Short Story

“वहां कौन है?” उसकी आवाज़ सुन खिड़की पर खड़े साये में थोड़ी हरकत हुई, पर कोई जवाब नहीं मिला. वह खिड़की की तरफ़ लपकी. एक साया तेज़ी से उसकी खिड़की से हटकर मंदिर की तरफ़ जानेवाले रास्ते की तरफ़ मुड़ गया. एक पल के लिए लैंप पोस्ट की रोशनी पड़ी, तो उसमें स्पष्ट दिखा, वह मानवी की ही आकृति थी. वही पर रुककर वह आकृति पलटी और उसे बाहर आने का इशारा किया. वह सन्न खड़ी रह गई, तो क्या मानवी की आत्मा भटक रही है या मानवी अभी भी ज़िंदा है.

रात के लगभग सात बज रहे थे. पटना एयरपोर्ट पर लैंड करने के लिए प्लेन आकाश में चक्कर लगा रहा था. विंडो सीट पर बैठी सुनंदा की नज़रें पल-पल क़रीब आते एयरपोर्ट की झिलमिल करते सितारों-सी रोशनी पर टिकी हुई थी. पूरे चार बरस बाद उसके पांव भारत की धरती पर पड़नेवाले थे. अपनों से मिलने और अतीत के एहसास से जुड़ने का विचार ही मन को उद्वेलित कर रहा था. अपनों से मिलना और अपनी धरती से जुड़ना कितना सुखद होता है, यह वही बता सकता है, जो बरसों अपनी धरती से दूर रहा हो.
हमेशा की तरह, प्लेन के लैंड करने के बाद भी, वह सीट पर बैठी थोड़ा भीड़ के कम होने का इंतज़ार कर रही थी कि तभी उसके सामनेवाले सीट को थामनेवाली हाथ पर उसकी नज़र गई. वह एक बेहद ख़ूबसूरत किसी लड़की का लंबी, पतली, उंगलियों वाला हाथ था, जिसमें हीरा जड़ा अंगुठी दमक रहा था. न जाने क्यों वह हाथ उसे बहुत ही जाना-पहचाना, अपना सा लगा. अचानक उसे एक झटका सा लगा. ऐसा हाथ तो सिर्फ और सिर्फ़ मानवी का ही हो सकता था. हीरे के अंगुठी का भी उसे कितना शौक था. उसने मुड़कर उस औरत की तरफ़ नज़रें घुमाई. उसने अपना पूरा चेहरा ओढ़नी से ढ़क रखा था, फिर भी कद-काठी मानवी से ही मिलता-जुलता था. वह झट से अपना बैग उठाए, उस भीड़ का हिस्सा बन गई. जाने क्यों उसे लग रहा था, वह औरत दूर होते हुए भी तिरक्षी निगाहों से उसे ही देख रही थी.
तभी उसके पैरों में जैसे ब्रेक लग गया. अपने बचपन की सहेली मानवी से मिलता-जुलत, कद-काठी देखकर जिस लड़की के पीछे, सुनंदा भाग रही थी, वह मानवी कैसे हो सकती थी? आज से पूरे छह साल पहले उसकी आंखों के सामने जिस मानवी के अस्तित्व का विसर्जन गंगा में कर दिया गया था, उसके दिख जाने का प्रश्न ही नहीं उठता था. पर मन का कोई क्या करे. जहां भी थोड़ी गुंजाइश नज़र आती है, असंभव को भी संभव मान लेता है. सामान लेकर एयरपोर्ट से बाहर निकली, तो इधर-उधर उसकी निगाहें अपने ममेरे भाई सुबोध को खोजने लगी. इतने बरसों बाद यहां आना भी तभी संभव हो पाया था, जब मामाजी ने सुबोध की शादी हाजीपुर के अपने पुश्तैनी मकान से ही करने का फ़ैसला किया था.
सुबोध को ढूढ़ती उसकी निगाहें सामने एक काले रंग के कार पर पड़ी, जिसमें वह औरत बैठ रही थी. बैठने के दौरान अचानक उसके चेहरे से ओढ़नी सरक गई, जिससे उसका चेहरा अनावृत हो सुनंदा की आंखों के सामने आ गया. मानवी की ही सूरत थी, जिसे देख वह स्तब्ध रह गई थी. उसके नसों में दौड़ता खून जैसे जम गया था. वह जड़वत उसे निहारती रह गई. बस, पल-दो पल में ही कार का दरवाज़ा बंद हुआ और कार आगे बढ़ गई. कार के आगे बढ़ते ही सुनंदा को जैसे होश आया, वह मानवी का नाम पुकारते हुए, उसके पीछे भागी, पर कार तेज़ी से आगे बढ़ गई और सामने से सुबोध आ गया.
उसे संभलते हुए बोला, ‘दीदी, आपको हो क्या गया है? कहां भागी जा रहीं हैं?’’
सुबोध की आवाज़ से जैसे उसकी चेतना वापस आ गई.
‘‘कुछ नहीं.. यूं ही… कोई परिचित दिखा गया था.’’
उसके पांव स्पर्श कर सुबोध सामान गाड़ी में व्यवस्थित करने लगा. जब दोनो एयरपोर्ट से बाहर निकले, सुबोध ख़ुश होते हुए बोला, “दी, मुझे तो अपनी आंखों पर विश्‍वास नहीं हो रहा है कि सचमुच आप मेरी शादी में आ गई हैं.’’
‘‘अपने सबसे प्यारे भाई की शादी में भला मैं कैसे नहीं आती?’’
फिर दोनों बातों में मशगूल हो गए. कुछ देर तक इधर-उधर की बातें करने के बाद अचानक मन में मानवी को लेकर उमड़ते-घुमड़ते प्रश्‍न होंठों पर आ ही गए थे, “सुबोध, तुम भी तो उस दिन सबके साथ थे, जब मानवी को लोग श्मशान घाट ले गए थे. क्या तुम लोगों ने वास्तव में मानवी को ही जलाया था या वह कोई और थी.’’

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“अचानक ये आप कैसे प्रश्‍न कर रही हैं दी? मानवी को मरे हुए लगभग छह साल गुज़र गए. ख़ुद उसके चाचा ने उसकी शिनाख्त की थी. उसके अस्थि विसर्जन के समय आप भी वहां उपस्थित थी. फिर भी…’’ वह वाक्य अधूरा छोड़कर उसे ऐसे देखने लगा जैसे उसका दिमाग़ बौरा गया हो.
वह सुबोध की शादी में आई थी, दूसरी कोई बात पूछने के बदले मानवी के विषय में पूछना उसे ख़ुद ही अटपटा-सा लगा. वह थोड़ी लज्जित होते हुए बोली, ‘‘सुब्बु, तू तो मेरा बचपन से राज़दार रहा है, फिर मैं आज कैसे तुमसे ये ना कहती कि अभी थोड़ी देर पहले, मैंने एयरपोर्ट पर मानवी को देखा था. तुमने भी तो मुझे उसके पीछे भागते देखा था.’’
“इतने दिनो बाद आप आईं हैं, तो अपनी बेस्ट फ्रेंड की याद आ जाना स्वाभाविक है. हो सकता है उसकी यादों में उलझा आपका दिमाग़ किसी दूसरी लड़की में उसे ढूंढ़ लिया हो. आप हैं भी तो बहुत भावुक न.”
उसे हल्के से चपत जमाते हुए हंसकर सुनंदा बोली, ‘‘चुप कर… ज़्यादा अपनी साइकोलाॅजी मत बघार. इतनी अक्ल है मुझमें.’’
बातें करते-करते पटना से हाजीपुर का रास्ता, जो क़रीब आधे घंटे का था कब समाप्त हो गया पता ही नहीं चला. जब कार उसके चिर-परिचित ननिहाल के दरवाज़े पर आ रुकी, उसकी ख़ुशी का पारावार न रहा. सामने ही मामी खड़ी उसी का इंतज़ार कर रही थीं. वह कार से उतर कर सीधे उनके गले से जा लगी. मामी उसे अपनी बांहों के घेरे में लिए अंदर आ गईं. बरसों बाद, एक बार फिर उनकी आत्मियता और प्यार ने उसे अंदर तक भीगो दिया.
वैसे भी मामी उसकी मां से कम नहीं थीं. मां के इस दुनिया से जाने के बाद वह मामी के ममता के आगोश में ही पली-बढ़ी थी. मामा -मामी की इकलौती संतान सुबोध उसके लिए अपने भाई से भी बढ़कर था. यही उसे मानवी जैसी दोस्त मिली थी, जो उसकी बहन जैसी थी. फिर भी जब मानवी मुसीबत में पड़ी, तो वह उसकी सहायता नहीं कर पाई थी, जिसका मलाल आज तक उसे सालता है. तभी मामी की आवाज़ ने उसे चौंका दिया था.
‘‘कहां खो गई बिटिया… परदेश क्या बसी हम सब तो तेरे लिए बेगाने ही हो गए.”
‘‘नहीं मामीजी, ऐसा कैसे हो सकता है? इस दुनिया में आप से ज़्यादा मेरा अपना कोई नहीं है. आप ही मेरी मां हो.’’
शादी-ब्याह के माहौल में मामी को कैसे समझाती कि जब से आई है, उसका मन मानवी में ही उलझा हुआ था. न जाने क्यूं, धीरे-धीरे उसका विश्‍वास पक्का होने लगा था कि मानवी ज़िंदा है. वह पूरे दो महीने की छुट्टी में आई थी. कितने ही लोगों से मिलना था. अब जाने कब आना संभव हो. वह सोचकर ही आई थी कि इस बार निश्चित रूप से मानवी के मौत की मिस्ट्री सुलझा कर ही जाएगी. पर शादी के माहौल में वह इसकी चर्चा किससे करे? कैसे करे, कुछ समझ नहीं पा रही थी. घर आए लोगों और रिश्तेदारों से ही बातें करने में व्यस्त थी.
रात में मामी ने उसका बिस्तर उसके उसी पुराने चिर-परिचित कमरे में लगवा दिया था, जिसके ईंट-ईंट पर अतीत की यादें बिखरी पड़ी थीं. बेहद थके होने के बावजूद सुनंदा की आंखों से नींद कोसो दूर था. वह टहलते हुए खिड़की के पास तक आ गई थी. खिड़की से सामने ही मानवी के घर का पिछला हिस्सा नज़र आ रहा था.
चांदनी रात में भी वह विशाल हवेलीनुमा मकान, अजीब तरह का मनहूसियत समेटे, किसी भूत बंगले से कम नहीं लग रहा था. उसने एक लंबी सांस ली. इस हवेली में न जाने कितने राज़ दफ़न थे. कभी हवेली के इस पिछले हिस्से में फल-फूलों से लदा एक सुंदर बगीचा हुआ करता था. वह जगह अब लंबे-लंबे घासों और जंगली पेड़-पौधों से भरा पड़ा था. काई से भरे दीवारों पर उग आए बरगद और पीपल के पेड़ों ने उस मकान को और भी मनहूस बना रखा था. वह कुछ देर तक उस मकान को यूं ही देखती अतीत के गलियारों में भटकती मानवी को याद करती रही, फिर बिछावन पर आ लेटी.
तभी उसे लगा उस कमरे की खिड़की पर एक साया सा खड़ा है. वह हड़बडाकर उठ बैठी.
“वहां कौन है?” उसकी आवाज़ सुन खिड़की पर खड़े साये में थोड़ी हरकत हुई, पर कोई जवाब नहीं मिला. वह खिड़की की तरफ़ लपकी. एक साया तेज़ी से उसकी खिड़की से हटकर मंदिर की तरफ़ जानेवाले रास्ते की तरफ़ मुड़ गया. एक पल के लिए लैंप पोस्ट की रोशनी पड़ी, तो उसमें स्पष्ट दिखा, वह मानवी की ही आकृति थी. वही पर रुककर वह आकृति पलटी और उसे बाहर आने का इशारा किया. वह सन्न खड़ी रह गई, तो क्या मानवी की आत्मा भटक रही है या मानवी अभी भी ज़िंदा है.
न चाहते हुए भी उसके मुंह से एक हल्की-सी चीख निकल गई. उसकी आवाज़ सुनकर सुबोध उसके कमरे में आ गया, जो शायद अब तक जगा हुआा था.‘‘ “क्या बात है दी? कोई था क्या? आपको मानवी फिर से दिख गई क्या?’’

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वह अवाक.. निशब्द खड़ी उसकें प्रश्नों को सुन रही थी. उसका उ़ड़ा हुआ पसीने से तर चेहरा देखकर ही वह सब समझ गया था कि उसकी दी को फिर से मानवी के कहीं आसपास होने का भ्रम हो गया है. फिर तो उसी कमरे में वह अपना खाट खींच ले लाया और वही सो गया. सुनंदा ने भी राहत की सांस ली थी और आंख बंदकर सोने का प्रयास करने लगी, पर वह सो नहीं सकी थी. रातभर मन अतीत के गलियारों में भटकता रहा था.
जब सुनंदा की मां मरी थीं, वह मात्र 10 वर्ष की थी. उसके पापा ऑफिस के काम से अक्सर टूर पर रहते थे, इसलिए सुनंदा को मामा-मामी का सौप दिया था. उसके मामा-मामी सुबोध के साथ हाजीपुर के अपने पुश्तैनी मकान में ही रहते थे. उसके मामा वहां के एक प्रतिष्ठित काॅलेज में बाॅटनी पढ़ाते थे. सुबोध उस समय लगभग 5 वर्ष का था. सुनंदा का उसके साथ बहुत ही सौहार्दपूर्ण रिश्ता था, दोस्तों जैसा. मामी भी सगी बेटी की तरह उसे प्यार करती थी. मानवी मामा के घर के बगल में बने कोठीनुमा मकान में रहती थी. वह और मानवी, दोनो एक ही स्कूल के एक ही क्लास में पढ़ती थीं. स्कूल में तो दोनो का साथ रहता ही था, पास-पड़ोस में रहने के कारण दोनो की शामें भी साथ गुज़रती थी. धीरे-धीरे दोनों अंतरंग सहेलियां बन गई थी. मन से नज़दीक होते हुए भी दोनों के स्वभाव में काफ़ी अंतर था. मानवी एक मुखर स्वभाव की निर्भीक और साहसी लड़की थी. ज़रूरत पड़ने पर वह अपना फ़ैसला ख़ुद लेती थी और उस पर कायम भी रहती थी. छोटी थी, तभी वह अपनी उम्र से ज़्यादा समझदारी की बातें करती.
वही सुनंदा सरल स्वभव की दुर्बल लड़की थी, जो हमेशा शांत और चुप रहतीे थी. वह अपना छोटा से छोटा फ़ैसला भी मामी से पूछकर लेती थी. उसके इस स्वभाव के कारण अक्सर उसे किसी न किसीे सहपाठी के कुटिलता का शिकार होना पड़ता. जिसे वह तो बर्दाश्त कर लेती, लेकिन जब मानवी को मालूम हो जाता, तो वह जिसने भी सुनंदा को सताया हो या उसे उल्टा-सीधा कुछ भी बोला हो, उसे कभी नहीं छोड़ती. उसके साथ होनेवाले हर एक अन्याय का विरोध करती. घर हो या बाहर, सब से सुनंदा के लिए झगड़ती रहती थी. अपने बेबाक स्वभाव के कारण वह अपने ही घर के लोगाें की भी निष्पक्ष आलोचना करने से नहीं घबराती थी. उसकी मां भी अपनी इस बिना किसी बाधा के बोलनेवाली स्पष्टवादी बेटी से कभी-कभी परेशान हो जाती थी. अक्सर सुनंदा से कहती, ‘‘अरे सुनंदा, कुछ तो समझा इसे तेरी ही बातें तो सुनती है. कुछ दूसरों की बातें भी सहना-समझना सिखे. कल को दूसरे घर जाएगी और ऐसी ही उद्दंड बनी रही, तो कैसे निभाएगी?’’
धीरे-धीरे समय गुज़रता गया और दोनों स्कूल छोड़ काॅलेज में आ गईं. यह उन्हीं दिनों की बात है, जब वे दोनो ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरा करने में लगी थी. एक दिन सुनंदा को मानवी और जगवीर के लव स्टोरी के विषय में कुछ उड़ती-उड़ती बातें काॅलेज में पता चली. मौक़ा पाते ही वह मानवी से उलझ पड़ी थी, ‘‘मानवी, तुम्हारे और जगवीर के विषय में ये सब क्या सुन रही हूं? तुम्हे कुछ होश है कि तुम्हारा एक ग़लत कदम तुम्हे और तुम्हारे परिवार को कहां ला खड़ा करेगा? यह मत भूलो कि तुम अपने पापा को खोकर, अपने चाचा पर निर्भर हो. तुम अच्छी तरह जानती हो अपने चाचा को भी, जो कभी किसी को छोटी से छोटी ग़लती के लिए भी माफ़ नहीं करते, इसलिए देख सब सच-सच बता मुझे, मैं पूरा सच जानना चाहती हूं.’’
मानवी कुछ देर तक चुपचाप उसकी परेशानी का लुत्फ़ उठाती रही, फिर बोली, ‘‘तुम जैसा सोच रही हो वैसा कुछ भी नहीं है. हां, यह सच है कि जगवीर मेरे ऊपर जान छिड़कता है. मेरा पीछा करता रहता है, पर मैं हमेशा उसे नज़रअंदाज़ करती रहती हूं. तुम तो जानती हो मधुकर भी मेरे इर्दगिर्द कम नहीं मंडराया था, पर क्या हुआ? अंत में थक-हारकर मेरा पीछा छोड़ दिया. इस प्रेमालाप का भी वही अंजाम होना है.’’
पर सुनंदा क्या जानती थी कि इस प्रेम का कितना भयंकर परिणाम होनेवाला था. उस समय मानवी की बातों सुनकर उसने राहत की सांस ली थी, “तू उसके विषय में सोचेगी भी नहीं और उससे दूर रहेगी. तुम्हारा एक ग़लत कदम कई ज़िंदगियां तबाह कर देगी.”
मानवी ने वही पर बात समाप्त कर दी थी, ‘‘सारी समझदारी का ठेका तुमने ही नहीं ले रखा है. मैं भी अपनी मर्यादा और अपनी ज़िम्मेदारियां समझती हूं.’’
बात आई गई हो गई थी. सुनंदा हमेशा मानवी के लिए परेशान रहती थी, क्योंकि उसे पता था, जितनी संपत्ति उन लोगों को विरासत में मिली थी, उतनी ही दकियानूसी और रूढ़िवादी सोच भी विरासत में मिली थी. मानवी का संयुक्त परिवार था, जिसमें उसकी मां और उसके अलावा उसके चाचा-चाची, दादी और तीन चचेरे भाई भी रहते थे. उसकी एक बड़ी बहन थी, जिसकी शादी हो चुकी थी.
घर के लोग कहते, जन्मते ही उसने पिता को डस लिया था, इसलिए सबने उसे बचपन से ही मनहूस का ख़िताब दे रखा था. उसके चाचा दिवाकर सिंह, गु़स्सैल स्वभाव के काफ़ी दबंग आदमी थे, जिनका घर में ही नहीं, आस-पड़ोस में भी लोग विरोध करने का साहस नहीं करते थे. कभी-कभी मानवी ही अपने अधिकारों को लेकर अपने चाचाजी से भी भिड़ जाने का साहस रखती थी. वैसे घर के हर मामले में मानवी के चाचा-चाची की बातें ही चलती थी.
उस वर्ष गर्मी की छुट्टियों में सुनंदा पापा से मिलने नहीं जा सकी. वह काम के सिलसिले में देश से बाहर चले गए थे. एक दिन दोनों सहेलियां सड़क पर टहल रही थी कि उनकी नज़र मंदिर के आंगन में पड़ी, जहां बेंच पर जगवीर बैठा था. सुनंदा को लगा काटो तो ख़ून नहीं, पर मानवी ने उसे समझाया कि डरने की क्या बात है? मैंने तो उसे बुलाया नहीं है. थोड़ी देर बाद किसी तरह हिम्मत जुटाकर सुनंदा उससे मिली और वहां आने के लिए मना किया. मना करने पर भी जगवीर वहां आता रहा. जब भी उस पर नज़र पड़ती मानवी उसे सख़्ती से मना करती.
छोटे शहरों में ये सब बातें, तो हवा के संग फैलती हैं. यह बात भी आस-पड़ोस में दावानल की तरह फैलने लगी कि मानवी से कोई मिलने आता है. गांव के लोगों की नज़र उसकी गतिविधियों पर थी. एक दिन ये सब बातें उसके चाचाजी के कानों में भी पड़ी. इसे मानवी का दुःसाहस समझ, वह ग़ुस्से से आगबबूला हो उठे थे. वह जगवीर के ख़ून के प्यासे हो गए थे. एक दिन जगवीर फिर आ गया था. उसे बचाने के लिए मानवी भागी-भागी मंदिर गई, तो फिर वह भी वापस नहीं लौटी.
मानवी के चाचा ने पता लगाने की बहुत कोशिश की पर उसका कहीं पता नहीं चला. अपमान की आग में जलते दिवाकरजी दोनों से अपने परिवार के अपमान का प्रतिशोध लेना चाहते थे. पर दोनो को ज़मीन निगल गई या आसमान कुछ पता ही नहीं चला. वह सुनंदा पर भी नज़र रखते, पर उसके पास भी मानवी का कोई फोन नहीं आया. पूरे तीन महीने बाद जब सुनंदा एक दिन काॅलेज में थी, मानवी का फोन आया. फोन उठाते ही बोली, “तू कुछ मत बोल बस मेरी सुन. उस दिन परिस्थिति ऐसी हो गई कि जगवीर की जान बचाने के चक्कर में मुझे उसके साथ भागने का फ़ैसला लेना पडा़, वरना वह चाचाजी के आदमियों द्वारा मारा जाता. मैं जहां भी हूं ठीक हूं. दीदी को मेरी क्या फ़िक्र होगी, वह तो अपने ससुरल में मस्त होगी, बस मेरी मां को किसी तरह मेरा संदेशा, पहुंचा देना कि मैंने जगवीर से शादी कर ली है.’’
इतना बोलकर उसने फोन काट दिया. सुनंदा किसी तरह 2-3 दिनों के प्रयास के बाद उसका संदेशा उसकी मां के पास तक पहुंचा दी थी.
इस घटना के पूरे छह महीने बाद एक दिन अचानक मानवी की मुलाकात दिल्ली के कनाटप्लेस पर अपने चाचा से हो गई. उन्हे देखकर मानवी काफ़ी भयभीत हो गई थी, पर उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उसके चाचाजी, उसकी उम्मीद के विपरीत अपनी सारी नाराज़गी को भूलाकर मानवी को घर चलने के लिए कहा. चाचा का प्यार देख उसका मन भी भावुक हो उठा. चाचा के गले लगते हीे उसकी आंखों से जैसे आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा. अपने घरवालों से मिलने के लिए उसका मन विकल हो उठा. उसी दिन शाम की ट्रेन से उसके चाचा वापस हाजीपुर लौटने वाले थे. उनके कहने पर वह भी उनके साथ जाने के लिए तैयार हो गई. जगवीर के बहुत मना करने पर भी मानवी नहीं मानी और जल्द ही वापस आने का वादा कर हाजीपुर चली आई.
उसके आने की ख़बर सुनते ही सुनंदा, अपने सारे काम छोड़ भागी-भागी मानवी से मिलने चली गई थी, पर मानवी की चाची ने उसे यह बोलकर की अभी बहुत थकी हुई है कल बात करना उसे वहां से वापस भेज दिया था. सुनंदा की समझ में नहीं आ रहा था कि उसके और मानवी के बीच ऐसी कैसी औपचारिकता आ गई थी कि बात करने के लिए भी उसे अनुमति की ज़रूरत आन पड़ी थी. पर परिस्थितियां तेज़ी से बदल रही थीं, जिससे कोई भी रिश्ता अछूता नहीं रह गया था, इसलिए कुछ भी कहना-सुनना बेकार था.
उसके बाद भी वह दो दिनों तक मानवी से मिलने की कोशिश करती रही, पर कोई न कोई बहाना बनाकर उसे टाल दिया गया. एक दिन वह हिम्मत कर मकान के पिछले हिस्से से मानवी के कमरे की खिड़की तक जा पहुंची. बाहर काफ़ी अंधेरा था. कमरे में भी एक छोटा सा बल्ब जल रहा था. भय से उसके दिल की धड़कनें काफ़ी तेज हो गई थी, पर हिम्मत कर उसने धीरे से मानवी को पुकारा. उसकी आवाज़ सुन झट से वह खिड़की के पास आ गई थी. सुनंदा को इतने क़रीब देखकर उसके सब्र का बांध टूट गया था. खिड़की पर अपना सिर रखकर फूट-फूटकर रो पड़ी थी. उसे रोते देख सुनंदा की आंखों से भी आंसू बह निकले. दोनों का मन रोकर थोड़ा हल्का हुआ, तो मानवी बोली, ‘‘सुनंदा, मैं चाचाजी के साथ यहां आकर बुरी तरह फंस गई हूं. मेरे यहां आने के बाद से चाचाजी के तेवर पूरी तरह से बदल गए हैं. अपनी ज़िद में आकर अब वह मेरी और जगवीर की शादी को किसी भी तरह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. वह किसी भी शर्त पर मुझे वापस नहीं जाने देना चाहते. मां भी अभी तक चुप है. मुझे कमरे में बंद कर दिया गया है. मैं कैसे क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा? मैंने इस परिवार को शायद बहुत कठोर आघात दिए हैं, पर मेरे साथ तो चाचाजी और भी बुरा कर रहे हैं. तुम मेरे लिए कुछ करो. मुझे यहां से किसी तरह निकालो.’’

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वह थोड़ी देर तक चुप रही फिर बोली, ‘‘इस घर से तो मुझे हमेशा तिरस्कार ही मिला, केवल लांछन और अपमान, पर जगवीर से मुझे जीवन में पहली बार मिला निश्छल और अनंत प्रेम, जिसे मैं खोना नहीं चाहती. तुम कुछ भी करके मेरी मदद करो.’’
‘‘तुम चिंता मत करो मैं हूं न, कुछ न कुछ करती हूं.”
बिना किसी हिचक के उसे तसल्ली तो दे दी थी, पर कैसे वह उसकी मदद करेगी यह उसके समझ में नहीं आ रहा था. दोनो अभी और भी कुछ बातें करतीं कि उस कमरे का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ से दोनों चौंककर चुप हो गईं. बाहर का अस्वभाविक अंधकार भी सुनंदा की हिम्मत तोड़ रहा था. मानवी से जल्द ही मिलने का वादा कर सही समय के इंतज़ार में वह लौट आई थी. उस दिन रातभर वह सो नहीे सकी. दूसरे दिन सुबह उठकर वह मानवी को वहां से निकालने का कोई उपाय सोचती उसके पहले ही आस-पड़ोस में चर्चा होने लगी थी कि मानवी अचानक ही रात के जाने किसी बेला में घर छोड़कर चली गई. उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इतने कड़े पहरे के बावजूद कैसे मानवी वहां से भागने में सफल हुई?
देखते-देखते एक हफ़्ता गुज़र गया. एक दिन अचानक जगवीर उसे ढूंढ़ता हुआ हाजीपुर पहुंचा. तब एक नई बात सामने आई कि मानवी तो दिल्ली पहुंची ही नहीं. जब से वह दिल्ली से आई थी, उसका फोन भी नहीं लग रहा था, इसलिए जगवीर घबराकर चला आया था. जब उसने दिवाकरजी से बातें कि तो वे बोले, ‘‘यह बात तो सब को पता है कि उसे तो इसी तरह घर छोड़कर भागने की आदत थी. न जाने किस समय बिना घर में किसी को बताए दिल्ली के लिए रवाना हो गई. अब तो मुझसे ज़्यादा उसे खोजने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है. तुम्ही पता करो वह कहां गई? उसका पता लगाने में मैं भी तुम्हारी मदद करूंगा.’’
जगवीर द्वारा पुलिस में भी कंप्लेन किया गया, पर मानवी का कही पता नहीं चल सका था. मानवी न जाने कहां थी? अपने हृदयहीन चाचा के कठोर सज़ा का दंड भुगत रही थी या फिर कही दूसरी मुसीबत में फंस गई थी. सभी सिर्फ़ उसे खोजने की बातें कर रहे थे, पर उसका पता कोई नहीं लगा पा रहा था.
इस घटना के पूरे तीन महीने बाद अचानक एक बड़ी ट्रेन दुर्घटना दानापुर के आसपास हुई. इस एक्सिडेंट के दूसरे दिन दिवाकरजी के पास फोन आया कि एक मरी हुई लड़की के पास से उनका फोन नंबर और पता मिला है. आकर उसकी पहचान करें. जब वह वहां गए, तो उस लड़की का चेहरा बुरी तरह से कुचल गया था कि पहचानना मुश्किल था. उसकी पहचान कुछ उसके कद-काठी, हाथ की बनावट और उसमें अटकी अंगूठी से की गई थी. वह अंगूठी सुनंदा की थी, जिसने कभी खेल-खेल में पक्की दोस्ती की ख़ातिर मानवी की अंगूठी से बदल ली थी. वह अंगूठी मानवी हमेशा पहने रहती थी. उसके बांह में अटके बैग में हाजीपुर का पता और फोन नंबर भी मिला, तो शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई. जब मानवी को हाजीपुर लाया गया, ख़ुद सुनंदा भी क़रीब जाकर देखी थी.
शत-प्रतिशत वही अंगूठी थी. मानवी को क्षत-विक्षत अवस्था में देखते ही दुख और संताप से थर-थर कांपती सुनंदा वही गिरकर बेहोश हो गई थी. उसी बीच उसके चाचा आनन-फानन में उसे अंतिम संस्कार के लिए ले गए.
जब उसे होश आया, तब तक मानवी के अंतिम विदाई हो चुकी थी. कहने-सुनने को बचा ही क्या था? कड़वा सच आंखों के सामने था. सवाल तो कई थे, पर जवाब देनेवाला कोई नहीं था. हां, उस रात जब वह कमरे में क़ैद मानवी से मिलने गई थी, अगर उस समय अपनी कायरता दिखाकर भागने के बदले, थोड़ी हिम्मत दिखाई होती, तो आज शायद मानवी ज़िंदा होती. तीन महीने तक वह कहां थी? किसी को कुछ पता नहीं था. न जाने मानवी को क्या-क्या झेलना पड़ा होगा. कितना अपमान, कितनी कटुता सह मानवी इस दुनिया से विदा हुई होगी.
अब भी जब कभी वह अकेली होती, तो उसकी आत्मा उसे कचोटती रहती. मानवी उसके लिए न जाने कितने लोगों से लडती-झगड़ती रहती थी. जब उसकी बारी आई, वह कायरों की तरह सोचती ही रह गई. मानवी के अकाल मृत्यु से उसे गहरा सदमा लगा था. परिस्थिति को देखते हुए उसके पापा ने उसकी शादी अमेरिका में कार्यरत दीपक से तय कर आए थे. दीपक से उसकी शादी क्या हुई भारत ही छूट गया. अतीत में भटकते हुए जाने कब उसकी आंख लग गई. सपने में भी उसे मानवी ही नज़र आई, जो उसके बगल में बिस्तर पर बैठी उसे उदास नज़रों से देख रही थी. जैसे कह रही हो सबके साथ तुमने भी मुझे भूला दिया. उसका दिल जोरों से धड़कने लगा और उसकी नींद खुल गई.
जब से वह आई थी, सपनों का एक सिलसिला-सा बन गया था. कभी आधी रात को, तो कभी सुबह-सबेरे के सपने में मानवी उसे नज़र आने लगी थी. वह जब कभी भी इन सपनों की चर्चा सुबोध से करती, तो वह उसे समझाता, ‘‘दी, वह आपकी बेस्ट फ्रेंड थी. उसकी यादें अक्सर आपके दिलोंदिमाग़ पर छाई रहती है, इसलिए वह आपको सपने में भी दिखती है.’’
वह चुप रह जाती. कुछ दिनों बाद उसे पता चला कि आस-पड़ोस में भी लोगों के बीच चर्चा थी कि मानवी की आत्मा शिव मंदिर के आसपास भटकती रहती थी. लोगों ने शाम के बाद उधर जाना छोड़ दिया था. बस एक मानवी की मां सावित्री देवी थी, जो अब भी शाम के समय बदस्तूर वहां दीया जलाने जाती थीं.
लोगों से तरह-तरह की बातें सुनकर मानवी के मौत का सत्य जानने के लिए सुनंदा और भी परेशान हो गई थी. पर घर में शादी के माहौल होने के कारण कुछ भी खुलकर बाते नहीं कर पा रही थी. एक दिन मामी ने उसे विवाह संबंधित कुछ सामान लाने के लिए पटना भेजा. वह उनके ही बताए एक दुकान पर सामान छांटने में व्यस्त थी कि एक जानी-पहचानी सी आवाज़ सुनाई दी, ‘‘अरे, दूसरे पैकेट में देखो न मैं जानती हूं, उसे सब पसंद आ जाएगा.’’
हूबहू मानवी की आवाज़ थी, वह चौंककर आवाज़ की तरफ़ मुड़कर बोलनेवाले को देखने की कोशिश की, पर कोई दिखाई नहीं दिया. उसने सेल्सगर्ल से जानना चाहा कि कौन बोल रहा था. उसने किसी सपना मैडम का नाम बताया और मिलवाया भी, पर उसकी आवाज़ कहीं से भी मानवी जैसी नहीे थी, पर थोड़ी देर बाद दुकान में लगे आईने में उसे मानवी की एक झलक ज़रूर दिखाई दी. पर उसके मुड़ते ही वहां कुछ भी नज़र नहीं आया.
एक दिन उसके एक क्लासमेट मधुकर ने उसे फोन कर खाने पर बुलाया. साथ ही उसने कुछ और भी लोगों को जो उस समय उसके साथ पढ़ते थे और आसपास ही रहते थे, उन्हें भी फोन कर एक होटल में एकत्रित किया. मानवी को आश्चर्य लगा. इतने कम समय में ही सब लोग कितने बदले-बदले से लग रहे थे. फिर भी आपस में स्नेह वही था. सब लोग मिलकर देर तक बातें करते रहे. एक-दूसरे की जानकारियां लेते रहे. जब सब लोग चले गए, एकांत पाकर वह मधुकर से मानवी के विषय में अपने मन में उठते सारे संशय और अपने अनुभव को शेयर किया. कभी मधुकर के मन में जो मानवी क लिए प्यार था, उस प्यार का वास्ता देकर उसके विषय में सही जानकारियां प्राप्त करने के लिए बोली, तो वह थोड़ा कनफ्यूज-सा दिखा. फिर भी उसके साथ सहयोग करने और जल्द ही मानवी के विषय में जानकारियां हासिल करने का वादा किया.
सुबोध की शादी क़रीब होने पर वह ख़ुद भी काफ़ी व्यस्त हो गई. शादी के बाद वह सोच ही रही थी कि वह मानवी के विषय में सही जानकारी प्राप्त करने के लिए अपना काम कहां से शुरू करे, तभी एक दिन मधुकर का फोन आ गया था. वह उसे अपने घर पर बुला रहा था. वहां उसने सुनंदा के लिए एक सरप्राइज़ प्लान कर रखा था. वहां जाने का उसका मन तो नहीं कर रहा था, पर जाना ही पड़ा. वहां मधुकर और उसकी मां ने बहुत प्रेम और आत्मियता से उसका स्वागत किया. कुछ औपचारिक बातों के बाद मधुकर बोला, ‘‘आज मैं तुम्हे एक बहुत बड़ा सरप्राइज़ देनेवाला हूं. मानवी के विषय में तुुम जानना चाहती थी न कि उसका क्या हुआ?’’
‘‘हां… हां… ज़रूर, तो फिर देर किस बात की है. जल्दी बताओ.’’

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‘‘तो सुनो मानवी मरी नहीं, ज़िंदा है. आज मैंने उससे मिलवाने के लिए ही तुम्हे यहां बुलवाया है.’’
‘‘क्या…’’ वह जड़वत शब्दहीन बैठी रह गई थी, जैसे उसे सांप सूंघ गया हो. वह सपने में भी नहीं सोची थी कि मानवी से यूं मुलाक़ात होगी. वह अभी अपने को संभाल भी नहीं पाई थी कि बगलवाले कमरे से निकलकर मानवी वहां आकर खड़ी हो गई. हल्के नीले रंग के सूट में बेहद ख़ूबसूरत लग रही थी. पहले से काफ़ी दुबली हो गई थी, पर उसके हंसमुख चेहरे पर वही आकर्षण था. आते ही सुनंदा के गले से लग गई. फिर तो देर तक दोनों एक-दूसरे को अपने-अपने आंसुओं से भिगेाती रहीं. जैसे आंसुओं से ही दोनों बरसों की अनकही बातें कह डालेंगी. जब दोनों का मन थोड़ा शांत हुआ, तो मधुकर बोला, ‘‘मेरा यह सरप्राइज़ तुम्हे कैसा लगा सुनंदा?’’ मधुकर की आवाज़ ने जैसे दोनों को वापस इस दुनिया से जोड़ दिया.
एक लंबी सांस भर सुनंदा बोली, ‘‘मौत और मातम के बाद ज़िंदगी से मुलाक़ात कितनी अलौकिक लगती है यह कोई मुझसे पूछे मधुकर! मेरे पास तो शब्द ही नहीं है अपने मन की भावनाओं को प्रगट करने के लिए. ऐसी सुंदर सौगात जीवन में पहली बार मिली है. जहां प्रकाश की एक किरण नसीब नहीं थी, तुमने तो प्रकाश पुंज ही पकड़ा दिया. अब तुम दोनों मुझे इस नाटक का रूपक भी समझा दो, ताकि मुझे पुरी तसल्ली हो जाए.’’

तब मानवी ने बिना किसी भूमिका के बोलना शुरू कर दिया था, ‘‘तुम्हे याद होगा, जब हम दोनों की मुलाकात उस रात खिड़की पर हुई थी. मैंने तुम्हे बताया था कि मैं किस तरह चाचाजी के चंगुल में फंस गई थी. उनके प्रवंचन से जर्जर हो गए मेरे हृदय पर आघत पर आघात हो रहे थे कि मैं जगवीर को छोड़ दूं. मैं उन्हें समझाने की कोशिश कर रही थी कि अब उसे छोड़ देने से यहां किसी का कोई फ़ायदा नहीं होनेवाला था. जगवीर से अलग होकर उसकी ज़िंदगी ज़रूर तबाह हो जाएगी. जो हो गया, सो हो गया, उसे वापस सुधारा नहीं जा सकता था. अपनी चुप्पी तोड़कर मां भी मेरे साथ खड़ी हो गई. उन्होने मेरी शादी को मान लिया था और मुझे वापस जगवीर के पास भेजना चाहती थी. मां का चाचाजी के विरुद्ध जाना, उन्हें और भी क्रोधित कर दिया. उसी दिन मुझे चाचाजी ने घर से दूर एक सुनसान स्थान पर क़ैद करवाकर रख दिया और इसकी भनक मां को भी नहीं लगने दी.’’
‘‘देखते-देखते उस क़ैद में तीन महीने गुज़र गए. मैं वहां से किसी तरह भागना चाहती थी, मुझे भागने का कोई मौक़ा नहीं मिल रहा था, अलबत्ता धमकियां ज़रूर मिल रही थी कि मैंने भागने की कोशिश की, तो जगवीर को मार दिया जाएगा. फिर भी एक दिन मुझे मौक़ा मिल ही गया, जब मेरी देखभाल करनेवाला ताला खुला छोड़ किसी से बात करने में व्यस्त हो गया. मैं धीरे से बाहर निकलकर दरवाज़ा सटा दी. वह थोड़ी देर में आकर ताला लगाकर चला गया. उसके जाते ही मैं भी वहां से चल दी. क़रीब आधा किलोमीटर चलने के बाद मुझे सड़क दिखा. जिसके साथ-साथ चलते हुए मैं शहर में आ गई. चलते-चलते सुबह हो गई थी. तुरंत मुझे याद आया कि यहां पर मधुकर का घर था. मैंने बिना सोचे-समझे मधुकर के घर के बेल का बटन दबा दिया. मुझे फटेहाल अवस्था में पाकर पहले तो मधुकर बहुत घबराया, पर मेरी सारी बातें सुनने के बाद मधुकर और उसकी मां मनीषा आंटी दोनों ने मुझे बड़े प्यार और सम्मान से अपने घर में शरण दिया और तत्काल किसी से भी संपर्क करने के लिए मना कर दिया. तभी बिहार से दिल्ली जानेवाली ट्रेन के पटरी से उतर जाने के कारण भयंकर रेल दुर्घटना हो गई. चुकी मधुकर रेलवे में ही काम करता है, इसलिए वह काफ़ी व्यस्त हो गया. तभी उसके दिमाग़ में एक योजना आई, क्यों न चाचाजी का मुझ पर से ध्यान हटाने के लिए इस दुर्घटना का फ़ायदा उठाया जाए. उसने मुझसे सलाह कर एक लावारिस लाश को मेरा नाम दे दिया और मुझे मृत घोषित करवा दिया.’’
थोड़ी देर चुप रहने के बाद उसने आगे बताना शुरू किया, ‘‘मेरी मृत्यु का चाचाजी को आसानी से विश्‍वास हो गया, क्योंकि यहां से दिल्ली जानेवाली हर ट्रेन में वह मुझे तलाश रहे थे, जिससे मेरे मरने का उन्हें पूरा विश्वास हो गया और चाचाजी ने मेरी तलाश बंद करवा दी. यहां का मामला शांत होते ही मैं मधुकर के साथ दिल्ली पहुंची, तो वहा एक दूसरा दुर्भाग्य मेरा पहले से ही इंतज़ार कर रहा था. घर के बाहर ही पता चल गया कि जगवीर की मां ने पहले मुझे गायब, फिर मरा हुआ जानकर अपनी पसंद की लड़की से उसकी शादी करवा दीं. उन्हें वैसे भी मैं पसंद नहीं थी. जब फोन कर मधुकर ने उसे बाहर बुलाया, तो मुझे देखकर वह जितना ख़ुश हुआ, उससे ज़्यादा परेशान हो गया. अजीब से धर्मसंकट में वह फंस गया था. तब मुझे बोलना ही पड़ा कि वह किसी को मेरे जीवित होने के विषय में कुछ ना कहे और मुझे मरा हुआ ही मान ले. तलाक़ का पेपर तैयार करवाए मैं समय पर आकर साइन कर दूंगी. मैं उल्टे पांव वापस आ गई. मधुकर ने ही मुझे अपने एक दोस्त के कंपनी में नौकरी दिलवा दिया. उसका एक्सपोर्ट-इंपोर्ट का बिज़नेस है. मैं इस कंपनी के लखनऊ वाले ब्रांच में काम कर रही हूं.
काम के सिलसिले में अक्सर पटना आती-जाती हूं. कभी-कभी अपना चेहरा ढंककर हाजीपुर के शिव मंदिर तक मां को देखने चली जाती हूं. वही किसी की नज़र मुझ पर गई और लोगों ने मुझे भटकती हुई आत्मा का ख़िताब दे दिया. एक दिन मां को मंदिर में अकेला पाकर मैंने अपने ज़िंदा होने की बात उन्हें बता दी. उन्होने चाचाजी के ख़तरनाक इरादे को समझते हुए किसी से कुछ नहीं कहा. उस दिन तुमसे मिलने भी मैं गई थी, क्योंकि प्लेन में ही तुम मुझे दिख गई थी. तुम्हे मंदिर तक आने का मैंने इशारा भी किया था, पर तुम मुझे भूत समझकर, शायद डर गई थी.’’
‘‘फिर क्या तुम्हारी मुलाक़ात जगवीर से कभी नहीं हुई?’’ पहली बार सुनंदा के मुंह से आवाज़ निकली थी.
‘‘हां, मुलाक़ात हुई थी, पर कोर्ट में तलाक़ लेने के लिए. वह एक लंबी-चौड़ी रकम भी मुझे देना चाह रहा था, पर मैंने इंकार कर दिया.’’
‘‘तब आगे तुमने क्या सोचा है?’’
जवाब मधुकर ने दिया, ‘‘मैंने इसे शादी के लिए प्रपोज किया है, पर यह कुछ फ़ैसला नहीं कर पा रही है. मैं और मेरी मां दोनों इस शादी के लिए तैयार हैं. मैं तो अपना ट्रांसफ़र भी लखनऊ करवा रहा हूं.’’
‘‘ठीक है. अगर यह तैयार नहीं हो रही है, तो अब तैयार होगी. इसकी तरफ़ से मैं हां करती हूं. मेरी दोस्ती की ख़ातिर मानवी को तुमसे शादी करनी ही होगी. क्यों मानवी चुप क्यों हो? कुछ तो बोलो.’’
सब की नज़रें मानवी पर टिकी थी. उसने मुस्कुराते हुए जैसे ही हामी भरी, वहां हंसी-खुशी का माहौल बन गया.
चार दिन बाद ही पटना के एक मंदिर में मधुकर और मानवी की शादी का समारोह साधारण ढ़ंग से संपन्न हो गया.
सुनंदा जब दोनों से विदा लेने गई, मधुकर से बोली, “तुम मानवी का ख़्याल रखना. इतनी सी उम्र में ही इसने बहुत दुख झेले है.”
मधुकर उसे आश्वस्त करते हुए बोला, ‘‘इससे पहले मानवी के साथ उसके चाचा ने चाहे जो किया, पर अब मानवी उन लोगों से नहीं डरेगी. सच सबके सामने आएगा. उन्हे भी तो पता चले कि उनके शक्तियों का दायरा चाहे कितना बड़ा भी क्यूं न हो, पर वह अंजाम के दायरे से बड़ा नहीं हो सकता, क्योंकि अंजाम हमेशा नियति ही निर्घारित करती है, इसलिए तुम निश्चिंत रहो अब मानवी के साथ कुछ भी ग़लत नहीं होगा.’’
अमेरिका लौटते समय सब से विदा लेकर जब सुनंदा फ्लाइट में बैठी, तो उसका मन बिल्कुल शांत था. अतीत का जो पन्ना उससे अलग होकर उसे दर्द दे रहा था, फिर से जीवन के किताब में जुड़ गया था.

Rita kumari
रीता कुमारी

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ढलती शाम के आसमान में छाया केसरिया रंग मुझे बेहद प्रिय है. किस उम्र में मन उस केसरिया रंग में रंगना शुरू हुआ वह तो याद नहीं, लेकिन जिस उम्र में मन स्मृतियों को संजोने लगा तभी से मैंने हर ढलती सांझ में ख़ुद को छत पर खड़े होकर आसमान को निहारते पाया. जाने क्या कशिश है इस संधि काल में कि मैं कहीं भी होती, कुछ भी काम कर रही होती, पैर अपने आप सीढ़ियां चढ़कर मुझे छत पर ले आते और मैं उस जादूगर की करिश्माई चित्रकारी में अचंभित मोहित-सी घंटों उस रंग में डूबी छत पर खड़ी रहती, जब तक कि वह केसरिया रंग गहरा लाल, फिर नीला, फिर बैंगनी होते हुए रात के काले आंचल में ना समा जाता.
उस दिन भी मैं छत पर खड़ी सांझ के आसमान को पल-पल रंग बदलते देख रही थी. सामने सड़क के उस पार लगे अमलतास और कचनार के घने पेड़ों पर पंछी कलरव कर रहे थे. नीलगिरी पर बने घोसलों में पंछियों की आवाजाही चल रही थी. गुलमोहर की शाखाओं में पंछियों का झुंड आ बैठता और एक साथ उड़ जाता. आसमान में भी झुंड के झुंड पंछी उड़कर अपने-अपने घरों को लौट रहे थे. मैं मुग्ध-सी इस दृश्य में खोई हुई थी कि अचानक ऐसा लगा कि मैं छत पर अकेली नहीं हूं कोई और भी है जो इस सांझ के जादू में खोया हुआ है. मैंने चौंककर इधर-उधर देखा, पड़ोसवाली छत पर कोने में मुंडेर पर हाथ रखे 20-22 साल का एक लड़का खड़ा था. पड़ोस में एक वृद्ध चाचा-चाची रहते थे, जिनके दोनों बेटे बाहर थे. यह शायद कोई मेहमान आया होगा. मैंने सरसरी निगाह से उसे देखा, ऊंचा-पूरा, साफ रंग, करीने से संवरे बाल. आसमान में उड़ते पंछियों को देखती उसकी नज़र अचानक मुझसे टकरा गई और मुझे अपनी और देखता पाकर वह मुस्कुरा दिया और मैं झेंपकर फिर आकाश को देखने लगी. लेकिन बरबस रोकने पर भी नज़र उसकी तरफ़ उठ जाती और उसे भी अपनी तरफ़ देखते पाकर दिल धड़क जाता. घिरती रात में जब मैं नीचे जाने लगी, तब मन आसमान के केसरिया रंग के साथ ही उसके चेहरे पर छिटके गुलाल में भीग चुका था. उस रोज़ अनायास ही कमरे में कदम रखते ही पांव आईने के सामने ठिठक गए और रातभर पूर्णिमा के चांद की चांदनी केसरिया रंग में लिपटी रही.
दूसरे दिन शाम बड़ी देर बाद आई और दोपहर बड़ी लंबी लगी. थोड़ा जल्दी ही छत पर पहुंच गई. आंखें सीधे सामनेवाली छत पर टिक गई, वह भी वही खड़ा इधर ही देख रहा था. मेरे पैर क्षणभर को कांप गए, धड़कने अनियंत्रित हो गई. मैंने दृष्टि सामनेवाले पेड़ों पर गड़ा दी, लेकिन मन उसकी ओर ही लगा रहा और तन उसकी नज़रों को अपने पर टिकी महसूस कर रोमांचित होता रहा. मैं जानने को व्याकुल हो रही थी कि वह कौन है.
दूसरे ही दिन मां से पता चला वह चाची के भाई का बेटा है और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए यहां आया है. उस दिन रसोईघर का बल्ब फ्यूज हो गया, तो मां ने खिड़की से आवाज़ देकर उसे ही बुलाया. शेखर, हां यही नाम था उसका और उस दिन वह छत से सीधे मेरे घर ही नहीं चुपके से मेरे दिल में भी भीतर चला आया. मैं टेबल पर बैठी पढ़ने का ढोंग किए किताब पर आंखें गड़ाए बैठी थी, लेकिन ध्यान सारा उस पर ही था. बल्ब बदलने के बाद वह कमरे के दरवाज़े पर क्षणभर को ठिठक गया, “क्या पढ़ती हो, किस ईयर में हो?”
मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ गए, दिल इतनी तेज़ी से धड़कने लगा कि मुंह से बोल ही नहीं निकल पाए. मां ने ही जवाब दिया, “फर्स्ट ईयर में है तुम भी तो साइंस पढ़े हो, इसे केमिस्ट्री पढ़ा दिया करना अगर समय हो एक घंटा.”
मेरे मन की तो बिना मांगे मुराद पूरी हो गई और दूसरे ही दिन से वह रोज़ शाम को मुझे पढ़ाने आने लगा. दिनभर अपनी पढ़ाई करता, शाम के सिंदूरी एहसास को हम दोनों साथ में जीते और धुंधलका छाते ही नीचे आकर पढ़ाई में लग जाते. कभी ज़िद करके मां उसे खाना खिलाकर ही मानती. यूं भी जब दोनों घरों के बीच पारिवारिक आत्मीयता थी, तो वह घर के सदस्य जैसे ही था. वह पढ़ाता तो मुझे आधा समझ आता आधा ध्यान उसमें रहता. कितना सौम्य, शांत, सुंदर था वह. आवाज़ विनम्र होकर भी गहरी थी. आंखें नीचे झुकी रहती मेरी, लेकिन उनके भाव कैसे कहां छुपाती. समझ तो शेखर को भी सब आ रहा होगा, लेकिन उसने कभी मर्यादा की सीमा का उल्लंघन नहीं किया.

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अठारहवें वर्ष में प्रवेश कर चुके मेरे मन के कुंवारे अनछुए भाव शेखर की आंखों में तैरते सिंदूरी डोरों से बंध गए थे. मन अजब-सी रूमानियत की ख़ुमारी में भीगा रहता. एकांत में मन करता कि उसके चौड़े सीने में अपना चेहरा छुपा लूं और वह मेरे बाल सहलाता रहे, लेकिन आंखों से सब कुछ स्पष्ट कर देने के बाद भी शेखर की ज़ुबान हमेशा ख़ामोश रही और व्यवहार सदा मर्यादित. चार महीने कब गुज़र गए पता नहीं चला. प्रतियोगी परीक्षा ख़त्म होने के दो ही दिन बाद उदास आंखों में तैरती नमी के बीच मुझे नज़र भर देख कर वह चला गया. फिर कभी नहीं लौटा. बहुत दिनों बाद पता चला उनकी शादी उनके पिता ने बचपन में ही अपने दोस्त की बेटी से पक्की कर दी थी. छत पर नितांत एकांत पलों में भी वह क्यों स्वयं पर इतना कठोर संयम रखते थे, तब समझ आया. मेरा कोमल मन टूट गया. अक्सर छत पर उनका मुस्कुराता चेहरा और बोलती आंखें याद कर रो देती. कैसे कहूं कि उन्हें भी मुझसे प्यार नहीं था, लेकिन पिता के वचन के विरुद्ध जाने के संस्कार नहीं थे उनके.
बरसों बीत गए, लेकिन आज भी मेरा पहला प्यार छत पर उसी कोने में मुस्कुराता खड़ा महसूस होता है. ढलती सांझ के आसमान के साथ ही मन का भी एक कोना शेखर के प्यार के केसरिया रंग में रंगा हुआ है. नीड़ों को लौटते पंछियों को देखकर एक कसक-सी उठती है मन में, काश! इन पंछियों की तरह मेरा शेखर भी कभी लौट पाता…

Dr. Vinita Rahurikar
डॉ. विनीता राहुरीकर
Love Story

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सोशल डिस्टेंसिंग करानेवाले कोरोना वायरस के जाने के बाद क्या सबके दिल मिल पाएंगे? क्या बच्चों में बाहर निकलने की, एक-दूसरे से मिलने-जुलने की नैसर्गिक उत्कंठा जागेगी?
दिनभर स्क्रीन में सिर दिए लोगों को आसपास सूखती रिश्तों की बेलों में अपने समय की खाद देकर हरियाने की इच्छा जागेगी. आज की चिंता क्या पर्यावरण के प्रति चिंतन में तब्दील होगी…

“हे भगवान्… कमरे का क्या हाल किया है तुम दोनों ने…”
शारदा ने कमरे छोटे-से कमरे को हैरानी से देखा. लैपटॉप से डाटा केबल द्वारा टीवी कनेक्ट करके एकलव्य और काव्या बिस्तर में बैठे कार्टून देख रहे थे… कुछ देर उनके पास बैठकर शारदा भी अजीब-सी आवाज़ निकालते कार्टून करेक्टर को देखने लगी. फिर कुछ ऊब से भरकर वह उठकर चली आई और बालकनी में बैठ गई. उन्हें अकेले बालकनी में बैठे देख बहू कविता ने उन्हें टोका, “क्या हुआ मां, आप यहां बालकनी में अकेले क्यों बैठी है…”
“क्या करूं, सुबह से कभी टीवी, तो कभी नेट पर कार्टून ही चल रहा है.“
“कार्टून नहीं एनीमेटेड मूवी है मां…”
“जो भी हो… सिरदर्द होने लगा है. दिनभर ये लैपटॉप नहीं, तो टीवी खोले बैठे रहते है… उनसे फुर्सत मिलती नहीं और जो मिल जाए, तो हाथों में मोबाइल आ जाता है… कुछ किताबे वगैरह दो बहू…”
“हां मम्मीजी, बेचारे अब करे भी तो क्या… इस कोरोना ने तो अच्छी-खासी मुसीबत कर दी. ईश्वर जाने कब स्कूल खुलेंगे…”
“मम्मी कोरोना को मुसीबत तो मत बोलो…”
काव्या की आवाज़ पर शारदा और कविता दोनों ने चौंककर काव्या को देखा, जो एकलव्य के साथ वॉशबेसिन में हाथ धोने आई थी…
काव्या की बात सुनकर कविता कुछ ग़ुस्से से बोली, “क्यों! कोरोना को मुसीबत क्यों न बोले?”
“अरे मम्मी, कोरोना की वजह से लग रहा है गर्मी की छुट्टियां हो गईं..” काव्या ने हंसते हुए कहा, तो कविता गंभीर हो गई.
“अरे! ऐसे नहीं बोलते काव्या… कोरोना की वजह से देखो कैसे हमारी आर्थिक व्यवस्था डांवाडोल हो रही है. इस वायरस का अब तक कोई इलाज नहीं निकला है. कितने लोग डरे हुए हैं. कितने लोग इसकी चपेट में आ गए है… और कितनों ने तो अपनी जान…”
“ओहो मम्मा, मज़ाक किया था और आप सीरियस हो गई… चलो सॉरी..” कविता के गले में गलबहियां डालते हुए काव्या उनकी मनुहार करती बोली, “छुट्टियां हो गई. पढ़ाई से फुर्सत मिल गई, इसलिए कह दिया.”
“ये मज़ाक का समय नहीं है समझी.” कविता ने डांटा, तो शारदा भी बड़बड़ा उठी…
“और क्या, आग लगे ऐसी छुट्टियों को. इस मुए कोरोना की वजह से पूरी दुनिया की जान सांसत में है और तू उसी को भला हुआ कह रही है. ऐसी छुट्टियों का क्या फ़ायदा, जिसमें न बाहर निकल पाए और न किसी को घर पर बुला पाए. न किसी से मेलजोल, न बातचीत… घूमना-फिरना सब बंद. सब अपने-अपने घरों में कैद कितने परेशान हैं…”
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“परेशानी कैसी दादी… टीवी, नेट सब तो खुला है न…” एकलव्य ने सहसा मोर्चा संभाल लिया…
“हम दोस्तों से जुड़े हैं. वाट्सअप और फोन से हमारी गप्पबाजी हो जाती है. मम्मी आजकल बढ़िया-बढ़िया खाना बना रही है… चिल दादी…” कहते हुए एकलव्य काव्या के साथ चला गया तो कविता शारदाजी से बोली, “मांजी रहने दीजिए, इनकी बात को इतना सीरियसली न लीजिए. वैसे देखा जाए, तो आज की जनरेशन का कूल रवैया हमारे लिए ठीक ही है… आज पूरे विश्‍व में इतनी भीषण विभीषिका आन पड़ी है, देश में घर में ही रहने का आह्वान किया जा रहा है. लोगों से दूर रहने को कहा जा रहा है. ऐसे में ये बिना शिकायत घर पर मज़े से बैठे है… ये कम है क्या…”
शारदाजी चुपचाप बहू की बातें सुनती रहीं…
“जानती हो मां, आज अख़बार में निकला है कि आपदा प्रबंधन में कोरोना वायरस को भी शामिल किया जा रहा है… और हां अब से विज्ञान के छात्र विभिन्न तरह के फ़्लू और बीमारियों के साथ कोरोना वायरस के बारे में भी पढ़ेंगे…”
“हां भई, परिवर्तन के इस युग में नई-नई चीज़ें पाठयक्रम में शामिल होंगी… जानती हो, जब मैंने उस जमाने में पर्यावरण का विषय लिया, तो लोग हंसते थे कि इसका क्या स्कोप है. आज देखो, पर्यावरण हमारी आवश्यकता बन गई… इसी तरह आज इस वायरस को लेकर जो बेचैनी की स्थिति बनी है, उसमे जागरूकता ज़रूरी है…”
अपनी शिक्षित सास की समझदारी भरी बातों से प्रभावित कविता देर तक उनसे वार्तालाप करती रही… फिर रसोई में चली गई. कविता के जाने के बाद शारदा ने अपनी नज़रे बालकनी से नीचे दिखनेवाले पार्क में गड़ा ली… पार्क में फैले सन्नाटे को देख मन अनमना-सा हो गया.
कोरोना के चक्कर में बाज़ार-मॉल सब बंद है… घर पर ऑनलाइन सामान आ जाता है. आगे की स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राशन इकट्ठा कर लिया गया है, सो सब निश्चिन्त है. स्कूल बंद है, पर बच्चे ख़ुश है… लोगो से मिलने-जुलने पर लगी रोक का भी किसी को ख़ास मलाल नहीं, क्योंकि बहुत पहले से ही सबने ख़ुद को वाट्सअप-फेसबुक के ज़रिए ख़ुद को बाहरी दुनिया से जोड़ लिया है… वैसे ही रिश्तों में दूरियों का एहसास होता था, अब तो दूरियां जीवनरक्षक है.
उन्हें एकलव्य की भी चिंता हो रही है. पहले ही उसका वज़न इतना बढ़ा हुआ है… अब तो दिनभर लैपटॉप या टीवी स्क्रीन के सामने बैठे खाना खाते रहना मजबूरी ही बन गई है… ये अलग बात है कि इस मजबूरी पर वो ख़ुश है, पर उन्हें बेचैनी है. सामान्य स्थिति में डांट-फटकार कर उसे घर से बाहर खेलने साइकिल चलाने भेजा जाता था. आज वो भी बंद है… हैरानी होती है कि आज के बच्चों को बाहर खेलने भेजना भी टास्क है.
यक़ीनन इसकी वजह वो ‘यंत्र’ है जिस पर दिनभर बिना थके लोगो की उंगलियां थिरकती है. वो ऊब रही है, क्योंकि लाख चाहने के बाद भी वो स्मार्टफोन से दोस्ती नहीं कर पाई. यश ने कितनी बार उनसे कहा, “मां, स्मार्टफोन की आदत डाल लो. समय का पता ही नहीं चलेगा.” स्मार्टफोन लाकर भी दिया, पर उन्हें कभी भी स्मार्टफोन पर मुंह गाड़े लोग अच्छे नहीं लगे शायद इसी वजह से उन्होंने इस आदत को नहीं अपनाया… इसीलिए आज वो उकताहट महसूस कर रही है… घर में क़ैद ऊब रही है, पर ये क़ैद इन बच्चों को महसूस नहीं होती. पार्क में न जाने का उन्हें कोई मलाल नहीं… फ्रेंड्स से आमने-सामने न मिलने की कोई शिकायत नहीं… ऐसे में उसे बच्चों के व्यवहार से कविता की तरह संतुष्ट होना चाहिए, पर मन बेचैन है.
रात का खाना बच्चों ने अपने-अपने कमरे में स्क्रीन ताकते हुए खाया.. वो भी खाना खाकर अपने कमरे में आकर लेट गईं… घर की दिनचर्या बिगड़ गई थी, ऐसा लग रहा था मानो काव्या और एकलव्य की गर्मियों की छुट्टियां चल रही हो. सहसा उन्हें बीते ज़माने की गर्मियों की छुट्टियां याद आई… यश काव्या की उम्र का ही था… गर्मियों की दोपहर को चोरी-छिपे खेलने भाग जाता था… गर्मी-सर्दी सब खेल पर भारी थी… सातवीं कक्षा में उसका वार्षिक परीक्षा का हिन्दी का पर्चा याद आया… चार बजे शाम का निकला यश सात बजे खेलकर आया, तो वह कितना ग़ुस्सा हुई थी.. “ऐसा करो, अब तुम खेलते ही रहो… कोई ज़रूरत नहीं है इम्तहान देने की, मूंगफली का ठेला लगाना बड़े होकर.” उसकी फटकार वह सिर झुकाए सुनता रहा.
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शारदाजी ये सोचकर मुस्कुरा उठीं कि यश को खेलने की एवज में उससे कितनी बार दूध-फल-सब्जी बिकवाई… कभी-कभी तो रिक्शा भी चलवाया. उसके मन-मस्तिष्क में कूटकूटकर भर दिया था, जो ढंग से पढ़ाई नहीं करते, ज़्यादा खेलते है, वो यही काम करते है. कितनी ग़लत थी वह… आज पछतावा होता है कि नाहक ही उसे खेलने के लिए डांटा. आउटडोर खेल के महत्व को उस वक़्त नकारा, जबकि आज चाहती है कि बच्चे खेले… खेलते भी है, पर मैदान में नहीं स्क्रीन पर… घर बैठे ही. वैसे ही आजकल खुले में खेलने को ठेलना पड़ता था. अब कोरोना के चलते वो भी नहीं हो सकता. अब बच्चों की मौज है… उन्हें कोई शिकायत नहीं, काश! वो शिकायत करते. यश की तरह… यश की खिलंदड़ी प्रवृत्ति को लेकर वह हमेशा चिंतित रही. आज उसके बच्चे खेलने नहीं जाते तो चिंतित है.
विचारों में घिरे-घिरे झपकी आई कि तभी काव्या और एकलव्य के चीखने से ही हड़बड़ाकर उठ बैठी… उनके कमरे में जाकर देखा, तो काव्या ख़ुशी से नाच रही थी… एकलव्य भी बहुत ख़ुश था. यश और कविता के मुख पर मंद-मंद मुस्कान थी… यश बोला, “मां, इनके इम्तहान कैंसिल हो गए…”
“मतलब…”
“मतलब अब बिना इम्तहान के ही ये दूसरी कक्षा में चले जाएंगे.”
“अरे ऐसे कैसे…”
“सब कोरोना की वजह से दादी, अभी-अभी स्कूल से मेल आया है, क्लास आठ तक सब बच्चे बिना इम्तहान के ही पहले के ग्रेड के आधार पर प्रमोट हो जाएंगे… हुर्रे मैं क्लास नाइंथ में आ गई…” वो उत्साहित थी.
“और मैं क्लास सेवन्थ में…”
“हां वो भी बिना मैथ्स का एग्ज़ाम दिए हुए…” काव्य ने एकलव्य को छेड़ा.
एकलव्य का हाथ मैथ्स में तंग है. सब जानते थे, इसलिए सब हंस पड़े.
इम्तहान नहीं होंगे, उसे सेलीब्रेट करने के लिए रात देर तक अंग्रेज़ी पिक्चर देखी गई…
शारदा अपने कमरे में आकर सो गई… सुबह आंख खुली, तो देखा सूरज की धूप पर्दों से भीतर आने लगी थी. आज कविता ने चाय के लिए आवाज़ नहीं लगाई, यह देखने के लिए वह उठी, तो देखा बेटे-बहू का कमरा बंद था.
आज न शनिवार था, न इतवार, न ही कोई तीज-त्यौहार फिर छुट्टी..? वो सोच ही रही थी कि तभी दरवाज़ा खुला… कविता कमरे से निकली, शारदा को देख बोली, “आज इन्हें ऑफिस नहीं जाना है, इसलिए देर से उठे. आप बालकनी में बैठो चाय वहीं लाते है.” सुबह और शाम की चाय अक्सर तीनों साथ ही पीते है. शारदा बालकनी में आकर बैठ गई… यश भी अख़बार लेकर बालकनी में पास ही आकर बैठ गया, तो शारदा ने पूछा “आज काहे की छुट्टी..”
“मां, कोरोना के चलते हमारी भी छुट्टी हो गई… आज सुबह मेल देखा, तो पता चला. हमें आदेश मिला है कि घर से काम करने के लिए…”
“ओह!..” कहकर वह मौन हुई, तो यश बोला, “पता नहीं ये कब तक चलेगा… घर से कैसे काम होगा.” यश के चेहरे पर कुछ उलझन देखकर शारदा ने परिहास किया, “क्यों तुम्हारे बच्चे बिना इम्तहान दिए दूसरी कक्षा में प्रवेश कर सकते है, तो क्या तुम घर से काम नहीं कर सकते…” यश हंसते हुए कहने लगा, “सच कहती हो मां… मुझे तो जलन हो रही है इनसे, बताओ, बिना इम्तहान के दूसरी क्लास में चले जाएंगे… “
शारदा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, तो यश बोला, “याद है मां, एक बार जब मुझे चिकनपाक्स हुआ था, तो भी मुझे इम्तहान देने पड़े थे वो भी अकेले…”
“अरे बाप रे! कैसे भूल सकती हूं. पहला पर्चा देकर घर आया और बस… ऐसे दाने निकले कि निकलते ही चले गए. सब बच्चों की छुट्टियां हुई, तब तूने इम्तहान दिए…”
“वही तो…” यश सिर हिलाते हुए कुछ अफ़सोस से बोला.
“बिना पढ़े मुझे तो नहीं मिली दूसरी क्लास… बीमारी में भी तुम मुझे कितना पढ़ाती थी. तुम पढ़कर सुनाती और मैं लेटा-लेटा सुनता रहता… जब तबीयत ठीक हुई, तब टीचर ने सारे एग्ज़ाम लिए. आज इन्हें देखो, मस्त सो रहे है दोनों.”
यश ने मां का हाथ थामकर कहा, “वक़्त कितना बदल गया है. मुझे याद है जब मुझे चिकनपाक्स हुआ था, तब मैं भी इनकी तरह क़ैद था घर में… छुआछूत वाली बीमारी के चलते न किसी से मिलना-जुलना, न किसी के साथ खेलना… बड़ा बुरा लगता था.”
“हां, बड़ा परेशान किया तूने उन पंद्रह दिन…”
“हैं अम्मा… ये परेशान करते थे क्या…” सहसा चाय की ट्रे लिए कविता आई और वह भी बातचीत में शामिल हो गई. शारदा यश के बचपन का प्रसंग साझा करने लगी.
“और क्या… एक दिन चोरी से निकल गया था बगीचे में… आम का पेड़ लगा था उस पर चढा बैठा था…” यश को वो प्रसंग याद आया और ख़ूब हंसा… “पता है कविता, मैं आम के पेड़ में चढा हुआ था अम्मा ने कहा एक बार तेरा चिकनपाक्स ठीक हो जाए, फिर बताती हूं.. मैं कितना डर गया था. लगा कि ठीक होऊं ही न….”
यह सुनते ही शारदा ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बड़ी ज्यादतियां की है तुझ पर…”
“कैसी बात कर रही हो मां… मैं था भी तो कितना शैतान कि मौक़ा मिलते ही बाहर भागने की सोचता… कभी क्रिकेट खेलता.. तो कभी फुटबॉल… कभी यूं ही पेड़ों में चढ़कर मस्ती करते…”
“जो आज जैसी सुविधाएं होती तो शायद तू बाहर निकलने को न छटपटाता…”
“अच्छा है जो आज जैसी सुविधाएं नहीं है. कम-से-कम हमने अपना बचपन तो जिया… सुविधाएं होती, तो शायद बचपन के क़िस्से नहीं होते… मां ये बच्चे अपने बचपन के कौन-से क़िस्से याद करेंगे.”
यश के मुंह से निकला, तो शारदा का मन भीग-सा गया. सहसा चुप्पी छा गई… तो कविता बोली, “कोरोना वायरस की वजह से हुई छुट्टियां और बिना इम्तहान दिए नई क्लास में प्रमोट होने जैसे क़िस्से याद करेंगे…”
हंसते हुए शारदा ने कविता से पूछा, “वो दोनों अभी उठे नहीं है क्या…”
“रात ढाई बजे तक चली है पिक्चर. इतनी जल्दी थोड़ी न उठनेवाले…”
“ठीक है सोने दे… उठकर करेंगे भी क्या, वही टीवी, नेट-गेम्स और स्मार्टफोन…” शारदा के कहने पर यश ने कहा, “अभी ये लोग सो रहे है… आओ, न्यूज सुन लेते है… देखे कोरोना वायरस का क्या स्टेटस है…”
“सच में बड़ा डर लग रहा है…” कविता ने कहा, तो यश बोला, “डरना नहीं है, वायरस से लड़ना है… अपने देश ने काबिलेतारीफ इंतज़ाम किए है. डब्ल्यूएचओ ने भी तारीफ़ की है, ये बड़ी बात है. आगे हमें ही सावधानियां रखनी है.” यश और कविता समाचार देखने चले गए..
शारदा सोचने लगी- कोरोना वायरस को भगाने के लिए जागरूक होना अतिआवश्यक है… सभी लोंगो के प्रयास से कोरोना देश-दुनिया से चला ही जाएगा… सैल्यूट है डॉक्टर को… सुरक्षाकर्मियों को और मीडियावालों को, जिनके काम घर से नहीं हैं.
इस वायरस से तो कभी-न-कभी छूटेंगे, पर उस वायरस का क्या… जिसने सबको दबोचा है और किसी को उसकी पकड़ में होने का अंदाज़ा भी नहीं है…
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मुआ इंटरनेट नाम का वायरस ज़रूरत के नाम पर घर-घर में प्रवेश कर चुका है. उसको दूर करने के इंतज़ाम कब होंगे. काश! समय रहते इसके प्रति भी जागरूकता आए, तो क्या बात हो… शायद बच्चों का बचपन बचपन जैसा बीते…
शारदा का मन बेचैन हो उठा. कुछ यक्ष प्रश्न उसके मन उद्वेलित करने लगे.
सोशल डिस्टेंसिंग करानेवाले कोरोना वायरस के जाने के बाद क्या सबके दिल मिल पाएंगे? क्या बच्चों में बाहर निकलने की, एक-दूसरे से मिलने-जुलने की नैसर्गिक उत्कंठा जागेगी?
दिनभर स्क्रीन में सिर दिए लोगों को आसपास सूखती रिश्तों की बेलों में अपने समय की खाद देकर हरियाने की इच्छा जागेगी. आज की चिंता क्या पर्यावरण के प्रति चिंतन में तब्दील होगी…
एक प्रश्न जो सबसे ज़्यादा उसे कचोट रहा था कि सब घर पर संतुष्ट है. वर्तमान की मांग होने पर भी आज ये संतुष्टि उसके मन को क्यों चुभ रही है?
“अरे मां, आप किस सोच में डूबी हैं…” कविता का स्वर उन्हें सोच-विचार घेरे से बाहर ले आया. भविष्य के गर्भ में छिपे उत्तर तो वर्तमान के प्रयासों और नीयत के द्वारा निर्धारित किए जाने हैं, ये सोचकर शारदा ने गहरी सांस भरी और उठ खड़ी हुईं…

मीनू त्रिपाठी
इतने समझदार कि जानकी चाहती रही मोबाइल पर रोज़ बात करें, पर संभव ने शादी की तारीख़ तक चार-छह बार ही बात की. बारात में गिनती के लोग आए. जानकी बड़ी हसरत से जयमाला के लिए मंच पर आई.
मतिभ्रम हुआ है कि यही यथार्थ है? जिसे चाचा समझा था वह डॉ. संभव हैं और जिसे डॉ. संभव समझ पहली नज़र में दिल दे दिया, वह उनके ठीक बगल में खड़ा उनका अनुज संयम है. जानकी सदमे में. संयम पूरी तरह चंचल हो रहा था, “भौजाईजी, भइया को माला पहनाइए.”
मैथिली भी यथार्थ पर अचंभित थी. उसने भी वही समझा था, जो जानकी ने, लेकिन अब स्थिति का सामना करना है. बोली, “पहना रही हैं भौजाईजी के देवरजी. थोड़ा धीर धरें.”…

विकास की ओर अग्रसर कस्बा-करारी. करारी का चार पुत्रियोंवाला साधारण-सा परिवार. निजी संस्थान के मामूली पद पर कार्यरत बाबूजी का स्तर साधारण है, पर लक्ष्य बड़ा है- पुत्रियों को कुछ दे सकें, न दे सकें, पर पढ़ने का पूरा अवसर देंगे.
बड़ी पुत्री जानकी हिंदी विषय में एमए उत्तीर्ण कर करारी की निजी स्कूल में प्राथमिक कक्षा में अध्यापन करते हुए इसी साल 25 की हुई है. उसके परिणय के लिए बाबूजी जहां भी गए, एक ही प्रश्‍न- कितना देंगे? बाबूजी पिटे हुए प्यादे की तरह घर लौट आते. कोई ख़बर नहीं थी बात बनेगी और आसानी से बनेगी. तय तिथि पर लड़केवाले जानकी को देखने आ रहे हैं. माता-पिता जीवित नहीं हैं. दो भाई हैं, जो चाचाजी के साथ आएंगे, लेकिन तीन नहीं, दो प्राणी ही तशरीफ लाए. जानकी से छोटी, मेहमानों की आवभगत में तल्लीन मैथिली, बुलावे के लिए सजकर तैयार बैठी जानकी से बोली, “चाचाजी और लड़का ही आए हैं. लड़का इतना सजीला है कि जानकी तुम्हारा जी मचल-मचल जाएगा.”
जानकी घबरा गई, “मैथिली, मैं तुम्हारी तरह बेशर्म नहीं हूं.”
“सजीले को देखकर मदहोश हो जाओगी. चलो, बैठक में तुम्हारी पुकार हो रही है.”
बैठक में सलज्ज जानकी की दृष्टि नहीं उठती थी. बड़ा ज़ोर लगाकर उसने अगल-बगल बैठे दोनों प्राणियों को देखा. सचमुच सजीला है. यदि कुछ पूछा जाएगा, तो बताते समय अच्छी तरह देख लेगी. वे दोनों इतने सज्जन निकले कि कुछ नहीं पूछा.
सज्जनों के जाने के उपरांत तीसरी बहन वैदेही ने पूछा, “जानकी, हरण करनेवाले कैसे लगे?”
“मैं बेशर्म नहीं हूं.”
बाबूजी योजना बनाने लगे, “लड़केवाले शादी जल्दी चाहते हैं. अगले माह अच्छा मुहूर्त है.”
अम्मा संशय में है, “सब कुछ बहुत अच्छा है, लेकिन संभव जानकी से 10 साल बड़े हैं.”
बाबूजी बेफ़िक्र हैं, “संभव डॉक्टर हैं. सुपर स्पेशिलाइज़ेशन, फिर प्रैक्टिस जमाने तक डॉक्टरों की इतनी उम्र हो जाती है. मुझे तो संभव बहुत सीधे-सादे और समझदार लगते हैं.”
इतने समझदार कि जानकी चाहती रही मोबाइल पर रोज़ बात करें, पर संभव ने शादी की तारीख़ तक चार-छह बार ही बात की. बारात में गिनती के लोग आए. जानकी बड़ी हसरत से जयमाला के लिए मंच पर आई.
मतिभ्रम हुआ है कि यही यथार्थ है? जिसे चाचा समझा था वह डॉ. संभव हैं और जिसे डॉ. संभव समझ पहली नज़र में दिल दे दिया, वह उनके ठीक बगल में खड़ा उनका अनुज संयम है. जानकी सदमे में. संयम पूरी तरह चंचल हो रहा था, “भौजाईजी, भइया को माला पहनाइए.”
मैथिली भी यथार्थ पर अचंभित थी. उसने भी वही समझा था, जो जानकी ने, लेकिन अब स्थिति का सामना करना है. बोली, “पहना रही हैं भौजाईजी के देवरजी. थोड़ा धीर धरें.”
जानकी के हाथों को सहारा देकर मैथिली और वैदेही ने माला डलवा दी. फोटो शूट के बाद जानकी अंदर कमरे में लाई गई. उसे ससुराल से आए वस्त्र पहनकर चढ़ावा के लिए तैयार होना है. तैयार होने का उमंग गायब था. बिछावन पर बैठकर हिचककर रोने लगी. अम्मा जानती थीं कि उस दिन चाचा नहीं आ पाए थे. जानकी ने सामान्य कद-सूरत व रंगतवाले संभव को चाचा और सजीले संयम को संभव समझ लिया है. उन्होंने बाबूजी से कहा था संभव अपनी उम्र से बड़े लगते हैं. दुबली जानकी अपनी उम्र से कम लगती है, पर बाबूजी ने निर्णय सुना दिया था, “लड़के का रूप-रंग नहीं, पद-प्रतिष्ठा देखी जाती है.” अम्मा विवश हुई. जानकी को इस तरह रोते देख, रिश्ते-नातेदार, महिलाएं पता नहीं क्या अर्थ लगाएंगी. वे उनसे बोलीं, “जानकी आज पराई हुई. ऐसे मौ़के पर रोना आ ही जाता है. आप लोग भोजन करें. मैं इसे आगे की रस्म के लिए तैयार कर दूं.”
उनके जाते ही अम्मा ने जानकी को गले से लगा लिया, मत रो जानकी.”
“अम्मा, तुमने मुझे धोखे में रखा.”

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“मैं नहीं जानती जानकी तुमने क्या देखा और क्या समझा. संभव की डॉक्टरी अच्छी चलती है. घर में पैसा भरा है.”
“तुम्हें पैसा दिखता है. अधेड़ नहीं दिखता?”
“35 का लड़का अधेड़ नहीं हो जाता. बाबूजी की हैसियत जानती हो. जो कर सकते हैं, कर रहे हैं. न रोओ. बात फैलेगी, तो बारात लौट सकती है. हम तो जीते जी मर जाएंगे.”
जानकी ने मान लिया विरोध का कोई मतलब नहीं. यदि बारात लौट गई, तो बहनों के विवाह में अड़चन आएगी. जिस संयम को पहली नज़र में दिल दे दिया, वह नफ़रत से भर जाएगा. छोटी हैसियतवालों को बड़े सपने नहीं देखने चाहिए. सजीले राजकुमार अमीरजादियों को मिलते हैं. वह तैयार होने लगी. संयम फोटोग्राफर को ले आया, “भौजाईजी, तैयार नहीं हुईं? फोटो शूट होना है.”
मैथिली ने माहौल को हल्का करने की कोशिश की, “ठहरिए, भौजाई के देवरजी. लड़कियों को तैयार होने में व़क्त लगता है. वह तो आप लड़के हैं कि कोट-पैंट पहना और हो गए तैयार.”
संयम, मैथिली को देखता रह गया, “आप लड़की हैं कि क्या हैं?”
“आना-जाना बना रहेगा. जान लीजिएगा हम मैथिली हैं.”
संयम पूरी रात संभव और जानकी के आसपास मंडराता रहा. किसी मित्र ने नियंत्रित किया, “बहुत ऊपर-ऊपर हो रहे हो. शादी तुम्हारी नहीं, भइया की हो रही है.”
“इस समय मैं भौजाई की ननद का रोल कर रहा हूं. मेरी बहन आज होती, तो इन्हें इसी तरह घेरे रहती.”
जानकी विदा होकर संगतपुर आ गई. बड़ा और व्यवस्थित मकान. पहली रात का आरंभ संभव ने अपनी पारिवारिक रूपरेखा बताकर किया.
“जैसा कि तुम जानती होगी पापा और मां डॉक्टर थे. यह मकान व संपत्ति उनकी बनाई हुई है. दोनों का अच्छा नाम था. उनके नाम का पूरा फ़ायदा मुझे मिल रहा है. वे हम तीनों भाई-बहन को डॉक्टर बनाना चाहते थे, पर संयम को आर्ट्स सब्जेक्ट अच्छा लगता था. बीकॉम के बाद लॉ किया. अब कचहरी में प्रैक्टिस करता है.”
“आपकी बहन भी है?”
“थी. मुझसे छोटी, संयम से बड़ी थी. मेडिकल कर रही थी. पापा-मां उसे छोड़ने हॉस्टल जा रहे थे. कार का एक्सीडेंट हो गया. तीनों नहीं रहे. मैं और संयम अचानक बेसहारा हो गए. पैसे की कमी नहीं थी, पर मानसिक संबल की ज़रूरत थी. चाचाजी ने बड़ा सहारा दिया. वे तुम्हें देखने आते, पर उन्हें छुट्टी नहीं मिली. मैंने संयम को बच्चे की तरह संभाला है. नादानी करे, तो अपना बच्चा समझकर माफ़ कर देना.”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है, जिसे पहली नज़र में दिल दे बैठी, जो आयु में उससे बड़ा है, उसे अपना बच्चा कैसे समझ सकती है? जिसे चाचाजी समझा, उसे पति कैसे समझ ले?
“जब मैं तुम्हें देखने आया तुम नाज़ुक लग रही थी. घर आकर मैंने साफ़ कह दिया था कि मिस मैच हो जाएगा. शादी नहीं करना चाहता था, पर संयम अड़ गया कि वह तुम्हें पसंद कर चुका है. चाचाजी अड़ गए कि उन्होंने तुम्हारे बाबूजी को उम्मीद दी है.”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. मैं संयम की पसंद और बाबूजी को दी गई उम्मीद की भेंट चढ़ गई.
“मां के बाद यह घर कभी घर नहीं लगा. वे पता नहीं कैसे इतना संभाल लेती थीं. मैं तो चाबियां देखते ही घबरा जाता हूं. संयम की स्थिति तो मुझसे भी दयनीय है. तुम हंसोगी, पर मुंह दिखाई में मैं तुम्हें चाबियां दूंगा. संभालो अपना घर.”
“चाबियां नहीं ले सकती. अभी आप मुझे ठीक तरह से नहीं जानते हैं, उस पर…”
“सात फेरों का बंधन मज़बूत होता है. घर तुम्हारा, ज़िम्मेदारी तुम्हारी. मैं मुक्त हुआ.”
जानकी संगतपुर में 10 दिन रही. संभव उसकी सहूलियत का ख़्याल रखते. संयम उसे प्रसन्न रखने का प्रयास करता, “अरे भाभी, तुम अच्छा आ गई. घर में मर्दाने चेहरे देखकर मैं संन्यासी बनता जा रहा था. यहां कामवाली बाई भी नहीं है कि उसका मुख देख लूं. खाना बनाने से लेकर बगीचे मेें पानी देने तक सारा काम बुढ़ऊ काका करते हैं.”
संभव मुस्कुरा दिए, “अब घर कैसा लगता है?”
“जन्नत. कचहरी जाने की इच्छा नहीं होती. लगता है भाभी के पास डटा रहूं.”
“शादी के बाद मेरे पैरों में बेड़ियां पड़नी चाहिए, पड़ गई तुम्हारे पैरों में.”
“सही फ़रमाते हो भइया. मां होतीं, तो भाभी को रसोई के राज-रहस्य बतातीं. आजकल मैं सास के रोल में हूं.”
संभव कृतज्ञ थे. “जानकी, दिनों बाद घर में रौनक़ लौटी है. इसी तरह मुझे सहयोग और संयम को स्नेह देती रहना.”
संयम ने अभूतपूर्व बयान दिया, “भइया के मुख से अब जाकर सहयोग, स्नेह, सहभागिता जैसे शब्द सुन रहा हूं, वरना वही एक्स रे, एमआरआई, ईसीजी, सिरिंज, ड्रिप. बाप रे! इसीलिए मैं डॉक्टर नहीं बना. डॉक्टर लोग बहुत कम हंसते हैं.” संभव हंसते हुए बोले, “मैं हंस रहा हूं.”
“अब थोड़ा हंसने लगे हो भइया. भाभी, भइया तुम पर लट्टू हैं. मैं हौसला न बढ़ाता, तो कुंआरे रह जाते.”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. यह हो जाता, तो विधाता शायद मेरा संयोग तुमसे जोड़ देते संयम…
जानकी करारी लौटी. अम्मा गदगद.
“दोनों भाइयों में बहुत प्रेम है. जानकी तुम संयम को संभव से कम न मानना.”
“संयम को कम नहीं बढ़कर मानती हूं.”
मैथिली बोली, “न सास-ससुर की रोक-टोक, न ननद की दादागिरी. जानकी मुझे जो ऐसा घर मिल जाए, तो ख़ूब मौज उड़ाऊं.”
“मेरा विवाह संयम से होता, तो मैं भी उड़ाती.”
अम्मा ने मैथिली को डपट दिया, “कुछ भी बोलती है. जानकी, बाबूजी से कहूंगी डॉक्टर साहब को फोन करके कहें कि तुम्हें लेने दोनों भाई आएं.”
मेरी नज़र तो संयम पर टिक गई है. चाहती हूं कि डॉक्टर साहब नहीं, संयम आएं.

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लेकिन संभव आए. जानकी निरुत्साहित.
कार ड्राइव कर रहे संभव ने उसके निरुत्साह को लक्ष्य किया, “उदास हो?”
“संयम को भी लाते.”
“उसे बुख़ार है.”
“कब से?”
“उदास थी, अब घबरा गई?”
घर पहुंचकर संभव ने संयम का टेंपरेचर चेक किया.
“मैं इसकी हाय-तौबा से परेशान हो गया हूं. जानकी अब तुम करो इसकी सेवा.”
संयम ने मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी, तुमने मेरी केयर भइया से कम की, तो मैं तहलका मचा दूंगा. देवर का अर्थ जानती हो?  दूसरा वर. मैं तुम्हारा दूसरा वर हूं.”
जानकी उसे अपलक देखती रही. संकेत तो नहीं दे रहा है? इस तरह घेरे रहता है जैसे समीपता चाहता है. इसी को मन में बसाकर तो यहां रहने की कोशिश कर रही हूं, पर जानकी की क़िस्मत में सदमे ही लिखे हैं.
बाबूजी अचानक आए, “डॉक्टर साहब, मैथिली ने बीएससी कर लिया है. एमएससी बायो टेक में करना चाहती है. करारी में यह विषय नहीं है. कहें तो यहां रहकर पढ़े. जानकी को अकेलापन नहीं लगेगा.”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. बाबूजी ने मेरा इस्तेमाल करने के लिए ही मुझे अधेड़ से ब्याह दिया है. सास-ससुर का झमेला नहीं है, इसलिए इन लोगों को चाहे जब टपक पड़ने की पात्रता मिल गई है. अभी अम्मा बीमार पड़ीं, बाबूजी यहां पटक गए कि करारी के डॉक्टर बेव़कूफ़ हैं. संभव अच्छा इलाज करेंगे. क्षीण बुद्धि संभव ने उपचार किया और माता जैसा आदर दिया. अब मैथिली पढ़ना चाहती है. फिर वैदेही फिर छोटी सिया. मैं अपने घर में, ख़ासकर संयम को लेकर दख़ल नहीं चाहती. बोली, “बाबूजी, सुनो तो…”
लेकिन क्या करे इस क्षीण बुद्धि प्राणनाथ का. अविलंब कहा, “बाबूजी, सुनना क्या है? आपका घर है. मैथिली रहेगी, तो चहल-पहल बनी रहेगी.”
बाबूजी उद्देश्य पूरा कर चलते बने. जानकी सदमे में. संभव ने हाल पूछा, “जानकी परेशान लगती हो.”
“बाबूजी आप पर भार डाल रहे हैं. मुझे संकोच होता है.”
“संकोच क्यों? इस घर में तुम्हारा अधिकार है.”
संयम ख़ुश हो गया, “बुला लो भाभी. मैथिली ने शादी में बहुत सताया था. गिन-गिनकर बदला लूंगा.”
मैथिली आकर माहौल में रंग भरने लगी. जानकी को संदेह नहीं पुख्ता विश्‍वास है कि मैथिली, संयम को लपेटे में लेने के लिए यहां स्थापित हुई है. उसमें रुचि लेकर संयम चालबाज़ी दिखा रहा है. फोर्थ सेमिस्टर पूरा होते-होते समझ में आ गया रचना रची जा चुकी है. राज़ खोलने का भार संयम पर डाल फोर्थ सेम की परीक्षा होते ही मैथिली करारी खिसक ली कि उसकी अनुपस्थिति में संयम प्रस्ताव पारित करा ले.
संयम प्रस्ताव लेकर जानकी के सम्मुख आया, “भाभी, कुछ कहना है.”
“कहो.”
“भइया से कहने की हिम्मत नहीं हो रही है. तुम मेरी अर्जी उनके दरबार में लगा देना.”
जानकी सब समझ रही है, पर फिर भी कहा, “अर्जी का मजमून तो सुनूं.”
“मैं मैथिली से शादी करना चाहता हूं.”
अब तक का सबसे भीषण सदमा. इस तरह चीखकर अभद्रता दिखाते हुए जानकी पहली बार बोल रही है, “पागल हुए हो?”
“उसी दिन पागल हो गया था, जब मैथिली को पहली बार देखा था.”
“मैथिली प्रेम-वेम पसंद नहीं करती.”
“उसका समर्थन है. कह रही थी तुम्हारा सामना नहीं कर सकेगी, इसलिए जब वह करारी चली जाए, तब मैं तुमसे बात करूं.”
जानकी रो देगी.
“देखती हूं संयम तुम्हारे भइया क्या कहते हैं?”
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. जिसे पहली नज़र में दिल दे दिया, वह मैथिली के नाम की लौ जलाए बैठा है. मैथिली कितनी घाघ है. मेरी स्थिति जानती है, फिर भी… ज़रूर अम्मा ने भेजा होगा कि संयम पर मोहिनी डाले. एक और लड़की के हाथ सस्ते में पीले हो जाएं. मैथिली ने ऐसी मोहिनी डाली… नहीं, मुझे मनचाहा नहीं मिला, मैं मैथिली को मनचाहा नहीं पाने दूंगी.
जानकी को रातभर नींद नहीं आई. ख़ुद को असहाय, उपेक्षित पा रही है. संभव की संगत नहीं चाहती, पर वे अपनी भलमनसाहत में उसके समीप आना चाहते हैं. संयम की संगत चाहती है, पर वह पकड़ से छूटता जा रहा है. अब उसके व्यवहार में रोमांच नहीं कपट का आभास होता है. पहले दिन से ही मैथिली को पाने की योजना बना रहा था. योजना सफल हो, इसलिए भाभी… भाभी… कहकर उसकी ख़ुशामद करता रहा.
जानकी निराशा, ईर्ष्या, क्रोध, बौखलाहट से गुज़र रही थी. अम्मा का फोन बौखलाहट को पराकाष्ठा पर ले आया.
“जानकी, मैथिली ने सब समाचार बताया. तुमको लेकर वह बड़े संकोच में है, पर संयम उससे शादी करना चाहता है. हमारे तो भाग्य जाग गए. दोनों बहनें मिल-जुल कर रहोगी. बाबूजी इतवार को डॉक्टर साहब से बात करने आएंगे.”
जानकी बौखलाहट में ललकारने लगी, “अम्मा, तुमने मैथिली को जान-बूझकर पढ़ने के बहाने मेरे घर भेजा कि संयम पर मोहिनी डाले. संयम, मोहिनी की चाल में फंस गया. क्षीण बुद्धि डॉक्टर साहब को क्या कहूं? संयम उनके दिमाग़ में इतना घुस गया है कि उसकी ख़ुशी के अलावा इन्हें कुछ नहीं सूझता.”
“नहीं…”
“मैं बोलूंगी अम्मा. तुम्हें मैथिली का बड़ा ख़्याल है. मुझे धोखे में रखकर अधेड़, बदसूरत के साथ बांधा, तब मेरा ख़्याल नहीं आया था? जब ये दोनों भाई मुझे देखने आए थे, मैंने डॉक्टर साहब को चाचा, संयम को डॉक्टर साहब समझ लिया था. तुम जानती थी असलियत क्या है, लेकिन मुझे नहीं बताया. मेरे साथ कपट किया.”
“नहीं बेटी…”

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“मैं बोलूंगी अम्मा. मैं अब भी सदमे से उबर नहीं पाई हूं. अच्छी चाल चली तुम लोगों ने. मेरा दिमाग़ ख़राब है. इस विषय में मुझसे बात न करना.”
जानकी ने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया. ठीक इसी क्षण स्वर उभरा, “भाभी…”
जानकी के कान बज रहे हैं या संयम कचहरी से लौट आया है?
बैठक में बैठी, तेज़ आवाज़ में अम्मा को ललकार रही जानकी को आभास नहीं था कि ज़रूरी फाइल लेने के लिए अचानक आ पहुंचा संयम उसकी कटुता सुनकर बैठक से लगे बाहरी खुले बरामदे में ठिठका खड़ा है. इसके आने की आहट नहीं मिली या दबी चाप से बैठक में दाख़िल हुआ है.
“संयम तुम? जल्दी आ गए.”
“फाइल भूल गया था.”
“पानी पियोगे?”
“हां.”
जानकी को राहत मिली कि संयम ने फोन पर की गई उसकी बातचीत नहीं सुनी. सुनता तो प्रतिक्रिया ज़रूर देता.
लेकिन जानकी महसूस करने लगी है कि संयम बहुत बदल गया है. कुटनी मैथिली करारी क्या गई, संयम की हंसी ले गई.”
“संयम, मैथिली की याद आ रही है?”
“उससे मेरा कोई वास्ता नहीं.”
“शादी नहीं करोगे?”
“नहीं.”
“क्यों?”

अम्मा से तुम जो बातें कर रही थीं, सुनकर शादी से मेरा विश्‍वास उठ गया. शादी के समय तुम्हारे मन में जो भी था, पर भइया के इतने अपनेपन को देखकर तुम्हारी धारणा में बदलाव नहीं आना चाहिए था? अधेड़, बदसूरत… भइया में इतने गुण हैं, पर तुम इस मामूली बात पर अटकी हो कि वे ख़ूबसूरत नहीं हैं? तुम तो बहुत ख़ूबसूरत हो, पर दिल साफ़ नहीं है, तो ख़ूबसूरती किस काम की? कपट तो हम लोगों के साथ हुआ है. सोचता था तुमने भइया का जीवन परिपूर्ण कर दिया है. उनकी भावनाओं को समझती हो. सब ढोंग. भैया हमेशा मुझसे कहते हैं कि मुझे फुर्सत नहीं मिलती, संयम तुम अपनी भाभी का ख़्याल रखा करो. मैंने तुम्हें इतना मान-सम्मान दिया, ख़्याल रखा… छी… छी…”

“संयम सुनो तो…”
“तुम सुनो. मिस मैच होगा सोचकर भइया शादी का मन नहीं बना रहे थे. मैं अड़ गया, मुझे तुम बहुत अच्छी लगी हो. अफ़सोस, मैं ग़लत था.”
“सुनो तो…”
“तुम सुनो. मैं मानता हूं कि भइया जैसे इंसान के लिए जो अच्छे विचार नहीं रखता, वह अच्छा नहीं हो सकता. भइया मेरे लिए क्या हैं, तुम नहीं समझोगी… मेरे लिए उनसे बढ़कर कुछ नहीं है. न तुम, न मैथिली.”
“संयम…”
“मैंने तुम्हारे भीतर का कालापन देख लिया, पर भइया को मत दिखाना. वे तुम पर विश्‍वास करते हैं. उन्हें तकलीफ़ होगी. उनके सामने मेरे साथ सहज व्यवहार करती रहना. मैं भी नाटक करता रहूंगा. नहीं करूंगा, तो भइया को कारण क्या बताऊंगा.”
संयम वहां से चला गया.
जानकी आत्मयंत्रणा से गुज़र रही है. संयम की आंखें सुलग रही थीं. शब्द लड़खड़ा रहे थे. कितना अपमानजनक है भाभी… भौजाई… रटनेवाले जिस देवर ने एक दिन दूसरा वर होने जैसी बात की थी. आज उसे भाभी कहने से भरपूर बच रहा था.

सुषमा मुनीन्द्र
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सुषमा मुनीन्द्र

परिमल शिवानी के प्रति एक अजब-सा खिंचाव महसूस करने लगा. उसने स्वयं पर पूरा नियंत्रण रखा. न कभी कुछ कहा, न कुछ इंगित ही किया, पर रात को बिस्तर पर लेटते ही वह जागी-मुंदी आंखों के समक्ष साकार हो उठती और बहुत चाहकर भी वह उस छवि को अपने मस्तिष्क से दूर न कर पाता…

कुछ अजब-सी उलझन में थे परिमल उन दिनों. उच्च जीवन मूल्योंवाले संस्कारयुक्त परिवार में पले-बढ़े परिमल को अपने आस-पास की दुनिया अति विचित्र लगती. अपने सहपाठियों की बातें, उनका व्यवहार अचम्भित करता था उन्हें. उस समय की पीढ़ी, जो आज पुरातनपंथी कहलाती है, वही तब उन्हें बहुत आधुनिक लगा करती थी.
मां-बाऊजी देहात छोड़ शहर आ बसे थे, ताकि बच्चों को अच्छी शिक्षा दिला सकें. बच्चे सब होनहार निकले, माता-पिता की आकांक्षाओं पर खरे उतरे, फिर भी घर का वातावरण सीधा-सरल ही बना रहा. काम के प्रति निष्ठा, सत्य बोलना, ईमानदारी आदि संस्कारों की ही विरासत मिली थी परिमल और उसके भाई-बहन को.
ऐसे संस्कारी व्यक्ति को एक बेहद आम बीमारी हो गई. प्यार हो गया था उसे. वह भी अपनी ही छात्रा से. वह अपने मन की बात कहे भी तो किससे! यही उलझन थी.
परिमल का प्यार उस सैलाब की तरह भी तो नहीं उमड़ा था, जो सीमाएं तोड़, वर्जनाओं को नकारता हुआ, दीवानावर आगे बढ़ता है. ऐसा प्यार तो अपना ढिंढोरा स्वयं ही पीट आता है, किसी से कहने-सुनने की ज़रूरत ही कहां पड़ती है. लेकिन परिमल का प्यार तो एक सुगन्धित पुष्प की तरह था. उस फूल की ख़ुशबू स़िर्फ उसी को सम्मोहित कर रही थी. और कोई नहीं जानता था, स्वयं शिवानी भी नहीं. जान भी कैसे सकती थी, परिमल उसे बताए तब न!
हुआ यूं कि परिमल ने एमए कर लिया, तो आगे पीएचडी करने की चाह भी हुई, ताकि किसी कॉलेज में व्याख्याता का पद पा सके. परंतु वह अपने माता-पिता पर बोझ नहीं बनना चाहता था. घर में एक छोटा भाई व बहन और थे. उनके प्रति माता-पिता की ज़िम्मेदारियां अभी बाकी थीं. सो, परिमल ने तय किया कि वह नौकरी करके घर की सहायता न भी करे, पर अपना ख़र्च तो निकाल ही सकता है. अतः उसने अपनी डॉक्टरेट की पढ़ाई करने के साथ-साथ सायंकाल ट्यूशन पढ़ाने की ठानी.
उसने अंग्रेज़ी साहित्य में एमए किया था और मध्य प्रदेश के उस छोटे से शहर में अंग्रेज़ी पढ़ानेवालों की ख़ूब मांग थी. परिमल के ही प्रो़फेसर ने उसे अपने एक परिचित की बेटी को पढ़ाने का काम दिलवा दिया.
शिवानी के महलनुमा घर में घुसते, पहली बार तो परिमल को कुछ हिचक-सी हुई. पर थोड़े ही दिनों में वह उस माहौल का आदी हो गया. घर के सभी सदस्यों का व्यवहार बहुत शालीन और स्नेहयुक्त था. किसी में भी अपने वैभव का दर्प नहीं. कारण था गृहस्वामिनी का स्वस्थ दृष्टिकोण. शिवानी से दस वर्ष ज्येष्ठ शशांक की अधिकांश शिक्षा मुंबई में हुई थी. उसका विवाह भी हो चुका था और अब वह पारिवारिक व्यवसाय संभाल रहा था.
शिवानी की शिक्षा चूंकि उसी शहर में आस-पास के स्कूलों में ही हो पाई थी, इसलिए उसे अब कॉलेज में अंग्रेज़ी को लेकर द़िक़्क़त आ रही थी. इसके अलावा माता-पिता को लगा कि अंग्रेज़ी का अच्छा ज्ञान न होने पर उसका रिश्ता किसी बड़े शहर के आधुनिक परिवार में संभव न हो पाएगा.
अतः परिमल को उसे पढ़ाने की ज़िम्मेदारी सौंप दी गई.
अब तक जिन लड़कियों से भी परिमल का परिचय हुआ था, उन सब से शिवानी एकदम भिन्न थी. मासूम और निश्छल. उसका यही सरल स्वभाव उसके चेहरे को अनोखी मुग्धता प्रदान करता था, जो बरबस मन को आकर्षित करती थी.
कुछ माह पढ़ाने के पश्‍चात् ही परिमल शिवानी के प्रति एक अजब-सा खिंचाव महसूस करने लगा. उसने स्वयं पर पूरा नियंत्रण रखा. न कभी कुछ कहा, न कुछ इंगित ही किया, पर रात को बिस्तर पर लेटते ही वह जागी-मुंदी आंखों के समक्ष साकार हो उठती और बहुत चाहकर भी वह उस छवि को अपने मस्तिष्क से दूर न कर पाता…
कभी-कभी शशांक से भी मुलाक़ात हो जाती. वह परिमल से तीन-चार वर्ष ही बड़ा था और दोनों में अच्छी पटने लगी थी. तीव्र बुद्धि शशांक उसके मनोभावों को थोड़ा-बहुत समझने लगा था. परिमल की विद्वता व उसके संयमित व्यवहार से प्रभावित भी था वह. शायद इसीलिए जब उसने परिमल को बताया कि मां-पिताजी शिवानी के विवाह की सोच रहे हैं और एक चार्टर्ड अकाउंटेंट से रिश्ते की बात भी चल रही है, तो यह कहते हुए उसने परिमल के चेहरे की ओर एक आशाभरी नज़र से देखा भी. शायद वह परिमल की प्रतिक्रिया जानना चाह रहा था, पर मन में घुमड़ते अवसाद को परिमल चुपचाप पी गया. उसके लिए शिवानी की ख़ुशी ही सर्वोपरि थी, उसकी अपनी चाहत से भी बढ़कर.
वह जानता था कि अभी उसे अपने पैरों पर खड़ा होने और विवाह लायक धन जुटाने के लिए पांच-सात वर्ष और संघर्ष करना होगा. तब भी वह शिवानी को वह सब सुविधाएं नहीं दे पाएगा, जिनकी वह आदी है या जो एक सीए पति से उसे मिल सकती हैं. इसके अलावा वह दोनों परिवारों के आर्थिक और सामाजिक अंतर को भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था.
परिमल की स्मृति में ताउम्र अंकित रही वह आख़िरी सांझ. सात बजने को थे कि शशांक आकर चुपचाप बैठ गया. उसने जैसे ही पढ़ाना समाप्त किया, तो शशांक ने बताया कि शिवानी का रिश्ता तय हो चुका है और अगले रविवार को सगाई की रस्म है, जिसके लिए उसे कुछ ख़रीददारी इत्यादि करनी होगी. अतः अब वह आगे और नहीं पढ़ पाएगी.
दरक गया था परिमल का मन. पर उसने मुबारक़बाद देते हुए भी शिवानी की तरफ़ नहीं देखा. अतः जान नहीं पाया कि वह किस कठिनाई से स्वयं को रोके खड़ी थी.
एक पूरा कालखंड ही बीत गया इस बात को. वर्षों की गिनती करें, तो चालीस वर्ष से कुछ ही कम. शिवानी की बेटी का विवाह हो चुका और वह नानी भी बन चुकी. पर कुछ चित्र स्मृति में आज भी यूं अंकित हैं, मानो पत्थर पर खुदे ऐतिहासिक शिलालेख हों. लेख नहीं, चित्र- अमिट-से शिलाचित्र.

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वयःसंधि पर खड़ी थी तब वह. पहली बार मन में प्यार की कोपल फूटी थी. परिचित नहीं थी वह इस विचित्र-से एहसास से. लगा था, जैसे एक सुवासित बयार सहलाने लगी हो तन-मन को. शिवानी जब भी उदास होती है, हताश होती है, ऊर्जा पाने उसी बीते कल में पहुंच जाती है. बेटी के ब्याह के बाद से तो और भी अकेली पड़ गई है वह. प्रायः स्वयं से बातें करती रहती है.
‘ज़माना कितना बदल गया है. कितनी समझदार है आज की पीढ़ी. अपने फैसले लेने में सक्षम, अपने हक़ों के बारे में सचेत. और एक मैं थी, कितनी नादान. सच कहूं तो मैं बेवकूफ़ ही थी. उस समय के मापदंड से भी. विवाह होने तक भी यही समझती रही कि विवाहित स्त्रियां बहुत से जेवर पहन लेती हैं, तभी उनके बच्चे हो जाते हैं. सरल हृदया मां ने कुछ बताया नहीं था. तब ऐसा प्रचलन भी नहीं था. इसी सादगी में एकदम आदशर्र् जीवन जीने का ही प्रयत्न किया.
‘वह मुझे पढ़ाने आते थे. झा अंकल के परिचित थे, सो पिताजी ने बिना झिझक उन्हें मुझे पढ़ाने के लिए हामी भर दी. बहुत उसूलों वाले थे परिमल सर. अन्य युवकों से एकदम भिन्न. नैतिकता की साक्षात् प्रतिमूर्ति. दो वर्षों में बहुत क़रीब से जाना उन्हें और वह मन को भाने लगे. उनके कारण पढ़ने में रुचि आने लगी. जाने क्यों मन को विश्‍वास था कि मैं भी उन्हें अच्छी लगती हूं. नहीं! कहा किसी ने भी कुछ नहीं. एक बार भी नहीं. पर बिना शब्दों में बांधे भी तो बहुत कुछ सुन-समझ और कह लिया जाता है न?
‘मां-पिताजी ने यहां विवाह तय कर दिया. कुछ नहीं कह पाई. हिम्मत ही नहीं जुटा पाई. कहती भी तो मानते क्या? पिताजी को अपने वैभव पर गर्व भले ही कभी नहीं रहा, पर मेरे सुखद भविष्य की उन्हें चिंता थी, सीए दामाद को छोड़कर मात्र एमए पढ़े एक बेरोज़गार युवक से अपनी बेटी का विवाह करने की बात पर राज़ी हो जाते क्या?
‘विवाह के उपरांत जीवनसाथी स़िर्फ अपने ही हित की सोचे, केवल अपनी ही इच्छाओं, ज़रूरतों व सुविधाओं का ख़याल हो उसे, तो कैसा होगा जीवन? पुरुष रूप में पैदा होने के कारण शक्ति और अधिकार, सब तो जन्म से ही मिले हैं उन्हें. मन की उलझन और परेशानी को वे क्या बांट सकेंगे? बुख़ार से तप रही होऊं तो पलभर पास खड़े होकर हालचाल ही पूछ लें, इतनी भी उम्मीद नहीं.
दुख-तकलीफ़ में नितान्त अकेली पड़ जाती हूं. ख़ासकर बिटिया के ब्याह के बाद से. ख़ैर, ज़िंदगी तो गुज़र ही रही है, गुज़र ही गई समझ लो, अगर ज़िंदा रहना भर काफ़ी मान लिया जाए तो. कभी मन उदास होता है, तो सोचती हूं कि क्या स़िर्फ पैसा ही ख़ुशियों की गारंटी हो सकता है? हीरे-मोती पहनने की चाह नहीं की थी, एक संवेदनशील साथी मिल गया होता, बस.’
भूल नहीं पाई परिमल को शिवानी. पति जब भी कोई कड़वी बात कह देते, जब कभी वह स्वयं को अवांछित-सा महसूस करती, तो परिमल को याद कर अपना मनोबल बढ़ा लेती. कल्पनाओं में जाने कितनी बार परिमल के कंधों पर सिर रखकर ढेर-से आंसू बहाए हैं उसने, अपनी हर तकलीफ़ उससे बांटकर अपना जी हल्का किया है.
समय तो स्वचलित क्रिया है, सो चलता ही रहता है. शिवानी के भैया-भाभी के विवाह की पचासवीं वर्षगांठ आने को है- गोल्डन एनिवर्सरी, जिसे उनके बेटे ने धूमधाम से मनाने की योजना बनाई है.
पिता तो बेव़क़्त चल बसे थे और मां का भी देहांत हो चुका, पर भाई-भाभी ने कभी शिवानी को मां-बाप की कमी महसूस नहीं होने दी. भैया के लिए आज भी वह प्यारी-सी छोटी बहना है. उसे भी इंतज़ार है आगामी उत्सव में सम्मिलित होने का. पति काम के बहाने जाना टाल गए और बिटिया-दामाद भी दूर की पोस्टिंग पर हैं, अतः वह अकेली ही पहुंची भाई के घर.
पार्टी अपने पूरे ज़ोरों पर है. वह सारे नाते-रिश्तेदारों से मिल चुकी. भाई के मित्र भी बारी-बारी से अभिवादन कर गए. उनमें ज़्यादातर नए थे, जिनसे वह नाममात्र को ही परिचित है. बहुत बोलनेवाली तो वह वैसे भी कभी नहीं रही, अतः सब से मिल-मिलाकर वह एक कोनेवाली मेज़ पर आ बैठी.
भैया से उसे पता चला है कि आज के उत्सव में सम्मिलित होने परिमल भी आनेवाले हैं और वह उनसे मिलने की अनुभूति को पूर्णतः महसूस करने के लिए पूरा एकांत चाहती है.
उसकी दृष्टि मुख्य द्वार पर टिकी है, ताकि वह परिमल के भीतर आते ही उन्हें देख सके और एक पल भी व्यर्थ न जाए. वह जानती है कि वह बहुत बदल चुके होंगे, पर कुछ भी हो, वह उन्हें पहचान लेगी. यादों में सदैव ही तो उसके साथ रहे हैं वह…
स्टेज पर कुछ कलाकार पुरानी फ़िल्मों के गीत हल्के स्वरों में गा रहे हैं, जो माहौल को उसी 40-50 वर्ष पूर्व के काल में ले गए हैं और शिवानी भी अपनी तमाम बीमारियां और दर्द भूलकर अपने ख़यालों में उसी यौवन के द्वार पर आकर जैसे ठिठक गई है.
आज वह अपनी यादों के साथ अकेली ही रहना चाह रही है. उस विगत काल में पहुंच चुकी है वह, जब यौवन ने नई-नई दस्तक दी थी. दुनिया एकाएक ख़ूबसूरत लगने लगी थी. पूरे परिवार का स्नेह पाती थी वह, पर उसे शाम का वह एक घंटा ही अज़ीज़ लगने लगा था, जब ‘सर’ उसे पढ़ाने आते थे.
धीरे-धीरे उस के मुख से ‘सर’ कहना भी छूटता जा रहा था. उनसे बात करते व़क़्त बिना सम्बोधन के ही काम चलाती. मन ही मन वह उन्हें चाहने लगी थी, पर शर्मीली और मितभाषी शिवानी किसी को नहीं बता पाई थी अपने मन की बात.
मुख्य द्वार से भीतर आनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को वह बड़े ध्यान से देख रही है. अधिकांश पुरुष गंजे अथवा सफ़ेद बालों वाले हैं. हां, स्त्रियां अनेकरूपा हैं. कुछ अपनी उम्र छिपाने के लोभ में सौन्दर्य प्रसाधनों से रंगी-पुती व गहनों से लदी-फंदी होने पर भी फूहड़ ही लगती हैं और कुछ बिना साज-शृंगार व सामान्य कपड़ों में भी शालीन.
कुल मिलाकर माहौल कुछ ऐसा है, जैसा विवाह के अवसरों पर होता है, सिवाय इसके कि अधिकतर अतिथि बड़ी उम्र के हैं. विवाह के अवसर पर चढ़ती उम्र की रौनक होती है. वर-वधू के संगी-साथी, चचेरे-ममेरे भाई-बहन धमाचौकड़ी मचाए रखते हैं, पर आज तो दूल्हा-दुल्हन स्वयं ही सत्तर पार कर चुके हैं और उनके मित्र-परिचित भी. रिश्तेदारों में जो बहुत नजदीकी हैं और परिवार समेत आए हैं, उन्हीं में से कुछ उभरती पीढ़ी के भी हैं.
भैया-भाभी अपने शुभचिंतकों से घिरे खड़े हैं. कुछ लोग हटते हैं तो दूसरे घेर लेते हैं. सबसे मिलना है उन्हें, सब की मुबारक़बाद स्वीकार करनी है. ऐसा क्यों न हो, दोनों ने कितना अच्छा समय एक संग गुज़ारा है. सहपाठी थे दोनों और विवाह भी जल्दी ही कर लिया था. भाभी स्नेहमयी और सहृदया. भैया भी सदैव ख़ुद से पहले दूसरों की प्रसन्नता की सोचनेवाले, भाभी की हर ख़ुशी पूरी करने की कोशिश करनेवाले. जीवन ऐसा बीते, तभी इस जश्‍न का औचित्य है.
शिवानी अपने ही ख़यालों में खोई है. दृष्टि उसकी द्वार पर ही है. उसने देखा ही नहीं कि भैया किसी को साथ लिए उसी की तरफ़ आ रहे हैं. जब उन्होंने पास पहुंच कर शिवानी को पुकारा, तभी जाना उसने. पर जब तक वह अपने साथी का परिचय करा पाते, उन्हें कोई अन्य अतिथि दिख गया और वह उसका स्वागत करने आगे बढ़ गए.
शिवानी ने एक सरसरी निगाह आगंतुक पर डाली और फिर से अपनी दृष्टि द्वार पर टिका दी. एक पल भी नहीं खोना चाहती वह परिमल को देखने के लिए. पर उसका ध्यान फिर भंग हुआ, जब आगंतुक ने उसे नाम लेकर पुकारा. शिवानी ने निगाहें उस ओर उठाईं, तो उस व्यक्ति के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कुराहट तैर गई और उसका चेहरा स्वतः ही ज़रा-सा बायीं ओर झुक गया. पहचान गई शिवानी और हड़बड़ाकर उठ खड़ी हुई.
सब कुछ वैसा ही तो हो रहा है, जैसा शिवानी ने चाहा था, जैसी उसने कल्पना की थी. वह परिमल के सान्निध्य में बैठी है और कोई भी नहीं है उनके आस-पास.

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नहीं, परिमल उसे भूला नहीं है. पिछली अनेक बातें याद हैं उसे. अरसे बाद मिले किसी पुराने स्नेही मित्र की ही तरह वह उससे बातें कर रहा है, उसका और उसके घर-परिवार का हालचाल जानना चाह रहा है. वह ही क्यों उसके हर प्रश्‍न का उत्तर बहुत औपचारिक और संक्षिप्त रूप में दे रही है? क्यों खुलकर बात नहीं कर पा रही वह?
मन ही मन ख़ुद से बातें करने लगी है शिवानी, ‘कल्पना में तुम मेरे संग ही रहे इन तमाम वर्षों में. तुम्हारी उपस्थिति मैं सदैव अपने आस-पास महसूस करती रही. अपने मन की हर बात, हर उलझन और परेशानी तुमसे बांटती रही, पर सच तो यह है कि कुछ भी नहीं जानते तुम मेरे बारे में, सिवाय भैया से सुनी कुछ मुख्य बातों के… और मैं ही क्या जानती हूं तुम्हारे बारे में, सिवा इसके कि गत वर्ष तुम्हारी पत्नी की मृत्यु हो गई और दोनों बेटे विदेश जा बसे हैं. अलग-अलग राहों पर चलते हुए इतिहास अलग हो चुके हैं हमारे. विवाह के समय भूल ही गई थी तुम्हें अपने जीवन से अलग करना.
भीतर से सदैव ही जुड़ी रही तुम्हारे संग. आज जाना, कितना बेमानी था वह सब.’
कंधे पर सिर रख कर रोने की बात तो उठी ही नहीं शिवानी के मन में. सामने बैठा व्यक्ति तो नितांत अजनबी था.

उषा वधवा 

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उषा वधवा

“तुम जानते हो तुम्हारा व्यक्तित्व, बोलचाल का तरीक़ा, हर एक के साथ तुम्हारी ज़रूरत से ज़्यादा इंटीमेसी दिखाना सामनेवाले को हर बार ग़लतफ़हमी में डाल देता है. तुम्हारे व्यवहार के धोखे में आकर सामनेवाला अपने आप को तुम्हारी ज़िंदगी में बहुत ज़्यादा इंपॉर्टेंट समझने लगता है. इससे हमारा रिश्ता प्रभावित होता है.” स्वाति बार-बार उसे कहती.

ऐसा कुछ नहीं है. मैं जानता हूं तुम मेरे लिए क्या हो, मेरे मन में तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता.” अमृत सपाट स्वर में कहता.

“कुछ पेड़ अचानक ही ज़मीन पर अपने आप उग आते हैं और ज़मीन में बड़ी गहराई तक अपनी जड़ें जमा लेते हैं. इसमें किसका कसूर है, ज़मीन का या फिर पेड़ों का?”
“न ज़मीन का और न ही पेड़ों का.” अमृत ने अनमने स्वर में उत्तर दिया था.
“ज़मीन तो अपनी जगह पड़ी रहती है, हवा में उड़ते बीज आकर उस पर गिर जाते हैं. भावनाओं की बारिश में बीज कब अंकुरित हो जाते हैं, ज़मीन को पता ही नहीं चलता.”
अमृत के जवाब पर सामनेवाले ने फिर से सवाल किया, “तो कसूर हवा का है, जो बीजों को उड़ाकर ज़मीन पर गिरा देती है, ये भी नहीं देखती कि किस पेड़ के बीज हैं और किसकी ज़मीन है.”
“कसूर हवा का भी नहीं है. उसे तो पता ही नहीं होता कि वह क्या उड़ाकर ले जा रही है और किसकी ज़मीन पर कौन-सा बीज गिरा रही है.” अमृत ने बीयर का खाली मग नीचे रखा और सवाल करनेवाले से विदा लेकर बार से बाहर आ गया. लौटकर ऑफ़िस जाना है. रास्ते में पान मसाले का एक पाउच ख़रीदकर मुंह में डाला.
ऑफ़िस पहुंचते ही शैली से दिनभर के कॉल्स के बारे पूछ-बताकर अमृत अपने केबिन में जाकर बैठ गया. फ़ाइलें देखते हुए, फ़ोन अटेंड करते हुए, वह देख रहा था कि शैली का पूरा ध्यान उसी की ओर था. बहुत दिनों से वह गौर कर रहा था कि शैली के कपड़े दिन-ब-दिन चटकीले होते जा रहे हैं, चेहरे पर मेकअप की परतें बढ़ती जा रही हैं, हाव-भाव बदल रहे हैं.
अमृत जब तक ऑफ़िस में होता है, शैली किसी-न-किसी बहाने से उसके आसपास मंडराती रहती है. केबिन के शीशे के दरवाज़े के ठीक उस पार बैठी शैली की आंखें दरवाज़े के इस पार बैठे अमृत पर ही टिकी रहती हैं.
“मे आइ कम इन?” शैली ने पूछा और बिना जवाब का इंतज़ार किए ही जाकर अमृत की सीट के पास खड़ी हो गई और झुककर फाइल दिखाने लगी. डियो और परफ्यूम की मिली-जुली तेज़ गंध अमृत की सांस में भर गई. फाइल के पन्ने पलटते हुए शैली की कोहनी कई बार अमृत के कंधे से छू गई.
पहले शैली दूर खड़ी होती थी. एक-एक इंच पास खिसकते हुए कब अमृत के कंधे तक पहुंच गई, उसे पता ही नहीं चला. पहले वह अपनी कोहनी अमृत के कंधे से छू जाने पर झिझक जाती थी, फिर झिझकना छूट गया.
अब शैली जान-बूझकर अमृत के कंधे, उंगलियों को छूती रहती है. क्या पाना चाहती है शैली अमृत के कंधे को छूकर? शैली कॉफी के बारे में पूछ रही थी…
अमृत ने घड़ी देखी. बीयर पीकर काफ़ी व़क़्त बीत चुका था, उसने हां कह दिया. शैली दो कप कॉफी बना लाई. कॉफी पीते हुए शैली अपने परिवार की द़िक़्क़तों के बारे में बताती रहती थी. अमृत दिलचस्पी से सुनता था. पुरुष दूसरी औरतों के दुख और आंसू नहीं देख सकता, ये उसकी कमज़ोरी है. अमृत में यह कमज़ोरी कुछ ज़्यादा है.

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शैली अमृत की यह कमज़ोरी भांप गई है, तभी वह समय मिलते ही अमृत के सामने अपनी परेशानियों का रोना रोने बैठ जाती है. शैली शिद्दत से चाहती है अमृत की उंगलियां उसके आंसू पोंछें और आंसू पोंछते हुए वे गालों से होती हुई शैली के कानों की लटों तक पहुंच जाएं. अमृत की उंगलियों को अपने गालों से कानों तक का सफ़र करवाने के लिए शैली आजकल हर संभव प्रयास कर रही है. दराज़ों को खोलने के बहाने कुर्सी की पीठ की बजाय अमृत के कंधे पर हाथ रख देती है या अमृत की बगल में झूल जाती है.
कॉफी ख़त्म हो चुकी थी. अमृत ने कप नीचे रखा और अपने काम निपटाने चल दिया. वो जानता था शैली यहीं चिपकी रहेगी. न ख़ुद काम करेगी न उसे करने देगी. शैली को आगे के काम के बारे में समझाकर वह निकल गया. शैली का चेहरा उतर गया…
रात में अमृत गैलरी में आकर बेंत की कुर्सी पर बैठ गया. स्वाति को चांद की रोशनी में गैलरी में बैठना बहुत पसंद था. चाहे जितनी रात गहरा जाए, वह दस मिनट तो यहां बैठने का समय निकाल ही लेती थी. अमृत तब जाकर कमरे में सो जाता था, जब स्वाति यहां बैठती थी.
अब जब स्वाति नहीं है, तो अमृत रोज़ यहां आकर बैठता है. जब स्वाति थोड़ी देर गैलरी में बैठने की ज़िद करती थी, तब अमृत खीझ जाता था. लेकिन जब से स्वाति गई है, अमृत रोज़ गैलरी में आकर बैठता है. जाने कितनी देर तक बैठा रहता है, फिर भी नींद नहीं आती, रात नहीं ढलती. लगता है समय जैसे रुक गया है.
अजीब बात है, स्वाति की ओर पीठ करके अमृत कितनी चैन से सोता था, सीधे सुबह ही आंख खुलती थी. लेकिन जब से स्वाति गई है, अमृत को नींद नहीं आती. रातभर पीठ की ओर पलंग पर एक खालीपन-सा चुभता रहता है, तब अमृत स्वाति की ओढ़ी हुई चादर अपने ऊपर कसकर लपेट लेता.
अमृत ने एक सिगरेट सुलगाई और एक लंबा कश लिया. दिन में पूछा गया सवाल अचानक ही अमृत के सामने आकर खड़ा हो गया, ज़मीन पर पेड़ों के बारे में.
शैली के अंदर की ज़मीन पर भी कुछ उग रहा है, वह महसूस कर रहा था. पिछले कई महीनों से ख़ासतौर पर जब से स्वाति गई है, शैली ही अपनी ज़मीन को बहुत ज़्यादा फैलाव दे रही है, एक के बाद एक पेड़ उगाती चली जा रही है…
“तुम जानते हो तुम्हारा व्यक्तित्व, बोलचाल का तरीक़ा, हर एक के साथ तुम्हारी ज़रूरत से ज़्यादा इंटीमेसी दिखाना सामनेवाले को हर बार ग़लतफ़हमी में डाल देता है. तुम्हारे व्यवहार के धोखे में आकर सामनेवाला अपने आप को तुम्हारी ज़िंदगी में बहुत ज़्यादा इंपॉर्टेंट समझने लगता है. इससे हमारा रिश्ता प्रभावित होता है.” स्वाति बार-बार उसे कहती.
“ऐसा कुछ नहीं है. मैं जानता हूं तुम मेरे लिए क्या हो, मेरे मन में तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता.” अमृत सपाट स्वर में कहता.
“कभी मार्क किया है तुमने, शैली मुझे कैसी नज़र से देखती है? ऐसा लगता है जैसे मुझ पर हंस रही है कि तुम हो ही क्या? तुम्हारे पति के लिए तुम मायने ही क्या रखती हो? उसमें तुम्हें लेकर अपने आप पर इतना ज़्यादा कॉन्फ़िडेंस कैसे डेवलप हो गया अमृत?” स्वाति अब बिफरने लगी थी.
“ऐसा कुछ भी नहीं है. ये सिर्फ तुम्हारी ग़लत सोच है, जिसे मैं बदल नहीं सकता.” अमृत के पास कहने को कुछ नहीं होता, तो वह स्वाति की सोच को ग़लत बताकर बात वहीं ख़त्म कर देता.

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“तुम ग़लत कर रहे हो अमृत. तुम स़िर्फ हमारे रिलेशनशिप के साथ ही धोखा नहीं कर रहे, बल्कि उस लड़की को बढ़ावा देकर उसकी भावनाओं से भी खेल रहे हो.” स्वाति कहने से अपने आप को रोक नहीं पाई.

“मैं किसी के भी साथ ऐसा नहीं करता. तुम्हें तो आदत हो गई है हर एक के साथ मेरा नाम जोड़ने की.”
“मेरी हर एक के साथ तुम्हारा नाम जोड़ने की आदत नहीं है, तुम्हारी आदत है हर किसी के साथ ऐसा रिलेशन डेवलप कर लेने की.” स्वाति कहना चाहती थी, लेकिन तब तक अमृत कमरे से बाहर जा चुका होता था.
स्वाति ने पास ही के शहर में नौकरी करने का निर्णय कर लिया था. उसने किराए का मकान भी ले लिया था. पहले स्वाति हर आठ दिन में अपने घर आ जाती थी, फिर धीरे-धीरे उसने आना कम कर दिया. जब भी आती, अमृत के उगाए हुए पेड़ों के जंगल उसके सामने आ जाते और उसका दम घुटने लगता…
अमृत की ज़मीन पर उगे आर्या के पेड़ों को वह अपना नसीब मानकर बैठी रहे या ऋषि की ज़मीन पर अपना नया बगीचा बनाए.
क्या ऋषि उम्रभर ऋषि ही रहेगा? या कुछ समय बाद वह अमृत बन जाएगा.
अमृत की भीतरी ज़मीन पर पराए पेड़ों का घना जंगल था. अमृत के साथ रहते-रहते स्वाति को समय-समय पर उन जंगलों के बारे में पता चला है. दूसरों के अंदर पनपते उन पेड़ों के बारे में भी पता चला, जिनके बीज अमृत के व्यवहार से पनपे थे.
पहले अमृत के अंदर स्वाति के मनचाहे पेड़ों का बगीचा था, जिसके सारे पेड़ स्वाति की पसंद के थे. लेकिन एक दिन अचानक आर्या ने स्वाति का भ्रम तोड़ दिया. स्वाति के लिए बगीचा तैयार करने के बहुत पहले से ही अमृत की ज़मीन पर आर्या ने अपने बीज बो दिए थे. उन पेड़ों की जड़ें इतनी अधिक गहरी और मज़बूत थीं कि स्वाति का कोमल बगीचा उखड़ने लगा.
अब तो जब भी स्वाति अमृत की ज़मीन पर उतरती, अपने आप को आर्या के पेड़ों के बीच पाती. आर्या, फिर स्नेहा, फिर शैली… अमृत ने अपने अंदर न जाने कितने जंगल बना रखे थे.
अमृत की ज़मीन के उन कंटीले जंगलों में भटकते-भटकते स्वाति थक गई थी. उनके कांटों से छलनी हो गई थी, इसलिए वह दूर चली आई थी. अमृत से दूर, ताकि ताज़ी हवा में खुलकर सांस ले सके.
श्रीकांत को क्या कभी आर्या की ज़मीन पर पराए पेड़ों के जंगल दिखाई नहीं दिए होंगे? क्यों और कैसे श्रीकांत उन जंगलों को इतनी आसानी से सह लेता है? या फिर आर्या श्रीकांत के पहुंचने तक अमृत के जंगलों का रास्ता चतुराई से बंद कर देती है या आर्या ने अपने जंगलों को दो अलग-अलग हिस्सों में सफ़ाई से बांट रखा है. जब मौक़ा हो अमृत के जंगल में, जब मन हो श्रीकांत के साथ उसकी ज़मीन पर. कोई इतनी सफलतापूर्वक अपने दो हिस्से कैसे कर सकता है? पर कुछ लोग कर लेते हैं, जैसे अमृत.
उसने तो न जाने अपने आप को कितने हिस्सों में बांट दिया है. स्वाति अपने आप को कभी भी अलग-अलग हिस्सों में बांट नहीं पाई. यदि दूसरे पेड़ उगाने हों, तो उसे पहला जंगल पूरा साफ़ करके ज़मीन खाली करनी होगी…
“आ गया सामान?” ऋषि ने अंदर आते हुए पूछा, “सॉरी ज़रा काम से चला गया था, पर तुम तो रुक सकती थीं. शाम को साथ ही में चलते.”
चाय, फिर साथ में डिनर बनाना, बीच-बीच में नोक-झोंक और बातें…
फिर रात में गैलरी में चांद की रोशनी में बैठकर कॉफी. स्वाति का दिन अच्छा गुज़रा. आजकल ऋषि के साथ ज़िंदगी वैसी ही हल्की-फुल्की और ख़ुशनुमा हो गई है, जैसी शुरुआती दिनों में अमृत के साथ थी. हंसते-खेलते साथ में घर के काम करना, बातें करना… ठंडी-ठंडी छांव के बीच से झरती कच्ची-पक्की गुनगुनी धूप जैसे.
क्या करे स्वाति?
अमृत की ज़मीन पर उगे आर्या के पेड़ों को वह अपना नसीब मानकर बैठी रहे या ऋषि की ज़मीन पर अपना नया बगीचा बनाए.
क्या ऋषि उम्रभर ऋषि ही रहेगा? या कुछ समय बाद वह अमृत बन जाएगा.
अमृत भी पहले-पहले ऋषि जैसा ही था, पर धीरे-धीरे… क्या समय बीतने पर ऋषि भी अमृत बन जाएगा?…
“ये क्या है शैली? हर काम में ग़लती. तुम्हारा ध्यान कहां रहता है आजकल?” अमृत ने बिल शैली के सामने फेंकते हुए कहा, “जाओ, फिर से बनाकर लाओ.”
शैली ग़ुस्से से मुंह फुलाकर अमृत के केबिन से बाहर चली गई. अमृत भुनभुनाता हुआ वापस अपनी कुर्सी पर बैठ गया.
“जब देखो तब बस बैठे-बैठे शीशे के उस पार से यहीं देखती रहती है या फिर केबिन में बैठे रहने के बहाने ढूंढ़ती रहती है. काम में कौड़ी का ध्यान नहीं है. कल इसके आने के पहले इसका टेबल दरवाज़े के सामने से साइड में शिफ्ट करवाना पड़ेगा.”
अमृत के मोबाइल की रिंग बजी. आर्या का फोन था. झल्लाकर अमृत ने फोन काट दिया. दो मिनट बाद रिंग फिर बजी.
उसके दो मिनट बाद फिर, अमृत बुरी तरह से चिढ़ गया. फोन रिसीव करके बोला, “मीटिंग में हूं. घर पहुंचकर बात करूंगा.”…
अब तक अमृत अपने बीज पराई ज़मीनों पर उगाता आया था. इसी में उसे अपना पुरुषार्थ सार्थक होते दिखता था. आज तक कोई भी अमृत के उगाए पेड़ों को काटने का दुस्साहस नहीं कर पाया, लेकिन स्वाति ऐसा दुस्साहस कर सकती है. उसकी ज़मीन में अमृत के बीजों को भस्म करने का तेज है और अगर ऐसा हुआ, तो अमृत हार जाएगा और अपनी हार अमृत बर्दाश्त नहीं कर सकता.
पिछले कई महीनों से अमृत देख रहा था स्वाति का व्यवहार बदल रहा है. पहले स्वाति हर आठ-दस दिनों में घर आ जाती थी. दो दिन भी रहती तो अपने बच्चे की तरह घर को दुलारती, अमृत का बिखरा सामान सहेजती, घर आकर अमृत से मिलकर उसके चेहरे पर एक आंतरिक ख़ुशी छलकती रहती थी.
लेकिन अब उन कामों में उसका पहले-सा मन नहीं रहा. दो दिनों के लिए ही आती है और उसमें भी न जाने किससे बात करती रहती है फोन पर. अमृत के पूछने पर टाल जाती है. गैलरी या बरामदे में अमृत से दूर खड़ी होकर किसी से बात करते हुए स्वाति के चेहरे पर वही ख़ुशी छलकती है, वही भाव रहते हैं, जो आर्या से बात करते हुए अमृत के चेहरे पर रहते हैं. पिछले तीन महीनों से स्वाति घर नहीं आई. फोन भी हमेशा अमृत ही करता है और उसके कान महसूस करने लगे हैं, स्वाति के स्वर में धीरे-धीरे गहराती हुई तटस्थता को, उभरती हुई औपचारिकता को…
घर आकर अमृत सीधे गैलरी में जाकर बैठ गया. स्वाति को किसी भी तरह से घर वापस लाना होगा. अमृत जानता है, स्वाति अमृत नहीं है. उसकी ज़मीन पर एक साथ कई पेड़ नहीं उग सकते. अगर वह किसी और के बीजों को उगाने के लिए ज़मीन तैयार कर रही होगी, तो वह पहले अमृत के पेड़ों को जड़-मूल से साफ़ करके ही दूसरे के लिए ज़मीन तैयार करेगी. इसीलिए अमृत स्वाति से मन ही मन घबराता है, चाहे ऊपर से यह बात कभी भी उसने प्रकट नहीं की हो.
और आजकल अमृत साफ़-साफ़ समझ रहा है, देख रहा है- स्वाति के अंदर कुछ तो उग रहा है. शायद उन बीजों का स्रोत अमृत को पता है. एक-दो बार स्वाति के यहां देखा था. तब ज़्यादा देर तक सामना नहीं हुआ था, पर शायद वही होगा. अमृत उस रात बिना खाए ही सो गया, स्वाति की चादर ओढ़कर.
दूसरे दिन शैली ऑफिस पहुंची, तो देखा उसका टेबल अमृत के केबिन के सामने से शिफ्ट हो चुका है. शैली को समझ में नहीं आ रहा था कि उसने आख़िर ऐसा क्या गुनाह कर दिया है, जो अमृत अचानक ही उससे इतना नाराज़ रहने लग गया.
पहले भी शैली काम में ग़लतियां करती थी, लेकिन अमृत ख़ुद ही करेक्शन कर लेता था. शैली को कुछ नहीं कहता था. जब भी अमृत ऑफिस में होता, किसी न किसी बहाने से शैली को अपने केबिन में बुलवाता और घंटों बातें करता रहता. घंटों की इन्हीं बातचीत और अमृत के स्पेशल अटेंशन ने शैली के मन में उसके लिए भावनाएं जगा दीं, तो इसमें शैली का क्या दोष?
क्यों आज तक अमृत अपने व्यवहार से हर समय शैली के मन में यह एहसास जगाता आया है कि वह उसके लिए कुछ ख़ास जगह रखती है और अब जब शैली अमृत के इतने क़रीब आ गई है, तो अमृत क़दम-दर-क़दम उससे दूर चला जा रहा है. अमृत जब ऑफिस पहुंचा, तब शैली नीता के पास बैठकर अपना रोना रो रही थी.
अमृत भुनभुनाते हुए अपने केबिन में आकर बैठ गया. “ये लड़कियां भी अजीब होती हैं. ज़रा-सा हंस-बोल लो, तो मान बैठती हैं कि सामनेवाले को इनसे प्यार हो गया है. जैसे कि आदमियों को और कोई काम ही नहीं है. किसी से हंसना-बोलना भी गुनाह हो गया है. हंसने-बोलने का लोग ग़लत ही मतलब निकालकर बैठ जाते हैं. चाहे आर्या हो, शैली हो या स्नेहा…” आर्या को पक्का विश्‍वास है कि अमृत के जीवन में आर्या से अधिक कोई महत्व नहीं रखता, स्वाति भी नहीं. परिस्थितिवश आर्या की शादी पहले हो गई, नहीं तो अगर वह अमृत को पहले मिली होती तो अमृत उसी से शादी करता.
इस बात से अमृत भी इनकार नहीं कर सकता कि यदि वह श्रीकांत से पहले आर्या से मिला होता, तो वह उससे शादी कर लेता. यही वजह है कि वह कई बार बुरी तरह से चिढ़ जाने के बाद भी आर्या को छोड़ नहीं पा रहा. शायद कभी छोड़ भी नहीं पाएगा.

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आर्या अमृत की इस कमज़ोर नस को पहचान चुकी है. तभी वह अमृत द्वारा झिड़क दिए जाने के बाद भी उसका पीछा नहीं छोड़ती है. लेकिन इन सभी सच के ऊपर एक और सच है, जो अमृत बहुत अच्छे से जानता है और मानता है. आर्या से वह कभी भी शादी नहीं कर सकता और आर्या स्वाति नहीं है. आर्या ही क्या, कोई भी स्वाति की जगह नहीं ले सकता.
आर्या अमृत के साथ से ख़ुश है, क्योंकि पति के अलावा भी एक और पुरुष का उसे अटेंशन मिल रहा है. लेकिन आर्या अगर उसकी पत्नी होती, तो अमृत के ऐसे रिश्ते को वह कभी भी सहन नहीं करती. वह अपने अधिकार की ज़मीन पर किसी दूसरे के पेड़ों को उगते नहीं देख पाती. जैसे स्वाति की ज़मीन पर किसी और के पेड़ों के उगने की आशंका अमृत के जीवन में एक तिलमिलाहट पैदा करती जा रही है. आदमी की फ़ितरत भी अजीब होती है.
अब तक अमृत अपने बीज पराई ज़मीनों पर उगाता आया था. इसी में उसे अपना पुरुषार्थ सार्थक होते दिखता था. आज तक कोई भी अमृत के उगाए पेड़ों को काटने का दुस्साहस नहीं कर पाया, लेकिन स्वाति ऐसा दुस्साहस कर सकती है. उसकी ज़मीन में अमृत के बीजों को भस्म करने का तेज है और अगर ऐसा हुआ, तो अमृत हार जाएगा और अपनी हार अमृत बर्दाश्त नहीं कर सकता.
रात में अमृत गैलरी में बैठ गया. स्वाति से बहुत देर तक बातें करके अभी-अभी उसने फ़ोन रखा था. इन दिनों वह रोज़ ही रात में देर तक स्वाति से बातें करता है. उसे एहसास दिलाता रहता है कि वह उसे कितना चाहता है, उसे स्वाति की कितनी ज़रूरत है. आख़िरकार अमृत ने एक फैसला किया. वो ज़िम्मेदारी अपने सिर पर लेने का, जिससे वह आज तक बचता आया है. वो ज़िम्मेदारी, जिसके लिए स्वाति अब तक तरस रही थी और अमृत उसका बोझ नहीं चाहता था. अब स्वाति टाल रही है, पर अमृत के पास और कोई चारा नहीं है. वो ज़िम्मेदारी ही स्वाति को हमेशा के लिए, हर परिस्थिति में अमृत के साथ बांधकर रख सकती है.
शैली या आर्या तो बहुत आती-जाती रहेंगी, पर स्वाति उसे दोबारा नहीं मिलेगी. अमृत जानता था, इसलिए वह उसे खो नहीं सकता. एक नए बंधन में जकड़कर उसे दोबारा इस घर और अमृत के साथ उसकी ज़मीन पर लाकर बसाना ही होगा. अमृत कल सुबह-सुबह ही स्वाति के पास पहुंच जाएगा. अमृत अंदर जाकर स्वाति की चादर लपेटकर सो गया. अमृत के अंदर की ज़मीन पर स्वाति के पेड़ लहलहा रहे थे.

डॉ. विनीता राहुरीकर

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डॉ. विनीता राहुरीकर
Short Story- Parai Zamin Par Uge Ped

“अम्मा, आपको याद है… जब विहान छोटा था, तो मुझे चाय पीते देख गर्म कप को पकड़ने की ज़िद करता था. एक बार झुंझलाकर मैंने उसकी नरम हथेली पर चाय का गर्म कप छुआ दिया. उसके बाद वो चाय के कप से दूर ही रहता था. ज़िम्मेदारी के बोझ को समेटे शादी का लड्डू थामना इनके बस का नहीं था, ये मैं जानती थी…”

Kahaniya

”जलपा… ए जलपा कहां हो तुम…?” मायादेवी की आवाज़ सुनकर जलपा झटपट रसोई से बाहर आ गई. पांव छूने झुकी, तो जलपा को आशीर्वाद देने की जगह वह उस पर बरस पड़ी. “ऐसे तो तुम लोग बड़े मॉडर्न बने फिरते हो… अब क्या हो गया, सारी अक्ल ताक पर रखकर बित्ते भर के लड़के की शादी करने चले हो.”

“आप को शादीवाली बात किसने बताई? अभी तो मैंने किसी को बताया ही नहीं है. और मां, बित्ते भर का नहीं रह गया है आपका पोता, मुझसे दो हाथ लंबा हो गया है.” जलपा ने अपनी सास की बात का शांतिपूर्वक जवाब दिया, तो वे अपना सिर पकड़कर बैठ गईं.

“हे भगवान… विहान नहीं बताता, तो क्या तुम लोग शादीवाले दिन बताते कि घर में गुड्डे-गुड़ियों का खेल हो रहा है.”

“मां, आप धूप में चलकर आ रही हो, पहले एक ग्लास ठंडा पानी पी लो.”

“मेरा दिमाग़ इतना गर्म है कि ठंडा होनेवाला नहीं है. कहां है मेरा विहान?…”

“पढ़ रहा है, बाद में मिल लेना.”

“रहने दे, पढ़ाई की इतनी चिंता होती, तो शादी का लड्डू ना थमाती इस उम्र में. क्या हो गया रे जलपा तेरी बुद्धि को…? सत्रह साल के लड़के की शादी… क्यों गड्ढे में ढकेल रही है?”

“मां, तुम भी तो पंद्रह साल की उम्र में ब्याहकर आई थी और बाबूजी भी अट्ठारह के थे. अपना विहान भी अपनी शादी तक अट्ठारह का हो जाएगा.”

“अरे, कुछ अच्छी बातें लेता हमारी पीढ़ी से…

पंद्रह-अट्ठारह की उम्र में शादी करके क्या सुख देखा, क्या दुनिया… कभी सोचा है.”

मायादेवीजी की आवाज़ दर्द में डूब गई थी, मानो अतीत की ओढ़ी ज़िम्मेदारियों का बोझ सहसा कंधों पर महसूस किया हो. “हमारे मां-बाप तो पुराने ज़माने के थे, पर तू ऐसी ज़्यादती कैसे कर सकती है?”

“ज़्यादती कहां अम्मा… उसकी मर्ज़ी से कर रही हूं. अब इतनी भी पुराने विचारों की नहीं हूं. प्यार करता है अपना विहान तनीशा से… शादी हो जाएगी, तो खुलकर एक-दूसरे के साथ घूमेंगे-फिरेंगे और मौज-मस्ती करेंगे. अब ऐसे में थोड़ी ज़िम्मेदारियां बढ़ेंगी, तो उसे निभाना सीखेंगे. अच्छा है जल्दी गृहस्थी बसा लें.” “प्यार…!”

मायादेवी कुछ पल के लिए जड़ खड़ी रहीं, फिर सहसा बोलीं, “हे भगवान! तू कैसी मां है? उसकी कोई उम्र है गृहस्थी और प्यार समझने की. तेरी बुद्धि को क्या हो गया है. अरे, समझा देती उसे प्यार से.

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ऊंच-नीच के बारे में बताती. अब ये क्या… कि उसकी ग़लती पर तूने शादी का दहला मार दिया. अब तू मेरा दिमाग़ गरम मत कर… मैं पहले अपने विहान से मिलना चाहती हूं.” मायादेवी विहान के कमरे की ओर लपकीं, तो अबकी बार जलपा ने रास्ता नहीं रोका. भीतर गईं, तो विहान क़िताबों में मुंह गड़ाए बैठा था. चेहरा ऐसा पीला, मानो हल्दी मल दी गई हो. हाव-भाव बता रहे थे कि मां और दादी की बातें उसके कानों में पड़ चुकी थीं.

दादी ने स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा, तो वह फफक पड़ा. मायादेवी का कलेजा निचुड़-सा गया था. “हंसता-बोलता मस्त बच्चा ये शादी के पचड़े में कैसे फंस गया?” दादी की बात सुनकर विहान की सिसकियां और बढ़ गई थीं. उसकी हालत देखकर मायादेवी ने उसे गले से लगा लिया.

टूटते-फूटते शब्दों में उसके मुंह से निकला, “दादी, मैं ये शादी नहीं करना चाहता हूं. मैं अभी पढ़ना चाहता हूं… मम्मी मेरा फ्यूचर ख़राब कर देंगी.”

“ना… ना… विहान अब देख मैं तेरे साथ कैसे खड़ी होती हूं. तेरी मम्मी की ज़िद की ऐसी की तैसी…” दुलारती दादी सहसा ठिठकीं, “अच्छा, ये तो बता मम्मी की बेव़कूफ़ी में और कौन-कौन साथ दे रहा है?”

“अमिता आंटी. वो अपनी बेटी की शादी मुझसे कराना चाहती हैं.”

“तेरी अमिता आंटी की बेटी करती क्या है?” “वो पढ़ाई कर रही है, मेरी क्लास में ही है.” “पर वो बेव़कूफ़ कैसे तैयार हो गई?”

“दादी, अब तो वो भी तैयार नहीं है. सच तो ये है कि हम दोनों ही इस जंजाल में नहीं पड़ना चाहते हैं.”

“अब नहीं तैयार हैं का क्या मतलब…? क्या पहले तैयार थे. कहीं प्यारवाली बात…”

“अरे, वही तो एक ग़लती हुई है.” नज़रें चुराते विहान ने धीरे से कहा, तो दादी ने पूरी बात बताने को उकसाया… “दादी, तनीशा  मुझे अच्छी लगती थी. हम दोनों को एक-दूसरे का साथ पसंद था. इस बात को लेकर पहले मम्मी चिढ़ती भी थीं… लेकिन बाद में पता नहीं क्या हुआ, वो अचानक हमारी शादी करने को तैयार हो गईं. आप कुछ करो दादी, इस शादी से बचा लो. अभी तो मम्मी ने किसी को नहीं बताया है, पर कुछ दिनों में जब सबको पता चलेगा तो सोचो… मेरे दोस्त मुझे कितना चिढ़ाएंगे..!” विहान टकटकी लगाए अपनी दादी को देख रहा था, लेकिन मायादेवी तो किसी अंधेरे में छिपे पक्ष को देखने का प्रयास कर रही थीं.

“अरे, अम्मा बड़े मौ़के से आई हो, देखो तो  आपकी होनेवाली बहू आई है…” जलपा की तेज़ आवाज़ से मायादेवी चौंकीं, वहीं विहान का चेहरा और बुझ गया.

“विहान, ओ विहान… कहां हो बेटा, देख तेरे लिए क्या लाई हूं.” अमिता की आवाज़ सुनकर विहान ने अपने कानों में उंगली डाल ली थी. और इधर जलपा ‘मेरी बहू’ कहती हुई बैठक की ओर दौड़ी. अचानक तनीशा की तेज़ आवाज़ आई, “आंटी प्लीज़, अब ये बहू-बहू का नाटक बंद करिए.” अमिता ने तुरंत तनीशा को डांटा, “ये क्या तरीक़ा है अपनी होनेवाली सास से बात करने का…”

“ममा प्लीज़, अब आप लोग एक बात कान खोलकर सुन लीजिए, मैं कोई शादी-वादी नहीं करने जा रही हूं और यही बात बताने मैं आपके साथ आई हूं.”

“तो क्या आप लोगों ने सात जनम तक साथ निभाने की झूठी क़सम खाई थी?”

“भाड़ में गई क़सम… हम दोनों ग़लत थे, तो आप लोगों ने हमारी ग़लती सुधारने की बजाय एक नया हंगामा शुरू कर दिया.”

“बेटा, हम तो तुम्हारे सच्चे प्यार से द्रवित हो गए थे.” जलपा ने भीगे शब्दों में कहा, तो तनीशा और भड़क गई. “आंटी, आप ये फिल्मी डायलॉग मत बोलिए. अट्ठारह का विहान और लगभग उतने साल की मैं… इस उम्र में आप सच्चे प्यार की उम्मीद करती हैं. अरे, कुछ दिन हमने एक-दूसरे की कंपनी को एंजॉय किया था, बस… बच्चे ग़लत हो सकते हैं, ऐसे में आपका फ़र्ज़ था हमें सही-ग़लत समझाना, पर यहां तो आप लोग ख़ुद ही बचपना करने पर उतारू हैं. हमारी शादी… उ़फ्! सोचकर ही अजीब लग रहा है… हमारी पढ़ाई-लिखाई, सपने, करियर, पूरी ज़िंदगी इस प्यार के चक्कर में… मुझे तो प्यार शब्द सुनने से घुटन हो रही है. कोई प्यार-व्यार नहीं है हमें. अच्छी-ख़ासी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर शादी कर लूं मैं… वो भी विहान से?”

“ओ मैडम..! ग़लती आपसे नहीं मुझसे भी हुई है… जिस उम्र में करियर पर फोकस करना था, तुम्हारी वजह से कहीं और चला गया.” दोनों के झगड़े को जहां अमिता और जलपा मुंह बाए देख रही थीं, वहीं मायादेवी ने उन्हें रोका, “बस, चुप हो जाओ तुम लोग,

तुम्हारी इस हालत का ज़िम्मेदार और कोई नहीं तुम ख़ुद हो. फोकस ध्यान से, एकाग्रता, संयम और अनुशासन से आती है, जिसे तुम लोगों ने तोड़ा…” दादी की बात से छाई चुप्पी को विहान ने तोड़ा, “दादी, इससे पहले कि मम्मी और आंटी हमारी जगहंसाई कराएं, इस क़िस्से को यहीं ख़त्म कर दो.”

“इसका मतलब है तुम दोनों दुनियावालों की वजह से अलग होना चाहते हो.”

“नहीं दादी, हम अपने अच्छे फ्यूचर के लिए अलग होना चाहते हैं. अब तो बस आप लोग हमें एग्ज़ाम की तैयारी करने दीजिए. इस चक्कर में वैसे ही बहुत समय बर्बाद हो गया है.” विहान की बात से सहमत तनीशा तुरंत बोली, “अब दस साल तक मुझे मेरे करियर को शेप देने के लिए छोड़ दो. मुझे मेडिकल के लिए तैयारी करनी होगी. सच, बड़ा ख़राब चक्कर है ये प्यार-व्यार…” तनीशा चुप हुई, तो अमिता कुछ सोचते हुए बोली, “जलपा, अगर बच्चों की यही मर्ज़ी है, तो हम कुछ दिन और…” “ओह! नो…! अब आप लोग कोई दूसरा कमिटमेंट मत कर लेना. जीवन के ऐसे डिसीज़न यूं जल्दबाज़ी में नहीं लिए जाते. इनका भी अपना एक समय और समझ होती है, जो उम्र के साथ आती है.” कहती हुई तनीशा अमिता को लगभग खींचती हुई साथ ले गई.

वो घर से क्या गई, विहान के तो ख़ुशी के मारे पंख ही निकल आए. “मैं भगवान के सामने दीया लगाती हूं.” कहती हुई मायादेवी पूजा के कमरे में चली गईं. जलपा आंखें मूंदें सोफे पर धम्म से बैठ गई. सहसा उसके होंठों से एक रहस्यमई, पर स्मित हंसी झलकी… उसके जेहन में तनीशा की बात… ‘जीवन के ऐसे डिसीज़न यूं…’ गूंज रही थी. यही बात तो उसने भी कही थी, पर उस व़क्त तो लगा था जीवन का सार उनके कानों तक पहुंचा ही नहीं था. चार-पांच महीने पहले की ही तो बात है, जब उसने विहान और तनीशा को एक साथ मोटरसाइकिल पर बैठे देखा था. साथ बैठना अजीब नहीं था, अजीब था तनीशा का उससे हद तक चिपककर बैठना. जलपा का मन निचुड़-सा गया था, पर एक दिन बड़े संकोच से अमिता ने कहा कि विहान और तनीशा के बीच कुछ चल रहा है. तनीशा ने विहान को लेकर मुझसे झूठ भी बोलना शुरू कर दिया है. अमिता की बात सुनकर जलपा के पांव तले ज़मीन खिसक गई थी. दबे शब्दों में उसने विहान को समझाया, तो वह भड़क गया. इधर अमिता के प्रति तनीशा के बागी तेवर मुखर हो गए थे. जब दोनों ने मिलकर उनको समझाने की कोशिश की, तो दोनों ने मिलकर घरवालों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था. पढ़ाई-लिखाई ताक पर रखकर एक-दूसरे का साथ निभाने की घोषणा कर दी. उनका जोश दूध के उफान की तरह अपनी उठान पर था कि तभी जलपा ने अचानक दोनों की शादी की पेशकश की, जिसे अमिता ने मंज़ूरी दे दी. विहान और तनीशा के बागी तेवर सहसा मंद पड़ने लगे. यकायक उलझन में पड़े… कुम्हलाने लगे… अब ना तो फोन पर लंबी बातें होतीं, ना ही आपस में मैसेज का आदान-प्रदान होता.

मिलना-जुलना भी लगभग बंद था. दोनों अपने कमरों में क़िताबों में मुंह घुसाए नज़र आते. अब वे एक-दूसरे का नाम सुनकर चिढ़ने लगे थे. अमिता कहती भी थी कि विहान के साथ घूम आओ, तो तनीशा चिढ़ जाती. कमोबेश यही स्थिति विहान की भी थी और आज विस्फोट ही हो गया. एक-दूसरे से रिश्ता तोड़कर वो एक-दूसरे को देखना भी गंवारा नहीं कर रहे थे. विचारों में खोई जलपा की तंद्रा विहान ने भंग की, “मम्मी, मैं आर. के. सर के पास मैथ्स पढ़ने जा रहा हूं. आज से एक्स्ट्रा कोचिंग लूंगा.” कहता हुआ वह तेज़ी से बाहर चला गया. दरवाज़ा बंदकर वो पलटी ही थी कि मायादेवी चाय की ट्रे पकड़े खड़ी थीं. “अच्छा, अब चाय पी ले… इस दिन के लिए बड़ी मेहनत की है तुमने…” वे धीमे से मुस्काईं, तो जलपा ठठाकर हंस पड़ी, “अम्मा, आप ने जान लिया था कि हम…?”

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“अरे, ये बाल धूप की स़फेदी नहीं लिए हैं. सच बताऊं, जब विहान ने शादीवाली बात बताई, तो तू मुझे सिरफिरी लगी. सुशांत से बात की, तो वो भी तेरा समर्थन कर रहा था. तब तो मैंने अपना माथा ठोंक लिया. विहान के दादा एक हफ़्ते के लिए गांव गए थे. मुझसे तो उनके आने तक सब्र भी नहीं हुआ. सो अकेली ही चली आई. यहां जब शादी का कारण पता चला, तो माथा ठनका. विहान से बात करते ही तेरी योजना का अंदाज़ा हुआ. फिर सोचा जैसा चल रहा है, चलने देती हूं.”

“क्या करती अम्मा, विहान इस उम्र में प्यार के चक्कर में पड़ गया. हमारे समझाने, डराने-धमकाने का उलटा असर हुआ. दोनों असुरक्षित महसूस करते हुए एक-दूसरे के और क़रीब आ गए थे. ऐसे में योजना के तहत दोनों को एक-दूसरे के पास ढकेला, तो उनका सारा एडवेंचर धरा का धरा रह गया.”

“बड़ी बदमाश है रे जलपा.” अम्मा लाड़ से बोलीं. हंसते हुए जलपा बोल रही थी, “ये उम्र इंफेचुएशन को प्यार समझने की भूल करती ही है. पर विहान और तनीशा के मामले में प्यार की तीव्रता अधिक थी, सो डर गए.”

“मैं अक्सर सोचती थी कि आज की पीढ़ी क़िताबों पर ज़्यादा निर्भर है, पर मनोवैज्ञानिक तरी़के से हल हुआ मामला क़ाबिले-तारीफ़ है.” मायादेवी की बात सुन जलपा को मानो कुछ याद आया, “अम्मा, आपको याद है… जब विहान छोटा था, तो मुझे चाय पीते देख गर्म कप को पकड़ने की ज़िद करता था. एक बार झुंझलाकर मैंने उसकी नरम हथेली पर चाय का गर्म कप छुआ दिया. उसके बाद वो चाय के कप से दूर ही रहता था. ज़िम्मेदारी के बोझ को समेटे शादी का लड्डू थामना इनके बस का नहीं था ये मैं जानती थी, पर इस योजना में भी ख़तरा कम नहीं था. डर लगा रहता था कि दोनों विवाह के लिए राज़ी ना हो जाएं.”

“ऐसा मुमकिन नहीं. गर्लफ्रेंड को मोटरसाइकिल पर बैठाने से शान बढ़ती है, पर इस उम्र में बीवी को बैठाकर घुमाने की बात, ना… ना… आख़िर विहान को दोस्त-बिरादरी में मुंह दिखाना है या नहीं.”

मायादेवी के कहने के ढंग से जलपा हंस पड़ी थी. सुशांत घर आए, तो आज का सारा क़िस्सा पता चला. वे भी योजना के सफल अंत पर अपनी टिप्पणी दे रहे थे कि आग से खेलने की ज़िद करते बच्चों को आग के पास ले जाना ज़रूरी होता है, ताकि आंच का अंदाज़ा लगाकर आनेवाले ख़तरे को समझें. “जो हुआ सो हुआ… अब इस घर में विहान की पढ़ाई के अलावा और कोई बात नहीं होगी.”

मायादेवी एक हफ़्ता रुककर विहान के पढ़ाई के प्रति समर्पण और एकाग्रता को देख उसे ढेरों शुभकामनाएं देकर वापस चली गई थीं. इसी बीच अलका ने फोन पर बताया कि तनीशा ने विहान के नाम से तौबा कर ली है, वो पूरी तरह से अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित कर रही है. जो बच्चे कल तक अपने वर्तमान और भविष्य के साथ खेल रहे थे, वो अपने आज और उज्ज्वल कल के प्रति पूरी तरह समर्पित थे और उनका साथ देने के लिए हर पल प्रहरी की तरह खड़े उनके माता-पिता एक बार फिर उन्हें सधे क़दमों से चलते देख सुकून से भरे थे.

Meenu Tripathi

         मीनू त्रिपाठी

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उससे संपर्क करने के बाद ही मैंने जाना कि पुरुष का वासनापूर्ण रूप ही होता है, यह हमारी पूरी पुरुष जाति के लिए अवधारणा है, तो ग़लत है. वापस लौटते समय सुनील का शरीर मुझसे दूर हो गया, साथ आया तो स़िर्फ एक एहसास मानो उसका शरीर नश्‍वर है और एहसास रूपी आत्मा अमर है, जो हर समय मेरे साथ रहेगा. यह एहसास कि कोई मुझे शिद्दत से चाहता है और मुझे ख़ुश देखना चाहता है, काफ़ी है जीने के लिए.

Short Story

जादू-सा असर किया मोबाइल के स्क्रीन पर लिखे सुनील के गाने की एक लाइन ने. उसने बिना कुछ कहे ही सब कुछ कह दिया. वह कुछ भी तो भूला नहीं था. हमारी 15 दिनों की मुलाक़ात में वह गाना ही तो था, जो गुनगुनाते हुए वह अपने सारे ज़ज़्बात व्यक्त कर देता था और मैंने भी उस गाने के अर्थ में स्वयं को तलाशते हुए, शब्दहीन, अपने हाव-भाव से उसका मौन निमंत्रण स्वीकार कर लिया था.

तीस साल बाद अचानक सोशल मीडिया पर उसका नाम और औपचारिकतापूर्ण संदेश- ‘हैलो पूजा! कैसी हो?’ ने तो मेरे मन में पहले ही तूफ़ान पैदा कर दिया था. परिस्थितियों और समय की मोटी चादर के तले दबकर उसका अस्तित्व ही मेरे लिए समाप्त हो चुका था. कहते हैं न कि रख-रखाव न किया जाए, तो महल भी खंडहर बन जाता है, फिर वह अल्हड़ उम्र ही ऐसी थी, जिसमें न कोई भविष्य के सपने होते हैं, न कोई वादे होते हैं. बस, किसी की मूक प्रशंसाभरी आंखों से

साक्षात्कार होने मात्र से इतना ख़ूबसूरत एहसास होता है कि मन रंगीन सपने सजाने लगता है. समय बहुत बलवान है, जो अच्छी-बुरी सभी यादों को भुलाने के लिए मरहम का काम करता है. लेकिन इस नए टेक्नोलॉजी ने तो मेरे अतीत को साक्षात् सामने लाकर खड़ा कर दिया था. शांत समंदर में झंझावात पैदा कर दिया था.

यह मेरे लिए अभिशाप है या वरदान, सोच में पड़ गई थी. वर्तमान परिस्थितियों के कारण इसका अब कोई औचित्य ही दिखाई नहीं दे रहा था. यह मन को उद्वेलित करके बेचैन ही करेगा.

आरंभ में औपचारिकतापूर्ण बातचीत से पता चला कि वह भोपाल में और मैं मुंबई में अपने-अपने परिवार के साथ जीवन बिता रहे हैं. फिर अचानक एक दिन मोबाइल के स्क्रीन पर उस गाने की लाइन पढ़कर मेरे मन की स्थिति बिल्कुल वैसी ही हो गई थी. जैसी उसकी आंखों में पहली बार मूक प्रेम निवेदन देखकर हुई थी. तो क्या वह कुछ भी नहीं भूला अब तक? उसके गाने की लाइन के प्रतिक्रियास्वरूप मैं तीस साल पहले की अव्यक्त भावनाओं में अपने को बहने से रोक नहीं पाई और उनको व्यक्त करने के लिए जवाब देने के लिए मजबूर हो गई.

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मैंने लिखा- ‘तो क्या तुम्हें सब कुछ याद है… परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं, लेकिन हम दोस्त बनकर बातें तो कर सकते हैं. हम दोनों ही अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हैं, इसलिए हमारे रिश्ते के इस नए मोड़ से हमारे अपने परिवारों के प्रति हमारे कर्त्तव्यों का हनन तो होगा नहीं, बल्कि उम्र के इस पड़ाव में जो खालीपन आ गया है, वह भर जाएगा. वैसे भी तुम्हारी भरपाई कभी हो नहीं पाई, वह दिल का कोना सूना ही है…’ मैसेज भेजते ही मुझे अजीब-सी ग्लानि होने लगी. यह मैंने क्या कर डाला! उसने तो स़िर्फ एक गाने की लाइन लिखी थी. उसके पीछे उसका अभिप्राय क्या था, यह जाने बिना ही मैंने क्या कुछ लिख डाला…

इतने वर्षों में उसके व्यक्तित्व में क्या बदलाव आया होगा? कैसी उसकी सोच होगी? क्या सोचेगा वह पढ़कर? एक शादीशुदा महिला भी शादी के बाद परपुरुष से संबंध रखना चाहती है. हां, परपुरुष ही तो था, केवल 15 दिनों की औपचारिक मुलाक़ात और उसके बाद इतने वर्षों का अंतराल किसी आत्मीय रिश्ते की ओर तो इंगित करता नहीं है. वैसे भी पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं की इतनी बेबाक़ी को निर्लज्जता का दर्जा ही दिया जाता है, ख़ासकर उस ज़माने में, जब हम मिले थे. हमारे संस्कार तो यही कहते थे.

काश! कोई ऐसा बटन भी होता, जिसे प्रेस करने से भेजा हुआ संदेश भी डिलीट हो जाता. अपने स्क्रीन पर तो घबराकर तुरंत डिलीट कर ही दिया था. उसका जवाब आने के बाद मेरी आत्मग्लानि और बढ़ गई. उसका जवाब था- ‘मैं आपसे स़िर्फ दोस्ती चाहता हूं, इतना इमोशनल होना ठीक नहीं है…’ मैंने प्रत्युत्तर में लिखा- ‘मुझे थोड़ा समय चाहिए…’

मन बड़ा खिन्न हो गया था. मैं सब कुछ भूल चुकी थी. अपने नीरस वैवाहिक जीवन के साथ समझौता कर चुकी थी. फिर यह सब क्यों? और उम्र के उस पड़ाव पर थी, जब शारीरिक शक्ति क्षीण हो जाती है. बस, स्वस्थ रहने के लिए मानसिक ख़ुशी मिलने के लिए मनुष्य भटकता है और जहां कहीं थोड़ा प्यार मिलता है, वहीं जाना चाहता है अर्थात् अल्हड़ उम्र की और इस उम्र की ज़िम्मेदारी मुक्त मानसिक स्थिति और आवश्यकताओं में विशेष अंतर नहीं होता.

मेरा मानना था कि प्यार कभी दोस्ती में परिवर्तित नहीं हो सकता. दोस्ती और प्यार के बीच सीमा रेखा खींचना असंभव है. मैंने मन ही मन तय कर लिया कि अपनी भावनाओं पर पूरी तरह कंट्रोल रखूंगी और उसके सामने उजागर नहीं होने दूंगी, लेकिन औपचारिक चैटिंग करते हुए मन होता कि थोड़ा तो वह रोमांटिक बात लिखे. उसके हर वाक्य में अपने मनोकूल अर्थ ढूंढ़ती रहती. और कभी-कभी असफल होने पर अतृप्त मन उदास हो जाता और असुरक्षा की भावना से घिर जाती कि पहले की तरह यह रिश्ता अस्थाई तो नहीं है. और यदि निभेगा भी, तो प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण कैसे निभेगा?

मैं चैटिंग से ही संतुष्ट रहना चाहती थी, लेकिन मेरी आवाज़ सुनने के उसके प्रस्ताव के सम्मोहन से ख़ुद को वंचित नहीं रख सकी. फोन करते ही मेरा पहला वाक्य था, “क्या अब तक याद हू मैं तुम्हें?”

“याद उसे किया जाता है, जिसे भुला दिया गया हो. मैं तो तुम्हें कभी भूला ही नहीं. तुम्हारी यादों के साथ जीना सीख लिया था. लगा ही नहीं तुम कभी मुझसे दूर हो…” इस तरह हमारी मूक यादों को उसने और मैंने शब्दों का जामा पहनाया.

समय ने हमारी भावनाओं को रत्तीभर भी नहीं बदला था, लेकिन परिस्थितियों ने हमारी ज़ुबान को संयमित शब्दों का चयन करने की ही अनुमति दी थी, इसलिए शब्दों को संभालकर बोल रही थी, जिससे दोस्ती की परिधि में ही रहूं. कितना मुश्किल था तब, जब उम्र ही ऐसी थी कि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए शब्दों का ज्ञान अधूरा था और अब अपार ज्ञान होते हुए भी अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है.

बात समाप्त करने के बाद भी एक अधूरी प्यास से मन व्याकुल रहता था. लेकिन मैं उसे खोना नहीं चाहती थी और मन ही मन भगवान पर निर्णय की ज़िम्मेदारी छोड़ दी थी. उससे मिलने में मेरा तो कोई प्रयास था नहीं, यह सब तो ईश्‍वर की ही योजना थी. कहते हैं, जीवन में किसी के मिलने के पीछे भी कोई उद्देश्य होता है, शायद मेरे प्यार के लिए भटकते, वैरागी, निश्छल मन को सहारा देने के लिए ही भगवान ने उसे मुझसे मिलवाया था.

इतना तो मैं विगत 15 दिनों की मुलाक़ात में जान गई थी कि वह हमारे मूक प्रेम के लिए बहुत गंभीर है. लेकिन हमारा सामाजिक रिश्ता ऐसा है, जिसके कारण इसका कोई भविष्य नहीं था. उससे बात करके यह भी पता चल गया कि मेरे लिखे एक पत्र के उनके बड़े भाई के हस्तगत होते ही हमारे पत्र-व्यवहार पर पूर्ण विराम लगा दिया गया था और मैं भी उसके पत्र के न आने के कारण को जाने बिना ही अपनी शादी के पहले उन पत्रों को भूमिगत कर आई और हमेशा के लिए इस रिश्ते को धराशाई कर दिया था. लेकिन बादलों में जिस प्रकार बिजली चमककर अपने अस्तित्व की याद दिलाती है, उसी प्रकार वह भी अपनी धूमिल-सी उपस्थिति मेरे मानस पटल पर कभी-कभी दिखा देता था, फिर बादल छंटने के साथ सब एकसार हो जाता था.

हर दूसरे दिन बातें होने लगीं. उसके लिए समय निश्‍चित किया गया. फोन आने के पहले तो अजीब-सी बेचैनी रहती ही थी, फोन करते समय अजब-सा रोमांच का अनुभव होता था. ऐसी जगह जाकर बात करती थी, जहां कोई नहीं देखे. एक अपराध भावना घेरे रहती. सोचती ऐसा कौन-सा पाप कर रही हूं, जो पति से छिपाकर करना पड़ रहा है. बात ही तो कर रही हूं… यह कैसा रिश्ता है, जो इतना पवित्र होते हुए भी, विवाह के बाद अनैतिक माना जाता है.

हम कृष्ण के राधा के साथ अलौकिक प्रेम की गाथा गाते-गाते नहीं थकते. सारा वृंदावन नगरी राधा के नाम से गूंजता रहता है और लौकिक प्रेम को व्यभिचार मानते हैं. यह कैसी दोहरी मानसिकता है? क्या विवाह के समय लिए गए सात वचन मनुष्य को सब ख़ुशी दे देते हैं, जो इस अनाम रिश्ते से मिलती है? क्या विवाह एक बेड़ी नहीं है? क्या जीने के लिए आर्थिक और शारीरिक सुरक्षा के

साथ-साथ भावनात्मक सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है? जो अधिकतर वैवाहिक जीवन में अस्तित्वहीन है.

पति हमारी भावना न समझे, बावजूद उसके साथ हम घुट-घुटकर जीने पर मजबूर हो जाते हैं. क्या जीवन सांसें पूरी करने का नाम है? यह समाज द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा मानसिक शोषण ही तो है. यह आक्रोश ‘सिलसिला’ मूवी में अमिताभ बच्चन द्वारा बोले गए शब्दों में साफ़ उजागर होता है- ‘दिल कहता है, दुनिया की हर एक रस्म उठा दें, दीवार जो हम दोनों में  है, आज गिरा  दें… क्यों दिल में सुलगते रहें, दुनिया को बता दें… हां, हमको मुहब्बत है…’ यह कैसा रिश्ता है, जो जीवनदायिनी होकर भी असामाजिक कहलाता है.

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जब भी फोन से उससे बात होती थी, मैं तो उसकी बातों के बयार में बहती रहती थी. वही याद दिलाता था कि आज की मुलाक़ात, बस इतनी ही. एक बार उसका फोन निश्‍चित समय पर नहीं आया. मन अजीब आशंकाओं से भर गया कि कहीं उसकी पत्नी ने हमारी बात सुनकर हमारी बातचीत पर पूर्ण विराम तो नहीं लगा दिया? बाद में बात करने से पता लगा कि वह व्यस्त था. इसकी कई बार पुनरावृत्ति होने लगी. मन असुरक्षित रिश्ते के संदेह से घिरने लगा.

फिर धीरे-धीरे बात करने का अंतराल बढ़ने लगा, तो इसका कारण पूछने पर उसने मुझे समझाया. “हमारे रिश्ते में यही ठीक है. बातें तो अंतहीन हैं. मैं चाहता हूं कि हमारी भावनाएं इतनी नॉर्मल हो जाएं कि रिश्ते में बेचैनी ही न रहे.” पहले तो मुझे उसकी बात अटपटी लगी, लेकिन धीरे-धीरे उसके फोन आने का इंतज़ार ही कम होने लगा और जीवन व्यवस्थित-सा हो गया. यह स्थिति ठीक वैसी ही थी, जब प्यार या शादी के आरंभिक दिनों की रूमानियत धीरे-धीरे समाप्त होकर जीवन सामान्य हो जाता है. रिश्ते की तपिश धीरे-धीरे भीषण ग्रीष्म ऋतु में पहली बरसात की सोंधी ख़ुशबू के साथ ठंडक प्रदान करती है. ये बहुत ही सुखद एहसास था, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.

हम दोनों ही जीवन के इस पड़ाव में एक-दूसरे में आए बदलाव को एक बार मिलकर देखना चाहते थे. ‘जहां चाह वहां राह’ वाली कहावत चरितार्थ हुई और एक पारिवारिक समारोह में उसके शहर में अपने पति के साथ जाकर उससे मिलने का मौक़ा मिला. उसके परिवारवाले हमारे इस रिश्ते के बारे में जानते थे, फिर भी उसने मुझे अपने घर आने का निमंत्रण देकर हमारे इस बेनाम रिश्ते पर मुहर लगा दी, तो मुझे सुखद आश्‍चर्य हुआ और यह सोचकर गर्व हुआ कि मैं उसके लिए आज भी विशेष स्थान रखती हूं.

उसने रास्ते में रखे दीये को मंदिर में रखे दीये का स्थान दे दिया था. उसके घर में मुश्किल से एक घंटे की सामूहिक मुलाक़ात में हम तटस्थ रहने का नाटक तो कर रहे थे, लेकिन मूक भाषा का दिल ही दिल में आदान-प्रदान भी चल रहा था. उसकी सुखी गृहस्थी को देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई. इस रिश्ते के इतना सुंदर और सुलझे हुए स्वरूप का पूरा श्रेय उसे जाता है. मैं तो एक समंदर के समान थी, जिसका बांध अचानक खोल देने पर वह निर्बाध गति से बहने के लिए व्याकुल हो गया था. उसके बहाव को कंट्रोल उसी ने किया, क्योंकि अति का परिणाम तबाही ही होता है. उससे संपर्क करने के बाद ही मैंने जाना कि पुरुष का वासनापूर्ण रूप ही होता है, यह हमारी पूरी पुरुष जाति के लिए अवधारणा है, तो ग़लत है.

वापस लौटते समय सुनील का शरीर मुझसे दूर हो गया, साथ आया तो स़िर्फ एक एहसास मानो उसका शरीर नश्‍वर है और एहसास रूपी आत्मा अमर है, जो हर समय मेरे साथ रहेगा. यह एहसास कि कोई मुझे शिद्दत से चाहता है और मुझे ख़ुश देखना चाहता है, काफ़ी है जीने के लिए. शायर साहिर लुधियानवी ने ऐसे रिश्ते को बेहद ख़ूबसूरती से परिभाषित किया है- ‘वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा…’ आज के विकसित टेक्नोलॉजी के संदर्भ में जब संपर्क के इतने साधन हैं, तो स्त्री-पुरुष के रिश्ते में ज़माने की सोच में आए बदलाव के कारण इसकी परिभाषा को परिवर्तित किया जा सकता है. छोड़ना के स्थान पर यदि हम जोड़ना लिखें तो यह रिश्ता सार्थक होगा.

Sudha Kasera

       सुधा कसेरा

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“ओ मां! अपने घर के कामों को, ज़िम्मेदारियों को खटना नहीं कहते और अगर तुम अपनी बेटी के लिए ऐसी सोच रखती हो, तो फिर एक बार ये भी सोचो कि भाभी भी इस घर के लिए तुम्हारे हिसाब से ‘खट’ ही रही हैं. तुम्हारे मन में भाभी के लिए कभी हमदर्दी क्यों नहीं जागती?”

Kahaniya

 

इस बार मायके आई हुई ईरा बहुत ख़ुश और उत्साह से भरी हुई थी. राखी पर तो वह लगभग हर साल मायके आती है और भाई दूज पर अपनी ननदों को अपने घर बुलाती है. इस तरह वो भी ख़ुश, उसके पति और ननदें भी ख़ुश.

राखी का त्योहार उसे बचपन से ही विशेष प्रिय रहा है. छोटी-सी थी जब पिताजी की गोद में चढ़कर राखी ख़रीदने बाज़ार जाती थी और ढेर सारी दुकानें ढूंढ़कर एक बहुत बड़ी-सी रंग-बिरंगी फूल-पत्तियोंवाली राखी ख़रीदती थी. अपना सारा प्यार वह राखी के आकार के साथ भइया की कलाई पर बांध देना चाहती थी. तब यही लगता था कि जितनी बड़ी राखी होगी, भइया को लगेगा कि ईरा उनसे उतना ही अधिक प्यार करती है. गोया राखी न हो, बहन के प्यार का नाप हो. तभी ईरा बाज़ार से सबसे बड़ी राखी छांटकर लाती थी और भइया था कि ‘इत्ती बड़ी राखी’ को देखकर मुंह बिचकाता, “ये क्या उठा लाई है? मेरे सारे दोस्त फिर शाम को मुझ पर हंसते हैं. कोई छोटी राखी नहीं मिली इसे?”

तब मां बहुत समझा-बुझाकर उसे शांत करतीं, “अरे, अभी छोटी है इसलिए. थोड़ी समझदार हो जाएगी, तब थोड़े ही इतनी बड़ी राखी बांधेगी.”

ईरा को अब भी याद है स्पंज के फूलों की परतों पर रंग-बिरंगी पन्नियों और चमकीले सितारे लगे वो पांच रुपयेवाली राखियां. कितना नेह भरा होता था उनमें. दूसरे दिन ईरा भइया के नहाने से पहले वो राखी उनकी कलाई से उतरवा लेती थी और फिर वह राखी उसके निजी ख़ज़ाने में जमा हो जाती थी. सालभर तक वह उसे संभालकर रखती. कभी अपनी कलाई पर बांधकर ख़ुश होती, तो कभी माथे पर रखकर अपने रूप पर ख़ुद ही रीझ जाती, मानो कहीं की महारानी हो.

प्यार के रेशमी धागों में बंधता-लिपटता बचपन फिर सयानेपन की ओर बढ़ चला. भइया उसकी राखी पूरे साल अपने हाथ पर बांधे रखता, तो अब राखी की सुंदरता की जगह उसकी मज़बूती प्रमुख हो गई. लेकिन रिश्ते वैसे ही सुंदर बने रहे, जैसे वो बचपन की राखी सुंदर हुआ करती थी. भाभी के आने के बाद उस राखी में मज़बूती का एक धागा और सुंदरता का एक नग और जुड़ गया.

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और इस बार तो लता बुआ भी आ रही हैं राखी पर, तो सोने पे सुहागा. कितने बरस हो गए बुआ से मिले. बचपन में कितना खेली है वो बुआ की गोद में. मां की तरह ही बुआ ने उसे संभाला था. वो 10 बरस की थी जब बुआ की शादी हो गई थी. कितना रोई थी तब ईरा, तबीयत ख़राब कर ली थी उसने अपनी. बुआ मायके कम ही आती थीं. एक तो वैसे भी मायका मां से होता है और दादी तो ईरा के जन्म के कुछ वर्ष बाद चल बसी थीं.

दादाजी तो और भी पहले चले गए थे. विवाह होते ही मां पर एक मानसिक दबाव हमेशा ही बना रहा था कि बुआ के विवाह की ज़िम्मेदारी एक अनचाहे बोझ की तरह उन्हें ही उठानी है. जैसे-तैसे उन्हें पढ़ा-लिखाकर उनका विवाह करके मानो मां ने चैन की सांस ली और पल्ला झटक लिया. कभी राखी, भाई दूज पर उन्हें बुलाने की बात भी नहीं उठाने देतीं घर में. भइया के विवाह पर बुआ आई थीं कुछ दिनों के लिए बस. लेकिन ईरा को हर छुट्टियों में बुआ बहुत आग्रह से अपने घर

बुलवातीं और उतने ही प्यार से रखतीं. उनके स्वयं के बच्चे हो जाने के बाद भी ईरा के प्रति उनके प्यार में किंचित मात्र फ़र्क़ नहीं आया था.

ईरा जब समझदार हुई, तब से उसे मां का व्यवहार कचोटने लगा. बुआ का क्या कभी मन नहीं करता होगा मायके, अपने जन्म स्थान आने का? अपने बच्चों को मामा के घर भेजने का? ससुराल में जब सब उनसे मायके जाने के बारे में पूछते होंगे, तब कैसा लगता होगा बुआ को. इसलिए उसने इस बार पिताजी पर बहुत दबाव बनाया और ख़ुद भी मां से बहुत आग्रहपूर्वक बुआ को राखी पर बुलाने को राज़ी किया. मां को पता नहीं क्यों हर बार इस बात का डर लगा रहता कि बुआ को बुलाया, तो उन्हें लेना-देना पड़ेगा. पहले ही उनके ब्याह का ख़र्च मां को ही करना पड़ा है और अब तीज-त्योहार पर फिर ख़र्चा. ईरा को मां की छोटी सोच और मानसिकता पर दुख होता, लेकिन कुछ बोल नहीं पाती. मां कैसे रिश्तों को पैसों में तोल पाती हैं, वो भी एक बेटी के उसके मायके के साथ रिश्ते को…

बुआ के आने में अभी एक दिन बाकी था. ईरा ने भाभी को रसोईघर में खाना और मिठाइयां बनवाने में पूरी मदद की, ताकि भाभी पर काम का अतिरिक्त बोझ न पड़े और उनके साथ ईरा समय भी व्यतीत कर ले. दोनों हंसी-मज़ाक और बातें कर रही थीं. मां हर थोड़ी देर बाद किसी-न-किसी बहाने से उसे आवाज़ देकर बुला रही थीं. ईरा समझ गई कि मां नहीं चाहती हैं कि वह रसोई में भाभी की मदद करे. ईरा को कोफ़्त हो आई मां की सोच पर. मां की मंशा समझकर भाभी का भी मुंह उतर गया. पर ईरा ने मां की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और वो भाभी के साथ काम करवाती रही.

दोपहर में खाने वगैरह से फुर्सत पाकर ईरा फिर आराम से मां के पास बैठी.

“तुझे क्या ज़रूरत है खटने की. दो दिन के लिए ही तो आई है. ईशिता कर लेती काम.” मां ने छूटते ही डांट लगाई.

“तो क्या हुआ मां दोनों ने मिलकर किया, तो काम भी जल्दी निबट गया. थोड़ा आराम भाभी भी कर लेंगी. इसी बहाने ननद-भाभी थोड़ी गपशप भी कर लेती हैं.” ईरा बोली.

“अरे, तुझे घर में तो खटना ही पड़ता है और यहां भी…” मां आगे कुछ बोलतीं, इससे पहले ही ईरा बोल पड़ी-

“ओ मां! अपने घर के कामों को, ज़िम्मेदारियों को खटना नहीं कहते और अगर तुम अपनी बेटी के लिए ऐसी सोच रखती हो, तो फिर एक बार ये भी सोचो कि भाभी भी इस घर के लिए तुम्हारे हिसाब से ‘खट’ ही रही हैं. तुम्हारे मन में भाभी के लिए कभी हमदर्दी क्यों नहीं जागती? तुम्हें कभी उनके लिए यह क्यों नहीं लगता कि वह बेचारी भी ‘खट’ रही है इस घर में. बेटियां काम करें, तो मांओं को लगता है कि बेचारी खट रही है, लेकिन बहू कितना भी काम करे, तो सास को वह हमेशा ़फुर्सत में ही बैठी लगती है. कहेंगी- यह तो उसका काम ही है. औरतों में बैठी इस सास और मां के अलग-अलग होने के कारण ही रिश्ते तनावपूर्ण हो जाते हैं. जिस दिन औरत निष्पक्ष रूप से स़िर्फ ‘स्त्री’ होकर ‘स्त्री’ को देखेगी, उस दिन दुनिया की सारी बहुएं, बेटियां, भाभियां और ननदें सुखी हो जाएंगी.”

मां अवाक् होकर सुनती रह गईं. उन्हें ईरा से ऐेसे प्रत्युत्तर की कतई आशा नहीं थी. उस समय उन्होंने चुप रहना ही उचित समझा.

शाम को भी घर के काम निबटाने में ईरा ने भाभी की मदद की और फिर उन्हें साथ लेकर बाज़ार चली गई और सबके लिए ढेर सारे उपहार ख़रीद लाई. मां, बुआ, भाभी के लिए साड़ियां, पापा और भइया के लिए कुर्ता-पायजामा,

रिंकी-ऋषि के लिए कपड़े, खिलौने, मिठाइयां. पिताजी और भाई-भाभी पास ही थे, इसलिए मां उस समय तो कुछ नहीं बोलीं, लेकिन ईरा मां के चेहरे के भाव देखकर समझ गई कि उनको बुआ के लिए भी समान क़ीमत की साड़ी लाना अच्छा नहीं लगा है. लेकिन ईरा इस बार कुछ ठानकर ही मायके आई थी. तीन साल हो गए उसकी शादी को, वह हक़ से अपने मायके आती है, तो बुआ क्यों नहीं?

ईरा आई थी, तो पिताजी बाहर तख़्त पर सो जाते थे और ईरा कमरे में मां के साथ. रात के खाने-पीने से निबटकर थोड़ी देर सबने बैठकर बातें की, फिर सब सोने चले गए. मां और ईरा भी अपने कमरे में आ गईं. आते ही मां ने अंदर से कुंडी लगा दी. फिर उन्होंने अपना लॉकर खोला और एक बड़ी-सी थैली निकालकर पलंग पर बैठ गईं. थैली खोलकर मां ने उसमें से कई छोटे-बड़े डिब्बे-डिब्बियां निकालीं. ईरा को पता था कि इसमें मां का सारा सोने-चांदी का सामान रखा था. मां ने दो जड़ाऊ कंगन बाहर निकाले. ईरा पहचान गई, यह उसकी दादी के कंगन थे. दोनों कंगन मिलाकर कम-से-कम 15 तोले के होंगे.

“मैं चाहती हूं कि अब ये कंगन तू रख ले.” मां ने ईरा के हाथों में कंगन थमाते हुए कहा, “इससे पहले की कोई और इन्हें झपट ले…”

“मगर क्यों मां? ये कंगन तो दादी के हैं न?” ईरा चौंककर बोली.

मगर तब तक मां थैली में दूसरी चीज़ें ढूंढ़ने लगीं और साथ ही मां का बड़बड़ाना भी शुरू हो गया.

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“ब्याह करने के बाद भी चैन नहीं है. उम्रभर इनके तीज-त्योहारों पर भी घर भरते रहो. ब्याह कर दिया भाई ने तब भी पिंड नहीं छूटा. अब भी मुक्ति नहीं है हमें. मां-बाबूजी ख़ुद तो चले गए, लेकिन हमें बांध दिया इस जंजाल में. घर पर बुलाकर इनकी ख़ातिरदारी भी करो और विदा करते समय इनकी ख़ातिर लुट भी जाओ. ये बहनें भी भाई के गले टंगी रहती हैं उम्रभर.”

ईरा को याद आया जब बुआ के यहां जाती थी, तो कितने प्यार से, चाव से कितना कुछ ख़रीदकर देती थीं वो उसे- कपड़े, खिलौने,  लेकिन उनके बेटों के लिए मां ने कभी कुछ नहीं भेजा. न कभी घर बुलाया छुट्टियों में. उन्हें पता ही नहीं कि मामा का घर कैसा होता है? चांदी की मामूली चीज़ देने का भी मां का मन नहीं हुआ, तो आलमारी में उपहार में आई हुईं साड़ियां छांटने लगीं मां बुआ को देने के लिए, लेकिन ईरा का चेहरा अचानक ही मुरझा-सा गया. वह अनायास ही बुआ के साथ अपनी तुलना करने लगी. दोनों ही तो इस घर की बेटियां हैं. आज मां बुआ को लेने-देने पर इतना मन ख़राब कर रही हैं, कल को भाभी भी ईरा के लिए… साड़ियां छांटती मां की नज़र अचानक ईरा पर पड़ी, “अरे, तुझे क्या हुआ? ऐसा मुंह क्यों उतर आया अचानक?”

मां तुम मेरे ही सामने बुआ के प्रति कैसी सोच और कैसी बातें कर रही हो? एक बार भी नहीं सोचा कि जैसे मैं इस घर की बेटी हूं, वो भी इस घर की बेटी हैं. अगर बुआ के प्रति तुम्हारी सोच ऐसी है, तो कल को भइया-भाभी भी मेरे साथ ऐसा ही करेंगे, तो उनकी कोई ग़लती नहीं होगी न? क्योंकि यदि तुम बुआ को कोसती हो, तो भाभी को भी तो पूरा हक़ है मेरे आने को कोसने का, मायके नहीं बुलाने का.” ईरा का गला भर आया, आंखें डबडबा आईं.

“अब तो मुझे भी यहां आने के लिए सोचना पड़ेगा.”

मां हाथ में साड़ी थामे सन्न-सी बैठी रह गईं. ये तो उन्होंने सोचा ही नहीं कि उनकी अपनी बेटी यह बात ख़ुद पर लेकर दुखी हो जाएगी.

“तुम शुरू से ही बुआ के प्रति जैसा व्यवहार कर रही हो, भविष्य में भाभी के मन में भी मेरे प्रति वैसा ही व्यवहार करने का बीज बो रही हो. क्योंकि वो देख रही हैं कि इस घर में ननद का सम्मान और प्रेम कितना और कैसा होता है.” ईरा हाथ के कंगनों की तरफ़ देखते हुए बोली, “ये दादी के पुश्तैनी कंगन हैं, वो चाहतीं तो तुम्हारी तरह ही चुपचाप बुआ को दे सकती थीं, लेकिन उन्होंने घर की बहू पर भरोसा किया और तुम्हारा मान रखा.”

“भाई-बहन का रिश्ता तो वैसे भी रेशम की तरह नाज़ुक होता है और मां बांधने के लिए उसमें पहले ही गांठ लगानी पड़ती है, तो जिस रिश्ते में पहले ही गांठ लगी हो, तो उसमें और खिंचाव क्यों पैदा करना. ये कंगन भाभी ने तुम्हारे पास देखे हुए हैं. कल को उन्होंने इसके बारे में पूछा, तो क्या जवाब दोगी. मायका मां से होता है और उसके बाद भाई-भाभी से. अपने व्यवहार की वजह से मेरा मायका मत छुड़ाओ मां. मैं इस घर का इतिहास दोहराना नहीं चाहती. बुआ को सम्मान दो, तभी तुम्हारी बहू मुझे सम्मान देना सीखेगी. जब बुआ के बच्चों को प्रेम से अपने घर रहने के लिए बुलाओगी, तभी भविष्य में इस घर में मेरे बच्चे भी अधिकार से आकर रह पाएंगे. भगवान के लिए एक ही घर की दो बेटियों के लिए अलग-अलग व्यवहार मत करो.” ईरा ने कंगन वापस मां के हाथों में थमा दिए.

दूसरे दिन सुबह-सवेरे ही बुआ आ गईं. सालों बाद अपना घर देखने की ख़ुशी उनके चेहरे पर सहज दिख रही थी. कितना कुछ लेकर आई थीं सबके लिए. एक-से-एक महंगी वस्तुएं और उन सबसे ऊपर सबके लिए अनमोल व अपार स्नेह. पिताजी भी कितने ख़ुश लग रहे थे.

नहा-धोकर पिताजी और भइया राखी बंधवाने बैठे. राखी बंधवाने के बाद भइया ने ईरा के सर पर स्नेह से हाथ फेरकर उपहार दिया. पिताजी सकुचाए से खड़े रहे. तभी मां ने एक क़ीमती साड़ी पिताजी को दी बुआ को देने के लिए. फिर मां ने दादी के जड़ाऊ कंगन में से एक-एक कंगन बुआ और भाभी को दिए.

“ये मांजी के कंगन हैं. इन पर अब तुम दोनों का हक़ है. ये मांजी के आशीर्वाद स्वरूप उनके बेटे और बेटी दोनों के वंश में रहेंगे.” बुआ की आंखें इस स्नेह से भीग गईं. मां ने उन्हें गले लगा लिया.

ईरा ने ईश्‍वर को प्रणाम किया. ये रेशमी रिश्ते अब प्यार की गांठ में बंधकर हमेशा मज़बूत रहेंगे.

Dr. Vinita Rahurikar

डॉ. विनीता राहुरीकर

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मैं स्तब्ध खड़ी रह गई थी. मेरा बुद्धिजीवी तार्किक मस्तिष्क संज्ञाशून्य हो गया था. तकनीक और विज्ञान हमें चांद-सूरज पर पहुंचा सकता है, पर किसी के दिल तक पहुंचने के लिए तो एक संवेदनशील दिल ही चाहिए.

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बेटे पिंटू को फिज़ियोथेरेपी के लिए ले जाते हुए यह मेरा छठा दिन था. खेलते व़क्त गिर जाने के कारण उसके घुटने की सर्जरी हुई थी और अब फिर से अपने पैरों पर खड़े होने के लिए उसे लगभग दो महीने की फिज़ियोथेरेपी की आवश्यकता थी. फिज़ियोथेरेपी सेंटर लगभग पूरे दिन ही खुला रहता था, इसलिए मैं अपनी सुविधानुसार सुबह, दोपहर, शाम- कभी भी उसे लेकर वहां पहुंच जाती थी. कभी नए चेहरे नज़र आते, तो कभी रोज़वाले ही परिचित चेहरे. कुछ स्वयं चलकर आने वाले होते, कुछ को छोड़ने और लेने आनेवाले होते थे, तो कुछ मेरे जैसे भी थे, जो आरंभ से अंत तक पेशेंट के साथ ही बने रहते थे. मैं और पिंटू जल्द ही वहां के माहौल में अभ्यस्त होने लगे थे.

लगभग हर उम्र, धर्म और आर्थिक स्तर के स्त्री-पुरुष वहां आते थे. मैंने गौर किया अधिकांश पुरुष और कुछ महिलाएं तो आते ही अपने-अपने मोबाइल पर व्यस्त हो जाते. वाट्सऐप, फेसबुक, वीडियो गेम या फिर गाने सुनने में थेरेपी के उनके डेढ़-दो घंटे ऐसे ही निकल जाते. मैंने सोच लिया, अब से मैं भी सारे मैसेजेस वहीं देखा और भेजा करूंगी.

उस दिन यही सोचकर मैंने पर्स से मोबाइल निकालने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि पास के बेड पर लेटे एक बुज़ुर्ग सज्जन के सवाल ने मुझे चौंका दिया.

“एक्सीडेंट हुआ था क्या?”

“ज…जी. खेलते व़क्त घुटने का लिगामेंट रप्चर हो गया था. सर्जरी हुई है.” न चाहते हुए भी मेरे चेहरे पर 9 वर्षीय पिंटू के लिए चिंता की लकीरें उभर आई थीं.

“अरे, चिंता मत करो. जिस तरह अच्छा व़क्त जल्दी गुज़र जाता है, उसी तरह बुरा व़क्त भी ज़्यादा दिन नहीं ठहरता. जल्दी ठीक हो जाएगा. इस उम्र में रिकवरी जल्दी होती है. समस्या तो हम जैसों के साथ है.”

“आपको क्या प्रॉब्लम है?”

“फ्रोज़न शोल्डर्स! वैसे तो बुढ़ापा अपने आप में ही एक बीमारी है और उसमें भी कुछ समस्या हो जाए, तो लंबा खिंच जाता है. यहां आ जाता हूं, फिज़ियोथेरेपिस्ट की निगरानी में कुछ व्यायाम कर लेता हूं, मशीन से थोड़ी सिंकाई करवा लेता हूं, तो आराम मिल जाता है.”

“सही है. लोगों से मिलकर, बात करके थोड़ा मन भी बहल जाता होगा.” मैंने उनके समर्थन में सुर मिलाया.

“हां, पर आजकल लोगों के पास मिलने-बतियाने का व़क्त कहां है? देखो, सब के सब अपने-अपने मोबाइल पर व्यस्त हैं. मीलों दूर बैठे व्यक्ति को मैसेज पर मैसेज, फोटोज़ भेजते रहेंगे, पर मजाल है बगल में दर्द से कराहते व्यक्ति की ज़रा-सी सुध ले लें.”

इस बार मैं उनकी हां में हां नहीं मिला सकी. मेरे बुद्धिजीवी मस्तिष्क ने अपना तर्क रख ही दिया. “दर्द से ध्यान हटाने के लिए ही तो हर कोई अपने को मोबाइल में व्यस्त किए हुए है.”

“मतलब?”

“अब देखिए न अंकल, थेरेपी में थोड़ा-बहुत दर्द तो होता ही है. ध्यान गानों में, संदेश भेजने-पढ़ने में, फोटोज़ देखने में लगा रहेगा तो दर्द की अनुभूति कम होगी. मैंने इसीलिए तो पिंटू को हेडफोन लगा दिया है. ख़ुद मैं भी अपना मोबाइल ही चेक करने जा रही थी…”

“कि मैंने तुम्हें बातों में लगाकर तुम्हारा टाइम ख़राब कर दिया.” अंकल ने मेरी बात झटके से समाप्त करते हुए दूसरी ओर मुंह फेर लिया. शायद मैंने उन्हें नाराज़ कर दिया था.

“आह!” उनके मुंह से कराह निकली.

“देखिए, आपका ध्यान दर्द पर गया और दर्द महसूस होने लगा. इतनी देर मुझसे बातें करते हुए आपको दर्द का एहसास ही नहीं हो रहा था. बात स़िर्फ ख़ुद को व्यस्त रखकर दर्द से ध्यान बंटाने की है. देखिए, आपसे बातों-बातों में पिंटू की एक्सरसाइज़ पूरी भी हो गई. न उसे कुछ पता चला, न मुझे, वरना वो यदि दर्द से परेशान होता रहता, तो उसे तड़पता देख मैं दुखी होती रहती.”

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केयरटेकर ने आकर अंकल की मशीन हटाई, तो उनके मुंह से निकल गया, “अरे, हो भी गई. आज तो पता ही नहीं चला.”

केयरटेकर सहित मेरे चेहरे पर भी मुस्कान दौड़ गई. अंकल झेंप गए.

“टेक्नोलॉजी इतनी बुरी भी नहीं है अंकल! हां, अति सर्वत्र वर्जयेत्.”

प्रत्युत्तर में अंकल मुस्कुरा दिए, तो मैं फूलकर कुप्पा हो गई. घर लौटकर मैंने यह बात अपने पति को बताई, तो वे भी मुस्कुराए बिना न रह सके.

“मतलब, वहां भी तुमने अपनी समझदारी का सिक्का जमाना आरंभ कर दिया है. सॉरी नीतू, घर के कामों के साथ-साथ पिंटू को लाने-ले जाने की ज़िम्मेदारी भी तुम्हें संभालनी पड़ रही है. क्या करूं? आजकल ऑफिस में वर्कलोड ज़्यादा होने से लगभग रोज़ ही लौटने में देरी हो जाती है. देखो, शायद अगले महीने थोड़ा फ्री हो जाऊं, तो फिर पिंटू को लाने-ले जाने की ज़िम्मेदारी मैं संभाल लूंगा.”

“अरे नहीं, मुझे कोई परेशानी नहीं है, बल्कि कुछ नया देखने-समझने को मिल रहा है.” मैंने उन्हें अपराधबोध से उबारना चाहा.

“ओहो! तो लेखिका महोदया को यहां भी कहानी का कोई प्लॉट मिल गया लगता है.”

पति ने चुटकी ली, तो मैं मन ही मन इनकी समझ की दाद दिए बिना न रह सकी. वाकई इस एंगल से तो मैंने सोचा ही नहीं था. सेंटर में तो इतने तरह के कैरेक्टर्स मौजूद हैं कि कहानी क्या, पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है. मैं अब और भी जोश के साथ पिंटू को सेंटर ले जाने लगी. पर उन अंकल से फिर बातचीत नहीं हो सकी. एक-दो बार आते-जाते आमना-सामना ज़रूर हो गया था, पर हम मुस्कुराकर आगे बढ़ गए थे. उन्हें जाने की जल्दी थी, तो मुझे आने की. इस बीच मेरा जन्मदिन आया, तो पति ने मुझे उपहारस्वरूप किंडल लाकर दिया.

“इसमें तुम कोई भी क़िताब सॉफ्ट कॉपी के रूप में स्टोर कर कहीं भी पढ़ सकती हो. हैंडल करने में बेहद सुविधाजनक.”

स्मार्टफोन, चश्मे के अलावा अब किंडल भी मेरे हैंडबैग की एक आवश्यक एक्सेसरी हो गई थी. सेंटर में मेरा व़क्त और भी आराम से गुज़रने लगा था. पिंटू के घुटने में भी काफ़ी सुधार था. मुझे किंडल पर व्यस्त देख वह मज़ाक करता.

“ममा, आप अपना लैपटॉप भी साथ ले आया करो. यहीं स्टोरी टाइप कर लिया करो.”

“नहीं, इतना भी नहीं.” मैं मुस्कुरा देती. पर्स में किंडल आ जाने के बाद से मेरी आंखें उन अंकल को और भी बेचैनी से तलाशने लगी थीं. शायद मैं उन्हें उन्नत टेक्नोलॉजी का एक और अजूबा दिखाने के लिए बेक़रार हो रही थी. उनसे उस दिन की मुलाक़ात न जाने क्यों मेरे दिल में बस-सी गई थी, आख़िर मेरी मुराद पूरी हो ही गई. उस दिन पिंटू को फिज़ियोथेरेपिस्ट के हवाले कर मैंने किंडल पर अपना अधूरा नॉवल पढ़ना शुरू ही किया था कि एक परिचित स्वर ने मुझे चौंका दिया. देखा तो अंकल थे.

“अंकल, आप कैसे हैं? कितने दिनों बाद फिर से मुलाक़ात हुई है?”

“हां, बीच में कुछ दिन तो मैं आया ही नहीं था. विदेश से बेटी-दामाद आए हुए थे. उनके और नाती-नातिन के संग दिन कब गुज़र जाता था पता ही नहीं चलता था. भगवान का शुक्र है उस समय कंधों में कोई दर्द नहीं हुआ.”

मैं मुस्कुरा दी. “अंकल दर्द तो हुआ होगा, पर आप बेटी और उसके बच्चों में इतने मगन थे कि आपको दर्द का एहसास ही नहीं हुआ.” अंकल हंसने लगे थे. “तुमसे मैं तर्क में नहीं जीत सकता बेटी. अपनी बेटी को भी मैंने तुम्हारे बारे में बताया था. कहने लगी ठीक ही तो कह रही हैं वे. कब से आपसे कह रही हूं कि इस बटनवाले मोबाइल को छोड़कर स्मार्टफोन ले लीजिए. आपका मन लगा रहेगा और हमें भी तसल्ली रहेगी. वह तो ख़ुद लाने पर उतारू थी, पर मैंने ही मना कर दिया. मेरे भला कौन-से ऐसे यार-दोस्त हैं, जिनसे वाट्सएप पर बातें करूंगा. जो दो-चार हैं, वे मेरे जैसे ही हैं, जो या तो ऐसे ही मिल लेते हैं या फोन पर बातें कर लेते हैं. अपना पुराना लैपटॉप वह पिछले साल आई थी, तब यहीं छोड़ गई थी. उस पर स्काइप पर बात कर लेती है. बाकी सुबह-शाम टीवी देख लेता हूं. मोबाइल में जितने ज़्यादा फंक्शन होंगे, मेरे लिए उसे हैंडल करना उतना ही मुश्किल होगा. शरीर संभल जाए वही बहुत है. और पिंटू बेटा कैसा है? ठीक है? यह तुम्हारे हाथ में क्या है?”

“यह किंडल है अंकल!” मैं उत्साहित हो उठी थी. “मेरे हसबैंड ने मुझे बर्थडे पर गिफ्ट किया है. मुझे पढ़ने-लिखने का बहुत शौक़ है न, तो इसलिए.” मैं उत्साह से उन्हें दिखाने लगी, तो आसपास के कुछ और लोग भी उत्सुकतावश जुट आए.

“यह देखिए. यह मैंने इसमें कुछ क़िताबें मंगवाई हैं. अब ये इसमें सॉफ्ट कॉपी के रूप में उपलब्ध हो गई हैं. मेरा जब जहां मन चाहे खोलकर पढ़ने लग जाती हूं मोबाइल की तरह. यह भी बैटरी से चार्ज होता है. मेरी अपनी लिखी क़िताब भी सॉफ्ट कॉपी के रूप में इसमें उपलब्ध है. आप कभी पढ़ना चाहें तो!”

“वाह, क्या टेक्नोलॉजी है!” आसपास के लोग सराहना करते धीरे-धीरे छितरने लगे, तो मेरा ध्यान अंकल की ओर गया. अंकल किसी गहरी सोच में डूबे हुए थे.

“क्या हुआ अंकल?”

“अं… कुछ नहीं. मैंने तुम्हें बताया था न कि बेटी ने स्मार्टफोन दिलवाने की बात कही थी और मैंने इंकार कर दिया था. तब वह यही, जो तुम्हारे हाथ में है- किंडल, यह भेजने की ज़िद करने लगी. दरअसल, उसने मुझे उसकी मां की डायरी पढ़ते देख लिया था.”

“आपकी पत्नी डायरी लिखती हैं?” मैंने बीच में ही बात काटते हुए प्रश्‍न कर डाला था.“लिखती है नहीं, लिखती थी? दो वर्ष पूर्व वह गुज़र गई.”

“ओह, आई एम सॉरी!”

अंकल, शायद किसी और ही दुनिया में चले गए थे, क्योंकि मेरी प्रतिक्रिया पर भी वे निर्लिप्त बने रहे और पत्नी की स्मृतियों में खोए रहे.

“उसके जीते जी तो कभी उसकी डायरी पढ़ने की आवश्यकता महसूस ही नहीं हुई. बहुत जीवंत व्यक्तित्व की स्वामिनी थी तुम्हारी आंटी. बेहद हंसमुख, बेहद मिलनसार, बेहद धार्मिक… हर किसी को अपना बना लेने का जादू आता था उसे. मैं ज़रा अंतर्मुखी हूं, लेकिन वो हर व़क्त बोलती रहती थी. पर कैंसर के आगे उसकी भी बोलती बंद हो गई.”

“क्या? कैंसर था उन्हें?”

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“ख़ूब लंबा इलाज चला. अपनी जिजीविषा के सहारे वो लंबे समय तक उस भयावह बीमारी से संघर्ष करती रही, पर अंत में थक-हारकर उसने घुटने टेक दिए. उसके दिन-प्रतिदिन टूटने का सफ़र याद करता हूं, तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. तुम उस दिन फिज़ियोथेरेपी के दर्द के व़क्त ध्यान दूसरी ओर लगाने की बात कर रही थी न? तुम्हारी आंटी के कीमोथेरेपी के दर्द के सम्मुख यह दर्द कुछ भी नहीं है. मैं तो उस व़क्त आंखें बंद कर बस उसका ध्यान कर लेता हूं. उसका हंसता-मुस्कुराता जीवंत चेहरा मेरी स्मृति में तैर जाता है और मैं सब भूलकर किसी और ही दुनिया में पहुंच जाता हूं.”

अंकल को भावुक होते देख मैंने उनका ध्यान बंटाना चाहा. “आप उनकी डायरी के बारे में बता रहे थे.”

“हां, उसके जाने के बाद मैंने एक दिन वैसे ही उसकी डायरी खोलकर पढ़ना शुरू किया, तो हैरत से मेरी आंखें चौड़ी हो गई थीं. भावनाओं को इतनी ख़ूबसूरती से शब्दों में पिरोया गया था कि मैं उसकी सशक्त लेखनी की दाद दिए बिना नहीं रह सका. किसी कवयित्री की कविता से कम नहीं है उसकी डायरी. एक-एक शब्द जितनी शिद्दत से काग़ज़ पर उकेरा गया था, पढ़ते व़क्त उतनी ही गहराई से दिल में उतरता चला जाता है. जाने कितनी बार पढ़ चुका हूं, पर मन ही नहीं भरता. दिन में एक बार उसके पन्ने न पलट लूं, तब तक मन को शांति नहीं मिलती. बेटी परिवार सहित आई हुई थी, फिर भी मैं आंख बचाकर, मौक़ा निकालकर एक बार तो डायरी के पन्ने पलट ही लेता था और रवाना होने से एक दिन पहले बस बेटी ने यही देख लिया. मां की डायरी देख, पढ़कर पहले तो वह भी ख़ूब रोई. फिर बोली, “ठीक है पापा, मान लिया स्मार्टफोन आपके काम का नहीं. अब मैं आपके लिए किंडल भेजूंगी. उसमें आप न केवल मम्मी की डायरी, वरन और भी बहुत सारी क़िताबें पढ़ सकेंगे. देखिए, मम्मी की डायरी की क्या हालत हो गई है. एक-एक पन्ना छितरा पड़ा है.”

“वो तो बेटी मैं रोज़ देखता हूं न तो इसलिए…” मैंने सफ़ाई दी थी.

“पर किंडल में यह समस्या नहीं होगी, चाहे आप दिन में 20 बार पढ़ें.”

“हां, बिल्कुल. यह देखिए न आप.” मैंने अपना किंडल उनके हाथ में पकड़ा दिया. वे कुछ देर उसे देखते-परखते रहे. फिर लौटा दिया.

“लेकिन बेटी इसमें वो डायरीवाली बात कहां? उस डायरी के पन्नों के बीच तो मेरे द्वारा तुम्हारी आंटी को दिए सूखे गुलाब हैं. जगह-जगह हल्दी-तेल के निशान हैं. आंसुओं से धुंधलाए अक्षर हैं. उसके पन्नों पर हाथ फेरता हूं, तो लगता है तुम्हारी आंटी को ही स्पर्श कर रहा हूं.”

मैं स्तब्ध खड़ी रह गई थी. मेरा बुद्धिजीवी तार्किक मस्तिष्क संज्ञाशून्य हो गया था. तकनीक और विज्ञान हमें चांद-सूरज पर पहुंचा सकता है, पर किसी के दिल तक पहुंचने के लिए तो एक संवेदनशील दिल ही चाहिए. तभी तो कहा गया है ‘जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि’. शायद इसीलिए अंकल से रू-ब-रू वार्तालाप से मुझे जितना सुकून मिलता है, उतना वाट्सऐप पर पिंटू के लिए मिले गेट वेल सून मैसेजेस से नहीं.

Sangeeta Mathur

    संगीता माथुर

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Akbar Birbal Ki Khaniya
सौजन्य: lets-inspire.com

अकबर-बीरबल कथा: पूर्णिमा का चांद (Akbar-Birbal Story: poornima Ka Chand)

एक बार बीरबल फारस देश के राजा के निमंत्रण पर उनके देश गए हुए थे. उनके सम्मान दावत का आयोजन किया गयाथा और अनेक उपहार दिए गए थे. अपने देश लौटने की पूर्व संध्या पर एक अमीर व्यक्ति ने पूछा कि वह कैसे अपने राजाकी फारस के राजा से तुलना करेंगे?

बीरबल ने कहा, “आपके राजा पूर्णिमा के चांद जैसे हैं. हालांकि हमारे राजा दूज के चंद्रमा के समान हैं.”

यह सुन फारसी बहुत खुश थे, लेकिन जब बीरबल घर गए, तो उन्होंने पाया कि सम्राट अकबर बहुत गुस्से में थे.

अकबर ने गुस्से में कहातुम अपने राजा को कैसे कमजोर बता सकते हो.”  तुम एक गद्दार हो !” बीरबल ने कहा, “नहीं, महाराज मैंने आपको कमज़ोर नहीं बताया है.

दरसल, पूर्णिमा का चांद कम हो जाता है और गायब हो जाता है, जबकि दूज के चांद में शक्ति बढ़ती है.

मैं वास्तव में दुनिया को बताता हूं कि दिन प्रतिदिन आपकी शक्ति बढ़ रही है, जबकि फारस के राजा का पतन हो रहा है.”

अकबर ने बीरबल की बुद्धिमत्ता का फिर लोहा माना. उनकी बात का असली अर्थ समझकर संतोष व्यक्त किया औरबीरबल का गर्मजोशी से स्वागत किया.

सीख: शब्दों से खेलकर कैसे गूढ़ अर्थ में अपनी बात भी कही जा सकती है और समानेवाले को नाराज़ भी नहीं किया गयायह कला सीखना ज़रूरी है.

मैं इधर-उधर बिखरे काग़ज़ात को समेटने लगी. मम्मी के बनाए उन नक्शों में मुझे उनके टूटे हुए ख़्वाबों की किर्चें नज़र आ रही थीं. अधूरे ख़्वाबों को ज़िंदगीभर ढोना सहज नहीं होता. सारी ज़िंदगी मैंने मम्मी के होंठों पर मुस्कान देखी थी, पर आज मुझे उस मुस्कान के पीछे छिपी कसक भी नज़र आ रही थी. आज यदि इतिहास स्वयं को दोहराता है, तो संभव है कल को मेरे मन में भी ऐसी ही वेदना छिपी होगी. मम्मी ने मेरी कशमकश को दूर कर दिया था.

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की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्‍चात् काउंसलिंग और अंत में इंटरव्यू सभी में मैंने अभूतपूर्व सफलता अर्जित की और मेरा चयन आईआईएम कॉलेज (अहमदाबाद) में हो गया. मम्मी-पापा बहुत ख़ुश थे. घर में उत्साह का माहौल था. उस दिन सुबह बैंक जाने के लिए मैं घर से निकलने लगी, तो मम्मी बोली, “प्रिया, तुम्हारे अहमदाबाद जाने में 15 दिन बचे हैं, अब अपनी जॉब से रिज़ाइन करके तुम्हें जाने की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए.” मम्मी की बात का जवाब दिए बगैर मैं चुपचाप बाहर निकल गई.

मम्मी को कैसे बताऊं मन में चल रही कशमकश के बारे में. मन में विचारों का तूफ़ान उठ रहा था. ज़िंदगी ऐसे दोराहे पर आ खड़ी हुई थी कि कौन-सी राह चुनूं समझ नहीं आ रहा था. कुछ दिन पूर्व तक मेरे जीवन का एक ही उद्देश्य था. आईआईएम कॉलेज से एमबीए करके जीवन में ऊंचा मुक़ाम हासिल करना, पर अब हालात बदल गए थे. अब करियर के साथ-साथ संजय को पाने की चाह भी दिल में घर बना चुकी थी.

संजय की याद आते ही पलकों के रास्ते मन के आंगन में कुछ माह पूर्व की स्मृतियां खिली धूप-सी उतर आईं. कैट की परीक्षा देने के पश्‍चात् मैं घर में खाली बैठी बोर हो रही थी, इसलिए मैंने एक प्राइवेट बैंक में जॉब ढूंढ़ ली. कुछ दिनों बाद वहां मेरी मुलाक़ात संजय से हुई. संजय चार्टेड अकाउंटेंट था. वह बैंक का ऑडिट करने आया करता था. एक शाम उसी सिलसिले में वो बैंक में था. उसकी मदद के लिए मैं और मेरा एक कलीग रुके हुए थे. काम पूरा होने के पश्‍चात् जब मैं बैंक से निकली, शाम के सात बज रहे थे. अंधेरा घिर आया था. मैं सड़क पर ऑटो की प्रतीक्षा में खड़ी थी, तभी संजय की कार समीप आकर रुकी. उसने कार का दरवाज़ा खोलते हुए कहा, “बैठिए, मैं आपको घर छोड़ देता हूं.”

“नहीं नहीं, मैं स्वयं चली जाऊंगी.” मैंने इनकार किया. संजय बोला, “आज आप मेरी वजह से लेट हुई हैं, इसलिए आपको हिफाज़त से घर पहुंचाने की ज़िम्मेदारी भी मेरी है. प्लीज़ बैठिए.” उसके आग्रह को मैं टाल न सकी. रास्ते में वह इधर-उधर की बातें करता रहा. उसने बताया कि उसके पिताजी का पिछले वर्ष स्वर्गवास हो चुका था. घर में बस उसकी मां थी, जो जल्द-से-जल्द उसकी शादी कर देना चाहती थी. लेकिन शादी जैसे गंभीर फैसले पर वह जल्दबाज़ी नहीं करना चाहता था. घर आ चुका था. मैं उसे अंदर लेकर आई.

मम्मी-पापा संजय से मिलकर प्रसन्न हुए.

गरम-गरम कॉफी के दौरान पापा की कई फाइनेंस संबंधी समस्याएं उसने मिनटों में सुलझा दीं.

संजय का ऑफिस बैंक के समीप था, इसलिए अक्सर उसका बैंक में आना-जाना लगा रहता था. धीरे-धीरे हम दोनों के बीच मित्रता होने लगी. हम अक्सर बाहर मिलने लगे. धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा कि संजय मुझे चाहने लगा है. एक दिन कॉफी पीते हुए उसने कहा, “प्रिया, हम दोनों की बहुत-सी बातें एक-दूसरे से मिलती हैं. हम दोनों की पसंद-नापसंद, जीवन के प्रति हमारा नज़रिया सभी कुछ मिलता है. सच पूछो तो मुझे ऐसी ही लड़की की तलाश थी, जो व्यावहारिक, ख़ूबसूरत व समझदार हो. क्या तुम ज़िंदगीभर साथ निभाने के लिए मेरा हाथ थामना पसंद करोगी?” संजय मुझे पसंद था. उसकी इंटेलिजेंसी, लगन, ज़िंदगी में ऊंचाइयां छूने की चाहत, सेंस ऑफ ह्यूमर सभी कुछ मुझे भाता था. मैंने उसे अपनी स्वीकृति दे दी.

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परिधि लांघकर सदियां बन गए. उस अनजानी ख़ुशी को आंचल में समेटे मैं हवा में तैर रही थी कि तभी कैट की परीक्षा का परिणाम आ गया. मैं सफल रही. उसके पश्‍चात् काउंसलिंग व इंटरव्यू के बाद मुझे आईआईएम कॉलेज में एडमिशन मिल गया. मैंने यह ख़बर संजय को सुनाई. बधाई देते हुए वो गंभीर स्वर में बोला, “प्रिया, अब समय आ गया है कि हम अपने संबंधों पर गंभीरतापूर्वक विचार कर लें. इधर मैं तुम्हारे घरवालों से हमारी शादी की बात करने की सोच रहा हूं और तुम अहमदाबाद जाने की सोच रही हो. नहीं प्रिया, अब मैं तुमसे दूर नहीं रह पाऊंगा.”

“यह क्या कह रहे हो तुम?” मैं आश्‍चर्य से बोली, “ज़िंदगी में यह मुक़ाम हासिल करने की मेरी बचपन से तमन्ना थी. इसके लिए मैंने रात-दिन मेहनत की. अब जबकि मंज़िल मेरे सामने है, तो मैं उससे कैसे मुंह मोड़ लूं. स़िर्फ दो साल की तो बात है.”

“दो साल? इतना समय मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूंगा? पहले तुम्हारा जो भी सपना रहा हो, पर अब तुम्हारी प्राथमिकता शादी होनी चाहिए. प्रिया, शादी के बाद भी तुम एमबीए कर सकती हो, आईआईएम कॉलेज से न सही, मुंबई के किसी अच्छे कॉलेज से.”

“लेकिन संजय…”

“प्लीज़ प्रिया, हम दोनों के प्यार की ख़ातिर तुम्हें मेरी बात माननी ही पड़ेगी.” उसी दिन से मेरे मन में कशमकश चल रही थी. मम्मी-पापा से भी मैं बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाई थी. लेकिन परिस्थितियों का सामना तो करना ही था. उस शाम घर पहुंचकर मैंने मम्मी से कहा, “मम्मी, मैं अहमदाबाद नहीं जाऊंगी.”

“क्यों?” मम्मी आश्‍चर्य से बोलीं.

“मैं और संजय एक-दूसरे को चाहते हैं और शादी करना चाहते हैं.”

“प्रिया, मैंने तुमसे संजय के साथ मेलजोल रखने पर इसलिए कभी कुछ नहीं कहा, क्योंकि मैं जानती हूं तुम समझदार हो. भावुकता में बहकर जीवन का इतना बड़ा फैसला करना ग़लत है फिर मैं और तुम्हारे पापा अभी तुम्हारी शादी नहीं करना चाहते. अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है. अभी तुम्हें अपना करियर बनाना है. अपने पैरों पर खड़ा होना है. समय के साथ तुम्हारे अंदर परिपक्वता आएगी और तुम अपने जीवन का सही फैसला कर सकोगी.”

“लेकिन मम्मी, मैं संजय को खोना भी नहीं चाहती.” मम्मी ने गौर से मेरा चेहरा देखा और मुझे अपने बेडरूम में ले गईं. अपनी आलमारी खोल उन्होंने कुछ पेपर्स निकाले और बोलीं, “प्रिया, आज मैं तुमसे अपनी कुछ व्यक्तिगत बातें शेयर करना चाहती हूं. इन पेपर्स को देखो. ये मकान के नक्शे हैं, जो कभी मैंने बनाए थे. प्रिया, मैं मुंबई में आर्किटेक्चर का कोर्स कर रही थी. सेकंड ईयर में थी, जब कॉलेज की तरफ़ से दार्जिलिंग घूमने गई थी. वहीं तुम्हारे पापा मुझे पहली बार मिले. वह भी अपने मित्र के साथ वहां घूमने आए थे और हमारे ही होटल में ठहरे थे. दार्जिलिंग में हम लोग छह दिन रहे और इस दौरान तुम्हारे पापा से मेरी अच्छी जान-पहचान हो गई. वह इंजीनियर थे और मुंबई में उनकी अपनी फैक्टरी थी.

मुंबई आकर हम लोग मिलते रहे. छह माह पश्‍चात् उन्होंने मेरे समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा. प्रिया, मैं अपना चार साल का कोर्स पूरा करना चाहती थी, पर तुम्हारे पापा को भी खोना नहीं चाहती थी. तुम्हारे नाना-नानी ने भी सोचा, इतना अच्छा लड़का मिल रहा है, तो शादी कर दी जाए. मेरी शादी हो गई. तुम्हारे पापा ने मुझसे वादा किया था कि शादी के बाद मेरी पढ़ाई जारी रखवाएंगे. लेकिन ऐसा संभव न हो सका. पहले तुम्हारी दादी बीमार प़ड़ गईं, फिर गृहस्थी में ऐसी उलझी कि आर्किटेक्ट बनना ख़्वाब ही रह गया. दो वर्ष की पढ़ाई तो व्यर्थ गई ही, साथ ही कभी आत्मनिर्भर भी न बन सकी. हां, तुम्हारे पापा से मुझे कभी कोई शिकायत नहीं रही. उन्होंने मुझे हर ख़ुशी, हर सुख दिया, लेकिन फिर भी मेरे मन में हमेशा इस बात का मलाल रहा कि मैं आर्किटेक्ट न बन सकी.

प्रिया, जीवन में कभी-कभी परीक्षा की ऐसी घड़ी आती है, पर तब हमें बहुत सोच-विचार कर दिल से नहीं दिमाग़ से काम लेना चाहिए, क्योंकि भावावेश में किए गए फैसले अक्सर ग़लत साबित होते हैं. अपने अथक परिश्रम को व्यर्थ मत जाने दो. इस समय अपने मन पर काबू रख अपना भविष्य संवार लो. संजय वास्तव में तुम्हारे लिए गंभीर होगा, तो दो साल तुम्हारी प्रतीक्षा अवश्य करेगा.” मम्मी कमरे से बाहर चली गईं.

मैं इधर-उधर बिखरे काग़ज़ात को समेटने लगी. मम्मी के बनाए उन नक्शों में मुझे उनके टूटे हुए ख़्वाबों की किर्चें नज़र आ रही थीं. अधूरे ख़्वाबों को ज़िंदगीभर ढोना सहज नहीं होता.

सारी ज़िंदगी मैंने मम्मी के होंठों पर मुस्कान देखी थी, पर आज मुझे उस मुस्कान के पीछे छिपी कसक भी नज़र आ रही थी. आज यदि इतिहास स्वयं को दोहराता है, तो संभव है कल को मेरे मन में भी ऐसी ही वेदना छिपी होगी. मम्मी ने मेरी कशमकश को दूर कर दिया था. अब मैंने फैसला कर लिया कि मैं अहमदाबाद आगे की पढ़ाई के लिए जाऊंगी. अगले दिन मैंने संजय से कहा, “देखो संजय, मुझे ग़लत मत समझना. आज जो मुझे देश के इतने प्रतिष्ठित कॉलेज से एमबीए करने का अवसर मिला है, उसके पीछे स़िर्फ मेरी मेहनत नहीं है, बल्कि मेरे मम्मी-पापा की तपस्या भी शामिल है. उन्होंने भी मेरे साथ कितनी ही रातें जागकर बिताई हैं. अपनी मेहनत के साथ-साथ मैं उनकी तपस्या को व्यर्थ नहीं जाने दूंगी. मैं एमबीए करने अवश्य जाऊंगी. हो सके तो तुम मेरी प्रतीक्षा करना.”

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दस दिन बाद अहमदाबाद जाते हुए एयरपोर्ट पर मम्मी-पापा मुझे छोड़ने आए थे. मेरी आंखों में आंसू थे. अपने घर से दूर जाने का ग़म तो था ही, साथ ही अपने प्यार को खो देने की टीस भी हृदय में उठ रही थी. हफ़्तेभर से संजय की कोई ख़बर नहीं थी. स्पष्ट था कि वह प्रतीक्षा के लिए तैयार नहीं था, तो क्या मैंने संजय को पहचानने में भूल की थी? क्या उसका प्यार सतही था? उसमें गहराई नहीं थी? मन में उठ रहे सवालों के साथ सामान लिए मैं आगे बढ़ रही थी, तभी कानों में संजय की आवाज़ आई. वह मेरा नाम पुकार रहा था. मैंने मुड़कर पीछे देखा. हाथों में गुलाब का बुके लिए संजय तेज़ी से मेरी ओर बढ़ रहा था. क़रीब आकर वह बोला, “सॉरी प्रिया, इतने दिनों से न तो तुमसे मिला और न फोन किया. दरअसल, मेरा एक छोटा-सा एक्सीडेंट हो गया था.” मैंने कुछ कहना चाहा, तो उसने रोक दिया, “कुछ मत कहो प्रिया. बस सुनो. मैं तुम्हारी दो साल तक प्रतीक्षा करूंगा. मैं तुमसे ही शादी करूंगा.” ख़ुशी से मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. मैंने कृतज्ञतापूर्ण नज़रों से मम्मी की ओर देखा. उनके सही मार्गदर्शन की वजह से ही मुझे ख़ुशी के ये अनमोल पल प्राप्त हुए थे. दिल में पूर्णता का एहसास लिए मैं अपनी मंज़िल की ओर बढ़ गई.

Renu Mandal

     रेनू मंडल

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