side effects

न जाने कितने ही पल यूं ही तारों को तकते-तकते साथ गुज़ारे थे हमने… न जाने कितनी ही शामें यूं ही बेफिज़ूल की बातें करते-करते बिताई थीं हमने… न जाने कितनी ऐसी सुबहें थीं, जो अलसाते हुए एक-दूजे की बांहों में संवारी थी हमने… पर अब न वो रातें हैं, न वो सुबह, न वो तारे हैं और न वो बातें… क्योंकि अब वो पहले सी फ़ुर्सत कहां, अब वो पहले-सी मुहब्बत कहां…!

disadvantages of internet

जी हां, हम सबका यही हाल है आजकल, न व़क्त है, न ही फ़ुर्सतक्योंकि ज़िंदगी ने जो रफ़्तार पकड़ ली है, उसे धीमा करना अब मुमकिन नहीं. इस रफ़्तार के बीच जो कभीकभार कुछ पल मिलते थे, वो भी छिन चुके हैं, क्योंकि हमारे हाथों में, हमारे कमरे में और हमारे खाने के टेबल पर भी एक चीज़ हमारे साथ रहती है हमेशा, जिसे इंटरनेट कहते हैं. ज़ाहिर है, इंटरनेट किसी वरदान से कम नहीं. आजकल तो हमारे सारे काम इसी के भरोसे चलते हैं, जहां यह रुका, वहां लगता है मानो सांसें ही रुक गईं. कभी ज़रूरी मेल भेजना होता है, तो कभी किसी सोशल साइट पर कोई स्टेटस या पिक्चर अपडेट करनी होती हैऐसे में इंटरनेट ही तो ज़रिया है, जो हमें मंज़िल तक पहुंचाता है. लेकिन आज यही इंटरनेट हमारे निजी पलों को हमसे छीन रहा है. हमारे फुर्सत के क्षणों को हमसे दूर कर रहा है. हमारे रिश्तों को प्रभावित कर रहा है. किस तरह छिन रहे हैं फ़ुर्सत के पल?

किस तरह छिन रहे हैं फ़ुर्सत के पल?

चाहे ऑफिस हो या स्कूलकॉलेज, पहले अपनी शिफ्ट ख़त्म होने के बाद का जो भी समय हुआ करता था, वो अपनों के बीच, अपनों के साथ बीतता था.

आज का दिन कैसा रहा, किसने क्या कहा, किससे क्या बहस हुईजैसी तमाम बातें हम घर पर शेयर करते थे, जिससे हमारा स्ट्रेस रिलीज़ हो जाता था.

 लेकिन अब समय मिलते ही अपनों से बात करना या उनके साथ समय बिताना भी हमें वेस्ट ऑफ टाइम लगता है. हम जल्द से जल्द अपना मोबाइल या लैपटॉप लपक लेते हैं कि देखें डिजिटल वर्ल्ड में क्या चल रहा है.

कहीं कोई हमसे ज़्यादा पॉप्युलर तो नहीं हो गया है, कहीं किसी की पिक्चर को हमारी पिक्चर से ज़्यादा कमेंट्स या लाइक्स तो नहीं मिल गए हैं…?

और अगर ऐसा हो जाता है, तो हम प्रतियोगिता पर उतर आते हैं. हम कोशिशों में जुट जाते हैं फिर कोई ऐसा धमाका करने की, जिससे हमें इस डिजिटल वर्ल्ड में लोग और फॉलो करें.

भले ही हमारे निजी रिश्ते कितने ही दूर क्यों न हो रहे हों, उन्हें ठीक करने पर उतना ध्यान नहीं देते हम, जितना डिजिटल वर्ल्ड के रिश्तों को संजोने पर देते हैं.

 

आउटडेटेड हो गया है ऑफलाइन मोड

आजकल हम ऑनलाइन मोड पर ही ज़्यादा जीते हैं, ऑफलाइन मोड जैसे आउटडेटेडसा हो गया है.

यह सही है कि इंटरनेट की बदौलत ही हम सोशल साइट्स से जुड़ पाए और उनके ज़रिए अपने वर्षों पुराने दोस्तों व रिश्तेदारों से फिर से कनेक्ट हो पाए, लेकिन कहीं न कहीं यह भी सच है कि इन सबके बीच हमारे निजी रिश्तों और फुर्सत के पलों ने सबका ख़ामियाज़ा भुगता है.

शायद ही आपको याद आता हो कि आख़िरी बार आपने अपनी मॉम के साथ बैठकर चाय पीते हुए स़िर्फ इधरउधर की बातें कब की थीं? या अपने छोटे भाईबहन के साथ यूं ही टहलते हुए मार्केट से सब्ज़ियां लाने आप कब गए होंगे?

बिना मोबाइल के आप अपने परिवार के सदस्यों के साथ कब डायनिंग टेबल पर बैठे थे?

अपनी पत्नी के साथ बेडरूम में बिना लैपटॉप के, बिना ईमेल चेक करते हुए कब यूं ही शरारतभरी बातें की थीं?

याद नहीं आ रहा नआएगा भी कैसे? ये तमाम ़फुर्सत के पल अब आपने सूकून से जीने जो छोड़ दिए हैं.

अपने बच्चे के लिए घोड़ा बनकर उसे हंसाने का जो मज़ा है, वो शायद अब एक जनरेशन पहले के पैरेंट्स ही जान पाएंगे, क्योंकि आजकल स़िर्फ पिता ही नहीं, मम्मी भी इंटरनेट के बोझ तले दबी हैं.

वर्किंग वुमन के लिए भी अपने घर पर टाइम देना और फुर्सत के साथ परिवार के साथ समय बिताना कम ही संभव हो गया है.

लेकिन फिर भी कहीं न कहीं वो मैनेज कर रही हैं, पर जहां तक पुरुषों की बात है, युवाओं का सवाल है, तो वो पूरी तरह इंटरनेट की गिरफ़्त में हैं और वहां से बाहर निकलना भी नहीं चाहते.

यही नहीं, आजकल जिन लोगों के पास इंटरनेट कनेक्शन नहीं होता या फिर जो लोग सोशल साइट्स पर नहीं होते, उन पर लोग हैरान होते हैं और हंसते हैं, क्योंकि उन्हें आउटडेटेड व बोरिंग समझा जाता है.

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स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है

रिसर्च बताते हैं कि सोशल साइट्स पर बहुत ज़्यादा समय बिताना एक तरह का एडिक्शन है. यह एडिक्शन ब्रेन के उस हिस्से को एक्टिवेट करता है, जो कोकीन जैसे नशीले पदार्थ के एडिक्शन पर होता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन की एक स्टडी के मुताबिक, जो लोग सोशल साइट्स पर अधिक समय बिताते हैं, वो अधिक अकेलापन और अवसाद महसूस करते हैं, क्योंकि जितना अधिक वो ऑनलाइन इंटरेक्शन करते हैं, उतना ही उनका फेस टु फेस संपर्क लोगों से कम होता जाता है.

यही वजह है कि इंटरनेट का अधिक इस्तेमाल करनेवालों में स्ट्रेस, निराशा, डिप्रेशन और चिड़चिड़ापन पनपने लगता है. उनकी नींद भी डिस्टर्ब रहती है. वो अधिक थकेथके रहते हैं. ऐसे में ज़िंदगी का सुकून कहीं खोसा जाता है.

इन सबके बीच आजकल सेल्फी भी एक क्रेज़ बन गया है, जिसके चलते सबसे ज़्यादा मौतें भारत में ही होने लगी हैं.

लोग यदि परिवार के साथ कहीं घूमने भी जाते हैं, तो उस जगह का मज़ा लेने की बजाय पिक्चर्स क्लिक करने के लिए बैकड्रॉप्स ढूंढ़ने में ज़्यादा समय बिताते हैं. एकदूसरे के साथ क्वालिटी टाइम गुज़ारने की जगह सेल्फी क्लिक करने पर ही सबका ध्यान रहता है, जिससे ये फुर्सत के पल भी यूं ही बोझिल होकर गुज़र जाते हैं और हमें लगता है कि इतने घूमने के बाद भी रिलैक्स्ड फील नहीं कर रहे.

मूवी देखने या डिनर पर जाते हैं, तो सोशल साइट्स के चेकइन्स पर ही ध्यान ज़्यादा रहता है. इसके चलते वो ज़िंदगी की ़फुर्सत से दूर होते जा रहे हैं.

सार्वजनिक जगहों पर भी लोग एकदूसरे को देखकर अब मुस्कुराते नहीं, क्योंकि सबकी नज़रें अपने मोबाइल फोन पर ही टिकी रहती हैं. रास्ते में चलते हुए या मॉल मेंजहां तक भी नज़र दौड़ाएंगे, लोगों की झुकी गर्दन ही पाएंगे. इसी के चलते कई एक्सीडेंट्स भी होते हैं.

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इंटरनेट की देन: पोर्न साइट्स भी पहुंच से दूर नहीं

 आजकल आसानी से पोर्न वीडियोज़ देखे जा सकते हैं. चाहे आप किसी भी उम्र के हों. इंटरनेट के घटते रेट्स ने इन साइट्स की डिमांड और बढ़ा दी है. बच्चों पर जहां इस तरह की साइट्स बुरा असर डालती हैं, वहीं बड़े भी इसकी गिरफ़्त में आते ही अपनी सेक्स व पर्सनल लाइफ को रिस्क पर ला देते हैं. इसकी लत ऐसी लगती है कि वो रियल लाइफ में भी अपने पार्टनर से यही सब उम्मीद करने लगते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि इन वीडियोज़ को किस तरह से बनाया जाता है. इनमें ग़लत जानकारियां दी जाती हैं, जिनका उपयोग निजी जीवन में संभव नहीं.

– यही नहीं, अक्सर एक्स्ट्रामैरिटल अफेयर्स भी आजकल ऑनलाइन ही होने लगे हैं. चैटिंग कल्चर लोगों को इतना भा रहा है कि अपने पार्टनर को चीट करने से भी वो हिचकिचाते नहीं. इससे रिश्ते टूट रहे हैं, दूरियां बढ़ रही हैं.

कुछ युवतियां अधिक पैसा कमाने के चक्कर में इन साइट्स के मायाजाल में फंस जाती हैं. बाद में उन्हें ब्लैकमेल करके ऐसे काम करवाए जाते हैं, जिससे बाहर निकलना उनके लिए संभव नहीं होता.

इंटरनेट फ्रॉड के भी कई केसेस अब आम हो गए हैं, ये तमाम बातें साफ़तौर पर यही ज़ाहिर करती हैं कि इंटरनेट ने वाक़ई ज़िंदगी की फुर्सत छीन ली है…!

योगिनी भारद्वाज

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एेसी कई दवाइयां हैं जिनका सेवन हम अक्सर करते हैं, लेकिन उनके बारे में हमें ज़्यादा जानकारी नहीं होती. जानकारी के अभाव में हम ग़लत तरी़के से दवा का सेवन कर लेते हैं, जिनके साइड इफेक्ट्स स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं. ख़ास इसी बात को ध्यान में रखते हुए आइब्रूफेन (Ibuprofen) से संबंधित जानकारी के लिए हमने बात की ज्यूपिटर हॉस्पिटल, मुंबई के कंसल्टेंट फिजिशियन डॉ. अमित श्रॉफ से.

 Ibuprofen Oral , Uses, Side Effects, Interactions

क्या है आइब्रूफेन?

आइब्रूफेन(Ibuprofen) एक नॉनस्टेरॉइडियल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग (एमएसएआईडी) है. बुखार, पीठदर्द, सिरदर्द, दांत में दर्द, आर्थराइटिस, मासिक धर्म के दौरान दर्द इत्यादि होने पर यह दवा दी जाती है. यह दवा शरीर में दर्द और सूजन देनेवाले हार्मोन्स का स्राव कम कर देती है, जिससे दर्द महसूस नहीं होता. छह महीने से ज़्यादा उम्र के बच्चों से लेकर वयस्क इस दवा का सेवन करते हैं.

आवश्यक जानकारी
दिल संबंधी बीमारियां होने या लगातार बहुत दिनों तक इस दवा का सेवन करने से हार्ट अटैक व स्ट्रोक का ख़तरा बढ़ जाता है. बायपास सर्जरी के तुरंत बाद इस दवा का सेवन नहीं करना चाहिए. अगर आपको आइब्रूफेन से एलर्जी है या पहले कभी नॉनस्टेरॉइडियल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग या एस्प्रिन लेने पर आपको कभी अस्थमा अटैक या एलर्जिक रिएक्शन हुआ हो तो इस दवा का सेवन करने से बचें. आइब्रूफेन के कारण पेट व आंतों में ब्लीडिंग हो सकती है, जो जानलेवा होता है. इसका ख़तरा अधिक उम्र के लोगों को ज़्यादा होता है. डॉक्टर द्वारा बताए गए डोज़ से ज़्यादा आइब्रूफेन का सेवन न करें, क्योंकि इससे आपके पेट या आंतों के क्षतिग्रस्त होने का ख़तरा रहता है. इसके अलावा अगर आपको निम्न समस्याएं हैं तो आइब्रूफेन(Ibuprofen) लेने से पहले डॉक्टर से अवश्य पूछें.
1- हार्ट डिज़ीज़, हाई ब्लडप्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल     या डायबिटीज़
2- अगर आप स्मोकिंग करते हैं8 यदि हार्ट अटैक, स्ट्रोक या ब्लड क्लॉट की हिस्ट्री
3- स्टमक अल्सर या ब्लीडिंग की हिस्ट्री 8 अस्थमा8 लिवर या किडनी डिज़ीज़
4- प्रेग्नेंसी के अंतिम तीन महीनों के दौरान आइब्रूफेन का सेवन करने से बच्चे की सेहत पर बुरा असर पड़ने का ख़तरा रहता है.

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आइब्रूफेन (Ibuprofen) किस तरह लें?
आइब्रूफेन उतनी ही मात्रा में लें, जितनी मात्रा में डॉक्टर ने लेने की सलाह दी है. बताए हुए डोज़ से ज़्यादा लेने की ग़लती बिल्कुल न करें. आइब्रूफेन का ओवरडोज़ आपके स्टमक या इंटेस्टाइन को क्षतिग्रस्त कर सकता है. एक वयस्क व्यक्ति के लिए आइब्रूफेन का अधिकतम  डोज़ 320 एमजी प्रतिदिन (ज़्यादा से ज़्यादा 4 डोज़) होता है. अगर दर्द, फीवर या स्वेलिंग से आराम मिल जाए तो आप डोज़ घटा भी सकते हैं. बच्चों के लिए आइब्रूफेन का डोज़ उनकी उम्र और वज़न पर निर्भर करता है. अतः डॉक्टर द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन ध्यानपूर्वक करें. अगर आपके मन में कोई शंका हो तो डॉक्टर से अवश्य पूछ लें. बच्चे को लिक्विड आइब्रूफेन देने से पहले बॉटल को अच्छी तरह हिला लें और दवा को नाप कर ही दें. इसे कमरे के तापमान पर गर्मी व नमी से दूर स्टोर करें.

डोज़ मिस करने पर
डोज़ को समय पर लेने की कोशिश करें. यदि डोज़ मिस करने के बहुत देर बाद याद आए और दूसरा डोज़ लेने का समय क़रीब आ गया हो तो वो डोज़ स्किप कर दें. एक साथ दो डोज़ लेने की ग़लती न करें.

ओवरडोज़ होने पर
आइब्रूफेन का ओवरडोज़ होने पर नॉज़िया, उल्टी, मल में रक्त, काला मल, कफ के साथ ख़ून, बेहोशी इत्यादि समस्याएं हो सकती हैं.
आइब्रूफेन कोर्स के दौरान किन चीज़ों से परहेज़ करें?
अगर आप आइब्रूफेन का सेवन कर रहे हैं तो अल्कोहल लेने से बचें. इसके अलावा यदि आप स्ट्रोक या हार्ट अटैक से बचने के लिए एस्प्रिन का सेवन कर रहे हैं तो आइब्रूफेन न लें. आइब्रूफेन एस्प्रिन के असर को कम कर देती है. अगर आपको दोनों दवाइयां लेनी पड़ें तो एस्प्रिन लेने से आठ घंटे पहले आइब्रूफेन(Ibuprofen) लें. सर्दी, एलर्जी या दर्द की कोई भी दवा लेने से पहले डॉक्टर से अवश्य पूछें, क्योंकि बहुत-सी दवाएं आइब्रूफेन के जैसी होती हैं. ऐसे में दोनों दवाएं साथ लेने पर नुक़सान पहुंच सकता है. दवा का लेबल चेक करके देख लें, कि कहीं उसमें एस्प्रिन, आइब्रूफेन, केटोफ्रेन या नैप्रोज़ेन तो नहीं है.

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 आइब्रूफेन (Ibuprofen) के साइड इफेक्ट्स
अगर आपको आइब्रूफेन का सेवन करने पर चेहरे, होंठ, जीभ पर सूजन, छींक व सांस लेने में तकलीफ़ हो तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें. इसके अलावा निम्न परेशानियां होने पर आइब्रूफेन खाना तुरंत रोक दें.
सांस फूलना
शरीर में सूजन या वज़न बढ़ना
स्किन रैश
लिवर संबंधी समस्या- नॉज़िया, पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द, खांसी के साथ ख़ून आना इत्यादि.
एनीमिया, स्किन का पीला पड़ा जाना
स्किन रिएक्शन

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एक समय था जब ट्यूशन पढ़ने की ज़रूरत स़िर्फ उन बच्चों को पड़ती थी, जो स्कूल की पढ़ाई के साथ कोपअप नहीं कर पाते थे, लेकिन आज पैरेंट्स अपने मंथली बजट में बच्चों की स्कूल फ़ीस के साथ-साथ ट्यूशन फ़ीस भी शामिल करना नहीं भूलते. बच्चों के लिए भी ट्यूशन जाना अब उनकी एज्युकेशन का अहम् हिस्सा बन चुका है. पैरेंट्स और स्टूडेंट्स के बीच ट्यूशन के इस ट्रेंड की ज़रूरत और इससे जुड़े तमाम पहलुओं के बारे में बता रही हैं सरिता यादव.

 

इस बार अच्छे मार्क्स नहीं लाओगे तो अगले सेशन से ट्यूशन जाना होगा… लेकिन मुझे वहीं ट्यूशन जाना है, जहां मेरा बेस्ट फ्रेंड नैतिक जाता है… नहीं, तुम वहीं ट्यूशन जाओगे जहां दीदी जाती है… पढ़ाई के दौरान पैरेंट्स और बच्चों के बीच इस तरह के संवाद होना आम बात है. मुद्दा होता है स़िर्फ और स़िर्फ परफ़ॉर्मेंस का, जिसके लिए ट्यूशन जाना ज़रूरी समझा जाता है. हमारी यही सोच ट्यूशन फ़ीवर को बढ़ावा दे रही है, जिसके चलते ट्यूशन्स की मांग तेज़ी से बढ़ती जा रही है.

ट्यूशन्स ऑन डिमांड

अनऑफ़िशियल इंडस्ट्री के तौर पर दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही ट्यूशन इंडस्ट्री आज स्टूडेंट्स और पैरेंट्स दोनों के बीच ऑन डिमांड है. पिछले 5 सालों में ट्यूशन्स की मांग 40 से 45% बढ़ गई है. 70% स्टूडेंट्स मैथ्स, केमिस्ट्री, फ़िज़िक्स जैसे सब्जेक्ट्स के लिए ट्यूशन्स पर ही आश्रित होते हैं.

क्या हैं वजहें?

मुंबई स्थित एक मशहूर कोचिंग क्लासेस के एकॅडेमिक मैनेजर सतीश ऑडोबा बताते हैं, “हमने देखा है कि 85 % स्टूडेंट्स स्कूल एज्युकेशन से ख़ुश नहीं होते. हमारे पास अधिकतर ऐसे पैरेंट्स आते हैं, जो बच्चों को उन सब्जेक्ट्स में स्ट्रॉन्ग बनाना चाहते हैं, जिनमें वे पहले से कमज़ोर हैं.” ट्यूशन्स पर निर्भरता का आलम ये है कि 5वीं कक्षा तक पढ़ रहे बच्चों को पैरेंट्स एज्युकेशन बेस मज़बूत करने के लिए ट्यूशन भेजते हैं और इसके बाद क्लास में अच्छे मार्क्स और बेहतर करियर के लिए एक्स्ट्रा क्लासेस के रूप में भी यह सिलसिला चलता ही रहता है.

ट्यूशन्स की बढ़ती मांग के पीछे अच्छे परफ़ॉर्मेंस के अलावा और भी कई कारण हैं, जैसे-
* 65% पैरेंट्स वर्किंग होने के नाते बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाते इसलिए वे अपने बच्चों को ट्यूशन भेजते हैं.
* ओवर ऐम्बिशियस पैरेंट्स अपने एवरेज बच्चों को रैंकिंग लिस्ट में सबसे ऊपर देखने की उम्मीद में बच्चे केलिए ट्यूशन का सहारा लेते हैं.
* कई पैरेंट्स का मानना है कि ट्यूशन उनके बच्चे को बिज़ी रखता है और पढ़ाई के लिए उन्हें रेग्युलर और पंचुअल बनाता है.
* कई पैरेंट्स तो स़िर्फ दूसरे बच्चों के पैरेंट्स से कॉम्पिटीशन के चलते अपने बच्चों को ट्यूशन भेजते हैं.
* ऐसे पैरेंट्स भी हैं, जो अपने चंचल बच्चों को हैंडल नहीं कर पाते, इसलिए उन्हें ट्यूशन भेज देते हैं.
* मार्केट में इंग्लिश की बढ़ती डिमांड भी बच्चों को ट्यूशन जाने के लिए मजबूर कर रही है, क्योंकि जो पैरेंट्स इंग्लिश नहीं जानते, उन्हें इंग्लिश मीडियम से पढ़ रहे बच्चों को पढ़ाने में द़िक़्क़त होती है और ट्यूशन का सहारा लेना ही पड़ता है.

स्टूडेंट्स की नज़र में कितना ज़रूरी है ट्यूशन?

* ऐसा नहीं है कि स़िर्फ पैरेंट्स ही बच्चों को ट्यूशन भेजने के लिए परेशान रहते हैं, कई बार स्टूडेंट्स ख़ुद भी ट्यूशन जाने का निर्णय लेते हैं.
* अच्छे परफ़ॉर्मेंस के लिए कई स्टूडेंट्स ट्यूशन के नोट्स और ट्यूटर के साथ अपनी अंडरस्टैंडिंग को अहम् मानते हैं.
* 71% स्टूडेंट्स मानते हैं कि ट्यूशन्स से पढ़ाई में एक्स्ट्रा हेल्प मिलती है जो अच्छे मार्क्स पाने के लिए ज़रूरी है.
* वहीं 85% स्टूडेंट्स ये मानते हैं कि ट्यूशन्स में पढ़ाई फास्ट होती है. ट्यूशन में स्कूल से पहले पढ़ाया गया टॉपिक जब स्कूल में पढ़ाया जाता है तो ख़ुद-ब-ख़ुद माइंड में उसका रिविज़न हो जाता है.
* ज़्यादातर स्टूडेंट्स स्कूल टीचर से ज़्यादा ट्यूशन टीचर के साथ कंफ़र्टेबल महसूस करते हैं.
* चौंकानेवाली बात ये है कि एक तरफ़ जहां पैरेंट्स बच्चों के अच्छे परफ़ॉर्मेंस के लिए पैसे ख़र्च करने में पीछे नहीं हटते, वहीं 65% स्टूडेंट्स स़िर्फ, इसलिए ट्यूशन ज्वाइन करते हैं, क्योंकि उनके फ्रेंड्स भी ट्यूशन जाते हैं और इस मामले में वे ख़ुद को पीछे नहीं देखना चाहते.
* मात्र 22% स्टूडेंट्स ही ऐसे हैं जो ट्यूशन में लगने वाली फ़ीस को वेस्टेज ऑफ़ मनी मानते हैं.

कैसे करें ट्यूशन सलेक्शन?

* आप जो भी ट्यूशन सलेक्ट कर रहे हैं पहले उस टीचर के नोट्स की अन्य ट्यूशन टीचर के नोट्स से तुलना कर लें और जो बेहतर लगे उसे चुनें.
* ट्यूशन टीचर एक्सपीरियंस्ड, क्वालिफ़ाइड और अपने काम के प्रति ईमानदार हो, ये पहले जान लें.

* आपका बच्चा जिस सब्जेक्ट के लिए ट्यूशन जा रहा है उस सब्जेक्ट की टीचर को सही नॉलेज है या नहीं, यह भी ज़रूर पता करें.
* स्कूल टीचर को ही ट्यूशन टीचर बनाने से बचें, क्योंकि वो आपके बच्चे के लिए अगर सही टीचर होते तो आपके बच्चे को ट्यूशन की ज़रूरत ही नहीं पड़ती.

ट्यूशन के साइड इ़फेक्ट्स

वुमन एंड चाइल्ड साइकियाट्रिस्ट शरीता शाह बताती हैं, “हाल में ही मेरे पास एक ऐसी पेशेंट आई थी, जो 10वीं कक्षा में पढ़ रहे अपने बच्चे की ट्यूशन फ़ीस न भर पाने की वजह से इतनी चिंतित थी कि उसके कारण वह डिप्रेशन में आ गई और हो भी क्यों न, उसके बच्चे की ट्यूशन फ़ीस 1,90,000 रुपये जो थी.” शरीता कहती हैं,“ पहले पैरेंट्स स्कूल की पढ़ाई को प्राथमिकता देते थे और बच्चे को ट्यूशन तभी भेजते थे, जब उसे एक्स्ट्रा हेल्प की ज़रूरत होती थी, लेकिन आजकल स्कूल जाने से पहले ही बच्चे ट्यूशन जाना शुरू कर देते हैं और स्कूल की पढ़ाई को एक्स्ट्रा एज्युकेशन समझने लगते हैं. इस सोच के विकसित होते ही उनके एकेडेमिक करियर में ट्यूशन अपनी ख़ास जगह बना लेता है.”

हेल्दी नहीं है पढ़ाई का प्रेशर

मुंबई के एक म्युनिसिपल स्कूल में बतौर टीचर काम कर रही मयूरी चंद्रा दूसरे पैरेंट्स की तरह ही अपने बच्चे के कम मार्क्स से परेशान थीं. उन्होंने एक अच्छे ट्यूटर की तलाश की, लेकिन 6 महीने ट्यूशन पढ़ने के बावजूद उनके बेटे के मार्क्स काफ़ी कम आए. मयूरी तुरंत समझ गईं कि बेटे का समय ट्यूशन में बर्बाद करने से कोई फ़ायदा नहीं होगा. उनके बेटे को अपना समय अपनी दूसरी प्रतिभाओं को निखारने में लगाना चाहिए. उनका बेटा मोनो एक्टिंग में माहिर है और अब मराठी नाटकों में काम करके वाहवाही बटोर रहा है. बेटे की एक्टिंग से मिलनेवाली तारीफ़ों में मयूरी यह भूल गई हैं कि उनका बच्चा स्कूल के क्लास रूम में एक एवरेज स्टूडेंट है. मयूरी कहती हैं,“ मैंने अपने बेटे को वैसे ही स्वीकार कर लिया है जैसा वो है, इसलिए मैं पढ़ाई के लिए उस पर ज़्यादा दबाव नहीं देती. हां, समय-समय पर उसे एज्युकेशन के महत्व और ज़रूरत के बारे में ज़रूर बताती रहती हूं.”
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि हर बच्चा क्लास का टॉपर हो यह ज़रूरी नहीं, लेकिन हर बच्चे में कुछ ख़ासियत ज़रूर होती है. क्लासरूम का एक एवरेज स्टूडेंट अन्य ऐक्टिविटीज़ में अपने क्लासमेट से बहुत आगे हो सकता है. पैरेंट्स इस बात का ध्यान रखें कि आज स़िर्फ एज्युकेशन में ही नहीं, अन्य एक्टीविटीज़ में भी बहुत प्रतियोगिता है. अत: अपने बच्चों को सही तरह से समझ कर ही उन पर एज्युकेशन संबंधी प्रेशर बनाएं, वरना स़िर्फ पढ़ाई के प्रेशर में बच्चों की क्रिएटिविटी नष्ट हो सकती है.

स़िर्फ ट्यूशन ही नहीं है विकल्प

* पैरेंट्स की व्यस्तता और स्कूल में बच्चे पर अच्छे परफ़ॉर्मेंस के प्रेशर ने पैरेंट्स के पास ट्यूशन के अलावा दूसरा कोई विकल्प छोड़ा भी नहीं है, लेकिन जो पैरेंट्स बच्चों की ट्यूशन फ़ीस पर बड़ी रकम नहीं ख़र्च कर सकते, उनके लिए ये ऑप्शन बेहतर साबित हो सकते हैं.
यदि दोनों पैरेंट्स वर्किंग हैं, तो आपस में तय करके कोई भी एक पार्टनर प्रतिदिन दो घंटे बच्चे को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी ले.
* अगर आप बच्चे को ट्यूशन नहीं भेज सकते, तो घर के किसी भी शिक्षित और सक्षम व्यक्ति को बच्चे की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी सौंप सकते हैं.
* अपने बच्चों को उनके स्कॉलर फ्रेंड्स के साथ ग्रुप में पढ़ाई करने की सलाह दें.
* ज़्यादा फ़ीस से बचने के लिए प्राइवेट ट्यूशन के बजाय अपनी कॉलोनी या सोसायटी के बच्चों के साथ ग्रुप ट्यूशन रखें.

ट्यूशन्स की हक़ीक़त बयां करते आंकड़े

* एसोचेम के सोशल डेवलपमेंट फ़ाउंडेशन के रिसर्च बताते हैं कि 38% पैरेंट्स हर महीने प्राइमरी लेवल के ट्यूशन पर 1000 रुपये और सेकेंडरी लेवल के ट्यूशन पर 3500 रुपये एक बच्चे पर ख़र्च करते हैं.
* मिडल क्लास फैमिली के पैरेंट्स अपने हर महीने की इन्कम का 1/3 हिस्सा बच्चों के प्राइवेट ट्यूशन्स पर ख़र्च करते हैं.
* सामान्यत: प्रतिमाह 25000 रुपए तक सैलरी पाने वाले 60% पैरेंट्स अपने 2 बच्चों के प्राइवेट ट्यूशन पर 8000 रुपये प्रति महीने ख़र्च करते हैं.

शरीता शाह के अनुसार, इन बातों पर ग़ौर करके आप ये समझ सकते हैं कि आपके बच्चे को ट्यूशन की ज़रूरत है या नहीं.
* जानने की कोशिश करें कि आपका बच्चा क्लास में टॉप रैंकर्स की लिस्ट में आता है या उसका परफ़ॉर्मेंस ऐवरेज है. इसके आधार पर तय करें कि उसे ट्यूशन की ज़रूरत है या नहीं.
* बच्चे से पूछें कि उसे किस सब्जेक्ट में एक्स्ट्रा हेल्प की ज़रूरत है. उसकी ज़रूरत के हिसाब से ही ट्यूशन सलेक्ट करें.
* आपका बच्चा अगर पढ़ाई में कमज़ोर है और कड़ी मेहनत के बाद भी अच्छे मार्क्स नहीं ला पा रहा, तो उसे सच में गाइडेंस की ज़रूरत है. अत: उसे ट्यूशन ज़रूर भेजें.
* पढ़ाई के मामले में अगर बच्चा आपकी बात नहीं सुनता, तो एक सही ट्यूटर आपकी मदद कर सकता है.
* कुछ पैरेंट्स अपने बच्चे के लिए एक्सपीरियंस टीचर के बजाय सीनियर स्टूडेंट्स को प्रीफ़र करते हैं. यह निर्णय बच्चे की क्षमता के आधार पर ही लें.
* कुछ टयूशन सेंटर्स में बच्चों पर ज़रूरत से ज़्यादा होमवर्क और प्रोजेक्ट्स का प्रेशर डाल दिया जाता है. ऐसे में बच्चे पढ़ाई से भागने लगते हैं. अतः ट्यूटर की बिहेवियरल जानकारी ज़रूर रखें.

प्रायः देखा गया है कि छोटी-छोटी तकलीफ़ों में तुरंत आराम के लिए हम स्वयं ही कोई भी दवा या पेनकिलर्स ले लेते हैं. कई बार काफ़ी समय तक इन दवाइयों को हम लेतेे रहते हैं और बिना इनके साइड इफेक्ट्स (Side Effects of Self Medication) जाने दूसरों को भी लेने की सलाह देते रहते हैं. यदि आप भी ऐसा करते हैं, तो अलर्ट हो जाएं.

Side Effects of Self Medication
अक्सर हम बिना डॉक्टर की सलाह के सिरदर्द, बुख़ार, सर्दी-ज़ुकाम, पेटदर्द, नींद आदि के लिए ख़ुद से ही दवाइयां ले लेते हैं. इसके अलावा शुगर फ्री टैबलेट्स, ताक़त की गोलियां और बदनदर्द के लिए भी अक्सर पेनकिलर्स लेते रहते हैं. इन सबसे भविष्य में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है.

ख़ुद दवाइयां लेने के कारण

– समय की कमी.

– केमिस्ट की सलाह को सही समझना.

– डॉक्टर से अपॉइंटमेंट लेने की औपचारिकता से बचना या डॉक्टर का घर बहुत दूर होना.

– डॉक्टर की फीस अधिक होना.

– शुभचिंतकों, पड़ोसी या मित्रों की सलाह को सही मानना.

– घर में पड़ी दवाइयों को ही उपयोग में ले आने की प्रवृत्ति.

डॉक्टर की सलाह-मशवरा के बिना दवाइयां लेने से क्या हो सकता है?

– बुख़ार की गोलियां अनावश्यक रूप से लेने पर लिवर पर बुरा असर पड़ता है और वो कमज़ोर होने लगता है.

– दर्दनिवारक गोलियां शरीर का संतुलन बिगाड़ देती हैं, जिससे कब्ज़, बदहज़मी की समस्या पैदा हो जाती है.

– शुगर फ्री गोलियां अक्सर हार्मोंस को उत्तेजित करती हैं. इन्हें अधिक या कम लेने से हार्मोनल इम्बैलेंस की संभावना होती है.

– एंटीबायोटिक्स दवाइयां लेने से शरीर में इनके प्रति, प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है, जिसके कारण हर बार हायर डोज़ खानी पड़ती है.

– एंटीट्यूबरोक्लोसिस (टीबी) दवाइयां असर करना बंद कर देती हैं.

– गर्भपात की दवाइयां लेने से गर्भपात अधूरा रह सकता है. यह जानलेवा भी हो सकता है.

– ताक़त की दवाइयों से शरीर बिगड़ने या हार्मोनल गड़बड़ी होने की संभावना रहती है.

– हाई डोज़ दवाइयां लंबे समय तक लेने से किडनी फेल हो जाने का ख़तरा रहता है.

– प्रेग्नेंसी व लैक्टेशन के दौरान बिना जांचे-परखे दवाइयां लेने से शिशु की सेहत प्रभावित हो सकती है और यह ख़तरनाक भी हो
सकता है.

– व्यक्ति विशेष में किसी बीमारी या कमी होने के कारण कई दवाइयां प्रतिबंधित होती हैं. इन दवाइयों के सेवन से ख़ून में से रक्त कोशिकाएं टूटने लगती हैं यानी ख़ून पानी बन जाता है.

– नींद की दवाइयों के अक्सर हम आदी हो जाते हैं. उनकी फिर हाई डोज़ ही हमें लेनी पड़ती है.

– दो विपरीत साल्टवाली दवाइयां ले लेने से घातक परिणाम हो सकते हैं.

दवाइयां लेने के तरी़के

– कई दवाइयां खाली पेट ली जानेवाली होती हैं, तो कुछ दूध के साथ.

– रिपीट होनेवाली दवाइयों के बीच का अंतराल महत्वपूर्ण होता है.

– एंटीसेप्टिक व एंटीबायोटिक्स दवाइयों को एक नियमित तरी़के से लेना होना बेहद आवश्यक है.

– कई दवाइयों के साथ ख़ास तरह का भोजन वर्जित होता है.

स्वयं दवाई लेते समय संभवतः आप इन बातों का ध्यान न रख पाएं. डॉक्टरी सलाह लेने पर डॉक्टर आपकी उम्र, वज़न और मर्ज़ देखकर दवा देते हैं. इसके अलावा ज़रूरत होने पर ब्लड, यूरिन, स्टूल और अन्य जांच की सलाह भी देते हैं.

दवाइयों पर साइड इफेक्ट्स लिखे होते हैं

– कुछ दवाइयों से आपको नींद आती है.

– कुछेक दवाइयां आपकी सेक्स ड्राइव कम कर देती हैं.

– कुछ दवाइयां आपकी आंखों की रोशनी क्षीण कर देती हैं.

– कुछ दवाइयां एकदम से असर करती हैं और कुछ धीरे-धीरे.

यदि आप इधर-उधर से या केमिस्ट से पूछकर दवाइयां लेते हैं

– असली मर्ज़ का पता ही नहीं चलेगा, क्योंकि बीमारी के लक्षण सप्रेस हो जाएंगे.
– लंबे समय तक ग़लत दवाई लेते रहने से गुर्दे ख़राब हो जाने का ख़तरा होता है.
– कई बार बीमारी का कारण कुछ और हो सकता है, जैसे- सिरदर्द- दिमाग़ की नस फटने से या पेटदर्द- अपेन्डिक्स फटने से. इन परिस्थितियों में हमने ख़ुद इलाज करने की कोशिश की, तो जान बचाना मुश्किल हो जाएगा और डॉक्टर भी मदद नहीं कर पाएगा.
– कुछ देर के लिए तुरंत आराम तो मिल जाएगा, पर शरीर में जटिलताएं बढ़ जाएंगी.

दवाइयों के स्टोरेज के तरी़के भी अलग-अलग होते हैं और उन्हें उसी रूप में रखकर उनका सेवन करना अपेक्षित परिणामों के लिए
आवश्यक है.

– सभी केमिस्ट फार्मसिस्ट नहीं होते, अतः उनका ज्ञान अधूरा रहता है.

– यदि कभी डॉक्टर से पूछे बिना दवा खाने की मजबूरी हो, तब परिस्थिति अनुकूल होते ही डॉक्टर को तुरंत दिखाएं. डॉक्टर को बता दें कि आपने किस दवा का सेवन किया है. बीमारी की पूरी हिस्ट्री, एक्स रे व अन्य रिपोर्ट डॉक्टर को दिखाएं.

– यदि हम लंबे समय तक होमियोपैथी व आयुर्वेदिक दवाइयां लेते रहते हैं, तो ये भी ख़तरनाक हो सकती हैं. होमियोपैथी व
आयुर्वेदिक दवाइयों में भी धातुएं होती हैं. सामान्य अवधारणा से विपरीत इन्हें ख़ुद से नहीं लेना चाहिए, क्योंकि नुक़सान किसी से भी हो सकता है.
भारत में तक़रीबन सभी जगहों पर डॉक्टरी सुविधाएं उपलब्ध हैं. साथ ही सरकारी-ग़ैरसरकारी सभी तरह के हॉस्पिटल व डॉक्टर हैं. अब तो कई राज्यों में मध्यम वर्ग व निम्न वर्ग के लिए मुफ़्त डॉक्टरी सुविधा, सलाह-परामर्श व दवाइयां भी मिलने लगी हैं.
यहां हम यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि हमें स़िर्फ स्वयं दवाई खा लेने की आदत पर नियंत्रण रखना है. घर में दवाइयों की इमर्जेंसी किट अवश्य रखें, पर सभी दवाइयों की एक्सपायरी डेट जांच-परखकर यथासंभव डॉक्टर को दिखाकर या पूछकर ही दवाइयां लें. आख़िर एक तंदुरुस्ती हज़ार नियामत है.

– पूनम मेहता

महीनेभर पहले दिखने लगते हैं हार्ट अटैक के ये लक्षण ( Heart Attack Early Signs and Symptoms in Women & Men)

ज़्यादातर लोग लो ब्लड प्रेशर को उतनी गंभीरता से नहीं लेते, जितना हाई ब्लड प्रेशर को. उन्हें अंदाज़ा ही नहीं कि लो बीपी भी ख़तरनाक हो सकता है. इसलिए ज़रूरी है कि समय रहते इसका सही ट्रीटमेंट करवाया जाए.

Risk factors of Low Blood Pressure
क्या है लो ब्लड प्रेशर?

लो ब्लड प्रेशर को हाइपोटेंशन भी कहा जाता है. सामान्य तौर पर किसी भी व्यक्ति का नॉर्मल ब्लड प्रेशर 120/80 होता है. इससे थोड़ा-बहुत ऊपर-नीचे चलता है, पर अगर आपका बीपी 90/60 या उससे भी कम है, तो आपको लो ब्लड प्रेशर की समस्या है. इससे संबंधित अधिक जानकारी के लिए हमने बात की डॉ. जगदीश केनी से.

कारण

प्रेग्नेंसी: प्रेग्नेंसी के दौरान किसी भी महिला का सर्कुलेटरी सिस्टम बहुत तेज़ी से बढ़ जाता है, जिसके कारण ब्लड प्रेशर लो हो जाता है. पर प्रेग्नेंसी के दौरान यह नॉर्मल होता है. बच्चे के जन्म के साथ ही बीपी सामान्य लेवल पर आ जाता है. अगर किसी महिला का बीपी बहुत ज़्यादा लो है, तो उसे रेग्युलर चेकअप की ज़रूरत पड़ती है.
हार्ट प्रॉब्लम्स: हार्ट वाल्व प्रॉब्लम्स, हार्ट अटैक व हार्ट फेलियर के कारण भी बीपी लो हो जाता है.
इंडोक्राइन प्रॉब्लम्स: थायरॉइड, एडिसन्स डिसीज़, लो ब्लड शुगर और कभी-कभी डायबिटीज़ के कुछ मामलों में भी बीपी लो हो जाता है.
डीहाइड्रेशन: शरीर में पानी की कमी के कारण बीपी लो हो जाता है. बुख़ार, उल्टी, डायरिया आदि के कारण डीहाइड्रेशन होता है. ऐसे में लिक्विड डायट पर ख़ास ध्यान दें.
ब्लड लॉस: किसी बड़ी इंजरी या अंदरूनी रक्तस्राव के कारण शरीर में अचानक ख़ून की कमी हो जाती है, जिससे रक्तचाप निम्न हो जाता है.
पोषण की कमी: शरीर में विटामिन बी12 और आयरन की कमी के कारण एनीमिया हो जाता है, जिससे आपका शरीर पर्याप्त मात्रा में रेड ब्लड सेल्स नहीं बना पाता और ब्लड प्रेशर लो हो जाता है.
दवाइयां: हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट प्रॉब्लम्स, पार्किंसन्स डिसीज़, डिप्रेशन की गोलियां या पेनकिलर दवाइयां ज़्यादा लेने से बीपी लो हो सकता है. यौन शक्ति बढ़ानेवाली दवाइयां, जैसे- वियाग्रा लेनेवाले लोग अगर नाइट्रेट बेस्ड सॉरबिट्रेट जैसी दवाएं भी साथ लेते हैं, तो उससे ख़तरनाक तरी़के से बीपी लो हो सकता है.

इसके अलावा चक्कर आने से, डेंगू, मलेरिया, बहुत ज़्यादा इंफेक्शन होने से, अचानक सदमा लगने से, कोई डरावना दृश्य देखने या ख़बर सुनने से भी बीपी लो हो सकता है.

लक्षण:

थकान, कमज़ोरी, चक्कर आना, धुंधला दिखाई देना, त्वचा में पीलापन, शरीर ठंडा पड़ जाना, डिप्रेशन, जी मचलाना, प्यास लगना, तेज़ रफ़्तार से आधी-अधूरी सांसें आना आदि.

क्यों ख़तरनाक है लो बीपी?

अगर आपका बीपी लो है और आप समय पर इसका सही इलाज नहीं करवा रहे, तो आप नीचे दिए गए किसी भी ख़तरे का शिकार हो सकते हैं.

– एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ अगर आपको लो बीपी है और आपमें कुछ दिनों से चक्कर, थकान, उबकाई जैसे लक्षण नज़र आ रहे हैं, तो यह काफ़ी गंभीर हो सकता है. इसके कारण आप हार्ट प्रॉब्लम्स और किडनी फेलियर के शिकार भी हो
सकते हैं.

– इसके अलावा यह आपके नर्वस सिस्टम व ब्रेन को भी डैमेज कर सकता है.

– प्रेग्नेंसी में अगर लो बीपी का ध्यान न रखा गया, तो स्टिल बर्थ (कोख में बच्चे की मृत्यु) जैसे कॉम्प्लीकेशन्स हो सकते हैं.

– स्ट्रोक, डेमेन्शिया (मनोभ्रम), ब्रेन डिसऑर्डर, किडनी डिसीज़ आदि से पीड़ित हो सकते हैं.

– चक्कर आने से कई बार लोग गिर सकते हैं और उन्हें गंभीर चोट भी आ सकती है.

– इसके कारण शॉक (सदमा पहुंचना) भी लग सकता है, जिससे शरीर के कई ऑर्गन्स बुरी तरह डैमेज हो सकते हैं और यह प्राणघातक भी हो सकता है.

– अंदरूनी रक्तस्राव के कारण ब्लड इंफेक्शन की आशंका बढ़ जाती है.

क्या करें?

– डॉक्टर हमेशा खाने में नमक की मात्रा कम करने की सलाह देते हैं, पर लो बीपी से पीड़ित लोगों को सोडियम की मात्रा थोड़ी ज़्यादा ही रखने की सलाह दी जाती है. अगर आपको ज़्यादा नमक पसंद नहीं, तो आप सोया सॉस आदि ले सकते हैं, पर नमक की मात्रा बढ़ाने से पहले अपने डॉक्टर से कंसल्ट ज़रूर कर लें.

– भरपूर पानी पीएं. हालांकि यह सलाह तो सभी के लिए है, क्योंकि पर्याप्त पानी हर किसी के लिए उतना ही ज़रूरी है, पर अगर आपको लो बीपी है, तो यह बहुत ज़्यादा फ़ायदेमंद हो सकता है.

– पैरों में ब्लड प्रेशर बढ़ाने के लिए कंप्रेशन स्टॉकिंग्स का इस्तेमाल करें.

– जब बीपी अचानक लो हो जाए, तो पेशेंट को तुरंत फर्स्ट एड दें. पेशेंट को तुरंत पीठ के बल लिटाकर पैरों के नीचे 2 तकिए रखें, इससे ब्रेन की तरफ़ ब्लड सप्लाई बढ़ जाती है और उसे राहत मिलती है.

– अल्कोहल से दूर रहें.

– बहुत ज़्यादा देर तक खड़े न रहें.

– बहुत ज़्यादा देर तक बैठे या लेटे रहने के बाद अचानक खड़े न हो जाएं. धीरे-धीरे उठें, इससे बीपी अचानक से बढ़ता-
घटता नहीं.

– चलते व़क्त ध्यान रखें, ताकि चक्कर खाकर गिरने से बच सकें.

– एक्सरसाइज़, योगा, स्विमिंग, वॉकिंग और साइकलिंग से रोज़ाना ब्लड प्रेशर को रेग्युलेट कर सकते हैं.

– अपने खाने में कार्बोहाइड्रेट युक्त पदार्थों, जैसे- आलू, चावल, बे्रड, पास्ता आदि की मात्रा कम कर दें.
श्र लो बीपी वालों के लिए हंसना बहुत फ़ायदेमंद होता है. सुबह-सुबह ज़ोर-ज़ोर से हंसने से आपके ब्लड प्रेशर को नॉर्मल होने में मदद मिलती है.

बचाव

– ज़्यादा से ज़्यादा तरल पदार्थों का सेवन करें. इससे आप डीहाइड्रेशन के शिकार नहीं होंगे.

– बहुत ज़्यादा गर्म पानी से नहाने से बचें. इसके कारण शरीर का तापमान बढ़ सकता है.

– 6-8 घंटे की पर्याप्त नींद लें, क्योंकि थकान भी लो बीपी का कारण बनता है.

– नियमित अंतराल पर थोड़ा-थोड़ा खाना खाएं.

– अगर आपने अभी-अभी एंटी डिप्रेशन की टैबलेट्स शुरू की हैं और खड़े होने पर सिर चकराता है या बहुत हल्का महसूस करते हैं, तो तुरंत अपने डॉक्टर को बताएं.

– हेल्दी डायट अपनाएं. अपने खाने में साबूत अनाज, फ्रूट्स, वेजीटेबल्स और फिश शामिल करें.

– जो लोग आउटडोर एक्टीविटीज़ ज़्यादा करते हैं या जिन्हें बहुत ज़्यादा पसीना आता है, उन्हें नींबू पानी पीना चाहिए.

– स्ट्रेस से दूर रहें और पॉज़ीटिव सोचें.

होम रेमेडीज़

– 10-15 किशमिश को सिरामिक बाउल में रातभर के लिए भिगोकर रख दें. सुबह सबसे पहले एक-एक कर किशमिश चबा-चबाकर खाएं और पानी पी जाएं.

– 7 बादाम को रातभर भिगोकर रखें. छीलकर, पीस लें और गुनगुने दूध में मिलाकर लें.

– 10-15 तुलसी के पत्तों को पीसकर छान लें. 1 टीस्पून शहद मिलाकर सुबह खाली पेट लें.

– दिन में दो बार बीटरूट और कैरेट का जूस पीएं.

– रोज़ाना एक कप ब्लैक टी लें. कैफीन ब्लड प्रेशर बढ़ाने में मदद करता है.

– लो ब्लड प्रेशर में अनार बहुत फ़ायदेमंद होता है. चाहे फ्रूट खाएं या जूस पीएं, दोनों ही लाभदायक हैं.

– पनीर हर फॉर्म में फ़ायदेमंद है, पर अगर कच्चा ही खाएं, तो और भी अच्छा है.

– प्याज़, मटर, ब्रोकोली, गाजर आदि को डायट में शामिल करें.

– हींग को तवे पर हल्का-सा भूनकर पानी के साथ लें.

– नमक-शक्कर का घोल लो बीपी वालों के लिए फायदेमंद होता है.

– रात को 2-3 अंजीर भिगोकर सुबह खाएं. डायबिटीज़ के मरीज़ स़िर्फ एक ही अंजीर खाएं.

– सुनीता सिंह

मोटापा कई बीमारियों की जड़ है. यह व्यक्ति को केवल शारीरिक तौर पर ही नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक तौर पर भी नुक़सान पहुंचाता है. एक रिसर्च के मुताबिक़ भारत में लगभग 50 फ़ीसदी तलाक की वजह है सेक्सुअली असंतुष्टि, जिसका मुख्य कारण है मोटापा. इसके बारे में और जानकारी दे रही हैं बैरिएट्रिक सर्जन डॉ. जयश्री टोडकर, डायरेक्टर, जेटी ओबेसिटी सॉल्यूशन एट मुंबई एंड पूणे.

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मोटापा है सेक्स का दुश्मन

– मोटापे का सीधा असर सेक्स ड्राइव पर पड़ता है.

–  दोनों में से एक पार्टनर अगर मोटा है, तो मोटे शरीर की वजह से सेक्स करते व़क्त वो सहज महसूस नहीं करता, जिसकी वजह से सेक्स में उसकी रुचि कम हो जाती है.

– मोटापे की वजह से शरीर का आकार बिगड़ जाता है, जिसकी वजह से वह अपने पार्टनर को सेक्स करने के लिए उत्तेजित या आकर्षित नहीं कर पाता है.

– सेक्स करने में झिझक या सही से परफॉर्म न करने की वजह से वैवाहिक जीवन में समस्याएं आने लगती हैंं.

– मोटापा सेक्सुअल एक्टिविटी को भी प्रभावित करता है. यौन क्रियाएं करने के लिए मसल्स का लचीला होना और शरीर में ऊर्जा का होना ज़रूरी है.

– बॉडी इमेज यानी मोटे शरीर को लेकर झिझक और शर्म महसूस करने की वजह से यह एक साइकोलॉजिकल समस्या भी बन गई है.

– मोटापे का असर सीधा मूड पर होता है. ख़राब मूड सेक्स क्रियाओं में बाधा बनता है.

– ज़्यादा वज़न स्टैमिना को प्रभावित करता है. स्टैमिना कम होने की वजह से ऑर्गेज़्म तक पहुंचने में द़िक्क़त हो सकती है.

– मोटापे की वजह से शरीर में हार्मोन्स का संतुलन बिगड़ जाता है. शरीर में फैट्स बढ़ने की वजह से टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन के स्तर में गिरावट आ जाती है, जिसकी वजह से कामेच्छा कम हो जाती है. एक स्टडी में ये बात सामने आई है कि जब शरीर का फैट कम या ज़्यादा होता है, तो उसका सीधा असर कामेच्छा पर पड़ता है.

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पुरुषों को होती हैं ये समस्याएं

 

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इरेक्टाइल डिसफंक्शन

मोटापे की वजह से कई बीमारियां हो जाती हैं और शरीर के कई अंगों तक रक्त संचार ठीक से नहीं हो पाता. हाई कोलेस्ट्रॉल और टाइप 2 डायबिटीज़, हाई ब्लडप्रेशर जैसी बीमारियों की वजह से धमनियां ब्लॉक होने लगती हैं और जननांगों तक ब्लड सर्कुलेशन ठीक ढंग से नहीं हो पाता, जिसकी वजह से इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या हो सकती है.

प्रीमैच्योर इजेकुलेशन

मोटापे की वजह से पुरुष जल्दी स्खलित हो जाते हैं, जिसकी वजह से वो सेक्स के समय अपने पार्टनर को संतुष्ट नहीं कर पाते हैं.

टेस्टोस्टेरॉन में कमी

टेस्टोस्टेरॉन को मेल सेक्स हार्मोन भी कहा जाता है. इसकी कमी पुरुष को चिड़चिड़ा, गुस्सैल बना देती है. मूड का भी सीधा संबंध इस हार्मोन से होता है. इसकी कमी कामेच्छा को कम कर देती है. शरीर में अतिरिक्त फैट्स टेस्टोस्टेरॉन के स्तर को कम कर देता है. अमेरिका में हुए एक रिसर्च के मुताबिक़ मोटे लोगों में टेस्टोस्टेरॉन का स्तर 50 फ़ीसदी तक कम हो जाता है. टेस्टोस्टेरॉन की कमी इंफर्टिलिटी का कारण बन सकती है.

मोटापा साथ ले आता है बीमारियां

मोटे लोगों को ब्लडप्रेशर, हार्ट डिसीज़, डायबिटीज़ जैसी कई बीमारियां घेर लेती हैं, जिसकी वजह से दवाएं खानी पड़ती हैं. इन बीमारियों में ली जानेवाली दवाओं से भी कामेच्छा पर असर पड़ता है. एक रिसर्च के मुताबिक़ ओबेज़ यानी मोटे लोगों की सेक्स लाइफ में नॉर्मल वज़नवाले लोगों के मुकाबले 25 गुना ज़्यादा परेशानियां होती हैं.

महिलाओं की समस्याएं पुरुषों से ज़्यादा हैं

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आत्मविश्‍वास की कमी

मोटापे की शिकार महिलाओं में आत्मविश्‍वास कम हो जाता है. ख़ूबसूरत शरीर न होने की वजह से उन्हें ऐसा लगता है कि सेक्स करते व़क्त वो आकर्षक नहीं लगेंगी. सेक्सुअल एक्टिविटीज़ की क्वालिटी और मोटापे में सीधा संबंध होता है.

ब्लड सर्कुलेशन ठीक से न हो पाने का असर

केवल पुरुषों में ही मोटापे की वजह से ब्लड सर्कुलेशन की समस्या नहीं होती, महिलाएं भी इससे पीड़ित होती हैं. मोटापे के कारण वेजाइना तक रक्त संचार ठीक से न हो पाने के कारण सेक्स ड्राइव कम हो जाता है.

झिझक-शर्म महसूस होना

मोटापे की वजह से महिलाएं सेक्स के दौरान अपनी बॉडी इमेज को लेकर झिझक महसूस करती हैं, जिसकी वजह से वो खुलकर सेक्सुअल एक्टिविटीज़ में हिस्सा नहीं ले पाती हैं.

ऑर्गेज़्म तक न पहुंचना

मोटापे के कारण महिलाओं को ऑर्गेज़्म तक पहुंचने में भी द़िक्क़त होती है. कई महिलाओं को इंटरकोर्स के दौरान दर्द या जांघों की मांसपेशियों में होनेवाले खिंचाव के कारण भी सेक्स करने की इच्छा ख़त्म हो जाती है.

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मोटापा कम करें, सेक्सुअली फिट रहें

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– डायट में बदलाव करें. भले ही वज़न कम न हो पाए, लेकिन खानपान पर ध्यान रखकर सेक्स ड्राइव को बढ़ाया जा सकता है.

– लो फैट डायट के साथ फल व सब्ज़ियां खाएं. यह डायट ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखेगा और सेक्स करने की चाह बनाए रखेगा.

– आहार में सैचुरेटेड फैट की मात्रा कम करें और प्रोटीन की मात्रा बढाएं. इससे वज़न कम करने में मदद मिलेगी और सेक्स हार्मोन्स का संतुलन बना रहेगा.

– लाइफस्टाइल बदलें और वर्कआउट करें. ऐसी एक्सरसाइज़ या एक्टिविटीज़ जिससे जांघों, कमर, कूल्हों की मांसपेशियों तक रक्त संचार हो. इसके लिए ब्रिस्क वॉक यानी तेज़ चलना, योग, साइकिलिंग आदि एक्टिविटीज़ जननांगों तक रक्त संचार को बढ़ा देते हैं और मोटापा कम करने में भी मदद करते हैं, जिससे कामोत्तेजना बढ़ जाती है.

– अगर मोटापे का कारण आनुवांशिक है, तो डॉक्टर की मदद लें.

– जीवनशैली सुधारें. धूम्रपान, अल्कोहल से दूरी बनाएं.

कैसे पता करें कि आप ओबेज़ हैं?

 

1– यह जानने के लिए आपको अपना बीएमआई चेक करना होगा. बीएमआई यानी बॉडी मास इंडेक्स, जो ये बताता है कि हाइट के अनुसार आपका वज़न कितना होना चाहिए.

–  स्वास्थ्य मंत्रालय के मानकों के अनुसार भारतीयों में सामान्य बीएमआई 23 से कम होना चाहिए, जिनका बीएमआई 25 से ज़्यादा है, उन्हें मोटापे की श्रेणी में रखा गया है.

क्या है इलाज?

मोटापा एक ऐसी बीमारी है, जो व्यक्ति को डिप्रेशन में ले जाती है. कई बार एंटी डिप्रेज़ेंट दवाएं भी इसमें कारगर साबित नहीं होती हैं.
मोटापे का सही उपचार न हो पाने की वजह से कई बार व्यक्ति के शरीर में ज़रूरी विटामिन्स की कमी हो जाती है. एनीमिया, स्वभाव में चिड़चिड़ापन आदि समस्याएं भी हो जाती हैं. इसलिए इस समस्या का सही इलाज ज़रूरी है.

मोटापे के शिकार पार्टनर का मज़ाक न बनाएं

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अगर एक पार्टनर मोटापे का शिकार है, तो दूसरे पार्टनर की ज़िम्मेदारी है कि वो उसे कंफर्टेबल फील कराए. सेक्स के दौरान उसका मज़ाक न बनाए और न ही उसे अपमानित करे. अपने पार्टनर से इस समस्या के बारे में बात करे और वज़न कम करने के लिए प्रेरित करे.

डॉ. जयश्री का कहना है कि मोटापा केवल बाहरी अपीयरेंस नहीं है, बल्कि ये शरीर में हुए कई हार्मोनल और दूसरी शारीरिक प्रणाली मेंं आए बदलावों को दर्शाता है. ख़ुद से वज़न घटाना सही तरीक़ा नहीं है. न्यूट्रिशनल और मेटाबोलिक मूल्यांकन के बाद ही ओबेसिटी एक्सपर्ट्स मोटापे का ट्रीटमेंट करते हैं. विभिन्न मेटाबोलाइट, जैसे- यूरिक एसिड, लिपिड, हार्मोन्स, किडनी, लिवर फंक्शन आदि की जांच के बाद ही इलाज किया जाता है. ऊपर बताए गए मूल्यांकन के बाद इंटरनेशनल सेंटर ऑफ एक्सेलेंस गाइडलाइन्स के तहत मोटापे से पीड़ित के लिए उपयुक्त मेडिकल या सर्जिकल मार्ग अपनाया जाता है. डॉ. जयश्री का कहना है कि बैरियाट्रिक मेटाबोलिक ट्रीटमेंट से कई लोगों को सेक्सुअल फंक्शन के मामले में संतोषजनक परिणाम मिले हैं.

– प्रियंका सिंह

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