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कहानी- होली की गुझिया (Short Story- Holi Ki Gujhiya)

क़रीब 10 बजे गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ पर वह बाहर आई, तो “हैप्पी होली” के समवेत स्वर के साथ सास-ससुर आते दिखाए दिए. पैर छूती तूलिका को सास ने गर्मजोशी से बांहों में भर लिया. ससुर ने स्नेहजनित आशीर्वाद भरा हाथ उसके सिर पर रखा. परदेस में सहसा अपने देश की महक उसे भली लगी कि तभी उसकी नज़र समीर को ढ़ूंढ़ने लगी, फिर समीर को देख वह हर्षमिश्रित विस्मय से चिल्ला पड़ी.

Holi Story

‘’तूलिका, तुम यहां समंदर के किनारे आराम से  बैठो, मैं डियर आयलैंड और गैब्रियल आयलैंड का टिकट लेकर ट्रैवल एजेंसी से पता करता हूं कि मम्मी-पापा को कहां-कहां घुमाया जा सकता है.” समीर अपने मम्मी-पापा के मॉरिशस आने पर बहुत उत्साहित नज़र आ रहे थे. शीघ्रता से वह जेटी की ओर बढ़ गए.

तूलिका समंदर के किनारे बैठकर लहरों का आना-जाना देखने लगी. मॉरिशस में समंदर का नीला पन्ने-सा हरा रंग उसे बहुत भाता है. समीर के साथ अक्सर यहां आकर घंटों बैठती है. किस व़क्त लो टाइड-हाई टाइड होगा, उसे पता है. क़रीब आधे घंटे बैठने के बाद उसने महसूस किया कि समंदर की लहरें रफ़्ता-रफ़्ता आगे बढ़ने लगी थीं. आस-पास की गीली रेत को देख मन गीला-गीला-सा होने लगा था.

बीते रविवार की बात मन-मस्तिष्क में घूमने लगी. जब वह सुबह-सुबह  समीर के साथ बैठी इत्मिनान से चाय की चुस्कियां भर रही थी. उस व़क्त उसके मुंह से निकला, “समीर, होली आनेवाली है. काश! हम शादी के बाद की पहली होली इंडिया में मनाते… सच घर की बहुत याद आ रही है.” उसकी बात पर समीर कुछ मौन के बाद बोले, “तूलिका, होली के एक दिन पहले मम्मी-पापा यहां आएंगे…”

सास-ससुर  के अप्रत्याशित आगमन की ख़बर सुनकर वह चौंकी, तो समीर कहने लगे, “सोचा था तुम्हें सरप्राइज़ दूंगा, पर तुम पहले भी कई बार होली पर इंडिया जाने की बात कह चुकी हो, तो रहा नहीं गया, इसलिए बता दिया.” यह सुनकर वह आश्‍चर्य से बोली, “मम्मी-पापा के आने का प्रोग्राम कब बना? तुम पहले से जानते थे क्या?”

“अरे! अब मॉरिशस का प्रोग्राम अचानक तो नहीं ही बनेगा, क़रीब एक-दो महीने पहले ही मुझे पता चला.”

“वाह! और तुम मुझे अब बता रहे हो. अरे! इसमें सरप्राइज़ जैसा क्या था.

मम्मी-पापा अचानक मॉरिशस आ जाते, तो मेरे लिए कितनी अजीब सिचुएशन होती.” बेसाख़्ता उसके मुंह से निकला, तो समीर अटपटाकर कहने लगे, “अरे! मैं तो सोच रहा था कि मम्मी-पापा के आने की बात सुनकर तुम ख़ुशी से उछल पड़ोगी, पर तुमने तो बड़ा ठंडा रिस्पॉन्स दिया.”

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“अरे नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. अब अचानक किसी के आने की ख़बर दोगे, तो थोड़ी हड़बड़ाहट तो होगी न.” तूलिका के कहने पर समीर बोले, “जानती हो, हमारी शादी के पहले मैंने उन्हें कई बार मॉरिशस घूमने आने के लिए कहा, पर वो नहीं आए और अब देखो अपनी बहूरानी के साथ होली खेलने की इच्छा उन्हें मॉरिशस खींच लाई. वो दोनों बड़े उत्साह से यहां आ रहे हैं होली मनाने, ये हमारे लिए बहुत बड़ी बात है.”

समीर की बात पर वह संभलकर बोली, “वो तो ठीक है, पर सोचो, तुम्हारे सरप्राइज़ के चक्कर में मेरे इम्प्रेशन की तो बैंड बज जाती. मम्मी-पापा पहली बार घर आते और मैं उन्हें आठ बजे तक सोती मिलती, घर अस्त-व्यस्त मिलता, तो वो यही कहते कि उनकी बहू को घर संभालना भी नहीं आता. आज पूरा दिन साफ़-सफ़ाई में लगना मेरे साथ.”

यह सुनकर समीर अदा से बोले, “आज बंदा आपकी सेवा में सहर्ष तत्पर है.”

पति-पत्नी के बीच हल्के-फुल्के ढंग से बात का समापन हो गया, पर तूलिका का मन न जाने क्यों होली के अवसर पर सास-ससुर के आने को लेकर असहज था.

उसे याद आया कि कुछ दिनों पहले उसने होली पर अपने मायके जाने की बात कही, तो समीर तनाव में आ गए. फिर उसे भारत जाने से ये कहकर रोक लिया कि ऑफिशियल कमिटमेंट के कारण मैं तो भारत जा नहीं सकता, फिर तुम क्या अकेले जाओगी. वो भी होली पर… मुझे अकेले छोड़कर होली का त्योहार मनाना अच्छा लगेगा तुम्हें? तुम्हें रंग लगाए बिना मेरी होली तो फीकी रह जाएगी.”

उसके प्रेम के वशीभूत भावुकतावश उसने आगरा जाना टाल दिया, पर अब वह समझ पा रही थी कि यकीनन सास-ससुर के मॉरिशस आने के कार्यक्रम की वजह से उसने उसे मायके जाने से रोका होगा.

और तो और समीर ने सास-ससुर को घुमाने के लिए हफ़्ते-दस दिन की छुट्टी के लिए भी अप्लाई कर दिया. सास-ससुर किसी और समय मॉरिशस आते, तो वह उत्साह से भर जाती, पर मायके में होली न मनाकर यहां सास-ससुर के स्वागत के निहितार्थ उसका रुकना मन को बुझा गया.

दो-तीन दिन तक सास-ससुर कहां-कहां घूमेंगे, खाने में किस दिन क्या-क्या पकेगा, बाहर कहां क्या खाएंगे… होली के एक दिन पहले वे आ रहे हैं, तो होली में क्या पकवान बनेंगे, इस पर चर्चा होती रही. चर्चा के बीच एक दिन समीर ने उत्साह से उससे पूछा, “तूलिका, तुम्हें गुझिया बनानी आती है?”

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यह सुनकर तूलिका ने थोड़ी मायूसी से कहा, “नहीं.”

“अरे यार! होली में गुझिया नहीं बनेगी, तो मज़ा ही नहीं आएगा.” एक लंबी सांस लेते हुए समीर ने कहा, तो तूलिका ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. समीर फिर बोले, “चलो कोई बात नहीं. मम्मी से गुझिया बनवाऊंगा. तुम्हें पता है, मम्मी बहुत अच्छी गुझिया बनाती हैं. वह खोए में ड्रायफ्रूट, किशमिश डालती हैं. सच में मज़ा आ जाता है उनके हाथ की गुझिया खाकर, आह!.. याद करके ही मुंह में पानी आ गया.”

यह सुनकर तूलिका तपाक से बोली, “गुझिया तो मेरी मम्मी भी बहुत स्वादिष्ट बनाती हैं. उनके हाथ की गुझिया खाओगे, तो सब भूल जाओगे. वह  खोए में नारियल-चिरौंजी डालकर ऐसी स्वादिष्ट गुझिया बनाती हैं कि सालभर तक उसका स्वाद ज़ुबां से जाता नहीं है. पर क्या कहूं, इस साल मैं उनके हाथ की गुझिया और आगरा की होली बहुत मिस करूंगी.”

यह सुनकर समीर गंभीर हो गए. उसे भी सहसा भान हुआ कि यूं सास और मां में तुलना करके उसने सही नहीं किया.

एकबारगी उसे अफ़सोस हुआ, पर वह भी क्या करती, जाने-अनजाने वह मायके-ससुराल की तुलना पर मायके को श्रेष्ठतर बताकर ही चैन लेती.

लहरों के स्वर अब तेज़ हो गए थे. उन्होंने सोच-विचार में खोई तूलिका का ध्यान अपनी ओर एक बार फिर आकर्षित किया. तूलिका ने नज़र भरकर समंदर पर दृष्टि डाली…  फिर समय देखा एक घंटा व्यतीत हो गया था, पर समीर अभी तक नहीं आए. बनस्पत समंदर अब पास आ गया था, इसका अंदाज़ा चट्टानों को देखकर लगाया जा सकता था. कुछ देर पहले जो चट्टानें दिख रही थीं, वे अब समंदर में डूबने लगी थीं.

विचारों ने फिर रफ़्तार पकड़ी. क़रीब छह महीने पहले तक वह भी तो इन चट्टानों की भांति शादी न करने का संकल्प लिए अटल थी, पर एक तरफ़ उसके माता-पिता शादी के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे थे, तो दूसरी तरफ़ समीर अपने प्यार की लहरों से उसके संकल्पों को डुबोने का प्रयास कर रहे थे. आख़िरकार तूलिका को मनाने में वह सफल हुए. समीर ने उससे कहा, “इकलौती संतान होने के कारण मैं तुम्हारे पैरेंट्स के प्रति तुम्हारी सोच और कमिटमेंट्स को समझता हूं. मैं भी फैमिली ओरिएंटेड पर्सन हूं. तुम्हारे पैरेंट्स मेरे भी पैरेंट्स होंगे.”

समीर की समझदारी भरी बातों पर रीझकर उसके  प्यार और विश्‍वास पर भरोसा करके उसने शादी के लिए ‘हां’ कर दी.

पर आज अपनी उस ‘हां’ पर उसे चिंता हो रही है. वह तो उसके मायके को हाशिये पर छोड़कर अपने पैरेंट्स को घुमाने-फिराने और त्योहार मनाने की योजनाएं बना रहा है. इस विचार की गड़ी फांस रह-रहकर मन में टीस उठाती रही. नीले समंदर ने धीरे-धीरे समस्त चट्टानों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया था. तूलिका अब

बेचैनी-से समीर के आने का इंतज़ार करने लगी. कुछ ही देर में समीर आते दिखाई दिए. आते ही उन्होंने पूरे उत्साह से बताया कि वे ट्रैवल एजेंसी से सारी जानकारी जुटा लाए हैं और फेरी वगैरह के टिकट भी ले आए हैं. वीकेंड होने की वजह से आज वहां काफ़ी भीड़ थी, इसलिए देर हुई.

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देखते-देखते होली क़रीब आ गई और साथ ही सास-ससुर के मॉरिशस पहुंचने की घड़ी भी. सुबह-सुबह उठकर उसने रसोई की सारी व्यवस्था देखी, फिर चाय का कप लेकर बालकनी में आ बैठी. मन मायके की उस देहरी पर चिड़िया-सा फुदकता जा बैठा, जहां इस व़क्त गुझियों की सुगंध फैली हुई थी. वह आनेवाली होली में खुली आंखों से देखे दृश्य में अपने पापा को अबीर-गुलाल को कटोरियों में सजाए बैठे देख पा रही थी. मां ने चिप्स, पापड़, नमकीन, मठरी जाने क्या-क्या प्लेट में सजाकर रखा था.

तूलिका की आंखों के सामने वे दिन घूम गए, जब उसके पापा बाल्टी में रंग घोलकर उसके लिए रखा करते थे और वह अपनी पिचकारी भरकर रंगों भरी बाल्टी खाली कर देती थी. सहेलियों का हुजूम इकट्ठा होता था. पूरा आंगन गीला हो जाता था, मां रेफरी की तरह यहां-वहां रंग न गिराने की सबको हिदायत देतीं, पर उनकी कोई नहीं सुनता था. और तो और मां को भी घेरकर लाया जाता. पापा उन पर रंग डालते, तो वह बड़बड़ाती फिर पापा से रंग छीनकर उन्हें रंग लगाने का प्रयास करतीं. होली का हुड़दंग सबको रंगों से सराबोर कर देता.

वह जानती थी कि कल सब उसे बहुत मिस करेंगे. उसने तो मां से कहा भी था कि वह होली पर आगरा आना चाहती है, पर मां ने बड़प्पन दिखाते हुए उसे पति के संग वहीं रहकर होली मनाने की सलाह दे डाली.

वह अंदाज़ा लगा रही थी कि आगरा में उसकी अनुपस्थिति में कैसी होली मनेगी. शगुन के तौर पर मां-पापा एक-दूसरे को अबीर-गुलाल का टीका लगाकर एक-दूसरे को गुझिया खिलाकर होली की रवायत पूरी कर लेंगे.

तूलिका का मन अपने माता-पिता से बात करने के लिए सहसा छटपटाया, तो वह बात करने के लिए अपना फोन लेने उठी कि तभी समीर ने उसके दोनों गालों में रंग मल दिया. वह अचानक किए गए इस हमले के लिए तैयार नहीं थी, इसलिए अचकचाकर अपने चेहरे से गुलाल झाड़ते हुए कहने लगी, “अभी तो पूरे घर की सफ़ाई की है और तुम गंदा करने चले आए. और होली आज नहीं, कल है. अभी से परेशान मत करो प्लीज़.”

समीर ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा, तो उसे उसकी आंखों में नमी दिखाई दी. समीर ने परेशान होकर उसके माथे को छूकर पूछा, “‘क्या हुआ तुम्हारी तबीयत तो ठीक है न? इतनी उदास-सी क्यों दिख रही हो.” तूलिका कुछ अनमनी होकर वहां से जाने लगी, तो समीर उसका रास्ता रोककर कहने लगा, “माना होली कल है, पर तुम्हें रंग आज इसलिए लगा दिया कि कल कहीं मुझसे पहले कोई और रंग न लगा दे. अरे यार, थोड़ा-सा मुस्कुरा दो वरना…”  बात अधूरी छोड़कर वह चुप हो गया.

“थोड़ा मुस्कुरा दो, वरना मेरी पेशी हो जाएगी.” यह वाक्य अक्सर वह अपने पैरेंट्स की मौजूदगी में कहता है और सच भी है. मज़ाक में भी वह अपने सास-ससुर से समीर की शिकायत कर दे, तो वह अपने बेटे की अच्छी क्लास ले लेते हैं.

सास-ससुर से तूलिका को भरपूर प्यार मिला, इसमें दो राय नहीं थी, फिर भी आज उनके आगमन पर उसके मन में नैराश्य पनपना निस्संदेह ग़लत था. उसके उदास होने की पृष्ठभूमि में मायके जाकर होली न मना पाने का मलाल  था, पर इन सबमें उनका क्या दोष. 10-15 दिनों में वह यहां के अनुभव लेकर चले जाएंगे. नहीं-नहीं, अपनी उदासीनता-खिन्नता से वह त्योहार को फीका नहीं कर सकती और बहुत-से त्योहार आएंगे अपने माता-पिता के संग मनाने के लिए. पूरी ताक़त से उसने नैराश्य को मन से उखाड़ फेंका. नए सकारात्मक विचार की सहसा चली हवा  पूर्वाग्रह के बादल ले उड़ी. अपने उदासीन व्यवहार का संज्ञान लेते हुए वह मुस्कुराकर समीर के हाथों से रंग लेकर उसी को लगाते हुए बोली,  “हैप्पी होली.”

कुछ देर बाद समीर अपने पैरेंट्स को लेने एयरपोर्ट चले गए. वह तैयार होकर नाश्ते-खाने की व्यवस्था देखने लगी. क़रीब 10 बजे गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ पर वह बाहर आई, तो “हैप्पी होली” के समवेत स्वर के साथ सास-ससुर आते दिखाए दिए. पैर छूती तूलिका को सास ने गर्मजोशी से बांहों में भर लिया. ससुर ने स्नेहजनित आशीर्वाद भरा हाथ उसके सिर पर रखा. परदेस में सहसा अपने देश की महक उसे भली लगी कि तभी उसकी नज़र समीर को ढ़ूंढ़ने लगी, फिर समीर को देख वह हर्षमिश्रित विस्मय से चिल्ला पड़ी. समीर गाड़ी की पिछली सीट पर बैठे तूलिका के मम्मी-पापा को उतरने में मदद कर रहे थे.

तूलिका की सास तूलिका के मां-पापा की ओर इशारा करते हुए बोली, “तूलिका, तुमसे बार-बार पूछा कि उपहार में क्या लाएं, पर तुमने तो बताया ही नहीं, इसलिए हम ख़ुद ही सरप्राइज़ ले आए…”

तूलिका को भौंचक्का देखकर ससुरजी कहने लगे, “हम सब नए साल में आना चाहते थे, पर तुम्हारे मां-पापा का वीज़ा तैयार नहीं था, तो सोचा चलो, होली ही मना आएंगे बच्चों के साथ.”

“कैसा रहा सरप्राइज़?”

सहसा समीर ने प्यार से तूलिका का हाथ थामते हुए प्रश्‍न किया, तो जवाब में उसने भावविह्वल मुग्ध नज़रों से निहारकर धीमे से उसकी हथेलियों को दबा दिया.

“पापा, आपके आने का प्रोग्राम कब बना?” एकांत पाते ही तूलिका ने पूछा, तो वह हंसकर कहने लगे, “अचानक तो नहीं बना. तुम्हारे ससुरालवाले तुम्हें सरप्राइज़ देना चाहते थे, सो चुप रहना मुनासिब समझा.”

“हां तूलिका, समीर और तुम्हारे सास-ससुर  की वजह से संभव हो पाया है यहां आना. मुझे तो जानती ही हो, तीज-त्योहार में घर छोड़कर कहीं आती-जाती नहीं, पर तुम्हारे ससुरालवालों ने घेराव करके मनाया कि जहां बच्चे, वहीं त्योहार. तुम्हारे पापा भी जोश में आ गए और देखो होली मनाने मॉरिशस चले आए.”

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अपनी मां के कहने पर तूलिका आश्‍चर्य से बोली, “मैं तो आगरा आने को बोल रही थी, तब भी नहीं बताया.”

“इसीलिए तो तुझे रोका. जो तू आगरा आ जाती, तो हम यहां कैसे आ पाते? पर सच कहूं, इन दो-तीन महीनों तक अपने आने की बात तुझसे छिपाना बड़ा कठिन काम रहा.” यह कहकर मां-पापा हंसने लगे. अपने साथ मां-पापा को यूं उल्लासित पाकर वह आह्लादित थी.

यकीनन ये कार्यक्रम तीन-चार महीनों से बन रहा होगा, इसीलिए उसे भारत जाने से रोका समीर ने. यह सोचकर अथाह प्यार और आदर उमड़ आया अपने जीवनसाथी के प्रति.

पूरे घर में अनोखी रौनक़ थी. सबके व्यवस्थित होने के बाद वह समीर के पास आई. पत्नी के चेहरे के भाव पढ़कर वह नाटकीय अंदाज़ में बोला, “थैंक्यू मत बोलना. वो तो तुम्हें प्रूव करना था कि मेरी मम्मी तुम्हारी मम्मी से ज़्यादा स्वादिष्ट गुझिया बनाती हैं. अब तुम तो मानने को तैयार थी नहीं, इसलिए हाथ कंगन को आरसी क्या. दोनों को यहीं बुला लिया.”

“अरे चलो, ये बात तो महज़ चार दिन पहले हुई है. क्या मैं जानती नहीं कि तुरत-फुरत ऐसे कार्यक्रम नहीं बनते हैं, पर एक बार को तुम्हारी बात मान भी लूं तो भी…” तूलिका रसोईं की ओर इशारा करते फुसफुसाई, “तुम्हारा ये प्रयास तो बेकार गया… वो देखो… मेरी सास और तुम्हारी सास मिलकर गुझिया बना रही हैं, इसलिए गुझिया में नया स्वाद होगा… और हां… कल सबसे पहले तुमसे रंग लगवाऊंगी, ये मेरा वादा है.”

त्योहार की चहल-पहल में लगा ही नहीं कि वे भारत में नहीं हैं. नवदंपत्ति बड़े-बुज़ुर्गों की स्नेह छाया में निश्‍चिंतता और उत्साह के साथ त्योहार की तैयारियों में जुटे थे. घर में गुझियों की महक फैलने लगी थी. इस बार की गुझियों में वाक़ई नया स्वाद था. उसमें किशमिश-चिरौंजी-ड्रायफ्रूट और नारियल सब डाले गए थे.

रिश्तों की मिठास में पकी गुझिया स्वादिष्ट और सालोंसाल तक याद की जाने लायक बनी थी. आपसी समझ के रंग शरीर के साथ मन को भी सराबोर कर गए थे.

Minu tripathi

      मीनू त्रिपाठी

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Kids Story: राजा और लेखक (Kids Story: Raja Aur Lekhak)

Raja Aur Lekhak

Raja Aur Lekhak

Kids Story: राजा और लेखक (Kids Story: Raja Aur Lekhak)

एक नगर में एक राजा था. एक दिन वो यूं ही टहलने निकला. घूमते-घूमते उसे किताबों का एक बड़ा-सा संग्रहालय नज़र आया. राजा उसमें गया, तो वहां ढेर सारी किताबें देखकर ख़ुश हो गया. राजा को लगा एक ही जगह पर इतनी सारी ज्ञानवर्द्धक किताबें तो बेहद फ़ायदेमंद है. राजा को उन किताबों में से एक किताब बहुत पसंद आई. वो उस किताब को लेकर घर चला आया. किताब पढ़कर राजा उस लेखक से बहुत प्रभावित हुआ, क्योंकि उसमें लेखक ने लिखा था कि किस तरह से उसने अपना सारा जीवन अकेले ही बिता दिया. उस लेखक ने अपने बीवी-बच्चों पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया और संपूर्ण जीवन समाज में भ्रमण करके बिता दिया.

राजा ने सोचा वो भी अपना पूरा जीवन समाज में भ्रमण करके ही बिताएगा. राजा ने सोचा कि पहले मैं उस लेखक से भी मिल लेता हूं, जिसने ये किताब लिखी है. राजा उस लेखक के गांव जाकर उसके घर गया. वहां जाकर राजा ने देखा कि वो लेखक तो मज़े से अपने बीवी-बच्चों के साथ रह राह है. राजा को बहुत दुख भी हुआ और गुस्सा भी आया कि इसकी किताब पढ़कर मैं समाज भ्रमण के लिए निकल रहा था, पर ये तो मज़े से यहां रह रहा है और किताब में गलत बात लिखी है.

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राजा ने उस किताब को दिखाते हुए लेखक से गुस्से में पूछा कि उसने यह झूठ क्यों लिखा? लेखक ने राजा से कहा कि यह किताब उसने समाज में भटके हुए लोगों को सही राह दिखाने के इरादे से लिखी है. लेखक ने कहा कि मेरा काम है समाज के लोगों का मार्गदर्शन करना, ताकि लोग अपना जीवन सुधार सकें. लेखक ने राजा से अपने साथ बाहर चलने को कहा. वो राजा को एक भाला बनाने वाले के पास ले गया और उसे एक अच्छा सा भाला दिखाने को कहा.

भाला लेकर लेखक ने राजा से कहा कि यह देखिए इस भाले को. राजा ने कहा मैं क्या करूं इसका. लेखक ने कहा कि यह भाला यह दुकान वाला बनाता है, फिर उसने दुकान वाले से कहा कि तुम भाला इतना अच्छा बनाते हो, तो क्या तुम युद्ध में नहीं जा सकते?

भाला बनाने वाले ने हंसते हुए कहा कि यह मेरा काम नहीं है. युद्ध में तो बड़े-बड़े वीर योद्धा जाते हैं, तो मैं कैसे जा सकता हूं, क्योंकि मेरा काम उनके लिए अच्छे से अच्छा भाला बनाने का है, युद्ध लड़ना उनका काम है. उसकी बात सुनकर लेखक ने राजा से कहा कि इसी तरह मेरा काम दूसरों को अपने लेखन के ज़रिए जीने की कला सिखाना है, इसका यह मतलब नहीं कि वह जीवन या वह कला मैं ख़ुद जानता हूं.

लेखक के तर्क से राजा समझ गए कि दरअसल उस किताब में लिखी बातों का क्या अर्थ है. राजा ख़ुश हुआ, लेखक और भाला बनाने वाले को ईनाम देकर वह वापस अपने महल लौट आया, ताकि एक शासक की तरह अपनी जनता का ख़्याल रख सके.

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कहानी- अंतिम अध्याय (Short Story- Antim Adhyay)

यदि इश्क़ छुपाना कठिन है, तो उसका इज़हार कर पाना भी आसान नहीं होता. लेकिन प्यार मौन और अनकहा रहकर भी उतना ही सच्चा हो सकता है और शब्दों में बंधे बिना भी व्यक्त हो जाता है. अमृता तो मन की बात समझ लेने में यूं भी माहिर थी.

बाद में जो कुछ हुआ, वह उसके बस में नहीं था. हमने अपने प्यार का इज़हार शब्दों में किया होता, तो भी क्या कर लेती वो? हमारे जीवन में प्रारब्ध का कितना हाथ है यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन हाथ की लकीरों में लिखा रहता हो या फिर माथे की, नियति अपना खेल दिखाती अवश्य है.

Short Story

बहुत अंतर था गांव और शहर के जीवन में. परंतु गांव का स्कूल दसवीं कक्षा तक ही था. उस वर्ष मामा जब मां से राखी बंधवाने आए, तब बोले, “बहुत मेधावी है तुम्हारा बेटा. इसे मेरे साथ शहर भेज दो. पढ़-लिखकर कुछ बन जाएगा, तो मुझे इस बात की संतुष्टि होगी कि मैं तुम्हारे लिए कुछ कर पाया.”

यह मेरा सौभाग्य था कि मुझे जितने अच्छे मामा मिले थे, उतनी ही अच्छी मामी भी थीं, जिन्होंने मुस्कुराकर मेरा स्वागत किया और अपने ही बच्चों जैसा स्नेह भी दिया. मामा ने मेरा दाख़िला उसी स्कूल में करवा दिया, जिसमें उनके अपने बेटे उपेन्द्र ने उसी वर्ष बारहवीं पास की थी.

कहां गांव का दो कमरोंवाला कच्चा स्कूल, जिसमें न तो अध्यापक नियमित रूप से आते थे और न ही बैठने की पूरी व्यवस्था ही थी और कहां शहर का यह नामी स्कूल, जिसमें यदि फीस ऊंची थी, तो सुविधाएं भी पूरी थीं. नियमित रूप से पढ़ाई, हवादार बड़े-बड़े कमरे और लंबा-चौड़ा खेल का मैदान. मेरे नंबर अच्छे होने के कारण मुझे दाख़िला तो मिल गया था, लेकिन मैं थोड़ा घबराया हुआ भी था.

शुरू में उपेन्द्र ने मेरा खुले दिल से स्वागत किया. दो बहनों का अकेला भाई, मुझमें उसे अपना एक संगी मिल गया. उम्र में भी बस दो साल का अंतर था, अतः वह मेरे जीवन का सखा, गाइड सब कुछ बन गया. मैं उसे अपने मन की हर बात कहता और हर बात पर उससे सलाह लेता. पढ़ाई में उपेन्द्र की विशेष रुचि नहीं थी. शायद उसे अपने पिता का जमा-जमाया व्यापार नज़र आ रहा था, लेकिन मामा-मामी चाहते थे कि व्यापार में आने से पहले उपेन्द्र अच्छे से पढ़-लिख ले. उन्होंने अपनी दोनों बेटियों का विवाह भी उच्च शिक्षा दिलवाने के बाद ही किया था. लेकिन उपेन्द्र को प्रोत्साहित करने के लिए जब कभी वे मेरी लगन व मेहनत का उदाहरण रखते, तो उसके चेहरे पर ईर्ष्या की एक लहर दौड़ जाती. बारहवीं में नंबर कम आने के कारण किसी अच्छे कॉलेज में दाख़िला मिलने की संभावना नहीं थी, सो मामा ने एक प्राइवेट कॉलेज में उपेन्द्र का एम.बी.ए में दाख़िला करवा दिया.

आज पीछे मुड़कर देखता हूं, तो यूं लगता है, जैसे यह जीवन भी एक लंबी कहानी ही तो है- हर व्यक्ति की अपनी अलग कहानी, अपने अलग-अलग सुख-दुख.

ग्रामीण जीवन के अपने अध्याय को समाप्त कर शहरी जीवन में ढलने को मैं प्रयत्नरत था, पर यह सब इतना आसान भी न था. मामा मेरी इस कठिनाई को समझते थे कि अपनी पूरी कोशिशों के बावजूद मैं इस नए माहौल में असहज महसूस कर रहा हूं और अकारण ही अपने दोस्तों की हंसी का पात्र भी बनता हूं. जब तक उपेन्द्र स्कूल में था, तब तक अन्य लड़कों को थोड़ा डर रहता था, पर उपेन्द्र व उसके साथी सब स्कूल पास कर चुके थे.

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मामा के एक परिचित की बेटी थी अमृता, जो उसी स्कूल में पढ़ती थी. वह मुझसे दो वर्ष जूनियर थी, उसी माहौल में ढली होने के कारण आत्मविश्‍वास था उसमें. मामा ने मेरी ज़िम्मेदारी उसी को सौंप दी. वह आधी छुट्टी के व़क्त और वैसे भी यदा-कदा मुझसे बात करने आ जाती. कह सकते हैं कि मुझे तिनके का सहारा मिल गया था और इससे मेरे दोस्तों द्वारा मेरा मज़ाक उड़ाना कम भी हो गया. मैं भी धीरे-धीरे अपने पांव जमाने लगा. स्कूल में तो अमृता से मुलाक़ात होती ही, पारिवारिक मैत्री होने के कारण अन्य अवसरों पर भी हो जाती. अन्य लड़कियों से बहुत अलग थी वो. कोमल और संवेदनशील. यूं वो कम ही बोलती थी, पर नारी सुलभ गुण के चलते वो मेरी परेशानी और मन की बात का सहज अनुमान लगा लेती. मैं उसकी मां से भी कई बार मिला था. वे स्नेहपूर्वक मेरा

आवभगत करतीं. साल बीतते रहे और मैं स्कूल पार करके कॉलेज भी पहुंच गया. मुझे ज़िंदगी अब अच्छी लगने लगी थी, क्योंकि अमृता अच्छी लगने लगी थी. बिना किसी आहट, बिना मेरे जाने, न जाने कब वो मेरे दिल में समा गई थी. यह मेरे जीवन के मधुरतम दिन थे और अज्ञानवश मैं यह मान बैठा था कि जीवन का यह अध्याय सदैव यूं ही चलता रहेगा.

प्यार हमारी कमज़ोरी भी बन सकती है और ताक़त भी. मैंने अपने प्यार को अपना प्रेरणास्रोत बना लिया. मैं जानता था कि उसे पाने के लिए मुझे अन्य लड़कों से कहीं अधिक कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी. पढ़ाई में मेहनत कर मैं कितने भी अच्छे नंबर पा लूं, तब भी था तो मैं अनगढ़ ही. गांव से लाकर शहर में रोप दिया गया एक पौधा. मेरे बातचीत करने का सलीका, मेरा एटीकेट और सामान्य ज्ञान उन लोगों के मुक़ाबले नगण्य था, जो शहरी माहौल में पले-बढ़े थे, जिन्होंने अच्छे स्कूलों में शिक्षा पाई थी.

यदि इश्क़ छुपाना कठिन है, तो उसका इज़हार कर पाना भी आसान नहीं होता. लेकिन प्यार मौन और अनकहा रहकर भी उतना ही सच्चा हो सकता है और शब्दों में बंधे बिना भी व्यक्त हो जाता है. अमृता तो मन की बात समझ लेने में यूं भी माहिर थी.

बाद में जो कुछ हुआ, वह उसके बस में नहीं था. हमने अपने प्यार का इज़हार शब्दों में किया होता, तो भी क्या कर लेती वो? हमारे जीवन में प्रारब्ध का कितना हाथ है यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन हाथ की लकीरों में लिखा रहता हो या फिर माथे की, नियति अपना खेल दिखाती अवश्य है.

ग्रेजुएशन के बाद मुझे देहरादून की मिलिट्री एकेडमी में प्रवेश मिला गया. छुट्टियों में मां से मिलने गांव तो जाता ही, परंतु साल के बीच एक-दो चक्कर मेरठ मामा के घर भी लगा आता और अमृता से भी मिल आता. अमृता की मां को हमारी दोस्ती की जानकारी भी थी और स्वीकार्य भी.

ट्रेनिंग पूरी करके लेफ्टिनेंट बना ही था कि मामाजी का पत्र मिला, जिसमें उपेन्द्र के विवाह की सूचना थी. निमंत्रण-पत्र भी साथ था. उपेन्द्र का विवाह अमृता से हो रहा था. लंबा-चौड़ा आयोजन, जिसमें पांच दिन चलनेवाले कार्यक्रमों की फेहरिस्त थी.

मैं हैरान रह गया. अभी ही तो मेरा करियर बना था और समय आया था कि मैं उसे प्रपोज़ कर सकूं. वैसे भी इससे पहले किस बूते पर उसके माता-पिता से बात करता? पर क्या अमृता भी यही चाहती थी?

इसी प्रश्‍न का उत्तर पाने मैं मेरठ जा पहुंचा. पहली बार ऐसा हुआ था कि मैं मामा के घर न जाकर सीधे अमृता के घर गया था. घर में उसकी मां अकेली थीं और अमृता मामी के साथ विवाह की ख़रीददारी करने बाज़ार गई हुई थी. मुझे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी. चाय का प्याला पकड़ाते ही उन्होंने स्वयं ही बात छेड़ी. दरअसल, मेरे मामा और अमृता के पापा एक ही क्लब के मेंबर थे. वहीं पर मामाजी ने अमृता के पापा से कहा कि उपेन्द्र उनकी बेटी से विवाह करने को इच्छुक है. अमृता के पापा को प्रस्ताव पसंद आ गया. जाना-पहचाना, पढ़ा-लिखा परिवार, अच्छा व्यवसाय और भला क्या चाहिए था उन्हें? उन्होंने फ़ौरन हामी भर दी. अमृता की मां ने समझाने की बहुत कोशिश की कि एक बार अमृता से ज़रूर बात कर लेनी चाहिए, लेकिन अमृता के पिता उनमें से थे, जो स्वयं को ही सबसे समझदार व्यक्ति समझते हैं. ऐसे लोग सलाह-मशविरा नहीं करते, केवल फैसला सुनाते हैं, जिसे मानना अनिवार्य होता है. और उनके अपने विचार से अमृता के लिए इससे बेहतर रिश्ता और क्या हो सकता था.

यह जानकर कि विवाह का प्रस्ताव स्वयं उपेन्द्र की तरफ़ से आया है मुझे बहुत अचंभा हुआ, चोट भी लगी. मामा-मामी न सही, उपेन्द्र तो भली-भांति मेरे इस प्यार से परिचित था. जैसे मैं अपनी हर परेशानी उससे बांटता था, वैसे ही अमृता के बारे में भी हर बात मैंने उसे बताई थी. कभी वह मज़ाक में कहता कि तुमने तो आते ही सबसे अच्छी लड़की पटा ली और कभी अनजाने में व्यंग्य भी करता कि तुम जैसे मिट्टी के माधो को अमृता जैसी समझदार लड़की कैसे पसंद करती है, यह मेरी समझ के बाहर है.

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विवाह पर जाना तो लाज़िमी था, सो गया, पर केवल बारात में. और फिर छुट्टी न होने का बहाना बनाकर लौट आया. बहुत ख़ुश थे मामा-मामी और उनसे कोई गिला भी न था मुझे. इसमें कोई शक़ नहीं था कि वहां पर अमृता ख़ुश रहेगी. मामा-मामी बहुत अच्छे थे, संपन्न घर था और उपेन्द्र भी ज़रूर मन ही मन उसे चाहता रहा होगा, तभी तो विवाह का प्रस्ताव रखा और क्या चाहिए ख़ुशियों के लिए.

तहेदिल से अमृता की ख़ुशियों की कामना कर मैं लौट आया और मान लिया कि मेरी कहानी की इति हो चुकी है. लेकिन उपन्यासों के उपसंहार भी तो हुआ करते हैं न. लगता है मेरी कथा का उपसंहार लिखना अभी शेष था.

शायद लड़कियों में जीवन से समझौता करने की शक्ति हम पुरुषों से अधिक होती है. ख़ैर, मुझमें नहीं थी और फलस्वरूप मैं मामा के घर जाने से कतराता रहा. उपेन्द्र का बेटा हुआ और वह चार साल का भी हो गया, पर मैं उस घर में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया.

मां से पता चला कि उपेन्द्र का बेटा शिवम बहुत बीमार है और डॉक्टरों ने उसे रक्त का कैंसर बतलाया है. मेरी आंखों के सामने अमृता का उदास चेहरा दिनभर घूमता रहता. एक मां के लिए अपने बच्चे के दुख से बढ़कर कोई दुख नहीं हो सकता.

अमृता की खोई ख़ुशी लौटाने के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार था, पर मैं वहां जाकर उसे ढाड़स बंधाने का साहस भी नहीं जुटा पा रहा था. बस, प्रार्थना भर कर सकता था और वही कर रहा था. सबकी मिली-जुली दुआओं का ही असर था कि आगे टेस्ट कराने पर उसे रक्त कैंसर की वह क़िस्म एएलएल निकली, जो गंभीर होते हुए भी लाइलाज नहीं थी. अब उसका इलाज संभव हो चुका है.

यद्यपि वह लंबा और कष्टप्रद है, क़रीब साढ़े तीन साल तक चलनेवाला. कैंसर सेल ख़त्म करने के लिए दवाइयां इतनी स्ट्रॉन्ग दी जाती हैं कि मरीज़ का स्वस्थ ख़ून भी प्रभावित होता है. फलस्वरूप मरीज़ को अनेक बार बाहरी ब्लड चढ़ाने की ज़रूरत पड़ती है. एक कठिनाई यह भी थी कि शिवम का ब्लड ग्रुप ओ निगेटिव था, जो बहुत कम लोगों का होता है और डॉक्टरों की राय में ख़ून ब्लड बैंक से न लेकर किसी स्वस्थ एवं युवा व्यक्ति का ही दिया जाना चाहिए. उपेन्द्र का अपना ब्लड ग्रुप वही था, लेकिन ब्लड इतने कम अंतराल से दिया जाना था कि एक ही व्यक्ति से बार-बार ब्लड नहीं लिया जा सकता था. मुझे पता चलते ही मैंने अपना ब्लड देने की ठानी, क्योंकि मेरा भी वही ब्लड ग्रुप था.

मैंने फ़ौरन फोन पर ही उपेन्द्र से बात की और उसे आश्‍वस्त किया कि जितनी बार भी आवश्यक होगा मैं अपना ब्लड दूंगा. यूं हम बारी-बारी शिवम को ब्लड देने लगे. उपेन्द्र मुझे निश्‍चित तारीख़ बता देता और मैं उसी दिन सीधे अस्पताल पहुंच जाता. इस बीमारी में मरीज़ की रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम हो जाती है और उसे इंफेक्शन बहुत जल्दी पकड़ सकता है, अतः उसे सबसे अलग रखा जाता है. केवल एक ही व्यक्ति नहा-धोकर और साफ़-सफ़ाई का ध्यान रखते हुए उसके पास बैठ सकता है. अमृता भीतर कमरे में बेटे के संग रहती और मेरी मुलाक़ात बाहर स़िर्फ उपेन्द्र से ही होती. उसके बाद मैं घर जाकर मामा-मामी से मिलकर लौट आता.

तीसरी बार जब मैं ब्लड देने गया, तो शिवम की सेहत में काफ़ी सुधार था. हालांकि दवाइयां अभी लंबे समय तक चलनी थीं. डॉक्टर आश्‍वस्त थे कि ख़तरा टल गया है और फ़िलहाल और ब्लड देने की ज़रूरत नहीं. सदैव की भांति अमृता भीतर कमरे में शिवम के पास थी. लौटते समय मैंने उपेन्द्र को आश्‍वस्त किया कि कोई भी आवश्यकता पड़ने पर मुझे बता दे, मैं तुरंत आ जाऊंगा. उपेन्द्र ने मेरा हाथ अपने दोनों हाथों में लेकर कहा, “मैं तुम्हारा यह एहसान ज़िंदगीभर नहीं भूलूंगा. तुमने हमारे बुझते चिराग़ को फिर से रौशन करने में मदद की है.” मैं कैसे कहता उससे कि ये सब मैंने तुम्हारे लिए नहीं अमृता के लिए किया है. मेरे लिए आज भी अमृता की ख़ुशी सर्वोपरि है.

अब तो मेरी कहानी का उपसंहार भी लिखा जा चुका है और मैंने क़िताब बंद कर दी है, निश्‍चय के साथ कि अपने अतीत में अब कभी नहीं झांकूंगा और न ही भविष्य की सोचूंगा. बस, केवल वर्तमान में ही जीऊंगा. मैंने अमृता के संग ज़िंदगी गुज़ारने का सपना देखा था, जो पूरा नहीं हुआ. सौभाग्यशाली होते हैं वे, जिनका प्यार परवान चढ़ता है, लेकिन जिनका नाक़ामयाब रह जाता है, दास्तान तो उनकी भी होती है न! और सबसे बड़ी बात यह कि प्यार में क़ामयाब न हो पाने का मतलब यह क़तई नहीं है कि उनकी निष्ठा में कोई कमी रह गई थी.

एक बात और, कहा जाता है कि कच्ची उम्र का प्यार महज़ एक दैहिक आकर्षण होता है, विपरीत लिंगी में जगी नई उत्सुकता मात्र. मुझे तो याद नहीं आता कि मैंने हाथ बढ़ाकर कभी अमृता को छूने का प्रयत्न भी किया हो. सच तो यह है कि किशोरवय और यौवन की दहलीज़ पर खड़ा वह समय, जब दुनिया और उसके स्वार्थ से अभी वास्ता नहीं प़ड़ा होता, बस उसी समय का प्यार ही वास्तविक प्यार होता है, निश्छल और निर्मल. और ऐसा जीवन में स़िर्फ एक ही बार हो सकता है.

सूखी धरती पर वर्षा की पहली फुहार महसूस की है कभी? किस तरह महक उठती है कुंआरी धरती इस पहले मिलन से. बाद में कितना भी बरस ले, जलमय हो जाए पृथ्वी पर वो सोंधी महक फिर नहीं उठती कभी. ठीक वैसा ही होता है अपरिपक्व उम्र का वो पहला प्यार!

Usha Drava

        उषा वधवा

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कहानी- पगलिया (Hindi Short Story- Pagliya)

Hindi Short Story

“मैं अपनी कोख में नन्हीं-सी जान को लेकर घर से निकली, तो जानती थी कि मुझे अपनी और अपनी बच्ची के चारों तरफ़ एक सख़्त कवच बुनना होगा, जो मेरी और उसकी रक्षा समाज में इंसान के वेश में छिपे भेड़ियों से कर सके. ऐसे में घर छोड़ते समय मुझे मेरी मृत मां बहुत याद आईं, जो कहती थीं कि मैं रहूं या न रहूं, मेरा आशीर्वाद हर समय तेरा साथ देगा. मैंने अपनी मां की स्मृतियों से ही अपना कवच बुन लिया, लेकिन वही कवच मेरा दुश्मन बन गया. प्रथम की मां मुझे पागल समझकर मुझसे डरती हैं.’’   

 Hindi Short Story

वाणी के जाने के बाद से उसकी कातर आवाज़ मेरे दिल से निकल ही नहीं रही थी. “प्लीज़ डॉक्टर, आप एक बार

मानसिक अस्पताल चलकर मां को देख लीजिए. मैं उन्हें वहां नहीं छोड़ना चाहती. मेरी समझ में नहीं आ रहा कि अचानक से मां इतनी आक्रामक कैसे हो गईं? शायद उनसे किसी ने कह दिया था कि उनकी मां मर चुकी हैं, इसीलिए वो हर किसी को पत्थर मारने लगी हैं. लोगों को पकड़कर कहती हैं कि मेरी मां से मिलो. जब वे कहते हैं कि यहां कोई नहीं है, तो उसे मारने दौड़ती हैं.” कहते-कहते वाणी का गला भर्रा गया था.

मैं असमंजस में पड़ गई. मेरे इतने वर्षों का अनुभव ग़लत कैसे हो गया? भले ही सामान्य और परा-मनोविज्ञान के विद्यार्थियों ने उस केस को वाद-विवाद का विषय बना दिया हो, पर मेरी अनुभवी आंखों के लिए तो वो केस आईने की तरह साफ़ था, तभी तो मैंने कह दिया था वाणी से कि उसकी मां को इलाज की कोई आवश्यकता नहीं है, फिर अचानक ये कैसे हो सकता है?

मैंने उसे दिलासा देते हुए कहा था कि वो अपनी मां की पूरी जीवनी विस्तार से लिखकर लाए. जो कुछ भी वो उनके बचपन से उनके बारे में जानती है या उसने किसी से भी सुना है वो सिलसिलेवार लिखे, ताकि मैं उनका केस एक बार फिर समझ सकूं और आज ही वो ये दर्द का दस्तावेज़ लेकर आ गई थी, जिसे मैंने पूरी तन्मयता से पढ़ना शुरू किया.

‘मेरी मां को भी हर औरत की तरह अपने भीतर उस स्पंदन ने अभिभूत किया, जो किसी भी औरत के जीवन में उल्लास के वो क्षण लेकर आता है, जिनमें वो सृष्टि से सर्जक हो जाने का गौरव पा लेती है. उनके साथ-साथ उनके ससुरालवाले भी बहुत ख़ुश थे, लेकिन घरवालों की नीयत नियति के खेल में कौन-सा अड़ंगा लगानेवाली है, ये पता चला तो उनके होश उड़ गए. तीन महीने पूरे हुए और डॉक्टर ने उनका परीक्षण करके जो बताया, उससे घरवालों के चेहरों के भाव बदल गए. पिता ने जब रात में उन्हें समझाया कि कल शाम को गर्भपात के लिए क्लीनिक जाना है, तो उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक गई. कल तक जिस नन्हें जीव के आगमन पर सब हर्षित व उत्साहित थे, आज उसी के आगमन का द्वार बंद कर देना चाहते थे. क्यों? क्योंकि वो एक कन्या थी? वो कन्या जिसे हमारी संस्कृति में देवी कहा गया, वो कन्या जिसका दान वैतरणी नदी को पार करने का साधन बताया गया. वो कन्या, जिसके पांव छूकर नवरात्र में उससे घर की समृद्धि का आशीर्वाद मांगा जाता है. उस कन्या का जीवन छीन लेना उन्हें गवारा न हुआ. उन्होंने घरवालों को समझाने की बहुत कोशिश की, पर कोई निष्कर्ष नहीं निकला. पिता ने अपने पक्ष रखे कि वो तीन बहनों की शादियां करके त्रस्त हो चुके हैं. बेटी की शादी ही नहीं, हिफ़ाज़त करना भी एक जंजाल है. तर्कों की कमी तो मां के पास भी न थी, लेकिन किसी ने उनकी एक न सुनी. आख़िर पिता ने कह ही दिया कि उन्हें अब कोई बहस नहीं करनी है और ये उनका अंतिम फैसला है, तो मां के सामने ये चुनौती खड़ी हो गई कि अपनी संसृति की जान कैसे बचाए.

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इसी ऊहापोह में वे आधी रात में उठकर छत पर टहलने लगीं. हवा कुछ ज़्यादा ही वेगमयी और घुमावदार थी. उसके घर्षण से उपजी सांय-सांय की ध्वनियां जैसे मन के झंझावात का प्रतिनिधित्व कर रही थीं कि उन्हें अपनी मां दिखाई पड़ीं. वो सुखद आश्‍चर्य के साथ दौड़कर उनसे लिपट गईं. “आप यहां? बाबूजी ने तो संदेशा भिजवाया था कि आप… लेकिन मैं जानती थी कि मेरी मां मुझे छोड़कर स्वर्ग भी नहीं जा सकती.” वो रोते हुए बोलीं. नानी ने उनके आंसू पोंछकर सांत्वना दी और कहा कि वे उनके साथ हैं. अब उनके भीतर और बाहर का झंझावात भीषण रूप ले चुका था. एक और एक ख़ुशनुमा ज़िंदगी थी, जिसमें सब कुछ था सिवाय निर्णय लेने की स्वतंत्रता के और दूसरी ओर एक तिनके को तूफ़ानों को ही पायदान बनाते हुए अंबर की ऊंचाइयों तक पहुंचाने का संघर्ष. आख़िर उनके अंतर्द्वंद्व की प्रतिनिधि हवाओं की सरसराहट धीरे-धीरे शांत होते-होते एक रहस्यमयी सन्नाटे में बदल गई. ये तूफ़ान आने के पहले का ख़ामोश शोर था, क्योंकि वो जीवन को तूफ़ान के हवाले करने का निर्णय ले चुकी थीं.

सुबह मां तैयार हुईं. मंदिर जाने के बहाने घर से निकलीं और ट्रेन में बैठ गईं. उनके बैग में उनके गहने, कुछ पैसे, उनके शैक्षणिक प्रमाणपत्र और उस तीर्थस्थान का टिकट था, जहां वो शादी के बाद घूमने गई थीं. ट्रेन से उतरकर वो उसी सराय में पहुंचीं, जहां तब वो लोग ठहरे थे. वहां निराश्रित महिलाओं के लिए एक आश्रम भी था. उन्हें मिलकर सराय के सारे काम करने होते थे और पारिश्रमिक के तौर पर भोजन, वस्त्र और एक सामूहिक छत मिलती थी. काम से मां कब घबराती थीं. यहीं उनका नाम ‘पगलिया’ पड़ा, क्योंकि काम तो वो पागलों की तरह बिना थके-रुके, बिना कोई प्रतिवाद किए करती ही थीं, साथ ही उस मां से अक्सर बात भी करती थीं, जो उनके सिवा किसी को नज़र ही नहीं आती थीं. कुछ लोग तो ये मानने लगे थे कि उन पर किसी भूत-प्रेत का साया है और उसी की सहायता से वो इतना काम कर लेती हैं.

मैं चार साल की हुई, तो वो एक अच्छे स्कूल का फॉर्म लेने गईं, लेकिन उन्हें ये कहकर मना कर दिया गया कि पिता के हस्ताक्षर के बिना बच्चे को प्रवेश नहीं मिल सकता. फिर उन्होंने एक तरकीब आज़माई. वो रोज़ सुबह जाकर प्रधानाध्यापक के घर के गेट के सामने खड़ी हो जातीं. जब उनकी गाड़ी निकलती, तो रोज़ उन्हें सामने से हटाना पड़ता. रोज़ वो उनसे एक ही प्रार्थना करतीं. एक महीने बाद आख़िर वो तंग आ गए और कार से उतरकर उन्हें समझाने का प्रयत्न किया कि अगर तुम्हारी बेटी को प्रवेश दे भी दिया गया, तो तुम अपने बच्चे को गृहकार्य कैसे कराओगी?

अगले दिन मां ने उनके घर की घंटी बजाई. दरवाज़ा खुलने पर वे बोलीं, “आपको ये दिखाना था.” उनके हाथ में एक उत्तर पुस्तिका थी, जिसमें कक्षा आठ की गणित के हल किए हुए सवाल थे. फिर उन्होंने अपनी कहानी बताकर अपने पढ़ाई के प्रमाणपत्र दिखाए और प्रधानाध्यापक से पढ़ाई से संबंधित कुछ भी पूछने को कहा. वो उनके जुनून के आगे नतमस्तक हो गए और मुझे प्रवेश मिल गया.

मां ने अपने साथ लाए गहने बेचकर स्कूल का शुरुआती ख़र्च तो निकाल लिया, पर आगे के ख़र्च की समस्या के लिए उन्होंने आस-पास के लोगों के घरों में काम ढूंढ़ना शुरू किया. उन्हें एक घर में खाना बनाने का काम मिल गया. बच्चे तो आश्रम की कुछ और औरतों के भी थे. वे बगल के सरकारी स्कूल में पढ़ने भी जाते थे,  पर मां की बात और उनकी दिनचर्या कुछ अलग ही थी. मैं हमेशा खिली-खिली और साफ़-सुथरे प्रेस किए कपड़ों में दिखती. जब भी बाकी औरतों के आराम का समय होता, वो थोड़ी देर लेटकर झपकी ले रही होतीं, मां मेरे साथ-साथ और बच्चों को भी बिठाकर गृहकार्य करा रही होतीं या मुझे साथ लेकर पड़ोस के घर में खाना बनाने गई होतीं. अक्सर पूछने पर कि वो इतना काम बिना थके कैसे कर लेती हैं, वो बतातीं कि उनकी मां उनकी काम में मदद करती हैं.

एक दिन मां आश्रम की रसोई में थीं और मैं अपनी कोठरी में पढ़ रही थी. तभी एक प्रबंधक की कुदृष्टि मुझ पर पड़ गई. उसका मन मुझे चॉकलेट देने का हुआ. वो मुझे फुसलाकर अपने कमरे में ले गया और दरवाज़ा बंद करने चला, तो सामने मां को देखकर घबरा गया. वो ग़ुस्से में बोलीं, “मेरी बेटी को अकेला न समझना, उसकी नानी उसके साथ रहती हैं और जब भी वो समझती हैं कि वाणी को मेरी ज़रूरत है, मुझे बता देती हैं. यदि कभी मैं न भी उपलब्ध हुई, तो मेरी मां उसकी रक्षा कर सकती हैं.” मां की आंखों में अंगारे थे और कंठ में ज्वाला. उनकी ऊंचे स्वर में कही गई ये बातें औरों ने भी सुनी. उस दिन के बाद से किसी ने मेरे पास आने की हिम्मत नहीं की.

आसमान के नक्षत्र और घड़ी की सुइयां अपने ढंग से समय के परिवर्तन चक्र में मां के संघर्षों के साक्षी बनते रहे. जब वसंत में वल्लरियों में नए फूटते पल्लव और पुष्पों की नई कोपलें मन का हुलास बढ़ाते होते और अन्य औरतें खिड़की में बैठकर तनिक सुस्ताते हुए वासंती हवा में सराबोर हो रही होतीं, तब मां मुझे फल-मेवे तथा अन्य पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए अतिरिक्त कमाई हेतु लिफ़ा़फे बना रही होतीं. जब ग्रीष्म के ताप से आक्रांत धरती बरखा की रिमझिम फुहारों से शीतल हो रही होती और आलस भरी दोपहरी में काम से थककर सब नींद ले रहे होते, तब मां मेरी छोटी-बड़ी ज़रूरतें पूरी करने के लिए किसी के घर में खाना बना रही होतीं. जब अमराई में नए बौरों की सोंधास आम्रफलों की मीठी ख़ुशबू में बदलती होती, तब मां पागलों की तरह आश्रम में आनेवाले अजनबियों से बारहवीं के बाद की पढ़ाई के विकल्पों की जानकारी एकत्र कर रही होतीं. जिस प्रकार दीये अपनी प्रकृति के अनुसार हवाओं से जूझते हुए अंधकार को भगाने और किसी के जीवन में उजाला भरने के लिए अपनी देह को निमित्त बनाते हैं, ठीक उसी प्रकार मेरी मां अपनी संपूर्ण ओजस्विता के साथ दिन में उन्नीस घंटे काम करके अपनी संतति के व्यक्तित्व को संपूर्णता देने के यज्ञ में स्वयं के जीवन को होम करती रहीं. संकीर्ण लोगों का डर मां के पागलपन या उन पर किसी प्रेतात्मा की छाया होने की बात फैलाता रहा और उदार लोगों की संवेदना हमारा मार्गदर्शन और विभिन्न समस्याओं का समाधान करती रही.

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मैं रात में सोने से पहले मां की गोद में सिर रखकर अपने दिनभर के क्रियाकलापों के बारे में बताती. मां ने मुझे मेरे जन्म से पहले की बातें तब-तब टुकड़ों में बताईं, जब कभी मैंने किसी परीक्षा, प्रतियोगिता या संघर्ष के कारण निराशा या हताशा भरी बातें कहीं.

परिश्रम और जुझारूपन के गुण मैंने अपनी मां से विरासत में पाए थे, इसलिए विश्‍वविद्यालय में व्याख्याता बन सकी. यहीं मेरी मुलाक़ात प्रथम से हुई. धीरे-धीरे मुलाक़ात जान-पहचान में, फिर दोस्ती और फिर प्यार में बदली. नौकरी शुरू करते ही मैं मां को लेकर एक अच्छे किराए के घर में आ गई. प्रथम को भी मैंने शुरू में ही अपनी कहानी बताते हुए स्पष्ट कर दिया था कि मां सदैव मेरे साथ ही रहेंगी. उस दिन मां प्रथम की मां से मिलकर आईं, फिर अचानक ये सब क्या हो गया? समझ में नहीं आता.’

मेरा ध्यान अंतिम शब्दों पर अटक गया.

‘मां प्रथम की मां से मिलने गईं.’ और माजरा मेरी समझ में आ गया. अब इस केस को सुलझाने का एक ही उपाय था कि देविका का पक्ष प्रथम की मां के सामने रखा जाए. हालांकि ये सैद्धांतिक रूप से तो ग़लत कहा जाता था, एक प्रकार का छल था, पर देविका का भला इसी में था.

दूसरे दिन मानसिक अस्पताल में मैंने देविका का हाथ संपूर्ण स्निग्धता के साथ अपने हाथों में लेकर उसकी आंखों में सीधे झांकते हुए बस इतना ही कहा, “तुम मुझे धोखा नहीं दे सकतीं. जब तुम्हारी बेटी तुम्हें पहली बार मेरे पास इलाज के लिए लाई थी, तभी मैं समझ गई थी कि तुम्हें कोई बीमारी नहीं है. तुम चाहो, तो मुझसे अपने दिल की बात बांट सकती हो.”

इस पर जाने कितनी देर जीवन की सख़्त धूप से वाष्पित होकर मन के आकाश पर जमते गए बादल आंसुओं की बरसात करते रहे और उन्होंने कहना शुरू किया, “मैं अपनी कोख में नन्हीं-सी जान को लेकर घर से निकली, तो जानती थी कि मुझे अपनी और अपनी बच्ची के चारों तरफ़ एक सख़्त कवच बुनना होगा, जो मेरी और उसकी रक्षा समाज में इंसान के वेश में छिपे भेड़ियों से कर सके. ऐसे में घर छोड़ते समय मुझे मेरी मृत मां बहुत याद आईं, जो कहती थीं कि मैं रहूं या न रहूं, मेरा आशीर्वाद हर समय तेरा साथ देगा. मैंने अपनी मां की स्मृतियों से ही अपना कवच बुन लिया, लेकिन वही कवच मेरा दुश्मन बन गया. प्रथम की मां मुझे पागल समझकर मुझसे डरती हैं. वो मुझे साथ रखने को किसी भी प्रकार से तैयार नहीं हो रही हैं, इसीलिए वाणी और प्रथम में दूरियां बढ़ती जा रही हैं. मैं वाणी को अच्छी तरह जानती हूं. वो अपना प्यार छोड़ देगी, पर मां को नहीं छोड़ेगी. मुझे और कुछ नहीं सूझा, तो मैंने ये उपाय किया.” वो मेरे सामने हाथ जोड़कर बैठ गईं, “मैं जानती हूं कि एक जीवनसाथी के बिना जीवन गुज़ारने का दर्द क्या होता है. जब से प्रथम मेरी बेटी के जीवन में आया है, मैंने उसकी आंखों में जो चमक देखी है, उसके छिन जाने की कल्पना से भी सिहर उठती हूं. प्लीज़ आप मेरी बेटी की ख़ुशियां बचा लीजिए. उससे कह दीजिए कि उसकी मां को बाकी का सारा जीवन मानसिक अस्पताल में ही गुज़ारना होगा. वो ठीक नहीं हो सकती.”

मेरे साथ आए और पर्दे के पीछे बैठे वाणी-प्रथम और प्रथम की मां सब सुन रहे थे और किंकर्त्तव्यविमूढ़ से उस त्याग की मूरत को देख रहे थे, जो स़िर्फ एक मां थी. आख़िर प्रथम की मां उठीं और उन्होंने देविका को गले लगा लिया.

भावना प्रकाश

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कहानी- मोनालिसा (Short Story- Monalisa)

अचानक मुझे मम्मी के चेहरे में मोनालिसा के चेहरे का प्रतिबिंब दिखाई दिया. जैसे उनके चेहरे पर भी एक उदास-सी मुस्कुराहट थी और मन में जाने कितने दुख भरे राज़. यह क्या? मैंने मोनालिसा को देखा, तो उसमें मुझे अपनी मम्मी का चेहरा नज़र आया. मुझे मोनालिसा की उदास व रहस्यमयी मुस्कुराहट में अपनी मम्मी की मुस्कुराहट दिखाई दी. मेरी हथेलियां पसीने से भीग उठी थीं. यह आज मम्मी के चेहरे पर कौन-से भाव हैं, जो मेरे दिल तक सीधे पहुंच रहे हैं.

Kahani

पेरिस का लूव्र म्यूज़ियम देखने की बड़ी चाह थी मेरे मन में. अब से पहले कई बार मैं रजत से पूछ चुकी थी. “रजत, अंदर से क्यों नहीं देखा तुमने म्यूज़ियम अब तक? पेरिस में दो साल से रहकर भी नहीं गए?”

“दीदी, मुझे पेंटिंग्स का इतना शौक नहीं है न.”

मैंने उसे छेड़ा, “बस, तुम बाहर से ही लूव्र के साथ फोटो खिंचवाकर अपनी डीपी रखना.” रजत हंस पड़ा था. मम्मी, पापा और मैं यूरोप घूमने आए हुए हैं. रजत पेरिस में एमआयएम कर रहा है. आज हम लूव्र जा रहे हैं. विश्‍व के सबसे प्रसिद्ध  संग्रहालयों में से एक है लूव्र. लूव्र का पिरामिड पेरिस का सबसे मशहूर दर्शनीय स्थल है, जहां 35 हज़ार से ज़्यादा पेंटिंग्स और मूर्तियां हैं. यहां विन्ची की मोनालिसा शायद विश्‍व की सबसे मशहूर पेंटिंग है, माइकल एंजेलो का बनाया 2.15 मीटर ऊंचा स्टैचू उनकी महान कृतियों में से एक है. लूव्र पेरिस का सेंट्रल लैंडमार्क है. पेरिस आकर लूव्र तो जाना ही था.

पापा को पेंटिंग्स, मूर्तियां देखने का कभी ज़्यादा शौक तो नहीं रहा, पर यहां की कला देखकर कौन तारीफ़ किए बिना रह सकता है. पापा भी मुझे मंत्रमुग्ध से दिखे. पेंटिंग्स की ख़ूब फोटो ले रहे थे. उनकी नज़रों में प्रशंसा का भाव देख मुझे अच्छा लगा.

रजत… आज तो वह भी बोरियत के एक्सप्रेशंस नहीं दे पाया. इन पेंटिंग्स को देखकर वह भी हैरान था. कहने लगा, “मुझे तो लगा मैं आज बोर हो जाऊंगा, पर ये सब तो एक से एक मास्टरपीस हैं.”

और मुझे तो ये सब देखने में जो अतुलनीय आनंद आ रहा था… शब्दों में वर्णन नहीं कर सकती. मैंने एक नज़र मम्मी पर डाली. वे हम तीनों से काफ़ी पीछे थीं जैसे किसी जादू के घेरे में हर पेंटिंग के आगे खड़ी होतीं और अपलक पेंटिंग को निहारतीं. मैंने पापा को इशारा करके यह सीन दिखाया. पापा ने मम्मी को छेड़ा, “शुभा, हम भी हैं साथ में. हमें भूल गई क्या?”

मम्मी की नज़रें मुझसे मिलीं, तो मैंने नोट किया कि उनकी आंखों में नमी-सी है, जिसे वह बड़ी महारथ से सबसे छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही हैं. नाकाम ही कहूंगी, क्योंकि मैंने तो देख ही लिया था न. बेटी हूं उनकी. जैसे वे मेरी बात मेरे बिना कहे जान जाती हैं, तो उनकी आंखों की यह नमी मुझसे भला कैसे छुप पाती. मैं प्रत्यक्षतः तो चुप रही, पर अब मेरा ध्यान मम्मी की भावभंगिमाओं पर ही लगा था. रजत ने इतने में मेरे कान में कहा, “दीदी, भूख लगी है. यह तो बहुत बड़ा म्यूज़ियम है. खाना खा लें?” एक बज रहा था. मम्मी के खाने का भी टाइम है यह. उन्हें भी भूख लगी होगी.

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मैंने मम्मी से कहा, “मम्मी, लंच कर लें? फिर यहीं आ जाएंगे.”

कुछ गीले-नरम से शब्द मेरे कानों में पड़े, “धैर्या, एक बात मानोगी?”

“बोलो, मम्मी.”

“तुम तीनों जाकर खा लो, मैं बाद में खा लूंगी, यहां से हटने का मन ही नहीं है.”

पापा भी कहने लगे, “नहीं शुभा, लगातार खड़े रहने और चलने से तुम्हारा बैकपेन बढ़ सकता है. तुम्हारा थोड़ा बैठना ज़रूरी है.”

“… पर एक बार इस विंग से एग्ज़िट कर दिया, तो शायद आ नहीं पाएंगे और अभी तो बहुत सारी पेंटिंग्स बची हैं, कहीं देखने से रह न जाएं.”

रजत ने कहा, “इतनी पेंटिंग्स हैं मम्मी, थोड़ी-बहुत रह भी गई, तो कोई बात नहीं.”

मम्मी परेशान-सी दिखीं. “ना… ना… बेटा, कुछ रह न जाए. धैर्या, प्लीज़ तुम तीनों जाओ, खा लो. मैं बाद में खा लूंगी बेटा.”

मैंने कहा, “ठीक है मम्मी, बाद में चलते हैं. बस थोड़ा जल्दी कर लो आप, अभी यह विंग काफ़ी बचा है.”

यह सुनकर मम्मी ने बहुत उत्साह से आगे क़दम बढ़ा दिए. बेहद ख़ूबसूरत कलाकृतियों के बीच कुछ समय और बीत गया. हमेशा समय पर खाने-पीनेवाली मम्मी को आज भूख-प्यास का होश ही नहीं था. लंच करते हुए भी उनके प्रफुल्लित चेहरे पर ज़रा भी थकान नहीं थी. नहीं तो अब तक हम यूरोप में जहां-जहां घूमे थे, मम्मी कभी थककर बैठ जातीं, तो कभी जल्दी से देखकर निपटा देतीं, पर लूव्र में तो यह मेरी कोई और ही मां थी, उनके चेहरे में कुछ तो ऐसा था, जो मैंने लंबे समय से नहीं देखा था. उसके बाद हम उस विंग में गए, जहां विन्ची की विश्‍व प्रसिद्ध मोनालिसा का चित्र बाहर ही लगा हुआ था. उस हॉल में भीड़ सबसे ज़्यादा थी. एक दीवार पर मोनालिसा थी और उसके सामने की दीवार पर द लास्ट सपर. पेंटिंग्स पर नज़र डालकर मैंने मम्मी को देखा. भीड़ में पेंटिंग के आगे जाकर खड़ी मम्मी पेंटिंग को एकटक देखती हुई. उनकी आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बहे चली जा रही थी. मेरे क़दम वहीं जड़ हो गए. मम्मी कभी मोनालिसा को देखतीं, तो कभी मुड़कर द लास्ट सपर को. जैसे उन्हें समझ ही न आ रहा हो कि पहले और ज़्यादा किसे देखें. रजत और पापा अपने-अपने फोन से तस्वीरें लेने में व्यस्त हो गए थे. मम्मी मोनालिसा को कई दिशाओं से देख रही थीं और मैं अपनी मां को… कभी इधर से, कभी उधर से चेहरे पर बच्चों जैसा भोलापन लिए जैसे किसी बच्चे को अचानक कई चीज़ें देखकर समझ नहीं आता न कि पहले कौन-सी चीज़ हाथ में ले. बच्चा कभी कुछ उठाता है, कभी कुछ. ऐसी ही स्थिति मम्मी की थी. इतनी भीड़ में कभी किसी पेंटिंग के सामने खड़ी होतीं, कभी किसी के. आंसू उनके गाल पर बहे चले जा रहे थे. अब मुझसे रुका नहीं गया. मम्मी के कंधे पर हाथ रखकर पूछा, “यह क्या मम्मी? रो क्यों रही हो? देखो कोई और रो रहा है यहां? तबीयत तो ठीक है न?”

मम्मी के आंसू और वेग से बहने लगे. उत्साह के आवेग से रुंधे कंठ से निकला, “धैर्या, ये मोनालिसा… मैंने इसकी पढ़ाई की है और ये लास्ट सपर… मुझे आज तक याद था कि इसमें ऊपर तीन चिड़िया हैं और यह कुत्ता…देखो इसके कलर्स देखो. मैंने सब पढ़ा है ये. कभी सोचा ही नहीं था कि इन पेंटिंग्स को जीवन में अपनी आंखों से देखूंगी. देखो धैर्या, कितनी सुंदर कलर स्कीम. तुम्हें पता है, हमने पढ़ा है यह सब… ये बेहतरीन कलाकार और मोनालिसा को देखो जैसे अभी कुछ कहेगी. इसे बनाने की हम बहुत कोशिश करते थे और फिर कितना हंसते थे. इसके तो आसपास भी नहीं फटक सके हम. दिनभर इसके स्केच बनाने की कोशिश करते थे हम. मेरी एक स्केच बुक तो इसी की प्रैक्टिस से भरी थी, पर ऐसी कहां बनती.” अचानक भीड़ से मम्मी संभलीं. माहौल का आभास हुआ, तो चुप हो गईं. ‘थोड़ा और देख लूं’ कहकर भीड़ में और आगे जाकर देखने की कोशिश करने लगीं.

मैं तो पाषाणवत् खड़ी की खड़ी रह गई. रजत और पापा इधर-उधर हो गए थे. मैं एक कोने में जाकर मम्मी को ही देखते खड़ी हो गई. मेरी आंखें भी भर आई थीं, यह आभास मुझे अभी हुआ था.

यह क्या हो गया हमसे. ड्रॉइंग एंड पेंटिंग में एमए किया था मम्मी ने. मम्मी कितनी पेंटिंग्स बनाती थीं. हमें पढ़ाते हुए बैठे-बैठे हमारी किसी भी नोटबुक के आख़िरी पेज पर स्केच बनाती रहती थीं. स्कूल में बच्चे भी पूछते थे, किसने बनाया. हम गर्व से बताते थे मम्मी ने. मम्मी ने ही तो हमेशा हमारे ड्रॉइंग के होमवर्क किए थे और हमने क्या किया? उनका यह शौक घर और हमारी ज़िम्मेदारियों के बीच कब पीछे छूटता चला गया, हममें से किसी ने परवाह भी नहीं की. पूछा भी नहीं किसी ने कि मम्मी अब क्यों नहीं कुछ बनातीं? क्या अब उनका मन नहीं होता? वे घर के ही काम निपटाती रहीं. उनका एक ही तो शौक था. वह भी खो गया. हम सब कैसे भूल गए कि वे भी एक कलाकार हैं. अपनी कला को गुम होते देख कैसे उनका मन चैन पाता रहा होगा? आज मुझे याद आ रहा है कि कैसे तबीयत ख़राब होने पर भी वे मेरा ड्रॉइंग का होमवर्क करने बैठ गई थीं. कहा था, “अरे, मैं कभी कुछ ड्रॉ करने से थक सकती हूं क्या? जल्दी बताओ क्या बनाना है. बहुत दिन से कुछ नहीं बनाया.”

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जो हमारा ड्रॉइंग का काम करने के लिए बीमारी में भी आतुर हो उठती थीं, उन्हें और कुछ बनाने का मौक़ा क्यों नहीं मिला? उनके अंदर का कलाकार बस हमारा होमवर्क करने में ही संतोष पाता रह गया. बड़ी भूल हुई हमसे. अचानक मुझे मम्मी के चेहरे में मोनालिसा के चेहरे का प्रतिबिंब दिखाई दिया. जैसे उनके चेहरे पर भी एक उदास-सी मुस्कुराहट थी और मन में जाने कितने दुख भरे राज़. यह क्या? मैंने मोनालिसा को देखा, तो उसमें मुझे अपनी मम्मी का चेहरा नज़र आया. मुझे मोनालिसा की उदास व रहस्यमयी मुस्कुराहट में अपनी मम्मी की मुस्कुराहट दिखाई दी. मेरी हथेलियां पसीने से भीग उठी थीं. यह आज मम्मी के चेहरे पर कौन-से भाव हैं, जो मेरे दिल तक सीधे पहुंच रहे हैं. अचानक एक धुंधली-सी याद आई, जब मैं एक दिन स्कूल से लौटी थी, तो मम्मी अपना पेंटिंग का सामान रोते हुए स्टोर रूम में रख रही थीं. नहीं, बात कुछ और थी. यह घर की व्यस्तता नहीं थी, जिसने मम्मी को उनकी कला से दूर किया था. यह कुछ और था. हां, याद आ रहा है. मैंने मम्मी से तब पूछा था कि यह सामान यहां क्यों रख रही हो. मम्मी ऐसे ही मुस्कुराई थीं. हां, ऐसी ही हंसी थी… मोनालिसा जैसी. कहा था, “अब कहां टाइम मिलता है.” उस दिन मुझे खाना खिलाते हुए भी मम्मी अपने आंसू पोंछ रही थीं. क्यों रोई थीं मम्मी उस दिन? क्यों नहीं उसके बाद कभी कुछ बनाया उन्होंने? मैं जानकर रहूंगी कि उस दिन हमारे स्कूल जाने के बाद क्या हुआ था घर में? हमें यह ग़लती सुधारनी होगी. मैं मन ही मन बहुत कुछ सोच चुकी थी. हम चारों इकट्ठा हुए. दूसरे हॉल में जाना था, जहां एक से एक लैंडस्केप्स थे. मम्मी फिर ख़ुशी से झूम उठीं. यहां इस समय ज़्यादा भीड़ नहीं थी. मैंने बात छेड़ी. “मम्मी, इन सबमें कौन-सी बेस्ट है?” मम्मी ने हर तरफ़ देखकर बताया, “यह वाली.”

“मम्मी, ड्रॉइंगरूम के लिए ऐसी बनाओगी?” मम्मी ने एक ठंडी सांस ली, “पता नहीं, क्या कहूं?”

“कहना क्या है. जाते ही ऐसी बनाना. घर के हर रूम में आपकी पेंटिंग होनी चाहिए. हमारे घर में भी एक कलाकार है और हम यहां दूसरे की वाहवाही कर रहे हैं.” मेरे कहने के ढंग पर मम्मी हंस पड़ीं. बोलीं, “देखेंगे.”

मैंने पापा और रजत को जल्दी से इशारा कर दिया था. पहले दोनों कुछ समझे नहीं, फिर मैंने उन्हें आंखों ही आंखों में बहुत कुछ कहा, जिसे दोनों ने सुन लिया. दोनों ने कहा, “हां, ज़रूर बनाना.”

रजत ने कहा, “हमें आपके जितना इंटरेस्ट नहीं है तो क्या हुआ. मैं जब अगली बार इंडिया आऊं, तो आपकी पेंटिंग ड्रॉइंगरूम में होनी चाहिए.” मम्मी ने पापा को देखा. वे भी फ़ौरन बोले, “हां, शुभा, बहुत सालों से तुमने कुछ नहीं बनाया. अब एक मास्टरपीस हो ही जाए.” मम्मी ने इस बात पर जैसे पापा को देखा, मुझे फिर मोनालिसा की मुस्कुराहट याद आई. कुछ था मम्मी की मुस्कुराहट में. क्या था, मुझे जानना था.

मैंने उन्हें कब ऐसा देखा था, याद नहीं. मेरे दिल में जैसे कुछ उमड़ा जा रहा था. कैसी होती हैं मांएं. घर-बच्चों में अपने ही दिल को क्या अच्छा लगता है भूल जाती हैं. कभी ज़िक्र भी नहीं करतीं. कभी जतलाती भी नहीं कि उनका क्या कब छूटता चला गया, पर हमें उन्हें अब याद दिलाना था. मैंने बहुत कुछ सोच लिया था. जाते ही उनके लिए कलर्स, कैनवास. सब सामान आना था यह तय था. पर मुझे उससे पहले बहुत कुछ जानना था. डिनर करते हुए जब हम चारों साथ बैठे, तो टॉपिक लूव्र ही था. हम चारों को ही लूव्र बहुत अच्छा लगा था. मैंने बात छेड़ ही दी, “मम्मी, आपने पेंटिंग बनाना क्यों छोड़ा था?” मम्मी के हाथ का निवाला हाथ में ही रह गया. उन्होंने पापा को देखा. मुझे पलभर में ही मम्मी की आंखों में बहुत कुछ दिखा… दुख, निराशा, नमी. मेरी और रजत की आंखें भी पापा पर टिक गईं.

रजत ने कहा, “हां मम्मी, बताओ न.” मम्मी की आंखों में पापा को जो भी कुछ नज़र आया होगा, पापा ने गंभीर स्वर में शर्मिंदगी के साथ कहा, “मैं बताता हूं. यह सब मेरी ग़लती है. तुम्हारे दादा-दादी शुभा के पेंटिंग के इस शौक से नफ़रत करते थे. अम्मा को लगता था यह बेकार में पैसे उड़ानेवाला शौक है. उन्हें पता नहीं क्यों, शुभा पर ग़ुस्सा आता रहता था. बहुत बाद में मैंने महसूस किया अम्मा शुभा के गुणों से जलती थीं. शुभा में जो गुण हैं, वे अम्मा में नहीं थे. इतना धैर्य, त्याग उनमें कहां था. मैं उनकी इकलौती संतान था. वे शुभा की पेंटिंग, उसके हुनर को मेरे सामने इतने बुरे रूप में रखतीं कि एक दिन मैं उन पर अंधविश्‍वास कर शुभा की इस कला का अपमान कर बैठा. अम्मा ने मेरे सामने इसकी अधूरी पेंटिंग फाड़कर फेंक दी. मैं चुपचाप देखता रहा. अम्मा को कुछ नहीं कहा. उस दिन शुभा ने जिन नज़रों से मुझे देखा था, मैं अंदर तक शर्मिंदा हो गया था, पर अपने माता-पिता की ग़लत बातों के ख़िलाफ़ बोलने की हिम्मत कभी नहीं कर पाया.

शुभा ने उसी दिन अपना सामान उठाकर स्टोर रूम में रख दिया, फिर कभी कुछ नहीं बनाया. जो बच्चे शुभा से पेंटिंग्स सीखने आते थे, उन सबको शुभा ने अगले दिन ही सिखाने से भी मना कर दिया. मैं शुभा का जीवनसाथी हूं, उसका पति हूं, मैं अपने पति होने का फर्ज़ ठीक से नहीं निभा पाया. मैंने अपनी पत्नी के गुणों की कदर नहीं की. उसका दिल दुखाया है. सालों यह मन ही मन कितना जली होगी. एक कलाकार को अपनी भावनाएं व्यक्त करने से रोका मैंने. कैसे जी होगी यह. फिर भी कभी कोई शिकायत नहीं की. अम्मा-बाबूजी नहीं रहे, पर शुभा ने फिर कभी ब्रश नहीं उठाया. मैंने भी नहीं कहा, पर आज बच्चों के सामने तुमसे माफ़ी मांगता हूं शुभा.” पापा ने कहते-कहते मम्मी का हाथ पकड़ लिया.

“शुभा, जितना समय निकल गया, उसके लिए मुझे माफ़ कर दो. अब घर जाकर अपनी इस कला को नई ऊंचाइयों पर ले जाओ. क्लासेस लो, पेंटिंग्स बनाओ, सब कुछ करो, जो तुम्हें करना था. हम सब तुम्हारे साथ हैं. आज इतना अच्छा दिन था… लूव्र का दिन!  आज के दिन मुझे माफ़ कर दो.” मम्मी इस आख़िरी बात पर मुस्कुराईं, तो मुझे लगा मेरी मम्मी, मेरी मोनालिसा की इस मुस्कुराहट के आगे सारी दुनिया की मुस्कुराहट फीकी है. इस मुस्कुराहट में बहुत कुछ था, जो मेरे मन को पुलकित कर गया था.

Poonam ahmed

पूनम अहमद

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कहानी- एम्पटी नेस्ट सिंड्रोम (Story- Empty Nest Syndrome)

“जीवन, बस कुछ रिश्तों तक सीमित नहीं होता कि उनके दूर हो जाने से सब

ख़त्म हो जाए. जीवन बहुत मूल्यवान है. इसका विस्तार करो. यह अवसाद से घिरने के लिए नहीं है. ईश्‍वर के दिए इस अनुपम उपहार का सम्मान करो, प्रेम करो.” एक गहरी सांस लेकर प्रकाश चुप हो गए.

Kahani

अरे भई, चाय मिलेगी कि नहीं आज की तारीख़ में.” अख़बार से नज़रें हटाकर रसोईघर की टोह लेते हुए प्रकाश ने ऊंची आवाज़ में पूछा.

कोई जवाब नहीं आया. प्रकाश रसोईघर के दरवाज़े की तरफ़ देखते रहे. कुछ पलों के बाद दोबारा आवाज़ देने ही वाले थे कि आशा एक ट्रे में चाय के दो कप लिए आते दिखी. टेबल पर ट्रे रखकर आशा ने एक कप प्रकाश को दिया और दूसरा कप ख़ुद लेकर सामनेवाले सोफे पर बैठ गई.

सुबह बड़ी ख़ुशगवार थी. अक्टूबर की सुबहें वैसे भी बड़ी मनोहारी होती हैं. बरसात के बाद का धुला-धुला आसमान,

खिली-खिली प्रकृति, ठंड की हल्की ख़ुमारी ओढ़े हवा और पंछियों की उन्मुक्त विभोर कर देनेवाली चहचहाट, नर्म पड़ती धूप.

प्रकाश का मन ख़ुश हो गया. वो आशा से बातें करने लगे. मौसम की ख़ूबसूरती की बातें, बीते वर्षों की बातें, प्रकृति में हुए बदलाव की बातें, आशा के भाई-बहनों के बारे में चर्चा आदि, लेकिन आशा का मन किसी भी चर्चा में नहीं रमा. प्रकाश की बातें वह बड़े ऊपरी मन से सुन रही थी और कभी-कभार गर्दन हिला देती या ‘हूं-हां’ कर देती. चाय ख़त्म होने के साथ ही प्रकाश की बातों का स्टॉक भी ख़त्म हो गया. आशा भी खाली कप और ट्रे उठाकर वापस रसोईघर में चली गई.

प्रकाश एक गहरी सांस भरकर कुछ पल सोच की मुद्रा में गंभीर होकर बैठे रहे. फिर आहिस्ता से उठकर मॉर्निंग वॉक पर निकल गए. पिछले कई महीनों से वे देख रहे थे कि आशा बहुत चुप-चुप-सी रहने लगी है. बहुत ज़्यादा बातें करने की आदत तो वैसे भी आशा की कभी नहीं रही, लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर छाई प्रसन्नता और संतोषभरी मुस्कान से घर में एक उजाला-सा छाया रहता था. बात भले ही कम करती थी, तो क्या हुआ, श्रोता तो बहुत अच्छी थी. ध्यान और रुचि से सामनेवाले की बात सुनती थी. पर अब इतने बेमन से सुनती है कि प्रकाश आहत-सा महसूस करने लगते हैं. कोई कुछ बात करना चाहता है और सामनेवाले को मानो आपमें और आपकी बातों से कोई सरोकार ही नहीं है. हार कर प्रकाश भी चुप हो जाते. आशा की मन:स्थिति को वे भी समझते थे. जब से दोनों बेटे नौकरी करने के लिए बाहर सेटल हुए हैं, तब से घर बिल्कुल वीरान लगने लगा है. दो साल हो गए बड़े बेटे को बैंगलुरू में सेटल हुए और एक साल हो गया है छोटे बेटे को हैदराबाद में सेटल हुए. छोटा बेटा तो काम के सिलसिले में कंपनी की तरफ़ से 10 महीनों से जापान गया हुआ है. जब दोनों पढ़ाई कर रहे थे, तब परीक्षा के बाद छुट्टियों में वे घर आते रहते थे, लेकिन नौकरी लगने के बाद काम की व्यस्तता इतनी बढ़ गई है कि अब तो  घर आना भी बंद हो गया. तभी से आशा चुप-चुप रहने लगी है. पहले प्रकाश ने यह सोचकर ध्यान नहीं दिया कि कुछ दिनों में आशा को भी आदत हो जाएगी इन नई परिस्थितियों की, लेकिन अब उन्हें चिंता होने लगी. आशा का न काम में मन लगता और न तो वह ठीक से खाना खा रही है. ऐसे तो बीमार पड़ जाएगी.

अपनी सोच में डूबे वे कब पासवाले पार्क में पहुंच गए, उन्हें पता ही नहीं चला. जब पीछे से वीरेंद्र ने आवाज़ लगाई, तब प्रकाश की तंद्रा भंग हुई. वीरेंद्र पास की बिल्डिंग में ही रहते थे और रोज़ सुबह पार्क में आकर मिलते. दोनों आज भी रोज़ की तरह पार्क के चक्कर लगाने लगे और फिर एक बेंच पर बैठकर बातें करने लगे. दो मिनट की बातचीत में ही वीरेंद्र ने भांप लिया कि प्रकाश कुछ उदास है.

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“क्या बात है यार! सब ठीक तो है. कुछ उदास लग रहे हो?” वीरेंद्र ने आत्मीयता से पूछा.

“आशा को लेकर परेशान हूं थोड़ा.” प्रकाश ने बोझिल होकर जवाब दिया.

“अरे, क्या हुआ भाभी को?”

“महीनों हो गए, डिप्रेस जैसी हो गई है. न बात करती है, न ही कुछ खाती-पीती है ढंग से. अजीब-सी होती जा

रही है दिन-ब-दिन. पांच साल की सर्विस और बची है मेरी, लेकिन समझ नहीं आ रहा है कि नौकरी करूं या नहीं.” प्रकाश के स्वर में चिंता थी.

वीरेंद्र ने कुछ देर सोचने के बाद कहा, “मेरा एक मित्र मनोवैज्ञानिक है. हम चलकर उससे बात कर सकते हैं. शायद वह कुछ हल बताए इस समस्या का. पहले हम दोनों ही मिल आते हैं, फिर अगर ज़रूरत पड़ी, तो भाभी को भी ले जाएंगे. डॉक्टर की तरह नहीं एक मित्र की तरह ही बात करेंगे.”

वीरेंद्र का सुझाव प्रकाश को पसंद आया. दूसरे दिन ही दोनों डॉ. दीपेश के पास बैठकर आशा की समस्या पर विचार कर रहे थे. सारी बातें ध्यानपूर्वक सुनने के बाद दीपेश ने कहना शुरू किया.

“महत्वाकांक्षी बच्चों के शहर या देश के बाहर सेटल हो जाने के कारण शहरों की महिलाएं इस अवसाद का शिकार होने लगी हैं. इसे ‘एम्पटी नेस्ट सिंड्रोम’ कहते हैं. 40 से ऊपर की महिलाएं, जो शिक्षित भी हैं, लेकिन विवाह के बाद उन्होंने अपना ध्यान स़िर्फ परिवार और बच्चों पर पूरी तरह केंद्रित कर दिया था. पति के नौकरी या व्यवसाय में व्यस्त हो जाने तथा बच्चों की शिक्षा या नौकरी के चलते बाहर सेटल हो जाने के कारण एक बड़ा वैक्यूम या शून्यता महसूस करती हैं, जिसमें उनकी असली पहचान खो जाती है. वे अचानक महसूस करने लगती हैं कि उनकी कोई वैल्यू ही नहीं है. वे अकेली हो गई हैं. साथ ही इस उम्र में हार्मोनल चेंजेस भी अपना प्रभाव डालते हैं.”

“हां, आजकल एकल परिवार के चलन के बाद से महिलाओं के अकेले रह जाने की समस्या और भी बढ़ गई है. पहले संयुक्त परिवार होने से स्त्रियां घर में ही अपनी समस्याओं, भावनाओं को

एक-दूसरे से कह-सुनकर अपना मन हल्का कर लेती थीं. अपने बच्चे बाहर भी चले गए, तब भी अन्य सदस्यों के रहने से वे शारीरिक-मानसिक रूप से व्यस्त रहती थीं, तो अकेलेपन या अवसाद से दूर रहती थीं.” वीरेंद्र ने कहा.

“हां सही है. ‘एम्पटी नेस्ट सिंड्रोम’ आधुनिक एकल परिवारों की ही देन है. दरअसल, अधिकांश महिलाओं की आदत होती है कि वे अपने लिए कुछ नहीं रखतीं. सब कुछ पति-बच्चों में बांट देती हैं. वे भूल जाती हैं कि वे ख़ुद भी ख़ुद का प्यार पाने की सबसे पहली अधिकारी हैं. वे सारा प्यार तो परिवार को बांट देती हैं. नतीजा, उनके जाने के बाद वे शून्य से घिर जाती हैं, क्योंकि उन्होंने स्वयं से प्यार करना, अपने लिए जीना कभी सीखा ही नहीं.” दीपेश ने बताया.

“तो इसका हल क्या है? आशा को इस अवसाद से कैसे उबारूं?” प्रकाश ने परेशान होकर पूछा.

“कोई पुरानी हॉबी हो, जो व्यस्तता के चलते छूट गई हो. क्लब आदि जॉइन करे, ताकि अधिक से अधिक व्यस्त रह सके, लेकिन यह सब करने से पहले ‘लव योर सेल्फ’ यानी ‘ख़ुद से प्यार करो’ की सोच विकसित करना ज़रूरी है. मात्र त्याग की मूर्ति बने रहने से कुछ नहीं होगा.” दीपेश ने बताया.

उसे धन्यवाद देकर वीरेंद्र और प्रकाश बाहर निकले. प्रकाश परेशान थे. आज तक तो उन्हें पता ही नहीं कि आशा की कोई ऐसी हॉबी भी है. कभी किसी चीज़ में रुचि लेते देखा भी नहीं उसे, सिवाय घर के कामों और बच्चों के. न संगीत आदि सुनने में ही कभी दिलचस्पी देखी. ऐसे में उसके लिए क्या किया जाए. ‘लव योर सेल्फ’ की सोच कैसे पैदा की जाए उसके भीतर? जब वह ख़ुद से प्यार करना सीखेगी, तभी ख़ुद की पसंद का कोई काम करके ख़ुश रह पाएगी. पर यही तो सबसे कठिन था, उसे ख़ुद से प्यार करना कैसे सिखाया जाए? इस समस्या से भी वीरेंद्र ने ही उसे बाहर निकाला.

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“मेरे एक आत्मीय परिचित हैं राठौड़जी. आयु में बड़े हैं, लेकिन पति-पत्नी दोनों ही बहुत ज़िंदादिल और मिलनसार हैं. भाभीजी को उनसे मिलवाने ले चलते हैं.” वीरेंद्र ने कहा.

“लेकिन उससे क्या होगा?” प्रकाश ने पूछा.

“तुम चलो तो.” वीरेंद्र ने ज़ोर दिया.

दूसरे दिन वीरेंद्र, प्रकाश और आशा को एक क्लब में ले गया और राठौड़जी तथा उनकी पत्नी से मिलवाया. दोनों इतने ख़ुशमिज़ाज थे कि बात-बात पर ठहाके लगाते. उनके आसपास के सभी लोग ख़ुश दिख रहे थे. दोनों आशा से बहुत आत्मीयता से मिले. उनके कारण पूरे क्लब का माहौल ख़ुशनुमा रहता. ऐसा लग रहा था जैसे दोनों मुक्त हाथों से सबको ख़ुशियां बांट रहे थे. दोनों के चेहरों पर एक तेजस्वी उजाला था. आशा वहां भी अनमनी-सी ही रही. न हंसी, न किसी गतिविधि में शामिल हुई. दो-तीन घंटे बाद प्रकाश उसे लेकर घर आ गए.

“कैसा लगा मिस्टर राठौड़ और उनकी पत्नी से मिलकर? कितने ख़ुशमिज़ाज हैं न दोनों. ज़िंदादिल, जीवन के आनंद से भरपूर.” प्रकाश ने कहा.

“जब जीवन में कोई तनाव, परेशानी,

अकेलापन न हो, तो कौन भला ख़ुश न रहेगा.” आशा उदास स्वर में बोली.

“तुम्हें पता है आशा, वीरेंद्र ने बताया मुझे क्लब में. मिस्टर राठौड़ का बड़ा बेटा भारतीय सेना में मेजर था. डेढ़ बरस पहले सीमा पर तैनात था. आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो गया. 28 वर्ष की अल्पायु में उनका जवान बेटा चल बसा. क्या उन्हें दुख नहीं होगा बेटे की मृत्यु का?” प्रकाश दर्दभरे स्वर में बोले.

आशा अचानक स्तब्ध-सी हो गई.

“और पिछले आठ माह से उनका छोटा बेटा भी कश्मीर के अति संवेदनशील इलाके में तैनात है, जहां क़दम-क़दम पर मौत का ख़तरा सिर पर मंडराता रहता है. तुम्हारे दोनों बेटे तो अच्छी नौकरियों पर ख़ुशहाल हैं ना, सुरक्षित हैं. तब भी तुम उनकी याद में अवसाद से घिरी हो. बताओ क्या तुम्हारा दर्द सच में राठौड़जी और उनकी पत्नी के दर्द से बड़ा है? प्रकाश ने प्रश्‍न किया.

आशा  का  सिर  झुक  गया  और  वह कुछ बोल नहीं पाई.

“तब भी दोनों इतने प्रसन्न रहते हैं कि स़िर्फ ख़ुद ही नहीं, दूसरों को भी ख़ुशियां बांटते हैं, क्योंकि उन्होंने प्रेम का मार्ग चुना ख़ुद के लिए. वे स्वयं से प्रेम करते हैं, तभी वे दूसरों को भी प्रेम करके ख़ुश रहते हैं. वे जीवन का मूल्य समझते हैं, तभी उन्होंने ख़ुद को अपने परिवार तक सीमित, संकीर्ण न रखकर प्रेम बांटकर अपना परिवार बढ़ा लिया. वे न जाने कितने बेसहारा लोगों को सहारा देते हैं. दुखियों को सांत्वना देते हैं. जीवन, बस कुछ रिश्तों तक सीमित नहीं होता कि उनके दूर हो जाने से सब ख़त्म हो जाए. जीवन बहुत मूल्यवान है. इसका विस्तार करो. यह अवसाद से घिरने के लिए नहीं है. ईश्‍वर के दिए इस अनुपम उपहार का सम्मान करो, प्रेम करो.” एक गहरी सांस लेकर प्रकाश चुप हो गए.

जब सुबह प्रकाश की नींद खुली, तो उन्होंने देखा कि घर में उनके फेवरेट पुराने गाने बज रहे थे. वे हाथ-मुंह धोकर आए, तो आशा चाय की ट्रे लेकर खड़ी थी. ट्रे में सुंदर नए कप रखे थे, जिन पर सूरजमुखी के फूल बने हुए थे. आशा ने भी सुंदर चटक रंग की साड़ी पहनी थी. उसके चेहरे की मुस्कुराहट ने पिछले महीनों की सारी अवसादपूर्ण मलीनता को धो दिया.

“सुनो, आज बुक स्टोर चलेंगे. मुझे किताबें, ख़ासकर बंगाली लेखकों के उपन्यास पढ़ने का बहुत शौक़ था. शरत बाबू, आशापूर्णा देवी को अब ़फुर्सत से पढ़ना चाहती हूं और हर छुट्टीवाले दिन हम भी क्लब चला करेंगे. आपने सही कहा, अपने बच्चों की ज़िम्मेदारी से मुक्त होने के बाद समाज के विकास में योगदान देना ही जीवन की सार्थकता है. बच्चे तो अपने नए जीवन में ख़ुश हैं और हम उनकी याद में अवसाद में घिर जाएं, ये ठीक नहीं है. जीवन का और भी कोई उद्देश्य होना चाहिए. अब हम भी राठौड़ दंपति के साथ मिलकर काम करेंगे.” आशा उत्साह से बोली.

“हां ज़रूर, जैसा तुम कहो. आज तुम्हें फिर पुराने रूप में देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है.”

प्रकाश ने कहा तो आशा ने मुस्कुराकर उनके कंधे पर सिर रख दिया. खिड़की से आती सुनहरी, उजली किरणें पूरे कमरे में फैल गईं.

Dr. Vineeta Rahurikar

डॉ. विनीता राहुरीकर

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Kids Story: जलपरी और दो चोर (Kids Story: Jalpari And Two Thieves)

 

Kids Story

Kids Story: जलपरी और दो चोर (Kids Story: Jalpari And Two Thieves)

दूर किसी जगह पर एक नीली झील थी, जहां एक जलपरी रहती थी. उस जलपरी का नियम था कि वो रोज़ शाम को कुछ समय के लिए बाहरी दुनिया में आती थी. कुछ समय बिताती और फिर नियमित समय पर लौट जाती. एक बार वहां से दो चोर जा रहे थे और उन्होंने जलपरी को देख लिया. उसे देखकर दोनों ने एक योजना बनाई कि क्यों न इसे पकड़कर हम शहर में बेच आएं, जिससे हमें अच्छे ख़ासे पैसे मिलेंगे.

दोनों ने मछली पकड़नेवाला जाल ख़रीदा और अगले दिन झील के किनारे इंतज़ार करने लगे. तभी उनकी नज़र एक लड़के पर पड़ी. वो भी वहां मछलियां पकड़ने आया था. दोनों चोरों ने उस लड़के से कहा कि यहां से भाग जाए, क्योंकि यह उनका इलाका है. उस लड़के ने कहा कि इस झील का किनारा काफ़ी दूर तक फैला है और यह बहुत बड़ी झील है, तो आप लोग यहां मछलियां पकड़ो, मैं थोड़ी दूर पर जाकर मछलियां पकड़ता हूं.

 

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उसकी बात सुनकर दोनों चोरों को बहुत ग़ुस्सा आया. उन्होंने उस लड़के से कहा कि वो यहां से तुरंत चला जाए, वरना उसकी पिटाई होगी. वो लड़का उन दोनों के इरादों से अंजान था, उसे हैरानी हुई, इसलिए वो थोड़ी दूर जाकर पेड़ के पीछे छिप गया.

Mermaid

थोड़ी देर बाद वो जलपरी बाहर आई, उसे देखकर लड़का भी हैरान हो गया. वो जलपरी बेहद ख़ूबसूरत थी. दोनों चोरों ने जलपरी पर जाल फेंक दिया. यह देखकर वो लड़का वहां आ गया. एक चोर ने अपने साथी से कहा कि तुम जलपरी को देखो, मैं इस लड़के को ठिकाने लगाता हूं. लड़के के पास एक बड़ा सा डंडा था, जिससे उसने चोर की ख़ूब पिटाई की. अपने साथी को पिटता देख, दूसरा चोर भी मदद के लिए आ गया. मौक़ा देखकर जलपरी जाल से छूट गई और झील में चली गई.

दोनों चोर मिलकर उस लड़के को पीटने लगे कि तभी वहां एक बड़ा-सा मगरमच्छा आ गया और दोनों चोरों पर हमला कर दिया. किसी तरह मगर से बचकर दोनों चोर भाग खड़े हुए.

दरअसल, उस मगर को जलपरी ने ही लड़के की मदद के लिए भेजा था. इस तरह वो लड़का रोज़ वहां आने लगा और जलपरी भी रोज़ उससे मिलने लगी. दोनों में बहुत ही गहरी दोस्ती हो गई.

सीख: हमेशा दूसरों की मदद के लिए आगे आना चाहिए. किसी को मुसीबत में देखकर भागना नहीं चाहिए, बल्कि ग़लत लोगों के इरादे भांपकर सही निर्णय लेना चाहिए.

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कहानी- आस्था और विश्‍वास (Short Story- Aastha Aur Vishwas)

प्रांजलि की आस्था और विश्‍वास की चमक के आगे मेरा चेहरा निस्तेज पड़ गया. एक ही मां की बेटियां होते हुए भी उसकी सोच इतनी सकारात्मक और मेरी… ग्लानि हो रही थी मुझे स्वयं पर. बड़ी होने के बावजूद मैं स्वयं को प्रांजलि से छोटा महसूस कर रही थी.

Hindi Kahani

 

“सही और ग़लत की कोई निश्‍चित परिभाषा नहीं होती है, न ही बातों को तोलने का कोई निर्धारित मापदंड होता है. जो बात एक इंसान के लिए सही होती है, हो सकता है वही बात दूसरे इंसान को ग़लत लगे.”

हल्के-फुल्के ढंग से कही हुई मेरी इस बात पर विनीत चिढ़ गए थे और न जाने कितनी नसीहतें दे डाली थीं. फिर मेरे सब्र का बांध भी टूट गया था. न जाने कितने दिनों का संचित आक्रोश सतह पर आ गया था. दरअसल, यह कोई एक दिन का आक्रोश नहीं था. जब से मेरे देवर रजत की शादी हुई थी और घर में पायल आई थी, तभी से मेरे मन में एक चिंगारी-सी सुलग रही थी, जो धीरे-धीरे अग्नि का रूप लेती जा रही थी. डरती हूं, कहीं यह अग्नि रिश्तों को ही न जला दे, इसलिए ख़ामोश रहती हूं. पायल को सारा घर हाथोंहाथ ले रहा है. मम्मी उसके रूप-गुणों की प्रशंसा करते नहीं अघातीं. पापाजी उसकी कुकिंग के दीवाने हैं. विनीत उसकी इंटेलीजेंसी, उसके सलीके, बातचीत के ढंग के कसीदे पढ़ते हैं. यहां तक कि ढाई साल का नन्हा रिंकू भी अपनी चाची के आगे-पीछे डोलता है.

मैं पिछले चार साल से इस घर में खट रही हूं, किंतु मेरा किया किसी को दिखाई नहीं देता. शादी के समय एमए, बीएड की डिग्री मेरे पास थी. चाहती तो टीचिंग आराम से मिल जाती, किंतु पहले मम्मीजी का ऑपरेशन आ गया था. कई माह लग गए थे, उन्हें पूरी तरह स्वस्थ होने में. उसके बाद रिंकू का जन्म हो गया. गृहस्थी की रेलपेल में पिसती ही चली गई. कभी स्वयं के लिए कुछ नहीं कर पाई, जिसका ख़ामियाज़ा मुझे अब तक भुगतना पड़ रहा है. दूसरी ओर पायल, जो शादी से पहले से ही बैंक में नौकरी कर रही है, मुफ़्त में स्पेशल ट्रीटमेंट बटोर रही है. पायल की याद आते ही मन न जाने कैसा हो गया. कुछ लोग क़िस्मत के धनी होते हैं. थोड़ा-सा भी करें, तो ढेर सारा यश मिलता है और कुछ अपनी जान भी निकालकर रख दें, तो भी किसी के मुंह पर प्रशंसा के दो बोल नहीं आते, मान-सम्मान मिलना तो बहुत दूर की बात है.

उस दिन भी ऐसा ही कुछ तो हुआ था. मेरी ननद निमी को देखने संदीप के घरवाले आए थे. संदीप पहले से ही निमी को पसंद करता था. बस, औपचारिकता पूरी करने अपने घरवालों को ले आया था. उनकी आवभगत करने में सुबह से शाम हो गई थी. पायल उनके पास बैठी थी. चलते समय उन्हें देने के लिए किचन से मिठाई के डिब्बे लेकर मैं ड्रॉइंगरूम में जा रही थी, मैंने सुना, संदीप की मां मम्मीजी से बोली थीं, “आप बहुत भाग्यशाली हैं, जो आपको पायल जैसी बहू मिली. बैंक में इतनी बड़ी ऑफिसर है, किंतु घमंड छूकर नहीं गया.” सुनते ही मेरे तन-बदन में आग लग गई थी.

मम्मीजी के कहे शब्द कि ‘स़िर्फ पायल ही नहीं, मेरी बड़ी बहू भी बहुत अच्छी है’ पर मैंने ध्यान नहीं दिया. मिठाई के डिब्बे वहीं टेबल पर रख, बिना किसी से कुछ कहे-सुने ग़ुस्से में मैं छत पर जाकर बैठ गई थी.

घरवालों के साथ-साथ विनीत को भी मेरा इस तरह चले जाना बुरा लगा था. मेहमानों के चले जाने पर उन्होंने मुझसे इस बारे में बात करनी चाही. मन ही मन मुझे अपनी ग़लती का एहसास था, किंतु विनीत के आगे उसे क्यों स्वीकार करूं? इसलिए हल्के-फुल्के ढंग से सही-ग़लत की परिभाषा उन्हें समझाने लगी, जिस पर वे चिढ़ गए. फिर मैं भला क्यों ख़ामोश रहती? “सुबह से मैं किचन में लगी हुई थी. आधे से ज़्यादा काम मैंने किया. पायल को पिछली रात बुख़ार था, इसलिए उससे ज़्यादा मदद भी नहीं ली, फिर भी प्रशंसा की पात्र वही बनी और यह कोई नई बात नहीं है.

पायल कुछ भी करती है, तो उसकी प्रशंसा होती है. मैं जो पिछले चार सालों से इस घर में पिस रही हूं, सब मिट्टी हो चुका है. मैं कमाती नहीं हूं, इसीलिए आप लोगों को मेरी कद्र नहीं है. मैं भी नौकरी करती होती, तब पता चलता.” एक घंटे तक अनवरत बोलती रही थी और विनीत चुपचाप सुनते रहे थे. जब मेरा आवेश कुछ कम हुआ, तो शांत स्वर में बोले, “नियति, इस घर के लिए तुमने जो कुछ भी किया, उसे सब जानते हैं. तुम्हारी प्रशंसा भी करते हैं, किंतु तुम्हारे सामने कोई कुछ कह नहीं पाता, क्योंकि तुमने वैसा माहौल ही नहीं बनने दिया. तुमने जो कुछ भी किया. उसमें मात्र कर्त्तव्यबोध था, आस्था नहीं थी.

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तुमने अपना समय दिया, श्रम दिया, किंतु अपनत्व नहीं दिया, जबकि पायल ने वही दिया, जिसके लिए इस घर के लोग तरसते रहे हैं. उसने भरपूर प्यार दिया है. अपनापन दिया है. नियति, किसी से दो मीठे बोल बोलने में पैसे नहीं लगते हैं. हां, इससे सुननेवाले की आत्मा तृप्त अवश्य हो जाती है. तुम एक क्षण के लिए भी इस घर से जुड़ नहीं पाई. क्या कभी मम्मी-पापा को मनुहार करके तुमने कुछ खिलाया? तबीयत ख़राब होने पर मम्मी को दवाई तो दी, किंतु स्नेह से कभी उनके माथे पर हाथ नहीं रखा. रजत और पायल के हास-परिहास का कभी प्रत्युत्तर नहीं दिया.

निमी के साथ कभी सहेली का-सा बर्ताव नहीं किया, तभी तो निमी ने संदीप के साथ अपने अफेयर की बात तुम्हें न बताकर पायल को बताई, जबकि तुम इस घर में पहले आई हो. कभी-कभी तो मुझे लगता है, हम दोनों के बीच भी एक औपचारिकता है. अंतरंगता का कोई क्षण शायद ही कभी आया हो.” इस कड़वी सच्चाई को मैं बर्दाश्त नहीं कर पाई और ग़ुस्से में बोली, “ठीक है विनीत, जब मैं आप लोगों को कुछ दे ही नहीं पाई, तो फिर मेरा यहां रहना व्यर्थ है. कल सुबह मैं रुड़की चली जाऊंगी, प्रांजलि के पास.”

सचमुच अगले दिन मेरी अटैची तैयार थी. जानती थी रिंकू आराम से अपनी दादी, चाची के साथ रह लेगा, इसलिए बेफ़िक्र होकर अपनी छोटी बहन के पास आ गई. विनीत ने भी मुझे नहीं रोका. घर में उन्होंने प्रांजलि की तबीयत ख़राब होने का बहाना बना दिया था, किंतु यहां आकर भी क्या अपेक्षित ख़ुशी हासिल हुई थी? दरवाज़े पर ही प्रांजलि की सास का ठंडा व्यवहार मन को कचोट गया था. कहीं यहां आकर भूल तो नहीं कर दी, इससे पहले कि निराशा मन पर हावी होती, प्रांजलि की स्नेहिल मुस्कान ने मन को कुछ राहत दी. रवि गरमागरम समोसे ले आए थे. चाय और समोसे खाकर प्रांजलि डिनर की तैयारी में लग गई थी. मैं भी उसके पीछे किचन में उसकी मदद के लिए चली आई. पांच मिनट भी नहीं बीते होंगे कि उसकी सास ने आकर कहा, “अरे प्रांजलि, नियति से मटर क्यों छिलवा रही हो?”

“इसमें क्या हर्ज़ है आंटी, काम के साथ-साथ हमारी गपशप भी चल रही है.” मैंने हंसते हुए कहा.

“नहीं नियति, तुम इस घर में मेहमान हो. दो दिन के लिए आई हो. तुम काम करो, मुझे अच्छा नहीं लगेगा.” कहते हुए मेरा हाथ पकड़ वे मुझे ड्रॉइंगरूम में ले आईं और टीवी के आगे बैठा दिया. मेरा मन बुझ गया.

रात तक प्रांजलि काम में व्यस्त रही और मैं बोर होती रही. बीच-बीच में रवि ने अवश्य कुछ बातें कीं. रात में प्रांजलि मेरे साथ सोना चाहती थी, किंतु मम्मी की भावभंगिमा देख उसने इरादा बदल दिया और अपने कमरे में चली गई. मेरा बिस्तर आंटी ने अपने कमरे में लगवाया. दो माह पूर्व की घटना मेरे ज़ेहन में ताज़ा हो गई थी. एक सेमिनार अटेंड करने प्रांजलि मेरे पास देहरादून आई थी. उस दौरान पूरे घर ने उसे सिर-आंखों पर रखा था. मम्मीजी कितने लाड़ से उसे खिलाती-पिलाती थीं. हरदम उसे एहसास करवातीं कि यह उसका अपना घर है. पायल ने तो बिना मुझसे पूछे पिक्चर की टिकटें बुक करवा दी थीं. हंसते-खिलखिलाते चार दिन कैसे गुज़र गए, पता ही नहीं चला था, किंतु यहां आते ही मुझसे कहा गया कि मैं यहां मेहमान हूं. दो दिनों में ही मैंने देख लिया, प्रांजलि कितने कठोर अनुशासन के बीच रह रही थी. नौकरी, घर की समस्त ज़िम्मेदारी, उस पर भी सास की टोकाटाकी की आदत, क्या यही सब झेलने के लिए प्रांजलि ने मम्मी-पापा के विरोध का सामना करके रवि से शादी की थी? इतना सब होते हुए भी उसके चेहरे पर रत्तीभर शिकन नहीं थी. हरदम एक मधुर मुस्कान लिए काम करती. हर सुबह एक नई ऊर्जा, एक नए उत्साह से भरी होती. मुझे लगा, कहीं अपने मन की पीड़ा को मुझसे छिपाने का यह प्रयास तो नहीं है. अपने चेहरे पर ख़ुशी का यह झूठा आवरण तो उसने नहीं ओढ़ रखा है?

तीसरे दिन आंटी रवि के साथ डेन्टिस्ट के पास गईं, तो मुझे राहत के पल नसीब हुए. चाय का कप लिए हम दोनों लॉन में बैठ गए. उत्तेजित होकर मैंने पूछा, “प्रांजलि, यह सब क्या है? इतने दिनों बाद मैं तेरे पास आई हूं और आंटी हैं कि बात ही नहीं करने देतीं. हरदम साए की तरह पीछे लगी रहती हैं.” प्रांजलि सहजता से मुस्कुराई और बोली, “दरअसल दी, मम्मी को वहम रहता है, कहीं मैं उनकी बुराई तो नहीं कर रही.”

“बुराई करनेवाले काम तो वे करती ही हैं. प्रांजलि, तू माने या न माने, रवि से शादी करना एक ग़लत फैसला था. घर में सदैव तूने यही बताया कि तू सुखी है. कितनी सुखी है, पिछले दो दिनों से मैं देख रही हूं. नौकरी के साथ-साथ सारे काम का दायित्व, उस पर उनकी टोकाटाकी, क्यों बर्दाश्त करती है ये सब? आख़िर क्या कमी है तुझमें, जो उनसे इतना दब रही है.”

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प्रांजलि गंभीर हो उठी, “दी, सुख का अर्थ केवल कुछ पा लेना ही नहीं है, अपितु जो है, उसमें संतोष कर लेना भी है. अपनों के लिए कुछ करना, उनकी बात सुन लेना उनसे दबना नहीं होता, बल्कि उनका सम्मान करना होता है. तुम जानती हो दी, रवि ने अपनी मम्मी की इच्छा के विरुद्ध जाकर मुझसे शादी की थी. इस नाते घर में, उनके दिल में जगह बनाने का प्रयास मुझे ही करना है. मैं मम्मी को यक़ीन दिलाना चाहती हूं कि रवि ने मुझे उनकी बहू बनाकर कोई ग़लती नहीं की है. मैं हर तरह से उनके योग्य हूं.”

“प्रांजलि, कोई फ़ायदा नहीं होगा, वे इसे तेरी कमज़ोरी समझेंगी.”

“नहीं दी, मैं ऐसा नहीं सोचती. कर्त्तव्य के साथ-साथ आस्था जुड़ी हुई हो, तो उसका असर अवश्य होता है. सास होने के साथ-साथ वे एक मां भी हैं. उनके हृदय में भी ममता और करुणा का सागर छलकता होगा. सास मां का ही प्रतिरूप होती है और बहू बेटी का. इस नाते सास-बहू के साथ-साथ हमारा मां-बेटी का भी रिश्ता हुआ न. समर्पण में बहुत शक्ति होती है दी. पूर्णतया समर्पित हो जाना चाहती हूं मैं अपने घर के प्रति, अपने रिश्तों के प्रति. अपने इस प्रयास में मैं सफल भी होने लगी हूं, इसका एहसास मुझे कल रात हुआ, जब सिरदर्द होने पर मैंने मम्मी के माथे पर हाथ रखा और मेरा हाथ थामे वे देर तक आंखें बंद किए लेटी रहीं. डॉक्टर से अपॉइंटमेंट परसों का था, किंतु वे आज ही चली गईं, शायद मुझे और आपको स्पेस देने के लिए.”

प्रांजलि की आस्था और विश्‍वास की चमक के आगे मेरा चेहरा निस्तेज पड़ गया. एक ही मां की बेटियां होते हुए भी उसकी सोच इतनी सकारात्मक और मेरी… ग्लानि हो रही थी मुझे स्वयं पर. बड़ी होने के बावजूद मैं स्वयं को प्रांजलि से छोटी महसूस कर रही थी. मां-पिता के समान स्नेहिल सास-ससुर, छोटी बहन सरीखी ननद और देवरानी, भाई जैसा एक देवर और टूटकर चाहनेवाला पति और क्या चाहिए था मुझे? विनीत सच कह रहे थे. कमी मुझमें थी, मेरी निष्ठा में थी. आज पहली बार मेरे मन में अपने घर के प्रति, घरवालों के प्रति अपनत्व की भावना जागी थी. मन में भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था. आज तक सबसे अपेक्षा ही रखती आई थी मैं. आज जीवन में पहली बार कुछ देने की इच्छा बलवती हो रही थी. अपना प्रेम और समर्पण न्योछावर करना चाहती थी मैं अपनों पर. इस देने की भावना में भी कितना सुख निहित है. हृदय की गहराइयों में महसूस कर रही थी मैं. अब मैं जल्द से जल्द अपनों के पास पहुंच जाना चाहती थी. आंटी और रवि के कहने के बावजूद फिर मुझसे वहां रुका नहीं गया. सुबह होते ही आस्था और विश्‍वास की डोर थामे एक नए उत्साह के साथ मैं अपने घर लौट आई.

Renu Mandal

        रेनू मंडल

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कहानी- प्रतीक्षा यात्रा (Short Story- Pratiksha Yatra)

“मैं तब तक पूरी तरह तुमसे जुड़ चुका था, मगर इस फ़र्ज़ की जंग में तुम्हारे सपनों की बलि क्यों चढ़ाता, इसीलिए जाते-जाते कह गया तुमसे कि मेरी प्रतीक्षा मत करना… मगर तुम्हें मुक्त करके तो मैं ख़ुद और भी गहरे बंधन में बंध गया. हर पल तुम्हारी याद सताती. ख़ुद को इतना व्यस्त कर लिया कि तुम्हारा ख़याल ही न आए, पर जो नस-नस में लहू बनकर बह रहा हो, उस प्यार को भूल पाना कहां आसान होता है…” मैंने देखा राजीव की आंखें भर आई थीं.

Hindi Short Story

शाम के धुंधलके में ये सब कुछ अचानक ही हसीन हो उठा है या तुम्हारे आने की ख़बर ने उल्लास भर दिया है, इस मन में ही नहीं, इस दृष्टि में भी. अब हर शै ख़ूबसूरत है. कल तक उदास-सी लगनेवाली ये लंबी सड़क, पेड़ों के झुरमुट और आस-पास बने छोटे-छोटे घर… बालकनी में चेयर पर अधलेटी हो मैं सोच में डूबती जा रही हूं. क्यों इतना अपनापन, इतना अधिकार, इतनी सुरक्षा समेटे है तुम्हारा स़िर्फ नाम ही.

कल शाम तक मेरी दुनिया में तुम्हारी यादों के सिवा हर तरफ़ तन्हाई-ही-तन्हाई थी और आज… जैसे सारे समीकरण बदल गए हैं. ऐसा लग रहा है जैसे वो मिलने जा रहा हो, जिसकी अब तक स़िर्फ कल्पना भर की.

दोपहर को मोबाइल पर तुम्हारा नंबर देखकर दिल में कई ख़ूबसूरत सुगंधित फूल एक साथ खिल उठे. धड़कनों को संभाला ही था कि हड़बड़ाहटभरा तुम्हारा स्वर सुनाई दिया, “अरू, ट्रेन में हूं, तुम्हारे पास कल शाम तक पहुंच जाऊंगा. बातें मिलने पर. ओ.के. बाय.” और फ़ोन कट गया.

राजीव आ रहा है मेरे पास… मुझसे मिलने. यही तो मेरी तपस्या थी. इतने वर्षों का अटूट विश्‍वास कि मिलकर रहेंगे हम दोनों. मेरी चिर-प्रतीक्षित आकांक्षा, जिसने अब तक मुझे न केवल जीवन जीने का संबल दिया, बल्कि मेरी प्रेरणा बना रहा विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कुराने का. हां, वही इंतज़ार अब समाप्ति की ओर है.

दस साल पहले की ‘अरू’ अब ‘मिस अरुन्धती’ सीनियर प्रो़फेसर बन चुकी है. मगर राजीव के लिए तो स़िर्फ ‘अरू’ है अरुन्धती नाम को लघुरूप ‘अरू’ उसी ने तो दिया था और आज फ़ोन पर इतने सालों बाद भी इसी नाम से पुकारा तो अच्छा लगा.

प्रसन्नता भी कितना बड़ा साधन है मन को जीवंत करने का. इस एक फ़ोन के बाद कितनी बातें सोच चुकी हूं. कल शाम को खाने में क्या बनाया जाए? कितने दिनों से हेयर कट नहीं किया… वार्डरोब के पास भी दो बार हो आई. कब से कोई नई साड़ी भी नहीं ख़रीदी. कल क्या पहनूं?

अचानक हर बात का ख़याल आने लगा. इससे पहले इतने दिनों में कभी क्यों नहीं सोचा ये सब?

मां रोज़ ध्यान दिलाती, “बालों को सेट करवा लो बेटी… नई साड़ी कब ख़रीदोगी… इतने अच्छे ओहदे पर हो, थोड़े टिप-टॉप में रहा करो… तभी तो लगेगा आत्मनिर्भर हो.” मगर मुझे तब कुछ लगा ही नहीं. कभी मन ही नहीं किया. बस, मां की ख़ुशी के लिए उन्हीं के हाथों में पैसे रख देती.

“तुम ही ला देना मेरे लिए कुछ अच्छी साड़ियां, मेरी चॉइस कहां अच्छी है.”

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और मां अजीब नज़रों से मुझे देखती रह जाती. मेरा जीवन जैसे रुक-सा गया था राजीव के न होने पर और उसे जैसे ज़बरन घसीटना और ढेलना पड़ रहा था मुझे.

कॉलेज में भी सहेलियों के बीच गपशप और चुहलबाजियां होती रहतीं और मैं सबके बीच रहकर भी सबसे कटी-कटी और सबसे बहुत दूर चली जाती. वहां, जहां राजीव की कल्पनाएं होतीं, उसका एहसास मेरे रोम-रोम में समाया था.

उस रोज़ मिसेज़ शर्मा ने अचानक पूछ लिया था, “सच बताना अरुन्धती, तुम अपनी विधवा मां को अकेली नहीं छोड़ना चाहती, स़िर्फ यही वजह है तुम्हारे विवाह न करने की? तुम्हारा यों गुमसुम, चुपचाप उदास-सा रहना तो कुछ और ही बयां करता है.”

“मैं तुम्हारी बड़ी बहन जैसी हूं, अगर कोई पसंद हो, तो खुल के बताओ. हो सकता है उसके साथ घर बसा के तुम अपनी मां की और भी अच्छी तरह देखभाल कर सको. और तुम्हारे शादी न करने के फैसले से क्या तुम्हारी मां सचमुच ख़ुश होंगी? कल उनके न रहने पर तुम्हारा क्या होगा, कभी ये सोचा है?”

उनके प्रश्‍नों की झड़ी ने मुझे विचलित कर दिया और मैं बस इतना ही कह सकी, “मैं किसी की प्रतीक्षा कर रही हूं दीदी, अगर मेरे प्रारब्ध में उनका साथ लिखा है, तो मैं उनकी हो कर रहूंगी और अगर नहीं तो पूरा जीवन उनकी यादों के नाम है. मैं तो दोनों सूरतों में बस उन्हीं की बन कर जीना चाहती हूं.”

उन्हें हतप्रभ-सा छोड़कर मैं वहां से उठकर चली आई. जाने क्यों उन्हें सब कुछ बताने का मन कर रहा था, मगर ज़ुबान साथ नहीं दे रही थी.

और एक दिन कैंटीन में फिर पकड़ लिया उन्होंने मुझे. उस रोज़ मैं भी अंदर तक भरी-भरी-सी थी. छलक गया अंतर्मन उनके सामने.

“दस साल पहले मैं इसी कॉलेज में बी.ए. प्रथम वर्ष में थी और राजीव मुझसे एक साल सीनियर साइंस के स्टूडेंट. नई-नई होने के कारण मेरे दोस्त बहुत कम थे. उनमें राजीव से पहला परिचय ही दोस्ती का रिश्ता कायम कर गया हमारे बीच. मुझसे स़िर्फ दो साल बड़े राजीव मुझसे काफ़ी ज़्यादा समझदार और परिपक्व थे. शायद ये पारिवारिक परिस्थितियों का असर था. राजीव के पिता नहीं थे और दो छोटी बहनों की ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थी.

उनसे हुई दो-चार मुलाक़ातों में ही मुझे लगने लगा कि मेरा ‘कुछ’ छिनता जा रहा है और मैं कुछ कर नहीं पा रही हूं.

राजीव के व्यक्तित्व की गहराई में डूबने से मैं ख़ुद को बचा नहीं पा रही थी.

मेरी आंखों के मूक संदेश उन आंखों तक पहुंचने लगे, मगर प्रतिउत्तर में उन आंखों में कोई भाव न पाकर मैं थोड़ा डर जाती.

उन दिनों मन-ही-मन ईश्‍वर से प्रार्थना करते. मन्नतें रखने लगी कि राजीव मुझे स्वीकार कर लें.

उन्हें न पाकर मन जैसे बगावत कर बैठता. कहीं भी मन न लगता और मैं उन्हें ढूंढ़ ही लिया करती. कभी कैंटीन में तो कभी लाइब्रेरी में…

धीरे-धीरे वो भी खुलने लगे मुझसे. घंटों बातें होतीं- पढ़ाई, करियर, समाज-दुनिया पर बातें करते-करते हम ख़ुद पर सिमट आए. राजीव भी मेरे बगैर बेचैन हो जाते, मगर मुंह से कभी ऐसी कोई बात न कहते, जिसका सूत्र पकड़कर मैं अपने सपनों को साकार करने की कोशिश करती. डेढ़ साल का वो अमूल्य समय, जिसके हर एक दिन में राजीव की अनगिनत यादें हैं, मेरे जीवन का स्वर्णिम समय था और उस दिन उस एक ख़त के बाद शुरू हुई मेरी ये प्रतीक्षा यात्रा, जिस पर मैं आज तक चल रही हूं.”

मिसेज़ शर्मा मेरी बातें सुनते ही थोड़ी बेचैन-सी हो गईं, “मुझे पूरी बात बताओ अरुन्धती, फिर क्या हुआ?”

“कॉलेज का अंतिम दिन था. सभी अश्रुपूर्ण विदाई के माहौल में डूबे थे. मेरा तो बुरा हाल था. अब तक राजीव से मैंने खुलकर नहीं कहा था कि मैं उन्हें अपना जीवनसाथी मान चुकी हूं. आज चुप रहने का मतलब था हमेशा के लिए उनसे दूर हो जाना और ये ख़याल ही मेरे लिए प्राणघातक था.

मन-ही-मन उनसे काफ़ी कुछ कह लेने के बाद हिम्मत जुटाकर मैं जा पहुंची उनके पास. मगर ये क्या… उनके सामने पहुंची तो ज़ुबान को जैसे ताला लग गया. उनकी बड़ी-बड़ी गहरी आंखों में लबालब आंसू भरे थे. मुझसे कुछ कहने के लिए जैसे ही उन्होंने होंठ खोले, पीछे से किसी ने आवाज़ दी, “राजीव जल्दी करो, फ़्लाइट का व़क़्त हो गया.” मेरे मन में उमड़ते-घुमड़ते प्रश्‍नों को छोड़कर मेरे हाथ में एक ख़त थमा राजीव तेज़ी से चले गए.

और बस उसी ख़त के सहारे आज तक जी रही हूं” कहते हुए डायरी में से एक ख़त मैंने मिसेज़ शर्मा की ओर बढ़ा दिया.

मिसेज़ शर्मा बगैर मेरी ओर देखे आतुरता से पत्र पढ़ने लगीं.

प्रिय अरू,

काफ़ी दिनों से तुमसे कहना चाह रहा था, अगर आज भी नहीं कह सका तो शायद कभी मौक़ा न मिले. मैं तुमसे प्रेम करता हूं अरू. तुम्हारे बगैर कैसे जी पाऊंगा नहीं जानता, मगर कोशिश करूंगा, क्योंकि अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए मुझे जीना होगा. मैं कनाडा जा रहा हूं. वहां से लौटने की गुंजाइश कम ही है, मगर कोशिश करूंगा मरने से पहले एक बार ज़रूर तुम्हारे पास लौट कर आ सकूं. पर शायद तब तक तो बहुत देर हो चुकी होगी. तुम्हें ब्याहकर अपने साथ नहीं ले जा सकता, क्योंकि मेरी अपनी कुछ मजबूरियां हैं, पर अपनी धड़कनों में, अपने रोम-रोम में तुम्हें लिए जा रहा हूं. हो सके तो मुझे माफ़ कर देना और हां अरू, मेरी प्रतीक्षा मत करना. ईश्‍वर करे, तुम्हें मुझ से भी अधिक प्रेम करनेवाला जीवनसाथी मिले.

सदैव तुम्हारा,

राजीव

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ख़त को पढ़कर मिसेज़ शर्मा भरी आंखों को पोंछते हुए मेरी ओर देखने लगी.

“मैं ख़त पढ़कर बेतहाशा एयरपोर्ट भागी. वहां राजीव को देखा, तो लगा कटे बेल की तरह लिपट जाऊं राजीव से, मगर आसपास का ख़याल कर रुक गई.

प्लेन आ चुकी थी मेरी ओर सजल नेत्रों से देखते हुए राजीव प्लेन में चढ़ गए. पीछे से मैं हाथ हिलाते हुए ज़ोर से चिल्ला पड़ी, “मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी राजीव, सदैव तुम्हारी ही रहूंगी.”

मैंने भरे गले से कहा और ख़ामोश हो गई. तभी मिसेज़ शर्मा ने मुझसे पूछा, “इतने सालों तक विदेश में रहकर क्या वो शख़्स अब भी तुम्हारा होगा?”

“हां, मुझे विश्‍वास है कि एक दिन वो अवश्य लौटेंगे. ये मेरी आस तब तक बंधी रहेगी, जब तक मैं ज़िंदा हूं.”

“मगर अरुधन्ती, ये तो कोरी भावुकता है, तुमने उस व्यक्ति के लिए अपना जीवन रोक रखा है, जिससे तुम्हारा कोई सामाजिक रिश्ता नहीं है…”  मैंने उन्हें बीच में रोकते हुए कहा, “मैं उन्हें अपना जीवनसाथी मान चुकी हूं और क्या ये रिश्ता काफ़ी नहीं है उनकी प्रतीक्षा करने के लिए?”

मिसेज़ शर्मा को निरुत्तर छोड़कर मैं घर लौट आई और सप्ताहभर बाद ही यह फ़ोन मेरे जीवन की दिशा बदल गया.

रातभर मैं कल्पना में राजीव से बातें करती रही और अगले दिन शाम को राजीव मेरे सामने था. हम दोनों ही ख़ामोश थे. व़क़्त के अंतराल ने दोनों को बाहरी तौर पर बदला था, मगर भीतर वही ज़ज़्बात वही झंझावात उमड़-घुमड़ रहे थे.

उतरा-उतरा पीला निस्तेज़ चेहरा लिए राजीव बस मुझे देखे जा रहा था. मैंने ही मौन तोड़ा, “क्या किया इतने वर्षों तक राजीव?”

“कर्त्तव्यों का निर्वाह…” संक्षिप्त उत्तर. मैं कैसे संतुष्ट होती, “खुलकर बताओ न राजीव…”

मेरी उत्सुकता देखकर हल्की मुस्कुराहट आ गई उनके चेहरे पर. विस्तार से मुझे बताने लगे राजीव, “यहां पढ़ाई पूरी करते ही कनाडा से बुलावा आ गया, बड़ी कंपनी से जॉब ऑफ़र था. परिवार में मेरे अलावा कोई था नहीं, दो बहनों की पढ़ाई-लिखाई, शादी की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर थी. उसे पूरा करने के लिए बहुत पैसा चाहिए था. मां की यही आस थी कि हम तीनों का घर बसा हुआ देखकर ही जाएं इस संसार से.

मैं तब तक पूरी तरह तुमसे जुड़ चुका था, मगर इस फ़र्ज़ की जंग में तुम्हारे सपनों की बलि क्यों चढ़ाता, इसीलिए जाते-जाते कह गया तुमसे कि मेरी प्रतीक्षा मत करना… मगर तुम्हें मुक्त करके तो मैं ख़ुद और भी गहरे बंधन में बंध गया. हर पल तुम्हारी याद सताती. ख़ुद को इतना व्यस्त कर लिया कि तुम्हारा ख़याल ही न आए, पर जो नस-नस में लहू बनकर बह रहा हो, उस प्यार को भूल पाना कहां आसान होता है…”

मैंने देखा राजीव की आंखें भर आई थीं. हौले से मैंने पूछा, “तो इस याद से छूटने का प्रयास क्यों नहीं किया राजीव? क्या दूसरी लड़की नहीं मिली इतने सालों में?”

जवाब में हंस दिया राजीव.

“हृदयविहीन व्यक्ति भी कहीं रिश्ते बनाता है अरू. मन तो तुम्हारे पास ही छूटा हुआ था. उस छूटे हुए मन को ही हासिल करने चला आया तुम्हारे पास, जब तुम्हारे ही कॉलेज की किसी मिसेज़ शर्मा ने मुझे फ़ोन पर बताया कि तुम आज भी मेरी प्रतीक्षा कर रही हो, तो मैं बेतहाशा भाग आया तुम्हारे पास अपनी ज़िंदगी दोबारा हासिल करने.”

अचानक ख़ुशी के आवेश में राजीव ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मैं एकटक उसे निहारती रह गई. वो चेहरा, जिसे दोबारा देखने की आस में मैंने दस साल काटे थे, वो चेहरा सदा के लिए मेरे सामने था.

एक बार फिर गंभीर होते हुए राजीव ने कहा, “मगर तुमने इतनी कठोर प्रतीक्षा कैसे की अरू? जिस इंतज़ार में कोई वादा तक नहीं था, वो इंतज़ार तुमने किया कैसे? ख़ुद को कैसे बचाकर रखा समाज से, लोगों से? क्या तुम्हारी मां ने तुम पर शादी के लिए कभी दबाव नहीं डाला?”

मैं हौले से मुस्कुरा पड़ी. “मन की शक्ति बहुत बड़ी ताक़त होती है राजीव, मन-ही-मन तुम्हारे साथ सात फेरों में बंधने से लेकर हर रस्म निभा चुकी थी और फिर तुम्हारे ही शब्दों में मन के बिना कहीं और क्या रिश्ता जोड़ती…?”

राजीव प्रसन्नता से अभिमानभरी नज़रों से मेरी ओर एकटक निहारने लगे, तो मेरी पलकें स्वत: झुक गईं.

राजीव का हाथ थामे मैं तेज़ी से घर की ओर चल पड़ी, पर आज ये लंबी सड़क उदास और सूनी-सी नहीं, बल्कि बेहद ख़ुश और खिली-खिली-सी लग रही है, बिल्कुल मेरी ही तरह.

– वर्षा सोनी

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कहानी- क़िस्मतवाली (Short Story- Kismatwali)

“मेरे पति स़िर्फ मेरे प्रति पूर्ण समर्पित हैं, ये ख़्याल मुझे आभासी ख़ुशी देता है, मेरे होंठों पर मुस्कान लाता है. लोग जो मेरे प्रति ईर्ष्या महसूस करते हैं, क्या ये सब सुशांत से अलग होने पर संभव होगा. सब मेरे प्रति दया भाव रखना शुरू कर देंगे या फिर क्या पता, कोई फ़ायदा उठाने की सोचे.”

Hindi Kahani

मनस्वी, कितना सुंदर मौसम है, बेकार ही ऑफिस आ गई. सुशांत ने कितना कहा कि मत जाओ. आज इस भीगे मौसम का मज़ा लेंगे, पर हाय री क़िस्मत.”

सुकन्या के अंदाज़ पर मनस्वी फीकी मुस्कान के साथ सुबह-सुबह अपने पति के साथ हुई नोंकझोंक में खो गई.

ज़रा-सी बात और पतिदेव झुंझला पड़े. क्या करे वह अगर बरसात के दिनों में उनके अंडरवियर और बनियान नहीं सूखे तो.

कितना भी ड्रायर चला लो, पंखे में भी डाल लो, नमी तो रह ही जाती है. इसमें बेवजह उखड़ जाने की क्या ज़रूरत थी. शाम को तो बरसात में चहक-चहककर पकौड़े और चाय की मांग हो रही थी, तब तो बरसात बड़ी अच्छी लगी. मोहम्मद रफ़ी के गाने भी ज़ुबां पर चढ़ गए, पर सुबह होते ही?

“अरे! कहां खोई हुई है.” सुकन्या की बात पर लंबी सिसकारी लेते मनस्वी बोली, “तेरी बातों में खोई हूं और कहां? काश! हमारे पति भी तेरे सुशांत जैसे रूमानी होते, तो क्या बात होती. सच बता सुकन्या, कौन-सा जादू चलाया है तूने, जो सुशांत जी तुझ पर लट्टू रहते हैं.”

यह सुनकर सुकन्या मुस्कुराई, “कवि हैं पति मेरे. उनकी पेन की नोंक मुझ पर घूमकर नित नए विषय उठा लेती है. उनके रोमांटिक स्वभाव की सीधी वजह मैं ही हूं, और क्या.”

उसके सांवले-सलोने चेहरे पर चमक उभरी, फिर वह कहीं खो-सी गई. वह अक्सर ऐसे ही जब-तब खो जाती है.

कंप्यूटर बैकलॉग करते सुकन्या को धौल जमाती हुई वह बोली, “तू और तेरा कवि पति, ये ऑफिस है मैडम, यहां खोना मना है.”

“अरे! इसमें खोने जैसा क्या है, मेरे सुशांत हैं ही ऐसे. इन बरसाती बूंदों में उनके साथ के सामने अपनी नौकरी को चुनकर पाप किया है. इन मस्त नज़ारों में मेरा साथ पाकर वह जाने क्या-क्या लिख जाते मुझ पर…”

सुकन्या मादक अंगड़ाई लेते हुए बोली, तो मनस्वी उसे देखती रह गई. सांवला रंग, बोलती-सी मुस्कुराती मोटी-मोटी आंखें, शरीर दुहरा, गले में एक चकत्ता, जो शायद जन्मजात ही था. ऐसा कुछ भी नहीं था उसमें, जो किसी को बांधे रख सके. फिर भी पति की उस पर अतिशय आसक्ति दर्शाती थी कि बाह्य सुंदरता पर आंतरिक सौंदर्य हावी पड़ता है.

“ऐ, ऐसे क्या देख रही है. बोल न, आधी छुट्टी लेकर चली जाऊं.” वह शरारत से एक बार फिर बोली, तो मनस्वी माथा पकड़कर स्वांग जनित स्नेह से बोल पड़ी, “हे भगवान! तू और तेरा कविराज रांझा. अब चल, कैंटीन में चाय पीकर मौसम का लुत्फ़ उठाएंगे. यहां ऑफिस में भी बरसात का मज़ा कुछ कम नहीं.”

वह शायद कुछ ज़ोर से बोल पड़ी थी. तभी आसपास के लोग भी मुस्कुरा पड़े.

ये कोई आज की बात नहीं थी. ऑफिस में अक्सर ये चर्चा होती है कि सुकन्या जाने कौन-सी कलम-दवात से क़िस्मत लिखवा कर आई है, जो उसे इतना प्यार करनेवाला पति मिला है. प्रेम से लबरेज़ दांपत्य का किसी को उदाहरण देना होता, तो हमेशा सुकन्या का उदाहरण दिया जाता.

वह स्वयं भी तो अपने प्रेमिल क्षणों को बांटने से नहीं चूकती. रोज़ ही कोई न कोई रोमांटिक क़िस्सा उसके हिस्से रहता.

मसलन- कल रात  सुशांत ने चांदनी रात में मधुर वार्तालाप के बीच ये पंक्तियां उसको नज़र कीं. कल शाम साथ-साथ खाना बनाया. ये साड़ी सुशांत ने दी है. ये अंगूठी उन्होंने देते हुए ये कहा- वो कहा… उफ़्फ़! कितना कुछ था उसके पास कहने को. रोज़ एक नया प्रसंग होता सुनाने को. वह कम पड़ता, तो उसकी लिखी रूमानी ग़ज़लों और मतलों को सुनाते हुए ऐसे भाव देती जैसे उन भाव भरी इबारतों का पेटेंट करवाकर आई हो.

अपने रूमानी दाम्पत्य की क़िस्सागोई करती और सबके होंठों पर मुस्कान की रेखा घिर आती. उसकी कजरारी स्वप्नीली आंखें पति के प्यार से लबलबातीं, तो लोगबाग   जल-भुनकर ख़ाक हो जाते, पर मनस्वी  उसकी सबसे अच्छी श्रोता थी. कभी-कभी उसे भय भी लगता कि सुकन्या-सुशांत के प्रेम को कहीं किसी की नज़र न लग जाए.

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ऑफिस से शाम को मनस्वी उस दिन  घर पहुंची, तो पतिदेव ने उसके लिए चाय बनाकर रखी थी. पतिदेव के हाथों  की चाय और मिज़ाजपुर्सी से सुबह की झड़प से उपजी तल्खी गायब हो गई, तो एकबारगी मनस्वी को ग्लानि हो आई.

क्या हुआ जो विजय सुशांत जैसा भावुक कवि हृदय नहीं रखते, पर जैसे भी हैं,  केयरिंग है. उसकी जगह और कोई भी होता, तो ऑफिस जाने की हड़बड़ी में नम बनियान देख चिड़चिड़ा जाता. जाने-अनजाने विजय और सुशांत की तुलना कर बैठने पर मन अपराधबोध से भर उठा.

क़रीब 10 दिन बीतते न बीतते सुकन्या एक बार फिर दफ़्तर से नदारद हुई. फोन किया, तो पता चला मैडमजी माउंटआबू  की ख़ुशनुमा वादियों में हैं. उसकी प्रफुल्लित आवाज़ उसकी ख़ुशी ज़ाहिर कर रही थी.

“क्या करूं मनु, सुशांत ने एकदम से प्रोग्राम बना लिया. क्या करती आना ही पड़ा, पर सच कहूं, बड़ा मज़ा आ रहा है. इतना  ख़ूबसूरत मौसम है कि क्या कहूं… मेरे कमरे के ठीक सामने पहाड़ियां हैं, जिन्हें बादलों ने ऐसे ढंका है कि…”

“सुन मुझे थोड़ा काम है.” मनस्वी ने स्वर भरसक संभाला, कहीं ईर्ष्या ज़ाहिर न हो जाए, पर सुकन्या अपनी दुनिया में मस्त बोल रही थी,

“मनु, अपने रोज़मर्रा के जीवन की रेलमपेल से छुटकारा पाना ज़रूरी है. जो पल हमने यहां जीए हैं, बस वही ज़िंदगी है. जानती हूं तेरा समय ख़राब कर रही हूं, पर क्या करूं, तुझसे अपनी ख़ुशी बांटती हूं, तो ख़ुुशी और बढ़ जाती है…”

“अरे, नहीं सुकन्या इतना भी बिज़ी नहीं हूं. तुम्हारे जीवन में ख़ुशियों के पल यूं ही आते रहें और क्या चाहिए. और हां, अब की बार आना तो असली ख़ुशी लेकर आना, मतलब दो से तीन की तैयारी करके आना…” यह सुनकर वह ज़ोर से हंस दी, फिर ‘अच्छा रखती हूं’ कहकर उसने फोन काट दिया.

हो न हो, इस बार सुकन्या ज़रूर ख़ुशख़बरी लेकर आएगी. मनस्वी सोच के घोड़े दौड़ा रही थी. एक हफ़्ते बाद सुकन्या का फिर फोन आया, “मनस्वी मेरी दो दिन की छुट्टी बढ़वाने की अर्ज़ी दे देना यार. मैं गिर पड़ी. सुशांत ट्रेकिंग पर ले गए थे, रस्सी हाथ से छूट गई. वो तो इन्होंने मुझे संभाल लिया, वरना जाने क्या होता. चेहरे और हाथ में चोट आई है, दो-चार दिन बाद ऑफिस जॉइन करूंगी. बॉस को बता देना…” इस ख़बर के बाद दो दिन बाद दाएं हाथ में क्रेप बैंडेज बांधे आई, तो उसकी दशा देख मनस्वी चौंक पड़ी. चेहरे के दाईं तरफ़ कालापन देख वह घबरा गई. सुकन्या सबको हैरान-परेशान देखकर चिर-परिचित अंदाज़ में बोली, “अरे, बस पूछ मत, ये सुशांत हैं न… आज यहां चलेंगे, कल वहां… डिनर, ट्रेकिंग-बोटिंग… बस पूछ मत मनस्वी… ख़ूब मज़े किए. ट्रेकिंग में गिर पड़ी. सुशांत से अपनी जी भरकर सेवा करवाई है.

सुकन्या अभी भी ख़ुश थी. और क्यों न होती. सच है, दुख-तकलीफ़ में पति का प्यारभरा स्पर्श कितना सुखद लगता है. पति का साथ-दुलार बड़े से बड़े घाव का मरहम बन जाता है. सुकन्या का मुस्कुराता चेहरा देखकर मनस्वी को तीन दिन पहले पैर में लगी वो  मोच याद आई, जिसे कितनी लापरवाही से विजय ने अनदेखा कर दिया. बाद में केमिस्ट को फोन पर पूछकर पेनकिलर मंगवाकर दे दी.

“ऐ कहां खो गई?” सुकन्या के कहने पर मनस्वी उसके चेहरे को ध्यान से देखने लगी. सांवले चेहरे पर चोट का कालापन घुल-मिल गया था. कुछ ऐसे ही सुकन्या का दर्द पति के प्रेम में घुल-मिल गया होगा. शारीरिक पीड़ा दांपत्य प्रेम में घुलकर विलुप्त-सी लगी.

मनस्वी सरसरी नज़र डालते हुए बोली,  “कुछ नहीं, तू अपना हाल बता. तेरे पास माउंटआबू की ढेर सारी बातें होंगी. तू सुना, सच कहूं, तो तेरी बातों से हमारे हृदय के सोये तार भी झनझना उठते हैं.”

और समय होता, तो सुकन्या शुरू हो जाती, पर आज वह कराह उठी, शायद दर्द था. बैलेंस चार्टशीट में पिछले दिनों का लेखा-जोखा भरने के प्रयास में वह खो-सी गई.

“तू कुछ ठीक नहीं लग रही.  कुछ दिन और आराम क्यों नहीं कर लेती.” मनस्वी के कहने पर वह मुस्कुराने की कोशिश करती कहने लगी. “नहीं यार, बहुत काम पेंडिंग है… करना तो है ही…” कहते हुए वह सिसकारकर अपने चोटिल हाथ को सहलाने लगी.

“हाथ में दर्द है ना, ला मैं तेरी मदद करती हूं.” मनस्वी के कहने पर वह “तू बस डाटा डिक्टेट कर दे…” कहते हुए कुछ देर आंखें मूंदे बैठी रही, फिर लंबी और गहरी सांस लेकर काम शुरू किया.

इस बात को महीना भी नहीं बीता था कि वह फिर अनुपस्थित हुई, पर इस बार बॉस के साथ पूरा स्टाफ उससे नाराज़ था, क्योंकि वार्षिक क्लोज़िंग में ऐसे ही काम की अधिकता थी, उसके हिस्से का भार भी सबके सिर पर पड़ गया.

बॉस ने भी आर-पार बात करने का मन बना लिया, आख़िरकार प्रोफेशनलिज़्म भी कुछ होता है. ज़रा-ज़रा-सी बात पर यहां देखना न वहां, पति के पीछे आंखें मूंदें चल पड़ना सही नहीं था. बॉस उसके लिए चार्टशीट बना रहे हैं.

मनस्वी उसके लिए परेशान थी और कुछ हद तक नाराज़ भी. पर जो भी हो, उसकी नौकरी बचाना ज़रूरी था. फोन से संपर्क नहीं हो पाया, तो एक बार उसके घर जाने के लिए मन यह सोचकर बनाया कि शायद अड़ोस-पड़ोस में कोई कुछ जानता हो. कोई हो, जो बता सके कि वह कहां गई है. स्क्वायर मॉलवाली रोड पर पहुंचकर एकता अपार्टमेंट का पता किया. गेट पर सुकन्या सुशांत मीणा तीसरे माले में रहते हैं, यह आसानी से पता चल गया. पांच मिनट के भीतर ही वह तीसरे माले पर पहुंच गई. सुशांत मीणा के नाम की नेमप्लेट देखी, तो वह हैरान रह गई. घर खुला था. बाहर कई चप्पलें रखी थीं. एकबारगी मन किसी आशंका से धड़का, पर अंदर से आती हंसी-खिलखिलाहट की आवाज़ से आशंका निर्मूल सिद्ध हुई. दरवाज़ा खटखटाना नहीं पड़ा, बैठक में ही नीचे कई लोग बैठे दिखे. सुशांत को वह तस्वीर में देख चुकी थी, सो पहचानने में उसे कोई परेशानी नहीं हुई.

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‘जी कहिये?’ के कर्कश स्वर के साथ सुशांत खड़ा अजीब ढंग से घूर रहा था.

“सुकन्या…” उसके मुंह से निकला, तो “वह किचन में देखो…” कहते हुए वह वहां बैठे लोगों के बीच बैठ गया. उसका उपेक्षाभरा अभद्र व्यवहार देखकर मनस्वी विस्मित थी. बैठक में काव्य गोष्ठी चल रही थी. रसोई से सुकन्या चाय के कप लेकर निकलती दिखी. मनस्वी को देख वह हकबकाकर पास आई और सामने बने कमरे में ले गई.

खिसियाई-सी मुस्कराहट लाते बोली, “आज काव्य गोष्ठी है. सुशांत के ख़ास लोग आए हैं, सो ऑफिस नहीं आ पाई, पर तू यहां क्यों चली आई? ”

उसके लापरवाहीभरे प्रश्‍न पर ग़ुस्से से ज़्यादा उसे उस पर दया आई. वह पागल थी या इतनी भोली कि यह भी न समझ सकी कि उसके ग़ैरज़िम्मेदाराना रवैये से नाख़ुश बॉस उसे इस्तीफ़ा पकड़ाकर बाहर का रास्ता दिखा सकता है.

सुकन्या भरसक सामान्य दिखने का प्रयास कर रही थी, पर मनस्वी की आंखें बैठक के उस असामान्य दृश्य पर टिकी थीं, जहां  छह-सात  स्त्रियां और लगभग इतने ही पुरुष  गद्दे-मसनद के साथ बैठे काव्य पाठ के नाम पर हंसी-ठठ्ठा अधिक कर रहे थे.

एक महिला सुशांत से सटी बैठी हंस-हंसकर उस पर गिर पड़ रही थी. सस्ता-सा माहौल देखकर मनस्वी से और बैठा नहीं गया. वह तो सोचकर आई थी कि शायद इस बार फिर सुकन्या अपने सपने के राजकुमार के साथ कहीं सैर पर निकली होगी या कहीं बीमार न पड़ गई हो. पर यहां तो दोनों स्थितियों से इतर कुछ और ही दिखा.

“तू ऐसे एकदम से कैसे चली आई?” सुकन्या के पूछने पर सख़्त लहज़े में मनस्वी बोली, “तेरा फोन नहीं लग रहा था, क्या करती. अपनी नौकरी बचाना चाहती है, तो कल आ जाना. मैं चलती हूं. तू इनकी मिज़ाजपुर्सी कर…” सुकन्या की झुकी गर्दन और झुक गई जब एक महिला का इठलाया-सा स्वर आया, “सुशांतजी, काव्य में ऐसा रसिकभाव, जो मन को सहज उद्वेलित कर दे… सूखे उपवन में मलय सुगंध उठा दे… ऐसा मर्मस्पर्शी भाव कहां से आता है आपकी कविताओं में.”

यह सुनकर सुशांत बोला, “अजी, आप जैसी सखी हों इस सखा की, तो कामदेव उतर ही आते हैं वाणी में. अब घरवाली की मुटियाई कमर और काले रंग पर तो कुछ लिख नहीं सकते. उनको देखकर तो आते विचार भाग जाएं.”

यह सुनकर सुशांत से लगभग चिपकी औरत हंसकर उस पर लदती हुई, ‘अजी, अब ऐसा भी न बोलिए’ कहकर हंस दी. बेशर्मी भरी हंसी के बीच सुशांत की वासनायुक्त लोलुप आंखें एक-दो से मिलती साफ़ दिखीं.

सुकन्या मनस्वी को खींचकर बाहर ले आई. आंखों में आंसू उतर आए, तो कमज़ोर शब्दों में बोली, “वह रीमा है, क्या करूं. जब घर आती है, तो ऑफिस आने को जी नहीं करता. डरती हूं.” अनपेक्षित माहौल और उसकी दशा देख मनस्वी ‘चलती हूं कल बात करेंगे’ बोलकर भारी मन से बाहर निकल आई.

काव्य गोष्ठी का दृश्य याद कर मन वितृष्णा से भर उठा. क्या सोचा था उसने सुशांत के बारे में और वह क्या निकला.

रातभर सुकन्या की कही बातों और देखे गए दृश्य को जोड़ती रही, पर कोई साम्यता नहीं दिखी. दूसरे दिन बॉस के ऑफिस से बाहर निकलती सुकन्या को उसने पकड़ लिया. वह भी शायद बहुत कुछ भीतर भरे थी, इसीलिए मनस्वी के देखने मात्र से उसके आंसू ढुलकने आरंभ हो गए. जो बताया, वह उस पर विश्‍वास न करती, पर कल का देखा दृश्य उसकी बातों का सत्यापन कर रहा था. वह हिचक-हिचककर बोल रही थी, “सुशांत का कवि होना मेरे जीवन में नासूर है. क्या कहूं, इतनी औरतों से मित्रता है, कोई भाई, तो कोई यार मानती है. सुशांत तो वैसे ही दिलफेंक रहे हैं. कवि होने से महिला मित्रों के संग-साथ… यारी-दोस्ती, रूप-सौंदर्य की बातें करने का लायसेंस मिल गया है. कोई  यकीन नहीं कर सकता है कि बाहर की स्त्रियों को आभार आदरणीय माननीय जैसे शब्दों से संबोधित करनेवाले सुशांत वास्तव में काम वासना के कीचड़ से लथपथ हैं. घिन आती है मुझे कभी-कभी अपने आप से कि मैं ऐसे आदमी के संसर्ग में हूं. सच कहूं, तो बाहर स्त्री पर आदर-सम्मान पर ग्रंथ लिखनेवाले सुशांत अपनी पत्नी को अपने घर में अपनी जूती समझते हैं.

कभी नेहा, तो कभी तूलिका… कल्पना-चंद्रिका… हे ईश्‍वर किस-किस का नाम लूं… आजकल रीमा नाम की औरत से उनके संबंध हैं. मैं सब कुछ जानकर भी चुप हूं.  माउंट आबू इनकी काव्य गोष्ठी में गई थी. रीमा को लेकर विवाद हुआ, तो ये तैश में आ गए. मुझे धक्का दिया और नतीजा टूटा हाथ लेकर मैं यहां आई. कविता और औरतों का इन्हें नशा है.”

“तूने यह सब पहले क्यों नहीं कहा? क्यों जताती रही कि तुम आदर्श दंपत्ति हो?”

उत्तेजना से मनस्वी बोली, तो वह फूट-फूटकर रो पड़ी. कुछ संभली तो कहने लगी, “पागल हूं न, क्या करूं. जो नहीं मिला, उसे कल्पना में ही जी लेती थी. यथार्थ में तो कवि की पत्नी होने की प्रताड़ना मिली है, सो सह रही हूं. सत्य की कठोर भूमि पर चलते-चलते पांव में छाले पड़ जाते, तो कुछ देर मिथ्या झूठे रूमानी मधुर दाम्पत्यिक क़िस्सों के सलोने झूले में सुस्ता लेती.”

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“मत सह. अपनी नौकरी संभाल और ख़ुद को संभाल. जो नहीं मिला, उसके पीछे मृगतृष्णा-सी मत भाग.”

“कहना आसान है, पर सहना तो पड़ेगा ही अपने बूढ़े माता-पिता के लिए, जिन्होंने बड़ी मुश्किल से मेरे साधारण रंग-रूप के चलते बड़े श्रम से सुशांत को ढूंढ़ा है.”

“तो क्या, जब तक माता-पिता हैं, तू सहेगी?”

“हां, और तब तक ही क्यों, शायद हमेशा के लिए सुशांत मेरा हो जाए… हो सकता है हम दो से तीन हो जाएं. मेरी तरफ़ से प्रयास जारी है, शायद आनेवाला अपनी क़िस्मत के साथ मेरी क़िस्मत भी लेकर आए.”

“तू पागल है, मृगतृष्णा में जी रही है. चल अभी, सुशांत का असली चेहरा सबके सामने ला.”

“नहीं-नहीं, ऐसा मत बोल, तू किसी को कुछ नहीं बताएगी. जो तिलिस्म मैंने अपने रिश्ते का बनाया है, सबके सामने उसे टूटते मैं नहीं देख सकती. सब मुझ पर हंसेंगे. मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी. मनस्वी तुझे मेरी  क़सम, जो किसी से कुछ कहा.”

“हे भगवान, तू इन हालात में भी किसी तीसरे के बारे में सोच सकती है. मुस्कुरा और हंस सकती है, ये सब मेरी कल्पना से परे है.”

“मेरे पति स़िर्फ मेरे प्रति पूर्ण समर्पित हैं, ये ख़्याल मुझे आभासी ख़ुशी देता है, मेरे होंठों पर मुस्कान लाता है. लोग जो मेरे प्रति ईर्ष्या महसूस करते हैं, क्या ये सब सुशांत से अलग होने पर संभव होगा? सब मेरे प्रति दया भाव रखना शुरू कर देंगे. या फिर क्या पता, कोई फ़ायदा उठाने की सोचे. बेचारी का तमगा लगाकर मैं नहीं घूम सकती. मेरी क़सम खा मनस्वी कभी किसी को कुछ नहीं बताएगी.” सुकन्या हाथ जोड़े प्रार्थना कर रही थी. मनस्वी वहां और ठहर नहीं पाई.

कौन कह सकता था कि वह आज के ज़माने की अपने पैरों पर खड़ी आधुनिक महिला की बात सुन रही थी, जो छलावे के बुलबुले के संग खेलकर अपना मन बहला रही थी. बुलबुला फूट चुका था. वह और ताक़त से फूंककर बुलबुला बनाने में जुटी थी.

जब तीन दिन बाद अख़बार में सुशांत की तस्वीर छपी थी. ‘नारी गौरव’ की रक्षा हेतु पढ़े काव्य पाठ में उनकी कविता सर्वश्रेष्ठ कविता के रूप में चुनी गयी थी. ऑफिस में फुसफुसाहट थी, कितनी क़िस्मतवाली है न सुकन्या, कितनी सुंदर कविता है दोहरी ज़िम्मेदारी निभाती नारी का क्या सुंदर वर्णन हुआ है. मन से श्रद्धानत होते हुए पत्नी पर क्या ख़ूब लिखा है. ‘सुकन्या, लगता है तू शब्द दर शब्द कविता में ढल गई है.’… ‘यू आर सो लकी, पति कितना सोचते हैं…’

कोई कह रहा था, तो किसी ने कहा ‘भई, भावुक कवि… पति शब्दों और भावनाओं की कमी कहां.’ मनस्वी का जी चाहा अपने कान बंदकर ज़ोर से चीखे. नहीं, ये पंक्तियां सुकन्या के लिए नहीं हैं.  वह संस्कारविहीन इंसान कहलाने लायक नहीं है. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उसने सिर उठाया, तो सुकन्या के चेहरे पर एक अभूतपूर्व चमक देखी.

“तो आज जलेबी-समोसा सुकन्या मैडम की तरफ़ से.”

“हां-हां, क्यों नहीं.” सुकन्या प्रफुल्लित-सी कह रही थी.

सुकन्या के चेहरे का ओज उगते सूरज-सी लाली दे रहा था, सब भ्रमित थे, पर वो जानती थी, अंधेरा होनेवाला है. वह उसके चेहरे को ध्यान से देख रही थी और सुकन्या सतर्क-सी उसे सावधान कर रही थी, कहीं उसके चेहरे पर हंसी की रेखा धूमिल न हो.

Minu tripathi

       मीनू त्रिपाठी

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कहानी- चली-चली रे पतंग (Short Story- Chali-Chali Re Patang)

‘अब जब सब चैन से हैं, तो लोगों को क्यों दर्द हो रहा है? कभी हवाहवाई, तो कभी चली-चली रे पतंग देखो… गा-गाकर छेड़ते हैं. पता नहीं लोग अपनी ज़िंदगी से ज़्यादा दूसरों की ज़िंदगी में दख़ल क्यों देते हैं? मैंने तो बच्चों को भी आज़ाद कर दिया. रहने दो उन्हें इसी सब में ख़ुश. अच्छा ही तो है किसी को ख़ुशी देना.’ वह मुस्कुराई.

Hindi Kahani

तिरपन वर्षीया उर्वशी आईने में संवरते हुए अपने दो-चार चमकते उन चांदी के तारों को देख रही थी, मानो वे उसकी उम्र की गवाही देने ज़बर्दस्ती उतर आए हों, जबकि उसका रूप लावण्य उसे 40 से ज़्यादा की मानने को तैयार न था. आंखों में वही चमक, शरीर में वैसा ही कसाव, खिलता गेहुंआ रंग, संतुलित कद-काठी, कोई भी कपड़े पहनती, तो उसका रूप खिल-खिल जाता.

पति अनंत को दुनिया से गए 17 साल बीत गए. एक अरसा निकल गया. कब तक रोती. आख़िर बेटे अनन्य और अक्षुण की परवरिश करनी थी. पुरातनपंथी ससुरालवालों के विरोध करने पर भी उसने अनंत की ही कंपनी में जॉब हासिल कर ली थी. अपने अच्छे पढ़े-लिखे होने का उसे फ़ायदा मिला. वह लगन और मेहनत से दिन-ब-दिन तऱक्क़ी करती चली गई. 50 की होते-होते दोनों बच्चों को उसने सेटल कर दिया. मिलनसार हंसमुख उर्वशी अपनी मीठी ज़ुबां से सबका मन मोह लेती. बहुत से स्त्री-पुरुष उसे अपना दोस्त मानने लगे थे. अपनी समस्या उससे शेयर करते, जिनका समाधान अक्सर उसके पास होता. दूसरों की मदद कर उसे बहुत ख़ुशी मिलती. उसका यूं खुले दिल से सबसे घुलना-मिलना कुछ लोगों को रास न आता, जिसमें पड़ोसी और रिश्तेदार सभी थे, लेकिन उस पर कोई असर न होता.

आज वो फिर तैयार होकर जयेश सर के घर जा रही थी. जयेश अग्रवाल उसके बॉस थे. ऑफिस के कामों में बिल्कुल परफेक्ट, पर घर के मामलों में जल्दी घबरा उठते. लड़केवाले उनकी बेटी को देखने आ रहे थे. पत्नी गांव की थीं, कुछ

ऊंच-नीच न हो जाए, इसलिए उनकी बेटी भी चाहती थी कि उर्वशी आंटी आ जाएं. वह उर्वशी से जब भी मिली, उसके अपनेपन और अपनी पीढ़ी जैसे नए विचारों से बेहद प्रभावित हुई थी.

“फिर कहां चली बनी-ठनी पतंग बनके मैडम हवाहवाई, छुट्टी के दिन तो चैन से बैठा करो घर पर हम सहेलियों के साथ. किट्टी में भी ज़माने से नहीं शामिल हुई.” बगलवाली मिसेज़ माथुर ने टोक दिया.

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“हां, बच्चे जो यहां नहीं, तो फ़ायदा क्यों न उठाए?” मेड को सब्ज़ी दिलवाती तारा चावला ने मुस्कुराते हुए चुटकी ली.

“हां, हम तो यूं ही घर में उलझी रह जाती हैं, घर का मैनेजमेंट, पूजा-व्रत, रिश्तेदारी इनके जैसे आज़ाद परिंदे हम कहां…”

“आज इस डाल पर कल उस डाल पर…” ऑटो से उतरी नैना वोहरा ने जोड़ दिया, तो सभी खिलखिलाकर हंस पड़ीं. कार बाहर निकालते हुए उनकी फ़ब्तियां उर्वशी के कानों में भी पड़ीं, जिसकी वह अब तो आदी हो चुकी थी. उसने मुस्कुराकर सबको बाय किया और आगे निकल गई.

उसके जाने के बाद भी औरतें उसके बारे में बातों का पूरा ग्रंथ रच डालतीं. ‘क्या जवाब दे ऐसे लोगों को जिन्हें जीना नहीं आता. वे आंख मूंदकर उसी पुराने ढर्रे पर चलना चाहती हैं, ज़रा भी बदलना नहीं चाहतीं.’ एक ही खोल के अंदर जीते-मरते हैं, बस यह सोचकर कि लोग क्या कहेंगे.’

एक बेटा लंदन में सेटल है और एक ने इसी शहर में अपनी ससुराल के पास घर ले लिया है, तो क्या करें, इनके जैसे माथा पीटें, रोएं बैठकर कि अकेले रह गए, ज़िंदगी बेकार हो गई. अब ज़िंदगी में जीने के लिए बचा क्या’ सोचते हुए उर्वशी ने गर्दन झटकी. मन ही मन मुस्कुराई और चल दी. अभी तो सही समय है कुछ करने का, अपने दायित्व सब पूरे हो गए. कुछ अपने लिए, कुछ औरों के लिए बस कुछ न कुछ नया करते जाना, सीखते जाना है.

उर्वशी लौटी, तो उसके चेहरे पर बड़ी तसल्ली की रौनक़ थी. जयेश सर की लड़की दिव्या का रिश्ता तय हो गया था. तुरंत ही सगाई की रस्म भी कर दी गई. उर्वशी ने सब बख़ूबी संभाल लिया था. जयेश का पूरा परिवार बहुत ख़ुश था. सारे लोग तो उसे अपने से लगते. चेंज करके जब वह बेड पर आई, तो सोचने लगी, कहां है वह अकेली? इतने लोग, इतने परिवार, इतने काम हैं यहां करने को, अभी खाली कहां? अकेली कहां? उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई. चश्मा उतारा और जाने वह कब नींद की आगोश में खो गई.

उर्वशी की औरों से अलग अपनी अनोखी दुनिया थी. वह बेहद क्रिएटिव थी, जिनके लिए उसे समय कम पड़ता. अपने इतने सारे शौक़ थे, फुर्सत में होती, तो कोई भी अपने पेंडिंग शौक़ के काम उठा लेती और चाव से मसरूफ़ हो जाती. नए गीत-ग़ज़ल लिखना, सुनना, गुनगुनाना, पेंटिंग, स्केच करना, नया प्लांट लगाना, कभी किचन में नई रेसिपी ट्राई करना या नया कुछ ईज़ाद करना.

कुछ न कुछ नया सीखते-करते रहना उसे अच्छा लगता, वरना वो बेचैन हो जाती. शादी के बाद ज़िम्मेदारियां संभालने में उसे व़क्त ही कहां था अपनी रुचि के काम करने के लिए. परिवार के साथ दायित्व निभाते हुए भी ख़ुश तो बहुत रही, पर अंदर से अनमयस्क-सी रही. कुछ छूटा-सा लगता था, तो अब ज़िंदगी का पूरा आनंद उठा  रही थी.

लोगों के कमेंट पर यही सोचती ‘पता नहीं पड़ोसिनों, रिश्तेदार महिलाओं को क्या परेशानी है. नहीं आता उनकी बातों में उसे मज़ा तो क्या करे? एक ही ढर्रे की बातें, वही टॉपिक, नई ड्रेस, साड़ी, शॉपिंग रेट, नई ज्वेलरी, नई गाड़ी या किसी की लड़की का किसी के साथ चक्कर, व्रत-पूजा-पाठ, सिद्ध बाबा के प्रवचन,

भजन-कीर्तन, मंदिर, तीर्थदर्शन या सास-ननद-पति पुराण और कैसे भूला जा सकता है उनका मेड-सर्वेंट चैप्टर… उफ़्फ़’ उर्वशी का दिल कांप उठता.

वह सोचती कम से कम ऑफिस कलीग्स या दोस्त ऐसी बेकार की बातें कर मेरा दिमाग़ और वक़्त तो नहीं ज़ाया करते. उनके साथ योग, वॉक, कभी कोई नेक काम, किसी की मदद के लिए चली जाती. फुर्सत होती, तो कभी अपने शौक़ पूरे करती. कभी दोस्तों के संग टेबल टेनिस-बैडमिंटन खेलती या कभी पिकनिक, टूरिस्ट प्लेस, कभी मूवी, बाहर रेस्टोरेंट में डिनर, तो कभी घर पर अपना बनाया स्पेशल लंच-स्नैक्स कराती. इसके अलावा कभी बेटे-बहू-बच्चे आ जाते या वो ख़ुद जाकर मिल आती बच्चों से, तो क्या बुरा है जीवन? उसने ख़ुद ही तो चुना था ये जीवन.

बहू शालिनी वैसे तो मॉडर्न ख़्यालों की थी, पर सास की आज़ादी से उसे भी अपने मायकेवालों की तरह ही गुरेज था. कहती, “इस उम्र में ये सब आवारगी-सी है. ये इतना खुलापन आज़ादी आपको शोभा नहीं देती. लोग बातें बनाते हैं, बदनामी होती है हमारी.”

वह जानती नहीं क्या? शालू अलग घर चाहती थी. इस बहाने अपने पति राघव को वो मायके के पास ही खींच ले गई. ज़िद करके वहीं एक दूसरा घर भी बनवा लिया. राघव ने तो बहुत कहा कि मां के बिना वह दूसरे घर में हरगिज़ रहने नहीं जाएगा, पर उर्वशी बच्चों की ख़ुशी समझ रही थी.

उसने राघव को समझाया, “तो इसमें ग़लत क्या है? ठीक ही है ना, सोसायटी के ये छोटे-छोटे फ्लैट हैं. घर में बच्चे के लिए खेलने की जगह कम है. वहां उसका मायका पास है. शालू ख़ुश रहेगी, मेरे पोते शैंकि को भी उसके मामा के बच्चे खेलने के लिए मिल जाया करेंगे और जगह भी. यह भी तो देख न, हम रहते तो एक छत के नीचे हैं, पर कितनी देर साथ बैठ पाते हैं. सभी अपने-अपने कामों में बिज़ी रहते हैं. ऐसे वीकेंड पर कभी तुम सब, कभी मैं

आते-जाते रहेंगे. जब चाहे वैसे भी मिलते रहेंगे. शालू ख़ुश रहेगी, तो तुझे भी ख़ुश रखेगी. तुम सब ख़ुश रहोगे, तो मैं भी ख़ुश और चाहिए भी क्या… बेकार की मेरी चिंता मत कर. इतने सारे शौक़ हैं मेरे, अकेली कहां हूं मैं? फिर यहां कितनी यादें बिखरी पड़ी हैं चारों ओर, जो मुझे जीवन से जोड़े रखती हैं.” किसी तरह उर्वशी राघव को समझा पाने में सफल हुई थी.

‘अब जब सब चैन से हैं, तो लोगों को क्यों दर्द हो रहा है? कभी हवाहवाई, तो कभी चली-चली रे पतंग देखो… गा-गाकर छेड़ते हैं. पता नहीं लोग अपनी ज़िंदगी से ज़्यादा दूसरों की ज़िंदगी में दख़ल क्यों देते हैं. मैंने तो बच्चों को भी आज़ाद कर दिया. रहने दो उन्हें इसी सब में ख़ुश. अच्छा ही तो है किसी को ख़ुशी देना.’ वह मुस्कुराई.

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आसमान पर बादलों की टोलियां ठंडी हवाओं के साथ मस्ती में उड़ रही थीं. वह धीरे-धीरे ख़ुद ही गुनगुना उठी- चली-चली रे पतंग, देखो चली रे… उसने वॉर्डरोब से धानी रंग की साड़ी निकाली और पहनकर आईने के सामने आ खड़ी हुई. काला बॉर्डर उसकी खुली रंगत पर ख़ूब खिल रहा था. बालों को संवारा, पर बांधने को दिल नहीं किया उसका.

आज सच में दिल की पतंग आसमान छूने उड़ी-उड़ी जा रही थी. उसने ग़ज़लों का बज रहा रिकॉर्ड बंद कर दिया. अपना गाना उसे अधिक रुचिकर लग रहा था. सुबह बना रही पेंटिंग को उसने झीने कपड़े से कवर किया. खुली कलर ट्यूब के ढक्कन बंद करके उसने सैंडल पहनी. मोबाइल और पर्स उठाया, घर लॉक किया और गुनगुनाते हुए बाहर पैदल ही निकल आई.

पास के मार्केट से बड़ा-सा केक लिया और छोटे-छोटे बहुत सारे गिफ्ट्स. आज फिर उसे ‘आशियां’ अनाथालय जाना था. वहां किसी बच्चे का जन्मदिन है. वह देर-सबेर ज़रूर पहुंचती. आज तो संडे ही था. वह ढेर सारे पैकेट्स के साथ सुहावने मौसम का मज़ा लेते आहिस्ता-आहिस्ता चलते हुए घर लौटी, तो सब्ज़ी लेते-लेते गप्पे लड़ा रही पड़ोसिनों के कमेंट शुरू हो गए.

“कहां की तैयारी है मैडम हवाहवाई! संडे को भी पतंग बनी लहराती-इठलाती कहां से आई, कहां को चली?”

“आज कोई दोस्त आ नहीं रहे क्या?”

“कितने सारे दोस्त हैं इनके… आज  कोई भी नहीं…” चुटकी ली गई थी.

“औरतें कम, पुरुष ज़्यादा ये नहीं ध्यान दिया?” वही व्यंग्यात्मक सम्मिलित हंसी.

“पतंग-सी उड़ना है, तो किसी से डोर बांध क्यों नहीं लेती? कोई देखनेवाला तो है नहीं, आज़ाद हो.”

“एक कट गई, तो कोई और डोर मिल जाएगी भई…” वही ठहाके.

“बताओ तो हमें भी चली-चली रे पतंग कहां चली रे…?”

मन तो कर रहा है गाकर ही सुना दूं इन्हें. चली बादलों के पार अपनी कार पे सवार…सारी दुनिया ये देख-देख जली रे… बादल झूमेंगे, तो मोर को नाचने से कौन रोक पाएगा भला… पर क्या बताए इनको, इन्हें कुछ सही समझ आएगा क्या भला? बस, इसी तरह की बकवास बातों में ही इनकी ज़िंदगी का आनंद है. कुछ कहूं तो पल्ले पड़नेवाला नहीं. वह जवाब में उन्हें क्या बोलती, “बस यूं ही.” कहकर मुस्कुरा दी.

सारे उपहार पैकेट्स कार में डाले, फिर सामने ठेले पर से अपने लिए नमक नींबू लगा गर्म भुट्टा ख़रीदा, दांतों में दबाया और मौसम का आनंद लेते हुए उत्साह से चल पड़ी ऐसे गंतव्य की ओर, जहां बहुत सारे नन्हें उत्कंठापूर्वक उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे.

Neerja Shrivastav

डॉ. नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू’

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कहानी- जीत गई ज़िंदगी (Short Story- Jeet Gayi Zindagi)

इस अंतिम अस्पताल में वह यंत्रवत घुसा. निराशा से चारों ओर नज़र दौड़ायी, पर असफल रहा. वापस जाते पैरों को किसी के कराहने की आवाज़ ने रोक लिया. मुड़कर देखा, कोने के बेड पर हाथों में नलियां, वेंटीलेटर लगाए कोई लेटा था. गौर से देखा, वह रिया ही थी… उसे अपनी आंखों और क़िस्मत पर विश्‍वास ही नहीं हो रहा था. वह रिया के माथे पर हाथ फेरने लगा, “रिया… उठो… मैं आ गया हूं… उठो… रिया…” मगर वह बेहोश हो चुकी थी. उसका हाथ अपने हाथों में लिए, उससे माफ़ी मांगता, बातें करता प्रतीक रातभर जागा रहा. इस भयानक बम विस्फोट में रिया के बचने को एक चमत्कार मान ईश्‍वर की ख़ूब मिन्नतें करता रहा.

Hindi Short Story

रिया का मन आज सुबह से ही कच्चा हो रहा था. फटाफट काम निपटाते हाथ प्रतीक की आंखों में अपने लिए चिढ़ और नफ़रत के सम्मिश्रित भाव देख ठिठककर रह गए. कहां चूक गई वह? मल्टीनेशनल कंपनी के हज़ारों लोगों को संभालती सीईओ काफ़ी कोशिशों के बावजूद अपना घर बिखरने से नहीं बचा पाई. मन में दबा दुख और आंसुओं का आवेग आंखों के रास्ते बाहर आना चाहता था. किसी तरह ज़ब्त कर गई रिया. चुप-सी उदास दीवारें और पराए होते अपने के बीच रहना बहुत मुश्किल लग रहा था. आहत् अहम् ने न जाने किन आक्रोश भरे क्षणों में अलग होने का निर्णय ले लिया. उसी की काग़ज़ी खानापूर्ति के लिए दोनों चार बजे वकील के पास आने वाले थे.

घर से निकलते हुए रिया के पैरों में मानो बेड़ियां पड़ गईं. एक लंबी सांस ले पूरे घर को आंखों में समेटते बाहर निकली. मानो अब शायद ही वापसी हो.

वकील के यहां तलाक़नामे पर हस्ताक्षर करते रिया के हाथ एकबारगी कांपे. कनखियों से देखा… प्रतीक का भी यही हाल था. दोनों ख़ामोशी के साथ ही बाहर निकले. चर्चगेट स्टेशन पहुंचते ही प्रतीक ने चुप्पी तोड़ी.

“तुम घर पहुंचो, मैं बाद में आऊंगा.” और उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही दरवाज़े से बाहर निकल गया.

‘अब मेरा साथ घर तक भी गवारा नहीं.’ मन रो उठा रिया का. शायद बाहर की मूसलाधार बारिश भी उसका साथ दे रही थी.

लोकल ट्रेन में बैठते ही उसके विचारों की श्रृंखला फिर शुरू हो गयी. कितना प्यार किया करते थे दोनों एक-दूसरे से. प्रेम में आकंठ डूबे रहते. दोनों के परिवार इस शादी के ख़िलाफ़ थे. सारी कठिनाइयां झेलते, आपसी विश्‍वास के सहारे दो वर्ष का लंबा अंतराल गुज़र गया था. बीतते समय ने प्यार की नींव और मज़बूत कर दी थी. लेकिन दोनों के परिवारवालों का दिल फिर भी नहीं पिघला. अब और इंतज़ार न करते हुए दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली. दहलीज़ लांघते ही रिया अय्यर रिया प्रतीक माथुर बन गई. जीवन में ख़ुशियां ही ख़ुशियां थीं. ऑफ़िस से घर लौटने का दोनों को बेसब्री से इंतज़ार होता, लेकिन धीरे-धीरे यह प्यार न जाने कहां खोता चला गया. प्यार की जगह कड़वाहट ने ले ली थी.

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ब्रांद्रा स्टेशन पास आने लगा. विचारों को झटक रिया उठकर दरवाज़े तक आई कि अचानक भयानक आवाज़ से ज़ोरदार बम विस्फोट हुआ. वह कुछ समझ पाती, इससे पहले ही ज़ोरदार धक्के से वह दरवाज़े के बाहर फेंक दी गई. सिर झनझना उठा. चारों ओर ख़ून ही ख़ून, मांस के लोथड़े और चीत्कारें. अर्द्धचेतनावस्था में ही उसने देखा कुछ लोग उसे उठाकर दौड़ रहे हैं. दर्द की एक टीस पूरे शरीर में फैल गई. आंखों के आगे अंधेरा छा गया. शायद बेहोश हो गई थी वह.

प्रतीक थके-थके क़दमों से घर जाने के लिए चर्चगेट पहुंचा. बाहर की दुनिया से बेख़बर अपनी ही धुन में खोया था. स्टेशन पर ख़ूब भीड़ थी. लोग बातें कर रहे थे.

“पिछले ह़फ़्ते तेज़ बारिश ने दम निकाल दिया. उसके बाद भिवंडी में हुआ दंगा दहशत फैला गया. दो दिन पहले शिवसेना की तोड़-फोड़ से डरे लोग संभले भी नहीं थे कि आज 11 जुलाई का ये बम विस्फोट. पता नहीं और क्या-क्या देखना बाकी है.”

बम विस्फोट..? प्रतीक के कान खड़े हो गए. पूछने पर पता चला सात जगहों पर बम विस्फोट हुए हैं और वो भी प्रथम श्रेणी के डिब्बे में. प्रतीक के तो होश उड़ गए. हाथ-पैर कांपने लगे.

“रि…या…” वह ज़ोर से चिल्लाया. सिर पकड़कर नीचे बैठ गया और दहाड़े मारकर रोने लगा. विस्फोट 6.24 को बांद्रा में हुआ था और रिया उसी ट्रेन में थी.

लोगों ने प्रतीक को संभाला और उसे फ़ोन करने की सलाह दी. “हां… हां… फ़ोन करता हूं…” कांपते हाथ न जाने कितनी बार डायल करते रहे, पर फ़ोन नहीं लगा, ना ही मोबाइल और ना ही घर का. लगता भी कैसे, लगभग सभी मुंबईवासी और दूसरे शहरों में रहनेवाले लोग अपने घरवालों और रिश्तेदारों की सलामती जानने के लिए फ़ोन कर रहे थे. इससे सारे नेटवर्क जाम हो गए थे.

काफ़ी रात हो गई थी. प्रतीक जल्द-से-जल्द बांद्रा पहुंचना चाहता था, पर ट्रेनें रद्द हो गई थीं. लोगों का बड़ा-सा हजूम चर्चगेट से भाईंदर और विरार तक पैदल ही भूखा-प्यासा अपने-अपने घरों की ओर भाग रहा था. अनेक शंका-कुशंकाओं के साथ कि कहीं हमारा कोई अपना तो इस विस्फोट में नहीं…? इन भागते पैरों को ताक़त देने के लिए लोग रास्तों में मदद के लिए खड़े थे. स्थानीय निवासी और सेवाभावी संस्थाओं के कार्यकर्ता तो पीने के पानी से लेकर चाय-बिस्किट तक बड़े ही अनुशासित तरी़के से बांट रहे थे, कहीं-कहीं आग्रह के साथ और कहीं मीठी ज़बरदस्ती के साथ. उन अनजान लोगों का प्रेम और अपनापन देख प्रतीक की आंखें बरबस ही गीली हो गईं.

किसी तरह प्रतीक बांद्रा स्टेशन पहुंचा. वहां का दृश्य देखकर उसका दिल दहल गया. मृतकों के शरीर के अवयव जहां-तहां पड़े थे. हाथ कहीं, तो पैर कहीं. सब ओर ख़ून और मांस के चीथड़े. दर्द से चिल्लाते घायल लोगों का बिखरा सामान, ट्रेन की टूटी हुई ख़ून से सनी खिड़कियां, उखड़ी हुई सीटें, विस्फोट की तीव्रता बयान कर रही थीं. आस-पास के लोग घर में डरकर, दुबककर बैठने की बजाय घायल लोगों को जल्द-से-जल्द अस्पताल पहुंचा रहे थे. घर की चादरों और साड़ियों से स्ट्रेचर का काम लिया जा रहा था.

“कहां हो… रिया…” प्रतीक की मानो धड़कनें रुक गई थीं.

“अरे बाबा… यहीं तो हूं… तुम भी ना… ख़ामख़ाह… बेकार शोर मचाते हो.” प्रतीक की जान में जान आई. आंखों में चमक लिए उसने मुड़कर देखा. ओह…. नहीं…. यह तो उसका भ्रम था. ये तो घर के रोज़मर्रा के संवाद थे. प्रतीक पुकारता और रिया ऐसे ही जवाब देती. उसकी प्रोजेक्ट रिपोर्ट के लिए रात-रात भर जागती. उसके साथ विभिन्न संदर्भ ढूंढ़ती, उसका मार्गदर्शन करती रिया उसे याद आने लगी.

काम करते-करते झपकी लगने पर वह सो जाता, परंतु सुबह उसे सारी रिपोर्ट टाइपिंग कर प्रिंटआउट के साथ तैयार मिलतीं. यह रिया का ही कमाल था, जबकि उसे भी सुबह घर के सारे काम निपटाकर ऑफ़िस जाना पड़ता था.

एक दिन उसके बीमार होने पर मना करने के बावजूद रिया अपना प्रेज़ेंटेशन छोड़ सारा दिन उसके सिरहाने बैठी रही, जबकि इस प्रेज़ेन्टेशन के बाद उसे प्रमोशन मिलना तय था. पुरानी बातें याद कर सोच में पड़ गया प्रतीक. ऐसी गुणी, प्रतिभा संपन्न, प्यार करनेवाली पत्नी को वो तलाक़ देने जा रहा था. रिया का पहले खा लेना, उसे खाने के लिए ना पूछना, घर को सलीके से ना रखना या प्रतीक का चीज़ें बेतरतीब रखना, गीला तौलिया बिस्तर पर डाल देना, एक-दूसरे के लिए व़क़्त न होना… ये सब तो इतने बड़े झगड़े की वजह नहीं हो सकती कि तलाक़ ही ले लिया जाए. क्या हमारा ईगो हमारे प्यार से बड़ा हो गया था? और इस प्यार का एहसास होने के लिए क्या इस हादसे का होना ज़रूरी था? यदि वह पहले ही समझ पाता तो शायद रिया को इस तरह ना खोता, धिक्कार है उस पर.

“कहां हो.. रिया…” चलते-चलते थक गया था प्रतीक. एक ओर भय से पागल मन और दूसरी ओर टीवी पर दिखता हाहाकार उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल चक्कर काटने पर मजबूर कर रहे थे.

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अस्पतालों की अवस्था तो और भी विकट थी, चारों ओर शोर ही शोर. “हैलो… पचास बेड और भिजवाओ… एम्बुलेंस प्लेटफॉर्म पर भेजो… सर्जन एनस्थेटिस्ट को कॉल करो… साथ ही सांत्वना के शब्द घबराओ मत… सब ठीक होगा… डॉक्टर जी जान से सेवा में लगे थे. डॉक्टरों द्वारा रक्तदान की अपील करने से पहले ही अस्पताल के बाहर लगी लंबी लाइन ने दो घंटों में ही ख़ून का स्टॉक पूरा कर दिया. इस विलक्षण तेज़ी, भावना और अपनेपन ने प्रतीक को हिम्मत बंधायी और रिया के जीवित रहने की आस भी जगायी. उसे लगा पूरी मुंबई सारी रात नहीं सोयी है और उस जैसे अनेक शोकमग्न लोगों के दुःख में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से शामिल है.

इस अंतिम अस्पताल में वह यंत्रवत घुसा. निराशा से चारों ओर नज़र दौड़ायी, पर असफल रहा. वापस जाते पैरों को किसी के कराहने की आवाज़ ने रोक लिया. मुड़कर देखा, कोने के बेड पर हाथों में नलियां, वेंटीलेटर लगाए कोई लेटा था. गौर से देखा, वह रिया ही थी… उसे अपनी आंखों और क़िस्मत पर विश्‍वास ही नहीं हो रहा था. वह रिया के माथे पर हाथ फेरने लगा, “रिया… उठो… मैं आ गया हूं… उठो… रिया…” मगर वह बेहोश हो चुकी थी. उसका हाथ अपने हाथों में लिए, उससे माफ़ी मांगता, बातें करता प्रतीक रातभर जागा रहा. इस भयानक बम विस्फोट में रिया के बचने को एक चमत्कार मान ईश्‍वर की ख़ूब मिन्नतें करता रहा.

आज तीन दिन बाद रिया ने आंखें खोलीं. शायद यह प्रतीक का प्यार ही था, जो उसे मौत के मुंह से बचा लाया. वेंटीलेटर हटा दिया गया.

“अब ख़तरा टल गया है.” डॉक्टर बोले.

“थैंक्यू… डॉक्टर… थैंक्यू…” डबडबाई आंखों से प्रतीक डॉक्टर के पैरों पर गिर पड़ा. रिया आश्‍चर्यचकित-सी प्रतीक के उदास आंसू भरे चेहरे, सूनी आंखों और बढ़ी हुई दाढ़ी को देख रही थी. उसका हाथ अपने हाथों में ले प्रतीक बहुत कुछ कह रहा था, पर रिया कुछ भी समझ नहीं पा रही थी.

“विस्फोट की तीव्र आवाज़ से इनकी सुनने की शक्ति चली गई है.” डॉक्टर ने एक और आघात किया.

“घबराने की कोई बात नहीं, लगभग सभी पेशेंट्स की यही समस्या है. एक से तीन महीने में यह समस्या अपने आप ठीक हो जाएगी.” प्रतीक ने चैन की सांस ली.  हाथों में हाथ लिए दोनों बड़ी देर तक रोते रहे, पर ये ख़ुशी के आंसू थे. उनका प्यार ख़त्म थोड़े ही हुआ था, वह तो जमी हुई काई के नीचे ठहरे पानी की तरह था और अब तो यह जमी हुई परत भी हट चुकी थी. ज़िंदगी और मौत के बीच झूलती रिया ने प्रतीक को एहसास दिलाया था कि वह रिया से अब भी बेहद प्यार करता है. साथ ही यह भी कि छोटे-मोटे झगड़े तो हर गृहस्थी में होते रहते हैं, उन्हें ज़्यादा तूल देना ठीक नहीं. प्रतीक के इस प्यार, लगाव और देखभाल को रिया भी महसूस कर रही थी और पछता रही थी. सब कुछ पहले जैसा हो गया था. इस बम विस्फोट से न जाने कितनी ज़िंदगियां उजड़ गईं, मगर एक ज़िंदगी संवर गई.

रिया के मुंह से आश्‍चर्यमिश्रित चीख सुन प्रतीक ने सिर उठाकर सामने देखा. दोनों के परिवारवाले खड़े थे, जो टीवी में इन्हें देख यहां पहुंचे थे. इस भयानक

हादसे ने सारी कड़वाहट मिटा दी थी. सिर पर बंधी पट्टी, दोनों हाथों में जलने के ज़ख़्म और पैर में फ्रैक्चर लिए रिया ने उठने की कोशिश की.

“बस… बस… बहू… जल्दी से ठीक होकर घर आ जाओ.” प्रतीक की मां ने कहा. दोनों ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे. ख़ुशियां फिर लौट आई थीं. हां… ज़िंदगी जीत गई थी.

– डॉ. सुषमा श्रीराव

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