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कंगना से भिड़े शेखर सुमन (Shekhar Suman Take A Dig On Kangana’s Simran)

कंगना रनौट एक बार फिर चर्चे में हैं. जब से उन्होंने टीवी शो अाप की अदालत में अपने सभी एक्स ब्वॉयफ्रेंड्स के बारे में बेबाक़ बातें कीं और उनपर इल्ज़ाम लगाए हैं, तब से हर कोई कंगना के बारे में ही चर्चा कर रहा है. कुछ लोग कंगना के बोल्डनेस की तारीफ़ कर रहे हैं, तो कुछ उनपर गड़े मुर्दे उखाड़ने का आरोप लगा रहे हैं.

‪#KanganaRanaut during the #Simran Press Conference in Bengaluru earlier today!‬

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कंगना के एक्स ब्वॉयफ्रेंड व शेखर सुमन के बेटे अध्ययन सुमन ने काफ़ी पहले कंगना के बारे में बेहद चौंका देनेवाली बातें उजागर की थीं. उन्होंने कहा कि वे उनपर ब्लैक मैजिक किया करती थीं और उन्हें शारीरिक प्रताड़ना देती थीं.  कंगना ने इंटरव्यू के दौरान इन इल्जामों को सिरे से खारिज कर दिया व अध्ययन को खूब खोरी-खोटी भी सुनाई. उसके बाद अध्ययन ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और कंट्रोवर्सी से दूर रहने की बात कही. लेकिन लगता है कि अध्ययन के पिता शेखर सुमन को कंगना की कड़वी बातें बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगीं और उन्होंने मौक़ा देखते ही मन की भड़ास निकाल ली.

शेखर सुमन ने कंगना की हाल में रिलीज़ हुई फिल्म सिमरन की असफलता का मज़ाक उड़ाते हुए ट्विट किया कि इतना हंगामा, इतना शोर शराबा…नतीज़ा? खोदा पहाड़, निकली चुहिया….

हमें यकीन है कि इसे पढ़ने के बाद कंगना आगबबूला हो जाएंगी. आपको बता दें कि कंगना की फिल्म सिमरन बॉक्स ऑफिस पर लुढ़क गई है. फिल्म ने पहले दो दिन मात्र 6 करोड़ का बिज़नेस किया. सुनने में तो यह भी आ रहा है कि फिल्म की कमाई से ज़्यादा तो कंगना की फीस थी. शेखर ने अपने ट्विट के माध्यम से शायद यह इशारा किया कि एेसे विवादित इंटरव्यूज़ देकर लाइमलाइट में आई कंगना को इसका कोई फ़ायदा नहीं मिला और फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फुस्स हो गई.

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फिल्म रिव्यू: ‘सिमरन’ में सारा दारोमदार है कंगना पर, ‘लखनऊ सेंट्रल’ कमज़ोर फिल्म है (Movie Review: Simran And Lucknow Central)

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फिल्म- सिमरन

स्टारकास्ट- कंगना रनौत, सोहम शाह

निर्देशक- हंसल मेहता

रेटिंग- 3 स्टार्स

फिल्म रिव्यू सिमरन

कहानी

ये कहानी है खुलकर अपनी शर्तों पर जीने वाली लड़की प्रफुल पटेल की. प्रफुल पटेल (कंगना) एक बिंदास लड़की है. उसका तलाक हो चुका है और वो अपने माता-पिता के साथ रहती है. एक होटल में वो हाउसकीपर का काम करती है. उसका बॉयफ्रेंड भी है. एक दिन वो पहुंचती है लॉस वेगास, जहां वो गैम्बलिंग करती है और बहुत सा पैसा हार जाती है. कर्ज़ में डूबी बिंदास प्रफुल लूटपाट का काम शुरू करती है और धीरे-धीरे क्राइम की ओर बढ़ जाती है. क्या होता है प्रफुल का? क्या उसकी चोरी की लत उसे बड़ी मुश्किल में फंसा देती है? क्या होता है तब, जब उसके बॉयफ्रेंड को पता चलता है कि प्रफुल को चोरी करने की आदत है? इन सवालों का जवाब आपको फिल्म देखने पर ही मिल पाएगा.

फिल्म की यूएसपी और कमज़ोर कड़ी

फिल्म की यूएसपी है कंगना की ऐक्टिंग, जो हमेशा की तरह अच्छी है. फिल्म में कंगना के कई शेड्स हैं, जो आपको मज़ेदार लगेंगे.

बात करें अगर कमज़ोर कड़ी कि तो फिल्म की कहानी थोड़ी-सी बिखरी नज़र आती है. कई जगहों पर कहानी में कुछ ऐसा होता है, जिस पर यक़ीन करना मुश्किल हो जाता है.

शाहिद, अलीगढ़ और सिटीलाइट जैसी बेहतरीन फइल्में बना चुके हंसल मेहता इस फिल्म में वो कमाल नहीं दिखा पाए.

फिल्म का ट्रेलर काफ़ी मज़ेदार थी, लेकिन फिल्म से ये उम्मीद नहीं की जा सकती है.

फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है.

फिल्म देखने जाएं या नहीं?

अगर आप कंगना रनौत के फैन हैं और हल्की-फुल्की कॉमेडी पसंद करते हैं, तो एक बार ये फिल्म देख सकते हैं.

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फिल्म रिव्यू लखनऊ सेंट्रल

फिल्म- लखनऊ सेंट्रल

स्टारकास्ट- फरहान अख्तर, डायना पेंटी, गिप्पी ग्रेवाल, रोनित रॉय, रवि किशन और दीपक डोबरियाल

निर्देशक- रंजीत तिवारी

रेटिंग- 2.5

लखनऊ सेंट्रल का विषय अच्छा है. आइए, जानते हैं फिल्म कैसी है.

कहानी

कहानी है किशन मोहन गिरहोत्रा (फरहान अख़्तर) की, जो मुरादाबाद में रहता है और म्यूज़िक डायरेक्टर बनना चाहता है. एक दिन उसके साथ कुछ ऐसा होता है कि वो एक मामले में आरोपी बना दिया जाता है और जेल पहुंच जाता है. जेल में वो वहां के कैदियों गिप्पी ग्रेवाल, दीपक डोबरियाल, इनामुलहक और राजेश शर्मा के साथ मिलकर बैंड बनाता है. जेलर (रोनित रॉय) की नज़रें इन सब कैदियों पर होती है. सोशल वर्कर बनी डायना पेंटी इन कैदियों से सहानभूति रखती हैं. क्या किशन मोहन ख़ुद को निर्देष साबित कर पाता है? क्या वो संगीतकार बनने का अपना सपना पूरा कर पाता है? इन सब सवालों का जवाब फिल्म में आखिर में मिल जाता है.

फिल्म की यूएसपी और कमज़ोर कड़ी

फिल्म का विषय अच्छा था, लेकिन फिल्म इस विषय पर खरी नहीं उतरती है. बेहद ही कमज़ोर डायरेक्शन है फिल्म का.

फरहान अख़्तर की ऐक्टिंग हमेशा की तरह अच्छी है, लेकिन कमज़ोर डायरेक्शन का असर उन पर साफ़ नज़र आता है.

रवि किशन, दीपक डोबरियाल का काम अच्छा है.

फिल्म में यूं तो बैंड दिखाया गया है, लेकिन गाने ऐसे नहीं की याद रखे जाएं.

फिल्म देखने जाएं या नहीं?

अगर आप फरहान अख़्तर के फैन हैं, तो ये फिल्म देखने जा सकते हैं. वैसे किसी कारणवश अगर ये फिल्म आप नहीं भी देख पाते हैं, तो कोई नुक़सान नहीं होगा आपका.