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आज भी होते हैं लड़कियों के वर्जिनिटी टेस्ट्स…! (‘Stop the V-Ritual’: The Fight To End Virginity Test)

  • कोई इस तथ्य को माने या न माने, लेकिन सच यही है कि आज भी भारतीय समाज में शादी से पहले लड़की का वर्जिन (Virgin) होना एक अनिवार्य शर्त होती है.
  • लड़का वर्जिन है या नहीं, इससे किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, लेकिन लड़की पर सबकी नज़र रहती है.
  • दरअसल, वर्जिनिटी (Virginity) को घर की व लड़की की इज़्ज़त से जोड़कर देखा जाता है. आज भी यह सोच कायम है.
  • शादी से पहले सेक्स की बात तो दूर, प्रेम-संबंध तक भी हमारे समाज के बहुत बड़े तबके में स्वीकार्य नहीं है.
  • लड़की की वर्जिनिटी को उसके चरित्र के साथ जोड़ा जाता है, लड़कों के लिए तो यह मात्र उनकी उम्र का दोष होता है.
वर्जिनिटी का क्या अर्थ है?

लड़की के कुंआरेपन को वर्जिनिटी कहा जाता है यानी जिस लड़की ने पहले कभी सेक्स न किया हो, वो वर्जिन है. इसे जांचने-परखने के कई तरी़के भी हमारे समाज में इजाद किए गए हैं, जिनमें सबसे हास्यास्पद है- शादी की पहली रात को स़फेद चादर बिछाकर यह देखना कि सेक्स के बाद चादर पर ख़ून के धब्बे हैं या नहीं. दरअसल, वर्जिनिटी को लेकर इतनी ग़लतफ़हमियां हैं कि पढ़े-लिखे लोग भी इसे समझना नहीं चाहते.

वर्जिनिटी से जुड़े मिथ्स
  • पहली बार संबंध बनाने पर ख़ून निकलता है: यह सबसे बड़ा मिथ है. 90% मामलों में पहली बार सेक्स (Sex) करने पर भी ख़ून नहीं निकलता. यह हम नहीं, रिसर्च बताते हैं.
  • हाइमन पहली बार सेक्स से ही टूटता है: सबसे बड़ा तथ्य यह है कि कई लड़कियों में तो जन्म से ही हाइमन नहीं होता. वैसे भी आजकल शादी करने की उम्र बढ़ गई है. लड़कियां फिज़िकली भी एक्टिव हो गई हैं, जिसमें कभी खेल-कूद के दौरान, कभी साइकिलिंग, स्विमिंग, तो कभी अन्य एक्टिविटी के चलते लड़कियों की योनि की झिल्ली फट जाती है.
  • पहली बार सेक्स करने पर वर्जिन लड़कियों को दर्द होता है: यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है और शरीर से ज़्यादा यह मस्तिष्क से जुड़ा होता है. यदि लड़का-लड़की मानसिक रूप से सेक्स के लिए तैयार हैं, तो काफ़ी हद तक संभावना है कि दर्द नहीं होगा. दूसरी बात, यदि फोरप्ले बेहतर ढंग से किया गया हो, तब भी दर्द की संभावनाएं कम हो जाती हैं.
  • टु फिंगर टेस्ट: बहुत-से लोगों का मानना है कि यह सबसे सटीक तरीक़ा है लड़कियों की वर्जिनिटी का पता लगाने का, जबकि ऐसा कोई भी टेस्ट नहीं है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि लड़की ने पहले सेक्स किया है या नहीं.
  • वर्जिन लड़की का वेजाइना छोटे आकार का होता है: सभी लड़कियों के वेजाइना का आकार उसके बॉडी शेप पर निर्भर करता है. वेजाइना का छोटा-बड़ा, टाइट या लूज़ होना वर्जिनिटी से संबंध नहीं रखता. इन सबके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं.
  • बेहतर होगा अपने पार्टनर पर भरोसा रखा जाए और अपनी लव लाइफ को एक ख़ून के धब्बे के भरोसे न रखकर उसे एंजॉय किया जाए.
यहां आज भी पंचायत निर्धारित करती है लड़की की वर्जिनिटी

हम 21वीं सदी में हैं और हम में से अधिकांश लोग यही सोचते होंगे कि इस ज़माने में वर्जिनिटी टेस्ट की बातें बेकार हैं. आजकल लोग सुलझे हुए हैं. लेकिन ऐसा है नहीं. मात्र चंद लोग ही हैं, जिनके लिए लड़कियों की वर्जिनिटी के कोई मायने नहीं.

महाराष्ट्र के पुणे के इलाके में ही कंजरभाट एक ऐसा समुदाय है, जहां पंचायत की देखरेख में शादी की पहली रात को वर्जिनिटी टेस्ट करवाया जाता है. स़फेद चादर बिछाकर यह देखा जाता है कि लड़की वर्जिन है या नहीं. शादी की रात दुल्हन के सारे गहने और चुभनेवाली तमाम चीज़ें निकलवा दी जाती हैं, ताकि उससे घायल होकर कहीं ख़ून के धब्बे न लग जाएं. इस टेस्ट में फेल होने पर दुल्हन को कई तरह की यातनाएं दी जाती हैं. पंचायत उसे सज़ा सुनाती है और यहां तक कि पहले इस तरह की घटनाएं भी हुई हैं, जहां शादी को रद्द तक कर दिया जाता था.

लेकिन अब इसी समुदाय के एक युवा विवेक तमाइचिकर ने आगे आकर इस कुप्रथा को रोकने के लिए मोर्चा खोल दिया है. स्टॉप द वी रिचुअल नाम से विवेक और उनकी कज़िन प्रियंका तमाइचिकर ने व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया है. उनकी ही तरह अन्य युवा भी इस ग्रुप का हिस्सा हैं. हालांकि इन युवाओं की राह इतनी आसान नहीं है, क्योंकि पंचायत का विरोध करने पर इन्हें मारा जाता है. ये पुलिस की मदद भी ले रहे हैं, लेकिन इस कुप्रथा को जड़ से मिटाना इतना आसान भी नहीं.

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…मेरे लिए वर्जिनिटी एक अंधविश्‍वास है!

जी हां, यह कहना है विवेक का, जिन्होंने स्टॉप द वी रिचुअल की शुरुआत की. इसी संदर्भ में हमने ख़ुद विवेक से ख़ास बातचीत की.

विवेक तमाइचिकर पत्नी ऐश्‍वर्या के साथ

मैं 5वीं क्लास में था, जब मैंने घर पर एक तरह से हिंसा देखी. मैं अपनी कज़िन की शादी में गया था, अगले दिन उसी के साथ मारपीट हो रही थी. मेरे लिए असमंजस की स्थिति थी, क्योंकि उस उम्र में यह सब समझना बेहद मुश्किल था. मैं टयूशन गया, तो टीचर ने भी पूछा कैसी रही शादी? मैंने कह दिया कि लड़की ख़राब निकली… तो यह होता है, जब आप उसी चीज़ को देखकर पले-बढ़े होते हों. फिर टीनएज आते-आते मुझे समझ में आने लगा कि नहीं, कुछ तो ग़लत है. और उम्र बढ़ी, कॉलेज गया, तो और बातें समझ में आने लगीं और महसूस हुआ कि यह इंसानियत के ख़िलाफ़ है.

फिर मेरी सगाई ऐश्‍वर्या से हुई, तो उसके सामने मैंने अपने विचार रखे और मैंने उससे पूछा, तो उसने भी मेरा साथ देना ठीक समझा. हालांकि हमें एक बेहद कंज़र्वेटिव कम्यूनिटी और समाज से लोहा लेना था, लेकिन यह ज़रूरी था, क्योंकि मेरे लिए वर्जिनिटी एक अंधविश्‍वास है.

मेरी कज़िन प्रियंका भी बहुत ही डेडिकेटेड थी इस कैंपेन को लेकर. हमने व्हाट्सऐप ग्रुप बनाया, युवा हमारे साथ जुड़ने लगे. फेसबुक पर लिखना शुरू किया, तो और असर हुआ. कई लोगों का साथ मिला. अगस्त में राइट टु प्राइवेसी एक्ट और ट्रिपल तलाक़ नियमों के बाद मैंने फेसबुक पर अपने कैंपेन को थोड़ा एग्रेसिवली आगे बढ़ाया, जिससे बहुत-से युवाओं का मुझे अच्छा रेस्पॉन्स मिला. यह देखकर अच्छा लगा कि लोगों का माइंडसेट बदल रहा है.

प्रियंका तमाइचिकर

फैमिली का क्या रेस्पॉन्स था?

परिवारवाले चूंकि उसी कंज़र्वेटिव समाज का हिस्सा थे, तो उनके मन में डर भी था और कंफ्यूज़न भी. उन्होंने विरोध ही किया मेरा. उनके मन में पंचायत का डर था. समाज से निकाले जाने का डर था, तो यह उनका माइंडसेट था, पर मुझे जो करना था, वो करना ही था.

मैं ख़ासतौर से अपनी पत्नी ऐश्‍वर्या भट्ट और  बहन प्रियंका को सैल्यूट करना चाहूंगा कि दोनों ने मुझे बहुत सपोर्ट किया. दोनों लड़कियां हैं और उनसे बेहतर इस विषय की संवेदनशीलता को कौन समझ सकता है भला. उनका डेडिकेशन काबिले तारीफ़ है. इस कैंपेन में प्रियंका ने भी बहुत बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और मेरा साथ दिया.

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कभी डर नहीं लगा?

नहीं, कभी भी नहीं, क्योंकि मेरे लिए कोई दूसरा रास्ता था ही नहीं. मुझे इसी रास्ते पर चलना था. यह अमानवीय कृत्य मेरी बर्दाश्त के बाहर था. कंजरभाट समाज में मेरा कोई स्थान नहीं है, लेकिन मेरी जीत इसी में है कि मुझे फोन पर कहा जाता है कि समाज के लोग ग़ुस्सा हैं, ये सब बंद क्यों नहीं कर देते, तो मैं यही कहता हूं कि समाज के लोग बदल क्यों नहीं जाते? मेरे कैंपेन का असर हो रहा है, इसीलिए तो मुझसे आप बात कर रहे हो? उन्हें लगता है कि मैंने वर्जिनिटी जैसे टैबू टॉपिक को खुलेआम चर्चा का विषय बना दिया. सोशल मीडिया व मीडिया में भी इस पर हम बात करते हैं, तो ज़ाहिर है लोगों का माइंडसेट ज़रूर बदलेगा. यहां तक कि समाज के भी कुछ लोग यह जानते और मानते हैं कि मैं सही हूं, पर उनमें समाज के विरुद्ध खड़े होने की हिम्मत नहीं. मुझमें है, मैं करूंगा.

आप लोगों पर हमले भी होते रहते हैं?

जी हां, सीधेतौर पर तो नहीं, पर परोक्ष रूप से कभी व्हाट्सऐप के ग्रुप बनाकर, तो कभी गुंडों से पिटवाकर हमें धमकाया जाता है. सामाजिक रूप से बहिष्कार करके भी हमारे जज़्बे को तोड़ने की कोशिशें होती हैं, लेकिन इससे हमारे हौसले कम नहीं होनेवाले.

कहीं कोई बदलाव नज़र आ रहा है?

जी हां, मैं आपको कुछ रोज़ पहले की ही घटना बताता हूं. हमें एक शादी में बुलाया गया. वो परिवार काफ़ी रसूख़दार था. उस शादी में पंचायत को वो अधिकार नहीं दिए गए, जो पारंपरिक रूप से दिए जाते रहे हैं अब तक. इसके अलावा हमें वहां ख़ासतौर से बुलाया गया, सम्मान दिया गया. जो शगुन की बातें होती हैं, जिनसे लिंग भेद न हो व समाज को नुक़सान न हो, उसका हमने भी विरोध नहीं किया, लेकिन वहां उस परंपरा को पूरी तरह से तोड़ दिया गया, जिसके लिए कंजरभाट समाज जाना जाता है. हमें बेहद ख़ुशी हुई. हालांकि जब हम बाहर आए, तो हमारी गाड़ी का कांच टूटा हुआ था, जो पंचायत के लोगों ने ही ग़ुस्से में किया था. पर यही तो हमारी जीत थी.

पंचायत किस तरह से करती है वर्जिनिटी टेस्ट?

यह इतना अमानवीय है कि आपको यक़ीन नहीं होगा कि इस युग में भी ये सब होता है. शादी के व़क्त पूरी पंचायत मौजूद रहती है. उनका सत्कार-सम्मान होता है. शादी के बाद दूल्हा-दुल्हन को बोला जाता है कि अब आपको वर्जिनिटी टेस्ट के लिए भेजा जा रहा है. परिवार के साथ मैरिड कपल को लॉज में भेजा जाता है. वहां दुल्हन को महिला सदस्य पूरी तरह नग्न करती है, ताकि शरीर पर ऐसा कुछ भी न रहे, जिससे चोट वगैरह लगकर ख़ून निकले. स़फेद चादर बिछाई जाती है और आधे घंटे का समय कपल को दिया जाता है परफॉर्म करके रिज़ल्ट देने का. यदि दूल्हा परफॉर्म नहीं कर पा रहा हो, तो कपल को ब्लू फिल्म दिखाई जाती है या दूल्हे को शराब की आदत हो, तो शराब पिलाई जाती है या उन्हें कोई और परफॉर्म करके दिखाता है. उसके बाद वो स़फेद चादर लड़केवाले अपने कब्ज़े में ले लेते हैं.

अगले दिन सुबह पंचायत फाइनल सर्टिफिकेट देने के लिए बैठती है. कुल 100-200 लोग होते हैं. दूल्हे से पूछा जाता है- ‘तेरा माल कैसा था?’ दूल्हे को तीन बार बोलना पड़ता है- ‘मेरा माल अच्छा था या मेरा माल ख़राब था.’ तो आप सोचिए ये लिंग भेद का सबसे ख़तरनाक रूप कितना अमानवीय है. यदि लड़की इस टेस्ट में फेल हो जाती है, तो उस मारा-पीटा जाता है, कहा जाता है कि किस-किस के साथ तू क्या-क्या करके आई है… वगैरह.

प्रशासन का रवैया कैसा रहा अब तक?

मेरे ही गु्रप के एक लड़के ने एक शादी का वीडियो शूट करके पुलिस में कंप्लेन की थी. उस शादी में पंचायत बैठी थी और वहां पैसों का काफ़ी लेन-देन व कई ऐसी चीज़ें हो रही थीं, जो क़ानून के भी ख़िलाफ़ थीं. पर पुलिस ने एफआईआर तक नहीं लिखी. हमारे ही गु्रप की एक लड़की को भी समाज ने बायकॉट किया, हम पर भी अटैक्स होते हैं, पर समाज का दबाव इतना ज़्यादा है कि सीधेतौर पर कोई कार्रवाई इतनी जल्दी नहीं होती.

आज भी अधिकांश लड़के शादी के लिए ‘वर्जिन’ लड़की ही ढूंढ़ते हैं. क्या लगता है कि उनकी सोच बदलेगी?

यही तो चैलेंज है. दरअसल, हम जिस माहौल, समाज व परिवार में पलते-बढ़ते हैं, वो ही हमारी सोच को गढ़ती है. पारंपरिक तौर पर हम उसी का हिस्सा बन जाते हैं, तो ये एक माइंडसेट है, जिसे बदलना अपने आपमें चुनौती तो है, लेकिन हमें इस चुनौती को स्वीकारना होगा और जीत भी हासिल करनी होगी.

हाइमन रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी का बढ़ता ट्रेंड

लड़के कितनी ही मॉडर्न सोच रखने का दावा क्यों न करते हों, पर उनका ध्यान भी लड़की की वर्जिनिटी पर ही रहता है. यही वजह है कि आजकल लड़कियां हाइमन रिकंस्ट्रक्शन सर्जरी करवाने में ही अपनी भलाई समझने लगी हैं. इसे हाइमनोप्लास्टी, हाइमन रिपेयर या

री-वर्जिनेशन कहा जाता है. यह सर्जरी महंगी होती है, लेकिन आजकल सरकारी अस्पतालों में भी यह होने लगी है. यह कॉस्मेटिक सर्जरी होती है और सरकारी अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि

दिन-ब-दिन इसमें बढ़ोत्तरी हो रही है. हर महीने कम से कम दो-तीन केसेस हाइमन रिपेयर के होते ही हैं. इन लड़कियों पर सामाजिक और पारिवारिक दबाव होता है. साथ ही यह डर भी कि कहीं उनका पार्टनर उन्हें छोड़ न दे. यहां तक कि कुछ मामलों में तो पैरेंट्स ही यह सर्जरी करवाने की सलाह देते हैं, जहां लड़कियों की दोबारा शादी करानी हो या इसी तरह के मामले हों, तो परिवार के दबाव में लड़की सर्जरी करवाती है.

भारत में भी सेक्सुअल एक्टिवनेस बढ़ गई है, लेकिन इसके बावजूद अधिकांश सर्वे इस बात को पुख़्ता करते हैं कि लड़के आज भी शादी के लिए वर्जिन लड़की ही ढूंढ़ते हैं.

– गीता शर्मा

 

शादीशुदा से प्यार अब परहेज़ नहीं (Having An Affair With Married Man?)

Having An Affair With Married Man
बदलते ज़माने के दौर में बहुत कुछ बदला है. पर सबसे अधिक जीने के नज़रिए में बदलाव आया है. एक व़क़्त था, जब शादीशुदा के प्यार के बारे में ख़्याल को भी ग़लत माना जाता था, पर अब ऐसा नहीं रहा. आइए, इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर एक नज़र डालें.

Having An Affair With Married Man

  • एक का हो गया, वह दूसरे का नहीं हो सकता. एक ज़माने में लोग ऐसा ही सोचते थे. इसीलिए एकदो दशक पहले तक ऐसी घटनाएं कम ही देखने को मिलती थीं कि किसी लड़की को शादीशुदा पुरुष से प्यार हो जाए. उस ज़माने में लड़कियों के बुनियादी स्त्रियोचित गुणों में सौतिया डाह का स्थान सर्वोपरि था. यह कल्पना करना मुश्किल था कि अविवाहित लड़की किसी अन्य स्त्री के पति के साथ प्यार की पींगे बढ़ा सकती है.
  • लेकिन स्त्री और पुरुष की इस बनावट और उनके संबंधों की बुनावट में पिछले कुछ अरसे से काफ़ी बदलाव आया है. आज लड़कियां न केवल शादीशुदा पुरुष को प्यार के क़ाबिल समझ रही हैं, बल्कि समाज भी ऐसे संबंधों पर ऐतराज़ करता नज़र नहीं आ रहा. समाज और जीवन के ये फ़लस़फे यूं ही नहीं बदल गए. इनके लिए देशदुनिया में हो रहे तमाम परिवर्तन ज़िम्मेदार हैं.

लड़कियों का कामकाजी होनाः शादीशुदा पुरुष के प्रति लड़की के झुकाव, लगाव और प्यार की सबसे बड़ी वजह आज के ज़माने में लड़कियों का कामकाजी होना है. किसी ऑफ़िस में काम करती लड़की सुबह 10 से शाम 5 बजे तक का समय अपने पुरुष सहकर्मी के साथ बिताती है. लंबे समय तक साथ काम करना, चाय पीना, लंच करना, हंसीमज़ाक जैसी रोज़मर्रा की घटनाएं चाहेअनचाहे दिलों को क़रीब लाती हैं. काम के दौरान एकदूसरे का सहयोग करने, सीखनेसिखाने, सुखदुख बांटने का सिलसिला कब प्यार में तब्दील हो जाता है, पता ही नहीं चलता. इसके अलावा करियर की सीढ़ियां चढ़ने की चाहत भी प्यार का चोला पहनकर आती है.

सीरियल, हॉलीवुड व बॉलीवुड का असरः भारतीय महिलाओं की मनःस्थिति में आए इस बदलाव में धारावाहिकों की भी ख़ास भूमिका रही है. आजकल हर धारावाहिक में मसाला डालने के लिए जो तानेबाने बुने जाते हैं, उनमें विवाहित पुरुषों से रिश्ते बनानेवाली नायिकाओं ने आम युवतियों को भी प्रेरित किया है. आज लड़कियां शादी से पहले अथवा शादी के बाद भी अपनी मर्ज़ी से ऐसा कोई क़दम उठाने में नहीं झिझक रही हैं.

भारतीय महिलाओं के मन को इस रूप में ढालने में दूसरी सबसे अहम् भूमिका बॉलीवुड और हॉलीवुड के सितारों की भी रही है. नायकनायिकाओं को अपनी पसंद की ज़िंदगी जीने और अपनी पसंद की स्त्री/पुरुष को चुनने की आज़ादी ने धारावाहिकों में चल रही काल्पनिक कहानियों पर सच्चाई की मुहर लगा दी है. बदलाव आपके सामने है. आज से दो दशक पहले कोई युवती शादीशुदा पुरुष के साथ संबंध बनाकर अपने घर तो क्या, दूर किसी शहर में भी रहने की नहीं सोच सकती थी जबकि आज ऐसे रिश्ते के बावजूद लड़कियां अपने परिवार में ही रह रही हैं और कहीं से भी विरोध के स्वर उठते नहीं दिखते.

ग्लोबलाइज़ेशन व सूचना क्रांतिः सूचना क्रांति और वैश्‍वीकरण ने सारी दुनिया को एक गांव की शक्ल दे डाली है. दुनिया की सारी संस्कृतियां एकदूसरे को काफ़ी नज़दीक से देख रही हैं. टीवी चैनलों पर दूरदराज़ की ख़बरें पलभर में हर जगह पहुंच जाती हैं. ऐसे में पश्‍चिमी सभ्यता के खुलेपन का असर भारतीय समाज पर भी पड़ा है और भारतीय युवाओं और युवतियों के मन में भी खुली हवा में सांस लेने की चाहत जागी है. वह अपनी पसंद के पुरुष के साथ जीवन जीना चाहती है. वह पुरुष अविवाहित है या विवाहित, इससे उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

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Having An Affair With Married Man
बड़े धोखे हैं इस राह में

नोएडा की एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत जयचंद विवाहित है. उसकी पत्नी और बच्चे गांव में हैं. वह और उसके साथ काम करनेवाली वर्षा एक ही बिल्डिंग में रहते हैं. एक ही ऑफ़िस में साथसाथ काम करते हुए और एक ही बिल्डिंग में रहते हुए वर्षा न जाने कब जयचंद के मोहपाश में बंधकर उससे प्रेम करने लगी, वह जयचंद को अपना सर्वस्व मानने लगी. लेकिन क्या ऐसा जयचंद के साथ भी है? क्या वह भी वर्षा को उसी शिद्दत के साथ चाहता है? नहीं! वर्षा अब यह अच्छी तरह जान चुकी है. जिस प्रेम ने उसके अंदर कभी उमंगें भरी थीं, वह अब एक बोझ बनकर रह गया है. वर्षा इस असहनीय स्थिति से छुटकारा पाना तो चाहती है, लेकिन जयचंद से अलग होकर जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती. इसलिए इस कशमकश भरे रिश्ते को प्यार के नाम पर निभाए जा रही है.

यह मात्र एक वर्षा और जयचंद की कहानी नहीं है. ऐसी न जाने कितनी वर्षाएं अपने प्यार से न जाने कितने जयचंदों की दुनिया हरीभरी कर रही हैं. लेकिन क्या उनकी अपनी दुनिया हरीभरी है, वे ख़ुद भी आश्‍वस्त होकर नहीं कह सकती हैं.

ज़ाहिर है, शादीशुदा पुरुष से प्यार की राह पर ख़तरे तो हर क़दम पर हैं, लेकिन ज़िंदगी की अजीब दास्तां का क्या ठिकाना? वह ऐसे मोड़ पर पहुंच सकती है, जहां कोई ऐसा मिल जाए, जो हो तो चुका हो किसी और का, पर बना आपके लिए है. ऐसे में क्या करेंगी आप? क्या ज़िंदगी जीने के लिए कभीकभी ख़तरों से नहीं खेलना पड़ता?

भ्रमित जीवन की शिकार

दरअसल अविवाहित लड़कियां अपने प्यार को चाहे जितना सच्चा मानें, ख़ुद को चाहे जितना स्मार्ट समझें, शादीशुदा पुरुष की निगाह में वे बस इच्छाओं की पूर्ति का एक साधन होती हैं. अपनी समझ से जब वे प्यार कर रही होती हैं, तब वस्तुतः वे शिकार बन रही होती हैं. इसके कई कारण हैं

कम उम्र वाली लड़कियों की चाहत होती है कि पुरुष उन पर ध्यान दें, उनके काम की प्रशंसा करें, उनकी ख़ूबसूरती की तारीफ़ करें. शादीशुदा पुरुष की अनुभवी आंखें उनकी इन चाहतों को बख़ूबी भांप जाती हैं. मन में तरहतरह के मंसूबे बांधे हुए पुरुष बाहरी तौर पर तो अच्छा बनते हुए व मदद करते हुए बड़े सहज भाव से लड़की की इच्छाएं पूरी करता है, पर साथ ही प्यार के नाम पर इसकी क़ीमत भी वसूलता जाता है.

स्त्री पुरुष से अपना पूरा वजूद, सारी भावनाएं जोड़ लेती है, लेकिन पुरुष इसका बस दिखावा करता है. स्त्री के दिल व भावनाओं से खेलते हुए पुरुष की असल ज़रूरत महज जिस्मानी होती है. स्त्री को इसका पता तब चलता है, जब बहुत देर हो चुकी होती है. उसके सारे सपने चूरचूर हो जाते हैं और वह डिप्रेशन से घिर जाती है.

अपने प्रेम या यूं कहें कि प्रेमी की ख़ातिर स्त्री को जितना सहना पड़ता है, उसके मुक़ाबले शादीशुदा पुरुष को कोई त्याग नहीं करना पड़ता. प्रेम का खुलासा होने पर लड़की को परिवार, पैरेंट्स की नाराज़गी के साथ समाज की तोहमत और बदनामी भी झेलनी पड़ती है, जिससे आगे चलकर शादी में अड़चनें भी आती हैं. इतना सब कुछ झेलने के बाद आख़िर स्त्री को मिलता क्या है? दोहरी ज़िंदगी जीनेवाले फरेबी पुरुष का दिखावटी और झूठा प्रेम. ऐसा प्रेम जो दूर से तो नज़र आता है, लेकिन नज़दीक जाने पर मृगमरीचिका साबित होता है.

इंडियन साइको सोशल फ़ाउंडेशन की सायकोलॉजिस्ट डॉ. समीक्षा कौर शादीशुदा पुरुषों से बढ़ते प्यार के लिए करियर को लेकर आई जागरूकता और इसके कारण शादी में देर, दहेज व वैवाहिक जीवन की समस्याओं से भागने की प्रवृत्ति को मानती हैं. वे इसे परिस्थितिवश हुआ समझौता करार देती हैं और कहती हैं, ”जहां तक पुरुषों की बात है, तो पार्टनर से विचारों में तालमेल का अभाव, पत्नी का गैरज़िम्मेदाराना रवैया जैसी चीज़ें उन्हें दूसरी स्त्री, ख़ासकर अपनी कलीग की ओर खींचते है. वहीं युवतियों में करियर को लेकर आई जागरूकता व वैवाहिक जीवन के झंझटों से दूर स्वच्छंद जीवन जीने की चाह ने ऐसी परिस्थितियां पैदा की हैं. करियर की भागमभाग में युवतियों को मानसिक, शारीरिक तृप्ति के लिए सुरक्षित बांहों की तलाश होती है, जहां उनकी महत्वाकांक्षाएं प्रभावित न होती हों. ऐसे में उन्हें साथ में काम करनेवाले विवाहित पुरुष ज़्यादा उपयुक्त दिखते हैं.”

डॉ. कौर ऐसे संबंधों में ठगे जाने की बात को भी स्वीकारती हैं. ”स्त्री पहले प्यार करती है और बाद में शारीरिक संबंधों के लिए तैयार होती है, जबकि पुरुष पहले शारीरिक संबंध बनाता है और बाद में वह भावनात्मक रूप से जुड़ भी सकता है, नहीं भी. ऐसी युवतियां ऐसे क़दम उठा तो लेती हैं, लेकिन उनकी सुख की तलाश ख़त्म नहीं होती, क्योंकि उनकी कल्पना में जो प्रेम होता है, वह दूसरी स्त्री के रूप में कभी हासिल नहीं होता. उन्हें सौतिया डाह तो नहीं होता, मगर अपने साथी की पत्नी को नीचा दिखाने की चाह ज़रूर होती है. ऐसे संबंधों को अब मौन सामाजिक स्वीकृति भी मिल चुकी है. अभिभावक तो नहीं, पर भाईबहन ऐसी बातें आपस में शेयर कर ही लेते हैं. कुछ मामलों में मांबाप भी इन संबंधों को स्वीकार कर लेते हैं.”

संजय श्रीवास्तव

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बेटा नहीं, बेटी कहो

क्या मेरा शृंगार मेरी कमज़ोरी है? हाथों की चूड़ियां ज़ंजीर हैं जैसे कोई, पैरों की पायल बेड़ियां हो गईं शायद… माथे की बिंदी ने लाजवंती बना दिया या कानों की बाली ने दासी बना दिया…?
मेरी ख़ूबसूरती के सारे प्रतीक मेरी कमज़ोरी की निशानी कब, क्यों और आख़िर कैसे बना दिए गए? मेरा बेटी होना ही क्या मेरा कमज़ोर होना है? आज जब मैं एक बेटी होकर भी घर की सारी ज़िम्मेदारियां पूरी करती हूं, तो क्यों तारीफ़ के नाम पर बार-बार यही सुनने को मिलता है कि ये हमारी बेटी नहीं, बेटा है?

जी हां, आज भी अक्सर हम अपने घरों या आसपास में इस तरह की बातें सुनते हैं, लेकिन ये तमाम बातें मन में एक सोच को ज़रूर जन्म देती हैं कि बेटी को बेटी ही क्यों नहीं रहने दिया जाता, अगर वो मज़बूत इरादोंवाली और ज़िम्मेदारियां उठानेवाली है, तो उसकी तुलना बेटों से की जाने लगती है. इन्हीं सवालों पर हम चर्चा करेंगे, शायद किसी अंजाम तक पहुंच जाएं…

कारण

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पारंपरिक सोच: चूंकि हमारे समाज में बेटों को घर का मुखिया मानकर हर काम की ज़िम्मेदारी की उम्मीद उनसे ही की जाती है, तो ऐसे में बेटी यदि इन कामों को करे, तो हम उसे बेटे जैसा मानते हैं, क्योंकि समाज में यह सोच नहीं बन पाई है अब तक कि बेटियों की भी ज़िम्मेदारियां होती हैं घर के प्रति.
दूसरी तरफ़ बेटा शब्द हमें आज भी गौरवान्वित कर जाता है, जिस गर्व से समाज में ‘बेटा’ शब्द बोला जाता है, वो गर्व ‘बेटी’ शब्द के प्रति नहीं जुड़ा है. दरअसल, बात स़िर्फ शब्द की नहीं, इसकी जड़ हमारी सोच से जुड़ी हुई है. हमारी पारंपरिक सोच यही है कि बेटा वंश चलाता है, बेटा परिवार चलाता है, बेटा बुढ़ापे का सहारा है… जबकि आज की बेटियों ने इन तमाम दकियानूसी ख़्यालात को ग़लत साबित कर दिखाया है, लेकिन उसके हक़ की इज़्ज़त आज भी उसे नहीं मिल रही, क्योंकि जो भी बेटियां इस तरह की तमाम ज़िम्मेदारियां निभाती हैं, उन्हें बेटे की ही उपाधि से नवाज़ा जाता है.

कैज़ुअल अप्रोच: हमारा पारिवारिक ढांचा अब भी ऐसा है कि बेटियों से हम ज़्यादा उम्मीदें नहीं लगाते. इसलिए वो जो भी करती हैं, हमें ‘एक्स्ट्रा’ ही लगता है. उनके प्रति बहुत ही कैज़ुअल अप्रोच रखते हैं कि बेचारी लड़की होकर आख़िर कितना करेगी और
क्यों करेगी?

पराया धन: आज भी बेटियों को हम घर का एक स्थायी सदस्य न मानकर पराया धन ही मानते हैं. उसे बोझ या ज़िम्मेदारी ही समझते हैं. यदि वो घर के प्रति या अपने पैरेंट्स के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करती है, तो हमें लगता है कि वह बेटों की भूमिका निभा रही है.

नज़ाकत का प्रतीक: चूंकि लड़कियां शरीर से नाज़ुक होती हैं, तो उनकी नज़ाकत को कमज़ोरी से जोड़कर देखा जाता है. यही वजह है कि बेटियां जब भी कोई अच्छा व ज़िम्मेदारी का काम करती हैं, तो कहा जाता है कि यह बेटी नहीं, बेटा है घर का यानी बेटा अपने आप में मज़बूती व ज़िम्मेदारी का प्रतीक बन गया और बेटी कमज़ोरी का.

समाज का नज़रिया: भारतीय समाज ही नहीं, कई अन्य देशों व समाजों में भी महिलाओं को कमज़ोर आंका जाता है. उन्हें सजावट या उपभोग की वस्तु मात्र समझा जाता है. ऐसे में वहां जब लड़कियां कुछ अलग कर दिखाती हैं, तो वो दुनिया के लिए बड़ी ख़बर बन जाती है.
शायद इन जुमलों को अब बदलने का व़क्त आ गया है-

– अरे, क्या लड़कियों की तरह रो रहा है… तू तो मर्द है, लड़का होकर आंसू बहाना तुझे शोभा नहीं देता. अक्सर ये जुमला हम अपने आसपास व घरों में भी सुनते आ रहे हैं. जब भी कोई लड़का रोता है, भले ही वो बच्चा ही क्यों न हो, तो ख़ुद मां या उसकी बड़ी बहन के मुंह से पहला वाक्य यही निकलता है- क्या लड़कियों की तरह रो रहा है. स्ट्रॉन्ग बन.

– अगर तुमसे यह काम नहीं होता, तो हाथों में चूड़ियां पहन लो… चूड़ियां, जो नारी का शृंगार होती हैं. उसके सौंदर्य का प्रतीक होती हैं, उन्हें भी कमज़ोरी की निशानी के तौर पर देखा जाता है. अगर कोई पुरुष किसी काम में कमज़ोर पड़ जाए या फिर उसे ललकारना हो, तो स्वयं महिलाएं भी यह बोलती मिलती हैं कि यह तुम्हारे बस की बात नहीं, तुम चूड़ियां पहन लो…

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– ये लड़कों वाले काम तुम क्यों कर रही हो? जब भी कोई शारीरिक मेहनत का काम हो और कोई लड़की उसे करती नज़र आए, तो अक्सर यही कहा जाता है कि ये लड़कोंवाले काम हैं, तुम्हें ये सब करना शोभा नहीं देता. शायद अब व़क्त आ गया है कि हमें ख़ुद थोड़ा सतर्क रहना होगा अपने शब्दों के चयन में और अपने व्यवहार में, ताकि अंजाने ही सही, लेकिन इस तरह के भेदभाव के बीज, जो हम बचपन से अपनी संतानों के मन में बोते आ रहे हैं, उनसे वो बच सकें.

वक्त बदल रहा है

 

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– वक्त, समाज की सोच और लोगों का नज़रिया भी अब बदल रहा है. कई ऐसे काम हैं, जहां पहले महिलाओं का दख़ल तक नहीं था, जो स़िर्फ पुरुषों के ही माने जाते थे, वहां भी अब बेटियां अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं और इतना ही नहीं, अपने अच्छे काम से सबकी वाहवाही भी लूट रही हैं.

– सेना में अब तक महिलाओं की भूमिका सीमित थी, लेकिन अब उन्हें भी पूरा मौक़ा मिलेगा. सबसे बड़ी बात कि भारतीय वायुसेना में अब महिला फाइटर पायलेट्स को भी जगह मिलेगी यानी महिलाएं अब फाइटर प्लेन उड़ा सकेंगी.

– अब लोग समझने लगे हैं कि कोमल और कमज़ोर दो अलग-अलग शब्द हैं और बेटियां भले ही कोमल हों, पर कमज़ोर बिल्कुल नहीं हैं. इसलिए हर बेटी अब यही कहना चाहती है कि प्लीज़ हमें बेटा नहीं, बेटी कहो.

एक्सपर्ट ओपिनियन

इस विषय में हमने बात की सायकोथेरेपिस्ट डॉ. चित्रा मुंशी से-

– दरअसल, समाज की प्रवृत्ति सदियों से ऐसी ही बनी हुई है, ख़ासतौर से अगर हम पूर्वी देशों की बात करें, तो हमारे समाज में लिंग के आधार पर भूमिकाएं अधिक बंटी हुई हैं, बजाय रिश्तों के आधार पर.

–  पुरुषों को रोटी कमानेवाला यानी ब्रेड अर्नर माना जाता है. ऐसे में जिन परिवारों में ये भूमिका बेटों की जगह बेटियां निभाती हैं, वहां इसके साथ एक गिल्ट यानी अपराधबोध जुड़ जाता है. लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि यह निर्णय कौन लेता है कि ये काम किसका है और किसका नहीं?

– यहां समाज की प्रचलित मान्यताओं को ही हम आधार बना लेते हैं, जैसे- 10 में से 8 लोग यही सोच रखते हैं कि यह काम बेटों का है और दो लोग इसमें भेदभाव नहीं करते, तो हम 8 लोगों को आधार बना लेते हैं, क्योंकि मेजोरिटी यही सोचती है.

– इस तरह सायकोसोशल डेवलपमेंट जेंडर डिफरेंस सिखाता है, न कि बायलॉजिकल डिफरेंस. असली फ़र्क़ समाज क्या भूमिका दे रहा है, उसी पर निर्भर करता है और हमारे यहां लड़कियों को केयरटेकर का रोल ही दिया जाता है. उदाहरण के तौर पर- अगर घर में बच्चों को अपनी मातृभाषा बोलनी नहीं आती, तो हर कोई स्त्री से ही सवाल करेगा कि बच्चों को कुछ सिखाया नहीं, कोई भी बच्चों के पिता से नहीं पूछेगा, बल्कि उसके प्रति सहानुभूति व्यक्त करेगा कि ये बेचारा तो दिनभर कमाने में ही लगा रहता है, इसके पास समय ही कहां है.

– यहां मैं यह ज़रूर कहना चाहूंगी कि यह अपेक्षा रखना कि समाज जल्द ही बदल जाएगा, ग़लत है, क्योंकि इसमें सदियां लगेंगी, लेकिन जागरूकता ज़रूर फैलाई जा सकती है, क्योंकि यह समाज हम से ही बना है, हम यदि अपने घर से बदलाव की शुरुआत करते हैं और ये जो एक चक्र बना हुआ है, उसे तोड़ते हैं, तो धीरे-धीरे बदलाव संभव है.

– चूंकि समय बदल रहा है, तो आज की ज़रूरतें व हमारी भूमिकाएं भी बदल रही हैं. आज हमें उस पारंपरिक चक्र की ज़रूरत नहीं है, जो पहले हुआ करती थी. ऐसे में इस चक्र को बदलना
ज़रूरी है.

–  हम यह नहीं कह सकते कि सब कुछ एकदम से बदल डालो या परंपराएं तोड़ दो, लेकिन हमें इस प्रवाह की दिशा को मोड़ना होगा और न स़िर्फ मोड़ना होगा, बल्कि लगातार इसका फॉलोअप करना होगा कि क्या सच में अपने स्तर पर, अपने घरों में व आसपास हम बदलाव लाने का सफल प्रयास कर रहे हैं?

– छोटे स्तर पर ये प्रयास होने चाहिए. अगर कोई टीचर है, तो वो अपने विद्यार्थियों को समानता की बात समझा सकता है, अगर कोई लेखक है, तो वो लेखों के ज़रिए जागरूकता ला सकता है. इसी तरह से हम अपने घरों में, अपने रिश्तों व रिश्तों की भूमिकाओं में परिवर्तन ला सकते हैं, ताकि ये भूमिकाएं लिंग के आधार पर न होकर रिश्तों के आधार पर हों.

– गीता शर्मा