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कहानी- स्वीट डिश (Short Story- Sweet Dish)

Hindi Short Story

“कोई रिश्ता हमें कितना अच्छा लगेगा या कितना बुरा, वह हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण होगा, यह जानने के लिए ज़रूरी है कि हम खुले और साफ़ दिल से उस रिश्ते को स्वीकारें. जिस दिल में पहले से ही कोई पूर्वाग्रह पल रहा हो, वहां किसी सुमधुर रिश्ते का प्रवेश भला कैसे संभव है?”

“बड़ी नानी आ गई, बड़ी नानी आ गई.” का हल्ला मचते ही कुमुद पल्लू सिर पर लेकर सास का स्वागत करने दरवाज़े पर पहुंच गई. चरण स्पर्श का दौर समाप्त हुआ, तो विमलाजी के मुंह से पहले बोल ये फूटे, “चिंकी आई नहीं अभी तक?”

“उसकी ट्रेन लेट है, देर से आएगी. आप हाथ-मुंह धोकर फ्रेश हो जाइए. सभी आपका खाने पर इंतज़ार कर रहे हैं.” खाने पर भी चिंकी की ही बातें होती रहीं. चिंकी दादी की सबसे छोटी लाडली पोती है, तो निकिता और नीरज की दुलारी छोटी बहन. निकिता के दोनों बच्चे अपनी इकलौती मौसी की शादी की बात को लेकर काफ़ी उत्साहित थे.

“ममा, आपने चिंकी मौसी के लिए मौसाजी तो ढूंढ़ लिया. अब नीरज मामा के लिए मामीजी भी आप ही ढूंढ़ेंगी?”

“हां बहू, बच्चे सही कह रहे हैं. नीरज के लिए भी लड़की खोजकर दोनों भाई-बहन का एक ही मंडप में ब्याह रचा दे. तुझे भी तो अब आराम चाहिए.” विमलाजी ने कुमुद की ओर देखकर दिल की बात कही, तो उसने भी सहमति में गर्दन हिला दी, लेकिन चेहरा उसका गुमसुम ही बना रहा. नीरज खाना खाकर बच्चों को लेकर अपने कमरे में चला गया, तो विमलाजी से रहा नहीं गया.

“क्या बात है? तुम दोनों के चेहरों को देखकर तो लग ही नहीं रहा है कि चिंकी के रिश्ते की बात तय हो गई है.”

“दादी, दरअसल बात यह है कि पवन वैसे तो बहुत अच्छा लड़का है. फ़ोटोग्राफ़, बायोडाटा आदि देखकर दोनों परिवारवालों ने एक-दूसरे को पसंद भी कर लिया है. मैंने चिंकी और पवन को फेसबुक पर मिला भी दिया है, पर अब एक वजह से मुझे और मम्मी को यह रिश्ता खटाई में पड़ता नज़र आ रहा है. पवन संयुक्त परिवार से है. अपने परिवार के साथ इतना घुला-मिला हुआ है कि हमें नहीं लगता कि वह अपनी अलग गृहस्थी बसाएगा और चिंकी को जब यह बात पता चलेगी, तो वह इस शादी के लिए बिल्कुल तैयार नहीं होगी. आप तो जानती ही हैं, वह कितनी बिंदास और मनमौजी है. घर में कोई भी चीज़ आए, सबसे पहले उसे मिलनी चाहिए. यहां तक कि कोई मेहमान भी पहले उससे न मिले, तो उसका मूड उखड़ जाता है.”

“अब वह बच्ची नहीं है, बड़ी हो गई है. नौकरी करने लगी है.” विमलाजी ने टोका.

“और बड़े होने के साथ-साथ उसकी यह आज़ाद ख़यालात की प्रवृत्ति और भी बढ़ गई है दादी. तभी तो मेरे इतना कहने पर भी अलग कमरा लेकर रह रही है.”

“वह तो बेटी, वहां से उसका ऑफ़िस नज़दीक है इसलिए. तू बेकार ही इस बात का बुरा मान रही है.” कुमुद ने बात संभाली.

“जो भी हो मम्मी, मुझे नहीं लगता कि यह बात पता चलने पर चिंकी इस रिश्ते के लिए राज़ी होगी.” निकिता अभी भी आश्‍वस्त नहीं थी.

“मैं ऊपर बालकनी में जा रही हूं. चिंकी आ जाए, तो वहीं भेज देना.” विमलाजी यकायक उठकर सीढ़ियों की ओर बढ़ गईं, तो मां-बेटी आश्‍चर्यचकित हो उन्हें जाते देखती रह गईं.

“यह दादी को अचानक क्या हो गया?” निकिता के प्रश्‍न को अनसुना कर कुमुद गहरी सोच में डूब गई.

“हमें मांजी के सामने इस तरह संयुक्त परिवार के मुद्दे को नहीं उछालना चाहिए था निक्की. तू जानती तो है, तेरी दादी ने पूरा जीवन कितने बड़े परिवार को संभालते हुए गुज़ारा है. पूरे परिवार की धुरी थीं वे. वो तो तेरे पापा और चाचा की अलग-अलग शहरों में नौकरियां लग गईं, जिससे हम अलग-अलग रहने पर मजबूर हो गए.”

“वैसे भी आज के ज़माने में वह सब कैसे मुमकिन है मम्मी?”

“हालात के चलते बिखरना अलग बात है बेटी, लेकिन आधुनिकता और आज़ादी का दंभ भरते हुए अलग हो जाना थोड़ा अलग मुद्दा है. शायद तुम्हारी इन्हीं बातों से तुम्हारी दादी को ठेस लगी और वे उठकर चली गईं.”

“वे अपनी जगह सही हो सकती हैं मम्मी, लेकिन चिंकी को अच्छी तरह से जानते हुए मैं भी अपनी जगह ग़लत नहीं हूं, बल्कि मैं तो ख़ुद चाहती हूं कि चिंकी उस परिवार को अपना ले. मैं न केवल पवन, बल्कि उसके घरवालों से भी मिल चुकी हूं. सभी बहुत अच्छे लोग हैं. समस्या स़िर्फ चिंकी के दिमाग़ में बसे पूर्वाग्रह को तोड़ने की है.”

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“अब बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? ख़ैर, इस बारे में बाद में सोचेंगे. पहले मैं तेरी दादी को मनाकर आती हूं. वे अभी आईं और अभी हमने उनका मूड ख़राब कर दिया.” कुमुद सीढ़ियां फलांगते तुरंत विमलाजी के पास बालकनी में जा पहुंची.

विमलाजी आरामकुर्सी पर आंखें मूंदें विगत की यादों में खोई थीं. कुमुद की पदचाप से उनकी चेतना लौटी और उन्होंने आंखें खोल दीं. “आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए मैं क्षमा चाहती हूं. हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं था. मैं और निक्की तो स्वयं चाहते हैं कि चिंकी उस परिवार को अपना ले, पर आप तो चिंकी को जानती हैं न. उसे कौन समझाएगा?” कुमुद के चेहरे पर चिंता की लकीरें और भी गहरी हो उठी थीं.

“चिंकी आ जाए और तुम सबसे मिल ले, तो उसे मेरे पास भेज देना. मैं यहीं उसका इंतज़ार कर रही हूं.” अपनी बात समाप्त कर विमलाजी ने फिर से सिर टिकाकर आंखें मूंद लीं. सुखद अतीत के झरोखे से उन्हें बाहर निकाला दो ख़ूबसूरत बांहों ने, जिन्होंने न जाने कब चुपके से आकर उन्हें अपने आगोश में ले लिया.

“आ गई तू?” विमलाजी ने चिंकी को पीछे से खींचकर सामने रखी कुर्सी पर बिठा दिया और गौर से निहारने लगीं, तो चिंकी झेंप गई.

“ऐसे क्या देख रही हैं दादी?”

“देख रही हूं कल की नन्हीं-सी गुड़िया आज दुल्हन बनने जा रही है.”

“अभी वक़्त है दादी. कहीं छुपकर बैठे उस हमसफ़र को खोजकर लाने में अभी और वक़्त लगेगा.” चिंकी की बातों से विमलाजी को अंदाज़ा हो गया कि चिंकी को पवन के परिवार के बारे में बताया जा चुका है और इस बात को लेकर उसने अपनी सोच भी बदल ली है. क्या हो गया है आज की पीढ़ी को? कोई समझौता करने को तैयार ही नहीं. हर चीज़ उन्हें एकदम अपने मन-मुताबिक चाहिए. पल में सिलेक्ट,

पल में रिजेक्ट… मानो शादी न हुई गुड्डे-गुड़िया का खेल हो गया और कोई दुख या अफ़सोस भी नहीं.

“चिंकी, ले मैं तेरी थाली यहीं ले आई हूं. आराम से दादी से गप्पे मारते हुए खाना खा.” कुमुद ने चिंकी को थाली पकड़ाई, तो अपनी मनपसंद स्वीट डिश रसगुल्ला देखकर चिंकी चहक उठी. चिंकी खाना खाती रही और विमलाजी उससे इधर-उधर की, ऑफ़िस, कैंटीन, सहकर्मियों आदि की बातें करती रहीं.

“यह पालकवाली सब्ज़ी क्यों नहीं खा रही तू?”

“उं… यह मुझे पसंद नहीं है दादी.” चिंकी ने मुंह बनाते हुए कहा.

“तो क्या हुआ? बहुत पौष्टिक होता है पालक, फटाफट खा ले और यह रसगुल्ला तो तुझे बहुत पसंद है न, यह क्यों नहीं खा रही?”

“हूं… इसे तो मैंने अंत में खाने के लिए बचाकर रखा है. पहले फटाफट सारा खाना ख़त्म कर दूं, फिर लास्ट में मज़े ले-लेकर अपनी मनपसंद स्वीट डिश खाऊंगी.” मस्ती से गर्दन हिलाते हुए चिंकी ने कहा, तो उसके भोलेपन पर विमलाजी को ढेर सारा प्यार उमड़ आया.

“तेरी इस स्वीट डिश वाली बात से मुझे तेरे दादाजी की याद आ गई.”

“हाउ स्वीट एंड रोमांटिक दादी! दादाजी को भी रसगुल्ले पसंद थे क्या?” चिंकी थोड़ा पास खिसक आई. “बताओ न दादी.”

“अरे नहीं, वो बात नहीं है. तब हमारा संयुक्त परिवार था. एक-दूसरे की पसंद-नापसंद जानने-पूछने का होश ही कहां था? हर वक़्त एक संकोच घेरे रहता था. रोमांस की तो सोच भी नहीं सकते थे.”

“वही तो दादी. ऐसे में प्यार पनपना तो दूर रहा, जो है वो भी ख़त्म हो जाता है.” चिंकी थोड़ा जोश में आ गई थी, लेकिन दादी के अगले ही वाक्य ने उसके उत्साह पर पानी फेर दिया.

“बस, यहीं पर आज की पीढ़ी मात खा जाती है. खुल्लम-खुल्ला छेड़छाड़, आई लव यू कहना, किस करना. तुम लोग इन्हीं सब को प्यार समझते हो. प्यार की गहराई से तो तुम लोगों का दूर-दूर तक कोई नाता ही नहीं है… वैसे तुम्हारी भी ग़लती नहीं है. मैं भी पहले ऐसा ही कुछ समझती थी. तुम्हारे दादाजी जब ऑफ़िस से घर लौटते, तो बरामदे में ही बैठे अपने माता-पिता से पहले बतियाते. तब तक बड़े भाईसाहब के बच्चे ‘चाचा-चाचा’ करते उन्हें घेर लेते. वे कभी बच्चों को चॉकलेट-टॉफी पकड़ाते, तो कभी नन्हें मुन्नू को गोद में लेकर दुलारते, तब तक ननदजी अपने कॉलेज की बात बताने लगतीं. सबसे बतियाते हुए अंत में वे मुझ तक पहुंचते, तब तक मैं अपने कमरे में ग़ुस्से से गुड़मुड़ होती रहती. वे मुझसे प्यार भरी बातें करना चाहते, तो मैं मुंह फेर लेती या हां-हूं करके टरकाने लगती. वे मेरी मनःस्थिति समझ जाते.”

“नाराज़ हो मुझसे? मैं तुम्हारी नाराज़गी समझ सकता हूं. पर क्या करूं? सब के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाते-निभाते इतना वक़्त लग ही जाता है.”

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मैं फिर भी मुंह फुलाए रहती.

“मैं तुम्हारा ग़ुस्सा समझता हूं. तुम सोचती होगी सबके प्रति ज़िम्मेदारी समझता हूं और तुम्हारे प्रति नहीं. सबके लिए वक़्त निकाल सकता हूं, तुम्हारे लिए नहीं, पर सच्चाई कुछ और है. मेरी ज़िंदगी रूपी थाली में तुम्हारा स्थान स्वीट डिश की तरह है. जल्दी-जल्दी पूरा खाना ख़त्म कर मैं अंत में आराम से इस स्वीट डिश का पूरा लुत्फ़ लेना चाहता हूं. तुम्हारे लिए मुझे वक़्त निकालने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मेरा पूरा वक़्त तुम्हारा है. उसमें से दूसरे कामों के लिए, दूसरे लोगों के लिए मुझे वक़्त निकालना होता है.”

“मैं अवाक् उन्हें देखती रह गई थी. मैं उनके लिए इतनी महत्वपूर्ण हूं, इसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी, तब से मुझे उनसे कभी कोई शिकायत नहीं रही. उनके अंत समय तक मैं उनके लिए स्वीट डिश ही बनी रही.” विमलाजी थोड़ी भावुक होने लगीं, तो चिंकी ने हास-परिहास से वातावरण को हल्का करना चाहा.

“समझ नहीं आता आपको शुगर की बीमारी कैसे हो गई? जबकि आप तो ख़ुद स्वीट डिश हैं.”

विमलाजी कुछ संभल चुकी थीं और उन्हें अपना मक़सद भी याद आ गया था. “चिंकी, यह ज़िंदगी बड़ी अजीब है. कोई भी इंसान सारी ज़िंदगी केवल स्वीट डिश खाकर नहीं गुज़ार सकता. शरीर के लिए आवश्यक सारे पोषक तत्व पाने के लिए उसे सब कुछ खाना पड़ता है. पसंद हो, चाहे न हो. जैसे अभी तुम्हें पालक की सब्ज़ी ज़बरन गले के नीचे उतारनी पड़ी. रिश्तों की माया भी बहुत कुछ ऐसी ही है. पसंद न होते हुए भी कुछ रिश्तों को निभाना हमारी मजबूरी बन जाती है. यह मजबूरी धीरे-धीरे आदत बनती चली जाती है, फिर हमें इसमें भी आनंद आने लगता है, जैसा कि मेरे संग हुआ. स्वीट डिश यानी तुम्हारे दादाजी का साथ पाने के लालच में मैं सारे रिश्ते बख़ूबी निभाती चली गई और धीरे-धीरे मुझे उन रिश्तों से भी प्यार होने लगा. मैं सबकी और सब मेरी ज़रूरत बनते चले गए.

मुझे एहसास होने लगा कि यदि मन में भाव अच्छे नहीं हैं, तो पकवान भी निरे बेस्वाद लगेंगे. यदि मुंह में पहले से ही कड़वाहट घुली हो, तो उसमें कितना भी स्वादिष्ट व्यंजन रख दो, उसका स्वाद कड़वा ही आएगा. कोई रिश्ता हमें कितना अच्छा लगेगा या कितना बुरा, वह हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण होगा, यह जानने के लिए ज़रूरी है कि हम खुले और साफ़ दिल से उस रिश्ते को स्वीकारें. जिस दिल में पहले से ही कोई पूर्वाग्रह पल रहा हो, वहां किसी सुमधुर रिश्ते का प्रवेश भला कैसे संभव है?” चिंकी के खाना खाते हाथ यकायक थम से गए. वह गहन सोच की मुद्रा में आ गई थी. विमलाजी ख़ुश थीं कि तीर निशाने पर लग गया था.

“अरे! तुम खाना खाते-खाते रुक क्यों गई? यह रसगुल्ला तो लो, जो तुम्हें इतना पसंद है और जिसके लालच में तुमने पूरा खाना ख़त्म किया है.”

“हूं… हां खाती हूं.” कहते हुए चिंकी ने गप से पूरा रसगुल्ला मुंह में रख लिया. रसगुल्ले के मीठे-मीठे स्वाद ने उसे झूमने पर मजबूर कर दिया. “वाउ! मज़ा आ गया. पूरा खाना खाने के बाद स्वीट डिश खाने का अपना ही आनंद है. वैसे दादी, आप मुझे जो समझाना चाह रही हैं, मैं बख़ूबी समझ रही हूं. दादाजी का प्यार पाने के लालच में आप सारे रिश्ते निभाती चली गईं और प्यार का असली आनंद आपको इसी में मिला.” चिंकी अब वाकई गंभीर हो उठी थी, क्योंकि यह उसकी ज़िंदगी से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा था. पवन को वह पसंद करने लगी थी, लेकिन उसे पाने के लिए उसके पूरे परिवार को अपनाना होगा, यह विचार उसे परेशानी में डाल रहा था और इसीलिए वह अभी भी थोड़ा झिझक रही थी.

“मैं तुम्हें किसी भुलावे में नहीं रखना चाहती चिंकी. इसलिए झूठ नहीं बोलूंगी. यह राह इतनी आसान नहीं है. कई अप्रिय प्रसंग ऐसे आए, जिन्हें कड़वी दवा समझकर मुझे एक सांस में हलक से नीचे उतार लेना पड़ा, यह सोचकर कि चलो इससे जल्दी स्वस्थ हो जाऊंगी और फिर से एक ख़ुशहाल जीवन जीने लगूंगी और ऐसा हुआ भी.”

“कितना कुछ सहा है दादी आपने और कितना कुछ किया है आपने अपने परिवार को एक बनाए रखने के लिए. इतने परिश्रम का फल तो वैसे भी मीठा होना ही था और एक मैं हूं बिना कुछ किए ही मीठे फल पा लेना चाहती हूं. ऐसे में भला उसमें वह स्वाद कहां से आएगा?” चिंकी मुस्कुरा रही थी और उसकी मुस्कुराहट में उसके इरादों की चमक साफ़ नज़र आ रही थी.

“चिंकी, तुमने खाना ख़त्म कर लिया? देखो, मैं तुम्हारे लिए और रसगुल्ला

लाई हूं.” कहते हुए कुमुद ने चिंकी की प्लेट में एक और रसगुल्ला रख दिया. “आप भी एक लीजिए न मांजी?” कुमुद ने आग्रह किया.

“मैं मीठा कहां लेती हूं बहू?.. पर हां, चिंकी के राज़ी हो जाने की ख़ुशी में तेरा मुंह मीठा करा देती हूं.” कहते हुए विमलाजी ने कुमुद के मुंह में एक रसगुल्ला ठूंस ही दिया.

Sangeeta Mathur

     संगीता माथुर

 

अकबर-बीरबल की कहानी: जोरू का गुलाम (Akbar-Birbal Tale: Joru Ka Ghulam)

 

Akbar Aur Birbal

अकबर-बीरबल की कहानी: जोरू का गुलाम (Akbar-Birbal Tale: Joru Ka Ghulam)

बादशाह अकबर और बीरबल आपस में बातें कर रहे थे. बातों ही बातों में बात मियां-बीवी के रिश्ते पर चल निकली तो बीरबल ने कहा- अधिकतर मर्द जोरू के गुलाम ही होते हैं और अपनी बीवी से डरते हैं.

यह सुनकर बादशाह ने असहमति जताई और कहा कि मैं नहीं मानता.

यह सुन बीरबल ने कहा कि हुजूर, मैं यह बात सिद्ध कर सकता हूं.

बादशाह भी तैयार हो गए और कहा कि सिद्ध करो.

बीरबल ने कहा कि आप आज ही से आदेश जारी करें कि किसी के भी अपने बीवी से डरने की बात साबित हो जाती है तो उसे एक मुर्गा दरबार में बीरबल के पास में जमा करना होगा. बादशाह ने आदेश जारी कर दिया.

कुछ ही दिनों में बीरबल के पास ढेरों मुर्गे जमा हो गए, तब उसने बादशाह से कहा- अब तो इतने मुर्गे जमा हो गए हैं कि आप मुर्गीखाना खोल सकते हैं. अब तो मानते हैं न कि मेरी बात सिद्ध हो गई? अतः अब आप अपना आदेश वापस ले लें.

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बादशाह को न जाने क्या मज़ाक सूझा कि उन्होंने अपना आदेश वापस लेने से इंकार कर दिया. खीजकर बीरबल लौट आया और अगले दिन बीरबल दरबार में आया तो बादशाह अकबर से बोला- हुजूर, विश्‍वसनीय सूत्रों से पता चला है कि पड़ोसी राजा की पुत्री बेहद खूबसूरत है, आप कहें तो आपके विवाह का प्रस्ताव भेजूं?

यह क्या कह रहे हो तुम, कुछ तो सोचो, जनानाखाने में पहले ही दो हैं, अगर उन्होंने सुन लिया तो मेरी खैर नहीं.
बादशाह की यह बात सुनकर बीरबल ने कहा- हुजूर, दो मुर्गे आप भी दे ही दें अब.

बीरबल की बात सुनकर बादशाह झेंप गए और उन्होंने तुरंत अपना आदेश वापस ले लिया.

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कहानी- चौथा पड़ाव (Short Story- Chautha Padaav)

अब समय के बदलाव के अनुसार ज़रूरत है हमें हमारी सोच बदलने की, क्योंकि अब बच्चों की और प्रौढ़ लोगों की जीवनशैली में इतना अंतर आ गया है कि दोनों को ही साथ रहने में असुविधा होती है. हर उम्र में हरेक को अपने निजी जीवन को अपनी इच्छानुसार जीने के लिए स्वतंत्रता चाहिए होती है, जो साथ रहकर नहीं मिलती.

मैं सुबह अलसाए मन से सोकर उठी, क्योंकि आज मेरे रिटायरमेंट का पहला दिन था और मुझे पढ़ाने के लिए स्कूल जाने की जल्दी नहीं थी, इसलिए मेरा मन भी बहुत प्रफुल्लित था. अन्य दिनों के विपरीत जल्दी-जल्दी चाय बनाने की अपेक्षा मैं अपनी बालकनी में जाकर खड़ी हो गई. रातभर बरसात होने के कारण अमलतास और रात की रानी के पेड़ों से पानी टपक रहा था और उनके फूल ज़मीन पर बिखरे हुए थे. दूर-दूर तक सड़कें नहाई हुई लग रही थीं. बौछार के साथ ठंडी-ठंडी हवा और चिड़ियों की चहचहाहट मन को पुलकित कर रही थी. इस दृश्य की अनुभूति मुझे बिल्कुल नई लग रही थी, क्योंकि दस साल पहले इस मकान में आने के बाद जितनी फुर्सत से आज इसका अवलोकन कर रही हूं, इससे पहले कभी नहीं कर सकी.

स्कूल की नौकरी और बेटे समर के पालन-पोषण में घड़ी की सुइयों के अनुसार जीवन बीत रहा था. दृश्य देखने में इतनी खो गई थी कि मेरे पति सुनील के पुकारने की आवाज़ भी मेरे कानों से टकराकर लौट गई थी. हमेशा की तरह वे मुझे ढूंढ़ते हुए बालकनी में आ पहुंचे और बोले, “क्यों भई, आज चाय नहीं मिलेगी क्या? कल तक तो सुबह की चाय मैं ही तुम्हें बनाकर देता था. आज तो तुम भी मेरी तरह रिटायर हो, आज तुम चाय बनाओगी… ठीक है.”

“सच में तुमने यदि सहयोग नहीं दिया होता, तो मेरे लिए नौकरी करना बहुत कठिन था. अब सुबह की चाय मैं ही बनाऊंगी, लेकिन सुबह पांच बजे नहीं, सात बजे, नो रूटीन. कभी थोड़ा जल्दी… कभी थोड़ा लेट, चलेगा? मैं रूटीन से थक गई हूं.”

“हां, ठीक है. रिटायरमेंट का समय मिलता ही है अपने जीवन को अपने अनुसार जीने के लिए. नो वर्क प्रेशर.” इतना कहकर उन्होंने अपनी हथेली फैला दी और मैंने भी उस पर अपनी हथेली ज़ोर से रखते हुए ‘डन’ कहा और हम दोनों खिलखिलाकर हंस दिए.

मैं दो प्याली चाय बनाकर बालकनी में लाई और सुनील को, जो डायनिंग टेबल पर मेरा इंतज़ार कर रहे थे, आवाज़ देकर बुलाया और बोली, “अब हम सुबह की चाय बालकनी में ही लेंगे.” वे मुस्कुराते हुए बैठ गए. मैं जल्दी से उठकर अख़बार उठा लाई और सोचने लगी कि इस बालकनी में, जिसमें अभी तक बेतरतीबी से घर का फालतू सामान रखा था, उसे हटाकर बैठने के लिए दो कुर्सियां और एक मेज़ रखूंगी और यहीं बैठकर चाय पीया करेंगे. नौकरी की आपाधापी में कभी यह ख़्याल आया ही नहीं था. मुझे याद आया कि स्कूल के लिए जाते समय मैं चाय पीती नहीं थी, बल्कि घुटकती थी. वह भी कभी बैठकर और कभी-कभी खड़े-खड़े ही. छुट्टीवाले दिन भी घर के अन्य कार्यों में इतनी व्यस्त हो जाती थी कि आराम से चाय पीने का मौक़ा ही नहीं मिलता था.

मैंने महसूस किया कि बालकनी में चाय पीने का मज़ा ही अलग था. अब चाय घुटकने के स्थान पर उसको चुस्कियों के साथ पीते हुए बाहरी दृश्यों का आनंद लेना अख़बार की ख़बरों को पढ़ते हुए उस पर चर्चा करना, अलौकिक आनंद की अनुभूति दे रहा था, जिसे मैं शब्दों में नहीं बांध सकती.

मैंने लिस्ट बनाई कि किस-किस से मिलने का मन करता था और अब तक  उनसे मिलना टालती रही थी. सबसे पहले मुझे मुंबई में रहनेवाली अपनी बचपन की सखी पूनम का ख़्याल आया. उससे चार साल पहले उसके बेटे के विवाह पर ही मिली थी और विवाह की व्यस्तता के कारण 3 दिन में अधूरे मन से वापिस आना पड़ा था. मैंने झटपट वहां जाने की घोषणा अपने पति और बेटे समर के सामने कर दी और एक हफ़्ते के बाद ही वहां जाने का प्रोग्राम बना लिया. मुझे याद आया कि एक बार जब मेरी मां बीमार थीं, मैं मन मसोस कर रह गई थी, क्योंकि बच्चों के इम्तिहान और अपनी नौकरी के कारण उनको देखने भी नहीं जा पाई थी और वे दुनिया से भी चली गईं. कई बार तो घर पर मेहमान रहते थे और मुझे मजबूर होकर स्कूल जाना पड़ता था. उन दिनों की बेचारगी याद करके मेरा मन कसैला हो गया.

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अभी मुझे पूनम के पास गए दो दिन भी नहीं हुए थे कि समर का फोन आया कि उसकी कंपनी उसे बहुत जल्दी लंदन ट्रांसफर करना चाहती है. मैंने प्रत्युत्तर में ख़ुशी ज़ाहिर की, तो वह बोला, “मैं जानता था कि आप सुनकर ख़ुश होंगी, जबकि आपका और पापा का अपनी पोती और हमारे बिना रहना काफ़ी कठिन होगा और नए सिरे से अपनी ज़िंदगी आरंभ करनी होगी, लेकिन मैं आपको अधिक दिन तक अपने से दूर नहीं रहने दूंगा, जल्दी ही आप दोनों को अपने पास बुला लूंगा. पहले थोड़ा मुझे वहां सेटल होने दीजिए.” इससे पहले कि मैं कुछ उत्तर देती, फोन कट गया.

पूनम के साथ एक हफ़्ता रहकर बहुत आनंद आया. हम दोनों अतीत की यादें ताज़ा करके, मानो उसी युग में पहुंच गए थे. समय के बहाव ने हमारी दोस्ती पर रत्तीभर भी प्रभाव नहीं छोड़ा था. संतुष्ट मन से मैं वापिस दिल्ली आ गई.

समर एक महीने बाद ही अपने परिवार के साथ लंदन चला गया. एक बार तो उसके जाने से हमें झटका लगा कि अकेले कैसे रहेंगे? लेकिन जल्दी ही हमने अपने आपको संभाल लिया. उसके साथ रहते हुए, कुछ कार्यों के लिए अपने को असमर्थ समझकर उस पर आश्रित रहते थे, उसके जाने के बाद उन्हें स्वयं करने के लिए हमारे अंदर नई ऊर्जा का संचार हुआ और हम उसे करने में सक्षम हो गए. कहते हैं ना ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है’. मुझे आरंभ से ही पढ़ने में बहुत रुचि थी, जो विवाह के बाद कभी पूरी नहीं कर पाई थी. अब ऑनलाइन किताबें मंगवाकर पढ़ने में व्यस्त रहने लगी. लाइब्रेरी की मेंबरशिप ले ली. वहां जाने से पढ़ने का शौक़ तो पूरा होता ही था, बहुत से पढ़ने के शौक़ीन लोगों से वहीं जान-पहचान भी हो गई और पुस्तकों के बारे में उनसे चर्चा करने में जहां ज्ञान की वृद्धि होती थी,

वहीं जान-पहचान के लोगों का दायरा भी बढ़ गया था. इंटरनेट पर भी बहुत से परिचित लोगों से कनेक्टेड होने से अकेलेपन का एहसास ही जैसे समाप्त हो गया था. फिल्मों का शौक़ भी मनचाही फिल्में देखने से पूरा हो रहा था. सबसे मिलने-जुलने में और फोन पर लंबी बातें करने में समय कहां बीत रहा था, पता ही नहीं चला. ऐसा लग रहा था जैसे बचपन के केयरफ्री दिन फिर लौटकर आ गए थे. किसी ने सही परिभाषा दी है कि ‘प्रौढ़ावस्था बचपन का पर्याय होता है’.

समर ने कुछ महीनों बाद ही हमारा वीज़ा प्रोसेस करना आरंभ कर दिया और जल्दी ही हमें अपने पास बुला लिया. उसकी सुखी गृहस्थी देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई. जब हमारे साथ रहता था, तब  मुझे अक्सर चिंता होती थी कि वह हमसे इतना अटैच्ड था कि कभी हमारे बिना रह भी पाएगा, लेकिन यह देखकर कि अकेले रहकर वह बहुत स्वावलंबी हो गया था और दैनिक क्रिया-कलाप सुचारु रूप से हो रहे थे. मैंने महसूस किया कि बच्चों में अपने माता-पिता से दूर रहकर ही आत्मनिर्भरता आती है, इसलिए उनसे कुछ समय के लिए दूर रहना भी आवश्यक है. हमें उनके साथ रहते हुए छह महीने बीत गए, तो मुझे इंडिया की याद आने लगी और मैंने समर को जब अपने लौटने की इच्छा बताई, तो वह बोला, “ममा, आप लोग वहां जाकर क्या करेंगे? दूर रहेंगे तो मुझे भी आप लोगों की चिंता रहेगी.”

मैंने प्रत्युत्तर में कहा, “नहीं बेटा, तुम हमारी चिंता बिल्कुल नहीं करो, हमारी वहां की और यहां की जीवनशैली भिन्न होते हुए भी अपनी जगह दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण हैं और मैं दोनों में से पूर्णरूप से किसी से भी कटकर नहीं रहना चाहती. यहां कुछ महीनों के लिए तुम लोगों के साथ रहकर तुम्हारे जीवन-चर्या के अनुसार ज़िम्मेदारी-मुक्त होकर जीने का अलग ही आनंद है. मैं  हमेशा के लिए तुम्हारे साथ रहकर तुम्हारी ज़िम्मेदारियों को बढ़ाना नहीं चाहती, इसलिए इंडिया में रहकर अपना जीवन, अपनी दिनचर्या के अनुसार भी जीना चाहती हूं. बेटा बुरा मत मानना, मैं यह भी चाहती हूं कि हर लड़की की तरह गीता भी अपना घर अपनी इच्छानुसार सजाने-संवारने का अपना सपना पूरा करे और तुम भी अपने परिवार की ज़िम्मेदारी हमारे बिना संभालते हुए अपना जीवन स्वतंत्र रूप से अपनी इच्छानुसार जीयो और हमें भी जीने दो. तुम्हें जब भी हमारी ज़रूरत होगी, हम तुरंत तुम्हारे पास आ जाएंगे.” मैंने दृढ़ स्वर में जब अपना प्रस्ताव समर के सामने रखा और सुनील ने भी उस पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगा दी, तो उसे मेरी बात अधूरे मन से माननी पड़ी.

हम वापिस इंडिया आ गए और अपने रूटीन के अनुसार तनावरहित जीवन जीने लगे. हमें अपने स्वास्थ्य के लिए भी टहलने  और व्यायाम करने का भरपूर समय मिलता था. मैं सोचती थी कि समर लंदन चला गया, तो हमें अकेले रहने का मौक़ा मिला, लेकिन इंडिया में एक शहर में रहते हुए भी बेटा-बहू से अलग रहा जाए, तो क्या बुराई है? जिसके लिए समाज की प्रतिक्रिया तो नकारात्मक ही होगी. अब समय के बदलाव के अनुसार ज़रूरत है हमें हमारी सोच बदलने की, क्योंकि अब बच्चों की और प्रौढ़ लोगों की जीवनशैली में इतना अंतर आ गया है कि दोनों को ही साथ रहने में असुविधा होती है. हर उम्र में हरेक को अपने निजी जीवन को अपनी इच्छानुसार जीने के लिए स्वतंत्रता चाहिए होती है, जो साथ रहकर नहीं मिलती. इसका दूसरा सकारात्मक परिणाम यह है कि दोनों पीढ़ियों के पास दो घर हो जाते हैं और जब भी बदलाव का मन हो, तो एक-दूसरे के घर आ-जा सकते हैं और बच्चे भी आत्मनिर्भर होकर अपनी ज़िम्मेदारी संभालना सीख जाते हैं.

मुझे याद आया कि जब मेरे रिटायर होने  में कुछ महीने ही शेष रह गए थे, तब मेरी कलीग मिसेज़ पारीख बोलीं, “मैं भी अगले साल रिटायर हो जाऊंगी, आपके साथ तो आपका बेटा रहता है, इसलिए आपको घर में अकेलापन नहीं लगेगा. मेरी तो एक बेटी ही है, उसकी भी शादी हो गई है. मैं अकेले कैसे रहूंगी?”

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मैंने उनको जवाब दिया था, “हमारे उम्र के इस पड़ाव तक आते-आते बेटा हो या बेटी, दोनों ही अपने-अपने जीवन में व्यस्त हो जाते हैं. बेटी विवाह के कारण दूर जा सकती है, तो बेटा भी नौकरी के कारण हमसे दूर जा सकता है, यह सब स्वाभाविक है. ऐसा तो कभी न कभी होना ही है. यह जानते हुए भी हम अपने को ख़ुश रखने के लिए अपने बच्चों पर आश्रित रहते हैं, तो रिटायरमेंट के बाद का समय हमारे लिए अभिशाप बन जाता है. इसलिए आत्मनिर्भर रहकर अपने को ख़ुश रखने के अन्य रास्ते तलाशने चाहिए. अपनी दबी हुई इच्छाओं को पूरा करने का सुनहरा मौक़ा रिटायरमेंट के बाद ही मिलता है. वह हम बिना किसी पर आश्रित रहकर ही पूरा कर सकते हैं.” उन्हें मेरी बातें व्यावहारिक ना लगकर मात्र उपदेश लगीं. प्रत्युत्तर में बोलीं,  “ठीक है. आपका वह समय भी जल्दी ही आनेवाला है, तब देखूंगी…” और अब वह समय आ ही गया.

मेरे इंडिया पहुंचने पर वे मुझसे मिलने आईं और मेरे चेहरे की चमक देखकर हतप्रभ होकर बोलीं, “मैं तो समझी, अब तुम वहीं रहोगी!” तो मैं उनकी बात पूरी होने से पहले ही बोली, “देखो जो मैं कह रही थी, उसे मैंने सच कर दिखाया. मैं यहां अकेले बहुत ख़ुश हूं, ऐसा लग रहा है, जैसे कि मेरे नए पंख उग आए हैं और मैं जहां चाहूं उड़ सकती हूं.” मेरी बात सुनकर वे बोलीं, “सच में मैंने तो हमेशा लोगों को रिटायरमेंट के बाद बीमारियों का रोना रोते ही देखा है. आपसे मिलकर मुझे इस उम्र को जीने की कला सीखने को मिली है. आपका बहुत धन्यवाद.”

“वास्तव में ऐसे लोगों का शरीर बीमार नहीं होता, उनकी सोच बीमार होती है. वे अपने को बूढ़ा सोचकर अपने को असहाय और अक्षम मान लेते हैं और अपने शेष जीवन को जीने का एकमात्र उद्देश्य मृत्यु की प्रतीक्षा करना ही समझने लगते हैं. उनकी इस नकारात्मक सोच का प्रभाव उनके शरीर पर भी पड़ता है. उम्र के अनुसार शरीर पर बाहरी बदलाव तो आता है, लेकिन हमारी सोच हमारी बढ़ती उम्र के प्रति सकारात्मक हो, तो उसका प्रभाव हमारे मन पर कभी नहीं पड़ता. मन हमेशा उमंग से भरा होना चाहिए, उम्र को अपने मन पर कभी हावी नहीं होने देना चाहिए और यह कला मुझे भी अपने आप नहीं आई, मैंने भी किताबें पढ़कर सीखी है. एक किताब में मैंने पढ़ा था, जब तुम अपनी सोच को नियंत्रित कर लेते हो, तो अपने मस्तिष्क में आए विचारों को भी नियंत्रित कर लेते हो और जब तुम अपने मस्तिष्क में आए विचारों को नियंत्रित कर लेते हो, तो अपने जीवन को भी नियंत्रित कर लेते हो… इस बात का प्रभाव मुझ पर जीवनपर्यंत रहा और मेरी जीवन के प्रति सोच ही सकारात्मक हो गई.” मेरी बात सुनकर मिसेज़ पारीख के चेहरे की प्रतिक्रिया ऐसे लग रही थी, जैसे कि मैंने जीवन के चौथे पड़ाव को ख़ुशी से जीने की कला ही उन्हें सिखा दी हो.

         सुधा कसेरा


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कहानी- चेस्ट ऑफ ड्रॉअर (Short Story- Chest Of Drawer)

Hindi Kahani

विवाह के शुरुआती दिनों में वह अजीत के बारे में, उसके काम के बारे में, उससे मिलने-जुलनेवालों, सहयोगियों के बारे में पूछने, जानने में संकोच करती थी. अब वह अजीत के हर पहलू से जुड़ना चाहती है, पर कैसे जुड़े. अपनी दराज़ पर तो अजीत ने ताला लगा रखा है.

काम ख़त्म होने के बाद ज़रा कमर सीधी करने के ख़्याल से अर्पिता कमरे में आकर पलंग पर लेट गई. सुबह पांच बजे से उठकर जो गृहस्थी के कामों में लगती है, तो बारह-एक बजे जाकर सबसे ़फुर्सत मिलती है. तब तक कमर बुरी तरह से दुखने लगती है. साइड टेबल से एक पत्रिका उठाकर अर्पिता लेटे-लेटे ही उसके पन्ने पलट रही थी कि उसे याद आया, बेटी अनु को जल्दी ही स्कूल में अपना प्रोजेक्ट जमा करना है और उसके कुछ ज़रूरी काग़ज़ और चित्र मिल नहीं रहे थे. वो तीन-चार दिनों से अर्पिता से बोल रही थी कि ढूंढ़कर रख दे, लेकिन उसे ध्यान ही नहीं रहता.

बच्चे स्कूल से आकर खाना खाते हैं और पढ़ाई करने बैठ जाते हैं, वो उनका होमवर्क करवाती है और शाम को रसोई में लग जाती है. बस दिन ख़त्म. अनु रोज़ स्कूल जाते हुए उसे याद दिलाती है कि आज काग़ज़ ढूंढ़ देना. अर्पिता को कोफ़्त हुई. पढ़ाई के नाम पर पता नहीं क्या-क्या बेकार के काम करवाते रहते हैं ये स्कूलवाले. मैगज़ीन एक ओर रखकर वह उठ गई. दरवाज़े की आड़ में चार ड्रॉअरवाला चेस्ट ऑफ ड्रॉअर रखा था. चारों के एक-एक ड्रॉअर थे, जिनमें उनका महत्वपूर्ण सामान रखा था. एक ड्रॉअर में अर्पिता का, एक में बेटी अनु का, एक में बेटे अरु का और एक में अजीत का.

अर्पिता दूसरे नंबर का ड्रॉअर खोलकर अनु के काग़ज़ ढूंढ़ने लगी. पांच-सात मिनट में ही उसे प्रोजेक्ट के लिए ज़रूरी काग़ज़ और चित्र मिल गए. अभी तो बिटिया बस छठवीं में ही है, लेकिन प्रोजेक्ट के नाम पर क्या कुछ नहीं बनाना पड़ता है. काम के काग़ज़ निकालकर उसने अलग रखे और ड्रॉअर बंद कर दिया. आकर दुबारा पलंग पर लेट गई, तो नज़र एकबारगी फिर से चेस्ट ऑफ ड्रॉअर पर चली गई.

पिछले कुछ महीनों से अपने बारे में सोचते हुए उसे बहुत साल पहले पढ़ी हुई कहानी ‘बंद दराज़ों का साथ’ याद आ जाती. वह भी तो ऐसे ही दराज़ों के साथ जी रही है, जो अपने आप में अपने-अपने रहस्यों को छुपाकर जी रहे हैं.

कहने को चेस्ट ऑफ ड्रॉअर एक ही होता है, लेकिन उसके हर दराज़ में अलग-अलग सामान भरा होता है. किसी भी दराज़ को पता नहीं होता है कि दूसरे के अंदर क्या भरा है, जबकि ऊपर से देखने पर वे एक ही आलमारी के हिस्से दिखाई देते हैं.

उसका और अजीत का रिश्ता भी तो पिछले कुछ महीनों से ऐसा ही हो गया है. अजीत का देर से घर आना, पूछने पर टाल जाना, अपने आप में खोया रहना… यह सब देखकर अर्पिता भी अपने आपमें व अपने बच्चों में सिमट गई.

अर्पिता को इस चेस्ट ऑफ ड्रॉअर से हमेशा चिढ़ होती, क्योंकि यह रहस्य छुपानेवाला और अपने खोल में सिमटा हुआ-सा प्रतीत होता है. उसे आलमारी ज़्यादा अच्छी लगती. दरवाज़ा खोला और सारा सामान आंखों के सामने. कोई दुराव-छुपाव नहीं. सब कुछ खुला, जीवन और रिश्ते भी ऐसे ही होने चाहिए. स्पष्ट, खुले हुए, कहीं कोई अलगाव व  कोई रहस्य नहीं.

इधर कुछ दिनों से अजीत की व्यस्तता और ज़्यादा बढ़ गई थी. अब तो बहुत ज़रूरी बातें ही बड़ी मुश्किल से हो पाती थीं. नौकरी में तो काम के बंधे हुए घंटे ही होते हैं. सप्ताह में एक दिन की छुट्टी होती है, लेकिन व्यवसाय में तो वह भी नहीं. याद नहीं आ रहा कि पिछला कौन-सा रविवार पूरे परिवार ने साथ में गुज़ारा था. बच्चे तो कभी-कभी पूरे हफ़्ते ही अजीत को देख नहीं पाते हैं. रविवार की सुबह ही बच्चों की अजीत से मुलाक़ात हो पाती है.

अर्पिता ने मैगज़ीन एक ओर रख दी. पढ़ने में अब ध्यान नहीं लग रहा था. मन विचारों के कंटीले तारों में उलझ गया. एक-एक कर कई ख़्याल मन में आने लगे. क्यों कोई पुरुष ऐसा होता है… अपने खोल में सिमटा हुआ, सारी बातों को अपने अंदर दबाकर, छुपाकर रखनेवाला, कितना पराया लगने लगा है अजीत आजकल.

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जब नई-नई शादी हुई थी, तो एक-दूसरे को समझने की कोशिशों में ही दिन चुक गए. जब समझने लगे, तो एक-दूसरे की पसंद-नापसंद के अनुसार अपने आपको ढालने में कुछ समय और आगे सरक गया. जब ढलने लगे, तो बीच में संतान का आगमन. दोनों अपने कर्त्तव्य पूर्ति में लग गए. अजीत व्यवसाय में व्यस्त होते गए और अर्पिता दोनों बच्चों की परवरिश में. जो रिश्ता एक खुली आलमारी की तरह था, स्पष्ट था, उसमें

धीरे-धीरे न जाने कब अलग-अलग दराज़ें बनती गईं और वो खानों में बंटते गए.

विवाह के शुरुआती दिनों में वह अजीत के बारे में, उसके काम के बारे में, उससे मिलने-जुलनेवालों, सहयोगियों के बारे में पूछने, जानने में संकोच करती थी. अब वह अजीत के हर पहलू से जुड़ना चाहती है, पर कैसे जुड़े. अपनी दराज़ पर तो अजीत ने ताला लगा रखा है. बच्चे बड़े हो गए, तो अर्पिता भी ज़िम्मेदारियों से थोड़ा हल्की हो गई. अब वह अजीत के साथ आत्मीय होना चाहती है, उसके साथ खड़े होकर अपने दोनों बच्चों को हंसते-खेलते देखना चाहती है, लेकिन अब अजीत के पास समय नहीं है.

अर्पिता ने एक गहरी सांस ली. क्या सभी के रिश्ते ऐसे ही होते हैं. आलमारी के खुलेपन और पारदर्शिता से शुरू होकर चेस्ट ऑफ ड्रॉअर की तरह रहस्यमयी, चीज़ों को छुपानेवाले बंद दराज़ों पर जाकर ख़त्म होनेवाले या स़िर्फ उसका और अजीत का ही रिश्ता ऐसा हो गया है. अर्पिता आंखें बंद करके अपना ध्यान दूसरी ओर लगाने का प्रयत्न करने लगी, लेकिन मन में उन्हीं विचारों का झंझावात चलता रहा. उसका सर भारी होने लगा.

थोड़ी ही देर में अनु और अरु आ गए. बच्चों के कपड़े बदलवाकर उन्हें खाना खिलाया और फिर दोनों अपनी दिनभर की रामकहानी

सुनाने लगे. एक-दूसरे को चुप करवा-करवाकर अपनी बातें बताने लगे. अर्पिता को हंसी आ गई. वह अनु की बात सुनती, तब तक अरु उसका चेहरा अपनी ओर घुमाकर उसे कुछ बताने लगता. वह अरु की सुनती, तो अनु बीच में ही अपनी कहने लगती. दोनों जब तक उसे स्कूल की एक-एक बात नहीं बता देते, उन्हें चैन नहीं आता. अर्पिता सोचती बड़े भी ऐसे क्यों नहीं होते. मुक्त मन से अपना अंतर खोलकर रख देने वाले.

बच्चों को आज कोई होमवर्क नहीं था, तो अर्पिता अनु का प्रोजेक्ट बनवाने लगी.

कुछ महीने और आगे सरक गए. अजीत और भी अधिक व्यस्त हो गया था. आजकल तो वह अर्पिता से आंखें भी कम ही मिलाता था. ऐसा लगता, जैसे कोई चोरी पकड़े जाने से डर रहा हो या अंदर का कोई भेद छुपा रहा हो. दरवाज़े के पीछे रखे चेस्ट ऑफ ड्रॉअर के प्रति अर्पिता की चिढ़ अब गहरी उदासीनता में बदल गई थी. शायद ऐसा ही होता है, कुछ रिश्ते डोर टूटने पर इतनी दूर चले जाते हैं कि उनके साथ स्नेह तो क्या, क्रोध के धागे भी टूट जाते हैं और फिर व्यक्ति उनकी ओर से सारी भावनाएं ख़त्म कर तटस्थ होकर उदासीन हो जाता है.

एक रोज़ बच्चों को स्कूल भेजने के बाद अर्पिता की नज़र कैलेंडर पर गई. उसे ध्यान आया, आज तो उसके विवाह की सालगिरह है. पिछले आठ दिनों से तो अजीत इतने अधिक व्यस्त रहे कि बस कुछ घंटे सोने के लिए ही घर आते थे. बेचैनी से आवाज़ धीमी करके न जाने किससे बातें करते रहते थे. आज तो बहुत ही जल्दी घर से चले गए.

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अर्पिता ने कैलेंडर से नज़रें फेर लीं. अब उनके जीवन में वैसे भी इस तारीख़ का क्या महत्व रह गया है. दराज़ों में न जाने

क्या-क्या जमा हो गया था. ऊपर से सब साफ़, दबा-ढंका दिखता था, लेकिन अंदर…

अंदर सब कुछ अस्त-व्यस्त, ठुंसा हुआ, रात अजीत बहुत देर से घर आए. बच्चे सो गए थे. अर्पिता ने उसे खाना परोसा, खाना खाकर दोनों अपने कमरे में आ गए.

“शादी की सालगिरह मुबारक हो.” अजीत ने एक लिफ़ाफ़ा अर्पिता के हाथ में थमाते हुए बहुत कोमल स्वर में कहा.

अर्पिता चौंक गई. उसने तो उम्मीद ही नहीं की थी कि अजीत को आज का दिन याद होगा.

“इसमें क्या है?” लिफ़ाफ़ा हाथ में लेते हुए उसने पूछा.

“इसमें तुम्हारा घर है.” अजीत ने मुस्कुराते हुए कहा. आज उसके चेहरे पर लंबे समय बाद वही निश्छल और सहज मुस्कान तैर रही थी.

“मेरा घर? मैं समझी नहीं.” अर्पिता ने आश्‍चर्य से कहा.

“मेरे पास बैठो अर्पिता, मैं आज तुम्हें सारी बातें सच-सच बताता हूं.” कहते हुए अजीत ने उसे अपने पास पलंग पर बिठा दिया.

“दरअसल, सालभर पहले मुझे व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए और कुछ नए इन्वेस्टमेंट करने के लिए बहुत से पैसों की ज़रूरत पड़ी. मेरे पास और कोई चारा नहीं था, तो मैंने अपना घर गिरवी रखकर बैंक से पैसे उधार लिए.

मैं जानता हूं तुम्हें अपने घर से कितना प्यार है. तुम बच्चों की तरह अपने घर को सहेजती हो. एक-एक वस्तु को प्यार और अपनेपन से संभालती हो, इसलिए मैं दिन-ब-दिन अपराधबोध से घिरता जा रहा था और तुमसे आंखें मिलाने की भी हिम्मत नहीं कर पाता था. अपने मन में मैं अपने आपको तुम्हारा गुनहगार महसूस करता. मन में हर पल बस एक ही धुन समाई रहती कि जल्द से जल्द अपने घर को मुक्त करवाऊं, इसलिए रात-दिन काम में डूबा रहता. इस बीच व्यवसाय में बहुत उतार-चढ़ाव आए. तनावपूर्ण स्थितियां उत्पन्न हुईं, लेकिन ईश्‍वर के आशीर्वाद से अंत में जाकर सब ठीक हो गया. आज अपने घर के काग़ज़ वापस मिल गए. व्यवसाय प्रगति कर रहा है और सब कुछ अच्छा चल रहा है.

मैं देख रहा था महीनों से तुम उपेक्षित और अकेला महसूस कर रही थी. मेरा मन अंदर से छटपटाता रहता, लेकिन सारी परेशानियां बताकर मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाहता था.”

“ओह अजीत.” अर्पिता की आंखों से आंसू बह रहे थे. वह अजीत के गले लग गई. अजीत उसकी पीठ सहलाते हुए बोले, “मेरे पास तुम्हारे लिए एक और तोहफ़ा है. बहुत दिनों से हम साथ नहीं रहे न. मैंने कई दर्शनीय शहरों में होटल बुक करवा लिए हैं और टिकट भी आ गई हैं. तीन दिन बाद हम चारों पंद्रह दिनों के लिए बाहर घूमने जा रहे हैं.”

“सच अजीत? मैं अभी बच्चों को उठाकर उन्हें ये ख़ुशख़बरी सुनाती हूं.” अर्पिता ख़ुशी से चहकते हुए बोली. उसने तुरंत जाकर बच्चों को उठाया और उन्हें बताया. दोनों बच्चे अपने माता-पिता के पास चहकने लगे. अर्पिता अजीत के सीने से लग गई. बच्चे दोनों से लिपट गए. अर्पिता की नज़रें दरवाजे के पीछे की ओर गईं. आज उसे पहली बार एहसास हुआ दराज़ें रहस्य नहीं छुपातीं, वे तो अपने अंतर में सारी अस्त-व्यस्तता और दर्द को समेट लेती हैं, ताकि दूसरों को तकलीफ़ न हो.

पति भी ऐसे ही होते हैं, जो दराज़ बनकर सारी परेशानियों को, मुसीबतों को, दर्द को अपने अंदर छुपा लेते हैं, ताकि उनके प्रियजनों पर दुख की छाया भी न पड़े और घर ख़ुशहाल रहे. अर्पिता ने एक आभार भरी मुस्कान से चेस्ट ऑफ ड्रॉअर को देखा और धीरे से कहा ‘धन्यवाद.’

Dr. Vineeta Rahurikar

   डॉ. विनीता राहुरीकर

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कहानी- इस्तेमाल (Short Story- Istemaal)

Hindi Short Story

मनोरंजन के लिए तोते और मैना को पिंजरे में कैद किया जाता है, मछलियों को एक्वेरियम में कि मछलियां देखने से तनाव दूर होता है. लोग अपनी सुख-सुविधा के लिए पशु को स़िर्फ और स़िर्फ इस्तेमाल करते हैं, हिफ़ाज़त नहीं करते.

रोज़ की तरह वे सुबह जल्दी उठ गए. पुलिस विभाग की नौकरी ने जल्दी उठने की जो आदत डाल दी है, वह सेवानिवृत्ति के बाद भी कायम है. मधु मालती की छतनार बेल पर रातभर सोई समूहभर चिड़िया, चहकते हुए मानो प्रभाती गा रही थीं. वे चिड़ियों के चहकने पर तब ध्यान नहीं देते थे. पुलिस विभाग की नौकरी और दौरे की व्यस्तता में न ठीक से खा पाते थे, न नींदभर सो पाते थे. चिड़ियों के चहकने जैसे छोटे-छोटे उपक्रमों पर ध्यान देने का अवकाश उन्हें कभी नहीं मिला. इन दिनों उनका चहकना सुना करते थे. सोचते थे, किस कार्य प्रयोजन के लिए चिड़िया इतना चहकती हैं? अपने अस्तित्व के लिए, अधिकार के लिए, आवश्यकता के लिए, आज़ादी के लिए या यूं ही. वे अपने आप में मुस्कुरा दिए.

पक्षी जगत के बारे में इतना क्यों जानना-सोचना चाहते थे? जब से उनके कमरे के रोशनदान में चिड़िया के एक जोड़े ने घोंसला बनाया था, वे चिड़िया के प्रति काफ़ी संवेदनशील हो गए थे. चिड़िया उन्हें आकर्षित करती थी. उन्हें कोई कल्पना नहीं थी कि आंत के बड़े ऑपरेशन के कारण बिस्तर पर समय बिताएंगे और गौरैया समय बिताने का साधन बनेगी. कार्यकाल में सोचा करते थे सेवानिवृत्ति के बाद ख़ूब खाएंगे, ख़ूब सोएंगे और इत्मीनान से रहेंगे. अब जब बिस्तर पर शिथिल पड़े थे, लग रहा था बिना किसी कार्य और व्यस्तता के बिस्तर पर समय बिताना बहुत बड़ी सज़ा है. अस्पताल से घर आए, तब कुछ दिन परिचित-नातेदार देखने आते थे. अब नहीं आते. एक ही ग्रामीण बैंक में कार्यरत पुत्र अमृत और पुत्रवधू वृंदा ने उनकी सेवा के लिए काफ़ी छुट्टी ली, लेकिन अब नौकरी पर जाना ज़रूरी था. पोता जोश स्कूल और गृहकार्य में लगा रहता था. पत्नी गृहस्थी के बिखराव को समेटती रहती थी. अब वे थे, सेवानिवृत्ति थे, बीमारी, बिस्तर, परहेज़ी खाना, दवाइयां और खाली समय था. और सहसा उनका ध्यान घोंसले की ओर गया. पत्नी उनके कमरे की सफ़ाई करते हुए ग़ुस्सा हो रही थी, “चिड़िया रोशनदान में घोंसला बना रही है. कचरा फैला रही है, जबकि मरीज़ का कमरा साफ़ रहना चाहिए.”

उन्होंने निर्मित हो रहे घोंसले को देखा. इस बुद्धिमान चिड़िया ने उनकी अनुपस्थिति का अच्छा लाभ लिया. खाली कमरा देखकर कब्ज़ा जमाने लगी.

पत्नी ने चिड़िया को भगाने की तमाम कोशिश की, लेकिन ज़िद्दी चिड़िया ने घोंसला बनाकर ही दम लिया. वे कमरे में आती-जाती नर और मादा गौरैया की गतिविधि पर ध्यान देने लगे. चिड़िया की गतिविधि देखना उन्हें अच्छा लगने लगा. चिड़िया के व्यवहार पर सोचने लगे. यह मामूली-सा पक्षी घोंसला बनाने के लिए स्थान किस तरह चुनता होगा? इतना साहस कहां से लाता होगा कि पत्नी के दख़ल देने पर इधर-उधर उड़कर बार-बार रोशनदान पर आ जाता है और घोंसला बनाने लगता है. किस तरह मनुष्य के साथ रहने की आदत डाल लेता है कि घर का एक कोना अपना बना लेता है. इच्छा होती बर्ड वॉचर होते, तो चिड़ियों के संसार को थोड़ा-बहुत समझ पाते. वैसे इतना समझ गए थे कि पक्षी बड़ों और बच्चों में फ़र्क़ करना जानते हैं. चिड़िया जोश के समीप आकर जिस तरह चावल के कण उठा लेती, उनके समीप नहीं आती. इसे जोश की समीपता में वैसा जोखिम नहीं लगता, जिस तरह बड़ों की आहट होने पर लगता था. उन्हें आजकल चिड़िया की चर्चा करना बहुत अच्छा लगने लगा था. जोश को जब से उन्होंने घोंसला दिखाया था, वह चिड़िया और घोंसले को देखने के लिए कई मर्तबा उनके कमरे में आता था. उनके कमरे में पढ़ता था, नाश्ता करता था, खाना खाता था. अक्सर चावल, पोहा या रोटी का टुकड़ा फर्श पर फैला देता था. पहले चिड़िया झिझकती थी, अब जोश के बहुत समीप आकर चावल चोंच में उठा ले जाती थी और सुरक्षित जगह पर बैठकर खाती थी. जोश कटोरी में पानी भरकर कटोरी को स्टूल पर रख देता, पर चिड़िया पानी नहीं पीती. जोश हैरान होता, “दादू, चिड़िया को प्यास नहीं लगती?”

वे हंसते, “जोश, मुझे लगता है कि चिड़िया की नज़र कटोरी पर नहीं पड़ी है. यह भी हो सकता है कि उसे मालूम न हो कि पानी उसके लिए रखा है.”

“हो सकता है बगीचे की हौज के पास जिस छोटे गड्ढे में पानी भरा रहता है, वहां पी लेती हो.” उन्होंने जोश की बात का अनुमोदन किया, “ठीक कहते हो.”

हौज के नल से बूंद-बूंद पानी रिसकर एक छोटे गड्ढे में भर जाता था. कभी-कभी वे बिस्तर पर बैठकर खिड़की से बाहर का नज़ारा देखते. गड्ढे में भरे पानी में कुछ चिड़िया पंख फड़फड़ाकर अपनी देह को गीलाकर पानी में खेलतींं. देर तक उनका सामूहिक स्नान चलता. वे बिल्कुल नहीं पहचान पाते घोसला बनानेवाली दो चिड़िया कौन-सी हैं. इतना ज़रूर जान गए थे कि काले गाढ़े चित्तिदार पंखवाली नर चिड़िया होती है, भूरे चित्तिदार पंखवाली मादा चिड़िया. सोचते, चिड़िया की तरह मनुष्य भी एक जैसे रंग-रूप, कद-काठी के होते, तो सबको भेदभाव मुक्त समान अवसर, स्थिति और महत्व मिलता. समानता के बावजूद लोग अपने परिवार के सदस्यों को पहचान लेते, जैसे ये पक्षी अपने जोड़े को पहचान लेते हैं. उन्होंने जोश को दृश्य दिखाया, “जोश, चिड़िया मज़े से नहा रही हैं. तुम नहाने में सुस्ती दिखाते हो, रोते हो.”

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“दादू, मैं भी चिड़िया की तरह रोज़ नहाऊंगा. रोऊंगा नहीं.”

वे अचरज में थे. चिड़िया से प्रेरित होकर जोश सचमुच रोज़ नहाने लगा.

चिड़िया दिनभर कमरे में आती-जाती. कभी सीलिंग फैन पर बैठती, कभी रोशनदान पर, कभी दरवाज़े पर, कभी चावल खाने के लिए फ़र्श पर. चिड़िया को क्षति न पहुंचे, इसलिए वे गर्मी सह लेते, लेकिन पंखा नहीं चलाते. पत्नी उनकी तरह चिड़िया को लेकर सतर्क नहीं थी. उनके कमरे में आते ही पंखा चला देती. वे सतर्क हो जाते, “बंद करो. चिड़िया पंखे से कटकर मर जाएगी.”

“चिड़िया की बड़ी फ़िक्र है. हमसे गर्मी नहीं सही जाती.”

“दूसरे कमरे में जाकर पंखा चला लो. मुझे लगता है चिड़िया अंडे दे चुकी है. देखो न, कितना चौकस होकर इधर-उधर देखती है. जैसे डरती है कि कोई घोंसले को नुक़सान पहुंचा सकता है.”

“तुम चिड़िया की फ़िक्र करो. मैं गर्मी में नहीं बैठूंगी.”

पत्नी चली जाती. वे पत्नी के जाने का बुरा नहीं मानते थे. उन्हें चिड़िया की सुरक्षा अधिक ज़रूरी लगने लगी थी. वे दोपहर का खाना खाकर झपकी ले रहे थे कि चिड़िया के तेज़ स्वर और फड़फड़ाने से झपकी टूट गई. देखा नर और मादा चिड़िया में लड़ाई हो रही थी. कभी दोनों एक-दूसरे पर चोंच से आघात करतीं, कभी पीछा करते हुए इधर-उधर उड़तीं. इसी उपक्रम में मादा चिड़िया उनके बिस्तर पर आ गिरी. उन्होंने चिड़िया की प्रत्येक गतिविधि की तरह इस लड़ाई का भी एक कारण ढूंढ़ लिया. जिस तरह हर मां अपने बच्चे को लेकर बेहद सतर्क रहते हुए पिता पर कम सतर्क होने का आरोप लगाती है, शायद उसी तरह मादा चिड़िया का नर चिड़िया से विवाद हुआ होगा और लड़ पड़ी होगी. चिड़िया कुछ क्षण स्तब्ध बैठी रही. जैसे महसूस कर रही हो कि सुरक्षित है या नहीं. उन्होंने सुरक्षित होने का बोध कराने के लिए चिड़िया को पुचकारा. पुचकार का दुष्प्रभाव पड़ा. चिड़िया भयभीत होकर पूरी ताक़त लगाकर उड़ी और रोशनदान पर बैठ गई. दृश्य देख रही नर चिड़िया बिजली के तारवाली पट्टी के कोने, जहां रात को सिकुड़कर सोती थी, में जाकर बैठ गई.

वे बारी-बारी से दोनों को देखने लगे. चिड़िया के इस जोड़े को मालूम न होगा उनकी दिनचर्या में वह किस कदर शुमार हो गए थे.

बीमारी के उबाऊ दिन कुछ आसान हो गए थे. चिड़िया से अनाम संबंध बन गया था. पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ते थे, गौरैया की संख्या कम होती जा रही है. पेड़ काटकर, मच्छरों की रोकथाम के लिए घर के दरवाज़ों, खिड़कियों, रोशनदानों में मज़बूत जाली लगवाकर इनके घर के भीतर आने के रास्ते बंद किए जा रहे हैं. जब वे छोटे थे गांव में टिटहरी, पोड़की, महोखा, हुदहुद, पता नहीं कितने क़िस्म की चिड़िया आसपास रहती थीं.

जोश लुप्त होती जा रहीं इन चिड़ियों का नाम नहीं जानता या क़िताब में छपे चित्रों की सहायता से जानता था, जबकि चिड़िया की गतिविधि देखते हुए उन्हें लगने लगा है कि पशु-पक्षी न रहेंगे, तो कुछ भी सुंदर और सुरम्य न रहेगा. चिड़ियों का चहकना कितना आनंद देता है. बिल्कुल संगीत की तरह. वे आंखें मूंदकर तब तक शांत पड़े रहते थे, जब तक कि चिड़िया चहकना रोककर दानों की तलाश में इधर-उधर उड़ नहीं जाती.

“उठोगे नहीं क्या? सात बज रहा है.” पत्नी कमरे में आई, तो उन्हें लगा चिड़िया और उनके बीच का कोई सूत्र छूट रहा है. बोले, “जाग रहा हूं. चिड़ियों का चहकना सुन रहा था.”

“आजकल आप चिड़िया के अलावा कुछ नहीं सोचते. चलो ब्रश कर लो.”

“जोश जाग गया?”

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“नहीं. आज इतवार है. अमृत, वृंदा, जोश सब तानकर सो रहे हैं. अरे हां, अमृत के बॉस शाम को आपको देखने आ रहे हैं. मैं कमरा ठीक कर दूं. जोश का स्कूल बैग, क़िताबें, खिलौने सब यूं ही पड़े रहते हैं. चादर कितनी गंदी हो गई है.”

वे उठ गए, “चादर बदल दो. कमरा साफ़ रहे, तो मन ख़ुश रहता है.”

वे नहीं जानते थे कि पत्नी कमरा साफ़ नहीं कर रही है, बल्कि उनका दिल तोड़ दे रही है. फ्रेश होकर लौटे, तो देखा कि कमरे का परिदृश्य ही बदला हुआ था. पहली बार जाना कि परिदृश्य बदलने के लिए कुछ क्षण ही बहुत होते हैं. पत्नी ने बांसवाले लंबे झाड़ू से कमरे के जाले साफ़ करते हुए घोंसले को भी धराशायी कर दिया था. सुडौल घोंसला करुण तरी़के से फर्श पर छितराया पड़ा था. पास ही गुलाबी पारदर्शी त्वचावाले दो बच्चे निस्पंद पड़े थे. दो छोटे मांस पिंड. दुनिया में पूरी तरह आने से पहले विदाई. दोनों चिड़िया पूरी ताक़त से चीखकर सामर्थ्यभर विरोध कर रही थीं. वे जितना चीखना चाहते थे, स्तब्धता में नहीं चीख सके, “क्या किया? छोटे-से घोंसले से तुम्हें इतनी परेशानी थी?”

चिड़िया के बच्चों की दशा देख पत्नी को स्वाभाविक रूप से दुख हो रहा था, लेकिन अपनी चेष्टा को वाजिब ठहराते हुए बोली, “परेशानी थी. चिड़िया गंदगी फैलाती थी. कमरे में जहां-तहां

घास-फूस पड़े देख अमृत के साहब क्या सोचते? और फिर मैं नहीं जानती थी कि घोंसले में बच्चे होंगे.”

“चिड़िया ने मेहनत से घोंसला बनाया था. बच्चों के लिए दिनभर चिंतित रहती थी. तुमने सब ख़त्म कर दिया. देख रही हो, दोनों चिड़िया कितनी व्याकुल हैं?”

“कहा तो, नहीं जानती थी कि घोंसले में बच्चे होंगे. तुम आजकल चिड़िया के अलावा कुछ नहीं सोचते हो. वृंदा कह रही थी कि तुम्हारे कारण जोश पढ़ाई छोड़कर चिड़िया के पीछे बौराया रहता है.”

वे कहना चाहते थे- ‘चिड़िया थोड़े-से तिनके ही तो फैलाती थी. यह इतना बड़ा अपराध नहीं है कि इसकी प्रजाति को ख़त्म कर दिया जाए. चिड़िया का यह जोड़ा न होता, तो लंबी बीमारी के ये लंबे दिन बिताना मेरे लिए कठिन होता.’ नहीं कह सके. कह देते तो पत्नी कहती कि अपने दिमाग़ का इलाज कराओ. चिड़िया तुम्हारे दिमाग़ में घुस गई है. वे शिथिल होकर बिस्तर पर बैठ गए. यहां अभी-अभी दो बच्चों की मौत हुई थी. वे पूरी तरह विचलित थे, ठीक चिड़िया की तरह. चिड़िया क्रंदन कर रही थी. वे सोच रहे थे- ‘पशु-पक्षी पर्यावरण को संतुलित रखने में योगदान देते हैं. हम मनुष्य समझकर भी नहीं समझना चाहते. कहीं मांसाहार के लिए इन्हें मारा जा रहा है, कहीं अभयारण्य बनाकर इनकी सीमा निश्‍चित की जा रही है, चिड़ियाघरों में इन्हें पिंजरों में कैद किया जा रहा है. सर्कस और फिल्मों में करतब दिखाने के लिए प्रशिक्षित करते हुए दैहिक-मानसिक प्रताड़ना दी जाती है. जंगल काटकर इनके जीवनयापन में व्यवधान डाला जा रहा है. मनोरंजन के लिए तोते और मैना को पिंजरे में ़कैद किया जाता है, मछलियों को एक्वेरियम में कि मछलियां देखने से तनाव दूर होता है. लोग अपनी सुख-सुविधा के लिए पशु को स़िर्फ और स़िर्फ इस्तेमाल करते हैं, हिफ़ाज़त नहीं करते.’ वे ग्लानि से भरे थे.

जाने-अनजाने चिड़िया उनका मनोरंजन करती थी. वे इसके बच्चों की हिफ़ाज़त नहीं कर सके. पता नहीं क्यों, लेकिन उन्हें लग रहा था कि अपने खाली, लंबे, बीमार दिनों की बोरियत और सन्नाटे को कम करने के लिए उन्होंने चिड़िया का इस्तेमाल किया था.

Sushma Munindra

       सुषमा मुनीन्द्र

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कहानी- जड़ों की ओर (Short Story- Jadon Ki Or)

Kahani

“ग़लती मेरी भी थी मौसी. आज मुझे अफ़सोस होता है कि मैंने उनकी मूक भाषा को कभी पढ़ने का प्रयास नहीं किया. यदि ये कहानियां पहले पढ़ ली होतीं, तो मैं बहुत पहले अपने प्रति उनके अटूट प्रेम व संवेदनाओं को समझ जाता.”

“मौसी, मैं पराग बोल रहा हूं.”

“इंडिया के नंबर से?” मैं चौंक गई.

“हां मौसी, मैं इंडिया आ गया हूं.”

“ओह, शायद घर के लिए ग्राहक मिल गया दिखता है.” मैंने मन ही मन कयास लगाया. लेकिन पराग की पूरी बात सुनी, तो मैं आश्‍चर्यचकित रह गई.

“… यहीं अपने घर हमेशा के लिए.”

“मीता और आहना भी हैं? तो फिर उन्हें लेकर घर पर आज शाम डिनर के लिए आ जा. आज छुट्टी भी है.”

“नहीं मौसी, आप ही को आना होगा. दरअसल, कल कार्गो से सब सामान भी आ गया है, उसे भी व्यवस्थित करना है. तीन दिन बाद तो मुझे यहां ऑफिस जॅाइन करना है, तो उससे पहले…”

“मैं समझ गई. तू चिंता मत कर, तेरे मौसाजी कल फैक्ट्री जाते वक़्त मुझे तेरे यहां छोड़ देंगे. मैं सब करवा दूंगी. पर तू अचानक इस तरह… अभी 2 महीने पहले ही तो जीजाजी की बरसी पर मिलना हुआ था, तब तो तेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था.”

“हां मौसी, बस ऐसे ही मन बदल गया.”

मैं समझ गई कि वह फोन पर ज़्यादा बातें करने का इच्छुक नहीं है. अगले दिन जल्दी आने का वादा कर मैंने फोन रख दिया.

इस उम्र में भी कोई मुझे इतना अपना और किसी क़ाबिल समझता है, सोचकर ही मन ख़ुशी व गर्व से भर उठा था. मन पूरे दिन पराग व उससे जुड़ी यादों के इर्द-गिर्द ही भटकता रहा. दीदी गुज़रीं, तब पराग की स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं हुई थी. कुछ समय तक जीजाजी के पुनर्विवाह की ख़बरें आती रहीं. फिर इन ख़बरों पर विराम लग गया. जीजाजी का कहीं दूर तबादला हो गया. पराग को हॉस्टल भेज दिया गया. फिर वहीं से वह उच्च शिक्षा के लिए विदेश चला गया. जीजाजी ट्रांसफर होकर फिर इसी शहर में आ गए थे. उनके रिटायरमेंट को अब थोड़ा ही समय बचा था. उन्होंने मकान में नए सिरे से काम करवाया शायद भविष्य में पराग की शादी और गृहस्थी को ध्यान में रखते हुए. लेकिन पराग की शिक्षा पूरी हुई, तो उसे वहीं विदेश में अच्छी नौकरी मिल गई. शादी के लिए दबाव बढ़ा, तो उसने वहीं अपने साथ पढ़ी मीता से विवाह कर लिया. सर्वथा अलग परिवेश में पली-बढ़ी मीता से विवाह में राहत की एक ही बात थी कि वह भी भारतीय थी. फिर उसे बेटी होने की ख़बर भी मिली.

जीजाजी रिटायरमेंट के बाद और भी एकाकी हो गए थे. सुनने में आया था कि काफ़ी लिखने-पढ़ने लगे हैं. पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियां छपने लगी हैं. पारिवारिक समारोहों में ही उनसे मुलाक़ात हो पाती थी. काफ़ी दुबले और कमज़ोर लगने लगे थे. कई बार मन होता उन्हें अपने घर बुलाकर रख लूं, पर मन की बात मन में ही दबा लेनी पड़ती. लोग कहीं ग़लत मतलब न समझ लें कि हमारी नज़र उनकी संपत्ति पर है. वैसे भी उन्हें संभालनेवालों की कहां कमी थी? माता-पिता नहीं रहे थे, पर उनके अपने दो भाई थे. भाइयों के बच्चे थे. बेटा पराग तो था ही और अब तो पराग के ससुरालवाले भी थे.

जीजाजी के निधन पर पराग, मीता और उसकी प्यारी-सी बेटी आहना से मिलना हुआ था, पर तब ज़्यादा छुट्टी न मिलने की वजह से उसे जल्दी ही लौटना पड़ा था. जल्दी वापस आने का कहकर वह लौट गया था, पर लौटना हुआ था जीजाजी की बरसी पर ही और वह भी अकेले. तब सुनने में आया था कि अब वह शायद कभी इंडिया न लौटे. मकान-जायदाद आदि बेचने के लिए भी चाचा से कह गया है. और अब दो ही महीने बाद यह अचानक पूरी तरह घर वापसी? यदि लौटना ही था, तो जीजाजी के रहते ही लौट आता. जीजाजी बहुत कम बोलने वाले इंसान थे. कुछ कहते नहीं थे, पर हम उनके मन की बात तो समझते ही थे. लेकिन पराग के मन में आख़िर यह सब क्या चल रहा है? पराग से मिलने की मेरी बेचैनी पल-प्रतिपल बढ़ती ही जा रही थी.

सवेरे मैं जल्दी ही तैयार हो गई थी. पराग के घर के रास्ते से मैंने आहना के लिए कुछ चॉकलेट्स ख़रीद लिए थे. वैसे तो अब वह स्कूल जानेवाली समझदार बच्ची हो गई है, पर चॉकलेट्स तो हर उम्र के बच्चों को लुभाते ही हैं. हॉर्न सुनते ही पराग नीचे आ गया था और आदर सहित मुझे सहारा देते हुए ऊपर ले गया. पराग दोनों मां-बेटी ने भी मेरे पैर छूकर आशीर्वाद लिया, तो मैं सुखद आश्‍चर्य से भर उठी. मीता रसोई में घुसी, तो मैं भी पीछे-पीछे पहुंच गई.

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“मैं चाय-नाश्ता करके निकली हूं और वैसे भी मैं तुम्हारी मदद करने आई हूं, काम बढ़ाने नहीं.”

“मौसी सच बताऊं, तो काम कुछ है ही नहीं. वह तो आपको बुलाने का बहाना भर था. घर तो बरसों से सेट ही है. बस, थोड़ी साफ़-सफ़ाई कर ली है. अमेरिका से जो सामान आया है, उसमें से ज़रूरतभर का खोल लिया है. बाकी स्टोररूम में रखवा दिया है. सोचा तो था कि पुराना सब फर्नीचर, पर्दे वगैरह हटवाकर हमारा लाया सामान लगवा लेंगे, पर अब लगता है उस सबके लिए थोड़ा रुक जाना ही बेहतर होगा. दरअसल,  पापाजी की बरसी से लौटने के बाद से ही पराग बहुत गुमसुम और उदास रहने लगे थे. वे अपने साथ…” मीता की बात अधूरी ही रह गई, क्योंकि पराग मुझे पुकारता रसोई तक आ पहुंचा था.

“आओ न मौसी, लॉबी में बैठते हैं. काम तो होता रहेगा. पहले चाय-नाश्ता कर लेते हैं. मैं तो नाश्ते के लिए आप ही का इंतज़ार कर रहा था.” पराग ने इतने आग्रह से कहा कि मैं और इंकार न कर सकी और उसके साथ लॉबी में चली आई. आहना को हिज्जे जोड़-जोड़कर हिंदी के अख़बार की हेडलाइन्स पढ़ते देख मैं हैरान रह गई.

“कमाल है ज़रा-सी बच्ची अख़बार पढ़ रही है और वो भी हिंदी का. हमारे यहां तो आधुनिक पढ़ी-लिखी युवतियां भी अख़बार को मात्र शीशे चमकाने का साधन मानती हैं.”

“मैं चाहता हूं कि आहना में रीडिंग हैबिट विकसित हो, जो मुझमें नहीं थी. इसके लिए मैं ढेर सारी परीकथाएं व सचित्र कहानियों की पुस्तकें ख़रीदकर लाता हूं और रात को नियम से उनमें से एक-दो कहानी अवश्य पढ़कर सुनाता हूं. इससे उसका ज्ञान व आत्मविश्‍वास तो बढ़ेगा ही, दूसरों को समझने की क्षमता भी बढ़ेगी.”

“वाह, बहुत अच्छे! अपने दादा की तरह लेखक बनेगी यह तो!” प्यार से आहना के सिर पर हाथ फेरते हुए मैंने पराग की ओर नज़र घुमाई, तो पाया वह कुछ गुमसुम-सा हो उठा था. शायद उसे अपने पापा की याद आ गई थी. जीजाजी और साथ ही दीदी को यादकर मेरा भी मन भारी हो उठा. आंखें दीवार पर उनकी साथ लगी तस्वीर पर जाकर टिक गईं.

“दीदी के जाने के बाद मन तेरे लिए बहुत व्याकुल रहता था बेटे. मौसी ऐसे ही नहीं बन जाता कोई. मां-सी ममता रखनेवाली होती है मासी. पर तुझे तेरे पापा से अलग भी नहीं कर सकती थी. और उन्हें तुझे लेकर हमारे साथ आकर रहने के लिए भी नहीं कह सकती थी. तेरे चाचा वगैरह इसके लिए कभी तैयार नहीं होते. तूने उन्हें बताया अपने इंडिया लौट आने के बारे में?”

“हां, उन्होंने तो इस घर का सौदा ही तय कर दिया था और कुछ एडवांस भी ले चुके थे. अब मेरे लौटकर यहीं आकर रहने से उन्हें थोड़ा धक्का लगा है. ग़लती तो मेरी ही है. मैंने ही अचानक अपना निर्णय बदलकर उनकी साख को बट्टा लगाया है. ख़ैर, धीरे-धीरे मना लूंगा सबको. आप तो मेरेे इस निर्णय से नाराज़ नहीं हैं न मौसी?”

“अरे नहीं, कैसी बात कर रहा है तू? मैं तो बहुत ख़ुश हूं कि तू अपनों के बीच लौट आया है. पर काश! यह निर्णय थोड़ा पहले, मतलब तेरे पापा के जीते जी ले लिया होता. तू तो जानता ही है कि वे कितना कम बोलते थे. दीदी के जाने के बाद तो उन्होंने मन की बात ज़ुबान पर लाना ही बंद कर दिया था. जो सामने रख दो, खा लेते. जो कहते, वो पहन लेते, पर मैं जानती हूं कि वे कभी तुझे अपनी आंखों से दूर नहीं करना चाहते थे. इसीलिए तो इतने दबाव के बावजूद वे दूसरी शादी के लिए तैयार नहीं हुए थे.”

“मैं पापा को कभी समझ ही नहीं पाया. उनकी मूक भाषा को पढ़ ही नहीं पाया. वो तो उनकी बरसी पर आया, तब पता चला उनके कुछ दोस्तों ने मिलकर उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर उनकी कहानियों का संकलन प्रकाशित करवाया है. मुझे भी उन्होंने उसकी प्रति दी और वक़्त निकालकर पढ़ने का आग्रह किया.”

“अरे हां, याद आया. हम उपस्थित सभी लोगों को प्रतियां दी गई थीं. मेरी तो यहीं छूट गई थी. आज लेकर जाऊंगी.”

“मैंने तो पापा की कभी कोई कहानी पढ़ी ही नहीं थी. रीडिंग तो थी ही नहीं. मैं तो समाचार आदि भी ऑफिस में नेट पर ही देख लिया करता था. घर पर आनेवाले अख़बार बिना तह खुले ही रद्दी के लिए जमा होते रहते थे. फिर जब पापा से ही कभी अतिरेक लगाव नहीं हो पाया, तो उनकी कहानियों की क़िताब से मुझे क्या लगाव होता?

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बेमन-से मैंने वह पुस्तक शोल्डर बैग में डाल ली थी. जबसे होश संभाला था, पापा को मैंने मात्र एक संरक्षक के रूप में ही देखा था.

दादा-दादी साथ रहते थे और उनके सामने मुझे लाड़ जताना तो दूर रहा, वे मुझे गोद में लेने से भी हिचकिचाते थे.”

“हां, हम पुराने लोगों के कुछ ऐसे ही संस्कार थे, पर इसका यह मतलब नहीं कि वे तुझे प्यार नहीं करते थे. मैंने बताया न, तुझसे असीम स्नेह के मारे ही तो उन्होंने दूसरी शादी नहीं की थी. और यह उन्होंने किसी को जताया भी नहीं, पर किन्हीं भावुक पलों में मुझे बता बैठे थे.”

“जानता हूं. वे मुझे हॉस्टल भी नहीं भेजना चाहते थे, पर जहां उनका ट्रांसफर हुआ, वह नक्सली एरिया था. वहां मेरी जान को ख़तरा था. पापा चौबीस घंटे मेरी निगरानी नहीं रख सकते थे, इसलिए उन्होंने मुझे बोर्डिंग में डलवा दिया. मुझे विदेश भेजने के लिए भी उन्हें अपना मन कड़ा करना पड़ा था. ख़ुद उन्हीं के शब्दों में कि “मैं बेटे की उन्नति की राह में रोड़ा नहीं बनना चाहता था. नाते-रिश्तेदार, दोस्त कितना भी मुझे उसे रोकने को कहें, पर मैं उसे कभी कुछ करने से नहीं रोकूंगा. कोई किसी को रोक भी नहीं सकता है. निर्मला मुझे अकेला छोड़कर चली गई. क्या मैं उसे रोक पाया? कल मैं बेटे को अकेला छोड़कर चला जाऊंगा, तो क्या वह मुझे रोक पाएगा? कहां रोक पाया मौसी मैं उन्हें? काश! उन्होंने जीते जी मुझसे यह सब शेयर किया होता.”

“तो फिर तुम्हें ये सब बातें किसने बताईं? जीजाजी का ऐसा कौन राज़दार था, जिससे वे दिल की ये सब बातें शेयर करते थे?” मैं आश्‍चर्यचकित थी.

“उनकी कलम! जिससे वे कुछ नहीं छुपाते थे. मैंने आपको बताया था न कि उनकी कहानियों का संकलन मैंने अपने बैग में डाल लिया था. लंबी फ्लाइट थी. मैंने सोचा अमेरिका पहुंचकर तो मैं फिर काम में व्यस्त हो जाऊंगा. इस क़िताब को रास्ते में ही पढ़ लेता हूं. मैंने एक बार पढ़ना शुरू किया, तो खाना-पीना, सोना सब भूल गया.”

“क्यों? ऐसा क्या था उसमें?” मैंने उत्सुकता के साथ पूछा. ख़ुद पर ग़ुस्सा भी आ रहा था कि मैंने वह क़िताब क्यों नहीं पढ़ी?

“मौसी, पापा के तटस्थ व्यवहार से मैं आज तक यही समझता आ रहा था कि पापा की ज़िंदगी में मेरा कोई ख़ास स्थान नहीं है.

मेरे उनके पास होने, न होने से उन्हें कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता. लेकिन मेरी हैरानी की सीमा नहीं थी. उनकी हर कहानी का कथानक मेरे ही इर्द-गिर्द घूम रहा था. हर कहानी में पात्रों के नाम अलग-अलग थे, पर मैं भलीभांति समझ रहा था कि हर कहानी का मुख्य पात्र मैं ही हूं. हर कहानी चीख-चीखकर बता रही थी कि पापा ज़िंदगीभर मेरे अलावा न कुछ देख पाए, न कुछ सुन पाए और न ही कुछ समझ पाए.

आप जब वे कहानियां पढ़ेंगी, तो आपको मेरी बात की सच्चाई का एहसास होगा. मैं हैरान हूं कि कोई इंसान इतना दूर रहते हुए भी किसी और की ज़िंदगी से इस हद तक कैसे प्रभावित हो सकता है? शायद अपनी हर सांस के साथ वे मेरे ही बारे में सोचते थे. अमेरिका पहुंचने तक मैं पूरी तरह टूट चुका था, क्योंकि उनकी हर कहानी ने मुझे उनसे और गहराई से जोड़ दिया था. काश! उन्होंने एक बार, स़िर्फ एक बार मुझसे अपनी भावनाएं शेयर की होतीं, तो मैं उन्हें अकेला कभी नहीं छोड़ता.”

“हूं.” मैं ग़म व सोच में डूब गई थी. क्या वाक़ई बच्चों से संवाद बनाए रखना इतना ज़रूरी है?

“ग़लती मेरी भी थी मौसी. आज मुझे अफ़सोस होता है कि मैंने उनकी मूक भाषा को कभी पढ़ने का प्रयास नहीं किया. यदि ये कहानियां पहले पढ़ ली होतीं, तो मैं बहुत पहले अपने प्रति उनके अटूट प्रेम व संवेदनाओं को समझ जाता.”

“हूं, यह भी है.” मैंने सहमति में गर्दन हिलाई.

“आहना अभी छोटी है. पापा की कहानियों को पढ़ने-समझने जितनी बुद्धि अभी उसमें नहीं है, पर मैं चाहता हूं कि बड़ी होकर वह न केवल ये कहानियां पढ़े-समझे, बल्कि रिश्तों की गहराई को भी महसूस करे. मेरे और पापा के रिश्ते में अनजाने ही जो दूरियां और ग़लतफ़हमियां पनप गई थीं, वे मेरे और मेरी संतान के बीच कभी न पनपने पाएं. और यह तभी संभव है, जब मैं अपनी जड़ों से जुड़ा रहूं. अपने नवांकुरों को अपने से जुड़ा रखने के लिए एक पौधे को पहले अपनी जड़ों से जुड़ा रहना ज़रूरी है और मेरी जड़ें यहां भारत में हैं. देर तो अवश्य हो गई है, पर शायद अपने इस छोटे से क़दम से पापा की आत्मा को कुछ शांति पहुंचा सकूं.” पराग ने अपनी बात समाप्त की, तो उसके साथ मेरी आंखें भी डबडबा उठीं.

“मौसीजी का पेट बातों से ही भरने का इरादा तो नहीं कर लिया आपने? मैंने डाइनिंग टेबल पर चाय-नाश्ता लगा दिया है.” मीता ने कहा. इतनी देर से एक ही पोज़ीशन में बैठे रहने से मेरे घुटने अकड़ गए थे. यकायक उठकर चलने का प्रयास किया, तो लड़खड़ा गई. पराग एक हाथ से मुझे सहारा देते हुए व दूसरे हाथ से आहना की उंगली को थामे डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ लिया.

मीता आहना की प्लेट में नाश्ता परोसने लगी, तो पराग मेरे लिए चाय तैयार करने लगा. मैं मुग्ध भाव से दांपत्य के उस पौधे को जड़ों से जुड़े रहकर अपने नवांकुर को थामे ऊपर की ओर बढ़ते देख रही थी.

 

Sayli Mathur

   शैली माथुर

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अकबर-बीरबल की कहानी: राज्य के कौवों की गिनती (Akbar-Birbal Tale: How Many Crows In The Kingdom)

Akbar Birbal Story

अकबर-बीरबल की कहानी: राज्य के कौवों की गिनती (Akbar-Birbal Tale: How Many Crows In The Kingdom)

एक दिन राजा अकबर और बीरबल राज महल के बगीचे में टहल रहे थे. बहुत ही सुंदर सुबह थी. कई तरह के पंछी चहक रहे थे. वहीं तालाब के पास ही बहुत सारे कौवे भी आस-पास उड़ रहे थे. उन कौवों को देखते ही बादशाह अकबर के मन में एक सवाल उत्पन्न हुआ. उनके मन में यह सवाल आया कि उनके राज्य में कुल कितने कौवे होंगे?

बीरबल तो उनके साथ ही बगीचे में टहल रह थे, तो राजा अकबर ने बीरबल से ही यह सवाल कर डाला और पूछा कि बताओ बीरबल, आख़िर हमारे राज्य में कितने कौवे हैं? तुम तो बड़े चतुर हो, तुम्हें हर सवाल का उत्तर पता होता है.

यह सुनते ही चालाक बीरबल ने तुरंत उत्तर दिया कि महाराज, हमारे राज्य में कुल 95,463 कौवे हैं, आप चाहें तो गिनती करवा सकते हैं.
महाराज अकबर इतने तेज़ी से दिए हुए उत्तर को सुन कर हक्का-बक्का रह गए और उन्होंने बीरबल की परीक्षा लेने की सोची.

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Akbar Aur Birbal Ki Kahani

महाराज ने बीरबल से दोबारा सवाल किया- अगर तुम्हारी गणना के अनुसार कौवे ज़्यादा हुए तो?

बिना किसी संकोच के बीरबल बोले, हो सकता है महाराज, किसी पड़ोसी राज्य के कौवे हमारे राज्य में घूमने आये हों.

राजा फिर बोले- और अगर गिनती में कम कौवे हुए तो?

बीरबल ने फिर तपाक से उत्तर दिया- महाराज, हो सकता है हमारे राज्य के कुछ कौवे अपने किसी अन्य राज्यों के रिश्तेदारों के यहां घूमने गए हों.

यह सुन अकबर बेहद ख़ुश हुए, क्योंकि बीरबल ने अपनी चतुराई एक बार फिर साबित कर दी.

सीख: प्रश्‍न भले ही कितने मुश्किल क्यों न हों, बिना घबराई बुद्धि व चतुराई से काम लेना चाहिए. दुनिया का कोई ऐसा सवाल नहीं, जिसका जवाब न हो, बस ज़रूरत है, विवेक, धैर्य व बुद्धि की.

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कहानी- पुनर्प्रतिष्ठा (Short Story- Punarpratishtha)

Hindi Story

पहली बार शालू ने महसूस किया कि घर में किसी बड़े-बुज़ुर्ग की उपस्थिति, नानी-दादी का प्यार, बच्चों पर कितना सकारात्मक प्रभाव डालता है. उसके बच्चे तो शुरू से ही इस सुख से वंचित रहे, क्योंकि उनके जन्म से पहले ही उनकी नानी और दादी दोनों गुज़र चुकी थीं.

बच्चों को स्कूल बस में बैठाकर वापस आ शालू खिन्न मन से टैरेस पर जाकर बैठ गई. सुहावना मौसम, हल्के बादल और पक्षियों का मधुर गान कुछ भी उसके मन को वह सुकून नहीं दे पा रहे थे, जो वो अपने पिछले शहर के घर में छोड़ आई थी. शालू की इधर-उधर दौड़ती सरसरी नज़रें थोड़ी दूर एक पेड़ की ओट में खड़ी बुढ़िया पर ठहर गईं.

‘ओह! फिर वही बुढ़िया, क्यों इस तरह से उसके घर की ओर ताकती है?’ शालू की उदासी बेचैनी में तब्दील हो गई, मन में शंकाएं पनपने लगीं. इससे पहले भी शालू उस बुढ़िया को तीन-चार बार नोटिस कर चुकी थी.

दो महीने हो गए थे शालू को पूना से गुड़गांव शिफ्ट हुए, मगर अभी तक एडजस्ट नहीं हो पाई थी. पति सुधीर का बड़े ही शॉर्ट नोटिस पर तबादला हुआ था, वो तो आते ही अपने काम और ऑफ़िशियल टूर में व्यस्त हो गए. छोटी शैली का तो पहली क्लास में आराम से एडमिशन हो गया, मगर सोनू को बड़ी मुश्किल से पांचवीं क्लास के मिड सेशन में एडमिशन मिला. वो दोनों भी धीरे-धीरे रूटीन में आ रहे थे, लेकिन शालू, उसकी स्थिति तो जड़ से उखाड़कर दूसरी ज़मीन पर रोपे गए पेड़ जैसी हो गई थी, जो अभी भी नई ज़मीन नहीं पकड़ पा रहा था.

सब कुछ कितना सुव्यवस्थित चल रहा था पूना में. उसकी अच्छी जॉब थी. घर संभालने के लिए अच्छी मेड थी, जिसके भरोसे वह घर और रसोई छोड़कर सुकून से ऑफ़िस चली जाती थी. घर के पास ही बच्चों के लिए एक अच्छा-सा डे केयर भी था. स्कूल के बाद दोनों बच्चे शाम को उसके ऑफ़िस से लौटने तक वहीं रहते. लाइफ़ बिल्कुल सेट थी, मगर सुधीर के एक तबादले की वजह से सब गड़बड़ हो गया.

यहां न आस-पास कोई अच्छा डे केयर है और न ही कोई भरोसे लायक मेड ही मिल रही है. उसका करियर तो चौपट ही समझो और इतनी टेंशन के बीच ये विचित्र बुढ़िया. कहीं छुपकर घर की टोह तो नहीं ले रही? वैसे भी इस इलाके में चोरी और फिरौती के लिए बच्चों का अपहरण कोई नई बात नहीं है. सोचते-सोचते शालू परेशान हो उठी.

दो दिन बाद सुधीर टूर से वापस आए, तो शालू ने उस बुढ़िया के बारे में बताया. सुधीर को भी कुछ चिंता हुई, “ठीक है, अगली बार कुछ ऐसा हो, तो वॉचमैन को बोलना वो उसका ध्यान रखेगा, वरना फिर देखते हैं, पुलिस कम्प्लेन कर सकते हैं.” कुछ दिन ऐसे ही गुज़र गए. शालू का घर को दोबारा ढर्रे पर लाकर नौकरी करने का संघर्ष  जारी था, पर इससे बाहर आने की कोई सूरत नज़र नहीं आ रही थी.

एक दिन सुबह शालू ने टैरेस से देखा, वॉचमैन उस बुढ़िया के साथ उनके मेन गेट पर आया हुआ था. सुधीर उससे कुछ बात कर रहे थे. पास से देखने पर उस बुढ़िया की सूरत कुछ जानी पहचानी-सी लग रही थी. शालू को लगा उसने यह चेहरा कहीं और भी देखा है, मगर कुछ याद नहीं आ रहा था. बात करके सुधीर घर के अंदर आ गए और वह बुढ़िया मेन गेट पर ही खड़ी रही.

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“अरे, ये तो वही बुढ़िया है, जिसके बारे में मैंने आपको बताया था. ये यहां क्यों आई है?” शालू ने चिंतित स्वर में सुधीर से पूछा.

“बताऊंगा तो आश्‍चर्यचकित रह जाओगी. जैसा तुम उसके बारे में सोच रही थी, वैसा कुछ भी नहीं है. जानती हो वो कौन है?”

शालू का विस्मित चेहरा आगे की बात सुनने को बेक़रार था.

“वो इस घर की पुरानी मालकिन हैं.”

“क्या? मगर ये घर तो हमने मिस्टर शांतनु से ख़रीदा है.”

“ये लाचार बेबस बुढ़िया उसी शांतनु की अभागी मां है, जिसने पहले धोखे से सब कुछ अपने नाम करा लिया और फिर ये घर हमें बेचकर विदेश चला गया, अपनी बूढ़ी मां गायत्री देवी को एक वृद्धाश्रम में छोड़कर. छी… कितना कमीना इंसान है, देखने में तो बड़ा शरीफ़ लग रहा था.” सुधीर का चेहरा वितृष्णा से भर उठा. वहीं शालू याद्दाश्त पर कुछ ज़ोर डाल रही थी.

“हां, याद आया. स्टोर रूम की सफ़ाई करते हुए इस घर की पुरानी नेमप्लेट दिखी थी. उस पर ‘गायत्री निवास’ लिखा था, वहीं एक राजसी ठाठ-बाटवाली महिला की एक पुरानी फ़ोटो भी थी. उसका चेहरा ही इस बुढ़िया से मिलता था, तभी मुझे लगा था कि  इसे कहीं देखा है, मगर अब ये यहां क्यों आई हैं? क्या घर वापस लेने? पर हमने तो इसे पूरी क़ीमत देकर ख़रीदा है.” शालू चिंतित हो उठी.

“नहीं, नहीं. आज इनके पति की पहली बरसी है. ये उस कमरे में दीया जलाकर प्रार्थना करना चाहती हैं, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली थी.”

“इससे क्या होगा, मुझे तो इन बातों में कोई विश्‍वास नहीं.”

“तुम्हें न सही, उन्हें तो है और अगर हमारी हां से उन्हें थोड़ी-सी ख़ुशी मिल जाती है, तो हमारा क्या घट जाएगा?”

“ठीक है, आप उन्हें बुला लीजिए.” अनमने मन से ही सही, मगर शालू ने

हां कर दी.

गायत्री देवी अंदर आ गईं. क्षीण काया, तन पर पुरानी सूती धोती, बड़ी-बड़ी आंखों के कोरों में कुछ जमे, कुछ पिघले से आंसू. अंदर आकर उन्होंने सुधीर और शालू को ढेरों आशीर्वाद दिए. नज़रें भर-भरकर उस पराये घर को देख रही थीं, जो कभी उनका अपना था. आंखों में कितनी स्मृतियां, कितने सुख और कितने ही दुख एक साथ तैर आए थे.

वो ऊपरवाले कमरे में गईं. कुछ देर आंखें बंद कर बैठी रहीं. बंद आंखें लगातार रिस रही थीं. फिर उन्होंने दीया जलाया, प्रार्थना की और फिर वापस से दोनों को आशीर्वाद देते हुए कहने लगीं, “मैं इस घर में दुल्हन बनकर आई थी. सोचा था, अर्थी पर ही जाऊंगी, मगर…” स्वर भर्रा आया था.

“यही कमरा था मेरा. कितने साल हंसी-ख़ुशी बिताए हैं यहां अपनों के साथ, मगर शांतनु के पिता के जाते ही…” आंखें पुनः भर आईं.

शालू और सुधीर नि:शब्द बैठे रहे. थोड़ी देर घर से जुड़ी बातें कर गायत्री देवी भारी क़दमों से उठीं और चलने लगीं. पैर जैसे इस घर की चौखट छोड़ने को तैयार ही न थे, पर जाना तो था ही. उनकी इस हालत को वो दोनों भी महसूस कर रहे थे.

“आप ज़रा बैठिए, मैं अभी आती हूं.” शालू गायत्री देवी को रोककर कमरे से बाहर चली गई और इशारे से सुधीर को भी बाहर बुलाकर कहने लगी, “सुनिए, मुझे एक बड़ा अच्छा आइडिया आया है, जिससे हमारी लाइफ़ भी सुधर जाएगी और इनके टूटे दिल को भी आराम मिल जाएगा. क्यों न हम इन्हें यहीं रख लें? अकेली हैं, बेसहारा हैं और इस घर में इनकी जान बसी है. यहां से कहीं जाएंगी भी नहीं और हम यहां वृद्धाश्रम से अच्छा ही खाने-पहनने को देंगे उन्हें.”

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“तुम्हारा मतलब है, नौकर की तरह?”

“नहीं, नहीं. नौकर की तरह नहीं. हम इन्हें कोई तनख़्वाह नहीं देंगे. काम के लिए तो मेड भी है. बस, ये घर पर रहेंगी, तो घर के आदमी की तरह मेड पर, आने-जानेवालों पर नज़र रख सकेंगी. बच्चों को देख-संभाल सकेंगी. ये घर पर रहेंगी, तो मैं भी आराम से नौकरी पर जा सकूंगी. मुझे भी पीछे से घर की, बच्चों के खाने-पीने की टेंशन नहीं रहेगी.”

“आइडिया तो अच्छा है, पर क्या ये मान जाएंगी?”

“क्यों नहीं. हम इन्हें उस घर में रहने का मौक़ा दे रहे हैं, जिसमें उनके प्राण बसे हैं, जिसे ये छुप-छुपकर देखा करती हैं.”

“और अगर कहीं मालकिन बन घर पर अपना हक़ जमाने लगीं तो?”

“तो क्या, निकाल बाहर करेंगे. घर तो हमारे नाम ही है. ये बुढ़िया क्या कर सकती है.”

“ठीक है, तुम बात करके देखो.” सुधीर ने सहमति जताई.

शालू ने संभलकर बोलना शुरू किया, “देखिए, अगर आप चाहें, तो यहां रह सकती हैं.”

बुढ़िया की आंखें इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से चमक उठीं. क्या वाक़ई वो इस घर में रह सकती हैं, लेकिन फिर बुझ गईं. आज के ज़माने में जहां सगे बेटे ने ही उन्हें घर से यह कहते हुए बेदख़ल कर दिया कि अकेले बड़े घर में रहने से अच्छा उनके लिए वृद्धाश्रम में रहना होगा. वहां ये पराये लोग उसे बिना किसी स्वार्थ के क्यों रखेंगे?

“नहीं, नहीं. आपको नाहक ही परेशानी होगी.”

“परेशानी कैसी, इतना बड़ा घर है और आपके रहने से हमें भी आराम हो जाएगा.”

हालांकि दुनियादारी के कटु अनुभवों से गुज़र चुकी गायत्री देवी शालू की आंखों में छिपी मंशा समझ गईं, मगर उस घर में रहने के मोह में वो मना न कर सकीं.

गायत्री देवी उनके साथ रहने आ गईं और आते ही उनके सधे हुए अनुभवी हाथों ने घर की ज़िम्मेदारी बख़ूबी संभाल ली. सभी उन्हें  अम्मा कहकर ही बुलाते. हर काम उनकी निगरानी में सुचारु रूप से चलने लगा. घर की ज़िम्मेदारी से बेफ़िक्र होकर शालू ने भी नौकरी ज्वॉइन कर ली.

सालभर कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला. अम्मा सुबह दोनों बच्चों को उठातीं, तैयार करतीं, मान-मनुहार कर खिलातीं और स्कूल बस तक छोड़तीं. फिर किसी कुशल प्रबंधक की तरह अपनी देखरेख में बाई से सारा काम करातीं. रसोई का वो स्वयं ख़ास ध्यान रखने लगीं, ख़ासकर बच्चों के स्कूल से आने के व़क़्त वो नित नए स्वादिष्ट और पौष्टिक व्यंजन तैयार कर देतीं. शालू भी हैरान थी कि जो बच्चे चिप्स और पिज़्ज़ा के अलावा कुछ भी मन से न खाते थे, वे उनके बनाए व्यंजन ख़ुशी-ख़ुशी खाने लगे थे.

बच्चे अम्मा से बेहद घुल-मिल गए थे. उनकी कहानियों के लालच में कभी देर तक टीवी से चिपके रहनेवाले बच्चे उनकी हर बात मानने लगे. समय से खाना-पीना और होमवर्क निपटाकर बिस्तर में पहुंच जाते. अम्मा अपनी कहानियों से बच्चों में एक ओर जहां अच्छे संस्कार डाल रही थीं, वहीं हर व़क़्त टीवी देखने की बुरी आदत से भी दूर ले जा रही थीं.

शालू और सुधीर बच्चों में आए सुखद परिवर्तन को देखकर अभिभूत थे, क्योंकि उन दोनों के पास तो कभी बच्चों के पास बैठ बातें करने का भी समय नहीं होता था. पहली बार शालू ने महसूस किया कि घर में किसी बड़े-बुज़ुर्ग की उपस्थिति, नानी-दादी का प्यार, बच्चों पर कितना सकारात्मक प्रभाव डालता है. उसके बच्चे तो शुरू से ही इस सुख से वंचित रहे, क्योंकि उनके जन्म से पहले ही उनकी नानी और दादी दोनों गुज़र चुकी थीं.

आज शालू का जन्मदिन था. सुधीर और शालू ने ऑफ़िस से थोड़ा जल्दी निकलकर बाहर डिनर करने का प्लान बनाया था. सोचा था, बच्चों को अम्मा संभाल लेंगी, मगर घर में घुसते ही दोनों हैरान रह गए. बच्चों ने घर को गुब्बारों और झालरों से सजाया हुआ था. वहीं अम्मा ने शालू की मनपसंद डिशेज़ और केक बनाए हुए थे. इस सरप्राइज़ बर्थडे पार्टी, बच्चों के उत्साह और अम्मा की मेहनत से शालू अभिभूत हो उठी और उसकी आंखें भर आईं. इस तरह के वीआईपी ट्रीटमेंट की उसे आदत नहीं थी और इससे पहले बच्चों ने कभी उसके लिए ऐसा कुछ ख़ास किया भी नहीं था.

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बच्चे दौड़कर शालू के पास आ गए और जन्मदिन की बधाई देते हुए पूछा, “आपको हमारा सरप्राइज़ कैसा लगा?”

“बहुत अच्छा, इतना अच्छा, इतना अच्छा… कि क्या बताऊं…” कहते हुए उसने बच्चों को बांहों में भरकर चूम लिया.

“हमें पता था आपको अच्छा लगेगा. अम्मा ने बताया कि बच्चों द्वारा किया गया छोटा-सा प्रयास भी मम्मी-पापा को बहुत बड़ी ख़ुशी देता है, इसीलिए हमने आपको ख़ुशी देने के लिए ये सब किया.”

शालू की आंखों में अम्मा के लिए कृतज्ञता छा गई. बच्चों से ऐसा सुख तो उसे पहली बार ही मिला था और वो भी उन्हीं के संस्कारों के कारण.

केक कटने के बाद गायत्री देवी ने अपने पल्लू में बंधी लाल रुमाल में लिपटी एक चीज़ निकाली और शालू की ओर बढ़ा दी. “ये क्या है अम्मा?”

“तुम्हारे जन्मदिन का उपहार.”

शालू ने खोलकर देखा तो रुमाल में सोने की चेन थी. वो चौंक पड़ी, “ये तो सोने की मालूम होती है.”

“हां बेटी, सोने की ही है. बहुत मन था कि तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हें कोई तोहफ़ा दूं. कुछ और तो नहीं है मेरे पास, बस यही एक चेन है, जिसे संभालकर रखा था. मैं अब इसका क्या करूंगी. तुम पहनना, तुम पर बहुत अच्छी लगेगी.”

शालू की अंतरात्मा उसे कचोटने लगी. जिसे उसने लाचार बुढ़िया समझकर स्वार्थ से तत्पर हो अपने यहां आश्रय दिया, उनका इतना बड़ा दिल कि अपने पास बचे

इकलौते स्वर्णधन को भी वह उसे सहज ही दे रही हैं.

“नहीं, नहीं अम्मा, मैं इसे नहीं ले सकती.”

“ले ले बेटी, एक मां का आशीर्वाद समझकर रख ले. मेरी तो उम्र भी हो चली. क्या पता तेरे अगले जन्मदिन पर तुझे कुछ देने के लिए मैं रहूं भी या नहीं.”

“नहीं अम्मा, ऐसा मत कहिए. ईश्‍वर आपका साया हमारे सिर पर सदा बनाए रखे.” कहकर शालू उनसे ऐसे लिपट गई, जैसे बरसों बाद कोई बिछड़ी बेटी अपनी मां से मिल रही हो.

वो जन्मदिन शालू कभी नहीं भूली, क्योंकि उसे उस दिन एक बेशक़ीमती उपहार मिला था, जिसकी क़ीमत कुछ लोग बिल्कुल नहीं समझते और वो है नि:स्वार्थ मानवीय भावनाओं से भरा मां का प्यार. वो जन्मदिन गायत्री देवी भी नहीं भूलीं, क्योंकि उस दिन उनकी उस घर में पुनर्प्रतिष्ठा हुई थी. घर की बड़ी, आदरणीय, एक मां के रूप में, जिसकी गवाही उस घर के बाहर लगाई गई वो पुरानी नेमप्लेट भी दे रही थी, जिस पर लिखा था ‘गायत्री निवास’.

Deepti Mittal

      दीप्ति मित्तल

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कहानी- एक कप चाय (Short Story- Ek Cup Chai)

Short Story in Hindi

ख़ुशी से सुधीरजी की आंखें नम हो आई थीं. काश! उन्होंने चाय का निमंत्रण पहले स्वीकार कर लिया होता. सही कहा गया है कि बांटने से सुख बढ़ता है और दुख घटता है. इसलिए जब कोई आपको एक कप चाय के लिए आमंत्रित करता है, तो इसका तात्पर्य है कि वह आपके साथ ज़िंदगी के वो पल बांटना चाहता है, जो अभी तक अनकहे, अनसुने हैं. वह कुछ आपकी सुनना, तो कुछ अपनी सुनाना चाहता है.

हमेशा की तरह पत्नी के संग शहर की सबसे पॉश कॉलोनी में वॉक करते सुधीरजी स्वयं को किसी शहंशाह से कम नहीं समझ रहे थे. सवेरे और शाम की नियमित सैर उनका बरसों से चला आ रहा नियम था. तबीयत ठीक हो या न हो, इच्छा हो या न हो, शाम की सैर में तो साधनाजी को भी उनका साथ देना ही पड़ता था.

“समय रहते इस कॉलोनी में फ्लैट बुक करवाकर हमने कितनी समझदारी का काम किया न! देखो अब एक भी मकान खाली नहीं बचा है यहां. और सारे के सारे कितने प्रतिष्ठित लोग रहते हैं! मुझे तो लगता है कि शहर के सारे बड़े अफसर, बिज़नेसमैन यहीं आकर बस गए हैं. जिस इलाके में लोग किराए पर रहना अफोर्ड नहीं कर सकते, हमने अपना फ्लैट लिया है.”

“तो आप किसी से कम हैं क्या? रिटायर्ड चीफ इंजीनियर हैं.” साधनाजी ने पति की प्रशंसा की, तो सुधीरजी और भी फूलकर कुप्पा हो गए. सामने से आते किसी शख़्स ने उन्हें झुककर नमस्कार किया, तो सुधीरजी ठिठके. चेहरा काफ़ी परिचित-सा था.

“नमस्ते सर, नमस्ते मैडम! मैं प्रकाश! आप ही के ऑफिस में सुपरवाइज़र था.”

“ओह हां, अब पहचान लिया. कैसे हो? इधर केैसे आना हुआ?”

“जी मैं यहींं रहता हूं. इधर सी विंग में. मकान नंबर 212. रिटायर होने के बाद पिछले महीने यहां शिफ्ट हो गया था.”

“ओह, अच्छा! कौन हैं आपके मकान मालिक?”

“जी, अपना ही है.” प्रकाशजी ने नम्रता से कहा.

सुधीरजी के अहम् को हल्की ठेस लगी.

“टू बीएचके होगा?”

“नहीं सर, थ्री बीएचके है. अब इतना तो बड़ा चाहिए ही. कल को बेटे की भी शादी होगी. उसके बच्चे होंगे. गांव से मां को भी लाने की सोच रहा हूं. चलिए न सर, यहीं दूसरे माले पर ही है. एक कप चाय हो जाए. मिसेज़ को भी मैडम से मिलकर अच्छा लगेगा.”

“फिर कभी आएंगे. अभी तो आपकी मैडम को कुछ शॉपिंग करनी है.”

“ठीक है सर! समय निकालकर आइएगा ज़रूर चाय पीने.” प्रकाशजी विनम्रता से फिर झुक गए थे.

उनका अधीनस्थ उन्हीं के जितने बड़े मकान में इतनी पॉश कॉलोनी में रहता है. यह बात उन्हें हज़म नहीं हो रही थी.

“आपके दोस्त के यहां चल लेते न चाय पीने. कितने आग्रह से बुला रहे थे.” साधनाजी ने सरल हृदय से मन की बात रख दी. वैसे भी यहां आए इतना व़क्त हो गया. अभी तक किसी से ज़्यादा जान-पहचान नहीं हुई है.”

“वो दोस्त नहीं है मेरा. सुना नहीं क्या कहा उसने? मेरे ऑफिस में मेरा अधीनस्थ था वह! मुझे तो ताज्जुब हो रहा है कि इतनी महंगी कॉलोनी में उसने इतना महंगा फ्लैट ख़रीदा कैसे?” सुधीरजी मन ही मन उधेड़बुन में लगे हुए थे. 

“इतनी सैलरी तो नहीं थी इसकी. था भी ईमानदार! तो ऊपर की कमाई भी क्या रही होगी? लोन भी आख़िर कितना लिया होगा? किश्तें चुकाना कोई आसान काम थोड़े ही है?”

इस घटना के लगभग 10-12 दिन बाद सुधीरजी फिर प्रकाशजी से टकरा गए थे. बैंक से घर लौटने के लिए उन्होंने शेयरिंग कैब बुक करवाई थी. आधे रास्ते में जब प्रकाशजी उसमें सवार होने लगे, तो वे चौंके. दोनों का गंतव्य एक होने से साथ तो बैठे रहना ही था और साथ बैठे थे, तो वार्तालाप भी होनी ही थी.

“उस दिन ज़्यादा कुछ बात हो नहीं पाई.आपको तो एक-दो साल हो गए होंगे इधर शिफ्ट हुए?”

“हां, रिटायरमेंट के बाद से ही यहां हूं. बेटी का कॉलेज भी यहां से पास है.”

“अच्छा क्या कर रही है बिटिया?”

“इंजीनियरिंग फाइनल ईयर में है.”

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“बहुत बढ़िया. मेरे बेटे ने भी इंजीनियरिंग की है. मुंबई में एक एमएनसी में नौकरी कर रहा है. उसी ने ज़िद करके यह फ्लैट दिलाया है. कहता है, घर कोई बार-बार थोड़े ही न ख़रीदा जाता है. मैं भरूंगा लोन की किश्तें! सर, मुझे लगता है मैंने और निर्मला ने पिछले जन्म में ज़रूर कोई पुण्य कर्म किए होंगे, जो ऐसा लायक बेटा मिला. अब तो बस कोई उसके योग्य लड़की मिल जाए, तो बहू बनाकर घर ले आएं.”

“एक बार बेटे से पूछ तो लो, शायद कोई पसंद कर रखी हो. हो सकता है उसके साथ लिव इन में भी रह रहा हो. मुंबई में तो यह सब आम है. तुम गए हो उसके पास कभी मुंबई?”

“नहीं सर, वही आ जाता है सप्ताह, दस दिन में संभालने. पुणे से मुंबई दूर ही कितना है? जब भी आता है, कुछ न कुछ सुख-सुविधा के सामान से घर भर जाता है. हम कहते हैं, हमें यह सब नहीं चाहिए. तू तो बस बहू ले आ. तो कहता है यह मेरा काम नहीं है. यह तो आपकी ज़िम्मेदारी है.” ख़ुशी और भावनाओं से आह्लादित प्रकाशजी और भी बहुत कुछ बताना चाह रहे थे, पर उनका गंतव्य आ गया था. कैब ड्राइवर उतरने का इशारा कर रहा था.

“घर चलिए न सर, चाय पीकर चले जाइएगा. पास ही तो है. कहेंगे, तो मैं छोड़ दूंगा.” प्रकाशजी ने प्रेम से आग्रह किया.

“अरे नहीं, उसकी ज़रूरत नहीं है. फिर कभी फुर्सत से आऊंगा. अभी तो घर पर साधना भी इंतज़ार कर रही होगी.”

“भाभीजी को लेकर आइए सर कभी चाय पर. हमें बहुत प्रसन्नता होगी. मैं तो कहता हूं आज शाम को ही आ जाइए.”

“नहीं नहीं, मैं बता दूंगा. चलो भैया.” सुधीरजी ने ड्राइवर को चलने को कहा, तो प्रकाशजी ने हाथ जोड़ दिए. घर पहुंचकर पत्नी को यह बताते हुए कि प्रकाशजी ने मकान अपने बेटे के बलबूते पर ख़रीदा है. सुधीरजी काफ़ी तसल्ली महसूस कर रहे थे.

“अरे मैं आपको बताना ही भूल गई थी. अपनी वाणी की एक सहेली उनके बिल्कुल बगलवाले फ्लैट में ही रहती है. वहीं

आते-जाते उसकी दो-तीन बार प्रकाशजी और उनकी पत्नी से मुलाक़ात हुई है. कह रही थी अंकल-आंटी उस पर बेटी-सा प्यार रखते हैं. न हो तो आप ही उन्हें सपत्नी चाय पर बुला लीजिए. हर बार वे ही आपको निमंत्रण देते हैं.”

“तो मैं कौन-सा चला गया? ख़ैर देखते हैं.”

साधनाजी खाना लगाने में व्यस्त हो गईं, तो सुधीरजी एक बार फिर प्रकाशजी के बारे में सोचने लगे. ‘आदमी भला लगता है. ऑफिस में तो बस काम से काम रखते थे. कभी किसी के घर-परिवार के बारे में जानने का तो मौक़ा ही नहीं मिला. आज भी बेटे के बारे में बताते-बताते कैसे भावनाओं में बह गया था. काफ़ी कुछ कहना चाह रहा था कि घर आ गया. चलो अगली बार उसका चाय का निमंत्रण स्वीकार कर लूंगा.’ सुधीरजी शांत मन से खाना खाने बैठ गए थे.

इसके बाद कुछ ऐसा व्यस्त घटनाक्रम चला कि सुधीरजी के पास प्रकाशजी तो क्या किसी से मिलने-बतियाने का समय शेष न रहा. यहां तक कि उनकी सुबह-शाम की सैर भी छूट गई. पत्नी की थकावट और बेचैनी जिसे वे उम्र का तकाज़ा समझ रहे थे जांच के एक लंबे सिलसिले के बाद कैंसर निकली. बीमारी अभी आरंभिक अवस्था में ही थी और उपचार से ठीक हो जाने की उम्मीद थी. किंतु साधनाजी ने तो जीने की आस ही छोड़ दी थी. हर व़क्त नकारात्मक और निराशावादी विचार उन्हें घेरे रहते. बाप-बेटी ने उन्हें बहुत मुश्किल से सर्जरी और फिर कीमो थेरेपी के लिए तैयार किया था. इलाज के लंबे बोझिल पलों के बीच एक ही सकारात्मक और ख़ुशी की ख़बर आई थी कि वाणी का कैंपस प्लेसमेंट में चयन हो गया था. मुंबई की एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कंपनी में उसे अच्छे पैकेज पर नौकरी मिल गई थी. हालांकि वाणी का अभी नौकरी करने का कोई इरादा नहीं था. वह तो आगे एमबीए करना चाहती थी, पर इधर मम्मी के इलाज के दौरान हो रहे अतिशय ख़र्च ने उसे अपना निर्णय बदलने पर मजबूर कर दिया. वह नौकरी जॉइन कर पापा का सहारा बनना चाहती थी.

“पर बेटी, तेरी आगे की पढ़ाई का सपना?” सुधीरजी का स्वर भर्रा गया था. हमेशा पत्नी और बेटी का संबल बने रहने वाले सुधीरजी ख़ुद को बेहद असहाय महसूस कर रहे थे.

“मैं नौकरी के साथ-साथ तैयारी भी करती रहूंगी.” वाणी अपने निश्‍चय पर दृढ़ थी.

“पढ़ाई, नौकरी सब छोड़िए. मेरे जीते जी आप इसकी शादी कर दीजिए.” साधनाजी बीच में ही बोल पड़ी थीं. वातावरण बहुत भारी हो गया था. अंततः यह तय किया गया कि वाणी फ़िलहाल नौकरी जॉइन करने चली जाएगी. वह परीक्षा की तैयारी भी करती रहेगी, पर इस दरमियान कोई सुयोग्य वर मिल गया, तो उसके हाथ पीले कर दिए जाएंगे. सुधीरजी के कंधों पर यकायक ही ज़िम्मेदारियों का बोझ बढ़ गया था.

साधनाजी शनै: शनै: ठीक हो रही थीं. तबीयत पूछने आनेवालों और नाते-रिश्तेदारों से वे बेटी के लिए सुयोग्य वर बताने का आग्रह करतीं. सुधीरजी ने भी अपने स्तर पर वैवाहिक विज्ञापन आदि देखने आरंभ कर दिए थे. वाणी को अगले सप्ताह मुंबई जॉइन करने जाना था. तय हुआ कि उसकी अनुपस्थिति में आभा मौसी कुछ दिन मां के पास रहने आ जाएंगी.

सब कुछ ठीक हो रहा था, पर इस कुछ महीनों के घटनाक्रम ने सुधीरजी को हिलाकर रख दिया था. ज़िंदगी कभी इस तरह करवट ले बैठेगी, उन्हें सपने में भी गुमान नहीं था. साधनाजी के स्वास्थ्य में धीरे-धीरे सुधार हो रहा था, पर शारीरिक कमज़ोरी इतनी ज़्यादा थी कि डॉक्टर ने उन्हें किसी भी तरह के तनाव और श्रम से दूर रहने की सख़्त हिदायत दे दी थी.

वाणी तय कार्यक्रमानुसार मुंबई चली गई, तो आभा बहन के पास रहने आ गई. बहन के साथ-साथ घर की व्यवस्था भी बाई के सहयोग से उन्होंने संभाल ली. अब तो अस्पताल भी कभी-कभी ही चेकअप के लिए जाना होता था. बाज़ार से ज़रूरी सामान भी फोन करने पर आ जाता था. बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य और व्यवस्थित चल रहा था, पर ऊपर से सामान्य दिखनेवाले सुधीरजी अंदर से इतना टूट चुके थे कि एक कंधे का सहारा भी यदि मिल जाता, तो उसके सहारे भरभराकर ढह जाते.

पहले सब कुछ पत्नी को कहकर हल्के हो जानेवाले सुधीरजी अंदर ही अंदर भरते जा रहे थे. ज़िंदगी के इस मोड़ पर अकेले रह जाने का ख़तरा हर व़क्त सिर पर मंडराता प्रतीत होता. कहां तो वे सोचते थे कि उनके ऊंचे ओहदे और बेटी की उच्च शिक्षा के कारण लड़कों की लाइन लग जाएगी और कहां वे उसके लिए एक अदद सुयोग्य वर नहीं जुटा पा रहे थे. उस पर हर व़क्त बीमार पत्नी के सामने ख़ुश, मज़बूत बने रहने का नाटक.

“सब ठीक हो जाएगा. तुम बस चिंता करना छोड़ दो. डॉक्टर ने कहा है अगले सप्ताह से तुम्हारी फिज़ियोथेरेपी आरंभ कर देंगे. उससे तुम बहुत जल्द पहले की तरह घूमने-फिरने लगोगी. बस, तुम अच्छे से खाया-पीया करो और ख़ुश रहा करो.”

“हां दीदी, जीजाजी ठीक कहते हैं. देखो, इतने दिनों में कैसी सूरत हो गई है, वरना कितनी अच्छी लगती थीं! लोग वाणी की बड़ी बहन कहते थे.” आभा उठकर पुराने एलबम उठा लाई. दोनों बहनें एलबम देखने में खो गईं. सुधीरजी को अकेले गुमसुम बैठे देखा, तो साधनाजी बोल उठीं, आप नीचे वॉक कर आइए न! मेरे पास आभा है. कितना व़क्त हो गया आपको सैर पर गए हुए?”

“हं हां! आदत ही छूट गई. ठीक है, मैं घूमकर आता हूं. लौटते में तुम्हारी दवा भी लेता आऊंगा.” सुधीरजी जूते पहनकर सैर पर निकल पड़े थे. सी विंग के सामने से गुज़रे, तो अचानक प्रकाशजी का ख़्याल आ गया. मन में उनसे बतियाने, उनके सम्मुख अपना सुख-दुख उड़ेलने की हूक-सी उठी, पर अपने विगत के व्यवहार का ख़्याल आया, तो क़दम स्वतः ही आगे बढ़ गए. तभी पीछे से ‘भाईसाहब’ की पुकार सुन उनके बढ़ते क़दम ठिठक गए. एक महिला हाथ में थैला उठाए उन्हीं की ओर आ रही थी. पीछे-पीछे घिसटते से प्रकाशजी भी थे. वे काफ़ी कमज़ोर और थके-थके से लग रहे थे.

“अरे क्या हो गया आपको? तबीयत तो ठीक है न?”

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“कहां भाईसाहब! मांजी के जाने के बाद ये तो संभल ही नहीं पा रहे हैं. मैं तो समझा समझाकर थक गई. मांजी से बहुत जुड़ाव था इनका!”

“ओह, कब हुआ यह सब?”

“पूरे 20 दिन होने को आए हैं. न तो वापस काम पर जाना आरंभ किया है, न और कहीं. आज बड़ी मुश्किल से साथ ले जाकर घर का ज़रूरी सामान लेकर आई हूं. आप ही समझाइए इन्हें ऐसे कैसे चलेगा? जाना तो एक दिन सभी को है.” निर्मलाजी ने बिना रुके एक ही बार में मन की व्यथा बयां कर दी थी.

“मुझे तो कुछ पता ही नहीं चला. दरअसल मैं स्वयं भी कुछ व्यक्तिगत परेशानियों में उलझा हुआ था…”

“अरे, ये सब सुनाने के लिए थोड़े ही न रुकवाया था इन्हें. तुम भी न! आइए सर, घर चलिए. चाय पीते हुए इत्मीनान से बातें करेंगे.”

“हां हां!” प्रकाशजी तुरंत साथ हो लिए थे. मानो निमंत्रण के इंतज़ार में ही बैठे थे.

“आप कुछ परेशानियों की बात कर रहे थे. क्या हो गया? दरअसल गांव से मां को लाने के बाद उनके इलाज में इतना उलझा रहा कि आसपास से बेख़बर ही हो गया और फिर भी उन्हें बचा न सका.” चाय की गरम प्याली के साथ वार्तालाप का लंबा सिलसिला चल निकला. दोनों के पास एक-दूसरे को बताने के लिए बहुत कुछ था. सुधीरजी ने बेटी की मुंबई में नौकरी, उसके लिए उपयुक्त वर की खोज, पत्नी की बीमारी आदि के बारे में खुलकर बताया. तभी गरम पकौड़ों की प्लेट लिए शिल्पी भीतर प्रविष्ट हुई.

“मेरी भतीजी शिल्पी! पास ही नारायणा अस्पताल में फिज़ियोथेरेपिस्ट है.”

“अच्छा! डॉक्टर ने साधना को भी फिज़ियोथेरेपी के लिए बोला है. मैं आपको रिपोर्ट्स दिखाऊंगा. आप प्लीज़ उन्हें घर आकर करवा दीजिए.”

शिल्पी के हां करते ही सुधीरजी ने राहत की सांस ली.

“एक मसला तो हल हुआ. प्रकाश, तुमने कोई नौकरी जॉइन की है?”

“पास ही एक प्राइवेट फमर्र् है. अच्छा व़क्त निकल जाता है. चार पैसे मिलते हैं सो अलग. आप करना चाहेंगे सर?”

“सर कहकर शर्मिंदा न करो. अब हम दो सेवानिवृत दोस्त हैं. वैसे बात करना वहां, मेरे लायक कुछ काम हो तो!”

“जी! एक और बात भी कब से कहना चाह रहा था. छोटा मुंह बड़ी बात होगी. पर आज अवसर मिला है, तो कहे देता हूं. हम दोनों को ही आपकी बेटी वाणी अपने बेटे के लिए बहुत पसंद है.”

ख़ुशी से सुधीरजी की आंखें नम हो आई थीं. काश! उन्होंने चाय का निमंत्रण पहले स्वीकार लिया होता. सही कहा गया है कि बांटने से सुख बढ़ता है और दुख घटता है. इसीलिए जब कोई आपको एक कप चाय के लिए आमंत्रित करता है, तो इसका तात्पर्य है कि वह आपके साथ ज़िंदगी के वे पल बांटना चाहता है, जो अभी तक अनकहे, अनसुने हैं. वह कुछ आपकी सुनना, तो कुछ अपनी सुनाना चाहता है.

लौटते में उनका मन फूल-सा हल्का था. एक कप चाय के साथ वे चीनी-सी मीठी यादें और चायपत्ती-सी कड़वी दुखभरी बातें, जो शेयर कर आए थे.

 

Anil Mathur

     अनिल माथुर

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कहानी- खूंटे से बंधी (Short Story- Khute Se Bandhi)

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कितना अजब है न हमारे समाज में विवाह संबंध तय करने का तरीक़ा! लड़की को एक बार लड़के से मिलवाकर हुकुम हो जाता है कि तुम्हें अब उम्रभर इसी व्यक्ति से प्यार करना है. वह क्रूर हो, तुम्हारी परवाह न करे, तो भी उसकी लंबी उम्र की दुआ मांगनी है. उसके लिए व्रत-उपवास रखने हैं.

एक ही जीवन में कितने रंग बदल लेती है यह ज़िंदगी! कभी अरुणोदय का नव उल्लास लिए सामने आ खड़ी होती है, तो कभी थकी-हारी अस्पताल की ओर क़दम बढ़ाती संध्या-सी. सांझ गहराकर काली रात बन जाए चाहे, परंतु एक विश्‍वास अडिग रहता है कि अंधियारा छंट ही जाएगा, अरुणोदय फिर होगा. पर मेरे जीवन में तो नव अरुणोदय की कोई गुंजाइश ही नहीं बची है. दंड भोग रही हूं बिना अपराध किए. नहीं! अपराध तो किया था मैंने, अपनी ख़ुशियों के ख़्वाब देखकर. स़िर्फ देखे ही नहीं थे ये ख़्वाब, उन्हें पूरा करने की उम्मीद भी की थी.

मैंने भी आपको किस बेकार के दर्शन में उलझा दिया. चलो शुरू से ही बताती हूं. पिता सरकारी नौकरी में थे, तो उनका अक्सर तबादला होता रहता था. स्कूल तक तो चल गया, पर कॉलेज के लिए उन्होंने मुझे चंडीगढ़ के एक होस्टल में डाल दिया. होस्टल के तीन वर्ष मेरी रूम पार्टनर रही गौरी से मेरी ख़ूब पटती थी और बीए करने के बाद हमने एक संग बीएड करने का फैसला लिया. यहां होस्टल तो था नहीं, सो एक कमरा किराए पर ले लिया. मां ने कहा, “हर रोज़ बाहर खाने से अच्छा है दोनों मिल-जुलकर बना लिया करो. इसी बहाने सीख भी जाओगी.” गौरी की मम्मी ने भी इसी बात का अनुमोदन किया. गौरी को रसोई का बिल्कुल शौक़ नहीं था, सो वह काट-पीटकर देती और मैं बना देती. शुरू में तो कुछ दिक़्क़तें आईं. कभी दाल में नमक ज़्यादा हो जाता, तो कभी चावल कच्चे रह जाते, लेकिन मज़ा आ रहा था. मैं व्यंजन सीखने की किताबें भी ख़रीद लाई. नए-नए प्रयोग करने लगी.

गौरी के बड़े भाई कपिल चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में व्याख्याता बनकर आ गए और छुट्टी के दिन बहन से मिलने आते, तो हम उन्हें भोजन के लिए रोक लेते. घर का बना भोजन उन्हें भी अच्छा लगता था और मेरी पाक कला की तारीफ़ हो जाती. पहले तो मैं सकुचा जाती थी, प1314र धीरे-धीरे मेरी झिझक दूर होने लगी. हमारी बातें अक्सर किताबों को लेकर ही होतीं. उन्हें पढ़ने-पढ़ाने, दोनों का ही बहुत चाव था. हम दोनों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते. हमें कोर्स के इतर भी पढ़ने की प्रेरणा देते. नई किताबें लाकर देते. उन दिनों लड़कियों पर बहुत प्रतिबंध थे और वह हमारे अनेक काम कर आते. कोई अच्छी मूवी लगने पर वह भी दिखा लाते. उनके साथ हम स्वयं को बहुत सुरक्षित महसूस करतीं.

मेरे साथ उनकी मैत्री बढ़ रही थी, मज़बूत हो रही थी. हमारा अलग-अलग प्रांतों से होना इसमें आड़े नहीं आ रहा था. कपिल में उद्वेग और उन्माद नहीं, सच्चाई और निश्‍चय था. गौरी गवाह थी हमारी मैत्री की, सहमत और ख़ुश भी. मैं आश्‍वस्त थी अपने भविष्य के प्रति. मुझे विश्‍वास था मां-पापा को मैं मना लूंगी.

परीक्षा देकर घर लौटी, तो कपिल के संग मेरी मैत्री की ख़बर मुझसे पहले वहां पहुंच चुकी थी. पापा बहुत क्रोध में थे. पापा की तबादलेवाली नौकरी के कारण दादाजी सदैव चाचाजी के घर एक ही स्थान पर रहना पसंद करते आए थे, पर इन दिनों वह भी हमारे घर आए हुए थे. इन लोगों ने मेरे लिए चार-पांच लड़के पहले से ही छांट रखे थे. हफ़्ता-दस दिन में मिलना-मिलाना कर जिस लड़के ने ‘हां’ की, उसी से रिश्ता तय कर दिया गया और दो महीने बाद की विवाह की तारीख़ भी पक्की कर दी गई. उसके लंबे समय बाद तक कोई शुभ मुहूर्त नहीं था.

मैंने मां को कपिल की पूरी बात बता दी थी. यह भी कहा कि एक बार पापा उससे मिल लें. उन्हें मंज़ूर नहीं होगा, तो मैं हठ नहीं करूंगी. मां तो राज़ी हो गईं, पर दादाजी की उपस्थिति के कारण उनकी एक न चली. हम जैन और वह अग्रवाल. यहीं कपिल का सबसे बड़ा अपराध हो गया. विभिन्न धर्म का होना ही एकमात्र अड़चन नहीं होती विवाह संबंध स्थापित करने के लिए. और भी बहुत सारे व्यवधान खड़े किए जा सकते हैं और दादाजी की दबी चेतावनी के अनुसार तो ‘मेरा स्वयं अपने लिए वर ढूंढ़ लेना मेरे दुश्‍चरित्र होने का प्रमाण था’ और यथाशीघ्र मुझे विवाह बंधन में बांधना उसका एकमात्र उपाय. दादाजी के आगे मां का वजूद न के बराबर रह जाता. मेरे कारण उन्हें बहुत कुछ सुनना पड़ा था. सारा कुसूर ही दरअसल उनके सिर पर मढ़ दिया गया… लड़की को वश में न रखने का.

अब मुझे क्या फ़र्क़ पड़ना था कि मेरा रिश्ता किससे तय हुआ है. पापा ने अपने हिसाब से तो सब जांच-पड़ताल कर ही ली होगी. फ़र्क़ बस यह है कि ऐसी जांच-पड़ताल में दूल्हे की शिक्षा, खानदान, रंग-रूप ही देखे जाते हैं. पूरी उम्र साथ रहने के लिए एक-दूसरे के विचार, पसंद-नापसंद जैसी बातों को अहमियत नहीं दी जाती. सो विवाह हो गया. मेरी मोहब्बत निःशब्द छटपटाती रह गई.

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चंडीगढ़ के अपने अध्याय को मैंने अपनी यादों से पूरी तरह से मिटा दिया.  मुश्किल यह है कि जीवन किसी कंप्यूटर पर लिखी इबारत नहीं कि डिलीट पर हाथ रखते ही सब साफ़ हो जाए. बहुत गहरे पैठे होते हैं हमारे जज़्बात. पक्की स्याही से लिखे हुए. उसे मिटाने की कोशिश में जो निशान छूट जाता है, कुछ उसी तरह अधूरी रह गई कामनाएं भी गहरे घाव छोड़ जाती हैं मन पर, जिन्हें समय भी भरने में विफल रह जाता है. उम्र भर टीसते हैं, दर्द करते हैं ये घाव.

कितना अजब है न हमारे समाज में विवाह संबंध तय करने का तरीक़ा! लड़की को एक बार लड़के से मिलवाकर हुकुम हो जाता है कि तुम्हें अब उम्रभर इसी व्यक्ति से प्यार करना है. वह क्रूर हो, तुम्हारी परवाह न करे, तो भी उसकी लंबी उम्र की दुआ मांगनी है. उसके लिए व्रत-उपवास रखने हैं. मुस्कुराकर अपने सब कर्त्तव्य निभाने हैं. रमण नहीं चाहते थे कि मैं नौकरी करूं, तो मैंने नौकरी का विचार छोड़ दिया, पर उनकी हर ख़ुशी का ख़्याल रखने पर भी तो रमण को मेरे

दुख-दर्द से कोई सरोकार नहीं था. पहला गर्भ मिसकैरेज हो गया. स्थिति गंभीर थी, मुझे अस्पताल छोड़कर रमण काम पर चले गए… “डॉक्टर तुम्हारा इलाज करेंगे, मुझे बैठकर क्या करना है.”

अगले वर्ष जब बिटिया हुई, तो पांच दिन मैं रही अस्पताल में. साफ़ कह दिया, “मैं रोज़-रोज़ नहीं आऊंगा. यहीं किसी आया का इंतज़ाम कर लेना.” सास नहीं थी, पर मां तो आने को तैयार थीं, उन्हें भी मना कर दिया. बिटिया एक माह की हुई, तो मित्रों संग घूमने जाने का कार्यक्रम बना डाला. बहाना था, “रात को ठीक से सोने नहीं देती तुम्हारी बेटी.”

ईश्‍वर ने स्त्री को दिल और दिमाग़ क्यों दे दिए? न दर्द महसूस होता, न दुख होता उसे.

मेरे सुख-दुख से बेख़बर समय चक्र चलता रहा. बिटिया पांच वर्ष की होने को आई कि एक सांझ चार बजे के लगभग टेलीफ़ोन बजा. कपिल की आवाज़, “तुम्हारे शहर आया हुआ हूं. तुमसे मिलना चाहता हूं एक बार.” वर्षों से मृतप्राय पड़ा दिल धड़कने लगा, अचानक… ज़ोर-ज़ोर से.

सवाल यह नहीं था कि मेरे मना करने से वह मानेगा कि नहीं? सवाल यह था कि मैं स्वयं को कपिल से मिलने से रोक सकती थी क्या? सो मैंने उसे अगले दिन सुबह ग्यारह बजे आने को कह दिया.

कितना बदल चुके थे कपिल! बाहर कहीं देखती, तो पहचान भी न पाती शायद. उत्साहविहीन, थके-हारे-से. छह वर्ष में दस वर्ष बुढ़ा गए से.

धीरे से पूछा, “कैसी हो?” मुझे नहीं लगता उन्होंने उत्तर पाने के लिए प्रश्‍न किया था. कुछ पल ख़ामोश रहे, इधर-उधर नज़र घुमाई. धीमे से कहा, “तुमने ठीक ही निर्णय लिया अनुभा. कॉलेज का एक प्रोफेसर तुम्हारे लिए ये सारे ऐशो-आराम कहां से जुटा पाता. दुख बस यही है कि तुमने मुझे समय काटने का माध्यम बनाया, जिसे मैं तुम्हारा प्यार समझ बैठा और वास्तव में प्यार करने लगा तुम्हें.”

कपिल के प्यार की सच्चाई पर न मुझे तब संदेह था, न आज ही है, पर उन्होंने मेरे प्यार को खिलवाड़ कैसे मान लिया? क्यों नहीं समझ पाए मेरी मजबूरी को? बिना मेरा पक्ष जाने मुझे दोषी करार दिया. नहीं जानते थे क्या कपिल कि लड़कियों के विवाह में घर के बड़ों का निर्णय ही अंतिम रहता है? शहरों के कुछ अपवादों को छोड़कर, आज भी.

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परंतु उनका क्रोध भी तो यही दर्शा रहा था कि उनके मन में आज भी मेरे लिए विशेष स्थान है. नहीं चाहती थी कि यह संदेह उम्रभर बना रहे. नाश्ते का प्रबंध तो मैंने पहले ही कर रखा था. फ़टाफ़ट चाय भी बना लाई, ताकि इत्मीनान से बैठकर बातें कर सकूं.

“मेरा पक्ष जाने बग़ैर ही आपने मुझे दोषी करार दिया कपिल और मैं यह माने बैठी थी कि आपने ज़रूर मेरी मजबूरी समझी होगी. गौरी ने भी मुझसे नाता तोड़ लिया. एक बार तो पूछ लिया होता कि ऐसा क्यों हुआ आख़िर!”

उनके चेहरे पर उदासी एवं पश्‍चाताप की एक मिली-जुली-सी लहर गुज़र गई.

“चंडीगढ़ से लौटी, तो घर का माहौल बदला हुआ था. पापा और दादू दोनों ही क्रोध में थे. मां की सहानुभूति मेरे साथ थी और दादाजी वहां न होते, तो पापा को मनाना उतना कठिन न होता. परंतु दादाजी के सामने बोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी. मां की आंखों में जब-तब आंसू आ जाते, जिन्हें वह ‘आंख में कुछ पड़ गया है’ कहकर मुझे भरमाने का असफल प्रयत्न करती रहतीं. भाई के स्कूल का अंतिम वर्ष था. उसकी पढ़ाई में हर्जा हो रहा था. उस पर मेरे दुर्भाग्य से पड़ोस की एक लड़की अपने सहकर्मी के संग भाग गई. बाद में पता चला कि वह पुरुष तो पहले से ही विवाहित था. आस-पड़ोस का माहौल गर्म था और मुझे बिना लड़े ही हार स्वीकार कर लेनी पड़ी.

क्यों हमारे सामाजिक कर्णधारों ने स्त्री की स्थिति इतनी निर्बल बना दी. किसी गाय की तरह एक खूंटे से खोलकर दूसरे से बांध दो. गाय को कोई पूछता है भला कि तुम्हें

कौन-से घर जाना है? शहरों में स्थिति कुछ बदल रही है, पर अभी सदियां लगेंगी स्त्री को अपनी इच्छानुसार जी पाने में.”

जाते समय कपिल ने मेरा हाथ लेकर अपने माथे से लगा लिया. बोला कुछ नहीं, बस, नज़रभर देखा और उस नज़र ने स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने मुझे माफ़ कर दिया है. न ही मैं उनके बारे में कुछ पूछ पाई, न ही फिर मिलने की बात हुई. मैं इतने में ही संतुष्ट थी कि मैंने उनकी ग़लतफ़हमी दूर कर दी है.

सामाजिक व्यवस्था को कुबूल कर उसी में रच-बस गई थी मैं. बचपन में बेजान गुड़ियों के संग खेलती थी, अब तो जीती-जागती गुड़िया थी मेरे पास. मैंने दूसरों द्वारा खींची लीक पर चलकर जीवन जिया था. अपनी बेटी को इस क़ाबिल बनाऊंगी कि वह अपनी लीक ख़ुद तय करे.

दस वर्ष और बीत गए इस बात को कि एक हादसा हो गया. रमण की मृत्यु हो गई. मित्रों के संग पहाड़ों पर घूमने निकले थे कि नदी के पुल से गुज़रते वक़्त रेल पटरी से उतर गई और रेलिंग तोड़ती नदी में गिरने लगी. बहुत-सी बोगियां हवा में लटकती रह गईं. कुछ सवारियां बचा ली गईं, परंतु मरनेवालों की संख्या अधिक थी और उनमें एक नाम रमण का भी था. शायद मुझे मेरे अपराध का ही दंड मिला था. शायद मैं उस तरह का समर्पण नहीं कर पाई थी, जितना उन्हें अधिकार था.

मैंने घर में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया. पढ़ाने का शौक़ तो मुझे था ही. बिटिया स्कूल पास कर कॉलेज आ गई थी, आत्मविश्‍वास से भरपूर. अब वह मेरी बेटी नहीं, मेरी सहेली बन गई थी. रमण ने तो कभी अपना सुख-दुख बांटने के क़ाबिल नहीं समझा था मुझे, पर बिटिया कॉलेज से लौटती, तो बैठकर दिनभर के क़िस्से सुनाती. लड़कों से मिलनेवाले कॉम्पलीमेंट तक बताती. मुझे तसल्ली थी कि मैं सब जानती हूं उसके बारे में. पर वह कुछ नहीं जानती थी मेरे बारे में. मैंने उसे बताया ही कब था?

अपनी नानी से उसकी ख़ूब पटती थी. जब तक पति जीवित थे, तो वह केवल

तीज-त्योहार देने ही आती थीं हमारे घर. पर अब यदा-कदा आकर हमारे पास रह भी जातीं. हमारा मन भी लगा रहता. बिटिया ने सहसा अपनी सखी निशा के घर चंडीगढ़ जाने का कार्यक्रम बना लिया, तो नानी को मेरे पास रुकने के लिए बोल गई. चार दिन बाद लौटी, तो उसके संग मेरी बिछुड़ी सखी गौरी! मैं आश्‍चर्यचकित. गले मिली, तो मेरी अश्रुधारा ही बह निकली. आंसू गौरी से मिलने की ख़ुशी के थे अथवा नसीब पलट जाने के ग़म में, कह नहीं सकती. मैंने बिटिया से पूछा, “तुम तो निशा से मिलने गई थी, यह कहां मिल गई तुम्हें?” तो बड़े चैन से बैठते हुए बोली, “इन्हीं भाई-बहन को खोजने तो गई थी मैं चंडीगढ़, निशा की मदद से.”

मैं एकदम से सब के सामने पूछ नहीं पाई कि ‘तो फिर भाई कहां है?’

मां से ही पता चली थी उसे पूरी बात. उम्र का अंतर भूल दोनों सहेलियों-सी ही बतियाती रहतीं. उस दिन हम सब देर तक बैठे बात करते रहे. कपिल का जब भी नाम आता, गौरी भेदती नज़र से मेरी ओर देखती. क्या पढ़ना चाहती थी वह मेरे चेहरे पर? उम्र गुज़ार दी मन मारकर जीते हुए. अभी भी मेरे चेहरे पर कोई भाव उभरता था क्या? पर फिर भी मैं मन का चोर छुपाने इधर-उधर देखने लगती.

रात को गौरी को मेरे कमरे में ही सोना था. एकांत पाते ही मैंने उससे कपिल के बारे में पूछा. मेरे मन में तो कपिल के लिए सदैव दुआएं ही निकली थीं. वह स्वस्थ और प्रसन्न रहे यही चाहती थी मैं. यह सोचा भी नहीं था जो गौरी ने बताया, “कुछ माह पूर्व उसे डॉक्टरों ने कोलन कैंसर बताया था. ऑपरेशन तो हो चुका है और ठीक होने की पूरी संभावना है, किंतु इलाज अभी लंबा चलना है. मैं अपनी तरफ़ से पूरी देखभाल कर रही हूं, परंतु स्कूल जाते बच्चे, बीमार सास-ससुर और पति. चाहकर भी तो दिन में एक ही चक्कर लगा पाती हूं. एक केयरटेकर रखा हुआ है, वही देखभाल कर रहा है.”

“…पर उनके अपने परिवार के लोग? पत्नी, बच्चे?” मैंने बीच में ही टोकते हुए पूछा.

“अरी पगली! उसने विवाह ही कब किया कि आज उसे देखनेवाला कोई होता. बहुत कोशिश की मम्मी-पापा ने, आख़िरी दम तक, पर भैया माने ही नहीं. न ही कभी कारण बताया. कारण तो बस मैं ही जानती थी…”

मैंने उसी क्षण एक निर्णय लिया और अपना सामान अटैचीकेस में डालने लगी. गौरी को सुबह पहली बस से जाना था और उसके साथ मुझे भी.

Usha Vadwa

      उषा वधवा

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कहानी- मेकअप (Short Story- Makeup)

Kahani

मेकअप की पारंगतता इसी में है कि दोष छुप जाएं और गुण उभरकर आएं. चेहरे पर मेकअप की कला से एक स्त्री किसी को भी कुछ समय के लिए दीवाना बना सकती है. पर ग़लतियों और कमज़ोरियों पर मेकअप करके उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए अपना बना सकती है. पति-पत्नी के संबंध मधुर बनाए रखने में तो यह गुर विशेष काम आता है.

बेटी के संग बातचीत में तल्लीन वसुधाजी का ध्यान दीवारघड़ी की ओर गया, तो वे चौंकीं, “उठ, अब थोड़ा बाल वगैरह ठीक कर ले.”

“क्यों?” मां का मंतव्य समझकर श्रुति का मूड उखड़ गया था.

“अरे क्यों क्या? प्रेज़ेंटेबल बने रहने का ज़माना है. देख मैं भी तैयार होती हूं.” कहते हुए वसुधाजी उठकर अपने कपड़े-बाल आदि ठीक करने लगीं.

“रहने दो. आपको ज़रूरत नहीं है बनने-संवरने की. भगवान ने आपको खुले हाथों से रंग और रूप दिया है. मेकअप की परतें चढ़ाने की आवश्यकता तो मुझे है.” श्रुति बुझे मन से दर्पण के सामने जाकर बाल संवारने लगी थी.

“लो, भगवान ने इतनी सांवली सूरत मोहिनी मूरत बनाया है, फिर भी रोना रोए जा रही है. अरे, आजकल तो ज़माना ही डस्की ब्यूटी का है. हीरोइन्स को देखा नहीं?” अपने प्रयास में वसुधाजी सफल रहीं. श्रुति के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई थी. वसुधाजी उत्साहित हो उठीं.

“और किसने कहा कि मुझे मेकअप की आवश्यकता नहीं है? मैं तो बचपन से ही मेकअप करती आ रही हूं. अरे, मेकअप तो हम स्त्रियों का जन्मसिद्ध अधिकार है. बल्कि जन्मसिद्ध स्वभाव कहना अधिक उपयुक्त होगा.”

श्रुति के चेहरे पर नासमझी के भाव देख वे आगे बोलीं, “औरतें स़िर्फ चेहरे पर मेकअप नहीं करतीं, बल्कि घर, परिवार, पति, बच्चे सभी की ग़लतियों और कमज़ोरियों पर मेकअप करती रहती हैं. जब मैं छोटी थी, तो अक्सर छोटे भाई की ग़लतियों पर मेकअप करती थी. वह बहुत शैतान था. उससे दादाजी का चश्मा टूट गया, तो वह खेलने के बाद घर लौटने को राज़ी ही नहीं हुआ. मैं उसे समझा-बुझाकर घर लाई. झूठ बोला कि चश्मा मुझसे टूट गया. हालांकि किसी को विश्‍वास नहीं हुआ, पर हल्की डांट-डपट के बाद मामला शांत हो गया. मुझे संतोष था कि मैंने भाई को बचा लिया.”

“ऐसा तो मैंने भी किया है. आपको याद है गुल्लू का बर्थडे था. हम मॉल गए थे. वहां गुल्लू को 6000 के जूते पसंद आ गए थे. आपने दिलाने से इंकार कर दिया था..”

“हां… हां! बाद में वो तेरे साथ जाकर सस्ते वाले जूते लेकर आया था.” वसुधाजी को याद आ गया.

“नहीं, वे 6000 वाले ही थे. मैंने अपने स्कॉलरशिप के पैसे उसमें जोड़कर दिलवाए थे.”

“क्या? ख़ैर छोड़ो! मैं यही तो कह रही हूं कि मेकअप करना स्त्रियों का जन्मजात स्वभाव है… मैं पढ़ाई में आरंभ से ही अच्छी थी और तेरे मीकू मामा बस ठीकठाक. अच्छे नंबर आने के कारण मुझे बाहर के अच्छे कॉलेजों में प्रवेश मिल रहा था. लेकिन वहां की पढ़ाई महंगी थी. मां-पापा को बेटी को दूसरे शहर भेजने की हिचकिचाहट भी थी. बेटे को डोनेशन से प्रवेश दिलाना होगा. इस संभावना के मद्देनज़र पैसे भी जमा करने थे, इसलिए मुझे अपने ही शहर के सामान्य कॉलेज में प्रवेश दिलवा दिया गया. मैंने उनकी मजबूरी समझी और यह कहकर कि मुझे तो वैसे ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करनी है, उनकी मजबूरी को सबसे ढांपे रखा.

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यही नहीं, प्रतियोगी परीक्षा में सफल होकर उनकी इज्ज़त बढ़ाई भी. उस व़क्त उनके चेहरे पर शर्मिंदगी, कृतज्ञता और गर्व के मिले-जुले भाव देख मुझे एहसास हुआ कि ये सब मैं उन्हें खरी-खोटी सुनाकर नहीं पा सकती थी. उनकी ग़लती या मजबूरी पर मेकअप करके मैं उनकी नज़रों में ऊंचा उठ गई थी. जब शादी होकर ससुराल आई, तो दोनों घरों के आर्थिक स्तर में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ पाया, पर मैंने कभी मायके की तंगी ज़ाहिर नहीं होने दी. विभिन्न अवसरों पर मायके से आनेवाले उपहार, मिठाई आदि मैं अपने स्तर पर ही ससुराल भिजवाती रही. इस तरह दोनों परिवारों में स्नेह-सौहार्द बना रहा. वे जब भी कहीं परस्पर मिलते, आत्मीयता से मिलते. बेटी, कोई भी संबंध तोड़ने में एक सेकंड लगता है, पर जोड़ने में बरसों लग जाते हैं. फिर मेरी गोद में तू आ गई. एक तो दोनों परिवारों की बेटे की अपेक्षा, फिर तेरा दबा रूप-रंग! सच कहूं एकबारगी तो मेरा भी जी धक से रह गया था, पर फिर सोचा अपनी कोखजायी संतान का यदि मैं ही आदर नहीं करूंगी, तो दूसरा कौन करेगा? बस, ऐसा सोचना था कि छाती से ममता का सोता-सा फूट पड़ा. मैंने तुझे सीने से लगाकर ख़ूब ख़ुशी और संतोष ज़ाहिर किया. मेरी प्रसन्नता देख औरों के चेहरों पर भी मुस्कान आ गई और सबने तुझे सीने से लगा लिया था. तेरे लालन-पालन में मैंने अतिरिक्त सतर्कता बरती. चुन-चुनकर तेरे लिए खिलते रंग के आकर्षक परिधान ख़रीदकर लाती. तुझे अच्छा खिलाती-पिलाती. शहर के सबसे महंगे कॉन्वेंट स्कूल में तुझे दाख़िला दिलवाया. यदि कोई दबे स्वर में भी कह देता कि काश बेटी रंग-रूप में मां पर गई होती, तो मैं तिलमिला उठती थी.”

“यह तो मुझसे कहीं ज़्यादा स्मार्ट और आकर्षक है. बिल्कुल मॉडल जेैसे तीखे नैन-नक्श हैं. उस पर इतना तेज़ दिमाग़! इसके लिए तो लड़कों की लाइन लग जाएगी. और देख वही हुआ. अपने सहपाठी आकाश को तू इतना भा गई कि उसने ख़ुद आगे बढ़कर तेरा हाथ मांग लिया.” वसुधाजी ने गर्व से बेटी की ओर ताका, तो पाया उनकी बातें सुनते हुए वह कहीं खो-सी गई है. शायद आकाश के साथ अपने कॉलेेज के दिन याद कर रही है. काश दोनों के बीच सब कुछ पहले जैसा ही हो. जिस आशंका के मारे वे भागी-भागी यहां चली आई हैं, वह निर्मूल निकले. पिछले कुछ समय से वसुधाजी महसूस कर रही थीं कि फोन पर वार्ता के दौरान श्रुति उखड़ी-उखड़ी रहने लगी थी. किसी बात का ढंग से जवाब नहीं देती थी. ज़्यादा कुरेदो, तो झुंझला जाती थी. उन्होंने आकाश से अलग से बात करने की सोची, पर कर नहीं पाईं. मन में धंसा संदेह का कांटा जब गहरी टीस देने लगा, तो आख़िरकार एक दिन वे उनके पास आ ही पहुंचीं. दोनों ही उन्हें अचानक आया देख चौंक उठे थे.

“अर्चना डिलीवरी के लिए मायके गई हुई है. उसके लौटने पर बच्चे का काम बढ़ जाएगा. तब मेरा निकलना संभव नहीं हो पाएगा, इसलिए सोचा तुम लोगों के पास अभी रह आऊं.”

“अच्छा किया आपने.” कहकर आकाश तो निकल लिया था. पर श्रुति आश्‍वस्त नहीं हो पा रही थी.

“भैया के खाने का क्या होगा?”

“वह ऑफिस मेस में खा लेेगा. तू उसकी चिंता छोड़. यह तूने अपना और घर का क्या हाल बना रखा है? सब ठीक तो है?”

“हं..हां, ठीक है. मुझे क्या हुआ है?” श्रुति हड़बड़ा गई थी.

“नहीं, फोन पर भी तू खुलकर बात नहीं करती. मुझे लगा कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है.”

“क्या मां कुछ भी सोच लेती हो? बस थोड़ा ऑफिस में वर्कलोड ज़्यादा हो जाता है, तो चिड़चिड़ापन आ जाता है.” श्रुति नज़रें चुराने लगी, तो वसुधाजी ने वार्ता को वहीं विराम दे दिया था. वे तो भूल ही गई थीं कि श्रुति भी तो एक स्त्री है. मेकअप का स्वाभाविक गुण तो उसमें भी होगा. मेकअप की परतों के पीछे छुपे सच को जानने, सुलझाने के लिए उन्हें धैर्य रखना होगा.

श्रुति भी समझ रही थी कि मां को उसके दर्द का अंदेशा हो गया है, पर वह ख़ुद आगे होकर मां को कैसे बताए कि उसके और आकाश के बीच इन तीन सालों में काफ़ी कुछ बदल गया है. आकाश अब लगभग रोज़ ही ऑफिस से देरी से लौटने लगा है. न उसे पहले जितना व़क्त देता है, न प्यार. श्रुति को तो यह भी आशंका है कि वह किसी और लड़की के चक्कर में तो नहीं है. मां की ज़िंदगी में वैसे ही कितनी परेशानियां हैं. एक तो पापा का असामयिक देहावसान, फिर भाभी का व्यवहार भी उनके प्रति कुछ ख़ास अच्छा नहीं है. हालांकि मां ने कभी कुछ नहीं बताया. वे तो हर व़क्त भाभी के व्यवहार पर लीपापोती करती रहती हैं, ताकि श्रुति परेशान न हो. पर वह सब समझती है. नहीं, वह मां पर और चिंता का बोझ नहीं लादेगी. अपनी समस्या वह आप ही सुलझा लेगी. वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर स्वाभिमानी स्त्री है. जल्द ही वह आकाश से दो टूक बात कर अलग हो जाएगी. वह तो मां के अचानक आ जाने से उसकी योजना धरी रह गई थी. मां के सम्मुख अब तो वह आकाश के साथ भी अच्छे से पेश आने लगी थी.

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वसुधाजी को आए 10 दिन होने को थे. श्रुति ने ग़ौर किया कि आकाश न केवल व़क्त पर घर आने लगा था, वरन उससे हंस-हंसकर बातें भी करने लगा था. काम में भी हाथ बंटाने लगा था. काश मां कुछ दिन और रुक जाएं. काश मां कभी जाएं ही नहीं. यह भ्रम हमेशा बना ही रहे कि आकाश अब भी मुझसे प्यार करता है… नहीं, अब मां चली जाएं, ताकि वह इस मरीचिका से बाहर आकर आकाश से अलग होने के अपने निर्णय को क्रियान्वित कर सके. वसुधाजी बेटी के चेहरे पर आते उतार-चढ़ावों को ग़ौर से देख रही थीं. पर नारीजनित मेकअप की परतें इतनी गहरी थीं कि मन के सही-सही भाव का कयास लगाना दुश्कर प्रतीत हो रहा था.

डोरबेल बजी, तो दोनों की तंद्रा भंग हुई. श्रुति ने जल्दी-जल्दी चेहरे के मेकअप को अंतिम टच दिया और जाकर दरवाज़ा खोल दिया. आकाश की प्रशंसा भरी नज़रें श्रुति के चेहरे पर जम-सी गई थीं. नवयौवना की तरह शरमाकर झेंपते हुए श्रुति ने अंदर आने के लिए रास्ता दे दिया. अपने व्यवहार पर वह ख़ुद अचंभित थी.

“आज चाय-नाश्ता मैं तैयार करती हूं.” कहते हुए वसुधाजी रसोई में चली गई थीं.

“मैं फ्रेश होकर आता हूं, तब तक तुम भी चेंज कर लो. मूवी देखने चल रहे हैं. डिनर भी बाहर ही करेंगे.” श्रुति के जवाब की प्रतीक्षा किए बिना आकाश बाथरूम में घुस गया, तो श्रुति के पास चेंज करने के अलावा कोई विकल्प शेष न रहा. वसुधाजी चाय-नाश्ता लेकर लौटीं, तो श्रुति को दूसरी ड्रेस में तैयार देख बोल उठीं, “अरे, आज कहीं बाहर जाने की तैयारी है?”

श्रुति झेंप गई. बाहर आते आकाश ने जवाब दिया, “आप भी चलिए न मम्मीजी. मूवी के बाद डिनर भी बाहर ही करने का प्लान है.”

“हां मां, चलिए न.” श्रुति ने आग्रह किया.

“नहीं, मैं तो घर पर ही पसंदीदा सीरियल देखूंगी. खाना भी हल्का ही लूंगी दलिया वगैरह. तुम लोग हो आओ.”

श्रुति समझ गई पति-पत्नी को क़रीब लाने का यह मां का एक और मेकअप है, वरना क्या वह नहीं जानती कि मां को मूवी देखना और बाहर खाना कितना पसंद है! आकाश का रोमांटिक मूड और छलकता प्यार भी इशारा कर रहा था कि वह अकेले में कुछ कहना चाहता है. श्रुति ओैर आग्रह किए बिना निकल ली. वसुधाजी के चेहरे पर मुस्कुराहट दौड़ गई. मूवी से लौटते समय आकाश ने एक शोरूम के बाहर कार रोकी तो श्रुति चौंकी.

“अरसा हो गया तुम्हारे लिए कोई तोहफा नहीं लिया. चलो, सुंदर-सी ड्रेस सिलेक्ट करो.”

श्रुति के लिए एक महंगी और ख़ूबसूरत सी डे्रस लेने के बाद आकाश ने वसुधाजी के लिए भी एक साड़ी ख़रीदवाई. श्रुति उसके चेहरे पर आते पश्‍चाताप और कृतज्ञता के मिले-जुले भाव देख प्रभावित थी. रेस्तरां में भी उसने श्रुति की पसंदीदा फिश ऑर्डर की. श्रुति मन ही मन दस दिन पहले की और आज की स्थिति की तुलना कर रही थी. जब वह आकाश को खरी-खरी सुनाकर उससे अलग होने का सोच रही थी. वो तो अचानक मां आ गईं. उसे बिगड़े हुए हालात पर मेकअप करना पड़ा. और सारा परिदृश्य ही बदल गया. श्रुति के कानों में मां के शब्द गूंज रहे थे.

“बेटी, हर लड़की मेकअप का गुर मां के पेट से सीखकर आती है. हम चेहरे का मेकअप परफेक्ट कब मानते हैं, जब वो चेहरे के साथ इतना एकसार हो जाए कि लगे ही नहीं कि मेकअप किया गया है. एक स्त्री को अपने घर, परिवार, दोस्तों की ग़लतियों और कमज़ोरियों पर भी इस तरह मेकअप करना चाहिए कि सामनेवाले को एहसास न हो कि उसे ज़लील किया जा रहा है या उस पर कोई एहसान लादा जा रहा है. मेकअप की पारंगतता इसी में है कि दोष छुप जाएं और गुण उभरकर आएं. चेहरे पर मेकअप की कला से एक स्त्री किसी को भी कुछ समय के लिए दीवाना बना सकती है. पर ग़लतियों और कमज़ोरियों पर मेकअप करके उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए अपना बना सकती है. पति-पत्नी के संबंध मधुर बनाए रखने में तो यह गुर विशेष काम आता है. पति-पत्नी का संबंध दांत और जिह्वा की तरह होता है. एक सख्त और स्थिर है, तो दूसरी कोमल और चपल. पति कभी-कभी पत्नी पर अंकुश लगाता है, पर दांतों की तरह उसे आगोश में छुपाता भी है. दांत के बीच जब कुछ फंस जाता है, तो जिह्वा को झट पता चल जाता है और वह तुरंत उसे निकालने पहुंच जाती है और तब तक प्रयत्नरत और बेचैन रहती है, जब तक वह कचरा निकल नहीं जाता. कैसे भी हालात हों, दोनों अपना काम करते हमेशा साथ बने रहते हैं. मुंह के अंदर क्या चल रहा है, दोनों न चाहें तब तक बाहर किसी को पता भी नहीं चल पाता.”

ख़्यालों में खोई खाना खाती श्रुति को ध्यान ही नहीं रहा कब एक कांटा गले में अटक गया. वह बुरी तरह खांसने लगी. बौखलाया-सा आकाश कभी उसकी पीठ सहला रहा था, तो कभी पानी पिला रहा था. श्रुति के सामान्य होने तक उसकी सांस अटकी ही रही. आसपास के लोग भी उठकर मदद को आ गए थे.

“तुमने तो मुझे डरा ही दिया था. मैं बहुत शर्मिंदा हूं, पिछले कुछ समय से मैं तुम्हारे प्रति काफ़ी लापरवाह हो गया था, पर आज अचानक तुम्हें इस हालत में देखा, तो एक अनजाने डर से सिहर-सा गया. उस नन्हीं बच्ची को देख रही हो?”

अपने ख़्यालों में गुम श्रुति ने ध्यान ही नहीं दिया था कि एक नन्हीं बच्ची अपनी अठखेलियों से जाने कब से लोगों का ध्यान आकृष्ट किए हुए थी.

“… मैं सोच रहा था हमें भी अब एक बच्चा प्लान…”

‘धत्’ शर्म से श्रुति के गाल सुर्ख़ हो उठे थे मानो किसी ने उन पर ढेर सारा रूज़ लगा दिया हो.

Sangeeta Mathur

   संगीता माथुर

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कहानी- सुलझा हुआ आदमी (Short Story- Suljha Hua Aadmi)

“मैं अपनी फीलिंग्स को किसी के साथ शेयर करने को तरस जाती हूं. ऐसा बोरिंग इंसान पल्ले बंधा है कि मेरी ग़ज़ल, कविता व कहानियों की बातें उसके सिर के ऊपर से गुज़र जाती हैं. पता है, शुरू में एक बार मैंने उससे निदा फ़ाज़ली और अमीर कज़लबाश के बारे में पूछा कि इनमें से तुम्हें कौन ज़्यादा पसंद है? पहले तो वह मुझे मुंह बाए देखता रहा, फिर अपनी नासमझी पर पर्दा डालते हुए बोला कि मुझे तो तुम और स़िर्फ तुम पसंद हो…”

Hindi Kahaniya

यदि कोई मुझसे गुलमोहर के पेड़ और उसके फूलों के बारे में बातें करे, तो मैं भी उस पर बातें कर सकता हूं कि यह एक अच्छा, घना और छायादार पेड़ है, गर्मियों में खिलनेवाले इसके सुर्ख लाल और नारंगी फूल बड़े ख़ूबसूरत लगते हैं. तेज़ धूप में इसकी हरी-भरी पत्तियां आंखों को बड़ी भली लगती हैं… बस, इन्हीं दो-तीन वाक्यों को मैं चाहे जितनी बार दोहराऊं, लेकिन इससे ज़्यादा मैं इस विषय पर कुछ नहीं बोल पाऊंगा. पर मुझे ताज्जुब तब होता है, जब आभा और विशाल घंटों इस विषय पर जाने कितनी बातें कर जाते हैं. गुलमोहर से जुड़ी शेर-ओ-शायरी, उसके फूलों को देखकर कैसा महसूस होता है, किसी कवि और शायर ने उस पर क्या-क्या लिखा है वगैरह-वगैरह. यह तो एक मिसाल भर है. ऐसे सैकड़ों विषय होते हैं, जिन पर मेरे जैसा नीरस और आभा के शब्दों में अनरोमांटिक, बोरिंग आदमी कोई प्रतिक्रिया भी ज़ाहिर नहीं कर सकता, जबकि उस पर ये दोनों घंटों बहस करते हैं.

इस बीच बच्चे शाम को दूध-नाश्ते के लिए कई बार किचन में झांक चुके होते हैं. दो-तीन बार अपनी मम्मी के आसपास से भी गुज़रते हैं, लेकिन आभा को इससे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता. वह विशाल के साथ अपनी बतकहियों की उस आसमानी उड़ान पर होती, जहां उसके लिए घर-गृहस्थी, पति-बच्चे सब बौने साबित होते. वैसे भी वह अक्सर मेरी गृहस्थी में अपनी उपस्थिति ‘लिलीपुट्स के देश में गुलीवर’ की तरह ही दर्ज़ कराती.

अपनी मम्मी की महानता से अनभिज्ञ बच्चे भूख से बेहाल हो मेरे पास आते. “भूख लगी है पापा. ये अंकल कब जाएंगे? ममा को तो हमारी फ़िक़्र ही नहीं है.” बारह वर्षीया तनु की आंखों में चिढ़ और आक्रोश का धधकता लावा मेरे अंदर के बंद पड़े ज्वालामुखी को मुंह चिढ़ाने लगता. एक बार ऐसे ही खीझकर तनु ने आभा से कहा था, “मम्मी, आप इन अंकल को आने से मना क्यों नहीं कर देतीं? जब देखो तब चले आते हैं.” तब आभा आगबबूला हो उठी थी. “क्यों? तुम्हें क्या तकलीफ़ हो रही है? इतने सालों तक दमघोंटू माहौल में रहने के बाद एक मुट्ठी आसमान मिला है और वह भी तुम बाप-बेटी से बर्दाश्त नहीं हो रहा है.”

जैसे इसमें मेरी ही कोई साजिश हो, पर मेरे जैसा सुलझा हुआ आदमी ऐसी जुर्रत कर भी कैसे सकता था? वाकई इंसान यदि एक बार अपनी इमेज बना ले और दूसरों की आंखों में अपनी उस पुख़्ता इमेज की प्रशंसा देख ले, तो फिर ज़िंदगीभर अपनी उस छवि की लाश अपने कंधों पर ढोने के लिए मजबूर हो जाता है.

यूं देखा जाए तो आभा का इरादा स़िर्फ मुझे आहत करने का था, बेटी तो बस बहाना थी. लेकिन उसके इस अप्रत्याशित व्यवहार से तनु का चेहरा तमतमा गया था और वह आंखों में आंसू लिए अपने होंठ भींचती अपने कमरे में चली गई. मैंने भी अपनी मुट्ठियां कसी पाईं.

भूख से बेहाल बच्चों के लिए फिर मैं ही उठकर कभी मैगी बनाता, ब्रेड सेंकता, दूध गरम करता. रसोई में खटर-पटर मैं ज़रूरत से ज़्यादा ही करता. बच्चे भी भूख के कारण शोर-शराबा करते. लेकिन बगल के ड्रॉइंगरूम में बतियाती आभा के कानों में लगता विशाल की आवाज़ के अलावा दुनिया की सारी आवाज़ों की नो एंट्री रहती. चाय-कॉफी का शौक़ विशाल को नहीं है, स़िर्फ सिगरेट और रात की शराब ही बहुत है उसके लिए. ड्रॉइंगरूम में फैली सिगरेट की गंध उसके जाने के घंटों बाद तक इधर-उधर भटकती रहती.

शादी के बाद शुरुआती दिनों में मैं भी कभी-कभी शौक़िया सिगरेट पी लिया करता था. लेकिन आभा को उसकी बू से मितली आने लगती, सो मैंने सिगरेट पीना ही छोड़ दिया. मैं उसके लिए कुछ भी कर सकता हूं. पर अब वह कहती है कि सिगरेट पीनेवाले पुरुष कितने डैशिंग लगते हैं. वह शायर ही क्या, जो शराब न पीए.

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हैरानी होती है केमिस्ट्री जैसे नीरस सब्जेक्ट का लेक्चरर होकर विशाल कैसे फूल, पौधे, गीत-ग़ज़ल, भावनाओं से भरी बातें कर लेता है. मैं भी तो केमिस्ट्री पढ़ाता हूं, पर फूलों की ख़ुशबुओं की जगह लैब के तीखे केमिकल्स की कसैली गंध ही मुझ पर हावी रहती.

आभा अक्सर मेरी पकड़ से छिटककर दूर चली जाती थी. “तुम स्वभाव से तो एकदम अनरोमांटिक हो ही, तुम्हारी बॉडी से भी किसी केमिकल फैक्ट्री की तरह ही गैस लीक करती रहती है.”

मैं शर्म से पानी-पानी हो जाता. नहा-धोकर, पऱफ़्यूम और पाउडर से लैस होकर ही मैं बिस्तर पर जाता था. यूनिवर्सिटी का टॉपर, एक परिपक्व और सॉफ़िस्टिकेटेड इंसान पत्नी के इस तरह के कमेंट पर हीनभावना से ग्रस्त हो जाता. ख़ूबसूरत और छुईमुई-सी नाज़ुक पत्नी के इस तरह के व्यवहार से ज़िंदगी में जाने कितनी बार आहत और अपमानित भी हुआ मैं.

कभी शिकायत करने पर वह मुंह बिचकाकर कहती, “तुम्हें कुछ महसूस भी होता है रवि?”

शायद संवेदनाओं की सारी जड़ी-बूटियों को उसने ही पेटेंट करवा लिया है. मानो ‘महसूस करना’ पर स़िर्फ उसी की मोनोपोली है.

कभी अपनी बचपन की सहेलियों से बतियाती, “मैं अपनी फीलिंग्स को किसी के साथ शेयर करने को तरस जाती हूं. ऐसा बोरिंग इंसान पल्ले बंधा है कि मेरी ग़ज़ल, कविता व कहानियों की बातें उसके सिर के ऊपर से गुज़र जाती हैं. पता है, शुरू में एक बार मैंने उससे निदा फ़ाज़ली और अमीर कज़लबाश के बारे में पूछा कि इनमें से तुम्हें कौन ज़्यादा पसंद है? पहले तो वह मुझे मुंह बाए देखता रहा, फिर अपनी नासमझी पर पर्दा डालते हुए बोला कि मुझे तो तुम और स़िर्फ तुम पसंद हो…

“हां, पता है कि वह मुझे बहुत प्यार करता है. लेकिन इससे मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. मेरे लिए तो ज़्यादा इंपॉर्टेंट यह है कि मैं उसे प्यार कर पाती…

“वो तो ठीक है, हज़ारों की शादीशुदा ज़िंदगी ऐसे ही चलती है, बिना प्यार के, एक-दूसरे को ईमानदारी से झेलते हुए, शहीद होते. मेरी ज़िंदगी भी बस ऐसे ही बीत जाएगी…” और वह लंबी आह भरकर फ़ोन रख देती.

मैं यह नहीं कहता कि वह ये सारी बातें तब ज़ोर-ज़ोर से बोलती है, जब मैं बगल के कमरे में रहता हूं. पर मैं तो यह सोचता हूं कि जब वह मेरे सामने इतना कुछ कहती है, तो मेरे पीठ पीछे न जाने क्या-क्या कहती होगी. वैसे उसके मायकेवालों ने हमेशा मेरी तारीफ़ की है और यह भी जताया कि आभा मेरे साथ बहुत सुखी और संतुष्ट है.

फिर भी जैसी है, वह मेरी है और मेरे पास है. मेरे प्यारे बच्चों की मां है. घर को प्यार से सजाती-संवारती, बच्चों को ख़ूब प्यार करती, खाली समय में कविताएं लिखती-पढ़ती मेरी प्यारी आभा.

लेकिन विशाल के आते ही वह किसी दूसरी दुनिया में पहुंच जाती. पांच साल पहले जब केमिस्ट्री डिपार्टमेंट में विशाल की नियुक्ति हुई, तो मुझसे जूनियर होने के नाते वह ‘सर-सर’ कहकर मेरे आगे-पीछे लगा रहता. दुबला-पतला, मासूम-सा विशाल, 27-28 की उम्र का होने के बावजूद कम उम्र का लगता था. बी.एससी. के स्टूडेंट्स उसे घास नहीं डालते, तो रुआंसा होकर मेरे पास आता, “सर, इन लड़कों को समझाइए न. ये मेरे साथ बदतमीज़ी करते हैं.”

वह एजुकेशन मिनिस्टर का भांजा था, इसलिए उससे ज़्यादा क़ाबिल लोगों को पीछे धकेलकर उसे अपॉइंट किया गया था. स्टूडेंट्स कहां चूकनेवाले थे. लेकिन लड़कों के दर्द की वजह एक और भी थी. क्लास की लड़कियों का झुकाव तेज़ी से उसकी तरफ़ बढ़ रहा था, जो उन्हें कतई गवारा न था.

जब वह पहली बार अपनी पत्नी के साथ घर आया था, तो उसके जाने के बाद आभा देर तक पानी पी-पीकर अपने नसीब को कोसती रही, “कितनी सुंदर जोड़ी है, कितना प्यार है दोनों में…” से शुरू होकर “कितनी लकी है जया, जो उसे विशाल जैसा रोमांटिक, ख़ुशमिजाज़ पति मिला है…” पर आकर अटक गई. उसे कैसा पति मिला है, यह तो वह जानती ही थी.

शुरू में दोनों साथ आते थे. वह ‘सर-सर’ कहकर मेरे पास बना रहता. पत्नी को आभा अपने पास बिठाए रखती. फिर पता नहीं कब वह मुझे छोड़ आभा की तरफ़ मुख़ातिब हो गया. धीरे-धीरे पत्नी को भी साथ लाना बंद कर दिया या उसने ही आने से मना कर दिया. कोई तुक भी तो नहीं कि हर दूसरे-तीसरे दिन मुंह उठाकर बिन बुलाए किसी के घर धरना दिया जाए. लेकिन विशाल को शायद आभा का मौन निमंत्रण मिल चुका था. फिर उसमें बीवी या काज़ी किसी का क्या दख़ल?

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घर में प्रवेश करते ही सोफे पर बैठने से पहले वह बड़े अदब और नज़ाकत के साथ एक शेर सुनाता. आभा वाह-वाह करके बैठने का इशारा करती, तो लखनवी अंदाज़ में आदाब करता हुआ तड़ से शेर शुरू कर देता. उसके हर शेर पर आभा झूम उठती.

“पता है विशाल, जब मैं क्लास टेंथ में थी, तो यह मेरे फेवरेट शायर हुआ करते थे.” फिर वह कोई दूसरी ग़ज़ल छेड़ देता.

“पता है विशाल, जब मैं ट्वेल्थ में थी, तो इस शायर की दीवानी थी.”

पहले वह मुझसे इज़ाज़त लेकर सिगरेट पिया करता था. पर अब उसे मेरे वहां होने, न होने से कोई मतलब ही न रहा, फिर वह इज़ाज़त किससे और क्यों ले? सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुए वह कभी शैली का प्रेम-प्रसंग छेड़ बैठता, तो कभी कीट्स का. कभी सीमोन द बोउआर और ज्यां पॉल सार्त्र के प्लेटोनिक लव से अभिभूत होकर ‘लव इज़ इंपॉसिबल’ की व्याख्या करता, तो कभी ‘किसी को मुक़म्मल जहां नहीं मिलता’ का रोना रोता.

इधर उसने फ्रेंच कट दाढ़ी रखनी शुरू कर दी थी. चश्मे के मोटे फ्रेम के पीछे से झांकती भावपूर्ण आंखें, होंठों के बीच दबी सिगरेट इंटलेक्चुअल लुक देने के लिए काफ़ी होते हैं. चार-पांच सालों में उसने यूनिवर्सिटी में भी अच्छा रंग जमा लिया था, ख़ासकर लड़कियों पर.

इन दिनों उसका घर आना भी धीरे-धीरे कम हो रहा था. आभा फ़ोन पर फ़ोन करती. “क्या बात है विशाल? मैं कई दिनों से तुम्हारी राह देख रही हूं. तुम आए ही नहीं… ओह! बिज़ी विदाउट बिज़नेस. तुम जैसे निट्ठलों को क्या काम? फ़ौरन घर आओ. मैंने एक नई क़िताब ख़रीदी है, उसी पर तुमसे बात करनी है…”

फिर भी वह कई दिनों बाद आता और काफ़ी झुंझलाया हुआ. आभा की कोई अदा अब उसे बांध नहीं पा रही थी. इधर यूनिवर्सिटी में भी उसके कई क़िस्से मशहूर होने लगे थे. किसी स्टूडेंट के भाइयों के हाथों पिटाई भी हो चुकी थी उसकी. फिर भी आए दिन किसी न किसी स्टूडेंट के साथ उसका नाम कैंपस में उछलता रहता था. आभा के कानों तक भी ये क़िस्से पहुंचते रहते. उसे अपना तिलस्म टूटता-सा जान पड़ता.

तीसरे पहर यूनिवर्सिटी से लौटा, तो देखा आभा बेड पर औंधे मुंह पड़ी है. आवाज़ देने पर भी नहीं बोली. बच्चे अपने कमरे में थे.

“क्या बात है तनु, आज तुम्हारी मम्मी की तबीयत ख़राब है क्या?”

“हां, शायद उनका मूड बहुत ख़राब है.”

“क्यों? क्या बात हो गई?”

“पापा, आज सुबह जया आंटी अपनी बेबी के साथ आई थीं. उनके हाथ में प्लास्टर और सिर पर भी पट्टी बंधी थी. वे बहुत रो रही थीं. विशाल अंकल ड्रिंक करने के बाद उन्हें बहुत मारते हैं. दो दिन पहले उन्हें सीढ़ियों से धक्का दे दिया था… पापा, विशाल अंकल बहुत गंदे हैं, वे जया आंटी को बहुत टॉर्चर करते हैं. आज आंटी अपनी मम्मी के घर जा रही हैं. अब वे कभी नहीं लौटेंगी. जाने से पहले मम्मी से मिलने आई थीं. मम्मी उनसे कह रही थीं कि अब वे अंकल को कभी घर में घुसने भी नहीं देंगी.”

तनु के चेहरे पर एक सुकून और इत्मीनान की छाया स्पष्ट दिख रही थी. लेकिन उस बेचारी को मम्मी के मूड ऑफ़ होने की असली वजह कहां मालूम?

 

Geeta Singh

       गीता सिह

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