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न्यूज़ टाइम- आज की 5 ख़ास ख़बरें (Today’s Updates:Top 5 Breaking News)

रेशमी कपड़े पर भागवत गीता
62 वर्षीया हेमप्रभा चुटिया ने रेशमी कपड़े पर संस्कृत में पूरी भागवत गीता बुन डाली है. महाभारत का हिस्सा रहे हिंदू शास्त्र गीता में संस्कृत में 700 पद हैं. असम के डिब्रूगढ़ के मोरन की रहनेवाली हेमप्रभाजी ने दिसंबर 2016 में इसे करना शुरू किया था और अब जाकर इसे पूरा किया. 150 फीट लंबा व दो फीट चौड़े मुगा रेशम के इस कपड़े पर उन्होंने एक अध्याय इंग्लिश में भी बुना है. बहुमुखी प्रतिभा की धनी हेमप्रभाजी ने इसके पहले महादेव के नाम व उनके गुणमाला को रेशमी कपड़े पर बुना था. गौर करनेवाली बात यह है कि उनके इस प्रशंसनीय कार्य को म्यूजियम में संरक्षित करके रखा जाएगा. हेमप्रभाजी को उनके उल्लेखनीय कार्य के लिए कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं, जैसे- कनकलता अवॉर्ड, बाकुल बोन अवॉर्ड, हैंडलूम एंड टेक्सटाइल अवॉर्ड आदि.

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विद्यार्थियों की मदद करेगा सीबीएसई
केरल में आई तबाही से अनेक स्टूडेंट्स के सर्टिफिकेट, मार्कशीट, माइग्रेशन सर्टिफिकेट आदि बाढ़ के पानी में बह गए और कईयों के तो बुरी तरह ख़राब भी हो गए हैं. उनकी इसी परेशानी को सुलझाने के लिए सीबीएसई ने सराहनीय क़दम उठाया है. अब वे उन सभी विद्यार्थियों को डिजिटल डॉक्यूमेंट्स उपलब्ध कराएंगे. इसके लिए उन्होंने डिजिटल कोष परिणाम मंजुषा बनाया है. यह डिगिलॉकर ऐप (DigiLocker) से जुड़ा है. केरल स्टूडेंट्स अपने डॉक्यूमेंट्स इस ऐप की वेबसाइट पर लॉग इन कर बड़ी आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं. फ़िलहाल केरल में क़रीब एक हज़ार तीन सौ से अधिक स्कूल सीबीएसई बोर्ड से एफिलिएटेड हैं. इसके अलावा वे विद्यार्थी जिनका मोबाइल फोन नंबर रजिस्टर नहीं हैं, वे वेबसाइट पर जाकर अपने आधार कार्ड को लिंक करके अपने डॉक्यूमेंट्स डाउनलोड कर सकते हैं.

सांप प्रकोप से बचने के लिए यज्ञ
आंध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले में पिछले दो महीनों से सांप के काटे जाने की कई घटनाएं हुईं. इनमें जहां दो लोगों की मौत हो गई, वहीं सैकड़ों लोग अस्पताल में भर्ती हुए. सांप के प्रकोप से लोगों को बचाने के लिए सरकार ने सर्पयज्ञम यज्ञ करवाने का निर्णय लिया है. उनके इस फैसले की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. कुछ इसे अंधविश्‍वास को बढ़ावा देना कह रहे, तो कुछ सही कह रहे हैं. मोपादेवी के मशहूर सुब्रमण्येश्‍वर स्वामी मंदिर में सर्प दोष निवारण व सर्पयज्ञम पूजा अनुष्ठान किया जाएगा. इसके पहले भी सरकार बरसात के लिए वरूण यज्ञ कराती रही है.

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खिलाड़ियों का शानदार प्रदर्शन बरकरार
एशियन गेम्स के दसवें दिन का आकर्षण रहा बैडमिंटन में पीवी सिंधु का रजत पदक जीतना. साथ ही तीरंदाजी में भी भारत ने रजत पदक जीता. अब तक भारत को तीन रजत और एक कांस्य पदक मिल चुके हैं. भारत ने तीरंदाजी में महिलाओं व पुरुषों की कंपाउंड टीम इवेंट में सिल्वर मेडल जीता है. टेबल टेनिस में पुरुष टीम ने ब्रॉन्ज़ मेडल जीता. वहीं हॉकी में अपने आख़री लीग मैच में पुरुषों की टीम ने श्रीलंका को 20-0 से हराया. इसके पहले नौवें दिन एथलेटिक्स में खिलाड़ियों देशवासियों को गर्वित होने के कई मौ़के दिए और एक गोल्ड व तीन सिल्वर पर कब्ज़ा जमाया. भारतीय महिला एथलीट दुती चंद व हीमा दास ने महिलाओं की 200 मीटर रेस के सेमीफाइनल में प्रवेश कर लिया है.

आमिर की महाभारत के कलाकार
आमिर ख़ान ने अक्सर ही महाभारत पर फिल्म बनाने की बात कही है और यह उनका ड्रीम प्रोजेक्ट भी रहा है. वे इस पर मूवी की सीरीज़ बनाने के भी इच्छुक है, क्योंकि उनके अनुसार, इस विषय को तीन घंटे में नहीं समेटा जा सकता, इसलिए वे इसे तीन पार्ट में बनाएंगे. सूत्रो के अनुसार, कुछ कलाकारों का सिलेक्श भी हो चुका है, जिसमें बाहुबली प्रभास अर्जुन की भूमिका में, तो दीपिका पादुकोण द्रोपदी का क़िरदार निभाएंगी. निर्देशक के तौर पर उनकी पहली पसंद एसएस राजामौली हैं. दिलचस्प होगा आमिर ख़ान का रोल और इसमें कोई दो राय नहीं कि वे कृष्ण बनाना चाहेंगे, ताकि वे इस मूवी सीरिज़ के हर पार्ट में हों. इस बनाने के लिए रिलायंस एंटरटेनमेंट राजी हो गया है. अनुमानित इस मूवी सीरीज़ की बजट एक हज़ार करोड़ लगाई जा रही है.

– ऊषा गुप्ता

पंचतंत्र की कहानी: कौवा और कोबरा (Panchtantra Ki Kahani: The Cobra And The Crows)

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पंचतंत्र की कहानी: कौवा और कोबरा (Panchtantra Ki Kahani: The Cobra And The Crows)

बहुत साल पुरानी बात है, एक धनवान राज्य में बहुत बड़ा और पुराना बरगद का पेड़ था. उस पेड़ पर एक कौआ-कव्वी (Crows) का जोड़ा अपने घोसले में रहता था. ये जोड़ा दिनभर भोजन की तलाश में बाहर रहता और शाम होते ही लौट आता. उसी पेड़ के पास एक दुष्ट सांप  (Cobra) भी रहता था. कौआ-कव्वी का जोड़ा बहुत आराम से गुज़र-बसर कर रहा था. इसी बीच कव्वी ने अंडे दिए, दोनों बेहद ख़ुश थे. लेकिन एक दिन जब वो बाहर गए, तो सांप उनके अंडों को खा गया.

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दोनों बहुत रोये. अब हर साल मौसम आने पर कव्वी अंडे देती और वो सांप (Snake) मौक़ा पाकर उनके घोसले में जाकर अंडे खा जाता. वो दोनों ही समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर उनके बच्चों का दुश्मन कौन है? लेकिन जल्द हो वो समझ कि हो न हो यह काम उस सांप का ही है. सांप तो अंडे खाकर चला गया, लेकिन कव्वी के दिल पर जो बीता वो सोचा भी नहीं जा सकता था. कौए ने अपनी पत्नी को ढाढस बंधाया, “अब हमें शत्रु का पता चल चूका है, तो हम कुछ उपाय भी ज़रूर सोच लेंगे.”

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कौए ने काफ़ी सोचा और अपनी मित्र लोमडी से सलाह लेने दोनों उसके पास गए. लोमडी ने अपने मित्रों की दुख भरी कहानी सुनी. लोमडी ने काफ़ी सोचने के बाद कहा “मित्रो! तुम्हें वह पेड छोडकर जाने की जरुरत नहीं हैं. मेरे पास एक तरकीब है, जिससे उस दुष्टसर्प से छुटकारा पाया जा सकता है.” लोमडी ने अपने चतुर दिमाग में आई तरकीब बताई. उन्होंने लोमडी को धन्यवाद दिया और अपने घर लौट आए.

अगले ही दिन योजना अमल में लानी थी. दरअसल उस प्रदेश की राजकुमारी एक सरोवर में अपनी सहेलियों के साथ जल-क्रीड़ा करने आती थी. उनके साथ अंगरक्षक तथा सैनिक भी आते थे.

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जब राजकुमारी और उनकी सहेलियां सरोवर में स्नान करने जल में उतरी तो योजना के अनुसार कौआ उडता हुआ वहां आया. उसने पहले तो राजकुमारी तथा सहेलियों का ध्यान अपनी और आकर्षित करने के लिए ‘कांव-कांव’ का शोर मचाया. फिर राजकुमारी तथा उसकी सहेलियों द्वारा उतारकर रखे गए कपडों व आभूषणों में से राजकुमारी का प्रिय हीरे व मोतियों का विलक्षण हार में से एक हार चोंच में दबाकर ऊपर उड़ गया. सभी सहेलियां चीखी, “वह राजकुमारी का हार उठाकर ले जा रहा हैं.”

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सैनिकों ने ऊपर देखा तो सचमुच एक कौआ हार लेकर धीरे-धीरे उड़ता जा रहा था. सैनिक उसी दिशा में दौडने लगे. कौआ सैनिकों को उसी पेड़ की ओर ले आया. जब सैनिक कुछ ही दूर रह गए तो कौए ने हार इस प्रकार गिराया कि वह सांप के खोल के भीतर जा गिरा.

सैनिक दौड़कर खोल के पास पहुंचे, तो वहां हार और उसके पास में ही एक काले सर्प को देखा. सैनिकों ने भालों से उस सांप के टुकड़े-टुकड़े  कर डाले और वो दुष्ट सांप मर गया. कौआ-कव्वी बेहद खुश थे.

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सीख: शरीर से आप भले ही कमज़ोर हों, लेकिन सूझ बूझ का उपयोग कर हम बड़ी से बड़ी ताकत और दुश्मन को हरा सकते हैं, बुद्धि का प्रयोग करके हर संकट का हल निकाला जा सकता है.

पंचतंत्र की ऐसी ही शिक्षाप्रद और दिलचस्प कहानियों के लिए यहां क्लिक करें: Panchtantra ki Kahaniyan

पंचतंत्र की कहानी- झगड़ालू मे़ंढक (Panchtantra Story- Frog & Snake)

Panchtantra Story- Frog & Snake

Panchtantra Story- Frog & Snake

एक कुएं में ढेर सारे मेंढ़क रहते थे. मे़ंढकों के राजा का नाम था गंगदत्त. वह बहुत झगड़ालू स्वभाव का था. आसपास दो-तीन और कुए थे जिनमें भी मेंढक रहते थ. हर कुएं के मेंढ़कों का अपना राजा था. हर राजा से किसी न किसी बात पर गंगदत्त का झगड़ा होता रहता था. वह अपनी बेवकूफी कोई ग़लत काम करने लगता और कोई बुद्धिमान मेंढ़क उसे रोकने की कोशिश करता, तो मौक़ा मिलते ही वह अपने पाले हुए गुंडे मेंढ़कों से सलाह देने वाले की पिटाई करवा देता. कुएं के मे़ंढक गंगदत्त के इस व्यवहार से बहुत ग़ुस्से में थे. दरअसल, गंगदत्त अपनी हर मुसीबत के लिए दूसरों को दोष देता रहता था.
एक दिन गंगदत्त की पास के पड़ोसी मे़ंढक राजा से खूब लड़ाई हुई. जमकर तू-तू मैं-मैं हुई. गंगदत्त ने अपने कुएं में आकर बाकी मेंढ़कों को बताया कि पड़ोसी राजा ने उसका अपमान किया है और इस अपमान का बदला लेने के लिए उसने अपने मे़ंढकों को पड़ोसी कुएं पर हमला करने को कहा, मगर सब जानते थे कि झगड़ा गंगदत्त ने ही शुरू किया होगा. इसलिए कुछ बुद्धिमान मेंढ़कों ने एकजुट होकर एक स्वर में कहा, “राजन, पड़ोसी कुएं में हमसे दुगुने मेंढ़क हैं. वे स्वस्थ और हमसे ज़्यादा ताकतवर हैं. हम यह लड़ाई नहीं लड़ेंगे.”
गंगदत्त सन्न रह गया और बुरी तरह तिलमिला गया. मन ही मन में उसने ठान ली कि इन गद्दारों को भी सबक सिखाना होगा. गंगदत्त ने अपने बेटों को बुलाकर भड़काया, “बेटा, पड़ोसी राजा ने तुम्हारे पिता का घोर अपमान किया है. जाओ, उस राजा के बेटों की ऐसी पिटाई करो कि वे पानी मांगने लग जाएं.”
गंगदत्त के बेटे एक-दूसरे का मुंह देखने लगे. आख़िर बड़े बेटे ने कहा, “पिताश्री, आपने कभी हमें टर्राने की इजाज़त नहीं दी. टर्राने से ही मेंढ़कों में बल आता हैं, हौसला आता हैं और जोश आता है. आप ही बताइए कि बिना हौसले और जोश के हम किसी की क्या पिटाई करेंगे?”

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अब गंगदत्त सबसे चिढ़ गया. एक दिन वह कुढ़ता और बड़बड़ाता कुएं से बाहर निकल इधर-उधर घूमने लगा. उसने एक भयंकर नाग को पास ही बने अपने बिल में घुसते देखा. ये देखकर उसकी आंखें चमकी. जब अपने दुश्मन बन जाए, तो दुश्मन को दोस्त बना लेना चाहिए. यही सोचकर वह बिल के पास जाकर बोला, “नागदेव, मेरा प्रणाम.”
नागदेव फुफकारें, “अरे मेंढ़क मैं तुम्हारा बैरी हूं, तुम्हें खा सकता हूं और तू मेरे ही बिल के आगे आकर मुझे आवाज़ दे रहा है.”
गंगदत्त टर्राया, “हे नाग, कभी-कभी शत्रुओं से ज़्यादा अपने दुख देने लगते हैं. मेरा अपनी जातिवालों और सगों ने इतना घोर अपमान किया हैं कि उन्हें सबक सिखाने के लिए मुझे तुम जैसे शत्रु के पास सहायता मांगने आना पड़ा. तुम मेरी दोस्ती स्वीकार करो और मज़े करो.”
नाग ने बिल से अपना सिर बाहर निकाला और बोला, “मज़े, कैसे मज़े?”
गंगदत्त ने कहा, “मैं तुम्हें इतने मेंढ़क खिलाऊंगा कि तुम अजगर जैसे मोटे हो जाओगे.”
नाग ने शंका व्यक्त की, “पानी में मैं जा नहीं सकता. कैसे पकड़ूंगा मेंढ़क?”
गंगदत्त ने ताली बजाई, “नाग भाई, यहीं तो मेरी दोस्ती तुम्हारे काम आएगी. मैंने पड़ोसी राजाओं के कुओं पर नजर रखने के लिए अपने जासूस मेंढ़कों से गुप्त सुरंगें खुदवा रखी हैं. हर कुएं तक उनका रास्ता जाता है. सुरंगें जहां मिलती हैं वहां एक कक्ष है, तुम वहां रहना और जिस-जिस मेंढ़क को खाने के लिए कहूं, उन्हें खाते जाना.”
नाग गंगदत्त से दोस्ती के लिए तैयार हो गया, क्योंकि उसमें उसका लाभ ही लाभ था. एक मूर्ख बदले की भावना में अंधे होकर अपनों को ही दुश्मन के हवाले करने को तैयार हो, तो दुश्मन क्यों न इसका लाभ उठाए?
नाग गंगदत्त के साथ सुरंग कक्ष में जाकर बैठ गया. गंगदत्त ने पहले सारे पड़ोसी मेंढ़क राजाओं और उनकी प्रजाओं को खाने के लिए कहा. नाग कुछ ही हफ़्ते में सारे दूसरे कुओं के मेंढ़क को सुरंग के रास्ते जा-जाकर खा गया. जब सारे मेंढ़क समाप्त हो गए, तो नाग गंगदत्त से बोला, “अब किसे खाऊं? जल्दी बता. चौबीस घंटे पेट फुल रखने की आदत पड़ गई है.”
गंगदत्त ने कहा, “अब मेरे कुएं के सभी स्याने और बुद्धिमान मेंढ़कों को खाओ.”
जब सारे बुद्धिमान मेंढ़क ख़त्म हो गए, तो प्रजा की बारी आई, गंगदत्त ने सोचा प्रजा की ऐसी तैसी. हर समय कुछ न कुछ शिकायत करती रहती है. पूरी प्रजा का सफ़ाया करने के बाद नाग ने खाना मांगा, तो गंगदत्त बोला, “नागमित्र, अब केवल मेरा कुनबा और मेरे मित्र ही बचे हैं. खेल ख़त्म और मेंढ़क हजम.

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नाग ने फन फैलाया और फुफकारने लगा, “मेंढ़क, मैं अब कहीं नहीं जानेवाला. तू अब मेरे खाने का इंतज़ाम कर वरना हिस्सा साफ़.”
गंगदत्त की बोलती बंद हो गई. उसने नाग को अपने मित्र खिलाए फिर उसके बेटे नाग के पेट में गए. गंगदत्त ने सोचा कि मैं और मेंढ़की ज़िंदा रहे तो बेटे और पैदा कर लेंगे. बेटे खाने के बाद नाग फुफकारा “और खाना कहां हैं? गंगदत्त ने डरकर मेंढ़की की ओर इशार किया. गंगदत्त ने स्वयं के मन को समझाया “चलो बूढ़ी मेंढ़की से छुटकारा मिला. नई जवान मेंढकी से विवाह कर नया संसार बसाऊंगा।फ
मेंढ़की को खाने के बाद नाग ने मुंह फाड़ा “खाना.”
गंगदत्त ने हाथ जोड़कर कहा, “अब तो केवल मैं बचा हूं, तुम्हारा दोस्त गंगदत्त. अब लौट जाओ.”
नाग बोला मतू कौन-सा मेरा मामा लगता हैं और उसे भी खा गया.

सीख- अपनों से बदला लेने के लिए जो शत्रु का साथ लेता है उसका अंत निश्‍चित है.