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कहानी- एम्पटी नेस्ट सिंड्रोम (Story- Empty Nest Syndrome)

“जीवन, बस कुछ रिश्तों तक सीमित नहीं होता कि उनके दूर हो जाने से सब

ख़त्म हो जाए. जीवन बहुत मूल्यवान है. इसका विस्तार करो. यह अवसाद से घिरने के लिए नहीं है. ईश्‍वर के दिए इस अनुपम उपहार का सम्मान करो, प्रेम करो.” एक गहरी सांस लेकर प्रकाश चुप हो गए.

Kahani

अरे भई, चाय मिलेगी कि नहीं आज की तारीख़ में.” अख़बार से नज़रें हटाकर रसोईघर की टोह लेते हुए प्रकाश ने ऊंची आवाज़ में पूछा.

कोई जवाब नहीं आया. प्रकाश रसोईघर के दरवाज़े की तरफ़ देखते रहे. कुछ पलों के बाद दोबारा आवाज़ देने ही वाले थे कि आशा एक ट्रे में चाय के दो कप लिए आते दिखी. टेबल पर ट्रे रखकर आशा ने एक कप प्रकाश को दिया और दूसरा कप ख़ुद लेकर सामनेवाले सोफे पर बैठ गई.

सुबह बड़ी ख़ुशगवार थी. अक्टूबर की सुबहें वैसे भी बड़ी मनोहारी होती हैं. बरसात के बाद का धुला-धुला आसमान,

खिली-खिली प्रकृति, ठंड की हल्की ख़ुमारी ओढ़े हवा और पंछियों की उन्मुक्त विभोर कर देनेवाली चहचहाट, नर्म पड़ती धूप.

प्रकाश का मन ख़ुश हो गया. वो आशा से बातें करने लगे. मौसम की ख़ूबसूरती की बातें, बीते वर्षों की बातें, प्रकृति में हुए बदलाव की बातें, आशा के भाई-बहनों के बारे में चर्चा आदि, लेकिन आशा का मन किसी भी चर्चा में नहीं रमा. प्रकाश की बातें वह बड़े ऊपरी मन से सुन रही थी और कभी-कभार गर्दन हिला देती या ‘हूं-हां’ कर देती. चाय ख़त्म होने के साथ ही प्रकाश की बातों का स्टॉक भी ख़त्म हो गया. आशा भी खाली कप और ट्रे उठाकर वापस रसोईघर में चली गई.

प्रकाश एक गहरी सांस भरकर कुछ पल सोच की मुद्रा में गंभीर होकर बैठे रहे. फिर आहिस्ता से उठकर मॉर्निंग वॉक पर निकल गए. पिछले कई महीनों से वे देख रहे थे कि आशा बहुत चुप-चुप-सी रहने लगी है. बहुत ज़्यादा बातें करने की आदत तो वैसे भी आशा की कभी नहीं रही, लेकिन फिर भी उसके चेहरे पर छाई प्रसन्नता और संतोषभरी मुस्कान से घर में एक उजाला-सा छाया रहता था. बात भले ही कम करती थी, तो क्या हुआ, श्रोता तो बहुत अच्छी थी. ध्यान और रुचि से सामनेवाले की बात सुनती थी. पर अब इतने बेमन से सुनती है कि प्रकाश आहत-सा महसूस करने लगते हैं. कोई कुछ बात करना चाहता है और सामनेवाले को मानो आपमें और आपकी बातों से कोई सरोकार ही नहीं है. हार कर प्रकाश भी चुप हो जाते. आशा की मन:स्थिति को वे भी समझते थे. जब से दोनों बेटे नौकरी करने के लिए बाहर सेटल हुए हैं, तब से घर बिल्कुल वीरान लगने लगा है. दो साल हो गए बड़े बेटे को बैंगलुरू में सेटल हुए और एक साल हो गया है छोटे बेटे को हैदराबाद में सेटल हुए. छोटा बेटा तो काम के सिलसिले में कंपनी की तरफ़ से 10 महीनों से जापान गया हुआ है. जब दोनों पढ़ाई कर रहे थे, तब परीक्षा के बाद छुट्टियों में वे घर आते रहते थे, लेकिन नौकरी लगने के बाद काम की व्यस्तता इतनी बढ़ गई है कि अब तो  घर आना भी बंद हो गया. तभी से आशा चुप-चुप रहने लगी है. पहले प्रकाश ने यह सोचकर ध्यान नहीं दिया कि कुछ दिनों में आशा को भी आदत हो जाएगी इन नई परिस्थितियों की, लेकिन अब उन्हें चिंता होने लगी. आशा का न काम में मन लगता और न तो वह ठीक से खाना खा रही है. ऐसे तो बीमार पड़ जाएगी.

अपनी सोच में डूबे वे कब पासवाले पार्क में पहुंच गए, उन्हें पता ही नहीं चला. जब पीछे से वीरेंद्र ने आवाज़ लगाई, तब प्रकाश की तंद्रा भंग हुई. वीरेंद्र पास की बिल्डिंग में ही रहते थे और रोज़ सुबह पार्क में आकर मिलते. दोनों आज भी रोज़ की तरह पार्क के चक्कर लगाने लगे और फिर एक बेंच पर बैठकर बातें करने लगे. दो मिनट की बातचीत में ही वीरेंद्र ने भांप लिया कि प्रकाश कुछ उदास है.

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“क्या बात है यार! सब ठीक तो है. कुछ उदास लग रहे हो?” वीरेंद्र ने आत्मीयता से पूछा.

“आशा को लेकर परेशान हूं थोड़ा.” प्रकाश ने बोझिल होकर जवाब दिया.

“अरे, क्या हुआ भाभी को?”

“महीनों हो गए, डिप्रेस जैसी हो गई है. न बात करती है, न ही कुछ खाती-पीती है ढंग से. अजीब-सी होती जा

रही है दिन-ब-दिन. पांच साल की सर्विस और बची है मेरी, लेकिन समझ नहीं आ रहा है कि नौकरी करूं या नहीं.” प्रकाश के स्वर में चिंता थी.

वीरेंद्र ने कुछ देर सोचने के बाद कहा, “मेरा एक मित्र मनोवैज्ञानिक है. हम चलकर उससे बात कर सकते हैं. शायद वह कुछ हल बताए इस समस्या का. पहले हम दोनों ही मिल आते हैं, फिर अगर ज़रूरत पड़ी, तो भाभी को भी ले जाएंगे. डॉक्टर की तरह नहीं एक मित्र की तरह ही बात करेंगे.”

वीरेंद्र का सुझाव प्रकाश को पसंद आया. दूसरे दिन ही दोनों डॉ. दीपेश के पास बैठकर आशा की समस्या पर विचार कर रहे थे. सारी बातें ध्यानपूर्वक सुनने के बाद दीपेश ने कहना शुरू किया.

“महत्वाकांक्षी बच्चों के शहर या देश के बाहर सेटल हो जाने के कारण शहरों की महिलाएं इस अवसाद का शिकार होने लगी हैं. इसे ‘एम्पटी नेस्ट सिंड्रोम’ कहते हैं. 40 से ऊपर की महिलाएं, जो शिक्षित भी हैं, लेकिन विवाह के बाद उन्होंने अपना ध्यान स़िर्फ परिवार और बच्चों पर पूरी तरह केंद्रित कर दिया था. पति के नौकरी या व्यवसाय में व्यस्त हो जाने तथा बच्चों की शिक्षा या नौकरी के चलते बाहर सेटल हो जाने के कारण एक बड़ा वैक्यूम या शून्यता महसूस करती हैं, जिसमें उनकी असली पहचान खो जाती है. वे अचानक महसूस करने लगती हैं कि उनकी कोई वैल्यू ही नहीं है. वे अकेली हो गई हैं. साथ ही इस उम्र में हार्मोनल चेंजेस भी अपना प्रभाव डालते हैं.”

“हां, आजकल एकल परिवार के चलन के बाद से महिलाओं के अकेले रह जाने की समस्या और भी बढ़ गई है. पहले संयुक्त परिवार होने से स्त्रियां घर में ही अपनी समस्याओं, भावनाओं को

एक-दूसरे से कह-सुनकर अपना मन हल्का कर लेती थीं. अपने बच्चे बाहर भी चले गए, तब भी अन्य सदस्यों के रहने से वे शारीरिक-मानसिक रूप से व्यस्त रहती थीं, तो अकेलेपन या अवसाद से दूर रहती थीं.” वीरेंद्र ने कहा.

“हां सही है. ‘एम्पटी नेस्ट सिंड्रोम’ आधुनिक एकल परिवारों की ही देन है. दरअसल, अधिकांश महिलाओं की आदत होती है कि वे अपने लिए कुछ नहीं रखतीं. सब कुछ पति-बच्चों में बांट देती हैं. वे भूल जाती हैं कि वे ख़ुद भी ख़ुद का प्यार पाने की सबसे पहली अधिकारी हैं. वे सारा प्यार तो परिवार को बांट देती हैं. नतीजा, उनके जाने के बाद वे शून्य से घिर जाती हैं, क्योंकि उन्होंने स्वयं से प्यार करना, अपने लिए जीना कभी सीखा ही नहीं.” दीपेश ने बताया.

“तो इसका हल क्या है? आशा को इस अवसाद से कैसे उबारूं?” प्रकाश ने परेशान होकर पूछा.

“कोई पुरानी हॉबी हो, जो व्यस्तता के चलते छूट गई हो. क्लब आदि जॉइन करे, ताकि अधिक से अधिक व्यस्त रह सके, लेकिन यह सब करने से पहले ‘लव योर सेल्फ’ यानी ‘ख़ुद से प्यार करो’ की सोच विकसित करना ज़रूरी है. मात्र त्याग की मूर्ति बने रहने से कुछ नहीं होगा.” दीपेश ने बताया.

उसे धन्यवाद देकर वीरेंद्र और प्रकाश बाहर निकले. प्रकाश परेशान थे. आज तक तो उन्हें पता ही नहीं कि आशा की कोई ऐसी हॉबी भी है. कभी किसी चीज़ में रुचि लेते देखा भी नहीं उसे, सिवाय घर के कामों और बच्चों के. न संगीत आदि सुनने में ही कभी दिलचस्पी देखी. ऐसे में उसके लिए क्या किया जाए. ‘लव योर सेल्फ’ की सोच कैसे पैदा की जाए उसके भीतर? जब वह ख़ुद से प्यार करना सीखेगी, तभी ख़ुद की पसंद का कोई काम करके ख़ुश रह पाएगी. पर यही तो सबसे कठिन था, उसे ख़ुद से प्यार करना कैसे सिखाया जाए? इस समस्या से भी वीरेंद्र ने ही उसे बाहर निकाला.

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“मेरे एक आत्मीय परिचित हैं राठौड़जी. आयु में बड़े हैं, लेकिन पति-पत्नी दोनों ही बहुत ज़िंदादिल और मिलनसार हैं. भाभीजी को उनसे मिलवाने ले चलते हैं.” वीरेंद्र ने कहा.

“लेकिन उससे क्या होगा?” प्रकाश ने पूछा.

“तुम चलो तो.” वीरेंद्र ने ज़ोर दिया.

दूसरे दिन वीरेंद्र, प्रकाश और आशा को एक क्लब में ले गया और राठौड़जी तथा उनकी पत्नी से मिलवाया. दोनों इतने ख़ुशमिज़ाज थे कि बात-बात पर ठहाके लगाते. उनके आसपास के सभी लोग ख़ुश दिख रहे थे. दोनों आशा से बहुत आत्मीयता से मिले. उनके कारण पूरे क्लब का माहौल ख़ुशनुमा रहता. ऐसा लग रहा था जैसे दोनों मुक्त हाथों से सबको ख़ुशियां बांट रहे थे. दोनों के चेहरों पर एक तेजस्वी उजाला था. आशा वहां भी अनमनी-सी ही रही. न हंसी, न किसी गतिविधि में शामिल हुई. दो-तीन घंटे बाद प्रकाश उसे लेकर घर आ गए.

“कैसा लगा मिस्टर राठौड़ और उनकी पत्नी से मिलकर? कितने ख़ुशमिज़ाज हैं न दोनों. ज़िंदादिल, जीवन के आनंद से भरपूर.” प्रकाश ने कहा.

“जब जीवन में कोई तनाव, परेशानी,

अकेलापन न हो, तो कौन भला ख़ुश न रहेगा.” आशा उदास स्वर में बोली.

“तुम्हें पता है आशा, वीरेंद्र ने बताया मुझे क्लब में. मिस्टर राठौड़ का बड़ा बेटा भारतीय सेना में मेजर था. डेढ़ बरस पहले सीमा पर तैनात था. आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो गया. 28 वर्ष की अल्पायु में उनका जवान बेटा चल बसा. क्या उन्हें दुख नहीं होगा बेटे की मृत्यु का?” प्रकाश दर्दभरे स्वर में बोले.

आशा अचानक स्तब्ध-सी हो गई.

“और पिछले आठ माह से उनका छोटा बेटा भी कश्मीर के अति संवेदनशील इलाके में तैनात है, जहां क़दम-क़दम पर मौत का ख़तरा सिर पर मंडराता रहता है. तुम्हारे दोनों बेटे तो अच्छी नौकरियों पर ख़ुशहाल हैं ना, सुरक्षित हैं. तब भी तुम उनकी याद में अवसाद से घिरी हो. बताओ क्या तुम्हारा दर्द सच में राठौड़जी और उनकी पत्नी के दर्द से बड़ा है? प्रकाश ने प्रश्‍न किया.

आशा  का  सिर  झुक  गया  और  वह कुछ बोल नहीं पाई.

“तब भी दोनों इतने प्रसन्न रहते हैं कि स़िर्फ ख़ुद ही नहीं, दूसरों को भी ख़ुशियां बांटते हैं, क्योंकि उन्होंने प्रेम का मार्ग चुना ख़ुद के लिए. वे स्वयं से प्रेम करते हैं, तभी वे दूसरों को भी प्रेम करके ख़ुश रहते हैं. वे जीवन का मूल्य समझते हैं, तभी उन्होंने ख़ुद को अपने परिवार तक सीमित, संकीर्ण न रखकर प्रेम बांटकर अपना परिवार बढ़ा लिया. वे न जाने कितने बेसहारा लोगों को सहारा देते हैं. दुखियों को सांत्वना देते हैं. जीवन, बस कुछ रिश्तों तक सीमित नहीं होता कि उनके दूर हो जाने से सब ख़त्म हो जाए. जीवन बहुत मूल्यवान है. इसका विस्तार करो. यह अवसाद से घिरने के लिए नहीं है. ईश्‍वर के दिए इस अनुपम उपहार का सम्मान करो, प्रेम करो.” एक गहरी सांस लेकर प्रकाश चुप हो गए.

जब सुबह प्रकाश की नींद खुली, तो उन्होंने देखा कि घर में उनके फेवरेट पुराने गाने बज रहे थे. वे हाथ-मुंह धोकर आए, तो आशा चाय की ट्रे लेकर खड़ी थी. ट्रे में सुंदर नए कप रखे थे, जिन पर सूरजमुखी के फूल बने हुए थे. आशा ने भी सुंदर चटक रंग की साड़ी पहनी थी. उसके चेहरे की मुस्कुराहट ने पिछले महीनों की सारी अवसादपूर्ण मलीनता को धो दिया.

“सुनो, आज बुक स्टोर चलेंगे. मुझे किताबें, ख़ासकर बंगाली लेखकों के उपन्यास पढ़ने का बहुत शौक़ था. शरत बाबू, आशापूर्णा देवी को अब ़फुर्सत से पढ़ना चाहती हूं और हर छुट्टीवाले दिन हम भी क्लब चला करेंगे. आपने सही कहा, अपने बच्चों की ज़िम्मेदारी से मुक्त होने के बाद समाज के विकास में योगदान देना ही जीवन की सार्थकता है. बच्चे तो अपने नए जीवन में ख़ुश हैं और हम उनकी याद में अवसाद में घिर जाएं, ये ठीक नहीं है. जीवन का और भी कोई उद्देश्य होना चाहिए. अब हम भी राठौड़ दंपति के साथ मिलकर काम करेंगे.” आशा उत्साह से बोली.

“हां ज़रूर, जैसा तुम कहो. आज तुम्हें फिर पुराने रूप में देखकर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है.”

प्रकाश ने कहा तो आशा ने मुस्कुराकर उनके कंधे पर सिर रख दिया. खिड़की से आती सुनहरी, उजली किरणें पूरे कमरे में फैल गईं.

Dr. Vineeta Rahurikar

डॉ. विनीता राहुरीकर

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Kids Story: जलपरी और दो चोर (Kids Story: Jalpari And Two Thieves)

 

Kids Story

Kids Story: जलपरी और दो चोर (Kids Story: Jalpari And Two Thieves)

दूर किसी जगह पर एक नीली झील थी, जहां एक जलपरी रहती थी. उस जलपरी का नियम था कि वो रोज़ शाम को कुछ समय के लिए बाहरी दुनिया में आती थी. कुछ समय बिताती और फिर नियमित समय पर लौट जाती. एक बार वहां से दो चोर जा रहे थे और उन्होंने जलपरी को देख लिया. उसे देखकर दोनों ने एक योजना बनाई कि क्यों न इसे पकड़कर हम शहर में बेच आएं, जिससे हमें अच्छे ख़ासे पैसे मिलेंगे.

दोनों ने मछली पकड़नेवाला जाल ख़रीदा और अगले दिन झील के किनारे इंतज़ार करने लगे. तभी उनकी नज़र एक लड़के पर पड़ी. वो भी वहां मछलियां पकड़ने आया था. दोनों चोरों ने उस लड़के से कहा कि यहां से भाग जाए, क्योंकि यह उनका इलाका है. उस लड़के ने कहा कि इस झील का किनारा काफ़ी दूर तक फैला है और यह बहुत बड़ी झील है, तो आप लोग यहां मछलियां पकड़ो, मैं थोड़ी दूर पर जाकर मछलियां पकड़ता हूं.

 

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उसकी बात सुनकर दोनों चोरों को बहुत ग़ुस्सा आया. उन्होंने उस लड़के से कहा कि वो यहां से तुरंत चला जाए, वरना उसकी पिटाई होगी. वो लड़का उन दोनों के इरादों से अंजान था, उसे हैरानी हुई, इसलिए वो थोड़ी दूर जाकर पेड़ के पीछे छिप गया.

Mermaid

थोड़ी देर बाद वो जलपरी बाहर आई, उसे देखकर लड़का भी हैरान हो गया. वो जलपरी बेहद ख़ूबसूरत थी. दोनों चोरों ने जलपरी पर जाल फेंक दिया. यह देखकर वो लड़का वहां आ गया. एक चोर ने अपने साथी से कहा कि तुम जलपरी को देखो, मैं इस लड़के को ठिकाने लगाता हूं. लड़के के पास एक बड़ा सा डंडा था, जिससे उसने चोर की ख़ूब पिटाई की. अपने साथी को पिटता देख, दूसरा चोर भी मदद के लिए आ गया. मौक़ा देखकर जलपरी जाल से छूट गई और झील में चली गई.

दोनों चोर मिलकर उस लड़के को पीटने लगे कि तभी वहां एक बड़ा-सा मगरमच्छा आ गया और दोनों चोरों पर हमला कर दिया. किसी तरह मगर से बचकर दोनों चोर भाग खड़े हुए.

दरअसल, उस मगर को जलपरी ने ही लड़के की मदद के लिए भेजा था. इस तरह वो लड़का रोज़ वहां आने लगा और जलपरी भी रोज़ उससे मिलने लगी. दोनों में बहुत ही गहरी दोस्ती हो गई.

सीख: हमेशा दूसरों की मदद के लिए आगे आना चाहिए. किसी को मुसीबत में देखकर भागना नहीं चाहिए, बल्कि ग़लत लोगों के इरादे भांपकर सही निर्णय लेना चाहिए.

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कहानी- आस्था और विश्‍वास (Short Story- Aastha Aur Vishwas)

प्रांजलि की आस्था और विश्‍वास की चमक के आगे मेरा चेहरा निस्तेज पड़ गया. एक ही मां की बेटियां होते हुए भी उसकी सोच इतनी सकारात्मक और मेरी… ग्लानि हो रही थी मुझे स्वयं पर. बड़ी होने के बावजूद मैं स्वयं को प्रांजलि से छोटा महसूस कर रही थी.

Hindi Kahani

 

“सही और ग़लत की कोई निश्‍चित परिभाषा नहीं होती है, न ही बातों को तोलने का कोई निर्धारित मापदंड होता है. जो बात एक इंसान के लिए सही होती है, हो सकता है वही बात दूसरे इंसान को ग़लत लगे.”

हल्के-फुल्के ढंग से कही हुई मेरी इस बात पर विनीत चिढ़ गए थे और न जाने कितनी नसीहतें दे डाली थीं. फिर मेरे सब्र का बांध भी टूट गया था. न जाने कितने दिनों का संचित आक्रोश सतह पर आ गया था. दरअसल, यह कोई एक दिन का आक्रोश नहीं था. जब से मेरे देवर रजत की शादी हुई थी और घर में पायल आई थी, तभी से मेरे मन में एक चिंगारी-सी सुलग रही थी, जो धीरे-धीरे अग्नि का रूप लेती जा रही थी. डरती हूं, कहीं यह अग्नि रिश्तों को ही न जला दे, इसलिए ख़ामोश रहती हूं. पायल को सारा घर हाथोंहाथ ले रहा है. मम्मी उसके रूप-गुणों की प्रशंसा करते नहीं अघातीं. पापाजी उसकी कुकिंग के दीवाने हैं. विनीत उसकी इंटेलीजेंसी, उसके सलीके, बातचीत के ढंग के कसीदे पढ़ते हैं. यहां तक कि ढाई साल का नन्हा रिंकू भी अपनी चाची के आगे-पीछे डोलता है.

मैं पिछले चार साल से इस घर में खट रही हूं, किंतु मेरा किया किसी को दिखाई नहीं देता. शादी के समय एमए, बीएड की डिग्री मेरे पास थी. चाहती तो टीचिंग आराम से मिल जाती, किंतु पहले मम्मीजी का ऑपरेशन आ गया था. कई माह लग गए थे, उन्हें पूरी तरह स्वस्थ होने में. उसके बाद रिंकू का जन्म हो गया. गृहस्थी की रेलपेल में पिसती ही चली गई. कभी स्वयं के लिए कुछ नहीं कर पाई, जिसका ख़ामियाज़ा मुझे अब तक भुगतना पड़ रहा है. दूसरी ओर पायल, जो शादी से पहले से ही बैंक में नौकरी कर रही है, मुफ़्त में स्पेशल ट्रीटमेंट बटोर रही है. पायल की याद आते ही मन न जाने कैसा हो गया. कुछ लोग क़िस्मत के धनी होते हैं. थोड़ा-सा भी करें, तो ढेर सारा यश मिलता है और कुछ अपनी जान भी निकालकर रख दें, तो भी किसी के मुंह पर प्रशंसा के दो बोल नहीं आते, मान-सम्मान मिलना तो बहुत दूर की बात है.

उस दिन भी ऐसा ही कुछ तो हुआ था. मेरी ननद निमी को देखने संदीप के घरवाले आए थे. संदीप पहले से ही निमी को पसंद करता था. बस, औपचारिकता पूरी करने अपने घरवालों को ले आया था. उनकी आवभगत करने में सुबह से शाम हो गई थी. पायल उनके पास बैठी थी. चलते समय उन्हें देने के लिए किचन से मिठाई के डिब्बे लेकर मैं ड्रॉइंगरूम में जा रही थी, मैंने सुना, संदीप की मां मम्मीजी से बोली थीं, “आप बहुत भाग्यशाली हैं, जो आपको पायल जैसी बहू मिली. बैंक में इतनी बड़ी ऑफिसर है, किंतु घमंड छूकर नहीं गया.” सुनते ही मेरे तन-बदन में आग लग गई थी.

मम्मीजी के कहे शब्द कि ‘स़िर्फ पायल ही नहीं, मेरी बड़ी बहू भी बहुत अच्छी है’ पर मैंने ध्यान नहीं दिया. मिठाई के डिब्बे वहीं टेबल पर रख, बिना किसी से कुछ कहे-सुने ग़ुस्से में मैं छत पर जाकर बैठ गई थी.

घरवालों के साथ-साथ विनीत को भी मेरा इस तरह चले जाना बुरा लगा था. मेहमानों के चले जाने पर उन्होंने मुझसे इस बारे में बात करनी चाही. मन ही मन मुझे अपनी ग़लती का एहसास था, किंतु विनीत के आगे उसे क्यों स्वीकार करूं? इसलिए हल्के-फुल्के ढंग से सही-ग़लत की परिभाषा उन्हें समझाने लगी, जिस पर वे चिढ़ गए. फिर मैं भला क्यों ख़ामोश रहती? “सुबह से मैं किचन में लगी हुई थी. आधे से ज़्यादा काम मैंने किया. पायल को पिछली रात बुख़ार था, इसलिए उससे ज़्यादा मदद भी नहीं ली, फिर भी प्रशंसा की पात्र वही बनी और यह कोई नई बात नहीं है.

पायल कुछ भी करती है, तो उसकी प्रशंसा होती है. मैं जो पिछले चार सालों से इस घर में पिस रही हूं, सब मिट्टी हो चुका है. मैं कमाती नहीं हूं, इसीलिए आप लोगों को मेरी कद्र नहीं है. मैं भी नौकरी करती होती, तब पता चलता.” एक घंटे तक अनवरत बोलती रही थी और विनीत चुपचाप सुनते रहे थे. जब मेरा आवेश कुछ कम हुआ, तो शांत स्वर में बोले, “नियति, इस घर के लिए तुमने जो कुछ भी किया, उसे सब जानते हैं. तुम्हारी प्रशंसा भी करते हैं, किंतु तुम्हारे सामने कोई कुछ कह नहीं पाता, क्योंकि तुमने वैसा माहौल ही नहीं बनने दिया. तुमने जो कुछ भी किया. उसमें मात्र कर्त्तव्यबोध था, आस्था नहीं थी.

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तुमने अपना समय दिया, श्रम दिया, किंतु अपनत्व नहीं दिया, जबकि पायल ने वही दिया, जिसके लिए इस घर के लोग तरसते रहे हैं. उसने भरपूर प्यार दिया है. अपनापन दिया है. नियति, किसी से दो मीठे बोल बोलने में पैसे नहीं लगते हैं. हां, इससे सुननेवाले की आत्मा तृप्त अवश्य हो जाती है. तुम एक क्षण के लिए भी इस घर से जुड़ नहीं पाई. क्या कभी मम्मी-पापा को मनुहार करके तुमने कुछ खिलाया? तबीयत ख़राब होने पर मम्मी को दवाई तो दी, किंतु स्नेह से कभी उनके माथे पर हाथ नहीं रखा. रजत और पायल के हास-परिहास का कभी प्रत्युत्तर नहीं दिया.

निमी के साथ कभी सहेली का-सा बर्ताव नहीं किया, तभी तो निमी ने संदीप के साथ अपने अफेयर की बात तुम्हें न बताकर पायल को बताई, जबकि तुम इस घर में पहले आई हो. कभी-कभी तो मुझे लगता है, हम दोनों के बीच भी एक औपचारिकता है. अंतरंगता का कोई क्षण शायद ही कभी आया हो.” इस कड़वी सच्चाई को मैं बर्दाश्त नहीं कर पाई और ग़ुस्से में बोली, “ठीक है विनीत, जब मैं आप लोगों को कुछ दे ही नहीं पाई, तो फिर मेरा यहां रहना व्यर्थ है. कल सुबह मैं रुड़की चली जाऊंगी, प्रांजलि के पास.”

सचमुच अगले दिन मेरी अटैची तैयार थी. जानती थी रिंकू आराम से अपनी दादी, चाची के साथ रह लेगा, इसलिए बेफ़िक्र होकर अपनी छोटी बहन के पास आ गई. विनीत ने भी मुझे नहीं रोका. घर में उन्होंने प्रांजलि की तबीयत ख़राब होने का बहाना बना दिया था, किंतु यहां आकर भी क्या अपेक्षित ख़ुशी हासिल हुई थी? दरवाज़े पर ही प्रांजलि की सास का ठंडा व्यवहार मन को कचोट गया था. कहीं यहां आकर भूल तो नहीं कर दी, इससे पहले कि निराशा मन पर हावी होती, प्रांजलि की स्नेहिल मुस्कान ने मन को कुछ राहत दी. रवि गरमागरम समोसे ले आए थे. चाय और समोसे खाकर प्रांजलि डिनर की तैयारी में लग गई थी. मैं भी उसके पीछे किचन में उसकी मदद के लिए चली आई. पांच मिनट भी नहीं बीते होंगे कि उसकी सास ने आकर कहा, “अरे प्रांजलि, नियति से मटर क्यों छिलवा रही हो?”

“इसमें क्या हर्ज़ है आंटी, काम के साथ-साथ हमारी गपशप भी चल रही है.” मैंने हंसते हुए कहा.

“नहीं नियति, तुम इस घर में मेहमान हो. दो दिन के लिए आई हो. तुम काम करो, मुझे अच्छा नहीं लगेगा.” कहते हुए मेरा हाथ पकड़ वे मुझे ड्रॉइंगरूम में ले आईं और टीवी के आगे बैठा दिया. मेरा मन बुझ गया.

रात तक प्रांजलि काम में व्यस्त रही और मैं बोर होती रही. बीच-बीच में रवि ने अवश्य कुछ बातें कीं. रात में प्रांजलि मेरे साथ सोना चाहती थी, किंतु मम्मी की भावभंगिमा देख उसने इरादा बदल दिया और अपने कमरे में चली गई. मेरा बिस्तर आंटी ने अपने कमरे में लगवाया. दो माह पूर्व की घटना मेरे ज़ेहन में ताज़ा हो गई थी. एक सेमिनार अटेंड करने प्रांजलि मेरे पास देहरादून आई थी. उस दौरान पूरे घर ने उसे सिर-आंखों पर रखा था. मम्मीजी कितने लाड़ से उसे खिलाती-पिलाती थीं. हरदम उसे एहसास करवातीं कि यह उसका अपना घर है. पायल ने तो बिना मुझसे पूछे पिक्चर की टिकटें बुक करवा दी थीं. हंसते-खिलखिलाते चार दिन कैसे गुज़र गए, पता ही नहीं चला था, किंतु यहां आते ही मुझसे कहा गया कि मैं यहां मेहमान हूं. दो दिनों में ही मैंने देख लिया, प्रांजलि कितने कठोर अनुशासन के बीच रह रही थी. नौकरी, घर की समस्त ज़िम्मेदारी, उस पर भी सास की टोकाटाकी की आदत, क्या यही सब झेलने के लिए प्रांजलि ने मम्मी-पापा के विरोध का सामना करके रवि से शादी की थी? इतना सब होते हुए भी उसके चेहरे पर रत्तीभर शिकन नहीं थी. हरदम एक मधुर मुस्कान लिए काम करती. हर सुबह एक नई ऊर्जा, एक नए उत्साह से भरी होती. मुझे लगा, कहीं अपने मन की पीड़ा को मुझसे छिपाने का यह प्रयास तो नहीं है. अपने चेहरे पर ख़ुशी का यह झूठा आवरण तो उसने नहीं ओढ़ रखा है?

तीसरे दिन आंटी रवि के साथ डेन्टिस्ट के पास गईं, तो मुझे राहत के पल नसीब हुए. चाय का कप लिए हम दोनों लॉन में बैठ गए. उत्तेजित होकर मैंने पूछा, “प्रांजलि, यह सब क्या है? इतने दिनों बाद मैं तेरे पास आई हूं और आंटी हैं कि बात ही नहीं करने देतीं. हरदम साए की तरह पीछे लगी रहती हैं.” प्रांजलि सहजता से मुस्कुराई और बोली, “दरअसल दी, मम्मी को वहम रहता है, कहीं मैं उनकी बुराई तो नहीं कर रही.”

“बुराई करनेवाले काम तो वे करती ही हैं. प्रांजलि, तू माने या न माने, रवि से शादी करना एक ग़लत फैसला था. घर में सदैव तूने यही बताया कि तू सुखी है. कितनी सुखी है, पिछले दो दिनों से मैं देख रही हूं. नौकरी के साथ-साथ सारे काम का दायित्व, उस पर उनकी टोकाटाकी, क्यों बर्दाश्त करती है ये सब? आख़िर क्या कमी है तुझमें, जो उनसे इतना दब रही है.”

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प्रांजलि गंभीर हो उठी, “दी, सुख का अर्थ केवल कुछ पा लेना ही नहीं है, अपितु जो है, उसमें संतोष कर लेना भी है. अपनों के लिए कुछ करना, उनकी बात सुन लेना उनसे दबना नहीं होता, बल्कि उनका सम्मान करना होता है. तुम जानती हो दी, रवि ने अपनी मम्मी की इच्छा के विरुद्ध जाकर मुझसे शादी की थी. इस नाते घर में, उनके दिल में जगह बनाने का प्रयास मुझे ही करना है. मैं मम्मी को यक़ीन दिलाना चाहती हूं कि रवि ने मुझे उनकी बहू बनाकर कोई ग़लती नहीं की है. मैं हर तरह से उनके योग्य हूं.”

“प्रांजलि, कोई फ़ायदा नहीं होगा, वे इसे तेरी कमज़ोरी समझेंगी.”

“नहीं दी, मैं ऐसा नहीं सोचती. कर्त्तव्य के साथ-साथ आस्था जुड़ी हुई हो, तो उसका असर अवश्य होता है. सास होने के साथ-साथ वे एक मां भी हैं. उनके हृदय में भी ममता और करुणा का सागर छलकता होगा. सास मां का ही प्रतिरूप होती है और बहू बेटी का. इस नाते सास-बहू के साथ-साथ हमारा मां-बेटी का भी रिश्ता हुआ न. समर्पण में बहुत शक्ति होती है दी. पूर्णतया समर्पित हो जाना चाहती हूं मैं अपने घर के प्रति, अपने रिश्तों के प्रति. अपने इस प्रयास में मैं सफल भी होने लगी हूं, इसका एहसास मुझे कल रात हुआ, जब सिरदर्द होने पर मैंने मम्मी के माथे पर हाथ रखा और मेरा हाथ थामे वे देर तक आंखें बंद किए लेटी रहीं. डॉक्टर से अपॉइंटमेंट परसों का था, किंतु वे आज ही चली गईं, शायद मुझे और आपको स्पेस देने के लिए.”

प्रांजलि की आस्था और विश्‍वास की चमक के आगे मेरा चेहरा निस्तेज पड़ गया. एक ही मां की बेटियां होते हुए भी उसकी सोच इतनी सकारात्मक और मेरी… ग्लानि हो रही थी मुझे स्वयं पर. बड़ी होने के बावजूद मैं स्वयं को प्रांजलि से छोटी महसूस कर रही थी. मां-पिता के समान स्नेहिल सास-ससुर, छोटी बहन सरीखी ननद और देवरानी, भाई जैसा एक देवर और टूटकर चाहनेवाला पति और क्या चाहिए था मुझे? विनीत सच कह रहे थे. कमी मुझमें थी, मेरी निष्ठा में थी. आज पहली बार मेरे मन में अपने घर के प्रति, घरवालों के प्रति अपनत्व की भावना जागी थी. मन में भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था. आज तक सबसे अपेक्षा ही रखती आई थी मैं. आज जीवन में पहली बार कुछ देने की इच्छा बलवती हो रही थी. अपना प्रेम और समर्पण न्योछावर करना चाहती थी मैं अपनों पर. इस देने की भावना में भी कितना सुख निहित है. हृदय की गहराइयों में महसूस कर रही थी मैं. अब मैं जल्द से जल्द अपनों के पास पहुंच जाना चाहती थी. आंटी और रवि के कहने के बावजूद फिर मुझसे वहां रुका नहीं गया. सुबह होते ही आस्था और विश्‍वास की डोर थामे एक नए उत्साह के साथ मैं अपने घर लौट आई.

Renu Mandal

        रेनू मंडल

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कहानी- प्रतीक्षा यात्रा (Short Story- Pratiksha Yatra)

“मैं तब तक पूरी तरह तुमसे जुड़ चुका था, मगर इस फ़र्ज़ की जंग में तुम्हारे सपनों की बलि क्यों चढ़ाता, इसीलिए जाते-जाते कह गया तुमसे कि मेरी प्रतीक्षा मत करना… मगर तुम्हें मुक्त करके तो मैं ख़ुद और भी गहरे बंधन में बंध गया. हर पल तुम्हारी याद सताती. ख़ुद को इतना व्यस्त कर लिया कि तुम्हारा ख़याल ही न आए, पर जो नस-नस में लहू बनकर बह रहा हो, उस प्यार को भूल पाना कहां आसान होता है…” मैंने देखा राजीव की आंखें भर आई थीं.

Hindi Short Story

शाम के धुंधलके में ये सब कुछ अचानक ही हसीन हो उठा है या तुम्हारे आने की ख़बर ने उल्लास भर दिया है, इस मन में ही नहीं, इस दृष्टि में भी. अब हर शै ख़ूबसूरत है. कल तक उदास-सी लगनेवाली ये लंबी सड़क, पेड़ों के झुरमुट और आस-पास बने छोटे-छोटे घर… बालकनी में चेयर पर अधलेटी हो मैं सोच में डूबती जा रही हूं. क्यों इतना अपनापन, इतना अधिकार, इतनी सुरक्षा समेटे है तुम्हारा स़िर्फ नाम ही.

कल शाम तक मेरी दुनिया में तुम्हारी यादों के सिवा हर तरफ़ तन्हाई-ही-तन्हाई थी और आज… जैसे सारे समीकरण बदल गए हैं. ऐसा लग रहा है जैसे वो मिलने जा रहा हो, जिसकी अब तक स़िर्फ कल्पना भर की.

दोपहर को मोबाइल पर तुम्हारा नंबर देखकर दिल में कई ख़ूबसूरत सुगंधित फूल एक साथ खिल उठे. धड़कनों को संभाला ही था कि हड़बड़ाहटभरा तुम्हारा स्वर सुनाई दिया, “अरू, ट्रेन में हूं, तुम्हारे पास कल शाम तक पहुंच जाऊंगा. बातें मिलने पर. ओ.के. बाय.” और फ़ोन कट गया.

राजीव आ रहा है मेरे पास… मुझसे मिलने. यही तो मेरी तपस्या थी. इतने वर्षों का अटूट विश्‍वास कि मिलकर रहेंगे हम दोनों. मेरी चिर-प्रतीक्षित आकांक्षा, जिसने अब तक मुझे न केवल जीवन जीने का संबल दिया, बल्कि मेरी प्रेरणा बना रहा विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कुराने का. हां, वही इंतज़ार अब समाप्ति की ओर है.

दस साल पहले की ‘अरू’ अब ‘मिस अरुन्धती’ सीनियर प्रो़फेसर बन चुकी है. मगर राजीव के लिए तो स़िर्फ ‘अरू’ है अरुन्धती नाम को लघुरूप ‘अरू’ उसी ने तो दिया था और आज फ़ोन पर इतने सालों बाद भी इसी नाम से पुकारा तो अच्छा लगा.

प्रसन्नता भी कितना बड़ा साधन है मन को जीवंत करने का. इस एक फ़ोन के बाद कितनी बातें सोच चुकी हूं. कल शाम को खाने में क्या बनाया जाए? कितने दिनों से हेयर कट नहीं किया… वार्डरोब के पास भी दो बार हो आई. कब से कोई नई साड़ी भी नहीं ख़रीदी. कल क्या पहनूं?

अचानक हर बात का ख़याल आने लगा. इससे पहले इतने दिनों में कभी क्यों नहीं सोचा ये सब?

मां रोज़ ध्यान दिलाती, “बालों को सेट करवा लो बेटी… नई साड़ी कब ख़रीदोगी… इतने अच्छे ओहदे पर हो, थोड़े टिप-टॉप में रहा करो… तभी तो लगेगा आत्मनिर्भर हो.” मगर मुझे तब कुछ लगा ही नहीं. कभी मन ही नहीं किया. बस, मां की ख़ुशी के लिए उन्हीं के हाथों में पैसे रख देती.

“तुम ही ला देना मेरे लिए कुछ अच्छी साड़ियां, मेरी चॉइस कहां अच्छी है.”

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और मां अजीब नज़रों से मुझे देखती रह जाती. मेरा जीवन जैसे रुक-सा गया था राजीव के न होने पर और उसे जैसे ज़बरन घसीटना और ढेलना पड़ रहा था मुझे.

कॉलेज में भी सहेलियों के बीच गपशप और चुहलबाजियां होती रहतीं और मैं सबके बीच रहकर भी सबसे कटी-कटी और सबसे बहुत दूर चली जाती. वहां, जहां राजीव की कल्पनाएं होतीं, उसका एहसास मेरे रोम-रोम में समाया था.

उस रोज़ मिसेज़ शर्मा ने अचानक पूछ लिया था, “सच बताना अरुन्धती, तुम अपनी विधवा मां को अकेली नहीं छोड़ना चाहती, स़िर्फ यही वजह है तुम्हारे विवाह न करने की? तुम्हारा यों गुमसुम, चुपचाप उदास-सा रहना तो कुछ और ही बयां करता है.”

“मैं तुम्हारी बड़ी बहन जैसी हूं, अगर कोई पसंद हो, तो खुल के बताओ. हो सकता है उसके साथ घर बसा के तुम अपनी मां की और भी अच्छी तरह देखभाल कर सको. और तुम्हारे शादी न करने के फैसले से क्या तुम्हारी मां सचमुच ख़ुश होंगी? कल उनके न रहने पर तुम्हारा क्या होगा, कभी ये सोचा है?”

उनके प्रश्‍नों की झड़ी ने मुझे विचलित कर दिया और मैं बस इतना ही कह सकी, “मैं किसी की प्रतीक्षा कर रही हूं दीदी, अगर मेरे प्रारब्ध में उनका साथ लिखा है, तो मैं उनकी हो कर रहूंगी और अगर नहीं तो पूरा जीवन उनकी यादों के नाम है. मैं तो दोनों सूरतों में बस उन्हीं की बन कर जीना चाहती हूं.”

उन्हें हतप्रभ-सा छोड़कर मैं वहां से उठकर चली आई. जाने क्यों उन्हें सब कुछ बताने का मन कर रहा था, मगर ज़ुबान साथ नहीं दे रही थी.

और एक दिन कैंटीन में फिर पकड़ लिया उन्होंने मुझे. उस रोज़ मैं भी अंदर तक भरी-भरी-सी थी. छलक गया अंतर्मन उनके सामने.

“दस साल पहले मैं इसी कॉलेज में बी.ए. प्रथम वर्ष में थी और राजीव मुझसे एक साल सीनियर साइंस के स्टूडेंट. नई-नई होने के कारण मेरे दोस्त बहुत कम थे. उनमें राजीव से पहला परिचय ही दोस्ती का रिश्ता कायम कर गया हमारे बीच. मुझसे स़िर्फ दो साल बड़े राजीव मुझसे काफ़ी ज़्यादा समझदार और परिपक्व थे. शायद ये पारिवारिक परिस्थितियों का असर था. राजीव के पिता नहीं थे और दो छोटी बहनों की ज़िम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर थी.

उनसे हुई दो-चार मुलाक़ातों में ही मुझे लगने लगा कि मेरा ‘कुछ’ छिनता जा रहा है और मैं कुछ कर नहीं पा रही हूं.

राजीव के व्यक्तित्व की गहराई में डूबने से मैं ख़ुद को बचा नहीं पा रही थी.

मेरी आंखों के मूक संदेश उन आंखों तक पहुंचने लगे, मगर प्रतिउत्तर में उन आंखों में कोई भाव न पाकर मैं थोड़ा डर जाती.

उन दिनों मन-ही-मन ईश्‍वर से प्रार्थना करते. मन्नतें रखने लगी कि राजीव मुझे स्वीकार कर लें.

उन्हें न पाकर मन जैसे बगावत कर बैठता. कहीं भी मन न लगता और मैं उन्हें ढूंढ़ ही लिया करती. कभी कैंटीन में तो कभी लाइब्रेरी में…

धीरे-धीरे वो भी खुलने लगे मुझसे. घंटों बातें होतीं- पढ़ाई, करियर, समाज-दुनिया पर बातें करते-करते हम ख़ुद पर सिमट आए. राजीव भी मेरे बगैर बेचैन हो जाते, मगर मुंह से कभी ऐसी कोई बात न कहते, जिसका सूत्र पकड़कर मैं अपने सपनों को साकार करने की कोशिश करती. डेढ़ साल का वो अमूल्य समय, जिसके हर एक दिन में राजीव की अनगिनत यादें हैं, मेरे जीवन का स्वर्णिम समय था और उस दिन उस एक ख़त के बाद शुरू हुई मेरी ये प्रतीक्षा यात्रा, जिस पर मैं आज तक चल रही हूं.”

मिसेज़ शर्मा मेरी बातें सुनते ही थोड़ी बेचैन-सी हो गईं, “मुझे पूरी बात बताओ अरुन्धती, फिर क्या हुआ?”

“कॉलेज का अंतिम दिन था. सभी अश्रुपूर्ण विदाई के माहौल में डूबे थे. मेरा तो बुरा हाल था. अब तक राजीव से मैंने खुलकर नहीं कहा था कि मैं उन्हें अपना जीवनसाथी मान चुकी हूं. आज चुप रहने का मतलब था हमेशा के लिए उनसे दूर हो जाना और ये ख़याल ही मेरे लिए प्राणघातक था.

मन-ही-मन उनसे काफ़ी कुछ कह लेने के बाद हिम्मत जुटाकर मैं जा पहुंची उनके पास. मगर ये क्या… उनके सामने पहुंची तो ज़ुबान को जैसे ताला लग गया. उनकी बड़ी-बड़ी गहरी आंखों में लबालब आंसू भरे थे. मुझसे कुछ कहने के लिए जैसे ही उन्होंने होंठ खोले, पीछे से किसी ने आवाज़ दी, “राजीव जल्दी करो, फ़्लाइट का व़क़्त हो गया.” मेरे मन में उमड़ते-घुमड़ते प्रश्‍नों को छोड़कर मेरे हाथ में एक ख़त थमा राजीव तेज़ी से चले गए.

और बस उसी ख़त के सहारे आज तक जी रही हूं” कहते हुए डायरी में से एक ख़त मैंने मिसेज़ शर्मा की ओर बढ़ा दिया.

मिसेज़ शर्मा बगैर मेरी ओर देखे आतुरता से पत्र पढ़ने लगीं.

प्रिय अरू,

काफ़ी दिनों से तुमसे कहना चाह रहा था, अगर आज भी नहीं कह सका तो शायद कभी मौक़ा न मिले. मैं तुमसे प्रेम करता हूं अरू. तुम्हारे बगैर कैसे जी पाऊंगा नहीं जानता, मगर कोशिश करूंगा, क्योंकि अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए मुझे जीना होगा. मैं कनाडा जा रहा हूं. वहां से लौटने की गुंजाइश कम ही है, मगर कोशिश करूंगा मरने से पहले एक बार ज़रूर तुम्हारे पास लौट कर आ सकूं. पर शायद तब तक तो बहुत देर हो चुकी होगी. तुम्हें ब्याहकर अपने साथ नहीं ले जा सकता, क्योंकि मेरी अपनी कुछ मजबूरियां हैं, पर अपनी धड़कनों में, अपने रोम-रोम में तुम्हें लिए जा रहा हूं. हो सके तो मुझे माफ़ कर देना और हां अरू, मेरी प्रतीक्षा मत करना. ईश्‍वर करे, तुम्हें मुझ से भी अधिक प्रेम करनेवाला जीवनसाथी मिले.

सदैव तुम्हारा,

राजीव

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ख़त को पढ़कर मिसेज़ शर्मा भरी आंखों को पोंछते हुए मेरी ओर देखने लगी.

“मैं ख़त पढ़कर बेतहाशा एयरपोर्ट भागी. वहां राजीव को देखा, तो लगा कटे बेल की तरह लिपट जाऊं राजीव से, मगर आसपास का ख़याल कर रुक गई.

प्लेन आ चुकी थी मेरी ओर सजल नेत्रों से देखते हुए राजीव प्लेन में चढ़ गए. पीछे से मैं हाथ हिलाते हुए ज़ोर से चिल्ला पड़ी, “मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगी राजीव, सदैव तुम्हारी ही रहूंगी.”

मैंने भरे गले से कहा और ख़ामोश हो गई. तभी मिसेज़ शर्मा ने मुझसे पूछा, “इतने सालों तक विदेश में रहकर क्या वो शख़्स अब भी तुम्हारा होगा?”

“हां, मुझे विश्‍वास है कि एक दिन वो अवश्य लौटेंगे. ये मेरी आस तब तक बंधी रहेगी, जब तक मैं ज़िंदा हूं.”

“मगर अरुधन्ती, ये तो कोरी भावुकता है, तुमने उस व्यक्ति के लिए अपना जीवन रोक रखा है, जिससे तुम्हारा कोई सामाजिक रिश्ता नहीं है…”  मैंने उन्हें बीच में रोकते हुए कहा, “मैं उन्हें अपना जीवनसाथी मान चुकी हूं और क्या ये रिश्ता काफ़ी नहीं है उनकी प्रतीक्षा करने के लिए?”

मिसेज़ शर्मा को निरुत्तर छोड़कर मैं घर लौट आई और सप्ताहभर बाद ही यह फ़ोन मेरे जीवन की दिशा बदल गया.

रातभर मैं कल्पना में राजीव से बातें करती रही और अगले दिन शाम को राजीव मेरे सामने था. हम दोनों ही ख़ामोश थे. व़क़्त के अंतराल ने दोनों को बाहरी तौर पर बदला था, मगर भीतर वही ज़ज़्बात वही झंझावात उमड़-घुमड़ रहे थे.

उतरा-उतरा पीला निस्तेज़ चेहरा लिए राजीव बस मुझे देखे जा रहा था. मैंने ही मौन तोड़ा, “क्या किया इतने वर्षों तक राजीव?”

“कर्त्तव्यों का निर्वाह…” संक्षिप्त उत्तर. मैं कैसे संतुष्ट होती, “खुलकर बताओ न राजीव…”

मेरी उत्सुकता देखकर हल्की मुस्कुराहट आ गई उनके चेहरे पर. विस्तार से मुझे बताने लगे राजीव, “यहां पढ़ाई पूरी करते ही कनाडा से बुलावा आ गया, बड़ी कंपनी से जॉब ऑफ़र था. परिवार में मेरे अलावा कोई था नहीं, दो बहनों की पढ़ाई-लिखाई, शादी की ज़िम्मेदारी मेरे ऊपर थी. उसे पूरा करने के लिए बहुत पैसा चाहिए था. मां की यही आस थी कि हम तीनों का घर बसा हुआ देखकर ही जाएं इस संसार से.

मैं तब तक पूरी तरह तुमसे जुड़ चुका था, मगर इस फ़र्ज़ की जंग में तुम्हारे सपनों की बलि क्यों चढ़ाता, इसीलिए जाते-जाते कह गया तुमसे कि मेरी प्रतीक्षा मत करना… मगर तुम्हें मुक्त करके तो मैं ख़ुद और भी गहरे बंधन में बंध गया. हर पल तुम्हारी याद सताती. ख़ुद को इतना व्यस्त कर लिया कि तुम्हारा ख़याल ही न आए, पर जो नस-नस में लहू बनकर बह रहा हो, उस प्यार को भूल पाना कहां आसान होता है…”

मैंने देखा राजीव की आंखें भर आई थीं. हौले से मैंने पूछा, “तो इस याद से छूटने का प्रयास क्यों नहीं किया राजीव? क्या दूसरी लड़की नहीं मिली इतने सालों में?”

जवाब में हंस दिया राजीव.

“हृदयविहीन व्यक्ति भी कहीं रिश्ते बनाता है अरू. मन तो तुम्हारे पास ही छूटा हुआ था. उस छूटे हुए मन को ही हासिल करने चला आया तुम्हारे पास, जब तुम्हारे ही कॉलेज की किसी मिसेज़ शर्मा ने मुझे फ़ोन पर बताया कि तुम आज भी मेरी प्रतीक्षा कर रही हो, तो मैं बेतहाशा भाग आया तुम्हारे पास अपनी ज़िंदगी दोबारा हासिल करने.”

अचानक ख़ुशी के आवेश में राजीव ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मैं एकटक उसे निहारती रह गई. वो चेहरा, जिसे दोबारा देखने की आस में मैंने दस साल काटे थे, वो चेहरा सदा के लिए मेरे सामने था.

एक बार फिर गंभीर होते हुए राजीव ने कहा, “मगर तुमने इतनी कठोर प्रतीक्षा कैसे की अरू? जिस इंतज़ार में कोई वादा तक नहीं था, वो इंतज़ार तुमने किया कैसे? ख़ुद को कैसे बचाकर रखा समाज से, लोगों से? क्या तुम्हारी मां ने तुम पर शादी के लिए कभी दबाव नहीं डाला?”

मैं हौले से मुस्कुरा पड़ी. “मन की शक्ति बहुत बड़ी ताक़त होती है राजीव, मन-ही-मन तुम्हारे साथ सात फेरों में बंधने से लेकर हर रस्म निभा चुकी थी और फिर तुम्हारे ही शब्दों में मन के बिना कहीं और क्या रिश्ता जोड़ती…?”

राजीव प्रसन्नता से अभिमानभरी नज़रों से मेरी ओर एकटक निहारने लगे, तो मेरी पलकें स्वत: झुक गईं.

राजीव का हाथ थामे मैं तेज़ी से घर की ओर चल पड़ी, पर आज ये लंबी सड़क उदास और सूनी-सी नहीं, बल्कि बेहद ख़ुश और खिली-खिली-सी लग रही है, बिल्कुल मेरी ही तरह.

– वर्षा सोनी

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कहानी- क़िस्मतवाली (Short Story- Kismatwali)

“मेरे पति स़िर्फ मेरे प्रति पूर्ण समर्पित हैं, ये ख़्याल मुझे आभासी ख़ुशी देता है, मेरे होंठों पर मुस्कान लाता है. लोग जो मेरे प्रति ईर्ष्या महसूस करते हैं, क्या ये सब सुशांत से अलग होने पर संभव होगा. सब मेरे प्रति दया भाव रखना शुरू कर देंगे या फिर क्या पता, कोई फ़ायदा उठाने की सोचे.”

Hindi Kahani

मनस्वी, कितना सुंदर मौसम है, बेकार ही ऑफिस आ गई. सुशांत ने कितना कहा कि मत जाओ. आज इस भीगे मौसम का मज़ा लेंगे, पर हाय री क़िस्मत.”

सुकन्या के अंदाज़ पर मनस्वी फीकी मुस्कान के साथ सुबह-सुबह अपने पति के साथ हुई नोंकझोंक में खो गई.

ज़रा-सी बात और पतिदेव झुंझला पड़े. क्या करे वह अगर बरसात के दिनों में उनके अंडरवियर और बनियान नहीं सूखे तो.

कितना भी ड्रायर चला लो, पंखे में भी डाल लो, नमी तो रह ही जाती है. इसमें बेवजह उखड़ जाने की क्या ज़रूरत थी. शाम को तो बरसात में चहक-चहककर पकौड़े और चाय की मांग हो रही थी, तब तो बरसात बड़ी अच्छी लगी. मोहम्मद रफ़ी के गाने भी ज़ुबां पर चढ़ गए, पर सुबह होते ही?

“अरे! कहां खोई हुई है.” सुकन्या की बात पर लंबी सिसकारी लेते मनस्वी बोली, “तेरी बातों में खोई हूं और कहां? काश! हमारे पति भी तेरे सुशांत जैसे रूमानी होते, तो क्या बात होती. सच बता सुकन्या, कौन-सा जादू चलाया है तूने, जो सुशांत जी तुझ पर लट्टू रहते हैं.”

यह सुनकर सुकन्या मुस्कुराई, “कवि हैं पति मेरे. उनकी पेन की नोंक मुझ पर घूमकर नित नए विषय उठा लेती है. उनके रोमांटिक स्वभाव की सीधी वजह मैं ही हूं, और क्या.”

उसके सांवले-सलोने चेहरे पर चमक उभरी, फिर वह कहीं खो-सी गई. वह अक्सर ऐसे ही जब-तब खो जाती है.

कंप्यूटर बैकलॉग करते सुकन्या को धौल जमाती हुई वह बोली, “तू और तेरा कवि पति, ये ऑफिस है मैडम, यहां खोना मना है.”

“अरे! इसमें खोने जैसा क्या है, मेरे सुशांत हैं ही ऐसे. इन बरसाती बूंदों में उनके साथ के सामने अपनी नौकरी को चुनकर पाप किया है. इन मस्त नज़ारों में मेरा साथ पाकर वह जाने क्या-क्या लिख जाते मुझ पर…”

सुकन्या मादक अंगड़ाई लेते हुए बोली, तो मनस्वी उसे देखती रह गई. सांवला रंग, बोलती-सी मुस्कुराती मोटी-मोटी आंखें, शरीर दुहरा, गले में एक चकत्ता, जो शायद जन्मजात ही था. ऐसा कुछ भी नहीं था उसमें, जो किसी को बांधे रख सके. फिर भी पति की उस पर अतिशय आसक्ति दर्शाती थी कि बाह्य सुंदरता पर आंतरिक सौंदर्य हावी पड़ता है.

“ऐ, ऐसे क्या देख रही है. बोल न, आधी छुट्टी लेकर चली जाऊं.” वह शरारत से एक बार फिर बोली, तो मनस्वी माथा पकड़कर स्वांग जनित स्नेह से बोल पड़ी, “हे भगवान! तू और तेरा कविराज रांझा. अब चल, कैंटीन में चाय पीकर मौसम का लुत्फ़ उठाएंगे. यहां ऑफिस में भी बरसात का मज़ा कुछ कम नहीं.”

वह शायद कुछ ज़ोर से बोल पड़ी थी. तभी आसपास के लोग भी मुस्कुरा पड़े.

ये कोई आज की बात नहीं थी. ऑफिस में अक्सर ये चर्चा होती है कि सुकन्या जाने कौन-सी कलम-दवात से क़िस्मत लिखवा कर आई है, जो उसे इतना प्यार करनेवाला पति मिला है. प्रेम से लबरेज़ दांपत्य का किसी को उदाहरण देना होता, तो हमेशा सुकन्या का उदाहरण दिया जाता.

वह स्वयं भी तो अपने प्रेमिल क्षणों को बांटने से नहीं चूकती. रोज़ ही कोई न कोई रोमांटिक क़िस्सा उसके हिस्से रहता.

मसलन- कल रात  सुशांत ने चांदनी रात में मधुर वार्तालाप के बीच ये पंक्तियां उसको नज़र कीं. कल शाम साथ-साथ खाना बनाया. ये साड़ी सुशांत ने दी है. ये अंगूठी उन्होंने देते हुए ये कहा- वो कहा… उफ़्फ़! कितना कुछ था उसके पास कहने को. रोज़ एक नया प्रसंग होता सुनाने को. वह कम पड़ता, तो उसकी लिखी रूमानी ग़ज़लों और मतलों को सुनाते हुए ऐसे भाव देती जैसे उन भाव भरी इबारतों का पेटेंट करवाकर आई हो.

अपने रूमानी दाम्पत्य की क़िस्सागोई करती और सबके होंठों पर मुस्कान की रेखा घिर आती. उसकी कजरारी स्वप्नीली आंखें पति के प्यार से लबलबातीं, तो लोगबाग   जल-भुनकर ख़ाक हो जाते, पर मनस्वी  उसकी सबसे अच्छी श्रोता थी. कभी-कभी उसे भय भी लगता कि सुकन्या-सुशांत के प्रेम को कहीं किसी की नज़र न लग जाए.

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ऑफिस से शाम को मनस्वी उस दिन  घर पहुंची, तो पतिदेव ने उसके लिए चाय बनाकर रखी थी. पतिदेव के हाथों  की चाय और मिज़ाजपुर्सी से सुबह की झड़प से उपजी तल्खी गायब हो गई, तो एकबारगी मनस्वी को ग्लानि हो आई.

क्या हुआ जो विजय सुशांत जैसा भावुक कवि हृदय नहीं रखते, पर जैसे भी हैं,  केयरिंग है. उसकी जगह और कोई भी होता, तो ऑफिस जाने की हड़बड़ी में नम बनियान देख चिड़चिड़ा जाता. जाने-अनजाने विजय और सुशांत की तुलना कर बैठने पर मन अपराधबोध से भर उठा.

क़रीब 10 दिन बीतते न बीतते सुकन्या एक बार फिर दफ़्तर से नदारद हुई. फोन किया, तो पता चला मैडमजी माउंटआबू  की ख़ुशनुमा वादियों में हैं. उसकी प्रफुल्लित आवाज़ उसकी ख़ुशी ज़ाहिर कर रही थी.

“क्या करूं मनु, सुशांत ने एकदम से प्रोग्राम बना लिया. क्या करती आना ही पड़ा, पर सच कहूं, बड़ा मज़ा आ रहा है. इतना  ख़ूबसूरत मौसम है कि क्या कहूं… मेरे कमरे के ठीक सामने पहाड़ियां हैं, जिन्हें बादलों ने ऐसे ढंका है कि…”

“सुन मुझे थोड़ा काम है.” मनस्वी ने स्वर भरसक संभाला, कहीं ईर्ष्या ज़ाहिर न हो जाए, पर सुकन्या अपनी दुनिया में मस्त बोल रही थी,

“मनु, अपने रोज़मर्रा के जीवन की रेलमपेल से छुटकारा पाना ज़रूरी है. जो पल हमने यहां जीए हैं, बस वही ज़िंदगी है. जानती हूं तेरा समय ख़राब कर रही हूं, पर क्या करूं, तुझसे अपनी ख़ुशी बांटती हूं, तो ख़ुुशी और बढ़ जाती है…”

“अरे, नहीं सुकन्या इतना भी बिज़ी नहीं हूं. तुम्हारे जीवन में ख़ुशियों के पल यूं ही आते रहें और क्या चाहिए. और हां, अब की बार आना तो असली ख़ुशी लेकर आना, मतलब दो से तीन की तैयारी करके आना…” यह सुनकर वह ज़ोर से हंस दी, फिर ‘अच्छा रखती हूं’ कहकर उसने फोन काट दिया.

हो न हो, इस बार सुकन्या ज़रूर ख़ुशख़बरी लेकर आएगी. मनस्वी सोच के घोड़े दौड़ा रही थी. एक हफ़्ते बाद सुकन्या का फिर फोन आया, “मनस्वी मेरी दो दिन की छुट्टी बढ़वाने की अर्ज़ी दे देना यार. मैं गिर पड़ी. सुशांत ट्रेकिंग पर ले गए थे, रस्सी हाथ से छूट गई. वो तो इन्होंने मुझे संभाल लिया, वरना जाने क्या होता. चेहरे और हाथ में चोट आई है, दो-चार दिन बाद ऑफिस जॉइन करूंगी. बॉस को बता देना…” इस ख़बर के बाद दो दिन बाद दाएं हाथ में क्रेप बैंडेज बांधे आई, तो उसकी दशा देख मनस्वी चौंक पड़ी. चेहरे के दाईं तरफ़ कालापन देख वह घबरा गई. सुकन्या सबको हैरान-परेशान देखकर चिर-परिचित अंदाज़ में बोली, “अरे, बस पूछ मत, ये सुशांत हैं न… आज यहां चलेंगे, कल वहां… डिनर, ट्रेकिंग-बोटिंग… बस पूछ मत मनस्वी… ख़ूब मज़े किए. ट्रेकिंग में गिर पड़ी. सुशांत से अपनी जी भरकर सेवा करवाई है.

सुकन्या अभी भी ख़ुश थी. और क्यों न होती. सच है, दुख-तकलीफ़ में पति का प्यारभरा स्पर्श कितना सुखद लगता है. पति का साथ-दुलार बड़े से बड़े घाव का मरहम बन जाता है. सुकन्या का मुस्कुराता चेहरा देखकर मनस्वी को तीन दिन पहले पैर में लगी वो  मोच याद आई, जिसे कितनी लापरवाही से विजय ने अनदेखा कर दिया. बाद में केमिस्ट को फोन पर पूछकर पेनकिलर मंगवाकर दे दी.

“ऐ कहां खो गई?” सुकन्या के कहने पर मनस्वी उसके चेहरे को ध्यान से देखने लगी. सांवले चेहरे पर चोट का कालापन घुल-मिल गया था. कुछ ऐसे ही सुकन्या का दर्द पति के प्रेम में घुल-मिल गया होगा. शारीरिक पीड़ा दांपत्य प्रेम में घुलकर विलुप्त-सी लगी.

मनस्वी सरसरी नज़र डालते हुए बोली,  “कुछ नहीं, तू अपना हाल बता. तेरे पास माउंटआबू की ढेर सारी बातें होंगी. तू सुना, सच कहूं, तो तेरी बातों से हमारे हृदय के सोये तार भी झनझना उठते हैं.”

और समय होता, तो सुकन्या शुरू हो जाती, पर आज वह कराह उठी, शायद दर्द था. बैलेंस चार्टशीट में पिछले दिनों का लेखा-जोखा भरने के प्रयास में वह खो-सी गई.

“तू कुछ ठीक नहीं लग रही.  कुछ दिन और आराम क्यों नहीं कर लेती.” मनस्वी के कहने पर वह मुस्कुराने की कोशिश करती कहने लगी. “नहीं यार, बहुत काम पेंडिंग है… करना तो है ही…” कहते हुए वह सिसकारकर अपने चोटिल हाथ को सहलाने लगी.

“हाथ में दर्द है ना, ला मैं तेरी मदद करती हूं.” मनस्वी के कहने पर वह “तू बस डाटा डिक्टेट कर दे…” कहते हुए कुछ देर आंखें मूंदे बैठी रही, फिर लंबी और गहरी सांस लेकर काम शुरू किया.

इस बात को महीना भी नहीं बीता था कि वह फिर अनुपस्थित हुई, पर इस बार बॉस के साथ पूरा स्टाफ उससे नाराज़ था, क्योंकि वार्षिक क्लोज़िंग में ऐसे ही काम की अधिकता थी, उसके हिस्से का भार भी सबके सिर पर पड़ गया.

बॉस ने भी आर-पार बात करने का मन बना लिया, आख़िरकार प्रोफेशनलिज़्म भी कुछ होता है. ज़रा-ज़रा-सी बात पर यहां देखना न वहां, पति के पीछे आंखें मूंदें चल पड़ना सही नहीं था. बॉस उसके लिए चार्टशीट बना रहे हैं.

मनस्वी उसके लिए परेशान थी और कुछ हद तक नाराज़ भी. पर जो भी हो, उसकी नौकरी बचाना ज़रूरी था. फोन से संपर्क नहीं हो पाया, तो एक बार उसके घर जाने के लिए मन यह सोचकर बनाया कि शायद अड़ोस-पड़ोस में कोई कुछ जानता हो. कोई हो, जो बता सके कि वह कहां गई है. स्क्वायर मॉलवाली रोड पर पहुंचकर एकता अपार्टमेंट का पता किया. गेट पर सुकन्या सुशांत मीणा तीसरे माले में रहते हैं, यह आसानी से पता चल गया. पांच मिनट के भीतर ही वह तीसरे माले पर पहुंच गई. सुशांत मीणा के नाम की नेमप्लेट देखी, तो वह हैरान रह गई. घर खुला था. बाहर कई चप्पलें रखी थीं. एकबारगी मन किसी आशंका से धड़का, पर अंदर से आती हंसी-खिलखिलाहट की आवाज़ से आशंका निर्मूल सिद्ध हुई. दरवाज़ा खटखटाना नहीं पड़ा, बैठक में ही नीचे कई लोग बैठे दिखे. सुशांत को वह तस्वीर में देख चुकी थी, सो पहचानने में उसे कोई परेशानी नहीं हुई.

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‘जी कहिये?’ के कर्कश स्वर के साथ सुशांत खड़ा अजीब ढंग से घूर रहा था.

“सुकन्या…” उसके मुंह से निकला, तो “वह किचन में देखो…” कहते हुए वह वहां बैठे लोगों के बीच बैठ गया. उसका उपेक्षाभरा अभद्र व्यवहार देखकर मनस्वी विस्मित थी. बैठक में काव्य गोष्ठी चल रही थी. रसोई से सुकन्या चाय के कप लेकर निकलती दिखी. मनस्वी को देख वह हकबकाकर पास आई और सामने बने कमरे में ले गई.

खिसियाई-सी मुस्कराहट लाते बोली, “आज काव्य गोष्ठी है. सुशांत के ख़ास लोग आए हैं, सो ऑफिस नहीं आ पाई, पर तू यहां क्यों चली आई? ”

उसके लापरवाहीभरे प्रश्‍न पर ग़ुस्से से ज़्यादा उसे उस पर दया आई. वह पागल थी या इतनी भोली कि यह भी न समझ सकी कि उसके ग़ैरज़िम्मेदाराना रवैये से नाख़ुश बॉस उसे इस्तीफ़ा पकड़ाकर बाहर का रास्ता दिखा सकता है.

सुकन्या भरसक सामान्य दिखने का प्रयास कर रही थी, पर मनस्वी की आंखें बैठक के उस असामान्य दृश्य पर टिकी थीं, जहां  छह-सात  स्त्रियां और लगभग इतने ही पुरुष  गद्दे-मसनद के साथ बैठे काव्य पाठ के नाम पर हंसी-ठठ्ठा अधिक कर रहे थे.

एक महिला सुशांत से सटी बैठी हंस-हंसकर उस पर गिर पड़ रही थी. सस्ता-सा माहौल देखकर मनस्वी से और बैठा नहीं गया. वह तो सोचकर आई थी कि शायद इस बार फिर सुकन्या अपने सपने के राजकुमार के साथ कहीं सैर पर निकली होगी या कहीं बीमार न पड़ गई हो. पर यहां तो दोनों स्थितियों से इतर कुछ और ही दिखा.

“तू ऐसे एकदम से कैसे चली आई?” सुकन्या के पूछने पर सख़्त लहज़े में मनस्वी बोली, “तेरा फोन नहीं लग रहा था, क्या करती. अपनी नौकरी बचाना चाहती है, तो कल आ जाना. मैं चलती हूं. तू इनकी मिज़ाजपुर्सी कर…” सुकन्या की झुकी गर्दन और झुक गई जब एक महिला का इठलाया-सा स्वर आया, “सुशांतजी, काव्य में ऐसा रसिकभाव, जो मन को सहज उद्वेलित कर दे… सूखे उपवन में मलय सुगंध उठा दे… ऐसा मर्मस्पर्शी भाव कहां से आता है आपकी कविताओं में.”

यह सुनकर सुशांत बोला, “अजी, आप जैसी सखी हों इस सखा की, तो कामदेव उतर ही आते हैं वाणी में. अब घरवाली की मुटियाई कमर और काले रंग पर तो कुछ लिख नहीं सकते. उनको देखकर तो आते विचार भाग जाएं.”

यह सुनकर सुशांत से लगभग चिपकी औरत हंसकर उस पर लदती हुई, ‘अजी, अब ऐसा भी न बोलिए’ कहकर हंस दी. बेशर्मी भरी हंसी के बीच सुशांत की वासनायुक्त लोलुप आंखें एक-दो से मिलती साफ़ दिखीं.

सुकन्या मनस्वी को खींचकर बाहर ले आई. आंखों में आंसू उतर आए, तो कमज़ोर शब्दों में बोली, “वह रीमा है, क्या करूं. जब घर आती है, तो ऑफिस आने को जी नहीं करता. डरती हूं.” अनपेक्षित माहौल और उसकी दशा देख मनस्वी ‘चलती हूं कल बात करेंगे’ बोलकर भारी मन से बाहर निकल आई.

काव्य गोष्ठी का दृश्य याद कर मन वितृष्णा से भर उठा. क्या सोचा था उसने सुशांत के बारे में और वह क्या निकला.

रातभर सुकन्या की कही बातों और देखे गए दृश्य को जोड़ती रही, पर कोई साम्यता नहीं दिखी. दूसरे दिन बॉस के ऑफिस से बाहर निकलती सुकन्या को उसने पकड़ लिया. वह भी शायद बहुत कुछ भीतर भरे थी, इसीलिए मनस्वी के देखने मात्र से उसके आंसू ढुलकने आरंभ हो गए. जो बताया, वह उस पर विश्‍वास न करती, पर कल का देखा दृश्य उसकी बातों का सत्यापन कर रहा था. वह हिचक-हिचककर बोल रही थी, “सुशांत का कवि होना मेरे जीवन में नासूर है. क्या कहूं, इतनी औरतों से मित्रता है, कोई भाई, तो कोई यार मानती है. सुशांत तो वैसे ही दिलफेंक रहे हैं. कवि होने से महिला मित्रों के संग-साथ… यारी-दोस्ती, रूप-सौंदर्य की बातें करने का लायसेंस मिल गया है. कोई  यकीन नहीं कर सकता है कि बाहर की स्त्रियों को आभार आदरणीय माननीय जैसे शब्दों से संबोधित करनेवाले सुशांत वास्तव में काम वासना के कीचड़ से लथपथ हैं. घिन आती है मुझे कभी-कभी अपने आप से कि मैं ऐसे आदमी के संसर्ग में हूं. सच कहूं, तो बाहर स्त्री पर आदर-सम्मान पर ग्रंथ लिखनेवाले सुशांत अपनी पत्नी को अपने घर में अपनी जूती समझते हैं.

कभी नेहा, तो कभी तूलिका… कल्पना-चंद्रिका… हे ईश्‍वर किस-किस का नाम लूं… आजकल रीमा नाम की औरत से उनके संबंध हैं. मैं सब कुछ जानकर भी चुप हूं.  माउंट आबू इनकी काव्य गोष्ठी में गई थी. रीमा को लेकर विवाद हुआ, तो ये तैश में आ गए. मुझे धक्का दिया और नतीजा टूटा हाथ लेकर मैं यहां आई. कविता और औरतों का इन्हें नशा है.”

“तूने यह सब पहले क्यों नहीं कहा? क्यों जताती रही कि तुम आदर्श दंपत्ति हो?”

उत्तेजना से मनस्वी बोली, तो वह फूट-फूटकर रो पड़ी. कुछ संभली तो कहने लगी, “पागल हूं न, क्या करूं. जो नहीं मिला, उसे कल्पना में ही जी लेती थी. यथार्थ में तो कवि की पत्नी होने की प्रताड़ना मिली है, सो सह रही हूं. सत्य की कठोर भूमि पर चलते-चलते पांव में छाले पड़ जाते, तो कुछ देर मिथ्या झूठे रूमानी मधुर दाम्पत्यिक क़िस्सों के सलोने झूले में सुस्ता लेती.”

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“मत सह. अपनी नौकरी संभाल और ख़ुद को संभाल. जो नहीं मिला, उसके पीछे मृगतृष्णा-सी मत भाग.”

“कहना आसान है, पर सहना तो पड़ेगा ही अपने बूढ़े माता-पिता के लिए, जिन्होंने बड़ी मुश्किल से मेरे साधारण रंग-रूप के चलते बड़े श्रम से सुशांत को ढूंढ़ा है.”

“तो क्या, जब तक माता-पिता हैं, तू सहेगी?”

“हां, और तब तक ही क्यों, शायद हमेशा के लिए सुशांत मेरा हो जाए… हो सकता है हम दो से तीन हो जाएं. मेरी तरफ़ से प्रयास जारी है, शायद आनेवाला अपनी क़िस्मत के साथ मेरी क़िस्मत भी लेकर आए.”

“तू पागल है, मृगतृष्णा में जी रही है. चल अभी, सुशांत का असली चेहरा सबके सामने ला.”

“नहीं-नहीं, ऐसा मत बोल, तू किसी को कुछ नहीं बताएगी. जो तिलिस्म मैंने अपने रिश्ते का बनाया है, सबके सामने उसे टूटते मैं नहीं देख सकती. सब मुझ पर हंसेंगे. मैं बर्दाश्त नहीं कर पाऊंगी. मनस्वी तुझे मेरी  क़सम, जो किसी से कुछ कहा.”

“हे भगवान, तू इन हालात में भी किसी तीसरे के बारे में सोच सकती है. मुस्कुरा और हंस सकती है, ये सब मेरी कल्पना से परे है.”

“मेरे पति स़िर्फ मेरे प्रति पूर्ण समर्पित हैं, ये ख़्याल मुझे आभासी ख़ुशी देता है, मेरे होंठों पर मुस्कान लाता है. लोग जो मेरे प्रति ईर्ष्या महसूस करते हैं, क्या ये सब सुशांत से अलग होने पर संभव होगा? सब मेरे प्रति दया भाव रखना शुरू कर देंगे. या फिर क्या पता, कोई फ़ायदा उठाने की सोचे. बेचारी का तमगा लगाकर मैं नहीं घूम सकती. मेरी क़सम खा मनस्वी कभी किसी को कुछ नहीं बताएगी.” सुकन्या हाथ जोड़े प्रार्थना कर रही थी. मनस्वी वहां और ठहर नहीं पाई.

कौन कह सकता था कि वह आज के ज़माने की अपने पैरों पर खड़ी आधुनिक महिला की बात सुन रही थी, जो छलावे के बुलबुले के संग खेलकर अपना मन बहला रही थी. बुलबुला फूट चुका था. वह और ताक़त से फूंककर बुलबुला बनाने में जुटी थी.

जब तीन दिन बाद अख़बार में सुशांत की तस्वीर छपी थी. ‘नारी गौरव’ की रक्षा हेतु पढ़े काव्य पाठ में उनकी कविता सर्वश्रेष्ठ कविता के रूप में चुनी गयी थी. ऑफिस में फुसफुसाहट थी, कितनी क़िस्मतवाली है न सुकन्या, कितनी सुंदर कविता है दोहरी ज़िम्मेदारी निभाती नारी का क्या सुंदर वर्णन हुआ है. मन से श्रद्धानत होते हुए पत्नी पर क्या ख़ूब लिखा है. ‘सुकन्या, लगता है तू शब्द दर शब्द कविता में ढल गई है.’… ‘यू आर सो लकी, पति कितना सोचते हैं…’

कोई कह रहा था, तो किसी ने कहा ‘भई, भावुक कवि… पति शब्दों और भावनाओं की कमी कहां.’ मनस्वी का जी चाहा अपने कान बंदकर ज़ोर से चीखे. नहीं, ये पंक्तियां सुकन्या के लिए नहीं हैं.  वह संस्कारविहीन इंसान कहलाने लायक नहीं है. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उसने सिर उठाया, तो सुकन्या के चेहरे पर एक अभूतपूर्व चमक देखी.

“तो आज जलेबी-समोसा सुकन्या मैडम की तरफ़ से.”

“हां-हां, क्यों नहीं.” सुकन्या प्रफुल्लित-सी कह रही थी.

सुकन्या के चेहरे का ओज उगते सूरज-सी लाली दे रहा था, सब भ्रमित थे, पर वो जानती थी, अंधेरा होनेवाला है. वह उसके चेहरे को ध्यान से देख रही थी और सुकन्या सतर्क-सी उसे सावधान कर रही थी, कहीं उसके चेहरे पर हंसी की रेखा धूमिल न हो.

Minu tripathi

       मीनू त्रिपाठी

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कहानी- चली-चली रे पतंग (Short Story- Chali-Chali Re Patang)

‘अब जब सब चैन से हैं, तो लोगों को क्यों दर्द हो रहा है? कभी हवाहवाई, तो कभी चली-चली रे पतंग देखो… गा-गाकर छेड़ते हैं. पता नहीं लोग अपनी ज़िंदगी से ज़्यादा दूसरों की ज़िंदगी में दख़ल क्यों देते हैं? मैंने तो बच्चों को भी आज़ाद कर दिया. रहने दो उन्हें इसी सब में ख़ुश. अच्छा ही तो है किसी को ख़ुशी देना.’ वह मुस्कुराई.

Hindi Kahani

तिरपन वर्षीया उर्वशी आईने में संवरते हुए अपने दो-चार चमकते उन चांदी के तारों को देख रही थी, मानो वे उसकी उम्र की गवाही देने ज़बर्दस्ती उतर आए हों, जबकि उसका रूप लावण्य उसे 40 से ज़्यादा की मानने को तैयार न था. आंखों में वही चमक, शरीर में वैसा ही कसाव, खिलता गेहुंआ रंग, संतुलित कद-काठी, कोई भी कपड़े पहनती, तो उसका रूप खिल-खिल जाता.

पति अनंत को दुनिया से गए 17 साल बीत गए. एक अरसा निकल गया. कब तक रोती. आख़िर बेटे अनन्य और अक्षुण की परवरिश करनी थी. पुरातनपंथी ससुरालवालों के विरोध करने पर भी उसने अनंत की ही कंपनी में जॉब हासिल कर ली थी. अपने अच्छे पढ़े-लिखे होने का उसे फ़ायदा मिला. वह लगन और मेहनत से दिन-ब-दिन तऱक्क़ी करती चली गई. 50 की होते-होते दोनों बच्चों को उसने सेटल कर दिया. मिलनसार हंसमुख उर्वशी अपनी मीठी ज़ुबां से सबका मन मोह लेती. बहुत से स्त्री-पुरुष उसे अपना दोस्त मानने लगे थे. अपनी समस्या उससे शेयर करते, जिनका समाधान अक्सर उसके पास होता. दूसरों की मदद कर उसे बहुत ख़ुशी मिलती. उसका यूं खुले दिल से सबसे घुलना-मिलना कुछ लोगों को रास न आता, जिसमें पड़ोसी और रिश्तेदार सभी थे, लेकिन उस पर कोई असर न होता.

आज वो फिर तैयार होकर जयेश सर के घर जा रही थी. जयेश अग्रवाल उसके बॉस थे. ऑफिस के कामों में बिल्कुल परफेक्ट, पर घर के मामलों में जल्दी घबरा उठते. लड़केवाले उनकी बेटी को देखने आ रहे थे. पत्नी गांव की थीं, कुछ

ऊंच-नीच न हो जाए, इसलिए उनकी बेटी भी चाहती थी कि उर्वशी आंटी आ जाएं. वह उर्वशी से जब भी मिली, उसके अपनेपन और अपनी पीढ़ी जैसे नए विचारों से बेहद प्रभावित हुई थी.

“फिर कहां चली बनी-ठनी पतंग बनके मैडम हवाहवाई, छुट्टी के दिन तो चैन से बैठा करो घर पर हम सहेलियों के साथ. किट्टी में भी ज़माने से नहीं शामिल हुई.” बगलवाली मिसेज़ माथुर ने टोक दिया.

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“हां, बच्चे जो यहां नहीं, तो फ़ायदा क्यों न उठाए?” मेड को सब्ज़ी दिलवाती तारा चावला ने मुस्कुराते हुए चुटकी ली.

“हां, हम तो यूं ही घर में उलझी रह जाती हैं, घर का मैनेजमेंट, पूजा-व्रत, रिश्तेदारी इनके जैसे आज़ाद परिंदे हम कहां…”

“आज इस डाल पर कल उस डाल पर…” ऑटो से उतरी नैना वोहरा ने जोड़ दिया, तो सभी खिलखिलाकर हंस पड़ीं. कार बाहर निकालते हुए उनकी फ़ब्तियां उर्वशी के कानों में भी पड़ीं, जिसकी वह अब तो आदी हो चुकी थी. उसने मुस्कुराकर सबको बाय किया और आगे निकल गई.

उसके जाने के बाद भी औरतें उसके बारे में बातों का पूरा ग्रंथ रच डालतीं. ‘क्या जवाब दे ऐसे लोगों को जिन्हें जीना नहीं आता. वे आंख मूंदकर उसी पुराने ढर्रे पर चलना चाहती हैं, ज़रा भी बदलना नहीं चाहतीं.’ एक ही खोल के अंदर जीते-मरते हैं, बस यह सोचकर कि लोग क्या कहेंगे.’

एक बेटा लंदन में सेटल है और एक ने इसी शहर में अपनी ससुराल के पास घर ले लिया है, तो क्या करें, इनके जैसे माथा पीटें, रोएं बैठकर कि अकेले रह गए, ज़िंदगी बेकार हो गई. अब ज़िंदगी में जीने के लिए बचा क्या’ सोचते हुए उर्वशी ने गर्दन झटकी. मन ही मन मुस्कुराई और चल दी. अभी तो सही समय है कुछ करने का, अपने दायित्व सब पूरे हो गए. कुछ अपने लिए, कुछ औरों के लिए बस कुछ न कुछ नया करते जाना, सीखते जाना है.

उर्वशी लौटी, तो उसके चेहरे पर बड़ी तसल्ली की रौनक़ थी. जयेश सर की लड़की दिव्या का रिश्ता तय हो गया था. तुरंत ही सगाई की रस्म भी कर दी गई. उर्वशी ने सब बख़ूबी संभाल लिया था. जयेश का पूरा परिवार बहुत ख़ुश था. सारे लोग तो उसे अपने से लगते. चेंज करके जब वह बेड पर आई, तो सोचने लगी, कहां है वह अकेली? इतने लोग, इतने परिवार, इतने काम हैं यहां करने को, अभी खाली कहां? अकेली कहां? उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई. चश्मा उतारा और जाने वह कब नींद की आगोश में खो गई.

उर्वशी की औरों से अलग अपनी अनोखी दुनिया थी. वह बेहद क्रिएटिव थी, जिनके लिए उसे समय कम पड़ता. अपने इतने सारे शौक़ थे, फुर्सत में होती, तो कोई भी अपने पेंडिंग शौक़ के काम उठा लेती और चाव से मसरूफ़ हो जाती. नए गीत-ग़ज़ल लिखना, सुनना, गुनगुनाना, पेंटिंग, स्केच करना, नया प्लांट लगाना, कभी किचन में नई रेसिपी ट्राई करना या नया कुछ ईज़ाद करना.

कुछ न कुछ नया सीखते-करते रहना उसे अच्छा लगता, वरना वो बेचैन हो जाती. शादी के बाद ज़िम्मेदारियां संभालने में उसे व़क्त ही कहां था अपनी रुचि के काम करने के लिए. परिवार के साथ दायित्व निभाते हुए भी ख़ुश तो बहुत रही, पर अंदर से अनमयस्क-सी रही. कुछ छूटा-सा लगता था, तो अब ज़िंदगी का पूरा आनंद उठा  रही थी.

लोगों के कमेंट पर यही सोचती ‘पता नहीं पड़ोसिनों, रिश्तेदार महिलाओं को क्या परेशानी है. नहीं आता उनकी बातों में उसे मज़ा तो क्या करे? एक ही ढर्रे की बातें, वही टॉपिक, नई ड्रेस, साड़ी, शॉपिंग रेट, नई ज्वेलरी, नई गाड़ी या किसी की लड़की का किसी के साथ चक्कर, व्रत-पूजा-पाठ, सिद्ध बाबा के प्रवचन,

भजन-कीर्तन, मंदिर, तीर्थदर्शन या सास-ननद-पति पुराण और कैसे भूला जा सकता है उनका मेड-सर्वेंट चैप्टर… उफ़्फ़’ उर्वशी का दिल कांप उठता.

वह सोचती कम से कम ऑफिस कलीग्स या दोस्त ऐसी बेकार की बातें कर मेरा दिमाग़ और वक़्त तो नहीं ज़ाया करते. उनके साथ योग, वॉक, कभी कोई नेक काम, किसी की मदद के लिए चली जाती. फुर्सत होती, तो कभी अपने शौक़ पूरे करती. कभी दोस्तों के संग टेबल टेनिस-बैडमिंटन खेलती या कभी पिकनिक, टूरिस्ट प्लेस, कभी मूवी, बाहर रेस्टोरेंट में डिनर, तो कभी घर पर अपना बनाया स्पेशल लंच-स्नैक्स कराती. इसके अलावा कभी बेटे-बहू-बच्चे आ जाते या वो ख़ुद जाकर मिल आती बच्चों से, तो क्या बुरा है जीवन? उसने ख़ुद ही तो चुना था ये जीवन.

बहू शालिनी वैसे तो मॉडर्न ख़्यालों की थी, पर सास की आज़ादी से उसे भी अपने मायकेवालों की तरह ही गुरेज था. कहती, “इस उम्र में ये सब आवारगी-सी है. ये इतना खुलापन आज़ादी आपको शोभा नहीं देती. लोग बातें बनाते हैं, बदनामी होती है हमारी.”

वह जानती नहीं क्या? शालू अलग घर चाहती थी. इस बहाने अपने पति राघव को वो मायके के पास ही खींच ले गई. ज़िद करके वहीं एक दूसरा घर भी बनवा लिया. राघव ने तो बहुत कहा कि मां के बिना वह दूसरे घर में हरगिज़ रहने नहीं जाएगा, पर उर्वशी बच्चों की ख़ुशी समझ रही थी.

उसने राघव को समझाया, “तो इसमें ग़लत क्या है? ठीक ही है ना, सोसायटी के ये छोटे-छोटे फ्लैट हैं. घर में बच्चे के लिए खेलने की जगह कम है. वहां उसका मायका पास है. शालू ख़ुश रहेगी, मेरे पोते शैंकि को भी उसके मामा के बच्चे खेलने के लिए मिल जाया करेंगे और जगह भी. यह भी तो देख न, हम रहते तो एक छत के नीचे हैं, पर कितनी देर साथ बैठ पाते हैं. सभी अपने-अपने कामों में बिज़ी रहते हैं. ऐसे वीकेंड पर कभी तुम सब, कभी मैं

आते-जाते रहेंगे. जब चाहे वैसे भी मिलते रहेंगे. शालू ख़ुश रहेगी, तो तुझे भी ख़ुश रखेगी. तुम सब ख़ुश रहोगे, तो मैं भी ख़ुश और चाहिए भी क्या… बेकार की मेरी चिंता मत कर. इतने सारे शौक़ हैं मेरे, अकेली कहां हूं मैं? फिर यहां कितनी यादें बिखरी पड़ी हैं चारों ओर, जो मुझे जीवन से जोड़े रखती हैं.” किसी तरह उर्वशी राघव को समझा पाने में सफल हुई थी.

‘अब जब सब चैन से हैं, तो लोगों को क्यों दर्द हो रहा है? कभी हवाहवाई, तो कभी चली-चली रे पतंग देखो… गा-गाकर छेड़ते हैं. पता नहीं लोग अपनी ज़िंदगी से ज़्यादा दूसरों की ज़िंदगी में दख़ल क्यों देते हैं. मैंने तो बच्चों को भी आज़ाद कर दिया. रहने दो उन्हें इसी सब में ख़ुश. अच्छा ही तो है किसी को ख़ुशी देना.’ वह मुस्कुराई.

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आसमान पर बादलों की टोलियां ठंडी हवाओं के साथ मस्ती में उड़ रही थीं. वह धीरे-धीरे ख़ुद ही गुनगुना उठी- चली-चली रे पतंग, देखो चली रे… उसने वॉर्डरोब से धानी रंग की साड़ी निकाली और पहनकर आईने के सामने आ खड़ी हुई. काला बॉर्डर उसकी खुली रंगत पर ख़ूब खिल रहा था. बालों को संवारा, पर बांधने को दिल नहीं किया उसका.

आज सच में दिल की पतंग आसमान छूने उड़ी-उड़ी जा रही थी. उसने ग़ज़लों का बज रहा रिकॉर्ड बंद कर दिया. अपना गाना उसे अधिक रुचिकर लग रहा था. सुबह बना रही पेंटिंग को उसने झीने कपड़े से कवर किया. खुली कलर ट्यूब के ढक्कन बंद करके उसने सैंडल पहनी. मोबाइल और पर्स उठाया, घर लॉक किया और गुनगुनाते हुए बाहर पैदल ही निकल आई.

पास के मार्केट से बड़ा-सा केक लिया और छोटे-छोटे बहुत सारे गिफ्ट्स. आज फिर उसे ‘आशियां’ अनाथालय जाना था. वहां किसी बच्चे का जन्मदिन है. वह देर-सबेर ज़रूर पहुंचती. आज तो संडे ही था. वह ढेर सारे पैकेट्स के साथ सुहावने मौसम का मज़ा लेते आहिस्ता-आहिस्ता चलते हुए घर लौटी, तो सब्ज़ी लेते-लेते गप्पे लड़ा रही पड़ोसिनों के कमेंट शुरू हो गए.

“कहां की तैयारी है मैडम हवाहवाई! संडे को भी पतंग बनी लहराती-इठलाती कहां से आई, कहां को चली?”

“आज कोई दोस्त आ नहीं रहे क्या?”

“कितने सारे दोस्त हैं इनके… आज  कोई भी नहीं…” चुटकी ली गई थी.

“औरतें कम, पुरुष ज़्यादा ये नहीं ध्यान दिया?” वही व्यंग्यात्मक सम्मिलित हंसी.

“पतंग-सी उड़ना है, तो किसी से डोर बांध क्यों नहीं लेती? कोई देखनेवाला तो है नहीं, आज़ाद हो.”

“एक कट गई, तो कोई और डोर मिल जाएगी भई…” वही ठहाके.

“बताओ तो हमें भी चली-चली रे पतंग कहां चली रे…?”

मन तो कर रहा है गाकर ही सुना दूं इन्हें. चली बादलों के पार अपनी कार पे सवार…सारी दुनिया ये देख-देख जली रे… बादल झूमेंगे, तो मोर को नाचने से कौन रोक पाएगा भला… पर क्या बताए इनको, इन्हें कुछ सही समझ आएगा क्या भला? बस, इसी तरह की बकवास बातों में ही इनकी ज़िंदगी का आनंद है. कुछ कहूं तो पल्ले पड़नेवाला नहीं. वह जवाब में उन्हें क्या बोलती, “बस यूं ही.” कहकर मुस्कुरा दी.

सारे उपहार पैकेट्स कार में डाले, फिर सामने ठेले पर से अपने लिए नमक नींबू लगा गर्म भुट्टा ख़रीदा, दांतों में दबाया और मौसम का आनंद लेते हुए उत्साह से चल पड़ी ऐसे गंतव्य की ओर, जहां बहुत सारे नन्हें उत्कंठापूर्वक उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे.

Neerja Shrivastav

डॉ. नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू’

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कहानी- जीत गई ज़िंदगी (Short Story- Jeet Gayi Zindagi)

इस अंतिम अस्पताल में वह यंत्रवत घुसा. निराशा से चारों ओर नज़र दौड़ायी, पर असफल रहा. वापस जाते पैरों को किसी के कराहने की आवाज़ ने रोक लिया. मुड़कर देखा, कोने के बेड पर हाथों में नलियां, वेंटीलेटर लगाए कोई लेटा था. गौर से देखा, वह रिया ही थी… उसे अपनी आंखों और क़िस्मत पर विश्‍वास ही नहीं हो रहा था. वह रिया के माथे पर हाथ फेरने लगा, “रिया… उठो… मैं आ गया हूं… उठो… रिया…” मगर वह बेहोश हो चुकी थी. उसका हाथ अपने हाथों में लिए, उससे माफ़ी मांगता, बातें करता प्रतीक रातभर जागा रहा. इस भयानक बम विस्फोट में रिया के बचने को एक चमत्कार मान ईश्‍वर की ख़ूब मिन्नतें करता रहा.

Hindi Short Story

रिया का मन आज सुबह से ही कच्चा हो रहा था. फटाफट काम निपटाते हाथ प्रतीक की आंखों में अपने लिए चिढ़ और नफ़रत के सम्मिश्रित भाव देख ठिठककर रह गए. कहां चूक गई वह? मल्टीनेशनल कंपनी के हज़ारों लोगों को संभालती सीईओ काफ़ी कोशिशों के बावजूद अपना घर बिखरने से नहीं बचा पाई. मन में दबा दुख और आंसुओं का आवेग आंखों के रास्ते बाहर आना चाहता था. किसी तरह ज़ब्त कर गई रिया. चुप-सी उदास दीवारें और पराए होते अपने के बीच रहना बहुत मुश्किल लग रहा था. आहत् अहम् ने न जाने किन आक्रोश भरे क्षणों में अलग होने का निर्णय ले लिया. उसी की काग़ज़ी खानापूर्ति के लिए दोनों चार बजे वकील के पास आने वाले थे.

घर से निकलते हुए रिया के पैरों में मानो बेड़ियां पड़ गईं. एक लंबी सांस ले पूरे घर को आंखों में समेटते बाहर निकली. मानो अब शायद ही वापसी हो.

वकील के यहां तलाक़नामे पर हस्ताक्षर करते रिया के हाथ एकबारगी कांपे. कनखियों से देखा… प्रतीक का भी यही हाल था. दोनों ख़ामोशी के साथ ही बाहर निकले. चर्चगेट स्टेशन पहुंचते ही प्रतीक ने चुप्पी तोड़ी.

“तुम घर पहुंचो, मैं बाद में आऊंगा.” और उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही दरवाज़े से बाहर निकल गया.

‘अब मेरा साथ घर तक भी गवारा नहीं.’ मन रो उठा रिया का. शायद बाहर की मूसलाधार बारिश भी उसका साथ दे रही थी.

लोकल ट्रेन में बैठते ही उसके विचारों की श्रृंखला फिर शुरू हो गयी. कितना प्यार किया करते थे दोनों एक-दूसरे से. प्रेम में आकंठ डूबे रहते. दोनों के परिवार इस शादी के ख़िलाफ़ थे. सारी कठिनाइयां झेलते, आपसी विश्‍वास के सहारे दो वर्ष का लंबा अंतराल गुज़र गया था. बीतते समय ने प्यार की नींव और मज़बूत कर दी थी. लेकिन दोनों के परिवारवालों का दिल फिर भी नहीं पिघला. अब और इंतज़ार न करते हुए दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली. दहलीज़ लांघते ही रिया अय्यर रिया प्रतीक माथुर बन गई. जीवन में ख़ुशियां ही ख़ुशियां थीं. ऑफ़िस से घर लौटने का दोनों को बेसब्री से इंतज़ार होता, लेकिन धीरे-धीरे यह प्यार न जाने कहां खोता चला गया. प्यार की जगह कड़वाहट ने ले ली थी.

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ब्रांद्रा स्टेशन पास आने लगा. विचारों को झटक रिया उठकर दरवाज़े तक आई कि अचानक भयानक आवाज़ से ज़ोरदार बम विस्फोट हुआ. वह कुछ समझ पाती, इससे पहले ही ज़ोरदार धक्के से वह दरवाज़े के बाहर फेंक दी गई. सिर झनझना उठा. चारों ओर ख़ून ही ख़ून, मांस के लोथड़े और चीत्कारें. अर्द्धचेतनावस्था में ही उसने देखा कुछ लोग उसे उठाकर दौड़ रहे हैं. दर्द की एक टीस पूरे शरीर में फैल गई. आंखों के आगे अंधेरा छा गया. शायद बेहोश हो गई थी वह.

प्रतीक थके-थके क़दमों से घर जाने के लिए चर्चगेट पहुंचा. बाहर की दुनिया से बेख़बर अपनी ही धुन में खोया था. स्टेशन पर ख़ूब भीड़ थी. लोग बातें कर रहे थे.

“पिछले ह़फ़्ते तेज़ बारिश ने दम निकाल दिया. उसके बाद भिवंडी में हुआ दंगा दहशत फैला गया. दो दिन पहले शिवसेना की तोड़-फोड़ से डरे लोग संभले भी नहीं थे कि आज 11 जुलाई का ये बम विस्फोट. पता नहीं और क्या-क्या देखना बाकी है.”

बम विस्फोट..? प्रतीक के कान खड़े हो गए. पूछने पर पता चला सात जगहों पर बम विस्फोट हुए हैं और वो भी प्रथम श्रेणी के डिब्बे में. प्रतीक के तो होश उड़ गए. हाथ-पैर कांपने लगे.

“रि…या…” वह ज़ोर से चिल्लाया. सिर पकड़कर नीचे बैठ गया और दहाड़े मारकर रोने लगा. विस्फोट 6.24 को बांद्रा में हुआ था और रिया उसी ट्रेन में थी.

लोगों ने प्रतीक को संभाला और उसे फ़ोन करने की सलाह दी. “हां… हां… फ़ोन करता हूं…” कांपते हाथ न जाने कितनी बार डायल करते रहे, पर फ़ोन नहीं लगा, ना ही मोबाइल और ना ही घर का. लगता भी कैसे, लगभग सभी मुंबईवासी और दूसरे शहरों में रहनेवाले लोग अपने घरवालों और रिश्तेदारों की सलामती जानने के लिए फ़ोन कर रहे थे. इससे सारे नेटवर्क जाम हो गए थे.

काफ़ी रात हो गई थी. प्रतीक जल्द-से-जल्द बांद्रा पहुंचना चाहता था, पर ट्रेनें रद्द हो गई थीं. लोगों का बड़ा-सा हजूम चर्चगेट से भाईंदर और विरार तक पैदल ही भूखा-प्यासा अपने-अपने घरों की ओर भाग रहा था. अनेक शंका-कुशंकाओं के साथ कि कहीं हमारा कोई अपना तो इस विस्फोट में नहीं…? इन भागते पैरों को ताक़त देने के लिए लोग रास्तों में मदद के लिए खड़े थे. स्थानीय निवासी और सेवाभावी संस्थाओं के कार्यकर्ता तो पीने के पानी से लेकर चाय-बिस्किट तक बड़े ही अनुशासित तरी़के से बांट रहे थे, कहीं-कहीं आग्रह के साथ और कहीं मीठी ज़बरदस्ती के साथ. उन अनजान लोगों का प्रेम और अपनापन देख प्रतीक की आंखें बरबस ही गीली हो गईं.

किसी तरह प्रतीक बांद्रा स्टेशन पहुंचा. वहां का दृश्य देखकर उसका दिल दहल गया. मृतकों के शरीर के अवयव जहां-तहां पड़े थे. हाथ कहीं, तो पैर कहीं. सब ओर ख़ून और मांस के चीथड़े. दर्द से चिल्लाते घायल लोगों का बिखरा सामान, ट्रेन की टूटी हुई ख़ून से सनी खिड़कियां, उखड़ी हुई सीटें, विस्फोट की तीव्रता बयान कर रही थीं. आस-पास के लोग घर में डरकर, दुबककर बैठने की बजाय घायल लोगों को जल्द-से-जल्द अस्पताल पहुंचा रहे थे. घर की चादरों और साड़ियों से स्ट्रेचर का काम लिया जा रहा था.

“कहां हो… रिया…” प्रतीक की मानो धड़कनें रुक गई थीं.

“अरे बाबा… यहीं तो हूं… तुम भी ना… ख़ामख़ाह… बेकार शोर मचाते हो.” प्रतीक की जान में जान आई. आंखों में चमक लिए उसने मुड़कर देखा. ओह…. नहीं…. यह तो उसका भ्रम था. ये तो घर के रोज़मर्रा के संवाद थे. प्रतीक पुकारता और रिया ऐसे ही जवाब देती. उसकी प्रोजेक्ट रिपोर्ट के लिए रात-रात भर जागती. उसके साथ विभिन्न संदर्भ ढूंढ़ती, उसका मार्गदर्शन करती रिया उसे याद आने लगी.

काम करते-करते झपकी लगने पर वह सो जाता, परंतु सुबह उसे सारी रिपोर्ट टाइपिंग कर प्रिंटआउट के साथ तैयार मिलतीं. यह रिया का ही कमाल था, जबकि उसे भी सुबह घर के सारे काम निपटाकर ऑफ़िस जाना पड़ता था.

एक दिन उसके बीमार होने पर मना करने के बावजूद रिया अपना प्रेज़ेंटेशन छोड़ सारा दिन उसके सिरहाने बैठी रही, जबकि इस प्रेज़ेन्टेशन के बाद उसे प्रमोशन मिलना तय था. पुरानी बातें याद कर सोच में पड़ गया प्रतीक. ऐसी गुणी, प्रतिभा संपन्न, प्यार करनेवाली पत्नी को वो तलाक़ देने जा रहा था. रिया का पहले खा लेना, उसे खाने के लिए ना पूछना, घर को सलीके से ना रखना या प्रतीक का चीज़ें बेतरतीब रखना, गीला तौलिया बिस्तर पर डाल देना, एक-दूसरे के लिए व़क़्त न होना… ये सब तो इतने बड़े झगड़े की वजह नहीं हो सकती कि तलाक़ ही ले लिया जाए. क्या हमारा ईगो हमारे प्यार से बड़ा हो गया था? और इस प्यार का एहसास होने के लिए क्या इस हादसे का होना ज़रूरी था? यदि वह पहले ही समझ पाता तो शायद रिया को इस तरह ना खोता, धिक्कार है उस पर.

“कहां हो.. रिया…” चलते-चलते थक गया था प्रतीक. एक ओर भय से पागल मन और दूसरी ओर टीवी पर दिखता हाहाकार उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल चक्कर काटने पर मजबूर कर रहे थे.

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अस्पतालों की अवस्था तो और भी विकट थी, चारों ओर शोर ही शोर. “हैलो… पचास बेड और भिजवाओ… एम्बुलेंस प्लेटफॉर्म पर भेजो… सर्जन एनस्थेटिस्ट को कॉल करो… साथ ही सांत्वना के शब्द घबराओ मत… सब ठीक होगा… डॉक्टर जी जान से सेवा में लगे थे. डॉक्टरों द्वारा रक्तदान की अपील करने से पहले ही अस्पताल के बाहर लगी लंबी लाइन ने दो घंटों में ही ख़ून का स्टॉक पूरा कर दिया. इस विलक्षण तेज़ी, भावना और अपनेपन ने प्रतीक को हिम्मत बंधायी और रिया के जीवित रहने की आस भी जगायी. उसे लगा पूरी मुंबई सारी रात नहीं सोयी है और उस जैसे अनेक शोकमग्न लोगों के दुःख में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से शामिल है.

इस अंतिम अस्पताल में वह यंत्रवत घुसा. निराशा से चारों ओर नज़र दौड़ायी, पर असफल रहा. वापस जाते पैरों को किसी के कराहने की आवाज़ ने रोक लिया. मुड़कर देखा, कोने के बेड पर हाथों में नलियां, वेंटीलेटर लगाए कोई लेटा था. गौर से देखा, वह रिया ही थी… उसे अपनी आंखों और क़िस्मत पर विश्‍वास ही नहीं हो रहा था. वह रिया के माथे पर हाथ फेरने लगा, “रिया… उठो… मैं आ गया हूं… उठो… रिया…” मगर वह बेहोश हो चुकी थी. उसका हाथ अपने हाथों में लिए, उससे माफ़ी मांगता, बातें करता प्रतीक रातभर जागा रहा. इस भयानक बम विस्फोट में रिया के बचने को एक चमत्कार मान ईश्‍वर की ख़ूब मिन्नतें करता रहा.

आज तीन दिन बाद रिया ने आंखें खोलीं. शायद यह प्रतीक का प्यार ही था, जो उसे मौत के मुंह से बचा लाया. वेंटीलेटर हटा दिया गया.

“अब ख़तरा टल गया है.” डॉक्टर बोले.

“थैंक्यू… डॉक्टर… थैंक्यू…” डबडबाई आंखों से प्रतीक डॉक्टर के पैरों पर गिर पड़ा. रिया आश्‍चर्यचकित-सी प्रतीक के उदास आंसू भरे चेहरे, सूनी आंखों और बढ़ी हुई दाढ़ी को देख रही थी. उसका हाथ अपने हाथों में ले प्रतीक बहुत कुछ कह रहा था, पर रिया कुछ भी समझ नहीं पा रही थी.

“विस्फोट की तीव्र आवाज़ से इनकी सुनने की शक्ति चली गई है.” डॉक्टर ने एक और आघात किया.

“घबराने की कोई बात नहीं, लगभग सभी पेशेंट्स की यही समस्या है. एक से तीन महीने में यह समस्या अपने आप ठीक हो जाएगी.” प्रतीक ने चैन की सांस ली.  हाथों में हाथ लिए दोनों बड़ी देर तक रोते रहे, पर ये ख़ुशी के आंसू थे. उनका प्यार ख़त्म थोड़े ही हुआ था, वह तो जमी हुई काई के नीचे ठहरे पानी की तरह था और अब तो यह जमी हुई परत भी हट चुकी थी. ज़िंदगी और मौत के बीच झूलती रिया ने प्रतीक को एहसास दिलाया था कि वह रिया से अब भी बेहद प्यार करता है. साथ ही यह भी कि छोटे-मोटे झगड़े तो हर गृहस्थी में होते रहते हैं, उन्हें ज़्यादा तूल देना ठीक नहीं. प्रतीक के इस प्यार, लगाव और देखभाल को रिया भी महसूस कर रही थी और पछता रही थी. सब कुछ पहले जैसा हो गया था. इस बम विस्फोट से न जाने कितनी ज़िंदगियां उजड़ गईं, मगर एक ज़िंदगी संवर गई.

रिया के मुंह से आश्‍चर्यमिश्रित चीख सुन प्रतीक ने सिर उठाकर सामने देखा. दोनों के परिवारवाले खड़े थे, जो टीवी में इन्हें देख यहां पहुंचे थे. इस भयानक

हादसे ने सारी कड़वाहट मिटा दी थी. सिर पर बंधी पट्टी, दोनों हाथों में जलने के ज़ख़्म और पैर में फ्रैक्चर लिए रिया ने उठने की कोशिश की.

“बस… बस… बहू… जल्दी से ठीक होकर घर आ जाओ.” प्रतीक की मां ने कहा. दोनों ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे. ख़ुशियां फिर लौट आई थीं. हां… ज़िंदगी जीत गई थी.

– डॉ. सुषमा श्रीराव

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कहानी- सेल्फी (Short Story- Selfie)

काश! राहुल से उसका अफेयर न होता. अब वह ऐसे चक्रव्यूह में फंस गई थी, जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं जानती थी. एक ऐसा भंवर उसे लील लेने को आतुर था, जिसकी कोई लहर किनारे की ओर नहीं जा रही थी. इस भंवर में अब उसका डूबना निश्‍चित था.

Hindi Short Story

गाजर का हलवा प्लेट में डालकर वह सीढ़ियों की ओर बढ़ी. अनु को हलवा बहुत पसंद है. अभी वह आख़िरी सीढ़ी तक पहुंची ही थी कि उसे हंसी का सम्मिलित स्वर सुनाई दिया. शायद अनु का बॉयफ्रेंड अंकुर आया हुआ था. अंकुर को वह अच्छी तरह जानती है. अक्सर अनु के पास पढ़ने आता है. दोनों मिलकर प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रहे हैं. ज्यों ही उसने टैरेस पर क़दम रखा, सामने का दृश्य देख वह सकपका गई.

अनु अंकुर के आलिंगन में थी और वह उसे किस करते हुए सेल्फी ले रहा था. यकायक उसके समूचे शरीर में झुरझुरी-सी दौड़ गई और सर्दी में भी माथे पर पसीने की बूंदें चमक उठीं. वह ख़ामोशी से नीचे उतर आई. घबराहट के कारण उसे बेचैनी हो रही थी. थोड़ी देर बाद अंकुर चला गया, तो अनु उसके पास आ बैठी.

“क्या बात है दीदी, आपकी तबीयत ठीक नहीं है क्या?” उसने अनु की तरफ़ देखा और गंभीर स्वर में बोली, “अनु, तुम मेरी छोटी बहन के समान हो. अन्यथा न लो, तो तुमसे कुछ कहना चाहती हूं.”

“कहिए न दीदी, क्या बात है?”

“मैं जानती हूं तुम और अंकुर एक-दूसरे को चाहते हो और तुम्हारे घरवालों ने भी तुम्हारे रिश्ते पर स्वीकृति की मोहर लगा दी है. फिर भी विवाह से पूर्व इस तरह से सेल्फी लेना उचित नहीं.” अनु की भावभंगिमा कठोर हो गई. वह बोली, “ओह दीदी, दिस इज़ टू मच. आप हमारी जासूसी करती हैं. मेरे पर्सनल मैटर्स में बोलने का आपको कोई अधिकार नहीं.” दनदनाती हुई वह सीढ़ियां चढ़ गई. हतप्रभ रह गई वह. अनु से उसे ऐसे व्यवहार की अपेक्षा कदापि नहीं थी. खाना खाने का फिर उसका मन नहीं हुआ. वह बिस्तर पर जा लेटी. विवाह के पश्‍चात् उसने जब यह फ्लैट ख़रीदा था, तो बतौर पेइंग गेस्ट अनु को ऊपर का कमरा दे दिया था. अनु उसके कलीग की कज़िन थी और उसे दो साल के लिए एक कमरा चाहिए था, जहां वह आराम से पढ़ाई कर सके. अनु और वह आपस में जल्दी ही घुल-मिल गए थे. इस समय उसकी आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे और मन के कैनवास पर पिछले एक साल की स्मृतियां चलचित्र की भांति उभरकर उसे विचलित कर रही थीं.

वह दिन उसके ज़ेहन में जीवंत हो उठा, जब राहुल के बुलाने पर ऑफिस से सीधी वह कॉफी हाउस पहुंची थी.  राहुल उसकी प्रतीक्षा कर रहा था. “कॉन्ग्रैचुलेशन्स रिया, तुम्हारी शादी फिक्स हो गई. मैं बहुत ख़ुश हूं कि तुमने अपनी ज़िंदगी का इतना बड़ा ़फैसला ले लिया और मुझे बताना भी ज़रूरी नहीं समझा.” राहुल के व्यंग्यात्मक स्वर से उसका मलिन चेहरा और बुझ गया था.

“मैं विवश थी राहुल, क्या करती? पापा से बहुत कहा, पर वे इंतज़ार करने के लिए सहमत नहीं हुए. मैंने तुम्हें पहले ही बताया था कि जब से मम्मी का स्वर्गवास हुआ है, पापा को मेरे विवाह की जल्दी है, लेकिन तुमने मेरी बात को गंभीरता से नहीं लिया. बीटेक के बाद अच्छी-भली जॉब छोड़कर एमबीए करने लगे.” उसका स्वर भीग उठा था.

“नहीं रिया, तुम्हारा निश्‍चय पक्का होता, तो अंकल तुम्हें विवश नहीं कर सकते थे. तुम कोई दूध पीती बच्ची नहीं हो. इंजीनियर हो और अब तो मेरा एमबीए भी कंप्लीट हो चुका है. जल्दी ही जॉब भी मिल जाएगी. इतना समय हम दोनों ने साथ गुज़ारा, किंतु तुमने सब भुला दिया. रिया, मैं तुम्हें कभी माफ़ नहीं करूंगा.”  क्रोध और पीड़ा के मिले-जुले भाव से राहुल का चेहरा लाल हो उठा था. बोझिल मन लिए वह घर लौट आई थी.

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10 दिन पहले उसके पापा डॉ. राजेश ने उसका रिश्ता सौरभ से पक्का कर दिया था. उसने पापा को काफ़ी समझाया था कि वह कुछ दिन राहुल के जॉब लगने की प्रतीक्षा करें, पर पापा नहीं माने और उन्होंने ज़बरन सौरभ से उसकी सगाई कर दी. सौरभ मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब करता था.

घर-परिवार भी अच्छा था. उन दिनों उसका मन बेहद उद्विग्न रहता था. मम्मी को याद करके वह कलपती. काश! वे ज़िंदा होतीं, तो उसकी ज़िंदगी को यूं बिखरने न देतीं.

धीरे-धीरे एक माह बीत गया और फिर आई वह कभी न भूल सकनेवाली स्याह रात. अब तक क़िस्से-कहानियों या फिर फिल्मों में ही ब्लैकमेलिंग होते देखी थी. कभी ख़्वाब में भी नहीं सोचा था कि एक दिन स्वयं उसका शिकार हो जाएगी. उस रात खाना खाकर वह अपने रूम में पहुंची ही थी कि एक अनजान नंबर से उसे कॉल आया. फोन रिसीव करते ही एक आवाज़ उसके कानों से टकराई,  “तुम मुझे नहीं जानती हो रिया, पर मैं तुम्हें अच्छी तरह से जानता हूं. तुम कंप्यूटर इंजीनियर हो. तुम्हारे पापा डॉ. राजेश मेहता शहर के जानेमाने सर्जन हैं.”

“कौन हो तुम? क्या चाहते हो?“

“उत्तेजित मत हो. मैं तुम्हारे बारे में सब कुछ जानता हूं. सौरभ के साथ तुम्हारी सगाई के बारे में भी और राहुल के साथ तुम्हारे अफेयर के बारे में भी.”

“देखो, तुम जो कोई भी हो, मुझे परेशान किया, तो मैं पुलिस में रिपोर्ट कर दूंगी.”  “पुलिस में जाने की ग़लती मत करना, अन्यथा बहुत पछताओगी. यकीन नहीं आ रहा न, चलो मैं तुम्हारे मोबाइल पर कुछ भेज रहा हूं.” और चंद सेकंड में उसके मोबाइल पर जो फोटो आई, उसे देख उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई. उसे लगा, वह चक्कर खाकर गिर पड़ेगी. वह उसकी और राहुल की फोटो थी, जिसमें वह राहुल के साथ आलिंगनबद्ध थी और राहुल उसे किस कर रहा था.

जैसे अनगिनत बिजलियां उस पर एक साथ टूटकर गिर पड़ी हों. उसकी संपूर्ण चेतना बिल्कुल जड़ हो गई थी. पूरा ब्रह्मांड उसे घूमता-सा जान पड़ा था.

“रिया, यह फोटो तुम्हारे पापा और सौरभ को भेज दी जाए, तो कैसा रहे?” और फिर वही हुआ जो ऐसे केस में होता है, पैसों की डिमांड. फोन कट गया था. कितनी ही देर तक वह जड़वत बैठी रही थी. यह कैसी मुसीबत में फंस गई वह. कौन उसे ब्लैकमेल कर सकता है? तभी दिमाग़ में राहुल का नाम कौंधा. अवश्य ही वह राहुल है, क्योंकि फोटो उसी के पास थी. वह सारी रात बिस्तर पर पड़ी करवटें बदलती रही थी. कितना नाज़ था उसे स्वयं की समझदारी पर कि वह कभी कोई ग़लत काम नहीं कर सकती. एक बार उसकी फ्रेंड नेहा ने अपने बॉयफ्रेंड को पत्र लिख दिया था. कितना नाराज़ हुई थी वह उस पर. देर तक समझाती रही थी कि कभी किसी के पास कोई लेटर या अपना फोटो नहीं छोड़ना चाहिए और अब स्वयं यह भूल कर बैठी थी. कहां गया उसका वह आत्मविश्‍वास. प्यार के उन्माद में ऐसी बह गई कि अपने संस्कार भी भुला बैठी और ब्लैकमेलिंग जैसे संगीन मामले में फंस गई.

अगले दिन उसके कहने पर राहुल उससे मिला. उसे देखते ही वह बिफर पड़ी, “तुम इतना गिर जाओगे, मैं सोच भी नहीं सकती थी. मैं तुमसे शादी नहीं कर रही, तो तुम मुझे ब्लैकमेल करोगे?”

“यह क्या अनाप-शनाप बोल रही हो. मैं तुम्हें ब्लैकमेल कर रहा हूं. दिमाग़ ख़राब तो नहीं हो गया तुम्हारा. आख़िर बात क्या है?” उसने सारी बात बताकर कहा, “वह सेल्फी तुम्हीं ने ली थी न राहुल, फिर मैं यह कैसे मान लूं कि यह हरकत तुम्हारी नहीं है.”

“रिया प्लीज़, मुझ पर ऐसा घृणित इल्ज़ाम मत लगाओ. मैं कभी तुम्हारा बुरा नहीं चाहूंगा. तुम कहो, तो मैं तुम्हारी कुछ मदद करूं.”

“ओह राहुल, तुम पहले ही से काफ़ी मदद कर रहे हो?”  कड़वाहट से बोल वह घर लौट आई थी. फिर किस तरह उससे एक अनजान मफलर से चेहरा ढके व्यक्ति ने रुपए लिए, इस बात को याद कर जनवरी की इस ठंड में भी उसका शरीर पसीने से भीग रहा था. उस घटना ने उसकी ज़िंदगी ही बदलकर रख दी थी. अब हर पल वह डरी-सहमी-सी रहती कि कहीं उस व्यक्ति का दोबारा फोन न आ जाए. जब भी उसके मोबाइल की घंटी बजती, वह चिहुंक पड़ती. एक सर्द लहर-सी उसके समूचे शरीर में दौड़ जाती. चेहरा स़फेद पड़ जाता. उसकी यह हालत उसके पापा से अधिक दिनों तक छिपी नहीं रह सकी. एक दिन नाश्ते के टेबल पर उन्होंने पूछ ही लिया था, “रिया, देख रहा हूं आजकल तुम दिनोंदिन कमज़ोर और पीली पड़ती जा रही हो. कहीं तुम्हें कोई प्रॉब्लम तो नहीं है?”

“नहीं पापा, प्रॉब्लम क्या होगी. ऑफिस में काम का बहुत प्रेशर है.” कहकर वह अपने रूम में चली गई थी. 15 दिन ही बीते होंगे कि उस रात दोबारा उसके सिर पर सैकड़ों ज्वालामुखी फट गए थे. गर्म-गर्म लावा बनकर शब्द कानों में पड़ रहे थे, “इतने बड़े बाप की बेटी हो. अच्छी-ख़ासी ज्वेलरी होगी तुम्हारे पास. बस, वही चाहिए मुझे.”  कटे वृक्ष के समान वह पलंग पर गिरकर फूट-फूटकर रो पड़ी थी.

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काश! राहुल से उसका अफेयर न होता. अब वह ऐसे चक्रव्यूह में फंस गई थी, जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं जानती थी. एक ऐसा भंवर उसे लील लेने को आतुर था, जिसकी कोई लहर किनारे की ओर नहीं जा रही थी. इस भंवर में अब उसका डूबना निश्‍चित था. इससे पहले कि उसकी भूल पापा को पता चले और उनकी आंखों में उसके लिए नफ़रत और क्रोध दिखाई दे, उसे अपना जीवन समाप्त कर लेना चाहिए. हां, मृत्यु में ही उसकी मुक्ति है. कितनी ही देर तक वह रोती रही. निराशा की एक गहरी परत उसके चारों ओर लिपटती जा रही थी. रात के अंधियारे में उसकी व्यथा सुननेवाला कोई नहीं था. रो-रोकर जब जी कुछ हल्का हुआ, तो विचारों ने करवट बदली. उ़फ्, यह क्या सोच रही है वह. उसके जीवन पर पापा का क्या कोई अधिकार नहीं? उनके लाड़-प्यार का क्या यही प्रतिदान है? अभी तक तो वह मम्मी के ग़म से नहीं उबर पाए हैं. अब बेटी के बिछोह का इतना बड़ा सदमा क्या उन्हें जीते जी नहीं मार देगा? नहीं… नहीं… वह ऐसा कायरतापूर्ण क़दम कभी नहीं उठाएगी. मन ही मन वह ईश्‍वर का नमन करने लगी. काश! नियति उसे इस चक्रव्यूह को भेदने का कोई उपाय सुझा दे और वह उस व्यक्ति को सज़ा दिलवा सके, ताकि भविष्य में वह कभी किसी युवती का जीवन ख़राब न कर सके.

अगली शाम पापा के मित्र इंस्पेक्टर यादव ने जिस व्यक्ति को अरेस्ट किया, वह और कोई नहीं सौरभ था. वह अचम्भित, स्तब्ध थी, उसका होनेवाला पति ही उसकी ज़िंदगी के साथ ख़िलवाड़ कर रहा था. इंस्पेक्टर यादव ने बताया था, “जिस मोबाइल से सौरभ ने तुमको फोन किया था, उसके आईएमईआई नंबर को हमने ट्रेस किया. साथ ही वह ज्वेलरी बॉक्स, जो उसने तुम्हारी कार से उठवाया था, उसमें जीपीएस ट्रैकर लगा हुआ था. उसी की बदौलत हम सौरभ को पकड़ पाए.”

सौरभ को सगाई के पश्‍चात् पता चला था कि रिया का पिछले तीन सालों से राहुल से अफेयर चल रहा था. वह यह शादी नहीं करना चाहता था, पर रिश्ता तोड़ने से पहले कुछ पैसा ऐंठना चाहता था. राहुल को जॉब की तलाश थी. उसने राहुल को जॉब का आश्‍वासन देकर उससे दोस्ती की और फिर उसकी अनुपस्थिति में उसके मोबाइल से फोटो अपने मोबाइल पर फॉरवर्ड कर ली. उसी रात उसने रिया को फोटो भेजी थी.

उसमें इतना साहस भी नहीं बचा था कि वह पापा का सामना कर पाती. ग्लानि और शर्मिंदगी का एहसास उसके हृदय को मथे डाल रहा था. अंतस की पीड़ा आंखों से आंसू बनकर बह रही थी. आज उसकी वजह से उसके पापा की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई थी. काश! यह धरती फट जाती और वह उसमें समा जाती. पापा उसकी मनःस्थिति समझ रहे थे. इसलिए स्वयं उसके कमरे में चले आए. “मुझे क्षमा कर दीजिए पापा.” उनके कंधे पर सिर रख वह बिलख पड़ी.

“जो कुछ भी हुआ, उसे एक दुखद स्वप्न समझकर भूल जाओ. अच्छा हुआ, व़क्त रहते तुमने मुझे सब कुछ बता दिया. इंस्पेक्टर यादव मेरे मित्र हैं. उन्होंने मुझे आश्‍वासन दिया कि वह इस बात को मीडिया में नहीं आने देंगे, अन्यथा हमारी कितनी बदनामी होती. आधुनिकता के नाम पर आज की युवापीढ़ी का इस तरह का खुला अमर्यादित व्यवहार क्या जायज़ है?” भर्राए कंठ से पापा बोले थे. देर तक वह उसका सिर सहलाते रहे. भावनाओं का आवेग कुछ कम हुआ, तो उन्होंने कहा,  “याद रखो बेटा, हमारे कर्म ही जीवन को आकार देते हैं. वे कर्म ही होते हैं, जो हमारा वर्तमान और भविष्य निर्धारित करते हैं. भूल मेरी भी है, जल्दबाज़ी में इतना ग़लत फैसला ले बैठा.”

कुछ दिनों बाद ही उसका विवाह राहुल के साथ हो गया था. सोचते-सोचते उसने माथे पर किसी के कोमल हाथों का स्पर्श महसूस किया, तो आंखें खोल दीं. पश्‍चाताप का भाव चेहरे पर लिए उसके समीप अनु बैठी हुई थी. “आई एम सॉरी दीदी. ऊपर जाकर ठंडे दिमाग़ से सोचा, तो लगा आप बिल्कुल सही कह रही थीं. विवाह से पूर्व किसी पर भी इतना विश्‍वास करना उचित नहीं. मैंने आपको बहुत दुख पहुंचाया दीदी. मुझे क्षमा कर दीजिए.” उसने स्नेह से अनु का हाथ थाम लिया,  “मुझे ख़ुशी है, तुमने अपनी दीदी की बात का मान रखा.”

“अच्छा, अब उठिए दीदी. हाथ-मुंह धो लीजिए. राहुल भइया आने ही वाले होंगे. मैं जानती हूं, आपने खाना भी नहीं खाया होगा. मैं आप दोनों के लिए चाय और नाश्ता ला रही हूं.” चंद मिनटों बाद ही राहुल आ गया. मंत्रमुग्ध दृष्टि से उसे निहारते हुए बोला, “हुज़ूर, आज इस चांद-से मुखड़े पर बेमौसम बदलियां क्यों छाई हुई हैं?”

उसने उसे अपनी बांहों के घेरे में ले लिया. जैसे ही उसने अपनी और रिया की एक सेल्फी लेनी चाही, उसे एक करंट-सा लगा. छिटककर वह दूर होते हुए बोली, “नहीं राहुल, सेल्फी नहीं.” राहुल खिलखिलाकर हंस पड़ा. क़रीब आकर उसकी पलकों को चूमते हुए बोला, “अरे यार, अब हम दोनों पति-पत्नी हैं.” उसके अधरों पर भी स्निग्ध मुस्कान तैर गई. राहुल की आगोश में सिमटकर उसने उसके सीने पर सिर रख दिया. अब वह अतीत की स्याह परछाइयों से पूरी तरह से मुक्त थी.

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कहानी- परिवेश (Short Story- Parivesh)

आज के ज़माने में अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा होना सुखद है. हम सभी एक अलग परिवेश में पले-बढ़े हैं. हमारी अपनी अलग महत्वाकांक्षाएं हैं. ऐसे में बिल्कुल नए परिवेश में ढलना एक दुश्कर कार्य है. शादी के बाद सामंजस्य ज़रूरी है, पर सामंजस्य के नाम पर, जहां पूरे अस्तित्व को दांव पर लगा देना उचित नहीं है, वहीं अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उस घर की सुख-शांति को दांव पर लगाना भी ठीक नहीं है.

Hindi Stories

“क्या हुआ अदिति? इस तरह मुस्कुरा क्यूं रही है?” दीप्ति के यह पूछते ही अदिति की हंसी छूट गई. बड़ी मुश्किल से ख़ुद को संयत करके बोली, “मैं सोच रही थी कि अगर ईश्‍वर ने इस दिल को ज़ुबां दी होती और साथ में स्वर भी दिया होता तो क्या होता?”

“इस दुनिया में घमासान छिड़ा होता और क्या होता. तू भी न, कितनी बेतुकी बातें सोचती है. वैसे देखा जाए, तो दिल बोलता तो है, बस सामनेवाले के दिल के तार जुड़े होने चाहिए, तभी तो मां-बाप, प्रेमी-प्रेमिका, दोस्त ये सभी एक-दूसरे की भावनाओं को बिन बताए ही समझ लेते हैं, जैसे मैंने समझ लिया है कि यह बेतुकी बात तेरे दिल में ऐसे ही तो नहीं आई है.” दीप्ति की बात सुनकर अचानक ही अदिति संजीदा हो उठी.

कुछ सोचते हुए बोली, “दीप्ति, अक्सर हम रिश्ते बनाने में जल्दबाज़ी कर जाते हैं और जब तक हमें अपनी ग़लती का एहसास होता है, तब तक हम एक कमिटमेंट के बोझ तले दब चुके होते हैं. अगर इस दिल को स्वर मिला होता, तो तुरंत हम एक-दूसरे की बातों को समझकर, रिश्तों को आगे बढ़ाने से पहले एक-दूसरे के दिल की आवाज़ सुनकर सही निर्णय पर तो पहुंचते. स्वार्थ और मजबूरी पर टिके रिश्तों की पहचान तो की जा सकती, क्षणिक जज़्बात को संभालने का मौक़ा तो मिलता. सामनेवाले को स्वयं ही बिन बताए बात समझने का मौक़ा मिलता और ग़लतफ़हमियों की गुंजाइश तो न होती.”

अदिति एक ही सांस में बोलती चली गई, तो दीप्ति ने उसे टोका, “अदिति, तू सिक्के के एक ही पहलू पर विचार कर रही है. दूसरा पहलू तो देख, कितना भयानक है. तेरी इस बेतुकी सोच से मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं. ईश्‍वर ने सोच-समझकर दिल को ज़ुबां नहीं दी है, ताकि हमारे रिश्तों में परदा पड़ा रहे और सुधार की गुंजाइश बनी रहे, रिश्तों की डोर नाज़ुक होती है. हमारे मन के भीतर चलते सवाल-जवाब और तनाव को ये डोर सह नहीं पाएगी और इसे टूटते देर नहीं लगेगी. सोच अगर इस दिल को ज़ुबां मिल जाए, तो रिश्ते कितनी बेरहमी से चटकेंगे. आज अगर हमें किसी रिश्ते से मुंह मोड़ना भी पड़े, तो कम से कम इतना ध्यान तो रखें कि जीवन में किसी मोड़ पर मुलाक़ात हो, तो मुस्कुराकर एक-दूसरे को पहचानकर आगे बढ़ें, न कि एक कड़वाहट के साथ उपेक्षा से मुंह फेर लें. पर ये बता कि ये फितूर तुझे सूझा कैसे? क्या चल रहा है तेरे मन में?”

प्रश्‍न उछालकर दीप्ति किचन की ओर चली गई और अदिति का मन उस प्रश्‍न में उलझ गया. क्या बताए वह दीप्ति को कि जिस जतिन के साथ एक महीने पहले तक उसने हर हाल में साथ जीने-मरने की क़समें खाई थीं, आज उसी रिश्ते पर उसका मन पुनर्विचार करने को मजबूर हो गया है.

दीप्ति और अदिति दोनों कॉलेज के दिनों की सहेलियां हैं. दीप्ति एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती है, वहीं अदिति एमबीए कर रही है और आजकल दीप्ति के साथ ही रह रही है. एक-दूसरे की राज़दार होने के साथ-साथ वे एक-दूसरे को भरपूर स्पेस भी देती हैं. इसके अलावा समय-समय पर एक-दूसरे की समस्याओं के समाधान के लिए उचित मार्ग भी सुझाती हैं.

एमबीए के दूसरे साल में इंडस्ट्रियल-ट्रेनिंग के दौरान अदिति की मुलाक़ात जतिन से हुई. एक बड़ी कंपनी को सहजता से चलाते हुए जतिन के सभ्य और आकर्षक व्यक्तित्व से प्रभावित अदिति उसे कब दिल दे बैठी, पता ही न चला. मॉडर्न और कुछ कर दिखाने की तमन्ना रखनेवाली अदिति के मोहपाश ने जतिन को कब बांध लिया, वो जान ही नहीं पाया.

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अदिति के जन्मदिन पर जतिन उसे डिनर पर ले गया, उस दिन वह साड़ी में बिल्कुल अलग अंदाज़ में दिख रही थी. हमेशा वेस्टर्न कपड़ों में दिखनेवाली अदिति को इस रूप में देखकर जतिन ख़ुद को रोक नहीं पाया. रूमानियत से भरा वह अदिति को प्रपोज़ कर बैठा, जिसे अदिति ने भी सहर्ष स्वीकार कर लिया.

दोनों इस रोमांच से गुज़र ही रहे थे कि तभी जतिन का बर्थडे आ गया. दीप्ति और अदिति बड़े उत्साह से केक और बुके लेकर उसे सरप्राइज़ देने उसके घर पहुंचीं, तो वे ख़ुद सरप्राइज़ हो गईं. जब उन्होंने जतिन के घर में एक शांत और पारंपरिक माहौल देखा, तब उनका उत्साह शीघ्र ही ठंडा पड़ गया.

उन्हें यूं आया देख जतिन कुछ संकोच में पड़ गया. तभी वहां जतिन की मां आ गईं. सादगी और स्नेह से भरी जतिन की मां से अदिति काफ़ी प्रभावित हुई. बातों ही बातों में जतिन ने बताया कि बिज़नेस क्लास से जुड़े होने के कारण उसका परिवार आज भी संयुक्त रूप से रहता है.

घर का संचालन उसकी मां की देख-रेख में घर की दोनों बहुओं द्वारा किया जाता है, तो घर में सभी भाई बिज़नेस में उनके पिता के अनुभवों के आधार पर चलते हैं. कितनी भी डिग्रियां वे हासिल कर लें, वे सभी उनके अनुभवों के आगे बेकार हैं. जतिन की मां ने बड़े उत्साह से बताया कि जतिन के भाई की शादी हाल ही में हुई है. अपनी बहू के बारे में बताते हुए उनकी आंखों में संतुष्टि व प्रसन्नता के चिह्न थे.

अदिति ने घर के रख-रखाव को देखकर कहा, “आंटी, आपने घर को कितने पारंपरिक तरी़के से रखा है.”

तो वो हंसते हुए बोलीं, “बेटी, परंपराओं की ये अमूल्य निधि ही हमारे घर की पहचान है. हम सभी परिवारजनों ने इसे सुरक्षित रखने में अपना-अपना योगदान दिया है. ईश्‍वर की कृपा से मेरी दोनों बहुओं ने भी मेरा बड़ा साथ दिया है.” यह कहते हुए उनकी आंखों में संतोष उतर आया था.

बड़ी भावुकता के साथ जब उन्होंने कहा, “ये भगवान का आशीर्वाद ही है कि यत्नपूर्वक संजोई परंपराओं की अमूल्य निधि को मेरा परिवार आगे बढ़ा रहा है.” यह सुनकर जहां अदिति कुछ सोच में पड़ गई, वहीं दीप्ति उनके घर के परिवेश को देखकर उत्साहित नज़र आ रही थी और तारी़फें करते नहीं थक रही थी.

जतिन की मां उन्हें भोजनकक्ष की ओर ले गई, जहां डायनिंग टेबल की जगह आकर्षक चौकियां लगी हुई थीं, जिनमें सुंदर नक्काशी की हुई थी. थालियों में लगा राजसी नाश्ता देखकर तो उनकी आंखें फैल गईं. अदिति और दीप्ति ने जींस पहनी थी, इसलिए  नीचे बैठने में कुछ दिक़्क़त हुई. जतिन की मां ने बड़े मनुहार के साथ उन्हें नाश्ता करवाया.

रोज़ ब्रेड-बटर पर आश्रित दीप्ति के लिए आज का ब्रेकफास्ट किसी फाइव स्टार होटल के नाश्ते से कम नहीं था. तभी जतिन की दोनों भाभियां आम रस लेकर आईं. सिर पर पल्ला लिए उन्हें देख अदिति कुछ और सिमट गई. उनके घर के पारंपरिक माहौल में वह स्वयं को असहज महसूस करने लगी थी.

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“आप कुछ और लीजिए न.” छोटी बहू के पूछने पर जतिन की मां बोली, “तुम लोग बातें करो, मैं कुछ देर में आऊंगी.” अदिति ने दोनों बहुओं के चेहरे को ध्यानपूर्वक पढ़ा, लेकिन उन चेहरों में थकावट और शिकायत का रंचमात्र भी चिह्न नहीं था. अदिति से रहा नहीं गया और वह बोल पड़ी, “सिर पर पल्ला रखने से कभी आपको उलझन नहीं होती है?”

“नहीं, बिल्कुल भी नहीं. ऐसा नहीं है कि हम आज की आधुनिक दुनिया से अपरिचित हैं. हम सबके लिए ये बड़े सम्मान की बात है कि हम अपने परिवार की गरिमा का ख़्याल रखें और अपनी संस्कृति की धरोहर को संभालें.” सहज और आत्मविश्‍वास के साथ कही बात ने अदिति को निरुत्तर कर दिया.

तभी पास खड़े जतिन ने कहा, “इस घर के परिवेश में अब तक सभी बहुएं सहर्ष और सहज ही ढल गई हैं.” यह कहते हुए उसने अदिति के चेहरे को पढ़ने की कोशिश की. चलते समय सभी ने जतिन के जन्मदिन पर घर आने के लिए उन्हें धन्यवाद दिया था. जतिन के परिवार को नज़दीक से समझने के बाद जहां दीप्ति उत्साहित थी, वहीं अदिति किसी और सोच में पड़ी थी.

जाने क्यूं उस परिवेश की भूरि-भूरि प्रशंसा के बावजूद स्वयं को उस माहौल में ढालने के ख़्याल से ही वो तनावग्रस्त महसूस करने लगी थी. वह ख़ुद से प्रश्‍न करने लगी कि क्या ये वही जतिन है, जिससे उसने प्यार किया था? या फिर उनका प्यार उस मुक़ाम पर नहीं पहुंच पाया, जिसमें सामंजस्य के लिए किसी और सोच-विचार की कोई जगह नहीं होती है? क्या उसका प्यार अभी कच्चा है? जिस जतिन को उसने दिल दिया था और जो उस दिन अपने घर पर मिला था, दोनों के बीच अंतर को पाटने की कशमकश में पूरा दिन निकल गया.

“अदिति, आज खाना नहीं खाना क्या?”

“आ… हां.” अदिति मानो नींद से जागी हो. खाने की मेज़ पर छाई चुप्पी को दीप्ति ने तोड़ा, “अदिति, तेरे दिल में जो भी है, उसे जल्द-से-जल्द जतिन को बताना बेहतर है. आज के ज़माने में अपनी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा होना सुखद है. हम सभी एक अलग परिवेश में पले-बढ़े हैं. हमारी अपनी अलग महत्वाकांक्षाएं हैं. ऐसे में बिल्कुल नए परिवेश में ढलना एक दुश्कर कार्य है. शादी के बाद सामंजस्य ज़रूरी है, पर सामंजस्य के नाम पर, जहां पूरे अस्तित्व को दांव पर लगा देना उचित नहीं है, वहीं अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उस घर की सुख-शांति को दांव पर लगाना भी ठीक नहीं है. सच-सच बताना अदिति उनके घर में जो शांति और सुकून था, क्या वो पहली बारिश की बूंदों के बाद उठी सोंधी महक-सा नहीं था? पर बावजूद इसके तुम तनाव में थीं, क्योंकि तुम स्वयं को उन परिस्थितियों में रखकर देख रही थीं, जबकि मैंने उस महक को भीतर तक महसूस किया, क्योंकि मैं जानती थी कि मैं यहां थोड़ी देर के लिए रुकी हूं. मेरी एक अलग दुनिया बाहर इंतज़ार कर रही है, पर तुम वहां ठहरकर अपने मन मुताबिक दुनिया की खोज कर रही थी. अगर तुम अपनी ज़रूरतों के हिसाब से चलोगी, तो ये तुम्हारी स्वार्थपरता होगी, क्योंकि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तुम्हें उस घर की चूलें हिलानी पड़ेंगी.”

“पर एक बात बताओ दीप्ति, क्या कभी उस घर में परिवर्तन नहीं हुआ होगा?” “परिवर्तन ज़रूर आया होगा, पर वो तूफ़ान बनकर नहीं आया होगा. उसने अपनी पैठ धीमी गति से की होगी. जतिन के परिवार में, जो स्त्रियां हैं, वे सभी उसी मिलते-जुलते परिवेश से आई हैं. उनका उस परिवार में घुल-मिल जाना मुश्किल नहीं है. वो घर ऐसे लोगों पर टिका है, जो स्वयं से पहले दूसरों के बारे में सोचते हैं. जतिन के घर जाकर एक सुकून का एहसास होता है, पर उसके पीछे न जाने कितने लोगों का योगदान है. तुम्हारा और जतिन का रिश्ता अभी कितना आगे बढ़ा है, यह तुम्हारा व्यक्तिगत मामला है. अगर अब तुम उस घर जाना चाहती हो, तो उस घर के परिवेश को, जो वहां की पहचान है, मन से स्वीकारना होगा. उसे ज्यों का त्यों कैसे रख पाओगी, इस पर विचार कर लेना.”

दीप्ति की बातों से अदिति के मस्तिष्क में मंथन उद्वेलित हो चुका था. काफ़ी सोच-विचार के बाद रात तक अदिति निर्णय ले चुकी थी. सुबह उठते ही उसने जतिन को फोन किया. तय समय पर दोनों कॉफी हाउस में थे. आज जहां अदिति तनावरहित थी, वहीं जतिन कुछ असमंजस की स्थिति में था.

जतिन के कुछ बोलने से पहले अदिति बोल पड़ी, “आज मैं जो कुछ कहूंगी, मुझे विश्‍वास है तुम समझने की कोशिश करोगे. जतिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि तुम्हारे घर के परिवेश और वातावरण ने मुझे बहुत प्रभावित किया. आज के समय में भी अपनी संस्कृति को संभालना सुखद अनुभव है. जिन परंपराओं का निर्वाह तुम्हारे परिवार में हो रहा है, उनके साथ ज़्यादती होगी अगर मैं तुम्हारे परिवार में शामिल हुई तो… क्योंकि तुम्हारे और मेरे परिवेश में एक बड़ा अंतर है. उस अंतर को पाटने के लिए मैं तुम्हारे परिवार या स्वयं के अस्तित्व को दांव पर नहीं लगाना चाहती हूं. मैं तुम्हारे घर पर आकर सुकून के कुछ क्षण तो बिता सकती हूं, पर पूरी ज़िंदगी नहीं, क्योंकि मेरी अपनी अलग उड़ान है, मुझे अपनी मंज़िल तक पहुंचना है.”

अदिति ने अपने दिल की बात कहकर जतिन की ओर देखा, तो ऐसा लगा कि कुछ देर पहले उसके चेहरे पर छाए असमंजस के बादल छंट गए और मुस्कान के रूप में सुनहरी धूप ने जगह ले ली हो.

दिल से एक बोझ उतरने से वह तनावमुक्त दिखा, “थैंक्स अदिति, तुमने जिस सहजता के साथ अपनी बात कही, उसके लिए मैं तुम्हारा शुक्रगुज़ार हूं. जीवन में कुछ निर्णय समझदारी से लिए जाते हैं. उस दिन जब तुम मेरे घर आईं, तब भावी बहू के रूप में तुम्हें देखकर मैं तनावग्रस्त हो गया था. मैंने भावावेश में आकर तुम्हें प्रपोज़ तो कर दिया, पर उसके बाद एक दिन भी चैन से नहीं बैठा हूं. मैं हर पल तुम्हें अपने परिवार में फिट करने की जद्दोज़ेहद में लगा रहता था. तुम्हें अपने परिवार में सम्मिलित करके मैं स्वयं, तुम्हारे और अपने परिवारजन, किसी के साथ भी न्याय नहीं कर पाता. रिश्ता वही है, जो सहजता से निभे, वरना समझौता अधिक दिन तक नहीं टिकता है. सच तो यह है कि मैं ऊपर से कैसा भी दिखूं, पर अंदर से मेरा मन अपने परिवेश से भीतर तक जुड़ा हुआ है.”

“ये सच है जतिन कि तुम्हारी पहचान ने मुझे बहुत प्रभावित किया है. मैं अपने जीवन में उसके कुछ अंश ज़रूर डालना चाहूंगी, पर पूरी तरह से उसमें ढलना मुमकिन नहीं है, क्योंकि मेरी परवरिश अलग ढंग से हुई है. मेरी आकांक्षाएं भिन्न हैं. सच, आज कितने दिनों के बाद हम तनावमुक्त हुए हैं. ऐसा लग रहा है, हम दोनों ने आज अपने सिमटे पंख खोल दिए हों.”

दीप्ति की उचित सलाह पर जतिन और अदिति ने अपना रिश्ता तोड़ा तो ज़रूर था, पर उसमें कड़वाहट नहीं, समझदारी और दूरदर्शिता की मिठास थी. जहां अदिति जतिन के परिवार में पूरी गरिमा के साथ निभाई जानेवाली परंपराओं की मीठी छाप लेकर घर लौटी थी, वहीं जतिन अदिति की क़ाबिलियत तथा उसकी उड़ान को शुभकामनाओं से भरकर अपने परिवार के पास वापस लौट चुका था.

Minu tripathi

      मीनू त्रिपाठी

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कहानी- सीक्वल 2 (Short Story- Sequel 2)

माना बच्चा मां के पेट में रहता है, लेकिन जुड़ा तो पिता के दिल से भी रहता है. तुम गर्भस्थ शिशु को सुनने का प्रयास करना. देखना, उसकी धड़कनें स्वतः ही तुम्हारे दिल में उतरती चली जाएंगी. गर्भ में आने से लेकर गर्भनाल से जुदा होने तक वह तुम्हारे क्रियाकलापों और सोच-विचार से भी उतना ही प्रभावित होगा जितना अपनी मां से, क्योंकि उसकी मां के क्रियाकलाप और सोच-विचार तुमसे जुड़े हैं. तुम मां और शिशु के बीच की अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी हो. और कड़ी का महत्व हमेशा लड़ी से ज़्यादा होता है, क्योंकि वही लड़ी को तोड़ती या जोड़ती है.

Hindi Kahani

सुशांत के जाते ही स्वाति को फिर से टेबल, दराजें आदि टटोलते देख रमाजी से रहा न गया. “बेटी, तुम क्या टटोलती रहती हो? कुछ परेशानी है?” सास द्वारा चोरी पकड़ी जाते देख स्वाति एकदम झेंप गई.

“इस समय तुम्हें ज़रा भी टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं है. किसी भी तरह का तनाव बच्चे पर ग़लत असर डाल सकता है.”

“तो क्या सारी ज़िम्मेदारी होनेवाली मां की ही है? होनेवाले पिता का भी तो कोई फर्ज़ बनता है न मम्मीजी.” इतने समय से स्वाति के सीने में पनपता दर्द आख़िर फटकर बाहर आ ही गया था.

“कैसी बातें कर रही हो बेटी तुम? सुशांत तुम्हारा इतना तो ख़याल रखता है.” रमाजी बहू के आक्षेप से हैरान थीं.

“मैं कब कहती हूं कि ख़याल नहीं रखते? लेकिन मुझे धोखा तो न दें. शरीर फैलकर अनाकर्षक हो रहा है तो वे और कहीं…”

रमाजी को तो सांप सूंघ गया. “किसने कहा तुझसे ऐसा? सुशांत ऐसा नहीं कर सकता.”

“आप उनकी मां हैं न, इसलिए ऐसा कह रही हैं. लेकिन मैंने अपनी आंखों से उन्हें छुप-छुपकर उसके पत्र पढ़ते देखा है.”

“किसके?”

“अब यह मैं क्या जानूं? अपने लाडले से ही पूछिए न?” स्वाति की रुलाई फूट पड़ने को थी. लेकिन रमाजी ने धीरज रखते हुए उसके सिर पर हाथ फेरा. फिर हाथ पकड़कर उसे पलंग तक ले गई और धीरे से लिटा दिया.

“मैं शाम को सुशांत से स्वयं बात करूंगी. तुम विश्‍वास रखो, ऐसी कोई बात नहीं है.”

‘काश न हो…’ सोचते हुए स्वाति आंखें मूंदकर सोने का प्रयास करने लगी. डिलीवरी का समय एकदम पास जान उसकी रातों की नींद उड़ गई थी. हालांकि रमाजी ने आकर सब संभाल लिया था. उसकी मम्मी ने भी व़क़्त पर पहुंच जाने का आश्‍वासन दिया था. रमाजी और फ़ोन पर मम्मी उसे नसीहतें देती रहती थीं, हिम्मत बंधाती रहती थीं. पर फिर भी कोई न कोई परेशानी उसे घेरे रहती. समस्या मात्र शारीरिक रहती तो फिर भी ठीक था. लेकिन पति सुशांत के प्रति जब से उसके मन में शक के कीड़े ने जन्म लिया था, तब से वह मानसिक तनाव में भी रहने लगी थी. और इसी बात ने रमाजी को बेहद चिंतित कर दिया. शाम को सुशांत के घर लौटते ही उन्होंने उसे आड़े हाथों लिया. इस अनपेक्षित प्रहार से सुशांत एकदम बौखला उठा. उसने सफ़ाई पेश करने का प्रयास किया तो स्वाति भूखी शेरनी की तरह गरज उठी.

“मम्मीजी, इनसे कहिए कि वो पत्र निकालकर दिखाएं जो ये चोरी-चोरी पढ़ते हैं.”

“क… कौन-सा पत्र?”

“झूठ मत बोलो. मैंने अपनी आंखों से तुम्हें कभी बाथरूम में, तो कभी बालकनी में तो कभी मेरे सो जाने के भ्रम में चोरी-चोरी उसके पत्र पढ़ते देखा है.”

“हूं… तो यह बात है.” सुशांत ने अपनी जेब से एक पत्र निकालकर दिखाया. “शायद तुम इस पत्र की बात कर रही हो?”

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“हां, यही… देखा मम्मीजी आपने? इसे अपने साथ जेब में लेकर घूमते हैं. और मैं यहां…” स्वाति की बात अधूरी ही रह गई, क्योंकि सुशांत पत्र मां के हाथ में थमाकर तेज़ी से घर से बाहर निकल गया था. सास-बहू किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी उसे जाते देखती रह गईं. रमाजी की नज़रें हाथ में पकड़े पत्र पर गईं तो वह चौंक उठी, “अरे, यह तो तुम्हारे पापाजी के हाथ का लिखा पत्र है!”

“क्या?” स्वाति चौंक उठी.

रमाजी पत्र पढ़ने में खो गईं. स्वाति ने भी अपनी नज़रें उसी पर गड़ा दीं.

प्रिय बेटे सुशांत,

मेरा पत्र पाकर तुम हैरत में पड़ गए होगे न? दरअसल जब से पता चला है कि मैं दादा बननेवाला हूं, मैं ख़ुशी से फूला नहीं समा रहा हूं और तभी से तुम्हें पत्र लिखने की सोच रहा हूं. लगभग रोज़ ही रमा को बहू से फ़ोन पर बात करते सुनता हूं. अपने खाने-पीने का ख़याल रखना, रोज़ दोनों व़क़्त नियम से दूध पीना, सूखे मेवे, फल आदि बराबर खाना, भारी सामान मत उठाना. कपड़ों या पानी से भरी बाल्टी ख़ुद मत उठाना. सुशांत या बाई से कह देना… क्या? सवेरे जी मिचलाता है? अब बेटी यह तो इस दौरान होता ही है. पास में बिस्किट रखकर सोया करो. सवेरे उठकर दो बिस्किट खाकर ही बिस्तर से नीचे उतरा करो… आयरन और कैल्शियम बराबर ले रही हो न? बिल्कुल चिंता मत करना. इस समय किसी भी तरह का टेंशन लेना बिल्कुल ठीक नहीं है. मैं डिलीवरी से काफ़ी पहले आ जाऊंगी और सब संभाल लूंगी… हां, पर तब तक अपना ख़याल रखना.

तुम्हारी सास के भी रोज़ ऐसे ही हिदायत भरे फ़ोन आते होंगे. मां बनना है ही इतनी महत्वपूर्ण और गौरवपूर्ण बात. लेकिन एक बात तुम्हें भी खटकती होगी कि तुम भी तो पिता बनने जा रहे हो, फिर कोई तुम्हें इतना महत्व क्यों नहीं दे रहा? इस समय तुम्हारी अनुभूतियों को मुझसे बेहतर और कोई नहीं समझ सकता. लेकिन हम पुरुष बेचारे इस तरह के अनुभव फ़ोन पर शेयर नहीं कर सकते. झिझक होती है. इसलिए बहुत सोच-विचारकर आख़िर मैंने तुम्हें पत्र लिखने का निर्णय लिया.

मैं जानता हूं कि पापा बनने की ख़बर सुनते ही तुम्हारा दिल बल्लियों उछलने लगा होगा. मुझे भी जब डॉक्टर ने तुम्हारे अपनी मां के पेट में आने की सूचना दी थी, तो मेरे पांव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे. एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर लेने का-सा एहसास अंदर से उठा था. मन कर रहा था घर, ऑफ़िस, आस-पड़ोस में सबको चीख-चीखकर बताऊं कि मैं पापा बननेवाला हूं और मैंने ऐसा किया भी. चिल्लाकर तो नहीं, पर शर्माते, हिचकिचाते, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में सबको जता दिया था कि मैं पापा बनने जा रहा हूं.

उस समय हमारा संयुक्त परिवार था और घर में बड़े-बुज़ुर्गों का थोड़ा ज़्यादा ही लिहाज़ करने का रिवाज़ था. इसलिए मैं रमा का खुलकर ख़याल तो नहीं रख सका. पर हां, अपनी ओर से पूरा ध्यान रखता था. ऑफ़िस से लौटते व़क़्त चुपके से उसके लिए मिठाई या समोसे बंधवा लाता. कभी उसकी पान खाने की इच्छा होती तो रात को टहलाने के बहाने उसे पान खिला लाता. भरे-पूरे घर में भीनी-भीनी ख़ुशबू बिखेरते मिठाई-नमकीन को छुपाकर लाना बेहद जीवट का काम था. पर उन्हें खाते हुए रमा के चेहरे पर जो असीम तृप्ति के भाव उभरते, उन्हें देख मन गहरे आत्मसंतोष से भर जाता. इस दौरान लड़कियों का मन खट्टा, तीखा, मीठा और कभी-कभी तो मिट्टी, चॉक आदि खाने के लिए भी मचल जाता है. तुम बहू की स्वादेन्द्रिय का रुख़ जानकर उसे परितृप्त करने का प्रयास करना. देखना, तुम्हें भी कितनी तृप्ति का एहसास होगा? ऐसा लगेगा, सब तुम्हारे अपने पेट में जा रहा है.

मैं तुम्हें विशेषतः यह बताने के लिए पत्र लिख रहा हूं कि मैंने इस दौरान रमा का कैसे ध्यान रखा और जो मैं नहीं कर पाया, वो तुमसे करने की उम्मीद रखता हूं. पुरुष अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने में हमेशा से ही कंजूस रहे हैं. इसीलिए शायद पितृत्व को वो गौरव नहीं मिल सका, जो मातृत्व को हासिल है, वरना नंद ने भी कान्हा को उतना ही चाहा था जितना यशोदा ने. लेकिन ग्रंथों के पन्ने यशोदा की ममता के गान से भरे हुए हैं और गली-गली चर्चे भी यशोदा के ही होते हैं. ख़ैर, इन छोटी-छोटी बातों से पिता की महानता और उसका प्यार कम नहीं हो जाएगा.

रमा को उन दिनों सवेरे जल्दी उठने में परेशानी होती थी. मैं चाहता था सुबह की चाय मैं बनाकर उसे बिस्तर पर ही दूं, पर संकोचवश ऐसा कभी नहीं कर पाया. उसे ही सवेरे उठकर काम करना होता था. हालांकि मां, बहन उसकी मदद करती थीं, ख़याल भी रखती थीं. लेकिन मैं उसके लिए कुछ ख़ास नहीं कर पाने के कारण मन मसोसकर रह जाता था. एक दिन तो मैं ऑफ़िस के लिए निकल रहा था और रमा को उल्टियां शुरू हो गईं. मैं पलटकर उसे संभालने लगा. लेकिन तुरंत ही मां आ गई. ‘हम संभाल लेंगे. तुम जाओ, तुम्हें देर हो रही है.’ मुझे जाना पड़ा. उस व़क़्त रमा मुझे जिन कातर निगाहों से ताक रही थी, उन निगाहों को याद कर सीना आज भी छलनी हो जाता है. तुम्हारा तो फिर एकल परिवार है और बहू नौकरी भी करती है. उसे तो तुम्हारे सहारे की और ज़्यादा ज़रूरत है. बेटा, एक बात हमेशा याद रखना. एक स्त्री के लिए उसका पति सबसे बड़ा संबल होता है. ख़ुद से भी ज़्यादा वह उस पर भरोसा करती है. कभी भी कहीं भी उसके इस विश्‍वास को मत तोड़ना, चाहे इसके लिए संकोच और मर्यादा की बेड़ियां ही क्यों न तोड़नी पड़ जाएं…

पत्र पढ़ती रमाजी की आंखों के सामने अक्षर धुंधलाने लगे थे. उन्होंने घबराकर आंखें पोंछीं तो दो बूंद आंसू टपक पड़े. स्वाति हैरानी से कभी सास को निहारती तो कभी पत्र को. दोनों फिर पत्र पढ़ने में मशगूल हो गईं.

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… थोड़ा ज़्यादा ही गंभीर और भावुक हो गया हूं मैं! चलो, अब कुछ मज़ेदार बातें करते हैं. आख़िर इतने ख़ुशी का मौक़ा है. सब लोग बहू को अच्छा खिलाने-पिलाने की हिदायत दे रहे होंगे. पर मैं कहता हूं उसके साथ-साथ तुम अपने खाने-पीने का भी पूरा ख़याल रखना. आख़िर उसे और घर को संभालना तो तुम्हें ही है न? यदि तुम ही बीमार हो जाओगे तो… और फिर कल को एक नन्हा-मुन्ना भी आ जाएगा. उसके साथ तो तुम्हारी ज़िम्मेदारी व कार्यभार और भी बढ़ जाएगा. इसलिए अपने खाने-पीने का ख़याल ख़ुद रखना. जो फल, जूस, मेवे, घी आदि बहू को खिलाओ, थोड़ा ख़ुद भी खाना. माना बच्चा मां के पेट में रहता है, लेकिन जुड़ा तो पिता के दिल से भी रहता है. तुम गर्भस्थ शिशु को सुनने का प्रयास करना. देखना, उसकी धड़कनें स्वतः ही तुम्हारे दिल में उतरती चली जाएंगी. गर्भ में आने से लेकर गर्भनाल से जुदा होने तक वह तुम्हारे क्रियाकलापों और सोच-विचार से भी उतना ही प्रभावित होगा जितना अपनी मां से, क्योंकि उसकी मां के क्रियाकलाप और सोच-विचार तुमसे जुड़े हैं. तुम मां और शिशु के बीच की अत्यंत महत्वपूर्ण कड़ी हो. और कड़ी का महत्व हमेशा लड़ी से ज़्यादा होता है, क्योंकि वही लड़ी को तोड़ती या जोड़ती है.

गर्भनाल से जुदा होकर एक स्वतंत्र अस्तित्व जब तुम्हारी गोद में आएगा तो ख़ुशियों के साथ-साथ तुम्हारी ज़िम्मेदारियां भी कई गुना बढ़ जाएंगी. शुक्र है, अपनी उन ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए तुम्हारे पास पैटरनिटी लीव यानी पितृत्व अवकाश का विकल्प है, जो हमारे समय नहीं था. उसका पूरा सदुपयोग करना. बच्चे के पालन-पोषण संबंधी टिप्स मैं तुम्हें इस पत्र के सीक्वल-2 में दूंगा.

पत्र लंबा होता जा रहा है, पर देख रहा हूं कुछ महत्वपूर्ण बातें अभी भी छूटी जा रही हैं, जो शायद तुम्हें अभी तक किसी और ने नहीं बताई होंगी. गर्भावस्था के दौरान लगनेवाले टिटनेस के इंजेक्शन बहू को अवश्य लगवा देना और उसकी डॉक्टरी जांच बराबर करवाते रहना. बच्चे के टीकाकरण और देखभाल संबंधी जानकारी सीक्वल-2 में दूंगा. अब सबसे महत्वपूर्ण बात, हमारे लिए सबसे आवश्यक है सुरक्षित प्रसव और स्वस्थ शिशु. शिशु लड़का हो, चाहे लड़की, हमारे लिए परिवार में उसका आगमन बेहद हर्ष और उल्लास का विषय होगा. याद रहे, भ्रूण के लिंग निर्धारण के लिए उत्तरदायी स़िर्फ और स़िर्फ उसका पिता ही होता है. इसके लिए उसकी मां को प्रताड़ित करना बेहद घृणित और संकुचित सोच है.

रमा ने नन्हे शिशु के स्वागत की तैयारियां आरंभ कर दी हैं. झबले, पोतड़े, टोपी, मोजे आदि जाने क्या-क्या तैयार किए हैं. दादी बनने के उसके बड़े अरमान हैं. पर याद है न, हर अरमान और गौरव के साथ कुछ ज़िम्मेदारियां जुड़ी होती हैं. उन्हें पूरा करके ही उस गौरव का भरपूर लुत्फ़ उठाया जा सकता है. तुम्हें एक पिता नहीं, एक अच्छा पिता बनने के लिए ढेरों शुभकामनाएं. बहू को ढेर सारा आशीर्वाद और दुलार. ख़ुशख़बरी का बेसब्री से इंतज़ार करता.

तुम्हारा पिता

पत्र समाप्ति के साथ-साथ रमाजी की आंखों से गंगा-यमुना प्रवाहित होने लगी थी. स्वाति की आंखें भी भीग गई थीं. अचानक उसे सुशांत की अनुपस्थिति का ख़याल आया.

“मम्मीजी, सुशांत कहां चले गए? मेरा मन बहुत घबरा रहा है. मुझे उन पर इस तरह अविश्‍वास नहीं करना चाहिए था. लगता है, उन्हें मेरे व्यवहार से बहुत ठेस लगी है. मैं उनसे माफ़ी मांगना चाहती हूं. अभी फ़ोन करती हूं.”

स्वाति ने मोबाइल लगाया. लेकिन उधर से फ़ोन काट दिया गया. स्वाति बहुत निराश-हताश हो गई. इस बीच उसके पेट में हल्का-हल्का दर्द होने लगा. वह पेट पकड़कर बिस्तर पर लेट गई.

“मम्मीजी, बहुत दर्द हो रहा है.”

“हाय राम! लगता है लेबर पेन शुरू हो गए हैं. सुशांत को कैसे बुलाऊं?” घबराहट के मारे रमाजी के हाथ-पांव फूलने लगे थे.

“परेशान मत होइए मम्मीजी, मैं मैसेज भेजती हूं.” अभ्यस्त उंगलियों ने खटाखट मैसेज टाइप कर भेज दिया. “सॉरी! कम सून. नॉट फीलिंग वेल.”

“देखना मम्मीजी, वे दस मिनट में दौड़े चले आएंगे. हमारे परस्पर विश्‍वास की डोर इतनी भी कमज़ोर नहीं है.”

सुशांत स्वाति के विश्‍वास पर ख़रा उतरा. दस मिनट में ही वह भागता हुआ अंदर घुसा.

“स्वाति, स्वाति… तुम ठीक तो हो?”

“लगता है स्वाति को दर्द शुरू हो गया है. उसे अस्पताल ले जाना होगा. तुम उसे धीरे-धीरे कार तक ले जाओ. मैं बाकी सामान लेकर आती हूं.”

रमाजी और सुशांत ऑपरेशन थिएटर के बाहर चहलक़दमी कर रहे थे. उत्सुकता और बेचैनी का वह समय भी आख़िर बीत ही गया. लेडी डॉक्टर ने बाहर आकर नवजात शिशु के आगमन की बधाई दी. स्वाति को बच्चे के संग वॉर्ड में श़िफ़्ट कर दिया गया था. पोते को गोद में लेकर रमाजी खिल उठीं.

“देख सुशांत, बिल्कुल तेरे पापा पर गया है.”

सुशांत ने पापा को फ़ोन लगाया और ख़ुशख़बरी सुनाई.

“मैंने मोबाइल का स्पीकर ऑन कर दिया है. मैं अपने पोते की आवाज़ सुनना चाहता हूं.” स्पीकर पर बच्चे के रोने की आवाज़ गूंज उठी.

“अपने दादा को पुकार रहा है.” रमाजी का स्वर सुनाई दिया.

“पापाजी, मैं ठीक हूं. जल्दी आइए, हम आपका इंतज़ार कर रहे हैं.” यह स्वाति का स्वर था.

“और सीक्वल-2 का भी.” हंसी के साथ अंतिम पुछल्ला जोड़ते हुए सुशांत ने बात ख़त्म की.

Anil Mathur

     अनिल माथुर

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कहानी- फ़ैसला (Short Story- Faisla)

ऐसा नहीं था कि मैं अपने परिवार से प्यार नहीं करता था, लेकिन अपने प्यार को जताना मुझे कभी आया ही नहीं. आज झील ने, मेरे अपने ख़ून ने मुझे इस बात का एहसास दिलाया कि हर रिश्ते में प्यार का इज़हार कितना ज़रूरी होता है. पता नहीं ऐसा क्यों था, मैं जिन्हें बेहद प्यार करता था, वे ही मेरे प्यार को तरसते रहे.

Short Story

मेरी पत्नी का देहांत हुए आज बीस दिन हो गए. लोग सच ही कहते हैं, एक पत्नी ही होती है, जो पति की ज़्यादतियों को बर्दाश्त करती है. ईश्‍वर ने औरत को इतनी ज़्यादा सहनशक्ति दे रखी है, जिसकी कोई सीमा नहीं है, इसलिए उसकी तुलना धरती से की गयी है. अपनी मां की बीमारी की ख़बर सुनकर मेरा बेटा बहू के साथ अपनी मां को देखने आया, लेकिन मेरी पत्नी की सांस शायद उसकी एक झलक के लिए ही रुकी हुई थी. जैसे ही झील अपनी मां को पुकारता हुआ उसके कमरे में पहुंचा, उसकी मां ने उसके चेहरे को अपने कमज़ोर हाथों से थामा और हल्की-सी मुस्कान के साथ हमेशा के लिए अपनी आंखें बंद कर लीं. झील तो जैसे अपनी मां की मौत से पागल-सा हो गया. उसकी मां ही उसके लिए सब कुछ थी. कुल मिलाकर झील के लिए सारी दुनिया मां तक ही सिमटकर रह गयी थी और आज वही उसे छोड़कर जा चुकी थी.

झील के लिए मेरी भूमिका स़िर्फ एक पालक की ही थी, जो आर्थिक रूप से उसका पालन कर रहा था. झील के साथ मैंने कभी उसकी पढ़ाई या उसके भविष्य की योजनाओं के बारे में बातें नहीं कीं. मेरा काम था धन कमाना और उनकी ज़रूरतों को पूरा करना, बस मेरी ज़िम्मेदारी ख़त्म. कितना ग़लत था मैं? क्या पैसे में इतनी शक्ति होती है? यदि होती तो क्या मैं अपनी पत्नी को बचा ना लेता. ऐसा नहीं था कि मैं अपने परिवार से प्यार नहीं करता था, लेकिन अपने प्यार को जताना मुझे कभी आया ही नहीं. आज झील ने, मेरे अपने ख़ून ने मुझे इस बात का एहसास दिलाया कि हर रिश्ते में प्यार का इज़हार कितना ज़रूरी होता है. पता नहीं ऐसा क्यों था, मैं जिन्हें बेहद प्यार करता था, वे ही मेरे प्यार को तरसते रहे. मेरी पत्नी हर तरह से मेरा ख़याल रखती. उसकी हरदम यही कोशिश रहती कि मुझे किसी प्रकार की शिकायत ना हो. उसके इस समर्पण में प्यार के साथ-साथ एक प्रकार का डर भी शामिल रहता था, क्योंकि मैं बहुत ग़ुस्सैल प्रवृत्ति का इंसान था. किस बात पर नाराज़ हो जाऊं, कोई जान नहीं सकता था. मैंने बिना वजह कई बार अपनी पत्नी पर हाथ भी उठाया. मुझे याद है एक बार मेरी पत्नी ने कहा था, “ये सच है कि कमज़ोर ही मार खाता है, लेकिन मारनेवाला उससे भी ज़्यादा कमज़ोर होता है.” उसकी गूढ़ बातों का रहस्य समझकर भी मैं नासमझी दिखाता था, क्योंकि मैं जानता था कि वो बिल्कुल सच कह रही है.

आज मुझे मेरे बेटे ने ये एहसास दिला दिया कि ना मैं एक अच्छा बेटा था, ना अच्छा पति और ना ही अच्छा पिता और इन सब बातों का सारांश ये है कि मैं अच्छा इंसान ही नहीं रहा.

मेरी पत्नी की तेरहवीं के दूसरे दिन सारे मेहमान चले गए. घर में हम स़िर्फ तीन प्राणी ही रह गए. मेरा बेटा, बहू और मैं. बहू तो मुझसे बात कर लेती थी, लेकिन झील तो जिस कमरे में मैं रहता था, वहां से उठकर चला जाता. उसे देखकर ऐसा लगता जैसे अपनी मां की मौत का ज़िम्मेदार वो मुझे ही समझता हो. कुछ ही दिन बीते थे कि बहू ने बताया कि वे लोग वापस जा रहे हैं, शायद झील इस घर में मां के बगैर रहना ही नहीं चाहता था. मुझसे तो बात करता नहीं था, बहू के द्वारा कहलवा दिया कि कल रात की ट्रेन से वे जा रहे हैं. मैंने सोचा, अभी तो इनके जाने में पूरा एक दिन का समय बाकी है. रात को खाने के बाद बहू को समझा दूंगा कि कुछ दिन और रुक जाओ. रात के खाने पर झील नहीं दिखा. बहू ने बताया कि वो अपने दोस्त के यहां गए हैं.

मैंने उस समय कुछ नहीं कहा. जानता था सोने के पहले बहू दवाई देने के बहाने आएगी तभी कह दूंगा. लगभग दस मिनट बाद दरवाज़े पर दस्तक हुई. मैं समझ गया झील आ गया होगा. मैंने हमेशा अपने बेटे से दूरी बनाई रखी. वो तरसता रहा मुझसे बात करने के लिए, लेकिन मेरे ग़ुस्सैल चेहरे को देखकर उसकी कभी भी हिम्मत ही नहीं हुई और आज ऐसा व़क़्त आया है कि मेरी इच्छा हो रही है कि झील थोड़ी देर मेरे पास बैठे तो वो मुझ से दूर भाग रहा है, लेकिन अपने इस अकेलेपन का ज़िम्मेदार मैं ख़ुद था.

थोड़ी देर बाद बहू दवाई लेकर कमरे में आई. मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने एक लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ यह कहते हुए बढ़ाया कि ‘पापा झील ने आपके लिए दिया है. बहू के जाते ही मैंने पत्र खोला. पिता बनने के बाद ये पहली बार हुआ था कि झील ने मेरे लिए कुछ लिखा था. मैंने भीगी पलकों को पोंछा, जो न जाने क्यों बरसने पर तुली थीं. पत्र की हेडिंग पढ़कर ही दिल में एक टीस हुई. झील अपनी मम्मी के लिए हमेशा ‘डियर मम्मी’ या ‘मेरी स्वीट मम्मी’ इस तरह का संबोधन देता था. लेकिन मेरे लिए उसने लिखा था.

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आदरणीय पापा,

प्रणाम!

पता नहीं क्यों आपके लिए पत्र लिख रहा हूं ये जानते हुए कि आपके पत्थर दिल पर कुछ असर नहीं होगा. फिर भी मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं. पापा अब शायद मैं यहां कभी नहीं आऊंगा, क्योंकि मम्मी की वजह से ही मैं यहां आता था, जब वो ही नहीं रहीं तो… पापा इंसान को हमेशा ये क्यों लगता है कि वो हमेशा शक्तिशाली रहेगा, कभी किसी का सहारा नहीं लेगा. क्या ये सच है पापा, क्योंकि ये आपके ही शब्द हैं. पापा आप हमेशा स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझते थे. आपने कभी किसी को इ़ज़्ज़त नहीं दी. कभी किसी के साथ कोमलता से पेश नहीं आये. मैंने सुना था एक पुरुष यदि अच्छा पति साबित नहीं होता, तो वो एक क़ामयाब पिता होता है. लेकिन आपने तो कोई भी भूमिका ईमानदारी से नहीं निभाई. पापा आपने मम्मी को भी वो सम्मान नहीं दिया, जिसकी वो हक़दार थीं. जबकि उन्होंने हमेशा आपकी ख़ुशियों का ख़याल रखा. आपके बदलने की आस लगाए वो इस दुनिया से चली गयीं. मैंने कई बार मम्मी को आपके व्यवहार से दुखी होकर रोते देखा है. मैंने कभी उन्हें खुलकर हंसते नहीं देखा. उनकी हर हरकत, हर ख़ुशी में मैंने आपका दबाव महसूस किया है. पता नहीं वो आपको किस तरह बर्दाश्त कर रही थीं. आपका डर उन पर इस तरह हावी रहता था कि आपकी गैरमौजूदगी में भी आपके वजूद का एहसास उनके साथ होता था और वो हमेशा डरी-सहमी रहती थीं. मुझे याद है एक बार मैंने नासमझी में कह दिया था, “मम्मी आपको दूसरे पापा नहीं मिले जो आपने इन्हें हमारा पापा बना दिया.” आज मुझे इस बात का एहसास होता है कि ये बात कर मैंने मम्मी का दिल दुखाया था, लेकिन मम्मी हंस दी थीं. शायद मेरी उम्र ही ऐसी थी कि थप्पड़ नहीं मार सकती थीं. उन्होंने हंसकर कहा था, “यदि ये तुम्हारे पापा न होते तो मुझे तुम्हारे जैसा प्यारा बेटा कैसे मिलता.” जब मैं समझदार हुआ, रिश्तों को समझने लगा, तब समझा कि प्यार में वो शक्ति होती है, जो हर ग़म को सहने की ताक़त देती है और कुछ इसी तरह का प्यार मम्मी आपसे करती थीं. पापा मैं जानता हूं आपको मम्मी की कमी का एहसास हो रहा होगा. वो इसलिए नहीं कि आप उनसे प्यार करते थे, बल्कि इसलिए कि आपके हाथों में जो डोर रह गयी, उसकी कठपुतली ही नहीं रही, जिस पर आप हुकूमत चला सकें.

पापा, मम्मी की ख़ातिर मैं आपसे एक बात कहना चाहता हूं, कल हम लोग जा रहे हैं. यहां ऐसा कोई नहीं, जो आपकी देखभाल कर सके. इसलिए मैं चाहता हूं आप हमारे साथ चलें. यहां आपको अकेले छोड़ दूंगा, तो मम्मी की आत्मा मुझे कभी माफ़ नहीं करेगी. पापा ऐसा कहना तो ग़लत होगा कि मैं आपसे प्यार नहीं करता. हां, ये बात अलग है कि आपके कठोर व्यवहार में मेरा प्यार कहीं दब गया है, फिर भी कहता हूं पापा मुझे आपसे प्यार है और इसी प्यार का सहारा का वास्ता देकर कहता हूं कि आप हमारे साथ चलें.

आपका बेटा,

झील

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आज मेरे बेटे ने मुझे यह एहसास दिला ही दिया कि मैंने अपनी ज़िंदगी की कितनी अनमोल घड़ियों को यूं ही गंवा दिया. काश! मैं अपने बेटे को बता सकता कि मैं उससे और उसकी मम्मी से कितना प्यार करता हूं. आज मैंने यह निश्‍चय किया कि जो कुछ गंवा बैठा हूं, उसे तो ला नहीं सकता, पर जितना बचा है उसे तो संभाल ही सकता हूं. आज मैंने ऐसा फ़ैसला किया, जिसका इंतज़ार मेरी पत्नी को हमेशा रहा था. मेरे फैसले से मेरा मन इतना शांत हुआ कि मुझे पहली बार बहुत मीठी नींद आई. आज की सुबह लिए एक नया एहसास लाई थी. नाश्ते की टेबल पर झील नहीं दिखा. बहू ने बताया देर तक जागे हैं, इसलिए अब तक नहीं उठे. मैंने नाश्ता ख़त्म किया और अपने कमरे में आ गया. झील की मम्मी की तस्वीर के आगे जाकर पहले तो क्षमा मांगी, फिर धीरे से उससे वो कहा, जो वो सुनना चाहती थी. न जाने ऐसा क्यों लगा जैसे वो तस्वीर में भी मुस्कुरा रही है. बाहर आकर मैं लॉन में बैठा ही था कि अचानक मुझे एहसास हुआ कि मेरे ठीक पीछे कोई ख़ड़ा है. पलटकर देखा तो झील खड़ा था और थोड़ी ही दूर पर बहू खड़ी थी. मैं वापस मुड़ा और बिना पीछे देखे ही बहू को संबोधित करते हुए कहा, “मेरा सामान पैक कर लो, मैं भी चलूंगा.” मैं बगैर देखे ही दोनों की प्रतिक्रिया का अनुमान लगा सकता था. शायद बहू चली गयी थी.

मैंने पलटकर देखा, झील मेरी तरफ़ ही देख रहा है. बरबस ही मेरी बांहें फैलीं और झील एक अबोध बच्चे की तरह मुझसे लिपट गया व फूट-फूट कर रोने लगा. मेरी आंखों से भी आंसुओं की धार बह निकली. हम दोनों के आसुओं ने हमारे बीच की सारी दूरियां मिटा दीं. मैंने झील की तरफ़ देखा तो ऐसा लगा कि यही तो मेरी सच्ची पूंजी है. हम दोनों ने ख़ामोश रहकर भी एक-दूसरे से सब कुछ कह दिया. शाम को घर से निकलते हुए ऐसा लगा जैसे झील की मम्मी की आत्मा भी हमारे साथ है और होती भी क्यों ना, आज उसकी आत्मा जो ख़ुश थी.

– मीना राज तांडिया

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कहानी- गृहस्थी (Short Story- Grihasthi)

उन्हें सोमेश बाबू को यूं स्त्रियों की भांति गृहस्थी चलाते देख काफ़ी आश्‍चर्य होता था. अक्सर मज़ाक में पूछ बैठते, “यार सोम, तुम ऐसे औरतोंवाले काम इतनी आसानी से कैसे कर लेते हो? तुम्हें बोरियत नहीं होती क्या?”

सोमेश बाबू हंसकर कहते, “सच पूछो तो मुझे बड़ा मज़ा आता है. अपनी इच्छानुकूल भोजन बनाकर खाने से जो परम संतुष्टि मिलती है, उसे तुम नहीं समझोगे.”

Short Story in Hindi

आज भी सोमेश बाबू ने दो-चार निवाले खाकर थाली सरका दी. उनकी पत्नी नीलम देवी के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं.

आख़िर इनको हो क्या गया है? आज पांच दिन हो गए इनको बेतिया आए, लेकिन रोज़ खाते समय यही बेरुखी दिखा रहे हैं.

जब से बड़े बेटे सतीश की शादी हुई है, खाना उसकी पत्नी ममता ही बनाती है. बेचारी काफ़ी अच्छा खाना बनाती है. जो भी खाता है, उसकी तारीफ़ करता है. नीलम देवी सोचती रहीं कि अगर यह मान भी लिया जाए कि इनको बहू के हाथ के खाने का स्वाद रास न आता हो, लेकिन आज तो नीलम ने ख़ुद रसोई में जाकर अपना मनपसंद भोजन तैयार किया था, फिर भी इन्होंने नहीं खाया. कहीं इनकी तबियत तो गड़बड़ा नहीं गयी.

सोमेश बाबू चारपाई पर लेटे हुए थे. नीलम देवी ने प्यार से उनका माथा सहलाया.

“क्यों जी, आपकी तबियत ठीक नहीं है क्या? जब से आप आए हैं, खाना ठीक से नहीं खा रहे हैं.”

“नहीं, तबियत तो ठीक है. बस ऐसे ही खाने की इच्छा नहीं हो रही है. खैर, मैं कुछ देर सोना चाहता हूं. तुम भी जाकर आराम करो.”

सोमेश बाबू आंखें बंद कर जागते रहे. अपनी विगत ज़िन्दगी के बारे में सोचते रहे. आज से पैंतीस साल पहले उनकी नियुक्ति रेलवे में बुकिंग क्लर्क के पद पर मुजफ्फरपुर में हुई थी. उसी समय उनकी नई-नई शादी भी हुई थी.

बेतिया में उनका पुश्तैनी मकान था और वे अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे. मजबूरी में सोमेश बाबू को मुजफ्फरपुर में रेलवे क्वार्टर में अकेले रहना पड़ता था, क्योंकि उनके माता-पिता अपना घर छोड़कर नहीं जाना चाहते थे. बेचारी नई-नवेली उनकी पत्नी को लोक-लाज के कारण सास-ससुर की सेवा के लिए उनके साथ ही रहना पड़ता था.

तब आज का ज़माना तो था नहीं कि आज शादी हुई और कल माता-पिता की मर्ज़ी की परवाह किए बिना ही लड़का अपनी पत्नी को साथ लेकर चला जाए. शुरू-शुरू में सोमेश बाबू को अकेलापन काटने को दौड़ता, जब ड्यूटी से थके-हारे क्वार्टर में आते तो मन में एक हूक-सी उठती.

काश! मेरी पत्नी मेरे साथ रह पाती, मेरे लिए चाय-नाश्ता बनाकर रखती, मुस्कुराकर स्वागत करती.

लेकिन मन की इच्छा मन में ही दबकर रह जाती थी. शुरू-शुरू में वे जल्दी-जल्दी घर जाते थे. धीरे-धीरे समय बीतता रहा. नीलम देवी को दो लड़के और एक लड़की हुई. माता-पिता तो अपनी उम्र पूरी कर बारी-बारी से दुनिया से चले गए, लेकिन अब बच्चों की पढ़ाई की समस्या मुंह फाड़कर खड़ी हो गई.

घर को तो किराए पर देकर भी जाया जा सकता था, लेकिन सोमेश बाबू का हर दो-तीन साल पर स्थानांतरण होता रहता था. ऐसे में तीन-तीन बच्चों की पढ़ाई सुचारू रूप से नहीं चल पाती, इसलिए मजबूरी में नीलम देवी बेतिया में ही रहकर बच्चों को पढ़ाती रहीं.

समय के साथ सोमेश बाबू ने परिस्थितियों से समझौता कर लिया. अब उन्हें अकेले रहना नहीं खलता था. ड्यूटी से वापस आकर अपने लिए वे स्पेशल कड़क चाय का प्याला तैयार करते और इत्मीनान से अख़बार के साथ चाय की चुस्की लेते. फिर थैला लेकर बाज़ार निकल जाते. चुन-चुन कर ताज़ी सब्ज़ियां लाते, उन्हें साफ़ करते, बड़े मनोयोग से खाना तैयार करते और खा-पीकर संतुष्टि की नींद सो जाते.

धीरे-धीरे उन्होंने गृहस्थी का पूरा साजो-सामान इकट्ठा कर लिया था. सोमेश बाबू खाना बहुत लाजवाब बनाते थे. चिकन और मटन तो इतना अच्छा बनाते कि उनके मित्रों की लार टपक पड़ती.

उनके एक मित्र थे राकेश सहाय. वो बेचारे एक ग्लास पानी भी ख़ुद से लेकर नहीं पीते थे, इसलिए दोनों बच्चों को हॉस्टल में डाल दिया था और पत्नी को हमेशा साथ ही रखते थे. उन्हें सोमेश बाबू को यूं स्त्रियों की भांति गृहस्थी चलाते देख काफ़ी आश्‍चर्य होता था. अक्सर मज़ाक में पूछ बैठते, “यार सोम, तुम ऐसे औरतोंवाले काम इतनी आसानी से कैसे कर लेते हो? तुम्हें बोरियत नहीं होती क्या?”

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सोमेश बाबू हंस कर कहते, “सच पूछो तो मुझे बड़ा मज़ा आता है. अपनी इच्छानुकूल भोजन बनाकर खाने से जो परम संतुष्टि मिलती है, उसे तुम नहीं समझोगे.”

अब तो सोमेश बाबू को अपने हाथ से बनाए भोजन की ऐसी आदत पड़ गई थी कि छुट्टियों में घर जाने पर पत्नी और बेटी के हाथ का बना खाना बेस्वाद लगता था. लेकिन ‘दो-चार दिनों की बात है’, सोचकर किसी तरह काम चला लेते.

जब से बच्चे बड़े हो गए थे, कभी-कभार नीलम देवी छुट्टियों में उनके पास आकर रहना चाहती, तो उनके रवैये से जल्दी ही उकता कर चली जातीं. शुरू-शुरू में तो बेचारी ने बड़े चाव से पति की गृहस्थी को संवारना चाहा. लेकिन जैसे ही वह कोई काम करना चाहती, सोमेश बाबू लपककर पहुंच जाते और पत्नी पर न्योछावर होने लगते, “तुम यहां तो आराम कर लो, वहां तो दिनभर खटती रहती हो, कम-से-कम बन्दे को यहां तो अपनी सेवा का मौक़ा दो.” नाटकीय अंदाज़ में हंसकर सोमेश बाबू पत्नी के हाथ का काम छीनकर ख़ुद करने लगते.

बेचारी लाचारी से अपने पति को काम करते देखती रहती. एक भारतीय संस्कारों में पली औरत के लिए यह कितने शर्म की बात है कि वह भली-चंगी बैठी रहे और उसका पति गृहस्थी के काम करे. यहां तक कि सोमेश बाबू उनका खाना तक परोस देते. तंग आकर पत्नी ने उनके पास आना ही बन्द कर दिया.

इसी बीच बिटिया की शादी कर दी और फिर जैसे ही बड़े बेटे सतीश की नौकरी बैंक में लगी, उसकी भी शादी कर दी. छोटा बेटा नीतेश मेडिकल के अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहा था.

अब सोमेश बाबू के रिटायरमेंट में दो साल और बचे थे. आजकल वे गोरखपुर में बड़े बाबू के पद पर कार्यरत थे. उनके ज़िम्मेदारीपूर्ण दायित्व निर्वाह को देखते हुए उनके उच्चाधिकारियों ने उनकी तऱक़्क़ी के साथ बेतिया में डिप्टेशन कर दिया, ताकि नौकरी के अंतिम वर्ष वे परिवार के साथ रह सकें.

सोमेश बाबू को बहुत आश्‍चर्य हुआ, उन्होंने तो इसके लिए कभी कोई सिफ़ारिश नहीं की थी. बेचारे बड़े कशमकश में थे. उन्हें अकेले रहने की ऐसी आदत पड़ चुकी थी कि परिवार के साथ रहना उन्हें अपनी स्वतंत्रता का हनन लगता था. लेकिन अगर इंकार कर देते तो लोगों को आश्‍चर्य होता कि लोग परिवार के साथ रहने के लिए क्या-क्या तिकड़म नहीं भिड़ाते और वे कैसे आदमी हैं, जो ऐसा मौक़ा गवा रहे हैं. लिहाज़ा उन्होंने बड़े बेमन से बेतिया रेलवे स्टेशन का कार्यभार संभाल लिया.

लेकिन आज पांच दिन हो गए उन्हें घर आए और जबसे आए थे भरपेट खा नहीं सके थे. बेचारे अपनी मन:स्थिति का बयान भी किसी से नहीं कर सकते थे. अगर बात स़िर्फ पत्नी की होती, तो वे किसी बहाने उसे दरकिनार कर रसोई ख़ुद संभाल सकते थे, लेकिन सवाल तो बहू का था, उसके रहते तो यह कभी संभव न था. बेटे की पोस्टिंग इसी जगह थी, इसलिए बेटे-बहू को यहीं रहना था. उन्हें रह-रहकर अपनी स्वच्छंद जीवनचर्या याद आ रही थी, जहां वे अपने ढंग से जीते थे.

“उठिए न, चाय पी लीजिए,” पत्नी की आवाज़ से उनकी विचारधारा टूटी. आंखें खोलकर चाय का कप थाम लिया, अपनी बनाई स्पेशल चाय के सामने तो यह चाय बिल्कुल बेकार लगी. सोमेश बाबू घबरा गए.

‘बाप रे, दो साल में तो मैं घुटघुट कर मर जाऊंगा.’

मन के किसी कोने से आवाज़ आई, ‘रिटायरमेंट के बाद क्या करोगे?’

इसका भी हल उन्होंने निकाल लिया, ‘रिटायरमेंट के बाद मिले पैसों से गोरखपुर में ही कोई छोटा-सा बना-बनाया घर ख़रीद लूंगा कि मेरे स्वास्थ्य के लिए यही जगह अनुकूल है और उसमें अकेले पत्नी के साथ रहूंगा. पत्नी से उतनी प्रॉब्लम थोड़े ही होगी, जितनी बेटा-बहू और पूरे परिवार के बीच रहने पर है. पेंशन से दोनों जनों का आराम से गुज़ारा हो जाएगा.’

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फ़िलहाल इस समस्या का समाधान उन्होंने इस प्रकार किया- अपने परिवारवालों से चुपचाप उन्होंने यह बहाना करते हुए अपने उच्चाधिकारियों के पास आवेदन कर दिया कि उम्र अधिक हो जाने के कारण उन्हें नई जगह पर नए पद  का कार्यभार संभालने में काफ़ी मुश्किल हो रही है. इसलिए उन्हें गोरखपुर में ही बड़ा बाबू के पद पर वापस भेज दिया जाए, जिसका उन्हें तीन वर्षों का अनुभव है.

दो दिनों के बाद ही उन्हें गोरखपुर वापस भेज दिया गया. उनका डिप्टेशन समाप्त कर दिया गया. नीलम देवी उनके बुढ़ापे को देखते हुए उनके फिर से अकेले रहने की बात पर काफ़ी चिंतित हुईं.

सोमेश बाबू ने अपने अंदर की ख़ुशी को दबाकर ऊपरी अफ़सोस ज़ाहिर किया, “मैंने भी सोचा था कि अब चैन से घर-परिवार के साथ रहूंगा, लेकिन नौकरी करनी है

तो अफ़सरों का हुक्म तो बजाना ही पड़ेगा.”

नीलम देवी ने रास्ता निकाला, “अगर आप चाहें तो अब मैं आपके साथ रह सकती हूं. बिटिया भी ससुराल चली गई और घर संभालने के लिए सुघड़ बहू भी आ गई है.”

सोमेश बाबू घबरा गए, “अरे, नहीं-नहीं, तुम इतनी चिंता क्यों करती हो, तुमने तो अपनी सारी ज़िंदगी घर-गृहस्थी और बच्चों में खपा दी. अब तुम्हें आराम की ज़रूरत है. तुम कुछ दिन चैन से बहू की सेवा का आनंद उठाओ.”

पत्नी को उनकी बात रास नहीं आई. “मैं यहां सेवा का आनंद उठाऊं और आप वहां बुढ़ापे में अकेले बनाएं-खाएं.”

सोमेश बाबू ने हंसकर कहा, “मेरा क्या है, एक पेट के लिए थोड़ा-बहुत बना ही लूंगा. अब दो साल की ही तो बात है, फिर तो सब साथ ही रहेंगे.”

दरअसल, सोमेश बाबू अपनी गृहस्थी में किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त करना नहीं चाहते थे. पत्नी को हैरान-परेशान छोड़कर वे पूरे उत्साह से अपने वापस जाने की तैयारी करने लगे.

Neeta varma

    नीता वर्मा

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