहीं पिताजी, नेहा से उसके सपने मत छीनिए. पैसा उसकी पढ़ाई में लगाइए. यदि नेहा किसी क़ाबिल बन गई, तो आपको उसकी शादी की चिंता नहीं करनी पड़ेगी, वह अपनी क़ाबीलियत के बल पर अपने लिए वर तलाश कर लेगी. मत काटिए नेहा के पंख. उड़ लेने दीजिए उसे खुले आसमान में.” पिताजी अवाक् से सौम्या का मुंह देख रहे थे, उसके मन की व्यथा को पढ़ने की कोशिश कर रहे थे. नेहा दौड़कर सौम्या के गले लग गई. “मेरी प्यारी दीदी, आप कितनी अच्छी हो.”

सौम्या आज बहुत हल्का महसूस कर रही थी और उसे पूरा विश्‍वास था कि उसके जीवन से प्रेरणा लेकर स़िर्फ एक नेहा को ही नहीं, वरन् अनेक नेहाओं को सही दिशा मिलेगी. वे विदेश के आकर्षण व मोहजाल से निकल सकेंगी, जो एक छलावे से कम नहीं.

Ritu Dadu

      रीतू दादू

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कहानी- फ्रेम-दर-फ्रेम ज़िंदगी (Short Story- Frame-Dar-Frame Zindagi)

जिस महिला ने हमेशा से ख़ुद को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रखा हो, लोगों के कहने के बाद भी जिसने नौकरी करते रहने को वरीयता दी हो. उसके ख़ुद ही नौकरी छोड़ने का निर्णय नितांत निजी है. पर लोग…? वो तो फिर मुझे फ्रेम में बांधने लगे.

Hindi Short Story

डियर डायरी,

हर बात कहती हूं तुमसे, हर रोज़. बावजूद इसके कुछ न कुछ छूट ही जाता है. आज बिल्कुल अकेली हूं घर पर. निशांत 15 दिनों के टूर पर गए हैं. कीर्ति हॉस्टल में है. मां-पापाजी वापस लौट गए हैं, हर वर्ष की तरह तीन महीने हमारे साथ रहने के बाद. और जानती हो, आज एक बड़ी अलग-सी अनुभूति हुई है. वही बांट रही हूं तुमसे. बात शायद लंबी चले आज. देखो ना, हाथ में बैनर लेकर जीवन से इस बात पर मैंने लड़ाई कभी की ही नहीं कि मैं स्त्री हूं या मुझे कुछ कम मिला है, क्योंकि नारी होने के बेजा स्वांग की सच पूछो तो कभी ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई. हां, नारी होने के सुख को हमेशा, हर चीज़ पर भारी पाया है मैंने. जो भी सीखा अपने अनुभवों से सीखा, प्रयास से सीखा. तुमसे साझा कर-करके सीखा और कभी भी, कहीं भी ख़ुद को कमतर नहीं पाया. इस बात से बहुत ख़ुश भी हूं मैं. बस, आज मलाल हो रहा है, तो इस बात का कि यह ख़्याल पहले क्यों नहीं आया? वरना जीवन थोड़ा और आसान, थोड़ा और आज़ाद-सा हो जाता. थोड़ा बोझमुक्त और बहुत सरल हो जाता.

तुम्हें याद है? जब मैं बड़ी हो रही थी, कुछ 12 बरस से बड़ी रही होऊंगी, पर 13 की नहीं हुई थी. पीरियड्स आना शुरू ही हुए थे. तब रमा चाची ने कहा था मां से, “अब टुन्नो बड़ी हो रही है भाभीजी. हम छोटे शहर में रहते हैं, अब आप इसे फ्रॉक-व्रॉक पहनाना बंद कीजिए. अब तो सूट ही पहनना चाहिए इसे.” और मां ने अगले ही हफ़्ते तक ताईजी की बेटी चंदा दीदी के दो-तीन सूट घर पर ही मेरी फिटिंग के कर दिए और मुझसे उन्हें पहनने को कह दिया. मुझे कोई समस्या तो नहीं हुई, ना ही मैंने इसका विरोध किया. मुझे तो यह बड़े होने जैसी फीलिंग दे रहा था, क्योंकि घर की सभी बड़ी लड़कियों को सूट पहनते ही देखा था. यूं देखा जाए, तो मैं ख़ुश ही थी. हां, थोड़ी असुविधा ज़रूर हुई थी, दुपट्टा संभालते हुए साइकल चलाने में. कभी-कभी दुपट्टे साइकल में फंस जाते थे. मेरा तो नहीं फंसा, पर अर्चना का फंस नहीं गया था? जब मैं उसे अपनी साइकल के कैरियर पर बिठाकर स्कूल जा रही थी. ऐसी गिरी वो साइकल से कि माथा और घुटने छिल गए थे बुरी तरह. कमर में चोट आई सो अलग. आज सोचती हूं तो लगता है, रमा चाची ने आख़िर ऐसी सलाह मां को क्यों दी? उनकी तो ख़ुद भी एक लड़की थी और मां ने उनकी सलाह को क्यों माना? और तो और, मैंने ही क्यों माना? फ्रॉक्स बुरी तो नहीं होतीं? यह पहली थी… क़स्बे की लड़कीवाली फ्रेम.

फिर जब मैं कॉलेज में थी. को-एड कॉलेज था. हम लड़के-लड़कियां आपस में हर विषय पर बहस कर लिया करते थे. साथ-साथ आते-जाते भी थे. कभी-कभी जब सहपाठी लड़के बाज़ार में टकरा जाते थे, तो मैंने कभी उनसे बात करने में कोई झिझक महसूस नहीं की. एक बार यूं ही घर का सामान लेने गई थी और रास्ते में मनोज मिल गया. हम दोनों केमिस्ट्री के नोट्स को लेकर बात करते रहे और बातें कॉलेज की कई और बातों को जोड़ती गईं.

क़रीब-क़रीब घंटाभर सड़क के किनारे अपनी-अपनी स्कूटी को रोककर हम बतियाते रहे. फिर सामान लेकर मैं घर लौट आई. देर शाम को मां कमरे में आईं और पूछा कि मैं रास्ते में आज किससे बात कर रही थी? मैंने उन्हें बताया मनोज मिल गया था, पर ये भी पूछा कि आपसे किसने कहा इस बारे में? तो उन्होंने बताया कि पापा के एक कलीग ने मुझे सड़क पर उससे बात करते देखा, तो पापा से आकर कह गए कि आपकी बेटी एक लड़के से भरी सड़क पर गप्प लड़ा रही थी. पापा घर लौटे, तो उन्होंने मां से इसके बारे में पूछा, इसलिए वे पूछ रही हैं. मेरे जवाब से संतुष्ट मां चली तो गईं, लेकिन दूसरे दिन बातों-बातों में ये संदेश ज़रूर दे दिया कि बेटा, इस तरह सरेराह लड़कों से बात न किया करो. मैंने मां से कहा भी कि मां छुप-छुपकर तो नहीं मिले ना? और रास्ते में मिलने पर पढ़ाई की, कॉलेज की बात ही तो कर रहे थे और वो भी सरेआम? इसमें किसी को क्या दिक़्क़त होनी चाहिए? मां की सूरत थोड़ी उतर गई और मैं चाहते, न चाहते हुए भी बहुत कुछ समझ गई. ये दूसरी थी… छोटे शहर की युवतीवाली फ्रेम.

मैं हमेशा से अच्छी तरह जानती थी कि यूं देखा जाए, तो मैं औसत लुक्सवाली युवती थी, पर आत्मविश्‍वास मेरे व्यक्तित्व को हमेशा से ही कइयों से आगे ला खड़ा करता था. फिर भी कई बार जब-जब, किसी के द्वारा किसी अजीब-सी नई फ्रेम में जड़ी जाती थी मैं, पुरज़ोर विरोध नहीं कर पाती थी. एक बात रोकती थी शायद कि लोग… दूसरे लोग मुझे अच्छा नहीं कहेंगे और शायद तब समझ ही नहीं पाती थी कि फ्रेम में जड़ी जा रही हूं, तो कहती कैसे कि मुझे ऐसी फ्रेम में मत जड़ो, जिसमें मैं पूरी तरह समा ही नहीं सकती, क्योंकि मेरे स्वाभाविक व्यक्तित्व के तो कई आयाम हैं. उन्हें, उन सब को भला किस तरह फ्रेम में ़कैद किया जा सकता है? इसके लिए तो तुम्हें अनगिनत फ्रेम्स लानी होंगी, पर फिर भी कई-कई बातों में कई-कई लोगों ने कई-कई फ्रेम्स में जड़ना चाहा मेरे व्यक्तित्व को. यही सारी बातें तीसरी फ्रेम थीं जैसे… एक बड़ीवाली फ्रेम… एक बड़ी अच्छी लड़कीवाली फ्रेम.

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और वो याद है? शादी की बात चली तो निशांत के पिता के कहने पर निशांत ही हम सबसे मिलने आए थे. तब मैंने नौकरी शुरू की ही थी. एक छोटी-सी फर्म में कमर्शियल मैनेजर की. निशांत से बातचीत हुई, तो उनके सादे-से व्यक्तित्व ने मुझे बहुत प्रभावित किया था. उन्होंने कहा था कि वो चाहते हैं कि महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी हों, जब इतना पढ़ा है तो अपनी शिक्षा का उपयोग करें. बस, इसी बात ने तो जैसे मुझे मेरा आकाश दे दिया था. मैंने तो मन बना ही लिया था कि यदि यहां से ‘हां’ हुई, तो मैं ज़रूर अपनी हामी दे दूंगी. जब निशांत के घरवाले मुझे देखने आए थे, तब उनकी मां ने कहा था, “नौकरी तो ठीक है, पर घर को निभाना पहली ज़िम्मेदारी होना चाहिए. घर को इग्नोर करके नौकरी करना तो किसी गृहिणी को शोभा नहीं देता.” तो उनकी बात जैसे सही ही लगी थी. तब तो एहसास नहीं हुआ था, पर आज लगता है ये चौथी फ्रेम थी… अच्छी बहूवाली फ्रेम.

और डायरी, वो भला तुम कैसे भूल सकती हो? मैंने उसे सबसे पहले तो तुमसे ही साझा किया था न? वो हमारी शादी के बाद का मीठा-नमकीन-सा समय? शादी के बाद के प्यार का, पहले प्यार के ख़ुमार का. बड़े से महानगर में हम दोनों का साथ-साथ लगभग भागते हुए ऑफिस के लिए निकलना. शाम घर लौटना. रात के खाने के बाद लंबी-सी वॉक पर जाना और फिर एक-दूसरे की आगोश में सब कुछ भूलकर यूं सो जाना, जैसे दुनिया में हमें इससे ज़्यादा की तो कोई ज़रूरत ही नहीं है. इस बीच भी रिश्तेदारों के घर आने पर उनका हमारे वर्किंग कपल होने की तारीफ़ करने के साथ-साथ यह कहने से भी न चूकना कि यदि तुम काम न कर रही होतीं, तो घर को और ख़ूबसूरत तरी़के से रखा जा सकता था. ये पांचवीं फ्रेम थी… सुघड़ गृहिणीवाली फ्रेम.

फिर जब जॉब के दौरान मैं अपने कलीग्स से बात करती हुई बताती कि मैं अपने घर पर ख़ुद खाना पकाती हूं, कोई मेड नहीं लगा रखी है, तो उनका तपाक से यह कहना कि खाना तो बहुत अच्छा बना है, पर जब तुम दोनों कमा रहे हो, तो मेड क्यों नहीं रख लेते? एक्चुअली, छोटे शहरों में महिलाएं नौकरी के साथ खाना घर पर बना लेती हैं, पर हम तो खाना बनाना ही नहीं जानते और जब इतना कमाते हैं, तो मेड ही क्यों न लगाएं? फिर वीकएंड तो बाहर खाना खाने के लिए ही होते हैं? ये बातें बता रही थीं कि मैं छोटे शहर से आई महिला हूं और बड़े शहर की कामकाजी औरतों में शामिल होने के लिए ये थी छठवीं फ्रेम… शहर की स्मार्ट कामकाजी महिलावाली फ्रेम.

फिर कीर्ति के मेरे जीवन में आने का वो ख़ुशनुमा वक़्त. जब डिलीवरी के लिए ससुराल गई, तो बिल्कुल अनाड़ी थी. पहले बच्चे के दौरान कौन-सी महिला अनाड़ी नहीं होती? पहली बार मां बनती है, पहली बार बच्चा संभालती है और पहली बार उस अनुभव से गुज़रती है, जिसे हमेशा दिव्य करार दिया जाता है. अपने आप में दिव्य है भी मां बनने का अनुभव, पर डायरी, ये भी एक फ्रेम में बांध दिए जाने जैसा अनुभव ही है. अच्छी बातें सब बताते हैं, पर यह कोई नहीं बताता कि बचपन से अब तक जिस तरह ढांप-ओढ़कर मर्यादा में रहना सिखाया जाता है, डिलीवरी के वक़्त डॉक्टर, एनेस्थिसिस्ट और नर्स के आगे आप निपट नंगे हो जाते हो, बिल्कुल नंग-धड़ंग. दर्द में डूबे और असहाय. हां, अपने ही शरीर से निकले एक नन्हे शिशु के लिए यह सब सहना, उसके हमारी गोद में आते ही बहुत कमतर या छोटी-सी घटना जैसा लगता है. पर ये भी एक सच तो है ना? इसके बारे में कुछ न बताकर फिर आपको एक अच्छी मां के फ्रेम में बांध दिया जाता है. बात तो इसके आगे की भी है. डायरी! स्तनपान को यूं तो बड़ा ग्लोरिफाई करके दिखाया जाता है और एक बच्चे के लिए यह आवश्यक भी है. कीर्ति को भी तो मैंने ब्रेस्टफीड कराया ना? वो भी उसके दो साल के होने तक. पर बहुत से हार्मोनल बदलावों से गुज़र रही नई-नई मां को अपने शिशु को स्तनपान कराने के लिए शुरुआत में कितनी गहन पीड़ा से गुज़रना पड़ता है? इसका ज़िक्र कोई नहीं करता, क्यों? और ऐसी अस्त-व्यस्त-सी स्थिति में आपकी साड़ी, दुपट्टा अपनी जगह से हट जाए, तो आने-जानेवाली महिलाएं आपके दर्द को, आपकी रात की पूरी न हुई नींदों को अनदेखा करते हुए यह बताने से नहीं चूकतीं कि भले ही नई मां बनी हो तो क्या, शउर से रहना तो सीखो. ये सातवीं फ्रेम है… चुस्त-दुरुस्त मां वाली फ्रेम.

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जानती हो डायरी, ये फ्रेम्स जैसे ख़त्म ही नहीं होतीं, जिनमें हर महिला को बांध दिया जाता है या बांधने का प्रयास किया जाता है, बड़े हौले-से. और इनके शीशों में उतरने लगता है उसका व्यक्तित्व. कब? उसे भी पता ही नहीं चलता. याद है? जब कीर्ति दो-तीन साल की हुई थी. इन तीन वर्षों तक तो मुझे वर्क फ्रॉम होम दे ही दिया था कंपनी ने. मैं रोज़ाना कीर्ति को नीचे लेकर जाती थी शाम को, दूसरे बच्चों के साथ खिलाने, वहां अमूमन होममेकर्स ही मिलती थीं, अपने बच्चों के साथ. कामकाजी महिलाओं के बच्चे तो उनके दादा-दादी, नाना-नानी या मेड्स के साथ ही नीचे आते थे. एक दिन मैं कुछ बच्चों की मांओं के साथ बात कर रही थी कि अचानक कीर्ति कहीं नज़र नहीं आई. मैं उसे ढूंढ़ने गई, तो पाया कि वो थोड़ी ही दूर पर कुछ दूसरे बच्चों के साथ खेल रही है. वह मेरे साथ आने को तैयार नहीं हुई, तो मैंने वहां खड़ी एक मेड से कीर्ति का ध्यान रखने को कहा और उन महिलाओं का रुख किया, जिनसे मैं बात कर रही थी. वे मुझे आते देख नहीं सकीं और उनकी बातें मुझे सहज सुनाई दे गईं. उनमें से एक महिला दूसरी से पूछ रही थी, “क्या वाकई कीर्ति की मां कुछ काम करती है?” तो दूसरी महिला ने कहा, “कहती तो है, पर सच-झूठ ईश्‍वर जाने.” तीसरी बोली, “जिस तरह अकड़ती है, लगता है काम करती ही होगी.” चौथी ने कहा, “यदि कामकाजी होती, तो हम होममेकर्स के ग्रुप में आकर बात थोड़े ही करती?” मैं उल्टे पांव कीर्ति के पास लौट गई, क्योंकि फिर एक फ्रेम में बांधी जा रही थी… होममेकर/कामकाजीवाली फ्रेम.

फिर जब मैंने कीर्ति को समझा-बुझाकर क्रैश में रहने को राज़ी किया और फुलटाइम काम पर जाने की शुरुआत की, तो मैं, तुम और निशांत ही जानते हैं डायरी कि पहले के 15 दिनों तक वह मेरे लिए क्रैश के अंदर रोती थी और मैं उसके लिए उतनी ही देर क्रैश के बाहर ज़ार-ज़ार रोती थी. उसके चुप होने पर वह भली-सी क्रैश ओनर मुझे बाहर आकर इशारा कर देती थी कि वह चुप हो गई है और मैं मुरझाया-सा मुंह लेकर घर लौट पड़ती थी. कभी-कभी तो क्रैश ओनर कहती थी कि मुझे बहुत गिल्ट होता है. अंदर कीर्ति रोती है और बाहर आप. कीर्ति को मैं संभाल लूंगी, क्योंकि बच्चों को बहलाना आता है मुझे, पर आपका रोना मैं बर्दाश्त नहीं कर पाती. फिर कीर्ति को क्रैश की आदत लगाकर जैसे ही पहले दिन ऑफिस पहुंची, तो सबसे क्लोज़ कलीग ने ही एक और फ्रेम में बांध दिया. उसने कहा, “अरे, तुमने जॉइन कर लिया, इतनी छोटी-सी बच्ची को छोड़कर?” ये बड़ी निर्दयी फ्रेम थी… एक निर्मोही मां वाली फ्रेम.

और तुम तो जानती हो डायरी, मैं और निशांत एक ही बच्चा चाहते थे. आख़िर ये हमारा ़फैसला था. कीर्ति के इस दुनिया में आने से पहले ही निशांत ने मुझसे कह दिया था, “हमारा आनेवाला बच्चा बेटा हो या बेटी, पर होगा इकलौता ही.” मेरे क्यों? पूछने पर उन्होंने कहा था, “मैं इतना निष्ठुर नहीं हो सकता कि तुम्हें दोबारा लेबर पेन से गुज़रने दूं.” उनका जवाब सुनकर मेरी आंखें भर आई थीं. डायरी, और मैं कसकर लिपट गई थी उनसे. फिर हम पर घर-परिवार, रिश्तेदारों और कलीग्स का दबाव-सा आने लगा. जैसे वही हमारे दूसरे बच्चे को पालेंगे. आश्‍चर्य की बात है डायरी, जब घर-परिवार और रिश्तेदारों से मिलो, तो वे इकलौते बच्चे के बिगड़ने के संदेहों से घिरे और जब कलीग्स से मिलो, तो वे डबल इनकम सिंगल किड के तमगे से नवाज़ते हुए फिर बांधने लगे अलग-अलग फ्रेम्स में. पर इस बार की फ्रेम्स में मैं अकेली नहीं थी, निशांत भी थे. मैंने देखा इस बार फ्रेम में जड़े जाने को लेकर मैं हर बार की तरह सोच में डूबी थी, पर निशांत… उन्होंने ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. शायद इस फ्रेम का कोई दबाव महसूस नहीं किया उन्होंने, क्योंकि शायद वे पुरुष हैं, क्योंकि पुरुषों की कंडीशनिंग अलग तरह की होती है और शायद पहली बार उन्हें कोई किसी तरह की फ्रेम में जड़ने की कोशिश कर रहा था, तो जैसा कि मेरे साथ भी पहली बार हुआ था कि मैंने बिना कुछ महसूस किए सलवार-सूट सहजता से पहन लिया था, वही उनके साथ हुआ. उन्होंने सलवार-सूट पहनने की यानी दूसरा बच्चा करने की हामी तो नहीं भरी, पर सहज बने रहे.

फिर मेरे सामान्य, सहज ढंग से रहने, ज्वेलरी को नापसंद करने, ब्रैंडेड कपड़ों को ख़ास तवज्जो न देने पर मेरे अपने ही क़रीबी रिश्तेदारों का ये कहना कि आप कामकाजी हो, पर कामकाजी लगती तो नहीं हो. एक अलग तरह की फ्रेम थी. और इसी तरह पार्टीज़ में ज़्यादा दिलचस्पी न लेने को देखते हुए कलीग्स ने भी मुझे एक और फ्रेम में जड़ दिया… नीरस महिलावाली फ्रेम. ऐसे ही सास-ससुर के घर आने पर अपनी मर्ज़ी से कुछ महीनों के लिए ऑफिस में सलवार-कमीज़ पहनकर जाने को कलीग्स ने पू बनी पार्वती और आ गईं बहनजीवाली फ्रेम में जड़ दिया.

इस बीच 10 वर्ष तक नौकरी की और अपनी मेहनत से प्रमोशन भी बटोरती गई मैं. लोगों ने इस बीच भी कई फ्रेम्स में जड़ा, जैसे- बुरी बॉस फ्रेम, किस्मतवाली फ्रेम, चाटुकार महिला फ्रेम वगैरह… पर इन्हें इग्नोर करती रही मैं. देखो न डायरी, इन सभी फ्रेम्स को इग्नोर भले ही किया हो, पर मन के किसी कोने में आज भी ये मौजूद हैं, मतलब इनसे अप्रभावित तो नहीं रही न मैं? यही बताना चाहती हूं तुम्हें कि लोगों की अपेक्षाओं पर कान देती, उनके मुताबिक फ्रेम्स में ढलने की कोशिश करती मैं. मैं तो रह ही नहीं पाई, आज लगता है ये.

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तुम कह सकती हो डायरी कि मैं बहुत ज़्यादा संवेदनशील हूं, पर मुझे पता है तुम नहीं कहोगी. तुम तो मेरी अपनी हो ना? तुम मुझे किसी फ्रेम में भला क्यों जड़ोगी? इन सभी बातों से क़तरा-क़तरा मेरा व्यक्तित्व बना है और तुमसे बेहतर कौन जानता है यह? अब आगे की सुनो, तुम्हें याद तो होगा ही कि अभी कीर्ति टीनएज में आने भी न पाई थी कि उसे लेकर मुझे हर ओर से यह सुनाई देने लगा था… लड़की है, बड़ी हो रही है, अकेली बेटी है, बच्चियों को संभालने की उम्र है, एक ही तो बच्ची है, तुम्हें क्या ज़रूरत है इतना कमाने की, नौकरी करने की. इन आरोपों में लापरवाह मां, लालची मां की फ्रेम में जड़ी जा रही थी मैं.

सबसे अच्छी बात यह रही कि निशांत ने कभी मुझे किसी फ्रेम में नहीं जड़ा. बस, यहीं आकर ईश्‍वर की कृतज्ञ रही हूं हमेशा. उम्र बढ़ रही थी, थकान बढ़ रही थी, एक ही जगह काम करते हुए मोनोटोनी बढ़ रही थी और मां हूं, तो कहीं न कहीं इस बात का पूरा इल्म था कि अब कीर्ति बड़ी क्लास में आ रही है. उसे पढ़ने के लिए तो नहीं, पर पढ़ाई के दबाव से जूझने के लिए अपने आसपास मेरी उपस्थिति की दरकार है. अचानक एक दिन मैंने निशांत से कहा, “मैं नौकरी छोड़ना चाहती हूं.” उन्होंने मेरी बातों को सुना, मेरी बातों के वज़न को तौला और कहा, “जैसा तुम चाहो.”

जिस महिला ने हमेशा से ख़ुद को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रखा हो, लोगों के कहने के बाद भी जिसने नौकरी करते रहने को वरीयता दी हो, उसके ख़ुद ही नौकरी छोड़ने का निर्णय नितांत निजी है. पर लोग…? वो तो फिर मुझे फ्रेम में बांधने लगे. अरे, इतने साल नौकरी की है, अब घर कैसे बैठ पाओगी? थोड़े दिन अच्छा लगेगा, इसके बाद पछताओगी. और यहां मुझ पर मढ़ी जा रही थी… ग़लत निर्णय लेनेवाली महिला की फ्रेम.

नौकरी छोड़ने के बाद थोड़ा खालीपन लाज़मी था. इसी खालीपन के बीच ही तो ये सोच नमूदार हो गई. इन सारी बातों को सोचते हुए आज लगा कि मैं इन फ्रेम्स में बंधते-बंधते, फ्रेम-दर-फ्रेम ज़िंदगी जीते-जीते अपने वास्तविक व्यक्तित्व से परे चूं-चूं का मुरब्बा हो चली थी. बहुत-सी फ्रेम्स में बंद चूं-चूं का मुरब्बा. आज सोच लिया है कि अब इन फ्रेम्स से आज़ाद होना है. इस तरह कि अब कभी इनमें कोई भी मुझे जड़ न पाए. और जानती हो डायरी, सबसे मज़ेदार बात क्या है? घर में मौजूद सारे फ्रेम्स को मैंने उठाकर स्टोर में उस जगह रख दिया है, जहां हर माह कबाड़ी को देने के लिए चीज़ें इकट्ठा करती हूं, क्योंकि अब मुझे ये फ्रेम्स कहीं नहीं चाहिए. न दिल में, न दिमाग़ में और ना ही घर में. मैं ख़ुद के और दूसरी महिलाओं के लिए अनंत आकाश चाहती हूं और बस चले तो मैं दुनिया की हर महिला के दिल में बसी ऐसी फ्रेम्स को निकालकर फेंक दूं… आज, अभी और इसी वक़्त. सच! नए आकाश का पंछी तुम्हारी उन्मुक्त-सी शिखा.

 

Shilpa Sharma

शिल्पा शर्मा

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कहानी- आत्मविश्‍वास (Short Story- Atmavishwas)

वहां जाकर उसे पता चला कि वह कुछ लोगों के मुक़ाबले कितनी अच्छी स्थिति में थी. वे औरतें जो जीती-जागती लाशें थीं, निराशा और अवसाद की दलदल में प्रायः डूब ही चुकी थी. तिरस्कृत, बलात्कृत, अवहेलित, बहिष्कृत नारी प्रतिमाएं, संवेदनाहीन, अनुभूति शून्य, उन्हें सहारे की आवश्यकता थी. अकल्पनीय भीषण हादसों का सामना करके पत्थर हो गई थीं वे.

उन्हें देखकर शालिनी जैसे अट्ठाइस बरस की नींद से जाग उठी. उसे महसूस हुआ कि वह यह काम कर सकती है, क्योंकि उनके दुखों की भाषा उसके लिए भी अजनबी नहीं है. ज़ख़्म उनके जैसे गहरे नहीं हैं तो क्या, कांटों की वेदना तो उसने भी अनुभव की है.

Short Story in Hindi

 

“मैं जा रहा हूं. दरवाज़ा बंद कर लेना. अब उठोगी भी कि टुकुर-टुकुर देखती रहोगी.”

शालिनी ने उठकर दरवाज़ा बंद कर लिया. इस तरह के अपमान के घूंट पीने की वह आदी हो गई थी. अब ठीक दस मिनट बाद सामनेवाले घर से शिखाजी निकलेंगी. उन्हें निकलते देखने का मोह वो संवरण नहीं कर पाती. शालिनी ने खिड़की के परदे को ज़रा-सा सरकाया और आंखें सामनेवाले घर पर गड़ा दीं.

क़लफ़वाली कॉटन साड़ी, सौम्य मेकअप, अनुभवी मुखमुद्रा, कंधे पर टंगी पर्स ओझल हो जाती, तो अनायास ही शालिनी कमर में खोंसे पल्लू को मुक्त करके चेहरे का पसीना रगड़-रगड़कर पोंछती.

ये लोग कॉलोनी में नए आए हैं. उस दिन परिचय के लिए घर आए थे. बड़ी असहज हो गई थी शालिनी.

“मैं शिखा गुप्ता.” उस महिला ने शिष्टता से उसे नमस्कार करते हुए पूछा “आपका नाम?” “जी, मैं शालिनी शर्मा.” शालिनी ने अचकचाकर जवाब दिया. बुद्धू, बेवकूफ़, गंवार, मूर्ख, घर में नित्य सुने जाने वाले विभिन्न नामों के कारण अपना असली नाम याद करने में उसे ख़ासी मश़क़्क़त करनी पड़ी.

“शालिनी… शालू मेरी छोटी बहन. हां, अपनी बहन को मैं इसी नाम से बुलाती हूं. तुम्हें मंज़ूर है?”

“जी…” शालिनी बुरी तरह हकला गई. इतने स्नेह से उसे किसी ने कभी बुलाया हो, याद नहीं पड़ता. वह अपलक उसे यूं ताकती रह गई जैसे उस जैसी अयोग्य महिला पर किसी ने आश्‍चर्यजनक रूप से कृपादान किया हो.

शिखाजी हंसमुख और मिलनसार थीं, पर व्यक्तित्व में ज़मीन-आसमान का अंतर शालिनी को उनसे दूर कर देता. फलतः परिचय यहीं तक सीमित रह गया.

शाम को वही उबाऊ क्रम. योगेशजी का ऑफ़िस से आगमन. शालिनी द्वारा चाय-नाश्ता पेश किया जाना, पति का उसमें ढेरों नुक्स निकालना, शालिनी के गंवार पहनावे पर उबलना, शालिनी का गरदन झुका लेना, स्वयं को कोसना, फिर खाना, फिर मीन-मेख और फिर जानलेवा रात.

शालिनी को परे धकेल दिया जाता. जिस तरह डिस्पोज़ेबल कप को इस्तेमाल के बाद तोड़-मरोड़कर फेंका जाता है. शरीर का पोर-पोर टीसने लगता, पर विरोध करना जैसे उसने सीखा ही नहीं था.

जब से ब्याहकर इस घर में आई, अपने लिए यह सुनती रही, “मुंह में ज़ुबान ही नहीं है. बिल्कुल गऊ है.

एक आदर्श बहू के लिए इससे बड़ा कॉम्प्लीमेंट क्या हो सकता है. चार भाई-बहनों में दूसरे क्रमांक की शालिनी को अपने भाई-बहनों से युक्तिपूर्ण और तार्किक संवाद करना तो अच्छी तरह आता था, पर माता-पिता ने बुज़ुर्गों के सामने कम बोलने के संस्कार दिए थे, जिन्हें वह अच्छी तरह निबाह रही थी.

सास की दुलारी बहू पति की आंख की किरकिरी बनी रही. उसकी एक-एक बात उन्हें काट खाने दौड़ती. गुण भी अवगुण नज़र आते.

बढ़ती उम्र की बेटियों ने भी मां को कभी सम्मान नहीं दिया. उनकी और योगेश की ख़ूब घुटती थी. उन तीनों में वह कभी शामिल होने की कोशिश करती तो उसे चावल में कंकर-सा निकाल कर अलग कर दिया जाता.

अब ऐसी भी गई- गुज़री नहीं?थी वह. बी.ए. द्वितीय वर्ष पास थी. परंतु इन कृतघ्न लोगों की चाकरी बजाते-बजाते कहीं की नहीं रही. समाचार कान पर पड़ते हैं, सुनती भी है. इतनी अज्ञानी भी नहीं थी कि समझ भी न पाती. बस चर्चा नहीं कर पाती थी. अपने विचारों को प्रकट करना वह भूल ही गई थी. बरसों पहले ज़ुबान बंद हो गई थी तो खुलती कैसे!

उसकी शादी को अभी तीन-चार दिन ही हुए थे. पति के मित्र ने उन दोनों को खाने पर बुलाया. कुछ और दंपति भी आमंत्रित थे. घर के बुज़ुर्गों से दूर हमउम्र लोगों में उसे बड़ा खुला-खुला सा लग रहा था. तरह-तरह के विषयों पर चर्चा चल रही थी. वह अधिकार से भाग ले रही थी. अच्छी तरह स्वयं को प्रस्तुत कर रही थी. हंसी-मज़ाक, बातचीत में खाना कब ख़त्म हुआ पता ही नहीं चला.

“बड़े भाग्यशाली हो यार! बड़ी बुद्धिमती पत्नी मिली है.” एक मित्र ने कहा.

योगेश की पीठ पर धौल जमाते हुए दूसरे मित्र ने मज़ाक किया, “बंदर के गले में मोतियों की माला.” ठहाकों के बीच शालिनी ने देखा कि योगेश के चेहरे की रेखाएं खिंचने लगी हैं. बगैर एक शब्द बोले वे दोनों घर आए.

रात को अकेले में उन्होंने शालिनी को एक थप्पड़ रसीद कर दिया. “बहुत खी-खी कर रही थी वहां. एक से जी नहीं भरता?” लगा, जैसे कानों में किसी ने पिघला सीसा डाल दिया हो.

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उस रात का वह अपमान आज भी वह याद करती है, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. पति का सारा क्रोध उस पर बिजली बनकर टूट पड़ा था. पति-पत्नी के प्रणय की कोमल संवेदनाएं तार-तार हो गई थीं. एक सुंदर अनुभूति को अभिशाप के रूप में झेलने को वह विवश हो गई. पलंग के कोने में गुड़ीमुड़ी पड़ी शालिनी देर तक सिसकती रही. योगेश कब के सो चुके थे.

ज़ुबान तब से लेकर आज तक ख़ामोश है. संवेदनाओं ने बेहोश पड़े रहने में ही खैर समझी थी. मन के विचारों को दस दिशाओं का आकाश देने के बदले उसने उन्हें नियंत्रण के ताले में बंद कर दिया. आत्मा जड़ हो गई थी.

इतने बोझ तले जी सकता है इन्सान? शायद इसीलिए वह एक चेतनाहीन ज़िंदगी जी रही थी.

अपना अस्तित्व शनैःशनैः इसी रूप में उसने स्वीकार कर लिया. स़िर्फ एक ही क्षण उनके स्थिर जीवन में हलचल मचा देता था. सामने से निकलने वाली शिखाजी का दर्शन. ऊर्जा से भरपूर, आनंद से लबरेज़, कल्पना से परे वह नारी व्यक्तित्व.

आज…आज वह उसी के घर की ओर आ रही थी.

‘नमस्ते’ शिखाजी के अभिवादन के प्रत्युत्तर में वह सकुचाकर बोली, “आप तो बड़ी हैं, अभिवादन करके शर्मिंदा मत कीजिए..”

“अच्छा, मैं तुम्हें शालू ही कहूंगी जैसा हमने उस दिन तय किया था.” वह हंसकर बोली, “क्या तुम कभी घर से बाहर नहीं निकलती?”

“ज़रूरत ही नहीं पड़ती. सामान ये ला देते हैं, घर में काम भी बहुत हो जाता है.”

“काम का तो बहाना होता है हम औरतों का! दरअसल हम घर के बाहर निकलना ही नहीं चाहतीं. देखो, तुम्हारी दोनों बेटियों की शादी हो गई. अब घरेलू ज़िम्मेदारियां ख़त्म हो गईं. लेकिन समाज के प्रति भी हमारी ज़िम्मेदारी है या नहीं?”

शालिनी क्या कहती. उस प्रतिभावान गरिमापूर्ण व्यक्तित्व की धनी महिला से उसकी क्या बराबरी? पति के अनुसार तो वह परले दर्ज़े की बेवकूफ़ है, जिसने घरेलू ज़िम्मेदारी भी अच्छी तरह नहीं निभाई, लेकिन वह करती भी क्या? अपने घर की न सही, अपनी रसोई की भी वह रानी होती तो एक बात थी, पर योगेश वहां भी चले आते.

समाज सेवा कहां से होती. घर को अपना नहीं बना सकी, समाज को कैसे बनाती? शिखाजी के प्रस्ताव पर शालिनी मौन ही रही.

ताज्जुब था! ऐसी महिला उसके जैसी नगण्य निहायत घरेलू किस्म की महिला के साथ एकतरफ़ा संबंध बनाए हुए थी.

उस रात बरसों बाद शालिनी ने कोई सपना देखा. उसने देखा, शिखाजी उसका हाथ पकड़े रूई के फाहे जैसे बादलों में सैर करा रही थीं. वह मुक्त थी. निर्द्वंद्व. सिर पर हमेशा लदा रहने वाला हीनता का बोझ न जाने कहां गायब हो गया था.

अगले दिन सुबह ग़लती से उसने चाय में शक्कर ज़्यादा डाल दी. योगेश ने हमेशा की तरह उसे गाली दी. “ज़ाहिल कहीं की! चाय है या चाशनी.”

आज उनकी गाली को वह निर्लिप्त भाव से स्वीकार नहीं कर पा रही थी. अंतर में चिंगारी उठती हुई उसने साफ़ महसूस की. शिखाजी ने उसमें यह कैसा परिवर्तन ला दिया है? जिस मन को मृत समझकर उस पर टनों मिट्टी डाल चुकी थी, उसमें से न जाने कैसे जीवन की धड़कन सुनाई दे रही थी.

उस दिन योगेश घर लौटे तो बड़े चिंतित दिखाई दे रहे थे.

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“क्या हुआ जी?” उसने चाय का प्याला उन्हें पकड़ाते हुए विनम्रता से पूछा. “मुझे ट्रेनिंग के लिए दिल्ली भेजा जा रहा है. दो महीने की ट्रेनिंग है. अब तुम बिल्कुल अकेली यहां कैसे रहोगी?”

शालिनी ख़ुद भी फिक्रमंद हो गई. कभी भी अकेली नहीं रही वह.

“तुम ठहरी परले दर्ज़े की बेवकूफ़! लापरवाही तुम्हारी नस-नस में भरी हुई है. लौटूंगा तो पता नहीं मुझे घर दिखेगा या खंडहर.”

शालिनी क्या जवाब देती! इसका जवाब तो वह ख़ुद भी नहीं जानती थी.

“और हां, बाहर के कामों के लिए एक-दो दोस्तों को बोल दूंगा. वे लोग कर देंगे. ठेलेवाले से सब्ज़ी लेना, पर हिसाब ठीक तरह करना, वरना पकड़ा दोगी उसे सौ का नोट और वापस लेना भूल जाओगी.”

‘जी… जी’ करती रही शालिनी. भीतर ही भीतर वह भी चिंतित हो गई थी. योगेश के जाने के बाद शिखाजी ने उसे हिम्मत बंधाई, फिर उसे डांटकर बोली, “तुम इतना अपमान क्यों सहन करती हो? पत्नी पति को सम्मान देती है, तो पति का भी फ़र्ज़ है कि अपनी पत्नी को सम्मान दे.”

पत्नी को सम्मान? यह कैसी हैरतअंगेज़ बात थी.

“क्या आपके पति आपसे दबते हैं?” शालिनी अटपटा-सा प्रश्‍न पूछ बैठी.

“पागल हो गई हो? हम पति-पत्नी हैं, एक गृहस्थी के बराबर के साझेदार. एक-दूसरे के ग़ुलाम नहीं.”

पति-पत्नी एक-दूसरे के पूरक, साथी मित्र, सहयोगी? ये कैसे अनोखे शब्द हैं. वह तो स़िर्फ इतना जानती है कि पति स्वामी है, तो पत्नी दासी. पति पालनकर्ता है, तो पत्नी पालित. पति आश्रयदाता है, तो पत्नी आश्रित. पति जीवनरस से भरपूर वृक्ष है, तो पत्नी अमरबेल.

शिखाजी हंसकर उसे उलाहना देतीं, “बरसों से घर ही घर में रहकर तुम्हारा दिमाग़ जंग खा गया है. तुम भूल गई हो कि तुम पढ़ी-लिखी हो, सिलाई-बुनाई में माहिर हो, ये गुण कोई कम तो नहीं! कल से तुम मेरे साथ चलोगी.

“कहां?”

“हाफ वे होम, जहां मानसिक रूप से विक्षिप्त महिलाओं को रखा जाता है. ऐसी महिलाएं, जिन्हें उनके परिजन ठीक होने पर भी स्वीकार नहीं करते.”

“लेकिन मैं क्या करूंगी वहां जाकर?’

“तुम उनसे बातें करके उन्हें उनकी अंतर्वेदना से मुक्त करोगी? उन्हें एहसास दिलाओगी कि वे अकेली नहीं हैं. अपना हुनर सिखाओगी. अवसाद के अंधे कुंए

से उन्हें बाहर निकालने की हर संभव कोशिश करोगी.”

“लेकिन मुझे तो यह सब नहीं आता…”

“यह तुम्हारा वहम है, तुमने मुझसे अपनी ज़िंदगी के बारे में विस्तार से बताया तभी तो मुझे पता चला.”

“मुझसे नहीं होगा…”

वह ना-ना करती रही और शिखाजी कब खींचकर उसे ले गईं, उसे स्वयं पता नहीं चला.

वहां जाकर उसे पता चला कि वह कुछ लोगों के मुक़ाबले कितनी अच्छी स्थिति में थी. वे औरतें जो जीती-जागती लाशें थीं, निराशा और अवसाद की दलदल में प्रायः डूब ही चुकी थी. तिरस्कृत, बलात्कृत, अवहेलित, बहिष्कृत नारी प्रतिमाएं, संवेदनाहीन, अनुभूति शून्य, उन्हें सहारे की आवश्यकता थी. अकल्पनीय भीषण हादसों का सामना करके पत्थर हो गई थीं वे.

उन्हें देखकर शालिनी जैसे अट्ठाइस बरस की नींद से जाग उठी. उसे महसूस हुआ कि वह यह काम कर सकती है, क्योंकि उनके दुखों की भाषा उसके लिए भी अजनबी नहीं है. ज़ख़्म उनके जैसे गहरे नहीं हैं तो क्या, कांटों की वेदना तो उसने भी अनुभव की है.

उसके सांत्वना देने के तरी़के से शिखाजी भी अभिभूत हो गईं. अब तो वह रोज़ ही शिखाजी के साथ ‘हाफ वे होम’ जाने लगी.

शिखाजी ने शालिनी का रहन-सहन भी बदल दिया. ज़माने की ऱफ़्तार को समझने का प्रयास करते-करते वह उसी प्रवाह में आगे बढ़ चली थी. चेहरे के आहत, उदास भाव कहीं तिरोहित हो गए थे.

आजकल वह फ़ोन पर योगेश से सधी हुई आवाज़ में बस इतना ही कहती, “व्यर्थ चिंता न करें. अपनी और घर की सुरक्षा ख़ुद करने में वह सक्षम है.”

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घबराई हुई, अचकचाई हुई आवाज़ सुनने के आदी योगेश इस सधी हुई आवाज़ से भौंचक्के रह जाते.

इस दौरान गैस ख़त्म हुई. टेलीफ़ोन, बिजली, पानी का बिल- इस तरह के बीसियों मौ़के आए, जिनके लिए योगेशजी ने अपने ख़ास दोस्तों को कह रखा था. लेकिन ऐसी नौबत ही नहीं आई. शिखाजी के साथ जाकर वह स्वयं ही सारे काम कर आई. उसने देखा व्यर्थ ही वह इन सब कामों को हौआ समझती रही. कुछ भी कठिन नहीं था. शिखाजी कहतीं, “इन मामूली-से लगनेवाले कामों को भी स्वयं करने से आत्मविश्‍वास पैदा होता है. उस दिन ‘हाफ वे होम’ से लौटते हुए शालिनी का मन बेहद उदास था. बार-बार आंखों के सामने उस पंद्रह साल की मासूम बच्ची का चेहरा घूम जाता था. वह अपने नज़दीकी रिश्तेदार की हवस का शिकार हुई थी. अनचाहे गर्भ को ढोती वह लड़की अपने ही माता-पिता द्वारा ठुकराई गई थी. उसका कोई दोष न होते हुए भी उसे सजा दी गई थी. कुसूरवार ने उसके मां-बाप को अपने दृष्कृत्य की मामूली क़ीमत चुका दी थी.

“क्या इन औरतों का समाज में वापस लौटना संभव है? हमारी कोशिशों का सुखद परिणाम निकलेगा या नहीं?” शालिनी चिंतित थी.

“हां शालू, तुम्हें देखकर मैं विश्‍वासपूर्वक कह सकती हूं कि अपने अतीत की ज़्यादतियां भूलकर, वर्तमान की वेदना से उबरकर मुनासिब भविष्य का निर्माण किया जा सकता है.”

शिखाजी कुछ क्षण ख़ामोश रहीं, फिर भावुक होकर गंभीरतापूर्वक बोलीं, “समय कितना भी बदल गया हो, पर आज भी ये औरतें शाप भोग रही हैं. ये अपनों द्वारा छली गई हैं. इनका आत्मसम्मान आहत हो चुका है. इनकी अस्मिता को पैरों तले कुचला गया है. रामचंद्रजी ने अहिल्या को घोर अवसाद से उबारा. हमें भी वही आदर्श अपने सामने रखना है. समाज से बहिष्कृत, जड़ हो चुकी इन औरतों में चेतना जगानी है.”

“शिखाजी! आप सब कुछ कर सकती हैं. आपसे मिलने के पहले मेरी ज़िंदगी में भी कुछ नहीं था. अपने इर्द-गिर्द छाई धुंध को मैं अपनी ज़िंदगी का सच समझ बैठी थी. धुंध के पार का उजाला मेरी दृष्टि से दूर था और आज…”

“आज भी तुम वहीं हो! मैंने स़िर्फ तुमसे तुम्हारा परिचय कराया है. योगेशजी के विशेषणों को ही तुम सच समझ बैठी थी. लेकिन शालू, व्यक्ति जब स्वयं प्रयत्न करता है, तभी अपने अंधेरों से मुक्त हो पाता है. दूसरे उसे सांत्वना दे सकते हैं, लेकिन हिम्मत उसे स्वयं जुटानी पड़ती है. मध्यमवर्गीय परिवारों में कई बार अहंकारी पुरुष अपनी पत्नी के व्यक्तित्व को बौना बनाने में ही अपना पुरुषार्थ समझते हैं? तुम ही सोचो, समाज का आधा हिस्सा ही यदि चेतनाशून्य होगा तो उसके ऊंचा उठने की कल्पना भी कैसे की जा सकती है.”

शिखाजी की बातों में जीवन की सच्चाई थी.

दो महीने बाद योगेश घर लौटे, तो अपनी पत्नी को पहचान नहीं पाए. कहां गए वे लाचारी के भाव? उनके सामने तो एक तेजस्वी नारी खड़ी थी. सलीकेदार पहनावा और चेहरे पर गर्वीली मुस्कुराहट. यह तो उनकी पत्नी नहीं है, “आप जल्दी से नहा-धो लें. खाना तैयार है. एक बजे मुझे किसी काम से बाहर जाना है.”

शालिनी की इस अदा पर योगेश स्तब्ध होकर उसे देखते ही रह गए. उससे कुछ पूछने का भी साहस उनसे न हुआ. ‘पागल, बेवकूफ़, जाहिल, मूर्ख’ आदि उनकी जीभ पर आने के लिए मचलनेवाले शब्द आज पता नहीं कहां चले गए थे.

योगेश को वे खोजने पर भी नहीं मिल रहे थे.

 – स्मिता भूषण

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कहानी- सर्द ज़मीन (Short Story- Sard Zamin)

अकेलापन उसके अंदर इस कदर भर गया था कि दिनभर ऑफ़िस में थकने के बावजूद वह सो नहीं पाती. रात का सन्नाटा उसे तड़पाता. पुरुष की बलिष्ठ बांहों में समा जाने की चाह उसे करवटें बदलते हुए रात बिताने को मजबूर कर देती. क्या उसकी इच्छा अस्वाभाविक थी?

Hindi Kahani

वह बैग उठाए घर की दहलीज़ के बाहर क़दम रख देती है. इसके साथ ही कहानी ख़त्म हो जाती है… लतिका कहानी के समापन को एक अवास्तविक मोड़ मान उसका विश्‍लेषण करने लगती है. कहानी का हर पहलू, हर घटना उसे लगातार उलझन में डालती जाती है. उसे लगता है कि हंसा जैसी महिलाओं का समाज में होना सच है, पर उसके फैसले को कभी भी समाज की स्वीकारोक्ति नहीं मिल सकती है.

पिछले दो ह़फ़्तों से वह लगातार प्रेम कहानियों पर आधारित टीवी पर आनेवाले सीरियल की इस कहानी को देख रही थी. कहानी ‘हंसा’ नाम की एक महिला की थी, जिसके जीवन में अनायास ही एक पुरुष का प्रवेश होता है. पति के ज़्यादातर बाहर रहने व उसे समय न दे पाने के कारण अपनी तन्हा व उदास ज़िंदगी में रंग भरने की इच्छा उस पुरुष से मिलते ही हंसा के मन में पलने लगती है. बार-बार होती मुलाक़ातें नजदीकी बढ़ाती हैं, यहां तक कि उसका 8 वर्षीय बेटा भी उसमें अपने पिता की छवि व प्यार पाने की उम्मीद से उससे जुड़ता चला जाता है. पर पिता के आते ही अंकल की उपस्थिति उसके लिए गौण हो जाती है. उथल-पुथल से घिरी हंसा उस पुरुष के प्यार व सान्निध्य से जान पाती है कि पुरुष का स्पर्श कितना सुखद होता है. उसका साथ कितना विश्‍वास देनेवाला होता है. वह घर छोड़कर उसके साथ जाने का फैसला करती है. लेकिन अपनी बसी-बसायी गृहस्थी व बेटे को छोड़कर चले जाना उसके लिए सहज नहीं था. पर स्वयं के लिए जीने की ख़्वाहिश या पति के साथ बीते नौ वर्षों की पीड़ा शायद उसे स्वार्थी बनने को मजबूर कर देती है.

उसका जाना लतिका को ऐसा लग रहा था मानो किसी असंभव को जान-बूझकर लेखक ने संभव बनाने की कोशिश की है. समाज के नियमों व मर्यादाओं को दरकिनार कर इस तरह का क़दम उठाने की हिम्मत हंसा के अंदर हो ही नहीं सकती थी. उसे तो ज़बरदस्ती उसके अंदर ठूंसा गया था, ताकि नारी शक्ति को प्रस्तुत किया जा सके. फेमिऩिज़्म की परिभाषा को गढ़ने का यह प्रयास लतिका को परेशान किए जा रहा था.

आख़िर क्यों?

कहीं लतिका भी हंसा तो नहीं बनना चाह रही है?

लतिका हंसा नहीं है और हो भी नहीं सकती, लेकिन एक बार उसने भी तो हंसा बनने की कोशिश की थी.

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हर नारी के अंदर कहीं-न-कहीं एक हंसा छिपी होती है. कुछ उसे बाहर निकाल दबी-घुटी ज़िंदगी से छुटकारा पा लेती हैं तो कुछ जीवनभर दर्द के अंधेरे में स्वयं को गुम कर उस गुनाह की सज़ा भुगतती हैं, जो उन्होंने किया तो नहीं, पर उसके बारे में किसी कोने में बैठकर सोचा ज़रूर था. वही सोच उसे जीवनभर एक अपराधबोध, पीड़ा और ग़ुस्से के मिले-जुले भावों से जूझने के लिए मजबूर कर देगी, इसकी तो कल्पना उसने नहीं की थी. वही क्या, कोई भी इस तरह की कल्पना नहीं कर सकता.

लतिका ने भी सोचने की हिम्मत की थी. बहुत बार उसका मन भी किया कि वह इस नीरस और बेमानी ज़िंदगी के खोल से स्वयं को मुक्त कर ले. उसके और राजीव के  बीच शादी के शुरुआती दिनों से ही तालमेल नहीं बैठ पाया था. इसके कारण अनेक थे, जो शारीरिक व भावनात्मक रूप से जुड़े थे. हो सकता है कि उसने ही राजीव को समझने में भूल की हो. लेकिन सच तो यह था कि एक महिला को पुरुष के जिस साथ की अपेक्षा होती है, वह उसे राजीव से नहीं मिला. न ही शारीरिक रूप से और न ही मानसिक रूप से. न तो वह लतिका की ज़रूरतों को समझ पाया, न ही उसके अंदर किसी तरह की अनुभूति जागृत कर पाया. वह हमेशा ‘ठंडी औरत’ होने का ताना सहती रही. राजीव हर बात में उसका मज़ाक उड़ाता. उसकी बेइ़ज़्ज़ती करता. सीधी-सी बात थी कि वह उससे हर तरह से बेहतर जो थी. रंग-रूप, नौकरी व बुद्धि- हर मायने में वह राजीव से बढ़कर थी. ऐसे में राजीव को अपनी हीनभावना से उबरने के बजाय लतिका के अंदर ग़लतियां ढूंढ़ना ज़्यादा आसान लगता.

‘कहा जाता है कि जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन ग़लती तो किसी से भी हो सकती है, इसीलिए अक्सर दो विपरीत दिशाओं में सोचनेवालों की ईश्‍वर जोड़ी बना देता है. वह भी क्या करे, उसके पास काम का दबाव भी तो बहुत रहता है.’ राजीव अक्सर अपने दार्शनिक अंदाज़ में यह बात कहता था, लेकिन वह भी अपने बेमेल विवाह को संभाल नहीं पा रहा था.

दिन-रात के झगड़े और राजीव का जब-तब घर से गायब रहना लतिका को अक्सर सालता रहता. वह जानना भी चाहती कि वह कहां जाता है और क्या करता है तो दो टूक-सा जवाब मिलता, “मैं तुम्हें बताना ज़रूरी नहीं समझता.” वह सामंजस्य बिठाने की बहुत कोशिश करती. राजीव के साथ ही ख़ुशियां ढूंढ़ने की चाह में एक क़दम उसकी ओर बढ़ाती तो वह दो क़दम पीछे हट जाता. शराब की आदत ने उसमें और भी बुराइयां ला दीं. दूसरी महिलाओं का साथ उसे प्रिय लगता था.

जब राजीव और उसके बीच कोई रिश्ता ही नहीं था तो बच्चा होने का तो सवाल ही नहीं उठता था. अकेलापन उसके अंदर इस कदर भर गया था कि दिनभर ऑफ़िस में थकने के बावजूद वह सो नहीं पाती. रात का सन्नाटा उसे तड़पाता. पुरुष की बलिष्ठ बांहों में समा जाने की चाह उसे करवटें बदलते हुए रात बिताने को मजबूर कर देती. क्या उसकी इच्छा अस्वाभाविक थी? राजीव और वह अलग-अलग कमरों में सोते थे. शराब पीकर होश खोकर सोना कितना आसान होता है. किसी क़िस्म का ख़याल या भूख तब परेशान नहीं करती.

जीने का हक़ हर किसी को है, एक चिड़िया भी तमाम जिजीविषाओं को पूरा करने के लिए निरंतर प्रयास करती रहती है. उसके अंदर तो दिल, दिमाग़, भावनाएं सभी थीं. एक बार ऑफ़िस के टूर से दो दिन के लिए मुंबई गई थी. वहां उसका स्वागत आलोक ने ही किया था. वहां की ब्रांच का हेड था वह. दो दिन तक साए की तरह उसके साथ रहा. जान-पहचान, समान स्वभाव और मानसिक रूप से तालमेल बैठने से उनके बीच ऐसी दोस्ती हुई कि वापस आकर भी ऑफ़िस के काम के अतिरिक्त संवाद कायम रहा. फ़ोन, ईमेल और चैटिंग… बड़े ही ख़ुशनुमा पल हुआ करते थे वे.

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लतिका की बंधी-बंधाई ज़िंदगी में कुछ परिवर्तन आया. जैसे शांत सागर की लहरों में उफान आने लगा हो. दोनों ही अपने स्थिर जीवन से उकता चुके थे, शायद इसीलिए निकटता का सेतु बहुत जल्दी कायम हो गया. आलोक को अपना तन-मन समर्पित करने की तीव्र इच्छा लतिका को बार-बार उकसाने लगी. आलोक भी अपनी पत्नी से रिश्ता तोड़ उसके साथ जीवन बिताने को तत्पर था. तभी एक दिन लतिका के अंदर भी राजीव को छोड़ने की सोच उपजी. बेमानी रिश्ते को ढोने से फ़ायदा भी क्या था?

लेकिन इसी बीच पता चला कि राजीव का लिवर ख़राब हो गया है. शराब नहीं छोड़ी तो गुर्दे भी ख़राब हो सकते हैं. अस्पताल में भर्ती करा वह जी-जान से उसकी सेवा में जुट गई. पत्नी का फ़र्ज़ बाकी इच्छाओं पर भारी पड़ा. वैसे भी उस जैसे कमज़ोर इंसान को वह इस व़क़्त कोई झटका नहीं दे सकती थी. आलोक उसे समझेगा, यह भरोसा था उसे. पर आलोक का अस्पताल में आना राजीव को खल गया. बिस्तर पर लेटे-लेटे ही उसने उससे बिना कुछ कहे, बिना पूछे अपने मन में अनगिनत जाल बुन डाले. अविश्‍वास की झलक उसकी आंखों में देख लतिका ने उसे समझाना चाहा, पर उसकी हीनता ने तब तक उस पर गालियों के चाबुक बरसा डाले थे.

वह चुप हो गई. क्या फ़ायदा था ऐसे आदमी को किसी तरह का जस्टिफ़िकेशन देने का? वैसे भी सच को सुनने की समझ उसमें थी ही नहीं. आलोक लौट गया. कमज़ोरी और बेबसी से आतंकित राजीव को भला किस तरह की चुनौती दे? आलोक लतिका को अपने पास आने को कहता.

आलोक से उसकी मुला़क़ात फिर कभी नहीं हुई. न ही किसी और तरह से उन्होंने एक-दूसरे से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की. मानो बिना कहे ही वे यह समझौता करने को तैयार हो गए थे. राजीव की हालत कुछ सुधरी तो वह उसे घर ले आई. उसकी सेवा और देखभाल ने उसे उठने के क़ाबिल बना दिया. पर राजीव का व्यवहार और सोच कुछ अधिक संकुचित होता चला गया था. उसकी नज़रों में लतिका ‘ठंडी औरत’ से ‘गिरी हुई औरत’ हो गई थी.

लतिका अपनी उस सोच को कोसती, जिसने उसे ख़्वाब देखने के लिए उकसाया था. कभी लगता कि उसे राजीव को बीमारी की हालत में ही छोड़कर चले जाना चाहिए था. वह हर ओर से रिक्त हो गई थी. देखे गए सपने उसे और तंग करते. बिस्तर पर दम तोड़ती इच्छाएं उसे अब जड़ बनाने लगी थीं. ‘ठंडी औरत’ ही बनेगी अब वह. दिन-रात के ज़ुल्म और प्रताड़ना सहने के बावजूद वह

राजीव को छोड़ने की हिम्मत नहीं कर पाई. वह कमज़ोर थी शायद. तभी तो राजीव उसे छोड़कर चला गया. साथ में महानता का लबादा भी ओढ़ लिया.

‘तुम आलोक के साथ ख़ुश रह सको, इसलिए जा रहा हूं. तुम आज से मुक्त हो.’ पत्र में लिखी इन पंक्तियों को पढ़ उसे लगा कि वह बेदर्दी से छली गई है.

राजीव जब साथ था, वह उसकी हीनता का बोझ ढोती रही और अब उसके जाने के बाद उसकी महानता का बोझ ढोने पर मजबूर है. अपनी ख़ुशियों को बंटोर कर अंजुरी में भरने की उसे इतनी बड़ी सज़ा मिलेगी, उसने सोचा न था. राजीव को क्या पता कि उसकी अंजुरी में से ख़ुशियां और तमाम इच्छाएं तो कब की फिसल कर सर्द और गीली ज़मीन पर बिछ चुकी हैं.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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कहानी- जीवनधारा (Short Story- Jeevandhara)

Hindi Kahani

बहुत ख़ुश थी मैं. मुझे जब पहली तनख़्वाह मिली, तो मम्मी-पापा और सास-ससुर के लिए उपहार ख़रीदा. मेरे लिए वो दो घंटे बेहद ख़ुशनुमा होते थे, जब मैं गुड्डू की बहू से अपराजिता बनती, पर समय हमेशा एक-सा नहीं होता न. जब कर्नल दुरानी ने गेस्ट हाउस की लीज़ ख़त्म होने की ख़बर मुझे सुनाई, तो मैं सन्न रह गई. लगा, अब मैं ज़िंदगीभर गुड्डू की बहू बनकर ही रह जाऊंगी.

आज मुझे ‘बेस्ट कॉर्पोरेट एक्ज़ीक्यूटिव’ का पुरस्कार मिला है. हाथ में इस ट्रॉफी को थामे अपनी कार में बैठकर मैं ख़ुद को दुनिया की महारानी महसूस कर रही हूं.

आज से 25 साल पुरानी बात यूं लगती है जैसे कल की ही बात हो. इंजीनियरिंग के आख़िरी साल में एक दिन जब मेरे हॉस्टल की सभी लड़कियां अपने करियर के बारे में बातें कर रही थीं, तभी मम्मी की चिट्ठी आई. चिट्ठी पढ़ी, तो अवाक् रह गई. लिखा था कि तुम्हारी शादी गुड्डू से तय हो गई है.

गुड्डू मेरी बुआ की जेठानी का लड़का था. बचपन में देखा था, पर कभी उस नज़र से नहीं. इतने सालों बाद आज भी नहीं बता सकती कि मैं शादी की ख़बर पर ख़ुश हुई थी या दुखी. ख़ैर, परीक्षा ख़त्म करके घर पहुंची. चार दिन में फटाफट शादी निपट गई और मैं अपराजिता से गुड्डू की बहू बनकर दिल्ली आ गई. हां, मैं इस बात से बेहद ख़ुश थी कि मैं दिल्ली आ गई. हर छोटे शहर की लड़की की तरह मेरा भी सपना था कि मैं मेट्रो सिटी में जाकर नौकरी करूं.

ससुराल में सभी मेरे रंग-रूप, समझदारी, शिष्टता और फर्राटेदार इंग्लिश के कायल थे. साधारण शक्ल-सूरत और कम बोलने वाले प्रवीण मेरे आगे ख़ुद को दबा हुआ महसूस करते थे. ये मैंने तब जाना, जब उन्होंने मुझे किसी से भी बात करने पर टोकना शुरू कर दिया. मेरी हर बात में कमी निकालना, लोगों से मिलने-जुलने पर रोक लगाना, चटकीले कपड़े पहनने से रोकना, ये सब रूटीन बातें हो गईं.

इसी दौरान जब मैंने प्रवीण से अपनी नौकरी की बात की, तो वे बिफर गए. कहने लगे, “क्या तुम्हें अपने पति पर इतना भी भरोसा नहीं कि वो तुम्हें कमाकर खिला सके?” रोती-सिसकती मैं सोचती रही कि क्या मेरे प्रो़फेसर पापा ने मुझे इंजीनियरिंग पढ़ाकर ग़लती की? ख़ैर, इसी बीच पता चला कि अनाम्या मेरे गर्भ में है. इस ख़ुशी में मैं सब भूल गई. बहुत-सी तकलीफ़ों के बाद जब पहली बार उसे अपने हाथों में थामा तो ख़ुद से एक वादा किया कि कभी भी इसकी ज़िंदगी अपनी जैसी नहीं होने दूंगी. यह अपनी मर्ज़ी की ज़िंदगी जीएगी.

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अनाम्या स्कूल जाने लगी. फिर से मेरी ज़िंदगी में वही खालीपन आ गया. दूसरे बच्चे के बारे में भी नहीं सोच सकती थी, क्योंकि डॉक्टर ने पहले बच्चे के समय ही चेतावनी दे दी थी कि दूसरा बच्चा प्लान करने पर जान को ख़तरा हो सकता है. इसी बीच प्रवीण अपने काम के लिए घर पर कंप्यूटर ले आए. मुझे तो जैसे खिलौना मिल गया था. बस, रात-दिन यही धुन रहती कि किसी भी तरह मैं कंप्यूटर का हर एप्लीकेशन सीख जाऊं.

धीरे-धीरे मैं कंप्यूटर में इतनी माहिर हो गई कि प्रवीण के कंप्यूटर के सारे काम मैं ही करने लगी. वे भी बेहद ख़ुश थे. एक तो मुफ़्त की कंप्यूटर ऑपरेटर मिल गई थी और मेरे हुनर को बरबाद करने की ग्लानि भी जाती रही. बाद में हमने घर पर ही साइबर कैफे खोल लिया और वहीं पर मैं लोगों को कंप्यूटर सिखाने लगी. अब ज़िंदगी पहले से बेहतर लगने लगी थी.

लोग नए मिलेनियम के लिए तैयार थे और मेरी ज़िंदगी में भी नया अध्याय शुरू होनेवाला था. रिटायर्ड कर्नल दुरानी मेरे साइबर कैफे कम कंप्यूटर इंस्टिट्यूट के सबसे होशियार स्टूडेंट थे. हमारी ख़ूब जमती थी. वो हमेशा कहते थे कि अपराजिता, तुम अपना टैलेंट बरबाद कर रही हो. रिटायर होने के बाद कर्नल दुरानी एक मल्टीनेशनल कंपनी के लिए गेस्ट हाउस चलाते थे. उनका गेस्ट हाउस हमारे घर से सौ गज की दूरी पर था. उन्होंने उसी गेस्ट हाउस में मैनेजर की नौकरी मुझे ऑफ़र की.

दिल में फिर से एक उम्मीद जागी. स़िर्फ दो घंटे के लिए जाना था और गेस्ट हाउस भी घर के इतने पास था कि प्रवीण को मनाना मुश्किल न था.

बहुत ख़ुश थी मैं. मुझे जब पहली तनख़्वाह मिली, तो मम्मी-पापा और सास-ससुर के लिए उपहार ख़रीदा. मेरे लिए वो दो घंटे बेहद ख़ुशनुमा होते थे, जब मैं गुड्डू की बहू से अपराजिता बनती, पर समय हमेशा एक-सा नहीं होता न. जब कर्नल दुरानी ने गेस्ट हाउस की लीज़ खत्म होने की ख़बर मुझे सुनाई, तो मैं सन्न रह गई. लगा, अब मैं ज़िंदगीभर गुड्डू की बहू बनकर ही रह जाऊंगी. साइबर कैफे का ट्रेंड भी तब तक ख़त्म हो चुका था. मुझे घर की चारदीवारी के अलावा कोई रास्ता नहीं दिख रहा था.

चार महीने से घर पर रहते हुए मैं अवसादग्रस्त हो गई. प्रवीण से लड़ती, अनाम्या को डांटती और कुढ़ती रहती. किसी से मिलना-जुलना, यहां तक कि फ़ोन पर बात करना भी बंद कर दिया था. लगता था कि सब मुझ पर हंस रहे हैं. जैसे कह रहे हों, “बड़ा इस उम्र में नौकरी करने चली थी. लौट के बुद्धू घर को आए…” पूरी तो नहीं, पर आधी पागल तो मैं हो ही गई थी.

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कर्नल दुरानी ने जब मेरे बारे में सुना, तो मिलने के लिए मेरे घर चले आए. बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि उनके एक मित्र किसी मल्टीनेशनल कंपनी की शाखा भारत में खोलना चाहते हैं. उन्हें ऑफ़िस असिस्टेंट की ज़रूरत है, फिर कुछ सोचते हुए उन्होंने कहा, “अपराजिता, तुम उस पद के लिए आवेदन क्यों नहीं भरती?”

मैं भौंचक्की रह गई. इस उम्र में बिना किसी अनुभव के, वो भी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी! उन्होंने बहुत ज़ोर दिया, तो बिना किसी उम्मीद के मैं इंटरव्यू के लिए तैयार हो गई. धड़कते दिल से जब पांच सितारा होटल में इंटरव्यू के लिए पहुंची तो मिस्टर कुलकर्णी को देखकर मेरे हाथ-पांव फूल गए. 6 फ़ीट के मिस्टर कुलकर्णी मुझे बेहद रोबीले लगे, पर जब उनसे बात की तो काफ़ी सरल लगे.

इंटरव्यू भी अजीब था. जितने सवाल उन्होंने मुझसे किए, उससे कहीं ज़्यादा मैंने उनसे. “क्या इस उम्र में बिना किसी अनुभव के मैं यह काम कर पाऊंगी?” पूछने पर उन्होंने मुझे समझाया, “अपराजिता, तुम इंजीनियर हो, इतनी अच्छी अंग्रेज़ी बोलती हो, कंप्यूटर एक्सपर्ट हो और सबसे बड़ी बात है कि तुम काम करना चाहती हो. मैंने फैसला किया है कि इस पद के लिए तुम ही उपयुक्त उम्मीदवार हो.”

मैं तो सातवें नहीं, आठवें आसमान पर थी. पर कोई और भी था, जो मुझसे भी ज़्यादा ख़ुश था. वो थी मेरी टीनएजर बेटी. जब उसने मुझसे कहा, “ममा, मुझे आप पर गर्व है”, तो ऐसा लगा जैसे दुनिया की सारी ख़ुशियां मुझे मिल गई हों. मां-बेटी की जुगलबंदी के आगे प्रवीण भी हार गए और मुझे 38 साल की उम्र में अपना करियर शुरू करने का मौक़ा मिल ही गया.

संघर्ष यहीं ख़त्म नहीं हुआ. जिस ‘अपराजिता’ नाम की पहचान के लिए मैं इतनी परेशान थी, वह पहचान बनाने के लिए मुझे अब भी संघर्ष करना पड़ रहा था. जब मुझसे आधी उम्र की लड़कियां मेरा नाम लेकर बुलातीं, तो बेहद अजीब लगता. हर दिन एक नई चुनौती थी. पर मन में बस यही ठाना था कि कुछ भी हो, मुझे चारदीवारी में वापस कैद नहीं होना.

समय बीतता गया. मैं अपनी मेहनत और लगन से काम सीखती चली गई और यहां इस मुक़ाम तक पहुंच गई कि मुझे ‘बेस्ट कॉर्पोरेट एक्ज़ीक्यूटिव’ के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. मेरी कहानी शायद बहुत ख़ास नहीं है, पर फिर भी

चाहती हूं कि अपनी इस कहानी को हर उस औरत के साथ बांटूं, जो शादी, बच्चे-परिवार में गुम होकर अपने करियर को भूल-सी गई है. कोई बात नहीं, अगर आप आज कुछ नहीं कर पा रहीं, तो बस अपने आप को अपडेट रखें. करियर तो कभी भी शुरू किया जा सकता है.

बहुत साल पहले मेरी एक सहकर्मी थी अंकिता. उसे लिखने का बहुत शौक़ था.

वह अक्सर कहती थी, “अपराजिता, तुम्हारी कहानी सबको पता चलनी चाहिए, मैं एक दिन ज़रूर लिखूंगी.”

चलो, उसको फ़ोन करती हूं. दिल कर रहा है उससे बहुत कुछ कहने-सुनने का. अपनी जीवनधारा के अनकहे पन्नों को ख़ुद में समेट मैंने घर में प्रवेश किया, तो मेरी नातिन मचलती हुई मेरी तरफ़ भागी, इस ट्रॉफी को लेने के लिए.

Ankita Kashyap

 अंकिता कश्यप

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कहानी- खाली कमरे के मेहमान (Short Story- Khali Kamare Ke Mehman)

Hindi Kahani

“पागलोंवाली बात है तो पागलोंवाली ही सही. जानते हैं पापाजी, जब मैंने यूएस की अपनी अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़ अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए भारत आने का निर्णय लिया, तो वहां भी सबने मुझे यही कहा कि मैं पागलोंवाली बात कर रहा हूं, मगर मैं जानता था कि मैं जो कर रहा हूं, सही कर रहा हूं.”

पुणे शहर के कोलाहल और प्रदूषण को पीछे छोड़ कार तेज़ी से आगे बढ़ रही थी. जैसे ही सुधाकर को छोटी-छोटी पहाड़ियों और हरियाली के दर्शन शुरू हुए, उन्होंने विंडो ग्लास नीचे कर गहरी सांस इस तरह से खींची जैसे एक ही सांस में पूरे वायुमंडल को अपने फेफड़ों में भर लेना चाहते हों.

“बेटा, एसी बंद कर दो. अब उसकी ज़रूरत नहीं. देखो तो बारिश की हल्की फुहार से आबोहवा में कैसी सोंधी महक घुल गई है. वाह! तबीयत हरी-भरी हो गई.” उन्हें यूं प्रसन्न देख पत्नी सुमन भी मुस्कुराईं.

“तुम्हारे रेडियो में विविध भारती नहीं है क्या?” मौसम सुहावना होता देख उन्होंने एफएम सुन रहे रवि से चैनल बदलने की फ़रमाइश कर डाली. गाना ट्यून हुआ ‘मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया…’,

“वाह! सोने पे सुहागा. मैं ज़िंदगी का साथ…” वे सुमन को देखते हुए गाने के साथ गुनगुनाने लगे. दोनों एक-दूसरे की आंखों में झांककर मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे. आंखों में बेटे द्वारा दिए जानेवाले सरप्राइज़ गिफ्ट का कौतूहल था. कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कहां ले जाए जा रहे हैं, फिर भी वे दोनों आनंदित थे.

एक सरकारी महकमे से रिटायर्ड क्लर्क सुधाकर बड़े आदर्शवादी थे. भले ही कितने  अभाव रहे हों, उन्होंने कभी ऊपर की कमाई स्वीकार नहीं की. ऐसे धन को हाथ लगाना भी उनके लिए पाप था. अपनी तीनों संतानों- बड़े बेटे निपुण, बेटी सारिका और छोटे बेटे प्रणव की सीमित संसाधनों में बड़ी मितव्ययिता से परवरिश की थी उन्होंने. जब उनके सहकर्मी रिश्‍वत की कमाई से अपने घर बना रहे थे, तो वे दो कमरों के छोटे से किराए के घर में ही संतुष्ट थे.

सुधाकर के सहकर्मी अक्सर उन्हें उलाहना देते, “ऊपर का तू लेता नहीं और जो तेरी गाढ़ी कमाई है, वह हैसियत से बढ़कर बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर ख़र्च कर रहा है, तो तेरे बुढ़ापे के लिए क्या बचेगा?”

वे बड़ी उम्मीद और आत्मविश्‍वास से सिर उठाकर कहते, “मेरे बच्चे पढ़-लिख गए, तो वे ही मेरे लिए घर बना देंगे. मुझे पाप की कमाई से बना घर नहीं चाहिए.” उनकी आदर्शवादी बातों का ऑफिस में जमकर मखौल उड़ाया जाता, मगर वे ज़रा भी विचलित नहीं होते. उनकी पत्नी सुमन ने भी घर और बच्चों को कुछ इस तरह से संभाला था कि भले ही कुछ जोड़ नहीं पाए, मगर समय के साथ सब ज़िम्मेदारियां सहजता से पूरी होती चली गई थीं.

आज की तारीख़ में निपुण और उसकी पत्नी ईला, दोनों अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थे. उसके दो किशोरवय बच्चे थे. सारिका नागपुर के एक कॉलेज में बॉटनी की लेक्चरर थी. वह भी अपने पति और बेटे के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रही थी. छोटे बेटे प्रणव की मुंबई में रिक्रूटमेंट कंसल्टेंसी फर्म थी, जिसमें उसकी पत्नी रागिनी भी उसका सहयोग करती थी. तीनों बच्चों के डाली-पत्ते लगने के बाद पुणे में दोनों पति-पत्नी अकेले रह गए थे. निपुण और प्रणव ने न जाने कितनी बार उन्हें अपने साथ शिफ्ट हो जाने को कहा, मगर अपने पुराने शहर का मोह क्या छूटता है कभी. सो दोनों पुणे छोड़ कहीं और जाने को तैयार न थे. साल में एक बार सभी बच्चे मिलने आ जाते. फोन पर तो बात होती ही रहती. बस, वे दोनों इसी से संतुष्ट थे.

सुधाकर और सुमन, दोनों मानकर बैठे थे कि अब वे ही एक-दूसरे के बुढ़ापे का सहारा हैं. मगर छह महीने पहले निपुण ने एक अप्रत्याशित निर्णय सुनाया कि वह सालभर के अंदर-अंदर पुणे शिफ्ट हो जाएगा और उन लोगों के साथ ही रहेगा. पहली बार में उनको बेटे की बात पर विश्‍वास नहीं हुआ. सोचा, वह भला अपनी इतनी अच्छी नौकरी और लक्ज़री लाइफ छोड़ वापस भारत क्यों आने लगा? और बात स़िर्फ अकेले उसकी नहीं थी, उनके दोनों बच्चे अमेरिका में पढ़ रहे थे. ईला भी जॉब करती थी. ऊपर से ईला की तो इकलौती बहन भी उसी के शहर में रहती थी, फिर वह क्यों आने लगी सब छोड़-छाड़कर?

दोनों ने इसे क्षणिक भावावेश मानकर बात आई-गई कर दी. मगर आज सुबह सुमन के 68वें जन्मदिन के अवसर पर निपुण का पुनः फोन आया, “पापा-मम्मी, शाम चार बजे तैयार रहना. मेरा दोस्त रवि आएगा आपको लेने के लिए, आपको उसके साथ कहीं जाना है. कहां जाना है यह सरप्राइज़ है. दरअसल, आपका सरप्राइज़ गिफ्ट है.” अब बेटे ने जो करने को कहा, वह उन्होंने किया. रवि आया और उन्हें कार में बैठाकर ले गया. वह सफ़र अभी भी जारी था.

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“बेटा, अब तो बता दो कहां ले जा रहे हो, बड़ी देर हो गई है चले हुए?” व्याकुल सुधाकर ने पुनः पूछा.

“बस, अंकलजी आ गया.” कहते हुए रवि ने एक बड़े-से घर के सामने कार रोक दी. “आंटीजी, ये घर देख रही हैं ना आप, यही है आपका बर्थडे गिफ्ट. ये आलीशान डुप्लेक्स घर, आपके बेटे की तरफ़ से.” रवि ने जब उस घर की ओर इशारा करते हुए कहा, तो दोनों को विश्‍वास ही नहीं हुआ. ‘ज़रूर इसे समझने में कोई ग़लती हुई है, इतना बड़ा घर… कोई मज़ाक है क्या…’ दोनों विस्मित से एक-दूसरे की ओर देखने लगे.

“रुको बेटा, मैं निपुण को फोन लगाता हूं. तुम्हें ज़रूर कुछ ग़लतफ़हमी हुई है.” वे कह ही रहे थे कि ख़ुद निपुण का फोन आ गया.

“कहिए पापा, कैसा लगा सरप्राइज़ गिफ्ट? अंदर से देखा क्या? रवि के पास चाबी है, वह आपको दिखा देगा.” निपुण की बात सुन सुधाकर स्तब्ध रह गए. सुमन को आंखों ही आंखों में कहा, रवि सही कह रहा है.

“मगर बेटा ये…”

“अगर-मगर कुछ नहीं पापा, ये घर मैंने ख़रीदा है. इंडिया शिफ्ट होने के बाद हम सब यहीं रहेंगे. आप उस घर के मालिक हो, मालिक की तरह अंदर जाना. चलिए पापा, कुछ ज़रूरी काम है, बाद में फोन करता हूं. घर देखकर बताइएगा कैसा लगा.” कहकर निपुण ने फोन रख दिया.

‘मालिक की तरह.’ सुधाकर अभिभूत हो उठे. कानों में बरसों पुराने साथियों की फ़ब्तियां गूंजने लगीं, ‘देखा, मैं ना कहता था, मेरा घर मेरे बच्चे बना देंगे.’ वे पुनः बुदबुदाए. कितना सुखद क्षण था वह उनके जीवन का. पूरी उम्र की तपस्या का जैसे आज फल मिला था. उस फल को चखने दोनों सधे क़दमों से घर के अंदर दाखिल हुए.

“अंकलजी, इस घर के इंटीरियर का काम निपुण ने मुझे ही सौंपा है. यह काम मुझे चार महीनों में पूरा करना है, वह चाहता है आपकी शादी की सालगिरह पर गृहप्रवेश हो जाए. तब तक वह भी यहां शिफ्ट हो जाएगा.”

“मगर बेटा यहां आकर करेगा क्या, हमें तो कुछ नहीं बताया, तुम्हें कुछ पता है क्या?”

“ज़्यादा कुछ तो नहीं, मगर कह रहा था यहां आकर अपनी एक कंपनी खोलना चाहता है. दोनों पति-पत्नी एक ही फील्ड में हैं, मिलकर चला लेंगे. बच्चे तो वैसे भी अगले साल से अमेरिका के एक हॉस्टल में रहेंगे.”

“अच्छा, ऐसी बात है.” सुधाकर घर का निरीक्षण करते हुए बोले.

“अंकलजी, यहां नीचेवाले फ्लोर पर तीन कमरे हैं. तीन कमरे ऊपर हैं. ऊपरवाला हिस्सा निपुण का है. एक-एक कमरा दोनों बच्चों का और एक उनका है. नीचे का यह कमरा आपका है.”

“इतना बड़ा कमरा!” सुमन की आंखें चौंधिया गईं. इतनी बड़ी जगह में तो अब तक उसने पूरे परिवार को पाला था.

“और बाकी दो कमरे?” सुधाकर ने पूछा.

“इनमें एक गेस्टरूम है, बाकी दूसरा आपके कमरे जितना ही बड़ा है, इसे भी निपुण ने आपके कमरे जैसा ही तैयार करने को कहा है, पर यह किसका है, मुझे नहीं पता.” रवि ने कहा.

नीचे के कमरों के बाहर बरामदा और उससे आगे बड़े-से लॉन के लिए भी जगह थी.

“आंटीजी, लॉन की एक साइड में आपके लिए मंदिर बनेगा. उसे मैं आपसे डिज़ाइन अप्रूव कराकर ही बनवाऊंगा.” सुनकर सुमन के चेहरे पर बच्चों जैसी ख़ुशी दौड़ पड़ी. वह मन ही मन अपने लायक बेटे की बलाइयां ले रही थीं, जिसने उनका इतना ध्यान रखा था.

“पूरे घर को अच्छे से देख-परख दोनों मंत्रमुग्ध से घर की ओर लौट पड़े. नया आलीशान घर, घर के पीछे दिखती पहाड़ियां और हरियाली… और सबसे बड़ी बात, उस घर में उनके बेटे-बहू उनके साथ रहनेवाले थे. उनके बुढ़ापे का सहारा बननेवाले थे. आज उनके पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे. वे स्वयं को दुनिया के सबसे ख़ुशनसीब माता-पिता मान रहे थे.

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घर पहुंचकर सुमन चाय ले आई, मगर सुधाकर अभी भी जैसे उसी घर में चक्कर लगा रहे थे. “अकेले बैठे क्या सोच मुस्कुरा रहे हैं मकानमालिक साहब.” पत्नी के मुंह से यह नया संबोधन सुनकर सुधाकर गर्वित हो उठे.

“सच सुमन, सब कुछ एक सपने जैसा लग रहा है. निपुण का यहां आना, हमारे साथ रहने के लिए नया घर लेना, मुझे मालिक कहना, बड़ा अजीब लग रहा है. अभी तक तो हमेशा किराएदार ही बनकर रहा हूं.”

“तो अब मालिक बनने की आदत डाल लीजिए. मैं तो पहले ही कहती थी, हमारे बच्चे लाखों में एक हैं, नए ज़माने की हवा उन्हें नहीं लगी. आपने हमेशा उनका कितना ख़्याल रखा, अब उनकी बारी है. वैसे मानना पड़ेगा, हमारी बहू ईला भी लाखों में एक है, वरना आज के ज़माने में अपनी जमी-जमाई गृहस्थी छोड़ सास-ससुर के साथ रहने कौन बहू आती है. उसने हमें हमेशा ही अपने माता-पिता जैसा आदर दिया है.”

“वो तो है. अच्छा एक बात बताओ, वो हमारे साथवाला कमरा किसके लिए रख छोड़ा है निपुण ने? रवि ने भी कुछ नहीं बताया.”

“और किसके लिए होगा, प्रणव के लिए ही होगा, बहुत प्यार करता है वह अपने छोटे भाई से. सोचा होगा, जब भी वह मुंबई से आएगा, अपने कमरे में ही रुकेगा.”

सुमन पूरे आत्मविश्‍वास से बोली.

“पता नहीं क्यों मुझे लगता है वह कमरा सारिका के लिए है. याद है ना पिछले रक्षाबंधन पर जब दोनों मिले थे, निपुण ने उसे कहा था, अगली बार तुझे ऐसा गिफ्ट दूंगा, हमेशा याद रखेगी.” सुधाकर कुछ सोचते हुए बोले.

“हां, कहा तो था, पर फिर भी मुझे लगता है प्रणव का ही होगा. बेटियां तो

दो-चार दिन के लिए मायके आती हैं और फिर उसके लिए गेस्टरूम तो है ही. हो सकता है निपुण की योजना हो कि यहां आकर वह प्रणव को भी मुंबई से यहां अपने पास बुला लेगा और दोनों भाई साथ मिलकर कुछ काम कर लेंगे. इस तरह से पूरा परिवार एक साथ रह सकेगा.”

“हां, तुम्हारी बात में दम तो है. हो सकता है ऐसा ही हो.” सुधाकर बोले.

“हो सकता है नहीं, बल्कि सौ प्रतिशत ऐसा ही है, तुम देख लेना.” सुधा ने भविष्यवाणी कर दी थी.

देखते-देखते पांच महीने गुज़र गए. नए घर का इंटीरियर पूरा हो गया था. आज गृहप्रवेश की पूजा थी, अतः उसे फूलों और झालरों से ख़ूब सजाया गया था. निपुण, प्रणव, सारिका तीनों सपरिवार आ चुके थे. सारिका के सास-ससुर, बहू ईला, रागिनी के माता-पिता, और बाकी सभी मेहमान भी आ चुके थे. पूजा के बाद प्रीतिभोज का आयोजन था. गृहप्रवेश की पूजा संपन्न हुई. सुमन ने बहू ईला और रागिनी के साथ घर में विधिवत् प्रवेश किया. पूरा घर खुला था सिवाय उस एक बंद कमरे के जिसका कौन मेहमान है, यह अभी भी मिस्ट्री थी. उस कमरे के दरवाज़े पर लाल रिबन लगा हुआ था. सभी निपुण से पूछ रहे थे, ‘अभी तो बता दो कि यह सुंदर कमरा किसके लिए सजा है.’ मगर वह चुप था. सुधाकर धीरे से सुमन के कान में फुसफुसाए, “हमें पता है इसका सरप्राइज़, इस रिबन को यह अपने छोटे भाई के हाथ से ही कटवाएगा.” और मुस्कुरा उठे. सुमन भी दोनों बेटों के साथ रहने की कल्पना से आह्लादित थी.

तभी निपुण ने सबको इकट्ठाकर एक उद्घोषणा शुरू की. “आज सुबह से सभी मुझसे एक ही सवाल पूछ रहे हैं, यह लाल रिबन लगा कमरा किसका है? आप सभी को यह जानने की बड़ी उत्सुकता है कि आख़िर इस खाली कमरे का मेहमान कौन है, माफ़ कीजिए मेहमान नहीं, बल्कि मालिक कहना चाहिए. कौन है जो इसमें हमारे साथ रहेगा, तो अब मैं इस रहस्य से पर्दा उठाता हूं, वे हैं मेरे दूसरे मम्मी-पापा यानी मेरे आदरणीय सास-ससुर. यह कमरा उन्हीं के लिए बना है और आज मैं उन्हीं को समर्पित करता हूं. मैं उनसे विनती करता हूं कि वे आएं और इस रिबन को काटकर इस कमरे में गृहप्रवेश करें.”

यह सुनते ही सबके मुंह खुले के खुले रह गए. निपुण की इस योजना की ख़बर तो ईला को भी नहीं थी, वह भी इस उद्घोषणा से स्तब्ध रह गई… और सुधाकर एवं सुमन.., उन्होंने तो यह कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि निपुण ऐसा कुछ भी कर सकता है. ‘बेटी के माता-पिता कब उसकी ससुराल आकर रहते हैं, चलो कुछ दिनों के लिए आ भी गए, मगर मेहमान बनकर ही आते हैं और मेहमानों की तरह चले जाते हैं. मालिक की तरह हक़ से तो कभी नहीं रहते. और क्या ये अच्छा लगता है? लोग क्या कहेंगे? ये सब अमेरिका में चलता होगा यहां नहीं, दुनिया क्या कहेगी?’ सुमन के भीतर स्वसंवादों की लहर दौड़ रही थी. ‘इसे अकेले में ले जाकर समझाना पड़ेगा…’ वह सोच ही रही थी कि ईला के माता-पिता स्वयं निपुण का विरोध करने लगे.

“ये क्या कह रहे हो बेटा, हम यहां कैसे रह सकते हैं. ये हमारी बेटी का ससुराल है.”

“क्यों नहीं रह सकते पापाजी? एक तरफ़ तो आप मुझे बेटा बोल रहे हैं और दूसरी तरफ़, कैसे रह सकते हैं, सोच रहे हैं. इस घर में जैसे मेरे माता-पिता रहेंगे, वैसे ही आप दोनों रहेंगे. जिस हक़ से वे रहेंगे, उसी हक़ से आप भी रहेंगे. ये खाली मेरा ही नहीं, आपकी बेटी का भी घर है.”

“ये तो तुम बिल्कुल पागलोंवाली बातें कर रहे हो, ऐसा भी कभी होता है क्या, ईला तुम ही समझाओ अपने पति को.” सुमन को लगा जैसे उनके समधी ने उसके मुंह की बात छीन ली. वह मन ही मन ख़ुश हुई.

“पागलोंवाली बात है तो पागलोंवाली ही सही. जानते हैं पापाजी, जब मैंने यूएस की अपनी अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़ अपने माता-पिता के साथ रहने के लिए भारत आने का निर्णय लिया, तो वहां भी सबने मुझे यही कहा कि मैं पागलोंवाली बात कर रहा हूं, मगर मैं जानता था कि मैं जो कर रहा हूं, सही कर रहा हूं. मैंने अपने पापा से और आपसे भी कितनी बार कहा हमारे पास आ जाओ, मगर आप नहीं माने. अब आप लोगों की उम्र हो चली है. आए दिन कुछ-न-कुछ बीमारी लगी रहती है. मैं और ईला वहां बैठे-बैठे कुछ नहीं कर सकते. मेरे पैरेंट्स की देखरेख करने के लिए तो फिर भी यहां प्रणव और सारिका हैं, मगर आपकी तो दोनों ही बेटियां बाहर हैं. आपको तो यहां देखनेवाला कोई नहीं, इसलिए मैंने सोचा, क्यों न आप भी हमारे साथ ही रहें. इस तरह से मैं और ईला अपने दोनों पैरेंट्स का ख़्याल रख पाएंगे.”

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“लेकिन बेटा, दुनिया क्या कहेगी? हमें उलाहना देगी कि कैसे मां-बाप हैं, बेटी की ससुराल आकर पड़ गए?”

“दुनिया तो तब भी कुछ न कुछ कहेगी, जब आपके यहां न आने की स्थिति में मैं ईला को आपके पास छोड़ दूंगा. फिर वही दुनिया कहेगी कि शादी के इतने सालों बाद बेटी मायके आकर पड़ गई. अब निर्णय आपके हाथों में है. यह तो तय है कि इस उम्र में मैं अपने दोनों पैरेंट्स को अकेले रहने के लिए नहीं छोड़ूंगा. या तो आप यहां आएंगे या हम दोनों में से कोई एक आपके साथ रहेगा, निर्णय आपके हाथों में है. आप अपने बेटी-दामाद को अलग रखना चाहते हैं या उनके साथ रहना चाहते हैं.” निपुण ने ऐसा इमोशनल ब्लैकमेल किया कि उसके सास-ससुर निरुत्तर हो गए.

यह सुनकर ईला की आंखें भर आईं. आंखों से छलके आंसू जैसे निपुण के निर्णय के प्रति कृतज्ञता ज़ाहिर कर रहे थे. उसकी सराहना कर रहे थे. सच, अमेरिका में वह अपने पैरेंट्स के गिरते स्वास्थ्य को लेकर कितनी चिंतित रहती थी. हर पल लगता था, उन्हें कहीं कुछ हो न जाए. अपनी गृहस्थी और नौकरी छोड़ बार-बार भारत भी नहीं आ सकती थी, मगर आज निपुण ने यह अप्रत्याशित क़दम उठाकर उसकी सारी चिंताएं ही दूर कर दी थीं.

ईला अपने पैरेंट्स के पास जाकर बोली, “आपने मेरे लिए हमेशा किया ही है. मुझे बेटों की तरह पाला, मेरे नाज़ उठाए, मुझे आत्मनिर्भर बनाया, मेरा हमेशा ध्यान रखा. अब मेरी बारी है आपका ध्यान रखने की. चलिए ज़िद मत कीजिए, मान जाइए, आपको मेरी क़सम.” ईला के प्यारभरे अनुरोध के आगे उसके माता-पिता झुक गए.

उनके हाथों से उनके नए आशियाने का रिबन कट रहा था. उस खाली कमरे में गृहप्रवेश की रस्म निभाई गई. सभी निपुण के इस कृत्य की मुक्तकंठ से प्रशंसा कर रहे थे, कुछ लोग थे जिन्हें यह बात हज़म नहीं हो रही थी, वे कोने में खड़े खुसुर-फुसुर कर रहे थे. सुधाकर और सुमन मूकदर्शक बने खड़े थे. जाहिर है, उनको समझने और संभलने में थोड़ा व़क्त लगेगा. मगर जब समझेंगे, तो सबसे ज़्यादा वे ही अपने बेटे-बहू पर गर्व करेंगे.

       दीप्ति मित्तल

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Fairy Tales: ब्यूटी एंड द बीस्ट… (Beauty And The Beast)

Beauty And The Beast Story in Hindi

Fairy Tales: ब्यूटी एंड द बीस्ट… (Beauty And The Beast)

एक शहर में एक व्यापारी अपनी तीन बेटियों के साथ रहता था. तीनों बेटियां बेहद सुंदर थीं, पर सबसे छोटी बेटी ब्यूटी सबसे ख़ूबसूरत और समझदार थी. इसी वजह से उसकी दोनों बहनें उससे ईर्ष्या रखती थीं. दोनों बड़ी बहनें बेहद स्वार्थी थीं और अपने पिता की दौलत उड़ाने में ही उनकी दिलचस्पी थी. ब्यूटी हमेशा अपने पिता का ख़्याल रखती और हर रात वो एक सुंदर से राजकुमार का सपना देखती. उसे यकीन था कि एक दिन उसे वो राजकुमार अपने साथ महल में ले जाएगा.

दिन गुज़र रहे थे कि एक दिन की बात है व्यापारी को ख़बर मिलती है कि उनके सारे जहाज़ समुद्री तूफ़ान में डूब गए और वो तबाह हो गए. इस मुश्किल घड़ी में ब्यूटी ने पिता को संभाला, जबकि बाकी बहनें दिनभर रोना रोती रहतीं.

एक दिन व्यापारी को ख़बर मिली कि उनका एक जहाज़ मिल गया है. वो बेहद ख़ुश हुए और बंदरगाह जाने से पहले अपनी बेटियों से पूछने लगे कि उन्हें क्या उपहार चाहिए. दोनों बड़ी बहनों से कपड़े और गहने मांगे, जबकि ब्यूटी ने कहा कि आप सही सलामत वापस आ जाओ, इसके अलावा कुछ नहीं चाहती मैं. पर पिता ने ज़ोर दिया, तो उसने कहा कि मेरे लिए एक गुलाब का फूल लेते आना.

पिता बंदरगाह चल दिए, पर वहां जाकर देखा कि जहाज़ पूरी तरह अस्त-व्यस्त था, सारा माल गायब था. वो फिर निराश हो गए. वापसी में रास्ते में बर्फीले तूफ़ान से उनका सामना हुआ. उनका घोड़ा आगे चल नहीं पा रहा था. ऐसे में कुछ देर रुक जाना ही उन्हें सही लगा.

अपने घोड़े को एक पेड़ के नीचे खड़ाकर उन्होंने देखा कि कुछ दूरी पर रोशनी-सी चमक रही थी. वो उस तरफ़ चल पड़े. वहां जाकर देखा कि एक आलीशान महल था और वहां तूफ़ान का भी कोई असर नहीं था. बड़े से सोने के दरवाज़े से वो अंदर गए. वहां जाकर आवाज़ लगाई, पर वहां कोई नहीं था. अंदर जाकर उन्होंने देखा, खाने की मेज़ सजी हुई थी. उन्होंने इंतज़ार किया, पर जब कोई नहीं आया, तो भूख से व्याकुल उन्होंने खाना खा लिया. फिर ऊपर के कमरे की ओर जाकर देखा कि आरामदायक बिस्तर लगा हुआ था. वो आराम से सो गए.

Beauty Aur Beast Kahani

सुबह नींद खुली तो अपने कमरे में नए कपड़े देखे, उन्होंने नहाने के बाद कपड़े पहने और नीचे आ गए. नीचे नाश्ते का टेबल सजा हुआ था. लज़ीज़ नाश्ता करके उन्होंने ज़ोर से कहा कि आप जो कोई भी हैं, बड़े दयालू हैं. आपकी मेज़बानी के लिए धन्यवाद, अब मैं जा रहा हूं. जैसे ही वो बाहर गया, तो सामने गुलाबों का बगीचा था, जिसमें ख़ूबसूरत बैंगनी रंग के गुलाब लगे हुए थे. व्यापारी ने सोचा वो ब्यूटी की इच्छा तो पूरी कर ही सकता है, इसलिए उसने एक गुलाब तोड़ लिया. पर जैसे ही उसने गुलाब तोड़ा, अचानक धरती हिलने लगी और किसी के तेज़ गुर्राने की आवाज़ आने लगी. व्यापारी कुछ समझ पाता, इससे पहले ही उन्होंने देखा कि सामने से एक भीमकाय, दानवी आकृति चली आ रही है. उसके दांत और पंजे चाकू से भी तेज़ थे. वो जीता-जागता दानव था. उसने व्यापारी से कहा कि तुमको मेरे बगीचे से गुलाब तोड़ने की इजाज़त किसने दी. मैंने तुम्हारा इतना सत्कार किया और तुमने इस तरह से मेरा आभार प्रकट किया. इसकी सज़ा तुम्हें मिलनी चाहिए.

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Beauty And The Beast

यह सुनकर व्यापारी डर गया. उसने कहा कि आप इतनी दयालू हैं, इसलिए मुझे लगा कि एक गुलाब तोड़ने पर आप नाराज़ नहीं होंगे. ये गुलाब भी मैंने अपनी बेटी की इच्छा पूरी करने के लिए तोड़ा था. यह सुनकर दानव की आंखें चमकने लगीं, वो बोला, तुम्हारी बेटी है? तो मेरे पास तुम्हारे लिए एक प्रस्ताव है, जिससे तुम्हारी जान बच सकती है.

व्यापारी ने कहा, मुझे क्षमा कर दें और अपना प्रस्ताव बताएं, क्योंकि मेरी तीन बेटियां मेरा इंतज़ार कर रही हैं.

दानव और ख़ुश हो गया. तुम्हारी तीन बेटियां हैं, तब तो बहुत अच्छा है. उनमें से किसी एक से कहो कि वो यहां आकर रहे. मैं उसे अपने पास इस महल में रखूंगा, इसके बदले तुम्हें आज़ादी मिलेगी.

व्यापारी ने कहा कि ठीक है, मैं घर जाकर अपनी बेटियों को बताता हूं, मुझे यकीन है कि उनमें से कोई न कोई ज़रूर तैयार हो जाएगी. मैं वापसी का वादा करता हूं.

बीस्ट ने कहा कि मैं तुम्हें अपना सबसे तेज़ घोड़ा देता हूं और एक महीने का समय, लेकिन तुम्हारी बेटी को यहां अपनी मर्ज़ी से आना होगा, ज़ोर-ज़बर्दस्ती से नहीं. अगर तुम एक महीने में नहीं आए, तो मैं ख़ुद तुम्हें ढूंढ़ने आऊंगा.

व्यापारी ने भले ही यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था, पर उसे यही लग रहा था कि उसकी कोई भी बेटी तैयार नहीं होगी और उसकी मौत निश्‍चित है. घर जाकर सारी बातें बताईं. दोनों बहनें ब्यूटी पर क्रोधित हो उठीं कि ये सब तुम्हारे गुलाब की वजह से हुआ.
ब्यूटी ने कहा कि मैं पिताजी का वादा निभाने के लिए उनके साथ जाऊंगी. व्यापारी बेहद दुखी था कि उसके कारण यह दुर्भाग्य आया है. ब्यूटी ने समझाया और पिता का हौसला बढ़ाया. व्यापारी यही कहता रहा कि ब्यूटी अपनी ज़िंदगी जीओ, उसे यूं मुझ बूढ़े के लिए ख़राब मत करो.

Beauty And The Beast in Hindi

ब्यूटी ने कहा कि मैं इसका सामना कर सकती हूं. मुझमें हिम्मत है. आप घबराएं नहीं. दोनों जल्द ही आलिशान महल में पहुंच गए. वहां बढ़िया खाना मेज़ पर सजा हुआ था. दोनों ने खाना खाना शुरू किया. कुछ ही देर में बीस्ट वहां आ पहुंचा, जिसे देखकर ब्यूटी बेहद घबरा गई. बीस्ट ने ब्यूटी से पूछा कि क्या वो अपनी मर्ज़ी से यहां आई है, तो ब्यूटी ने सहमति जताई. बीस्ट ने कहा कि क्या तुम अपने पिताजी के बगैर मेरे साथ यहां रहने के लिए तैयार हो, तो ब्यूटी ने हां कहा.

बीस्ट ने व्यापारी से कहा कि आप अपने घोड़े के पास जाएं, वहां सोने से भरे ट्रंक हैं, जो आपकी दोनों बेटियों के लिए है. व्यापारी ने भारी मन से ब्यूटी से विदा ली. बीस्ट ने ब्यूटी को भी ऊपर जाकर आराम करने की सलाह दी. ब्यूटी ने ऊपर जाकर देखा कि बेहद ख़ूबसूरत कमरा उसके लिए तैयार था. वो सो गई. सुबह उठी तो उसकी ज़रूरत व शृंगार का हर सामान तैयार था. वो तैयार होकर नीचे आई, तो लज़ीज़ खाना मिला. खाना खाकर वो आराम ही कर रही थी कि बीस्ट ने उसके पास आकर पूछा कि क्या वो बदसूरत और डरावना है, तो ब्यूटी ने हां में गर्दन हिला दी. फिर बीस्ट ने पूछा क्या वो उससे शादी करेगी, बिना डरे उसे जवाब दे, तो ब्यूटी ने मना कर दिया. जवाब सुनकर बीस्ट चला गया. ब्यूटी हैरान थी कि इंकार करने पर भी बीस्ट नाराज़ नहीं हुआ, न ही ज़बर्दस्ती की.

Beauty And The Beast Hindi Story

बीस्ट हर रात को खाने के बाद ब्यूटी से शादी की बात कहता और ब्यूटी जब मना कर देती, तो वो बेहद उदास व दुखी होकर लौट जाता. धीरे-धीरे दिन गुज़रते गए. अब ब्यूटी को बीस्ट से डर नहीं लगता था. वो उसके नेक दिल का सम्मान करती थी. बीस्ट उसके लिए पियानो भी बजाता और लंबी-लंबी बातें करता. आलिशान महल में रहना ब्यूटी को अच्छा तो लग रहा था, लेकिन अब उसे अपने पिता की याद सताने लगी थी.

ब्यूटी को उदास देखकर बीस्ट ने पूछा, तो ब्यूटी ने एक हफ़्ते के लिए घर जाने की इच्छा जताई. बीस्ट ने कहा कि वो ब्यूटी की इच्छा को पूरा करेगा, लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि ब्यूटी अपनी नफ़रत के कारण उससे दूर जाना चाह रही हो. ब्यूटी ने कहा कि वो बीस्ट से नफ़रत नहीं करती और उसे अकेला छोड़कर जाने का उसे भी अफ़सोस है. बीस्ट ने कहा कि तुम जा सकती हो, पर यदि समय पर वापस नहीं आई, तो मेरी मौत निश्‍चित है.

ब्यूटी ने कहा वो ऐसा नहीं होने देगी. बीस्ट ने उसे एक अंगूठी देकर कहा कि इसे पहनकर सो जाओ और जब तुम उठोगी, तो अपने पिता के घर पर होगी. जब तुम्हारी वापस आने की इच्छा हो, तो यह अंगूठी उतार देना, तुम फिर इस महल में आ जाओगी.
ब्यूटी बेहद ख़ुश थी. अगली सुबह उसने ख़ुद को अपने घर पर अपने बिस्तर पर पाया. पिता से मिलकर वो भावुक हो गई. पिता भी बेहद ख़ुश थे. एक हफ़्ता गुज़र गया, पर ब्यूटी महल में वापस जाने की बात भूल गई थी.

Beauty Aur Beast Kahani

एक रात उसे सपना आया कि बीस्ट ज़मीन पर गिरा हुआ है और बस मौत के क़रीब है. वो बेहद डर गई और उसने वापस जाने का निर्णय लिया. सबसे अलविदा कहकर उसने अंगूठी उतारी और अगली सुबह वो महल में पहुंच गई. वो फ़ौरन उस बगीचे में गई, जहां सपने में उसने बीस्ट को मरते हुए देखा था. वो चौंक गई, क्योंकि बीस्ट सचमुच में बेहोशी की हालत में था. ब्यूटी ने पानी के छींटें मारे, तो बीस्ट को होश आया. उसे होश में आया देख ब्यूटी ख़ुशी से झूम उठी और उसे यह एहसास हुआ कि बीस्ट उसके दिल में जगह बना चुका था.

ब्यूटी ने कहा कि मैं बुरी तरह डर गई थी, अगर आपको कुछ हो जाता, तो मैं ख़ुद को कभी माफ़ नहीं करती. मैं आपसे बेहद प्यार करती हूं.
यह सुनकर बीस्ट ने कहा कि क्या तुम मुझ जैसे बदसूरत व अजीब से दिखनेवाले प्राणी से प्यार कर सकती हो?

ब्यूटी ने कहा क्यों नहीं, आपका दिल इतना सुंदर है कि कोई भी आपसे प्यार कर सकता है. मुझे जीवन में और कुछ नहीं चाहिए.
बीस्ट ने पूछा, क्या तुम मुझसे शादी करोगी?

ब्यूटी ने कहा कि हां, करूंगी.

यह सुनते ही बीस्ट के चारों तरफ़ रौशनी का साया मंडराने लगा और वो एक ख़ूबसूरत नौजवान में बदल गया.

ये देख ब्यूटी हैरान थी, क्योंकि ये वही नौजवान था, जिसके सपने वो देखती थी. उसने राजकुमार को बताया कि वो अक्सर उसके सपनों में आता था. राजकुमार ने बताया कि तुम्हारी वजह से मुझे एक भयंकर शाप से मुक्ति मिली. एक चुडैल को मैंने लड़ाई में हराया था, जब वो मर रही थी, तो उसने मुझे शाप दिया था कि मैं इतना कुरूप हो जाऊंगा कि कोई मुझसे प्यार नहीं करेगा. उसके शाप से मैं भयंकर दरिंदे में बदल गया था, पर तुम्हारे सच्चे प्यार ने मुझे फिर से जीवन दे दिया.

Beauty And The Beast Hindi Kahani

राजकुमार ब्यूटी को उसके घर ले गया, जहां उसके पिता से उसका हाथ मांगा. दोनों ने शादी की और ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगे.

सीख: सुंदरता स़िर्फ तन की नहीं होती, उससे कहीं बड़ी सुंदरता मन की होती है, जिससे सारा जग जीता जा सकता है. चेहरा समय के साथ बदल जाता है, पर मन की ख़ूबसूरती हमेशा बरक़रार रहती है. इसलिए बाहरी सुंदरता से आकर्षित होने की बजाय मन की सुंदरता का सम्मान करना सीखें.

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कहानी- सच्चा समपर्ण (Short Story- Sachcha Samarparn)

वैसे भी अरेंज मैरिज में होता भी तो यही है, दो अजनबियों को मां-बाप एक ही छत के नीचे ताउम्र रहने को बांध देते हैं. एक घर, एक ही छत शेयर करने तक तो ठीक है, फिर तुरंत ही एक ही बिस्तर शेयर करना… और फिर तुरंत ही बच्चा…?

Hindi Short Story

हद हो गई…! कल तक जो लोग शर्मोहया को लड़की का गहना… और न जाने क्या-क्या कहते थे, वो ही आज लड़की को बेशरमी का पाठ पढ़ा रहे हैं! क्या है इस दोगलेपन की वजह? क्यों पैदा होते ही लड़की को मार नहीं देते थे लोग…? मेरे ये आक्रोश भरे शब्द क़लम से नहीं भीतर कहीं हृदय से निकल रहे हैं, जहां ज्वालामुखी सुलग रहा है. उसी का लावा शब्द बनकर फूट रहा है. अभी हाथों की मेहंदी को छूटे महीनाभर ही हुआ था कि ख़ुशख़बरी की फ़रमाइशें होने लगीं, “भाभी, हमारे घर नन्हा-मुन्ना कब आएगा?”

“अब देर नहीं, भले ही दूसरा बच्चा पांच साल बाद कर लेना.” मांजी उम्मीद भरी आवाज़ में कहतीं. मैं सकुचा कर पैर के अंगूठे से ज़मीन कुरेदती रह जाती. इतनी जल्दी…? अभी तो साहिल को ठीक तरह से जान भी नहीं पाई हूं मैं. वैसे भी अरेंज मैरिज में होता भी तो यही है, दो अजनबियों को मां-बाप एक ही छत के नीचे ताउम्र रहने को बांध देते हैं. एक घर, एक ही छत शेयर करने तक तो ठीक है, फिर तुरंत ही एक ही बिस्तर शेयर करना… और फिर तुरंत ही बच्चा…?

मेरी कड़वाहट का एहसास घर भर में स़िर्फ साहिल को है. सगाई और शादी के बीच मात्र पन्द्रह दिनों का अन्तराल, उसमें स़िर्फ दो बार फ़ोन पर हुई औपचारिक बातचीत क्या किसी को इतना क़रीब ला सकते हैं? इतना क़रीब, जहां से सृजन की कल्पना की जा सके?

यूं भी मैं विवाह पूर्व इसी रिश्ते से भयभीत रहती थी, क्योंकि बेहद संकोची स्वभाव, किसी के इस तरह अंतरंग होने की कल्पना भर से ही सिहर उठता था, किंतु मेरी क़िस्मत अच्छी निकली.

विवाह की पहली रात ही अपनी समझदारी का परिचय देते हुए कहा था साहिल ने, “मैं तुम्हारे डर से वाकिफ़ हूं. पहले तुमसे दोस्ती करना चाहता हूं, क्योंकि मैं जानता हूं तुम बचपन से ही लड़कों से दूर रही हो, इसलिए सामाजिक मान्यताओं पर मत जाना. मेरी ओर से तुम पर कभी कोई प्रतिबंध नहीं होगा. तुमसे गहरा भावनात्मक संबंध कायम करना चाहता हूं. जब ख़ुद को तुम्हारे भरोसे के क़ाबिल महसूस करने लगूंगा, तभी तुम्हें हाथ लगाऊंगा. अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके एक हृदयविहीन तन को जीतना न प्रेम होता है, न ही पौरुष! तुम्हें जितना व़क़्त लगे मैं प्रतीक्षा करने को तैयार हूं, मगर प्लीज़, कभी भी बेमन से या डर से समर्पण मत करना आभा. मैं तुम्हारे सच्चे प्रेम का इच्छुक हूं. मन की दहलीज़ पार किए बिना मैं कोई दूसरा रिश्ता कायम नहीं करना चाहता.”

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मैं आश्‍चर्यचकित हो गई. भाभी, दीदी और सहेलियों ने जो पति के बारे में समझाया था, उससे सर्वथा अलग और मेरे मन के व्यक्ति से मेल खाता पति पाकर मैं धन्य हो गई.

और फिर दो ही दिन बाद मैं मायके आ गई. यहां भी ससुराल से संबंधित प्रश्‍नों में पहला प्रश्‍न यही होता, “पति कैसे हैं?” मैं आशय समझकर जान-बूझकर रहस्यमयी मुस्कान फेंक देती. जानती थी कि ये फलसफ़ा किसी के गले नहीं उतरेगा कि हृदयविहीन तन के नहीं, हृदययुक्त, बल्कि प्रेमयुक्त समपर्ण के इच्छुक हैं पतिदेव.

दो-चार दिन बीते ही थे कि पापा के मुंह से निकल पड़ा, “अब तो मुझे भी नानाजी पुकारनेवाला कोई जल्दी ही आए भगवान!” मैं सोचती रह जाती, लड़की को कुंवारेपन में सात तालों में बंद रखने वाले माता-पिता शादी होते ही ये कैसी मानसिकता ओढ़ लेते हैं. जहां पहले किसी लड़के से बात तक करना नागवार गुज़रता था, वहीं अब किसी लड़के के साथ इतनी घनिष्ठता की कामना करना… स़िर्फ इसलिए कि उस लड़के ने सात फेरे लिए हैं उस लड़की से?

क्या सात फेरे ही किसी शर्मीली लड़की की शर्मोहया के सातों द्वार खोलने के लिए काफ़ी होते हैं?… और किसी अनजान ‘पति’ नामक व्यक्ति को अपनाने की शक्ति प्रदान करते हैं? मैं जब-तब अपनी भड़ास डायरी में निकालती रहती. चाहे पूरी दुनिया मुझे अजीब समझे, मगर साहिल की नज़रों में मैं सही थी और वह मुझे तथा मेरी भावनाओं को पूरा सम्मान देते थे. मुझे मेरे खोल से बाहर निकालने के लिए साहिल बहुत प्रयास कर रहे थे. धीरे-धीरे मुझे बहुत अच्छा महसूस होने लगा. उनके सानिध्य में ख़ुद को निश्‍चिंत और सुरक्षित महसूस करती थी.

उनमें मेरे प्रति किसी प्रकार के उतावलेपन को न पाकर मैं इतनी प्रसन्न हो जाती कि बरबस लिख बैठती. ‘अभी भी दुनिया में ऐसे लोग बाकी हैं, जो रिश्तों को ढोते या निभाते नहीं, बल्कि जीते हैं, अपनी शर्तों पर और अपने तरी़के से…’ मैं अब साहिल के साथ बहुत ख़ुश रहने लगी थी. अभी मैं वहां रमने ही लगी थी कि मां का मनुहार भरा आमंत्रण आ गया. “तीन महीने हो चुके हैं विवाह हुए. एक बार आकर मिल जा बेटी, तुझे देखे बिना मन बेचैन हो रहा है.” मां के आग्रह और प्रेम ने मेरे मन में भी जाने की इच्छा पैदा कर दी, मगर साहिल का उदास चेहरा भी बार-बार घूम रहा था आंखों के आगे. अब भावनात्मक लगाव की नींव पड़ चुकी थी दोनों के हृदय धरा पर.

उससे दूर जाने का मन नहीं हो रहा था और मेरे जाने के नाम पर उसकी उदास आंखें जैसे कह रही हों, कैसे गुज़रेगा तुम्हें देखे बिना एक ह़फ़्ता….?  शारीरिक प्रेम से पहले जिस प्रेम की कामना मैंने सच्चे हृदय से की थी, वो हमारे बीच कायम हो चुका था और मन के तारों का जुड़ाव मैं साफ़ महसूस कर रही थी. ‘तो यूं कोई अच्छा लगते-लगते इस क़दर भा जाता है कि उससे बेइंतहा प्यार हो जाता है और उसका साथ अनिवार्य लगने लगता है…’ अब मेरी डायरी में इन सब बातों का समावेश होने लगा.

ख़ैर, ह़फ़्ताभर की इज़ाज़त ले मां से मिलने आ पहुंची. शाम को चाय और पकौड़ों के बीच मां पूछ बैठी, “बेटा तीन महीने हो गए विवाह को, कोई नई ख़बर…..?” मेरा मन ज़रा खिन्न हो गया. “क्यों मां, शादी होते ही यही पहली उम्मीद लगाकर बैठना उचित है? क्या ये सब नहीं पूछोगी… हम दोनों कैसे हैं? आपस में मेल- जोल कैसा है? वगैरह-वगैरह..?” इस पर मां हंस पड़ी, “तुझे देखते ही

समझ में आ गया कि तू सुखी है वहां पर, फिर और क्या पूछूं और शादी-ब्याह का मतलब ही क्या है, वंशबेल आगे बढ़ाने के लिए ही तो माता-पिता बेटे का विवाह करते हैं, ये अरमान तेरे सास-ससुर के मन में भी तो होगा.

वैसे तेरे मन में क्या चल रहा है? अगर फैमिली प्लानिंग का भूत हो तो एक के बाद ही अपनाना वो सब चोंचले.”

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मां के इस वाक्य पर मैं चिढ़ गई, “बस करो मां… अभी हमने कुछ भी प्लान नहीं किया है. अभी तो हमारे रिश्ते की शुरुआत है…” कहते-कहते मैं रुक गई तो मां की सशंकित नज़रों को भांप कर भाभी मुझे ठेलते हुए कमरे में ले गई और कोने में ले जाकर पूछा, “सच बताना दीदी, अभी तक?”

मेरे इन्कार में सिर हिलाने पर वो लगभग बदहवास होकर कहने लगी, “क्या? मगर क्यों, क्या ये शादी उनकी मर्ज़ी से नहीं हुई? क्या आप उन्हें पसंद नहीं?”

मैं अवाक रह गई, “ये सब आप क्या समझ रही हैं भाभी… हम दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अजनबी थे. क्या क़रीब आने के लिए थोड़ा व़क़्त नहीं लेना चाहिए.”

“थोड़ा व़क़्त, तीन महीने थोड़ा व़क़्त होता है दीदी?” ओह, इसका मतलब भाभी भी इसी मानसिकता की हैं, सोचते-सोचते मैं कह उठी.

“ये मुझ अकेले का नहीं, साहिल का भी निर्णय है.” फिर मेरे शर्मीलेपन को देखते हुए साहिल ने पहली बार मुझसे जो कुछ कहा उसे अक्षरश: दोहरा दिया.

पर इस बात से तो जैसे वहां कोहराम ही मच गया. मेरे शर्मीलेपन को कोसते-कोसते बात साहिल के पुरुष न होने तक पहुंच गई.

मां कह रही थी, “अजीब लड़का है, अरे इसने कहा और उसने मान लिया.”

“अरे कमी है उसमें तभी तो मान गया, वरना ऐसा हो सकता है क्या कभी? पुरुष होकर उसकी इस कायरता के पीछे जाने कौन-सी सच्चाई छिपी है…” ये दीदी के शब्द थे, “कहीं और किसी से तो उसके संबंध…?” मैं हतप्रभ-हैरान मुंह फाड़े कभी इसकी, तो कभी उसकी बातें सुनती जा रही थी. साहिल की शराफ़त को उसकी कायरता, बीमारी चरित्रहीनता-जाने क्या-क्या कहा जा रहा था और मैं अंदर-ही-अंदर उबल रही थी. तभी दीदी ने एक और विस्फोट किया, “तुमने कभी पहल करने की कोशिश नहीं की आभा?” तो मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं चीख पड़ी, “बंद करो आप सब लोग ये बकवास… क्या दोहरी मानसिकता है, शादी से पहले जिस लड़की को सदैव लड़कों से दूर रहना सिखाया जाता है, उसी लड़की को शादी होते ही कौन-से बेशरमी के पंख लग जाते हैं कि उसे ऐसा करना चाहिए?”

मैं बुरी तरह थक गई थी. उस बहस को मैंने दो वाक्यों में समाप्त किया. “ये हमारा नितान्त निजी मामला है और इसमें बोलने का हक़ मैं किसी को नहीं देती.” मेरे तीखे तेवर और शब्दों को सुनकर सभी चुप हो गए.

मेरे जीवन की ये सबसे कड़वी याद है, जिसे मैं ज़ेहन से जितना निकालना चाहती हूं, उतनी ही ये मेरे मस्तिष्क में चिपक-सी जाती है.

आज विवाह के पच्चीस साल बाद डायरी में मैंने इस बात का ज़िक्र किया है, क्योंकि आज यही सवाल मेरी बेटी मुझसे कर रही है.

“ममा, नीलेश और मैं एक-दूसरे से बिलकुल अन्जान हैं, मगर मैं जानती हूं कि आपने उसे मेरे लिए चुना है, तो ज़रूर कुछ सोचकर ही चुना होगा. मुझे आपके निर्णय पर कोई ऐतराज़ नहीं, मगर मुझे शादी से थोड़ा-सा डर लगता है.” कहते-कहते उसकी पलकें झुक गईं. मैं समझ गई कि मेरी बेटी भी वहीं पर खड़ी है, जहां पच्चीस साल पहले मैं खड़ी थी. पढ़ाई-लिखाई में अव्वल रहनेवाली मेरी बेटी प्यार-मुहब्बत और लड़कों से सदा दूरी रखनेवाली मेरी ही तरह संकोची है. लेकिन नीलेश भी कम समझदार नहीं, उसकी समझदारी की वजह से ही मैंने और साहिल ने उसे अपनी बेटी के लिए पसंद किया है.

उसके डर को भांपकर ही मैंने ये डायरी जान-बूझकर उसके कमरे में छोड़ी है, जो उसके डर से बाहर निकालने में उसकी मदद कर सके. और एक बार साहिल को भी खुलकर नीलेश से बात करनी होगी. बाकी कोई कुछ भी कहे… मेरी बेटी को भी सच्चे प्यार का सुख मिले, थोथी और खोखली मान्यताओं का बोझ नहीं… ये सब सोचते हुए मैं उसके कमरे से बाहर निकल आई.

– वर्षा सोनी

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कहानी- एम्पायर स्टेट (Short Story- Empire State)

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“तुम यहां मुझे पहली बार मिले थे जेम्स और याद है, यहीं पर तुमने मुझे प्रपोज़ भी किया था, तो फिर हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण फैसला भी इसी एम्पायर स्टेट बिल्डिंग पर होना चाहिए न!”

न्यूयॉर्क की शान एम्पायर स्टेट की 102 मंज़िल की बिल्डिंग एक समय में दुनिया की सबसे ऊंची बिल्डिंग थी. यहां से पूरे न्यूयॉर्क का विहंगम दृश्य दिखाई देता है. इसीलिए मुझे एम्पायर स्टेट बिल्डिंग बहुत पसंद है. दरअसल, मुझे ऊंचाइयों से प्यार है. जीवन में ऊंचा मुक़ाम हासिल करने की ख़ातिर ही मैं आईटी इंजीनियर बनकर दो साल पहले अपनी कंपनी की तरफ़ से न्यूयॉर्क आई थी. तब से अब तक मेरे हर एहसास की साक्षी रही है यह एम्पायर स्टेट बिल्डिंग. और आज जब मुझे अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण फैसला करना है, तब मैं इसके टॉप फ्लोर पर खड़ी कशमकश की स्थिति में पिछले दो वर्षों में जेम्स के साथ बिताए लम्हों को पुनः जीने का प्रयास कर रही हूं.

उससे जुड़ी एक-एक बात आज मेरी स्मृतियों के द्वार पर दस्तक दे रही है. पहली बार इसी एम्पायर स्टेट बिल्डिंग पर मिला था वह

मुझे. न्यूयॉर्क आए हुए दस दिन ही हुए थे मुझे. वीकेंड पर अपनी सहेली नेहा के साथ न्यूयॉर्क घूमने निकली थी. मेट्रो स्टेशन के बाहर थी, तभी नेहा के भाई का फोन आ गया. दो घंटे बाद मिलने के लिए कहकर वह चली गई. मैं एम्पायर स्टेट पहुंची. टिकट लेने के लिए जैसे ही बैग में हाथ डाला, पर्स नदारद देख मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई. उसमें मेरे क्रेडिट कार्ड्स थे. घबराई हुई मैं उसे चारों ओर तलाश कर ही रही थी कि एक अमेरिकन युवक ने मेरे क़रीब आकर कहा, “अरे,

कमाल करती हैं आप भी. कब से आपको पुकार रहा हूं, पर आप हैं कि एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा. यह लीजिए आपका पर्स. स्टेशन पर गिर गया था. चेक कर लीजिए. सब कुछ ठीक है न.” मैं ख़ुशी से उसे ताकती रह गई थी. उसे धन्यवाद कहने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे. मुझे कितनी बड़ी मुसीबत से उबार लिया था उसने. हमने एक-दूसरे को अपना परिचय दिया. उसका नाम जेम्स था और मेरी तरह वह भी इंजीनियर था.

वह बोला, “चलो रिद्म, जब तक तुम्हारी फ्रेंड नहीं आती, मैं तुम्हारे साथ हूं.” एम्पायर स्टेट के टॉप फ्लोर पर पहुंचकर मैं न्यूयॉर्क की ख़ूबसूरती को निहारती रह गई. काफ़ी देर तक नेहा वापस नहीं लौटी, तो मैंने घर जाना चाहा, पर अकेले जाने में मुझे घबराहट हो रही थी, तब जेम्स मुझे घर पहुंचाने के लिए तैयार हो गया. घर पहुंचकर उसे धन्यवाद देते हुए मैंने कहा, “आज का तुम्हारा सारा दिन मेरी वजह से ख़राब हो गया.”

“लेकिन इसके बदले मुझे एक अच्छा दोस्त भी तो मिल गया. मैं अगले वीकेंड पर फ्री हूं. तुम चाहो तो हम साथ घूम सकते हैं.” मैंने मुस्कुराकर अपनी स्वीकृति दे दी.

कुछ ही दिनों में हम दोनों अच्छे दोस्त बन गए. अब हर वीकेंड पर हम दोनों मिलते और सारा दिन साथ व्यतीत करते. मुझे पता भी नहीं चला कि कब मेरे हृदय की मरुभूमि पर प्रेम का एक छोटा-सा बीज अंकुरित होने लगा था. इसमें नन्हीं-नन्हीं कोपलें निकल आई थीं और उस दिन मेरे आश्‍चर्य की सीमा न रही, जब मैंने देखा, नन्हा-सा यह पौधा बढ़कर हरा-भरा वृक्ष बन गया है. रात-दिन अब जेम्स मेरे ख़्यालों में छाया रहता था.

एक दिन जेम्स ने कहा, “रिद्म, इस वीकेंड  पर मुझे अपने मॉम और डैड से मिलने जाना है. तुम साथ चलोगी?”

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“ऑफकोर्स.” मैं जेम्स के साथ उसके पैरेंट्स के घर पहुंची. वे दोनों मुझसे बहुत गर्मजोशी से मिले. जेम्स अपने फादर के साथ बातों में बिज़ी हो गया और मैं उसकी मॉम के साथ किचन में चली गई. बातों के दौरान मैंने उनसे पूछा, “इस उम्र में क्या आपका मन नहीं करता, आप अपने बेटे के साथ रहें?” उन्होंने मुस्कुराकर मेरी ओर देखा और बोलीं, “यहां का ऐसा ही कल्चर है और यह बुरा भी नहीं है. चाहे बच्चे हों या बड़े, हर इंसान की अपनी ज़िंदगी होती है. हर किसी को स्पेस चाहिए. रिश्ते साथ रहने से ही मज़बूत नहीं बनते हैं. रिश्ते मज़बूत बनते हैं, परस्पर प्रेम और आपसी सूझबूझ से. साथ रहकर एक-दूसरे को बोझ समझने से बेहतर क्या यह नहीं है कि दूर रहकर एक-दूसरे का ख़्याल रखा जाए. जेम्स माह में दो-तीन बार हमसे

मिलने आता है और हमारे सुख-दुख का ख़्याल रखता है, यही बहुत है. आवश्यकता से अधिक आशाएं सदैव दुख को जन्म देती हैं.” उनका जीवन के प्रति यह नज़रिया देख मैं बहुत प्रभावित हुई.

लंच के बाद हम सभी एक्वेरियम देखने गए. जेम्स के डैड के घुटनों में तकलीफ़ थी, इसलिए वो उन्हें व्हीलचेयर पर बैठाकर एक्वेरियम दिखा रहा था. शाम को उसके पैरेंट्स को घर पहुंचाकर हम वापस लौटे, तो मैंने कहा, “जेम्स, तुम्हारे अपने पैरेंट्स के प्रति जुड़ाव और सेवा से मैं बहुत प्रभावित हूं. उन्हें पैदल घूमने में तकलीफ़ होती है, तो तुम उन्हें व्हीलचेयर पर ले गए, यह बहुत बड़ी बात है. अन्य कोई होता, तो उन्हें ले जाने से इंकार कर देता.”

“इसमें बड़ी बात क्या है रिद्म? यह तो मेरी ड्यूटी है. इंसान कितना भी बूढ़ा हो जाए, उसका मन कभी बूढ़ा नहीं होता. उसकी इच्छाएं कभी नहीं मरती हैं. अपने शौक़ पूरे करने में यहां उम्र आड़े नहीं आती है. मैं ही क्या, तुम यहां किसी भी टूरिस्ट प्लेस पर चली जाओ, तुम्हें बहुत से ऐसे लोग दिखाई देंगे, जो अपने पैरेंट्स को व्हीलचेयर पर घुमा रहे होंगे.”

उस रात मैं बिस्तर पर सोने के लिए लेटी, तो अपने देश की याद ताज़ा हो आई. मैं सोचने लगी, यूं तो हमारे देश में लोग विदेशी संस्कृति की आलोचना करते हैं और भारतीय संस्कृति की दुहाई देते नहीं थकते, पर आज कितने ऐसे लोग हैं, जो बूढ़े माता-पिता का दायित्व ख़ुशी से उठाते हैं. उन्हें बोझ नहीं समझते. मेरे अपने ही घर में मम्मी-पापा के प्रति भइया का रवैया कितना उदासीन है, जबकि पापा ने रिटायरमेंट के बाद मिले पैसे का काफ़ी हिस्सा भइया को दे दिया था, फिर भी वह मम्मी-पापा के प्रति कितने लापरवाह हैं.

उस दिन की बात बार-बार मेरे मन को व्यथित कर रही थी. बुआ और उनका बेटा घर में आए हुए थे. सब लोग पिकनिक मनाने जा रहे थे. मम्मी-पापा भी साथ जाना चाहते थे, पर भइया-भाभी का मन उन्हें ले जाने का नहीं था. भइया रूखे स्वर में बोले थे, “आप क्या करेंगे वहां जाकर? आराम से घर में बैठिए.”

मैंने सुना, भाभी बुआ की बहू से बोली थीं, “मम्मी-पापा की तो पूछो मत. बुढ़ापा आ गया, पर घूमने का चस्का कम नहीं हुआ.” अपमान से मम्मी-पापा का चेहरा कितना निरीह हो गया था. ऐसे ही न जाने कितने ही प्रसंग दिमाग़ में घूम रहे थे. अगली सुबह पापा को फोन मिलाया, तो वह बोले, “रिद्म, तुझे नवीन याद है, अपने मेहता का बेटा, जो डॉक्टर है.”

“हां पापा, नवीन को कैसे भूल सकती हूं, उसके साथ तो मेरा बचपन बीता है. क्या हुआ पापा?”

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“कल मेहता का फोन आया था. उन्होंने नवीन के लिए तेरा रिश्ता मांगा है.” एक पल के लिए मैं ख़ामोश हो गई. फिर बोली, “ठीक है पापा, मैं सोचकर बताती हूं.” मैंने फोन रख दिया. नवीन पापा के मित्र मेहता अंकल का बेटा था. मैं जानती थी, वो एक क़ाबिल डॉक्टर होने से पहले बहुत अच्छा इंसान भी है. साथ ही उसके परिवार के लोग भी अच्छे व मिलनसार हैं. जो भी लड़की उस घर में बहू बनकर जाएगी, बहुत सुखी रहेगी, पर मैं अपने इस मन का क्या करती, जहां पहले से ही जेम्स बस चुका था.

जब से मैं जेम्स की फैमिली से मिली थी, रात-दिन मन में यही विचार घूमता था कि जेम्स से विवाह करके अमेरिका में बस जाऊं, तो जीवन कितना सुखमय होगा. इस ख़ूबसूरत देश में रहना अपने आप में कितना सुखद एहसास है. यहां रोज़मर्रा की ज़िंदगी तनावरहित और सहज है. लोग ख़ुशमिज़ाज और ईमानदार हैं. हर कोई नियमों का पालन करता है. कोई किसी की ज़िंदगी में दख़ल नहीं देता. किंतु मुझे जेम्स के मन को भी टटोलना था.

अगले वीकेंड पर मेरे क़दम ख़ुद-ब-ख़ुद एम्पायर स्टेट की ओर उठ गए. जेम्स वहां पहुंचा, तो मैंने कहा, “जेम्स, मैं तुम्हें कुछ बताना चाहती हूं. पापा ने मेरे लिए एक डॉक्टर लड़का पसंद किया है.” जेम्स गंभीर स्वर में बोला, “मैं भी तुमसे कुछ कहना चाहता हूं रिद्म, मैं तुमसे प्यार करता हूं और तुम्हारे साथ ज़िंदगी बिताना चाहता हूं. मेरे पैरेंट्स भी सहमत हैं. क्या तुम्हें मुझसे प्यार है?” मुझे ऐसा लगा, मानो मेरे कानों में शहनाइयां बज उठी हों. मैंने तुरंत अपनी स्वीकृति दे दी.

मम्मी-पापा को जेम्स के बारे में बताया, तो कुछ पल की ख़ामोशी के बाद वे बोले, “रिद्म, लड़कियां तो अन्तर्जातीय विवाह में ही परेशान हो जाती हैं, फिर यहां तो देश ही दूसरा है. इनका धर्म, संस्कृति, रहन-सहन, खानपान सभी कुछ अलग है. क्या तुम इनके साथ एडजस्ट कर पाओगी? रिद्म, जीवन के महत्वपूर्ण ़फैसले सोच-समझकर करने चाहिए. जल्दबाज़ी में नहीं. तुम एक बार फिर सोच लो आख़िर यह तुम्हारी ज़िंदगी का सवाल है.”

“पापा, मैंने अच्छी तरह सोच-समझकर ही यह फैसला किया है. मैं जेम्स और उसके परिवार के साथ एडजस्ट कर लूंगी. आप मुझ पर विश्‍वास रखिए.”

“ठीक है रिद्म, किंतु हर माता-पिता की तरह हमारी भी इच्छा है कि हम अपनी बेटी की शादी में शरीक हों, फिर चाहे शादी न्यूयॉर्क में हो या भारत में.” पापा भीगे स्वर में बोले.

“ऑफकोर्स पापा, आपके और मम्मी के आशीर्वाद के बिना मैं शादी नहीं करूंगी.” वह दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे ख़ुशी का दिन था. मुझे याद नहीं पड़ता, इससे पहले मैं कभी इतना ख़ुश रही थी. अगले दिन जेम्स से मिलने के लिए जाते समय मुझे लग रहा था, मानो ज़मीन पर नहीं चल रही वरन् हवा में तैर रही थी.

मैंने जेम्स को बताया, “मम्मी-पापा तुम्हारे साथ मेरी शादी के लिए सहमत हैं. बस, उनकी यही इच्छा है कि वे हमारी शादी में अवश्य शामिल हों.” जेम्स कुछ क्षण मुझे देखता रहा फिर बोला, “सुुनो रिद्म, हम अभी शादी नहीं करेंगे, पहले कुछ समय तक साथ रहेंगे.”

“क्या मतलब, लिव इन रिलेशनशिप में?”

“हां रिद्म, इसमें कोई बुराई नहीं है. अमेरिका में हज़ारों लोग ऐसे रहते हैं. कुछ समय बाद जब हमें लगेगा कि हम दोनों के बीच कोई मतभेद नहीं होगा, हमारी अच्छी निभेगी, तब हम शादी कर लेंगे.”

“लेकिन जेम्स, लिव इन रिलेशनशिप में हमेशा असुरक्षा की भावना रहती है. ऐसे रिश्ते लंबी दूरी तय नहीं करते हैं. तुम्हें ऐसा क्यों लगता है कि हमारी नहीं निभेगी. हम दोनों एक-दूसरे को चाहते हैं. मैं तुम्हारे कल्चर के साथ पूरी तरह एडजस्ट होकर दिखाऊंगी. क्या तुम्हें मुझ पर विश्‍वास नहीं है.”

“विश्‍वास तो है रिद्म, दरअसल, मैं सावधानीवश ऐसा कर रहा हूं. अमेरिका के क़ानून के अनुसार, अगर पति-पत्नी के बीच तलाक़ होता है, तो पति को अपनी प्रॉपर्टी और पैसे का आधा हिस्सा पत्नी को देना पड़ता है. इसलिए बहुत-से लोग सावधानी बरतते हैं और वर्षों शादी नहीं करते.”

“और इस बीच बच्चा हो जाए तो?” मैंने पूछा.

“हां, तो इसमें बुराई क्या है? देखो रिद्म, यहां बिना शादी के बच्चे हो जाना ग़लत नहीं माना जाता. यहां कोई किसी की ज़िंदगी में दख़ल नहीं देता है. न तो यहां किसी के पास इतना समय है कि कोई दूसरों की ज़िंदगी में ताकाझांकी करे और न ही लोगों की ऐसी मानसिकता है.”

“लेकिन जेम्स, बगैर शादी के…?”

“तुम व्यर्थ ही संकोच कर रही हो रिद्म. ठीक है, तुम अच्छी तरह सोच लो, फिर मुझे बताना.”

जेम्स जल्दी ही चला गया था और आज मुझे उसको अपने ़फैसले से अवगत कराना था. सोचते-सोचते मैं अतीत से वर्तमान में आ गई, पर मन में चल रहा अंतर्द्वंद्व थमने का नाम नहीं ले रहा था. इंसान खानपान, रहन-सहन और रीति-रिवाज़ों के साथ समझौता कर सकता है, पर माता-पिता के दिए संस्कारों को कैसे भूल जाए? इन्हीं संस्कारों से तो व्यक्ति के आचार-विचार बनते हैं. मेरी आत्मा में बसे हुए हैं मेरे संस्कार, फिर अपनी आत्मा का गला कैसे घोंट दूं.

अच्छाई-बुराई, सही-ग़लत के बीच के अंतर को कैसे मिटा दूं. आधुनिकता के नाम पर विवाह जैसे पवित्र बंधन को कैसे झुठला दूं? थोड़ी देर बाद जेम्स आकर बोला, “आज तुम फिर यहां चली आई.?”

“तुम यहां मुझे पहली बार मिले थे जेम्स और याद है, यहीं पर तुमने मुझे प्रपोज़ भी किया था, तो फिर हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण फैसला भी इसी एम्पायर स्टेट बिल्डिंग पर होना चाहिए न!”

“हां, तो फिर क्या सोचा तुमने?”

“नहीं जेम्स, मैं शादी किए बिना तुम्हारे साथ नहीं रह सकती. मेरी महत्वाकांक्षाएं मेरे संस्कारों से ऊंची नहीं हैं. मेरे माता-पिता की यह छोटी-सी इच्छा है कि वे मेरी शादी में सम्मिलित हों, तो मैं उनसे क्या कहूं कि मैं जेम्स के साथ बिना शादी किए ही रहना चाहती हूं. कल को मैं लोगों से क्या कहकर तुम्हारा परिचय करवाऊंगी? जिस रिश्ते में विश्‍वास ही न हो, वह रिश्ता तो टिक ही नहीं पाएगा. जल्द ही दम तोड़ देगा.

जेम्स, मुझे ऊंचाइयों से बहुत प्यार है, लेकिन इतना भी नहीं कि पांव के नीचे से ज़मीन ही निकल जाए.” जेम्स से विदा लेते हुए मेरी आंखें आंसुओं से भीग उठीं, पर जल्द ही मैंने उन्हें पोंछ दिया. पापा कहा करते थे कि आंसू इंसान के मन की कमज़ोरी को दर्शाते हैं और तुम्हें जीवन में कमज़ोर नहीं, मज़बूत बनना है. अब मैं जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहती थी, पापा को फोन पर यह बताने के लिए मुझे डॉक्टर नवीन का रिश्ता मंज़ूर है.

 

 

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      शुभि मंडल

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