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तलाक़ का बच्चों पर असर… (How Divorce Affects Children?)

Divorce

Talaq ka bachcho par asar

तलाक़ स़िर्फ कपल्स के रिश्तों को ही नहीं तोड़ता, बल्कि ये बच्चों के कोमल दिल को भी गहरी ठेस पहुंचाता है. पैरैंट्स का अलगाव उन्हें अकेला और तनावग्रस्त कर देता है. बच्चों को तलाक़ के पीड़ादायक अनुभव से कैसे बचाया जा सकता है? जानने के लिए अरुण कुमार ने बात की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट पूनम राजभर से.

 

बच्चों की सही परवरिश के लिए माता-पिता दोनों के साथ, प्यार व दुलार क़ी ज़रूरत होती है, लेकिन तलाक़ के बाद बच्चा माता-पिता में से किसी एक से दूर हो जाता है, और ये अलगाव उसके कोमल मन को अंदर से तोड़ देता है. माता-पिता के बीच आई इस दूरी को कुछ बच्चे आसानी से सहन नहीं कर पातें और डिप्रेश हो जाते हैं. हाल ही में हुए एक अध्ययन में भी ये बात सामने आई है कि तलाक़शुदा दंपत्तियों के बच्चों का सामाजिक व मानसिक विकास ठीक से नहीं हो पाता. वो पढ़ाई में भी अन्य बच्चों से पिछड़ जाते हैं. माता-पिता के अलगाव का अलग-अलग उम्र के बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है? आइए, जानते हैं.

0-4 साल
4 साल की उम्र तक के बच्चे अपने आसपास रहनेवाले लोगों से ज़्यादा जुड़े रहते हैं, लेकिन उन्हें आसपास होनेवाली बातों व घटनाओं की समझ नहीं होती. ऐसे में यदि पैरेंट्स अलग होते हैं, तो बच्चे को ज़्यादा कुछ समझ नहीं आता. तलाक़ के बाद यदि बच्चे की कस्टडी मां के पास है, तो वो पिता की अनुपस्थिति का आदी हो जाता है, लेकिन हालात तब बिगड़ सकते हैं जब बच्चे को संभालने के लिए परिवार में मां के अलावा कोई और जैसे नाना, नानी या अन्य सदस्य न हों. इस उम्र के बच्चे भले ही पारिवारिक ढांचे को न समझ पाएं, लेकिन उन्हें ये ज़रूर महसूस होता है कि उनके आसपास सब कुछ सामान्य नहीं है.

पैरेंट्स क्या करें?
पति-पत्नी को चाहिए कि वे बच्चे की कस्टडी का मामला कोर्ट-कचहरी में ले जाने की बजाय आपसी सहमति से सुलझा लें. चूंकि इस उम्र में बच्चों को मां की ज़्यादा ज़रूरत होती है, इसलिए बेहतर होगा कि उसे मां के पास ही रहने दिया जाए (यदि मां आर्थिक रूप से सक्षम हो). यदि मां आर्थिक रूप से कमज़ोर है, तो उसे आर्थिक सहायता उपलब्ध करना पिता की ज़िम्मेदारी है.

5-10 साल
इस उम्र में बच्चे चीज़ों को समझने लगते हैं और अपनी इच्छाओं को भी अभिव्यक्त करते हैं. सीखने के लिहाज़ से ये उम्र बच्चों के लिए बहुत अहम होती है. ऐसे में तलाक़ के बाद उपजे तनाव से वो आत्मकेंद्रित, दुखी और कुंठित हो सकते हैं. इस उम्र के बच्चे तलाक़ जैसी चीज़ों को समझ नहीं पातें. इसलिए वो बार-बार यही सोचते रहते हैं कि आख़िर मेरे मम्मी-पापा अलग क्यों रह रहे हैं? मेरे दूसरे दोस्तों की तरह मेरे पैरेंट्स साथ क्यों नहीं रहते? ऐसे सवाल बार-बार बच्चों को परेशान करते रहते हैं. इतना ही नहीं इसका उनके मानसिक विकास पर भी नकारात्मक असर होता है.

क्या करें पैरेंट्स?
बच्चों की ख़ातिर घर का महौल ख़ुशनुमा बनाएं रखने का प्रयास करें. बच्चे को ज़्यादा से ज़्यादा समय देने की कोशिश करें. उसके सामने अपने पार्टनर (पति/पत्नी) की बुराई न करें. अगर बच्चा कोई सवाल पूछता है, तो प्यार से उसका जवाब दें. उसके सवालों से झलाएं नहीं. आपके तलाक़ की वजह से बच्चे को स्कूल फियर भी हो सकता है, क्योंकि स्कूल में दूसरे बच्चों द्वारा उसके पैरेंट्स के बारे में पूछे जाने पर वो शर्मिंदगी व अधूरापन महसूस कर सकता है. अतः बच्चे का आत्मविश्‍वास बढ़ाएं, उसे समझाएं कि किसी चीज़ से डरने की ज़रूरत नहीं है, आप हर समय उसके साथ हैं. अगर मुमक़िन हो, तो तलाक़ के बाद भी बच्चे को दूसरे पार्टनर से मिलने दें. भले ही उनकी मुलाक़ात हफ़्ते या महीने में ही क्यों न हो, पर इससे बच्चे के अकेलेपन व अधूरेपन का एहसास दूर हो जाएगा.

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11-15 साल
इस उम्र तक बच्चे समझदार हो जाते हैं. हार्मोनल बदलावों की वजह से वो किसी भी चीज़ की ओर तेज़ी से आकर्षित होते हैं. इस उम्र के बच्चे अपने माता-पिता के तलाक़ को लेकर परेशान हो जाते हैं कि आख़िर ये हो क्या रहा है? ये मेरे साथ ही क्यों हो रहा है? उम्र के इस दौर में बच्चे को इमोशनली मज़बूत बनाने के लिए माता-पिता दोनों के प्यार व मार्गदर्शन की ज़रूरत होती है. दरअसल, इस उम्र के बच्चे अपने पैरेंट्स के अलगाव को जल्दी स्वीकार नहीं कर पातें. अपने सबसे क़रीबी रिश्ते को टूटता देख उनका रिश्तों पर से विश्‍वास उठ सकता है. अक्सर देखा गया है कि माता-पिता दोनों का साथ व प्यार न मिल पाने की वजह से बच्चे ज़िद्दी बन जाते हैं. जब वो दूसरे बच्चों को अपने पैरेंट्स के साथ देखते हैं, तो उसका कोमल मन आहत हो जाता है और वो ख़ुद को अनलकी (दुर्भाग्यशाली) मानकर परेशान हो जाते हैं. शारीरिक विकास के चलते इस उम्र में लड़कियों को मां की स़ख्त ज़रूरत होती है, ऐसे में अगर उनकी कस्टडी पिता के पास है, तो अपनी भावनाओं व परेशानियों को किसी से शेयर न कर पाने की वजह से वो कुंठित हो सकती है. तलाक़ के बाद घर के तनावपूर्ण माहौल का बच्चों की पढ़ाई पर भी बुरा असर पड़ पड़ता है.

क्या करें पैरेंट्स?
बच्चे पर विशेष ध्यान दें. उनके हर प्रश्‍न का सकारात्मक उत्तर दें. उसे माता-पिता दोनों का प्यार देने की कोशिश करें, ताकि उसे आपके पार्टनर की कमी ज़्यादा न खले. मगर बिना सोचे-समझे उनकी हर डिमांड पूरी करने की ग़लती न करें, वरना वो ज़िद्दी बन जाएंगे. यह ज़रूरी है कि आप बच्चे से दोस्ताना संबंध बनाएं और उसकी बातें ध्यान से सुनें. हो सके तो उसे अपनी समस्याएं भी बताएं, लेकिन ये सब करते हुए बच्चे को ये न जताएं कि आप हालात से बेहद निराश हो चुकी हैं. आपकी बातें हमेशा सकारात्मक होनी चाहिए. साथ ही बच्चे को ऐसे संस्कार दें कि वो रिश्तों की अहमियत समझ सके. इसके अलावा अगर बच्चे को स्वीमिंग, डांसिंग, सिंगिंग या खेलों में दिलचस्पी है, तो उसे इसके लिए प्रोत्साहित करें. पढ़ाई को लेकर हर समय उसके पीछे न पड़ी रहें, लेकिन ऐसा भी न हो कि आप इस मामले में कुछ बोले ही न. आप उसके स्कूली अनुभवों को एक दोस्त की तरह सुनें और सही-ग़लत का फ़र्क समझने में उसकी मदद करें, लेकिन ध्यान रखें कि बच्चे को ऐसा न लगे कि आप ख़ुद को उस पर थोप रही हैं.

16- 20 साल
ये उम्र बेहद महत्वपूर्ण है. इस उम्र में बच्चों की एक अलग दुनिया होती है, वो अपने आनेवाले कल को संवारने की कोशिशों में लगे रहते हैं. ऐसे में पैरेंट्स का अलगाव उनके लिए पैरों तले ज़मीन खिसकने जैसा है. भविष्य के सपने संजोते, करियर को लेकर गंभीर बच्चों को तो माता-पिता का तलाक़ दुनिया उजड़ने जैसा लगता है. कई तो इस सदमे से ज़िंदगी के प्रति बिल्कुल उदासीन हो जाते हैं. घर का निराशाजनक माहौल उन्हें भी मायूस और निराश कर देता है. इतना ही नहीं तलाक़ को लेकर दोस्तों के सवाल या मज़ाक भी उन्हें परेशान करते हैं. बच्चा माता-पिता दोनों से ही दूर हो जाता है. इस हालात के लिए वो माता-पिता दोनों या किसी एक को स्वार्थी समझने लगते हैं और उनके प्रति उसके मन में नफ़रत की भावना घर कर लेती है. यानी तलाक़ स़िर्फ कपल्स को ही एक-दूसरे से अलग नहीं करता, बल्कि बच्चे को भी पैरेंट्स से दूर कर देता है.

क्या करें पैरेंट्स?
इस उम्र के बच्चों पर बिना किसी तरह का दबाव डालें उन्हें परिस्थितियों को स्वीकार करने के लिए तैयार करें. उसे समझाएं कि हर हाल में आप उसके साथ रहेंगी और आप दोनों मिलकर परिस्थितियों को बेहतर बना लेंगे. हो सके तो उसे तलाक़ की असली वजह समझाने की कोशिश करें ताकि वो आपको स्वार्थी न समझें. चूंकि इस उम्र के बच्चे हर चीज़ अच्छी तरह समझ सकते हैं, इसलिए आप उनसे अपनी समस्याएं भी डिस्कस कर सकती हैं. इस उम्र में बच्चे पढ़ाई और करियर को लेकर बेहद गंभीर होते हैं. ऐसे में उन्हें सही रास्ता दिखाना आपकी ज़िम्मेदारी है. उनके बेहतर भविष्य के लिए उन्हें नकारात्मक और तनावपूर्ण माहौल से दूर रखने की कोशिश करें. पैरेंट्स के अलगाव से परेशान बच्चे कई बार ग़लत संगत व नशे के भी आदी हो जाते हैं. अतः इस मुश्किल हालात में बच्चे का ख़ास ख़्याल रखें. उससे इस तरह पेश आएं कि वो अपने दिल की हर बात आपसे शेयर कर सके.

 

अधिक पैरेंटिंग टिप्स के लिए यहां क्लिक करेंः Parenting Guide 

जानें कैसे पुरुषों पर भी असर डालता है तलाक़ (5 Reasons Why Divorce Is More Stressful On Men Than Women)

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आमतौर पर लोगों की यही सोच होती है कि तलाक़ का सबसे ज़्यादा असर महिलाओं पर होता है और इसका पुरुषों पर कोई असर नहीं होता, लेकिन ये सच नहीं है. तलाक़ पुरुषों को भी प्रभावित करता है (Divorce Is More Stressful On Men Than Women). पार्टनर से अलगाव उन्हें भी अकेला करता है, उन्हें भी तकलीफ़ देता है. तलाक़ का पुरुषों पर और क्या असर होता है, आइए जानते हैं.

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आमतौर पर तलाक़ के केस में सबकी सहानुभूति व तवज्जो पत्नी के साथ होती है. और माना जाता है कि किसी भी महिला के लिए तलाक़ की प्रक्रिया बेहद तकलीफ़देह होती है. लेकिन शायद ही किसी ने इस बात पर गौर किया हो कि तलाक़ पुरुषों के लिए भी उतना ही मुश्किलोंभरा व चुनौतीपूर्ण होता है. तलाक़ एक पुरुष को भी डिप्रेशन में डाल देता है. उसे अकेला बना देता है. साथ ही दोस्तों, परिवार, समाज की नज़रों में विलेन भी.
डॉ. प्रीति नंदा के अनुसार, यह एक मिथ है कि स़िर्फ महिलाएं ही अपने पति से बहुत प्यार करती हैं व उनसे दिल से जुड़ी रहती हैं. जबकि पुरुष भी अपनी पत्नी से भावनात्मक लगाव रखते हैं और डिवोर्स के बाद भी उस लगाव, संवेदनाओं व चाह को तोड़ नहीं पाते व बेचैन रहते हैं.
– तलाक़ पुरुषों को भावनात्मक रूप से अस्थिर कर देता है.
– कई बार मानसिक अवसाद इतना बढ़ जाता है कि उनमें आत्महत्या की प्रवृत्ति पनपनेे लगती है.
– मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, पुरुष एक स्त्री की तुलना में अपने दुख को 1% भी व्यक्त नहीं करते, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि उनका दुख-दर्द पत्नी की तुलना में कम है.
– तलाक़ के बाद पुरुष किस-किस तरह से प्रभावित होते हैं, आइए जानते हैं.

 

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मानसिक रूप से कमज़ोर होना

– पुरुष शारीरिक रूप से नारी की तुलना में भले ही बेहद ताक़तवर होते हैं, लेकिन मानसिक मज़बूती में वे स्त्री की तुलना में कहीं नहीं ठहरते.
– ये अलग बात है कि वे दुनिया के सामने कठोर बने रहते हैं.
– यहां तक कि तलाक़ जैसी त्रासदी को भी बिना शिकन के झेल लेते हैं, लेकिन यह महज़ दिखावा होता है.
– जीवनसाथी से अलगाव, आगे का जीवन तन्हा जीना, दोस्तों, रिश्तेदारों, महिला कलीग्स की चुभती निगाहें, ताने-उलाहने, तीखे कमेंट्स पुरुषों को अंदर से तोड़ देते हैं.
– उनका मन कमज़ोर और भावनाएं घायल होती जाती हैं.
– लेकिन हमेशा से जो सिखाया-बताया जाता है कि पुरुष बहादुर होता है, रोता नहीं है, उसे दर्द नहीं होता है… बस, यही बातें उन्हें कठोर बने रहने पर मजबूर कर देती हैं.

दर्द व्यक्त न कर पाना

– पुरुष अपने दुख-तकलीफ़ को उतनी सहजता से नहीं कह पाते, जितनी सरलता से महिलाएं कहती हैं. फिर चाहे बात छोटी-सी खरोंच लगने की हो या तलाक़ जैसी दुखद घटना.
– जहां स्त्री अपने-पराए हर किसी से अपने तलाक़ पर बात कर लेती है, पति के अत्याचार, व्यवहार के बारे में सब कुछ बता अपना मन हल्का कर लेती है, वहीं पुरुष ये सब नहीं कर पाते.
– पुरुष के लिए तो अपने बेस्ट फ्रेंड से भी अपनी पत्नी, तलाक़ और उससे जुड़े हालात, वजहों को डिसकस करना, अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करना टेढ़ी खीर साबित होता है.
– पुरुष अपने अंतर्मुखी स्वभाव के कारण अपने ग़म को अपने अंदर ही पालता रहता है.
– तलाक़ से उपजा अवसाद, सदमा और पत्नी का रिजेक्शन पुरुष को लंबे समय तक तोड़कर रख देता है.
– पुरुष का यही अंतर्मुखी स्वभाव आगे चलकर कई गंभीर मानसिक व शारीरिक हेल्थ प्रॉब्लम्स को जन्म देता है.

प्रभावित होती प्रोफेशनल लाइफ

– भारतीय पुरुष शादी होते ही अपनी हर तरह की ज़रूरतों के लिए पत्नी पर कुछ इस कदर निर्भर हो जाते हैं कि उनका डेली रूटीन बिना पत्नी की मदद के पूरा नहीं होता.
– तलाक होने पर अचानक जब यह सपोर्ट सिस्टम फेल हो जाता है, तो उनकीज़िंदगी अव्यवस्थित हो जाती है. इन सबका असर उनकी नौकरी यानी प्रोफेशनल लाइफ पर पड़ने लगता है.
– वे काम में पहले जैसे स्मार्ट और परफेक्ट नहीं रह जाते.
– देर रात तक की मीटिंग अटेंड नहीं कर पाते.
– वे लॉन्ग टूर पर नहीं जा पाते हैं, क्योंकि अब उन्हें घर मैनेज करने के साथ-साथ बच्चों के स्कूल (यदि बच्चे हैं), उनकी सुरक्षा की भी चिंता लगी रहती है.
– पहले की तरह स़िर्फ अपने करियर पर फोकस नहीं रख पाते, जिससे वे प्रोफेशनल फ्रंट पर पिछड़ने लगते हैं.
– सायकोलॉजिस्ट के अनुसार, घर-बाहर की ज़िम्मेदारी के साथ समाज व रिश्तेदारों के व्यवहार में उनके प्रति आया परिवर्तन, ठंडापन उन्हें मानसिक रूप से अस्थिर करता है.
– जीवनसाथी की कमी उनके मन में खालीपन का एहसास पैदा करने लगती है.
– वे ग़ुस्सैल, चिड़चिड़े व आक्रामक होते जाते हैं.
– कभी-कभी अल्कोहल, ड्रग्स, जुए आदि की लत उनके पतन का कारण बन जाती है.

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फाइनेंशियल प्रेशर

– पुरुषों के लिए डिवोर्स फाइनेंशियली भी बहुत भारी पड़ता है.
-तलाक़ के बाद भारी एलीमनी देनी पड़ती है.
– जॉइंट एसेट्स का लिक्विडेशन करना होता है.
– घर, चल-अचल संपत्ति में भी पत्नी व बच्चोें की हिस्सेदारी देना ज़रूरी होता है.
– इन सब को पूरा करते-करते पुरुष की ज़िंदगीभर की कमाई का एक बड़ा हिस्सा ख़र्च हो जाता है.
– फाइनेंशियल प्रेशर का असर उनके परफॉर्मेंस पर पड़ने लगता है, जिससे उनका कॉन्फिडेंस लेवल भी कम होता जाता है.
– तलाक़ पुरुष को मानसिक रूप से तो तोड़ता ही है, साथ ही कमोबेश पैसों की तंगी होेना उनके लिए दोहरी मार साबित होता है, जिसे झेल पाना पुरुषों के लिए कतई आसान नहीं होता.

इमोशनल अत्याचार

– डिवोर्स होने पर छोटे बच्चों की कस्टडी अक्सर मां को मिलती है. पिता के हिस्से में आती हैं कोर्ट के आदेशानुसार नियत समय पर चंद मुलाक़ातें.
– पुरुष अपनी पत्नी से अलग रह सकते हैं, लेकिन अपने बच्चों का दूर जाना उन्हें मानसिक रूप से तोड़ देता है.
– बच्चे के जन्म से लेेकर परवरिश से जुड़ी छोटी-छोटी बातें, यादें उन्हें ग़मगीन करती चली जाती हैं, यह औैर बात है कि वे अपना यह दर्द किसी से साझा नहीं करते.
– तलाक़ के बाद अपने बच्चे से पिता को दूर कर दिया जाना उनके लिए किसी इमोशनल अत्याचार से कम नहीं है.
तलाक़ का पुरुषों के मान-सम्मान और इमेज पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. लेकिन अफ़सोस यह कि जहां पत्नी को हर तरफ़ से सहयोग मिलता है, वहीं पति के पास एक कंधा भी नहीं होता, जिस पर सिर रखकर, वह अपना मन हल्का कर सके. इसलिए यह कह देना कि तलाक़ का असर पुरुषों पर नहीं होता न्यायसंगत नहीं है.

– निधि निगम